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UP Board Textbook Solutions for Class 10 Social Science Chapter 5 फ्रांसिसी क्रांति करण तथा परिणम्
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Class 10 Social Science Chapter 5 फ्रांसिसी क्रांति करण तथा परिणम् UP Board Solutions PDF
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
Question 1. फ्रांस की क्रान्ति के कारण लिखिए। किन प्रमुख दार्शनिकों ने इसे प्रभावित किया ?
Answer: अठारहवीं सदी में फ्रांस में एक पुरानी व्यवस्था थी जहाँ शासक अपनी मनमानी करते थे और उन पर कोई रोक नहीं थी। इस व्यवस्था को 'पुरानी व्यवस्था' इसलिए कहा जाता था क्योंकि यह प्राचीन तानाशाही का ही एक हिस्सा थी। फ्रांस के तत्कालीन शासक लुई सोलहवाँ और उनकी रानी इस व्यवस्था को सही मानते थे। सन् 1789 ई० में फ्रांस में क्रांति शुरू हुई जिसका मकसद इस पुरानी व्यवस्था को खत्म करना था। यह क्रांति एक बड़ी बाढ़ की तरह थी जिसने समाज की अधिकतर बुराइयों को बहा दिया। क्रान्ति के मुख्य कारण नीचे दिए गए हैं:
- (1) राजनीतिक कारण:
- राजाओं की मनमानी: फ्रांस के राजा अपनी इच्छा से शासन करते थे और उन पर कोई नियंत्रण नहीं था। वे मानते थे कि उन्हें शासन करने का अधिकार भगवान ने दिया है और वे खुद को भगवान का प्रतिनिधि समझते थे। इसलिए, वे जनता के प्रति अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं समझते थे। शासकों का यह रवैया जनता के बीच असंतोष का मुख्य कारण बना।
- राजाओं द्वारा अत्यधिक खर्च: राजा जनता पर नए-नए कर लगाते थे और करों से मिली रकम को अपनी सुख-सुविधाओं और शाही खर्चों पर बेतरतीब ढंग से खर्च करते थे। वे जनता की मेहनत की कमाई को फिजूलखर्ची में उड़ाते थे। जनता इस बात को सहन नहीं कर पाई।
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभाव: राजा के दरबारियों के पास 'अधिकार-पत्र' होते थे जिन पर राजा की मुहर लगी होती थी। अगर दरबारी किसी को भी कैद करना चाहते थे, तो उसका नाम उस पत्र पर लिख देते थे। इस तरह फ्रांस की जेलों में बहुत से लोग बिना किसी उचित कारण के बंद थे, जिससे लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीन ली गई थी।
- प्रांतों में असमान कानून: फ्रांस के अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग कानून थे। अमीर और गरीब के लिए भी अलग-अलग कानून थे। इससे जनता को बहुत दिक्कतें होती थीं और उनमें असंतोष बढ़ता जा रहा था।
- उच्च वर्ग को विशेष अधिकार: फ्रांस में कुलीन वर्ग और कैथोलिक चर्च के पादरियों को विशेष अधिकार मिले हुए थे। इन अधिकारों का इस्तेमाल करके वे आम जनता पर बहुत अत्याचार करते थे, जिससे जनता में नाराजगी बढ़ गई थी।
- सेना में असंतोष: साधारण सैनिकों के लिए तरक्की के रास्ते बंद थे। इस वजह से सेना में भी असंतोष था, जो फ्रांस की राज्य-क्रांति का एक कारण बना।
- अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम: अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम का फ्रांस की जनता पर गहरा प्रभाव पड़ा। इस संग्राम में फ्रांसीसी सेना ने लफायते के नेतृत्व में भाग लिया था। इससे फ्रांस के क्रांतिकारियों को एक मजबूत प्रेरणा मिली कि वे भी स्वतंत्रता के लिए लड़ सकते हैं।
- (2) सामाजिक कारण:फ्रांस की सामाजिक स्थिति बहुत खराब थी। समाज तीन वर्गों में बंटा हुआ था:
- पादरी वर्ग: इस वर्ग में कैथोलिक चर्च के बड़े पादरी आते थे। उन दिनों चर्च फ्रांस में एक अलग राज्य की तरह काम करता था। चर्च की अपनी सरकार और कर्मचारी थे। चर्च को लोगों पर कर लगाने और कई अन्य अधिकार प्राप्त थे। बड़े पादरी बहुत ही विलासिता भरा जीवन जीते थे, जिससे आम जनता में नाराजगी थी।
- कुलीन वर्ग: इस वर्ग में बड़े-बड़े सामंत, उच्च सरकारी अधिकारी और शाही परिवार के सदस्य शामिल थे। उन्हें कई विशेष अधिकार मिले हुए थे, जिनसे वे जनता का शोषण करते थे। उन्हें जनता से बेगार (बिना मजदूरी के काम) लेने और भेंट लेने का अधिकार था। आम जनता का इस वर्ग के प्रति भारी गुस्सा क्रांति का एक बड़ा कारण बना।
- जनसाधारण वर्ग: इस वर्ग में मजदूर, किसान, सामान्य शिक्षित वर्ग और आम जनता आती थी। इस वर्ग के शिक्षित लोगों को भी शासन में भाग लेने का अधिकार नहीं था, जबकि कम शिक्षित धनी व्यक्तियों को यह अधिकार प्राप्त था। इसी कारण क्रांति शुरू होते ही जनसाधारण ने इसका जोरदार समर्थन किया।
- (3) आर्थिक कारण:
- जनता का आर्थिक शोषण: लंबे और खर्चीले युद्धों, राजदरबार की शान-शौकत और उच्च वर्ग के विलासिता भरे जीवन के लिए आम जनता और किसानों की आय का 80 से 92 प्रतिशत तक करों के रूप में ले लिया जाता था। करों के इस भारी बोझ से जनता त्रस्त थी।
- उच्च वर्ग करों से मुक्त: फ्रांस में उच्च वर्ग और पादरियों पर कोई कर नहीं लगाया जाता था, जबकि आम जनता करों के भारी बोझ से दबी जा रही थी। यह आर्थिक असमानता क्रांति का प्रमुख कारण बनी।
- विलासी और अपव्ययी राजदरबार: फ्रांस के राजा बहुत ही विलासी और फिजूलखर्ची करने वाले थे। वे सरकारी धन को पानी की तरह बहाते थे। परिणामस्वरूप, राजकोष खाली हो गया और फ्रांस पर कर्ज का बोझ दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया।
- अमेरिका को वित्तीय सहायता: फ्रांस ने इंग्लैंड से बदला लेने के लिए अमेरिका को सैन्य और वित्तीय सहायता दी। इससे फ्रांस की आर्थिक स्थिति और खराब हो गई।
- (4) दार्शनिकों का प्रभाव:रूसो, मॉण्टेस्क्यू और वॉल्टेयर जैसे महान दार्शनिकों ने फ्रांस के लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बुराइयों के बारे में जागरूक किया। इन दार्शनिकों के क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित होकर फ्रांस की जनता में बौद्धिक जागृति फैली और वे न्याय, स्वतंत्रता और समानता की स्थापना के लिए प्रयास करने लगे। इन विचारों ने जनता को अपने अधिकारों के लिए लड़ने की प्रेरणा दी।
