UP Board Solutions Class 10 Home Science Chapter 23 Chart of Pulse Beating Breathing Rate and Body Temperature

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Detailed Chapter 23 नाड़ी की धड़कन, श्वसन दर और शरीर के तापमान का चार्ट UP Board Solutions for Class 10 Home Science

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Chapter 23 नाड़ी की धड़कन, श्वसन दर और शरीर के तापमान का चार्ट Answers & Solutions for Class 10 Home Science (UP Board)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. मनुष्य के शरीर की तापमान ज्ञात करने के उपकरण एवं उनका प्रयोग करने की विधि का वर्णन कीजिए। चित्र की सहायता से थर्मामीटर के बारे में लिखिए।
या
थर्मामीटर से तापक्रम नापने की विधि लिखिए । थर्मामीटर का प्रयोग करते समय आप क्या सावधानियाँ रखेंगी?
या
रोगी के तापक्रम चार्ट का क्या महत्त्व है? टाइफाइड तथा मलेरिया रोग के तापमान अंकन चार्ट का नमूना बनाइए।
या
तापक्रम चार्ट कैसे और क्यों बनाया जाता है ? किन रोगों में इसका बनाना अति आवश्यक है ?
या
रोगी का तापमान लेते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
या
थर्मामीटर से आप क्या समझती हैं? थर्मामीटर का प्रयोग करते समय ध्यान में रखने योग्य तथ्य क्या हैं?
या
तापमान चार्ट में आप क्या-क्या लिखेंगी ?
Answer: क्लीनिकल थर्मामीटर व्यक्ति के स्वास्थ्य के मूल्यांकन के लिए उसके शरीर के तापमान को जानना आवश्यक होता है। स्वस्थ व्यक्ति के शरीर का सामान्य तापक्रम 98.4° फारेनहाइट होता है। शरीर के तापमान को मापने वाले उपकरण को क्लीनिकल थर्मामीटर कहा जाता है। यह एक विशेष प्रकार का उपकरण है जिससे किसी भी व्यक्ति के शरीर का तापमान ज्ञात किया जा सकता है। यह एक काँच की बनी नली होती है जिसके बीच में एक सँकरी नली के समान रिक्त स्थान होता है। इसके एक सिरे- पर एकै घुण्डी के अन्दर पारा भरा होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक क्लिनिकल थर्मामीटर को दर्शाता है। इसमें एक पतली काँच की नली होती है जिसके एक सिरे पर एक बल्ब (घुण्डी) होती है जिसमें पारा भरा होता है। नली पर तापमान के निशान अंकित होते हैं, जिससे शरीर का तापमान मापा जाता है। घुण्डी को उच्च ताप पर रखने पर पारा सँकरे रिक्त स्थान में ऊपर की ओर बढ़ने लगता है। थर्मामीटर लम्बाई में चिह्नांकित रहता है। प्रायः दो प्रकार के थर्मामीटर प्रयोग में लाए जाते हैं। एक प्रकार का थर्मामीटर शरीर का ताप फारेनहाइट में नापता है। इसमें सामान्यतः 95° फारेनहाइट से 110° फारेनहाइट तक चिह्न लगे होते हैं। दूसरे प्रकार के थर्मामीटर से शरीर का ताप सेल्सियस में नापा जाता है तथा इस पर 35° सेण्टीग्रेड से 43° सेण्टीग्रेड तक चिह्न लगे होते हैं। प्रथम प्रकार के थर्मामीटर में 98.4° फारेनहाइट पर तथा दूसरे प्रकार के थर्मामीटर में 36° सेण्टीग्रेड पर तीर को लाल चिह्न बना होता है, जो कि एक स्वस्थ मनुष्य के शारीरिक ताप का द्योतक होता है।
थर्मामीटर का प्रयोग-
प्रयोग करने से पूर्व थर्मामीटर को स्वच्छ पानी से भली प्रकार साफ कर लेना चाहिए। चिकित्सालय में थर्मामीटर अनेक व्यक्तियों का ताप ज्ञात करने के लिए प्रयुक्त होता है। अतः प्रत्येक बार प्रयोग में लाने के लिए इसे स्प्रिट द्वारा साफ कर रोगाणुरहित किया जाता है। तत्पश्चात् थर्मामीटर को झटककर इसके पारे को सबसे नीचे के चिह्न परे उतार लेते हैं। अब इसे घुण्डी (बल्ब) की ओर से रोगी के मुँह (जीभ के नीचे) लगा दिया जाता है। दो-तीन मिनट बाद थर्मामीटर को रोगी के मुंह से निकालकर देखा जाता है कि इसमें पारा किस चिह्न तक चढ़ा है। यह चिह्न रोगी के शारीरिक ताप को प्रदर्शित करता है। छोटी आयु के बच्चों का शारीरिक ताप ज्ञात करने के लिए थर्मामीटर को उनकी बगल में लगाया जाता है। थर्मामीटर का प्रयोग करते समय निम्नलिखित सावधानियाँ रखनी चाहिए-
(i) थर्मामीटर का प्रयोग करने से पूर्व उसे भली प्रकार से साफ कर लेना चाहिए। प्रत्येक बार प्रयोग में लाने से पहले किसी निःसंक्रामक घोल (प्रायः स्प्रिट) से इसे धो लेना चाहिए ।
(ii) रोगी यदि अचेतावस्था में हो, तो उसके मुँह में थर्मामीटर नहीं लगाना चाहिए।
(iii) रोगी को यदि पसीना आ रहा हो तो उसे पोंछकर तथा कुछ देर रुककर ही उसका तापमान लेना चाहिए।
(iv) थर्मामीटर लगाते व निकालते समय शीघ्रता नहीं करनी चाहिए।
(v) तापमान लेने के पश्चात् थर्मामीटर को साफ कर सुरक्षित स्थान पर रख देना चाहिए।
मलेरिया का ताप-चार्ट बनाना -
मलेरिया में ताप में अधिक उतार-चढ़ाव की प्रवृत्ति पायी जाती है। यदि मलेरिया तीसरे दिन आता है तो पहले दिन ताप । अत्यधिक होगी एवं दूसरे दिन सामान्य होकर तीसरे दिन पुनः अत्यधिक हो जाएगी। परन्तु आन्त्र ज्वर । (typhoid) में ताप रोग के प्रथम सप्ताह में उच्च, दूसरे सप्ताह में अत्यन्त स्थिर तथा तीसरे सप्ताह में धीरे-धीरे नीचा होकर सामान्य हो जाता है। यद्यपि आजकल ओषधियों द्वारा ताप की इस सामान्य प्रवृत्ति को डॉक्टरों द्वारा परिवर्तित कर दिया जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र तीसरे दिन आने वाले मलेरिया ज्वर का ग्राफ दर्शाता है, जिसमें रोगी का ताप, नाड़ी, सुबह-शाम का विवरण और मल-मूत्र की स्थिति प्रतिदिन के अनुसार अंकित की गई है। यह ग्राफ ज्वर के पैटर्न को समझने में मदद करता है।
रोगी के ताप का चार्ट बनाना -
तीव्र ज्वर या अधिक समय तक रहने वाले ज्वर से पीड़ित रोगियों के तापमान का चार्ट बनाना आवश्यक होता है, क्योंकि इसके आधार पर चिकित्सक को ओषधियों के उचित प्रयोग की सुविधा हो जाती है। तापमान का चार्ट बनाने के लिए रोगी को प्रत्येक दो अथवा चार घण्टे बाद ताप लेकर निम्न प्रकार से तालिका बनानी चाहिए-
रोगी का नाम .....................
आयु .....................
सम्भावित रोग .....................

