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Detailed Chapter 5 क्षन्ती सौख्यम UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit
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Class 10 Sanskrit Chapter 5 क्षन्ती सौख्यम UP Board Solutions PDF
परिचय
Answer: यह पाठ महर्षि व्यास के महाभारत ग्रंथ से लिया गया है। व्यास जी ने संजय को दिव्य दृष्टि दी थी, जिससे संजय ने धृतराष्ट्र को महाभारत युद्ध का पूरा हाल सुनाया। यह पाठ महाभारत के अंत में भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर को दिए गए उपदेश का एक हिस्सा है, जब भीष्म पितामह तीरों की शैय्या पर लेटे थे। इस अंश में क्षमा के गुण का महत्व बताया गया है। क्षमा से ही मनुष्य के जीवन को सही अर्थ मिलता है और यह उसका सबसे बड़ा गुण है। क्षमा एक बहुत शक्तिशाली गुण है जो व्यक्ति को शांति और संतोष देता है।
In simple words: यह पाठ महाभारत से लिया गया है। यह भीष्म पितामह के उपदेशों का हिस्सा है, जहाँ क्षमा का महत्व बताया गया है।
🎯 Exam Tip: किसी भी परिचय को लिखते समय, मुख्य ग्रंथ, उसके लेखक और पाठ के प्रमुख विषय को संक्षेप में बताना महत्वपूर्ण है।
पाठ-सारांश
Answer: युद्धभूमि में तीरों की शैय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को जीवन के नैतिक सिद्धांतों का उपदेश दिया। उन्होंने कहा कि मानव जन्म सभी जन्मों में सबसे अच्छा है। जो व्यक्ति इस जीवन को पाकर भी दूसरों से नफरत करता है, धर्म का सम्मान नहीं करता और वासनाओं में डूबा रहता है, वह खुद को धोखा देता है। इसके उलट, जो व्यक्ति दूसरों के दुख को समझता है, उन्हें सांत्वना देता है, दान करता है और हमेशा मीठी बातें बोलता है, उसे दूसरे लोक में भी सम्मान मिलता है।
क्षमाशील लोग गाली का जवाब गाली से नहीं देते, बल्कि सहनशीलता दिखाते हुए गाली देने वाले को भी माफ कर देते हैं। ऐसा करने पर गाली देने वाले का क्रोध खुद ही उसे जला देता है। जो व्यक्ति संसार के मोह-माया में फंसा रहता है, उसकी बुद्धि और भी ज्यादा विचलित हो जाती है और उसे इस लोक तथा परलोक दोनों में दुख मिलता है। सहिष्णु और क्षमावान लोग कभी घमंड नहीं करते। गुस्सा दिलाने या गाली देने पर भी वे मीठे और प्रेम भरे वचन ही बोलते हैं।
दुख से छुटकारा पाने का एकमात्र तरीका है कि व्यक्ति दुख के बारे में सोचना ही बंद कर दे, क्योंकि चिंता करने से दुख कम नहीं होता, बल्कि बढ़ जाता है। संसार की हर चीज खत्म होने वाली है। जमा की हुई चीजें खत्म होती हैं, ऊंचाइयाँ गिरती हैं, मेल-मिलाप बिछड़ने में बदलता है, और जीवन का अंत मृत्यु है। अपनी इंद्रियों को वश में रखना, क्षमा, धैर्य, तेज, संतोष, सच बोलना, लज्जा, अहिंसा, व्यसनों से दूर रहना और काम में कुशल होना ही सुख के कारण हैं। जो व्यक्ति अपने क्रोध को नियंत्रित करता है, वह सभी मुश्किलों पर आसानी से जीत हासिल कर लेता है। ऐसा व्यक्ति क्रोधी को भी शांत कर सकता है। क्षमाशील और अहंकार से रहित व्यक्ति को संसार की किसी भी चीज का डर नहीं लगता।
In simple words: भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को जीवन के नैतिक नियम सिखाए, जिसमें क्षमा, सहनशीलता और क्रोध पर नियंत्रण का महत्व बताया गया है। उन्होंने कहा कि मानव जीवन अनमोल है और दुख से बचने का रास्ता चिंता न करना और सदाचारी जीवन जीना है।
