UP Board Solutions Class 10 Hindi Chapter 3 Raskhan

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Detailed Chapter 3 रसखान UP Board Solutions for Class 10 Hindi

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Class 10 Hindi Chapter 3 रसखान UP Board Solutions PDF

कवि-परिचय

 

Question 1. रसखान का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी रचनाओं को स्पष्ट कीजिए। या कवि रसखान का जीवन-परिचय दीजिए तथा उनकी एक रचना का नाम लिखिए।
Answer: हिन्दी साहित्य को कई मुसलमान कवियों ने आगे बढ़ाया है, लेकिन रसखान का काव्य बहुत ही मधुर और सुंदर है। उनका दिल बहुत भावुक था, जिस कारण वे भगवान श्रीकृष्ण के भक्त बन गए। उनके सभी काव्य में प्रेम और भक्ति साफ झलकती है। उन्हें कृष्ण-भक्ति शाखा के एक खास कवि के रूप में जाना जाता है।
जीवन-परिचय: रसखान दिल्ली के पठान सरदार थे। उनका पूरा नाम सैयद इब्राहीम रसखान था। 'प्रेम वाटिका' नाम की उनकी किताब से पता चलता है कि वे दिल्ली के शाही परिवार से थे और उनका लेखन जहाँगीर के समय का है। उनका जन्म करीब 1558 ईस्वी (या संवत 1615) में दिल्ली में हुआ था। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उनका जन्म 1533 ईस्वी में हरदोई जिले के पिहानी में हुआ था। डॉ. नगेन्द्र ने भी अपने 'हिन्दी-साहित्य के इतिहास' में उनका जन्म 1533 ईस्वी के आस-पास माना है। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने दिल्ली में कोई बड़ा संघर्ष देखा, जिससे दुखी होकर वे गोवर्धन चले आए और श्रीनाथ जी की शरण में गए। उनकी रचनाओं से पता चलता है कि वे पहले साधारण प्रेमी थे, लेकिन बाद में उनका प्रेम अलौकिक होकर कृष्ण भक्ति में बदल गया। गोस्वामी विट्ठलनाथ ने उन्हें पुष्टिमार्ग में शिक्षा दी थी। उन्होंने अपना ज़्यादातर जीवन ब्रजभूमि में ही बिताया। वे चाहते थे कि अगले जन्म में भी ब्रज में ही रहें और कृष्ण की भक्ति में लीन रहें। कवि रसखान का निधन लगभग 1618 ईस्वी (संवत 1675) में हुआ। उनकी भक्ति इतनी गहरी थी कि वे वृन्दावन के करील-कुंजों पर स्वर्ग को भी न्योछावर करने को तैयार थे।
कृतियाँ (रचनाएँ): रसखान की दो मुख्य रचनाएँ हैं—
(1) सुजान रसखान: यह कवित्त और सवैया छंदों में लिखी गई है। इसमें भक्ति और प्रेम से भरे 139 छंद हैं।
(2) प्रेमवाटिका: इसमें 25 दोहे हैं, जिनमें प्रेम के त्याग और निस्वार्थ रूप का बहुत सुंदर वर्णन किया गया है। यह प्रेम की गहरी समझ को दर्शाता है।
साहित्य में स्थान: भक्त कवियों में रसखान का स्थान बहुत ऊँचा है। डॉ. विजयेंद्र स्नातक ने लिखा है कि उनकी भक्ति दिल की सच्ची साधना है और उनका श्रृंगार वर्णन उनकी भावनाओं की खुली अभिव्यक्ति है। उनके काव्य उनके स्वच्छंद मन के सहज उद्गार हैं। इसलिए उन्हें स्वच्छंद काव्य-धारा का प्रवर्तक भी कहा जाता है। उनकी कविताओं में भावनाओं की गहराई और एकाग्रता को देखकर भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने कहा था कि 'इन मुसलमान हरिजनन पै कोटिन हिन्दू वारिये' (ऐसे मुसलमान भक्तों पर करोड़ों हिन्दू न्योछावर हैं)।
In simple words: रसखान एक महान कृष्ण भक्त कवि थे। उनका पूरा नाम सैयद इब्राहीम रसखान था और उनका जन्म 1558 ईस्वी में हुआ था। उनकी मुख्य रचनाएँ 'सुजान रसखान' और 'प्रेमवाटिका' हैं। उन्होंने अपना ज़्यादातर जीवन ब्रज में बिताया और कृष्ण भक्ति में लीन रहे।