तापमान (मुँह से लिया गया)
माह जुलाई 2018 दिनांक4 बजे प्रातः8 बजे प्रातः12 बजे दोपहर4 बजे सायं8 बजे रात्रि12 बजे रात्रि
20.
21
22
23
In simple words: क्लीनिकल थर्मामीटर शरीर का तापमान मापने वाला उपकरण है। इसका उपयोग शरीर के तापमान को रिकॉर्ड करने और रोगों के पैटर्न को समझने के लिए किया जाता है, जिससे उपचार में मदद मिलती है। थर्मामीटर का उपयोग करते समय उसे साफ रखना, होश में न होने वाले रोगी के मुँह में न लगाना और पसीना पोंछकर तापमान लेना जैसी सावधानियाँ बरतनी चाहिए।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में थर्मामीटर के उपयोग की विधि, सावधानियाँ, और मलेरिया जैसे रोगों के लिए तापमान चार्ट बनाने का महत्त्व स्पष्ट रूप से समझाना आवश्यक है।

 

Question 2. मनुष्य में नाड़ी की गति का परीक्षण किस प्रकार किया जाता है? तपेदिक के रोगी की अवस्था को ग्राफ द्वारा आप किस प्रकार प्रदर्शित करेंगी?
Answer: नाड़ी की गति मनुष्य के शरीर में रक्त प्रवाह की क्रिया हर समय चलती रहती है। इस क्रिया में फेफड़ों द्वारा शुद्ध किया गया रक्त हृदय द्वारा सारे शरीर में वितरित किया जाता है तथा शरीर के सभी अंगों से अशुद्ध रक्त हृदय तक जाता है। जहाँ से यह फेफड़ों में शुद्ध होने के लिए भेज दिया जाता ताप सु-शः सुशा- सुश है। इन सब कार्यों को करने के लिए एक विशेष, निश्चित 106° तथा नियमित गति से हृदय में हर समय सिकुड़न और शिथिलन होता रहता है। जब यह सिकुड़ता है, तो रुधिर दबाव के साथ धमनियों में पहुँचता है, जोकि रुधिर के अधिक दबाव के कारण फैल जाती हैं। जब हृदय फैलता है, तो धमनियों में रुधिर का दबाव कम हो जाता है तथा वे पूर्वावस्था में आ जाती हैं। इस प्रकार हृदय के साथ-साथ धमनियों में भी धड़कन होती है, जिसे हम नाड़ी की गति कहते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह ग्राफ तपेदिक के रोगी की अवस्था का चित्रण करता है। इसमें विभिन्न दिनों के लिए ताप (सेल्सियस और फारेनहाइट), नाड़ी, श्वास, मल और मूत्र की स्थिति को सुबह और शाम के समय के अनुसार अंकित किया गया है, जो रोगी के स्वास्थ्य परिवर्तनों को दर्शाता है। सामान्यतः स्वस्थ व्यक्ति को हृदय प्रति मिनट 72 बार फैलता व सिकुड़ता है। इसके साथ ही उसकी धमनियाँ भी धड़कती हैं। इनको कुछ स्थानों पर अनुभव किया जा सकता है, विशेषकर उन स्थानों पर जहाँ इन धमनियों को आगे बढ़ने के लिए किसी हड्डी के ऊपर से गुजरना पड़ता है। इन स्थानों पर उँगली रखने पर धमनी की धड़कन को स्पष्टतः अनुभव किया जा सकता है। अतः हम इसकी संख्या घड़ी देखकर प्रति मिनट ज्ञात कर सकते सुबह तथा शाम को ताप लेकर हैं। यह नाड़ी की गति का परीक्षण कहलाता है। प्रायः एक सामान्य व्यक्ति के लिए नाड़ी की गति 70-80 बार प्रति मिनट होती है। आयु के अनुसार इसमें कुछ अन्तर होते हैं, जिन्हें निम्नांकित सारणी में प्रदर्शित किया गया है-