🎯 Exam Tip: सारांश लिखते समय, सभी मुख्य बिंदुओं को सरल और स्पष्ट भाषा में क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करें, ताकि पाठक को पूरी कहानी का एक संक्षिप्त और सटीक विचार मिल सके।
पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या
(1) यो दुर्लभतरं प्राप्य मानुषं द्विषते नरः । धर्मावमन्ता कामात्मा भवेत् स खलु वञ्चते ॥
Answer: यह श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत' के 'पद्य-खण्ड' 'पद्म-पीयूषम्' के 'क्षान्ति-सौख्यम्' नामक पाठ से लिया गया है। यह संदर्भ इस पाठ के बाकी सभी श्लोकों पर भी लागू होगा। इस श्लोक में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को सलाह देते हैं कि इस संसार में मनुष्य जन्म पाकर व्यक्ति को धर्म का अनादर नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं: \( \text{यः नरः दुर्लभतरं मानुषं (जन्म) प्राप्य द्विषते, धर्मावमन्ता कामात्मा (च) भवेत्, सः खलु (आत्मनं) वञ्चते ।।} \)
इसका अर्थ है, जो मनुष्य दूसरे जन्मों से भी ज्यादा मुश्किल से मिलने वाला मनुष्य जन्म पाकर भी दूसरों से नफरत करता है, धर्म का अनादर करता है और अपनी इच्छाओं में डूबा रहता है, वह निश्चित रूप से खुद को ही धोखा देता है। हमें हमेशा अच्छे काम करने चाहिए।
In simple words: जो मनुष्य सबसे मुश्किल से मिला यह मानव जीवन पाकर भी दूसरों से नफरत करता है, धर्म का अपमान करता है और वासनाओं में लिप्त रहता है, वह खुद को ही ठगता है।
🎯 Exam Tip: श्लोक की व्याख्या करते समय, पहले उसका संदर्भ और प्रसंग बताएं, फिर शब्दार्थ की मदद से उसका सरल हिंदी अर्थ समझाएं।
(2) सान्त्वेनानप्रदानेन प्रियवादेन चाप्युत । समदुःखसुखो भूत्वा स परत्र महीयते ॥ [2013, 14]
Answer: इस श्लोक में भीष्म पितामह बताते हैं कि इस लोक और परलोक में सम्मान पाने के लिए क्या करना चाहिए। श्लोक का अन्वय है: \( \text{सः सान्त्वेन अन्न प्रदानेन उत प्रियवादेन च अपि समदुःखसुखः भूत्वा परत्र महीयते ।} \)
इसका अर्थ है कि वह मनुष्य दूसरों को सांत्वना (तसल्ली देने वाले शब्द) देता है, भोजन का दान करता है या मीठे वचन बोलता है, और सुख-दुख में समान भाव रखता है, उसे दूसरे लोक में सम्मान मिलता है। मतलब, जो व्यक्ति संसार के सभी प्राणियों के कष्टों को दूर करके खुद समभाव में रहता है, उसे दूसरे लोक में भी बहुत इज्जत मिलती है। दूसरों की मदद करने से हमें अंदर से खुशी मिलती है।
In simple words: जो व्यक्ति सांत्वना देता है, अन्न दान करता है, मीठा बोलता है और सुख-दुख में समान रहता है, उसे परलोक में सम्मान मिलता है।
🎯 Exam Tip: नैतिक श्लोकों की व्याख्या करते समय, उसके व्यावहारिक अर्थ और जीवन में उसके महत्व पर जोर दें।
(3) आक्रुश्यमानो नाक्रुश्येन्मन्युरेनं तितिक्षतः । आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं च तितिक्षतः ॥
Answer: इस श्लोक में भीष्म पितामह क्षमाशील व्यक्ति के अच्छे कर्मों के संग्रह के बारे में बताते हैं। श्लोक का अन्वय है: \( \text{आक्रुश्यमानः न आक्रुश्येत् । तितिक्षतः मन्युः एनम् आक्रोष्टारं निर्दहति, तितिक्षतः च सुकृतम् (भवति)।} \)
