NCERT Solutions for Class 10 Home Science: Chapter 17 मानव कंकाल प्रणाली और जोड़
Explore reliable textbook solutions for Chapter 17 मानव कंकाल प्रणाली और जोड़ tailored for Class 10 learners. Utilizing these Home Science answers ensures thorough preparation and strengthens foundational knowledge before final UP Board evaluations.
Practice Class 10 Home Science Solutions: Chapter 17 मानव कंकाल प्रणाली और जोड़
View or download the dedicated Chapter 17 मानव कंकाल प्रणाली और जोड़ solution resource below. Engaging with these textbook answers under focused study conditions ensures continuous academic progress and mastery of the 2026 27 curriculum for Home Science.
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
Question 1. अस्थि-संस्थान या अस्थि-तन्त्र से आप क्या समझती हैं? अस्थि-संस्थान (कंकाल) का क्या कार्य है?
या
मनुष्य के शरीर में अस्थि-संस्थान (कंकाल-तन्त्र) की क्या उपयोगिता है?
या
कंकाल-तन्त्र (अस्थि-संस्थान) या अस्थि-पंजर की हमारे शरीर में क्या उपयोगिता है? मानव शरीर में कुल कितनी अस्थियाँ होती हैं?
या
यदि शरीर में हड्डियाँ न होतीं तो क्या हानि होती?
Answer:अस्थि-संस्थान का अर्थ एवं कार्य
यह सत्य है कि बाहर से देखने पर शरीर की हड्डियाँ या अस्थियाँ दिखाई नहीं देतीं, परन्तु यदि शरीर की त्वचा तथा मांसपेशियाँ आदि हटा दी जाएँ, तो अन्दर केवल अस्थियों का ढाँचा मात्र रह जाएगा। इसके अतिरिक्त यदि ऊपर से ही शरीर के किसी भाग को हाथ से टटोला जाए, तो त्वचा के नीचे मांस और मांस के नीचे एक प्रकार की कठोर रचना महसूस होती है। ये कठोर रचना अस्थियाँ ही हैं। शरीर में विभिन्न अस्थियाँ आपस में व्यवस्थित रूप से सम्बद्ध रहती हैं। शरीर की सभी अस्थियाँ परस्पर सम्बद्ध होकर ही कार्य करती हैं। शरीर में अस्थियों की इस व्यवस्था को ही अस्थि-संस्थान या कंकाल-तन्त्र (Skeletal system) कहते हैं। अस्थि-संस्थान ही शरीर को दृढ़ता, आकृति तथा गति प्रदान करता है। अस्थि-संस्थान में अनेक अस्थियाँ तथा अस्थि-सन्धियाँ पाई जाती हैं।
कंकाल अथवा अस्थि-संस्थान की उपयोगिता
हमारे शरीर में उपस्थित लगभग 206 अस्थियाँ सम्मिलित रूप से कंकाल अथवा अस्थि-संस्थान का निर्माण करती हैं। अस्थि-संस्थान हमारे शरीर का एक निश्चित ढाँचा है, जिसकी उपयोगिता निम्नवर्णित हैं
(1) निश्चित आकार प्रदान करना: कंकाल अथवा अस्थि-संस्थाने हमारे शरीर को एक निश्चित आकार प्रदान करता है। अस्थियों के अभाव में मानव-शरीर मांस के एक लोथड़े के समान ही होता, जो न तो सीधा खड़ा हो सकता और न ही इसका कोई स्थिर आकार ही होता। वास्तव में अस्थि-संस्थान के द्वारा ही व्यक्ति के शरीर की लम्बाई एवं चौड़ाई का निर्धारण होता है।
(2) दृढता प्रदान करना: अस्थि-संस्थान शरीर को भली-भाँति साधे रहता है। शरीर के लगभग सभी भागों को सुदृढ़ रखने में अस्थियों का भरपूर योगदान रहता है। अस्थि-संस्थान के ही कारण हमारा शरीर बाहरी आघातों को सहन कर लेता है। अस्थि-संस्थान के माध्यम से ही हम भारी-से-भारी बोझ को भी उठा लिया करते हैं।
(3) कोमल अंगों को सुरक्षा प्रदान करना: भिन्न-भिन्न स्थानों पर अस्थियाँ कोमल अंगों को कवच प्रदान करती हैं; जैसे-पसलियाँ फेफड़ों व हृदय को, मेरुदण्ड सुषुम्ना नाड़ी को तथा कपाल मस्तिष्क को सुरक्षा प्रदान करता है।
(4) पेशियों को संयुक्त होने का स्थान प्रदान करना: विभिन्न स्थानों पर पेशियाँ अस्थियों से जुड़ी रहती हैं। पेशियाँ अस्थियों को सबल एवं सचल बनाती हैं।
(5) शरीर को गतिशीलता प्रदान करना: अस्थि-संस्थान में अनेक महत्त्वपूर्ण स्थानों पर सन्धियाँ होती हैं। अस्थियों, सन्धियों एवं पेशियों के पारस्परिक सहयोग से शरीर व इसके अन् गतिशील होते हैं।
(6) लाल एवं श्वेत रक्त कणिकाओं का निर्माण: प्रत्येक अस्थि के मध्य भाग में अस्थि-मज्जा होती है। अस्थि-मज्जा में रुधिर की लाल एवं श्वेत कणिकाओं का निर्माण होता है।
(7) श्वसन में सहयोग देना: ट्रैकिया अथवा वायुनलिका के छल्ले एवं पसलियाँ फेफड़ों को फूलने के संकुचन करने में सहायता प्रदान करती हैं।
(8) श्रवण में सहयोग देना: कान की कॉर्टिलेज अस्थियाँ श्रवण क्रिया में सहयोग प्रदान करती हैं।
(9) नेत्रों को सहयोग देना: हमारे नेत्र कपाल में बने अस्थि गड्डों में सुरक्षित रहते हैं। इनमें उपस्थित पेशियाँ नेत्रों की गति को नियन्त्रित करती हैं।
(10) उत्तोलक का कार्य करना: बोझा ढोते एवं सामान उठाते समय मेरुदण्ड एक उत्तम उत्तोलक का कार्य करता है।
अस्थियों (हड्डियों) की बनावट (रचना)
अस्थियाँ मानव शरीर का सबसे कठोर भाग होती हैं। मुख्य अस्थियों से भिन्न कुछ उपास्थियाँ मुलायम भी होती हैं जिन्हें कार्टिलेज कहते हैं। अस्थियों का निर्माण जीवित कोशिकाओं से होता है। अस्थियाँ सफेद रंग की तथा छूने में कठोर होती हैं। अस्थियाँ भीतर से खोखली होने के कारण कठोर होते हुए भी हल्की होती हैं। अस्थियों में एक नली होती है जिसके अन्दर एक गूदेदार पदार्थ भरा होता है, जिसे अस्थिमज्जा (Bone marrow) कहते हैं। जिस खोखले स्थान पर यह अस्थि-मज्जा होती है, उसे अस्थि-गुहा कहते हैं। अस्थि-मज्जा में लाल और श्वेत रक्त कण बनते हैं। नली के चारों ओर असंख्य अस्थि-कोशिकाएँ होती हैं। ये कोशिकाएँ टूटी हुई अस्थि को जोड़ने में भी सहायक होती हैं। अस्थि-नली में रक्तवाहिनी और नाड़ी सूत्र होते हैं। इसी कारण जीवित मनुष्य की अस्थि का रंग कुछ गुलाबीपन लिए होता है और मृत अवस्था में उसका रंग श्वेत हो जाता है। अस्थियां एक आवरण से ढकी रहती हैं, जिसे अस्थिच्छद कहते हैं। यह आवरण बहुत बड़ा होता है तथा मांसपेशियों से जुड़ा रहता है। अस्थियों का निर्माण विभिन्न खनिजों से होता है। इनमें मुख्य हैं-कैल्सियम फॉस्फेट, कैल्सियम कार्बोनेट तथा मैग्नीशियम फॉस्फेट । इनमें सर्वाधिक मात्रा कैल्सियम फॉस्फेट की ही होती है।
अस्थियों का विकास जीवन के आरम्भ से ही होना शुरू हो जाता है। भ्रूणावस्था में पूरा-का-पूरा कंकाल उपास्थि का ही होता है, परन्तु जन्म के उपरान्त इसका अधिकांश भाग हड्डी में परिवर्तित हो जाता है। यह परिवर्तन उपास्थि के मैट्रिक्स (Matrix) में चूने तथा फॉस्फोरस के लवणों के जमने या निक्षेपण (Deposition) से होता है और इस क्रिया को अस्थि-भवन कहते हैं।In simple words: अस्थि-संस्थान शरीर को आकार, दृढ़ता और गति प्रदान करता है। यह कोमल अंगों की रक्षा करता है, रक्त कणिकाओं का निर्माण करता है, और श्वसन तथा संवेदनाओं में सहायता करता है। हड्डियों के न होने पर शरीर केवल मांस का एक लोथड़ा होता और कोई कार्य नहीं कर पाता।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में अस्थि-संस्थान के कार्यों और उसकी संरचना की उपयोगिता को स्पष्ट रूप से बिंदुवार समझाना महत्वपूर्ण है, साथ ही यह भी बताना चाहिए कि हड्डियों के अभाव में क्या हानियाँ हो सकती हैं।
अस्थि-संस्थान के भाग
मानव अस्थि-संस्थान को निम्नलिखित तीन मुख्य भागों में विभक्त किया जा सकता है (1) सिर अथवा खोपड़ी: खोपड़ी में कपाल (जिसमें मस्तिष्क सुरक्षित रहता है) तथा आनन (चेहरा) सम्मिलित रहते हैं।