क्र०सं०आयुनाड़ी की गति प्रति मिनट
1.शिशु132-140
2.1 वर्ष का बालक100-139
3.2 वर्ष का बालक100-115
4.3 वर्ष का बालक90-100
5.4 से 7 वर्ष का बालक85-90
6.8 से 14 वर्ष का बालक75-85
7.15 से 41 वर्ष का व्यक्ति60-70
8.42 वर्ष से अधिक का व्यक्ति72-80
9.सामान्य पुरुष77-85
10.सामान्य स्त्री
की गति शरीर में अनेक स्थानों पर अनुभव की जा सकती है। उदाहरण के लिए-गर्दन पर, पैर पर, कलाई पर व पेट के मध्य में आदि-आदि । किन्तु सामान्यतः सबसे अधिक सुविधाजनक स्थान कलाई के पास अँगूठे की दिशा में पहुँचने पर होता है जहाँ यह सहज ही अनुभव की जा सकती है। नाड़ी देखते समय घड़ी भी देखनी आवश्यक है, जिससे कि नाड़ी की गति का आकलन प्रति मिनट किया जा सके। चिकित्सक को सूचित करने के लिए नाड़ी के गुण देखना भी आवश्यक है; जैसे-
(i) नाड़ी कमजोर चलती है या तेज,
(ii) निश्चित समय पर चलती है अथवा रुक-रुक कर,
(iii) निश्चित गति जानने के लिए प्रत्येक पन्द्रह मिनट बाद नाड़ी की गति को गिनना चाहिए। यदि एक ही गति आती है, तो गति को स्थिर व निश्चित माना जाता है अन्यथा अनिश्चित व अस्थिर माना जाएगा।
तपेदिक के रोगी की अवस्था का ग्राफ – रोगी की अवस्था का ग्राफ बनाने के लिए उसके तापमान, नाड़ी की गति, श्वास की गति, मल-मूत्र आदि की स्थिति को ग्राफ पेपर पर अंकित किया जाता है। ग्राफ कागज पर रोगी का नाम, आयु, रोग का नाम व रोग के प्रारम्भ एवं मुक्ति की तिथि अंकित कर दी जाती है।
प्रत्येक दिन प्रातः और सायंकाल का ताप लेकर निर्धारित तिथि व समय के नीचे ग्राफ पेपर पर नीचे से ऊपर की ओर (ऊर्ध्वतल में) निर्धारित स्थान पर बिन्दु लगाकर अंकित कर दिया जाता है। बाद में बिन्दुओं को मिलाकर ग्राफ बना दिया जाता है। नाड़ी की गति के अंकन के लिए ग्राफ पेपर के आधार के साथ तापक्रम के समान बिन्दु लगाये जाते हैं। इसके लिए पहले खाने में जो दस खाने हैं उन्हें एक के बराबर माना जाएगा। इस प्रकार नाड़ी गति की विभिन्न संख्याओं को अंकित कर दिया जाएगा। इसके नीचे श्वास गति व मल-मूत्र की अवस्था भी अंकित की जाती है।
In simple words: नाड़ी की गति हृदय के धड़कने से रक्त के दबाव के कारण धमनियों में होने वाली स्पंदन है। इसे कलाई पर महसूस करके प्रति मिनट गिना जाता है। तपेदिक के रोगी की अवस्था को एक ग्राफ द्वारा दिखाया जा सकता है जिसमें प्रतिदिन के तापमान, नाड़ी और श्वसन दर को अंकित किया जाता है, जिससे रोग की प्रगति को समझा जा सके।

🎯 Exam Tip: नाड़ी की गति का सही परीक्षण विधि और तपेदिक जैसे रोगों के ग्राफ को स्पष्टता से समझाना महत्वपूर्ण है, जिसमें ग्राफ के विभिन्न मापदंडों का उल्लेख हो।

 