इसका मतलब है कि दूसरों द्वारा गाली दिए जाने पर भी व्यक्ति को बदले में गाली नहीं देनी चाहिए। जो व्यक्ति गाली को सहन कर लेता है (क्षमा कर देता है), उसका क्रोध उस गाली देने वाले को पूरी तरह जला देता है और क्षमा करने वाले का पुण्य बढ़ता है। इसलिए, गाली देने वाला व्यक्ति खुद ही नष्ट हो जाता है और गाली सहन करने वाले को पुण्य मिलता है। क्षमा करने से व्यक्ति का मन शांत रहता है।
In simple words: गाली दिए जाने पर भी गाली नहीं देनी चाहिए। जो सहन करता है, उसका क्रोध गाली देने वाले को जला देता है और सहन करने वाले को पुण्य मिलता है।
🎯 Exam Tip: श्लोक में दिए गए कठिन शब्दों का अर्थ स्पष्ट करने से व्याख्या और भी सरल हो जाती है।
(4) सक्तस्य बुद्धिश्चलति मोहजालविवर्धिनी । मोहजालावृतो दुःखमिह चामुत्र चाश्नुते ॥
Answer: इस श्लोक में भीष्म पितामह सुख-दुख पाने के कारणों पर प्रकाश डालते हैं। श्लोक का अन्वय है: \( \text{सक्तस्य मोहजालविवर्धिनी बुद्धिः चलति । मोहजालावृतः (सह) इह च अमुत्र च दुःखम् अश्नुते ।} \)
इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति संसार से बहुत लगाव रखता है, उसकी बुद्धि मोह-माया के जाल को बढ़ाने वाली होती है और वह चंचल रहती है, यानी भटकती रहती है। मोह-माया के जाल में फंसा हुआ व्यक्ति इस लोक में और परलोक दोनों में दुख पाता है। इसलिए, सुख चाहने वाले व्यक्ति को संसार में आसक्त नहीं होना चाहिए। मोह-माया से दूरी बनाए रखने से मन को शांति मिलती है।
In simple words: संसार से बहुत लगाव रखने वाले व्यक्ति की बुद्धि मोह-माया के जाल में फंसकर भटकती रहती है, और उसे इस लोक तथा परलोक दोनों में दुख मिलता है।
🎯 Exam Tip: श्लोक में 'इह' और 'अमुत्र' जैसे शब्दों के अर्थ को स्पष्ट रूप से समझाएं, ताकि उनका महत्व साफ हो।
(5) अतिवादस्तितिक्षेत नाभिमन्येत कञ्चन । क्रोध्यमानः प्रियं ब्रूयादाक्रुष्टः कुशलं वदेत् ॥
Answer: इस श्लोक में सज्जन लोगों के स्वभाव का वर्णन किया गया है। श्लोक का अन्वय है: \( \text{अतिवादान् तितिक्षेत । कञ्चन न अभिमन्येत । क्रोध्यमानः प्रियं ब्रूयात् । आक्रुष्टः कुशलं वदेत् ।।} \)
इसका अर्थ है कि सज्जन लोगों को कड़वे वचनों को सहन करना चाहिए। उन्हें किसी के प्रति घमंड नहीं दिखाना चाहिए, यानी खुद को बड़ा और दूसरों को छोटा मानकर व्यवहार नहीं करना चाहिए। क्रोध दिलाने पर भी उन्हें प्रिय वचन बोलने चाहिए, यानी दूसरों द्वारा उकसाए जाने पर भी मीठी बातें ही बोलनी चाहिए। गाली दिए जाने पर भी हितकर वचन बोलने चाहिए। हमेशा दूसरों के प्रति विनम्र रहना चाहिए।
In simple words: सज्जनों को कड़वे वचन सहन करने चाहिए, घमंड नहीं करना चाहिए, और गुस्सा दिलाने या गाली दिए जाने पर भी मीठी और हितकर बातें बोलनी चाहिए।
🎯 Exam Tip: इस तरह के उपदेशात्मक श्लोकों में, बताए गए गुणों के महत्व और उनके सकारात्मक प्रभावों को विस्तार से समझाएं।
(6) भैषज्यमेतद् दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तयेत् । चिन्त्यमानं हि नव्येति भूयश्चापि प्रवर्धते ॥ [2007]
Answer: इस श्लोक में दुख दूर करने के उपाय के बारे में बताया गया है। श्लोक का अन्वय है: \( \text{एतद् दुःखस्य भैषज्यम् (अस्ति) यत् एतत् न अनुचिन्तयेत् हि चिन्त्यमानम् (दुःखम्) न व्येति, भूयः च अपि प्रवर्धते ।।} \)
इसका अर्थ है कि दुख की दवा यह है कि उसके बारे में चिंता नहीं करनी चाहिए। क्योंकि चिंता करने से दुख कम नहीं होता, बल्कि और बढ़ जाता है। इसका मतलब है कि दुख को भूलने की कोशिश करनी चाहिए। दुख को कम करने का सबसे अच्छा तरीका सकारात्मक सोच रखना है।