- (5) तात्कालिक कारण:सन् 1788 ई० में फ्रांस के कई हिस्सों में भयंकर अकाल पड़ा। लोग भूख से तड़पने लगे। राजकोष की बिगड़ी हालत सुधारने के लिए लुई 16वें ने नए कर लगाने का फैसला किया। 'पार्लेमां' (संसद) ने इन करों को मंजूरी नहीं दी और सुझाव दिया कि 'एताजेनेरो' (स्टेट्स जनरल) की सहमति से इन्हें लागू किया जाए। स्टेट्स जनरल के अधिवेशन के दौरान मतदान के तरीके पर विवाद हो गया। इसी गतिरोध के बीच लुई 16वें ने तनाव को नियंत्रित करने के लिए सेना इकट्ठा करने का आदेश दिया। इससे पेरिस की जनता भड़क उठी। उन्होंने युद्ध सामग्री इकट्ठा की और बास्तील के किले पर हमला कर दिया, जिससे क्रांति की शुरुआत हो गई। In simple words: फ्रांस में क्रांति के कई कारण थे, जैसे राजाओं की मनमानी, जनता पर बहुत ज्यादा कर और उच्च वर्ग के विशेष अधिकार। दार्शनिकों जैसे रूसो और वॉल्टेयर के विचारों ने लोगों को आजादी के लिए लड़ने की प्रेरणा दी। 1789 में अकाल और नए करों पर विवाद ने क्रांति को तुरंत शुरू कर दिया।
- राष्ट्रीय महासभा ने 4 अगस्त, 1789 ई० को सामंतों और पादरियों के विशेष अधिकारों को खत्म करने के लिए कई प्रस्ताव पास किए।
- राष्ट्रीय महासभा ने 27 अगस्त, 1789 ई० को 'मानव और नागरिकों के अधिकारों की घोषणा' की। इसके अनुसार कानून की नज़र में सभी व्यक्ति बराबर थे।
- राष्ट्रीय महासभा ने उन सभी लोगों की संपत्ति जब्त कर ली जो फ्रांस छोड़कर विदेश चले गए थे।
- राष्ट्रीय महासभा ने यह कानून बनाया कि किसी भी व्यक्ति को कानूनी सहायता के बिना दंडित नहीं किया जा सकता या कैद नहीं किया जा सकता।
- यदि राजा किसी प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं करेगा, तो भी तीन बार विधानसभा में पारित होने पर वह कानून बन जाएगा।
- राष्ट्रीय महासभा ने चर्च द्वारा कर लेने पर रोक लगा दी और चर्च की संपत्ति भी जब्त कर ली।
- राष्ट्रीय महासभा ने 6 फरवरी, 1790 ई० को धार्मिक मठों को बंद करवा दिया।
- राष्ट्रीय महासभा ने जुलाई, 1790 ई० में पादरियों पर नियंत्रण करने के लिए एक पादरी विधान बनाया। इसके अनुसार फ्रांस के पादरियों को रोम के पोप की अधीनता से मुक्त कर दिया गया। उनकी नियुक्ति और वेतन की व्यवस्था भी कर दी गई।
- राष्ट्रीय महासभा ने देश को 83 प्रांतों में बांटा, और प्रांतों को कैंटनों में, और कैंटनों को कम्यूनों में बांटकर एक समान शासन-व्यवस्था लागू की।
- राष्ट्रीय महासभा ने देश में स्थापित पुराने न्यायालयों को भंग करके फौजदारी और दीवानी के न्यायालय स्थापित किए। उसने न्यायाधीशों की नियुक्ति और उनके कार्यकाल को निश्चित कर दिया।
- राष्ट्रीय महासभा ने 30 सितंबर, 1791 ई० को देश के लिए एक संविधान बनाकर खुद को भंग कर दिया।
- शासन की मनमानी खत्म हो गई, जिससे वहां गणतंत्र की स्थापना हुई।
- कुलीन वर्ग के विशेष अधिकार खत्म हो गए।
- राजा-रानी की मनमानी पर रोक लग गई।
- चर्च के विशेष अधिकार खत्म होने से जनता का शोषण रुक गया।
- क्रांति-विरोधियों को 'गुलोटीन' नामक मशीन से फांसी दे दी गई।
- दास-प्रथा (गुलामी) खत्म हो गई।
- सामंतवाद खत्म करके समाजवाद की स्थापना हुई।
- लोकतंत्र का रास्ता खुल गया।
- निरंकुश शासन का अंत: फ्रांस की क्रांति के कारण यूरोप में लगभग सभी निरंकुश शासन खत्म हो गए। इससे लोगों को अपनी सरकार चुनने का अधिकार मिला।
- अन्य देशों में क्रांतियाँ: फ्रांस की क्रांति को देखकर यूरोप के दूसरे देशों में भी क्रांतियां हुईं। इसने अन्य देशों के लोगों को स्वतंत्रता और समानता के लिए लड़ने की प्रेरणा दी।
- शासन-व्यवस्था में सुधार: फ्रांस की क्रांति से प्रेरणा लेकर दूसरे राज्यों के शासकों ने अपनी शासन-व्यवस्था में कई सुधार किए और जनता की भलाई के काम शुरू किए। इसने सरकारों को जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया।
- लोकतांत्रिक सिद्धांतों का प्रसार: यूरोपीय देशों में लोकतांत्रिक सिद्धांतों का प्रचार हुआ। लोग समझने लगे कि सरकार जनता की होनी चाहिए।
- समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व: समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व (भाईचारा) के सिद्धांतों ने विश्व की राजनीति में एक नई लहर पैदा कर दी। ये सिद्धांत आज भी कई देशों के संविधानों का आधार हैं।
- संसदीय सुधार: इंग्लैंड में लोकतांत्रिक आंदोलन को ताकत मिली, जिससे वहां संसदीय सुधारों की एक श्रृंखला शुरू हुई।
- उपनिवेशों की समाप्ति: अमेरिका महाद्वीप के कई देशों ने पुर्तगाल और स्पेन के उपनिवेशों को खत्म करके गणतंत्र स्थापित किए।
- वयस्क मताधिकार: दुनिया के कई देशों में वयस्क मताधिकार (सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार) का प्रचलन शुरू हुआ।
- धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा: फ्रांस की क्रांति ने धर्मनिरपेक्ष राज्य (जहां सरकार का कोई धर्म नहीं होता) की अवधारणा को जन्म दिया और लोकप्रिय संप्रभुता (जनता का शासन) के सिद्धांत को स्थापित किया।
- सामंती व्यवस्था का अंत: इस क्रांति ने सदियों से चली आ रही यूरोप की पुरानी सामंती व्यवस्था को खत्म कर दिया।
- मानव अधिकारों की घोषणा: फ्रांस के क्रांतिकारियों द्वारा 27 अगस्त, 1789 ई० को की गई 'मानव और नागरिकों के जन्मजात अधिकारों की घोषणा' मानव-जाति की स्वतंत्रता के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी।
- विदेश-नीति पर प्रभाव: इस क्रांति ने इंग्लैंड, आयरलैंड और दूसरे यूरोपीय देशों की विदेश-नीति को प्रभावित किया।
