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Detailed Chapter 3 आपडेन UP Board Solutions for Class 10 Social Science
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Class 10 Social Science Chapter 3 आपडेन UP Board Solutions PDF
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
Question 1. प्राकृतिक आपदा से क्या अभिप्राय है? किसी एक प्राकृतिक आपदा पर विस्तार से प्रकाश डालिए।
या
आपदा से आप क्या समझते हैं? किन्हीं दो आपदाओं का वर्णन कीजिए। [2013]
या
प्राकृतिक आपदा किसे कहते हैं? किन्हीं चार प्राकृतिक आपदाओं के विषय में लिखिए। [2015]
Answer: प्राकृतिक कारणों से या प्रकृति में बदलाव के कारण होने वाले संकट को प्राकृतिक आपदा कहा जाता है। उदाहरण के लिए, भूकंप, ज्वालामुखी, बाढ़, सूखा, समुद्री लहरें, भूस्खलन, बादल फटना और चक्रवाती तूफान आदि। दूसरे शब्दों में, प्रकृति द्वारा होने वाली वे सभी घटनाएँ जो बड़े पैमाने पर मानव और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाती हैं, प्राकृतिक आपदाएँ कहलाती हैं। ये आपदाएँ सीधे प्रकृति या पर्यावरण से जुड़ी होती हैं।
भूस्खलन (Landslide)
भूस्खलन तब होता है जब भूमि का एक बड़ा हिस्सा या उसके टूटे हुए खंड ढलान से नीचे खिसक जाते हैं या गिर जाते हैं। भूस्खलन दुनिया की बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में से एक है। भारत के पहाड़ी इलाकों, खासकर हिमालय क्षेत्र में, भूस्खलन एक आम प्राकृतिक आपदा है, जिससे हर साल जान-माल का नुकसान होता है। यह यातायात और संचार व्यवस्था को भी बाधित करता है और रिहायशी इलाकों को नष्ट कर देता है। भू-क्षरण (मिट्टी का कटाव) और भूस्खलन अलग-अलग प्राकृतिक घटनाएँ हैं, लेकिन अक्सर लोग इन्हें एक ही मान लेते हैं। भू-क्षरण में मिट्टी किसी भी प्रक्रिया से अपने स्थान से दूसरी जगह बह जाती है, जबकि भूस्खलन में भूमि के बड़े-बड़े टुकड़े टूटकर सड़कों और बस्तियों को मलबे के नीचे दबा देते हैं, खेती की जमीन को खराब कर देते हैं और नदियों के बहाव को रोक देते हैं। पहाड़ी ढलानों पर चट्टानों का कमजोर होना भूस्खलन का मुख्य कारण है। जब चट्टानें कमजोर होती हैं, तो उनके अंदर घुसा हुआ पानी मिट्टी को ढीला कर देता है। यह ढीली मिट्टी ढलान पर भारी दबाव डालती है। नतीजतन, नीचे की सूखी चट्टानें ऊपर के भारी और गीले मलबे और चट्टानों का भार नहीं झेल पातीं, जिससे वे नीचे खिसक जाती हैं और भूस्खलन हो जाता है। पहाड़ी ढलानों और चट्टानों का कमजोर होना प्राकृतिक और मानवीय दोनों कारणों से हो सकता है। भूस्खलन के कारण या उत्पत्ति को नीचे दिए गए तरीकों से समझा जा सकता है:
1. भूकंप या अचानक चट्टानों के खिसकने से भूस्खलन होता है।
2. खुदाई या नदी के कटाव के कारण ढलान के आधार की ओर भी तेज भूस्खलन होते हैं।
3. भारी बारिश या बर्फबारी के दौरान, पहाड़ों की तेज ढलानों पर चट्टानों का एक बड़ा हिस्सा पानी की अधिकता और आधार के कटाव के कारण अपनी गुरुत्वाकर्षण स्थिति से असंतुलित होकर अचानक तेजी से टूटकर गिर जाता है। इसलिए, चट्टानों पर दबाव का बढ़ना भूस्खलन का मुख्य कारण है।
4. भूस्खलन त्वरित भूकंप, बाढ़, ज्वालामुखी विस्फोट, और अनियमित वन कटाई से भी हो सकता है।
5. सड़क और भवन बनाने के लिए प्राकृतिक ढलानों को समतल किया जाता है। ऐसे बदलावों के कारण भी पहाड़ी ढलानों पर भूस्खलन होने लगते हैं। असल में, मुलायम और कमजोर चट्टानों में रिसकर जमा बर्फ या पानी का भार ही पहाड़ी ढलानों पर चट्टानों के टूटने और खिसकने का प्रमुख कारण होता है।
भूस्खलन की रोकथाम
भूस्खलन एक प्राकृतिक आपदा है, लेकिन मानवीय गतिविधियाँ भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। इसके प्रभाव को कम करने के मुख्य तरीके निम्नलिखित हैं:
1. **भूमि उपयोग:** जहाँ ढलानें वनस्पति-रहित होती हैं, वहाँ भूस्खलन का खतरा बना रहता है। ऐसे स्थानों पर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार पेड़-पौधे लगाने चाहिए। भू-वैज्ञानिक विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए उपायों को अपनाकर, भूमि के उपयोग और स्थल की जाँच से ढलान को स्थिर बनाने वाली विधियों से भूस्खलन से होने वाली हानि को 95% से अधिक कम किया जा सकता है। जल के प्राकृतिक प्रवाह में कभी भी रुकावट नहीं आनी चाहिए।
2. **प्रतिधारण दीवारें:** भूस्खलन को रोकने और सड़कों को नुकसान से बचाने के लिए सड़कों के किनारे पर मजबूत दीवारें बनानी चाहिए, जिससे ऊँचे पहाड़ों से पत्थर सड़क पर न गिरें। रेल लाइनों के लिए सुरंगों के बाद भी काफी दूर तक प्रतिधारण दीवारें बनानी चाहिए।
3. **स्थानीय जल-प्रवाह नियंत्रण:** बारिश के पानी और झरनों से होने वाले भूस्खलन को नियंत्रित करने के लिए स्थानीय जल-प्रवाह को नियंत्रित करना चाहिए, जिससे पानी भूमि में प्रवेश न कर सके।
4. **पर्वतीय ढलानों को स्थिर करना:** पर्वतीय ढलानों को स्थिर करके भी भूस्खलन से होने वाली क्षति को कम किया जा सकता है। ढलानों पर घास उगाकर, पौधे लगाकर और पेड़ लगाकर उन्हें मजबूत किया जा सकता है। बहुत खड़ी ढलानों पर, जब तक पर्याप्त वनस्पति विकसित न हो, मिट्टी को अस्थायी रूप से रोकने के लिए टाट या नारियल की जटा का उपयोग किया जा सकता है।
5. **भवनों के समीप अवरोधक:** खड़ी या तेज ढलानों पर बने भवनों के पास ऐसे अवरोधक बनाने चाहिए जो छोटे भूस्खलनों को रोक सकें। ये अवरोधक गिरने वाले मलबे की गति को सहन करने में सक्षम होने चाहिए। अवरोधकों के निर्माण के समय पानी की निकासी का पूरा ध्यान रखना चाहिए।
6. **अभियांत्रिकी संरचना:** भूस्खलन के प्रभाव को कम करने के लिए मजबूत नींव वाले भवन और अन्य अभियान्त्रिकी संरचनाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए। भूमिगत प्रणालियों को इस तरह बनाया जाना चाहिए कि वे भूस्खलन से क्षतिग्रस्त न हों। इनके समीप भी प्रतिधारण दीवारें बनानी चाहिए। इनके निर्माण के समय भी पानी के निकास का पूरा ध्यान रखना चाहिए।
7. **वनस्पति आवरण में वृद्धि:** वनस्पति आवरण बढ़ाना भूस्खलन को नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी, सस्ता और उपयोगी तरीका है। यह मिट्टी की ऊपरी सतह को निचली सतह से बांधे रखता है और सतही जल-प्रवाह को धीमा करके मिट्टी के कटाव को रोकता है। पेड़-पौधे लगाने से मिट्टी की पकड़ मजबूत होती है, जिससे भूस्खलन का खतरा कम हो जाता है।
8. **भूस्खलन संभावित क्षेत्रों की पहचान:** भूस्खलन संभावित और प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करके उनका नक्शा बनाना चाहिए। प्रभावित लोगों में इसका प्रचार-प्रसार भी जरूरी है, ताकि वे सतर्क रह सकें। भारत में भूस्खलन के प्रमुख क्षेत्र हैं: हिमालय, उत्तर-पूर्वी पर्वतीय भाग, पश्चिमी घाट और नीलगिरि, पूर्वी घाट और विंध्याचल। इन रोकथाम और प्रबंधन उपायों को अपनाकर भूस्खलन से होने वाली हानि को कम से कम किया जा सकता है।
In simple words: प्राकृतिक आपदाएँ वे घटनाएँ हैं जो प्रकृति में बदलाव के कारण होती हैं और मानव जीवन व पर्यावरण को नुकसान पहुँचाती हैं। भूस्खलन एक ऐसी ही आपदा है, जिसमें जमीन का बड़ा हिस्सा खिसक जाता है। इसे रोकने के लिए पेड़ लगाना और मजबूत दीवारें बनाना जैसे उपाय किए जा सकते हैं।
🎯 Exam Tip: जब आप प्राकृतिक आपदाओं के बारे में लिख रहे हों, तो उनका अर्थ, कारण, प्रभाव और रोकथाम के उपाय तीनों को विस्तार से समझाएँ। उदाहरणों के साथ अपनी बात को स्पष्ट करना अच्छे अंक दिलाता है।
Question 2. भूकम्प के कारणों पर प्रकाश डालिए तथा इससे भवन-सम्पत्ति की रक्षा कैसे करेंगे? लिखिए।
Answer: प्राकृतिक आपदाओं में भूकंप सबसे विनाशकारी, भयानक और प्रभावशाली आपदा है। यह अनगिनत लोगों की जान ले लेता है और धन-संपत्ति को भी भारी नुकसान पहुँचाता है। भूकंप पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों में से एक है। वैसे तो धरती के अंदर हर दिन कंपन होता रहता है, लेकिन जब ये कंपन बहुत तेज हो जाते हैं तो उन्हें भूकंप कहते हैं। आमतौर पर भूकंप एक अचानक होने वाली घटना है जो पृथ्वी की ऊपरी परत में हलचल पैदा कर देती है। इन हलचलों के कारण पृथ्वी अचानक बहुत तेजी से काँपने लगती है। इसे ही भूचाल या भूकंप कहते हैं, और यह एक विनाशकारी घटना है।
भूकंप के कारण
भूगर्भशास्त्रियों ने भूकंप के निम्नलिखित मुख्य कारण बताए हैं:
1. **ज्वालामुखीय उद्गार:** जब प्लेटों की हलचल के कारण पृथ्वी के अंदर मौजूद गैसयुक्त पिघला हुआ लावा पृथ्वी की ऊपरी परत की ओर बहता है, तो उसके दबाव से चट्टानें हिल उठती हैं। यदि लावा के रास्ते में कोई भारी चट्टान आ जाती है, तो बहता हुआ लावा उस चट्टान को तेजी से धकेलता है, जिससे भूकंप आता है।
2. **भू-संतुलन में अव्यवस्था:** पृथ्वी की ऊपरी परत पर विभिन्न बल संतुलन बनाए रखने में लगे रहते हैं, जिससे पृथ्वी के अंदर की सियाल और सिमा परतों में बदलाव होते रहते हैं। यदि ये बदलाव अचानक और तेजी से होते हैं, तो पृथ्वी में कंपन शुरू हो जाता है।