In simple words: दुख की दवा यह है कि उसके बारे में सोचना बंद कर दें, क्योंकि चिंता करने से दुख कम नहीं होता, बल्कि बढ़ जाता है।
🎯 Exam Tip: जब कोई श्लोक किसी समस्या का समाधान बताता हो, तो उस समाधान की गहराई और प्रभाव को स्पष्ट करें।
(7) सर्वे क्षयान्ताः निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्याः । संयोगाः विप्रयोगान्ताः मरणान्तं हि जीवितम् ॥ [2009, 10]
Answer: इस श्लोक में जीवन में सुख-दुख से जुड़ी स्थितियों और उनके अंत के बारे में बताया गया है। श्लोक का अन्वय है: \( \text{सर्वे निचयाः क्षयान्ताः (सन्ति); (सर्वे) समुच्छ्रयाः पतनान्ताः (सन्ति) । (सर्वे) संयोगाः विप्रयोगान्ताः (सन्ति) । (सर्वेषां) जीवितं हि मरणान्तम् (अस्ति)।} \)
इसका अर्थ है कि सभी संग्रह आखिर में खत्म हो जाते हैं, यानी नष्ट हो जाते हैं। सभी ऊँचाइयाँ आखिर में गिर जाती हैं, यानी पतन को प्राप्त हो जाती हैं। सभी मेल-मिलाप आखिर में बिछड़ जाते हैं, और सभी जीवन का अंत निश्चित रूप से मृत्यु में होता है। इसका मतलब है कि सभी जीवधारियों का अंत मृत्यु है। इसलिए जब सब कुछ एक दिन खत्म ही हो जाना है, तो व्यक्ति को गलत काम नहीं करने चाहिए। यह जीवन की सच्चाई को दर्शाता है।
In simple words: सभी जमा चीजें खत्म हो जाती हैं, सभी ऊँचाइयाँ गिर जाती हैं, सभी मेल-मिलाप बिछड़ जाते हैं, और जीवन का अंत हमेशा मृत्यु होता है।
🎯 Exam Tip: जीवन की क्षणभंगुरता से जुड़े श्लोकों में, नश्वरता के संदेश और उससे जुड़ी शिक्षा को सरल शब्दों में बताएं।
(8) दमः क्षमा धृतिस्तेजः सन्तोषः सत्यवादिता ।। ह्रीरहिंसाऽव्यसनिता दाक्ष्यं चेति सुखावहाः ॥ [2008, 13]
Answer: इस श्लोक में मानव-जीवन को सुखी बनाने वाले गुणों पर प्रकाश डाला गया है। श्लोक का अन्वय है: \( \text{दमः, क्षमा, धृतिः, तेजः, सन्तोषः, सत्यवादिता, ह्रीः, अहिंसा, अव्यसनिता दाक्ष्यम् च-इति (दश गुणाः) सुखावहाः (सन्ति)।} \)
इसका अर्थ है कि मन और इंद्रियों को वश में रखना, क्षमा, धैर्य, तेज, संतोष, सच बोलना, लज्जा, किसी को नुकसान न पहुंचाना, बुरी आदतों से दूर रहना और काम में कुशल होना- ये दस गुण सुख देने वाले हैं। इसका मतलब है कि इन गुणों से युक्त व्यक्ति कभी दुखी नहीं होता। ये गुण व्यक्ति को मानसिक शांति देते हैं।
In simple words: अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण, क्षमा, धैर्य, संतोष, सच, लज्जा, अहिंसा, बुरी आदतों से दूरी और कार्य कुशलता- ये दस गुण हमें सुख देते हैं।
🎯 Exam Tip: गुणों की सूची वाले श्लोकों में, प्रत्येक गुण का अर्थ और उसके महत्व को स्पष्ट रूप से समझाएं।
(9) ये क्रोधं सन्नियच्छन्ति क्रुद्धान् संशमयन्ति च । न कुप्यन्ति च भूतानां दुर्गाण्यति तरन्ति ते ॥
Answer: इस श्लोक में क्रोध पर नियंत्रण करने का संदेश दिया गया है। श्लोक का अन्वय है: \( \text{ये क्रोधं सन्नियच्छन्ति, क्रुद्धान् च संशमयन्ति, भूतानां च न कुप्यन्ति, ते दुर्गाणि अतितरन्ति।} \)
इसका अर्थ है कि जो लोग क्रोध को वश में रखते हैं, क्रोधित लोगों को शांत करते हैं और प्राणियों पर क्रोध नहीं करते हैं, वे बड़ी कठिनाइयों, यानी विषम परिस्थितियों को पार कर लेते हैं। इसका मतलब है कि क्रोध सबसे बड़ा दुश्मन है। हमें उसे अपने से दूर रखना चाहिए। क्रोध को नियंत्रित करना शांति की कुंजी है।
