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Detailed Chapter 2 तुलसीदास UP Board Solutions for Class 10 Hindi
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Class 10 Hindi Chapter 2 तुलसीदास UP Board Solutions PDF
कवि-परिचय
Question 1. तुलसीदास की जीवनी पर प्रकाश डालते हुए उनकी कृतियों (रचनाओं) का उल्लेख कीजिए। [2009, 10]
या
कवि तुलसीदास का जीवन-परिचय दीजिए तथा उनकी एक रचना का नाम लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
Answer: गोस्वामी तुलसीदास भक्ति काल की रामभक्ति काव्यधारा के मुख्य कवि थे। उनकी भक्ति दास्य भाव की थी। उन्होंने श्रीराम के शील, शक्ति और सुंदरता को मिलाकर दिखाया। वे ऐसे सिद्ध कवि थे जो समय और स्थान की सीमाओं को पार कर चुके थे। मनुष्य के स्वभाव के जितने सुंदर वर्णन उनके काव्य में मिलते हैं, वैसा कहीं और नहीं मिलता। उनका 'श्रीरामचरितमानस' मानव संस्कृति का एक अमर काव्य है।
जीवन-परिचय- गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म सन् 1532 ई० (भाद्रपद, शुक्ल पक्ष, एकादशी, सं० 1589 वि०) में बाँदा जिले के राजापुर गाँव में हुआ था। कुछ विद्वान् उनका जन्म एटा जिले के 'सोरो' गाँव में मानते हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने राजापुर का ही समर्थन किया है। तुलसी सरयूपारीण ब्राह्मण थे। उनके पिता आत्माराम दुबे और माता हुलसी ने अशुभ मूल नक्षत्र में पैदा होने के कारण उन्हें छोड़ दिया था। उनका बचपन बहुत सी मुश्किलों से गुजरा। सौभाग्य से उन्हें बाबा नरहरिदास जैसे गुरु का आशीर्वाद मिला। इन्हीं की कृपा से उन्हें शास्त्रों का अध्ययन करने का अवसर मिला। स्वामी जी के साथ वे काशी आए थे, जहाँ परम विद्वान् महात्मा शेष सनातन जी ने उन्हें वेद-वेदांग, दर्शन, इतिहास और पुराण आदि में निपुण बनाया।
तुलसी का विवाह दीनबन्धु पाठक की सुंदर और बुद्धिमान बेटी रत्नावली से हुआ था। उन्हें अपनी सुंदर पत्नी से बहुत प्रेम था। एक बार जब पत्नी बिना बताए मायके चली गई, तो वे आधी रात में आँधी-तूफान का सामना करते हुए अपनी ससुराल पहुँच गए। इस पर पत्नी ने उन्हें डाँटा:
अस्थि चर्म मय देह मम, तामें ऐसी प्रीति । तैसी जो श्रीराम महँ, होति न तौ भवभीति ॥
पत्नी के इस फटकार से तुलसी को वैराग्य हो गया। उन्होंने कई तीर्थों का भ्रमण किया और राम के पवित्र चरित्र का गुणगान करने लगे। उन्होंने अपनी अधिकतर रचनाएँ चित्रकूट, काशी और अयोध्या में ही लिखी हैं। काशी के असी घाट पर सन् 1623 ई० (श्रावण, शुक्ल पक्ष, सप्तमी, सं० 1680 वि०) में उनका शरीर छूट गया। उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में यह दोहा प्रसिद्ध है:
संवत् सोलह सौ असी, असी गंग के तीर। श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर ॥
कृतियाँ (रचनाएँ)- तुलसीदास जी द्वारा रचित बारह ग्रन्थ प्रामाणिक माने जाते हैं, जिनमें श्रीरामचरितमानस प्रमुख है। उनकी रचनाओं का विवरण इस प्रकार है-
- श्रीरामचरितमानस-यह तुलसीदास जी का सबसे अच्छा ग्रन्थ है। इसमें मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पवित्र चरित्र के माध्यम से हिन्दू जीवन के सभी बड़े आदर्शों को स्थापित किया गया है।
- विनयपत्रिका-इसमें तुलसीदास जी ने कलियुग के खिलाफ रामचन्द्र जी के दरबार में एक अर्जी दी है। यह काव्य तुलसी के भक्त हृदय को सीधे दिखाता है।
- कवितावली-यह कवित्त-सवैया में लिखी एक बेहतरीन मुक्तक रचना है। इसमें रामचरित के मुख्य प्रसंगों को मुक्तकों में क्रम से बताया गया है। यह ब्रजभाषा में लिखी गई है।
- गीतावली-यह गेय पदों में ब्रजभाषा में लिखी एक सुंदर रचना है। इसमें लगभग सभी रसों का सुंदर मिश्रण है और कई राग-रागनियों का उपयोग किया गया है। यह रचना 230 पदों में बंधी है।
- कृष्ण गीतावली-यह कृष्ण की महिमा के बारे में 61 पदों में लिखा गया ब्रजभाषा का काव्य है।
- बरवै रामायण-यह बरवै छन्दों में रामचरित का वर्णन करने वाला एक छोटा काव्य है। इसमें अवधी भाषा का प्रयोग किया गया है।
- रामनहछू-यह लोकगीत शैली में सोहर छन्दों की एक छोटी पुस्तक है, जिसे उनकी प्रारंभिक रचना माना जाता है।
- वैराग्य संदीपनी-इसमें संतों के लक्षण दिए गए हैं। इसमें तीन हिस्से हैं। पहले हिस्से में 6 छन्दों में मंगलाचरण है। दूसरे हिस्से में संत-महिमा का वर्णन और तीसरे में शांतिभाव का वर्णन है।
- जानकी-मंगल-इसमें सीताजी और श्रीराम के शुभ विवाह के उत्सव का वर्णन है।
- पार्वती-मंगल-इसमें पूर्वी अवधी में शिव-पार्वती के विवाह का काव्यमय वर्णन है।
- दोहावली-इसमें दोहा शैली में नीति, भक्ति, नाम-माहात्म्य और राम-महिमा का वर्णन है।
- रामाज्ञा प्रश्न-यह शकुन-विचार की एक अच्छी पुस्तक है। इसमें सात सर्ग हैं।
साहित्य में स्थान- गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी-साहित्य के सबसे महान कवि हैं। उनके द्वारा हिन्दी कविता की हर तरफ से तरक्की हुई। उन्होंने अपने समय के समाज की गलतियों पर प्रकाश डाला और उन्हें ठीक करने के तरीके सुझाए। साथ ही उन्होंने कई अलग-अलग मतों और विचारों को मिलाकर समाज में फिर से जागृति का मंत्र फूंका। इसीलिए उन्हें समाज का मार्गदर्शक कवि कहा जाता है। उनके बारे में अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' जी ने ठीक ही लिखा है:
कविता करके तुलसी न लसे । कविता लसी पा तुलसी की कला ॥
In simple words: तुलसीदास जी राम भक्ति के बहुत बड़े कवि थे। उन्होंने भगवान राम के जीवन पर कई किताबें लिखीं, जिनमें 'रामचरितमानस' सबसे प्रसिद्ध है। यह किताब बहुत प्रभावशाली है और समाज को सही रास्ता दिखाती है।
