UP Board Solutions Class 10 Hindi Chapter 7 Ramnaresh Tripathi

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Detailed Chapter 7 रामनरेश त्रिपाठी UP Board Solutions for Class 10 Hindi

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Class 10 Hindi Chapter 7 रामनरेश त्रिपाठी UP Board Solutions PDF

कवि-परिचय

 

Question 1. श्री रामनरेश त्रिपाठी का जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्य-कृतियों (रचनाओं) का उल्लेख कीजिए। [2009, 10, 16] या रामनरेश त्रिपाठी का जीवन-परिचय देते हुए उनकी किसी एक रचना का नामोल्लेख कीजिए। [2012, 13, 14]
Answer: पं० रामनरेश त्रिपाठी ऐसे कवि थे जिन्होंने देश-प्रेम, मानव-सेवा और पवित्र प्रेम के गीत गाए। उनकी कविताओं में छायावाद का सुन्दर रूप और आदर्शवाद का मानवीय विचार एक साथ मिलते हैं। वे एक बहुत प्रतिभाशाली साहित्यकार थे। उनकी देशभक्ति से भरी कविताएँ बहुत दिल को छूने वाली हैं। रामनरेश त्रिपाठी ने हमेशा अपनी मातृभूमि के प्रति गहरा प्रेम और सम्मान दिखाया।

जीवन-परिचय: हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि रामनरेश त्रिपाठी का जन्म 1889 ई० में उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के कोइरीपुर गाँव में एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता पंडित रामदत्त त्रिपाठी एक धार्मिक ब्राह्मण थे। उन्होंने नौवीं कक्षा तक पढ़ाई की और बाद में खुद से पढ़कर और यात्रा करके बहुत ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने साहित्य को ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। उन्हें केवल हिंदी ही नहीं, बल्कि अंग्रेजी, संस्कृत, बांग्ला और गुजराती भाषाओं का भी अच्छा ज्ञान था। उन्होंने दक्षिण भारत में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए बहुत काम किया। वे हिंदी-साहित्य-सम्मेलन की इतिहास परिषद् के सभापति भी थे और साथ ही स्वतंत्रता सेनानी तथा देश-सेवी भी थे। साहित्य की सेवा करते हुए यह महान कवि 1962 ई० में चल बसे।

रचनाएँ: त्रिपाठी जी श्रेष्ठ कवि होने के साथ-साथ बाल-साहित्य और संस्मरण साहित्य के लेखक भी थे। नाटक, निबंध, कहानी, काव्य, आलोचना और लोक-साहित्य पर उनका पूरा अधिकार था। उनकी मुख्य काव्य-रचनाएँ इस प्रकार हैं:

  1. खण्डकाव्य- 'पथिक', 'मिलन' और 'स्वप्न' उनके तीन प्रमुख प्रबंधात्मक खण्डकाव्य हैं। इनकी कहानियाँ ऐतिहासिक और पौराणिक हैं, जिनमें देशप्रेम और राष्ट्रीयता की भावना भरी हुई है।
  2. मुक्तक काव्य- 'मानसी' एक फुटकर काव्य-रचना है। इसमें त्याग, देश-प्रेम, मानव-सेवा और बलिदान का संदेश देने वाली प्रेरक कविताएँ शामिल हैं।
  3. लोकगीत- 'ग्राम्य गीत' लोकगीतों का संग्रह है। इसमें गाँव के जीवन के सजीव और प्रभावशाली गीत हैं। इसके अलावा, त्रिपाठी जी की कुछ अन्य प्रमुख कृतियाँ हैं:

उपन्यास: 'वीरांगना' और 'लक्ष्मी'
नाटक: 'सुभद्रा', 'जयन्त' और 'प्रेमलोक'
कहानी-संग्रह: 'स्वप्नों के चित्र'
आलोचना: 'तुलसीदास और उनकी कविता'
संपादित: 'कविता कौमुदी' और 'शिवा बावनी'
संस्मरण: 'तीस दिन मालवीय जी के साथ'
टीका: 'श्रीरामचरितमानस की टीका'
बाल-साहित्य: 'आकोश की बातें', 'बालकथा कहानी', 'गुपचुप कहानी', 'फूलरानी' और 'बुद्धि विनोद'
जीवन-चरित: 'महात्मा बुद्ध' तथा 'अशोक'