3. **जलीय भार:** मानव द्वारा बनाए गए जलाशयों, झीलों या तालाबों के कारण धरती के नीचे की चट्टानों पर भार और दबाव में अचानक बदलाव आ जाते हैं, और इन्हीं के कारण भूकंप आता है।
4. **भू-पटल में सिकुड़न:** विकिरण के कारण पृथ्वी के अंदर की गर्मी धीरे-धीरे कम होती रहती है, जिसके कारण पृथ्वी की ऊपरी परत में सिकुड़न आती है। यह सिकुड़न पर्वत निर्माण की प्रक्रिया को जन्म देती है। जब यह प्रक्रिया तेजी से होती है, तो पृथ्वी की ऊपरी परत में कंपन शुरू हो जाते हैं।
5. **प्लेट विवर्तनिकी:** महाद्वीप और महासागरीय बेसिन बड़े, मजबूत भू-खंडों से बने हैं, जिन्हें प्लेट कहते हैं। सभी प्लेटें अलग-अलग गति से खिसकती रहती हैं। कभी-कभी जब दो प्लेटें आपस में टकराती हैं, तब भूकंप आते हैं। पृथ्वी के अंदर की प्लेटों का खिसकना भूकंप का एक प्रमुख कारण है।
6. **संसाधनों का अत्यधिक दोहन:** पृथ्वी से पानी, खनिज तेल और गैस का अत्यधिक दोहन करने के कारण जब सतह के भीतर जगह खाली हो जाती है, तो उसे भरने और संतुलित करने के लिए भूमि में हलचल उत्पन्न होती है, जिससे भूकंप आते हैं।
भवन-संपत्ति की रक्षा के उपाय
भारत में अब तक आए भूकंपों से सबसे अधिक नुकसान असुरक्षित भवनों के कारण हुआ है। इसका कारण यह है कि भवनों के निर्माण में ऐसी सामग्री का उपयोग किया जाता है जो बिना किसी खास तकनीक के होती है, और भूकंप के समय गिरकर भारी धन-जन का नुकसान करती है। इसलिए, भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित भवन निर्माण के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए:
1. **भवनों की आकृति:** भवन का नक्शा आमतौर पर आयताकार होना चाहिए। लंबी दीवारों को सहारा देने के लिए ईंट, पत्थर या कंक्रीट के कॉलम होने चाहिए। जहाँ तक हो सके T, L, U और X-आकार के बड़े भवनों को उचित स्थानों पर अलग-अलग खंडों में बाँटकर आयताकार खंड बना लेना चाहिए। खंडों के बीच पर्याप्त दूरी छोड़नी चाहिए, जिससे भूकंप के समय भवन हिल-डुल सके और नुकसान न हो।
2. **नींव:** जहाँ की जमीन कमजोर या अलग-अलग तरह की मिट्टी वाली हो, वहाँ नींव में भवन के कॉलमों को अलग-अलग तरीके से स्थापित करना चाहिए। ठंडे देशों में मिट्टी में नींव की गहराई जमने-बिंदु क्षेत्र के पर्याप्त नीचे तक होनी चाहिए, जबकि चिकनी मिट्टी में यह गहराई दरार के सिकुड़ने के स्तर से नीचे तक होनी चाहिए। ठोस मिट्टी वाली जगहों पर किसी भी प्रकार के आधार का उपयोग कर सकते हैं। चूने या सीमेंट और कंक्रीट से बनी ठोस और उचित चौड़ाई वाली नींव पर भवनों के आधार का निर्माण करना सही रहता है।
3. **दीवारों में खुले स्थान:** दीवारों में दरवाजे और खिड़कियों की अधिकता के कारण, उनकी भार-सहन क्षमता कम हो जाती है। इसलिए ये कम संख्या में और दीवारों के बीचों-बीच स्थित होने चाहिए। किनारों पर बने खुले स्थानों से दीवार के गिरने की संभावना अधिक होती है।
4. **कंक्रीट से बने बैंडों का प्रयोग:** भूकंप संवेदनशील क्षेत्रों में, दीवारों को मजबूती देने और उनके कमजोर हिस्सों को समतल रूप से मुड़ने की क्षमता बढ़ाने के लिए कंक्रीट के मजबूत बैंड बनाने चाहिए जो स्थिर विभाजक दीवारों सहित सभी बाहरी और आंतरिक दीवारों पर लगातार काम करते रहते हैं। इन बैंडों में प्लिंथ, लिंटेल, रूफ, ईव, फ्लोर, वर्टिकल, राफ्टर, होल्डिंग डाउन, गेबल आदि बैंड शामिल हैं।
5. **वर्टिकल रीइन्फोर्समेंट:** दीवारों के कोनों और जोड़ों में वर्टिकल स्टील लगाना चाहिए, जो सभी मंजिलों और फर्श वाले बैंड से गुजरता हो। भूकंपीय क्षेत्रों में, खिड़कियों और दरवाजों की चौखट में भी वर्टिकल रीइन्फोर्समेंट की व्यवस्था होनी चाहिए। दरअसल, कोई भी भवन भूकंप से पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सकता, लेकिन भूकंप प्रतिरोधी जरूर हो सकता है; यदि भवन की निर्माण योजना के मूल सिद्धांतों जैसे-हल्कापन, निर्माण की निरंतरता, आकार, द्रव्यमान आदि का ध्यान रखा जाए। भूकंप से बचाव के लिए मजबूत निर्माण और सही योजना बहुत जरूरी है।
In simple words: भूकंप पृथ्वी के अंदर की हलचल से आता है, जिसके मुख्य कारण ज्वालामुखी फटना, प्लेटों का खिसकना और अधिक खुदाई हैं। घरों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें आयताकार बनाना चाहिए, मजबूत नींव बनानी चाहिए, कम खिड़कियाँ-दरवाजे रखने चाहिए, और कंक्रीट के मजबूत बैंड और वर्टिकल स्टील का इस्तेमाल करना चाहिए।
🎯 Exam Tip: भूकंप के कारणों को बताते समय प्लेट विवर्तनिकी और मानवीय गतिविधियों का उल्लेख करें। भवन सुरक्षा उपायों में संरचनात्मक मजबूती पर विशेष ध्यान दें।
Question 3. बाढ़ आपदा निवारण हेतु प्रमुख उपाय लिखिए।
या
बाढ़ नियन्त्रण हेतु कोई दो उपाय सुझाइए। [2013]
या
बाढ़ आपदा की समस्या के समाधान के लिए चार सुझाव दीजिए। [2018]
Answer: बाढ़ आपदा को रोकने के मुख्य उपाय इस प्रकार हैं:
1. **सीधा जलमार्ग:** बाढ़ संभावित क्षेत्रों में जलमार्ग को सीधा रखना चाहिए ताकि पानी तेजी से एक सीमित रास्ते से बह सके। टेढ़ी-मेढ़ी नदियों में बाढ़ आने की संभावना अधिक होती है।
2. **जलमार्ग-परिवर्तन:** उन क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए जहाँ अक्सर बाढ़ आती है। ऐसी जगहों से जलमार्ग को मोड़ने के लिए कृत्रिम संरचनाएँ बनाई जाती हैं। यह काम वहीं किया जाता है जहाँ कोई बड़ा खतरा न हो।
3. **कृत्रिम जलाशयों का निर्माण:** आबादी वाले क्षेत्रों को बारिश के पानी से बचाने के लिए कृत्रिम जलाशय बनाने चाहिए। इन जलाशयों में जमा किए गए पानी का उपयोग बाद में सिंचाई या पीने के लिए किया जा सकता है। इन जलाशयों में बाढ़ के पानी को मोड़ने के लिए जल कपाट लगे होते हैं।
4. **बांध-निर्माण:** आबादी वाले क्षेत्रों को बाढ़ से बचाने और पानी के बहाव को रोकने के लिए रेत के थैलों से बांध बनाए जा सकते हैं।
5. **कच्चे तालाबों का निर्माण:** अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में ज्यादा से ज्यादा कच्चे तालाब बनाए जाने चाहिए। ये तालाब वर्षा के पानी को जमा कर सकते हैं, जिसका उपयोग जरूरत पड़ने पर किया जा सकता है। तालाब पानी को इकट्ठा करके भूमिगत जल स्तर को बढ़ाने में मदद करते हैं।
6. **नदियों को आपस में जोड़ना:** विभिन्न क्षेत्रों में बहने वाली नदियों को आपस में जोड़कर बाढ़ के खतरे को कम किया जा सकता है। अधिक पानी वाली नदियों का पानी कम पानी वाली नदियों में चला जाने से भी बाढ़ की स्थिति से सुरक्षा मिल सकती है।
7. **बस्तियों का बुद्धिमत्तापूर्ण निर्माण:** बस्तियों का निर्माण नदियों के रास्ते से हटकर किया जाना चाहिए। नदियों के आसपास अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में, सुरक्षा के लिए मकान ऊँचे चबूतरों पर बनाए जाने चाहिए और उनकी नींव व चारों ओर की दीवारों को मजबूत बनाना चाहिए।
8. **तटबंधों का निर्माण:** नदियों पर तटबंधों का निर्माण करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इससे किसी अन्य क्षेत्र में बाढ़ की समस्या उत्पन्न न हो। तटबंधों की सुरक्षा पर भी ध्यान देना चाहिए क्योंकि नदियों का जल ऊँचा होने पर ये टूट सकते हैं और अधिक विनाशकारी बाढ़ आ सकती है। इसके अलावा, पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण के लिए विस्फोटकों का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे भूस्खलन की संभावनाएँ बढ़ती हैं। ढलानों पर अधिक पेड़-पौधे लगाने और वन-विनाश को रोकने का भी पूरा प्रयास करना चाहिए।
In simple words: बाढ़ रोकने के लिए नदियों के रास्ते सीधे करने चाहिए, नए जलाशय और बांध बनाने चाहिए, नदियों को आपस में जोड़ना चाहिए, और घरों को ऊँची और मजबूत नींव पर बनाना चाहिए। जंगल काटना भी रोकना चाहिए।
🎯 Exam Tip: बाढ़ नियंत्रण के उपायों को लिखते समय तकनीकी और प्राकृतिक दोनों तरह के समाधानों को शामिल करें। यह भी बताएँ कि ये उपाय कैसे काम करते हैं।
Question 4. 'सूखा क्या है? इसके प्रमुख कारणों का उल्लेख कीजिए।
Answer: सूखा वह स्थिति है जिसमें किसी स्थान पर सामान्य से कम वर्षा होती है और यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है। सूखा तब बहुत गंभीर हो जाता है जब इसके साथ तापमान भी बढ़ जाता है। शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में सूखा एक आम समस्या है, लेकिन पर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्र भी इससे अछूते नहीं हैं। मानसूनी वर्षा वाले क्षेत्र सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। सूखा एक मौसम संबंधी आपदा है जो अन्य आपदाओं की तुलना में धीरे-धीरे आती है।
सूखे के कारण
दरअसल, सूखा एक प्राकृतिक आपदा है, लेकिन वर्तमान समय में प्रकृति और मानव दोनों ही इसके मूल में हैं। सूखे के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
1. **अत्यधिक चराई और जंगलों की कटाई:** अत्यधिक चराई और जंगलों की कटाई के कारण हरियाली धीरे-धीरे खत्म हो रही है। इसके परिणामस्वरूप वर्षा कम होती है और यदि होती भी है तो पानी तेजी से जमीन पर बह जाता है। इससे मिट्टी का कटाव होता है और भूमिगत जल-स्तर कम हो जाता है।
