UP Board Solutions Class 10 Social Science Chapter 7 Bharatiya Videsh Niti

Step-by-Step Textbook Solutions for Class 10 Social Science Chapter 07 भारतीय विदेश नीति

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. विदेश-नीति का क्या अर्थ है ? भारतीय विदेश-नीति के निर्धारक तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
या
भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? पंचशील के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। [2014]
या
भारत की विदेश नीति की कोई दो विशेषताएँ लिखिए । [2014, 16, 18]
या
भारत की विदेश-नीति की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2011, 12, 17]
या
किसी विदेशी पत्रिका में भारत को एक साम्राज्यवादी देश बताया गया है। इसका खण्डन करने के लिए उस पत्रिका के सम्पादक को क्या लिखेंगे ?
या
भारतीय विदेश नीति के विशिष्ट लक्षणों की व्याख्या कीजिए। [2013]
या
भारतीय विदेश नीति के किन्हीं तीन सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए । [2013, 15]
या
पंचशील तथा भारत की विदेश नीति पर एक लेख लिखिए। [2013]
या
भारतीय विदेश नीति के आधारभूत सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए। [2015, 17]
या
भारत की विदेश नीति के मुख्य सिद्धान्त क्या हैं? उनमें से किन्हीं तीन का उल्लेख कीजिए। [2016]
या
भारत की विदेश नीति की किन्हीं चार विशेषताओं की विवेचना कीजिए। [2016]

Answer: विदेश-नीति का मतलब है वह तरीका जिससे कोई देश दूसरे देशों के साथ व्यवहार करता है। भारत की विदेश नीति की मुख्य विशेषताएँ, लक्षण और सिद्धान्त नीचे दिए गए हैं:
भारत की विदेश-नीति की विशेषताएँ/लक्षण/व/सिद्धान्त
1. गुट-निरपेक्षता- दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया दो बड़े सैन्य गुटों में बँट गई थी। एक गुट का नेतृत्व अमेरिका कर रहा था, और दूसरे का सोवियत संघ (रूस)। ऐसे समय में, भारत ने आज़ादी के बाद तय किया कि वह किसी भी गुट में शामिल नहीं होगा। गुट-निरपेक्षता भारत की विदेश नीति का सबसे ज़रूरी हिस्सा है। यह नीति साम्राज्यवाद (जब एक देश दूसरे पर राज करता है) और उपनिवेशवाद (दूसरे देशों को गुलाम बनाना) के सख्त खिलाफ है। भारत का मानना है कि देश के विकास के लिए किसी खास गुट में शामिल होने के बजाय, गुट-निरपेक्ष रहकर सभी देशों से सहयोग लेना ज़्यादा अच्छा है।
2. पंचशील के सिद्धान्त में आस्था- भारत बौद्ध धर्म के पाँच नियमों पर आधारित 'पंचशील' के सिद्धान्त में बहुत भरोसा रखता है। साल 1954 में भारत और चीन ने एक दोस्ती की संधि की थी, जिसमें इन सिद्धान्तों का ऐलान किया गया। 1955 में बांडुंग सम्मेलन में एशिया और अफ्रीका के 29 देशों ने इसे स्वीकार किया, और बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इसे मान लिया। इन सिद्धान्तों के मुख्य बिंदु हैं:
• सभी देशों की ज़मीन की अखंडता और संप्रभुता (अपने फैसले लेने का अधिकार) का सम्मान करना।
• दूसरे देशों पर हमला न करना।
• दूसरे देशों के अंदरूनी मामलों में दखल न देना।
• सभी देशों को बराबर मानना।
• शांति और भाईचारे के साथ मिलकर रहने की नीति का पालन करना।
3. सभी राष्ट्रों से दोस्ती- भारत की विदेश नीति बनाने वाले पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि भारत का मुख्य लक्ष्य दुनिया के सभी देशों के साथ दोस्ती भरे संबंध बनाना है। भारत लगातार इस नीति का पालन करता आ रहा है। भारत सिर्फ अपने पड़ोसी देशों से ही नहीं, बल्कि सभी देशों से राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और व्यापारिक दोस्ती बनाए रखना चाहता है। यह नीति वैश्विक शांति और सहयोग को बढ़ावा देती है।
4. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व भारत की विदेश नीति का एक अहम हिस्सा है। यह भी पंचशील के सिद्धान्तों पर आधारित है। इसके तीन मुख्य नियम हैं:
• हर देश के आज़ाद रहने के अधिकार को पूरी तरह मानना।
• हर देश को अपना भविष्य खुद तय करने के अधिकार को मानना।
• गरीब और पिछड़े देशों का विकास एक निष्पक्ष अंतर्राष्ट्रीय संस्था के ज़रिए होना चाहिए। इस विचार के पीछे यह सोच है कि अगर ताकतवर देश ही कमज़ोर देशों का भविष्य तय करेंगे, तो कोई भी देश आर्थिक रूप से आगे नहीं बढ़ पाएगा। इसलिए सभी देशों को अपने तरीके से आर्थिक विकास करने का मौका मिलना चाहिए। इस सिद्धान्त का अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर बहुत अच्छा असर पड़ा है।
5. रंग-भेद नीति का विरोध- भारत रंग-भेद नीति (नस्लवाद) का पूरी तरह से विरोधी है। इसीलिए भारत ने दक्षिण अफ्रीका में 1994 तक रही अल्पमत गोरी सरकार द्वारा अपनाई गई रंग-भेद की नीति का हमेशा विरोध किया। रंग-भेद नीति असल में मानवता का बहुत बड़ा अपमान है क्योंकि यह लोगों को उनके रंग के आधार पर अलग करती है।
6. विश्व-शांति और संयुक्त राष्ट्र संघ में सहयोग- भारत अंतर्राष्ट्रीय विवादों को शांति से सुलझाने का समर्थन करता है। इसलिए भारत संयुक्त राष्ट्र संघ और दूसरी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ सहयोग करता है। विश्व शांति बनाए रखने के लिए भारत परमाणु हथियारों को कम करने पर भी ज़ोर देता है। यह दिखाता है कि भारत विवादों के शांतिपूर्ण समाधान में विश्वास रखता है।
7. साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध- भारत ने अपनी विदेश-नीति में साम्राज्यवाद के हर रूप का बहुत विरोध किया है। भारत ऐसी आदतों को विश्व शांति और व्यवस्था के लिए खतरनाक मानता है। के. एम. पणिक्कर के अनुसार, “भारत की नीति हमेशा से यह रही है कि यह गुलाम लोगों की आज़ादी के लिए आवाज़ उठाता रहा है; क्योंकि भारत को पूरा विश्वास है कि साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद हमेशा आधुनिक युद्धों का कारण रहा है।”
भारत की विदेश नीति के इन बिन्दुओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि भारत एक साम्राज्यवादी देश नहीं है। अगर किसी विदेशी पत्रिका में ऐसा लिखा गया है कि भारत एक साम्राज्यवादी देश है तो यह बात पूरी तरह से गलत और भ्रामक है। इसके लिए हमें उस पत्रिका के संपादक को कड़ा विरोध जताना चाहिए।
In simple words: विदेश-नीति का मतलब है कि एक देश दूसरे देशों के साथ कैसा रिश्ता रखता है। भारत की विदेश नीति के कई खास नियम हैं, जैसे किसी गुट में शामिल न होना, पंचशील के नियमों को मानना, सभी देशों से दोस्ती रखना, शांति से मिलकर रहना, रंग-भेद का विरोध करना, विश्व शांति का समर्थन करना और साम्राज्यवाद का विरोध करना। इन नीतियों से भारत दुनिया में शांति और सहयोग को बढ़ावा देता है।