🎯 Exam Tip: जीवन-परिचय लिखते समय कवि का जन्म, मृत्यु, मुख्य रचनाएँ और उनकी साहित्यिक विशेषताएँ क्रमबद्ध तरीके से बताएँ। मुख्य बिंदुओं को रेखांकित करना फायदेमंद होता है।

 

पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या सवैये

 

Question 1. मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं बज गोकुल गाँव के ग्वारन ।
जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन ॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर-धारन ।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल कदंब की डारन ॥

Answer:
(शब्दार्थ: मानुष = मनुष्य, ग्वारन = ग्वाले, धेनु = गाय, मँझारन = मध्य में, पाहन = पत्थर, पुरंदर = इंद्र, खग = पक्षी, बसेरो करौं = निवास करूँ, कालिंदी-कूल = यमुना का किनारा, डारन = डाल पर, शाखा पर।)
संदर्भ: यह पद्म कवि रसखान द्वारा रचित 'सुजान-रसखान' से हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'काव्य-खण्ड' में संकलित 'सवैया' शीर्षक से लिया गया है।
प्रसंग: इस पद्म में रसखान ने इस बात पर भरोसा दिखाया है कि आत्मा फिर से जन्म लेती है। वे अगले जन्म में भी श्रीकृष्ण की जन्मभूमि ब्रज में जन्म लेने और उनके पास रहने की इच्छा रखते हैं।
व्याख्या: रसखान कवि कहते हैं कि हे भगवान! अगर मरने के बाद मुझे अगले जन्म में इंसान के रूप में जन्म मिले, तो मेरी इच्छा है कि मैं ब्रजभूमि के गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच रहूँ। यदि मैं पशु के रूप में जन्म लूँ, जिसमें मेरा कोई वश नहीं है, फिर भी मेरी इच्छा है कि मैं नन्द जी की गायों के बीच चरता रहूँ। अगर मैं अगले जन्म में पत्थर बनूँ, तो भी मैं उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनना चाहता हूँ, जिसे आपने इंद्र का घमंड तोड़ने और गोकुल गाँव को पानी में डूबने से बचाने के लिए अपनी उंगली पर छाते की तरह उठा लिया था। अगर मुझे पक्षी के रूप में भी जन्म लेना पड़े, तो मेरी इच्छा है कि मैं यमुना नदी के किनारे स्थित कदम्ब के पेड़ की शाखाओं पर ही रहूँ। कवि की यह गहरी इच्छा दिखाती है कि वे कृष्ण और ब्रजभूमि से कितना प्रेम करते हैं।
काव्यगत सौन्दर्य-

  • 1. रसखान कवि की कृष्ण के प्रति गहरी भक्ति दिखाई गई है। उनकी भक्ति इतनी मजबूत है कि वे अगले जन्म में भी श्रीकृष्ण के पास ही रहना चाहते हैं।
  • 2. भाषा - ब्रज।
  • 3. शैली - मुक्तक।
  • 4. रस - शांत और भक्ति।
  • 5. छंद - सवैया।
  • 6. अलंकार - 'कालिंदी-कूल कदंब की डारन' में अनुप्रास अलंकार है।
  • 7. गुण - प्रसाद।

In simple words: रसखान चाहते हैं कि अगले जन्म में भी वे ब्रजभूमि में ही रहें, चाहे वे इंसान बनें, पशु बनें, पत्थर बनें या पक्षी बनें, वे हमेशा श्रीकृष्ण के पास रहना चाहते हैं।

🎯 Exam Tip: सवैया की व्याख्या करते समय, पहले कठिन शब्दों के अर्थ लिखें। फिर प्रसंग और संदर्भ को स्पष्ट करते हुए पंक्ति-दर-पंक्ति सरल भाषा में भावार्थ समझाएँ। काव्यगत सौंदर्य में भाषा, छंद, रस और अलंकार बताना ज़रूरी है।

 

Question 2. आजु गयी हुती भोर ही हौं, रसखानि रई बहि नंद के भौनहिं ।।
वाको जियौ जुग लाख करोर, जसोमति को सूख जात कह्यौ नहिं ॥
तेल लगाइ लगाई कै अँजन, भौंहैं बनाई बनाई डिठौनहिं ।
डारि हमेलनि हार निहारत बारत ज्यौं पुचकारत छौनहिं ॥