🎯 Exam Tip: कवि-परिचय लिखते समय, जन्म-मृत्यु, माता-पिता, गुरु, प्रमुख रचनाएँ और साहित्यिक महत्व जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं को क्रम से लिखना चाहिए।
पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या
धनुष-भंग
Question 1. उदित उदयगिरि मंच पर, रघुबर बालपतंग ।
बिकसे संत सरोज सब, हरषे लोचन शृंग ॥ [2017]
Answer:
[ उदयगिरि = उदयाचल पर्वत । बालपतंग = बाल सूर्य, प्रातःकालीन सूर्य । सरोज = कमल । लोचन = नेत्र । भुंग = भंवरे ।]
सन्दर्भ: प्रस्तुत काव्य-पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'काव्य-खण्ड' के ‘धनुष-भंग' कविता शीर्षक से ली गई हैं। यह अंश हमारी पाठ्य-पुस्तक में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड से लिया गया है।
प्रसंग: प्रस्तुत पद में धनुष-भंग के लिए बने हुए मंच पर रामचन्द्र जी के आने का वर्णन किया गया है।
व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि जब उदयाचल पर्वत जैसे विशाल मंच पर श्रीरामचन्द्र जी बाल सूर्य के समान उदय हुए, तो संत रूपी सभी कमल खिल उठे और उनकी आँखों रूपी भौंरे खुश हो गए। इसका मतलब है कि जैसे ही श्रीराम मंच पर आए, सभा में मौजूद सभी सज्जन लोग बहुत प्रसन्न हो गए। भगवान राम के आगमन से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा भर गई।
काव्यगत सौन्दर्य:
- यहाँ पर मंच की विशालता और श्रीरामचन्द्र जी के सौन्दर्य का वर्णन किया गया है।
- भाषा-अवधी ।
- शैली-प्रबन्ध और चित्रात्मक ।
- रस-अद्भुत ।
- छन्द-दोहा ।।
- अलंकार-उपमा, रूपक और अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग।
- गुण-माधुर्य ।
- भावसाम्य–कविवर बिहारी ने भी श्रीकृष्ण के सौन्दर्य का चित्रण करते हुए लिखा है-“मनौ नीलमनि सैल पर, आतपु पर्यो प्रभात ।”
In simple words: जब राम जी धनुष तोड़ने वाले मंच पर आते हैं, तो सब लोग वैसे ही खुश हो जाते हैं जैसे सूरज निकलने पर कमल खिल जाते हैं। राम जी की सुंदरता को देखकर सभी संत बहुत प्रसन्न हुए।
🎯 Exam Tip: पद्यांश की व्याख्या करते समय, कठिन शब्दों का अर्थ बताएं और फिर पूरे प्रसंग को सरल शब्दों में समझाएं। अलंकार और रस का उल्लेख करना न भूलें।
Question 2. नृपन्ह केरि आसा निसि नासी । बचन नखत अवलीन प्रकासी ॥
मानी महिप कुमुद सकुचाने । कपटी भूप उलूक लुकाने ॥
भए बिसोक कोक मुनि देवा । बरसहिं सुमन जनावहिं सेवा ॥
गुर पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु मागा ॥
सहजहिं चले सकल जग स्वामी । मत्त मंजु बर कुंजर गामी ॥
चलत राम सब पुर नर नारी । पुलक पूरि तन भए सुखारी ॥
बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे । जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे ॥
तौं सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ रामु गनेस गोसाईं ॥
Answer:
[ निसि = रात्रि । नखते = नक्षत्र, तारे। अवली = पंक्ति, समूह । मानी = अभिमानी । लुकाने = छिपना । कोक = चकवा, कोयल । आयसु – आज्ञा । बर = श्रेष्ठ । कुंजर = हाथी । पुलक = रोमांच । पितर = पूर्वज । मृनाल = कमल की नाल ।]
प्रसंग: प्रस्तुत पद में सभा में उपस्थित कुछ राजाओं की स्थिति, राम की विनम्रता और पूरे नगरवासियों की भावना का वर्णन किया गया है।
व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्र जी के मंच पर आते ही सभा में उपस्थित अन्य राजाओं की आशा रूपी रात खत्म हो गई और उनके वचन रूपी तारों का समूह चमकना बंद हो गया, यानी वे चुप हो गए। अभिमानी राजा रूपी कमल मुरझा गए और कपटी राजा रूपी उल्लू छिप गए। मुनि और देवता रूपी चकवे शोक रहित हो गए, यानी प्रसन्न हो गए। वे फूलों की बारिश करके अपनी सेवा और कृपा प्रकट करने लगे। इसके बाद श्रीरामचन्द्र जी ने बहुत प्रेम से अपने गुरु विश्वामित्र के चरणों की वंदना की और वहाँ मौजूद अन्य मुनियों से भी आज्ञा माँगी।
फिर गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि पूरे संसार के स्वामी श्रीरामचन्द्र जी सुंदर, मतवाले और श्रेष्ठ हाथी की चाल से चले, जो उनकी स्वाभाविक चाल थी। श्रीरामचन्द्र जी के चलने से सभा में उपस्थित नगर के सभी स्त्री-पुरुष प्रसन्न हो गए और उनके शरीर में रोमांच भर गया। सभी स्त्री-पुरुषों ने अपने पूर्वजों की वंदना की और अपने पुण्य कर्मों को याद करते हुए कहा कि हे गणेश जी! यदि हमारे किए हुए पुण्य कर्मों का थोड़ा भी फल मिलता हो, तो श्रीरामचन्द्र जी शिवजी के इस बड़े धनुष को कमल की नाल (डंडी) के समान तोड़ दें। इसका मतलब यह है कि सभा में मौजूद शरारती और अभिमानी राजाओं के अलावा सभी लोग चाहते थे कि श्रीराम इस धनुष को तोड़ दें। यह लोगों के मन में राम जी के प्रति गहरी आस्था और विश्वास को दिखाता है।
काव्यगत सौन्दर्य:
- प्रस्तुत पद्यांश में यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि नगर के सभी नर-नारी चाहते थे कि सीता को वर के रूप में राम ही मिलें।
- भाषा-अवधी ।
- शैली-प्रबन्ध और वर्णनात्मक ।
- रस-भक्ति ।
- छन्द-दोहा ।
- अलंकार-रूपक और अनुप्रास अलंकार का मनमोहक प्रयोग ।
- गुण-प्रसाद ।
- शब्दशक्ति-अभिधा और व्यंजना ।
In simple words: राम जी जब धनुष तोड़ने के लिए मंच पर आए, तो सभी अहंकारी राजा चुप हो गए और संत-देवता खुश हो गए। राम जी ने अपने गुरु को प्रणाम किया और फिर एक मतवाले हाथी की चाल से धनुष की ओर बढ़े। सभी लोग चाहते थे कि राम जी धनुष तोड़कर सीता जी से विवाह करें।
🎯 Exam Tip: किसी भी पद्यांश के प्रसंग को लिखते समय यह ध्यान रखें कि उसमें वर्णित घटना या भावों का संक्षेप में उल्लेख हो। व्याख्या में मुख्य संदेश को सरल शब्दों में प्रस्तुत करें।
Question 3. रामहि प्रेम समेत लखि, सखिन्ह समीप बोलाइ ।
सीता मातु सनेह बस, बचन कहइ बिलखाइ ।
Answer:
[ लखि = देखकर । खस = वशीभूत होकर । बिलखाइ = विलाप करते हुए!]