साहित्य में स्थान: खड़ी बोली के कवियों में उनका प्रमुख स्थान है। अपनी सेवाओं से हिंदी साहित्य के सच्चे सेवक के रूप में त्रिपाठी जी प्रशंसा के पात्र हैं। राष्ट्रीय भावनाओं को जगाने वाले कवि के रूप में वे हिंदी-साहित्य में एक खास जगह रखते हैं।
In simple words: रामनरेश त्रिपाठी एक महान कवि थे जिन्होंने देश और मानव प्रेम पर लिखा। उनकी रचनाओं में छायावाद की सुंदरता और आदर्शवाद की मानवीय सोच मिलती है। वे हिंदी साहित्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण कवि हैं।

🎯 Exam Tip: जीवन-परिचय लिखते समय जन्म स्थान, माता-पिता, शिक्षा, मुख्य रचनाएँ और साहित्यिक योगदान को बिंदुओं में स्पष्ट रूप से लिखें।

 

पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या

स्वदेश-प्रेम

 

Question 1. अतुलनीय जिसके प्रताप का साक्षी है प्रत्यक्ष दिवाकर । घूम-घूम-कर देख चुका है, जिनकी निर्मल कीर्ति निशाकर। देख चुके हैं जिनका वैभव, ये नभ के अनन्त तारागण। अगणित बार सुन चुका है नभ, जिनका विजय-घोष रण-गर्जन ।। [2015]
Answer:
[ अतुलनीय = जिसकी तुलना न की जा सके । साक्षी = प्रत्यक्ष द्रष्टा । दिवाकर = सूर्य । निशाकर = चंद्रमा । रण-गर्जन = युद्ध की गर्जना ।]

सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'काव्य-खण्ड' में संकलित श्री रामनरेश त्रिपाठी द्वारा रचित 'स्वदेश-प्रेम' शीर्षक कविता से लिया गया है। यह कविता त्रिपाठी जी के काव्य-संग्रह ‘स्वप्न' से ली गई है।

प्रसंग: कवि ने इन पंक्तियों में भारत के गौरवशाली अतीत की झलक दिखाई है। यह हमें अपने पूर्वजों की महानता याद दिलाता है।

व्याख्या: त्रिपाठी जी कहते हैं कि तुम्हें उन पूर्वजों को याद करना चाहिए, जिनकी महानता का गवाह आज भी सूर्य है। हमारे पूर्वज ऐसे थे, जिनकी उज्ज्वल और साफ़ प्रसिद्धि को चंद्रमा भी जगह-जगह घूमकर देख चुका है। हमारे पूर्वज इतने वैभवशाली थे कि आकाश के अनगिनत तारे भी उन्हें बहुत पहले देख चुके थे। हमारे पूर्वजों की युद्ध में जीत की आवाजें और युद्ध की गर्जनाएँ भी आकाश ने कई बार सुनी हैं। इसका मतलब है कि हमारे पूर्वजों का पवित्र स्वभाव, उनकी महानता, यश, धन और युद्ध कौशल सब कुछ अद्भुत और अविश्वसनीय था।
In simple words: कवि हमें अपने महान पूर्वजों को याद करने को कहते हैं। सूर्य, चाँद और तारे भी उनकी शक्ति, प्रसिद्धि और धन के गवाह हैं। आकाश ने उनके युद्धों की गर्जनाएँ कई बार सुनी हैं, जो उनकी अद्भुत वीरता को दिखाते हैं।

काव्यगत सौन्दर्य-
1. कवि ने अपने पूर्वजों के गुणों का बहुत सम्मान के साथ वर्णन किया है।
2. भाषा-संस्कृत शब्दों से युक्त साहित्यिक खड़ी बोली है।
3. शैली-भावात्मक है।
4. रस-वीर रस है।
5. गुण-ओज गुण है।
6. छन्द-प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राओं वाला मात्रिक छन्द है।
7. अलंकार-अनुप्रास, रूपक और पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार हैं।

🎯 Exam Tip: कविता की व्याख्या करते समय हर पंक्ति के अर्थ को सरल शब्दों में बताएँ और फिर उसके पीछे छिपे भाव और कवि के संदेश को भी स्पष्ट करें।

 

Question 2. शोभित है सर्वोच्च मुकुट से, जिनके दिव्य देश का मस्तक। पूँज रही हैं सकल दिशाएँ। जिनके जय-गीतों से अब तक ॥ जिनकी महिमा का है अविरल, साक्षी सत्य-रूप हिम-गिरिवर । उतरा करते थे विमान-दल जिसके विस्तृत वक्षस्थल पर ।।[2014]
Answer:
[ दिव्य = अलौकिक । सकल = सम्पूर्ण अविरल = लगातार, निरन्तर । साक्षी = गवाह । सत्य-रूप हिम-गिरिवर = सत्य स्वरूप वाला श्रेष्ठ हिमालय । वक्षस्थल = सीना ।]

