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Detailed Chapter 7 आर्थिक विकास में राज्य की भूमिका UP Board Solutions for Class 10 Social Science
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Class 10 Social Science Chapter 7 आर्थिक विकास में राज्य की भूमिका UP Board Solutions PDF
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
Question 1. अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका को निर्धारित करने वाले तत्वों की विवेचना कीजिए। या किसी अर्थव्यवस्था के आर्थिक विकास में राज्य का महत्त्वपूर्ण योगदान है। स्पष्ट कीजिए। या आर्थिक विकास में राज्य की क्या भूमिका होती है?
Answer: विकासशील देशों में आर्थिक विकास को कई समस्याएँ रोकती हैं। इन देशों में पैसों की कमी, प्राकृतिक साधनों का कम उपयोग, बचत और निवेश की कमी, उद्योगों का अभाव और बढ़ती बेरोज़गारी जैसी समस्याएँ आम हैं। इसलिए, सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह देश के प्राकृतिक साधनों का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करे। सरकार को पैसा, कुशल श्रमिक, उद्यमिता, तकनीकी जानकारी, परिवहन, संचार, बिजली और ऊर्जा जैसी सुविधाएँ उपलब्ध करानी चाहिए। इस लक्ष्य को पाने के लिए सरकार कई नीतियाँ बनाती है, जैसे राजकोषीय नीति, मौद्रिक नीति, औद्योगिक नीति और श्रम नीति। ये नीतियाँ आर्थिक विकास के लिए अच्छा माहौल बनाने में मदद करती हैं। सरकार देश में बचत और निवेश को बढ़ावा देने, उद्योग लगाने में मदद करने और कच्चे माल की आपूर्ति पक्की करने जैसे सभी कामों में बहुत अहम भूमिका निभाती है। इस तरह, सरकार आर्थिक विकास के लिए एक अच्छी योजना बनाने और उसे लागू करके आर्थिक लक्ष्यों को पूरा करने में महत्वपूर्ण योगदान देती है। राज्य के नियंत्रण के बिना व्यवस्थित आर्थिक विकास संभव नहीं है। हमारे संविधान में राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी बातों को खास जगह दी गई है। ये तत्व सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से अर्थव्यवस्था चलाने में सरकार की जिम्मेदारी की सीमा तय करते हैं। संविधान में बताए गए मुख्य नीति-निर्देशक सिद्धांत जो हमारे आर्थिक जीवन पर असर डालते हैं, वे इस प्रकार हैं:
1. सभी नागरिकों को जीने के लिए पर्याप्त साधन मिलें।
2. समाज के भले के लिए सभी भौतिक साधनों का सही वितरण हो।
3. एक निश्चित सीमा से ज़्यादा धन का एक जगह इकट्ठा होने पर रोक लगे।
4. महिलाओं और पुरुषों दोनों को समान काम के लिए समान वेतन मिले।
5. श्रमिकों की शक्ति और स्वास्थ्य की रक्षा हो, और उन्हें अपनी उम्र व स्वास्थ्य के हिसाब से खतरनाक काम करने के लिए मजबूर न किया जाए।
6. बच्चों को शोषण से बचाया जाए।
7. काम और शिक्षा का अधिकार मिले, और बेरोज़गारी, बीमारी व बुढ़ापे में सरकारी सहायता मिले।
8. काम करने का सही माहौल सुरक्षित रहे।
9. रोज़गार और जीवन का सही स्तर मिले।
10. कमज़ोर वर्गों, खासकर अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों के आर्थिक हितों को बढ़ावा मिले।
11. कृषि और पशुपालन को वैज्ञानिक तरीके से संगठित किया जाए।
In simple words: सरकार की मुख्य भूमिका विकासशील देशों में आर्थिक रुकावटों को दूर करके लोगों के लिए बेहतर जीवन और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। वह नीतियाँ बनाकर धन और संसाधनों का सही वितरण सुनिश्चित करती है और शोषण से बचाती है।
🎯 Exam Tip: इस तरह के सवालों में, सरकार की भूमिका के हर पहलू को स्पष्ट और बिन्दुवार तरीके से बताएँ। संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।
Question 2. आर्थिक विकास प्रक्रिया में राजकीय हस्तक्षेप एवं विधियों की विस्तृत विवेचना कीजिए। या सार्वजनिक वितरण प्रणाली के सफल क्रियान्वयन हेतु क्या कदम उठाने चाहिए? कोई दो सुझाव दीजिए। (2013) या औद्योगिक लाइसेन्सिग व्यवस्था को समझाइए तथा इसके उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिए। मौद्रिक नीति का अर्थ एवं उद्देश्य लिखिए। या विकासशील देशों के आर्थिक विकास के लिए दो उपाय सुझाइए। [2010] या राजकोषीय नीति से आप क्या समझते हैं? अर्थव्यवस्था के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए करारोपण के महत्त्व को लिखिए। या सार्वजनिक वितरण प्रणाली को प्रभावी बनाने में सरकार द्वारा किए गए प्रयास लिखिए। भारतीय रिजर्व बैंक के किन्हीं चार प्रमुख कार्यों का उल्लेख कीजिए। [2013] या उत्पादन और वितरण पर नियन्त्रण हेतु राज्य कौन-से उपाय करता है? स्पष्ट कीजिए।
Answer: **राज्य द्वारा हस्तक्षेप: हस्तक्षेप के प्रकार एवं विधियाँ**
भारतीय अर्थव्यवस्था एक मिश्रित अर्थव्यवस्था है। इसका मतलब है कि यहाँ सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र मिलकर काम करते हैं। सरकारी क्षेत्र का लक्ष्य 'सामाजिक हित' को बढ़ाना है, जबकि निजी क्षेत्र 'सबसे ज़्यादा लाभ' कमाना चाहता है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए, निजी उत्पादक कई बार ग्राहकों और श्रमिकों का शोषण करते हैं। सरकार का काम है कि वह समाज को इस शोषण से बचाए। इसके लिए सरकार आर्थिक कामों में दखल देती है। यह हस्तक्षेप मुख्य रूप से तीन तरीकों से होता है:
• राजकोषीय नीति
• मौद्रिक नीति
• उत्पादन और वितरण पर भौतिक नियंत्रण।
**1. राजकोषीय नीति**
राजकोषीय नीति का मतलब सरकार की सार्वजनिक खर्च और सार्वजनिक ऋण से जुड़ी नीतियों से है। प्रोफेसर आर्थर स्मिथीज के अनुसार, यह वह नीति है जिससे सरकार राष्ट्रीय आय, उत्पादन या रोज़गार पर मनचाहा असर डालने और बुरे असर को रोकने के लिए अपने खर्च और आय के कार्यक्रमों का उपयोग करती है। यह आर्थिक नीति का एक मज़बूत साधन है जो आर्थिक स्थिरता लाने में मदद करता है।
इस तरह, राजकोषीय नीति के तहत सरकार सार्वजनिक आय (जैसे कर लगाना), सार्वजनिक खर्च और सार्वजनिक ऋण के ज़रिए अर्थव्यवस्था पर मनचाहा असर डालने की कोशिश करती है। राजकोषीय नीति के मुख्य उपकरण ये हैं:
(i) करारोपण (कर) – कर एक ज़रूरी योगदान है जो हर करदाता को सरकार के कर विभाग को देना ही होता है। कर, नीति के एक उपकरण के रूप में, अर्थव्यवस्था को इस तरह प्रभावित करते हैं:
1. अमीर लोगों की आय पर ज़्यादा कर लगाकर आय और धन के वितरण में असमानताएँ कम की जा सकती हैं।
2. एक ऐसा कर ढाँचा जहाँ कर की दरें धीरे-धीरे बढ़ती हैं (प्रगतिशील कर-प्रणाली), जिससे एक निश्चित आय स्तर को कर मुक्त रखकर आय की असमानता को कम करने में मदद मिलती है।
3. विलासिता की चीज़ों पर ज़्यादा कर लगाकर आय की असमानता को कम किया जा सकता है।
4. ज़्यादा सीधे कर आयात को हतोत्साहित करते हैं।
5. अप्रत्यक्ष करों में कमी औद्योगिक विकास को गति देती है।
6. कर विकास के लिए ज़रूरी पूँजी जुटाने में मदद करते हैं।
7. करों से मिली आय के कारण सरकारी निवेश में वृद्धि होती है, जो आर्थिक और सामाजिक बुनियादी ढांचे के विकास में सहायक है।
(ii) सार्वजनिक व्यय – केंद्र, राज्य और स्थानीय संस्थाओं द्वारा किए गए खर्च को सार्वजनिक व्यय कहते हैं। आर्थिक उद्देश्यों को पाने के लिए सार्वजनिक व्यय का उपयोग इन तरीकों से किया जा सकता है:
1. सार्वजनिक खर्च से उपभोग स्तर, जीवन स्तर, काम करने की क्षमता और आख़िर में उत्पादकता के स्तर में बढ़ोतरी हो सकती है।
2. सार्वजनिक खर्च आर्थिक साधनों के एक जगह से दूसरी जगह जाने को प्रभावित करता है।
3. प्रगतिशील सार्वजनिक खर्च का तरीका अपनाकर आर्थिक असमानताओं को कम किया जा सकता है।
4. सार्वजनिक खर्च से सार्वजनिक निर्माण कार्यों की योजनाएँ शुरू करके रोज़गार बढ़ाया जा सकता है।
5. सार्वजनिक खर्च से आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया जा सकता है।
(iii) सार्वजनिक ऋण – जब सरकार अपनी वित्तीय ज़रूरतों को अपनी सामान्य आय से पूरा नहीं कर पाती, तो उसे सार्वजनिक ऋण लेना पड़ता है। इस तरह सार्वजनिक ऋण सरकार के खर्चों को पूरा करने का एक साधन है। इसलिए, सरकार द्वारा लिया गया ऋण सार्वजनिक ऋण कहलाता है। यह ऋण अपने ही देश में या विदेश से लिया जा सकता है। सार्वजनिक ऋण अर्थव्यवस्था पर इन तरीकों से असर डालते हैं:
1. उत्पादक कामों पर खर्च किया गया सार्वजनिक ऋण उत्पादन क्षमता बढ़ाता है।
2. सरकारी ऋण सुरक्षित और सुविधाजनक होते हैं। इसलिए, ये बचत को बढ़ावा देते हैं।
3. यदि ऋण गरीब लोगों के फायदे के लिए खर्च किया जाता है, तो इससे आर्थिक असमानताएँ कम होती हैं।
4. ऋण वर्तमान उपभोग को कम करता है।
5. ऋण के ज़रिए उद्योग और व्यापार में ज़रूरी बदलाव लाए जा सकते हैं।