Answer:
(शब्दार्थ: हुती = थी, भोर = सुबह, हौं = मैं, रई बहि = प्रेम में डूब गई, भौनहिं = भवन में, वाको = उसका, यशोदा का, जुग = युग, डिठौनहिं = काला टीका, हमेलनि = हमेल (सोने का आभूषण), निहारत = देख रही थी, बारत = न्योछावर करती हुई, पुचकारत = पुचकार रही थी, छौनहिं = पुत्र को।)
प्रसंग: इस पद्म में कवि ने श्रीकृष्ण के लिए माता यशोदा के प्यार भरे भाव का वर्णन किया है।
व्याख्या: एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है, "हे सखी! आज सुबह मैं श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबी हुई नन्द जी के घर गई थी। मैं चाहती हूँ कि उनका बेटा श्रीकृष्ण लाखों-करोड़ों साल तक जिए। यशोदा के सुख को शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता; उन्हें बहुत ज़्यादा खुशी मिल रही है।" वे अपने बेटे का श्रृंगार कर रही थीं। वे श्रीकृष्ण के शरीर पर तेल लगा रही थीं और आँखों में काजल लगा रही थीं। उन्होंने उसकी सुंदर भौंहें संवारकर बुरी नज़र से बचाने के लिए माथे पर टीका (डिठौना) लगाया था। वे उसके गले में सोने का हार पहनाकर और ध्यान से उसके रूप को निहारकर अपनी जान न्योछावर कर रही थीं और प्यार से बार-बार अपने बेटे को पुचकार रही थीं। यह माँ के अपने बच्चे के प्रति असीम स्नेह को दर्शाता है।
काव्यगत सौन्दर्य-

  • 1. इस छंद में माता यशोदा के प्यार भरे भाव और श्रीकृष्ण के सुबह के श्रृंगार का बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया है।
  • 2. भाषा - ब्रज।
  • 3. शैली - चित्रात्मक और मुक्तक।
  • 4. रस - वात्सल्य।
  • 5. छंद - सवैया।
  • 6. अलंकार - यमक, अनुप्रास और पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार हैं।
  • 7. गुण - प्रसाद।

In simple words: एक सखी दूसरी को बताती है कि उसने यशोदा माँ को श्रीकृष्ण का श्रृंगार करते देखा। यशोदा माँ अपने बेटे को प्यार से काजल, टीका और गहने पहना रही थीं, और बार-बार उसे पुचकार रही थीं।

🎯 Exam Tip: वात्सल्य रस के पदों की व्याख्या में माँ के स्नेह और बच्चे की बाल लीलाओं का वर्णन स्पष्ट रूप से करें। शब्दों के अर्थ और भावार्थ को सरल भाषा में व्यक्त करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. धूरि भरे अति सोभित स्यामजू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी ।
खेलत खात फिरै अँगनी, पग पैंजनी बाजति पीरी कछोटी ॥
वा छबि को रसखानि बिलोकत, वारत काम कला निज कोटी ।
काग के भाग बड़े सजनी हरि-हाथ सों लै गयौ माखन-रोटी ॥

Answer:
(शब्दार्थ: बनी = सुशोभित, पैंजनी = पायजेब, पीरी = पीला, कछोटी = कच्छा, सजनी = सखी।)
प्रसंग: इस पद्म में कवि ने बाल कृष्ण के मनमोहक रूप का वर्णन किया है। एक गोपी अपनी सखी से उनके सौंदर्य का वर्णन करती है।
व्याख्या: हे सखी! श्यामवर्ण के कृष्ण धूल से सने हुए बहुत सुंदर लग रहे हैं। उनके सिर पर एक सुंदर चोटी भी सजी हुई है। वे खेलते और खाते हुए अपने घर के आँगन में घूम रहे हैं। उनके पैरों में पायल बज रही है और उन्होंने पीले रंग की छोटी-सी धोती पहनी हुई है। कवि रसखान कहते हैं कि उनके उस सौंदर्य को देखकर कामदेव भी अपनी करोड़ों कलाएँ उन पर न्योछावर कर देते हैं। हे सखी! उस कौवे का भाग्य कितना महान है, जो कृष्ण के हाथ से मक्खन और रोटी छीनकर ले गया। इसका मतलब है कि कृष्ण की झूठी मक्खन-रोटी खाने का मौका जिसे मिला, वह बहुत भाग्यशाली है। बाल कृष्ण का यह रूप सबका मन मोह लेता है।
काव्यगत सौन्दर्य-

