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Detailed Chapter 17 श्वसन और गैसों का आदान-प्रदान UP Board Solutions for Class 11 Biology
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Class 11 Biology Chapter 17 श्वसन और गैसों का आदान-प्रदान UP Board Solutions PDF
अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर
Question 1. जैव क्षमता की परिभाषा दीजिए और इसका महत्त्व बताइए ।
Answer: जैव क्षमता। अन्तःश्वास आरक्षित वायु (Inspiratory Reserve Air Volume, IRV), प्रवाही वायु (Tidal Air Volume, TV) तथा उच्छ्वास आरक्षित वायु (Expiratory Reserve Air Volume, ERV) का योग (IRV + TV + ERV- 3000 + 500 + 1100 = 4600 मिली) फेफड़ों की जैव क्षमता होती है। यह वायु की वह कुल मात्रा होती है जिसे हम पहले पूरी चेष्टा द्वारा फेफड़ों में भरकर पूरी चेष्टा द्वारा शरीर से बाहर निकाल सकते हैं। जिस व्यक्ति की जैव क्षमता जितनी अधिक होती है, उसे शरीर की जैविक क्रियाओं के लिए उतनी ही अधिक ऊर्जा प्राप्त होती है। खिलाड़ियों, पर्वतारोही, तैराक आदि की जैव क्षमता अधिक होती है। युवक की जैव क्षमता प्रौढ़ की अपेक्षा अधिक होती है। पुरुषों की जैव क्षमता स्त्रियों की अपेक्षा अधिक होती है। यह उनकी कार्य क्षमता को प्रभावित करती है।
In simple words: जैव क्षमता फेफड़ों की वह अधिकतम वायु मात्रा है जिसे पूरी कोशिश से बाहर निकाला जा सकता है, यह IRV, TV, और ERV का योग होती है। इसका अधिक होना बेहतर शारीरिक क्रियाशीलता और ऊर्जा स्तर को दर्शाता है।
🎯 Exam Tip: जैव क्षमता (Vital Capacity) की परिभाषा और उसके घटकों (IRV, TV, ERV) को याद रखना महत्वपूर्ण है, साथ ही विभिन्न व्यक्तियों में इसके महत्व को समझना भी आवश्यक है।
Question 2. सामान्य निःश्वसन के उपरान्त फेफड़ों में शेष वायु के आयतन को बताएँ।
Answer: वायु की वह मात्रा जो सामान्य निःश्वसन (उच्छ्वास) के उपरान्त फेफड़ों में शेष रहती है, कार्यात्मक अवशेष सामर्थ्य (Functional Residual Capacity, FRC) कहलाती है। यह उच्छ्वास आरक्षित वायु (Expiratory Reserve Air Volume, ERV) तथा अवशेष वायु (Residual Air Volume, RV) के योग के बराबर होती है। इसकी सामान्यतया मात्रा 2300 मिली होती है।
FRC = ERV + RV
= 1100 + 1200 मिली
= 2300 मिली ।
In simple words: कार्यात्मक अवशेष सामर्थ्य (FRC) वह वायु है जो सामान्य सांस बाहर निकालने के बाद फेफड़ों में बची रहती है, जो ERV और RV का योग होती है और आमतौर पर 2300 मिली होती है।
🎯 Exam Tip: कार्यात्मक अवशेष सामर्थ्य (FRC) की सटीक परिभाषा और उसके घटक (ERV, RV) तथा उनका सामान्य मान याद रखना परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 3. गैसों का विसरण केवल कूपकीय क्षेत्र में होता है, श्वसन तन्त्र के किसी अन्य भाग में नहीं, क्यों?
Answer: गैसीय विनिमय मनुष्य के फेफड़ों में लगभग 30 करोड़ वायु कोष्ठक या कूपिकाएँ (alveoli) होते हैं। इनकी पतली भित्ति में रक्त केशिकाओं को घना जाल फैला होता है। श्वासनाल (trachea), श्वसनी (bronchus), श्वसनिका (bronchiole), कूपिका नलिकाओं (alveolar duct) आदि में रक्त केशिकाओं का जाल फैला हुआ नहीं होता। इनकी भित्ति मोटी होती है। अतः कूपिकाओं (alveoli) को छोड़कर अन्य श्वसन भागों में गैसीय विनिमय नहीं होता। सामान्यतया ग्रहण की गई 500 मिली प्रवाही वायु में से लगभग 350 मिली कूपिकाओं में पहुँचती है, शेष श्वास मार्ग में ही रह जाती है। वायु कोष्ठकों की भित्ति तथा रक्त केशिकाओं की भित्ति मिलकर श्वसन कला (respiratory membrane) बनाती हैं। इससे O2 तथा C का विनिमय सुगमता से हो जाता है। गैसीय विनिमय सामान्य विसरण द्वारा होता है। इसमें गैसें उच्च आंशिक दबाव से कम आंशिक दबाव की ओर विसरित होती हैं। वायुकोष्ठकों में O2 का आंशिक दबाव 100-104 mm Hg और CO2 का आंशिक दबाव 40 mm Hg होता है। फेफड़ों में रक्त केशिकाओं में आए अशुद्ध रुधिर में 0 का आंशिक दबाव 40 mm Hg और CO2 का आंशिक दबाव 45-46 mm Hg होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र वायुकोष्ठक (एल्विओलाई) और उसके आसपास की केशिकाओं के बीच गैसों के आदान-प्रदान को दर्शाता है। यह दिखाता है कि कैसे ऑक्सीजन वायुकोष्ठक से केशिकाओं में जाती है जहाँ रक्त अशुद्ध होता है, और कार्बन डाइऑक्साइड केशिकाओं से वायुकोष्ठक में आती है। चित्र में P(O2) और P(CO2) के आंशिक दबाव मानों को भी दर्शाया गया है जो गैस विनिमय को बढ़ावा देते हैं।
ऑक्सीजन वायुकोष्ठकों की वायु से विसरित होकर रक्त में जाती है और रक्त से CO2 विसरित होकर वायुकोष्ठकों की वायु में जाती है। इस प्रकार वायुकोष्ठकों से रक्त ले जाने वाली रक्त केशिकाओं में रक्त ऑक्सीजनयुक्त (Oxygenated) होता है। फेफड़ों से निष्कासित वायु में O2 लगभग 15.7% और CO2 लगभग 3.6% होती है।
In simple words: गैसों का विनिमय केवल कूपिकाओं (एल्विओलाई) में होता है क्योंकि उनकी पतली दीवारें और घनी केशिका जाल एक पतली श्वसन झिल्ली बनाते हैं, जो आंशिक दबाव के अंतर के कारण गैसों के कुशल विसरण की अनुमति देते हैं, जबकि अन्य श्वसन मार्गों की दीवारें मोटी होती हैं।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न का उत्तर देते समय, कूपिकाओं की संरचनात्मक विशेषताओं (पतली दीवारें, रक्त केशिकाओं का घना जाल) और आंशिक दबाव प्रवणता के महत्व पर जोर देना महत्वपूर्ण है।
Question 4. CO2 के परिवहन (ट्रांसपोर्ट) की मुख्य क्रियाविधि क्या है? व्याख्या कीजिए।
Answer: कार्बन डाइऑक्साइड का रुधिर द्वारा परिवहन ऊतकों में संचित खाद्य पदार्थों के ऑक्सीकरण से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड विसरण द्वारा रुधिर केशिकाओं में चली जाती है। रुधिर केशिकाओं द्वारा इसकापरिवहन श्वसनांगों तक निम्नलिखित तीन प्रकार से होता है
(1) प्लाज्मा में घुलकर (Dissolved in Plasma) : लगभग 7% कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन प्लाज्मा में घुलकर कार्बोनिक अम्ल के रूप में होता है।
(2) बाइकार्बोनेट्स के रूप में (In the form of Bicarbonates) :
लगभग 70% कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन बाइकार्बोनेट्स के रूप में होता है। प्लाज्मा के अन्दर कार्बोनिक अम्ल का निर्माण धीमी गति से होता है। अतः कार्बन डाइऑक्साइड का अधिकांश भाग (93%) लाल रुधिराणुओं में विसरित हो जाता है। इसमें से 70% कार्बन डाइऑक्साइड से कार्बोनिक अम्ल व अन्त में बाइकार्बोनेट्स का निर्माण हो जाता है। लाल रुधिराणुओं में कार्बोनिक एनहाइड्रेज एन्जाइम की उपस्थिति में कार्बोनिक अम्ल का निर्माण होता है।
प्लाज्मा में, कार्बोनिक एनहाइड्रेज एन्जाइम अनुपस्थित होता है; अतः प्लाज्मा में बाइकार्बोनेट कम मात्रा में बनता है। बाइकार्बोनेट आयन लाल रुधिराणुओं के पोटैशियम आयन (K+) तथा प्लाज्मा के सोडियम आयन (Na+) से क्रिया करके क्रमशः पोटैशियम तथा सोडियम बाइकार्बोनेट बनाता है।
(i) प्लाज्मा में- HCO3- + Na+ \( \rightarrow \) NaHCO3
सोडियम बाइकार्बोनेट
(ii) लाल रुधिराणुओं में- HCO3- + K+ \( \rightarrow \) KHCO3
पोटैशियम बाइकार्बोनेट
क्लोराइड शिफ्ट या हैम्बर्गर परिघटना (Chloride Shift or Hambergur Phenomenon) सामान्य pH तथा विद्युत तटस्थता (electric neutrality) बनाए रखने के लिए जितने बाइकार्बोनेट आयन रुधिर कणिकाओं से प्लाज्मा में आते हैं, उतने ही क्लोराइड आयन (Cl-) रुधिर कणिकाओं में जाकर उसकी पूर्ति करते हैं। इस क्रिया के फलस्वरूप प्लाज्मा में बाइकार्बोनेट तथा लाल रुधिरे कणिकाओं में क्लोराइड आयनों का जमाव हो जाता है। इस क्रिया को क्लोराइड शिफ्ट (chloride shift) कहते हैं। श्वसन तल पर प्रक्रियाएँ विपरीत दिशा में होती हैं जिससे CO2 मुक्त होकर वायुमण्डल में चली जाती है।
(3) कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन के रूप में (In the form of Carboxyhaemoglobin) : कार्बन डाइऑक्साइड का लगभग 23% भाग लाल रुधिर कणिकाओं के हीमोग्लोबिन से मिलकर अस्थायी यौगिक बनाता है
