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Detailed Chapter 3 क्या लिखें UP Board Solutions for Class 10 Hindi
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Class 10 Hindi Chapter 3 क्या लिखें UP Board Solutions PDF
जीवन-परिचय एवं कृतियाँ
Question 1. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के जीवन-परिचय एवं रचनाओं पर प्रकाश डालिए।
या
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जीवन-परिचय दीजिए तथा उनकी एक रचना का नाम लिखिए।
Answer: श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हिन्दी साहित्य के एक प्रसिद्ध निबंधकार, कवि, संपादक और साहित्य विशेषज्ञ थे। उन्हें साहित्य-सृजन की प्रेरणा अपने परिवार से विरासत में मिली थी, इसलिए उन्होंने विद्यार्थी जीवन से ही लिखना शुरू कर दिया था। उन्हें विशेष रूप से ललित निबंधों के लेखन के लिए बहुत प्रसिद्धि मिली। वे एक गंभीर विचारक, शिष्ट हास्य-व्यंग्यकार और कुशल आलोचक के रूप में हिंदी-साहित्य में जाने जाते थे। उनकी लेखनी ने हिंदी साहित्य को कई महत्वपूर्ण कृतियाँ दी हैं।
जीवन-परिचय: श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म 1894 ई० में मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के खैरागढ़ नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता श्री उमराव बख्शी और दादा पुन्नालाल बख्शी दोनों साहित्य-प्रेमी और कवि थे। उनकी माताजी को भी साहित्य से बहुत प्रेम था। इस साहित्यिक वातावरण के प्रभाव से उनका मन भी साहित्य की ओर आकर्षित हुआ और उन्होंने छात्र जीवन से ही कविताएँ लिखनी शुरू कर दी थीं। बी०ए० पास करने के बाद, बख्शी जी ने साहित्य-सेवा को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया और कहानियाँ व कविताएँ लिखने लगे। द्विवेदी जी उनकी रचनाओं और योग्यताओं से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने 'सरस्वती' पत्रिका की बागडोर बख्शी जी को सौंप दी। द्विवेदी जी के बाद 1920 से 1927 ई० तक उन्होंने सफलतापूर्वक 'सरस्वती' का संपादन किया। वे विनम्र स्वभाव के व्यक्ति थे और प्रसिद्धि से दूर रहते थे। खैरागढ़ के हाईस्कूल में पढ़ाने के बाद उन्होंने फिर से 'सरस्वती' का संपादन-भार संभाला। सन् 1971 ई० में 77 वर्ष की आयु में लगातार साहित्य-सेवा करते हुए उनका निधन हो गया।
कृतियाँ: बख्शी जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने निबंध, काव्य, कहानी, आलोचना और नाटक जैसे क्षेत्रों में अपनी कलम चलाई। वे निबंध और आलोचना के क्षेत्र में तो प्रसिद्ध थे ही, अपने ललित निबंधों के कारण भी विशेष रूप से याद किए जाते हैं। उनकी मुख्य रचनाएँ इस प्रकार हैं:
1. निबंध-संग्रह: 'पंचपात्र', 'पद्मवन', 'तीर्थरेणु', 'प्रबन्ध-पारिजात', 'कुछ बिखरे पन्ने', 'मकरन्द बिन्दु', 'यात्री', 'तुम्हारे लिए', 'तीर्थ-सलिल' आदि। इनके निबंध जीवन, समाज, धर्म, संस्कृति और साहित्य जैसे विषयों पर लिखे गए हैं।
2. काव्य-संग्रह: 'शतदल' और 'अश्रुदल' उनके दो काव्य-संग्रह हैं। उनकी कविताएँ प्रकृति और प्रेम से संबंधित हैं।
3. कहानी-संग्रह: 'झलमला' और 'अञ्जलि' उनके दो कहानी-संग्रह हैं। इन कहानियों में मानव-जीवन की कई तरह की समस्याओं को दिखाया गया है।
4. आलोचना: 'हिन्दी-साहित्य विमर्श', 'विश्व-साहित्य', 'हिन्दी उपन्यास साहित्य', 'हिन्दी कहानी साहित्य', 'साहित्य शिक्षा' आदि उनकी कुछ प्रमुख आलोचनात्मक पुस्तकें हैं।
5. अनूदित रचनाएँ: जर्मनी के मॉरिस मेटरलिंक के दो नाटकों 'प्रायश्चित्त' और 'उन्मुक्ति का बन्धन' का अनुवाद।
6. संपादन: 'सरस्वती' और 'छाया' जैसी प्रमुख पत्रिकाओं का संपादन करके उन्होंने बहुत यश प्राप्त किया।
साहित्य में स्थान: बख्शी जी एक भावुक कवि, श्रेष्ठ निबंधकार, निष्पक्ष आलोचक, कुशल पत्रकार और कहानीकार थे। आलोचना और निबंध के क्षेत्र में उनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण रहा है। वे विश्व-साहित्य की गहरी समझ रखते थे। उनके ललित निबंधों के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। उनके विचारों की मौलिकता और शैली की नवीनता के कारण हिंदी-साहित्य में शुक्ल युग के निबंधकारों में उनके निबंधों को खास जगह मिली है।
In simple words: पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी एक महान हिंदी साहित्यकार थे। उन्होंने कई निबंध, कविताएँ और कहानियाँ लिखीं, और 'सरस्वती' पत्रिका का संपादन भी किया। वे अपने सरल और मौलिक विचारों के लिए जाने जाते थे।