- समाजवादी विचारधारा का स्रोत: कुछ विद्वानों के अनुसार फ्रांस की क्रांति समाजवादी विचारधारा का स्रोत थी, क्योंकि इसने समानता के सिद्धांत को प्रतिपादित कर समाजवादी व्यवस्था का मार्ग भी खोला।
- फ्रांस में प्रगति: इस क्रांति के परिणामस्वरूप फ्रांस ने कृषि, उद्योग, कला, साहित्य, राष्ट्रीय शिक्षा और सैन्य गौरव के क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की। क्रांति ने देश को एक नई दिशा दी।
- राजाओं द्वारा अत्यधिक खर्च: राजा जनता पर नए-नए कर लगाते थे और करों से इकट्ठा किए गए पैसे को अपनी सुख-सुविधाओं पर खर्च करते थे। जैसे, लुई चौदहवें ने Rs. 10 करोड़ की लागत से अपना शानदार महल बनवाया था, जिसमें 18 हजार लोग रहते थे। इस तरह राजाओं ने जनता की मेहनत की कमाई को अपनी विलासिता में उड़ाकर राजकोष को खाली कर दिया था।
- उच्च वर्गों की करों से छूट: उस समय राज्य में जो लोग कर चुकाने की स्थिति में थे, उन पर कर नहीं लगाया जाता था। इनमें उच्च वर्ग के लोग जैसे- पादरी वर्ग और कुलीन वर्ग शामिल थे। ये लोग सरकार को किसी तरह का कोई कर नहीं देते थे। इसके बजाय, वे आम जनता का शोषण करते थे और उनसे इकट्ठा किए गए पैसे से ऐश करते थे। गरीब जनता, जिसके पास दो वक्त की रोटी भी नहीं थी, वह कर कहां से देती? इस तरह, कर वसूली कम होना और खर्च ज्यादा होना ही राजकोष के खाली होने का मुख्य कारण था। इस वित्तीय असंतुलन ने क्रांति की नींव रखी।
- अमेरिका की सफल क्रांति: अमेरिका में सफल क्रांति के बाद लोकतंत्र की स्थापना हुई, जिसने फ्रांसीसी लोगों को यह दिखाया कि स्वतंत्रता और स्व-शासन संभव है।
- बुद्धिजीवियों और तर्कशास्त्रियों के विचार: बुद्धिजीवियों और तर्कशास्त्रियों के विचारों में बदलाव आया। उन्होंने पुराने रूढ़िवादी विचारों को चुनौती दी और नए विचारों को बढ़ावा दिया।
- नवीन विचारधाराओं का प्रचलन: नई विचारधाराओं का प्रचलन हुआ और पुरानी प्रथाओं पर हमला किया गया। इसने लोगों को सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के बारे में सोचने पर मजबूर किया।
- रूसो का प्रभाव: रूसो ने राजा के विशेष अधिकारों का विरोध किया और जनता की राय को सबसे ऊपर रखा। उन्होंने कहा कि सरकार जनता की इच्छा से चलनी चाहिए।
- मॉण्टेस्क्यू का लोकतंत्र का मॉडल: मॉण्टेस्क्यू ने कुलीनों और दैवी अधिकारों से मुक्त जनता के सहयोग पर आधारित लोकतंत्र का एक ढांचा प्रस्तुत किया। उन्होंने शक्ति के पृथक्करण (separation of powers) का विचार दिया।
- मॉण्टेस्क्यू: मॉण्टेस्क्यू एक महान विचारक और लेखक थे। वे गणतंत्रात्मक लोकतंत्र के समर्थक थे। उन्होंने राजा के 'दैवी अधिकार' के सिद्धांत की कड़ी आलोचना की। इंग्लैंड की शासन पद्धति का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा और वे वैसी ही शासन पद्धति फ्रांस में भी स्थापित करना चाहते थे। उनके विचारों से फ्रांस की क्रांति को बहुत प्रेरणा मिली। उन्होंने 'द स्पिरिट ऑफ लॉज' नामक अपनी प्रसिद्ध किताब में अपने सिद्धांतों की विस्तार से व्याख्या की है।
- वॉल्टेयर: वॉल्टेयर एक प्रसिद्ध विचारक और लेखक थे। उनके विचारों से फ्रांस की क्रांति को बहुत बढ़ावा मिला। वे जनकल्याणकारी निरंकुश शासन की स्थापना करना चाहते थे। उन्होंने चर्च की बुराइयों की कड़ी निंदा करते हुए उसे 'बदनाम चीज' घोषित किया। फ्रांस के सुधारवादी आंदोलन में उनका महत्वपूर्ण योगदान था।
- रूसो: रूसो अठारहवीं शताब्दी के एक उच्च कोटि के दार्शनिक थे। 'सोशल कॉन्ट्रैक्ट' नामक प्रसिद्ध किताब उन्हीं की देन है। उनका विचार था कि राजा को जनता की भावनाओं के अनुसार काम करना चाहिए। फ्रांस की क्रांति को बढ़ावा देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
- टेनिस कोर्ट की सभा: फ्रांस को अपने पुराने दुश्मन इंग्लैंड से लगातार युद्ध करने पड़ रहे थे, जिससे सरकारी खजाना खाली होता जा रहा था। फ्रांस के राजा लुई सोलहवें ने 1789 ई० में पुरानी सामंती सभा 'स्टेट्स जनरल' का अधिवेशन इस उम्मीद से बुलाया कि वह नए कर लगाने की अनुमति दे देगी। इस सभा का पिछले 175 सालों से कोई अधिवेशन नहीं हुआ था। 'स्टेट्स जनरल' में तीन वर्गों का प्रतिनिधित्व था, जिसमें तीसरा वर्ग (जनसाधारण) सबसे बड़ा था। तीनों वर्गों का अलग-अलग अधिवेशन होता था। जनता ने करों का कड़ा विरोध करते हुए सभी वर्गों के एक साथ अधिवेशन की मांग की। राजा और कुलीन वर्ग ने इसका विरोध किया। तीसरा वर्ग, यानी जनता वर्ग ने तब पास के टेनिस कोर्ट में एक सभा आयोजित की और इसे 'राष्ट्रीय सभा' घोषित किया। उन्होंने संविधान बनाने की तैयारी शुरू कर दी। इस घटना को इतिहास में 'टेनिस कोर्ट की शपथ' के नाम से जाना जाता है। यह खुले विद्रोह की पहली चिंगारी थी, जिसमें राजा को जनता के सामने झुकना पड़ा। यह जनवर्ग की एक बड़ी जीत थी। राजा को एक सप्ताह बाद ही नेशनल असेंबली (राष्ट्रीय महासभा) को मान्यता देनी पड़ी।
- बास्तील का पतन: जून, 1789 ई० में राष्ट्रीय महासभा को मान्यता मिलने के बाद इसके होने वाले अधिवेशन की गतिविधियों पर पूरे फ्रांस की नजरें टिकी हुई थीं। इसी बीच जुलाई में पेरिस में यह अफवाह फैल गई कि राजा विदेशी सेना की मदद से देशभक्तों और क्रांतिकारियों को खत्म करने की योजना बना चुका है। 11 जुलाई को सम्राट ने वित्त मंत्री नेकर को पद से हटा दिया। इस घटना ने जनता में पनप रही आशंका को और बढ़ा दिया। इस पर पेरिस की जनता उत्तेजित हो उठी और तोड़-फोड़ करने लगी। 12 जुलाई, 1789 ई० को पेरिस में हो रहे उपद्रवों की सूचना पाकर बहुत-से सशस्त्र लुटेरे भी शहर में आ गए और उन्होंने हर जगह लूट-मार, तोड़-फोड़ और आतंक फैलाना शुरू कर दिया। 14 जुलाई को क्रांतिकारियों की एक भीड़ ने बास्तील के किले पर हमला बोल दिया और किले के रक्षक देलोने की हत्या करके वहां बंद कैदियों को रिहा कर दिया। उन्होंने वहां से हथियार लूटकर किले को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। यह घटना फ्रांस में निरंकुश शासन के पतन की पहली घटना थी, क्योंकि उस समय बास्तील का किला राजाओं की निरंकुशता और स्वेच्छाचारिता का प्रतीक माना जाता था। इस घटना का बहुत बड़ा ऐतिहासिक महत्व है। इसीलिए 14 जुलाई को फ्रांस में हर साल राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है। इन दोनों घटनाओं ने फ्रांस में क्रांति का स्वरूप बदल दिया। प्रतिक्रियावादी सामंत और पादरी फ्रांस छोड़ने की तैयारी करने लगे, किसानों ने सामंतों को लूटना शुरू कर दिया और प्रशासनिक अधिकारियों के आदेश का उल्लंघन क्रांति का पर्याय बन गया।