प्रसंग: इन पंक्तियों में भारत के गौरवशाली अतीत की झलक दिखाई गई है।

व्याख्या: कवि त्रिपाठी जी आगे कहते हैं कि यह 'भारत' हमारे हमेशा याद रहने वाले पूर्वजों का देश है। इसका माथा हिमालय रूपी सबसे ऊँचे मुकुट से सुंदर दिख रहा है। हमारे पूर्वजों के जीत के गीत आज तक सभी दिशाओं में गूँज रहे हैं। वे ही तो हमारे पूर्वज थे, जिनकी महिमा की गवाही आज भी सच्चा हिमालय दे रहा है। या यह कह सकते हैं कि उनकी महिमा हिमालय के रूप में प्रत्यक्ष दिखती है। इस भारत-भूमि के बहुत बड़े या विशाल सीने पर अलग-अलग देशों के विमान समूह बनाकर उतरते थे। यह दिखाता है कि प्राचीन भारत ज्ञान और व्यापार का केंद्र था।
In simple words: भारत हमारे महान पूर्वजों का देश है। हिमालय इसका मुकुट है और उनके जीत के गीत हर जगह गूँजते हैं। हिमालय उनकी महानता का गवाह है। प्राचीन भारत में यहाँ के बड़े मैदानों पर दूसरे देशों के विमान उतरते थे।

काव्यगत विशेषताएँ-
1. हिमालय के महत्व और सुंदरता की झलक दिखाई गई है।
2. भाषा-साहित्यिक और आसानी से समझ आने वाली खड़ीबोली है।
3. शैली-भावात्मक और वर्णनात्मक है।
4. रस-वीर रस है।
5. गुण-ओज गुण है।
6. छन्द-प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राओं वाला मात्रिक छन्द है।
7. अलंकार-अनुप्रास और रूपक अलंकार हैं।

🎯 Exam Tip: व्याख्या लिखते समय, कविता के संदर्भ को ध्यान में रखते हुए, प्रत्येक कठिन शब्द का अर्थ स्पष्ट करें और भाव सौंदर्य पर भी ध्यान दें।

 

Question 3. सागर निज छाती पर जिनके, अगणित अर्णव-पोत उठाकरे । पहुँचाया करता था प्रमुदित, भूमंडल के सकल तटों पर । नदियाँ जिसकी यश-धारा-सी । बहती हैं अब भी निशि-वासर । हूँढो, उनके चरण-चिह्न भी पाओगे तुम इनके तट पर । [2017]
Answer:
[ अगणित = अनगिनत । अर्णव-पोत = समुद्री जहाज । प्रमुदित = प्रसन्नचित्त । भूमंडल = पृथ्वीमण्डल । निशि-वासर = रात-दिन ।]

प्रसंग: इन पंक्तियों में भारत के अतीत की गौरवपूर्ण झाँकी प्रस्तुत की गई है।

व्याख्या: हमारे पूर्वज ऐसे थे कि स्वयं समुद्र भी उनकी सेवा करने के लिए तैयार रहता था। वह अपनी छाती पर उनके अनगिनत जहाजों को उठाकर खुशी-खुशी पृथ्वी के एक कोने से दूसरे कोने तक के सभी बंदरगाहों पर पहुँचाता था। इस देश में दिन-रात बहने वाली नदियों की धारा मानो हमारे उन पूर्वजों का यशगान करती जाती है। वे हमारे पूर्वज धन्य थे, जिनका त्याग, उत्साह और शौर्य अद्भुत था। कवि को विश्वास है कि उनके पदचिह्न आज भी हमारी नदियों और समुद्रों के किनारों पर मिल जाएँगे। इसका मतलब है कि यदि आप अपने पूर्वजों का अनुसरण करेंगे तो आपको उनका मार्गदर्शन अवश्य मिलता रहेगा। उनकी दूरदर्शिता और समुद्री व्यापार में कुशलता सराहनीय थी।
In simple words: हमारे पूर्वज इतने महान थे कि समुद्र उनके जहाजों को दुनिया भर में पहुँचाता था। नदियाँ उनके यश के गीत गाती हैं। कवि कहते हैं कि उनके पदचिह्न आज भी नदियों और समुद्रों के किनारों पर मिल जाएँगे, जो उनका मार्गदर्शन करते रहेंगे।