🎯 Exam Tip: जब विदेश नीति की विशेषताओं का वर्णन करें, तो हर विशेषता को एक अलग बिंदु में समझाएं और पंचशील के सिद्धान्तों जैसे मुख्य शब्दों का उल्लेख ज़रूर करें।

 

Question 2. गुट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं ? इसके बदलते स्वरूप का वर्णन कीजिए ।
या
भारत की गुट-निरपेक्ष नीति को स्पष्ट कीजिए । गुट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं ?
या
गुट-निरपेक्षता में भारत के योगदान का वर्णन कीजिए। “भारतीय विदेश नीति का आधार गुटनिरपेक्षता है।” स्पष्ट कीजिए। [2013]
या
विश्व-शान्ति के लिए गुट-निरपेक्षता क्यों आवश्यक है ? इसके महत्व का वर्णन उचित उदाहरणों सहित कीजिए। [2015, 17]
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रारम्भ क्यों हुआ ? प्रारम्भ में इसमें भाग लेने वाले दो प्रमुख देशों के नाम लिखिए। [2015]
या
गृट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? क्या वर्तमान समय में भी भारत को इसका पालन करना चाहिए? [2016]

Answer: गुट-निरपेक्षता का मतलब है किसी भी बड़ी शक्ति के गुट में शामिल न होना। साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय मामलों में बिना किसी बाहरी दबाव के, सही-गलत को देखकर आज़ाद फैसले लेना।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद, पूरी दुनिया दो बड़े गुटों में बँट गई थी। एक गुट का नेतृत्व अमेरिका ने किया और दूसरे गुट का सोवियत संघ (रूस) ने। इन दोनों गुटों के बीच कई कारणों से 'शीत युद्ध' शुरू हो गया। यूरोप और एशिया के ज़्यादातर देश इन गुटों में फंस गए थे और किसी न किसी गुट में शामिल हो गए। स्वतंत्र भारत की विदेश नीति के निर्माता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गुट-निरपेक्षता (Non-Alignment) को अपनी विदेश नीति का आधार बनाया। उन्होंने साफ कहा कि, “हम किसी गुट में शामिल नहीं हो सकते, क्योंकि हमारे देश में इतनी ज़्यादा अंदरूनी समस्याएँ हैं कि हम दोनों गुटों से संबंध बनाए बिना उन्हें सुलझा नहीं सकते।” साल 1961 में बेलग्रेड में गुट-निरपेक्ष देशों का पहला शिखर सम्मेलन हुआ, जिसमें केवल 25 देशों ने हिस्सा लिया। धीरे-धीरे गुट-निरपेक्षता अपनाने वाले देशों की संख्या बढ़ती गई और अब यह 120 हो गई है। इसमें शामिल होने वाले दो मुख्य देश इंडोनेशिया और मिस्र थे। गुट-निरपेक्षता ने छोटे देशों को अपनी आवाज़ उठाने का मौका दिया।
गुट-निरपेक्षता में भारत का योगदान
भारत ने गुट-निरपेक्षता को बढ़ाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत की विदेश नीति का मुख्य सिद्धान्त ही गुट-निरपेक्षता है। सबसे पहले, भारत ने ही एशिया और अफ्रीका के नए आज़ाद हुए देशों को एक-दूसरे के साथ जोड़ने और सहयोग करने की कोशिश की थी। 'बांडुंग सम्मेलन' में भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने खास भूमिका निभाई। इस तरह भारत गुट-निरपेक्षता में सबसे आगे रहा। पंडित नेहरू ने कहा था, “चाहे कुछ भी हो जाए, हम किसी भी देश के साथ सैनिक संधि नहीं करेंगे। अगर हम गुट-निरपेक्षता छोड़ते हैं तो हम अपनी इज़्ज़त खो देते हैं।” पंडित नेहरू के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी ने गुट-निरपेक्षता को आगे बढ़ाया। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने सातवें सम्मेलन (1983) में नई दिल्ली में गुट-निरपेक्ष आंदोलन की अध्यक्षता की थी। उन्होंने कहा था कि “गुट-निरपेक्षता खुद में एक नीति है। इसका मकसद फैसला लेने की आज़ादी और राष्ट्र के हितों की रक्षा करना है।”