- मानव और नागरिक अधिकारों की घोषणा: राष्ट्रीय सभा ने 27 अगस्त, 1789 ई० को 'मानव और नागरिकों के अधिकारों' की घोषणा की। इसके अनुसार कानून की नज़र में सभी व्यक्ति बराबर थे। यह घोषणा स्वतंत्रता, समानता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित थी।
- विशेषाधिकारों की समाप्ति: 4 अगस्त, 1789 ई० को राष्ट्रीय सभा ने सामंती विशेषाधिकारों (जैसे कुलीनों और पादरियों के विशेष अधिकार) को खत्म करने के लिए प्रस्ताव पारित किए। इससे समाज में फैली असमानता खत्म हुई।
- चर्च द्वारा संपत्ति संग्रह पर रोक: 10 अक्टूबर, 1789 ई० को राष्ट्रीय सभा ने कानून बनाकर चर्च द्वारा संपत्ति संग्रह पर रोक लगा दी। चर्च की सारी जायदाद छीनकर नीलाम कर दी गई और इस आय को राष्ट्रीय आय में शामिल कर लिया गया। अब चर्च किसी व्यक्ति पर किसी प्रकार का कर नहीं लगा सकता था। इस कदम से चर्च की शक्ति कम हुई और राज्य की वित्तीय स्थिति में सुधार हुआ।
- राजाओं की मनमानी
- उच्च वर्ग के विशेष अधिकार
- रूसो
- वॉल्टेयर
- उच्च वर्ग की करों से मुक्ति
- विलासी एवं अपव्ययी राजदरबार
- इस क्रांति ने धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा और लोकप्रिय संप्रभुता (जनता के शासन) के सिद्धांत को जन्म दिया।
- फ्रांसीसी क्रांति ने मानव-जाति को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (भाईचारे) का नारा प्रदान किया।
- इंग्लैंड की क्रांति
- अमेरिका की क्रांति
🎯 Exam Tip: फ्रांस की क्रांति के कारणों को राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, दार्शनिक और तात्कालिक - इन पाँच मुख्य बिन्दुओं में बांटकर याद रखें। प्रत्येक बिंदु के अंदर कम से कम दो-तीन उप-बिंदु जरूर लिखें।
Question 2. फ्रांस की राष्ट्रीय सभा के कार्यों एवं उसके प्रभावों पर प्रकाश डालिए।
Answer: फ्रांस में पहले 'स्टेट्स जनरल' नामक एक सामंती सभा थी जिसमें तीन वर्ग (एस्टेट) शामिल थे, और उनके अलग-अलग अधिवेशन होते थे। सन् 1789 ई० में, नए कर लगाने की अनुमति लेने के लिए इसका अधिवेशन बुलाया गया। तीनों वर्गों के अलग-अलग अधिवेशन हुए। बहुसंख्यक मजदूर वर्ग ने नए करों का विरोध किया। राजा और विशेष वर्ग ने सभा को भंग करने की कोशिश की, लेकिन जनता वर्ग ने पास के टेनिस कोर्ट में एक सभा की और उसे 'राष्ट्रीय सभा' घोषित कर दिया। राजा ने सेना बुलाकर राष्ट्रीय महासभा को भंग करने की फिर से कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो सका। आखिर में, राजा को राष्ट्रीय महासभा को मान्यता देनी पड़ी। राष्ट्रीय महासभा ने अपने लगभग दो वर्षों (1789-91) के कार्यकाल में बहुत महत्वपूर्ण काम किए और फ्रांस में सदियों से चली आ रही पुरानी, खराब व्यवस्थाओं को पूरी तरह से खत्म कर दिया। इस सभा ने सचमुच में समाज में बदलाव लाने का काम किया।
राष्ट्रीय महासभा के कार्य:
राष्ट्रीय महासभा ने निम्नलिखित मुख्य कार्य किए:
राष्ट्रीय महासभा का प्रभाव:
राष्ट्रीय महासभा के महत्वपूर्ण कार्यों के निम्नलिखित प्रभाव पड़े:
इस तरह फ्रांस की महासभा ने सिर्फ दो साल में फ्रांस के मुश्किल माहौल में इतने महत्वपूर्ण काम किए, जो दुनिया की कई विधानसभाएं कई सालों में भी नहीं कर पाई थीं। राष्ट्रीय महासभा का सबसे महत्वपूर्ण काम फ्रांस में पुरानी और खराब शासन-व्यवस्था को खत्म करना था। इस प्रक्रिया ने फ्रांस को एक आधुनिक राष्ट्र में बदलने की नींव रखी।
In simple words: फ्रांस में पहले 'स्टेट्स जनरल' नाम की एक सभा थी। जब राजा ने नए कर लगाने चाहे, तो जनता ने मिलकर उसे 'राष्ट्रीय सभा' घोषित कर दिया। इस सभा ने राजाओं और चर्च के सारे विशेष अधिकार खत्म किए, लोगों के लिए बराबरी के कानून बनाए और फ्रांस में लोकतंत्र का रास्ता खोला।🎯 Exam Tip: राष्ट्रीय महासभा के कार्यों और प्रभावों को अलग-अलग शीर्षकों में सूचीबद्ध करें। "मानव और नागरिकों के अधिकारों की घोषणा" जैसे प्रमुख कार्यों को विशेष रूप से उल्लेख करें।
Question 3. फ्रांस की क्रान्ति का फ्रांस तथा विश्व पर क्या प्रभाव पड़ा ? उदाहरण सहित प्रस्तुत कीजिए।
Answer: फ्रांस की क्रान्ति (1789 ई०) विश्व इतिहास की एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटना थी जिसने युग बदल दिया। इस क्रांति के फ्रांस और पूरी दुनिया पर बहुत दूरगामी प्रभाव पड़े, जो नीचे दिए गए हैं:
🎯 Exam Tip: क्रांति के प्रभावों को फ्रांस और विश्व पर पड़ने वाले प्रभावों में विभाजित करें। महत्वपूर्ण सिद्धांतों जैसे समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का उल्लेख करें।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. फ्रांस के राजकोष के रिक्त होने के कोई दो कारण लिखिए ।
Answer: फ्रांस का सरकारी खजाना खाली होने के दो मुख्य कारण नीचे दिए गए हैं:
🎯 Exam Tip: राजकोष खाली होने के कारणों में शाही फिजूलखर्ची और कर प्रणाली में असमानता को स्पष्ट रूप से उजागर करें।
Question 2. जनसाधारण वर्ग की स्थिति कैसी थी ?