In simple words: जो लोग क्रोध को नियंत्रित करते हैं, क्रोधितों को शांत करते हैं, और प्राणियों पर गुस्सा नहीं करते, वे सभी मुश्किलों को पार कर लेते हैं।
🎯 Exam Tip: क्रोध नियंत्रण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर आधारित श्लोकों में, उसके प्रभावों और लाभों को उदाहरणों के साथ समझाएं।
(10) अभयं यस्य भूतेभ्यो भूतानामभयं यतः । तस्य देहाविमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ॥ [2006,09,14]
Answer: इस श्लोक में भय से मुक्ति पाने का तरीका बताया गया है। श्लोक का अन्वय है: \( \text{यस्य भूतेभ्यः अभयम् (अस्ति), यतः भूतानाम् अभयम् (अस्ति) । देहाद् विमुक्तस्य तस्य कुतश्चन भयं न अस्ति।।} \)
इसका अर्थ है कि जिसे प्राणियों से कोई डर नहीं है, और जिससे प्राणियों को कोई डर नहीं है, जो शरीर से मुक्ति प्राप्त कर चुका है, यानी अहंकार से रहित है, उस व्यक्ति को कहीं से भी कोई डर नहीं लगता। ऐसे व्यक्ति को सच्ची शांति मिलती है।
In simple words: जिसे प्राणियों से डर नहीं लगता और जिससे प्राणियों को भी डर नहीं लगता, और जो अहंकार से मुक्त है, उसे कहीं से कोई डर नहीं होता।
🎯 Exam Tip: भयमुक्ति के श्लोकों में, निडरता के मूल कारण (जैसे अहंकार का त्याग) को स्पष्ट रूप से समझाएं।
सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या
(1) यो दुर्लभतरं प्राप्य मानुषं द्विषते नरः । [2009]
Answer: यह सूक्तिपरक पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत' के 'पद्य-खण्ड' 'पद्म-पीयूषम्' के 'क्षान्ति-सौख्यम्' पाठ से ली गई है। यह संदर्भ इस पाठ की बाकी सभी सूक्तियों पर भी लागू होगा। इस सूक्ति में मनुष्य जन्म को दुर्लभ बताने के साथ-साथ द्वेषरहित होने की आवश्यकता भी बताई गई है।
इसका सीधा अर्थ है: जो मनुष्य सबसे दुर्लभ मानव जीवन को प्राप्त करके दूसरों से नफरत करता है, वह खुद को ही धोखा देता है।
भारतीय ग्रंथों के अनुसार, सभी जीवधारियों की चौरासी लाख (84,00,000) योनियाँ मानी गई हैं, जिनमें अंडे से पैदा होने वाले, पसीने से पैदा होने वाले, पौधों से पैदा होने वाले और गर्भ से पैदा होने वाले- ये चार मुख्य प्रकार हैं। इन सभी योनियों में मनुष्य जन्म को सबसे दुर्लभ माना गया है। इस दुर्लभ जन्म को प्राप्त करके व्यक्ति को द्वेष से मुक्त रहना चाहिए। द्वेष व्यक्ति का एक बहुत ही सामान्य दुर्गुण है। इसीलिए, अत्यधिक दुर्लभ मानव शरीर प्राप्त करने वाला व्यक्ति यदि लोगों से द्वेष करता रहे और अपने कर्तव्यों पर ध्यान न दे, तो ऐसा जीवन व्यर्थ है, क्योंकि ऐसा व्यक्ति स्वयं को ही धोखा देता है। हमें हमेशा सभी से प्रेम करना चाहिए।
In simple words: सबसे दुर्लभ मनुष्य जन्म पाकर भी जो दूसरों से नफरत करता है, वह खुद को ही धोखा दे रहा है, क्योंकि यह जीवन अनमोल है।
🎯 Exam Tip: सूक्तियों की व्याख्या करते समय, उसके शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ गहरे भाव और व्यावहारिक सीख को भी स्पष्ट करें।
(2) धर्मावमन्ता कामात्मा भवेत् स खलु वञ्चते । [2006]
Answer: इस सूक्ति में कामनाओं में डूबे रहने वाले और धर्म की निंदा करने वाले व्यक्ति की स्थिति पर प्रकाश डाला गया है।
इसका सीधा अर्थ है: धर्म का अनादर करने वाला और अपनी इच्छाओं में डूबा रहने वाला व्यक्ति स्वयं को ही धोखा देता है।
जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं या कामनाओं में फंसा रहता है और धर्म की उपेक्षा करता है, उसका अनादर करता है, वह ऐसा करके किसी दूसरे का नुकसान नहीं करता, बल्कि अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है, यानी अपना ही नुकसान करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि धर्म व्यक्ति में सही-गलत और उचित-अनुचित का विवेक जगाता है। इससे व्यक्ति बुरे कर्मों से दूर रहता है और हमेशा अच्छे कर्म करने की कोशिश करता है। इसके परिणामस्वरूप वह ऊँचे से ऊँचे पद और आखिर में मोक्ष का अधिकारी बनता है। इसके विपरीत, धर्म का अनादर करने वाला और इंद्रियों के सुख में डूबा व्यक्ति केवल पाप कर्मों को जमा करता है और जीवन-मरण के चक्र में ही फंसा रहता है, उससे कभी बाहर नहीं निकल पाता। इसलिए, ऐसा करने वाला व्यक्ति स्वयं को ही धोखा देता है, किसी और को नहीं। हमें हमेशा धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए।
In simple words: जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं में डूबा रहता है और धर्म का अपमान करता है, वह खुद को ही नुकसान पहुंचाता है।
🎯 Exam Tip: धार्मिक उपदेशों वाली सूक्तियों में, धर्म के महत्व और उसके पालन से मिलने वाले लाभों को बताएं।
(3) मोहजालावृतो दुःखमिह चामुत्र चाश्नुते ।।
Answer: इस सूक्ति में सुख-दुख पाने के कारणों पर प्रकाश डाला गया है।
इसका सीधा अर्थ है: मोह के जाल में फंसा हुआ प्राणी इस लोक और परलोक दोनों में दुख भोगता है।
मोह-माया के जाल में फंसा व्यक्ति हर पल और अधिक धन-संपत्ति कमाने की चाह में रहता है और उसे पाने के लिए हर तरह के सही-गलत तरीके अपनाता है। इस तरह, अधिक धन पाने की चाह में वह अर्जित साधनों और धन-संपत्ति का उपयोग करने के बाद भी उनसे कोई सुख नहीं पा पाता। परलोक में सुख पाने के लिए भी वह कोई अच्छा काम नहीं कर पाता, क्योंकि उसके मन से मोह-माया का जाल हट नहीं पाता। इस प्रकार, मोह-माया में फंसा व्यक्ति न तो इस लोक में सुख पा सकता है और न परलोक में। भौतिक चीजों के पीछे भागने से हमें कभी सच्ची खुशी नहीं मिल सकती।
In simple words: जो व्यक्ति मोह-माया में फंसा रहता है, उसे इस दुनिया और अगले जन्म दोनों में दुख मिलता है।
🎯 Exam Tip: संसार के नश्वर स्वरूप को बताने वाली सूक्तियों में, मोह-माया से मुक्ति के महत्व पर जोर दें।
(4) भैषज्यमेतद् दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तयेत्।।
Answer: इस सूक्ति में दुख दूर करने का उपाय बताया गया है।
इसका सीधा अर्थ है: दुख की दवा यह है कि उसके बारे में चिंता नहीं करनी चाहिए।
सुख और दुख व्यक्ति के अपने हाथ में नहीं होते और न ही उन्हें किसी भी तरह नियंत्रित किया जा सकता है। दुख की जितनी अधिक चिंता की जाती है, वह उतना ही बढ़ता जाता है। इसे किसी दवा से दूर नहीं किया जा सकता। दवा भी तभी काम करती है, जब व्यक्ति मानसिक रूप से दुख से लड़ने के लिए तैयार हो। इसलिए यदि व्यक्ति अपने दुख को दूर करना चाहता है तो उसे दुख के बारे में सोचना छोड़ देना चाहिए। जब वह दुख के बारे में न सोचकर सुख के बारे में सोचेगा और यह अनुभव करेगा कि वह कई अन्य लोगों से सुखी है, तो निश्चित रूप से उसके मन को सुख-शांति मिलेगी। वास्तव में सुख-दुख कुछ भी नहीं हैं, ये केवल मन के विकल्प हैं। व्यक्ति जैसा सोचेगा, उसे वैसा ही अनुभव होगा। यदि वह अपने मन में स्वयं को सुखी मानेगा तो उसे सुख का अनुभव होगा और दुखी मानेगा तो उसे दुख का अनुभव होगा। हमें अपनी सोच को सकारात्मक रखना चाहिए।