प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी भी गुट-निरपेक्ष आंदोलन को मज़बूत बनाने के लिए प्रतिबद्ध थे। 15 अगस्त, 1986 को श्री राजीव गांधी ने कहा था कि, “भारत की गुट-निरपेक्षता की नीति के कारण ही भारत का विश्व में सम्मान है। यह दुनिया के दो-तिहाई गुट-निरपेक्ष देशों की आवाज़ है।” नवें शिखर सम्मेलन (सितंबर, 1989) में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि, “गुट-निरपेक्ष आंदोलन तभी गतिशील रह सकता है, जब यह उन्हीं सिद्धान्तों पर चले, जिन पर 1961 में पहले सम्मेलन में सदस्यों ने चलने का वादा किया था।” ग्यारहवें शिखर सम्मेलन में भारत को दो बातों में बड़ी सफलता मिली। भारत ने परमाणु हथियारों पर परमाणु शक्तियों के एकाधिकार का विरोध किया। बारहवें सम्मेलन में भारत और पाकिस्तान के परमाणु विस्फोट की आलोचना की गई थी। सम्मेलन के अध्यक्ष नेल्सन मंडेला द्वारा कश्मीर समस्या का ज़िक्र करने पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई, जिसके बाद नेल्सन मंडेला ने अपना बयान वापस ले लिया।
तेरहवें शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए पहल की। प्रधानमंत्री श्री वी. पी. सिंह और बाद में प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर भी इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए कोशिश करते रहे। प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने भी इसी नीति को जारी रखा। इसके बाद प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार देश की सुरक्षा और अखंडता के मुद्दों पर समय के हिसाब से विदेश नीति तय करने के लिए दृढ़ संकल्प थी।
सोवियत रूस के खत्म होने के बाद गुट-निरपेक्ष आंदोलन का राजनीतिक महत्व थोड़ा कम हो गया है, लेकिन इसकी आर्थिक भूमिका पहले से भी ज़्यादा बढ़ गई है। औद्योगिक देशों द्वारा उदार अर्थव्यवस्था को विश्वव्यापी बनाने के कारण ज़्यादातर गरीब और विकासशील देश अब आर्थिक और व्यापारिक क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। अमीर देशों में संरक्षणवाद बढ़ गया है और साम्राज्यवाद का एक नया आर्थिक रूप सामने आ रहा है। मुक्त व्यापार के नाम पर अमीर देश विकासशील देशों पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाना चाहते हैं। इसलिए विकासशील देशों को मिलकर अपने आर्थिक और व्यापारिक हितों की रक्षा करनी होगी। इस तरह गुट-निरपेक्ष आंदोलन को अपना रूप बदलकर, राजनीतिक से आर्थिक मोर्चे पर ध्यान देना होगा और अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में बड़े बदलाव लाने के लिए संघर्ष करना होगा। यह निश्चित रूप से गुट-निरपेक्ष आंदोलन की एक नई शुरुआत होगी।
In simple words: गुट-निरपेक्षता का मतलब है किसी भी बड़े सैन्य गुट में शामिल न होना और अपने फैसले खुद लेना। भारत ने यह नीति शुरू की थी ताकि नए आज़ाद देश अपनी आज़ादी बनाए रख सकें। आज भी यह नीति महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देश को बड़े गुटों के दबाव से बचाती है और अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित रखने में मदद करती है।

🎯 Exam Tip: गुट-निरपेक्षता की अवधारणा को समझाते समय, इसके जन्म के कारण, मुख्य सिद्धान्तों और भारत के योगदान को स्पष्ट रूप से बताएं।

 

Question 3. पंचशील से आप क्या समझते हैं ? इसके प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। [2012]
या
पंचशील से आपका क्या अभिप्राय है ? इसके किन्हीं दो सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए। पंचशील के तीन सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए । [2012, 14, 17, 18]
या
वर्तमान राजनीतिक स्थिति में पंचशील के कौन-से दो सिद्धान्त अधिक उपयोगी हैं?
या
पंचशील' के प्रस्ताव पर सर्वप्रथम किन दो देशों में सहमति बनी थी?
या
पंचशील के किन्हीं दो बिन्दुओं का उल्लेख कीजिए। [2016]