प्रसंग: प्रस्तुत पद में सीताजी की माता का श्रीरामचन्द्र जी के प्रति असीम स्नेह व्यक्त हुआ है।
व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि मंच पर आए श्रीरामचन्द्र जी को बहुत प्रेम से देखकर जनकनन्दिनी सीताजी की माता ने अपनी सभी सहेलियों को अपने पास बुला लिया और स्नेह के कारण दुख भरे स्वर में उनसे कहने लगीं। वे अपनी बेटी के भविष्य को लेकर चिंतित थीं और राम जी को देखकर उनके मन में स्नेह उमड़ आया।
काव्यगत सौन्दर्य:
- प्रस्तुत पद में सीताजी की माता का राम के प्रति वात्सल्य भाव का वर्णन हुआ है।
- भाषा-अवधी
- शैली-प्रबन्ध ।
- रस-वात्सल्य ।
- छन्द-दोहा ।
- अलंकार – अनुप्रास ।
- गुण-प्रसाद ।।
In simple words: सीता की माता ने राम को प्यार से देखा और अपनी सहेलियों को बुलाकर दुखी मन से बातें कहीं। उन्हें राम के प्रति बहुत प्यार महसूस हो रहा था।
🎯 Exam Tip: वात्सल्य रस की पहचान बच्चों के प्रति प्रेम, दुलार और चिंता के भावों से होती है। इसे व्याख्या में स्पष्ट रूप से दर्शाएं।
Question 4. सखि सब कौतुकु देखनिहारे । जेउ कहावत हितू हमारे ॥
कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं । ए बालक असि हठ भलि नाहीं ॥
रावन बान छुआ नहिं चापा । हारे सकल भूप करि दापा ॥
सो धनु राजकुर कर देहीं। बाल मराल कि मंदर लेहीं ।
भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी ॥
बोली चतुर सखी मृदु बानी । तेजवंत लघु गनिअ न रानी ॥
कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा । सोषेउ सुजसु सकल संसारा॥
रबि मंडल देखत लघु लागा। उदय तासु तिभुवन तम भागा ॥ [2015]
Answer:
[ कौतुकु = तमाशा । हितू = हित की चिन्ता करने वाले । गुर = गुरु । भलि = अच्छा । चापा = धनुष । दापा = घमण्ड । कर = हाथ। मराल = हंस । मंदर = मन्दराचल पर्वत। सिरानी = समाप्त हो जाना। बिधि = भाग्य । तेजवंत = तेज से युक्त । कुंभज = कुम्भ से उत्पन्न, अगस्त्य ऋषि । सुजसु = सुयश । ]
प्रसंग: प्रस्तुत पद में सीताजी की माता का राम के प्रति चिंता और उनकी सखी द्वारा उन्हें समझाने का वर्णन किया गया है।
व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि सीताजी की माता अपनी सखी से कह रही हैं कि हे सखी! जो लोग हमारे हितैषी कहलाते हैं, वे सब बस तमाशा देख रहे हैं। कोई भी उनके गुरु (विश्वामित्र) को यह नहीं समझाता कि ये श्रीराम बालक हैं और उनके लिए ऐसा हठ करना ठीक नहीं है। रावण और बाण जैसे असुरों ने भी जिस धनुष को छुआ तक नहीं और यहाँ मौजूद सभी राजा घमंड करके हार गए, वही धनुष इस कोमल रामचन्द्र के हाथ में दिया जा रहा है। कोई इन्हें यह क्यों नहीं समझाता कि हंस के बच्चे कहीं मन्दराचल पर्वत को उठा सकते हैं? इसका मतलब यह है कि महादेव के जिस धनुष को रावण और बाण जैसे बड़े-बड़े वीर छू तक नहीं पाए और दूर से ही प्रणाम करके चले गए, उसे तोड़ने के लिए विश्वामित्र का श्रीराम को आज्ञा देना और उनका उसे तोड़ने के लिए आगे बढ़ना उनका बचपना लगता है। इसीलिए वे कहती हैं कि गुरु विश्वामित्र को कोई समझाता क्यों नहीं है?
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि सीताजी की माता कहती हैं कि दूसरों की क्या कहूँ, राजा जनक तो खुद बड़े समझदार और ज्ञानी हैं, उन्हें तो गुरु विश्वामित्र को समझाने की कोशिश करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा लगता है कि उनकी सारी समझ और चतुराई खत्म हो गई है। हे सखी! क्या करूँ, ब्रह्मा की गति यानी वे क्या चाहते हैं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। इतना कहकर वे चुप हो जाती हैं तब उनकी एक चतुर सखी, जो श्रीरामचन्द्र जी के महत्व को जानती थी, कोमल वाणी में उनसे कहती है कि “हे रानी! देखने में छोटा होने पर भी तेजस्वी व्यक्ति को छोटा नहीं मानना चाहिए। कहाँ कुंभज यानी घड़े से पैदा हुए छोटे से मुनि अगस्त्य और कहाँ विशाल समुद्र? लेकिन उन्होंने उस समुद्र को सोख लिया। इस कारण से उनका यश पूरे संसार में फैल गया है। फिर सूर्य मंडल भी देखने में कितना छोटा लगता है, लेकिन उसके उदय होते ही तीनों लोकों (पृथ्वी, आकाश और स्वर्ग) का अँधेरा भाग जाता है।” कभी-कभी छोटी चीज़ें भी बहुत बड़ी ताकत रखती हैं, इस बात पर विश्वास रखना चाहिए।
काव्यगत सौन्दर्य:
- छोटा जानकर योग्यता पर सन्देह नहीं किया जाना चाहिए, इसकी कवि ने तर्कयुक्त अभिव्यक्ति की है।
- भाषा-अवधी
- शैली-प्रबन्ध और विवेचनात्मक ।
- रस-वात्सल्य ।
- छन्द-चौपाई ।
- अलंकार-अनुप्रास।
- गुण-प्रसाद ।।
In simple words: सीता की माता धनुष तोड़ने को लेकर चिंतित थीं क्योंकि राम जी बहुत छोटे थे। एक सखी ने उन्हें समझाया कि छोटे होने पर भी राम जी शक्तिशाली हो सकते हैं, जैसे छोटा सूरज भी अंधकार मिटा देता है।
🎯 Exam Tip: किसी भी तर्कयुक्त बात को प्रस्तुत करते समय, उसे उदाहरणों से समझाना चाहिए ताकि वह अधिक प्रभावशाली लगे।
Question 5. मंत्र परम लघु जासु बस, बिधि हरि हर सुर सर्ब ।
महामत्त गजराज कहूँ, बस कर अंकुस खर्ब ।।। [2015, 16]
Answer:
[ बस = वशीभूत । बिधि = ब्रह्मा । हरि = विष्णु । हर = शंकर । सुर = देवता । अंकुस = अंकुश । खर्ब = छोटा ।]
प्रसंग: प्रस्तुत पद में मंत्र और अंकुश के द्वारा सभी देवताओं और हाथी को नियंत्रित करने का वर्णन है।
व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि धनुष-भंग के समय जब सीताजी की माता श्रीराम को छोटा समझकर, धनुष तोड़ने में असमर्थ मानकर अपनी सखी से चिंता व्यक्त करती हैं, तब उनकी सखी विभिन्न उदाहरणों के द्वारा उनको समझाती हुई कहती हैं कि, “जिस मंत्र के वश में सभी देवता, ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि भी रहते को मजबूर होते हैं, वह मंत्र भी बहुत छोटा ही होता है।” बहुत विशाल और मदमस्त हाथी को भी महावत छोटे से अंकुश के द्वारा अपने वश में कर लेता है। यह दिखाता है कि आकार में छोटा होना ताकत की कमी नहीं दर्शाता।
काव्यगत सौन्दर्य:
- भाषा-अवधी ।
- शैली-प्रबन्ध और उद्धरण।
- छन्द-दोहा ।
- अलंकार-अनुप्रास ।
- शब्द-शक्ति-अभिधा और लक्षणा ।।
In simple words: यह दोहा बताता है कि एक छोटा सा मंत्र भी सभी देवताओं को अपने वश में कर लेता है और एक छोटा सा अंकुश भी बड़े हाथी को काबू कर लेता है। इसका मतलब है कि कभी-कभी छोटी चीजें भी बहुत शक्तिशाली होती हैं।
🎯 Exam Tip: उदाहरणों का प्रयोग करके अपनी बात को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना एक अच्छा तरीका है। छोटी चीज़ों की बड़ी शक्ति को उजागर करने वाले मुहावरे याद रखें।
Question 6. काम कुसुम धनु सायक लीन्हे । सकल भुवन अपने बस कीन्हे ॥
देबि तजिअ संसउ अस जानी । भंजब धनुषु राम सुनु रानी ॥
सखी बचन सुनि भै परतीती । मिटा बिषादु बढी अति प्रीती ॥[2016]
तब रामहि बिलोकि बैदेही । सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही ॥
मनहीं मन मनाव अकुलानी । होहु प्रसन्न महेस भवानी ॥
करहु सफल आपनि सेवकाई । करि हितु हरहु चाप गरुआई ॥
गननायक बरदायक देवा । आजु लगें कीन्हिउँ तुझे सेवा ॥
बार बार बिनती सुनि मोरी । करहु चाप गुरुता अति थोरी ॥
Answer:
[ कुसुम = पुष्प । सायक = बाण । संसउ = संशय । भंजब = तोड़ेंगे । बिषाद् = उदासी, निराशा । बिलोकि = देखकर । जेहि तेही = जिस किसी की। अकुलानी = व्याकुल होकर। सेवकाई = सेवा । हरहु = हरण कर लीजिए । गरुआई = गुरुता, भारीपन ।]
प्रसंग: प्रस्तुत पद में सीताजी की माताजी का राम की क्षमता के सम्बन्ध में विश्वास और सीता द्वारा विभिन्न देवताओं की प्रार्थना किए जाने का वर्णन किया गया है।
व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि सीताजी की माताजी की सहेली उनको समझाती हुई कहती हैं कि कामदेव ने फूलों का ही धनुष-बाण लेकर पूरे संसार को अपने वश में कर रखा है। हे देवी! इस बात को अच्छी तरह से समझकर आप अपने संदेह को छोड़ दीजिए। हे रानी!