  • 1. इस छंद में श्रीकृष्ण के बचपन के सौंदर्य का बहुत ही मनमोहक वर्णन किया गया है।
  • 2. भाषा - ब्रज।
  • 3. शैली - चित्रात्मक और मुक्तक।
  • 4. रस - वात्सल्य और भक्ति।
  • 5. छंद - सवैया।
  • 6. अलंकार - पद्म में हर जगह अनुप्रास है और 'वारत काम कला निज कोटी' में प्रतीप अलंकार है।
  • 7. गुण - माधुर्य।
  • 8. भावसाम्य - गोस्वामी जी ने भी श्रीराम के धूल से सने बाल रूप का ऐसा ही वर्णन किया है: "अति सुन्दर सोहत धूरि भरे, छवि भूरि अनंग की दूरि धरें।"

In simple words: कृष्ण धूल से सने हुए बहुत सुंदर लग रहे हैं, माथे पर चोटी है, पायल बज रही है और वे पीले रंग की धोती पहने हैं। कवि कहते हैं कि जो कौवा उनके हाथ से माखन-रोटी ले गया, वह बहुत भाग्यशाली है।

🎯 Exam Tip: बाल कृष्ण के वर्णन में उनकी वेशभूषा, बाल-लीलाएँ और उनके प्रति भक्तों के प्रेम को स्पष्ट करें। कवि के भावों को सरल शब्दों में व्यक्त करना ज़रूरी है।

 

Question 4. जा दिन तें वह नंद को छोहरा, या बन धेनु चराई गयी है।
मोहिनी ताननि गोधन गावत, बेनु बजाइ रिझाइ गयौ है ॥
वा दिन सो कछु टोना सो कै, रसखानि हियै मैं समाई गयी है।
कोऊ न काहू की कानि करै, सिगरो ब्रज बीर बिकाइ गयौ है ।

Answer:
(शब्दार्थ: छोहरा = पुत्र, धेनु = गाय, बेनु = वंशी, टोना = जादू, सिगरो = सम्पूर्ण।)
प्रसंग: इस पद्म में ब्रज की गोपियों पर श्रीकृष्ण के मनमोहक प्रभाव का सुंदर चित्रण किया गया है।
व्याख्या: एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है, "हे सखी! जिस दिन से नन्द का प्यारा बेटा इस जंगल में गायें चराने आया है और अपनी मीठी धुन सुनाकर और बाँसुरी बजाकर हम सबको मोह गया है, उसी दिन से ऐसा लगता है कि उसने कोई जादू-सा करके हमारे मन में घर कर लिया है। इसलिए अब कोई भी गोपी किसी की मर्यादा का पालन नहीं करती, उन्होंने अपनी शर्म और संकोच सब कुछ छोड़ दिया है। ऐसा लगता है कि पूरा ब्रज ही उस कृष्ण के हाथों बिक गया है, यानी वे उसके वश में हो गए हैं।" कृष्ण की बाँसुरी की धुन में ऐसा जादू है कि गोपियाँ सब कुछ भूलकर उनके प्रेम में लीन हो जाती हैं।
काव्यगत सौन्दर्य-

  • 1. यहाँ गोपियों पर कृष्ण-प्रेम के जादू का जीवंत वर्णन किया गया है।
  • 2. भाषा - ब्रज।
  • 3. शैली - मुक्तक।
  • 4. छंद - सवैया।
  • 5. रस - श्रृंगार।
  • 6. अलंकार - 'कोऊ न काहु की कानि करै', 'ब्रज बीर बिकाइ गयौ', 'बेनु बजाइ', 'गोधन गावत' में अनुप्रास अलंकार है।
  • 7. गुण - माधुर्य।
  • 8. भावसाम्य - रसखान ने कहीं और भी इसी प्रकार का वर्णन किया है: "कोऊ न काहु की कानि करै, कछु चेटक सो जु कियौ जदुरैया।"