**2. मौद्रिक नीति**
मौद्रिक नीति का मतलब सरकार या केंद्रीय बैंक की वह नियंत्रण नीति है जिसके तहत कुछ खास उद्देश्यों को पाने के लिए मुद्रा की मात्रा, उसकी लागत (ब्याज दर) और उसके उपयोग को नियंत्रित करने के उपाय किए जाते हैं। प्रोफेसर हैरी जी. जॉनसन के शब्दों में, "मौद्रिक नीति का अर्थ केंद्रीय बैंक की वह नियंत्रण नीति है जिसके ज़रिए केंद्रीय बैंक सामान्य आर्थिक नीति के लक्ष्यों को पाने के उद्देश्य से मुद्रा की पूर्ति पर नियंत्रण करता है।"
मौद्रिक नीति ऋण की पूर्ति और उसके उपयोग को प्रभावित करके, महंगाई से लड़कर और भुगतान संतुलन को स्थिर करके आर्थिक विकास की गति को तेज़ करने में मदद करती है। इसके ज़रिए निजी उपयोग या सरकारी खर्च के साधनों के प्रवाह को घटाया-बढ़ाया जा सकता है। इससे निवेश और पूंजी निर्माण के लिए उपलब्ध साधनों की मात्रा में ज़रूरत के हिसाब से बदलाव किया जा सकता है, और इस तरह कृषि व उद्योगों की मुद्रा और ऋण की ज़रूरतों को पूरा किया जा सकता है। किसी भी देश की एक अच्छी मौद्रिक नीति बचत और निवेश के लिए सही माहौल बनाती है। यह ऋण की लागत को कम करके बचत और निवेश को बढ़ावा देती है, मौद्रिक संस्थाओं की स्थापना करके निष्क्रिय साधनों को सक्रिय करती है, महंगाई के दबाव को नियंत्रित करके अतिरिक्त निवेश के लिए सही माहौल बनाती है और घाटे की भरपाई करके विकास के लिए अतिरिक्त साधन उपलब्ध करा सकती है।
**भारत में मौद्रिक नीति का संचालक-भारतीय रिजर्व बैंक**
भारतीय रिजर्व बैंक भारत का केंद्रीय बैंक है। इसकी स्थापना 1 अप्रैल, 1935 को हुई थी। 1 अप्रैल, 1949 को इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। यह बैंक मुख्य रूप से इन कामों को करता है:
1. कागज़ के नोट जारी करना।
2. बैंकों के लिए बैंक का काम करना।
3. सरकार का बैंकर, एजेंट और सलाहकार के रूप में काम करना।
4. विनिमय दर को स्थिर बनाए रखना।
5. कृषि और उद्योग के लिए ऋण की व्यवस्था करना।
6. आंकड़े इकट्ठा करना और उन्हें प्रकाशित करना।
7. मुद्रा और ऋण पर नियंत्रण रखना।
**3. उत्पादन एवं वितरण पर भौतिक नियंत्रण**
सरकार उत्पादन और वितरण के क्षेत्रों में सीधा हस्तक्षेप करके भारतीय अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण लगाती है।
(i) उत्पादन के क्षेत्र में नियंत्रण – सरकार औद्योगिक नीति और लाइसेन्सिंग प्रक्रिया के ज़रिए अर्थव्यवस्था के औद्योगिक क्षेत्र को नियंत्रित करती है।
**औद्योगिक लाइसेन्सिंग** – सरकार आर्थिक गतिविधियों में ज़रूरत के हिसाब से हस्तक्षेप करती है। उत्पादन के क्षेत्र में सरकारी हस्तक्षेप का पहला तरीका औद्योगिक लाइसेन्स रहा है। भारतीय संसद ने 'औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1948' के बाद 1951 में 'औद्योगिक विकास एवं नियमन अधिनियम' लागू किया था। इसके तहत भारत की सभी विनिर्माण इकाइयों को सरकार के पास पंजीकृत कराना ज़रूरी था। वर्तमान औद्योगिक नीति (1991) के प्रस्तावों के अनुसार, अब कुछ इकाइयों को छोड़कर जो सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं, बाक़ी को पंजीकृत कराना अनिवार्य नहीं है।
पुरानी व्यवस्था में लाइसेन्सिंग नियमों को इन उद्देश्यों के लिए अपनाया गया था:
1. उद्योगों का संतुलित क्षेत्रीय विकास करना।
2. बड़े व्यापारिक घरानों की और ज़्यादा बढ़ोतरी पर रोक लगाना।
3. नए उद्योगों को सुरक्षा देना।
4. कुछ क्षेत्रों को लघु उद्योगों के लिए आरक्षित रखना।
कड़े नियमों और प्रशासनिक नियंत्रणों के बढ़ने से निजी क्षेत्र हतोत्साहित हो रहा था। अब इस नीति में उदारता औद्योगिक विकास की दिशा में एक अच्छा कदम है।
1991 में घोषित उदारवादी औद्योगिक नीति और उसके बाद के संशोधनों के तहत, अब केवल 5 उद्योगों के लिए लाइसेन्स लेना ज़रूरी है। विदेशी पूंजी निवेश को बढ़ावा दिया गया है, विदेशी तकनीक के कई समझौतों को अपने-आप मंज़ूरी देने की व्यवस्था की गई है और निजी क्षेत्र के विस्तार को प्रोत्साहित किया गया है।
(ii) सार्वजनिक वितरण प्रणाली – अर्थव्यवस्था पर सरकार का भौतिक नियंत्रण सार्वजनिक वितरण और राशनिंग प्रणाली के रूप में भी होता है। जैसा कि हम जानते हैं, मांग और आपूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों से तय होने वाले दाम सामाजिक रूप से हमेशा सही नहीं होते। जब चीज़ों की आपूर्ति कम होती है, तो उनके दाम तेज़ी से बढ़ने लगते हैं। हमारे देश में ज़रूरी चीज़ों की अक्सर कमी रहती है। इसके तीन मुख्य कारण हैं:
1. हम खाद्यान्न जैसी ज़रूरी और बेचने लायक चीज़ों का उत्पादन पर्याप्त मात्रा में नहीं कर पाते।
2. उत्पादित माल के भंडारण और वितरण में कई कमियाँ हैं।
3. बड़े व्यापारी सट्टा बाज़ारी के लिए खाद्यान्नों का स्टॉक कर लेते हैं।
मांग के हिसाब से भारतीय ग्राहकों की खरीदने की शक्ति में बहुत असमानताएँ हैं। गरीब लोगों के पास खरीदने की शक्ति कम होती है। इसलिए, अगर खाद्यान्नों को मांग और आपूर्ति की शक्तियों पर छोड़ दिया जाए, तो खरीदने की शक्ति की कमी के कारण हमारी आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन्हें खरीद नहीं पाएगा। इसका नतीजा यह होगा कि एक तरफ़ तो कुपोषण और भुखमरी होगी और दूसरी तरफ़ ज़रूरत से ज़्यादा उपभोग और बर्बादी होगी। इसलिए ज़रूरी है कि सरकार खाद्यान्न, मिट्टी का तेल और इसी तरह की अन्य ज़रूरी चीज़ों की वसूली, दाम तय करने और वितरण इस तरह करे कि उसकी मांग और आपूर्ति के दबावों से रक्षा की जा सके। इसके लिए सरकार तीन कदम उठा सकती है:
1. प्राथमिक उत्पादक को उसकी उपज का उचित दाम ज़रूर दिया जाना चाहिए, नहीं तो वह उत्पादन बढ़ाने में हिचकिचाएगा। इसलिए सरकार को हमेशा एक ऐसी कीमत की घोषणा के लिए तैयार रहना चाहिए, जिस पर वह सार्वजनिक वसूली के ज़रिए किसान से अतिरिक्त माल खरीद सके। हमारे देश में केंद्र सरकार कृषि मूल्य आयोग के सुझावों के आधार पर कृषि उत्पादों के वसूली मूल्य की घोषणा करके उन्हें खरीदती है।
2. वसूल किए गए स्टॉक के लिए पर्याप्त भंडारण सुविधाएँ बनाई जानी चाहिए। इससे सरकार के पास बड़ा सुरक्षित भंडार रहेगा, बाज़ार में कीमतों में स्थिरता बनी रहेगी और सट्टेबाजी की प्रवृत्ति कम होगी। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ज़रिए बनी चीज़ों की बिक्री की जाती है।
3. पूरे देश में सरकारी नियंत्रण वाले वितरण केंद्रों या 'उचित मूल्य की दुकानों' के ज़रिए ज़रूरी चीज़ों की सार्वजनिक वितरण प्रणाली को प्रभावी बनाया जाता है।
भारत में खाद्यान्न, चीनी, मिट्टी का तेल आदि का वितरण 'उचित मूल्य की दुकानों' से होता है। नियंत्रित चीज़ों की बिक्री उपभोक्ता सहकारी समितियों के ज़रिए की जाती है। खाद्यान्न और चीनी की सार्वजनिक वितरण व्यवस्था आंशिक राशनिंग योजना के ज़रिए उचित मूल्य की दुकानों द्वारा की जाती है। ग्राहकों के लिए प्रति व्यक्ति कोटा तय कर दिया जाता है। इस तरह, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ज़रिए कम आय या गरीब वर्ग के ग्राहकों को उपभोग की सुरक्षा मिलती है।
In simple words: सरकार अर्थव्यवस्था में तीन मुख्य तरीकों से दखल देती है: राजकोषीय नीति (कर और खर्च), मौद्रिक नीति (पैसे का नियंत्रण) और उत्पादन व वितरण पर सीधा नियंत्रण। इन तरीकों से सरकार आर्थिक असमानताएँ कम करती है, विकास को बढ़ावा देती है और ज़रूरी चीज़ें सभी तक पहुँचाती है।
🎯 Exam Tip: जब सरकार के हस्तक्षेप की विधियों की व्याख्या करें, तो हर विधि (राजकोषीय, मौद्रिक, भौतिक नियंत्रण) को उदाहरणों और उसके प्रभावों के साथ विस्तार से समझाएँ। मुख्य बिंदुओं को सूचीबद्ध करना याद रखें।
Question 3. 'वैट' (मूल्यवर्द्धित कर) से आप क्या समझते हैं? भारत में वैट की आवश्यकता बताइए।
Answer: **मूल्यवर्द्धित कर (VAT)**
जो कर मूल्यवृद्धि के हर चरण (उत्पादन या वितरण) पर वसूला जाता है, उसे मूल्यवर्द्धित कर (VAT) कहते हैं। जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है, यह मूल्यवर्धन पर लगाया जाने वाला कर है, जो भारत में राज्यों द्वारा लगाया जाता है।
'वैट' कर लगाने का एक बेहतर तरीका है, क्योंकि इसमें कर की वसूली मूल्यवर्धन के हर स्तर पर होती है, इसलिए इसे 'बहु-बिंदु कर' भी कहते हैं। इसके उलट, गैर-वैट विधि में 'एकल-बिंदु कर' होता है, जिससे 'कर पर कर' लगने लगता है और इसका 'क्रमपाती प्रभाव' (Cascading Effect) पड़ता है। इससे महंगाई बढ़ती है। भारत जैसे देश में, जहाँ बड़ी आबादी की खरीदने की शक्ति कम है और लोग बेहतर जीवन-स्तर से नीचे गुज़र बसर करते हैं, वहाँ वैट पद्धति से कर वसूलना बहुत तर्कसंगत है। यह कर प्रणाली 'अमीरों के खिलाफ़' न होते हुए भी 'गरीबों के लिए हितैषी' है।