आप सुनिए, श्रीरामचन्द्र जी धनुष को ज़रूर तोड़ देंगे। सखी के मुख से इस प्रकार के सांत्वना भरे वचन सुनकर जनक-भामिनी को श्रीरामचन्द्र जी की ताकत पर विश्वास हो गया, उनकी उदासी खत्म हो गई और श्रीराम के प्रति उनके मन में स्नेह और भी बढ़ गया। इसी समय श्रीरामजी को देखकर, यानी उनके कोमल बाहरी व्यक्तित्व को देखकर, सीताजी जो भी देवता उनके ध्यान में आए, उनसे रामजी की सहायता के लिए विनती करने लगीं।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि जनकनन्दिनी सीताजी व्याकुल होकर मन-ही-मन में प्रार्थना कर रही हैं कि “हे भगवान् शंकर! हे माता पार्वती! मुझ पर प्रसन्न हो जाइए और मैंने आपकी जो कुछ भी सेवा-आराधना की है उसका अच्छा फल प्रदान करते हुए और मुझ पर कृपा करके धनुष के भारीपन को बहुत ही कम कर दीजिए।” फिर गणेश जी की प्रार्थना करती हुई कहती हैं कि “हे गणों के नायक और मन-चाहा वर देने वाले गणेश जी! मैंने आज ही के दिन के लिए; यानी श्रीराम जैसे पुरुष को पति-रूप में प्राप्त करने की इच्छा से; आपकी पूजा-अर्चना की थी। आप बार-बार की जा रही मेरी विनती को सुनिए और धनुष के भारीपन को बहुत ही कम कर दीजिए।” सच्ची भक्ति और प्रार्थना से मुश्किल काम भी आसान हो जाते हैं।
काव्यगत सौन्दर्य:
- मनवांछित प्राप्ति के लिए विभिन्न देवताओं की प्रार्थना करने की भारतीय परम्परा को स्पष्ट किया गया है।
- भाषा-अवधी ।
- शैली-प्रबन्ध और वर्णनात्मक ।
- रस - भक्ति ।
- छन्द-चौपाई ।
- अलंकार-अनुप्रास और पुनरुक्तिप्रकाश ।
- गुण-प्रसाद ।
- शब्दशक्ति-अभिधा और लक्षणा ।
In simple words: सखी ने सीता की माता को समझाया कि राम जी धनुष तोड़ देंगे। यह सुनकर सीता जी ने मन ही मन शंकर जी, पार्वती और गणेश जी से प्रार्थना की कि धनुष को हल्का कर दें ताकि राम उसे आसानी से तोड़ सकें।
🎯 Exam Tip: धार्मिक प्रसंगों की व्याख्या करते समय, उसमें निहित आस्था और भक्ति के भाव को स्पष्ट करना चाहिए। प्रार्थना के महत्व को भी बताएं।
Question 7. देखि देखि रघुबीर तन, सुर मनाव धरि धीर ।
भरे बिलोचन प्रेम जल, पुलकावली सरीर ॥
Answer:
[रघुबीर = रामचन्द्र जी । सुर = देवता । धीर = धैर्य । बिलोचन = नेत्रों में । पुलकावली = प्रेम और हर्ष से उत्पन्न रोमांच ।]
प्रसंग: प्रस्तुत पद में सीताजी की श्रीराम के प्रति प्रेमानुरक्ति का वर्णन हुआ है।
व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि सीताजी बार-बार श्रीरामचन्द्र जी की ओर देख रही हैं और धैर्य धारण करके देवताओं को मनचाहा वरदान देने के लिए मनाती जा रही हैं; यानी अनुनय-विनय कर रही हैं। उनके नेत्रों में प्रेम के आँसू भरे हुए हैं और शरीर में रोमांच हो रहा है। यह दृश्य उनके गहरे प्रेम और आशा को दिखाता है।
काव्यगत सौन्दर्य:
- सीताजी का श्रीराम के प्रति प्रेम का सजीव चित्रण हुआ है।
- भाषा-अवधी ।
- शैली-प्रबन्ध और वर्णनात्मक ।
- रस-श्रृंगार ।
- छन्द-दोहा
- अलंकार-पुनरुक्तिप्रकाश, रूपक और अनुप्रास।
- गुण-माधुर्य ।।
In simple words: सीता जी बार-बार राम जी को देख रही थीं। वे देवताओं से प्रार्थना कर रही थीं कि राम जी को ही उन्हें पति के रूप में मिलें। उनकी आँखों में आँसू थे और शरीर खुशी से काँप रहा था, जो उनके गहरे प्रेम को दर्शाता है।
🎯 Exam Tip: श्रृंगार रस के वर्णन में नेत्रों और शारीरिक भावों का सूक्ष्म चित्रण बहुत महत्वपूर्ण होता है। प्रेम और व्याकुलता के भावों को स्पष्ट करें।
Question 8. नीके निरखि नयन भरि सोभा । पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा ॥
अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी ॥
सचिव सभय सिख देइ न कोई । बुध समाज बड़ अनुचित होई ॥
कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा । कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा ।।
बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा । सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा ॥
सकल सभा कै मति भै भोरी । अब मोहि संभुचाप गति तोरी ॥
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी । होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी ॥
Answer:
[ नीके = अच्छी तरह । निरखि = देखकर । पनु = प्रण । छोभा = क्षोभ, दुःख । दारुनि = कठोर । कुलिसहु = हीरे के समान । उर = हृदय । सिरस = शिरीष । भोरी = भ्रम में पड़ना। जड़ता = कठोरता, मूर्खता । परिताप = सन्ताप, दुःख । निमेष = पलक झपकने में लगने वाला समय ।]
प्रसंग: प्रस्तुत पद में श्रीराम के प्रति सीताजी की अनुरक्ति का बहुत ही मार्मिक वर्णन किया गया है।
व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्र जी की सुंदरता को जी भरकर देखने के बाद और पिताश्री के प्रण को याद करके सीताजी का मन दुखी हो जाता है। वे मन-ही-मन सोचने लगती हैं; यानी खुद से कहने लगती हैं कि “ओह! पिताजी ने बहुत ही कठोर हठ ठान ली है और वे इसमें कोई लाभ-हानि नहीं समझ पा रहे हैं। भयभीत होने के कारण (राजपद से) कोई भी मंत्री उन्हें सही सलाह नहीं दे रहा है। वास्तव में विद्वानों की सभा में यह बहुत ही गलत काम हो रहा है। यह धनुष तो वज्र से भी अधिक कठोर है, जिसके सामने ये कोमल शरीर वाले श्याम वर्ण के किशोर की क्या तुलना; यानी कोई समानता ही नहीं है।” गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि, जनकनन्दिनी सीताजी ब्रह्मा से कहती हैं कि “भाग्य को लिखने वाले हे विधाता! मैं अपने हृदय में किस तरह से धैर्य रखूँ, यानी मैं धैर्य भी धारण नहीं कर सकती, क्योंकि सारी सभा की बुद्धि ही फिर गई है। वे यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि कहीं शिरीष के फूल के कण से हीरे को छेदा जा सकता है। अतः सब ओर से निराश होकर हे शिवजी के धनुष! अब मुझे केवल तुम्हारा ही सहारा है। अब तुम अपनी कठोरता लोगों पर डाल दो और श्रीरामचन्द्र जी के कोमल शरीर को देखकर उतने ही हल्के हो जाओ।” इस प्रकार विचार करते-करते सीताजी के मन में इतना दुख हो रहा है कि पलक झपकने में लगने वाला समय (निमेष) का एक अंश भी सौ युगों (समय मापने की बहुत लंबी इकाई) के समान बीत रहा है। उनकी चिंता में हर पल भारी महसूस हो रहा था।