Answer: पंचशील भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण आदर्श रहा है। जून 1954 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सबसे पहले इस सिद्धान्त की घोषणा की थी, और यह भारत और चीन के बीच एक समझौते में शामिल था। पंचशील का सिद्धान्त महात्मा बुद्ध के पाँच नियमों पर आधारित है, जो उन्होंने अपने जीवन के लिए तय किए थे। पंचशील के सिद्धान्तों की शुरुआत पंडित जवाहरलाल नेहरू और चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई के बीच तिब्बत से संबंधित समझौते के समय हुई थी। भारत, चीन और कई एशियाई व अफ्रीकी देशों ने अप्रैल 1995 में बांडुंग सम्मेलन में इन्हें स्वीकार किया, जिससे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और दोस्ती बढ़ी। पंचशील के पाँच सिद्धान्त निम्नलिखित हैं:
• सभी देश एक-दूसरे की संप्रभुता (अपने फैसले लेने का अधिकार) और अखंडता का सम्मान करें।
• कोई भी देश दूसरे देश पर हमला न करे और विवादों को शांतिपूर्ण तरीकों से सुलझाए।
• कोई भी देश दूसरे देश के अंदरूनी मामलों में दखल न दे।
• सभी देश बराबर रहें और एक-दूसरे के फायदे के लिए काम करें।
• सभी देश शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना से, यानी मिल-जुलकर शांति से रहें और एक-दूसरे से दोस्ती बनाए रखें।
भारत और चीन के साथ-साथ दूसरे देशों ने भी इसका समर्थन किया और संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस सिद्धान्त को स्वीकार किया। हालांकि पंचशील की घोषणा पहले भारत और चीन के बीच हुई थी, चीन ने 1962 में भारत पर हमला करके पंचशील के समझौते और सिद्धान्तों का पालन नहीं किया।
भले ही, उस समय चीन ने इस सिद्धान्त के महत्व को नहीं समझा था, लेकिन आज जब दुनिया पर परमाणु युद्ध का खतरा मंडरा रहा है, तो यह सिद्धान्त बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। आज दुनिया को शांति बनाए रखने की ज़रूरत है ताकि तीसरे विश्व युद्ध जैसी भयानक स्थिति का सामना न करना पड़े। इसके लिए हर देश को पंचशील के मुख्य नियम, यानी 'शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व' का पालन करना चाहिए। सभी देशों को अपनी आज़ादी और अखंडता के साथ-साथ पड़ोसी या अन्य देशों की अखंडता का भी सम्मान करना चाहिए। मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय हालात में पंचशील ही विश्व-शांति का एकमात्र रास्ता है।
In simple words: पंचशील पांच सिद्धांतों का एक समूह है जिस पर भारत और चीन ने 1954 में सहमति जताई थी। ये सिद्धांत देशों के बीच शांतिपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देते हैं, जैसे एक-दूसरे का सम्मान करना, हमला न करना, आंतरिक मामलों में दखल न देना, समानता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व। यह विश्व शांति के लिए बहुत ज़रूरी है।

🎯 Exam Tip: पंचशील के सिद्धांतों को याद रखें और उन्हें उदाहरणों के साथ समझाएं। यह भी बताएं कि वर्तमान समय में ये सिद्धांत कितने प्रासंगिक हैं।

 

Question 4. निःशस्त्रीकरण से आप क्या समझते हैं ? इसके सम्बन्ध में भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट कीजिए।
Answer:
निःशस्त्रीकरण
भारत की विदेश नीति हमेशा शांति और अहिंसा पर आधारित रही है। इसलिए, भारत निःशस्त्रीकरण का बहुत बड़ा समर्थक है। निःशस्त्रीकरण का मतलब है हथियारों को कम करना या खत्म करना। भारत का मानना है कि युद्धों का एक मुख्य कारण हथियारों का होना है। इसीलिए, निःशस्त्रीकरण ही अंतर्राष्ट्रीय शांति को मज़बूत बना सकता है। इससे हथियारों के उत्पादन पर होने वाले बेहिसाब खर्च से छुटकारा मिलता है। इस तरह बचाए गए संसाधनों और पैसे का उपयोग सभी देशों के विकास के लिए किया जा सकता है। भारत की विदेश नीति हमेशा हथियारों, खासकर परमाणु हथियारों को खत्म करने का पूरा समर्थन करती रही है। अपनी इस सोच के कारण, भारत और उसके सहयोगी देशों ने 1961 में परमाणु परीक्षणों को रोकने का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र महासभा में रखा था। 1962 में जिनेवा के निःशस्त्रीकरण सम्मेलन में भारत ने अपने सात अन्य सहयोगी देशों के साथ एक ज्ञापन प्रस्तुत किया। 1988 में निःशस्त्रीकरण के लिए हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा के तीसरे सत्र में भारत ने 'परमाणु शस्त्र मुक्त और अहिंसक विश्व-व्यवस्था' की एक कार्ययोजना भी पेश की थी।
भारत परमाणु अप्रसार संधि (NPT) और व्यापक परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) का उसकी भेदभावपूर्ण नीति के कारण दृढ़ता से विरोध करता रहा है। भारत ने अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण उद्देश्यों और न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने तक सीमित रखा है। भारत के इस रुख का समर्थन करते हुए अमेरिका ने 2008 में भारत के साथ परमाणु ऊर्जा से संबंधित एक समझौता किया, जिसका समर्थन परमाणु आपूर्ति कर्ता समूह (NSG) के 45 देशों ने भी किया। भारत अपने परमाणु विकल्प को तब तक नहीं छोड़ेगा जब तक दूसरे परमाणु हथियार रखने वाले देश इसके लिए तैयार नहीं हो जाते। इस तरह भारत शांति और सुरक्षा के साथ-साथ अपने राष्ट्रीय हितों को भी प्राथमिकता देता है।
In simple words: निःशस्त्रीकरण का मतलब है हथियारों को कम करना या हटाना, खासकर परमाणु हथियारों को। भारत इस नीति का समर्थन करता है क्योंकि उसका मानना है कि इससे विश्व शांति बनी रहेगी, युद्ध रुकेंगे, और हथियारों पर खर्च होने वाला पैसा विकास में लग पाएगा।