2. **ग्लोबल वार्मिंग:** ग्लोबल वार्मिंग वर्षा के पैटर्न में बदलाव का कारण बनती है। इसके परिणामस्वरूप वर्षा वाले क्षेत्र सूखाग्रस्त हो जाते हैं।
3. **कृषि योग्य समस्त भूमि का उपयोग:** बढ़ती आबादी के लिए भोजन उगाने हेतु लगभग सारी कृषि योग्य भूमि पर जुताई और खेती की जा रही है। इसके परिणामस्वरूप मिट्टी की उर्वरक शक्ति कम होती जा रही है और वह रेगिस्तान में बदलती जा रही है। ऐसी स्थिति में थोड़ी सी बारिश की कमी भी सूखे का कारण बन जाती है।
4. **वर्षा का असमान वितरण:** देश में वर्षा का वितरण दो तरीकों से असमान है। विभिन्न स्थानों पर न तो वर्षा की मात्रा समान होती है और न ही उसकी अवधि। हमारे देश की कुल खेती योग्य भूमि का लगभग 70% भाग सूखा संभावित क्षेत्र है। इस क्षेत्र में यदि कुछ वर्षों तक लगातार वर्षा न हो तो सूखे की बहुत दयनीय स्थिति पैदा हो जाती है।
5. **जलचक्र:** वर्षा जलचक्र के नियमित संचरण, प्रवाह और प्रक्रिया का परिणाम है, लेकिन जब कभी जलचक्र में रुकावट आती है तो वर्षा की कमी के कारण सूखे की स्थिति आ जाती है। आधुनिक विकास ने जलचक्र की प्राकृतिक प्रक्रियाओं को तोड़ दिया है, जिसके परिणामस्वरूप ऐसी स्थिति उत्पन्न हो रही है।
6. **भूमिगत जल का अधिक दोहन:** भूमिगत जलस्रोतों के अत्यधिक दोहन के कारण भी देश के कई प्रदेशों को सूखे का सामना करना पड़ रहा है। हालाँकि सूखे का कारण वर्षा की कमी को माना जाता है, लेकिन केवल वर्षा कम होने या न होने से ही सूखा नहीं होता। जब भूमिगत जल निकासी की दर भूमि में जाने वाले जल की दर से अधिक हो जाती है तो वर्षा न होने की स्थिति में सूखा पड़ जाता है।
7. **नदी मार्गों में परिवर्तन:** सतत-बहने वाली नदियाँ केवल सतही जल का बहाव मात्र नहीं होतीं बल्कि ये नदियाँ भूमिगत जलस्रोतों को भी जल प्रदान करती हैं। नदी का मार्ग बदल जाने पर आसपास के भूमिगत जलस्रोत सूखने लगते हैं।
8. **खनन कार्य:** देश के अनेक भागों में अवैज्ञानिक ढंग से किया गया खनन कार्य भी सूखे का एक प्रभावी कारण होता है। हिमालय की तराई और दून घाटी के क्षेत्रों में, जहाँ वार्षिक वर्षा का औसत 250 सेमी से अधिक रहता है, अनियोजित खनन कार्यों के कारण अनेक प्राकृतिक जलस्रोत सूख गए हैं।
9. **मिट्टी का संगठन:** मिट्टी जैविक संगठन द्वारा बना प्रकृति का महत्वपूर्ण पदार्थ है, जो स्वयं जल और नमी का भंडार होता है। वर्तमान समय में मिट्टी का संगठन असंतुलित हो गया है, इसलिए मिट्टी की जलधारण क्षमता बहुत कम हो गई है। जैविक पदार्थ (वनस्पति आदि) मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ाते हैं। वर्तमान समय में भूमि-क्षरण के कारण मिट्टी का वनस्पति आवरण कम हो गया है। इसलिए जलधारण क्षमता के अभाव के कारण सूखे का सामना अधिक करना पड़ता है।
In simple words: सूखा तब होता है जब लंबे समय तक बहुत कम बारिश होती है। इसके मुख्य कारणों में जंगलों की कटाई, ग्लोबल वार्मिंग, खेती के लिए सारी जमीन का उपयोग, बारिश का असमान वितरण, जलचक्र में बाधा, और भूमिगत जल का अधिक उपयोग शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: सूखे को परिभाषित करते समय "कम वर्षा" और "लंबी अवधि" जैसे महत्वपूर्ण शब्दों का उपयोग करें। कारणों में मानवीय और प्राकृतिक दोनों कारकों को शामिल करें।
Question 5. ओजोन-क्षरण के कारण, प्रभाव एवं नियन्त्रण पर लेख लिखिए।
या
ओजोन-क्षरण को रोकने के लिए कोई दो उपाय सुझाइए। [2013]
Answer: ओजोन ऑक्सीजन तत्व का ही एक रूप है। समतापमंडल में सूर्य की पराबैंगनी किरणें वायुमंडलीय ऑक्सीजन से क्रिया करके ओजोन गैस बनाती हैं।
ओजोन गैस का महत्व
वायुमंडल में ओजोन गैस की उपस्थिति पर्यावरण के जैविक तत्वों के जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए आवश्यक है। सूर्य से आने वाले विकिरण में मौजूद पराबैंगनी किरणों का 99% से भी अधिक भाग इस गैस द्वारा वायुमंडल में प्रवेश के साथ ही अवशोषित कर लिया जाता है। इस अवशोषण से पृथ्वी पर जीवन के विभिन्न रूप, पराबैंगनी किरणों के कई हानिकारक प्रभावों से बच पाते हैं। ओजोन गैस ऊष्मा उत्पन्न करने वाली लाल अवरक्त किरणों को पृथ्वी तक नहीं पहुँचने देती है जिससे पृथ्वी का तापमान संतुलित रहता है।
ओजोन गैस के क्षरण के कारण
वायुमंडल में ओजोन गैस की मात्रा 0.5% प्रतिवर्ष के हिसाब से कम हो रही है और अंटार्कटिका के ऊपर स्थित वायुमंडल में 20 से 30% तक ओजोन की मात्रा कम हो गई है। इसके अलावा, ओजोन की कमी वाले छोटे-छोटे छिद्र ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, चिली, अर्जेंटीना आदि स्थानों पर देखे गए हैं। ओजोन में हो रही कमी का कारण रासायनिक अभिक्रियाओं को माना जाता है जो ओजोन को ऑक्सीजन में बदल रही हैं। ओजोन गैस में विघटन उत्पन्न करने वाला प्रमुख रसायन क्लोरो-फ्लोरो कार्बन (CFC) यौगिक है। इस यौगिक का उपयोग शीतलीकरण उद्योग (रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर), अग्निरोधी पदार्थों, प्लास्टिक, रंग और एयरोसोल उद्योग में होता है। क्लोरो-फ्लोरो कार्बन से मुक्त हुआ क्लोरीन का एक परमाणु, ओजोन के एक लाख अणुओं को तोड़ने की क्षमता रखता है। इसी तरह धीरे-धीरे ओजोन परत का क्षरण होता है।
ओजोन क्षरण का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव
पराबैंगनी किरणों के प्रभाव से मनुष्य की त्वचा की ऊपरी सतह की कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप 'हिस्टेमिन' नामक रसायन के निकलने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। फलस्वरूप, 'मिलिग्रैंड' नामक त्वचा कैंसर, ब्रोंकाइटिस, निमोनिया, अल्सर आदि रोग हो जाते हैं। पराबैंगनी किरणों का प्रभाव आँखों के लिए बहुत घातक होता है। आँखों में सूजन और घाव होना तथा मोतियाबिंद जैसी बीमारियों में वृद्धि का कारण भी इन किरणों का पृथ्वी की सतह पर आना है।
ओजोन क्षरण को रोकने के उपाय
ओजोन गैस के क्षरण को रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए:
1. **प्रदूषण पर नियंत्रण:** प्रदूषण के कारण विभिन्न प्रकार की जहरीली गैसें वायुमंडल में फैलती हैं, जिनका ओजोन परत पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
2. **CFC गैसों पर नियंत्रण:** फैक्ट्रियों, रसायन उद्योगों आदि से निकलने वाली क्लोरो-फ्लोरो कार्बन, ओजोन के लिए बहुत हानिकारक हैं। प्रशीतन और वातानुकूलित मशीनों द्वारा इन गैसों का विस्तार बढ़ता है। इन गैसों का उत्पादन और उपयोग नियंत्रित करना आवश्यक है।
3. **नाइट्रस ऑक्साइड (NO₂):** नाइट्रस ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें जो जेट विमानों द्वारा ऊपरी वायुमंडल में फैलती हैं, उन्हें नियंत्रित किया जाना चाहिए।
4. **वृक्षारोपण:** वृक्षारोपण द्वारा प्रदूषण रोका जा सकता है और ओजोन परत को बचाया जा सकता है। अधिक पेड़-पौधे लगाने से वायुमंडल में हानिकारक गैसों की मात्रा कम होती है।
In simple words: ओजोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है। CFC जैसी गैसों के कारण यह परत पतली हो रही है, जिससे त्वचा कैंसर और आँखों की बीमारियाँ बढ़ रही हैं। इसे रोकने के लिए प्रदूषण कम करना और CFC गैसों का उपयोग बंद करना जरूरी है।
🎯 Exam Tip: ओजोन क्षरण के कारणों में CFCs और नाइट्रस ऑक्साइड जैसे रसायनों का उल्लेख करें। स्वास्थ्य प्रभावों पर ध्यान दें और नियंत्रण उपायों में प्रदूषण कम करने पर जोर दें।
Question 6. 'सूनामी' से क्या अभिप्राय है? इसके कारणों पर प्रकाश डालिए।
Answer:
समुद्री लहरें (सूनामी)
समुद्री लहरें कभी-कभी बहुत विनाशकारी रूप ले लेती हैं। इनकी ऊँचाई 15 मीटर या इससे भी अधिक हो सकती है। ये तट के आस-पास की बस्तियों को पूरी तरह तबाह कर देती हैं। इनकी रफ्तार समुद्र की गहराई के साथ बढ़ती जाती है, जबकि उथले सागर में इनकी रफ्तार कम होती है। ये लहरें मिनटों में ही तट तक पहुँच जाती हैं। जब ये लहरें उथले पानी में प्रवेश करती हैं, तो इनकी रफ्तार कम हो जाती है, लेकिन पीछे से आने वाली लहरें एक के ऊपर एक चढ़कर, लहरों की ऊँची दीवार बना देती हैं और भयानक शक्ति के साथ तट से टकराकर कई मीटर ऊपर तक उठती हैं। तटवर्ती मैदानी इलाकों में इनकी रफ्तार 50 किमी प्रति घंटे से भी अधिक हो सकती है।
इन विनाशकारी समुद्री लहरों को 'सूनामी' कहा जाता है। 'सूनामी' जापानी भाषा का शब्द है, जो दो शब्दों 'सू' अर्थात् 'बंदरगाह' और 'नामी' अर्थात् 'लहर' से बना है। सूनामी लहरें अपनी भयानक शक्ति के द्वारा विशाल चट्टानों, नावों और अन्य मलबे को भूमि पर कई मीटर अंदर तक धकेल देती हैं। ये तटवर्ती इमारतों, वृक्षों आदि को नष्ट कर देती हैं। 26 दिसंबर, 2004 को दक्षिण-पूर्व एशिया के 11 देशों में 'सूनामी' द्वारा फैलाई गई विनाशलीला से सभी परिचित हैं। इन सूनामी लहरों की ऊर्जा हिरोशिमा पर गिराए गए बम से तीन सौ पचास गुना अधिक पाई गई थी।
सूनामी के कारण
सूनामी लहरों की उत्पत्ति के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