काव्यगत सौन्दर्य:
- राम के शरीर की कोमलता का अनुभव कर ईश्वर से उन पर अनुग्रह करने की प्रार्थना की गयी है।
- भाषा-अवधी
- शैली-प्रबन्ध ।
- रस-श्रृंगार और भक्ति ।
- छन्द – दोहा ।
- अलंकार-अनुप्रास और उपमा ।
- गुण-माधुर्य और प्रसाद।।
In simple words: सीता जी ने राम की सुंदरता देखी, फिर अपने पिता की कठोर प्रतिज्ञा याद करके दुखी हो गईं। वे सोचती हैं कि यह धनुष बहुत कठोर है और राम जी कोमल हैं। वे भगवान से प्रार्थना करती हैं कि धनुष हल्का हो जाए और उनका यह समय जो युगों के समान लग रहा था, थोड़ा आसान हो।
🎯 Exam Tip: किसी भी भावनात्मक प्रसंग में, पात्र के मन के विचारों और भावनाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त करना महत्वपूर्ण होता है। इसमें उनकी प्रार्थना और आंतरिक द्वंद्व को भी दर्शाएं।
Question 9. प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि, राजत लोचन लोल ।
खेलत मनसिज मीन जुग, जनु बिधु मंडल डोल ।।
Answer:
[ चितइ व चितव = देखकर । महि = पृथ्वी । राजत = सुशोभित । लोचन = नेत्र । मनसिज = कामदेव । मीन = मछली । बिधु = चन्द्रमा ।]
प्रसंग: प्रस्तुत पद में सीता जी के सौन्दर्य का वर्णन किया गया है।
व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी सीता जी की वाणी की असमर्थता को दिखाते हुए अलंकारिक रूप में कह रहे हैं कि पहले प्रभु श्रीरामचन्द्र जी की ओर देखकर और फिर लज्जा से पृथ्वी की ओर देखती हुई सीताजी के चंचल नेत्र इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं मानो चंद्रमा रूपी डोल में कामदेव की दो मछलियाँ खेल रही हों। यह उनके मन की चंचलता और लज्जा दोनों को दर्शाता है।
काव्यगत सौन्दर्य:
- नेत्रों की चंचलता की तुलना मछलियों से की गयी है।
- भाषा-अवधी ।
- शैली-प्रबन्ध और वर्णनात्मक ।
- रस-शृंगार ।
- छन्द- दोहा
- अलंकार-उत्प्रेक्षा और अनुप्रसि ।
- गुण-माधुर्य ।
In simple words: सीता जी पहले राम को देखती हैं, फिर शर्म से धरती की ओर देखती हैं। उनके चंचल नेत्र ऐसे लगते हैं मानो चंद्रमा के घेरे में कामदेव की दो मछलियाँ खेल रही हों, जो उनकी सुंदरता और लज्जा को दर्शाते हैं।
🎯 Exam Tip: रूपक और उत्प्रेक्षा जैसे अलंकारों का प्रयोग करके सुंदरता का वर्णन और अधिक प्रभावशाली हो जाता है। उपमा का सही प्रयोग करें।
Question 10. गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी । प्रगट न लाज निसा अवलोकी ॥
लोचन जल रह लोचन कोना। जैसे परम कृपन कर सोना ॥
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी । धरि धीरजु प्रीतिति उर आनी ॥
तन मन बचन मोर पनु साचा । रघुपति पद सरोज चितु राचा ॥तौ भगवानु सकल उर बासी । करिहि मोहि रघुबर कै दासी ॥
जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू । सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू ॥
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सब जाना॥
सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसे । चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसे ॥ (2015)
Answer:
[ गिरा = वाणी । अलिनि = भ्रमर का स्त्रीलिंग । कृपन = कंजूस । साचा = सच्चा । राचा = अनुरक्त । तकेउ = देखकर । गरुरु = गरुड़ पक्षी। ब्यालहिं = सर्प ।]
प्रसंग: प्रस्तुत पद में सीताजी की राम के प्रति गहरे प्रेम का बहुत ही जीवंत वर्णन किया गया है।
व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी सीताजी की वाणी की असमर्थता को दिखाते हुए अलंकारिक रूप में कह रहे हैं कि सीताजी की वाणी रूपी भ्रमरी को उनके मुख रूपी कमल ने रोक रखा है। इसका मतलब है कि उनके मुख से आवाज ही नहीं निकल पा रही है। लज्जा रूपी रात को देखकर भी वह प्रकट नहीं हो पा रही है। नेत्रों का जल नेत्रों के कोने में उसी प्रकार रुक गया है जैसे बहुत कंजूस का गड़ा हुआ सोना गड़ा ही रह जाता है। इसका मतलब यह है कि सीता जी अपनी असमर्थता को आँसुओं के द्वारा प्रकट करने में भी सक्षम नहीं हैं। अपनी इस बढ़ी हुई व्याकुलता को समझकर सीताजी प्रेमपूर्वक संकोच करने लगीं। तत्पश्चात् उन्होंने हृदय में धैर्य धारण करके मन में विश्वास किया कि यदि तन, मन और वचन से मेरा प्रण सच्चा है और श्रीरामचन्द्र जी के चरण-कमलों में मेरा हृदय वास्तव में अनुरक्त है तो सभी के हृदय में निवास करने वाले ईश्वर मुझे उन रघुकुल श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्र जी की दासी ज़रूर बनाएँगे; क्योंकि जिस किसी पर भी जिस किसी का सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि प्रभु श्रीरामचन्द्र जी की ओर देखकर सीताजी ने शरीर के द्वारा अपने प्रेम का निश्चय कर लिया; यानी इस बात का निश्चय कर लिया कि अब यह शरीर या तो इन्हीं (श्रीराम) का होकर रहेगा या रहेगा ही नहीं। उनके इस निश्चय को कृपानिधान श्रीरामचन्द्र जी तुरंत जान गए। इसके बाद उन्होंने सीताजी की ओर देखकर धनुष की ओर इस प्रकार देखा जैसे गरुड़ छोटे से सर्प की ओर देखता है। भगवान राम ने सीता के मन के भावों को तुरंत समझ लिया।
काव्यगत सौन्दर्य:
- राम के प्रति सीता की अनुरक्ति का आलंकारिक वर्णन है।
- भाषा-अवधी
- शैली-प्रबन्ध और चित्रात्मक ।
- रस-शृंगार व भक्ति ।
- छन्द-दोहा ।
- अलंकार-सर्वत्र अनुप्रास, रूपक व उपमा का मंजुल प्रयोग ।
- गुण-माधुर्य और प्रसाद ।
- शब्द-शक्ति-अभिधा और लक्षणा ।।