काव्यगत सौन्दर्य-
1. पूर्वजों की गौरव-गाथा का सजीव और अलंकारिक वर्णन किया गया है।
2. भाषा-सरल, आसानी से समझ आने वाली तथा साहित्यिक खड़ीबोली है।
3. शैली-भावात्मक है।
4. रस-वीर रस है।
5. छन्द-प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राओं वाला मात्रिक छन्द है।
6. गुण-ओज गुण है।
7. अलंकार-अनुप्रास, 'नदियाँ जिसकी यश-धारा-सी' में उपमा तथा रूपक अलंकार हैं।

🎯 Exam Tip: कविता के कठिन शब्दों के अर्थ को सरल रूप में समझाएँ और यह भी स्पष्ट करें कि कवि ने किस अलंकार का प्रयोग किया है और उसका क्या प्रभाव है।

 

Question 4. विषुवत्-रेखा का वासी जो, जीता है नित हाँफ-हाँफ कर। रखता है अनुराग अलौकिक, वह भी अपनी मातृ-भूमि पर ॥ धुववासी, जो हिम में, तम में, जी लेता है काँप-काँप कर । वह भी अपनी मातृ-भूमि पर, | कर देता है प्राण निछावर ॥ [2011]
Answer:
[ विषुवत्-रेखा = भूमध्य रेखा, वह काल्पनिक रेखा जो पृथ्वी तल के मानचित्र पर ठीक बीचो-बीच (गणना के लिए) पूर्व-पश्चिम है। वासी = निवासी, रहनेवाला। अनुराग = प्रेम । अलौकिक = दिव्य, लोक से परे । धुववासी = ध्रुव प्रदेश का रहने वाला । तम = अंधकार ।]

प्रसंग: कवि ने इन पंक्तियों में बताया है कि हर इंसान को अपनी मातृभूमि से प्यार होता है। कोई भी उसे छोड़कर कहीं जाना पसंद नहीं करता। यह एक सार्वभौमिक सत्य है।

व्याख्या: जो व्यक्ति भूमध्य रेखा पर रहता है, जहाँ बहुत गर्मी पड़ती है, वह उस गर्मी के कारण हाँफ-हाँफ कर जीवन बिताता है। फिर भी, उस जगह से लगाव के कारण वह भीषण गर्मी छोड़कर ठंडी जगह पर नहीं जाता। वह कष्ट सहते हुए भी अपनी मातृभूमि पर असाधारण प्रेम और बहुत श्रद्धा रखता है। इसी तरह, जो व्यक्ति ध्रुव प्रदेश में रहता है, जहाँ हमेशा बर्फ जमी रहती है और बहुत ठंड पड़ती है, वह उस भयंकर ठंड में काँप-काँप कर अपना जीवन बिताता है। लेकिन ठंड से घबराकर गर्म जगहों पर जाकर नहीं रहता। उसे भी अपनी मातृभूमि से बहुत प्यार होता है और उसकी रक्षा के लिए वह अपने प्राण भी न्योछावर कर देता है।
In simple words: कवि कहते हैं कि चाहे कोई व्यक्ति बहुत गर्म जगह (भूमध्य रेखा) पर रहता हो या बहुत ठंडी जगह (ध्रुव प्रदेश) पर, सभी को अपनी मातृभूमि से बहुत प्यार होता है। वे अपनी ज़मीन की रक्षा के लिए अपनी जान भी दे देते हैं।

काव्यगत सौन्दर्य-
1. कवि ने स्पष्ट किया है कि हर इंसान को मातृभूमि से स्वाभाविक प्रेम होता है।
2. इन पंक्तियों में देश-प्रेम की प्रेरणा दी गई है।
3. भाषा-सरल खड़ी बोली है।
4. रस-वीर रस है।
5. शैली-भावात्मक है।
6. छन्द-प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राओं वाला मात्रिक छन्द है।
7. गुण-ओज गुण है।
8. शब्दशक्ति-व्यंजना है।
9. अलंकार-'अनुराग अलौकिक' तथा 'हिम में, तम में' में अनुप्रास, 'हाँफ-हाँफ' तथा 'काँप-काँप' में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार हैं।
10. भावसाम्य-महर्षि वाल्मीकि ने जन्मभूमि को स्वर्ग से भी बढ़कर माना है- 'जननी जन्मभूमिश्च, स्वर्गादपि गरीयसी ।'