Answer: जनसाधारण वर्ग में मजदूर, किसान, सामान्य शिक्षित लोग और आम जनता आती थी। इन लोगों की स्थिति बहुत दयनीय थी क्योंकि उनसे बहुत सारा काम तो लिया जाता था लेकिन उन्हें मजदूरी बहुत कम मिलती थी। अगर कोई मजदूर बीमार हो जाता था, तो भी उसे अपने तय घंटों तक काम करना पड़ता था। अगर वह काम करने की हालत में नहीं होता था, तो उसके साथ बहुत बेरहमी से व्यवहार किया जाता था। शिक्षित होने के बावजूद, जनसाधारण वर्ग के लोगों को शासन कार्य में भाग लेने का अधिकार नहीं दिया गया था। इस तरह न जाने कितनी प्रतिभाएं अंधेरे में ही खो जाती थीं, जबकि कुलीन वर्ग या पादरी वर्ग के लोग कम शिक्षित होने पर भी शासन कार्य में भाग लेने के लिए अधिकृत थे। इस वर्ग की जनसंख्या कुल आबादी का 95 प्रतिशत थी। राजाओं, राजदरबारियों, सामंतों आदि के विलासितापूर्ण जीवन के लिए जनता पर तरह-तरह के कर लगाए जाते थे, और करों की वसूली बहुत निर्दयता से की जाती थी। किसानों की आय का 80 से 92 प्रतिशत तक हिस्सा करों के रूप में लिया जाता था। इस तरह करों के बोझ से आम जनता बहुत दुखी थी। इन सभी तथ्यों से साफ पता चलता है कि फ्रांस के जनसाधारण वर्ग की स्थिति बहुत खराब थी। उन्हें मूलभूत अधिकारों और सम्मान से भी वंचित रखा गया था।
🎯 Exam Tip: जनसाधारण वर्ग की स्थिति बताते समय, उनके आर्थिक शोषण, राजनीतिक अधिकारों के अभाव और सामाजिक असमानता पर जोर दें।
Question 3. फ्रांस की क्रान्ति को प्रेरणा देने वाले तत्वों का उल्लेख कीजिए ।
Answer: फ्रांस की जनता में पहले से ही गुस्सा और असंतोष था। वे जल्द से जल्द महंगाई, बेरोजगारी और करों के बोझ से मुक्ति चाहती थी। अब क्रांति के लिए बस एक प्रेरणा की जरूरत थी। अतः, फ्रांस की क्रांति को निम्नलिखित तत्वों से प्रेरणा मिली:
🎯 Exam Tip: प्रेरणा देने वाले तत्वों में बाहरी घटनाओं (जैसे अमेरिकी क्रांति) और आंतरिक बौद्धिक आंदोलनों (दार्शनिकों के विचारों) दोनों को शामिल करें।
Question 4. फ्रांस में 14 जुलाई को राष्ट्रीय दिवस क्यों मनाया जाता है ?
Answer: पेरिस के पास बास्तील नामक जगह पर फ्रांस के पुराने राजाओं द्वारा बनाया गया एक किला था। 14 जुलाई, 1789 ई० को क्रांतिकारियों की भीड़ ने बास्तील किले का दरवाजा तोड़ दिया और सभी कैदियों को रिहा कर दिया। इससे फ्रांस की क्रांति तेजी से शहरों, कस्बों और गांवों में फैल गई। यह घटना फ्रांस में निरंकुश शासन के खत्म होने की शुरुआत थी, क्योंकि उस समय बास्तील का किला राजाओं की मनमानी और स्वेच्छाचारिता का प्रतीक माना जाता था। इसीलिए 14 जुलाई, जिस दिन बास्तील के किले का पतन हुआ था, फ्रांस में हर साल राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन स्वतंत्रता और समानता के मूल्यों का प्रतीक बन गया।
🎯 Exam Tip: बास्तील के पतन की ऐतिहासिक महत्ता पर जोर दें और यह स्पष्ट करें कि यह घटना निरंकुश शासन के अंत का प्रतीक क्यों मानी जाती है।
Question 5. नेपोलियन बोनापार्ट ने फ्रांस के पुनर्निर्माण के लिए क्या प्रयास किया था ? या नेपोलियन कौन था ? वह क्यों प्रसिद्ध है ? (2011)
Answer: नेपोलियन फ्रांस में डायरेक्टरी का मुखिया था। बाद में वह अपनी बहादुरी और योग्यता से फ्रांस का तानाशाह बन गया। उसने ऑस्ट्रिया, प्रशा और रूस को हराया था। वह इंग्लैंड को भी हराना चाहता था, लेकिन इंग्लैंड की ताकतवर नौसेना की वजह से ऐसा नहीं कर सका। नेपोलियन ने अपनी ताकत बढ़ाकर फ्रांस के यश को चारों ओर फैलाया था। अपने शासनकाल में उसने कई युद्ध जीते, जिससे पूरा यूरोप डर गया था। अपनी अद्भुत जीत से उसने फ्रांस की जनता का दिल जीत लिया था।
10 नवंबर, 1799 ई० को उसने डायरेक्टरी को भंग करके खुद को फ्रांस का पहला कौंसल घोषित करवाया। सन् 1799 ई० से 1804 ई० तक उसने फ्रांस में कई महत्वपूर्ण सुधार किए। उसने कानूनों को संहिताबद्ध किया, जिसे 'नेपोलियन कोड' के नाम से जाना जाता है। उसके शासनकाल में फ्रांस यूरोप का सबसे समृद्ध और शक्तिशाली देश बन गया था। यूरोप के मित्र-राष्ट्रों ने 18 जून, 1815 ई० में नेपोलियन को वाटरलू नामक जगह पर हराकर सेंट हेलेना द्वीप पर जीवन के अंत तक कैद रखा। नेपोलियन का प्रभाव सैन्य रणनीति से लेकर नागरिक कानून तक फैला हुआ था।
In simple words: नेपोलियन बोनापार्ट फ्रांस का एक ताकतवर नेता था जिसने कई देशों को हराया और फ्रांस को मजबूत बनाया। उसने फ्रांस में नए कानून बनाए और सुधार किए, जो 'नेपोलियन कोड' कहलाते हैं। हालांकि, 1815 में वाटरलू के युद्ध में उसकी हार हुई।🎯 Exam Tip: नेपोलियन के योगदान में उसके सैन्य विजयों के साथ-साथ 'नेपोलियन कोड' जैसे प्रशासनिक सुधारों पर भी ध्यान केंद्रित करें।
Question 6. फ्रांसीसी राज्य-क्रान्ति पर किन दार्शनिकों के विचारों का प्रभाव पड़ा है।
Answer: फ्रांस की राज्य-क्रांति पर जिन दार्शनिकों के विचारों का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा था, उनका संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है:
फ्रांस के लोग रूसो, मॉण्टेस्क्यू और वॉल्टेयर जैसे महान दार्शनिकों और लेखकों जैसे दिदरो और क्वेसेन के विचारों से प्रभावित होकर स्वतंत्रता की मांग करने लगे थे। इन विचारकों ने फ्रांस के निवासियों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बुराइयों के बारे में बताया। इन दार्शनिकों के क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित होकर फ्रांस की जनता ने इन बुराइयों को खत्म करने के लिए ठान लिया। इस तरह फ्रांस में एक बौद्धिक जागृति फैली और यहां के निवासी न्याय, स्वतंत्रता और समानता की स्थापना के लिए कोशिश करने लगे। इन विचारकों के लेखों ने जनता को एकजुट किया।
In simple words: फ्रांस की क्रांति पर मॉण्टेस्क्यू, वॉल्टेयर और रूसो जैसे दार्शनिकों का बहुत गहरा असर पड़ा। उन्होंने राजा की मनमानी का विरोध किया और लोगों को आजादी, बराबरी और न्याय के बारे में सोचने पर मजबूर किया। रूसो की किताब 'सोशल कॉन्ट्रैक्ट' ने लोगों को खासकर प्रेरित किया।🎯 Exam Tip: प्रत्येक दार्शनिक के मुख्य विचार और उनकी प्रसिद्ध कृतियों का उल्लेख करें, और यह बताएं कि उनके विचारों ने क्रांति को कैसे प्रेरित किया।
Question 7. फ्रांस की राज्य-क्रान्ति से सम्बन्धित टेनिस कोर्ट की सभा तथा बास्तोल जेल को तोड़ने की घटनाओं का वर्णन कीजिए । इनका क्या प्रभाव पड़ा ?