🎯 Exam Tip: जीवन-परिचय लिखते समय जन्म स्थान, माता-पिता का नाम, शिक्षा, प्रमुख रचनाएँ और साहित्य में योगदान जैसे मुख्य बिंदुओं को हमेशा क्रमबद्ध तरीके से लिखें।
गद्यांशों पर आधारित प्रश्न,
प्रश्न-पत्र में केवल 3 प्रश्न (अ, ब, स) ही पूछे जाएँगे। अतिरिक्त प्रश्न अभ्यास एवं परीक्षोपयोगी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण दिए गये हैं।
Question 1. अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबन्ध-लेखक ए० जी० गार्डिनर का कथन है कि लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है। उस समय मन में कुछ ऐसी उमंग-सी उठती है, हृदय में कुछ ऐसी स्फूर्ति-सी आती है, मस्तिष्क में कुछ ऐसा आवेग-सा उत्पन्न होता है कि लेख लिखना ही पड़ता है। उस समय विषय की चिन्ता नहीं रहती। कोई भी विषय हो, उसमें हम अपने हृदय के आवेग को भर ही देते हैं। हैट टाँगने के लिए कोई भी ख़ुटी काम दे सकती है। उसी तरह अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त है। असली वस्तु है हैट, खूटी नहीं। इसी तरह मन के भाव ही तो यथार्थ वस्तु हैं, विषय नहीं।
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)
1. 'हैट' और 'ख़ुटी' का उदाहरण इस गद्यांश में क्यों दिया गया हैं ? स्पष्ट कीजिए ।
2. विशेष मानसिक स्थिति में क्या होता है ?
3. मनोभावों को व्यक्त करने के लिए किसकी आवश्यकता होती है ?
Answer:
(अ) प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'गद्य-खण्ड' में संकलित तथा श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा लिखित 'क्या लिखें ?' शीर्षक ललित निबन्ध से लिया गया है।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या: लेखक ए० जी० गार्डिनर के विचारों को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि निबंध लिखने के लिए एक खास मन की हालत होनी चाहिए। इस हालत में मन में एक प्रकार का उत्साह और ताजगी भर जाती है, जिससे दिमाग में एक तीव्र भावना उठती है और व्यक्ति को कुछ न कुछ लिखना ही पड़ता है। उस समय लिखने के विषय के बारे में चिंता नहीं होती। लेखक अपने मन के गहरे भावों को किसी भी विषय में डाल देते हैं। जैसे, एक हैट टाँगने के लिए कोई भी खूंटी काम आ सकती है, उसी तरह मन के भावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय ठीक रहता है। असली चीज हैट है, खूंटी नहीं। इसी प्रकार मन के भाव ही असली चीज हैं, विषय नहीं। यदि मन में भाव और विचार हों तो किसी भी विषय पर लिखा जा सकता है।
(स)
1. प्रस्तुत गद्यांश में 'हैट' का उदाहरण मन के भावों के लिए और 'खुटी' का उदाहरण विषय के लिए दिया गया है। गार्डिनर महोदय के अनुसार, जैसे हैट मुख्य चीज है और खूंटी नहीं, वैसे ही मन के भाव और विचार मुख्य हैं, विषय नहीं। इसका मतलब है कि अगर मन में भाव और विचार हों, तो किसी भी विषय पर लिखा जा सकता है।
2. विशेष मानसिक स्थिति में व्यक्ति के मन में उमंग, उत्साह, और ताजगी आती है। मस्तिष्क में एक विशेष प्रकार का तीव्र आवेग उत्पन्न होता है, जिससे व्यक्ति उसे व्यक्त करने के लिए लिखने बैठ जाता है।
3. मनोभावों को व्यक्त करने के लिए एक उपयुक्त विषय की आवश्यकता होती है, जिसमें लेखक अपने भावों को भर सके।
In simple words: लेखक बताता है कि निबंध लिखने के लिए मन में खास उत्साह और ताजगी होनी चाहिए। जब मन में गहरे भाव होते हैं, तो कोई भी विषय उन्हें व्यक्त करने के लिए सही होता है, जैसे हैट टाँगने के लिए कोई भी खूंटी काम आती है।
🎯 Exam Tip: गद्यांश की व्याख्या करते समय, लेखक के मूल विचार को सरल शब्दों में व्यक्त करें और उदाहरणों का उपयोग करके अपने स्पष्टीकरण को पुष्ट करें।
Question 2. उन्होंने स्वयं जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबन्धों में लिपिबद्ध कर दिया। ऐसे निबन्धों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे मन की स्वच्छन्द रचनाएँ हैं। उनमें न कवि की उदात्त कल्पना रहती है, न आख्यायिका-लेखक की सूक्ष्म दृष्टि और न विज्ञों की गम्भीर तर्कपूर्ण विवेचना। उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है। उनमें उसके सच्चे भावों की सच्ची अभिव्यक्ति होती है, उनमें उसका उल्लास रहता है। ये निबन्ध तो उस मानसिक स्थिति में लिखे जाते हैं, जिसमें न ज्ञान की गरिमा रहती है और न कल्पना की महिमा, जिसमें हम संसार को अपनी ही दृष्टि से देखते हैं और अपने ही भाव से ग्रहण करते हैं।
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)
1. निबन्ध किस मानसिक स्थिति में लिखे जाते हैं ?