(2) धड़: वक्ष एवं उदर धड़ के दो भाग होते हैं। वक्ष में रीढ़ की अस्थि, उरोस्थि, हँसली की अस्थियाँ, कन्धे की अस्थियाँ, पसलियाँ तथा नितम्ब की अस्थियाँ आदि होती हैं, जबकि उदर अस्थिविहीन होता है।
(3) शाखाएँ: शाखाओं में दो जोड़े होते हैं-ऊर्ध्व शाखाएँ (भुजाएँ) तथा अधोशाखाएँ (डाँगें)।
Question 2. मानव कपाल की संरचना का सचित्र एवं संक्षिप्त वर्णन कीजिए ।
या
सिर की अस्थियों की बनावट और कार्य का चित्र सहित वर्णन कीजिए ।
Answer:सिर अथवा खोपड़ी
मानव खोपड़ी में कुल 22 अस्थियाँ होती हैं जिनमें से 14 चेहरे में तथा शेष ऊपरी भाग में स्थित होती हैं। खोपड़ी के दो प्रमुख भाग होते हैं (1) कपाल (क्रेनियम) तथा (2) चेहरा (फेस)
कपाल की अस्थियाँ
कपाल ब्रेन बॉक्स की तरह है। यह हमारे शरीर में सिर के ऊपरी भाग में स्थित होता है। यह अन्दर से खोखला तथा गुम्बद की तरह होता है। इसमें हमारा मस्तिष्क सुरक्षित रहता है। कपाल की रचना 8 चपटी हड्डियों के द्वारा होती है। ये हड्डियाँ आपस में मजबूती से तथा न हिलने-डुलने वाली सन्धियों अर्थात् अचल सन्धियों से जुड़ी होती हैं। कपाल में निम्नलिखित 8 हड्डियाँ होती हैं
(क) ललाटास्थि (Frontal Bone): यह माथा बनाती है और सामने वाले भाग में अकेली ही स्थित होती है। इसी में हमारी आँखों के दो गड्ढे भी होते हैं।
(ख) पार्शिवकास्थि (Parietal Bones):
ये संख्या में दो तथा ललाटास्थियों के ठीक नीचे मध्य में आपस में जुड़ी हुई अस्थियाँ होती हैं और कपाल का बीच का ऊपरी भाग बनाती हैं, जोकि गुम्बद की तरह होता है। ये दोनों कानों की तरफ फैली होती हैं तथा ये बड़ी हड्डियाँ होती हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मानव खोपड़ी की विभिन्न अस्थियों और उनकी स्थिति को दर्शाता है। इसमें ललाटास्थि (माथे की हड्डी), पार्श्विक अस्थियाँ (सिर के किनारों की हड्डियाँ), नासास्थि (नाक की हड्डी), ऊर्ध्व हनुवास्थि (ऊपरी जबड़े की हड्डी), अधो हनुवास्थि (निचले जबड़े की हड्डी), कपालास्थि (कपाल का पिछला भाग), शंखास्थि (कान के पास की हड्डियाँ) और पश्च कपालास्थि (खोपड़ी का निचला पिछला भाग) शामिल हैं। यह खोपड़ी के प्रत्येक भाग की स्थिति को स्पष्ट करता है।
(ग) पाश्चादास्थि (Occipital Bones): यह हड्डी भी पार्शिवकास्थि से जुड़ी हुई उसके ठीक पीछे स्थित होती है और खोपड़ी का पश्च भाग बनाती है। इस हड्डी में खोपड़ी का एक बड़ा छिद्र होता है, जिसे महाछिद्र कहते हैं। रीढ़ की हड्डी के अन्दर स्थित सुषुम्ना इसी छिद्र से होकर मस्तिष्क के साथ जुड़ी होती है। इसमें महाछिद्र के दोनों ओर इधर-उधर दो महत्त्वपूर्ण उभार होते हैं जो खोपड़ी को रीढ़ की हड्डी के साथ जोड़ने में सहायक होते हैं। वास्तव में इन्हीं उभारों पर खोपड़ी टिकी रहती है।
(घ) शंखास्थियाँ (Temporal Bones): ये हड्डियाँ संख्या में दो होती हैं और सिर के दोनों ओर कनपटियों को बनाती हैं। कान भी इन्हीं अस्थियों पर स्थित होते हैं। प्रत्येक कान का छिद्र भी इन्हीं अस्थियों पर होता है।
(ङ) जतुकास्थि (Sphenoid Bones): यह दोनों शंखास्थियों के बीच कपाल का निचला तल बनाती है। यह आगे की तरफ ललाट से जुड़ी होती है और पंख की तरह होती है। सम्पूर्ण रूप में इसका आकार एक तितली की तरह दिखाई पड़ता है।
(च) झरझरास्थि या बहु छिद्रिकास्थि (Ethmoid Bone): यह संख्या में एक होती है और कपाल का निचला तल बनाती है। यह दोनों आँखों के कोटरों के बीच स्थित होती है। इस हड्डी में अनेक छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। इन छिद्रों से होकर मस्तिष्क से निकलने वाली तन्त्रिका-तन्त्र की नाड़ियाँ, रक्त की नलिकाएँ आदि निकलती हैं। इस हड्डी से नाक के अन्दर के भीतरी भाग की संरचना भी बनती है।
चेहरे की अस्थियाँ
मानव का चेहरा निम्नलिखित 14 हड्डियों से निर्मित होता है
(क) अधोहनु या निचले जबड़े की अस्थियाँ (Lower Jaw Bones): यह जबड़ा चेहरे का सबसे निचला भाग हैं। यह अत्यधिक मजबूत तथा काफी बड़ी हड्डी का बना होता है। इसका आधार घोड़े की नाल की तरह होता है। इसको मेण्डिबल भी कहते हैं। ठोढ़ी भी इसी हड्डी के द्वारा बनती है। यह हड्डी निचले जबड़े को हिला-डुला सकती है; जिसके द्वारा भोजन का भक्षण, पीसना-चबाना इत्यादि कार्य होते हैं। इस हड्डी में ऊपर की ओर 16 गड्ढे होते हैं, जिनमें 16 दाँत फिट रहते हैं।।
(ख) ऊर्ध्व-हनु या ऊपरी जबड़े की अस्थियाँ (Upper Jaw Bones): यह दो हड्डियों से मिलकर बनता है। दोनों हड्डियों में से एक दाहिनी तथा एक बाईं ओर होती है तथा नाक के ठीक नीचे मध्य में जुड़ी रहती है। इसी हड्डी के द्वारा मुँह के अन्दर तालु का अगला भाग भी बनता है। इन दोनों हड्डियों को मैक्सिलरी अस्थियाँ कहते हैं। प्रत्येक हड्डी में नीचे तथा आगे की ओर 8-8 गड्ढे होते हैं, जिनमें दाँत लगे रहते हैं।
(ग) कपालास्थि (Check Bones): ये संख्या में दो होती हैं तथा कान से लेकर आँख के नीचे, नाक तक फैली रहती हैं और आकार में चपटी होती हैं। ये गाल के ऊपरी भाग का आकार बनाती हैं, इसलिए इन्हें कपोलास्थियाँ कहते हैं।
(घ) तालुकास्थियाँ (Palate Bones): इनकी संख्या भी दो होती है। ये छोटी हड्डियाँ हैं और तालु के पिछले हिस्से में लगी होती हैं व आगे की ओर मैक्सिलरी हड्डी से जुड़ी रहती हैं अर्थात् तालु का अगला भाग मैक्सिलरी हड्डी से तथा पिछला भाग तालुकास्थि से बनता है।
(ङ) नासास्थियाँ (Nasal Bones): इनकी संख्या भी दो होती है। ये हड्डियों भी चपटी होती हैं। इनका आकार लगभग चौकोर होता है और ये नाक के ऊपरी भाग का कठोर कंकाल बनाती हैं।
(च) स्पंजी या टरबाइनल अस्थियाँ (Spongy Bones): ये संख्या में दो होती हैं। ये हड्डियाँ विशेष सलवटदार तथा ऐठी हुई होती हैं जो नाक के भीतरी भाग में स्थित होती हैं। इसी मार्ग से होकर वायु आती-जाती है; अतः ये श्वसन मार्ग का निर्माण करती हैं। नाक के अन्दर इन्हें उँगलियों से टटोलकर देखा जा सकता है।
(छ) अश्रु अस्थियाँ (Lachrymal Bones): इनकी संख्या भी दो होती है। ये हड्डियाँ छोटी तथा छिद्रयुक्त होती हैं। इनकी स्थिति नाक के ऊपरी भाग में नेत्र कोटरों के बीच में होती है। इन्हीं से होकर, छिद्र के द्वारा आँख से आँसू नाक के अन्दर पहुँचते हैं; इसीलिए इनको अश्रु अस्थियाँ भी कहते हैं।
(ज) सीरिकास्थि (Vomer Bone): यह संख्या में एक होती है तथा नाके के अन्दर का परदा बनाती है और इसको दो भागों में बाँटती है।In simple words: मानव खोपड़ी 22 हड्डियों से बनी होती है, जिसमें 8 कपाल की और 14 चेहरे की हड्डियाँ शामिल हैं। कपाल मस्तिष्क की सुरक्षा करता है, जबकि चेहरे की हड्डियाँ चेहरे की संरचना बनाती हैं और जबड़े, नाक, आँखें जैसे अंगों को सहारा देती हैं। प्रत्येक हड्डी का विशिष्ट आकार और कार्य होता है।
🎯 Exam Tip: खोपड़ी की हड्डियों की संख्या, उनके प्रकार (कपाल और चेहरे की) और प्रत्येक हड्डी के कार्य का स्पष्ट उल्लेख करना महत्वपूर्ण है। चित्र के माध्यम से हड्डियों की स्थिति को दर्शाना उत्तर को अधिक प्रभावी बनाता है।
Question 3. मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) की रचना और उसके कार्य का वर्णन कीजिए। यो मेरुदण्ड दण्ड की क्या उपयोगिता है?