1. **ज्वालामुखीय विस्फोट:** महासागरों की तली के आंतरिक भागों में जब कभी कोई ज्वालामुखी सक्रिय होता है और उसमें विस्फोट होता है तो महासागरों में सूनामी लहरों की उत्पत्ति होती है। सन् 1983 में इंडोनेशिया में क्रैकटो नामक विख्यात ज्वालामुखी में भयानक विस्फोट हुआ और इसके कारण लगभग 40 मीटर ऊँची सूनामी लहरें उत्पन्न हुईं। इन लहरों ने जावा और सुमात्रा में जन-धन को भारी क्षति पहुँचाई।
2. **भूकंप:** समुद्र तल के पास या उसके नीचे भूकंप आने पर समुद्र में हलचल पैदा होती है और यही हलचल विनाशकारी सूनामी का रूप ले लेती है। 26 दिसंबर, 2004 को दक्षिण-पूर्व एशिया में आईं विनाशकारी सूनामी लहरें भूकंप का ही परिणाम थीं। पश्चिमी देशों के वैज्ञानिक इन समुद्री लहरों को 'भूगर्भिक बम' कहते हैं। भारतीय भू-वैज्ञानिक प्रो० जे०जी० नेगी के अनुसार 26 दिसंबर, 2004 को आई भूकंपजनित प्रलयंकारी समुद्री लहरों की ताकत 32,000 हाइड्रोजन बम के विस्फोट के बराबर थी। समुद्री तल में होने वाले भूकंप से विशाल लहरें पैदा होती हैं।
3. **भूस्खलन:** समुद्र की तलहटी में भूकंप और भूस्खलन के कारण ऊर्जा निकलने से भी बड़ी-बड़ी लहरें उत्पन्न होती हैं जिनकी गति बहुत तेज होती है। मिनटों में ही ये लहरें विकराल रूप धारण कर तट की ओर दौड़ती हैं। हाल ही के वर्षों में किसी बड़े क्षुद्र ग्रह (उल्कापात) के समुद्र में गिरने को भी समुद्री लहरों का कारण माना गया है।
In simple words: सूनामी बड़ी समुद्री लहरें हैं जो भूकंप, ज्वालामुखी फटने या समुद्र के नीचे भूस्खलन के कारण आती हैं। ये तट पर बहुत नुकसान पहुँचाती हैं। इनकी ऊँचाई बहुत ज्यादा हो सकती है और ये तेज गति से चलती हैं।
🎯 Exam Tip: सूनामी की परिभाषा में उसके जापानी मूल और "बंदरगाह की लहर" अर्थ को शामिल करें। कारणों में समुद्री भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट जैसे भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं पर जोर दें।
Question 7. आपदा से आप क्या समझते हैं? मानवकृत किन्हीं दो आपदाओं का वर्णन कीजिए। [2011, 12, 13, 17]
या
मानवीय आपदा का क्या तात्पर्य है? किसी एक मानवीय आपदा से बचने के लिए चार सुझाव दीजिए। [2015]
या
मानवकृत आपदा का क्या अभिप्राय है? ग्रीसहाउस के दो प्रभाव लिखिए। [2015]
Answer: आपदा एक प्राकृतिक या मानव-जनित भयानक घटना या संकट को कहते हैं जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य को शारीरिक चोट, मृत्यु और धन-संपत्ति, जीविका व पर्यावरण की हानि का दुःखद सामना करना पड़ता है। मानवकृत आपदाएँ मनुष्य की गलतियों और बुरे कामों का नतीजा होती हैं। मानवकृत दो आपदाओं का वर्णन इस प्रकार है:
(1) **ओजोन क्षरण**
ओजोन परत ऑक्सीजन का एक रूप है जो समतापमंडल में सूर्य की पराबैंगनी किरणों से बनती है। यह पृथ्वी को हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाती है। CFC (क्लोरो-फ्लोरो कार्बन) जैसे रसायनों के कारण यह परत पतली हो रही है, जिसे ओजोन क्षरण कहते हैं। इससे त्वचा कैंसर, आँखों की समस्याएँ और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो सकती है। इसे रोकने के लिए प्रदूषण नियंत्रण और CFCs का उपयोग कम करना आवश्यक है।
(2) **हरितगृह प्रभाव (Greenhouse Effect)**
हरितगृह एक ऐसा घर होता है जो काँच का बना होता है। यह गर्मी को अंदर तो आने देता है लेकिन बाहर नहीं जाने देता। पृथ्वी सूर्य से सीधे ऊर्जा प्राप्त करती है, लेकिन वायुमंडल अपनी अधिकांश ऊर्जा पृथ्वी से प्राप्त करता है (पार्थिव विकिरण)। वायुमंडल प्रवेशी छोटी तरंग सौर विकिरण के लिए आमतौर पर पारदर्शी होता है। वास्तव में वायुमंडल काँच के घर की तरह होता है; यह सूर्य के प्रकाश को बाहर से अंदर आने तो देता है लेकिन उस प्रकाश को बाहर जाने नहीं देता। इसी प्रकार, वायुमंडल सौर विकिरण तरंगों को जमीन तक तो आने देता है लेकिन धरातल से होने वाली दीर्घ तरंग पार्थिव विकिरण को बाहर जाने से रोकता है। वायुमंडल के इस प्रभाव को ही हरितगृह प्रभाव कहते हैं।
**हरितगृह प्रभाव के कारण**
हरितगृह प्रभाव को कार्बन डाइऑक्साइड गैस के साथ मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन, जलवाष्प और ओजोन जैसी गैसें भी बढ़ा रही हैं। पिछले 100 वर्षों में वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड गैस में 25% की वृद्धि हुई है। वायुमंडल में इन हरितगृह गैसों की वृद्धि के निम्नलिखित कारण हैं:
* जीवाश्म ईंधन (जैसे-लकड़ी, कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस) के जलने से।
* स्वचालित वाहनों में जीवाश्म ईंधन के दहन से।
* कल-कारखानों और औद्योगिक भट्टियों में ईंधन के जलने से।
* ज्वालामुखी के उद्गार से।
* वनस्पति के सड़ने-गलने से।
* वन-विनाश से।
**हरितगृह प्रभाव के दुष्प्रभाव**
पिछले 100 वर्षों में वैश्विक औसत तापमान में लगभग \(0.3^\circ C\) से \(0.7^\circ C\) की वृद्धि हुई है। वैज्ञानिकों के अनुसार सन् 2050 तक पृथ्वी के औसत तापमान में \(1.5^\circ C\) से \(4.5^\circ C\) बढ़ने की संभावना है। ऐसा होने पर वर्तमान पर्यावरणीय व्यवस्था में वर्षा के पैटर्न में परिवर्तन हो सकता है, बढ़ती गर्मी के कारण अल-नीनो प्रभाव में वृद्धि हो सकती है, ग्लेशियरों की बर्फ पिघल सकती है और ध्रुवों पर जमी बर्फ की चादरों के पिघलने से समुद्र तल एक मीटर ऊँचा हो सकता है तथा तटीय प्रदेश पानी में डूब सकते हैं।
**हरितगृह के दुष्प्रभावों को नियंत्रण में करने के उपाय**
हरितगृह प्रभाव को नियंत्रण में करने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
1. **वृक्षारोपण करना:** वृक्षारोपण से वायुमंडल में मौजूद \(CO_2\) की मात्रा, जो हरितगृह प्रभाव की प्रमुख गैस है, कम हो जाएगी।
2. **फैक्ट्रियों पर नियंत्रण:** फैक्ट्रियों से विभिन्न प्रकार की हानिकारक गैसें निकलती हैं जो वायुमंडल को प्रदूषित तो करती ही हैं, साथ ही हरितगृह प्रभाव में वृद्धि करती हैं। रसायन उद्योगों से निकलने वाली \(CO_2\), \(SO_2\) (कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड) अत्यंत हानिकारक होती हैं।
3. **नाइट्रस ऑक्साइड (\(NO_x\)):** जेट विमानों से निकलने वाली जहरीली गैसें हैं जो हरितगृह प्रभाव को बढ़ावा देती हैं।
4. **CFC गैसों पर रोक:** क्लोरो-फ्लोरो कार्बन, मीथेन (\(CH_4\)) तथा \(CO\) (कार्बन मोनोऑक्साइड) वायुमंडल को प्रदूषित कर हरितगृह प्रभाव में वृद्धि करती हैं तथा इन पर नियंत्रण आवश्यक है।
In simple words: मानवकृत आपदाएँ इंसानों की गलतियों से होती हैं, जैसे ओजोन परत का पतला होना (CFCs के कारण) और ग्रीनहाउस प्रभाव (बढ़ती गैसों के कारण धरती का गर्म होना)। इन्हें रोकने के लिए प्रदूषण कम करना और पेड़ लगाना जरूरी है।
🎯 Exam Tip: मानवीय आपदाओं की परिभाषा देते समय मानवीय गलतियों पर जोर दें। ओजोन क्षरण और हरितगृह प्रभाव जैसी दो आपदाओं के कारण, प्रभाव और नियंत्रण उपायों को स्पष्ट रूप से बताएँ।
Question 8. भूमण्डलीय तापन से आप क्या समझते हैं? इसके दो कारण एवं दो प्रभाव लिखिए। [2014]
Answer:
भूमंडलीय तापन (Global Warming)
पिछले 100 वर्षों में वैश्विक औसत तापमान में लगभग \(0.3^\circ C\) से \(0.7^\circ C\) की वृद्धि हुई है। वैज्ञानिकों के अनुसार सन् 2050 तक पृथ्वी के औसत तापमान में \(1.5^\circ C\) से \(4.5^\circ C\) की बढ़ोत्तरी हो सकती है। वैश्विक औसत तापमान में यह बढ़ोत्तरी ही भूमंडलीय तापन कहलाती है। यह पृथ्वी के पर्यावरण के लिए एक बड़ी चुनौती है।
भूमंडलीय तापन के प्रमुख कारण
भूमंडलीय तापन के दो प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
* जीवाश्म ईंधनों का बिना सोचे-समझे अधिक उपयोग।
* ओजोन छिद्र के कारण भूमंडल पर पहुँचने वाली पराबैंगनी किरणें।
भूमंडलीय तापन के प्रमुख प्रभाव
भूमंडलीय तापन के दो प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं:
* भूमंडलीय तापन के कारण भूमंडल की जलवायु में परिवर्तन हो जाएगा, यानी कहीं अधिक ठंड तो कहीं अधिक गर्मी पड़ेगी, कहीं अधिक वर्षा होगी तो कहीं वर्षा नहीं होगी। जिसके कारण जन-जीवन प्रभावित होगा।
* भूमंडलीय तापन के कारण ग्लेशियर, ध्रुवों तथा पर्वत की चोटियों पर जमी बर्फ पिघल जाएगी जिसके कारण समुद्र तल की ऊँचाई बढ़ जाएगी फलस्वरूप समुद्र तटीय प्रदेश समुद्र में डूब जाएँगे। यह तटीय इलाकों के लिए गंभीर खतरा है।
In simple words: भूमंडलीय तापन का मतलब है पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ना। इसके मुख्य कारण जीवाश्म ईंधन का ज्यादा उपयोग और ओजोन परत के छिद्र से आने वाली पराबैंगनी किरणें हैं। इसके प्रभावों में जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों का पिघलना और समुद्र का स्तर बढ़ना शामिल है।
🎯 Exam Tip: भूमंडलीय तापन को परिभाषित करते समय तापमान वृद्धि की सीमा और समय-सीमा का उल्लेख करें। कारणों और प्रभावों को संक्षिप्त और स्पष्ट बिंदुओं में प्रस्तुत करें।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. भुकम्प की भविष्यवाणी कैसे की जा सकती है?