🎯 Exam Tip: निःशस्त्रीकरण की परिभाषा को स्पष्ट करें और भारत के पक्ष में दिए गए तर्कों को बिंदुओं में लिखें, खासकर संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के प्रयासों का उल्लेख करें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. गुट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? क्या यह वर्तमान परिस्थितियों में प्रासंगिक है? उदाहरण दीजिए। [2012, 14, 18]
Answer: गुट-निरपेक्षता की नीति 1961 में बेलग्रेड सम्मेलन में शुरू हुई थी। इस सम्मेलन में भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंडोनेशिया के पूर्व राष्ट्रपति सुकर्णो, मिस्र के राष्ट्रपति गामेल अब्दुल नासिर और यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो ने मिलकर गुट-निरपेक्षता की नीति की घोषणा की थी और इस पर पूरा भरोसा दिखाया था। ये ही इस नीति के संस्थापक थे। इस नीति का मतलब है कि अलग-अलग देशों के गुटों से दूर रहकर अपनी स्वतंत्र नीति को अपनाना और सभी देशों की अखंडता में विश्वास रखना। इस नीति के तहत किसी भी तरह के शोषण, साम्राज्यवाद, रंग-भेद, युद्ध या सैनिक गुटबंदी के लिए कोई जगह नहीं है। यह छोटे और कमज़ोर देशों को अपनी पहचान बनाए रखने में मदद करती है।
वर्तमान में गुट-निरपेक्षता की नीति की प्रासंगिकता
आजकल शीत युद्ध जैसी स्थिति नहीं है। इस समय दुनिया में सिर्फ अमेरिका ही एक बड़ी महाशक्ति है। इस बदली हुई स्थिति में कुछ लोग इस नीति की ज़रूरत पर शक करते हैं, लेकिन ऐसा है नहीं। गुट-निरपेक्ष देशों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह इसके बढ़ते हुए महत्व को दिखाता है। जर्मनी और नीदरलैंड जैसे देश तो इसके शिखर सम्मेलन में मेहमान देश के रूप में और चीन ने पर्यवेक्षक देश के रूप में हिस्सा लिया। इन देशों की कोशिश है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण रहे। इस तरह गुट-निरपेक्षता की नीति आज भी ज़रूरी है।
In simple words: गुट-निरपेक्षता का मतलब है किसी भी बड़े सैन्य गुट में शामिल न होकर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाना। यह 1961 में शुरू हुई थी और आज भी प्रासंगिक है क्योंकि यह देशों को अपनी पहचान और हितों की रक्षा करने में मदद करती है।

🎯 Exam Tip: गुट-निरपेक्षता की परिभाषा, इसके संस्थापकों और इसकी वर्तमान प्रासंगिकता को उदाहरणों के साथ स्पष्ट करें।

 

Question 2. रंगभेद से आप क्या समझते हैं?
या
रंग-भेद की नीति से कौन देश सबसे अधिक प्रभावित हुआ ? इसका तीव्र विरोध क्यों किया गया है? संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसके विरुद्ध जनपद निर्माण करने के लिए क्या कदम उठाये हैं ? [2013]
या
मानवाधिकार प्रत्येक मानव के लिए इतने अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों हैं ? संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकार का सार्वभौम घोषणा-पत्र कब निर्गत किया था ? [2013]

Answer: रंगभेद-नीति एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या है। अंग्रेज लोग अश्वेत लोगों के साथ अमानवीय और क्रूर व्यवहार करते थे। यह मानवता के खिलाफ था। अफ्रीकी देशों में इस समस्या ने बहुत भयानक रूप ले लिया था। अफ्रीका महाद्वीप की यह मुख्य समस्या जातिवाद या गोरे-काले का भेद थी। यह समस्या यूरोपीय शक्तियों ने शुरू की थी। उनके राज में यहाँ श्वेत लोग आकर बस गए और प्रशासन व बड़े काम उन्हीं के हाथों में थे। ये शासक थे, इसलिए स्थानीय लोगों पर मनमाना अत्याचार करते थे और उन्हें गुलाम समझते थे। यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक उनका राज था, हालांकि कई बार इसका विरोध किया गया। लेकिन यूरोपीय लोग अपनी जाति को श्रेष्ठ मानकर स्थानीय लोगों का शोषण करते रहे। आज भले ही यहाँ के देश आज़ाद हैं, फिर भी जहाँ विदेशी हैं वहाँ यह समस्या अभी भी है। इसके अलावा, यहाँ कई आदिवासी जातियाँ भी रहती हैं। उनके और बाकी अफ्रीकी लोगों के बीच तालमेल बनाना उनके विकास के लिए बहुत ज़रूरी है।
यह समस्या दक्षिण रोडेशिया और दक्षिण अफ्रीका में बहुत बढ़ गई थी और वहाँ संघर्ष चलता रहता था। अफ्रीकी देशों ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र संघ में बार-बार यह मुद्दा उठाया और 'मानव अधिकार' का हवाला देकर इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण बना दिया। इसी वजह से संयुक्त महासभा ने रंगभेद की नीति को 1973 में 'मानवता के खिलाफ अपराध' घोषित किया और 1978 को 'रंगभेद विरोधी वर्ष' के रूप में मनाया। संयुक्त राष्ट्र ने इस समस्या को हल करने के लिए कई प्रस्ताव और प्रतिबंध लगाए, जिससे दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद खत्म हुआ।
In simple words: रंगभेद एक ऐसी नीति है जहाँ लोगों के रंग के आधार पर भेदभाव किया जाता है। यह अफ्रीका में बहुत बड़ी समस्या थी, जहाँ गोरे लोग काले लोगों पर अत्याचार करते थे। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसका कड़ा विरोध किया और इसे मानवता के खिलाफ अपराध घोषित किया, जिससे यह खत्म हो पाई।

🎯 Exam Tip: रंगभेद की परिभाषा, इसके मुख्य शिकार देश (जैसे दक्षिण अफ्रीका) और संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका को स्पष्ट करें।

 

