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Detailed Chapter 13 श्री श्याम नारायण पांडे UP Board Solutions for Class 10 Hindi
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Class 10 Hindi Chapter 13 श्री श्याम नारायण पांडे UP Board Solutions PDF
कवि-परिचय
Question 1. श्री श्यामनारायण पाण्डेय का जीवन-परिचय दीजिए तथा उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
Answer: श्यामनारायण पाण्डेय जी का जन्म 1907 ईस्वी (संवत् 1964) में आजमगढ़, उत्तर प्रदेश के डुमराँव गाँव में हुआ था। उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा के बाद संस्कृत की पढ़ाई के लिए काशी (बनारस) का रुख किया और वहाँ से 'साहित्याचार्य' की परीक्षा पास की। वे स्वभाव से बहुत सीधे, दिल से खुशमिजाज और निडर व्यक्ति थे। उनकी शख्सियत में शौर्य, अच्छाई और सादगी का अनोखा मेल था। उनके विचार द्विवेदी युग से प्रभावित थे, जिसमें व्यवहारिकता और मर्यादा का ध्यान रखा जाता था। लगभग बीस सालों तक वे हिंदी कवि सम्मेलनों में बहुत मशहूर रहे। उन्होंने आधुनिक हिंदी साहित्य में वीर रस की कविता को 'खड़ी बोली' में लोकप्रिय बनाया। यह महान कवि 1991 में इस दुनिया से चले गए।
उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं:
- 'हल्दी घाटी' (1937-39 ई.)
- 'जौहर' (1939-44 ई.)
- 'तुमुल' (1948 ई.) - यह 'त्रेता के दो वीर' नामक खंडकाव्य का ही बदला हुआ रूप है।
- 'रूपांतर' (1948 ई.)
- 'आरती' (1945-46 ई.)
- 'जय हनुमान' (1956 ई.) - यह उनकी मुख्य प्रकाशित काव्य पुस्तक है।
- 'माधव', 'रिमझिम', 'आँसू के कण' और 'गोरा वध' - ये उनकी शुरुआती छोटी रचनाएँ हैं।
- 'परशुराम' (अप्रकाशित काव्य) और 'वीर सुभाष' (रचनाधीन ग्रंथ) - श्यामनारायण पाण्डेय के संस्कृत में लिखे कुछ काव्य-ग्रंथ भी अप्रकाशित हैं।
In simple words: श्यामनारायण पाण्डेय जी का जन्म आजमगढ़ में 1907 में हुआ था। उन्होंने संस्कृत की पढ़ाई की और 'साहित्याचार्य' की उपाधि ली। वे वीर रस के कवि थे और 'हल्दी घाटी' तथा 'जौहर' उनकी खास रचनाएँ हैं। उनका निधन 1991 में हुआ।
🎯 Exam Tip: जीवन-परिचय लिखते समय जन्म-स्थान, जन्म-तिथि, प्रमुख रचनाएँ और साहित्यिक योगदान को साफ-साफ बताना महत्वपूर्ण होता है।
पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या
हल्दीघाटी
Question 1. मेवाड़-केसरी देख रहा, केवल रण का न तमाशा था। वह दौड़-दौड़ करता था रण, वह मान-रक्त का प्यासा था। चढ़कर चेतक पर घूम-घूम, करता सेना रखवाली था। ले महामृत्यु को साथ-साथ मानो प्रत्यक्ष कपाली था।
Answer: प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि श्यामनारायण पाण्डेय द्वारा रचित 'हल्दीघाटी' नामक कविता से ली गई हैं। इन पंक्तियों में कवि हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के अद्भुत पराक्रम और शौर्य का वर्णन कर रहे हैं। कवि बताते हैं कि महाराणा प्रताप (मेवाड़-केसरी) युद्ध में सिर्फ एक दर्शक की तरह नहीं खड़े थे। वे रणभूमि में दौड़-दौड़कर लड़ रहे थे और अपने स्वाभिमान (मान-रक्त) की रक्षा के लिए शत्रुओं के रक्त के प्यासे थे। वे अपने घोड़े चेतक पर घूम-घूमकर अपनी सेना की रक्षा कर रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो साक्षात काल के स्वामी (कपाली) स्वयं मृत्यु को अपने साथ लेकर युद्ध में उतर आए हों। जब मानसिंह शत्रु सेना का नेतृत्व करते हुए युद्धभूमि में राणा प्रताप के सामने आया, तो राणा प्रताप ने उसकी सेना में भारी उथल-पुथल मचा दी।
काव्यगत सौन्दर्य:
- युद्धभूमि का जीवंत वर्णन किया गया है।
- रस: वीर रस।
- शैली: ओजपूर्ण।
- छंद: मुक्त, तुकान्त।
- अलंकार: श्लेष, अतिशयोक्ति, पुनरुक्तिप्रकाश, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास।