In simple words: गोपियाँ कहती हैं कि जब से कृष्ण ने गायें चराईं और बाँसुरी बजाई है, तब से सब पर उनका जादू छा गया है। अब कोई गोपी अपनी मर्यादा नहीं मानती और पूरा ब्रज कृष्ण के वश में हो गया है।

🎯 Exam Tip: कृष्ण के मोहक प्रभाव और गोपियों की प्रेम-विह्वलता का वर्णन करते समय उनकी भावनाओं को व्यक्त करने वाले शब्दों का प्रयोग करें। प्रसंग और व्याख्या में तारतम्यता बनाए रखें।

 

Question 5. कान्ह भये बस बाँसुरी के, अब कौन सखी, हमकौं चहिहै ।
निसद्यौस रहै सँग-साथ लगी, यह सौतिन तापन क्यौं सहिहै ॥
जिन मोहि लियौ मनमोहन कौं, रसखानि सदा हमकौं दहिहै ।
मिलि आओ सबै सखि, भागि चलें अब तो ब्रज मैं बँसुरी रहिहै ॥

Answer:
(शब्दार्थ: चहिहै = चाहेगा, निसद्यौस = रात-दिन, तापन = संतापों को, सहिहै = सहन करेगी, मोहि लियौ = मोहित कर लिया है, दहिहै = जलाती है।)
प्रसंग: इन पंक्तियों में श्रीकृष्ण के बाँसुरी के प्रति प्रेम और गोपियों की उस बाँसुरी से जलन का जीवंत वर्णन किया गया है।
व्याख्या: एक गोपी अपनी सखी से कहती है, "हे सखी! श्रीकृष्ण अब बाँसुरी के वश में हो गए हैं, अब हमसे कौन प्यार करेगा? श्रीकृष्ण हमसे बहुत प्यार करते थे, लेकिन अब वे इस दुष्ट बाँसुरी से प्रेम करने लगे हैं। यह बाँसुरी रात-दिन उनके साथ लगी रहती है। यह बाँसुरी रूपी सौत की ईर्ष्या के दुःख को क्यों सहेगी?" जिस बाँसुरी ने हमारे मन को मोहने वाले कृष्ण को अपने प्रेम से मोहित कर लिया है, वह हमें हमेशा ईर्ष्या से जलाती रहेगी। हे सखी! आओ हम सब मिलकर ब्रज छोड़कर कहीं और चलें, क्योंकि यहाँ अब केवल बाँसुरी ही रहेगी। मतलब, कृष्ण के प्रेम से वंचित होकर हमारा अब ब्रज में जीना मुश्किल हो जाएगा। गोपियों को लगता है कि बाँसुरी ने कृष्ण को उनसे दूर कर दिया है।
काव्यगत सौन्दर्य-

  • 1. प्रस्तुत छंद में गोपियों की मुरली के प्रति स्वाभाविक ईर्ष्या का जीवंत वर्णन किया गया है।
  • 2. भाषा - सुलित ब्रज।
  • 3. शैली - चित्रोपम मुक्तक।
  • 4. रस - श्रृंगार।
  • 5. छंद - सवैया।
  • 6. अलंकार - अनुप्रास।
  • 7. भावसाम्य - महाकवि सूरदास ने भी मुरली के प्रति गोपियों की ऐसी ही ईर्ष्या को व्यक्त किया है। उनकी गोपियाँ तो मुरली को चुरा लेना चाहती हैं। जैसे: "सखी री, मुरली लीजै चोरि। जिनि गुपाल कीन्हें अपनें बस, प्रीति सबनि की तोरि ॥"

In simple words: गोपियाँ दुखी हैं क्योंकि कृष्ण बाँसुरी के वश में हो गए हैं। वे बाँसुरी को अपनी सौत मानती हैं और कहती हैं कि अब उनसे कौन प्यार करेगा। इसलिए वे ब्रज छोड़कर जाने की बात करती हैं।

🎯 Exam Tip: गोपियों के मनोभावों, विशेषकर बाँसुरी के प्रति उनकी ईर्ष्या और कृष्ण के प्रति उनके प्रेम को स्पष्ट रूप से दर्शाएँ। छंद के भावार्थ को सरल और भावनात्मक तरीके से प्रस्तुत करें।

 