Question 3. विश्व-शान्ति के लिए निःशस्त्रीकरण क्यों आवश्यक है ? किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिए। [2013]
Answer: आजकल के परमाणु युग में निःशस्त्रीकरण बहुत ज़रूरी है। यह रास्ता अपनाकर ही हम इंसान की उपलब्धियों को बचा सकते हैं। इसके पक्ष में कुछ तर्क इस प्रकार हैं:
1. विश्व-शांति स्थापित करने के लिए- विश्व शांति तभी संभव है जब हथियारों पर नियंत्रण हो। कोहन के अनुसार, “निःशस्त्रीकरण से देशों के बीच डर और मतभेद कम होते हैं, जिससे शांतिपूर्ण समझौतों की प्रक्रिया आसान हो जाती है।” प्रो. शूमेन कहते हैं, “संघर्ष का डर ही हथियारों की होड़ को जन्म देता है और युद्ध की संभावना को बढ़ाता है। हथियारों की दौड़ युद्ध की मानसिकता पैदा करती है और अविश्वास व डर को बढ़ाती है। इससे समाज में ऐसे लोग पैदा होते हैं जिनका फायदा युद्ध में होता है।” शुरुआत में हथियारों की दौड़ से बड़े पैमाने पर भूखमरी आती है और आखिर में यह बड़े पैमाने पर हत्याओं में बदल जाती है।
2. आर्थिक नुकसान से बचने के लिए- जो पैसा झुग्गी-झोपड़ियों को खत्म करने और गरीबों के लिए घर बनाने में खर्च हो सकता था, उसे युद्ध के हथियार बनाने में खर्च किया जाता है। जबकि युद्ध न लड़ने की कसम कई बार खाई जा चुकी है। इससे दुनिया में भूखमरी और गरीबी बढ़ती है, जो अंततः विश्व शांति के लिए खतरा बन जाती है। जब तक दुनिया में भूखमरी और गरीबी रहेगी, तब तक विश्व शांति स्थापित करना मुश्किल होगा। निःशस्त्रीकरण से यह पैसा मानव कल्याण में लगाया जा सकता है।
In simple words: विश्व शांति के लिए निःशस्त्रीकरण बहुत ज़रूरी है। इससे देशों के बीच युद्ध का खतरा कम होता है और हथियारों पर होने वाला बेहिसाब खर्च रुक जाता है। यह पैसा गरीबों की मदद करने और दुनिया में भूखमरी व गरीबी को कम करने में इस्तेमाल किया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: निःशस्त्रीकरण की आवश्यकता को समझाते समय, विश्व शांति और आर्थिक लाभ जैसे मुख्य कारणों पर ज़ोर दें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. गुट-निरपेक्षता के तीन सिद्धान्तों को लिखिए। [2014]
Answer: गुट-निरपेक्षता के तीन सिद्धान्त निम्नलिखित हैं—
• सैनिक गुटों से दूर रहना और बड़ी शक्तियों के साथ कोई समझौता न करना।
• स्वतंत्र विदेश नीति बनाना और उसे लागू करना।
• साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध करना।
In simple words: गुट-निरपेक्षता के मुख्य तीन नियम हैं: किसी भी फौजी गुट में शामिल न होना, अपने देश के लिए खुद फैसले लेना, और किसी भी देश के दूसरे पर राज करने का विरोध करना।

🎯 Exam Tip: गुट-निरपेक्षता के सिद्धान्तों को सटीक और संक्षिप्त रूप से लिखें, ध्यान रहे कि वे मुख्य बिंदुओं को कवर करें।

 

Question 2. पंचशील सिद्धान्त के प्रवर्तक कौन थे ?
Answer: पंचशील सिद्धान्त के प्रवर्तक पंडित जवाहरलाल नेहरू थे।
In simple words: पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पंचशील के सिद्धांतों की शुरुआत की थी।

🎯 Exam Tip: जब किसी सिद्धांत के प्रवर्तक का नाम पूछा जाए, तो पूरा नाम और पद लिखना सही रहता है।

 

Question 3. पंचशील समझौता किस-किसके बीच हुआ ?
Answer: पंचशील समझौता भारत तथा चीन के बीच हुआ था।
In simple words: पंचशील समझौता भारत और चीन के बीच हुआ था।

🎯 Exam Tip: समझौते से संबंधित प्रश्नों में, शामिल देशों या पक्षों के नाम स्पष्ट रूप से बताएं।

 

Question 4. भारत द्वारा गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने के दो कारण लिखिए।
Answer: भारत द्वारा गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने के दो कारण ये हैं:
• भारत किसी भी बड़ी शक्ति के गुट में शामिल नहीं होना चाहता था।
• भारत का पंचशील के सिद्धान्तों में पूरा विश्वास था।
In simple words: भारत गुट-निरपेक्ष इसलिए बना क्योंकि वह किसी बड़े सैन्य गुट में शामिल नहीं होना चाहता था और उसे पंचशील के सिद्धांतों पर भरोसा था।

🎯 Exam Tip: किन्हीं दो कारणों को हमेशा स्पष्ट और संक्षिप्त बिंदुओं में लिखें।

 

Question 5. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम सम्मेलन कब और कहाँ आयोजित हुआ ?
Answer: गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम सम्मेलन सितम्बर, 1961 ई० में बेलग्रेड (यूगोस्लाविया) में आयोजित हुआ था।
In simple words: गुट-निरपेक्ष आंदोलन का पहला सम्मेलन 1961 में यूगोस्लाविया के बेलग्रेड शहर में हुआ था।

🎯 Exam Tip: घटनाओं से संबंधित प्रश्नों में, सही तारीख और स्थान का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. गुट-निरपेक्षता की त्रिमूर्ति से क्या आशय है ?
या
गुट-निरपेक्षता की चौकड़ी से क्या आशय है? [2017]
या
गुट-निरपेक्षता की नीति का सूत्रपात करने वाले किन्हीं दो गैर-भारतीयों के नाम और उनके देशों का उल्लेख कीजिए । [2009]
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के जन्मदाताओं में से किन्हीं दो का नाम लिखिए। [2013]