In simple words: दुख की दवा यह है कि उसके बारे में सोचना बंद कर दें, क्योंकि सोचने से दुख बढ़ता ही है।
🎯 Exam Tip: दुख निवारण से संबंधित सूक्तियों में, मानसिक शक्ति और सकारात्मक दृष्टिकोण के महत्व को समझाएं।
(5) सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्याः । [2009, 11, 12, 15]
Answer: इस सूक्ति में संसार की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डाला गया है।
इसका सीधा अर्थ है: सभी संग्रह नाशवान हैं और सभी ऊँचाइयाँ पतन में समाप्त होती हैं।
इस संसार में जितने भी संग्रह हैं, वे सब एक न एक दिन खत्म हो जाएंगे, यानी उनका नाश निश्चित है। जितनी भी ऊँची-ऊँची वस्तुएँ और इमारतें हमें दिखती हैं, वे एक दिन गिर जाएंगी। हमने जितनी भी ऊँचाइयाँ हासिल की हैं, वे एक दिन खत्म हो जाएंगी। इसका मतलब है कि यहाँ कुछ भी हमेशा रहने वाला नहीं है, बल्कि क्षणिक है। इसलिए व्यक्ति को इस संसार में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। सब कुछ अस्थाई है, इसलिए हमें संतुलन बनाए रखना चाहिए।
In simple words: सभी जमा चीजें खत्म होती हैं, सभी ऊँचाइयाँ गिरती हैं, और सब कुछ नश्वर है, इसलिए हमें आसक्ति नहीं रखनी चाहिए।
🎯 Exam Tip: संसार की नश्वरता से जुड़ी सूक्तियों में, वैराग्य और अनासक्ति के संदेश को प्रमुखता से बताएं।
(6) संयोगाः विप्रयोगान्ताः मरणान्तं हि जीवितम् । [2006, 08,09,11] मरणान्तं हि जीवितम् ।।
Answer: इस सूक्ति में मृत्यु की शाश्वतता पर प्रकाश डाला गया है।
इसका सीधा अर्थ है: मिलन का अंत वियोग है और जीवन का अंत मृत्यु है।
यह संसार दुखप्रधान है। इसमें मिलन के क्षण बहुत कम होते हैं, जबकि वियोग हमेशा रहता है। हर सुख का अंत दुख है, लेकिन हर दुख का अंत सुख नहीं है। जो आज है, वह कल नहीं रहेगा और जो कल रहेगा वह आगे नहीं रहेगा। जो मिला है, वह बिछड़ेगा भी, और जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है। यानी, जीवन का अंतिम परिणाम मृत्यु है। इसलिए व्यक्ति को इस संसार में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। यह जीवन चक्र का अटल नियम है।
In simple words: हर मेल-मिलाप का अंत बिछड़ना है, और जीवन का अंत निश्चित रूप से मृत्यु है।
🎯 Exam Tip: जीवन-मृत्यु के चक्र से संबंधित सूक्तियों में, इस अपरिवर्तनीय सत्य को गहराई से समझाएं।
श्लोक का संस्कृत-अर्थ
(1) यो दुर्लभतरं ... खलु वञ्चते ॥ (श्लोक 1) [2013]
Answer: अस्मिन् श्लोके महापुरुषः भीष्मः युधिष्ठिरम् उपदिशति-यः नरः दुर्लभतरं मनुष्य-जन्म प्राप्य जीवेभ्यः द्वेषं करोति, सः धर्मस्य अवमन्ता कामात्मा च भवेत्, सः खलु स्व-आत्मानं वञ्चते ।
In simple words: यः जनः दुर्लभं मानवजन्म प्राप्य जीवेभ्यः द्वेषं करोति, धर्मम् अवमानयति, कामवासनासु लीनः च भवति, सः स्वयमेव वञ्चितः भवति।
🎯 Exam Tip: संस्कृतार्थ लिखते समय, मूल श्लोक के सभी शब्दों को सही व्याकरण और अर्थ के साथ संस्कृत में ही स्पष्ट करें।
(2) आक्रुश्यमानो ... च तितिक्षतः ॥ (श्लोक 3)
Answer: महात्मा भीष्मः कथयति – यः पुरुषः आक्रुष्यमानः अपि क्रोधं न कुर्वति क्रोधमपि सहते, आक्रुष्टारम् अपि क्षमा करोति; सः क्षमाशीलः पुरुषः पुण्यशाली भवति ।