Answer: फ्रांस की राज्य-क्रांति में टेनिस कोर्ट की सभा और बास्तील जेल के पतन का विशेष महत्व है। इन दोनों घटनाओं का वर्णन नीचे दिया गया है:
🎯 Exam Tip: टेनिस कोर्ट की शपथ और बास्तील के पतन को क्रांति की दो महत्वपूर्ण शुरुआती घटनाओं के रूप में प्रस्तुत करें। उनके तात्कालिक और दीर्घकालिक प्रभावों का स्पष्ट उल्लेख करें।
Question 8. 1789 में फ्रांस की राष्ट्रीय सभा द्वारा की गई तीन प्रमुख घोषणाओं का वर्णन कीजिए। [2015]
Answer: 1789 में फ्रांस की राष्ट्रीय सभा द्वारा की गई तीन प्रमुख घोषणाएँ निम्नलिखित हैं:
🎯 Exam Tip: इन घोषणाओं के मुख्य बिंदु - समानता, विशेषाधिकारों का अंत, और चर्च की संपत्ति का राष्ट्रीयकरण - को स्पष्ट रूप से समझाएं।
Question 9. फ्रांस की क्रान्ति में 'टेनिस कोर्ट की शपथ' का क्या महत्त्व है? इसके कारण और परिणाम पर प्रकाश डालिए। [2016]
Answer: 'स्टेट्स जनरल' फ्रांस की पुरानी संसद थी जिसमें तीन सदन थे, यानी तीन वर्गों का प्रतिनिधित्व था। प्रत्येक वर्ग का अलग-अलग अधिवेशन होता था। 1614 ई० के बाद अब तक इसका कोई अधिवेशन नहीं हुआ था। स्टेट्स जनरल के सदस्यों की कुल संख्या 1214 थी, जिसमें 308 पादरी वर्ग के, 285 कुलीन वर्ग के और 621 जनसाधारण वर्ग के सदस्य थे। राजा ने धन की कमी पूरी करने के लिए इस उम्मीद से 1789 ई० में इसका अधिवेशन बुलाया कि वह नए कर लगाने की अनुमति दे देगी। जनता वर्ग ने करों का विरोध किया और संयुक्त अधिवेशन की मांग की। राजा और दरबारी वर्ग ने इसका विरोध किया तथा सभा को भंग करना चाहा। जनता वर्ग ने सभी से हटने से इनकार कर दिया। इसी बीच बहस होने लगी कि 'तीसरा सदन क्या है?' फ्रांस के प्रसिद्ध विधिवेत्ता 'एबीसीएज' ने एक पुस्तिका बांटी जिसमें लिखा था-"तीसरा सदन ही राष्ट्र का पर्याय है, लेकिन देश की सरकार ने उसकी पूरी तरह से उपेक्षा कर रखी है।" 6 मई, 1789 ई० को तीनों वर्गों के सदस्यों ने अलग-अलग भवनों में बैठक की। जनसाधारण वर्ग का नेतृत्व 'मीराबो' ने संभाला।
टेनिस कोर्ट की शपथ: फ्रांस के तत्कालीन राजा लुई सोलहवें ने सामंतों, कुलीनों और पादरियों के दबाव में आकर साधारण वर्ग के सभा भवन को बंद करवा दिया और इस वर्ग को सभा स्थगित रखने का आदेश दिया। राजा के इस आदेश के विरोध में, तीसरे सदन (वर्ग) के सभी सदस्य भवन के पास स्थित टेनिस कोर्ट के मैदान में इकट्ठा हो गए। तीसरे वर्ग के नेता 'मीराबो' की अध्यक्षता में शपथ ली, जिसमें उन्होंने यह संकल्प लिया कि "हम यहां से तब तक नहीं हटेंगे, जब तक हम देश के लिए संविधान का निर्माण नहीं कर लेते, भले ही हमारे खिलाफ तलवारें ही क्यों न उठानी पड़ें।" फ्रांस के इतिहास में यह संकल्प 'टेनिस कोर्ट की शपथ' के नाम से जाना जाता है। तीसरे सदन के सदस्यों की इस घोषणा से लुई सोलहवें डर गए और उन्होंने 27 जून, 1789 ई० को तीनों सदनों की संयुक्त बैठक (अधिवेशन) की अनुमति दे दी। 'स्टेट्स जनरल' को राष्ट्रीय सभा की मान्यता प्रदान की गई। इस सभा ने 9 जुलाई, 1789 ई० को संविधान सभा का काम संभाला।
In simple words: 'टेनिस कोर्ट की शपथ' फ्रांस में एक बहुत महत्वपूर्ण घटना थी। राजा ने नए कर लगाने के लिए एक सभा बुलाई थी, लेकिन आम जनता को बराबर अधिकार नहीं मिल रहे थे। तो आम जनता के नेताओं ने एक टेनिस कोर्ट में इकट्ठा होकर शपथ ली कि वे तब तक नहीं हटेंगे जब तक देश के लिए एक नया संविधान नहीं बना लेते। इस शपथ ने राजा को झुकने पर मजबूर किया और क्रांति को आगे बढ़ाया।🎯 Exam Tip: टेनिस कोर्ट की शपथ को फ्रांस की क्रांति में जनता के प्रतिरोध और संप्रभुता की पहली महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करें। इसके पीछे के कारणों और परिणामों को विस्तार से बताएं।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. फ्रांसीसी क्रान्ति कब प्रारम्भ हुई ?
Answer: पहली फ्रांसीसी क्रांति जून, 1789 ई० में शुरू हुई। जुलाई, 1830 ई० में फ्रांस में फिर से क्रांति का विस्फोट हुआ, और फरवरी, 1848 ई० में फ्रांस में आखिरी क्रांति हुई। इन क्रांतियों ने देश के राजनीतिक और सामाजिक ढांचे को बदल दिया।
In simple words: फ्रांस में पहली क्रांति जून 1789 में शुरू हुई, फिर 1830 और 1848 में भी क्रांतियां हुईं।
🎯 Exam Tip: फ्रांसीसी क्रांति की शुरुआत की तारीख (1789) को याद रखना महत्वपूर्ण है, साथ ही बाद की प्रमुख क्रांतियों का भी उल्लेख करें।
Question 2. फ्रांस की क्रान्ति के दो कारण लिखिए।
Answer: फ्रांस की क्रांति के दो मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
ये दोनों कारण जनता में गहरे असंतोष का कारण बने और अंततः क्रांति को जन्म दिया।
In simple words: फ्रांस की क्रांति के दो बड़े कारण थे: राजाओं का अपनी मनमानी करना और अमीर लोगों के पास बहुत सारे खास अधिकार होना।
🎯 Exam Tip: क्रांति के दो सबसे महत्वपूर्ण और अक्सर पूछे जाने वाले कारणों पर ध्यान दें: निरंकुश शासन और सामाजिक-आर्थिक असमानता।
Question 3. फ्रांस की प्राचीन संसद का क्या नाम था ? [2017]
Answer: फ्रांस की प्राचीन संसद का नाम 'स्टेट्स जनरल' था। यह सभा तीन वर्गों (पादरी, कुलीन और जनसाधारण) का प्रतिनिधित्व करती थी।
In simple words: फ्रांस की पुरानी संसद को 'स्टेट्स जनरल' कहते थे।
🎯 Exam Tip: 'स्टेट्स जनरल' नाम और उसके तीन वर्गों की संरचना को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 4. क्रान्ति प्रारम्भ होने के समय फ्रांस का राजा कौन था ?