2. मॉनटेन की शैली के निबन्धों की विशेषता क्या है ?
3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने किस शैली के निबन्धों की विशेषता बतायी है ?
Answer:
(अ) प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'गद्य-खण्ड' में संकलित तथा श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा लिखित 'क्या लिखें ?' शीर्षक ललित निबन्ध से लिया गया है।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या: श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी कहते हैं कि मॉनटेन की आज़ाद शैली में लिखे गए निबंधों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे लेखक के दिल की बेरोकटोक रचनाएँ होती हैं। उनमें न तो कवि जैसी ऊँची कल्पना की जरूरत होती है, न ही किसी कहानी लेखक जैसी बारीक समझ की, और न ही विद्वानों जैसी गंभीर तर्कपूर्ण बातों की। इन निबंधों में लेखक अपने मन की सच्ची भावनाओं को पूरी आज़ादी और खुशी के साथ व्यक्त करते हैं। ये निबंध ऐसी मानसिक स्थिति में लिखे जाते हैं, जहाँ ज्ञान की महानता या कल्पना की महिमा नहीं होती, बल्कि हम दुनिया को अपनी ही नज़र से देखते हैं और अपने ही भावों से समझते हैं। लेखक ऐसे निबंधों में अपने भावों को सीधा और सच्चा व्यक्त करते हैं, बिना किसी बनावट या दिखावे के।
(स)
1. निबंध ऐसी मानसिक स्थिति में लिखे जाते हैं जिसमें न तो ज्ञान का गौरव होता है और न ही कल्पना की ऊँची उड़ान। निबंध में लेखक केवल अपने विचारों को व्यक्त करता है।
2. मॉनटेन की शैली के निबंधों की विशेषता यह है कि वे लेखक के दिल की आज़ाद रचनाएँ हैं। इनमें लेखक की सच्ची भावनाएँ और उनके भावों का असली रूप सामने आता है।
3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने स्वच्छन्दतावादी (आज़ाद) शैली के निबंधों की विशेषता बताई है। उन्होंने साफ किया है कि इन निबंधों में बनावट, बड़ी कल्पना और तर्क वाली बातें नहीं होतीं।
In simple words: लेखक बताते हैं कि अच्छे निबंध तब लिखे जाते हैं जब मन आज़ाद और खुश हो। इन निबंधों में लेखक अपनी सच्ची भावनाओं को बिना किसी दिखावे के व्यक्त करता है, जैसे वह दुनिया को देखता और महसूस करता है।
🎯 Exam Tip: व्याख्या करते समय, पाठ के मूल संदेश को सरल और स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत करें। रेखांकित अंशों से जुड़े सभी महत्वपूर्ण विचारों को शामिल करना सुनिश्चित करें।
Question 3. दूर के ढोल सुहावने होते हैं; क्योंकि उनकी कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती । जब ढोल के पास बैठे । हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर, संध्या समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं। ढोल के उन्हीं शब्दों को सुनकर वह अपने हृदय में किसी के विवाहोत्सव का चित्र अंकित कर लेता है। कोलाहल से पूर्ण घर के एक कोने में बैठी हुई किसी लज्जाशीला 'नव-वधू की कल्पना वह अपने मन में कर लेता है। उस नव-वधू के प्रेम, उल्लास, संकोच, आशंका और विषाद से युक्त हृदय के कम्पन ढोल की कर्कश ध्वनि को मधुर बना देते हैं; क्योंकि उसके साथ आनन्द का कलरव, उत्सव व प्रमोद और प्रेम का संगीत ये तीनों मिले रहते हैं। तभी उसकी कर्कशता समीपस्थ लोगों को भी कटु नहीं प्रतीत होती और दूरस्थ लोगों के लिए तो वह अत्यन्त मधुर बन जाती है।
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)
1. प्रस्तुत अंश में 'दूर के ढोल' और 'नव-वधू' में साम्य और वैषम्य बताइए।
2. ढोल की आवाज किसके लिए कर्कश होती है और किसके लिए मधुर ?