**भारत में वैट की आवश्यकता**
दुनिया के 150 से ज़्यादा देश अपने अप्रत्यक्ष करों को मूल्यवर्द्धित कर (वैट) पद्धति से ही इकट्ठा करते हैं। वैश्वीकरण की प्रक्रिया में अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ने के लिए भारत को भी इस प्रणाली को अपनाने की ज़रूरत महसूस हो रही थी। भारत में भी अप्रत्यक्ष करों की वसूली के लिए वैट विधि को अपनाना ज़रूरी है। इसे हम इन तरीकों से समझा सकते हैं:
(i) क्योंकि गैर-वैट पद्धति में कर की वसूली एक ही बिंदु पर होती है, जिससे कर पर कर लगने से दाम बढ़ते जाते हैं, जो गरीबों के खिलाफ़ है। इसलिए वैट अपनाने से यह दाम-वृद्धि नहीं होगी, जिससे गरीबों की खरीदने की शक्ति बढ़ेगी और उनके जीवन-स्तर में सुधार होगा।
(ii) भारत एक संघीय राजव्यवस्था है, जहाँ केंद्र सरकार के अलावा राज्य सरकारों द्वारा भी कई तरह के अप्रत्यक्ष कर वसूले जाते हैं। जबकि केंद्र द्वारा लगाए गए अप्रत्यक्ष कर पूरे देश में एक जैसे हैं, राज्यों के अप्रत्यक्ष कर (जैसे उत्पाद शुल्क, बिक्री कर, मनोरंजन कर) हमेशा से अलग-अलग रहे हैं। इस वजह से भारत के अलग-अलग राज्यों में अप्रत्यक्ष करों का भार भी अलग-अलग है। इसका मतलब है कि भारत का बाज़ार एक जैसा (unified) नहीं था, जिससे भारत में उत्पादन और व्यापार करना मुश्किल काम रहा है। यही कारण था कि वैट के ज़रिए राज्यों के अप्रत्यक्ष करों में समानता लाने के लिए 'राज्य वैट' की शुरुआत की गई, जिसने राज्यों के बिक्री करों की जगह ली और इसकी वसूली मूल्यवर्द्धित पद्धति पर शुरू हुई। इस प्रक्रिया को 'समरूप वैट' (Uniform VAT) की शुरुआत भी कहते हैं।
(iii) आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए भारत के बाज़ार को एकरूप या समरूप बनाना ज़रूरी था, जिसकी शुरुआत 'वैट' से हुई।
(iv) भारतीय संघीय व्यवस्था में आर्थिक रूप से मज़बूत संघ और कमज़ोर राज्यों का उदय हुआ, इससे राज्यों के स्थानीय विकास कार्यों में लगातार कमी आई। चूंकि वैट विधि में राज्यों की कर वसूली बढ़ती है, इसलिए भारत में इस प्रणाली को अपनाना ज़रूरी है। वैट प्रणाली राज्यों की आय बढ़ाने में मदद करती है, जिससे वे अपने विकास कार्यों पर ध्यान दे सकें।
(v) हालाँकि भारत में अप्रत्यक्ष करों की बड़ी चोरी होती रही है, पर वैट विधि के लागू होने से कर चोरी घटी है; क्योंकि इस विधि में किसी भी स्तर पर की गई मूल्यवृद्धि की पुष्टि के लिए पिछली खरीद की रसीद दिखानी ज़रूरी होती है। इस विधि से करों की 'दोहरी जाँच' (double check) संभव है और कर की चोरी रोकना अपने आप संभव हो जाता है।
(vi) 'राज्य वैट' में राज्यों के अन्य अप्रत्यक्ष करों और केंद्र के कई अप्रत्यक्ष करों को शामिल कर दिया जाए तो कर की व्यवस्था काफ़ी सरल' (Simple) और 'दक्ष' (Efficient) भी हो जाएगी। ऐसे ही भविष्य के कर को 'एकल वैट' (Single VAT) कहा जाएगा, जिसकी कोशिश 'वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Services Tax-GST)' द्वारा करने की कोशिश की गई है। इस तरह, इन सभी बातों को ध्यान में रखकर कर सुधार (चेलिया कमेटी एवं केलकर कमेटी) शुरू किए गए, जिनमें एक हद तक सफलता मिली है और इन्हें आगे जारी रखने का प्रोत्साहन मिला है। गौरतलब है कि वर्ष 1996 में केंद्र सरकार ने वैट पद्धति से उत्पाद शुल्क वसूलना शुरू किया था और इस कर को एक नया नाम 'सेनवैट' (CENVAT) दिया गया था।
हालाँकि कमेटी का एक और प्रस्ताव राज्यों के उत्पाद शुल्क और बिक्री कर को एक कर, 'राज्य वैट' में मिलाने का था, लेकिन राज्यों की इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह संभव नहीं हो सका। आख़िर में राज्यों के सिर्फ़ बिक्री कर का नाम बदलकर वैट कर दिया गया और इसकी वसूली वैट पद्धति पर होने लगी। कुछ राज्यों ने इसे लागू नहीं किया, जबकि कुछ ने बाद में लागू किया, फिर भी इसका अनुभव उत्साहजनक रहा।
In simple words: वैट (मूल्यवर्द्धित कर) एक ऐसा अप्रत्यक्ष कर है जो सामान के उत्पादन और बिक्री के हर स्तर पर लगता है, जिससे 'कर पर कर' का बोझ कम होता है। भारत में इसे इसलिए ज़रूरी माना गया क्योंकि यह कर चोरी कम करता है, बाज़ार को एक जैसा बनाता है और राज्यों की आय बढ़ाता है।
🎯 Exam Tip: वैट की परिभाषा को स्पष्ट करें और भारत में इसकी आवश्यकता के बिंदुओं को तार्किक क्रम में समझाएँ। 'क्रमपाती प्रभाव' और 'दोहरी जाँच' जैसे मुख्य शब्दों का उल्लेख करना न भूलें।
Question 4. सेवा कर क्या है? वस्तु एवं सेवाकर का वर्णन कीजिए।
Answer: **सेवा कर**
पिछले दशक में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में सेवा क्षेत्र का हिस्सा बढ़ता रहा है। वर्ष 1994-95 में भारत सरकार ने सेवा कर लागू किया, जिससे उसके कर राजस्व में वृद्धि होती रही है। सेवा कर एक तरह का अप्रत्यक्ष कर है; क्योंकि इसमें सेवा देने वाला कर देता है और वह इसकी भरपाई सेवाओं का उपयोग करने वालों या लेने वालों से करता है। सेवा कर अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से सरकार के राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है।
वर्ष 1994 में केवल तीन सेवाओं से शुरू होकर आज सेवाकर 100 से ज़्यादा सेवाओं पर लागू है। संघीय बजट 2015-16 में सेवा कर को बढ़ाकर 14 प्रतिशत कर दिया गया जिसमें शिक्षा उपकर भी शामिल था, जबकि पहले यह शिक्षा उपकर सहित 12.36 प्रतिशत था। फिर 15 नवंबर, 2015 को सेवा कर की दर को स्वच्छ भारत उपकर जोड़कर 14.5% कर दिया गया। इसके बाद 1 जून, 2016 से सभी करयोग्य सेवाओं पर 0.5 कृषि कल्याण उपकर लगाया गया, जिससे सेवा कर की दर बढ़कर 15% हो गई। इस बदलाव से केंद्र और राज्यों दोनों स्तरों पर सेवाओं पर कर लगाना आसान हो गया।
**वस्तु एवं सेवा कर (GST)**
वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) एक ऐसा कर है जो राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी वस्तु या सेवा के निर्माण, बिक्री और उपयोग पर लगाया जाता है। इस कर व्यवस्था के लागू होने के बाद उत्पाद शुल्क, केंद्रीय बिक्री कर, सेवा कर जैसे केंद्रीय कर और राज्य स्तर के बिक्री कर या वैट, एंट्री टैक्स, लॉटरी टैक्स, स्टाम्प ड्यूटी, टेलीकॉम लाइसेंस फीस, टर्नओवर टैक्स आदि ख़त्म हो जाएँगे। इस कर व्यवस्था में वस्तु और सेवा की खरीद पर दिए गए कर को उनकी आपूर्ति के समय दिए जाने वाले कर के मुकाबले समायोजित कर दिया जाता है, हालाँकि यह कर भी आखिर में ग्राहक को ही देना होता है; क्योंकि वही सप्लाई चेन में सबसे आखिर में होता है।
अप्रत्यक्ष करों के क्षेत्र में सुधारों की शुरुआत वर्ष 2003 में केलकर समिति ने की थी। इसके बाद संप्रग सरकार ने वर्ष 2006 में जीएसटी विधेयक प्रस्तावित किया था और पहली बार यह विधेयक वर्ष 2011 में लाया गया था। जीएसटी व्यवस्था दुनिया के 140 देशों में लागू है। वर्ष 1954 में जीएसटी लागू करने वाला फ्रांस दुनिया का पहला देश है। भारत की तरह की दोहरी जीएसटी व्यवस्था ब्राजील और कनाडा में भी है। वर्ष 2000 में तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने जीएसटी पर विचार के लिए एक विशेष अधिकार प्राप्त समिति बनाई थी और समिति का अध्यक्ष पश्चिम बंगाल के तत्कालीन वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता को बनाया गया था। असीम दासगुप्ता समिति को जीएसटी के लिए मॉडल तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
वर्ष 2005 में तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने आम बजट में जीएसटी के विचार को सार्वजनिक तौर पर सामने रखा था। इसके अलावा वर्ष 2009 में जीएसटी के बारे में एक विमर्श-पत्र रखा गया और बाद में सरकार ने राज्यों के वित्त मंत्रियों की एक अधिकारसंपन्न समिति बनाई थी। हालाँकि वर्ष 2014 में तत्कालीन संप्रग सरकार ने इससे संबंधित विधेयक तैयार किया था, लेकिन लोकसभा का कार्यकाल खत्म होने के कारण यह विधेयक पारित नहीं हो सका। वर्तमान सरकार इसे लोकसभा में लेकर आई और इसे स्थायी समिति में भेजा गया।