Answer:मेरुदण्ड की रचना और कार्य
रचना: मेरुदण्ड हमारी खोपड़ी के निचले भाग से लेकर शरीर के पिछले छोर तक स्थित छोटे-छोटे टुकड़ों के जुड़ने से बनी एक विशिष्ट रचना है। इन टुकड़ों या भागों को कशेरुकाएँ कहते हैं। छोटे बच्चे के मेरुदण्ड में कुल 33 कशेरुकाएँ होती हैं, युवावस्था में नीचे की नौ कशेरुकाओं में से पिछली पाँच मिलकर एक और अन्तिम चार मिलकर एक अस्थि बन जाती है। इस प्रकार कुल 26 कशेरुकाएँ रह जाती हैं। इनके मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं
(1) ग्रीवा कशेरुकाएँ (Cervical vertebrae):
इनकी संख्या 7 होती है और ये गर्दन के पिछले हिस्से में स्थित होती हैं। गर्दन को घुमाने, सीधा करने, झुकाने इत्यादि में ये कशेरुकाएँ मजबूती के साथ लचीलापन पैदा करती हैं, साथ-ही-साथ सम्पूर्ण कशेरुक दण्ड में स्थित सुषुम्ना का अग्रभाग इन्हीं कशेरुकाओं के अन्दर स्थित होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मानव कशेरुक दण्ड (रीढ़ की हड्डी) की संरचना को दर्शाता है, जिसमें विभिन्न प्रकार की कशेरुकाएँ और पूरे कशेरुक दण्ड का प्राकृतिक झुकाव शामिल है। इसमें ग्रीवा कशेरुकाएँ (गर्दन), वक्ष कशेरुकाएँ (छाती), कटि कशेरुकाएँ (कमर), कूल्हे की कशेरुकाएँ (त्रिकास्थि) और पुच्छ कशेरुकाएँ (अनुत्रिक) स्पष्ट रूप से दर्शायी गई हैं।
(2) वक्षीय कशेरुकाएँ (Thoracic Vertebrae): इनकी संख्या 12 होती है और ये वक्षीय प्रदेश में पृष्ठ भाग में ग्रीवा कशेरुकाएँ स्थित होती हैं। ये वक्षीय कंकालं का पिछला तथा मजबूत हिस्सा बनाती हैं। सामने की ओर अन्य हड्डियाँ स्थित होने के कारण वक्षीय स्थल बहुत अधिक लचीला नहीं होता है, फिर भी वक्ष कशेरुकाएँ आवश्यकतानुसार यह झुक सकता है।
(3) कटि कशेरुकाएँ (Lumber Vertebrae): इनकी संख्या 5 होती है। ये प्रमुखतः उदर तथा कमर के भाग में स्थित कटि कशेरुकाएँ होती हैं। इस भाग में आगे सामने की ओर कोई हड्डी न होने के कारण, उदर का यह भाग प्रमुखतः अत्यन्त लचीला होता है। कूल्हे की कशेरुकाएँ
(4) त्रिक कशेरुकाएँ (Sacral Vertebrae): इनकी संख्या 5 होती है। कमर के निचले भाग में ये शरीर का लगभग निचला छोर बनाती हैं। 5 कशेरुकाएँ वयस्क होने तक आपस में पूर्णतः समेकित हो जाती हैं और त्रिभुजाकार हड्डी त्रिकास्थि करती हैं। त्रिकास्थि कूल्हे की हड्डी व श्रोणि- इसकी विभिन्न कशेरुकाएँ तथा सम्पूर्ण मेखला के मध्य में स्थित होती है। इसके कारण ही कुल्हे की कशेरुक दण्ड के झुकाव हड्डी के साथ मिलकर मनुष्य सीधा खड़ा हो सकता है।
(5) अनुत्रिक कशेरुकाएँ (Coccycal Vertebrae): इनकी संख्या 4 होती है। यद्यपि मनुष्य में पूँछ दिखायी नहीं पड़ती, किन्तु पूँछ के अवशेष के रूप में यहाँ 4 कशेरुकाएँ उपस्थित होती हैं। ऐसा समझा जाता है कि मानव का विकास किसी पूंछ वाले जन्तु से हुआ है और उसके अवशेषों के रूप में कुछ कशेरुकाएँ रह गयी हैं। ये चार अस्थियाँ वयस्क अवस्था प्राप्त करते-करते आपस में समेकित होकर एक छोटी-सी संरचना अनुत्रिक बनाती हैं, जो श्रोणि-मेखला के मध्य से पीछे की ओर वास्तविक अन्तिम भाग बनाती है।
मेरुदण्ड के कार्य: मेरुदण्ड मानव अस्थि-संस्थान का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं
1. मेरुदण्ड में फिसलने वाली सन्धि पाई जाती है, जिसके फलस्वरूप हम उठ-बैठ व चल पाते हैं।
2. मेरुदण्ड की कशेरुकाओं के बीच में उपास्थि (Cartilage) की गद्दियाँ होती हैं, जिनके कारण कूदते समय मेरुदण्ड के टूटने का भय नहीं रहता है।
3. मेरुदण्ड की प्रथम कशेरुका सिर के लिए आधारशिला का कार्य करती है।
4. मेरुदण्ड के अन्दर सुषुम्ना नाड़ी सुरक्षित रहती है।
5. मेरुदण्ड पीठ की ओर पसलियों को जुड़ने का स्थान प्रदान करती है।
6. मेरुदण्ड सिर से धड़ तक सारे शरीर को साधे रखती है।In simple words: मेरुदण्ड रीढ़ की हड्डी छोटे-छोटे कशेरुकाओं से बनी एक लचीली संरचना है जो सिर से धड़ तक शरीर को सहारा देती है। यह शरीर को गतिशीलता प्रदान करती है, मस्तिष्क से निकलने वाली सुषुम्ना नाड़ी की सुरक्षा करती है, और आंतरिक अंगों को सहारा देती है।
🎯 Exam Tip: मेरुदण्ड की विभिन्न कशेरुकाओं (ग्रीवा, वक्षीय, कटि, त्रिक, अनुत्रिक) की संख्या और उनके कार्यों का वर्णन करें। मेरुदण्ड की संरचना का सचित्र वर्णन और उसके महत्व को स्पष्ट करना अधिक अंक दिलाता है।
Question 4. वक्ष-स्थल के अस्थि-संस्थान की संरचना का संक्षेप में परिचय दीजिए।
या
वक्ष तथा पसलियों का सचित्र वर्णन कीजिए ।
Answer:वक्षीय कटहरा
गर्दन से लेकर जाँघ तक का भाग धड़ कहलाता है। मध्यपट द्वारा इसके दो स्पष्ट भाग हो जाते हैं (1) वक्ष (Thorax) तथा (2) उदर (Abdomen)
वक्षीय भाग में शरीर के अति कोमल एवं महत्त्वपूर्ण अंग (फेफड़े, हृदय आदि) स्थित होते हैं। कंकाल का वक्षीय भाग, जिसे वक्षीय कटहरा कहते हैं, इन अंगों को पूर्ण रूप से सुरक्षित रखता है। इसमें मेरुदण्ड, उरोस्थि तथा पसलियाँ आदि सम्मिलित हैं। इनका संक्षिप्त परिचय अग्रलिखित है
(1) रीढ़ की हड्डी या मेरुदण्ड (Vertebral Column):
वक्षीय कंकाल का पृष्ठ भाग अर्थात् पीठ का भाग इसी हड्डी के द्वारा बनता है। यह हड्डी, जो कई छोटी-छोटी छल्ले जैसी हड्डियों के पास-पास लगी होने से बनती है, अन्य हड्डियों को साधने, उन्हें उरोस्थिका स्थान देने आदि का कार्य करने के साथ ही अनेक पेशियों को भी स्थान देती है। यह हड्डी इस कंकाल का मजबूत पृष्ठ बनाती है। बनाती है।
(2) उरोस्थि (Sternum):
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मानव वक्षीय कटहरे का त्रिविम दृश्य दर्शाता है, जिसमें उरोस्थि (छाती की हड्डी), हस्तक (उरोस्थि का ऊपरी भाग), पसलियाँ और चलायमान पसलियाँ (फ्लोटिंग रिब्स) स्पष्ट रूप से दिखाई गई हैं। यह संरचना फेफड़े और हृदय जैसे शरीर के महत्वपूर्ण आंतरिक अंगों की सुरक्षा करती है।
यदि हम अपने वक्ष में मध्य रेखा पसलियाँ पर अपनी उँगलियों से टटोलकर देखें तो एक दबा हुआ स्थान महसूस होता है। इसके नीचे छाती की हड्डी या उरोस्थि होती है। यह हड्डी प्रमुख रूप से 3 महत्त्वपूर्ण भागों से मिलकर बनती है
(क) उग्र-उरोस्थि (Manubrium): यह उरोस्थि का अगला, चौड़ा तथा चपटा भाग है, जिसका आधार लगभग तिकोना । चलायमान पसलियाँ तथा नीचे की ओर लगभग सँकरा होता जाता है। दोनों ओर की । त्रिविम दृश्य हँसली की हड्डी अर्थात् जत्रुकास्थि (Collar Bone) इन हड्डियों से जुड़ी होती है। पसलियों को पहला जोड़ भी इसी भाग से जुड़ा होता है।
(ख) मध्य-उरोस्थि (Mesosternum): यह भाग काफी लम्बा और सँकरा होता है। यह भाग एक संयुक्त हड्डी के रूप में होता है, जिसमें भ्रूणावस्था में ही चार हड्डियों के टुकड़े पूरी तरह जुड़कर एक हो जाते हैं। पसलियों के छह जोड़े (दूसरी से सातवीं पसली तक) इसी भाग पर दोनों ओर जुड़े होते हैं।
(ग) पश्च-उरोस्थि या जिंफीस्टर्नम (Giphisternum): यह छोटा भाग है। प्रारम्भिक अवस्था में तो बच्चों में यह उपास्थियों का बना होता है, किन्तु बाद में यह कड़ा हो जाता है। इस भाग में कोई पसली जुड़ी न होने के कारण यह भाग पसलियों से अलग रहता है।
पसलियाँ या पर्शकाएँ
इनकी कुल संख्या 12 जोड़े अर्थात् 24 होती है। ये विशेष रूप से धनुष-कमान की तरह झुककर वक्षीय कटहरा या पिंजरा बनाती हैं। सभी पसलियाँ पृष्ठ भाग में अपने क्रमांक से कशेरुकाओं से जुड़ी होती हैं। इस प्रकार प्रत्येक कशेरुका से दोनों ओर एक-एक पसली उसी क्रमांक में जुड़ी होती है। दूसरी ओर अर्थात् जन्तु के प्रतिपृष्ठ तल की ओर यह पसली उरोस्थि से जुड़ी रहती है, जिसमें से पहला जोड़ा उग्र उरोस्थि से तथा दूसरे से सातवें तक मध्य-उरोस्थि से जुड़े रहते हैं। आठवीं पसली अपनी ओर की सातवीं पसली से मध्य में जुड़ जाती है। नवीं व दसवीं पसली आपस में जुड़ी रहती हैं। इसके अतिरिक्त, ग्यारहवीं व बारहवीं पसली केवल कशेरुकाओं से जुड़ी रहती हैं, जिसके फलस्वरूप इनके दूसरे सिरे बिल्कुल स्वतन्त्र रहते हैं। इसलिए इन्हें मुक्त पर्शकाएँ या तैरती हुई पसलियाँ (Floating ribs) कहते हैं। इनमें से पहले से लेकर सातवें जोड़े तक तो सत्य पसलियाँ तथा शेष मिथ्या पसलियाँ होती हैं। पसलियाँ वक्षीय कटहरे का मुख्य भाग बनाती हैं तथा साथ ही ये कटहरे के भीतरी स्थान को घटा-बढ़ा भी सकती हैं। कटहरे के बीच की मांसपेशियाँ फैलकर पसलियों को झुकाती एवं सौंधा करती रहती हैं, जिससे कि कटहरे का भीतरी स्थान घटता-बढ़ता रहता है। इससे फेफड़ों की संकुचन व फैलने की गति में सहायता मिलती है।In simple words: वक्षीय कटहरा, जिसमें मेरुदण्ड, उरोस्थि और पसलियाँ शामिल हैं, धड़ के ऊपरी भाग की कंकाल संरचना है। यह हृदय और फेफड़ों जैसे महत्वपूर्ण आंतरिक अंगों की सुरक्षा करता है और श्वसन क्रिया में सहायता करता है। पसलियाँ धनुष-कमान की तरह मुड़कर एक पिंजरा बनाती हैं।
🎯 Exam Tip: वक्षीय कटहरे के मुख्य घटक (मेरुदण्ड, उरोस्थि, पसलियाँ) और उनके योगदान को स्पष्ट करें। पसलियों के विभिन्न प्रकारों और श्वसन में उनकी भूमिका का वर्णन करना महत्वपूर्ण है।
Question 5. पैर की हड्डियों का वर्णन कीजिए।
या
पैर की अस्थियों का चित्र बनाकर नामांकित कीजिए ।