सोडियम तथा पोटैशियम के बाइकार्बोनेट्स तथा कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन आदि पदार्थों से युक्त रुधिर अशुद्ध होता है। यह रुधिर ऊतकों और अंगों से शिराओं द्वारा हृदय में पहुँचता है। हृदय से यह रुधिर फुफ्फुस धमनियों द्वारा फेफड़ों में शुद्ध होने के लिए जाता है। फेफड़ों में ऑक्सीजन की अधिक मात्रा होने के कारण रुधिर की हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन से मिलकर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है। ऑक्सीहीमोग्लोबिन, हीमोग्लोबिन की अपेक्षा अधिक अम्लीय होता है। ऑक्सीहीमोग्लोबिन के अम्लीय होने के कारण श्वसन सतह पर कार्बोनेट्स तथा कार्बोनिक अम्ल का विखण्डन (decomposition) होता है
(क) 2NaHCO3 \( \xrightarrow{\text{ऑक्सीहीमोग्लोबिन की अम्लीयता}} \) Na2CO3 + H2O + CO2\( \uparrow \)
(ख) 2KHCO3 \( \xrightarrow{\text{ऑक्सीहीमोग्लोबिन की अम्लीयता}} \) K2CO3 + H2O + CO2\( \uparrow \)
(ग) H2CO3 \( \rightarrow \) H2O + CO2\( \uparrow \)
कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन तथा प्लाज्मा प्रोटीन के रूप में बने अस्थायी यौगिक भी ऑक्सीजन से संयोजित होकर कार्बन डाइऑक्साइड को मुक्त कर देते है उपर्युक्त प्रकार से मुक्त हुई कार्बन डाइऑक्साइड रुधिर केशिकाओं तथा फेफड़ों की पतली दीवारों से विसरित होकर फेफड़ों में पहुँचती है जहाँ से यह उच्छ्वास द्वारा बाहर निकाल दी जाती है।
In simple words: कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन मुख्य रूप से बाइकार्बोनेट्स (लगभग 70%), कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन (लगभग 23%) और प्लाज्मा में घुली हुई अवस्था (लगभग 7%) में होता है। बाइकार्बोनेट निर्माण में लाल रक्त कोशिकाओं में कार्बोनिक एनहाइड्रेज एंजाइम महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, और क्लोराइड शिफ्ट pH संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।
🎯 Exam Tip: CO2 परिवहन के तीनों मुख्य रूपों (बाइकार्बोनेट्स, कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन, प्लाज्मा में घुलनशील) को उनके प्रतिशत योगदान और संबंधित रासायनिक प्रतिक्रियाओं (विशेषकर क्लोराइड शिफ्ट) के साथ विस्तार से समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 5. कूपिका वायु की तुलना में वायुमण्डलीय वायु में pO2 तथा pCO2 कितनी होगी? मिलान कीजिए।
(i) pO2 न्यून, pCO2 उच्च
(ii) pO2 उच्च, pCO2 न्यून
(iii) pO2 उच्च, pCO2 उच्च
(iv) pO2 न्यून, pCO2 न्यून
Answer: (ii) pO2 उच्च, pCO2 न्यून । (वायुमण्डलीय वायु में O2 का आंशिक दाब 159 तथा CO2 का आंशिक दाब 0.3 होता है, जबकि कूपिका वायु में O2 का आंशिक दाब 104 तथा CO2 का आंशिक दाब 40 होता है।)
In simple words: वायुमंडलीय वायु में ऑक्सीजन का आंशिक दबाव कूपिका वायु की तुलना में अधिक होता है, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड का आंशिक दबाव कूपिका वायु की तुलना में बहुत कम होता है।
🎯 Exam Tip: वायुमंडलीय वायु और कूपिका वायु में pO2 और pCO2 के आंशिक दबावों के बीच के अंतर को याद रखें, क्योंकि यह गैस विनिमय के लिए महत्वपूर्ण प्रेरक शक्ति है।
Question 6. सामान्य स्थिति में अन्तःश्वसन प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए ।
Answer: सामान्य श्वासोच्छ्वास (breathing) या श्वासन अनैच्छिक होता है। इसमें पसलियों की गति की भूमिका 25% और डायफ्राम की भूमिका 75% होती है।
अन्तःश्वास या प्रश्वसन (Inspiration) : सामान्य स्थिति में अन्तःश्वास में गुम्बदनुमा डायफ्राम पेशियों में संकुचन के कारण चपटा सा हो जाता है। डायफ्राम की गति के साथ बाह्य अन्तरापर्शक पेशियों (external intercostal muscles) में संकुचने से पसलियाँ सीधी होकर ग्रीवा की तथा बाहर की तरफ खिंचती है। इससे उरोस्थि (sternum) ऊपर और आगे की ओर उठ जाती है। इन गतियों के कारण वक्षगुहा का आयतन बढ़ जाता है और फेफड़े फूल जाते हैं। वक्ष गुहा और फेफड़ों में वृद्धि के कारण वायुकोष्ठकों या कूपिकाओं (alveoli) में वायुदाब लगभग 1 से 3mm Hg कम हो जाता है। इसकी पूर्ति के लिए वायुमण्डलीय वायु श्वास मार्ग से कूपिकाओं में पहुँच जाती है। इस क्रिया को अन्तःश्वास कहते हैं। इसके द्वारा मनुष्य (अन्य स्तनी) वायु ग्रहण करते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र श्वासोच्छ्वास की क्रियाविधि को दर्शाता है, विशेष रूप से अंतःश्वसन (A) और उच्छ्वसन (B)। अंतःश्वसन (A) में, डायफ्राम नीचे चपटा होता है और बाह्य अंतरापर्शुक पेशियां पसलियों को ऊपर व बाहर खींचती हैं, जिससे वक्ष गुहा का आयतन बढ़ता है। उच्छ्वसन (B) में, डायफ्राम ऊपर उठता है और पेशियां शिथिल होती हैं, जिससे वक्ष गुहा का आयतन घटता है।
In simple words: अंतःश्वसन में, डायफ्राम चपटा होता है और बाह्य अंतरापर्शुक पेशियों के संकुचन से पसलियां उठती हैं, जिससे वक्षगुहा का आयतन बढ़ता है। इससे फेफड़ों के अंदर दबाव कम होता है और वायुमंडलीय वायु फेफड़ों में प्रवेश करती है।
🎯 Exam Tip: अंतःश्वसन प्रक्रिया के यांत्रिक चरणों (डायफ्राम और पसलियों की गति) और उनके कारण होने वाले दबाव परिवर्तनों को स्पष्ट रूप से समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 7. श्वसन का नियमन कैसे होता है?
Answer: श्वसन का नियमन मस्तिष्क के मेडयूला (medulla) एवं पोन्स वैरोलाइ (Pons varolii) में स्थित श्वास केन्द्र (respiratory centre) पसलियों तथा डायफ्राम से सम्बन्धित पेशियों की क्रिया का नियमन करके श्वासोच्छ्वास (breathing) या श्वसन (respiration) का नियमन करता है। श्वास क्रिया तन्त्रिकीय नियन्त्रण में होती है। यही कारण है कि हम अधिक देर तक श्वास नहीं रोक पाते हैं। फेफड़ों की भित्ति में 'स्ट्रेच संवेदांग' (stretch receptors) होते हैं। फेफड़ों के आवश्यकता से अधिक फूल जाने पर ये संवेदांग पुनर्निवेशन नियन्त्रण (feedback control) के अन्तर्गत निःश्वसन को तुरन्त रोकने के लिए हेरिंग बुएर रिफ्लेक्स चाप (Hering-Bruer Reflex Arch) की स्थापना करके श्वास केन्द्र को उद्दीपित करते हैं, जिससे श्वास दर बढ़ जाती है। यह नियन्त्रण प्रतिवर्ती क्रिया के अन्तर्गत होता है।
शरीर के अन्तःवातावरण में CO2 की सान्द्रता के कम या अधिक हो जाने से श्वास केन्द्र स्वतः उद्दीपित होकर श्वास दर को बढ़ाता या घटाता है। O2 की अधिकता कैरोटिको सिस्टैमिक चाप (Carotico systemic arch) में उपस्थित सूक्ष्म रासायनिक संवेदांगों को प्रभावित करती है। ये संवेदांग श्वास केन्द्र को प्रेरित करके श्वास दर को घटा या बढ़ा देते हैं।
In simple words: श्वसन का नियमन मस्तिष्क के मेड्यूला और पोन्स वैरोलाई में स्थित श्वास केंद्र द्वारा होता है, जो डायफ्राम और पसलियों की मांसपेशियों को नियंत्रित करता है। रक्त में CO2 और O2 के स्तर के अनुसार रासायनिक संवेदांग (chemoreceptors) इस केंद्र को उत्तेजित कर श्वसन दर को समायोजित करते हैं, तथा फेफड़ों में मौजूद स्ट्रेच रिसेप्टर्स भी एक प्रतिवर्ती क्रिया (हेरिंग-बुएर रिफ्लेक्स) के माध्यम से नियमन में मदद करते हैं।
🎯 Exam Tip: श्वसन नियमन में मस्तिष्क के विभिन्न भागों (मेड्यूला, पोन्स), स्ट्रेच रिसेप्टर्स और रासायनिक संवेदांगों की भूमिका को विस्तार से समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 8. pCO2 का ऑक्सीजन के परिवहन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
Answer: कूपिकाओं में जहाँ pO2 उच्च तथा pCO2 न्यून होता है H⁺ सांद्रता कम तथा ताप कम होने पर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनता है। ऊतकों में जहाँ pO2 न्यून तथा pCO2 उच्च होता है H⁺ सांद्रता अधिक तथा ताप अधिक होता है। ऑक्सीहीमोग्लोबिन का विघटन होता है तथा 0, मुक्त हो जाती है। इसका अर्थ है O2 फेफड़े की सतह पर हीमोग्लोबिन के साथ मिलती है तथा ऊतकों में अलग हो जाती है। सामान्य परिस्थिति में 5 मिली 02 ऊतकों को प्रति 100 मिली ऑक्सीजनित रक्त से मिलता है।
In simple words: उच्च pCO2 और H+ सांद्रता (अम्लता) ऑक्सीजन को हीमोग्लोबिन से अलग करने में मदद करती है, जिससे ऑक्सीजन ऊतकों तक पहुंच पाती है। इसके विपरीत, निम्न pCO2 और H+ सांद्रता फेफड़ों में हीमोग्लोबिन को ऑक्सीजन से बांधने में मदद करती है।
🎯 Exam Tip: ऑक्सीजन परिवहन पर pCO2 के प्रभाव को बोहर प्रभाव से जोड़कर समझाएं और फेफड़ों व ऊतकों में pCO2, pO2, H+ सांद्रता और तापमान की स्थितियों का उल्लेख करें।
Question 9. पहाड़ पर चढ़ने वाले व्यक्ति की श्वसन प्रक्रिया में क्या प्रभाव पड़ता है?