In simple words: सीता जी के मुख से लाज के कारण आवाज़ नहीं निकल रही थी और आँखों में आँसू रुके हुए थे। उन्होंने मन में प्रण किया कि यदि उनका प्रेम सच्चा है, तो राम जी उन्हें अपनी दासी ज़रूर बनाएंगे। राम जी ने सीता जी का प्रेम जान लिया और फिर धनुष को वैसे ही देखा जैसे गरुड़ छोटे साँप को देखता है, यानी उसे तोड़ने के लिए तैयार हो गए।
🎯 Exam Tip: किसी भी पद्यांश की व्याख्या करते समय, पात्रों के आंतरिक भावनाओं और उनकी शारीरिक प्रतिक्रियाओं का विस्तृत वर्णन करें ताकि उनका मनोवैज्ञानिक चित्रण स्पष्ट हो सके।
Question 11. लखन लखेउ रघुबंसमनि, ताकेउ हर कोदंडु । पुलकि गात बोले बचन, चरने चापि ब्रह्मांडु ॥ [2018]
Answer:
[ लखेउ = देखा । ताकेउ = देखा । कोदंडु = धनुष । गात = शरीर । चरन = चरण, पैर । चापि = दबाकर । ब्रह्मांडु = ब्रह्मांड ।]
प्रसंग: प्रस्तुत पद में लक्ष्मण का श्रीराम के प्रति स्नेह और उनकी स्वयं की बलवत्ता का वर्णन किया गया है।
व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि जब लक्ष्मण जी ने देखा कि रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्र जी ने शिवजी के धनुष की ओर देखा है तो उनका शरीर अत्यधिक पुलकित हो उठा और पूरे ब्रह्मांड को अपने दोनों चरणों से दबाकर वे इस प्रकार बोले। लक्ष्मण जी का यह भाव उनके भाई के प्रति अटूट विश्वास और स्वयं की शक्ति को दर्शाता है।
काव्यगत सौन्दर्य:
- लक्ष्मण की सामर्थ्य का वर्णन किया गया है।
- भाषा-अवधी ।
- शैली-प्रबन्ध ।
- रस-वीर ।
- छन्द-दोहा ।
- अलंकार-अनुप्रास का मोहक प्रयोग और अतिशयोक्ति ।
- गुण-ओज ।।
In simple words: लक्ष्मण जी ने देखा कि राम जी धनुष की ओर देख रहे हैं, तो उनका शरीर खुशी से भर गया। उन्होंने अपने पैरों से पूरे ब्रह्मांड को दबाकर शक्तिशाली वचन बोले, यह दिखाता है कि वे कितने बलवान और अपने भाई के प्रति समर्पित थे।
🎯 Exam Tip: अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग करते समय, भावों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करें, लेकिन उसकी मूल भावना को बनाए रखें।
Question 12. दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला । धरहु धरनि धरि धीर न डोला ॥
राम चहहिं संकर धनु तोरा । होहु सजग सुनि आयसु मोरा ॥
चाप समीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए॥
सब कर संसउ अरु अग्यानू । मंद महीपन्ह कर अभिमानू ॥
भृगुपति केरि गरब गरुआई । सुर मुनिबरन्ह केरि कदाई ॥
सिय कर सोचु जनक पछितावा । रानिह कर दारुन दुख दावा ॥
संभुचाप बड़ बोहितु पाई । चढे जाइ सब संगु बनाई ॥
राम बाहुबल सिंधु अपारू । चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू ॥ [2018]
Answer:
[ दिसिकुंजरहु = दिशाओं के रक्षक हाथी । कमठ = कच्छप । अहि = सर्प यहाँ शेषनाग । कोला = वाराह, सूअर । सजग = सचेत । आयसु = आदेश । चाप = धनुष । सुकृत = पुण्य कर्म । भृगुपति = परशुराम । कदराई = कायरता । कड़हारू = केवट ।]
प्रसंग: प्रस्तुत पद में लक्ष्मण की सामर्थ्य और राम के ईश्वरत्व गुणों से युक्त होने का वर्णन किया गया है।
व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि लक्ष्मण जी ने कहा- हे दिशाओं के रक्षक हाथी! हे कच्छप! हे शेषनाग! हे वाराह! धैर्य धारण करके इस पृथ्वी को इस प्रकार पकड़े रखो, जिससे यह हिलने न पाए। श्रीरामचन्द्र जी शंकर जी के धनुष को तोड़ना चाहते हैं, इसलिए आप सभी लोग मेरी इस आज्ञा को सुनकर सावधान हो जाइए। श्रीरामचन्द्र जी जब शंकर जी के धनुष के करीब आए तब सभी उपस्थित स्त्री-पुरुषों ने देवताओं और अपने पुण्यों को याद किया; यानी उनका स्मरण किया। सभी का संदेह और अज्ञान, साधारण। यानी छोटे राजाओं का अभिमान, परशुराम जी के गर्व की गंभीरता, देवताओं और श्रेष्ठ मुनियों की भयभीतता, सीता जी का विचार, जनक का पछतावा और सभी रानियों के भयानक दुख की आग; ये सभी शिवजी के धनुष रूपी बड़े जहाज को पाकर समूह बनाकर उसके ऊपर चढ़कर और श्रीरामचन्द्र जी की भुजाओं के बल रूपी गहरे समुद्र के पार जाना चाहते हैं, लेकिन उनके साथ कोई नाविक नहीं है। यह दृश्य राम की शक्ति और लोगों के विश्वास को दर्शाता है।
काव्यगत सौन्दर्य:
- राम-लक्ष्मण देवत्व के गुणों से युक्त थे, इसका आभास कराया गया है।
- भाषा-अवधी ।
- शैली-प्रबन्ध ।
- रस-वीर और शान्त ।
- छन्द-चौपाई ।
- अलंकार-अनुप्रास ।
- शब्दशक्ति-अभिधा और लक्षणा ।
- गुण-ओज और प्रसाद ।
In simple words: लक्ष्मण जी ने सभी दिशाओं के रक्षकों को पृथ्वी को थामे रखने का आदेश दिया क्योंकि राम जी धनुष तोड़ने वाले थे। जब राम जी धनुष के पास आए, तो सभी लोगों ने भगवान को याद किया। सभी की चिंताएं, राजाओं का घमंड और परशुराम जी का अभिमान, यह सब धनुष रूपी नाव पर चढ़कर राम की भुजाओं के सहारे पार जाना चाहते थे।
🎯 Exam Tip: व्याख्या करते समय, पात्रों की भावनाओं और उनके कार्यों के पीछे के कारणों को स्पष्ट रूप से समझाएं। काव्यात्मक सौंदर्य में रस और अलंकार का सही उल्लेख करें।
Question 13. राम बिलोके लोग सब, चित्र लिखे से देखि ।।
चितई सीय कृपायतन, जानी बिकल बिसेषि ॥
Answer:
[ बिलोके = देखे । चित्र लिखे = चित्र के समान, मूर्तिवत्। सीय = सीता । बिकल= व्याकुल । बिसेषि = विशेष ।]
प्रसंग: प्रस्तुत पद में समस्त सभा के साथ-साथ सीताजी की स्थिति का वर्णन किया गया है।
व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्र जी ने सभा में उपस्थित सभी लोगों की ओर देखा। ये सभी लोग उन्हें चित्र में लिखे हुए के समान यानी मूर्तिवत दिखाई पड़े। इसके बाद कृपानिधान श्रीरामचन्द्र जी ने सीताजी की ओर देखा और उनको इन सबसे अधिक यानी विशेष रूप से व्याकुल अनुभव किया। सीताजी की व्याकुलता देखकर राम जी भी भावुक हो गए।