Answer: प्रत्येक पश्च-पाद के
1. जाँघ,
2. टाँग,
3. टखना,
4. तलवा तथा
5. उँगलियाँ; पाँच भाग होते हैं। इनका संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है
(1) जाँघ की हड्डी अथवा उर्विका (Femur): यह एक लम्बी वे अत्यधिक मजबूत हड्डी होती है। इसका सिरा गोल एवं चिकना होता है तथा श्रोणि उलूखल में फंसा रहता है, जिससे कि यह सहज ही कई दिशाओं में घूम सकती है। इसका दूसरा सिरा घुटने का जोड़ बनाता है तथा अपेक्षाकृत चौड़ा होता है।
(2) पगदड़ या टाँग: घुटने से आगे टखने तक यह श्रेणिफलक भाग दी हड्डियों से मिलकर बना होता है। इनमें से भीतरी त्रिकास्थि हड्डी, जिसे अन्त:जंघिका (Tibia) कहते हैं, मोटी तथा आसनास्थि अधिक लम्बी होती है; जबकि बाहरी हड्डी, जिसे उर्विका बहि: जंधिका (Fibula) कहते हैं, अपेक्षाकृत छोटी तथा सँकरी होती है। घुटने को मुख्य रूप से अन्तःजंघिका ही बनाती है। इस स्थान पर एक ओर अन्तःजंघिका तथा दूसरी ओर उर्विका के तल आपस में चिपके रहते हैं। बहि: जंघिका का इस ओर जानुका । का सिरा अन्तः जंघिका से जुड़ा होता है। घुटने पर सामने की क चपटी तिकोनी हड्डी और होती है, जिसे जानुका अन्तःजंघिको बहि: जंघिको (पटेला) कहते हैं। यह हड्डी घुटने को आगे की ओर मुड़ने से रोकती है, किन्तु पीछे की ओर मोड़ने में रुकावट नहीं डालती । गुल्फ की अस्थि
(3) टखना:
टखने में 7 हड्डियाँ होती हैं। ये कलाई की तरह स्थित होती हैं, किन्तु अपेक्षाकृत ज्यादा मजबूत और अंगुलास्थियाँ बड़ी भी होती हैं; अतः इनसे एड़ी को कुछ भाग भी बनता है। शरीर का सम्पूर्ण भार इन्हीं को सँभालना अस्थियों का आपसी सम्बन्ध तथा पड़ता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मानव पश्च-पाद (पैर) की विभिन्न अस्थियों के आपसी संबंध को दर्शाता है, साथ ही श्रोणि-मेखला (पेल्विक गर्डल) से उनके जुड़ाव को भी दिखाता है। इसमें श्रोणिफलक, त्रिकास्थि, आसनास्थि, उर्विका (जाँघ की हड्डी), जानुका (घुटने की कटोरी), अन्तःजंघिका, बहिःजंघिका (पिंडली की हड्डियाँ), गुल्फ की अस्थि (टखने की हड्डी), प्रपादास्थियाँ और अंगुलास्थियाँ (पैर की उंगलियाँ) शामिल हैं।
(4) तलवा या प्रपाद: इस भाग को बनाने के लिए 5 लम्बी हड्डियाँ होती हैं। ये सीधी होती हैं। तथा लगभग सम्पूर्ण तलवे को बनाती हैं। इन्हें प्रपादास्थियाँ कहते हैं। पीछे की ओर ये टखने की हड्डी से जुड़ी होती हैं, जबकि आगे की ओर इनसे उँगलियों की अस्थियाँ जुड़ती हैं।
(5) उँगलियाँ: प्रत्येक उँगली में 3 किन्तु अँगूठे में केवल 2 हड्डियाँ होती हैं। ये हड्डियाँ सीधी व हाथ की हड्डियों की अपेक्षा छोटी होती हैं। यहाँ अँगूठा भी उँगलियों की ही दिशा में लगा रहता है।In simple words: पैर की हड्डियाँ जाँघ, टाँग, टखना, तलवा और उँगलियों में बटी होती हैं। जाँघ की उर्विका शरीर की सबसे मजबूत हड्डी है, जबकि टाँग में टिबिया और फिबुला होती हैं। टखने और तलवे में छोटी हड्डियाँ होती हैं, और उँगलियों में अंगुलास्थियाँ होती हैं, जो पैर को सहारा और गति प्रदान करती हैं।
🎯 Exam Tip: पैर की हड्डियों के प्रत्येक भाग की हड्डियों के नाम, उनकी संख्या और मुख्य कार्य को याद रखना महत्वपूर्ण है। जाँघ की उर्विका, टाँग की टिबिया-फिबुला और घुटने की जानुका का उल्लेख करना आवश्यक है।
Question 6. बाहु की अस्थियों का सचित्र वर्णन कीजिए।
या
बाहु की अस्थियों के नाम लिखिए। कोहनी में किस प्रकार का जोड़ पाया जाता है?
या
चित्र की सहायता से अग्रबाह की अस्थियों का वर्णन कीजिए ।
या
बाह में पाई जाने वाली अस्थियों के नाम लिखिए।
Answer:बाह की अस्थियाँ
सम्पूर्ण बाहु की अस्थियों को 5 भागों में बाँट सकते हैं; जैसे-ऊपर से क्रमशः ऊपरी बाहु, अध:बाह या अग्रबाहु, कलाई, हथेली तथा उँगलियाँ। प्रत्येक भाग को बनाने के लिए एक या कुछ अस्थियाँ होती हैं; जैसे
ऊपरी बाहु की अस्थियाँ: यह केवल एक अस्थि से बनती है जिसे प्रगण्डिकास्थि (Humerus) कहते हैं। यह एक लम्बी अस्थि होती है जो काफी मजबूत व अन्दर से खोखली होती है। लम्बाई में यह पूर्ण ऊपरी बाहु में फैली रहती है। इसकी ऊपरी सिरा गेंद की तरह गोल होता है तथा अंस-फलक के अंसकूप में फँसा रहता है। यह अपने गोल तथा चिकनेपन के कारण कूट में आसानी से इधर-उधर या किसी भी दिशा में घूम सकता है। इसका दूसरा सिरा अग्रबाहु की अस्थि के साथ एक वि प्रकार की सन्धि बनाता है जो केवल एक ओर को खुलती या बन्द होती है। इस प्रकार की सन्धि को कब्जा सन्धि कहते हैं। यह भाग कोहनी का जोड़ बनाता है।
अग्रबाहु की अस्थि:
अग्रबाहु या अध:बाहु में दो लम्बी मजबूत अस्थियाँ होती हैं। दोनों एक-दूसरे के पास-पास लगी रहती हैं। इन अस्थियों को बहि:प्रकोष्ठिकास्थि (Radius) तथा अन्तः प्रकोष्ठिकास्थि (Ulna) कहते हैं। इनमें से रेडियस अँगूठे की ओर तथा अल्ना छोटी उँगली की ओर होती है। अल्ना अपेक्षाकृत लम्बी अस्थि है। यही अस्थि कोहनी के जत्रुकास्थि भाग में और लम्बी होकर कब्जा सन्धि बनाने में सहायक है। अंर, लङ रेडियस का ऊपरी सिरा सँकरा होता है जो प्रकोष्ठिका के साथ जुडा रहता है; किन्तु अगला सिरा, जो कलाई की अस्थि के पास होता है, प्रगण्डिकास्थि काफी चौड़ा होता है। इन दोनों लम्बी अस्थियों का लगाव अग्रबाहु में इस प्रकार होता है कि यदि हम हथेली को सीधा फैलाते हैं, तो ये एक-दूसरे के पास स्थित होती हैं, किन्तु हथेली को घुमाकर अन्दर अन्तःप्रकोष्ठिका की ओर ले जाएँ, तो ये एक-दूसरे के ऊपर स्थित होती हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र बाहु (हाथ) की विभिन्न अस्थियों को दर्शाता है, उनके आपसी संबंध और अंसमेखला (कंधे की पेटी) से उनके जुड़ाव को भी दिखाता है। इसमें जत्रुकास्थि (कॉलरबोन), अंसफलक (कंधे का ब्लेड), प्रगण्डिकास्थि (ऊपरी बाहु की हड्डी), अंतःप्रकोष्ठिकास्थि और बहिःप्रकोष्ठिकास्थि (निचले बाहु की हड्डियाँ), बन्धास्थियाँ (कलाई की हड्डियाँ), करभास्थि (हथेली की हड्डियाँ) और अंगुल्यास्थियाँ (उंगलियों की हड्डियाँ) शामिल हैं।
कलाई की अस्थियाँ:
कलाई में 8 काफी छोटी-छोटी मणिबन्धास्थयाँ अस्थियाँ होती हैं, जिन्हें मणिबन्धिकास्थियाँ (कार्पल्स) कहते हैं। ये मणिबन्ध 4-4 की दो पंक्तियों में स्थित होकर कलाई को बाँधती हैं। इन केर भास्थि अस्थियों के छोटी-छोटी और अलग-अलग होने के कारण कलाई पूरी 18- अँगुल्यास्थियाँ तरह लचकदार होती है तथा किसी भी दिशा में आसानी से घुमाई जा जासकती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र कलाई और हाथ की अस्थियों को दर्शाता है। इसमें मणिबन्धिकास्थियाँ (कार्पल्स - कलाई की हड्डियाँ) और करभास्थियाँ (मेटाकार्पल्स - हथेली की हड्डियाँ) स्पष्ट रूप से दिखाई गई हैं, जो हाथ को लचीलापन प्रदान करती हैं।
हथेली की अस्थि: हथेलीहथेली को 5 लम्बी और सँकरी अस्थियाँ, उनका आपसी सम्बन्ध व हड्डियाँ बनाती हैं। इन अस्थियों को करभिकाएँ या मेटा-कार्पल्स । अंसमेखला के साथ लगाव कहते हैं। कलाई की ओर ये मणिबन्ध से जुड़ी होती हैं। तथा आगे की ओर अँगुलियों की अस्थि से इनका सम्बन्ध मणिबन्धिकास्थियाँ होता है।
अँगुलियों की अस्थि: प्रत्येक अँगुली में 3 अस्थियाँ होती हैं। अँगूठे में केवल दो अस्थियाँ होती हैं। ये अँगुलास्थियाँ कहलाती हैं तथा छोटी होती हैं। एक-दूसरे के साथ सपाट जोड़ एक-दूसरे के ऊपर फिसलने में मदद करता है। अँगूठा अन्य अँगुलियों के पीछे हथेली के साथ । समकोण बनाता है। इसकी ऐसी स्थिति के कारण ही हम । छोटी-से-छोटी वस्तु को भी आसानी से पकड़ पाते हैं।In simple words: बाहु की अस्थियों में ऊपरी बाहु की प्रगण्डिकास्थि, अग्रबाहु की रेडियस और अल्ना, कलाई की मणिबन्धिकास्थियाँ, हथेली की करभिकाएँ और उँगलियों की अंगुलास्थियाँ शामिल हैं। ये हड्डियाँ बाहु को गतिशीलता और सहारा प्रदान करती हैं, कोहनी में कब्जा सन्धि होती है।
🎯 Exam Tip: बाहु के प्रत्येक भाग की हड्डियों (ह्यूमरस, रेडियस, अल्ना, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स, फैलेंजेज) के नाम, उनकी संरचना और उनके द्वारा निर्मित सन्धियों (जैसे कोहनी में कब्जा सन्धि) का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है। चित्र के माध्यम से स्पष्टीकरण सहायक होगा।
Question 7. सन्धि किसे कहते हैं? सन्धि कितने प्रकार की होती हैं? उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
या
मनुष्य के शरीर में कितने प्रकार की सन्धियाँ होती हैं? किसी एक प्रकार की सन्धि का चित्र बनाइए ।
या
अस्थि सन्धि से आप क्या समझती हैं? अस्थि सन्धि के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उसके प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
या
कन्दुक-खल्लिका सन्धि की रचना लिखिए व चित्र बनाइए
या
कोहनी में किस प्रकार की सन्धि पायी जाती है? चित्र सहित वर्णन कीजिए ।
या
अस्थि सन्धि से आप क्या समझती हैं? अस्थि सन्धियाँ कितने प्रकार की होती हैं? चल सन्धियों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
या
चल सन्धि क्या है ? चल सन्धि के प्रकार उदाहरण सहित लिखिए।
या
सन्धियाँ कितने प्रकार की होती हैं?