Answer: पहाड़ पर ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ वायु में O2 का आंशिक दाब कम हो जाता है; अतः मैदान की अपेक्षा ऊँचाई पर श्वासोच्छ्वास क्रिया अधिक तीव्र गति से होगी। इसके निम्नलिखित कारण होते हैं
1. रुधिर में घुली हुई ऑक्सीजन का आंशिक दाब कम हो जाता है। O2 रक्त में सुगमता से विसरित होती है। अतः शरीर में ऑक्सीजन परिसंचरण कम हो जाता है। इसके फलस्वरूप सिरदर्द तथा उल्टी (वमन) का आभास होता है।
2. अधिक ऊँचाई पर वायु में ऑक्सीजन की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है; अतः वायु से अधिक O2 प्राप्त करने के लिए श्वासोच्छ्वास क्रिया तीव्र हो जाती है।
3. कुछ दिनों तक ऊँचाई पर रहने से रुधिर में लाल रुधिराणुओं की संख्या बढ़ जाती है और श्वास क्रिया सामान्य हो जाती है।
In simple words: ऊँचाई बढ़ने पर वायुमंडलीय ऑक्सीजन का आंशिक दबाव कम हो जाता है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की कमी महसूस होती है, परिणामस्वरूप श्वासोच्छ्वास की दर बढ़ जाती है। समय के साथ, शरीर लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या बढ़ाकर इस कमी के अनुकूल हो जाता है।
🎯 Exam Tip: ऊँचाई पर ऑक्सीजन के आंशिक दबाव में कमी और शरीर की अनुकूली प्रतिक्रियाओं (श्वास दर में वृद्धि, RBCs की संख्या में वृद्धि) को स्पष्ट रूप से वर्णित करें।
Question 10. कीटों में श्वास क्रियाविधि कैसे होती है?
Answer:
कीटों में श्वास क्रियाविधि
कीटों में श्वसन हेतु ट्रैकिंया (trachea) पाए जाते हैं। कीटों के शरीर में ट्रैकिया का जाल फैला होता है। ट्रैकियो पारदर्शी, शाखामय, चमकीली नलिकाएँ होती हैं। ये श्वास रन्ध्रों (spiracles) द्वारा वायुमण्डल से सम्बन्धित रहती हैं। श्वास रन्ध्र छोटे वेश्म (atrium) में खुलते हैं। श्वास रन्ध्रों पर रोमाभ सदृश शूक तथा कपाट पाए जाते हैं। कुछ श्वास रन्ध्र सदैव खुले रहते हैं। शेष अन्तःश्वसन (inspiration) के समय खुलते हैं और उच्छ्व सन (expiration) के समय बन्द रहते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक कीट के आंतरिक शरीर रचना में ट्रैकिया प्रणाली का विस्तृत जाल दिखाता है, जो कीटों में श्वसन का मुख्य साधन है। यह दर्शाता है कि कैसे श्वास रंध्र (spiracles) बाहरी वातावरण से जुड़े होते हैं और ट्रैकिया, ट्रैकियोल्स और अन्य संबंधित वाहिकाओं के माध्यम से शरीर की कोशिकाओं तक ऑक्सीजन पहुँचाते हैं, जो शरीर के भीतर एक व्यापक नेटवर्क बनाती हैं।
ट्रैकियल वेश्म (atrium) से शाखाएँ निकलकर एक पृष्ठ तथा अधर तल पर 'ट्रैकिया का जाल बना लेती हैं। ट्रैकिया से निकलने वाली ट्रैकिओल्स (tracheoles) ऊतक या कोशिकाओं तक पहुँचती हैं। कीटों में गैसों का विनिमय बहुत ही प्रभावशाली होता है और 02 सीधे कोशिकाओं तक पहुँचती है। इसी कारण कीट सर्वाधिक क्रियाशील होते हैं।
In simple words: कीटों में श्वसन ट्रैकिया प्रणाली द्वारा होता है, जिसमें श्वास रंध्र (spiracles) वायुमंडलीय हवा लेते हैं और एक जटिल नलीदार नेटवर्क (ट्रैकिया और ट्रैकियोल्स) के माध्यम से ऑक्सीजन सीधे कोशिकाओं तक पहुंचाते हैं, जिससे अत्यधिक कुशल गैस विनिमय होता है।
🎯 Exam Tip: कीटों में श्वसन प्रणाली (ट्रैकिया, श्वास रंध्र, ट्रैकियोल्स) की संरचना और कार्यप्रणाली को विस्तार से समझाना महत्वपूर्ण है, साथ ही यह भी बताना कि यह सीधे कोशिकाओं तक ऑक्सीजन कैसे पहुंचाती है।
Question 11. ऑक्सीजन वियोजन वक्र की परिभाषा दीजिए। क्या आप इसकी सिग्माभ आकृति का कोई कारण बता सकते हैं?
Answer:
ऑक्सीजन वियोजन वक्र
हीमोग्लोबिन द्वारा ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमला ऑक्सीजन के आंशिक दबाव (partial pressure) अर्थात् pO2 पर निर्भर करती है। हीमोग्लोबिन-क़ी वह प्रतिशत मात्रा जो ऑक्सीजन ग्रहण करती है, इसकी प्रतिशत संतृप्ति (percentage saturation of haemoglobin) कहलाती है; जैसेफेफड़ों में रक्त के ऑक्सीजनीकृत होने पर O2 का आंशिक दबाव pO2) लगभग 97 mm Hg होता है। इस pO2 पर हीमोग्लोबिन की प्रतिशत संतृप्ति लगभग 98% होती है।
ऊतकों से वापस आने वाले रक्त में O2 का आंशिक दबाव pO2 लगभग 40 mm Hg होता है, इस pO2 पर हीमोग्लोबिन की प्रतिशत संतृप्ति लगभग 75% होती है। pO2 तथा हीमोग्लोबिन की प्रतिशत संतृप्ति के सम्बन्ध को ग्राफ पर अंकित करने पर एक सिग्माभ वक्र (sigmoid curve) प्राप्त होता है। इसे ऑक्सीजन वियोजन वक्र कहते हैं। ऑक्सीजन हीमोग्लोबिन वियोजन वक्र पर शरीर ताप एवं रक्त के pH का प्रभाव पड़ता है। ताप के बढ़ने या pH के कम होने पर यह वक्र दाहिनी ओर खिसकता है। इसके विपरीत ताप के कम होने या pH के अधिक होने से ऑक्सीजन हीमोग्लोबिन वक्र बाईं ओर खिसकता है। रक्त में CO2 की मात्रा बढ़ने या इसका pH घटने (H' आयन की संख्या बढ़ने से) पर O2 के प्रति हीमोग्लोबिन की आकर्षण शक्ति कम हो जाती है। इसी को बोहर प्रभाव (Bohr effect) कहते हैं। यह क्रिया ऊतकों में होती है। इस प्रकार बोहर प्रभाव का योगदान हीमोग्लोबिन को फेफड़ों से ऊतकों तक ऑक्सीजन के परिवहन को प्रोत्साहित करता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र ऑक्सीजन-हीमोग्लोबिन वियोजन वक्र को ग्राफिक रूप से दर्शाता है, जो हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन संतृप्ति प्रतिशत को ऑक्सीजन के आंशिक दबाव (PO2) के फलन के रूप में दिखाता है। वक्र की सिग्माभ आकृति हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन के प्रति बढ़ती आत्मीयता को दर्शाती है जैसे-जैसे अधिक ऑक्सीजन अणु इससे बंधते हैं। तालिका विभिन्न PO2 मानों पर हीमोग्लोबिन की संतृप्ति का संख्यात्मक डेटा प्रदान करती है, जो वक्र को पूरक करता है।
| PO2 (mm Hg) | % Sat. of Hb |
|---|---|
| 10 | 13.5 |
| 20 | 35 |
| 30 | 57 |
| 40 | 75 |
| 50 | 83.5 |
| 60 | 89 |
| 70 | 92.7 |
| 80 | 94.5 |
| 90 | 96.5 |
| 100 | 97.5 |
फेफड़ों में हीमोग्लोबिन को O2 मिलते ही CO2 के प्रति इसका आकर्षण कम हो जाता है और कार्बोमिनोहीमोग्लोबिन CO2 त्यागकर सामान्य हीमोग्लोबिन बन जाता है। अम्लीय हीमोग्लोबिन H⁺ आयन मुक्त करता है जो बाइकार्बोनेट (HCO3) से मिलकर कार्बोनिक अम्ल बनाते हैं। यह शीघ्र ही CO2 तथा H2Oमें टूटकर CO2 को मुक्त कर देता है। इसे हैल्डेन प्रभाव (Haldane effect) कहते हैं। हैल्डेन प्रभाव फेफड़ों में CO2 के बहिष्कार को और ऊतकों में 02 के बहिष्कार को प्रेरित करता है।