Question 3. रोगी को मल-मूत्र कराते समय किन-किन बातों का ध्यान रखा जाता है? एनिमा का प्रयोग आप किस प्रकार करेंगी?
Answer: रोगी को मल-मूत्र विसर्जन कराना वह रोगी जिसको चलने-फिरने की अनुमति प्राप्त है, सामान्य व्यक्ति की तरह से परिचारिका की देख-रेख में मल-त्याग कर सकता है। परन्तु यदि रोगी सम्पूर्ण समय बिस्तर पर ही रहता है और चल-फिर सकने की क्षमता नहीं रखता अथवा उसे चलने-फिरने की अनुमति नहीं है, तो उसे परिचारिका की सहायता से बिस्तर में लेटी हुई दशा में ही मल-त्याग करना होता है। इसके लिए उसे एक विशेष प्रकार के मल-पात्र (बेड-पैन) की आवश्यकता होती है। परिचारिका को इस प्रकार के रोगी का मल-मूत्र विसर्जन कराते समय निम्नलिखित विधि एवं सावधानी अपनानी चाहिए-
(i) मल-मूत्र त्याग के समय रोगी के बिस्तर पर रबर-शीट डालनी चाहिए।
(ii) रोगी को सीधे लिटाकर, उसके घुटने मुड़वा देने चाहिए ।
(iii) रोगी के बिस्तर के कपड़ों को मोड़ देना चाहिए।
(iv) साफ, साबुत मल-पात्र (बेड-पैन) रोगी की कमर के नीचे लगा देना चाहिए। यह अधिक ठण्डा नहीं होना चाहिए ।
(v) मल-पात्र (बेड-पैन) रखने के बाद रोगी को सहारा देने के लिए तकिया लगा देना चाहिए।
(vi) ओढ़ने की चादर को गन्दा होने से बचाने के लिए इसके नीचे कोई पुराना अखबार लगा देना चाहिए।
(vii) मल-त्याग के उपरान्त रोगी के मल-पात्र को धीरे से एक हाथ से उठा देना चाहिए।
(viii) मल-त्याग के बाद रोगी की गुदा को गीली रूई या टॉयलेट-पेपर अथवा जल से धोकर भली-भाँति साफ कर देना चाहिए ।
(ix) मल-पात्र को हटाते ही ढक देना चाहिए तथा उसे कमरे से बाहर कर देना चाहिए।
(x) यदि रोगी बार-बार मल-त्याग करता है, तो सुरक्षात्मक-पैडों का प्रयोग करना चाहिए।
(xi) यदि रोगी को केवल मूत्र-त्याग करना है, तो मूत्र-पात्र का प्रयोग करना चाहिए।
(xii) प्रयोग के बाद रोगी के मल-मूत्र पात्र को खौलते पानी से साफ कर व कपड़े से पोंछसुखाकर रखना चाहिए।
मल-विसर्जन के समय ध्यान देने योग्य बातें-
(i) रोगी ने दिन में कितनी बार मल-मूत्र त्याग किया ?
(ii) मल का रंग कैसा रहा? स्वस्थ अवस्था में यह भूरा होता है। ऐसा न होने की दशा में चिकित्सक को अवगत कराना चाहिए।
(iii) मल किस तरह का है? गाँठदार, पतला, रक्तयुक्त अथवा कीड़े होने की दशा में चिकित्सक से परामर्श प्राप्त करना चाहिए ।
(iv) प्राकृतिक रूप से मल-त्याग न होने पर भी चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए ।
एनिमा का प्रयोग। रोगी को यदि प्राकृतिक रूप से मल-त्याग नहीं हो रहा है, तो उसे आवश्यकतानुसार चिकित्सक से परामर्श प्राप्त कर एनिमा देना उचित रहता है। एनिमा आवश्यकतानुसार कई प्रकार के होते हैं और उन्हें अलग-अलग प्रकार के उपकरणों द्वारा रोगी को दिया जा सकता है।
कुछ महत्त्वपूर्ण प्रकार के एनिमा, उनके उपकरणों तथा उनको लगाने की विधि निम्नलिखित है-
(1) साबुन के घोल का एनिमा – इसके लिए एक निश्चित पात्र होता है जिसमें एक ओर तले के पास एक टोंटी या नली लगी होती है जिससे रबर की एक लम्बी व पतली नली लगी होती है। रबर की नली के सिरे पर एक प्लास्टिक की लम्बी नली लगी होती है। इस नली को रोगी की गुदा में 10-12 सेमी अन्दर तक डाला जाता है। ऊपर के पात्र में साबुन का पानी भर दिया जाता है। साबुन का घोल बनाने के लिए 15 ग्राम साबुन को पाँच लीटर गर्म जल में घोला जाता है। यह घोल अधिक गर्म नहीं होना चाहिए। एनिमा पात्र की ऊँचाई रोगी के बिस्तर से न्यूनतम आधा मीटर होनी चाहिए। अब टोंटी खोल देने पर साबुन का घोल । रोगी की बड़ी आंत में प्रवेश करने लगता है। इस समय रोगी को लम्बे-लम्बे श्वास दिलाने चाहिए। जब पर्याप्त घोल पेट में पहुँच जाए, तो नोजल को धीरे-धीरे रोगी की गुदा से निकालकर रोगी को सीधा कर देना चाहिए।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एनिमा-पात्र को दर्शाता है जिसका उपयोग नमक या साबुन के पानी का एनिमा देने के लिए किया जाता है। इसमें एक पात्र, एक लंबी नली और एक रेगुलेटर होता है जिसके माध्यम से घोल को रोगी के शरीर में प्रवेश कराया जाता है।(2) नमक के पानी का एनिमा – इस एनिमा को प्रयोग करने के लिए उपर्युक्त उपकरण की ही आवश्यकता होती है। आधा लीटर जल में आधा चम्मच नमक डाल दिया जाता है। पानी हल्का गर्म ही होना चाहिए। इसे उपर्युक्त विधि द्वारा ही लगाया जाता है। यह एनिमा रोगी के कमजोर होने या कोई आघात पहुंचने पर लगाया जाता है। यदि अधिक दुर्बलता के कारण रोगी जल इत्यादि लेने में असमर्थ हो तो नमक के घोल में थोड़ा ग्लूकोज भी मिला देते हैं।
(3) अरण्डी के तेल का एनिमा – इसके लिए एक विशेष प्रकार के उपकरण की आवश्यकता होती है। अरण्डी के तेल को जल-ऊष्मक में गर्म करते हैं। इसके लिए एक बर्तन में जल गर्म, करते हैं तथा एक अन्य छोटे बर्तन में तेल रख देते हैं। जल के गर्म होने पर तेल भी गर्म हो जाता है। अब 200 मिली तेल एनिमा के उपकरण में भर लेते हैं। अरण्डी के तेल का एनिमा उन रोगियों को दिया जाता है जिनको मल की गाँठे बन गई हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र अरण्डी के तेल का एनिमा देने के लिए उपयोग होने वाले उपकरण को प्रदर्शित करता है। इसमें एक विशिष्ट नली और पात्र शामिल होता है जिसके द्वारा अरण्डी के तेल को रोगी को दिया जाता है, खासकर कब्ज के मामलों में।(4) ग्लिसरीन का एनिमा – यह प्रायः बच्चों को दिया जाता है। इसे देने के लिए एक विशेष प्रकार की सिरिंज की आवश्यकता पड़ती है। दो चम्मच ग्लिसरीन को एक शीशी में डालकर जल-ऊष्मक में हल्का गर्म कर लिया जाता है। अब इसे पिचकारी में भरकर एनिमा लगाते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र ग्लिसरीन का एनिमा देने के लिए उपयोग की जाने वाली पिचकारी (सिरिंज) को दर्शाता है। इसमें एक सिरिंज होती है जिसका उपयोग ग्लिसरीन जैसे तरल पदार्थ को शरीर में नियंत्रित तरीके से डालने के लिए किया जाता है।In simple words: रोगी को मल-मूत्र त्याग कराते समय साफ-सफाई, गोपनीयता और सही उपकरण का उपयोग महत्वपूर्ण है। बेड-पैन का सही ढंग से इस्तेमाल करना और रोगी को सहारा देना चाहिए। एनिमा का उपयोग तब किया जाता है जब रोगी प्राकृतिक रूप से मल त्याग नहीं कर पाता, जिसमें साबुन के घोल, नमक के पानी, अरण्डी के तेल या ग्लिसरीन का उपयोग विशिष्ट उपकरणों के साथ किया जाता है।