3. ढोल की कर्कश ध्वनि को कौन मधुर बना देता है और क्यों ?
4. दूर के ढोल सुहावने क्यों होते हैं ?
Answer:
(अ) प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'गद्य-खण्ड' में संकलित तथा श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा लिखित 'क्या लिखें ?' शीर्षक ललित निबन्ध से लिया गया है।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या: लेखक श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी कहते हैं कि दूर के ढोल इसलिए अच्छे लगते हैं क्योंकि उनकी कान को चुभने वाली आवाज दूर तक नहीं पहुँचती। जब ढोल पास बजते हैं, तो पास बैठे लोगों के कान के पर्दे फटने लगते हैं, लेकिन दूर किसी नदी के किनारे शाम के शांत माहौल में बैठे लोगों को वही आवाज मीठी लगती है। दूर बैठे किसी व्यक्ति को ढोल की तेज आवाज खुश इसलिए करती है, क्योंकि वह अपने मन में शादी वाले घर के एक कोने में बैठी शर्मीली दुल्हन की कल्पना करने लगता है। शादी की मीठी कल्पना, प्रेम, खुशी, शर्म, संदेह और दुख से भरे दिल की भावनाएँ ढोल की तीखी आवाज को मधुर बना देती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उस नई दुल्हन के दिल में खुशी का मीठा गीत, उत्सव का आनंद और प्रेम का संगीत तीनों एक साथ मौजूद रहते हैं। इसका मतलब यह है कि अगर शादी की खुशी, जीवन की मीठी कल्पनाएँ और प्रिय के प्रति प्रेम की भावना न हो, तो नई दुल्हन को भी शादी में बजने वाले ढोल अच्छे नहीं लगेंगे।
(स)
1. 'दूर के ढोल' का अर्थ है कि दूर से कोई चीज अच्छी लगती है क्योंकि उसकी खराबियाँ पता नहीं चलतीं, जबकि 'नव-वधू' में साम्य यह है कि दोनों ही स्थितियों में मन में मधुरता का संचार होता है। वैषम्य यह है कि ढोल की आवाज पास से कर्कश लगती है, जबकि नव-वधू की कल्पना हमेशा सुखद होती है।
2. ढोल की आवाज पास बैठे व्यक्ति के लिए कर्कश (कानों को चुभने वाली) होती है, जबकि दूर बैठे व्यक्ति के लिए मधुर (मीठी) होती है। लेकिन अगर पास बैठा व्यक्ति विवाहोत्सव में किसी नई दुल्हन की कल्पना करता है, तो उसे ढोल की कर्कश ध्वनि भी मधुर लगने लगती है।
3. ढोल की कर्कश ध्वनि को किसी नई दुल्हन का प्रेम, खुशी, संकोच आदि भावों से भरा दिल मधुर बना देता है, क्योंकि उसके साथ आनंद की मधुर ध्वनि, उत्सव की खुशी और प्रेम का संगीत तीनों मिले-जुले रहते हैं।
4. दूर के ढोल सुहावने इसलिए लगते हैं क्योंकि उनकी कठोर और तेज आवाज दूर तक नहीं पहुँचती और केवल उनकी हल्की और मधुर ध्वनि ही सुनाई देती है, जिससे मन को अच्छा महसूस होता है।
In simple words: दूर के ढोल अच्छे लगते हैं क्योंकि उनकी तेज आवाज दूर तक नहीं पहुँचती, सिर्फ धीमी आवाज सुनाई देती है। जब मन खुश होता है और अच्छी कल्पनाएँ करता है, तो वही ढोल की आवाज मीठी लगने लगती है।
🎯 Exam Tip: इस तरह के प्रश्नों में 'साम्य' और 'वैषम्य' दोनों पहलुओं को स्पष्ट करना आवश्यक है। उदाहरणों को ध्यान से समझें और उनका उपयोग अपनी व्याख्या में करें।
Question 4. जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है, जो वृद्ध हो गये हैं, जो अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आये हैं, उन्हें अपने अतीतकाल की स्मृति बड़ी सुखद लगती है। वे अतीत का ही स्वप्न देखते हैं। तरुणों के लिए जैसे भविष्य उज्ज्वल होता है, वैसे ही वृद्धों के लिए अतीत । वर्तमान से दोनों को असन्तोष होता है। तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं। तरुण क्रान्ति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक । इन्हीं दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है और इसी से वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है।
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए ।
(स)
1. वर्तमान समय सदैव सुधारों का समय क्यों बना रहता है ?
2. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
3. युवा और वृद्ध व्यक्तियों के वैचारिक अन्तर को स्पष्ट कीजिए। या तरुण और वृद्ध दोनों क्या चाहते हैं?
4. संसार का चित्र किसे बड़ा मनमोहक प्रतीत होता है ?
5. तरुण और वृद्ध दोनों क्या चाहते हैं ?
Answer:
(अ) प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'गद्य-खण्ड' में संकलित तथा श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा लिखित 'क्या लिखें ?' शीर्षक ललित निबन्ध से लिया गया है।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या: लेखक श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी कहते हैं कि जिन नौजवानों ने अभी तक दुनिया की मुश्किलों, समस्याओं और कठिनाइयों का सामना नहीं किया है, उन्हें यह दुनिया बहुत आकर्षक और सुंदर लगती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अपने उज्ज्वल भविष्य के सपने देखते हैं, और जीवन के संघर्षों से बहुत दूर रहते हैं। दूर से हर चीज अच्छी लगती है। जो लोग अपनी बचपन और जवानी को पार कर चुके हैं और अब बूढ़े हो गए हैं, वे बीते हुए समय की यादें ताज़ा करके खुश होते हैं। नए लोगों के लिए भविष्य दूर होता है और बूढ़ों के लिए उनका बचपन दूर हो गया होता है। इसी वजह से नौजवानों को भविष्य और बूढ़ों को बीता हुआ समय प्यारा लगता है। लेखक बख्शी जी का कहना है कि नौजवान पूरे जोश और साहस के साथ वर्तमान को बदलना चाहते हैं और बूढ़े लोग पुराने समय की और हमारी अच्छी संस्कृति की रक्षा करना चाहते हैं। इसी संघर्ष के कारण दोनों का जीवन हमेशा तनावपूर्ण रहता है। लेकिन इसका फायदा यह है कि नौजवानों के प्रयासों से वर्तमान समय में सुधार होते हैं और बूढ़ों के प्रयासों से हमारी गौरवपूर्ण संस्कृति सुरक्षित रहती है।
(स)
1. वर्तमान समय हमेशा सुधारों का समय बना रहता है, क्योंकि हर व्यक्ति, चाहे वह युवा हो या बूढ़ा, अपने आज के समय से दुखी रहता है। युवा अपने भविष्य के सुखद सपने देखते हैं और बूढ़े अपने बीते हुए सुखों को याद करते हैं। वर्तमान किसी को भी अच्छा नहीं लगता क्योंकि वह सामने ही होता है। असल में, हमें जो कुछ मिलता रहता है, हम उससे अक्सर असंतुष्ट ही रहते हैं, इसलिए उसे बदलते रहते हैं।
2. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक कहना चाहते हैं कि बूढ़ों की सोच हमारी संस्कृति को सुरक्षित रखती है और युवाओं की सोच वर्तमान में सुधार लाती है। यदि ऐसा नहीं होता तो आने वाली पीढ़ियाँ हमेशा एक ही पुरानी बातों को दोहराती रहतीं।
3. युवाओं को भविष्य की यादें मनमोहक लगती हैं और वृद्धों को अतीत की। युवा भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को। युवा क्रांति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत के गौरव की रक्षा करते हैं।
4. संसार का चित्र ऐसे युवाओं को बहुत आकर्षक लगता है, जो जीवन के संघर्षों और कठिनाइयों से अभी दूर हैं।
5. तरुण (युवा) और वृद्ध दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं। तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को। तरुण क्रांति का समर्थन करते हैं और वृद्ध अतीत के गौरव की रक्षा करते हैं।
In simple words: युवा भविष्य को बेहतर बनाना चाहते हैं और बूढ़े अपने पुराने गौरव को बचाना चाहते हैं। दोनों ही वर्तमान से खुश नहीं रहते, इसलिए समाज में हमेशा बदलाव और सुधार होते रहते हैं।
🎯 Exam Tip: तरुण और वृद्ध की सोच में अंतर बताते समय उनके लक्ष्यों और वर्तमान के प्रति उनके दृष्टिकोण पर ध्यान दें। उत्तर में उनकी भूमिकाओं को स्पष्ट करें।
Question 5. मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो। तभी तो आज तक कितने ही सुधारक हो गये हैं। पर सुधारों का अन्त कब हुआ? भारत के इतिहास में बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द और महात्मा गाँधी में ही सुधारकों की गणना समाप्त नहीं होती। सुधारकों का दल नगर-नगर और गाँव-गाँव में होता है। यह सच है कि जीवन में नये-नये क्षेत्र उत्पन्न होते जाते हैं और नये-नये सुधार हो जाते हैं। न दोषों का अन्त है और न सुधारों का। जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गये हैं और उन सुधारों का फिर नव सुधार किया जाता है। तभी तो यह जीवन प्रगतिशील माना गया है।
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)
1. मनुष्य जाति के इतिहास में कब सुधारों की आवश्यकता नहीं हुई? कुछ प्रमुख सुधारकों के नाम लिखिए ।
2. “प्रत्येक वस्तु, पदार्थ, विचार परिवर्तनशील हैं', इस सत्य का वर्णन करते हुए एक वाक्य लिखिए।
3. जीवन प्रगतिशील क्यों माना गया है?