या
अस्थियों में 'अचल सन्धि से आप क्या समझती हैं?
Answer:अस्थि सन्धियाँ
शरार में दो या दो से अधिक अस्थियों के मिलने के स्थान को अस्थि-सन्धि कहते हैं। शरीर के भिन्न भिन्न अंगों की अस्थियाँ पररपा विद रहती हैं। प्रत्येक सन्धि 'बन्धक तन्तुओं तथा 'सौत्रिव: पनों की पट्टियों से बँधी रहती है। ये बन्धक सूत्र डोरे के समान होते हैं तथा अस्थियों को उचित स्थानों पर स्थित रखते हैं। जिन स्थानों पर दो अस्थियों की सन्धियाँ होती हैं, वहाँ पर अस्थियों में कोमल पदार्थ कार्टिलेज अधिक मात्रा में विद्यमान रहता है; अतः जोड़ पर इसके रहने से जोड़ में सुविधा रहती है। जोड़ पर अस्थियाँ एक-दूसरे पर घूमती हैं। इससे रगड़ होना स्वाभाविक है। इस रगड़ को बचाने के लिए प्रत्येक सन्धि पर ऐसी ग्रन्थियाँ होती हैं, जिनसे एक प्रकार का चिकना द्रव पदार्थ सदैव निकलता रहता है। यह पदार्थ सन्धि को उसी प्रकार से सुरक्षित रखता है, जिस प्रकार से कोई मशीन तेल दे देने से सुरक्षित रहती है।
क्रिया एवं महत्त्व: सन्धियों पर ही अंगों की गति होती है। यदि हमारी बाहु की अस्थि स्केप्युता से अपने वर्तमान रूप में संयुक्त न होती तो हमारी बाँह बेकार निर्जीव अवस्था में लटकती रहती। हम उसे न तो घुमा-फिरा सकते थे और न ही ऊपर से नीचे उठा सकते थे। जब हम दौड़ते हैं, लड़ते हैं या किसी वस्तु को पकड़ते हैं, तो हमारे अंगु इन सन्धियों पर ही मुड़ते हैं। ये मुड़ने की क्रिया उत्पन्न करने वाली पेशियाँ होती हैं, जो एक सन्धि से उदय होकर दूसरी अस्थि पर एक लम्बी रस्सी के समान कण्डरा द्वारा लगती है। जब पेशी संकुचित होती है, तो जिस अस्थि पर वह लगी होती है, वह ऊपर यो सामने या पीछे की ओर उठ जाती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सन्धियों के द्वारा ही हमारे शरीर की विभिन्न गतियाँ सम्भव होती हैं। यदि हमारे अस्थि-संस्थान में ये समस्त सन्धियाँ न होतीं, तो हमारा शरीर किसी भी प्रकार की गति न कर पाता तथा वह पूर्ण रूप से स्थिर ही रहता। सन्धियाँ दो प्रकार की होती हैं (1) अचल तथा (2) चल:
(1) अचल सन्धियाँ: जब दो या दो से अधिक अस्थियाँ आपस में मिलकर इस प्रकार जुड़े जाएँ कि वे बिल्कुल हिल-डुल ही न सकें, तो उस सन्धि को अचल सन्धि कहते हैं। इस प्रकार की सन्धियाँ कपाल की अस्थियों में पाई जाती हैं। इस प्रकार के जोड़ के लिए अस्थियों के किनारे इस प्रकार के होने चाहिए कि वे एक-दूसरे में पूर्ण रूप से जमकर बैठ जाएँ।
(2) चल सन्धियाँ:
दो या दो से अधिक अस्थियाँ जब एक-दूसरे के पास इस प्रकार लगी रहती हैं कि वे किसी निश्चित या कई दिशाओं में आसानी से हिल-डुल सकती हों अर्थात् गति कर सकें, तो इस प्रकार के जोड़ को चल सन्धि कहते हैं।
चल सन्धियाँ शरीर में कई प्रकार की होती हैं, जिनसे शरीर के विभिन्न अंगों को मोड़ा, घुमाया या चलाया जा सकता है। हमारे शरीर के विभिन्न अंगों को विभिन्न प्रकार के कार्य करने पड़ते हैं। ये सन्धियाँ निम्न प्रकार की होती हैं
(i) कन्दुक-खल्लिका या गेंद और प्यालेदार सन्धियाँ (Ball and Socket Joint): यह जोड़ एक प्याले जैसे भाग में किसी दूसरी अस्थि का गोल सिरा फिट रहने से बनता है। ऐसी स्थिति में गेंद जैसा गोल सिरा प्याले जैसे गोल अस्थि में आसानी से चाहे जिधर घूम सकता है। ऐसी सन्धि को कन्दुक-खल्लिका सन्धि कहते हैं। शरीर में इस प्रकार की सन्धि कन्धे पर बाहु का जोड़ तथा कूल्हे पर टॉग का जोड़ है।
(ii) कब्जा सन्धि (Hinge Joint):
इस प्रकार की सन्धियों में दोनों अस्थियाँ अथवा एक अस्थि एक ही दिशा में खुल या बन्द हो सकती है। इस प्रकार के जोड़ में निश्चय ही कोई एक अस्थि या उसका कोई प्रवर्ध इस प्रकार बढ़ा रहता है कि वह एक निश्चित दिशा के अलावा अन्य दिशा की गति को पूर्णतः रोकता है। इस प्रकार का जोड़ कोहनी, घुटना तथा उँगलियों में मिलता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र विभिन्न प्रकार की चल सन्धियों को दर्शाता है। इसमें (i) कन्दुक-खल्लिका सन्धि (Ball and Socket Joint) को ह्यूमरस के सिर और अंसउलूखल के साथ, (ii) कब्जा सन्धि (Hinge Joint) को रेडियस, अल्ना और ह्यूमरस के साथ, (iii) खूँटीदार सन्धि (Pivot Joint) को द्वितीय कशेरुका और खोपड़ी के साथ, और (iv) फिसलनदार सन्धि को रेडियस और अल्ना के साथ दिखाया गया है। ये सन्धियाँ शरीर के अंगों को विभिन्न दिशाओं में गति प्रदान करती हैं।
(iii) ख़ुटीदार सन्धि (Pivot Joint): इसे धुराग्र सन्धि भी कहते हैं। इसमें एक अस्थि या उसके प्रवर्ध धुरे की भाँति अथवा बँटे की तरह सीधे होते हैं। इन धुरों पर दूसरी अस्थियाँ या धुरिया इस प्रकार टिकी रहती हैं कि इनको किधर भी घुमाया जा सके। इनमें केवल टिकी हुई अस्थि या अस्थियाँ ही गति करेंगी, बँटे वाली नहीं। रीढ़ की अस्थि की पहली-दूसरी कशेरुका खोपड़ी के साथ इस प्रकार का जोड़ बनाती हैं। वहीं पर इस कशेरुका का एक प्रवर्ध निकला रहता है, जिस पर खोपड़ी रखी रहती है। इस प्रकार खोपड़ी इस पर आसानी से घूमती है।
(iv) फिसलनदार सन्धि (Sliding Joint): इसे विसप सन्धि भी कहते हैं। ऐसी सन्धि वास्तव में कोई जोड़ नहीं बनाती है, बल्कि इनकी अस्थियाँ एक-दूसरे के ऊपर अपने चपटे तल के पास-पास लगी रहती हैं। इन दोनों की चौड़ाई में कई उपास्थियाँ होती हैं जो इन अस्थियों को गति करने के लिए फिसलने में मदद करती हैं। कलाई की अस्थि के जोड तथा कशेरुका के जोड़ों में इसी प्रकार की सन्धि होती है। यद्यपि हमारी अँगुलियों में कब्जे की तरह के पोरुए होते हैं, जबकि इन अस्थियों का आपसी जोड़ भी फिसलने वाला ही होता है।
(v) पर्याण या सैडिल सन्धि (Saddle Joint): इस प्रकार की अस्थि सन्धि हमारे हाथ के अँगूठे की मेटाकार्पल्स तथा कार्पल्स के मध्य पाई जाती है। इस सन्धि की विशिष्ट रचना के ही कारण. हाथ को अँगूठा अन्य अँगुलियों की अपेक्षा इधर-उधर अधिक घुमाया जा सकता है। सैडिल सन्धि की रचना कन्दुक-खल्लिका से मिलती-जुलती होती हैं, परन्तु इसे सन्धि में पाए जाने वाले बॉल तथा साकेट कम विकसित होते हैं।
अस्थियों की सन्धियाँ या जोड़ सदैव ही विशेष प्रकार की डोरियों या स्नायुओं (Ligaments) से बँधे रहते हैं। इन्हीं जोड़ों पर मांसपेशियाँ लगी रहती हैं। मांसपेशियाँ गति कराने में सहायक होती हैं, जबकि ये डोरियाँ इन्हें बाँधे रखने में। इस प्रकार के जोड़ों में उपास्थियाँ भी कई बार महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं।
चल सन्धि की रचना
हमारे शरीर की चल-सन्धियों में इनमें कई प्रबन्ध होते हैं, ताकि अस्थियाँ आपस में रगड़ खाकर खराब न हों और वे इस प्रकार बँधी रहें कि वे अपने स्थान से हटें भी नहीं। इसके लिए श्वेत स्नायु की गोल या चौड़ी डोरियाँ होती हैं। ये होरियाँ ही इन अस्थियों को एक-दूसरे के साथ निश्चित स्थान की ओर निश्चित दिशा में बॉधे रखती हैं। छोटी पेशियाँ इन्हें खींचकर किसी भी दिशा या गन्तव्य दिशा में हटाने की कोशिश करती हैं, किन्तु स्प्रिंग की तरह उल्टी दिशा में ये इन्हें पूर्व-निर्धारित स्थान पर खींच लेती हैं। अस्थियों को रगड़ से बचाने का विशेष प्रबन्ध होता है। इसके लिए दोनों अस्थियों के बीच एक थैली जैसी वस्तु होती है जिसके अन्दर एक गाढ़ा स्नेहयुक्त तरल पदार्थ होता है। इस तरल पदार्थ के कारण अस्थियों के सिरे सदैव चिकने रहते हैं। चिकने तरल पदार्थ वाले इन थैलों को स्नेहको यो स्राव-सम्पुट (Synovial capsules) कहते हैं। इनके अन्दर भरे चिकने पदार्थ को स्नेहक द्रव (Synovial fluid) कहते हैं।In simple words: सन्धि वह स्थान है जहाँ दो या दो से अधिक हड्डियाँ मिलती हैं। ये दो प्रकार की होती हैं-अचल (जो गति नहीं करतीं, जैसे कपाल में) और चल (जो गति करती हैं)। चल सन्धियाँ विभिन्न प्रकार की होती हैं जैसे कन्दुक-खल्लिका, कब्जा, खूँटीदार, फिसलनदार और पर्याण सन्धि, जो शरीर को गतिशीलता प्रदान करती हैं।