🎯 Exam Tip: रोगी की स्वच्छता और सुविधा का ध्यान रखते हुए मल-मूत्र विसर्जन कराने की प्रक्रिया, साथ ही विभिन्न प्रकार के एनिमा और उनके प्रयोग की विधि का विस्तृत वर्णन महत्वपूर्ण है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. किसी रोगी की श्वास की गति का निरीक्षण आप किस प्रकार करेंगी? या श्वसन-क्रिया की दर से क्या तात्पर्य है?
Answer: सामान्य अवस्था में एक स्वस्थ मनुष्य निश्चित गति से श्वास लेता है। यदि इस गति में तेजी अथवा कमी आती है तो उसके स्वास्थ्य में अवश्य ही कोई कमी है। मनुष्य में श्वसन-क्रिया निःश्वसन (श्वास बाहर छोड़ना) व प्र:श्वसन (श्वास भीतर लेना) के दो पदों में सम्पूर्ण होती है। एक मिनट में होने वाली श्वसन क्रिया को श्वसन की दर माना जाता है। एक स्वस्थ मनुष्य में यह प्रक्रिया एक मिनट में लगभग 15 से 18 बार दोहराई जाती है। एक शिशु में यह गति अधिक तेज होती है। श्वास की गति को भी ताप या नाड़ी की गति के अनुसार ही तालिका या ग्राफ पर अंकित किया जाता है। किसी व्यक्ति की श्वास की गति का निरीक्षण करते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाता है-
(i) श्वास हल्का है अथवा गहरा,
(ii) श्वास लेते समय कोई कठिनाई अथवा कष्ट तो नहीं है,
(iii) श्वास लेते समय किसी प्रकार की आवाज तो नहीं होती है,
(iv) श्वास क्रिया नियमित है अथवा अनियमित।
In simple words: श्वसन-क्रिया की दर से तात्पर्य एक मिनट में ली जाने वाली साँसों की संख्या से है, जो स्वस्थ व्यक्ति में 15-18 बार होती है। इसका निरीक्षण करते समय यह देखा जाता है कि साँस हल्की या गहरी है, कोई कठिनाई या आवाज तो नहीं आ रही, और साँस नियमित है या अनियमित।

🎯 Exam Tip: श्वसन दर की परिभाषा और उसके निरीक्षण के दौरान ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बिंदुओं को स्पष्ट रूप से लिखें, क्योंकि यह रोगी की स्थिति के मूल्यांकन में सहायक होता है।

 