Answer: भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा पेश की गई गुट-निरपेक्षता की नीति का इंडोनेशिया के पूर्व राष्ट्रपति सुकर्णो, मिस्र के राष्ट्रपति नासिर और यूगोस्लाविया के पूर्व राष्ट्रपति मार्शल टीटो ने समर्थन किया था। इन्होंने ही गुट-निरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी थी। इन्हें ही गुट-निरपेक्षता की चौकड़ी या त्रिमूर्ति कहा जाता है।
In simple words: गुट-निरपेक्षता की त्रिमूर्ति का मतलब पंडित जवाहरलाल नेहरू, मार्शल टीटो और अब्दुल नासिर जैसे नेता थे, जिन्होंने इस आंदोलन की शुरुआत की थी।

🎯 Exam Tip: त्रिमूर्ति या चौकड़ी के नाम याद रखें और उनके देशों का भी उल्लेख करें।

 

Question 7. भारत की विदेश-नीति के उद्देश्य बताइट । [2015]
Answer: भारतीय विदेश नीति के मुख्य उद्देश्य ये हैं:
• अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा में सकारात्मक सहयोग देना।
• साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का कानूनी तौर पर विरोध करना।
• सैनिक गुटबंदियों से खुद को दूर रखना।
• सभी देशों के साथ शांतिपूर्ण और सम्मानजनक संबंध स्थापित करना।
• सैनिक गुटबंदियों और समझौतों से हमेशा खुद को अलग रखना चाहिए। यह नीति आत्मनिर्भरता और विश्व शांति के आदर्शों पर आधारित है।
In simple words: भारत की विदेश नीति का लक्ष्य दुनिया में शांति और सुरक्षा बनाए रखना, साम्राज्यवाद का विरोध करना, सैनिक गुटों से दूर रहना और सभी देशों से अच्छे संबंध रखना है।

🎯 Exam Tip: विदेश नीति के उद्देश्यों को हमेशा स्पष्ट और संक्षिप्त बिंदुओं में लिखें, ताकि वे आसानी से याद रहें।

बहुविकल्पीय

 

Question 1. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के अब तक आयोजित शिखर सम्मेलनों की संख्या है
(क) 17
(ख) 16
(ग) 14
(घ) 13
Answer: (क) 17
In simple words: गुट-निरपेक्ष आंदोलन के अब तक कुल 17 शिखर सम्मेलन हो चुके हैं।

🎯 Exam Tip: इस प्रकार के तथ्यात्मक प्रश्नों के लिए संख्या को ठीक से याद रखना ज़रूरी है।

 

Question 2. 1961 ई० में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम शिखर सम्मेलन कहाँ हुआ? [2014, 16]
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का सर्वप्रथम शिखर सम्मेलन किस नगर में हुआ था? (2015, 16, 18]

(क) बेलग्रेड (यूगोस्लाविया) में
(ख) दिल्ली (भारत में
(ग) काहिरा (मिस्र) में
(घ) हवाना (क्यूबा) में
Answer: (क) बेलग्रेड (यूगोस्लाविया) में
In simple words: गुट-निरपेक्ष आंदोलन का पहला बड़ा सम्मेलन 1961 में यूगोस्लाविया के बेलग्रेड शहर में हुआ था।

🎯 Exam Tip: पहले शिखर सम्मेलन की जगह और साल को हमेशा याद रखें क्योंकि यह एक बुनियादी जानकारी है।

 

Question 3. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का सातवाँ शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था- [2011]
(क) हरारे में
(ख) जकार्ता में
(ग) नयी दिल्ली में
(घ) बेलग्रेड में
Answer: (ग) नयी दिल्ली में
In simple words: गुट-निरपेक्ष आंदोलन का सातवां शिखर सम्मेलन भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित हुआ था।

🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलनों की मेजबानी करने वाले शहरों को याद रखें, खासकर जब यह भारत से संबंधित हो।

 

Question 4. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का 14वाँ शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था- [2012]
(क) जकार्ता में
(ख) हरारे में
(ग) बेलग्रेड में
(घ) नयी दिल्ली में
Answer: (क) जकार्ता में
In simple words: गुट-निरपेक्ष आंदोलन का 14वां बड़ा सम्मेलन इंडोनेशिया के शहर जकार्ता में हुआ था।

🎯 Exam Tip: अलग-अलग शिखर सम्मेलनों की मेजबानी करने वाले शहरों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 5. पंचशील समझौता कब हुआ?
(क) 1950 ई० में
(ख) 1960 ई० में
(ग) 1945 ई० में
(घ) 1954 ई० में
Answer: (घ) 1954 ई० में
In simple words: पंचशील समझौता भारत और चीन के बीच साल 1954 में हुआ था।

🎯 Exam Tip: प्रमुख समझौतों की तारीखें याद रखना ज़रूरी है।

 

Question 6. पंचशील के सिद्धान्त में निम्नलिखित में से कौन-सा सिद्धान्त शामिल है?
(क) अनाक्रमण
(ख) समानता एवं पारस्परिक लाभ
(ग) शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व
(घ) ये सभी
Answer: (घ) ये सभी
In simple words: पंचशील के सिद्धांतों में एक-दूसरे पर हमला न करना, समानता और आपसी लाभ, और शांति से मिलकर रहना, ये तीनों ही शामिल हैं।

🎯 Exam Tip: पंचशील के सभी पाँचों सिद्धान्तों को याद रखें ताकि आप पहचान सकें कि कौन-सा इसमें शामिल है।

 

Question 7. भारत की विदेश-नीति निम्नलिखित में से किसका समर्थन नहीं करती है? [2012]
(क) निःशस्त्रीकरण ।
(ख) उपनिवेशवाद
(ग) गुट-निरपेक्षता
(घ) पंचशील
Answer: (ख) उपनिवेशवाद
In simple words: भारत की विदेश नीति उपनिवेशवाद का समर्थन नहीं करती है, बल्कि इसका विरोध करती है, क्योंकि यह गुलामी को बढ़ावा देता है।