Answer:
(अ) प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'गद्य-खण्ड' में संकलित तथा श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा लिखित 'क्या लिखें ?' शीर्षक ललित निबन्ध से लिया गया है।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या: लेखक का कहना है कि मानव समाज बहुत बड़ा है और इसमें हमेशा सुधार होते रहते हैं। बुद्ध से महात्मा गांधी तक हमारे देश में कई बड़े सुधारक हुए हैं। जीवन में गलतियों की एक लंबी लिस्ट होती है, इसलिए सुधारों का सिलसिला कभी नहीं रुकता। सुधारकों की टीमें हर शहर और गाँव में होती हैं। जीवन में कई नए क्षेत्र लगातार बनते रहते हैं और उनमें नए सुधार होते रहते हैं। हर चीज में कुछ कमियाँ होती हैं, जिनमें सुधार जरूरी होता है। जब सुधार किए जाते हैं, तो उस समय के लिए चीजें बेहतर हो जाती हैं, लेकिन समय के साथ वही सुधार फिर से कमियाँ लगने लगते हैं और उनमें दोबारा सुधार की जरूरत महसूस होती है। इसी सुधार और बदलाव की वजह से जीवन को हमेशा आगे बढ़ता हुआ माना गया है।
(स)
1. मनुष्य जाति के इतिहास में ऐसा कोई समय नहीं आया जब सुधारों की आवश्यकता नहीं हुई हो। इसका मतलब है कि हमेशा सुधारों की जरूरत पड़ती रही है और आगे भी पड़ती रहेगी। कुछ प्रमुख समाज सुधारक हैं- गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीरदास, गुरु नानकदेव, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, विनोबा भावे आदि।
2. 'प्रत्येक वस्तु, पदार्थ, विचार परिवर्तनशील हैं', इस सत्य का वर्णन करते हुए हम यह कह सकते हैं कि, "परिवर्तन प्रकृति का नियम है। सिर्फ परिवर्तन ही नहीं, पूरी सृष्टि ही बदलती रहती है।"
3. न तो गलतियाँ खत्म होती हैं और न ही सुधार। जो चीजें कभी अच्छी थीं, वही आज गलत हो सकती हैं और उन सुधारों में फिर नए सुधार किए जाते हैं। इसी कारण जीवन को प्रगतिशील माना गया है।
In simple words: इतिहास में हमेशा सुधारों की ज़रूरत रही है। जीवन में नई समस्याएँ आती रहती हैं और पुराने समाधानों में भी बदलाव की ज़रूरत पड़ती है, इसलिए जीवन को हमेशा आगे बढ़ता हुआ (प्रगतिशील) माना जाता है।
🎯 Exam Tip: जब सुधारकों के नाम या अवधारणाओं की व्याख्या पूछी जाए, तो सटीक जानकारी दें और यह भी समझाएँ कि जीवन को प्रगतिशील क्यों माना जाता है, यानी निरंतर बदलाव और अनुकूलन।
Question 6. हिन्दी में प्रगतिशील साहित्य का निर्माण हो रहा है। उसके निर्माता यह समझ रहे हैं कि उनके साहित्य में भविष्य का गौरव निहित है। पर कुछ ही समय के बाद उनका यह साहित्य भी अतीत का स्मारक हो जाएगा और आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे। उनके स्थान में तरुणों । का फिर दूसरा दल आ जाएगा, जो भविष्य का स्वप्न देखेगा। दोनों के ही स्वप्न सुखद होते हैं; क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)
1. “दूर के ढोल सुहावने क्यों होते हैं ?” स्पष्ट कीजिए।
2. प्रस्तुत अवतरण में लेखक क्या कहना चाहता है ?
3. प्रगतिशील साहित्य को अतीत का स्मारक क्यों कहा गया है।
4. लेखक ने साहित्य के निर्माण में किन विशेषताओं का उल्लेख किया है?
5. प्रगतिशील साहित्य-निर्माता क्या समझकर साहित्य-निर्माण कर रहे हैं?