Question 2. नाड़ी, श्वास-गति तथा तापमान मनुष्य के स्वास्थ्य से किस प्रकार जुड़े रहते हैं?
Answer: नाड़ी, श्वास-गति तथा तापमान का मनुष्य के स्वास्थ्य से सीधा सम्बन्ध है। सामान्यतः नाड़ी तथा श्वास की गति का 4 और 1 अनुपात होता है। नाड़ी की गति सामान्यतया शरीर का ताप 1° फारेनहाइट बढ़ने पर 10 बार बढ़ जाती है। अतः श्वास की गति भी उपर्युक्त अनुपात के अनुसार बढ़ जाएगी। इस प्रकार नाड़ी, श्वास की गति और तापमान भी परस्पर सम्बन्धित होते हैं तथा किसी व्यक्ति के तापमान को देखकर उसकी नाड़ी की गति एवं श्वास की गति का अनुमान लगाया जा सकता है, परन्तु यह तब ही सम्भव हो सकता है, जबकि उस व्यक्ति की सामान्य अवस्था में हमें उसकी नाड़ी व श्वास की गति का पूर्ण ज्ञान हो ।
In simple words: नाड़ी, श्वास और तापमान ये तीनों शरीर के महत्वपूर्ण संकेत हैं जो आपस में जुड़े होते हैं। शरीर का तापमान बढ़ने पर नाड़ी और श्वास की गति भी बढ़ जाती है, जिससे व्यक्ति के स्वास्थ्य की स्थिति का पता चलता है।

🎯 Exam Tip: नाड़ी, श्वास और तापमान के बीच के सहसंबंध को संख्यात्मक अनुपात और तापमान में वृद्धि के साथ इन गतियों में होने वाले परिवर्तनों के माध्यम से समझाना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. रोगी को मल-मूत्र विसर्जन कराते समय चिकित्सक की सूचनार्थ आप किन-किन बातों का लिखित विवरण तैयार करेंगी?
Answer: रोगी के मल-मूत्र विसर्जन के सम्बन्ध में चिकित्सक को प्रायः निम्नलिखित सूचनाएँ देनी होती हैं-
(i) मल-मूत्र का रंग और बनावट कैसी है?
(ii) मल-मूत्र से किस प्रकार की दुर्गन्ध आती है?
(iii) रोगी को मल-मूत्र विसर्जन में किस प्रकार का कष्ट होता है?
(iv) रोगी मल-मूत्र त्यागते समय किसी प्रकार की रुकावट की अनुभूति तो नहीं करता?
(v) रोगी कितनी बार और किस-किस समय मल-मूत्र त्याग करता है?
(vi) रोगी के मल-मूत्र की जाँच की विभिन्न रिपोर्ट ।
In simple words: चिकित्सक को मल-मूत्र विसर्जन के संबंध में रोगी के मल-मूत्र का रंग, बनावट, गंध, त्यागने में कष्ट या रुकावट, और कितनी बार त्याग करता है, जैसी विस्तृत जानकारी देनी चाहिए, साथ ही प्रयोगशाला रिपोर्ट भी संलग्न करनी चाहिए।

🎯 Exam Tip: रोगी के मल-मूत्र विसर्जन से संबंधित सभी अवलोकन योग्य और अनुभवजन्य विवरणों को सूचीबद्ध करना आवश्यक है, जो चिकित्सक को सही निदान और उपचार में मदद करेगा।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. शरीर का ताप ज्ञात करने के लिए किस उपकरण का प्रयोग किया जाता है।
Answer: उक्ट शरीर का ताप लेने के लिए क्लीनिकल थर्मामीटर प्रयुक्त किया जाता है।
In simple words: शरीर का तापमान मापने के लिए क्लीनिकल थर्मामीटर का उपयोग किया जाता है।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न का सीधा उत्तर "क्लीनिकल थर्मामीटर" है।

 

Question 2. थर्मामीटर की उपयोगिता बताइए ।
Answer: थर्मामीटर से व्यक्ति के शरीर का तापमान मापा जाता है। इससे ज्वर का निर्धारण किया जाता है।
In simple words: थर्मामीटर का उपयोग शरीर का तापमान मापने और बुखार की पहचान करने के लिए किया जाता है।

🎯 Exam Tip: थर्मामीटर की प्राथमिक उपयोगिता शरीर का तापमान मापना है, जिसका उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. शरीर का तापक्रम मापने के लिए किन इकाइयों का प्रयोग किया जाता है?
Answer: शरीर का तापक्रम मापने के लिए प्रायः डिग्री फारेनहाइट नामक इकाई का प्रयोग किया जाता है। किन्तु कुछ थर्मामीटर डिग्री सेण्टीग्रेड में भी होते हैं। अतः डिग्री सेण्टीग्रेड भी शरीर का ताप मापने की एक प्रचलित इकाई है।
In simple words: शरीर का तापमान डिग्री फारेनहाइट और डिग्री सेल्सियस (सेण्टीग्रेड) में मापा जाता है।

🎯 Exam Tip: शरीर का तापमान मापने की दोनों प्रमुख इकाइयों- फारेनहाइट और सेण्टीग्रेड- का उल्लेख करना चाहिए।

 

Question 4. थर्मामीटर में कौन-सा पदार्थ भरा जाता है और क्यों?
Answer: थर्मामीटर में पारा भरा जाता है। यह चमकदार होता है तथा थर्मामीटर की दीवारों से चिकता भी नहीं है। ताप पाकर इसका विस्तार समान रूप में होता है।
In simple words: थर्मामीटर में पारा भरा जाता है क्योंकि यह ताप पाकर समान रूप से फैलता है और काँच से चिपकता नहीं है, जिससे सटीक माप मिलती है।