In simple words: ऑक्सीजन वियोजन वक्र एक सिग्माभ ग्राफ है जो ऑक्सीजन के आंशिक दबाव के सापेक्ष हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन संतृप्ति को दर्शाता है। इसकी सिग्माभ आकृति इसलिए होती है क्योंकि एक ऑक्सीजन अणु के जुड़ने से हीमोग्लोबिन के अन्य स्थलों पर ऑक्सीजन के जुड़ने की आत्मीयता बढ़ती है, और यह वक्र शरीर के ताप, pH, pCO2 जैसे कारकों से प्रभावित होता है (बोहर प्रभाव)।
🎯 Exam Tip: ऑक्सीजन वियोजन वक्र की परिभाषा, उसकी सिग्माभ आकृति के कारण और इसे प्रभावित करने वाले कारकों (तापमान, pH, pCO2 - बोहर प्रभाव) को उदाहरण सहित समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 12. क्या आपने अव-ऑक्सीयता (हाइपोक्सिया) (न्यून ऑक्सीजन) के बारे में सुना है। इस सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश कीजिए व साथियों के बीच चर्चा कीजिए ।
Answer:
अव-ऑक्सीयता (Hypoxia) :
इस स्थिति का सम्बन्ध शरीर की कोशिकाओं/ऊतकों में ऑक्सीजन के आंशिक दबाव में कमी से होता है। यह ऑक्सीजन की कम आपूर्ति के कारण होता है। वायुमण्डल में पहाड़ों पर 8000 फुट से अधिक ऊँचाई पर वायु में O2 का दबाव कम हो जाता है। इससे सिरदर्द, वमन, चक्कर आना, मानसिक थकान, श्वास लेने में कठिनाई आदि लक्षण प्रदर्शित होते हैं। इसे कृत्रिम हाइपोक्सिया (artificial hypoxia) कहते हैं। यह रोग प्रायः पर्वतारोहियों को हो। जाता है। शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी के कारण रक्त की ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता प्रभावित होती है। इसे एनीमिया हाइपोक्सिया (anaemia hypoxia) कहते हैं।
In simple words: हाइपोक्सिया शरीर की कोशिकाओं या ऊतकों में ऑक्सीजन की कमी की स्थिति है, जो ऊँचाई पर कम वायुमंडलीय ऑक्सीजन या हीमोग्लोबिन की कमी (एनीमिया हाइपोक्सिया) के कारण हो सकती है, जिससे सिरदर्द, थकान और सांस लेने में कठिनाई जैसे लक्षण उत्पन्न होते हैं।
🎯 Exam Tip: हाइपोक्सिया की परिभाषा, इसके कारणों (जैसे ऊँचाई, एनीमिया) और इसके सामान्य लक्षणों को स्पष्ट रूप से समझाएं।
Question 13. निम्न के बीच अन्तर करें
(क) IRV, ERV
(ख) अन्तः श्वसन क्षमता और निःश्वसन क्षमता
(ग) जैव क्षमता तथा फेफड़ों की कुल धारिता
Answer:
(क)
IRV व ERV में अन्तर
1. IRV : अन्तःश्वसन सुरक्षित आयतन (inspiratory reserve volume) वायु आयतन की वह अतिरिक्त मात्रा है जो एक व्यक्ति बलपूर्वक अन्तःश्वासित कर सकता है। यह औसतन 2500 मिली से 3000 मिली होती है।
2. ERV : निःश्वसन सुरक्षित आयतन (expiratory reserve volume) वायु आयतन की वह अतिरिक्त मात्रा है जो एक व्यक्ति बलपूर्वक निःश्वासित कर सकता है। यह औसतन 1000 मिली से 1100 मिली होता है।
(ख)
अन्तःश्वसन क्षमता व निःश्वसन क्षमता में अन्तर
1. अन्तःश्वसन क्षमता (Inspiratory Capacity, IC) : सामान्यतः निःश्वसन उपरान्त वायु की कुल मात्रा (आयतन) जिसे एक व्यक्ति अन्तःश्वासित कर सकता है। इसमें ज्वारीय आयतन तथा अन्तः श्वसन सुरक्षित आयतन सम्मिलत होते हैं (TV + IRV)।
2. निःश्वसन क्षमता (Expiratory Capacity, EC) : सामान्यतः अन्तः श्वसन उपरान्त वायु की कुल मात्रा (आयतन) जिसे एक व्यक्ति निःश्वासित कर सकता है। इसमें ज्वारीय आयतन और निःश्वसन सुरक्षित आयतन सम्मिलित होते हैं (TV + ERV)।
(ग)
जैव क्षमता तथा फेफड़ों की कुल धारिता में अन्तर
1. जैव क्षमता (Vital Capacity) : बलपूर्वक निःश्वसन के बाद वायु की वह अधिकतम मात्रा जो एक व्यक्ति अन्तःश्वासित कर सकता है अथवा वायु की वह अधिकतम मात्रा जो एक व्यक्ति बलपूर्वक अन्तःश्वसन के पश्चात् निःश्वासित कर सकता है।
2. फेफड़ों की कुल धारिता (Total Lung Capacity) :
बलपूर्वक निःश्वसन के पश्चात् । फेफड़ों में समायोजित (उपस्थित) वायु की कुल मात्रा । इसमें RV, ERV, TV तथा IRV सम्मिलित हैं। यानि जैव क्षमता + अवशिष्ट आयतन (VC + RV)।
In simple words: IRV वह अतिरिक्त वायु है जिसे बलपूर्वक अंदर लिया जा सकता है, जबकि ERV वह अतिरिक्त वायु है जिसे बलपूर्वक बाहर निकाला जा सकता है। अंतःश्वसन क्षमता TV और IRV का योग है, जबकि निःश्वसन क्षमता TV और ERV का योग है। जैव क्षमता बलपूर्वक साँस लेने या निकालने की अधिकतम मात्रा है, जबकि फेफड़ों की कुल धारिता फेफड़ों में समा सकने वाली कुल वायु (VC+RV) है।
🎯 Exam Tip: श्वसन आयतन और क्षमताओं की परिभाषाएं, उनके घटकों और सामान्य मानों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये फुफ्फुसीय कार्यप्रणाली को समझने के लिए आधारभूत हैं।
Question 14. ज्वारीय आयतन क्या है? एक स्वस्थ मनुष्य के लिए एक घण्टे के ज्वारीय आयतन (लगभग मात्रा) को आकलित करें।
Answer:
1. ज्वारीय आयतन (Tidal Volume, TV) : सामान्य श्वसन क्रिया के समय प्रति अन्तःश्वासित या निःश्वासित वायु का आयतन ज्वारीय आयतन कहलाता है। यह लगभग 500 मिली होता है अर्थात् स्वस्थ मनुष्य लगभग 6000 से 8000 मिली वायु प्रति मिनट की दर से अन्तःश्वासित/ निःश्वासित कर सकता है।
In simple words: ज्वारीय आयतन सामान्य श्वसन के दौरान अंदर ली गई या बाहर निकाली गई वायु की मात्रा है, जो आमतौर पर 500 मिलीलीटर होती है। एक स्वस्थ व्यक्ति एक घंटे में लगभग 360-480 लीटर वायु श्वसित करता है।
🎯 Exam Tip: ज्वारीय आयतन की परिभाषा और सामान्य मान को याद रखना महत्वपूर्ण है, साथ ही प्रति मिनट और प्रति घंटे श्वसन दर के संदर्भ में इसके व्यावहारिक अनुप्रयोग को भी समझना आवश्यक है।
परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न
Question 1. श्वसन भागफल का अर्थ है।
(क) ऑक्सीजन की प्रति मिनट ग्रहण (व्यय) मात्रा
(ख) कार्बन डाइऑक्साइड के उत्पादन एवं ऑक्सीजन के ग्रहण का अनुपात
(ग) प्रति मिनट कार्बन डाइऑक्साइड का ग्रहणे
(घ) ताप एवं ऑक्सीजन ग्रहण का अनुपात
Answer: (ख) कार्बन डाइऑक्साइड के उत्पादन एवं ऑक्सीजन के ग्रहण का अनुपात
In simple words: श्वसन भागफल (Respiratory Quotient - RQ) कार्बन डाइऑक्साइड की उत्पादित मात्रा और उपभोग की गई ऑक्सीजन की मात्रा का अनुपात है, जो श्वसन के लिए उपयोग किए जा रहे सबस्ट्रेट के प्रकार को इंगित करता है।
🎯 Exam Tip: श्वसन भागफल (RQ) की परिभाषा को याद रखना महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से यह जानने के लिए कि यह उत्पादित CO2 और उपभोग की गई O2 का अनुपात है।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. ब्रोंकाई को एक वाक्य में परिभाषित कीजिए।
Answer: ब्रोंकाई (bronchi) श्वसन नली (trachea) की वक्ष गुहा में पाई जाने वाली दो शाखाएँ हैं।
In simple words: ब्रोंकाई श्वासनली की दो मुख्य शाखाएं हैं जो फेफड़ों में हवा ले जाती हैं।
🎯 Exam Tip: ब्रोंकाई की परिभाषा को याद रखें और इसे श्वासनली से इसके संबंध को ध्यान में रखें।
Question 2. एपिग्लॉटिस का क्या कार्य है?