Answer:
(अ) प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'गद्य-खण्ड' में संकलित तथा श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा लिखित 'क्या लिखें ?' शीर्षक ललित निबन्ध से लिया गया है।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या: विद्वान लेखक श्री बख्शी जी साहित्यिक सुधार की प्रक्रिया को समझाते हुए कहते हैं कि आज के युवा साहित्यकार वर्तमान में भूत और भविष्य के बीच संतुलन बनाकर प्रगतिवादी साहित्य रच रहे हैं। उन्हें लगता है कि उनके साहित्य में भविष्य का गौरव छिपा है और भविष्य में सुधार की जरूरत नहीं होगी। लेकिन कुछ समय बाद, उनका यह शानदार साहित्य भी पुराना हो जाएगा और आज के युवा लेखक भी एक दिन बूढ़े होकर बीते समय की बातें याद करेंगे। विद्वान लेखक श्री बख्शी जी कहते हैं कि आज के युवा लेखक भी एक दिन बूढ़े होकर पुरानी बातों का गुणगान करेंगे। और उस समय जो नए युवा साहित्यकार होंगे, वे वर्तमान से खुश नहीं होंगे और नया साहित्य बनाना चाहेंगे। वे भी भविष्य के बारे में सोचेंगे। यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। युवाओं को भविष्य दूर का लगता है और बूढ़ों को अतीत; इसीलिए दोनों को ये सुखद लगते हैं। यह इंसान का स्वभाव है कि जो चीज उसकी पहुँच से दूर होती है, वह उसे अच्छी लगती है और वह उसे पाने की कोशिश करता रहता है। इसीलिए 'दूर के ढोल सुहावने वाली कहावत' सच साबित होती है।
(स)
1. युवाओं को भविष्य दूर का लगता है और वृद्धों को अतीत। इसीलिए दोनों को ये ही सुखद लगते हैं। यह मानव स्वभाव है कि जो वस्तु उसकी पहुँच से दूर होती है, वही उसे अच्छी लगती है और वह उसी को पाने का प्रयत्न भी करती है। इसीलिए कहा जाता है कि 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं'।
2. प्रस्तुत अवतरण में लेखक कहना चाहते हैं कि जो कुछ भी आज जरूरी लग रहा है, वह कल पुराना हो जाएगा और उसमें सुधार की आवश्यकता महसूस होने लगेगी। यह पुराना होने और सुधार का क्रम जीवन के हर क्षेत्र में और साहित्य में लगातार चलता रहता है।
3. प्रगतिशील साहित्य को अतीत का स्मारक इसलिए कहा गया है क्योंकि वह भी कुछ समय बाद अतीत (बीती हुई) की चीज बन जाता है, यानी पुराना हो जाता है।
4. लेखक ने साहित्य के निर्माण में निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया है:
• हिन्दी भाषा के अन्तर्गत प्रगतिशील साहित्य का निर्माण हो रहा है।
• साहित्य में भविष्य का गौरव निहित होता है।
5. प्रगतिशील साहित्य-निर्माता यह समझकर साहित्य-निर्माण कर रहे हैं कि उनके साहित्य में भविष्य का गौरव निहित है।
In simple words: लेखक बताते हैं कि प्रगतिशील साहित्य भी समय के साथ पुराना हो जाएगा। युवा हमेशा भविष्य की सोचते हैं और बूढ़े अतीत को याद करते हैं, क्योंकि जो चीज दूर होती है, वह ज़्यादा अच्छी लगती है।
🎯 Exam Tip: इस गद्यांश से संबंधित प्रश्नों का उत्तर देते समय, समय के साथ विचारों और साहित्य के बदलते स्वरूप को स्पष्ट रूप से समझाएँ। 'दूर के ढोल सुहावने' मुहावरे का अर्थ संदर्भ में दें।
व्याकरण एवं रचना-बोध
Question 1. निम्नलिखित शब्दों से उपसर्ग पृथक् कीजिए तथा उस उपसर्ग से बनने वाले दो अन्य शब्द भी लिखिए सम्मति, निबन्ध, विज्ञ, दुर्बोध, अभिव्यक्ति ।
Answer:
| शब्द | उपसर्ग | दो अन्य शब्द |
|---|---|---|
| सम्मति | सम् | संशय, संकल्प |
| निबन्ध | नि | निडर, निवास |
| विज्ञ | वि | विज्ञान, विशेष |
| दुर्बोध | दुर | दुर्बल, दुराचार |
| अभिव्यक्ति | अभि | अभियोग, अभिकर्ता |
In simple words: उपसर्ग वे छोटे शब्द होते हैं जो किसी शब्द के शुरू में लगकर उसका अर्थ बदल देते हैं। इस तालिका में कुछ शब्दों से उपसर्ग अलग किए गए हैं और उनसे बनने वाले दो नए शब्द भी दिए गए हैं।