🎯 Exam Tip: सन्धि की परिभाषा, उसके प्रकार (अचल और चल) और चल सन्धियों के प्रत्येक प्रकार (कन्दुक-खल्लिका, कब्जा, खूँटीदार, फिसलनदार, पर्याण) का उदाहरण सहित विस्तृत वर्णन करें। चित्र के माध्यम से सन्धियों को समझाना उत्तर को पूर्ण बनाता है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. मानव शरीर में पाई जाने वाली अस्थियों के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
Answer: यह सत्य है कि प्रायः सभी अस्थियों की आन्तरिक रचना एक समान ही होती है, परन्तु उनके बाहरी आकार में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है। आकार की भिन्नता के आधार पर मानव शरीर की समस्त अस्थियों को निम्नलिखित छः प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है
1. चपटी अस्थियाँ: कपाल की अस्थियाँ।
2. लम्बी अस्थियाँ: बाँहों तथा टाँगों की अस्थियाँ।
3. गोल अस्थियाँ: कलाई तथा टखने की अस्थियाँ।
4. विषम अस्थियाँ: मेरुदण्ड की अस्थियाँ।
5. छोटी अस्थियाँ: अँगुलियों की अस्थियाँ।
6. कीलाकार अस्थियाँ: टखने की अस्थियों की दूसरी तह के भीतर की तीन अस्थियाँ।In simple words: मानव शरीर की हड्डियाँ उनके आकार के आधार पर छह प्रकारों में विभाजित होती हैं: चपटी (कपाल), लम्बी (बाँहें, टाँगें), गोल (कलाई, टखना), विषम (मेरुदण्ड), छोटी (उँगलियाँ), और कीलाकार (टखने की कुछ हड्डियाँ)।
🎯 Exam Tip: अस्थियों के प्रकारों को याद रखने के लिए उनके आकार और शरीर में उनके स्थान को ध्यान में रखें। प्रत्येक प्रकार के लिए एक-दो उदाहरण देना पर्याप्त होता है।
Question 2. सन्धि किसे कहते हैं? सन्धियों के प्रकार लिखिए। कन्धे में किस प्रकार की सन्धि पाई जाती है?
या
अस्थि सन्धियाँ किसे कहते हैं? कब्जेदार जोड़ के बारे में लिखिए।
या
अस्थि-सन्धि किसे कहते हैं। सन्धियों के नाम उदाहरण सहित लिखिए।
Answer: शरीर के कंकाल तन्त्र में दो या दो से अधिक अस्थियों के मिलने के स्थान को सन्धि कहते हैं। सन्धियाँ प्रमुखतः दो प्रकार की होती हैं (1) चल सन्धि तथा (2) अचल सन्धि ।
चल सन्धियाँ पूर्ण या अपूर्ण प्रकार की हो सकती हैं। पूर्ण सन्धियाँ कई प्रकार की होती हैं; जैसे-कन्दुक-खल्लिका सन्धि, कब्जा सन्धि, धुराग्र या कीलक सन्धि, विसप सन्धि आदि । कन्धे के स्थान पर कन्दुक-खल्लिका सन्धि पाई जाती है।In simple words: सन्धि वह जगह है जहाँ दो या दो से अधिक हड्डियाँ मिलती हैं। सन्धियाँ मुख्य रूप से अचल (स्थिर) और चल (गतिशील) दो प्रकार की होती हैं। कन्धे में कन्दुक-खल्लिका सन्धि पाई जाती है, जो इसे विभिन्न दिशाओं में घूमने की अनुमति देती है।
🎯 Exam Tip: सन्धि की परिभाषा को स्पष्ट करें और उसके दो मुख्य प्रकारों (चल और अचल) को बताएं। चल सन्धियों के विभिन्न उप-प्रकारों के नाम और कन्धे की सन्धि का विशिष्ट उदाहरण देना महत्वपूर्ण है।
Question 3. हमारे मेरुदण्ड में पाई जाने वाली कशेरुकाओं की संख्या एवं स्थिति का उल्लेख कीजिए ।
या
मेरुदण्ड में कितनी अस्थियाँ होती हैं?
Answer:एक वयस्क व्यक्ति के मेरुदण्ड में कुल 26 कशेरुकाएँ होती हैं, जिनकी स्थिति के अनुसार संख्या निम्नलिखित है
| क्र०सं० | स्थिति | संख्या |
| 1. | गर्दन की कशेरुकाएँ | 7 |
| 2. | अभिपृष्ठ कशेरुकाएँ (वक्ष-स्थल) | 12 |
| 3. | कटि अथवा कमर की कशेरुकाएँ | 5 |
| 4. | त्रिकास्थि व अनुत्रिक कशेरुकाएँ | 2 |
| मेरुदण्ड की कुल कशेरुकाएँ | 26 |
🎯 Exam Tip: मेरुदण्ड की कुल कशेरुकाओं की संख्या (26) और प्रत्येक क्षेत्र में उनकी सटीक संख्या को याद रखना महत्वपूर्ण है। तालिका के रूप में जानकारी प्रस्तुत करना उत्तर को स्पष्ट और प्रभावी बनाता है।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. अस्थि-संस्थान से क्या आशय है?
Answer: शरीर की समस्त अस्थियों की व्यवस्था को अस्थि-संस्थान या कंकाल-तन्त्र के नाम से जाना जाता है।
In simple words: अस्थि-संस्थान शरीर की सभी हड्डियों की व्यवस्थित संरचना को कहते हैं, जो शरीर को ढाँचा प्रदान करती है।
🎯 Exam Tip: यह प्रश्न अस्थि-संस्थान की मूल परिभाषा पर आधारित है, जिसे स्पष्ट रूप से समझाना महत्त्वपूर्ण है।
Question 2. वयस्क मनुष्य में अस्थियों की कुल संख्या कितनी होती है?
या
शरीर में कुल कितनी अस्थियाँ होती है ।
Answer: वयस्क मनुष्य के अस्थि-संस्थान में प्राय: 206 अस्थियाँ होती हैं।
In simple words: एक वयस्क इंसान के शरीर में आमतौर पर 206 हड्डियाँ होती हैं, जो उसके कंकाल तंत्र का निर्माण करती हैं।
🎯 Exam Tip: यह एक तथ्यात्मक प्रश्न है; सटीक संख्या याद रखना स्कोरिंग के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 3. मानव अस्थि-संस्थान को कितने भागों में विभक्त किया जा सकता है?
Answer: मानव अस्थि-संस्थान को तीन मुख्य भागों में बाँटा जा सकता है (1) खोपड़ी, (2) धड़ और (3) ऊर्ध्व तथा अधोशाखाएँ।
In simple words: मानव कंकाल को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा गया है- सिर (खोपड़ी), धड़ और हाथ-पैरों की हड्डियाँ (शाखाएँ)।
🎯 Exam Tip: कंकाल-तन्त्र के प्रमुख भागों का सही वर्गीकरण और नामकरण करना आवश्यक है।
Question 4. अस्थियों के विकास के लिए कौन-कौन से पोषक तत्त्व आवश्यक हैं?
Answer: कैल्सियम तथा फॉस्फोरस अस्थियों के विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्त्व हैं।
In simple words: हड्डियों के सही विकास और मजबूती के लिए कैल्शियम और फॉस्फोरस नामक खनिज बहुत जरूरी होते हैं।
🎯 Exam Tip: हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक खनिजों का सही उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।
Question 5. अस्थियों के खोखले भाग को क्या कहते हैं? उसमें क्या भरा रहता है?
Answer: अस्थियों के खोखले भाग को अस्थि-गुहा कहते हैं। उसमें अस्थिमज्जा नामक गूदेदार पदार्थ भरा रहता है।
In simple words: हड्डी के अंदर के खाली हिस्से को अस्थि-गुहा कहते हैं, जिसमें अस्थिमज्जा (बोन मैरो) भरा होता है।
🎯 Exam Tip: अस्थियों की आंतरिक संरचना के इन महत्वपूर्ण हिस्सों के नाम और कार्य को समझना आवश्यक है।
Question 6. लाल रक्त कणिकाओं का निर्माण कहाँ होता है?
Answer: लाल रक्त कणिकाएँ अस्थियों के अस्थिमज्जा भाग में बनती हैं।
In simple words: हमारे शरीर में लाल रक्त कोशिकाएं हड्डियों के अंदर मौजूद अस्थिमज्जा में बनती हैं।
🎯 Exam Tip: रक्त कणिकाओं के निर्माण स्थल का सही उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।
Question 7. बाल्यावस्था में मेरुदण्ड में कशेरुकाओं की संख्या बताइए ।
Answer: बच्चों के मेरुदण्ड में 33 कशेरुकाएँ होती हैं।
In simple words: बच्चों की रीढ़ की हड्डी में कुल 33 कशेरुकाएं होती हैं, जो वयस्क होने पर आपस में जुड़कर कम हो जाती हैं।
🎯 Exam Tip: बच्चों और वयस्कों के मेरुदण्ड में कशेरुकाओं की संख्या में अंतर को याद रखना आवश्यक है।
Question 8. वयस्क व्यक्ति के मेरुदण्ड में कितनी कशेरुकाएँ पाई जाती हैं?