🎯 Exam Tip: पारे के विशिष्ट गुणों का उल्लेख करें जो इसे थर्मामीटर के लिए उपयुक्त बनाते हैं (चमकदार, चिपकता नहीं, समान विस्तार)।

 

Question 5. एक सामान्य स्वस्थ व्यक्ति के शरीर का ताप कितना होता है?
या
थर्मामीटर (तापमापक यन्त्र) में न्यूनतम तापमान कितना होता है?
Answer: एक सामान्य स्वस्थ व्यक्ति के शरीर का ताप प्रायः 98.4° फारेनहाइट होता है।
In simple words: एक स्वस्थ व्यक्ति का सामान्य शरीर का तापमान लगभग 98.4° फारेनहाइट होता है।

🎯 Exam Tip: सामान्य शरीर के तापमान की सटीक संख्या (98.4° फारेनहाइट) याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. तापक्रम चार्ट बनाने से क्या लाभ हैं?
या
रोग का तापक्रम चार्ट बनाना क्यों आवश्यक है?
Answer: तापक्रम चार्ट बनाने से यह लाभ होता है कि चिकित्सक उसको देखकर आसानी से रोगी के स्वास्थ्य में हो रहे परिवर्तनों तथा रोगी की दशा आदि का उचित ज्ञान प्राप्त कर सकता है और तद्नुसार दवा आदि में तत्काल परिवर्तन भी कर सकता है।
In simple words: तापक्रम चार्ट से चिकित्सक को रोगी के स्वास्थ्य में हो रहे बदलावों को समझने में मदद मिलती है, जिससे वह सही और तुरंत उपचार दे पाता है।

🎯 Exam Tip: तापक्रम चार्ट का मुख्य लाभ चिकित्सक को रोगी की स्थिति का त्वरित मूल्यांकन और उपचार योजना में सहायता प्रदान करना है।

 

Question 7. शरीर का ताप बढ़ने पर किसी व्यक्ति की नाड़ी की गति में क्या परिवर्तन होता है?
Answer: शरीर का ताप बढ़ने पर (प्रायः ज्वर आदि में) नाड़ी की गति प्रति डिग्री फारेनहाइट पर दस बार बढ़ जाती है।
In simple words: शरीर का तापमान बढ़ने पर, विशेष रूप से बुखार में, नाड़ी की गति प्रति डिग्री फारेनहाइट ताप वृद्धि पर लगभग दस बार बढ़ जाती है।

🎯 Exam Tip: तापमान और नाड़ी की गति के बीच के सीधे संबंध को याद रखें: प्रत्येक 1° फारेनहाइट वृद्धि पर नाड़ी की गति में 10 बीट्स प्रति मिनट की वृद्धि होती है।

 

Question 8. ऐसे रोगी, जिन्हें श्वास लेने में कठिनाई हो, को तत्काल किस प्रकार की सहायता दी जानी चाहिए?
Answer: श्वास लेने में कठिनाई महसूस करने वाले रोगी को तत्काल ऑक्सीजन दी जानी चाहिए।
In simple words: श्वास लेने में कठिनाई वाले रोगी को तुरंत ऑक्सीजन सहायता प्रदान करनी चाहिए।

🎯 Exam Tip: श्वास संबंधी कठिनाई एक आपातकालीन स्थिति है, जिसमें तत्काल ऑक्सीजन सहायता सबसे महत्वपूर्ण होती है।

 

Question 9. सामान्यतः श्वास की गति कितनी होती है?
या
एक स्वस्थ मनुष्य एक मिनट में कितनी बार श्वास लेता है?
Answer: सामान्यतः एक स्वस्थ व्यक्ति एक मिनट में 15-18 बार श्वास लेता है।
In simple words: एक स्वस्थ व्यक्ति आमतौर पर एक मिनट में 15 से 18 बार साँस लेता है।

🎯 Exam Tip: स्वस्थ व्यक्ति की सामान्य श्वसन दर 15-18 साँस प्रति मिनट होती है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

 

Question. निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए-
1. एक सामान्य स्त्री की नाड़ी की गति प्रति मिनट होती है-
(क) 72-80
(ख) 77-85
(ग) 80-90
(घ) 90-100
Answer: (ख) 77-85
In simple words: एक सामान्य स्त्री की नाड़ी की गति प्रति मिनट 77-85 के बीच होती है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न आयु वर्गों और लिंग के लिए सामान्य नाड़ी दर के आंकड़े याद रखें।

 

Question. 2. स्वस्थ मनुष्य की नाड़ी एक मिनट में कितनी बार चलती है?
(क) 20-30
(ख) 40-50
(ग) 60-70
(घ) 72-80
Answer: (घ) 72-80
In simple words: एक स्वस्थ मनुष्य की नाड़ी एक मिनट में 72 से 80 बार चलती है।

🎯 Exam Tip: स्वस्थ वयस्क व्यक्ति की औसत नाड़ी दर 72 बीट्स प्रति मिनट होती है।

 