Answer: एपिग्लॉटिस कण्ठद्वार को ढक्कन की भाँति बन्द करने का कार्य करता है।
In simple words: एपिग्लॉटिस एक ढक्कन की तरह काम करता है जो भोजन निगलते समय श्वास नली को बंद कर देता है, ताकि भोजन फेफड़ों में न जाए।
🎯 Exam Tip: एपिग्लॉटिस के मुख्य कार्य-भोजन को श्वासनली में जाने से रोकना-को स्पष्ट रूप से याद रखें।
Question 3. “आणविक ऑक्सीजन जीवन हेतु नितान्त आवश्यक है।" कैसे? अति संक्षेप में समझाइए ।
Answer: आणविक ऑक्सीजन के द्वारा ही कोशिकाओं में आवश्यक ऊर्जा उत्पादन के लिए ऑक्सी श्वसन होता है जो बिना ऑक्सीजन के नहीं हो सकता। अतः जीवन को चलाये रखने के लिए आणविक ऑक्सीजन अत्यन्त आवश्यक है।
In simple words: आणविक ऑक्सीजन कोशिकीय श्वसन के लिए अनिवार्य है, जो कोशिकाओं में ऊर्जा उत्पन्न करने वाली प्रक्रिया है, और इस ऊर्जा के बिना जीवन संभव नहीं है।
🎯 Exam Tip: ऑक्सीजन की मौलिक भूमिका को कोशिकीय श्वसन और ऊर्जा उत्पादन के संदर्भ में संक्षेप में बताएं।
Question 4. ग्लाइकोलाइसिस क्रिया के अन्त में ग्लूकोज के प्रत्येक अणु से पाइरुविक अम्ल के कितने अणु बनते हैं? इस क्रिया में O2 की क्या उपयोगिता है?
Answer: ग्लाइकोलाइसिस क्रिया के अन्त में ग्लूकोज के प्रत्येक अणु से दो पाइरुविक अम्ल (pyruvic acid) अणु बनते हैं। इस क्रिया में O2 की कोई आवश्यकता नहीं होती है।
In simple words: ग्लाइकोलाइसिस में ग्लूकोज के एक अणु से दो पाइरुविक अम्ल के अणु बनते हैं, और इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन की कोई आवश्यकता नहीं होती है।
🎯 Exam Tip: ग्लाइकोलाइसिस के उत्पादों (पाइरुविक अम्ल के 2 अणु) और ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में इसकी प्रकृति को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 5. ATP तथा NADP का पूरा नाम लिखिए ।
Answer:
1. ATP-एडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट ।
2. NADP-निकोटिनामाइड ऐडीनीन डाइन्यूक्लियोटाइड फॉस्फेट ।
In simple words: ATP का पूरा नाम एडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट है, जो ऊर्जा मुद्रा है, जबकि NADP का पूरा नाम निकोटिनामाइड ऐडीनीन डाइन्यूक्लियोटाइड फॉस्फेट है, जो एक सहएंजाइम है।
🎯 Exam Tip: ATP और NADP के पूर्ण रूप को सही ढंग से याद रखना सुनिश्चित करें, क्योंकि ये जीव विज्ञान में महत्वपूर्ण अणु हैं।
Question 6. श्वसन क्रिया में हीमोग्लोबिन के महत्त्व पर प्रकाश डालिए। या मानव रुधिर में पाये जाने वाले श्वसन रंजक (वर्णक) का नाम तथा रासायनिक संघटन बताइए। या हीमोग्लोबिन के महत्त्वपूर्ण कार्यों का उल्लेख कीजिए।
Answer: मनुष्य सहित सभी कशेरुकियों (vertebrates) के तरल संयोजी ऊतक रुधिर (blood) की विशेष कोशिकाओं, जिन्हें लाल रुधिर कणिकाएँ (red blood corpuscles = RBCs) कहते हैं, में एक लोहयुक्त रंगा पदार्थ (pigment) पाया जाता है। यह हीमोग्लोबिन (haemoglobin) कहलाता है। हीमोग्लोबिन में लगभग 5% लोहा (Fe++) तथा शेष ग्लोबिन नामक प्रोटीन (protein) होती है।
हीमोग्लोबिन नामक इस पदार्थ में ऑक्सीजन (O2) तथा कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के संयोजन की अत्यधिक क्षमता होती है। इसीलिए श्वसन की क्रिया में यह इन गैसों के परिवहन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
In simple words: हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाने वाला एक लोहयुक्त प्रोटीन है जो ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी श्वसन गैसों के परिवहन के लिए जिम्मेदार होता है, जिससे यह श्वसन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
🎯 Exam Tip: हीमोग्लोबिन की संरचना (लोहा, ग्लोबिन प्रोटीन) और इसके प्राथमिक कार्य (O2 और CO2 का परिवहन) को समझना महत्वपूर्ण है।
Question 7. प्राणियों में पाये जाने वाले दो श्वसनी वर्णकों के नाम लिखिए।
Answer: हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) और हीमोसायनिन (Haemocyanin)।
In simple words: प्राणियों में दो मुख्य श्वसनी वर्णक हीमोग्लोबिन और हीमोसायनिन हैं, जो ऑक्सीजन परिवहन का कार्य करते हैं।
🎯 Exam Tip: हीमोग्लोबिन और हीमोसायनिन जैसे सामान्य श्वसन वर्णकों के नाम याद रखें।
Question 8. वयस्क मनुष्य सामान्यतः एक मिनट में कितनी बार श्वसन करता है? वायु संचालन कौन-सी क्रिया है?
Answer: सामान्य वयस्क मनुष्य एक मिनट में लगभग 12-20 बार श्वसन करता है। श्वसन एक भौतिक क्रिया है।
In simple words: एक वयस्क मनुष्य प्रति मिनट 12-20 बार सांस लेता है, और वायु का शरीर में प्रवेश और बाहर निकलना एक भौतिक प्रक्रिया है।
🎯 Exam Tip: स्वस्थ वयस्क की सामान्य श्वसन दर (12-20 बार प्रति मिनट) को याद रखें और श्वसन को एक भौतिक प्रक्रिया के रूप में पहचानें।
Question 9. श्वास रोध और श्वास क्षिप्रता को स्पष्ट कीजिए ।
Answer:
(i) श्वास रोध : इस रोग के अन्तर्गत श्वसन क्रिया में मांसपेशियाँ सुचारु रूप से कार्य नहीं कर पाती हैं तथा फेफड़ों का आयतन भी लगभग अपरिवर्तित रहता है।
(ii) श्वास क्षिप्रता : इस रोग में श्वास दर तीव्र हो जाती है। एक सामान्य वयस्क मनुष्य की आराम की अवस्था में श्वास दर लगभग 12-20 है, परन्तु श्वास क्षिप्रता से ग्रस्त व्यक्ति की श्वास दर 20 से ऊपर होती है।
In simple words: श्वास रोध (Asphyxia) में श्वसन मांसपेशियां ठीक से काम नहीं करतीं और फेफड़ों का आयतन अपरिवर्तित रहता है, जबकि श्वास क्षिप्रता (Tachypnea) में श्वसन दर सामान्य से बहुत अधिक (20 साँस/मिनट से अधिक) हो जाती है।
🎯 Exam Tip: श्वास रोध (Asphyxia) और श्वास क्षिप्रता (Tachypnea) की परिभाषाओं और उनके मुख्य अंतरों (मांसपेशियों का कार्य, श्वसन दर) को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 10. श्वसन तन्त्र के निम्नलिखित विकारों के कारण लिखिए
(i) एम्फिसीमा
(ii) अस्थमा
Answer:
(i) एम्फिसीमा : इस रोग में कूपिका भित्ति क्षतिग्रस्त हो जाती है जिससे गैस विनिमय की सतह घट जाती है। वायु प्रदूषण, धूम्रपान आदि इसके प्रमुख कारण हैं।
(ii) अस्थमा : इस रोग में श्वसनी और श्वसनिकाओं की शोथ के कारण श्वसन के समय घरघराहट होती है तथा श्वास लेने में कठिनाई होती है। वायु प्रदूषण, धूलयुक्त वायु, धूम्रपान आदि इसके प्रमुख कारण हैं।
In simple words: एम्फिसीमा में कूपिकाओं की दीवारें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं जिससे गैस विनिमय क्षेत्र कम हो जाता है, जबकि अस्थमा में श्वसनी और श्वसनिकाओं में सूजन के कारण सांस लेने में कठिनाई और घरघराहट होती है। दोनों के मुख्य कारण वायु प्रदूषण और धूम्रपान हैं।
🎯 Exam Tip: एम्फिसीमा और अस्थमा के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें, उनके शारीरिक प्रभावों (कूपिका क्षति बनाम वायुमार्ग की सूजन) और सामान्य कारणों को याद रखें।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. ATP का पूरा नाम लिखिए तथा इसके कार्य बताइए। या कोशिकीय श्वसन में माइटोकॉण्डूिया की क्या भूमिका है?