🎯 Exam Tip: उपसर्गों को पहचानते समय, मूल शब्द के अर्थ को समझने का प्रयास करें। उपसर्ग हमेशा शब्द के आरंभ में जुड़ते हैं।
Question 2. निम्नलिखित शब्दों से प्रत्यय अलग करके लिखिए तथा उस प्रत्यय से बने दो अन्य शब्द बताइए- शीर्षक, विद्वत्ता, प्रतिभावान्, लज्जाशील, समीपस्थ, सुखद । शब्द
Answer:
| शब्द | प्रत्यय | दो अन्य शब्द |
|---|---|---|
| विद्वत्ता | ता | महत्ता, निर्बलता |
| प्रतिभावान् | वान् | दयावान्, धनवान् |
| लज्जाशील | शील | विनयशील, विचारशील |
| समीपस्थ | स्थ | निकटस्थ, दूरस्थ |
| सुखद | द | दुःखद, जलद |
In simple words: प्रत्यय वे शब्द के अंत में लगने वाले अक्षर या शब्द होते हैं, जो उसके अर्थ को बदल देते हैं। इस तालिका में कुछ शब्दों से प्रत्यय को अलग करके और उनसे बनने वाले दो और शब्द दिखाए गए हैं।
🎯 Exam Tip: प्रत्यय को पहचानते समय, यह सुनिश्चित करें कि मूल शब्द का अपना स्वतंत्र अर्थ हो। प्रत्यय हमेशा शब्द के अंत में जुड़ते हैं।
Question 3. निम्नलिखित शब्दों का इस प्रकार से वाक्यों में प्रयोग कीजिए कि उनका अर्थ स्पष्ट हो जाए-आवेग, विश्वकोश, गाम्भीर्य, कर्कशता, विषाद, दूरस्थ
Answer:
| शब्द | वाक्य-प्रयोग |
|---|---|
| आवेग | क्रोध के आवेग में व्यक्ति को कुछ नहीं सूझता। |
| विश्वकोश | विश्वकोश को सबसे भरोसेमंद ज्ञान का स्रोत माना जाता है। |
| गाम्भीर्य | रामचंद्र शुक्ल का विचार-गाम्भीर्य उनकी शैली को एक नया रूप देता है। |
| कर्कशता | वाणी की कर्कशता के कारण ही कौवे को सम्मान नहीं मिलता। |
| विषाद | योगी जन हर्ष-विषाद से मुक्त होते हैं। |
| दूरस्थ | मैं अपने दूरस्थ मित्र से बहुत कम मिल पाता हूँ। |
In simple words: यहाँ दिए गए शब्दों का प्रयोग वाक्यों में किया गया है ताकि उनका सही अर्थ समझ में आ सके। हर वाक्य में शब्द का प्रयोग इस तरह से किया गया है कि उसका मतलब साफ हो जाए।
🎯 Exam Tip: शब्दों का वाक्यों में प्रयोग करते समय, यह सुनिश्चित करें कि वाक्य सरल और स्पष्ट हो, और शब्द का अर्थ बिना किसी संदेह के व्यक्त हो जाए।
Question 4. प्रस्तुत पाठ में निम्नलिखित साहित्यकारों की जिन विशेषताओं का उल्लेख हुआ है, उन्हें लिखिए-श्रीहर्ष, बाणभट्ट, अमीर खुसरो, सेनापति ।
Answer:
श्रीहर्ष: श्रीहर्ष की भाषा-शैली बहुत कठिन है, जिसे केवल विषय के विशेषज्ञ ही समझ सकते हैं। उनकी शैली में अस्पष्टता या समझने में कठिनाई एक दोष है। उनकी रचनाओं को समझने के लिए गहरी जानकारी की आवश्यकता होती है।
बाणभट्ट: बाणभट्ट की भाषा-शैली में बड़े-बड़े सामासिक (कई शब्दों को जोड़कर बनाए गए) पद होते हैं, जिसमें वाक्य बहुत लंबे हो जाते हैं। इससे उनके लेखन को समझना थोड़ा मुश्किल हो जाता है।
अमीर खुसरो: अमीर खुसरो के साहित्य की मुख्य विशेषता विभिन्न विषयों को एक सूत्र में पिरो देना है, यानी अलग-अलग बातों को एक साथ जोड़कर प्रस्तुत करना। यही खास बात उन्हें दूसरे साहित्यकारों से अलग करती है।
सेनापति: श्रीहर्ष की तरह सेनापति की भाषा-शैली भी समझने में कठिन है। उनकी कविताएँ और रचनाएँ सीधी-सादी भाषा में न होकर, थोड़ी जटिल होती हैं।
In simple words: श्रीहर्ष और सेनापति की भाषा कठिन है, जबकि बाणभट्ट लंबे वाक्यों का प्रयोग करते थे। अमीर खुसरो की खास बात यह थी कि वे अलग-अलग विषयों को एक साथ जोड़कर लिखते थे।
🎯 Exam Tip: साहित्यकारों की विशेषताएँ लिखते समय, उनकी भाषा-शैली, विषय-वस्तु और उनके योगदान को स्पष्ट और संक्षिप्त शब्दों में समझाएँ।
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