🎯 Exam Tip: मातृभूमि प्रेम पर आधारित प्रश्नों में विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के लोगों के उदाहरण देकर अपनी बात को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करें।

 

Question 5. तुम तो, हे प्रिय बंधु, स्वर्ग-सी, सुखद्, सकल विभवों की आकर । धरा-शिरोमणि मातृ-भूमि में, धन्य हुए हो जीवन पाकर ॥ तुम जिसका जल अन्न ग्रहण कर, बड़े हुए लेकर जिसकी रज । तन रहते कैसे तज दोगे, उसको, हे वीरों के वंशज ॥
Answer:
[ आकर = खान, खजाना। धरा-शिरोमणि = पृथ्वी पर सबसे अच्छी व सर्वश्रेष्ठ ।]

प्रसंग: इन पंक्तियों में कवि ने मातृभूमि को स्वर्ग से भी बढ़कर बताते हुए देशप्रेम की प्रेरणा दी है।

व्याख्या: देशप्रेम की प्रेरणा देते हुए कवि भारतवासियों से कहते हैं कि जब विषुवत् और ध्रुव-प्रदेशों के निवासी भी अपने देश से प्रेम करते हैं, तो आपको अपनी भारत-भूमि से तो निश्चित रूप से और अधिक प्रेम होना चाहिए। क्योंकि यहाँ की धरती सुख-समृद्धि से भरी है, सारे वैभवों से परिपूर्ण है और स्वर्ग से भी बढ़कर है। सभी देशों की धरती से ज़्यादा इस धरती पर जन्म लेना बहुत पुण्यों का फल होता है। तुम धन्य हो कि तुमने यहाँ जन्म लिया है और यहीं का अन्न खाकर, पानी पीकर और इसी की धूल-मिट्टी में खेलकर बड़े हुए हो; तो शरीर रहते हुए हे वीरों के वंशज! तुम इसे कैसे छोड़ दोगे? यानी इसकी रक्षा करना तुम्हारा पहला कर्तव्य है। यह हमारी पहचान और जीवन का आधार है।
In simple words: कवि कहते हैं कि हमारी मातृभूमि स्वर्ग से भी अच्छी है, जहाँ सुख और धन है। हमें यहाँ जन्म लेकर और इसका अन्न-जल पाकर बड़े होने का सौभाग्य मिला है, इसलिए हमें इसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि इसकी रक्षा करनी चाहिए।

काव्यगत सौन्दर्य-
1. मातृभूमि की रक्षा करना प्रत्येक देशवासी का पहला कर्तव्य है।
2. भाषा-प्रवाहमयी खड़ी बोली है।
3. शैली-भावात्मक है।
4. रस-वीर रस है।
5. गुण-ओज गुण है।
6. शब्द-शक्ति-व्यंजना है।
7. छन्द-प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राओं वाला मात्रिक छन्द है।
8. अलंकार-'स्वर्ग-सी सुखद' में उपमा तथा अनुप्रास अलंकार हैं।
9. भावसाम्य-राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त तो स्वदेश-प्रेम की भावना से रहित हृदय को पत्थर मानते हैं: 'जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं। वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ॥'

🎯 Exam Tip: मातृभूमि के महत्व को बताते समय, केवल उसके प्राकृतिक सौंदर्य पर ही नहीं, बल्कि उसके सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों पर भी जोर दें।

 

Question 6. जब तक साथ एक भी दम हो, हो अवशिष्ट एक भी धड़कन । रखो आत्म-गौरव से ऊँची पलकें, ऊँचा सिर, ऊँचा मन ॥ एक बूंद भी रक्त शेष हो, जब तक मन में हे शत्रुजय ! दीन वचन मुख से न उचारो, मानो नहीं मृत्यु का भी भय ॥ [2017]
Answer:
[ दम = साँस । अवशिष्ट = बाकी, बची हुई । शत्रुजय = शत्रु को जीतने वाले । उचारो = बोलो ।]

प्रसंग: इन पंक्तियों में त्रिपाठी जी स्वाभिमान की भावना बनाए रखने पर बल दे रहे हैं।