Question 6. मोर-पखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरें पहिरौंगी ।
ओढिपितम्बर लै लकुटी, बन गोधन ग्वारन संग फिरौंगी ॥
भावतो वोहि मेरो रसखानि, सो तेरे कहै सब स्वाँग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरींगी ॥

Answer:
(शब्दार्थ: मोर-पखा = मोर के पंखों से बना मुकुट, गरें = गले में, पितम्बर = पीताम्बर, पीला वस्त्र, लकुटी = छोटी लाठी, स्वाँग = श्रृंगार अभिनय, अधरान = होंठों पर, अधरा न = होंठों पर नहीं।)
प्रसंग: इस सवैया में कृष्ण के वियोग में व्याकुल गोपियों की मन की स्थिति का मनमोहक वर्णन किया गया है। कृष्ण-प्रेम में डूबी गोपियाँ कृष्ण का वेश धारण करके अपने दिल को सांत्वना देती हैं।
व्याख्या: एक गोपी अपनी दूसरी सखी से कहती है, "हे सखी! मैं तुम्हारे कहने पर अपने सिर पर मोर के पंखों से बना मुकुट पहनूँगी, अपने गले में गुंजा की माला पहनूँगी, कृष्ण की तरह पीले वस्त्र पहनूँगी और हाथ में लाठी लेकर ग्वालों के साथ गायें चराते हुए जंगल में घूमूँगी। ये सभी काम मुझे अच्छे लगते हैं और तेरे कहने से मैं कृष्ण के सभी रूप धारण कर लूँगी। लेकिन उनकी बाँसुरी को अपने होंठों से नहीं छूऊँगी।" इसका मतलब है कि कृष्ण गोपियों के प्रेम की परवाह न करके दिनभर बाँसुरी को अपने पास रखते हैं और उसे अपने होंठों से लगाए रहते हैं। इसलिए गोपियाँ उसे सौत मानकर उसका स्पर्श भी नहीं करना चाहतीं, क्योंकि वह श्रीकृष्ण के ज़्यादा ही करीब है। यह गोपियों की गहरी भक्ति और बाँसुरी से उनकी जलन को दर्शाता है।
काव्यगत सौन्दर्य-

  • 1. प्रस्तुत छंद में कृष्ण के प्रति गोपियों के अनन्य प्रेम और बाँसुरी के प्रति स्त्री-सुलभ ईर्ष्या का स्वाभाविक चित्रण किया गया है।
  • 2. भाषा - ब्रज।
  • 3. शैली - मुक्तक।
  • 4. गुण - माधुर्य।
  • 5. रस - श्रृंगार।
  • 6. छंद - सवैया।
  • 7. अलंकार - 'या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी' में अनुप्रास और यमक अलंकार हैं।

In simple words: गोपी कहती है कि वह कृष्ण के सभी रूप अपना लेगी, जैसे मोरपंख का मुकुट, पीले वस्त्र और लाठी। लेकिन वह बाँसुरी को अपने होंठों से नहीं छुएगी, क्योंकि वह कृष्ण के बहुत करीब है और गोपियों को उससे जलन होती है।

🎯 Exam Tip: इस पद में गोपियों का कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम और बाँसुरी के प्रति उनकी ईर्ष्या को स्पष्ट करें। व्याख्या में यह दर्शाएँ कि वे कृष्ण के वियोग में किस प्रकार सांत्वना पाती हैं।

 

कवित्त

 

Question 1. गोरज बिराजै भाल लहलही बनमाल,
आगे गैयाँ पाछे ग्वाल गावै मृदु बानि री ।
तैसी धुनि बाँसुरी की मधुर-मधुर जैसी,
बंक चितवन मंद मंद मुसंकानि री ॥
कदम बिटप के निकट तटिनी के तट,
अटा चढ़ि चाहि पीत पट फहरानि री ।
रस बरसावै तन-तपनि बुझावै नैन,
प्राननि रिझावै वह आवै रसखानि री ॥