Answer: भूकंप की भविष्यवाणी निम्नलिखित तरीकों से की जा सकती है:
1. किसी क्षेत्र में हो रही भूगर्भीय गतिविधियों का अनुमान उस क्षेत्र में हो रहे भू-आकृतिक परिवर्तनों से लगाया जा सकता है। ऐसे क्षेत्र जहाँ भूमि ऊपर-नीचे होती रहती है, बहुत अधिक भूस्खलन होते हैं, नदियों के मार्ग में असामान्य परिवर्तन होता है, वे अक्सर भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील होते हैं।
2. किसी क्षेत्र में सक्रिय भ्रंशों, यानी उन दरारों की उपस्थिति जहाँ भूखंड टूटकर विस्थापित हुए हों, को भूकंप का संकेत माना जा सकता है। इस प्रकार के भ्रंशों की गतिविधियों को समय के अनुसार और अन्य उपकरणों से मापा जा सकता है।
3. भूकंप संवेदनशील क्षेत्रों में भूकंपमापी यंत्र (Seismograph) लगाकर विभिन्न भूगर्भीय गतिविधियों को रिकॉर्ड किया जाता है। इस अध्ययन से बड़े भूकंप आने की पूर्व चेतावनी मिल जाती है। भूकंप की शुरुआती अवस्था में दरवाजे, खिड़कियाँ और अन्य खिसकने और घूमने वाली वस्तुओं में कंपन होने लगता है, या वे घूमने लगती हैं। मंदिरों की घंटियाँ भी बजने लगती हैं। हालाँकि भूकंप का पूर्वानुमान अभी भी पूरी तरह संभव नहीं है, फिर भी भूकंप आने से पहले की ऐसी घटनाओं और व्यवहारों के अवलोकन और पहचान में दक्षता प्राप्त कर ली जाए तो भूकंप आने से पहले आवश्यक सावधानियों द्वारा सुरक्षा को बढ़ाया जा सकता है। भूकंप की सटीक भविष्यवाणी करना अभी भी एक चुनौती है, लेकिन इन संकेतों से तैयारी में मदद मिल सकती है।
In simple words: भूकंप की भविष्यवाणी जमीन की हलचल, दरारों के सक्रिय होने और भूकंपमापी यंत्रों से डेटा रिकॉर्ड करके की जा सकती है। दरवाजे, खिड़कियाँ या मंदिरों की घंटियाँ बजने जैसे छोटे संकेत भी भूकंप आने से पहले मिल सकते हैं।
🎯 Exam Tip: भूकंप की भविष्यवाणी के तरीकों को बताते समय भूगर्भीय गतियों, भ्रंशों और सीस्मोग्राफ जैसे वैज्ञानिक उपकरणों पर ध्यान केंद्रित करें। शुरुआती संकेतों का भी उल्लेख करें।
Question 2. भूकम्प आपदा के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों पर प्रकाश डालिए।
Answer: भूकंप आपदा के दौरान निम्नलिखित सावधानियाँ रखनी चाहिए:
* भूकंप के दौरान घबराएँ या डरे नहीं। शांत रहना बहुत जरूरी है।
* जहाँ हैं वहीं रहें लेकिन दीवारों, छतों और दरवाजों से दूर रहें। जितना जल्दी हो सके, मैदान, आँगन आदि खुली जगह में चले जाएँ। यदि खुली जगह में नहीं जा सकें तो मेज या पलंग के नीचे चले जाएँ। इससे आपको गिरने वाली चीजों से बचाव मिलेगा।
* दरारों के टूटने या मलबा गिरने पर गहरी नजर रखें। दीवारों या भारी सामान से दूर रहें तथा आँखों को हाथों से ढककर सुरक्षित कर लें।
* यदि चलती कार में हों तो गाड़ी रोककर बाहर आ जाएँ। भूकंप के दौरान वाहन न चलाएँ तथा पुल या सुरंग भूलकर भी पार न करें, क्योंकि वे असुरक्षित हो सकते हैं।
* बिजली के मुख्य स्विच और गैस का पाइप बंद कर दें और गैस-सिलिंडर सील कर दें। यह आग या गैस लीक होने के खतरे को कम करेगा।
In simple words: भूकंप आने पर शांत रहें, खुली जगह पर जाएँ या मजबूत मेज के नीचे छिप जाएँ। दीवारों और भारी चीजों से दूर रहें, चलती गाड़ी रोक दें और बिजली व गैस बंद कर दें।
🎯 Exam Tip: भूकंप के दौरान सुरक्षा उपायों को लिखते समय "करो" और "मत करो" दोनों तरह की सलाह शामिल करें, जैसे "शांत रहें" और "दीवारों से दूर रहें"।
Question 3. सूखा आपदा निवारण के प्रमुख उपाय लिखिए। [2012]
Answer: सूखा आपदा निवारण के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं:
1. **हरित पट्टियाँ:** सड़क मार्गों के दोनों ओर 5 मीटर की चौड़ाई में हरित पट्टियों का विकास किया जाना चाहिए। हरित पट्टी समय के साथ वर्षा की मात्रा बढ़ाती है और यह वर्षा जल को रिसकर जमीन के नीचे जाने में भी सहायक होती है। इसके परिणामस्वरूप कुओं, तालाबों आदि में जल-स्तर बढ़ जाता है और मानव-उपयोग के लिए अधिक जल उपलब्ध हो जाता है।
2. **जल-संचय:** वर्षा कम होने की स्थिति में पानी की आपूर्ति बनाए रखने के लिए, जल को जमा करके रखना एक समझदारी भरा तरीका है। जल का संचय बांध बनाकर या तालाब बनाकर किया जा सकता है। प्राकृतिक तालाबों का संरक्षण भी एक उत्तम उपाय है। इनमें जल का संचय भूमिगत जल के स्तर को भी बढ़ाता है।
3. **वर्षा-जल का संचय:** वर्षा-जल का ज्यादा से ज्यादा संचय किया जाना चाहिए। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में प्रत्येक गृहस्वामी को वर्षा-जल का संचय अनिवार्य रूप से करना चाहिए। यह जल सिंचाई, पशुओं, मल-निकास आदि से संबंधित कार्यों में उपयोग किया जा सकता है। राजस्थान के एक गाँव ने इसी पद्धति को अपनाकर अपने और आसपास के गाँवों की जल-समस्या को दूर कर दिया है।
4. **नदियों को आपस में जोड़ना:** देश की विभिन्न सतत-बहने वाली नदियों को आपस में जोड़ने से उन क्षेत्रों में भी जल उपलब्ध किया जा सकता है, जहाँ वर्षा की कमी रही हो। भारत सरकार नदियों को जोड़ने की एक महत्वाकांक्षी परियोजना अगस्त, 2005 में शुरू कर चुकी है। यह परियोजना सूखे की समस्या से निपटने में महत्वपूर्ण है।
5. **भूमि का उपयोग:** सूखा संभावित क्षेत्रों में भूमि उपयोग पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है, खासकर हरित पट्टी बनाने के लिए कम से कम 35% भूमि को आरक्षित कर दिया जाना चाहिए और इस भूमि पर अधिक से अधिक वृक्षारोपण किया जाना चाहिए। हरित पट्टी बनाने के लिए वृक्षों और फसलों का चयन विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार करना चाहिए।
In simple words: सूखा रोकने के लिए हरित पट्टियाँ बनानी चाहिए, बारिश का पानी जमा करना चाहिए, नदियों को आपस में जोड़ना चाहिए और जमीन का सही उपयोग करना चाहिए। यह उपाय पानी की कमी को कम करने में मदद करते हैं।
🎯 Exam Tip: सूखा निवारण उपायों को बताते समय पानी के संरक्षण, पुनर्वनीकरण और उचित भूमि उपयोग पर जोर दें। वास्तविक जीवन के उदाहरणों को शामिल करना सहायक हो सकता है।
Question 4. नाभिकीय परमाणु विस्फोट के कारणों का उल्लेख करते हुए इसके निवारण के कोई दो प्रमुख उपाय लिखिए।
Answer: नाभिकीय विस्फोटों के पीछे निम्नलिखित दो मुख्य कारण निहित हैं:
1. **मानवीय भूल, तकनीकी अकुशलता या कुप्रबंधन और अव्यवस्था:** जिसके परिणामस्वरूप परमाणु ईंधन और संयंत्रों में विस्फोट या रेडियोधर्मी पदार्थों के रिसाव के कारण भारी तबाही की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
2. **मानवीय दुष्प्रवृत्तियाँ:** जो राजनीतिक स्वार्थों के कारण उत्पन्न होती हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा राजनीतिक स्वार्थों के कारण ही दूसरे विश्व युद्ध में परमाणु बमों का प्रयोग किया गया था।
नाभिकीय विस्फोट और रिसाव से बचने का सबसे प्रभावशाली तरीका अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इन बमों के निर्माण और प्रयोग पर पूर्ण प्रतिबंध और परमाणु ऊर्जा केंद्रों में पूरी सावधानी रखना हो सकता है। इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा इनके निर्माण तथा प्रयोग पर तुरंत प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से अमेरिका, को मानव कल्याण के लिए पूरी इच्छाशक्ति और ईमानदारी से ऐसे प्रतिबंधों का पालन करना चाहिए। ऊर्जा संयंत्रों से उत्पन्न विकिरण के खतरों को कम करने हेतु निम्नलिखित दो उपाय हैं:
1. **परमाणु ऊर्जा केंद्रों से उत्पन्न कचरे का निस्तारण:** परमाणु ऊर्जा केंद्रों से उत्पन्न कचरे का ऐसा प्रबंधन किया जाना चाहिए जिससे रेडियोधर्मी विकिरण न हो। रेडियोसक्रिय अपशिष्टों तथा उच्चस्तरीय द्रव अवस्था के कचरे को गंधक और पिच के साथ मिश्रित करके ठोस बनाकर स्टील के ड्रमों में सुरक्षित कर उन्हें समुद्र की गहरी खाइयों में ड्रिल किए गए गत में दबाया जा सकता है।
2. **रिएक्टरों के रख-रखाव में पूरी सतर्कता:** रिएक्टरों के रख-रखाव में पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए। समय-समय पर परमाणु संयंत्रों और पाइप लाइनों का निरीक्षण करते रहना चाहिए। जहाँ से गैसों का रिसाव हो सकता है, वहाँ पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। यह सुनिश्चित करना कि सभी उपकरण ठीक से काम कर रहे हैं, दुर्घटनाओं को रोकने में मदद करता है।
In simple words: नाभिकीय विस्फोट मानवीय गलतियों या राजनीतिक स्वार्थों के कारण होते हैं। इन्हें रोकने के लिए परमाणु बमों के निर्माण पर प्रतिबंध लगाना और परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से निकलने वाले कचरे का सही प्रबंधन करना जरूरी है। साथ ही, रिएक्टरों का नियमित निरीक्षण और रख-रखाव भी महत्वपूर्ण है।
🎯 Exam Tip: नाभिकीय आपदाओं के कारणों में मानवीय भूल और राजनीतिक स्वार्थ दोनों का उल्लेख करें। निवारण उपायों में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और कठोर सुरक्षा प्रोटोकॉल पर जोर दें।
Question 5. चक्रवात एवं प्रतिचक्रवात से आप क्या समझते हैं? [2011]
या
चक्रवात से आप क्या समझते हैं? [2010]
Answer:
चक्रवात (समुद्री तूफान)
चक्रवात एक प्रकार की पवनें हैं जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में तेज गति से चलती हैं। यह एक कम दबाव का क्षेत्र होता है जिसमें बाहर से केंद्र की ओर हवाएँ तेज गति से चलती हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में ये हवाएँ घड़ी की सुइयों की विपरीत दिशा में चलती हैं, लेकिन दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों की अनुकूल दिशा में ये पवनें चला करती हैं। यह चक्रवात मौसमी होते हैं, और ये अक्सर गर्मियों के उत्तरार्ध में सक्रिय होते हैं। इनकी उत्पत्ति तापमान के अंतर के कारण होती है। वास्तव में यह तेज गति से चलने वाली विनाशकारी पवनें होती हैं। इनके चलने की दिशा आमतौर पर पश्चिम की ओर होती है और इनकी गति 100 किलोमीटर प्रति घंटे से भी अधिक होती है। समुद्र में तो यह तेज गति से चलती हैं, लेकिन तटों पर पहुँचने पर जमीन से घर्षण होने के फलस्वरूप कमजोर पड़ जाती हैं। विश्व के विभिन्न देशों में इन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है। भारत में इन्हें 'चक्रवात', ऑस्ट्रेलिया में 'विली विलीज', संयुक्त राज्य अमेरिका में 'हरिकेन' तथा चीन में 'टाइफून' कहा जाता है।