काव्यगत सौन्दर्य:
- भाषा-अवधी ।
- शैली-प्रबन्ध व चित्रात्मक ।
- रस - शान्त और श्रृंगार ।
- छन्द-दोहा ।
- अलंकार-उपमा और अनुप्रास ।
- शब्दशक्ति-अभिधा और लक्षणा ।
- गुण-प्रसाद और माधुर्य ।
In simple words: राम जी ने देखा कि सभा में सभी लोग मूर्ति की तरह शांत खड़े थे। फिर उन्होंने सीता जी को देखा और पाया कि वह सबसे अधिक चिंतित और व्याकुल थीं।
🎯 Exam Tip: किसी भी दृश्य का वर्णन करते समय, उपमा अलंकार का प्रयोग करके तुलना को प्रभावी बनाएं, जैसे "चित्र लिखे से" में किया गया है।
Question 14. देखी बिपुल बिकल बैदेही । निमिष बिहात कलप सम तेही ॥
तृषित बारि बिन जो तनु त्यागा। मुएँ करइ को सुधा तड़ागा ॥
का बरषा जब कृषी सुखाने । समय चुके पुनि का पछिताने ॥
Answer:
[ निमिष = पलक झपकने का समय । तृषित = प्यासा । तड़ागा = तालाब । जिय = हृदय में । लखि = देखकर । लाघव = शीघ्रता से । दामिनि = बिजली । ठाढ़े = खड़े हुए। भुवन = संसार । धुनि = ध्वनि ।]
प्रसंग: प्रस्तुत पद में सीता जी का राम के प्रति प्रेम और शिव-धनुष के टूटने का वर्णन किया गया है।
व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्र जी ने सीताजी को बहुत ही व्याकुल देखा। उन्होंने महसूस किया कि उनका एक-एक क्षण एक-एक कल्प (चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष) के समान बीत रहा था। यदि प्यासा व्यक्ति पानी न मिलने पर अपना शरीर छोड़ दे, तो उसके चले जाने पर अमृत का तालाब भी क्या करेगा, सारी खेती के सूख जाने पर बारिश किस काम की, समय के बीत जाने पर फिर पछताने से क्या लाभ? इसका मतलब यह है कि समय के बीत जाने पर सब कुछ बेकार हो जाता है। अपने हृदय में ऐसा विचार करके श्रीरामचन्द्र जी ने सीताजी की ओर देखा और उनका अपने प्रति विशेष प्रेम देखकर वे खुशी से भर उठे। मन-ही-मन उन्होंने गुरु विश्वामित्र को प्रणाम किया और बहुत फुर्ती से धनुष को उठा लिया। जैसे ही उन्होंने धनुष को अपने हाथ में उठाया, वह उनके हाथ में बिजली की तरह चमका और आकाश में मंडल के आकार का हो गया। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि सभा में उपस्थित लोगों में से किसी ने भी श्रीरामचन्द्र जी को धनुष उठाते, चढ़ाते और जोर से खींचते हुए नहीं देखा; यानी ये तीनों ही काम इतनी जल्दी हुए कि इसका किसी को पता ही नहीं लगा। सभी ने श्रीरामचन्द्र जी को केवल खड़े देखा और उसी क्षण उन्होंने धनुष को बीच से तोड़ डाला। धनुष के टूटने की ध्वनि इतनी भयानक हुई कि वह तीनों लोकों में फैल गई। राम जी की यह अद्भुत शक्ति सभी को अचंभित कर गई।
काव्यगत सौन्दर्य:
- राम-सीता के पारस्परिक प्रेम की सार्थक अभिव्यक्ति हुई है।
- भाषा-अवधी ।
- शैली-प्रबन्ध और सूक्तिपरक ।
- रस-शृंगार और अद्भुत ।
- छन्द-दोहा ।
- अलंकार-अनुप्रास और उत्प्रेक्षा ।
- गुण-माधुर्य ।
- शब्दशक्ति-अभिधा और लक्षणा ।
In simple words: राम जी ने सीता को बहुत दुखी देखा, तो उन्हें लगा कि समय बहुत तेजी से बीत रहा है। उन्होंने मन ही मन गुरु को प्रणाम किया और बिजली की तरह फुर्ती से धनुष उठा लिया। इतनी तेजी से उन्होंने धनुष तोड़ा कि कोई देख नहीं पाया और धनुष टूटने की आवाज़ तीनों लोकों में फैल गई।
🎯 Exam Tip: समय की महत्ता और पात्रों की शीघ्रता को दर्शाने के लिए सटीक मुहावरों और अलंकारों का प्रयोग करें। उदाहरणों से अपनी बात को बल दें।
Question 3. रानी मैं जानी अजानी महा, पबि पाहन हूँ ते कठोर हियो है । राजहु काज अकाज न जान्यो, कह्यो तिय को जिन कान कियो है। ऐसी मनोहर मूरति ये, बिछुरे कैसे प्रीतम लोग जियो है ? आँखिन में, सखि ! राखिबे जोग, इन्हें किमि कै बनबास दियो है ?
Answer: ग्रामीण स्त्रियाँ रानी कैकेयी को बहुत अज्ञानी मानती हैं क्योंकि उनका हृदय वज्र और पत्थर से भी ज़्यादा कठोर है। उन्हें तनिक भी दया नहीं आई जब उन्होंने इतने कोमल राजकुमारों को वनवास भेज दिया। वे यह भी कहती हैं कि राजा दशरथ ने उचित-अनुचित का विचार नहीं किया और अपनी पत्नी कैकेयी की बात मान ली। स्त्रियाँ सोचती हैं कि इतने सुंदर राजकुमारों से बिछड़कर उनके प्रियजन कैसे जीवित रहेंगे? वे तीनों तो आँखों में बसाने योग्य हैं, फिर उन्हें किस कारण वनवास दिया गया है? ग्रामीण लोग इस घटना को ईश्वर की इच्छा मानते हैं।
In simple words: गाँव की स्त्रियाँ कैकेयी को कठोर दिल वाली और राजा दशरथ को बिना सोचे-समझे पत्नी की बात मानने वाला मानती हैं। वे सोचती हैं कि इतनी सुंदर राम, लक्ष्मण, सीता को वनवास क्यों मिला और उनके बिना उनके परिवार वाले कैसे जी रहे होंगे।
🎯 Exam Tip: इस तरह के भावुक प्रश्नों में, पात्रों के मनोभावों और उनके कहने के पीछे की भावनाओं को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
Question 4. सीस जटा, उर बाहु बिसाल, बिलोचन लाल, तिरीछी सी भौंहैं । तून सरासन बान धरे, तुलसी बन-मारग में सुठि सोहैं ॥ सादर बारहिं बार सुभाय चितै, तुम त्यों हमरो मन मोहैं । पूछति ग्राम बधूसिय सों' कहौ साँवरे से, सखि रावरे को हैं?'
Answer: ग्रामीण स्त्रियाँ सीताजी से पूछती हैं कि जिनके सिर पर जटाएँ हैं, विशाल छाती और भुजाएँ हैं, लाल आँखें हैं और तिरछी भौंहें हैं, जो तरकस, धनुष और बाण धारण किए इस वन-मार्ग में बहुत सुंदर दिख रहे हैं, और जो बार-बार आदर के साथ तुम्हारी ओर देख रहे हैं जिससे हमारा मन भी मोहित हो रहा है, हे सखी! तुम हमें बताओ कि ये सुंदर साँवले रूप वाले पुरुष (राम) तुम्हारे कौन लगते हैं? स्त्रियाँ ऐसे प्रश्न पूछकर अपनी जिज्ञासा प्रकट करती हैं।
In simple words: गाँव की औरतें सीता से पूछती हैं कि जटाधारी, विशाल भुजाओं वाले, लाल आँखों और तिरछी भौंहों वाले, धनुष-बाण लिए हुए जो सुंदर व्यक्ति हैं, जो बार-बार तुम्हारी ओर देख रहे हैं, वे तुम्हारे कौन हैं?