Question. 3. शरीर का तापमान कब लेना चाहिए?
(क) खाना खाने के 15 मिनट बाद
(ख) खाना खाने के तुरन्त बाद
(ग) कुछ भी खाने-पीने के 15 मिनट बाद
(घ) पेय पदार्थ लेने के तुरन्त बाद
Answer: (ग) कुछ भी खाने-पीने के 15 मिनट बाद
In simple words: शरीर का तापमान कुछ भी खाने-पीने के कम से कम 15 मिनट बाद लेना चाहिए ताकि सटीक माप मिल सके।

🎯 Exam Tip: तापमान मापने से पहले मुंह को सामान्य स्थिति में आने का समय देना आवश्यक है।

 

Question. 4. एक स्वस्थ मनुष्य एक मिनट में कितनी बार साँस लेता है ?
(क) 14 से 15 बार
(ख) 15 से 16 बार
(ग) 17 से 18 बार
(घ) 18 से 20 बार
Answer: (ख) 15 से 16 बार
In simple words: एक स्वस्थ मनुष्य सामान्यतः एक मिनट में 15 से 16 बार साँस लेता है।

🎯 Exam Tip: स्वस्थ वयस्क की सामान्य श्वसन दर 12-20 साँस प्रति मिनट होती है; दिए गए विकल्पों में से सबसे उपयुक्त 15-16 है।

 

Question. 5. मानव शरीर का सामान्य तापक्रम कितना होता है?
(क) 98.4° फारेनहाइट
(ख) 99° फारेनहाइट
(ग) 97.6° फारेनहाईट
(घ) 100° फारेनहाइट
Answer: (क) 98.4° फारेनहाइट
In simple words: मानव शरीर का सामान्य तापक्रम 98.4° फारेनहाइट होता है।

🎯 Exam Tip: सामान्य मानव शरीर का तापमान का मानक मान 98.4° फारेनहाइट है।

 

Question. 6. शरीर का तापमान देखने का अल्पतम समय है
(क) 13 से 2 मिनट
(ख) 2 से 3 मिनट
(ग) 3 से 4 मिनट
(घ) 5 मिनट
Answer: (ख) 2 से 3 मिनट
In simple words: शरीर का तापमान मापने के लिए थर्मामीटर को कम से कम 2 से 3 मिनट तक शरीर में रखना चाहिए।

🎯 Exam Tip: थर्मामीटर को शरीर में पर्याप्त समय तक रखने से सटीक रीडिंग मिलती है; आमतौर पर यह 2-3 मिनट होता है।

 

Question. 7. थर्मामीटर द्वारा ज्ञात करते हैं
(क) नाड़ी की गति
(ख) श्वसन की दर
(ग) रुधिर का दाबे
(घ) शरीर का तापमान
Answer: (घ) शरीर का तापमान
In simple words: थर्मामीटर का उपयोग शरीर के तापमान को मापने के लिए किया जाता है।

🎯 Exam Tip: थर्मामीटर का प्राथमिक कार्य शरीर का तापमान मापना है।

 

Question. 8. श्वसन तन्त्र का मुख्य अंग होता है
(क) फेफड़े
(ख) अग्न्याशय
(ग) यकृत
(घ) आमाशय
Answer: (क) फेफड़े
In simple words: श्वसन तंत्र का मुख्य अंग फेफड़े होते हैं, जो गैसों के आदान-प्रदान के लिए जिम्मेदार होते हैं।

🎯 Exam Tip: फेफड़े श्वसन प्रणाली के केंद्र में हैं और ऑक्सीजन लेने तथा कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ने का कार्य करते हैं।

 

Question. 9. शरीर का तापमान नापने के लिए प्रयुक्त किया जाता है-
(क) लैक्टोमीटर
(ख) थर्मामीटर
(ग) बैरोमीटर
(घ) हाइड्रोमीटर
Answer: (ख) थर्मामीटर
In simple words: शरीर का तापमान मापने के लिए थर्मामीटर का प्रयोग किया जाता है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न मापन उपकरणों और उनके विशिष्ट उपयोगों को जानें, जैसे लैक्टोमीटर दूध की शुद्धता, बैरोमीटर वायुमंडलीय दाब, और हाइड्रोमीटर द्रवों का घनत्व मापता है।

 

Question. 10. एक स्वस्थ व्यक्ति का हृदय एक मिनट में कितनी बार धड़कता है ?
(क) 72
(ख) 80
(ग) 100
(घ) 200
Answer: (क) 72
In simple words: एक स्वस्थ व्यक्ति का हृदय सामान्यतः एक मिनट में लगभग 72 बार धड़कता है।

🎯 Exam Tip: स्वस्थ वयस्क की औसत हृदय गति 60-100 बीट्स प्रति मिनट होती है, जिसमें 72 को मानक माना जाता है।

 

Question. 11. नाड़ी दर का सम्बन्ध होता है
(क) मानव हृदय की धड़कन से
(ख) भोजन पाचने से ।
(ग) श्वास लेने से
(घ) इनमें से कोई नहीं
Answer: (क) मानव हृदय की धड़कन से
In simple words: नाड़ी दर का सीधा संबंध मानव हृदय की धड़कन से होता है, क्योंकि यह हृदय द्वारा रक्त पंप करने की गति को दर्शाती है।

🎯 Exam Tip: नाड़ी दर सीधे हृदय गति को दर्शाती है, जो हृदय के संकुचन और रक्त पंप करने की प्रक्रिया का एक माप है।

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