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से संबंधित संविधान संशोधन (122वाँ) विधेयक 8 अगस्त, 2016 को लोकसभा में पारित हो गया और सभी सदस्यों ने इस बिल के पक्ष में मतदान किया। हालाँकि राज्यसभा ने 3 अगस्त, 2016 को जीएसटी विधेयक को सर्वसम्मति से पारित कर दिया था। इस संविधान संशोधन विधेयक का राष्ट्रपति की स्वीकृति से पहले आधे से ज़्यादा राज्यों के विधानमंडलों द्वारा समर्थन किया जाना था। इसी क्रम में असम देश का पहला राज्य था, जिसकी विधानसभा ने सबसे पहले इस विधेयक का समर्थन किया। इसके बाद बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, दिल्ली, नागालैंड, महाराष्ट्र, हरियाणा, सिक्किम, मिजोरम, तेलंगाना, गोवा, ओडिशा, राजस्थान, अरुणाचल प्रदेश तथा आंध्र प्रदेश राज्यों की विधानसभाओं द्वारा इस विधेयक को पारित किए जाने के बाद 8 सितंबर, 2016 को राष्ट्रपति द्वारा इस विधेयक को स्वीकृति प्रदान कर दी गई। इसी के साथ संविधान संशोधन (101वाँ) अधिनियम, 2016 लागू हुआ। इस अधिनियम का क्रियान्वयन 1 जुलाई, 2017 से शुरू किया गया, जिसमें वस्तु एवं सेवाकर की दरों को चार स्तरों में बांटा गया है, जो क्रमशः 5%, 12%, 18% तथा 28% हैं। यह प्रणाली टैक्स इकट्ठा करने को आसान बनाती है और कर के बोझ को भी उचित ढंग से वितरित करती है।
इस कर व्यवस्था में केंद्र और राज्यों, दोनों के कर केवल बिक्री के समय वसूले जाएँगे, साथ ही ये दोनों ही कर निर्माण लागत (मैन्यूफैक्चरिंग कॉस्ट) के आधार पर तय होंगे, जिससे वस्तु और सेवाओं के दाम कम होंगे और आम ग्राहकों को लाभ होगा।
गरीबों के लिए ज़रूरी चीज़ों को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है, इससे गरीबी दूर करने में भी मदद मिलेगी। बैंकों में भी पारदर्शिता आएगी, वे गरीबों को आसानी से कर्ज दे सकेंगे। छोटे उद्यमियों को भी उनके रिकॉर्ड के हिसाब से आसानी से कर्ज मिलेगा; क्योंकि अब सब कुछ ऑनलाइन होगा।
इसके अंतर्गत भारत सरकार द्वारा कुछ केंद्रीय एवं कुछ राज्य के अप्रत्यक्ष करों को समाहित किया गया है, जिनका विवरण इस प्रकार है:
| क्रम सं० | केन्द्रीय कर | राज्य कर |
|---|---|---|
| 1. | आयात शुल्क (Custom Duty) | बिक्री-कर : मूल्य संवर्द्धित कर (Sale Tax : Value Added Tax- VAT) |
| 2. | उत्पाद शुल्क (Excise Duty) | विलासित कर (Luxury Tax) |
| 3. | केंद्रीय बिक्री-कर (CST) | विद्युत शुल्क (Electricity Duty) |
| 4. | सेवा-कर (Service Tax) | मनोरंजन कर (Entertainment Tax) |
| 5. | शिक्षा उपकर, सरचार्ज आदि | प्रवेश कर व चुंगी (Entry Tax & Ocroi) |
In simple words: सेवा कर सेवाओं पर लगने वाला एक अप्रत्यक्ष कर है जिससे सरकार को राजस्व मिलता है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) एक राष्ट्रव्यापी कर है जो कई केंद्रीय और राज्य करों को मिलाकर बनाया गया है। इसका उद्देश्य कर व्यवस्था को सरल बनाना, दाम कम करना और पारदर्शिता बढ़ाना है।
🎯 Exam Tip: सेवा कर और जीएसटी की परिभाषा और उनके मुख्य उद्देश्यों को स्पष्ट करें। जीएसटी के विभिन्न लाभों और केंद्रीय/राज्य करों के समामेलन को बिंदुवार तरीके से समझाएँ।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. अर्थव्यवस्था में राज्य का हस्तक्षेप क्यों आवश्यक है ?
Answer: अर्थव्यवस्था को चलाने में सरकार की भूमिका बहुत ज़रूरी होती है। सरकार के नियंत्रण के बिना व्यवस्थित आर्थिक विकास संभव नहीं है। भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था है, जहाँ निजी और सरकारी दोनों क्षेत्र साथ-साथ काम करते हैं। भारतीय संविधान में 'समाजवादी' गणतंत्र की स्थापना करना राज्य का एक मुख्य उद्देश्य है, और यह तभी संभव है जब अर्थव्यवस्था पर राज्य का पूरा नियंत्रण हो। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में बाजार सामाजिक उद्देश्यों को अनदेखा करता है और सिर्फ़ अपने फायदे के लिए उत्पादन करता है। अर्थव्यवस्था में बढ़ते धन और आय की असमानताओं को कम करने और समाज में ज़्यादा से ज़्यादा लोक-कल्याण के लिए सरकार अर्थव्यवस्था में कई तरह से नियंत्रण लगाकर हस्तक्षेप करती है। कराधान, मौद्रिक नीति, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और राशनिंग सरकारी हस्तक्षेप के उदाहरण हैं। अर्थव्यवस्था में राज्य के हस्तक्षेप की एक और वजह यह है कि देश के आर्थिक विकास के लिए ज़रूरी निवेश के साधन जुटाने की ज़रूरत होती है। शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य, परिवहन, संचार और ऊर्जा जैसी सामाजिक और आर्थिक सेवाएँ देने के लिए राज्य को धन की ज़रूरत होती है। इसलिए राज्य को अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप करना ज़रूरी है। यह काम राजकोषीय नीति, मौद्रिक नीति और उत्पादन व वितरण पर भौतिक नियंत्रण के ज़रिए किया जाता है। इस तरह राज्य के हस्तक्षेप का मुख्य उद्देश्य आर्थिक असमानता को खत्म करना और आर्थिक न्याय स्थापित करना है।
In simple words: सरकार का अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप ज़रूरी है ताकि धन और आय की असमानता कम हो, सामाजिक कल्याण बढ़े, और आर्थिक विकास के लिए ज़रूरी निवेश जुटाए जा सकें। यह आर्थिक न्याय और सामाजिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए नीतियों और नियंत्रणों का उपयोग करती है।
🎯 Exam Tip: सरकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता के मुख्य कारणों पर ध्यान दें, जैसे आर्थिक असमानता को कम करना, लोक-कल्याण को बढ़ावा देना और संसाधनों का उचित वितरण सुनिश्चित करना।
Question 2. देश में मौद्रिक नियन्त्रण स्थापित करने वाली किन्हीं दो संस्थाओं का वर्णन कीजिए।
Answer: मौद्रिक नीति का मतलब ऐसी नीति से है, जिसे मौद्रिक अधिकारी देश में ऋण और मुद्रा की मात्रा को नियमित और नियंत्रित करने के लिए उपयोग करते हैं। देश का केंद्रीय बैंक मौद्रिक नीति लागू करने के लिए अधिकृत होता है। भारत में देश का केंद्रीय बैंक 'भारतीय रिजर्व बैंक' मौद्रिक नीति का नियमन करता है। भारतीय रिजर्व बैंक कई उपायों से देश में ऋण-मुद्रा की पूर्ति को नियंत्रित करता है। इन उपायों में मुख्य रूप से ये दो हैं:
1. बैंक दर नीति – बैंक दर वह ब्याज दर होती है जिस पर केंद्रीय बैंक व्यापारिक बैंकों को ऋण देता है। अगर बैंक दर ज़्यादा होती है, तो व्यापारिक बैंक भी ज़्यादा ब्याज दर पर पैसा उधार देते हैं। अगर बैंक दर कम होती है, तो व्यापारिक बैंक व्यापारियों को कम ब्याज दर पर पैसा उधार देते हैं। इस तरह बैंक दर और ब्याज दरों में सीधा संबंध होता है। बैंक दर में वृद्धि से ऋण की मात्रा कम होती है और बैंक दर में कमी से ऋण की मात्रा बढ़ती है। यह एक महत्वपूर्ण उपकरण है जो पैसे की उपलब्धता को नियंत्रित करता है।
2. खुले बाज़ार की कार्यवाही – खुले बाज़ार की कार्यवाही का मतलब केंद्रीय बैंक द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों को खरीदना-बेचना है। जब केंद्रीय बैंक प्रतिभूतियों को खरीदता है, तो इससे व्यापारिक बैंकों के पास जमा राशि बढ़ती है और ज़्यादा ऋण बनाया जा सकता है। जब ऋण की मात्रा बढ़ानी होती है, तो केंद्रीय बैंक प्रतिभूतियों को खरीदता है। ऋण की मात्रा कम करने के लिए केंद्रीय बैंक खुले बाज़ार में प्रतिभूतियों को बेचता है। यह भी मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करने का एक प्रभावी तरीका है।
In simple words: देश में मौद्रिक नियंत्रण मुख्य रूप से भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा किया जाता है। इसके दो मुख्य तरीके बैंक दर नीति और खुले बाज़ार की कार्यवाही हैं, जिनसे ऋण और मुद्रा की मात्रा को नियंत्रित किया जाता है।
🎯 Exam Tip: मौद्रिक नियंत्रण के उपकरणों की व्याख्या करते समय, 'बैंक दर' और 'खुले बाज़ार की कार्यवाही' की क्रियाविधि को स्पष्ट रूप से समझाएँ कि वे कैसे ऋण आपूर्ति को प्रभावित करते हैं।
Question 3. राजकोषीय नीति तथा मौद्रिक नीति में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer: राजकोषीय नीति और मौद्रिक नीति दोनों ही आर्थिक नीतियों के महत्वपूर्ण अंग हैं, लेकिन इनके कार्यक्षेत्र और उद्देश्य अलग-अलग होते हैं:
**राजकोषीय नीति** – राजकोषीय नीति का मतलब सरकार द्वारा अपने बजट, कराधान (कर लगाने), खर्च और ऋण नीति से है। इसका मुख्य उद्देश्य सरकार द्वारा देश में आर्थिक विकास प्राप्त करना और आर्थिक स्थिरता बनाए रखना है। यह नीति सरकार के हाथों में होती है। यह आय और खर्च के माध्यम से अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित करती है।
**मौद्रिक नीति** – मौद्रिक नीति का मतलब ऐसी नीति से है, जिसे देश का मौद्रिक अधिकारी (जैसे केंद्रीय बैंक) देश में मुद्रा और ऋण की मात्रा को नियमित और नियंत्रित करने के लिए उपयोग करता है। इसका मुख्य उद्देश्य महंगाई को नियंत्रित करना, भुगतान संतुलन को स्थिर करना और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। यह नीति मुख्य रूप से ब्याज दरों और बैंकों के माध्यम से अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है।
In simple words: राजकोषीय नीति सरकार के कर और खर्च से जुड़ी है, जिसका लक्ष्य देश का विकास है, जबकि मौद्रिक नीति केंद्रीय बैंक द्वारा पैसे और ऋण को नियंत्रित करती है ताकि महंगाई और अर्थव्यवस्था स्थिर रहे।