🎯 Exam Tip: ऐसे वर्णनात्मक प्रश्नों में पात्रों के बाहरी रूप और उनके व्यवहार को विस्तार से बताना चाहिए।
Question 5. सुनि सुन्दर बैन सुधारस-साने, सयानी हैं जानकी जानी भली । तिरछे करि नैन दै सैन तिन्हें, समुझाइ कछू मुसकाइ चली ॥ तुलसी तेहि औसर सोहै सबै, अवलोकति लोचन-लाहु अली । अनुराग-तड़ाग में भानु उदै, बिगसीं मनो मंजुल कंज-कली ॥
Answer: ग्रामवधुओं के अमृत जैसे मीठे वचनों को सुनकर चतुर सीताजी उनकी मन की बात समझ गईं। उन्होंने अपनी मुस्कुराहट और आँखों के इशारे से ही उनके प्रश्न का उत्तर दे दिया, उन्हें कुछ भी बोलने की ज़रूरत नहीं पड़ी। अपनी नारी-सुलभ लज्जा के कारण उन्होंने केवल इशारे से ही राम के बारे में बताया कि वे उनके पति हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि सीताजी का इशारा समझते ही सभी सखियाँ राम के सौंदर्य को एकटक देखने लगीं, जिससे उनकी आँखों को बहुत आनंद मिला। ऐसा लग रहा था मानो प्रेम के सरोवर में राम रूपी सूर्य उग गया हो और ग्रामवधुओं की आँखें रूपी सुंदर कमल की कलियाँ खिल गई हों। यह दृश्य देखने वालों के मन में प्रेम भर देता है।
In simple words: सीताजी ने गाँव की औरतों के मीठे वचन सुने और समझ गईं कि वे राम के बारे में पूछ रही हैं। लज्जा के कारण उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुराकर आँखों के इशारे से बता दिया कि राम उनके पति हैं। यह देखकर सभी औरतें खुश हो गईं, जैसे प्रेम के तालाब में कमल खिल गए हों।
🎯 Exam Tip: भावों की अभिव्यक्ति के लिए संकेत और इशारों का वर्णन करते समय, उनके पीछे छिपे अर्थ को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
Question 1. निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकारों का नाम लिखकर उनका स्पष्टीकरण भी दीजिए-
(क) भरे भुवन घोर कठोर व रबि बाजि तजि मारगु चले ।
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कुरुम कलमले ॥
सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं।
कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं ॥
(ख) सुनि सुन्दर बैन सुधारस-साने, सयानी हैं जानकी जानी भली ।
तिरछे करि नैन दै सैन तिन्हें, समुझाई कछू मुसकाइ चली ॥
तुलसी तेहि औसर सोहैं, सबै अवलोकति लोचन-लाहु अली ।।
अनुराग-तड़ाग में भानु उदै, बिगसीं मनो मंजुल कंज-कली ॥
Answer:
(क) इन पंक्तियों में 'भ', 'र', 'ज', 'ह', 'क', 'ल' जैसे कई अक्षरों की बार-बार आवृत्ति हुई है, इसलिए यहाँ अनुप्रास अलंकार है। इसके साथ ही, धनुष टूटने से तीनों लोकों में भारी हलचल मच गई, यह वर्णन बहुत ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर किया गया है, इसलिए इसमें अतिशयोक्ति अलंकार भी है। यह वर्णन घटना के प्रभाव को बहुत अधिक दर्शाता है।
(ख) इन पंक्तियों में 'स', 'न', 'ज', 'ल', 'त' जैसे कई अक्षरों की बार-बार आवृत्ति हुई है, इसलिए यहाँ अनुप्रास अलंकार है। 'अनुराग-तड़ाग में भानु उदै' में प्रेम को तालाब और सूर्य को राम से तुलना करके उन्हें एक ही बताया गया है, इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है। 'बिगसीं मनो मंजुल' में कमल की कलियों का उपमान के रूप में संभावना व्यक्त की गई है, जिससे यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है। यह भावों को सुंदर तरीके से प्रस्तुत करता है।
In simple words: (क) इस हिस्से में एक ही अक्षर कई बार आया है, इसलिए यह अनुप्रास अलंकार है। धनुष टूटने से तीनों लोकों में बड़ी हलचल मच गई, इसे इतना बढ़ाकर बताया गया है कि यह अतिशयोक्ति अलंकार है। (ख) इस हिस्से में भी एक ही अक्षर कई बार आया है, इसलिए यह अनुप्रास अलंकार है। 'अनुराग-तड़ाग में भानु उदै' में रूपक अलंकार है क्योंकि प्रेम को तालाब और सूर्य को राम के समान बताया गया है। 'बिगसीं मनो मंजुल' में उत्प्रेक्षा अलंकार है, जहाँ कमल की कलियों के खिलने की संभावना व्यक्त की गई है।
🎯 Exam Tip: अलंकारों की पहचान के लिए अक्षरों की आवृत्ति (अनुप्रास), उपमेय-उपमान में समानता (रूपक/उपमा) और संभावना (उत्प्रेक्षा) जैसे प्रमुख संकेतों पर ध्यान दें।
Question 2. निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त रस और उसका स्थायी भाव लिखिए
(क) देखि देखि रघुबीर तन सुर मराव धरि, धीर ।
भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर ॥
(ख) भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले ।
चिक्करहिं दिग्गज डोले महि अहि कोल कुरुम कलमले ॥
सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं।
कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं ॥
Answer:
(क) रस-शृंगार, स्थायी भाव-रति । इन पंक्तियों में सीताजी का श्रीराम के प्रति प्रेम और उनकी भावुकता का वर्णन है, जो शृंगार रस का उदाहरण है।
(ख) रस-अद्भुत, स्थायी भाव-आश्चर्य । इन पंक्तियों में धनुष टूटने से उत्पन्न भयंकर ध्वनि और उसके बाद हुए अद्भुत प्रभावों का वर्णन है, जो अद्भुत रस को दर्शाता है।
In simple words: (क) इन पंक्तियों में प्रेम की भावना दिखाई गई है, इसलिए इसमें शृंगार रस है। इसका मुख्य भाव 'प्रेम' (रति) है। (ख) इन पंक्तियों में धनुष टूटने के बाद हुए बड़े और अनोखे बदलावों का जिक्र है, इसलिए इसमें अद्भुत रस है। इसका मुख्य भाव 'आश्चर्य' है।
🎯 Exam Tip: रस की पहचान के लिए पंक्तियों के मुख्य भाव को समझें - प्रेम के लिए शृंगार, भय के लिए भयानक, और आश्चर्य के लिए अद्भुत रस होता है।
Question 3. 'वन-पथ पर' कविता किस छन्द में लिखी गयी है, सलक्षण लिखिए।
Answer: 'वन-पथ पर' कविता सवैया छंद में लिखी गई है। सवैया छंद ऐसे वर्णिक छंद होते हैं जिनमें 22 से लेकर 26 तक अक्षर होते हैं। मत्तगयंद और सुंदरी सवैया छंद के प्रमुख प्रकार हैं, जो इसकी लय और गति को तय करते हैं। छंद कविता को एक संगीतमय रूप देता है।
In simple words: 'वन-पथ पर' कविता सवैया छंद में लिखी गई है। सवैया एक प्रकार का छंद है जिसमें 22 से 26 अक्षर होते हैं। मत्तगयंद और सुंदरी इसके दो मुख्य प्रकार हैं।
🎯 Exam Tip: छंदों के लक्षणों को याद करते समय, उनके अक्षर या मात्रा संख्या और उनके प्रमुख भेदों पर विशेष ध्यान दें।
Question 4. निम्नलिखित पदों में सनाम समास-विग्रह कीजिए-
पद कमल, चारिभुज, सुलोचनि, मखशाला, त्रिभुवन, दस बदन, राम-लषन ।
| समस्त पद | समास-विग्रह | समास-नाम |
|---|---|---|
| पद कमल | पदरूपी कमल | कर्मधारय |
| चारिभुज | चार भुजाएँ हैं जिसकी अर्थात् विष्णु | बहुव्रीहि |
| सुलोचनि | सुन्दर लोचन वाली है जो अर्थात् सीता | बहुव्रीहि |
| मखशाला | मख (यज्ञ) के लिए शाला | चतुर्थी तत्पुरुष |
| त्रिभुवन | त्रि (तीन) भुवनों का समूह | द्विगु |
| दस बदन | दस बदन (मुख) हैं जिसके अर्थात् रावण | बहुव्रीहि |
| राम-लषन | राम और लषन (राम और लक्ष्मण) | द्वन्द्व |
🎯 Exam Tip: समास-विग्रह करते समय पद के अर्थ और उनके बीच के संबंध को ध्यान में रखें ताकि सही समास का प्रकार पहचान सकें।
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