व्याख्या: कविवर त्रिपाठी जी कहते हैं कि जब तक तुम्हारी साँसें चल रही हैं और तुम्हारा हृदय धड़क रहा है, तब तक तुम्हें अपना और अपने देश का गौरव ऊँचा रखना है। अपनी पलकें, अपना सिर तथा अपना मनोबल ऊँचा रखना है; यानी तुम्हें कोई ऐसा काम नहीं करना है, जिससे तुम्हें किसी के सामने सिर झुकाना पड़े, आँखें नीची करनी पड़ें और दीन-हीन बनना पड़े। जब तक तुम्हारे शरीर में एक बूंद भी खून बाकी रहे, तब तक हे शत्रुओं को जीतने वाले भारतीयों! तुम दीनता भरे वचन नहीं बोलो और देश की रक्षा करते हुए यदि तुम्हारी मृत्यु भी हो जाए तो तुम्हें उसका भी डर नहीं होना चाहिए। अपनी गरिमा को बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण है।
In simple words: कवि कहते हैं कि जब तक जान में जान है और दिल धड़क रहा है, तब तक अपना और देश का गौरव बनाए रखो। कभी भी दीनता भरे शब्द मत बोलो और देश के लिए मरते समय भी मौत से मत डरो।

काव्यगत सौन्दर्य-
1. स्वाभिमान की रक्षा पर बल दिया गया है।
2. भाषा-सहज और सरल खड़ी बोली है।
3. शैली-भावात्मक है।
4. रस-वीर रस है।
5. छन्द-प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राओं वाला मात्रिक छन्द है।
6. गुण-ओज गुण है।
7. शब्दशक्ति-व्यंजना है।
8. अलंकार-अनुप्रास अलंकार है।
9. भावसाम्य-अन्यत्र भी कहा गया है: 'जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है। वह नर नहीं पशु है निरा और मृतक समान है॥'

🎯 Exam Tip: स्वाभिमान से जुड़े प्रश्नों में, व्यक्तिगत और राष्ट्रीय गौरव के महत्व को रेखांकित करें और बताएं कि यह कैसे हमारे व्यवहार को प्रभावित करता है।

 

Question 7. निर्भय स्वागत करो मृत्यु का, मृत्यु एक है विश्राम-स्थल । जीव जहाँ से फिर चलता है, धारण कर नव जीवन-संबल ॥ मृत्यु एक सरिता है, जिसमें, श्रम से कातर जीव नहाकर ।। फिर नूतन धारण करता है, | काया-रूपी वस्त्र बहाकर ॥ [2011, 13, 18]
Answer:
[ निर्भय = भयरहित होकर । विश्राम-स्थल = विश्राम करने का स्थान। संबल = सहारा। सरिता = नदी। कातर = दुःखी । नूतन = नए । काया = शरीर ।]

प्रसंग: कवि ने इन पंक्तियों में मृत्यु से भयभीत न होने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या: हे भारत के वीरों! तुम बिना डर के मृत्यु का स्वागत करो और मृत्यु से कभी मत डरो; क्योंकि मृत्यु वह जगह है, जहाँ इंसान अपने जीवन भर की थकान को दूर करके आराम करता है; इसलिए इंसान को उससे डरना नहीं चाहिए। मृत्यु वह जगह है, जहाँ इंसान पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर पहनता है और फिर से नए जीवन की यात्रा पर आगे बढ़ता है। कवि कहता है कि मृत्यु एक नदी जैसी है, जिसमें नहाकर इंसान जीवन भर की थकान दूर करता है। वह उस मृत्यु रूपी नदी में अपने शरीर रूपी पुराने कपड़े बहा देता है और फिर से नए जीवन रूपी कपड़े पहनता है। कवि का मतलब यह है कि हमें बिना किसी डर के और खुशी-खुशी मृत्यु का स्वागत करना चाहिए। मृत्यु सिर्फ एक पड़ाव है, अंत नहीं।
In simple words: कवि हमें मृत्यु से न डरने को कहते हैं। वे कहते हैं कि मृत्यु एक आराम करने की जगह है, जहाँ से आत्मा नया जीवन पाती है, जैसे नदी में नहाकर शरीर नए कपड़े पहनता है।

काव्यगत सौन्दर्य-
1. जीवन रूपी मार्ग के बीच पड़ने वाले विश्राम-गृह के रूप में मृत्यु की कल्पना, कवि की एकदम नई सोच है। यह त्रिपाठी जी की गहरी सोच को दिखाता है।
2. कवि ने स्वदेश पर मर-मिटने की प्रेरणा दी है।
3. भाषा-सरल खड़ी बोली है।
4. शैली-उद्बोधन (प्रेरणा देने वाली) है।
5. रस-वीर रस है।
6. छन्द-प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राओं वाला मात्रिक छन्द है।
7. गुण-प्रसाद गुण है।
8. शब्दशक्ति-व्यंजना है।
9. अलंकार-'मृत्यु एक है विश्राम-स्थल' तथा 'मृत्यु एक सरिता है' में रूपक तथा अनुप्रास अलंकार हैं।
10. भावसाम्य-
 1. अंग्रेजी के कवि मिल्टन ने मृत्यु का महत्व बताते हुए कहा है कि 'मृत्यु सोने की वह चाबी है, जो अमरता के महल को खोल देती है।'
 2. कवि के विचारों पर भारतीय दर्शन का, खासकर गीता का, सीधा प्रभाव दिखता है- 'वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ।'