🎯 Exam Tip: राजकोषीय और मौद्रिक नीति के बीच अंतर बताते समय, दोनों के मुख्य उद्देश्यों, उपकरणों और उन्हें नियंत्रित करने वाली संस्थाओं पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 4. सार्वजनिक वितरण प्रणाली क्या है ? इसके दो महत्त्व/लाभ बताइए। [2009] या सार्वजनिक वितरण प्रणाली का क्या तात्पर्य है? इसके दो लाभों को-उल्लेख कीजिए। [2014] या भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दो उद्देश्यों/लाभ का वर्णन कीजिए। [2017] या भारत में राशनिंग व्यवस्था के दो महत्त्व बताइए। या सार्वजनिक वितरण प्रणाली के किन्हीं तीन महत्त्वों को बताइट। [2015]
Answer: अर्थव्यवस्था में मांग और आपूर्ति की शक्तियाँ हमेशा उत्पादन और वितरण से जुड़े सवालों का सामाजिक रूप से सही हल नहीं दे पातीं। हमारे देश में भोजन, ईंधन और कपड़े जैसी ज़रूरी चीज़ों की मांग और आपूर्ति में कई कमियाँ हैं।
आपूर्ति की ओर से, समस्या चीज़ों की कमी की है। इस कमी के कारण अपर्याप्त उत्पादन, भंडारण और विपणन में कमियाँ, और सट्टेबाजी व कालाबाज़ारी के लिए जमाखोरी की प्रवृत्ति हो सकती है।
मांग की ओर से, समस्या गरीबी और ग्राहकों की खरीदने की शक्ति में बहुत ज़्यादा असमानताओं की है। उदाहरण के लिए, अगर खाद्यान्नों को मांग और आपूर्ति की खुली शक्तियों के ज़रिए तय कीमतों पर बेचा जाए, तो हमारी आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन्हें खरीद नहीं पाएगा। ऐसे में एक तरफ़ तो कुपोषण और भुखमरी की स्थिति होगी और दूसरी तरफ़ चीज़ों की बर्बादी और ज़्यादा उपभोग होगा।
इस समस्या से निपटने के तीन प्रभावी उपायों में से एक है सार्वजनिक वितरण प्रणाली। इसके तहत पूरे देश में सरकार नियंत्रित वितरण केंद्रों या उचित मूल्य की दुकानों के ज़रिए ज़रूरी चीज़ों का वितरण किया जाता है। भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली खाद्यान्न और चीनी की बिक्री करने वाली उचित मूल्य की दुकानों के नेटवर्क के ज़रिए सफलतापूर्वक काम करती है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली का पहला उद्देश्य मांग और आपूर्ति के बीच की खाई को भरना है। इसका दूसरा उद्देश्य यह है कि इसने ज़रूरी खाद्य और ज़रूरी चीज़ों की जमाखोरी को दूर करने में अहम भूमिका निभाई है।
In simple words: सार्वजनिक वितरण प्रणाली वह व्यवस्था है जिसमें सरकार नियंत्रित दुकानों के ज़रिए कम कीमतों पर ज़रूरी वस्तुएँ उपलब्ध कराती है। इसके लाभों में मांग-आपूर्ति का संतुलन, जमाखोरी पर रोक और गरीबों को सस्ती चीज़ें मिलना शामिल है।
🎯 Exam Tip: सार्वजनिक वितरण प्रणाली की अवधारणा और इसके सामाजिक व आर्थिक महत्व को स्पष्ट करें। उन समस्याओं का उल्लेख करें जिन्हें यह प्रणाली हल करने का प्रयास करती है।
Question 5. आर्थिक विकास हेतु सरकार को कर लगाने चाहिए। इसके पक्ष में कोई दो तर्क लिखिए।
Answer: आर्थिक विकास के लिए सरकार को कर लगाने चाहिए, इसके पक्ष में दो मुख्य तर्क हैं:
1. विकास के लिए ज़रूरी पूँजी जुटाना – सरकार करों के ज़रिए ही आर्थिक विकास के लिए ज़रूरी धन इकट्ठा करती है। सड़कें, पुल, अस्पताल और स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाओं के निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में धन की आवश्यकता होती है, जिसे करों से ही पूरा किया जाता है।
2. सार्वजनिक निवेश में वृद्धि – करों से मिलने वाली आय के परिणामस्वरूप सार्वजनिक निवेश में बढ़ोतरी होती है। यह निवेश आर्थिक और सामाजिक बुनियादी ढांचे के विकास में सहायक होता है। इससे देश में उद्योग और व्यापार को बढ़ावा मिलता है और रोज़गार के अवसर पैदा होते हैं।
In simple words: सरकार को आर्थिक विकास के लिए कर लगाने चाहिए क्योंकि करों से विकास परियोजनाओं के लिए धन मिलता है और सार्वजनिक निवेश बढ़ता है, जिससे बुनियादी ढांचा मजबूत होता है और रोज़गार बढ़ता है।
🎯 Exam Tip: करों के महत्व को बताते समय, स्पष्ट करें कि ये केवल राजस्व का स्रोत नहीं बल्कि आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण भी हैं।
Question 6. मौद्रिक नीति से क्या अभिप्राय है ? इसके उद्देश्य लिखिए। या भारत की मौद्रिक नीति के किन्हीं दो उद्देश्यों का वर्णन कीजिए। [2009]
Answer: मौद्रिक नीति का मतलब ऐसी नीति से है, जिसे मौद्रिक अधिकारी (जैसे केंद्रीय बैंक) देश में ऋण और मुद्रा की मात्रा को नियमित और नियंत्रित करने के लिए उपयोग करते हैं। इसका उद्देश्य आर्थिक स्थिरता बनाए रखना और विकास को बढ़ावा देना है।
इसके उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
1. बचत और निवेश के लिए उचित माहौल बनाना।
2. ऋण की लागत (ब्याज दर) को कम करके बचत और निवेश को बढ़ावा देना।
3. मौद्रिक संस्थाओं की स्थापना करके निष्क्रिय साधनों को गतिशील बनाना।
4. महंगाई के दबाव को नियंत्रित करके अतिरिक्त निवेश के लिए उचित माहौल बनाना।
5. घाटे की भरपाई (हीनार्थ प्रबंधन) द्वारा विकासात्मक निवेश के लिए अतिरिक्त साधन उपलब्ध कराना।
In simple words: मौद्रिक नीति केंद्रीय बैंक द्वारा पैसे और ऋण को नियंत्रित करने का एक तरीका है। इसका लक्ष्य बचत, निवेश, आर्थिक स्थिरता और महंगाई नियंत्रण को बढ़ावा देना है, जिससे देश का विकास हो सके।
🎯 Exam Tip: मौद्रिक नीति के उद्देश्यों को याद करते समय, ध्यान दें कि यह महंगाई, निवेश, और आर्थिक स्थिरता को कैसे प्रभावित करती है। केंद्रीय बैंक की भूमिका का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।
Question 7. जी०एस०टी० के लाभ बताइए।
Answer: जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) के कई लाभ हैं। यह एक ज़्यादा सटीक कर प्रणाली है जिसका पालन करना आसान और वितरण के मामले में आकर्षक है। जीएसटी मौजूदा टैक्स ढाँचे की तरह कई जगहों पर नहीं, बल्कि सिर्फ़ अंतिम गंतव्य स्थान (Destination Point) पर लगेगा। मौजूदा व्यवस्था में किसी सामान पर फ़ैक्टरी से निकलते समय टैक्स लगता है और फिर खुदरा दुकान पर भी, जब वह बिकता है तो वहाँ भी उस पर टैक्स जोड़ा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस नई व्यवस्था से भ्रष्टाचार में कमी आएगी, लाल फीताशाही कम होगी और पारदर्शिता बढ़ेगी, जिससे पूरा देश एक साझा व्यापार बढ़ाने में सहायक होगा।
**सरकार को लाभ**- जीएसटी के तहत कर संरचना आसान होगी और 'कर-आधार' (Tax Base) बढ़ेगा। इसके दायरे से बहुत कम सामान और सेवाएँ बच पाएँगी। एक अनुमान के अनुसार, जीएसटी व्यवस्था लागू होने के बाद निर्यात, रोज़गार और आर्थिक विकास में बढ़ोतरी होगी, इससे देश को सालाना 15 अरब रुपये की अतिरिक्त आय होगी। यह सरकार के लिए एक स्थिर और बढ़ता राजस्व स्रोत है।
**कंपनियों को लाभ**- वस्तु और सेवाओं के दाम कम होने से उनकी खपत बढ़ेगी, इससे कंपनियों का लाभ बढ़ेगा। इसके अतिरिक्त उन पर टैक्स का औसत बोझ कम होगा। कर केवल बिक्री के स्थान पर लगने से उत्पादन लागत (प्रोडक्शन कॉस्ट) कम होगी, जिससे निर्यात बाज़ार में कंपनियों की प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ेगी। यह कंपनियों के लिए लागत में कमी लाएगा।
**जनता को लाभ**- इस कर व्यवस्था में केंद्र और राज्यों दोनों के कर केवल बिक्री के समय वसूले जाएँगे। साथ ही ये दोनों ही कर निर्माण लागत (मैन्यूफैक्चरिंग कॉस्ट) के आधार पर तय होंगे, इससे वस्तु और सेवाओं के दाम कम होंगे और आम ग्राहकों को लाभ होगा। वस्तुओं के सस्ते होने से उनकी खरीदने की क्षमता बढ़ेगी।
गरीबों के लिए ज़रूरी चीज़ों को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है। इससे गरीबी दूर करने में भी मदद मिलेगी। बैंकों में भी पारदर्शिता आएगी, वे गरीबों को आसानी से कर्ज दे सकेंगे। छोटे उद्यमियों को भी उनके रिकॉर्ड के हिसाब से आसानी से कर्ज मिलेगा; क्योंकि अब सब कुछ ऑनलाइन होगा।
In simple words: जीएसटी से कर प्रणाली सरल होती है, भ्रष्टाचार कम होता है और पारदर्शिता बढ़ती है। यह सरकार का राजस्व बढ़ाता है, कंपनियों के लिए लागत कम करता है और जनता के लिए वस्तुओं को सस्ता बनाता है, जिससे आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है।
🎯 Exam Tip: जीएसटी के लाभों को सरकार, कंपनियों और जनता के दृष्टिकोण से अलग-अलग बिंदुओं में समझाएँ। 'गंतव्य स्थान कर' की अवधारणा और कराधान में पारदर्शिता जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर जोर दें।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका किन बातों पर निर्भर करती है ?