प्रतिचक्रवात (Anticyclone)
चक्रवातों के विपरीत प्रतिचक्रवात उच्च वायुदाब के क्षेत्र होते हैं। इन उच्च वायुदाब केंद्रों से वायु का प्रवाह बाहर की ओर होता है। उत्तरी गोलार्द्ध में वायु का प्रवाह घड़ी की सुइयों के अनुरूप और दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों की विपरीत दिशा में होता है। ध्रुवीय क्षेत्रों की उच्च वायुदाब पेटियाँ और उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब क्षेत्र इनकी उत्पत्ति के प्रमुख क्षेत्र हैं। चक्रवातों की अपेक्षा प्रतिचक्रवातों का मौसम संबंधी परिस्थितियों पर कम बुरा प्रभाव पड़ता है। प्रतिचक्रवात वायु के नीचे उतरने के क्षेत्र होते हैं। नीचे उतरती वायु धरातल पर उच्च वायुदाब बनाए रखती है तथा बाहर की ओर फैलती है। सामान्यतया प्रतिचक्रवात स्वच्छ मौसम लाते हैं परंतु यह हमेशा सच नहीं होता है। कभी-कभी विशेष परिस्थितियों में प्रतिचक्रवातों में कपासी तथा कपासी वर्षा मेघों की उत्पत्ति होने से यह धारणा गलत सिद्ध होती है। प्रतिचक्रवात के केंद्र की ओर वायुदाब प्रवणता कमजोर होती है और पवनें हल्की तथा परिवर्तनशील होती हैं। प्रतिचक्रवात आमतौर पर साफ मौसम और कम हवाएँ लाते हैं।
In simple words: चक्रवात कम दबाव वाले क्षेत्र होते हैं जहाँ हवाएँ अंदर की ओर तेजी से घूमती हैं, जिससे तूफान आते हैं। प्रतिचक्रवात उच्च दबाव वाले क्षेत्र होते हैं जहाँ हवाएँ बाहर की ओर चलती हैं, जिससे आमतौर पर साफ मौसम रहता है।
🎯 Exam Tip: चक्रवात और प्रतिचक्रवात के बीच के अंतर को स्पष्ट करने के लिए उनकी वायुमंडलीय दबाव प्रणाली (उच्च/निम्न दबाव) और हवा के घूमने की दिशा (गोलार्द्ध के अनुसार) पर ध्यान दें।
Question 6. भूकम्प से बचाव के उपाय लिखिए।
Answer: भूकंप से बचाव के उपाय-भूकंप एक प्राकृतिक आपदा है जिसे रोक पाना मनुष्य के वश में नहीं है। भूकंप से होने वाली हानि को निम्नलिखित उपायों द्वारा कम अवश्य किया जा सकता है:
1. किसी क्षेत्र में हो रही भूगर्भीय गतिविधियों का अनुमान उस क्षेत्र में हो रहे भू-आकृतिक परिवर्तनों से लगाया जा सकता है। ऐसे क्षेत्र जहाँ भूमि ऊपर-नीचे होती रहती है, बहुत अधिक भूस्खलन होते हैं, नदियों के मार्ग में असामान्य परिवर्तन होता है, वे अक्सर भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील होते हैं।
2. किसी क्षेत्र में सक्रिय भ्रंशों, यानी उन दरारों की उपस्थिति जहाँ भूखंड टूटकर विस्थापित हुए हों, को भूकंप का संकेत माना जा सकता है। इस प्रकार के भ्रंशों की गतिविधियों को समय के अनुसार और अन्य उपकरणों से मापा जा सकता है।
3. भूकंप संवेदनशील क्षेत्रों में भूकंपमापी यंत्र (Seismograph) लगाकर विभिन्न भूगर्भीय गतिविधियों को रिकॉर्ड किया जाता है। इस अध्ययन से बड़े भूकंप आने की पूर्व चेतावनी मिल जाती है।
4. हालाँकि भूकंप का पूर्वानुमान अभी भी पूरी तरह संभव नहीं है, फिर भी बड़े भूकंप आने से पहले कुछ असामान्य प्राकृतिक घटनाएँ तथा जैविक व्यवहार होने लगते हैं। यदि इन घटनाओं और व्यवहारों को देखकर और पहचानकर दक्षता प्राप्त कर ली जाए तो भूकंप आने से पहले आवश्यक सावधानियों द्वारा सुरक्षा को बढ़ाया जा सकता है।
5. मनुष्य से अधिक संवेदनशील प्राणी; जैसे-कुत्ते, बिल्लियाँ, गाय, चमगादड़ आदि तथा कुछ अन्य जानवर अचानक उत्तेजित होकर असामान्य व्यवहार करने लगते हैं, जिसे पहचाना जा सकता है। इस असामान्य व्यवहार का कारण संभवतः भूकंप आने से पहले पृथ्वी की कमजोर सतहों से निकलने वाली ऊर्जा और विभिन्न प्रकार की गैसें हैं। इनको आधुनिक उपकरणों द्वारा रिकॉर्ड किया जा सकता है।
6. जलीय स्रोतों का पानी गंदा अथवा मटमैला होने लगता है। रुके हुए पानी के गड्ढों की सतह में मौजूद कीचड़ में सूक्ष्म मोड़ पड़ने लगते हैं।
7. भूकंप आने से पहले पृथ्वी की रेडियोधर्मिता में हुई असामान्य वृद्धि से गैसों के निकलने के कारण वातावरण में अचानक परिवर्तन; जैसे-हवा का शांत हो जाना, तेज आँधी या तूफान आना आदि; महसूस किए जाते हैं।
8. भूकंप की शुरुआती अवस्था में दरवाजे, खिड़कियाँ और अन्य खिसकने और घूमने वाली वस्तुओं में कंपन होने लगता है या वे घूमने लगती हैं। मंदिरों की घंटियाँ भी बजने लगती हैं। इसलिए, उपर्युक्त लक्षणों की पहचान हो जाने पर भूकंप से बचने की तैयारी शुरू कर लेनी चाहिए, जिससे होने वाली क्षति को कम किया जा सके।
In simple words: भूकंप से बचाव के लिए भूगर्भीय संकेतों, सीस्मोग्राफ डेटा और जानवरों के असामान्य व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा, भूकंप के शुरुआती संकेतों जैसे दरवाजे का हिलना-डुलना को पहचानकर तुरंत सुरक्षा के उपाय अपनाने चाहिए।
🎯 Exam Tip: भूकंप से बचाव के उपायों को बताते समय वैज्ञानिक निगरानी (सीस्मोग्राफ), पर्यावरणीय संकेतों (जानवरों का व्यवहार, गैस रिसाव) और संरचनात्मक सुरक्षा जैसे बिंदुओं को शामिल करें।
Question 7. भारत के प्रमुख सूखाग्रस्त क्षेत्रों के नाम लिखिए तथा सूखा पड़ने के प्रमुख कारणों की व्याख्या कीजिए।
Answer: भारत में सूखा प्रभावित क्षेत्र को निम्नलिखित प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है:
1. **मरुस्थलीय क्षेत्र:** भारत में राजस्थान का शुष्क मरुस्थलीय तथा अर्ध-शुष्क क्षेत्र अत्यधिक सूखे के प्रकोप का सामना करता है। यहाँ हर दो या तीन वर्षों के अंतराल पर भयंकर सूखा पड़ता रहता है।
2. **गुजरात, पंजाब तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश:** इन क्षेत्रों में अक्सर तीन वर्ष बाद सूखा पड़ता रहता है। पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खेती के लिए भूमिगत जल के अत्यधिक उपयोग के कारण अब अधिकतर सूखे की समस्या बनी रहती है।
3. **तमिलनाडु, रायलसीमा तथा तेलंगाना क्षेत्र:** इन क्षेत्रों में दो से ढाई वर्ष के अंतराल पर सूखे का संकट झेलना पड़ता है। इसलिए, इन क्षेत्रों को सूखाग्रस्त क्षेत्रों के अंतर्गत रखा जाता है।
4. **पूर्वी उत्तर प्रदेश, दक्षिणी मैसूर एवं विदर्भ क्षेत्र:** इन क्षेत्रों में आमतौर पर चार या इससे अधिक वर्षों में सूखे का सामना करना पड़ता है। इन क्षेत्रों को मध्यम सूखाग्रस्त क्षेत्र कहा जाता है।
5. **पश्चिम बंगाल, पूर्वी तटीय प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र तथा मध्य प्रदेश:** इन क्षेत्रों में औसतन पाँच वर्ष या इससे अधिक समय में सूखे का संकट झेलना पड़ता है। इन क्षेत्रों के विस्तार में कभी-कभी बिहार और झारखंड भी शामिल हो जाते हैं। ये क्षेत्र निम्न सूखाग्रस्त क्षेत्रों के अंतर्गत माने जाते हैं।
सूखा पड़ने के प्रमुख कारण
सूखे के प्रमुख कारण वही हैं जो विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 4 में बताए गए हैं। संक्षेप में, ये कारण शामिल हैं: अधिक चराई और वनों की कटाई, ग्लोबल वार्मिंग, कृषि के लिए भूमि का अत्यधिक उपयोग, वर्षा का असमान वितरण, जलचक्र में बाधाएँ, भूमिगत जल का अधिक दोहन, नदी मार्गों में परिवर्तन, खनन कार्य और मिट्टी के खराब संगठन। ये सभी कारक सूखे की स्थिति को बढ़ाते हैं।
In simple words: भारत में राजस्थान, गुजरात, पंजाब, तमिलनाडु, पूर्वी उत्तर प्रदेश, और पश्चिमी बंगाल जैसे क्षेत्र सूखे से प्रभावित हैं। सूखे के मुख्य कारण जंगलों की कटाई, ग्लोबल वार्मिंग, पानी का गलत इस्तेमाल और बारिश की कमी है।
🎯 Exam Tip: सूखाग्रस्त क्षेत्रों को बताते समय भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों का उल्लेख करें। कारणों को संक्षिप्त में सूचीबद्ध करें, और चाहें तो अधिक विवरण के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्नों का संदर्भ दे सकते हैं।
Question 8. बाढ़ प्रकोप के कारणों की व्याख्या कीजिए।
Answer: बाढ़ प्राकृतिक और मानवीय दोनों कारकों का परिणाम है। प्राकृतिक कारकों में लंबी अवधि तक उच्च तीव्रता वाली वर्षा, नदियों के घुमावदार मोड़ व स्वाभाविक अवरोध, भूस्खलन आदि प्रमुख हैं, तो मानवीय कारकों में शहरीकरण, नदियों पर बांधों का निर्माण, पुलों व जलभंडारों का निर्माण, अत्यधिक वन-विनाश आदि प्रमुख हैं। भारत में बाढ़ आपदा के लिए निम्नलिखित कारक जिम्मेदार हैं:
1. **लगातार भारी वर्षा:** जब किसी क्षेत्र में लगातार भारी वर्षा होती है तो वर्षा का जल धाराओं के रूप में मुख्य नदी में मिल जाता है। यह जल नदी के तटबंधों को तोड़कर आस-पास के क्षेत्रों को जलमग्न कर देता है। भारी मानसूनी वर्षा तथा चक्रवातीय वर्षा बाढ़ों के प्रमुख कारण हैं।
2. **भूस्खलन:** भूस्खलन भी कभी-कभी बाढ़ों का कारण बनते हैं; क्योंकि इसके कारण नदी का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। परिणामस्वरूप नदी का जल-मार्ग बदलकर आस-पास के क्षेत्रों को जलमग्न कर देता है। इस प्रकार की बाढ़ का वेग इतना तेज होता है कि यह बड़ी से बड़ी बस्ती को भी अस्तित्वहीन कर देता है।
3. **वन-विनाश:** वन पानी के वेग को कम करते हैं। नदी के ऊपरी भागों में बड़ी संख्या में वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से भी बाढ़ें आती हैं। हिमालय में बड़े पैमाने पर वनों का विनाश ही हिमालयी नदियों में बाढ़ का मुख्य कारण है। वन-रहित भूमि पर वर्षा का जल तेजी से बहता है, जिससे भूमि का कटाव अधिक होता है। इससे नदियों में अधिक मात्रा में गाद जमा होती है और नदियों का तल उथला होता जा रहा है।
In simple words: बाढ़ भारी बारिश, भूस्खलन और वनों की कटाई के कारण आती है। मानव गतिविधियाँ जैसे शहरीकरण और नदियों पर बांध बनाना भी बाढ़ का कारण बनते हैं। यह पानी के बहाव को रोककर आस-पास के इलाकों को डुबो देता है।