🎯 Exam Tip: मृत्यु संबंधी दार्शनिक प्रश्नों में, मृत्यु को जीवन के अंत के बजाय एक परिवर्तन या अगले चरण के रूप में प्रस्तुत करें, जिससे सकारात्मक संदेश जाए।

 

Question 8. सच्चा प्रेम वही है जिसकी । तृप्ति आत्म-बलि पर हो निर्भर । त्याग बिना निष्प्राण प्रेम है, करो प्रेम पर प्राण निछावर ॥ देश-प्रेम वह पुण्य-क्षेत्र है, अमल असीम, त्याग से विलसित । आत्मा के विकास से जिसमें, मनुष्यता होती है विकसित ॥ [2009, 12, 14, 16]
Answer:
[ तृप्ति = सन्तुष्टि । आत्म-बलि = अपने प्राण न्योछावर कर देना। निष्प्राण = प्राणरहित, मृत । पुण्य-क्षेत्र = पवित्र स्थान । अमल = स्वच्छ । विलसित = सुशोभित । ]

प्रसंग: कवि ने त्याग और बलिदान को ही सच्चे देश-प्रेम के लिए ज़रूरी माना है।

व्याख्या: कवि कहता है कि सच्चा प्रेम वही होता है, जिसमें खुद के त्याग की भावना होती है; यानी सच्चा प्रेम त्याग पर ही निर्भर करता है। सच्चे प्रेम के लिए यदि हमें अपनी जान भी देनी पड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिए। बिना त्याग के प्रेम में कोई जान नहीं होती, वह मृत समान है। त्याग से ही प्रेम में जान आती है; इसलिए सच्चे प्रेम के लिए जान देने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। देश-प्रेम एक पवित्र भावना है, जो शुद्ध और असीमित त्याग से सुंदर दिखती है। देश-प्रेम की भावना से ही इंसान की आत्मा विकसित होती है। आत्मा के विकास से इंसान का विकास होता है; इसलिए देश-प्रेम से आत्मा का विकास और आत्मा के विकास से मनुष्यता का विकास होना चाहिए। देशप्रेम हमें एक बेहतर इंसान बनाता है।
In simple words: कवि कहते हैं कि सच्चा प्रेम वही है जिसमें त्याग और बलिदान हो। त्याग के बिना प्रेम बेजान है। देश के प्रति प्रेम एक पवित्र भावना है जो त्याग से चमकती है। इसी से हमारी आत्मा और इंसानियत का विकास होता है।

काव्यगत सौन्दर्य-
1. प्रस्तुत पद में देशप्रेम की उत्पत्ति के मूल भावों पर प्रकाश डाला गया है।
2. भाषा-सरल खड़ी बोली है।
3. शैली-उद्बोधन (प्रेरणा देने वाली) है।
4. रस-वीर रस है।
5. छन्द-प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राओं वाला मात्रिक छन्द है।
6. गुण-ओज गुण है।
7. अलंकार-“करो प्रेम पर प्राण निछावर' में अनुप्रास तथा रूपक अलंकार हैं।
8. भावसाम्य-रामधारी सिंह 'दिनकर' जी ने भी कहा है: 'स्वातन्त्र्य गर्व उनका जो नर फाकों में प्राण गॅवाते हैं । पर नहीं बेचमन का प्रकाशरोटी का मोल चुकाते हैं।'

🎯 Exam Tip: देश-प्रेम से संबंधित उत्तरों में त्याग, बलिदान और मानवीय विकास जैसे मुख्य बिंदुओं को शामिल करें ताकि आपके उत्तर में गहराई आ सके।

 

काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध

 