🎯 Exam Tip: भारत की विदेश नीति के मुख्य सिद्धान्तों को समझें ताकि यह जान सकें कि भारत किसका समर्थन करता है और किसका नहीं।

 

Question 8. निम्नलिखित में से कौन गुट-निरपेक्ष आन्दोलन से सम्बन्धित नहीं है? [2013]
(क) मिस्र के नासिर
(ख) इण्डोनेशिया के सुकर्णो
(ग) भारत के जवाहरलाल नेहरू
(घ) चीन के चाऊ-एन-लाई
Answer: (घ) चीन के चाऊ-एन-लाई
In simple words: मिस्र के नासिर, इंडोनेशिया के सुकर्णो और भारत के जवाहरलाल नेहरू गुट-निरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक थे, जबकि चीन के चाऊ-एन-लाई इससे संबंधित नहीं थे।

🎯 Exam Tip: गुट-निरपेक्ष आंदोलन के प्रमुख संस्थापकों के नाम याद रखें।

 

Question 9. वर्ष 2012 में गुट-निरपेक्ष शिखर सम्मेलन किस देश में आयोजित हुआ था ? [2013]
(क) भारत
(ख) पाकिस्तान
(ग) ईरान
(घ) बांग्लादेश
Answer: (ग) ईरान
In simple words: साल 2012 में गुट-निरपेक्ष देशों का शिखर सम्मेलन ईरान में हुआ था।

🎯 Exam Tip: हाल के वर्षों में हुए शिखर सम्मेलनों की मेजबानी करने वाले देशों को याद रखें।

 

Question 10. निम्नलिखित में से कौन-सा एक तत्त्व भारतीय विदेश-नीति का आधार नहीं है ? [2013]
(क) विश्व शान्ति की स्थापना में सहयोग
(ख) अन्तर्राष्ट्रीय कानून का पालन
(ग) उपनिवेशवाद का समर्थन
(घ) सैनिक गुटबन्दियों से पृथकता
Answer: (ग) उपनिवेशवाद का समर्थन
In simple words: भारतीय विदेश नीति उपनिवेशवाद का समर्थन नहीं करती, बल्कि उसका विरोध करती है। बाकी सारे तत्व भारतीय विदेश नीति के आधार हैं।

🎯 Exam Tip: भारतीय विदेश नीति के आधारभूत सिद्धांतों को अच्छे से समझें ताकि आप यह पहचान सकें कि कौन-सा सिद्धांत इसका हिस्सा नहीं है।

 

Question 11. निःशस्त्रीकरण आवश्यक है [2014]
(क) विश्व शान्ति के लिए
(ख) युद्ध रोकने के लिए
(ग) मानव संहार रोकने के लिए।
(घ) ये सभी
Answer: (घ) ये सभी
In simple words: निःशस्त्रीकरण विश्व शांति बनाए रखने, युद्धों को रोकने और बड़े पैमाने पर मानव जीवन के विनाश को रोकने के लिए बहुत ज़रूरी है।

🎯 Exam Tip: निःशस्त्रीकरण के सभी लाभों को याद रखें, क्योंकि ये सभी विकल्प इसकी आवश्यकता को दर्शाते हैं।

 

Question 12. निम्नलिखित में से गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का अग्रदूत कौन था ? [2015, 17]
(क) मार्शल टीटो
(ख) जोसेफ स्टालिन
(ग) विंस्टन चर्चिल
(घ) फ्रेंकलिन रुजवेल्ट
Answer: (क) मार्शल टीटो
In simple words: यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो गुट-निरपेक्ष आंदोलन के प्रमुख संस्थापकों में से एक थे।

🎯 Exam Tip: गुट-निरपेक्ष आंदोलन के संस्थापकों के नाम अच्छी तरह याद रखें।

 

Question 13. निम्नलिखित में से पंचशील सिद्धान्त के प्रतिपादक कौन थे ? [2015]
(क) जवाहरलाल नेहरू
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) सुभाषचन्द्र बोस
(घ) बी०आर० अम्बेडकर
Answer: (क) जवाहरलाल नेहरू
In simple words: भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पंचशील के सिद्धांतों को बनाया और बढ़ावा दिया था।

🎯 Exam Tip: पंचशील के प्रतिपादक का नाम याद रखना एक महत्वपूर्ण तथ्य है।

 

Question 14. ‘सह-अस्तित्व' का सिद्धान्त निरूपित किया गया था (2017)
(क) संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में
(ख) पंचशील की घोषणा में
(ग) मानवाधिकारों की घोषणा में
(घ) भारतीय संविधान की उद्देशिका में
Answer: (ख) पंचशील की घोषणा में
In simple words: 'सह-अस्तित्व' का सिद्धांत पंचशील की घोषणा का एक मुख्य हिस्सा था, जो शांतिपूर्ण सह-जीवन पर ज़ोर देता है।

🎯 Exam Tip: 'सह-अस्तित्व' जैसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों का उल्लेख कहाँ किया गया था, यह याद रखना ज़रूरी है।

 

Question 15. 'डिस्कवरी ऑफ इण्डिया' पुस्तक का लेखक कौन है? (2017)
(क) जवाहरलाल नेहरू
(ख) मौलाना अब्दुल कलाम आजाद
(ग) सुभाष चन्द्र बोस
(घ) महात्मा गाँधी
Answer: (क) जवाहरलाल नेहरू
In simple words: 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' किताब को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखा था, जो भारत के इतिहास और संस्कृति पर आधारित है।

🎯 Exam Tip: प्रसिद्ध पुस्तकों और उनके लेखकों के नाम याद रखना सामान्य ज्ञान और इतिहास के लिए महत्वपूर्ण है।

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