🎯 Exam Tip: बाढ़ के कारणों को बताते समय प्राकृतिक (वर्षा, भूस्खलन) और मानवीय (वन-विनाश, शहरीकरण) दोनों कारकों को स्पष्ट रूप से अलग-अलग करें। प्रभाव को संक्षिप्त और प्रभावशाली शब्दों में व्यक्त करें।
Question 9. सूनामी लहरों से बचाव के उपाय लिखिए।
Answer: यदि आप ऐसे तटवर्ती क्षेत्र में रहते हैं जहाँ सूनामी आने का खतरा है, तो आपको अपनी सुरक्षा के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:
- समुद्र तट के पास घर न बनाएँ और न ही किसी तटवर्ती बस्ती में रहें। यदि तट के पास रहना ज़रूरी हो, तो घर को बहुत ऊँची जगह पर बनाएँ। घर बनवाते समय एक विशेषज्ञ की सलाह लें और उसे सूनामी-रोधी बनाएँ।
- तटीय ज्वार जाली बनाकर सूनामी को तट के करीब रोका जा सकता है। हालाँकि, गहरे समुद्र में इसका उपयोग नहीं किया जा सकता। ज्वार जाली तट को प्राकृतिक लहरों से बचाती है।
- सूनामी की चेतावनी को कभी भी हल्के में न लें। यदि आप सूनामी से प्रभावित क्षेत्र में रहते हैं, तो समुद्र तट से दूर किसी सुरक्षित, ऊँची जगह पर चले जाएँ।
- यदि आप सूनामी चेतावनी के समय समुद्र में किसी नाव पर हों, तो किनारे पर लौटने के बजाय खुले समुद्र की ओर निकल जाएँ, क्योंकि सूनामी का सबसे ज़्यादा असर किनारों पर ही होता है।
- यदि ऊँची इमारतें मज़बूत कंक्रीट की बनी हों, तो ख़तरे के समय उनकी सबसे ऊपर की मंज़िल को सुरक्षित जगह के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
- पानी के साथ घर में घुसे ज़हरीले जीव-जंतुओं और साँपों से सावधान रहें। मलबा हटाने के लिए सही उपकरणों का उपयोग करें।
In simple words: सूनामी से बचने के लिए तट के पास घर न बनाएँ, चेतावनी पर ध्यान दें, ऊँची जगह पर जाएँ और सुरक्षित रहें।
🎯 Exam Tip: जब आपदाओं से बचाव के उपाय पूछे जाएँ, तो उन्हें बिन्दुवार (point-wise) लिखें ताकि उत्तर स्पष्ट और समझने में आसान हो।
Question 10. रासायनिक एवं विस्फोटजनित आपदाओं के कारणों की व्याख्या कीजिए।
Answer: रासायनिक और औद्योगिक विस्फोटों से होने वाली आपदाओं के मुख्य कारण इस प्रकार हैं:
- उद्योगों का सही योजना के बिना विकास करना।
- उचित प्रबंधन और सुरक्षा के उपाय न अपनाना, साथ ही इंसानी गलतियाँ और तकनीकी जानकारी की कमी।
- प्रबंधकों द्वारा तय किए गए सुरक्षा मानकों की अनदेखी करना।
- औद्योगिक क्षेत्रों का आबादी वाले इलाकों के पास स्थापित होना।
- जोखिम भरे औद्योगिक क्षेत्रों के बारे में आम जनता को जानकारी न होना।
इन मुख्य कारणों के अलावा, कभी-कभी इस तरह की दुर्घटनाएँ कुछ प्राकृतिक कारणों, जैसे- बाढ़, भूकंप या आग लगने के कारण भी हो सकती हैं। रासायनिक उद्योगों में सुरक्षा के नियमों का पालन करना बहुत ज़रूरी होता है।
In simple words: रासायनिक आपदाएँ गलत योजना, खराब प्रबंधन, इंसानी गलतियों और सुरक्षा नियमों की अनदेखी से होती हैं। कभी-कभी प्राकृतिक घटनाएँ भी इसमें शामिल हो जाती हैं।
🎯 Exam Tip: रासायनिक आपदाओं के कारणों को लिखते समय मानवीय लापरवाही और औद्योगिक सुरक्षा की कमी पर ध्यान दें।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. प्राकृतिक आपदा क्या है? किन्हीं दो प्राकृतिक आपदाओं का उल्लेख कीजिए। [2013, 14]
Answer: प्राकृतिक आपदा उसे कहते हैं जो प्राकृतिक कारणों से या प्रकृति में बड़े बदलावों के कारण पैदा होती है और इससे बड़ा संकट आता है। इसके दो उदाहरण भूकंप और सूनामी हैं। यह प्रकृति के संतुलन में गड़बड़ी के कारण होती है।
In simple words: प्राकृतिक आपदा प्रकृति में बदलाव या प्राकृतिक कारणों से आने वाले बड़े संकट को कहते हैं, जैसे भूकंप या सूनामी।
🎯 Exam Tip: प्राकृतिक आपदा की परिभाषा में 'प्राकृतिक कारण' शब्द का उपयोग ज़रूर करें और उदाहरण भी दें।
Question 2. भूकम्प की उत्पत्ति के प्रमुख कारण क्या हैं ?
Answer: भूकंप आने के मुख्य कारण इस प्रकार हैं:
- ज्वालामुखी का फटना,
- पृथ्वी के संतुलन में गड़बड़ी,
- पानी का अत्यधिक भार,
- पृथ्वी की ऊपरी परत का सिकुड़ना,
- भू-प्लेटों का खिसकना,
- और धरती के संसाधनों का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल।
ये सभी कारण धरती के अंदर होने वाली हलचलों से जुड़े हैं।
In simple words: भूकंप ज्वालामुखी, पृथ्वी के असंतुलन, पानी के भार, परत के सिकुड़ने, प्लेटों के खिसकने और बहुत ज़्यादा संसाधन इस्तेमाल करने से आता है।
🎯 Exam Tip: भूकंप के कारण बताते समय पृथ्वी की आंतरिक संरचना और प्लेटों की गति से संबंधित बिंदुओं को शामिल करें।
Question 3. ज्वालामुखी प्रक्रिया क्या है ?
Answer: ज्वालामुखी फटने की प्रक्रिया भूकंप की तरह बहुत तेज़ी से और अचानक होती है, जिससे ज़मीन पर बड़ा नुकसान होता है। इसमें धरती के अंदर से बहुत ज़्यादा गर्म लावा, गैस और राख तेज़ी से फटकर बाहर निकलते हैं। यह प्रक्रिया बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान करती है।
In simple words: ज्वालामुखी फटने पर धरती के अंदर से गर्म लावा, गैस और राख अचानक बाहर निकलते हैं, जिससे बहुत नुकसान होता है।
🎯 Exam Tip: ज्वालामुखी प्रक्रिया का वर्णन करते समय 'लावा', 'गैस', 'राख' और 'विस्फोट' जैसे मुख्य शब्दों का प्रयोग करें।
Question 4. भूस्खलन किसे कहते हैं ?
Answer: जब ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा या उसके टूटे हुए टुकड़े खिसककर नीचे गिर जाते हैं, तो इसे भूस्खलन कहते हैं। यह अक्सर बारिश या भूकंप जैसी घटनाओं से होता है।
In simple words: ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा जब खिसककर नीचे गिर जाता है, तो उसे भूस्खलन कहते हैं।
🎯 Exam Tip: भूस्खलन की परिभाषा में 'भूमि का खिसकना' या 'गिरना' जैसे शब्दों पर ज़ोर दें।
Question 5. बाढ़ प्रकोप के प्रमुख कारण क्या हैं ?
Answer: बाढ़ आने के मुख्य कारण इस प्रकार हैं:
- लगातार बहुत ज़्यादा बारिश होना,
- भूस्खलन से नदियों का रास्ता रुकना,
- जंगलों को काटना (वन-विनाश) जिससे पानी का बहाव तेज़ हो जाता है,
- खराब जल-निकास प्रणाली, जहाँ पानी इकट्ठा हो जाता है,
- और ग्लेशियरों या बर्फ का ज़्यादा पिघलना जिससे नदियों में पानी बढ़ जाता है।
इन कारणों से नदियाँ अपने किनारों को तोड़ देती हैं और आसपास के इलाकों में पानी भर जाता है।
In simple words: बाढ़ भारी बारिश, भूस्खलन, जंगल काटने, खराब जल-निकास और बर्फ पिघलने से आती है।
🎯 Exam Tip: बाढ़ के कारणों को लिखते समय प्राकृतिक और मानवीय दोनों कारकों को शामिल करें।
Question 6. सूनामी किसे कहते हैं ?
या
सूनामी शब्द की व्याख्या कीजिए।
Answer: 'सूनामी' एक जापानी शब्द है जो 'सू' (बंदरगाह) और 'नामी' (लहर) से मिलकर बना है। सूनामी का मतलब होता है 'समुद्री लहरें'। ये समुद्र में भूकंप या ज्वालामुखी फटने से पैदा होने वाली बहुत तेज़ और विशाल लहरें होती हैं जो तट पर बड़ा नुकसान करती हैं।
In simple words: सूनामी जापान का शब्द है जिसका मतलब है 'बंदरगाह की लहरें'। ये समुद्र में भूकंप से उठने वाली बहुत बड़ी और विनाशकारी लहरें होती हैं।
🎯 Exam Tip: सूनामी की परिभाषा में उसके जापानी मूल और 'समुद्री लहरें' या 'भूकंप से उठने वाली लहरें' शब्दों का उपयोग करें।
Question 7. आपदा से क्या तात्पर्य है? [2012, 18]
Answer: आपदा का मतलब एक ऐसी भयानक घटना या संकट है जो प्राकृतिक या इंसान की वजह से होता है। इसके कारण लोगों को चोट लगती है या उनकी मौत हो जाती है, साथ ही संपत्ति, रोज़ी-रोटी और पर्यावरण को भी भारी नुकसान होता है। यह अचानक आती है और बड़े पैमाने पर तबाही मचाती है।
In simple words: आपदा एक भयानक घटना है जो प्राकृतिक या इंसानी कारणों से होती है, जिससे जान-माल का बड़ा नुकसान होता है।
🎯 Exam Tip: आपदा की परिभाषा में 'प्राकृतिक या मानव-जनित' कारण और 'जान-माल का नुकसान' जैसे मुख्य बिन्दुओं को शामिल करें।
Question 8. भूकम्प केन्द्र से क्या अभिप्राय है ?
Answer: भूकंप केंद्र वह जगह होती है जहाँ भूकंप की लहरें सबसे पहले महसूस की जाती हैं, इसे 'अभिकेंद्र' भी कहते हैं। वहीं, धरती के अंदर जिस जगह से भूकंप की लहरें पैदा होती हैं, उसे 'भूकंप मूल' कहते हैं। भूकंप की तीव्रता अभिकेंद्र पर सबसे ज़्यादा होती है।
In simple words: भूकंप केंद्र वह जगह है जहाँ भूकंप की लहरें सबसे पहले ज़मीन पर महसूस होती हैं, और भूकंप मूल वह जगह है जहाँ ये लहरें धरती के अंदर से शुरू होती हैं।
🎯 Exam Tip: भूकंप केंद्र (epicenter) और भूकंप मूल (hypocenter) के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझाएँ।
Question 9. भूस्खलन का एक मानवजनित कारण लिखिए।
Answer: जंगलों की अंधाधुंध कटाई और पहाड़ों पर बड़े बाँध तथा विशाल इमारतें बनाने से पहाड़ों पर दबाव बढ़ता है, जिससे भूस्खलन होता है। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को पकड़े रखती हैं, इसलिए वन-विनाश भूस्खलन का एक बड़ा कारण है।
In simple words: जंगलों को काटना और पहाड़ों पर बहुत बड़े बाँध या इमारतें बनाना भूस्खलन का एक मानवीय कारण है।
🎯 Exam Tip: मानवजनित कारणों में वनों की कटाई और निर्माण कार्यों पर ध्यान दें, क्योंकि ये सीधे तौर पर मिट्टी के कटाव और ढलानों के अस्थिर होने से जुड़े हैं।
Question 10. हरित पट्टी की एक उपयोगिता लिखिए ।
Answer: हरित पट्टी समय के साथ बारिश की मात्रा को बढ़ाती है और बारिश के पानी को ज़मीन के नीचे रिसने में मदद करती है। इससे ज़मीन के अंदर का पानी (भूजल) बढ़ जाता है, जो जीवन के लिए बहुत ज़रूरी है।
In simple words: हरित पट्टी बारिश बढ़ाती है और पानी को ज़मीन में रिसने में मदद करती है, जिससे भूजल का स्तर बढ़ता है।
🎯 Exam Tip: हरित पट्टी के महत्व को बताते समय 'वर्षा जल संचयन' और 'भूजल स्तर में वृद्धि' जैसे बिंदुओं को शामिल करें।
Question 11. अधिक बर्फ पिघलने से बाढ़ कैसे आती है ?