In simple words: यः आक्रुष्यमानः अपि न आक्रुष्येत्, क्रोधं सहते, आक्रोष्टारं च क्षमते, सः पुण्यवान् भवति।
🎯 Exam Tip: संस्कृत व्याख्या में, क्रियापदों (verbs) और विशेषणों (adjectives) का सही प्रयोग अर्थ को और भी स्पष्ट बनाता है।
(3) भैषज्यमेतद् दुःखस्य ... भूयश्चापि प्रवर्धते ॥ (श्लोक 6) (2009)
Answer: अस्मिन् श्लोके भीष्मपितामहः युधिष्ठिरम् उपदिशः-अस्मिन् संसारे दुःखस्य निवृत्तेः एकमात्र उपायः अस्ति यत् तस्य चिन्तनं न कुर्यात । एतत् दुःखस्य औषधम् अस्ति। यतः चिन्त्यमानं दुःखम् अल्पतां न प्राप्नोति, अपितु अत्यधिकं वृद्धि प्राप्नोति ।
In simple words: दुःखस्य औषधं अस्ति यत् तस्य चिन्तनं न करणीयम्, यतः चिन्तायाः दुःखं वर्धते, न तु घटते।
🎯 Exam Tip: श्लोक के केंद्रीय विचार को संस्कृत में संक्षेप में और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने पर ध्यान दें।
(4) सर्वे क्षयान्ताः ... हि जीवितम् ॥ (श्लोक 7) [201]
Answer: महर्षिः वेदव्यासः कथयति यत् संसारे ये सङ्ग्रहाः सन्ति, अन्ते तेषां विनाशः भवति, ये चे उत्तुङ्गाः सन्ति, अन्ते तेषां पतनम् अवश्यं भवति । संयोगाः अन्ते वियोगरूपे परिणताः भवन्ति, एवमेव जीवितम् अपि अन्ते मृत्युं प्राप्नोति ।।
In simple words: संसारे सर्वे निचयाः, समुच्छ्रयाः, संयोगाः च क्षयान्ताः, पतनान्ताः, विप्रयोगान्ताः च सन्ति; जीवनस्य अन्ते मृत्युः एव अस्ति।
🎯 Exam Tip: संस्कृतार्थ में, श्लोक के मूल भाव को बनाए रखते हुए उसे सरल और स्पष्ट वाक्यों में व्यक्त करें।
(5) दमः क्षमा ... चेति सुखावहाः ॥ (श्लोक 8) [2008, 15]
Answer: महात्मा भीष्मः कथयति यत् जीवने इन्द्रियाणां नियन्त्रणः, क्षमा, धैर्यं, तेजः, सन्तोषः सत्यवादिता, लज्जा, अहिंसा, दुर्व्यसनरहिता, कार्यदक्षता च इति सुखसाधनाः सन्ति ।
In simple words: इन्द्रियनिग्रहः, क्षमा, धैर्यं, सन्तोषः, सत्यं, लज्जा, अहिंसा, अव्यसनं, दाक्ष्यं च दश सुखस्य साधनानि सन्ति।
🎯 Exam Tip: गुणों की सूची वाले श्लोकों में, प्रत्येक गुण को संस्कृत में संक्षेप में परिभाषित करें।
(6) ये क्रोधं ... "तरन्ति ते ॥ (श्लोक 9) [2007, 10, 15]
Answer: महात्मा भीष्मः कथयति यत् ये जनाः क्रोधं सन्नियच्छन्ति, क्रुद्धान् च संशमयन्ति, जीवानां च क्रोधं न कुर्वन्ति, ते जनाः दुर्गाणि अतितरन्ति । क्रोधः मनुष्यस्य महद्रिपुः अस्ति; अतः मनुष्यः क्रोधं न कुर्यात् अत्र इति भावः ।।
In simple words: ये जनाः क्रोधं नियन्त्रयन्ति, क्रुद्धान् च शान्तान् कुर्वन्ति, जीवेषु च न कुप्यन्ति, ते सर्वाणि कठिनानि अतिक्रामन्ति।
🎯 Exam Tip: संस्कृतार्थ में, श्लोक के नैतिक संदेश को सरल और स्पष्ट संस्कृत वाक्यों में व्यक्त करें।
(7) अभयं यस्य ... कुतश्चन ॥ (श्लोक 10) [2006, 08, 12]
Answer: महात्मा भीष्मः कथयति यत् यस्य भूतेभ्यः अभयं भवति, यतः भूतानाम् अभयं प्राप्नोति, तस्मात् देहात् विमुक्तस्य पुरुषस्य कुतश्चन भयं न भवति ।
In simple words: यस्य सर्वेभ्यः प्राणिभ्यः अभयं अस्ति, यस्मात् च सर्वेषां प्राणिनां अभयं अस्ति, तस्य देहाभिमानरहितस्य पुरुषस्य कुतोऽपि भयं न भवति।
🎯 Exam Tip: संस्कृतार्थ में, श्लोक के दार्शनिक पहलुओं को सरल और स्पष्ट भाषा में समझाएं।
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