Answer: कोशिकीय श्वसन के अन्तर्गत क्रेब्स चक्र माइटोकॉण्ड्रिया में सम्पन्न होता है। इसके फलस्वरूप हाइड्रोजन परमाणु (2H) मुक्त होते हैं। इन्हें हाइड्रोजनग्राही NAD, NADP या FAD ग्रहण करके अपचयित हो जाते हैं। इन्हें पुनः ऑक्सीकृत स्थिति में लाने का कार्य इलेक्ट्रॉन परिवहन तन्त्र करता है। इसमें उच्च ऊर्जा इलेक्ट्रॉन मुक्त होता है। मुक्त इलेक्ट्रॉन जब एक इलेक्ट्रॉनग्राही से दूसरे इलेक्ट्रॉनग्राही पर ट्रान्सफर होता है तो ऊर्जा मुक्त होती है। मुक्त ऊर्जा की कुछ मात्रा ATP के रुप में संचित हो जाती है। यह क्रिया माइटोकॉण्ड्रिया के क्रिस्टी पर स्थित ऑक्सीसोम्स या F, कण पर होती है।
ATP (एडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट) में संचित ऊर्जा पेशीय गति, अपेशीय क्रियाओं, सक्रिय गमन, ऊष्मा। उत्पादन, जैव-संश्लेषण, जैव-विद्युत, जैव-प्रकाश उत्पादन आदि क्रियाओं में प्रयुक्त होती है। माइटोकॉण्ड्रिया को कोशिका का विद्युत गृह तथा ATP को उपापचय जगत का सिक्का कहते हैं।
In simple words: ATP (एडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट) कोशिकाओं की ऊर्जा मुद्रा है, जिसका उपयोग पेशीय गति, जैव-संश्लेषण और अन्य जैविक प्रक्रियाओं के लिए किया जाता है। माइटोकॉण्ड्रिया में क्रेब्स चक्र और इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र के माध्यम से ATP का उत्पादन होता है, जो इसे "कोशिका का पावरहाउस" बनाता है।
🎯 Exam Tip: ATP के पूर्ण रूप और उसके कार्यों के साथ-साथ माइटोकॉण्ड्रिया की भूमिका को क्रेब्स चक्र और इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र के स्थल के रूप में समझाना महत्वपूर्ण है, जो ATP उत्पादन में महत्वपूर्ण हैं।
Question 2. ए०टी०पी० क्या है? यह ए०डी०पी० से किस प्रकार भिन्न है?
Answer:
ए०टी०पी० (ATP) :
कोशिकीय श्वसन के फलस्वरूप मुक्त गतिज ऊर्जा ATP में संचित हो जाती है। यह ट्राइफॉस्फेट न्यूक्लिओटाइड (एडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट) है।
| ए०टी०पी० (ATP) | ए०डी०पी० (ADP) |
|---|---|
|
|
In simple words: ATP (एडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट) एक ऊर्जा-समृद्ध अणु है जिसमें तीन फॉस्फेट समूह होते हैं, जबकि ADP (एडीनोसीन डाइफॉस्फेट) में दो फॉस्फेट समूह होते हैं और इसमें कम ऊर्जा होती है। ATP ऊर्जा जारी करने के लिए ADP में बदल जाता है, और ADP ऊर्जा ग्रहण करके ATP में बदल जाता है।
🎯 Exam Tip: ATP और ADP की संरचनात्मक विशेषताओं (फॉस्फेट समूहों की संख्या) और ऊर्जा भंडारण/रिलीज में उनकी भूमिका को स्पष्ट रूप से अंतर करना महत्वपूर्ण है।
Question 3. निःश्वसन तथा उच्छ्वसन में अन्तर लिखिए।
Answer:
निःश्वसन तथा उच्छ्वसन में अन्तर
| निःश्वसन (Inspiration) | उच्छ्वसन (Expiration) |
|---|---|
|
|
In simple words: निःश्वसन (साँस अंदर लेना) एक सक्रिय प्रक्रिया है जहाँ डायफ्राम और बाह्य अंतरापर्शुक पेशियां सिकुड़ती हैं, जिससे वक्षगुहा का आयतन बढ़ता है और हवा फेफड़ों में आती है। उच्छ्वसन (साँस बाहर निकालना) एक निष्क्रिय प्रक्रिया है (सामान्य स्थिति में) जहाँ पेशियां शिथिल होती हैं, वक्षगुहा का आयतन घटता है और हवा बाहर निकल जाती है।
🎯 Exam Tip: निःश्वसन और उच्छ्वसन के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से बताएं, जिसमें शामिल मांसपेशियों की क्रियाएं, वक्षगुहा के आयतन में परिवर्तन और फेफड़ों के भीतर दबाव ग्रेडिएंट शामिल हैं।
Question 4. रुधिर में ऑक्सीजन गैस के संवहन का वर्णन कीजिए ।
Answer:
ऑक्सीजन का परिवहन
हीमोग्लोबिन लाल रक्त कणिकाओं में स्थित एक लाल रंग को लौहयुक्त वर्णक है। हीमोग्लोबिन के साथ उत्क्रमणीय (reversible) ढंग से बँधकर ऑक्सीजन ऑक्सीहीमोग्लोबिन (oxyhaemoglobin) का गठन कर सकता है। प्रत्येक हीमोग्लोबिन अणु अधिकतम चार O2 अणुओं को वहन कर सकते हैं। हीमोग्लोबिन के साथ ऑक्सीजन का बँधना प्राथमिक तौर पर O2 के आंशिक दाब से सम्बन्धित है। CO2 का आंशिक दाब, हाइड्रोजन आयन सांद्रता और तापक्रम कुछ अन्य कारक हैं जो इस बन्धन को बाधित कर सकते हैं। हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन से प्रतिशत संतृप्ति को pO2 के सापेक्ष आलेखित ।
करने पर सिग्माभ वक्र (sigmoid curve) प्राप्त होता है। इस वक्र को वियोजन वक्र (dissociation curve) कहते हैं जो हीमोग्लोबिन से 0, बंधन को प्रभावित करने वाले pCO2; H⁺ आयन सांद्रता आदि घटकों के अध्ययन में अत्यधिक सहायक होता है। कूपिकाओं में जहाँ उच्च pO2, निम्न pCO2; कम H⁺सांद्रता और निम्न तापक्रम होता है, वहाँ ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाने के लिए ये सभी घटक अनुकूल साबित होते हैं जबकि ऊतकों में निम्न pO2 उच्च pCO2 उच्च H⁺ सांद्रता और उच्च तापक्रम की स्थितियाँ ऑक्सीहीमोग्लोबिन से ऑक्सीजन के वियोजन के लिए अनुकूल होती हैं।
इससे स्पष्ट है कि O2 हीमोग्लोबिन से फेफड़ों की सतह पर बँधती है और ऊतकों में वियोजित हो जाती है। प्रत्येक 100 मिली ऑक्सीजनित रक्त सामान्य शरीर की क्रियात्मक स्थितियों में ऊतकों को लगभग 5 मिली O2 प्रदान करता है।
In simple words: ऑक्सीजन का परिवहन मुख्य रूप से हीमोग्लोबिन द्वारा ऑक्सीहीमोग्लोबिन के रूप में होता है। यह प्रक्रिया ऑक्सीजन के आंशिक दबाव, CO2 के आंशिक दबाव, pH और तापमान जैसे कारकों से प्रभावित होती है, जिससे फेफड़ों में ऑक्सीजन हीमोग्लोबिन से बंधती है और ऊतकों में मुक्त होती है।
🎯 Exam Tip: ऑक्सीजन परिवहन में हीमोग्लोबिन की भूमिका, ऑक्सीजन-हीमोग्लोबिन वियोजन वक्र की सिग्माभ आकृति, और इसे प्रभावित करने वाले कारकों (pO2, pCO2, pH, तापमान) को स्पष्ट रूप से समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 5. ऑर्निथीन चक्र को रेखाचित्र की सहायता से समझाइए। या ऑर्निथीन-आर्जिनीन चक्र को रेखीय चित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए।
Answer:
यूरिया का निर्माण या ऑर्निथीन चक्र
विभिन्न जैव-रासायनिक (bio-chemical) क्रियाओं के अन्तर्गत यकृत कोशिकाओं में अमोनिया को कार्बन डाइऑक्साइड के साथ मिलाकर यूरिया (urea) का निर्माण किया जाता है। ये क्रियाएँ एक चक्र के रूप में होती हैं जिसे ऑर्निथीन चक्र (ormithine cycle) अथवा क्रेब-हेन्सलीट चक्र (Kreb-Henseleit cycle) कहते हैं। इस चक्र में डीएमीनेशन से प्राप्त अमोनिया का एक अणु कार्बन डाइऑक्साइड के एक अणु से मिलकर कार्बमोइल फॉस्फेट (carbamoyl phosphate) बनाता है। इसमें दो ATP अणुओं का भी उपयोग होता है। काबेंमोइल फॉस्फेट उपलब्ध ऑर्निथीन के साथ ट्रान्सकाबेंमिलेज एन्जाइम की उपस्थिति में संयोग कर लेता है, इससे साइट्रलिन (citrulline) बनता है। साइट्रलिन ए०टी०पी० (ATP) की उपस्थिति में एस्पार्टिक अम्ल (aspartic acid) के साथ संयोग कर आर्जिनोसक्सीनिक अम्ल (arginosuccinic acid) बनाता है। आर्जिनोसक्सीनिक अम्ल का एन्जाइम की उपस्थिति में आर्जिनीन (arginine) तथा फ्यूमैरिक अम्ल (fumaric acid) में विघटन हो जाता है। अब एन्जाइम आर्जिनेज (arginase) की उपस्थिति में आर्जिनीन का विघटन होता है और यूरिया (urea) तथा ऑर्निथीन (ornithine) का निर्माण होता है। इस प्रकार ऑर्निथीन अगले चक्र के लिए वापस मिल जाती है। ऑर्निथीन की इस प्रकार की उपस्थिति के कारण ही इसको ऑर्निथीन चक्र (ornithine cycle) कहते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र ऑर्निथीन चक्र को दर्शाता है, एक चयापचय पथ जिसके माध्यम से यकृत में अमोनिया को यूरिया में परिवर्तित किया जाता है। इसमें ऑर्निथीन, सिट्रुलिन, आर्जिनोसक्सीनेट और आर्जिनिन जैसे मध्यवर्ती उत्पाद शामिल होते हैं, जिनमें ATP का उपयोग होता है और अंत में यूरिया और फ़्यूमैरिक एसिड का उत्पादन होता है। ऑर्निथीन चक्र के अंत में पुनर्चक्रित हो जाता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