Answer:
(शब्दार्थ: गोरज = गायों के पैरों से उड़ी हुई धूल, लहलही = शोभायमान हो रही है, बानि = वाणी, बंक = टेढ़ी, तटिनी = (यमुना) नदी, तन-तपनि = शरीर की गर्मी।)
संदर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि रसखान द्वारा रचित 'सुजान-रसखान' से हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'काव्य-खण्ड' में संकलित 'कवित्त' शीर्षक से ली गई हैं।
प्रसंग: इन पंक्तियों में शाम के समय वन से गायों के साथ लौटते हुए कृष्ण की अनुपम शोभा का वर्णन एक गोपी अपनी सखी से कर रही है।
व्याख्या: गोपी कहती है कि हे सखी! वन से गायों के साथ लौटते हुए कृष्ण के माथे पर गायों के पैरों से उड़ी धूल बहुत सुंदर लग रही है। उनके गले में जंगल के फूलों की माला शोभा दे रही है। कृष्ण के आगे-आगे गायें चल रही हैं और पीछे मधुर स्वर में गाते हुए ग्वाल-बाल चल रहे हैं। श्रीकृष्ण की चितवन जितनी मधुर और टेढ़ी है, उतनी ही उनकी धीमी-धीमी मुस्कान है। उनकी इस मधुर छवि के अनुसार ही उनकी बाँसुरी की धुन भी मीठी है। हे सखी! कदम्ब वृक्ष के पास यमुना नदी के किनारे खड़े कृष्ण के पीले वस्त्रों का फहराना, ज़रा अटारी पर चढ़कर तो देख लो। रस की खान वह श्रीकृष्ण चारों ओर सौंदर्य और प्रेम-रस की वर्षा करते हुए शरीर और मन की जलन को शांत कर रहे हैं। उनका सौंदर्य आँखों की प्यास बुझा रहा है और प्राणों को अपनी ओर खींचकर प्रसन्न कर रहा है। कृष्ण का यह रूप देखकर सभी मोहित हो जाते हैं।
काव्यगत सौन्दर्य-

  • 1. प्रस्तुत छंद में गाय चराने के बाद लौटते हुए श्रीकृष्ण के अनुपम सौंदर्य का मनमोहक चित्रण हुआ है।
  • 2. भाषा - सरल, सरस ब्रज।
  • 3. शैली - मुक्तक।
  • 4. रस - श्रृंगार।
  • 5. छंद - मनहरण कवित्त।
  • 6. अलंकार - 'भाल लहलही बनमाल' में अनुप्रास, 'मधुर-मधुर, मंद-मंद' में पुनरुक्तिप्रकाश तथा 'रसखानि री' में श्लेष अलंकार का सुंदर प्रयोग है।
  • 7. गुण - माधुर्य।

In simple words: गोपी अपनी सखी से कहती है कि शाम को गाय चराकर लौटते कृष्ण बहुत सुंदर लग रहे हैं। उनके माथे पर धूल, गले में माला, और उनकी बाँसुरी की धुन व मुस्कान मन को मोह लेती है। वे अपनी सुंदरता से सबका मन प्रसन्न कर रहे हैं।

🎯 Exam Tip: कवित्त की व्याख्या करते समय श्रीकृष्ण के सौंदर्य वर्णन के हर पहलू (वेशभूषा, क्रियाएँ, भाव) को विस्तार से समझाएँ। रस, छंद और अलंकार का उल्लेख करना न भूलें।

 

काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध

 

Question 1. निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा रस है, उसके स्थायी भाव का नाम लिखिए
(क) तेल लगाइ लगाइ के अंजन, भाँहँ बनाइ बनाइ डिठौनहिं ।
(ख) जिन मोहि लियौ मनमोहन कौं, रसखानि सदा हम दहिहै ।
मिलि आओ सबै सखि भागि चलें अब तो ब्रज में बँसुरी रहिहै ।।

Answer:
(क) इन पंक्तियों में वात्सल्य रस है, जिसका स्थायी भाव स्नेह (रति) है।
(ख) इन पंक्तियों में श्रृंगार रस है, जिसका स्थायी भाव रति है।
In simple words: पहले भाग में माँ के प्यार को दिखाया गया है, इसलिए वह वात्सल्य रस है। दूसरे भाग में प्रेम की भावना है, इसलिए वह श्रृंगार रस है।

🎯 Exam Tip: रस और स्थायी भाव की पहचान करने के लिए पंक्तियों के मूल भाव को समझें। वात्सल्य में संतान के प्रति प्रेम और श्रृंगार में नायक-नायिका के प्रेम का वर्णन होता है।

 