Question 1. निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त रस का नाम सलक्षण बताइए- विषुवत्-रेखा का वासी जो, जीता है नित हाँफ-हाँफ कर। रखता है अनुराग अलौकिक, वह भी अपनी मातृ-भूमि पर ॥ धुववासी जो हिम में तम में, जी लेता है। काँप-काँप कर। वह भी अपनी मातृ-भूमि पर, कर देता है। प्राण निछावर ॥
Answer: इन पंक्तियों में वीर रस है। वीर रस का मुख्य भाव उत्साह होता है, जब किसी काम को करने, त्याग करने या युद्ध में लड़ने का जोश दिखाया जाता है। इन पंक्तियों में अपनी मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर करने का उत्साह दिखाया गया है। यह कविता के 'स्वदेश-प्रेम' शीर्षक के भाव को दर्शाता है।
In simple words: इन पंक्तियों में वीर रस है क्योंकि इनमें अपनी मातृभूमि के लिए जान देने का जोश और हिम्मत दिखाई गई है।

🎯 Exam Tip: किसी भी कविता में रस की पहचान करने के लिए सबसे पहले उसके स्थायी भाव (जैसे वीर रस के लिए उत्साह) को समझना ज़रूरी है।

 

Question 2. निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा अलंकार है ? परिभाषा सहित लिखिए-
(क) निर्भय स्वागत करो मृत्यु का, मृत्यु एक है विश्राम-स्थल । जीव जहाँ से फिर चलता है, धारण कर नव जीवन-संबल ॥ मृत्यु एक सरिता है, जिसमें, श्रम से कातर जीव नहाकर । फिर नूतन : धारण करता है, काया-रूपी वस्त्र बहाकर ॥
(ख) तुम तो, हे प्रिय बन्धु, स्वर्ग-सी, सुखद, सकल विभवों की आकर । धरा-शिरोमणि मातृभूमि में, धन्य हुए हो जीवन पाकर ॥
Answer:
(क) 'मृत्यु एक है विश्राम-स्थल' तथा 'मृत्यु एक सरिता है' में रूपक अलंकार है। रूपक अलंकार वहाँ होता है जहाँ उपमेय (जिसकी तुलना की जाए) पर उपमान (जिससे तुलना की जाए) का कोई भेद किए बिना आरोप किया जाता है। यहाँ मृत्यु को सीधे विश्राम-स्थल और नदी बताया गया है।

(ख) 'स्वर्ग-सी सुखद' में उपमा अलंकार है। उपमा अलंकार वहाँ होता है जहाँ उपमेय और उपमान में स्पष्ट और सुंदर समानता दिखाई जाती है। यहाँ 'मातृभूमि' (उपमेय) की तुलना 'स्वर्ग' (उपमान) से 'सी' (समानतावाचक शब्द) का प्रयोग करके की गई है, जो सुख देने वाली है।
In simple words: (क) यहाँ मृत्यु को सीधे 'विश्राम-स्थल' और 'नदी' बताया गया है, इसलिए रूपक अलंकार है। (ख) यहाँ मातृभूमि को 'स्वर्ग' जैसा सुख देने वाला कहा गया है, इसलिए उपमा अलंकार है।

🎯 Exam Tip: अलंकार की पहचान के लिए, कविता की पंक्तियों में उपमेय-उपमान और समानतावाचक शब्दों (जैसे - सा, सी, से, समान) को ध्यान से देखें और उनकी परिभाषाओं को याद रखें।

 

Question 3. निम्नलिखित पदों में सनाम समास-विग्रह कीजिए- अचर, परीक्षा-स्थल, देश-जाति, गिरि-वर, चरण-चिह्न, शत्रुजय |
Answer: इन शब्दों में समास विग्रह के साथ-साथ उनके समास का नाम भी नीचे दिया गया है, जो हिंदी व्याकरण के नियमों को स्पष्ट करता है।

समस्तपदसमास-विग्रहसमास-नाम
अचरन चर (न चलने वाला)नञ् तत्पुरुष
परीक्षा-स्थलपरीक्षा का स्थलषष्ठी तत्पुरुष
देश-जातिदेश और जातिद्वन्द्व
गिरि-वरगिरि में श्रेष्ठ (वर)सप्तमी तत्पुरुष
चरण-चिह्नचरणों के चिह्नषष्ठी तत्पुरुष
शत्रुजयशत्रु को जय कर लिया है जिसनेबहुव्रीहि

In simple words: समास विग्रह में शब्दों को अलग करके उनका अर्थ समझा जाता है और फिर बताया जाता है कि वह कौन से समास का प्रकार है, जैसे तत्पुरुष, द्वंद्व या बहुव्रीहि।

🎯 Exam Tip: समास विग्रह करते समय, शब्द के शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ उसके पूरे संदर्भ को समझें ताकि सही समास का नाम पहचान सकें।

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