Answer: अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका मुख्य रूप से दो बातों पर निर्भर करती है:
1. राज्य द्वारा स्वीकृत सिद्धांत – यह सिद्धांत तय करते हैं कि सरकार की आर्थिक गतिविधियों में कितनी भागीदारी होगी।
2. अर्थव्यवस्था में निर्णय लेने वाले व्यक्ति – ये व्यक्ति सरकार की नीतियों को बनाते और लागू करते हैं, जिससे राज्य की भूमिका तय होती है।
In simple words: राज्य की भूमिका इस बात पर निर्भर करती है कि सरकार किन आर्थिक सिद्धांतों को मानती है और कौन से लोग आर्थिक फैसले लेते हैं।
🎯 Exam Tip: राज्य की भूमिका तय करने वाले कारकों को संक्षेप में स्पष्ट करें, जिसमें आर्थिक विचारधारा और नीति-निर्माताओं का प्रभाव शामिल है।
Question 2. मिश्रित अर्थव्यवस्था को परिभाषित कीजिए। [2010]
Answer: श्री दूधनाथ चतुर्वेदी के अनुसार, “मिश्रित अर्थव्यवस्था एक ऐसी आर्थिक प्रणाली है जिसमें निजी क्षेत्र तथा सार्वजनिक क्षेत्र, दोनों का पर्याप्त मात्रा में सह-अस्तित्व होता है। दोनों के कार्यों का क्षेत्र निर्धारित कर दिया जाता है, परन्तु निजी क्षेत्र की प्रमुखता रहती है। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में इस प्रकार कार्य करते हैं कि बिना शोषण के देश के सभी वर्गों के आर्थिक कल्याण में वृद्धि हो तथा तीव्र आर्थिक विकास प्राप्त हो सके ।” इस तरह की अर्थव्यवस्था में सरकार और निजी कंपनियाँ दोनों मिलकर काम करती हैं।
In simple words: मिश्रित अर्थव्यवस्था वह प्रणाली है जहाँ निजी और सरकारी दोनों क्षेत्र साथ मिलकर काम करते हैं ताकि समाज का कल्याण हो और देश का तेज़ आर्थिक विकास हो सके।
🎯 Exam Tip: मिश्रित अर्थव्यवस्था की परिभाषा को उसके मुख्य घटकों (निजी और सार्वजनिक क्षेत्र का सह-अस्तित्व) और उद्देश्यों (कल्याण और विकास) के साथ स्पष्ट करें।
Question 3. एक पूर्णतया समाजवादी अर्थव्यवस्था में मुख्य निर्णयकर्ता कौन होता है ?
Answer: एक पूर्णतया समाजवादी अर्थव्यवस्था में मुख्य निर्णयकर्ता राज्य होता है। इस व्यवस्था में, उत्पादन और वितरण से संबंधित सभी बड़े फैसले सरकार द्वारा लिए जाते हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य सामाजिक समानता और कल्याण होता है।
In simple words: समाजवादी अर्थव्यवस्था में सारे बड़े आर्थिक फैसले सरकार लेती है।
🎯 Exam Tip: समाजवादी अर्थव्यवस्था में मुख्य निर्णयकर्ता की पहचान करें और बताएं कि निर्णय लेने की शक्ति क्यों केंद्रीयकृत होती है।
Question 4. सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बिक्री की जाने वाली किन्हीं दो प्रमुख वस्तुओं के नाम लिखिए।
Answer: सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अन्तर्गत बिक्री की जाने वाली दो प्रमुख वस्तुओं के नाम हैं:
1. चीनी
2. मिट्टी का तेल
In simple words: सार्वजनिक वितरण प्रणाली में चीनी और मिट्टी का तेल जैसी ज़रूरी चीज़ें बेची जाती हैं।
🎯 Exam Tip: सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत वितरित की जाने वाली वस्तुओं के सामान्य उदाहरणों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 5. उन तीन विधियों का नाम लिखिए जिनके द्वारा राज्य एक मिश्रित अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप करता है। या आर्थिक क्रियाओं में राज्य सरकार के हस्तक्षेप की किन्हीं दो विधियों के नाम लिखिए। [2011] या भारतीय अर्थव्यवस्था के किन्हीं तीन क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए जिनमें राज्य हस्तक्षेप करता है। [2015]
Answer: राज्य एक मिश्रित अर्थव्यवस्था में तीन मुख्य विधियों द्वारा हस्तक्षेप करता है:
1. राजकोषीय नीति द्वारा – सरकार कर लगाकर और खर्च करके अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करती है।
2. मौद्रिक नीति द्वारा – केंद्रीय बैंक मुद्रा की आपूर्ति और ब्याज दरों को नियंत्रित करता है।
3. उत्पादन एवं वितरण पर भौतिक नियंत्रण द्वारा – सरकार सीधा हस्तक्षेप करके वस्तुओं के उत्पादन और वितरण को नियंत्रित करती है।
In simple words: सरकार राजकोषीय नीति, मौद्रिक नीति और उत्पादन व वितरण पर नियंत्रण करके अर्थव्यवस्था में दखल देती है।
🎯 Exam Tip: राज्य के हस्तक्षेप की विधियों को सूचीबद्ध करते समय, उनके मुख्य कार्यक्षेत्रों (कर, मुद्रा, उत्पादन) को संक्षिप्त रूप में समझाएँ।
Question 6. भारत में आवश्यक वस्तुओं की कमी के क्या कारण हैं ?
Answer: भारत में आवश्यक वस्तुओं की कमी के मुख्य दो कारण निम्नलिखित हैं:
1. उत्पादन का अपर्याप्त होना – देश में ज़रूरी वस्तुओं का उत्पादन मांग के मुकाबले कम होता है, जिससे उनकी कमी हो जाती है।
2. भंडारण एवं विपणन सुविधाओं में कमी – वस्तुओं के भंडारण और बाज़ार तक पहुँचाने की सुविधाओं में कमी होने के कारण भी चीज़ें खराब हो जाती हैं या समय पर उपलब्ध नहीं हो पातीं।
In simple words: भारत में ज़रूरी चीज़ों की कमी का कारण कम उत्पादन और खराब भंडारण व वितरण व्यवस्था है।
🎯 Exam Tip: आवश्यक वस्तुओं की कमी के कारणों को स्पष्ट करते समय, उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला की समस्याओं पर ध्यान दें।
Question 7. बाजार में माँग और पूर्ति की शक्तियाँ किसके पक्ष में होती हैं ?
Answer: बाजार में मांग और पूर्ति की शक्तियाँ उन्हीं के पक्ष में होती हैं जो ज़्यादा खर्च करने की स्थिति में होते हैं। इसका मतलब है कि बाज़ार अर्थव्यवस्था में, जिनकी खरीदने की क्षमता ज़्यादा होती है, वे ही वस्तुओं और सेवाओं को आसानी से प्राप्त कर पाते हैं।
In simple words: बाज़ार में मांग और पूर्ति की शक्तियाँ उन लोगों के पक्ष में होती हैं जिनके पास खरीदने के लिए ज़्यादा पैसे होते हैं।
🎯 Exam Tip: इस अवधारणा को समझाते समय, आर्थिक असमानता और खरीदने की शक्ति के प्रभाव को संक्षेप में बताएं।
Question 8. व्यावसायिक बैंकों को दिशा देना एवं नियन्त्रित करना किसका काम है ?
Answer: व्यावसायिक बैंकों को दिशा देना और नियंत्रित करने का काम भारतीय रिजर्व बैंक का है। भारतीय रिजर्व बैंक देश का केंद्रीय बैंक है, जो देश की मौद्रिक नीति को लागू करने और बैंकिंग प्रणाली को विनियमित करने के लिए जिम्मेदार है।
In simple words: भारतीय रिजर्व बैंक व्यावसायिक बैंकों को नियंत्रित करता है।
🎯 Exam Tip: केंद्रीय बैंक (रिजर्व बैंक) की भूमिका को स्पष्ट करें, खासकर बैंकिंग क्षेत्र के नियामक के रूप में।
Question 9. भारतीय रिजर्व बैंक के चार प्रमुख कार्य लिखिए। [2014, 15]
Answer: भारतीय रिजर्व बैंक के चार प्रमुख कार्य हैं:
1. पत्र-मुद्रा का निर्गमन – रिजर्व बैंक कागज़ के नोट जारी करने का एकमात्र अधिकार रखता है।
2. विनिमय दर को स्थिर बनाए रखना – यह विदेशी मुद्रा विनिमय दरों को स्थिर रखने के लिए नीतियाँ बनाता है।
3. सरकार के बैंकर का कार्य – यह केंद्र और राज्य सरकारों के लिए बैंकर, एजेंट और सलाहकार के रूप में काम करता है।
4. बैंकों का बैंक – यह अन्य बैंकों के लिए भी बैंक का काम करता है, उन्हें ऋण देता है और उनके नकदी भंडार का प्रबंधन करता है।
In simple words: रिजर्व बैंक नोट जारी करता है, विनिमय दर स्थिर रखता है, सरकार का बैंकर है और अन्य बैंकों का भी बैंक है।
🎯 Exam Tip: भारतीय रिजर्व बैंक के कार्यों को सूचीबद्ध करते समय, प्रत्येक कार्य को एक मुख्य वाक्य में स्पष्ट करें ताकि उसकी भूमिका पूरी तरह से समझ में आए।
Question 10. विदेशी विनिमय की खरीद व बिक्री को कौन-सी संस्था नियन्त्रित करती है ?