Answer: क्रांति प्रारम्भ होने के समय फ्रांस का राजा लुई सोलहवाँ था। वह अपनी पत्नी रानी मैरी एंटोनेट के साथ शासन कर रहा था।
In simple words: जब क्रांति शुरू हुई, फ्रांस का राजा लुई सोलहवाँ था।
🎯 Exam Tip: शासक का नाम याद रखना महत्वपूर्ण है क्योंकि वह क्रांति की शुरुआत में एक प्रमुख व्यक्ति था।
Question 5. उस सभा का नाम लिखिए जिसके बुलाने से फ्रांस में क्रान्ति का विस्फोट हुआ ।
Answer: सामंती सभा 'स्टेट्स जनरल' के अधिवेशन बुलाने के साथ ही फ्रांस में क्रांति का विस्फोट हो गया। इस अधिवेशन में हुए विवादों ने क्रांति को भड़काया।
In simple words: 'स्टेट्स जनरल' नाम की सभा के बुलावे से फ्रांस में क्रांति शुरू हुई।
🎯 Exam Tip: 'स्टेट्स जनरल' को क्रांति के तात्कालिक कारणों में से एक के रूप में याद रखें।
Question 6. रूसो कौन था ? उसने कौन-सी पुस्तक लिखी ? [2011,12]
Answer: रूसो फ्रांस का एक महान दार्शनिक, लेखक और शिक्षाशास्त्री था। उसने 'सोशल कॉन्ट्रैक्ट' नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। रूसो के विचारों ने फ्रांसीसी क्रांति को बहुत प्रभावित किया।
In simple words: रूसो फ्रांस का एक बहुत ही जाने-माने विचारक थे। उन्होंने 'सोशल कॉन्ट्रैक्ट' नाम की किताब लिखी थी।
🎯 Exam Tip: रूसो के योगदान को 'सोशल कॉन्ट्रैक्ट' पुस्तक और उनके "सामान्य इच्छा" (general will) के सिद्धांत से जोड़कर याद रखें।
Question 7. नेपोलियन का पतन कब और कहाँ हुआ ?
Answer: नेपोलियन बोनापार्ट का पतन सन् 1815 ई० में 'वाटरलू' के युद्ध में हुआ। इस युद्ध के बाद उसे सेंट हेलेना द्वीप पर कैद कर लिया गया।
In simple words: नेपोलियन 1815 में वाटरलू के युद्ध में हार गया था।
🎯 Exam Tip: वाटरलू के युद्ध की तारीख (1815) और स्थान को याद रखना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नेपोलियन के साम्राज्य का अंत था।
Question 8. फ्रांस की क्रान्ति के दो दार्शनिकों के नाम लिखिए। [2010]
Answer: फ्रांस की क्रांति के दो दार्शनिक थे:
इन दार्शनिकों के विचारों ने जनता को समानता और स्वतंत्रता के लिए लड़ने की प्रेरणा दी।
In simple words: रूसो और वॉल्टेयर फ्रांस की क्रांति के दो बड़े विचारक थे।
🎯 Exam Tip: क्रांति को प्रभावित करने वाले मुख्य दार्शनिकों के नामों को याद रखें, जैसे रूसो, वॉल्टेयर और मॉण्टेस्क्यू।
Question 9. फ्रांस का राष्ट्रीय पर्व कब मनाया जाता है ?
Answer: फ्रांस का राष्ट्रीय पर्व 14 जुलाई को मनाया जाता है। यह दिन बास्तील के किले के पतन का प्रतीक है।
In simple words: फ्रांस का राष्ट्रीय पर्व 14 जुलाई को मनाया जाता है।
🎯 Exam Tip: 14 जुलाई की तारीख और इसके पीछे की ऐतिहासिक घटना (बास्तील का पतन) को याद रखें।
Question 10. स्टेट्स जनरल की राष्ट्रीय महासभा को मान्यता कब दी गयी ?
Answer: स्टेट्स जनरल की राष्ट्रीय महासभा को सन् 1789 ई० में मान्यता दी गई। यह मान्यता राजा को जनता के सामने झुकने पर मिली थी।
In simple words: 'स्टेट्स जनरल' को 1789 में राष्ट्रीय महासभा के रूप में पहचान मिली थी।
🎯 Exam Tip: 1789 की तारीख महत्वपूर्ण है क्योंकि यह फ्रांस में राजनीतिक बदलाव की शुरुआत को दर्शाता है।
Question 11. फ्रांस की क्रान्ति के दो आर्थिक कारणों का उल्लेख कीजिए।
Answer: फ्रांस की क्रांति के दो आर्थिक कारण निम्नलिखित हैं:
इन कारणों से जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ा और राजकोष खाली हुआ।
In simple words: क्रांति के दो आर्थिक कारण थे कि अमीर लोग कोई कर नहीं देते थे और राजपरिवार बहुत फिजूलखर्ची करता था।
🎯 Exam Tip: आर्थिक कारणों में कर प्रणाली की असमानता और शाही फिजूलखर्ची को मुख्य बिंदुओं के रूप में शामिल करें।
Question 12. फ्रांस की क्रान्ति के दो परिणाम लिखिए। [2017, 18]
Answer: फ्रांस की क्रांति के दो परिणाम निम्नलिखित हैं:
ये सिद्धांत आज भी दुनिया भर में प्रेरणा देते हैं।
In simple words: फ्रांस की क्रांति के दो बड़े परिणाम थे: इसने एक ऐसे देश का विचार दिया जहाँ सरकार का कोई धर्म नहीं होगा और जनता का शासन होगा। इसने लोगों को आजादी, बराबरी और भाईचारे का संदेश भी दिया।
🎯 Exam Tip: स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और धर्मनिरपेक्षता जैसे सिद्धांतों को क्रांति के प्रमुख परिणामों के रूप में याद रखें।
Question 13. फ्रांस की राज्य क्रान्ति से पहले होने वाली दो राज्य क्रान्तियों के नाम लिखिए। [2014]
Answer: फ्रांस की राज्य क्रांति से पहले होने वाली दो राज्य क्रांतियां निम्नलिखित हैं:
इन क्रांतियों ने फ्रांस की जनता को प्रेरणा दी और दुनिया में बदलाव की लहर शुरू की।
In simple words: फ्रांस की क्रांति से पहले इंग्लैंड में और अमेरिका में भी क्रांतियां हुई थीं।
🎯 Exam Tip: इन दो क्रांतियों के नामों को याद रखें और समझें कि उन्होंने फ्रांसीसी क्रांति को कैसे प्रेरित किया।
बहुविकल्पीय प्रश्न
Question 1. फ्रांस की प्राचीन संसद का नाम था
(क) डायट
(ख) स्टेट्स जनरल
(ग) राष्ट्रीय सभा सभा
(घ) डाइरेक्टरी
Answer: (ख) स्टेट्स जनरल
In simple words: फ्रांस की पुरानी संसद को स्टेट्स जनरल कहा जाता था।
🎯 Exam Tip: 'स्टेट्स जनरल' फ्रांस की क्रांति से पहले की महत्वपूर्ण राजनीतिक संस्था थी, इसका नाम याद रखें।
Question 2. फ्रांस की क्रान्ति कब प्रारम्भ हुई? [2014, 18]
(क) 1889 ई० में
(ख) 1689 ई० में
(ग) 1789 ई० में
(घ) 1779 ई० में
Answer: (ग) 1789 ई० में
In simple words: फ्रांस की क्रांति 1789 में शुरू हुई थी।
🎯 Exam Tip: फ्रांस की क्रांति की सटीक शुरुआत की तारीख 1789 ई० है, इसे याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 3. फ्रांस की क्रान्ति का तात्कालिक कारण था (2015, 18)
(क) स्टेट्स जनरल का अधिवेशन
(ख) दार्शनिकों की भूमिका
(ग) आर्थिक तंगी
(घ) सम्राट् की निरंकुशता
Answer: (क) स्टेट्स जनरल का अधिवेशन
In simple words: 'स्टेट्स जनरल' की सभा क्रांति का तुरंत का कारण बनी, क्योंकि इसमें विवाद हुआ था।
🎯 Exam Tip: तात्कालिक कारण अक्सर वह घटना होती है जो लंबे समय से चले आ रहे असंतोष को भड़का देती है; इस मामले में 'स्टेट्स जनरल' का अधिवेशन।
Question 4. फ्रांस में समाज के तीसरे वर्ग (जनसामान्य) का प्रतिशत था
(क) 5
(ख) 25
(ग) 75
(घ) 95
Answer: (घ) 95
In simple words: फ्रांस में आम लोगों का समूह, यानी तीसरा वर्ग, कुल आबादी का 95 प्रतिशत था।
🎯 Exam Tip: समाज के तीसरे वर्ग का बड़ा प्रतिशत क्रांति के लिए महत्वपूर्ण था क्योंकि यह दर्शाता है कि अधिकांश आबादी शोषित थी।
Question 5. 1789 ई० की राज्य-क्रान्ति के समय फ्रांस का शासक था
(क) चार्ल्स प्रथम
(ख) लुई सोलहवाँ
(ग) लुई फिलिप
(घ) लुई अठारहवाँ
Answer: (ख) लुई सोलहवाँ
In simple words: 1789 की क्रांति के समय फ्रांस का राजा लुई सोलहवाँ था।
🎯 Exam Tip: शासक का नाम सीधे तौर पर याद रखें क्योंकि यह क्रांति से जुड़ा एक केंद्रीय व्यक्ति था।
Question 6. रूसो कौन था?