Question 2. निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार का नाम बताते हुए उसका स्पष्टीकरण दीजिए
(क) वा छबि को रसखानि बिलोकत, वारत काम कला निज कोटी ।
(ख) या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी ।
(ग) रस बरसावे तन-तपनि बुझावै नैन,
प्राननि रिझावै वह आवै रसखानि री ॥

Answer:
(क) इन पंक्तियों में 'क' वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है। यहाँ प्रतीप अलंकार भी है, क्योंकि "वारत काम कला निज कोटी" में कृष्ण के सौंदर्य को देखकर कामदेव स्वयं अपनी करोड़ों कलाएँ न्योछावर कर रहे हैं। इसमें उपमान (कामदेव) को उपमेय (कृष्ण) बना दिया गया है।
(ख) इन पंक्तियों में 'म', 'ध', 'र' वर्णों की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है। इसमें यमक अलंकार भी है क्योंकि 'अधरान' शब्द के दो अलग-अलग अर्थ हैं— एक का अर्थ 'होंठों पर' और दूसरे 'अधरा न' का अर्थ 'होंठों पर नहीं' है।
(ग) इन पंक्तियों में श्लेष अलंकार है। यहाँ 'रसखानि री' शब्द के दो अर्थ हैं— एक 'रस की खान' यानी श्रीकृष्ण और दूसरा 'कवि रसखान' है।
In simple words: (क) में 'क' वर्ण बार-बार आया है (अनुप्रास) और कृष्ण के सौंदर्य को कामदेव से बढ़कर बताया है (प्रतीप)। (ख) में 'म', 'ध', 'र' वर्ण बार-बार आए हैं (अनुप्रास) और 'अधरान' शब्द के दो अलग अर्थ हैं (यमक)। (ग) में 'रसखानि री' के दो अर्थ हैं (श्लेष)।

🎯 Exam Tip: अलंकार की पहचान के लिए, वर्णों की आवृत्ति (अनुप्रास), एक शब्द के कई अर्थ (श्लेष), या एक शब्द के बार-बार अलग-अलग अर्थ में प्रयोग (यमक) पर ध्यान दें। उदाहरण के साथ स्पष्टीकरण दें।

 

Question 3. सवैये और कवित्त का लक्षण लिखते हुए पाठ से एक-एक उदाहरण दीजिए।
Answer:
सवैया: यह एक वर्णिक छंद है जिसमें 22 से 26 तक के वर्ण होते हैं। इसके कई प्रकार होते हैं। इस पाठ में दिए गए सभी सवैया छंद इसके उदाहरण हैं।
कवित्त: यह भी एक वर्णिक छंद है, जिसे दण्डक वृत्त भी कहते हैं। इसके हर चरण में 31 वर्ण होते हैं। 16वें और 15वें वर्ण पर रुकना होता है। इसके अंत में एक गुरु वर्ण होता है। इसे मनहरण कवित्त भी कहा जाता है। पाठ में दिया गया 'गोरज बिराजै भाल...' कवित्त इसका एक अच्छा उदाहरण है।
In simple words: सवैया एक कविता का प्रकार है जिसमें 22 से 26 अक्षर होते हैं। कवित्त एक और प्रकार है जिसमें 31 अक्षर होते हैं और यह थोड़ा बड़ा होता है।

🎯 Exam Tip: सवैया और कवित्त के लक्षण (वर्ण संख्या, यति) याद रखें। उदाहरण के लिए पाठ से ही कोई प्रसिद्ध पंक्ति लिखें।

 

Question 4. निम्नलिखित शब्दों के खड़ी बोली रूप लिखिए-
करोर, सिगरी, दुति, लकुटी, काग, अँगुरी, भाजति, संजम ।

Answer:

शब्दखड़ी बोली का रूपशब्दखड़ी बोली का रूप
करोरकरोड़कागकौआ
सिगरीसारीअँगुरीअँगुलियाँ
दुतिद्युतिभाजतिभागती
लकुटीलाठीसंजमसंयम

In simple words: यहाँ ब्रज भाषा के शब्दों को आज की हिंदी भाषा (खड़ी बोली) में बदला गया है, जैसे 'करोर' को 'करोड़' और 'काग' को 'कौआ' कहते हैं।

🎯 Exam Tip: शब्दों के खड़ी बोली रूप लिखते समय वर्तनी (स्पेलिंग) पर विशेष ध्यान दें, ताकि अर्थ सही बना रहे।

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