Answer: विदेशी विनिमय की खरीद और बिक्री को भारतीय रिजर्व बैंक नियंत्रित करता है। यह विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने और देश के भुगतान संतुलन को प्रबंधित करने के लिए नीतियां लागू करता है।
In simple words: भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा की खरीद-बिक्री को नियंत्रित करता है।
🎯 Exam Tip: विदेशी विनिमय नियंत्रण में केंद्रीय बैंक की भूमिका को स्पष्ट करें और बताएं कि यह क्यों महत्वपूर्ण है।
Question 11. भारत के केन्द्रीय बैंक का नाम बताइए। इसकी स्थापना व राष्ट्रीयकरण कब-कब किया गया ?
Answer: भारत के केंद्रीय बैंक का नाम भारतीय रिजर्व बैंक (रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया) है। इसकी स्थापना 1 अप्रैल, 1935 को हुई थी और 1 अप्रैल, 1949 को इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। राष्ट्रीयकरण का अर्थ है कि बैंक का स्वामित्व सरकार के पास चला गया।
In simple words: भारत का केंद्रीय बैंक भारतीय रिजर्व बैंक है, जिसकी स्थापना 1 अप्रैल, 1935 को हुई थी और इसका राष्ट्रीयकरण 1 अप्रैल, 1949 को किया गया।
🎯 Exam Tip: केंद्रीय बैंक का नाम, स्थापना तिथि और राष्ट्रीयकरण की तिथि याद रखें, क्योंकि ये अक्सर सीधे पूछे जाते हैं।
Question 12. भारत में मौद्रिक नीति का नियन्त्रण कौन करता है ?
Answer: भारत में मौद्रिक नीति का नियंत्रण रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया करता है। यह केंद्रीय बैंक है जो देश में मुद्रा आपूर्ति और ब्याज दरों को नियंत्रित करने के लिए ज़िम्मेदार है।
In simple words: रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भारत की मौद्रिक नीति को नियंत्रित करता है।
🎯 Exam Tip: मौद्रिक नीति के नियंत्रण में केंद्रीय बैंक (रिजर्व बैंक) की भूमिका को स्पष्ट रूप से बताएं।
Question 13. राशनिंग का एक महत्त्व लिखिए। [2009]
Answer: राशनिंग का एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इससे ज़रूरी वस्तुओं की कीमतें स्थिर रहती हैं तथा सट्टेबाजी, कालाबाज़ारी और जमाखोरी की भी रोकथाम हो जाती है। यह सुनिश्चित करता है कि आवश्यक वस्तुएँ सभी को उचित मूल्य पर उपलब्ध हों।
In simple words: राशनिंग से चीज़ों के दाम स्थिर रहते हैं और जमाखोरी रुक जाती है।
🎯 Exam Tip: राशनिंग के महत्व को बताते समय, मूल्य स्थिरता और जमाखोरी पर इसके सकारात्मक प्रभाव पर जोर दें।
Question 14. आर्थिक विकास से क्या आशय है?
Answer: आर्थिक विकास एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है, जिससे किसी देश की वास्तविक राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय में लंबे समय तक बढ़ोतरी होती है। इसमें केवल आर्थिक वृद्धि ही नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता और सामाजिक कल्याण में सुधार भी शामिल होता है।
In simple words: आर्थिक विकास का मतलब है देश की कुल आय और हर व्यक्ति की आय में लगातार बढ़ोतरी, जिससे लोगों का जीवन स्तर सुधरे।
🎯 Exam Tip: आर्थिक विकास की परिभाषा देते समय, 'वास्तविक राष्ट्रीय आय' और 'प्रति व्यक्ति आय' में 'दीर्घकालिक वृद्धि' जैसे मुख्य शब्दों का उपयोग करें।
Question 15. सरकारी हस्तक्षेप से आप क्या समझते हैं?
Answer: सरकारी हस्तक्षेप का मतलब है कि सरकार अर्थव्यवस्था में सीधे तौर पर दखल देती है। यह धन और आय के वितरण में असमानताओं को कम करने, विकास के लिए ज़रूरी निवेशों के लिए साधन जुटाने और समाज में अधिकतम लोक-कल्याण के लिए अर्थव्यवस्था में विभिन्न प्रकार के नियंत्रण लगाकर करती है। इस प्रकार, अर्थव्यवस्था में आवश्यकतानुसार नियंत्रण उपायों को अपनाना ही सरकारी हस्तक्षेप कहलाता है। सरकार यह सुनिश्चित करती है कि बाज़ार की शक्तियाँ सामाजिक उद्देश्यों की अनदेखी न करें।
In simple words: सरकारी हस्तक्षेप का मतलब है कि सरकार अर्थव्यवस्था में नियम बनाती है ताकि धन का सही बँटवारा हो, विकास हो और सभी लोगों का भला हो।
🎯 Exam Tip: सरकारी हस्तक्षेप की परिभाषा में 'असमानता कम करना', 'निवेश जुटाना' और 'लोक-कल्याण' जैसे मुख्य उद्देश्यों को शामिल करें।
Question 16. अर्थव्यवस्था में राज्य किन तरीकों से हस्तक्षेप करता है ?
Answer: अर्थव्यवस्था में राज्य निम्नलिखित तरीकों से हस्तक्षेप कर सकता है:
1. कराधान (Taxation) – सरकार कर लगाकर आय इकट्ठा करती है और उसे विकास कार्यों पर खर्च करती है।
2. मौद्रिक नीति (Monetary Policy) – केंद्रीय बैंक मुद्रा की आपूर्ति और ब्याज दरों को नियंत्रित करता है।
3. सार्वजनिक वितरण एवं राशनिंग (Public Distribution and Rationing) – सरकार ज़रूरी वस्तुओं का वितरण करती है और उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करती है।
In simple words: सरकार कर लगाकर, पैसे की नीति बनाकर और ज़रूरी चीज़ें बाँटकर अर्थव्यवस्था में दखल देती है।
🎯 Exam Tip: राज्य के हस्तक्षेप के मुख्य तरीकों को सूचीबद्ध करें और प्रत्येक के पीछे के सिद्धांत को संक्षेप में समझाएँ।
Question 17. राशनिंग व्यवस्था से आप क्या समझते हैं?
Answer: राशनिंग व्यवस्था से आशय है कि सरकार द्वारा नियंत्रित दुकानों के माध्यम से उचित मूल्य पर खाद्यान्न (अनाज) और अन्य आवश्यक वस्तुओं का प्रति व्यक्ति निर्धारित कोटा (मात्रा) उपलब्ध कराना। इसका मुख्य उद्देश्य गरीब और कम आय वाले लोगों को सस्ती दरों पर ज़रूरी वस्तुएँ मुहैया कराना है।
In simple words: राशनिंग वह तरीका है जहाँ सरकार नियंत्रित दुकानों से लोगों को तय मात्रा में ज़रूरी सामान सस्ते में देती है।
🎯 Exam Tip: राशनिंग की परिभाषा में 'सरकारी नियंत्रण', 'उचित मूल्य' और 'निर्धारित कोटा' जैसे मुख्य शब्दों को शामिल करें।
Question 18. औद्योगिक लाइसेन्सिग का क्या अभिप्राय है?
Answer: औद्योगिक लाइसेन्स प्रणाली के अंतर्गत 'औद्योगिक विकास एवं नियमन अधिनियम (1951)' लागू किया गया था। इस अधिनियम के तहत भारत की सभी विनिर्माण औद्योगिक इकाइयों को सरकार के पास पंजीकृत कराना अनिवार्य किया गया था। इसका उद्देश्य औद्योगिक विकास को नियंत्रित और संतुलित करना था।
In simple words: औद्योगिक लाइसेन्सिंग का मतलब है कि उद्योगों को काम करने के लिए सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी।
🎯 Exam Tip: औद्योगिक लाइसेन्सिंग की परिभाषा में 'अधिनियम' और 'पंजीकरण की अनिवार्यता' जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं का उल्लेख करें।
Question 19. औद्योगिक लाइसेन्सिग के दो प्रमुख उद्देश्य लिखिए।
Answer: औद्योगिक लाइसेन्सिंग के दो प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे:
1. उद्योगों का क्षेत्रीय स्तर पर संतुलित विकास करना – यह सुनिश्चित करना कि उद्योग सिर्फ़ कुछ बड़े शहरों में ही न लगें, बल्कि पूरे देश में समान रूप से फैलें।
2. नव-संचालित उद्योगों का संरक्षण करना – नए स्थापित होने वाले उद्योगों को बड़े और पुराने उद्योगों की प्रतिस्पर्धा से बचाना ताकि वे विकसित हो सकें।
In simple words: औद्योगिक लाइसेन्सिंग के उद्देश्य उद्योगों का पूरे देश में एक समान विकास करना और नए उद्योगों को सहारा देना था।
🎯 Exam Tip: औद्योगिक लाइसेन्सिंग के उद्देश्यों को सूचीबद्ध करते समय, 'संतुलित विकास' और 'संरक्षण' जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 20. पंजीकरण औद्योगिक लाइसेन्सिंग का क्या अभिप्राय है ? [2010]
Answer: भारतीय संसद ने 'औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1948' के बाद 1951 में 'औद्योगिक विकास एवं नियमन अधिनियम' लागू किया। इसी को पंजीकरण औद्योगिक लाइसेन्सिंग प्रणाली का नाम दिया गया। इस प्रणाली के तहत हर उद्योग को सरकार के पास अपना पंजीकरण कराना ज़रूरी होता था, ताकि सरकार औद्योगिक गतिविधियों पर नियंत्रण रख सके।
In simple words: पंजीकरण औद्योगिक लाइसेन्सिंग का मतलब था कि हर उद्योग को सरकार के साथ रजिस्टर करना ज़रूरी था, जैसा कि 'औद्योगिक विकास एवं नियमन अधिनियम 1951' में कहा गया था।
🎯 Exam Tip: पंजीकरण औद्योगिक लाइसेन्सिंग को समझाते समय, संबंधित अधिनियम और उसके मुख्य उद्देश्य (पंजीकरण की अनिवार्यता) का उल्लेख करें।
बहुविकल्पीय प्रश्न
Question 1. हमारी (भारतीय) अर्थव्यवस्था है [2009, 16]
(क) पूँजीवादी
(ख) समाजवादी
(ग) मिश्रित
(घ) साम्यवादी
Answer: (ग) मिश्रित
In simple words: भारत में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र मिलकर काम करते हैं, इसलिए इसकी अर्थव्यवस्था मिश्रित कहलाती है।
🎯 Exam Tip: भारत की अर्थव्यवस्था के प्रकार को याद रखें, जो पूंजीवादी और समाजवादी दोनों तत्वों को जोड़ती है।
Question 2. औद्योगिक लाइसेन्स आवश्यक नहीं है
(क) लघु उद्योगों की स्थापना के लिए।
(ख) कुटीर उद्योगों की स्थापना के लिए।
(ग) उद्योगों के विस्तार के लिए
(घ) नयी इकाई लगाने के लिए।
Answer: (ख) कुटीर उद्योगों की स्थापना के लिए।
In simple words: छोटे, घर-आधारित कुटीर उद्योगों को शुरू करने के लिए औद्योगिक लाइसेन्स की ज़रूरत नहीं होती थी।
🎯 Exam Tip: औद्योगिक लाइसेन्सिंग के नियमों के अपवादों को याद रखें, खासकर छोटे पैमाने के उद्योगों के लिए।
Question 3. मौद्रिक नियन्त्रण किया जाता है [2014]
(क) रिजर्व बैंक द्वारा।
(ख) वित्तीय संस्थाओं द्वारा
(ग) राज्य सरकार द्वारा
(घ) केन्द्र सरकार द्वारा।
Answer: (क) रिजर्व बैंक द्वारा।
In simple words: देश में पैसे की आवाजाही और ब्याज दरों को नियंत्रित करने का काम रिजर्व बैंक करता है। यह सुनिश्चित करता है कि अर्थव्यवस्था में सही मात्रा में पैसा रहे।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि मौद्रिक नीति का मुख्य उद्देश्य मुद्रा की आपूर्ति और साख को नियंत्रित करना होता है, जो केन्द्रीय बैंक द्वारा किया जाता है।
Question 4. सार्वजनिक वितरण प्रणाली का क्या उद्देश्य है?