In simple words: ऑर्निथीन चक्र यकृत में अमोनिया और कार्बन डाइऑक्साइड को यूरिया में बदलने की एक चक्रीय प्रक्रिया है। इस चक्र में ऑर्निथीन, सिट्रुलिन, आर्जिनोसक्सिनेट और आर्जिनिन जैसे मध्यवर्ती शामिल होते हैं, जिसमें ATP का उपयोग होता है और अंततः यूरिया और फ्यूमैरिक एसिड का उत्पादन होता है, जबकि ऑर्निथीन को अगले चक्र के लिए पुनर्चक्रित किया जाता है।
🎯 Exam Tip: ऑर्निथीन चक्र के प्रत्येक चरण को, शामिल एंजाइमों और मुख्य उत्पादों के साथ, आरेख की सहायता से समझाएं। यूरिया के निर्माण में अमोनिया के विषहरण के महत्व पर जोर दें।
Question 1. कोशिकीय श्वसन से आप क्या समझते हैं? इससे सम्बन्धित विभिन्न पदों (steps) का उल्लेख कीजिए। या निम्नलिखित
Answer:
पर टिप्पणी लिखिए
(क) ग्लाइकोलिसिस (glycolysis)
(ख) कोशिकीय श्वसन (cellular respiration) या कोशिकीय श्वसन क्या है? ग्लाइकोलिसिस को अनॉक्सी श्वसन क्यों कहा जाता है? ग्लाइकोलिसिस प्रक्रम का वर्णन कीजिए ।
कोशिकीय श्वसन
भोज्य पदार्थों को विखण्डित कर उनसे रासायनिक ऊर्जा को, उपयोग के लिए, विमुक्त करने वाली अपंचयिक (catabolic) व पूर्णतः नियन्त्रित (controlled) क्रिया श्वसन (respiration) कहलाती है।”
सामान्यतः सभी जन्तुओं में भोज्य पदार्थों में उपस्थित, रासायनिक ऊर्जा धीरे-धीरे एक श्रृंखला में होने वाली अभिक्रियाओं (reactions) के द्वारा स्वतन्त्र की जाती है। अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पदार्थ, ऐडीनोसीन डाइफॉस्फेट या ए०डी०पी० (adenosine diphosphate or ADP) स्वतन्त्र की गयी इस ऊर्जा को अपने साथ जोड़कर एक अस्थायी यौगिक ऐडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट या ए०टी०पी० (adenosine triphosphate or ATP) का निर्माण कर लेता है। ए०टी०पी० को किसी भी स्थान या उसी या अन्य किसी कोशिका में ऊर्जा के लिए उपयोग में लाया जा सकता है और फिर से ए०डी०पी० प्राप्त हो जाता है। जीवित कोशिका (living cell) में इस प्रकार की क्रिया अत्यन्त नियन्त्रित विधियों से विशेष व्यवस्था के अन्तर्गत, अनेक एन्जाइम, सहएन्जाइम एवं अन्य पदार्थों एवं तन्त्रों (systems) के अन्तर्गत की जाती है। यही नहीं, क्रियाओं के फलस्वरूप जो गतिज ऊर्जा (kinetic energy) निष्कासित होती है उसके अधिकांश भाग को विशेष पदार्थ ए०टी०पी० (ATP) में इस प्रकार संचित किया जाता है
कि उपयोग की आवश्यकता के समय यह तुरन्त अपघटित होकर ऊर्जा को उपलब्ध करा देता है और स्वयं ऊर्जा उत्पादन के स्थान पर ए०डी०पी० (ADP) के रूप में पहुँचकर नयी ऊर्जा ग्रहण करता है अर्थात् उसका कुछ बिगड़ता भी नहीं। बस, यही समस्त क्रियाएँ अर्थात् खाद्य पदार्थ के ऑक्सीकरण से लेकर उपभोग के लिए ऊर्जा उपलब्ध कराने की नियन्त्रित क्रियाओं को हम श्वसन (respiration) कहते हैं।
कोशिकीय श्वसन से सम्बन्धित दो प्रमुख पद
(i) ग्लाइकोलिसिस (Glycolysis) : श्वसन की यह सामान्य क्रिया प्रारम्भ में कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) में होती है और इसमें ऑक्सीजन के बिना ही, केवल आन्तरिक परिवर्तनों के द्वारा, कार्बोहाइड्रेट को अपूर्ण रूप से ऑक्सीकृत करके थोड़ी-सी ऊर्जा निकाल ली जाती है। इस प्रकार के श्वसन को जिसमें ऑक्सीजन अनुपस्थित होती है, अनॉक्सी या अवायवीय (anaerobic) श्वसन कहते हैं।
(ii) क्रेब्स चक्र (Kreb's Cycle) : अधिक दक्षश्वसन की यह क्रिया ऑक्सीजन की उपस्थिति में सामान्य कोशिका में माइटोकॉण्ड्रिया (mitochondria) पर होती है और ऑक्सीश्वसन या वायवीय श्वसन (aerobic respiration) कहलाती है।
ग्लाइकोलिसिस या ई०एम०पी० पथ
ग्लाइकोलिसिस की अभिक्रियाएँ कोशिका के कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) में होती हैं जिसमें 6 C वाला ग्लूकोज का एक अणु विघटित होकर 3 C वाले दो पाइरुविक अम्ल (pyruvic acid) अणु बनाता है। क्रम से एन्जाइम (enzymes) तथा सह-एन्जाइम्स (co-enzymes) की सहायता से शृंखलाबद्ध रूप में, ये क्रियाएँ इस प्रकार घटित होती हैं
पद । :
ग्लूकोज के अणु का फॉस्फोराइलेशन इस क्रिया के अन्त में फ्रक्टोज 1, 6-डाइफॉस्फेट (fructose 1, 6-diphosphate) का निर्माण होता है। इस क्रिया में पहले ग्लूकोज अणु एक ATP अणु से ऊर्जा तथा एक फॉस्फेट गुट्ट (PO4) प्राप्त करता है तथा ग्लूकोज 6-फॉस्फेट (glucose 6-phosphate) बनाता है। ग्लूकोज 6-फॉस्फेट समावयवीकरण (isomerization) के द्वारा फ्रक्टोज 6-फॉस्फेट (fructose 6-phosphate) में बदल जाता है। फ्रक्टोज 6-फॉस्फेट का अणु अब एक ATP अणु से एक फॉस्फेट गुट्ट ऊर्जा की उपस्थिति में प्राप्त करता है और इससे फ्रक्टोज 1, 6-डाइफॉस्फेट बनता है।
पद ॥ :
फॉस्फोराइलेटेड शर्करा का विदलन
इस पद में फ्रक्टोज 1, 6-डाइफॉस्फेट का विदलन (splitting) होता है जिससे दो ट्रायोज (trioses) बनते हैं-एक, 3-फॉस्फोग्लिसरैल्डिहाइड (3-phosphoglyceraldehyde) तथा दूसरा डाइहाइड्रॉक्सी-एसीटोन फॉस्फेट (dihydroxyacetone phosphate)। बाद में, दूसरा ट्रायोज भी एक आइसोमेरेज (isomerase) एन्जाइम की उपस्थिति में 3-फॉस्फोग्लिसरैल्डिहाइड में ही बदल जाता है। इस प्रकार, इस परिवर्तन के बाद, दो अणु 3-फॉस्फोग्लिसरैल्डिहाइड के उपलब्ध होते हैं। 3-फॉस्फोग्लिसरैल्डिहाइड, अकार्बनिक फॉस्फेट (H3PO4 से) प्राप्त करके 1, 3-डाइफॉस्फोग्लिसरैल्डिहाइड का निर्माण करता है जो दो H⁺ आयन तथा इलेक्ट्रॉन देकर ऑक्सीकृत हो जाता है। यह क्रिया डिहाइड्रोजिनेज (dehydrogenase) एन्जाइम तथा NAD सह-एन्जाइम की उपस्थिति में होती है तथा 1, 3-डाइफॉस्फोग्लिसरिक अम्ल (1, 3-diphosphoglyceric acid) का निर्माण होता है।
1, 3-डाइफॉस्फोग्लिसरिक अम्ल (1, 3-diphosphoglyceric acid) का डीफॉस्फोराइलेशन (dephosphorylation) होता है तथा एक फॉस्फेट गुंट्ट अलग होकर उपस्थित ADP के साथ संयुक्त होकर ATP का निर्माण करता है। इस प्रकार दो अणुओं से दो ATP अणु और दो अणु 3-फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल (3-phosphoglyceric acid) बनते हैं। जिसमें एन्जाइम, फॉस्फोग्लिसरोम्यूटेज की सहायता से फॉस्फेट गुट्ट का फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल में स्थान परिवर्तन हो जाने से फॉस्फेट अब 2 स्थिति में आ जाता है। अब, प्रत्येक अणु से एक अणु जल निकल जाने से 2-फॉस्फोइनॉल पाइरुविक अम्ल (2-phosphoenol pyruvic acid) का निर्माण होता है। 2-फॉस्फोइनॉल पाइरुविक अम्ल के डीफॉस्फोराइलेशन (dephosphorylation) के द्वारा पाइरुविक अम्ल (pyruvic acid) को निर्माण होता है। इस प्रकार प्राप्त फॉस्फेट गुट्ट 2ADP अणुओं के साथ मिलकर 2ATP अणुओं का निर्माण करते हैं।