Answer: वयस्क व्यक्ति के मेरुदण्ड में 26 कशेरुकाएँ पाई जाती हैं।
In simple words: एक वयस्क व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी में 26 कशेरुकाएं होती हैं, क्योंकि कुछ हड्डियां बचपन में जुड़ जाती हैं।
🎯 Exam Tip: यह भी एक तथ्यात्मक प्रश्न है, जिसमें संख्या का सही उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।
Question 9. सिर के मुख्य भाग कौन-से हैं?
Answer: सिर के दो मुख्य भाग हैं (1) कपाल तथा (2) चेहरा।
In simple words: सिर के दो मुख्य हिस्से होते हैं - कपाल (जो दिमाग को ढकता है) और चेहरा।
🎯 Exam Tip: सिर के प्रमुख दो भागों का सही नामकरण करना आवश्यक है।
Question 10. हमारे शरीर में लम्बी अस्थियाँ कहाँ-कहाँ पाई जाती हैं?
Answer: हमारे शरीर में बाँहों तथा टाँगों में लम्बी अस्थियाँ पाई जाती हैं।
In simple words: शरीर में लंबी हड्डियाँ मुख्य रूप से हाथों और पैरों में पाई जाती हैं, जैसे जांघ की हड्डी।
🎯 Exam Tip: शरीर में विभिन्न प्रकार की अस्थियों के स्थान का ज्ञान होना चाहिए।
Question 11. मानव खोपड़ी में कुल कितनी अस्थियाँ होती हैं?
Answer: मानव खोपड़ी में कुल 22 अस्थियाँ होती हैं, जिनमें से 8 कपाल में तथा 14 चेहरे में स्थित होती हैं।
In simple words: मानव खोपड़ी में कुल 22 हड्डियां होती हैं, जिनमें से 8 दिमाग के चारों ओर और 14 चेहरे में होती हैं।
🎯 Exam Tip: खोपड़ी की कुल अस्थियों की संख्या और उनके विभाजन का सटीक ज्ञान महत्वपूर्ण है।
Question 12. मानव खोपड़ी में प्रायः किस प्रकार की सन्धियाँ पाई जाती हैं?
Answer: मानव खोपड़ी में प्रायः अचल सन्धियाँ होती हैं।
In simple words: मानव खोपड़ी की हड्डियां आपस में अचल संधियों से जुड़ी होती हैं, जिसका मतलब है कि वे हिलती नहीं हैं।
🎯 Exam Tip: विभिन्न प्रकार की सन्धियों और उनके स्थानों को समझना महत्वपूर्ण है।
Question 13. अस्थि सन्धि किसे कहते हैं? सन्धियों के प्रकार लिखिए ।
Answer: अस्थि-संस्थान में दो अथवा दो से अधिक अस्थियों के परस्पर सम्बद्ध होने की व्यवस्था एवं स्थल को अस्थि सन्धि कहते हैं। शरीर में चल तथा अचल दो प्रकार की अस्थि सन्धियाँ पायी जाती हैं।
In simple words: अस्थि सन्धि वह जगह है जहाँ दो या दो से अधिक हड्डियाँ मिलती हैं; ये मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं - हिलने वाली (चल) और न हिलने वाली (अचल)।
🎯 Exam Tip: सन्धि की परिभाषा और उसके मुख्य प्रकारों का उल्लेख करना आवश्यक है।
Question 14. शरीर में सन्धियों से क्या लाभ हैं?
या
शरीर में कंकाल सन्धियों का क्या महत्त्व है?
Answer: शरीर की गतिशीलता में सन्धियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है। इन्हीं के कारण हम अपने हाथ, पैर तथा गर्दन आदि को हिला-डुला पाते हैं।
In simple words: संधियाँ शरीर को हिलने-डुलने और गति करने में मदद करती हैं, जिससे हम अपने अंगों को आसानी से चला पाते हैं।
🎯 Exam Tip: सन्धियों के कार्यात्मक महत्व को स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए।
Question 15. शरीर में मूल रूप से कितने प्रकार की सन्धियाँ पाई जाती हैं?
Answer: हमारे शरीर में मूल रूप से दो प्रकार की सन्धि पाई जाती हैं। जिन्हें क्रमशः अचल सन्धि तथा चल सन्धि कहा जाता है।
In simple words: मूलतः शरीर में दो प्रकार की संधियां होती हैं - अचल संधियां जो स्थिर रहती हैं, और चल संधियां जो गति करती हैं।
🎯 Exam Tip: सन्धियों के मुख्य वर्गीकरण को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 16. अचल सन्धि का क्या अर्थ है? यह शरीर में कहाँ पायी जाती हैं?
Answer: हमारे शरीर की उन अस्थि-सन्धियों को अचल सन्धि कहा जाता है, जिनमें किसी प्रकार की गति नहीं होती तथा सम्बन्धित अस्थियाँ स्थिर होती हैं। अचल सन्धियाँ कपाल की अस्थियों में पाई : जाती हैं।
In simple words: अचल संधियां वे होती हैं जिनमें हड्डियां बिल्कुल हिलती नहीं हैं, जैसे कि सिर की खोपड़ी की हड्डियां।
🎯 Exam Tip: अचल सन्धि की परिभाषा और उसके सटीक उदाहरण का उल्लेख करना चाहिए।
Question 17. पूर्ण चल सन्धियाँ कितने प्रकार की होती हैं?
Answer: पूर्ण चल सन्धियाँ पाँच प्रकार की होती हैं
1. कब्जा सन्धि,
2. कन्दुक-खल्लिका सन्धि,
3. ख़ुटीदार सन्धि,
4. फिसलनदार या प्रसर सन्धि तथा
5. सैडिल या पर्याण सन्धि ।
In simple words: पूरी तरह हिलने वाली संधियां पांच मुख्य प्रकार की होती हैं, जैसे कब्ज़े, गेंद-प्याले, धुरी, फिसलने वाली और सैडल संधियां।
🎯 Exam Tip: चल सन्धियों के विभिन्न प्रकारों के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 18. चल तथा अचल सन्धि में क्या अन्तर है?
Answer: चल सन्धियों में विभिन्न प्रकार की निर्धारित गतियाँ होती हैं, जबकि अचल सन्धियों में किसी प्रकार की गति नहीं होती ।
In simple words: चल संधियां अंगों को हिलाने-डुलाने में मदद करती हैं, जबकि अचल संधियां स्थिर होती हैं और कोई गति नहीं होने देतीं।
🎯 Exam Tip: चल और अचल सन्धियों के बीच के मुख्य अंतर (गतिशीलता) को स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए।
Question 19. गेंद-गड्डा (कन्दुक-खल्लिका) सन्धि के दो उदाहरण बताइए।
Answer: गेंद-गड्डा या कन्दुक-खल्लिका सन्धि के उदाहरण हैं-कन्धे की अस्थि सन्धि तथा कूल्हे की अस्थि सन्धि ।
In simple words: गेंद-प्यालेदार संधि के दो मुख्य उदाहरण हैं कंधे का जोड़ और कूल्हे का जोड़, जहाँ एक हड्डी का गोलाकार सिरा दूसरी हड्डी के गड्ढे में फिट होता है।
🎯 Exam Tip: कन्दुक-खल्लिका सन्धि के उदाहरणों को याद रखना स्कोरिंग के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 20. कब्जा सन्धि तथा बँटीदार सन्धि का सामान्य परिचय दीजिए।
Answer:
(1) कब्जा सन्धि: इस प्रकार की सन्धियों में दोनों अस्थियों अथवा एक अस्थि कब्जे की तरह एक ही दिशा में खुल या बन्द हो सकती है; जैसे-कुहनी या उँगली ।
(2) ख़ुटीदार सन्धि: इसमें एक अस्थि या उसके प्रवर्ध धुरे की भाँति अथवा बँटे की तरह सीधी होती हैं। इन पर दूसरी अस्थि को किसी भी तरफ घुमाया जा सकता है; जैसे-कशेरुका के एक प्रवर्ध पर रखी खोपड़ी। इस प्रकार खोपड़ी दाएँ या बाएँ, किधर भी घूम सकती है।
In simple words: कब्जा सन्धि दरवाजे के कब्ज़े की तरह एक ही दिशा में खुलती-बंद होती है (जैसे कोहनी), जबकि खूँटीदार सन्धि में एक हड्डी दूसरी हड्डी के चारों ओर घूम सकती है (जैसे सिर का गर्दन पर घूमना)।
🎯 Exam Tip: इन दोनों प्रकार की सन्धियों के कार्य और उनके उदाहरणों को स्पष्ट रूप से समझाना आवश्यक है।
बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न-निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए
Question 1. कंकाल-तन्त्र के मुख्य कार्य हैं (क) शरीर को आकृति एवं दृढ़ता प्रदान करना (ख) रक्त कणों का निर्माण करना (ग) शरीर को गति प्रदान करना (घ) ये सभी
Answer: (घ) ये सभी
In simple words: कंकाल-तन्त्र शरीर को आकार देता है, हड्डियाँ रक्त कण बनाती हैं, और संधियाँ गति में मदद करती हैं, इसलिए सभी कार्य इसके मुख्य कार्य हैं।
🎯 Exam Tip: कंकाल-तन्त्र के सभी प्रमुख कार्यों को समझना और याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 2. हड्डी में कड़ापन किस तत्त्व के कारण होता है? (क) लौह तत्त्व (ख) सोडियम (ग) मैग्नीशियम (घ) कैल्सियम
Answer: (घ) कैल्सियम
In simple words: हड्डियों का कड़ापन मुख्य रूप से कैल्शियम नामक खनिज के कारण होता है, जो उनकी मजबूती प्रदान करता है।
🎯 Exam Tip: हड्डियों की मजबूती के लिए कैल्शियम का महत्व एक बुनियादी तथ्य है जिसे याद रखना चाहिए।
Question 3. हड्डियाँ किस तत्त्व से मजबूत होती हैं? (क) प्रोटीन (ख) सोडियम (ग) कैल्सियम (घ) वसा
Answer: (ग) कैल्सियम
In simple words: हड्डियाँ मुख्य रूप से कैल्शियम नामक खनिज के कारण मजबूत होती हैं, जो उनकी संरचना का एक महत्वपूर्ण घटक है।
🎯 Exam Tip: हड्डियों के स्वास्थ्य से जुड़े पोषक तत्वों पर ध्यान दें, विशेषकर कैल्शियम पर।
Question 4. खोपड़ी में अस्थियों की कुल संख्या कितनी होती है? (क) आठ (ख) चौदह (ग) बाईस (घ) चौबीस
Answer: (ग) बाईस
In simple words: मानव खोपड़ी में कुल 22 हड्डियां होती हैं, जिनमें कपाल और चेहरे की हड्डियां शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: खोपड़ी में कुल हड्डियों की संख्या सीधे तौर पर याद रखना स्कोरिंग के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 5. मानव कंकाल में कितनी अस्थियाँ होती हैं? (क) 100 (ख) 206 (ग) 200 (घ) 106
Answer: (ख) 206