(क) उत्पादन संरक्षण
(ख) विदेशी विनिमय संरक्षण
(ग) मजदूरी संरक्षण
(घ) उपभोक्ता संरक्षण
Answer: (घ) उपभोक्ता संरक्षण
In simple words: सार्वजनिक वितरण प्रणाली का मुख्य लक्ष्य गरीबों को सही दाम पर जरूरी चीजें दिलाना है। इससे लोग महंगे सामान से बचते हैं और उनकी रोजमर्रा की ज़रूरतें पूरी होती हैं।
🎯 Exam Tip: सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का सीधा संबंध नागरिकों को आवश्यक वस्तुएं, जैसे राशन, उचित मूल्य पर उपलब्ध कराकर उन्हें महंगाई से बचाना है।
Question 5. सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सम्मिलित नहीं है
(क) खाद्यान्न
(ख) चीनी
(ग) मिट्टी का तेल
(घ) डीजल
Answer: (घ) डीजल
In simple words: सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आमतौर पर खाने-पीने की चीजें और कुछ बहुत ज़रूरी सामान मिलते हैं। डीजल इन ज़रूरी सामानों में शामिल नहीं होता, इसलिए यह राशन की दुकान पर नहीं मिलता।
🎯 Exam Tip: सार्वजनिक वितरण प्रणाली मुख्य रूप से खाद्य सुरक्षा और बुनियादी घरेलू आवश्यकताओं पर केंद्रित है, जिसमें ईंधन जैसे उत्पाद आमतौर पर शामिल नहीं होते।
Question 6. निम्नलिखित में से भारतीय रिजर्व बैंक का मुख्य कार्य कौन-सा है?
(क) केवल मुद्रा का लेन-देन करना
(ख) केवल ऋण सुविधा उपलब्ध कराना।
(ग) केवल विदेशी विनिमय एवं क्रय-विक्रय का नियन्त्रण
(घ) केवल आयात-निर्यात पर नियन्त्रण करना।
Answer: (ग) केवल विदेशी विनिमय एवं क्रय-विक्रय का नियन्त्रण
In simple words: भारतीय रिजर्व बैंक देश के विदेशी पैसों के खरीदने और बेचने को संभालता है। इससे देश की मुद्रा की कीमत स्थिर रखने में मदद मिलती है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार आसान होता है।
🎯 Exam Tip: रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन करता है, जो देश की आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 7. भारत में विदेशी विनिमय की खरीद एवं बिक्री पर नियन्त्रण कौन-सा बैंक करता है? [2009]
या
भारत में विदेशी विनिमय को नियन्त्रित करने वाला निम्नलिखित में से कौन है? [2013, 16]
(क) स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया
(ख) रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया
(ग) सेण्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया
(घ) यूनियन बैंक ऑफ इण्डिया
Answer: (ख) रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया
In simple words: भारत में विदेशी पैसों की खरीद-बिक्री को रिजर्व बैंक ही नियंत्रित करता है। यह देश की विदेशी मुद्रा को ठीक से मैनेज करता है।
🎯 Exam Tip: यह प्रश्न केंद्रीय बैंक के कार्यों से संबंधित है, जिसमें विदेशी विनिमय का प्रबंधन एक महत्वपूर्ण भूमिका है।
Question 8. भारत में मौद्रिक नीति का संचालन व नियन्त्रण कौन-सा बैंक करता है? [2009,14]
(क) स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया
(ख) रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया
(ग) सेण्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया
(घ) बैंक ऑफ इण्डिया
Answer: (ख) रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया
In simple words: भारत में पैसों से जुड़ी नीतियों को बनाने और उन्हें लागू करने का काम रिजर्व बैंक करता है। यह सुनिश्चित करता है कि बाजार में कितने पैसे होने चाहिए।
🎯 Exam Tip: मौद्रिक नीति एक केंद्रीय बैंक का प्राथमिक कार्य है, जो अर्थव्यवस्था में मुद्रा और साख की उपलब्धता को नियंत्रित करती है।
Question 9. निम्नलिखित में से भारत का केन्द्रीय बैंक कौन है? [2015, 18]
(क) पंजाब नेशनल बैंक
(ख) पंजाब एण्ड सिन्ध बैंक
(ग) भारतीय रिजर्व बैंक
(घ) सेण्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया
Answer: (ग) भारतीय रिजर्व बैंक
In simple words: भारत का मुख्य बैंक, जो सभी दूसरे बैंकों को नियंत्रित करता है और सरकार के लिए बैंक का काम करता है, वह भारतीय रिजर्व बैंक है।
🎯 Exam Tip: प्रत्येक देश का एक केंद्रीय बैंक होता है जो उसकी बैंकिंग प्रणाली और मौद्रिक नीति का प्रबंधन करता है।
Question 10. सरकारी हस्तक्षेप का उदाहरण है
(क) राजकोषीय नीति
(ख) मौद्रिक नीति
(ग) सरकारी नियन्त्रण
(घ) ये सभी
Answer: (घ) ये सभी
In simple words: जब सरकार अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए पैसे से जुड़ी नीतियां बनाती है, या बैंकों को नियंत्रित करती है, या चीजों के उत्पादन पर रोक लगाती है, तो यह सब सरकारी हस्तक्षेप कहलाता है।
🎯 Exam Tip: सरकारी हस्तक्षेप अर्थव्यवस्था को स्थिर करने और सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए विभिन्न उपकरण जैसे कराधान, खर्च और विनियमन का उपयोग करता है।
Question 11. नई औद्योगिक नीति की घोषणा हुई थी
(क) 1950 में
(ख) 1982 में
(ग) 1986 में
(घ) 1991 में
Answer: (घ) 1991 में
In simple words: भारत में एक बड़ी नई औद्योगिक नीति साल 1991 में शुरू की गई थी। इस नीति ने देश में उद्योगों को आगे बढ़ाने के कई नियम बदले।
🎯 Exam Tip: 1991 की औद्योगिक नीति भारत में आर्थिक सुधारों के एक महत्वपूर्ण दौर की शुरुआत थी, जिससे अर्थव्यवस्था अधिक खुली हुई।
Question 12. भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना हुई थी [2011, 15, 17]
(क) 1935 में
(ख) 1940 में
(ग) 1945 में
(घ) 1950 में
Answer: (क) 1935 में
In simple words: भारतीय रिजर्व बैंक की शुरुआत साल 1935 में हुई थी। यह भारत का केंद्रीय बैंक है, जिसे देश के सभी बैंकों को चलाने की जिम्मेदारी मिली है।
🎯 Exam Tip: भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत की गई थी, और इसने अप्रैल 1935 में अपना काम शुरू किया था।
Question 13. भारतीय रिजर्व बैंक का राष्ट्रीयकरण कब हुआ? [2017]
(क) 1 अप्रैल, 1949
(ख) 26 जनवरी, 1950
(ग) 1 अप्रैल, 1951
(घ) 1 जनवरी, 1948
Answer: (क) 1 अप्रैल, 1949
In simple words: भारतीय रिजर्व बैंक को साल 1949 में सरकार ने अपने अधिकार में ले लिया था। इसे राष्ट्रीयकरण कहते हैं, जिसका मतलब है कि बैंक अब पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में आ गया।
🎯 Exam Tip: राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य केंद्रीय बैंक को सार्वजनिक क्षेत्र के नियंत्रण में लाना था ताकि वह देश की आर्थिक नीतियों को बेहतर ढंग से लागू कर सके।
Question 14. भारत में आर्थिक उदारीकरण की नीति कब आरम्भ हुई? [2017, 18]
(क) 1981 ई० में
(ख) 1998 ई० में
(ग) 1991 ई० में ।
(घ) 1988 ई० में
Answer: (ग) 1991 ई० में ।
In simple words: भारत ने साल 1991 में आर्थिक उदारीकरण की नई नीतियां अपनानी शुरू कीं। इसका मतलब था कि देश की अर्थव्यवस्था को और ज़्यादा खुला बनाया गया, ताकि व्यापार और निवेश बढ़े।
🎯 Exam Tip: 1991 के आर्थिक सुधारों ने भारत की अर्थव्यवस्था को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धा करने में मदद की, जिससे देश में आर्थिक वृद्धि तेज हुई।
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