Answer: सामान्य से ज़्यादा बर्फ पिघलना भी बाढ़ का एक कारण है। जब बहुत ज़्यादा बर्फ पिघलती है, तो नदियों में पानी बहुत बढ़ जाता है। इस बढ़े हुए पानी से नदियाँ अपने तटबंधों को तोड़ देती हैं और आसपास के इलाकों में बाढ़ आ जाती है। यह ग्लोबल वार्मिंग का एक सीधा परिणाम है।
In simple words: ज़्यादा बर्फ पिघलने से नदियों में बहुत पानी भर जाता है, जिससे वे टूट जाती हैं और आसपास के इलाकों में बाढ़ आ जाती है।
🎯 Exam Tip: बर्फ पिघलने और बाढ़ के बीच के संबंध को स्पष्ट करते हुए 'नदियों में जल की मात्रा में वृद्धि' और 'तटबंधों का टूटना' जैसे शब्दों का प्रयोग करें।
Question 12. आपदा प्रबन्धन से आप क्या समझते हैं? [2015]
Answer: आपदा प्रबंधन का मतलब है प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले खतरों और नुकसान को कम करने की योजना बनाना और काम करना। इसमें आपदा से पहले तैयारी करना, आपदा के दौरान बचाव कार्य और आपदा के बाद राहत व पुनर्निर्माण शामिल होता है।
In simple words: आपदा प्रबंधन का मतलब है प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए तैयारी और उपाय करना।
🎯 Exam Tip: आपदा प्रबंधन की परिभाषा में 'जोखिम कम करना' और 'नुकसान कम करना' जैसे मुख्य शब्दों का उल्लेख ज़रूर करें।
बहुविकल्पीय
Question 1. प्राकृतिक आपदाएँ होती हैं
(क) जन्तुजनित ।
(ख) मानवजनित
(ग) वनस्पतिजनित
(घ) प्रकृतिजनित
Answer: (घ) प्रकृतिजनित
In simple words: प्राकृतिक आपदाएँ प्रकृति के कारणों से ही उत्पन्न होती हैं, जैसे भूकंप, बाढ़ या तूफान।
🎯 Exam Tip: प्राकृतिक आपदाओं का मूल 'प्रकृति' होती है, इसलिए 'प्रकृतिजनित' विकल्प सही है।
Question 2. निम्नलिखित में कौन-सी प्राकृतिक आपदा नहीं है?
(क) ज्वालामुखी विस्फोट
(ख) जनसंख्या विस्फोट
(ग) बादल विस्फोट
(घ) चक्रवात
Answer: (ख) जनसंख्या विस्फोट
In simple words: जनसंख्या विस्फोट एक मानवीय समस्या है, जबकि अन्य सभी प्राकृतिक रूप से होने वाली आपदाएँ हैं।
🎯 Exam Tip: प्राकृतिक आपदाएँ वे होती हैं जो प्रकृति में होने वाले बदलावों से उत्पन्न होती हैं, जबकि मानवीय गतिविधियाँ मानव-जनित आपदाएँ होती हैं।
Question 3. भू-प्लेटों के खिसकने से क्या होता है?
(क) ज्वालामुखी विस्फोट
(ख) चक्रवात
(ग) बाढ़
(घ) सूखा
Answer: (क) ज्वालामुखी विस्फोट
In simple words: जब पृथ्वी की परत के नीचे की बड़ी चट्टानें (प्लेटें) खिसकती हैं, तो कभी-कभी ज्वालामुखी फटते हैं।
🎯 Exam Tip: भू-प्लेटों के खिसकने से भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट जैसी भूगर्भीय घटनाएँ होती हैं।
Question 4. विश्व में सर्वाधिक भूकम्प कहाँ आते हैं?
(क) जापान
(ख) भारत
(ग) इटली
(घ) सिंगापुर
Answer: (क) जापान
In simple words: जापान में भूकंप सबसे ज़्यादा आते हैं क्योंकि यह कई भूगर्भीय प्लेटों के किनारों पर स्थित है।
🎯 Exam Tip: भूकंप के जोखिम वाले देशों को याद रखें, खासकर वे जो भूगर्भीय प्लेटों की सीमाओं पर स्थित हैं।
Question 5. भूस्खलन से सबसे अधिक प्रभावित कौन-सा क्षेत्र है?
(क) पहाड़ी प्रदेश
(ख) मैदानी भाग
(ग) पठारी प्रदेश
(घ) ये सभी
Answer: (क) पहाड़ी प्रदेश
In simple words: भूस्खलन अक्सर पहाड़ों पर होता है क्योंकि वहाँ की ढलानें और चट्टानें कमज़ोर होती हैं।
🎯 Exam Tip: भूस्खलन के लिए 'पहाड़ी' और 'ढलान' जैसे शब्द महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये ढलान वाले क्षेत्रों में ज़्यादा होता है।
Question 6. अतिवृष्टि द्वारा होने वाली आपदा को क्या कहते हैं?
(क) बाढ़
(ख) सूखा
(ग) भूस्ख लन
(घ) सूनामी
Answer: (क) बाढ़
In simple words: जब बहुत ज़्यादा बारिश होती है, तो उसे अतिवृष्टि कहते हैं, और इससे अक्सर बाढ़ आ जाती है।
🎯 Exam Tip: 'अतिवृष्टि' का मतलब है 'बहुत ज़्यादा बारिश', जिसका सीधा परिणाम 'बाढ़' होता है।
Question 7. अनावृष्टि से होने वाली आपदा को क्या कहते हैं?
(क) चक्रवात
(ख) सूखा
(ग) सूनामी
(घ) आग
Answer: (ख) सूखा
In simple words: अनावृष्टि का मतलब है जब बारिश बहुत कम होती है, जिससे ज़मीन सूख जाती है और सूखा पड़ता है।
🎯 Exam Tip: 'अनावृष्टि' का मतलब है 'बारिश की कमी', जिसका परिणाम 'सूखा' होता है।
Question 8. निम्न गैसों में से किस गैस को 'ग्रीनहाउस गैस' के नाम से जानते हैं?
(क) ओजोन
(ख) कार्बन डाइऑक्साइड
(ग) क्लोरीन
(घ) ऑक्सीजन
Answer: (ख) कार्बन डाइऑक्साइड
In simple words: कार्बन डाइऑक्साइड एक मुख्य ग्रीनहाउस गैस है जो पृथ्वी के तापमान को बढ़ाती है।
🎯 Exam Tip: ग्रीनहाउस गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें शामिल होती हैं जो धरती को गर्म रखती हैं।
Question 9. सागरों में भूकम्प के समय उठने वाली लहरों को क्या कहते हैं?
(क) सूनामी
(ख) चक्रवात
(ग) भूस्खलन
(घ) ज्वार-भाटा
Answer: (क) सूनामी
In simple words: समुद्र में भूकंप आने पर बहुत बड़ी और तेज़ लहरें उठती हैं, जिन्हें सूनामी कहते हैं।
🎯 Exam Tip: सूनामी का सीधा संबंध समुद्र के नीचे होने वाले भूकंपीय गतिविधियों से है।
Question 10. निम्नलिखित में से कौन-सी प्राकृतिक आपदा नहीं है? [2012, 14, 17]
(क) सूखा
(ख) चक्रवात
(ग) रेल दुर्घटना
(घ) सूनामी
Answer: (ग) रेल दुर्घटना
In simple words: रेल दुर्घटना इंसानी गलती या तकनीकी खराबी से होती है, यह प्राकृतिक घटना नहीं है।
🎯 Exam Tip: प्राकृतिक आपदाएँ प्रकृति की देन होती हैं, जबकि मानव-निर्मित आपदाएँ मानवीय गतिविधियों या तकनीकी विफलताओं के कारण होती हैं।
Question 11. निम्नलिखित में से कौन आपदा मानव-निर्मित है? [2013]
(क) भूस्खलन
(ख) भूकम्प
(ग) हरितगृह प्रभाव प्रभाव
(घ) सूनामी लहरें
Answer: (ग) हरितगृह प्रभाव प्रभाव
In simple words: हरितगृह प्रभाव मुख्यतः इंसानों द्वारा छोड़ी गई गैसों से बढ़ता है, इसलिए यह एक मानव-निर्मित समस्या है।
🎯 Exam Tip: मानव-निर्मित आपदाएँ अक्सर प्रदूषण, औद्योगिक गतिविधियों और अनियोजित विकास से संबंधित होती हैं।
Question 12. सूनामी है [2014]
(क) एक नदी
(ख) एक पवन
(ग) एक पर्वत चोटी
(घ) एक प्राकृतिक आपदा
Answer: (घ) एक प्राकृतिक आपदा
In simple words: सूनामी समुद्र में भूकंप या ज्वालामुखी फटने जैसी प्राकृतिक घटनाओं से पैदा होती है।
🎯 Exam Tip: सूनामी हमेशा प्राकृतिक कारणों से ही उत्पन्न होती है, जैसे समुद्र के नीचे भूकंप या ज्वालामुखी विस्फोट।
Question 13. वैश्विक तपन का प्रभाव है [2014]
(क) बाढ़
(ख) सूखा
(ग) चक्रवात
(घ) ये सभी
Answer: (घ) ये सभी
In simple words: वैश्विक तपन के कारण धरती का तापमान बढ़ता है, जिससे बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी आपदाएँ ज़्यादा होने लगती हैं।
🎯 Exam Tip: वैश्विक तपन (ग्लोबल वार्मिंग) से जलवायु परिवर्तन होता है, जिससे कई तरह की प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ जाती हैं।
Question 14. निम्नलिखित में से कौन-सी एक मानवकृत आपदा है? [2016]
(क) भूस्खलन
(ख) भूकम्प
(ग) बाढ़
(घ) बम विस्फोट
Answer: (घ) बम विस्फोट
In simple words: बम विस्फोट इंसानों द्वारा किए गए कार्यों से होता है, इसलिए यह एक मानव-निर्मित आपदा है।
🎯 Exam Tip: मानवकृत आपदाएँ वे होती हैं जो मानवीय गतिविधियों, गलतियों या इरादों से पैदा होती हैं।
Question 15. निम्नलिखित में से कौन-सा क्षेत्र भूस्खलन से अधिक प्रभावित होता है? [2017]
(क) पर्वतीय क्षेत्र
(ख) पठारी क्षेत्र
(ग) मैदानी क्षेत्र
(घ) समुद्रतटीय क्षेत्र
Answer: (क) पर्वतीय क्षेत्र
In simple words: पहाड़ों पर ढलान ज़्यादा होती है और मिट्टी कमज़ोर, जिससे भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
🎯 Exam Tip: भूस्खलन की संभावना उन क्षेत्रों में सबसे ज़्यादा होती है जहाँ खड़ी ढलानें और अस्थिर मिट्टी होती है, जैसे पर्वतीय क्षेत्र।
Question 16. निम्न में से कौन प्राकृतिक आपदा नहीं है? [2017]
(क) सूनामी
(ख) बाढ़
(ग) वैश्विक तापन
(घ) ज्वालामुखी विस्फोट
Answer: (ग) वैश्विक तापन
In simple words: वैश्विक तापन एक प्रक्रिया है जो मानवीय गतिविधियों से होती है, न कि अपने आप होने वाली प्राकृतिक घटना।
🎯 Exam Tip: वैश्विक तापन (ग्लोबल वार्मिंग) एक पर्यावरणीय समस्या है जो मुख्यतः मानवीय गतिविधियों के कारण उत्पन्न होती है, इसलिए इसे प्राकृतिक आपदा नहीं माना जाता।
Question 17. अनावृष्टि से होने वाली आपदा को कहा जाता है [2017]
(क) चक्रवात
(ख) सूनामी
(ग) बाढ़
(घ) सूखा
Answer: (घ) सूखा
In simple words: अनावृष्टि का मतलब है बारिश की कमी, और जब बारिश बहुत कम होती है तो सूखा पड़ जाता है।
🎯 Exam Tip: 'अनावृष्टि' और 'सूखा' का सीधा संबंध है - जहाँ बारिश कम होती है, वहाँ सूखा पड़ता है।
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