In simple words: एक वयस्क मानव कंकाल में सामान्यतः 206 हड्डियां होती हैं।
🎯 Exam Tip: मानव शरीर में हड्डियों की कुल संख्या एक महत्वपूर्ण सामान्य ज्ञान है जिसे याद रखना चाहिए।
Question 6. बच्चों के मेरुदण्ड में कितनी अस्थियाँ होती हैं? (क) 35 (ख) 33 (ग) 30 (घ) 36
Answer: (ख) 33
In simple words: बच्चों की रीढ़ की हड्डी में 33 कशेरुकाएं होती हैं, जो वयस्क होने पर कुछ हड्डियों के जुड़ने से कम हो जाती हैं।
🎯 Exam Tip: बच्चों और वयस्कों के मेरुदण्ड में कशेरुकाओं की संख्या में अंतर को स्पष्ट रूप से याद रखें।
Question 7. कन्धे पर किस प्रकार की सन्धि होती है? (क) अल्पचल सन्धि (ख) कब्जेनुमा सन्धि (ग) अचल सन्धि (घ) गेंद-गड्डा सन्धि
Answer: (घ) गेंद-गड्डा सन्धि
In simple words: कंधे का जोड़ एक गेंद-प्यालेदार संधि का उदाहरण है, जो हाथ को कई दिशाओं में घुमाने की अनुमति देता है।
🎯 Exam Tip: शरीर में विभिन्न सन्धियों के प्रकार और उनके स्थानों के उदाहरणों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 8. कोहनी का जोड़ कौन-सा जोड़ कहलाता है? (क) धुराग्र (ख) कब्जेदार (ग) फिसलने वाला (घ) ख़ुटीदार
Answer: (ख) कब्जेदार
In simple words: कोहनी का जोड़ एक कब्जेदार संधि है, जो केवल एक ही दिशा में मुड़ने या सीधा होने की अनुमति देता है, जैसे दरवाजे का कब्ज़ा।
🎯 Exam Tip: कब्जेदार संधि का कार्य और कोहनी जैसे उदाहरणों को समझना महत्वपूर्ण है।
Question 9. चेहरे में कितनी अस्थियाँ पाई जाती हैं? (क) अठारह (ख) बीस (ग) चौदह (घ) ये सभी
Answer: (ग) चौदह
In simple words: मानव चेहरे में कुल 14 हड्डियां होती हैं जो चेहरे की संरचना बनाती हैं।
🎯 Exam Tip: खोपड़ी के विभिन्न भागों में हड्डियों की संख्या तथ्यात्मक जानकारी है, जिसे याद रखना चाहिए।
Question 10. ऊपरी बाह की हडडी होती है (क) लम्बी (ख) मोटी (ग) चपटी (घ) कैसी भी
Answer: (क) लम्बी
In simple words: ऊपरी बांह की हड्डी (ह्यूमरस) एक लंबी हड्डी होती है जो कंधे से कोहनी तक फैली होती है।
🎯 Exam Tip: शरीर के प्रमुख अस्थियों के प्रकार और उनके गुणों को समझना आवश्यक है।
Question 11. ऊपरी बाहु की अस्थि है (क) अंसफलक (ख) प्रगण्डिका (ग) बहिः प्रकोण्ठिकास्थि (घ) अन्तः प्रकोण्ठिकास्थि
Answer: (ख) प्रगण्डिका
In simple words: ऊपरी बांह की मुख्य हड्डी को प्रगण्डिका (ह्यूमरस) कहते हैं।
🎯 Exam Tip: शरीर के मुख्य अंगों की हड्डियों के वैज्ञानिक नाम याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 12. गर्दन के भाग में ग्रीवा कशेरुकाओं की संख्या होती है (क) 4 (ख) 5 (ग) 6 (घ) 7
Answer: (घ) 7
In simple words: गर्दन के हिस्से में 7 ग्रीवा कशेरुकाएं होती हैं, जो गर्दन की गतिशीलता में मदद करती हैं।
🎯 Exam Tip: मेरुदण्ड के विभिन्न भागों में कशेरुकाओं की संख्या का सटीक ज्ञान आवश्यक है।
Question 13. घुटना किस प्रकार की सन्धि का उदाहरण है? (क) कन्दुक-खल्लिका (गेंद-गड्ढा) जोड़ (ख) कब्जेदार जोड़ (ग) कीलदार जोड़ (घ) फिसलने वाला जोड़
Answer: (ख) कब्जेदार जोड़
In simple words: घुटने का जोड़ एक कब्जेदार संधि है, जो पैर को केवल आगे-पीछे मोड़ने की अनुमति देता है।
🎯 Exam Tip: शरीर के प्रमुख जोड़ों के प्रकार और उनके उदाहरणों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 14. रीढ़ की हड्डी में पाया जाता है (क) कन्दुक-खल्लिका जोड़ (ख) चूलदार जोड़ (ग) कीलदार जोड़ । (घ) फिसलने वाला (विसप) जोड़
Answer: (ग) कीलदार जोड़
In simple words: रीढ़ की हड्डी में कीलदार जोड़ पाए जाते हैं, जो सीमित गतिशीलता प्रदान करते हैं।
🎯 Exam Tip: रीढ़ की हड्डी में सन्धियों के प्रकार की पहचान करना महत्वपूर्ण है।
Question 15. मानव शरीर में कितने प्रकार के जोड़ होते हैं? (क) दो (ख) तीन (ग) चार (घ) पाँच
Answer: (क) दो
In simple words: मानव शरीर में मुख्य रूप से दो प्रकार के जोड़ होते हैं - चल और अचल संधियां।
🎯 Exam Tip: सन्धियों के मुख्य वर्गीकरण की संख्या को याद रखना चाहिए।
Question 16. मानव शरीर में कितनी जोड़ी पसलियाँ पाई जाती हैं? (क) 5 जोड़ी (ख) 10 जोड़ी (ग) 12 जोड़ी (घ) 20 जोड़ी
Answer: (ग) 12 जोड़ी
In simple words: मानव शरीर में कुल 12 जोड़ी पसलियाँ होती हैं, जो वक्ष पिंजरे का निर्माण करती हैं।
🎯 Exam Tip: पसलियों की संख्या एक तथ्यात्मक जानकारी है जिसे सटीक रूप से याद रखना चाहिए।
Question 17. खूटी (धुराग्र) सन्धि पाई जाती है (क) कन्धे में (ख) घुटने में (ग) खोपड़ी में (घ) कोहनी में
Answer: (ग) खोपड़ी में
In simple words: खूँटीदार संधि खोपड़ी और गर्दन के ऊपरी कशेरुका के बीच पाई जाती है, जो सिर को घुमाने में मदद करती है।
🎯 Exam Tip: धुराग्र या खूँटीदार सन्धि के स्थान का सही उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।
Question 18. अचल सन्धि कहाँ पाई जाती है? (क) खोपड़ी में (ख) घुटने में (ग) कलाई में (घ) कोहनी में
Answer: (क) खोपड़ी में
In simple words: अचल संधियां खोपड़ी में पाई जाती हैं, जहाँ हड्डियां बिना हिले-डुले मजबूती से जुड़ी होती हैं।
🎯 Exam Tip: अचल सन्धियों के विशिष्ट उदाहरणों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 19. आठ हड्डियाँ पायी जाती हैं (क) रीढ़ में (ख) पेट में (ग) कपाल में (घ) हथेली में
Answer: (ग) कपाल में
In simple words: कपाल में आठ हड्डियां होती हैं जो मस्तिष्क को सुरक्षा प्रदान करती हैं।
🎯 Exam Tip: कपाल में हड्डियों की संख्या एक सीधा तथ्यात्मक प्रश्न है।
Question 20. रीढ़ की हड्डी में कितनी कशेरुकाएँ पायी जाती हैं?
या
एक वयस्क व्यक्ति के मेरुदण्ड में कितनी कशेरुकाएँ होती हैं? (क) 28 (ख) 24 (ग) 26 (घ) 25
Answer: (ग) 26
In simple words: एक वयस्क की रीढ़ की हड्डी में 26 कशेरुकाएं होती हैं, जो बचपन की 33 कशेरुकाओं के जुड़ने से बनती हैं।
🎯 Exam Tip: वयस्क मेरुदण्ड में कशेरुकाओं की संख्या का सही उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।
Free study material for Home Science
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 17 मानव कंकाल प्रणाली और जोड़
Textbook Solutions for Class 10 Home Science Chapter 17 मानव कंकाल प्रणाली और जोड़
Explore reliable textbook solutions for Chapter 17 मानव कंकाल प्रणाली और जोड़ tailored for Class 10 learners. Utilizing these complete exercise answers ensures your preparation aligns exactly with official UP Board standards for Home Science.
Mastering Theoretical and Practical Questions
Clear, methodical explanations accompany every challenging problem within the Class 10 Home Science text. Engaging with these detailed answers lays a solid foundation for advanced learning and improves foundational clarity for upcoming assessments.
Effective Self-Study and Homework Assistance
Consistent practice with these solution guides cultivates faster problem-solving habits and clearer logical structuring. For a complete preparation experience, pair these textbook answers with our dedicated revision notes and sample papers for Class 10 Home Science.
FAQs
The complete and updated UP Board Solutions Class 10 Home Science Chapter 17 मानव कंकाल प्रणाली और जोड़ is available for free on StudiesToday.com. These solutions for Class 10 Home Science are as per latest UP Board curriculum.
Yes, our experts have revised the UP Board Solutions Class 10 Home Science Chapter 17 मानव कंकाल प्रणाली और जोड़ as per 2026 exam pattern. All textbook exercises have been solved and have added explanation about how the Home Science concepts are applied in case-study and assertion-reasoning questions.
Toppers recommend using UP Board language because UP Board marking schemes are strictly based on textbook definitions. Our UP Board Solutions Class 10 Home Science Chapter 17 मानव कंकाल प्रणाली और जोड़ will help students to get full marks in the theory paper.
Yes, we provide bilingual support for Class 10 Home Science. You can access UP Board Solutions Class 10 Home Science Chapter 17 मानव कंकाल प्रणाली और जोड़ in both English and Hindi medium.
Yes, you can download the entire UP Board Solutions Class 10 Home Science Chapter 17 मानव कंकाल प्रणाली और जोड़ in printable PDF format for offline study on any device.