In simple words: कोशिकीय श्वसन वह नियंत्रित प्रक्रिया है जिसमें कोशिकाएं भोज्य पदार्थों को तोड़कर ऊर्जा (ATP) उत्पन्न करती हैं। इसमें ग्लाइकोलाइसिस (कोशिकाद्रव्य में ग्लूकोज से पाइरुविक अम्ल का निर्माण, ऑक्सीजन के बिना) और क्रेब्स चक्र (माइटोकॉण्ड्रिया में पाइरुविक अम्ल का आगे ऑक्सीकरण, ऑक्सीजन की उपस्थिति में) जैसे चरण शामिल हैं, जिससे ऊर्जा का कुशल उत्पादन होता है।
🎯 Exam Tip: कोशिकीय श्वसन की परिभाषा, ग्लाइकोलाइसिस और क्रेब्स चक्र के मुख्य चरणों, उनके स्थल (कोशिकाद्रव्य, माइटोकॉण्ड्रिया) और प्रत्येक चरण में ATP उत्पादन को विस्तार से समझाना महत्वपूर्ण है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र ई०एम०पी० पथ (EMP pathway) या ग्लाइकोलिसिस की चरण-दर-चरण अभिक्रियाओं को दर्शाता है। इसमें ग्लूकोज के फॉस्फोराइलेशन से शुरू होकर विभिन्न मध्यवर्ती चरणों से होते हुए पाइरुविक अम्ल का निर्माण दिखाया गया है, जिसमें \( \text{ATP} \) उत्पादन और खपत के बिंदु स्पष्ट हैं। ग्लाइकोलिसिस की सम्पूर्ण क्रियाओं में जहाँ अम्ल बनते हैं; जैसे- फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल, पाइरुविक अम्ल इत्यादि, ये सब लवणों के रूप में हो सकते हैं। अतः इन्हें फॉस्फोग्लिसरेट, पाइरुवेट (phosphoglycerate, pyruvate) इत्यादि भी लिखा जाता है। ग्लाइकोलिसिस (glycolysis) में \( \text{ATP} \) के कुल चार अणुओं का निर्माण होता है, किन्तु प्रारम्भिक अभिक्रियाओं में दो \( \text{ATP} \) अणु काम में आ जाते हैं। अतः शुद्ध लाभ केवल दो अणुओं का ही होता है (net gain) = \( 4 \text{ ATP} - 2 \text{ ATP} = 2 \text{ ATP} \) दो स्वतन्त्र \( \text{H}^+ \) आयन (ions) भी प्राप्त होते हैं जो प्राय: \( \text{NAD} \) या \( \text{NADP} \) पर चले जाते हैं।
क्रेब्स चक्र या ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र
पाइरुविक अम्ल का ऑक्सीकरण ऑक्सीजन की उपस्थिति में क्रमबद्ध तथा चक्र में होने वाली अभिक्रियाओं द्वारा होता है।
यह चक्र ही क्रेब्स चक्र (Krebs cycle) कहलाता है। इसकी सम्पूर्ण अभिक्रियाएँ माइटोकॉण्ड्रिया (mitochondria) में
होती हैं जहाँ सभी प्रकार के आवश्यक एन्जाइम्स (enzymes) व सह-एन्जाइम्स (co-enzymes) मिलते हैं। पाइरुविक
अम्ल, एसीटिल को एन्जाइम-'ए' (acetyl co-enzyme-A) बनाने के बाद क्रेब्स चक्र में साइट्रिक
अम्ल (citric acid) के रूप में दिखायी पड़ता है; अतः इस चक्र को ट्राइकार्बोक्सिलिक
अम्ल चक्र या साइट्रिक अम्ल चक्र (tricarboxylic acid cycle or citric acid cycle) कहते हैं। क्रेब्स चक्र में
प्रवेश से पूर्व पाइरुविक अम्ल एक जटिल प्रक्रिया से निकलता है। इस क्रिया में कम-से-कम पाँच को-फैक्टर (co-factor)
तथा एक एन्जाइम-समूह (enzyme-complex) की आवश्यकता होती है। क्रेब्स चक्र में तो एसीटिल को-एन्जाइम-'ए'
(acetyl co-enzyme-A) ही प्रवेश करता है। ये क्रियाएँ निम्नलिखित पदों में सम्पन्न होती हैं
1. ऑक्सीजन के सन्तोषप्रद मात्रा में उपलब्ध होने पर ही उपर्युक्त प्रक्रिया होती है और एसीटिल को-एन्जाइम-'ए'
(acetyl co-enzyme-A) को निर्माण होता है। इस जटिल प्रक्रिया में पाइरुविक अम्ल के तीन कार्बन में से
दो कार्बन परमाणु रह जाते हैं जो एसीटिल (acetyl) समूह के रूप में co-A (co-enzyme-A) के साथ जुड़े
हुए हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र क्रेब्स चक्र (Kreb's cycle) का सरलीकृत रेखाचित्र प्रस्तुत करता है, जिसमें ग्लूकोज से पाइरुविक अम्ल और फिर एसीटिल-को-एन्जाइम-ए का निर्माण दिखाया गया है। चक्र में विभिन्न कार्बनिक यौगिकों जैसे साइट्रिक अम्ल, आइसोसिट्रिक अम्ल, अल्फा-कीटोग्लूटेरिक अम्ल, सक्सिनिल-को-एन्जाइम-ए, सक्सिनिक अम्ल, फ्यूमैरिक अम्ल, मैलिक अम्ल और ऑक्सैलोएसिटिक अम्ल का रूपांतरण दर्शाया गया है। इसमें ऊर्जा वाहकों जैसे \( \text{NAD}^+ \) और \( \text{FAD} \) का उपयोग और \( \text{CO}_2 \) का निष्कासन भी स्पष्ट है।
\( \text{pyruvic acid} + \text{co - A} + \text{NAD} \)
\( \implies \text{CH}_3\text{CO.co - A} + \text{CO}_2 + \text{NAD.H}_2 \)
उपर्युक्त प्रक्रिया में \( \text{H}^+ \) आयन प्राप्त होते हैं ( \( \text{NAD.H}_2 \) के रूप में)। \( \text{NAD.H}_2 \) इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण तन्त्र
(electron transport system = ETS) में पहुंचकर मुक्त ऊर्जा से तीन \( \text{ATP} \) अणुओं का निर्माण करते
हैं। इस प्रकार, दो अणु पाइरुविक अम्ल से \( 6\text{ATP} \) अणु प्राप्त होते हैं।
2. एसीटिल को-एन्जाइम-'ए' (acetyl co-A) क्रेब्स चक्र के अन्तिम उत्पाद, चार कार्बन यौगिक \( (\text{C}_4) \),
ऑक्सैलोएसीटिक अम्ल (oxaloacetic acid) के साथ मिलकर (condensation) साइट्रिक अम्ल (citric
acid) बनाता है। साथ ही को-एन्जाइम-'ए' (co-A) स्वतन्त्र हो जाता है। यह क्रिया जल तथा एक
कण्डेन्सिंग ऐन्जाइम की उपस्थिति में होती है
1. इसके बाद की क्रियाएँ चार ऑक्सीकरण (Oxidation) पदों (steps) में सम्पन्न होती हैं जिनमें होकर साइट्रिक
अम्ल (citric acid) से ऑक्सैलोएसीटिक अम्ल (Oxaloacetic acid) फिर से प्राप्त किया जाता है। इन क्रियाओं
में चार जोड़ा \( \text{H}^+ \) आयन और चार जोड़ा इलेक्ट्रॉन्स (electrons) निकाले जाते हैं। इन पदों की अभिक्रियाएँ जटिल,
श्रृंखलाबद्ध व चक्रिक (cyclic) होती हैं तथा विभिन्न एन्जाइम्स, सहएन्जाइम्स, को-फैक्टर्स (co-factors) के
सहयोग से सम्पन्न होती हैं इस प्रकार पाइरुविक अम्ल के दो अणुओं (ग्लूकोज के
एक अणु से प्राप्त) से कार्बन डाइऑक्साइड के छह अणु (तीन + तीन) निकलते हैं। इस क्रिया में कुल \( 30 \) (तीस)
\( \text{ATP} \) अणु भी बनते हैं। \( 6 \) (छह) \( \text{ATP} \) अणु ग्लाइकोलिसिस तथा क्रेब्स चक्र के मध्य बनते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण
अणु से सम्पूर्ण वायवीय श्वसन के बाद एक ग्लूकोज अणु से \( 38 \text{ ATP} \) अणु प्राप्त होते हैं।In simple words: कोशिकीय श्वसन वह प्रक्रिया है जिसमें ग्लूकोज को तोड़कर ऊर्जा (ATP) उत्पन्न की जाती है, जो ग्लाइकोलिसिस (बिना ऑक्सीजन के साइटोप्लाज्म में) और क्रेब्स चक्र (ऑक्सीजन के साथ माइटोकॉन्ड्रिया में) जैसे चरणों में होती है। यह जीवन के लिए आवश्यक ऊर्जा का मुख्य स्रोत है।
🎯 Exam Tip: कोशिकीय श्वसन के प्रमुख चरणों (ग्लाइकोलिसिस, क्रेब्स चक्र, ETS) और प्रत्येक चरण में ATP उत्पादन के बारे में स्पष्ट जानकारी दें। रासायनिक समीकरणों और एंजाइमों के महत्व पर ध्यान दें।
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