(क) राजा
(ख) जनरल
(ग) दार्शनिक
(घ) सैनिक
Answer: (ग) दार्शनिक
In simple words: रूसो एक प्रसिद्ध दार्शनिक थे।
🎯 Exam Tip: रूसो, मॉण्टेस्क्यू और वॉल्टेयर जैसे नाम फ्रांस की क्रांति के दार्शनिकों के रूप में याद रखें।
Question 7. फ्रांस के क्रान्तिकारियों ने मानव के मौलिक अधिकारों के घोषणा-पत्र को कब जारी किया?
(क) 15 अगस्त, 1789 ई० में
(ख) 27 अगस्त, 1789 ई० में
(ग) 30 अगस्त, 1789 ई० में
(घ) 24 अक्टूबर, 1789 ई० में
Answer: (ख) 27 अगस्त, 1789 ई० में
In simple words: क्रांतिकारियों ने मानव अधिकारों का घोषणा-पत्र 27 अगस्त, 1789 को जारी किया था।
🎯 Exam Tip: 'मानव और नागरिक अधिकारों की घोषणा' की तारीख और उसके महत्व को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 8. फ्रांस में आतंक के शासन का संस्थापक कौन नहीं था?
(क) दान्ते
(ख) डॉ० मारा
(ग) रॉब्सपियरे
(घ) मीराबो
Answer: (घ) मीराबो
In simple words: मीराबो आतंक के शासन का संस्थापक नहीं था; वह क्रांति के शुरुआती दौर के प्रमुख नेताओं में से एक था।
🎯 Exam Tip: 'आतंक के शासन' से जुड़े प्रमुख व्यक्तियों (जैसे रॉब्सपियरे) और उनसे अलग व्यक्तियों को पहचानना सीखें।
Question 9. मित्र राष्ट्रों ने नेपोलियन को 'वाटर लू' नामक स्थान पर किस वर्ष परास्त किया? [2012]
(क) 1789 ई० में
(ख) 1792 ई० में
(ग) 1815 ई० में
(घ) 1830 ई० में
Answer: (ग) 1815 ई० में
In simple words: नेपोलियन को 1815 में वाटरलू के युद्ध में हराया गया था।
🎯 Exam Tip: वाटरलू के युद्ध की तारीख (1815) और इसका महत्व नेपोलियन के अंतिम पतन के रूप में याद रखें।
Question 10. रूसो की पुस्तक का नाम है।
(क) दे स्प्रिट ऑफ ब्याज
(ख) सोशल कॉन्ट्रेक्ट
(ग) दास कैपिटल
(घ) द प्रिन्स
Answer: (ख) सोशल कॉन्ट्रेक्ट
In simple words: रूसो की प्रसिद्ध किताब का नाम 'सोशल कॉन्ट्रैक्ट' है।
🎯 Exam Tip: रूसो की प्रमुख कृति 'सोशल कॉन्ट्रैक्ट' का नाम सीधे तौर पर याद रखें।
Question 11. किस तिथि को बस्तील का पतन हुआ था? [2011, 14]
(क) 4 जुलाई, 1789 ई०
(ख) 14 जुलाई, 1789 ई०
(ग) 14 सितम्बर, 1789 ई०
(घ) 24 अगस्त, 1789 ई०
Answer: (ख) 14 जुलाई, 1789 ई०
In simple words: बास्तील का किला 14 जुलाई, 1789 को गिराया गया था।
🎯 Exam Tip: 14 जुलाई, 1789 की तारीख को फ्रांस के राष्ट्रीय दिवस और क्रांति के महत्वपूर्ण क्षण के रूप में याद रखें।
Question 12. निम्न में से कौन-सी क्रान्ति 'टेनिस कोर्ट की सभा' से सम्बन्धित थी? (2010)
(क) रूस की क्रान्ति
(ख) इंग्लैण्ड की क्रान्ति
(ग) फ्रांस की क्रान्ति
(घ) अमेरिका की क्रान्ति
Answer: (ग) फ्रांस की क्रान्ति
In simple words: 'टेनिस कोर्ट की सभा' फ्रांस की क्रांति से जुड़ी हुई थी।
🎯 Exam Tip: 'टेनिस कोर्ट की शपथ' को फ्रांस की क्रांति के एक प्रमुख और निर्णायक क्षण के रूप में याद रखें।
Question 13. 'स्पिरिट ऑफ लॉज' नामक पुस्तक का लेखक कौन था? (2015, 18)
(क) रूसो
(ख) लॉक
(ग) मॉण्टेस्क्यू
(घ) मैकियावली
Answer: (ग) मॉण्टेस्क्यू
In simple words: 'स्पिरिट ऑफ लॉज' किताब मॉण्टेस्क्यू ने लिखी थी।
🎯 Exam Tip: मॉण्टेस्क्यू की इस प्रसिद्ध कृति और उनके 'शक्तियों के पृथक्करण' के सिद्धांत को याद रखें।
Question 14. नेपोलियन बोनापार्ट की अन्तिम पराजय कहाँ हुई? [2016]
(क) वाटर लू में
(ख) रूस में
(ग) ऑग्ट्रिया में
(घ) प्रशा में
Answer: (क) वाटर लू में
In simple words: नेपोलियन बोनापार्ट की आखिरी हार वाटरलू में हुई थी।
🎯 Exam Tip: वाटरलू का युद्ध उस स्थान का नाम है जहां नेपोलियन को अंतिम हार मिली थी।
Question 15. महान दार्शनिक वाल्टेयर ने किस देश की क्रान्ति को प्रभावित किया था? [2016]
(क) अमेरिका
(ख) इंग्लैण्ड
(ग) रूस
(घ) फ्रांस
Answer: (घ) फ्रांस
In simple words: वाल्टेयर ने फ्रांस की क्रांति को बहुत प्रभावित किया था।
🎯 Exam Tip: वॉल्टेयर फ्रांस की क्रांति के सबसे प्रभावशाली दार्शनिकों में से एक थे; उनके विचारों ने क्रांति को बढ़ावा दिया।
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