- भावसाम्य: देशभक्त माखनलाल चतुर्वेदी ने भी ऐसे ही भाव व्यक्त किए हैं: "बलि होने की परवाह नहीं, मैं हूँ कष्टों का राज रहे, मैं जीता, जीता, जीता हूँ, माता के हाथ स्वराज रहे।"
In simple words: हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप केवल देख नहीं रहे थे, बल्कि पूरी ताकत से लड़ रहे थे। वे अपने घोड़े चेतक पर घूम-घूमकर सेना की रक्षा कर रहे थे और शत्रुओं को ऐसे मार रहे थे जैसे वे स्वयं मृत्यु हों। उनका गुस्सा और वीरता देखने लायक थी।
🎯 Exam Tip: पद्यांश की व्याख्या करते समय सबसे पहले उसका सन्दर्भ, फिर प्रसंग और अंत में विस्तृत व्याख्या लिखनी चाहिए। काव्यगत सौन्दर्य में रस, अलंकार और शैली का उल्लेख करें।
Question 2. चढ़ चेतक पर तलवार उठा, रखता था भूतल पानी को । राणा प्रताप सिर काट-काट, करता था सफल जवानी को । सेना-नायक राणा के भी, रण देख देखकर चाह भरे । मेवाड़ सिपाही लड़ते थे । दूने तिगुने उत्साह भरे॥
Answer: यह काव्यांश कवि श्यामनारायण पाण्डेय द्वारा रचित 'हल्दीघाटी' कविता से लिया गया है। इसमें कवि महाराणा प्रताप के युद्ध कौशल और पराक्रम का वर्णन कर रहे हैं। कवि कहते हैं कि जब राणा प्रताप चेतक घोड़े पर तलवार उठाकर युद्ध कर रहे थे, तो ऐसा लगता था मानो वे पृथ्वी पर अपनी असीमित वीरता (पानी = जोश, प्रतिष्ठा) को धारण कर रहे हों। वे एक ऐसे पराक्रमी वीर थे जो शत्रु सेना के सिर काट-काटकर अपनी जवानी को सफल कर रहे थे। महाराणा प्रताप का युद्ध देखने से उनकी सेना के सैनिक भी बहुत उत्साहित हो जाते थे। राणा प्रताप के इस पराक्रम को देखकर मेवाड़ के सिपाही दोगुने-तिगुने जोश के साथ युद्ध करते थे। यह दर्शाता है कि एक साहसी नेता कैसे अपने सैनिकों को प्रेरणा देता है।
काव्यगत सौन्दर्य:
- कवि ने देश के गौरवशाली इतिहास का वर्णन किया है।
- रस: वीर रस।
- छंद: मुक्त, तुकान्त।
- अलंकार: पुनरुक्तिप्रकाश, श्लेष, अतिशयोक्ति।
- शैली: ओजपूर्ण।
- भावसाम्य: हिन्दी के महान कवि जयशंकर प्रसाद ने भी ऐसे ही भाव व्यक्त किए हैं: "असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ, विकीर्ण दिव्य दाह सी, सपूत मातृभूमि के, रुको न शूर साहसी, अराति सैन्य-सिन्धु में, सुवाड़वाग्नि से जलो। प्रवीर हो जयी बनो, बढ़े चलो, बढ़े चलो।"
In simple words: राणा प्रताप चेतक पर सवार होकर तलवार उठाते थे और इतनी बहादुरी से लड़ते थे कि लगता था जैसे पृथ्वी पर सारा साहस उन्हीं का हो। वे दुश्मनों के सिर काटकर अपनी जवानी को सफल कर रहे थे। उन्हें देखकर उनकी सेना के सैनिक भी दुगुने जोश से लड़ते थे।
🎯 Exam Tip: पंक्तियों की व्याख्या करते समय, कविता में आए कठिन शब्दों का अर्थ स्पष्ट करना चाहिए, जैसे 'पानी' का अर्थ यहाँ 'जोश' या 'प्रतिष्ठा' है।
Question 3. क्षण मार दिया कर कोड़े से, रण किया उतर कर घोड़े से। राणा रण कौशल दिखा-दिखा, चढ़ गया उतर कर घोड़े से।। क्षण भीषण हलचल मचा मचा, राणा-कर की तलवार बढ़ी । था शोर रक्त पीने का यह रण चण्डी जीभ पसार बढी ॥
Answer: प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि श्यामनारायण पाण्डेय की 'हल्दीघाटी' कविता से ली गई हैं, जो राणा प्रताप के अद्भुत युद्ध कौशल का वर्णन करती हैं। कवि बताते हैं कि हल्दीघाटी के युद्धभूमि में राणा प्रताप का रण-कौशल देखकर वे चकित हैं। राणा प्रताप ऐसे युद्ध कर रहे थे कि कभी वे शत्रुओं पर हाथ के कोड़े से हमला करते थे, तो कभी घोड़े से उतरकर युद्ध करते थे। उनका घोड़े पर चढ़ना और उतरना भी देखते बनता था। वे लगातार अपने युद्ध कौशल (रण कौशल) का प्रदर्शन करते रहे। उनके कारण युद्धभूमि में हर पल भयानक (भीषण) हलचल मच रही थी, और राणा के हाथ (कर) की तलवार तेजी से चल रही थी। रणभूमि में ऐसा शोर था मानो युद्ध की देवी चण्डी (दुर्गा, काली) रक्त पीने के लिए अपनी जीभ फैलाकर आगे बढ़ रही हों। यह दर्शाता है कि राणा प्रताप का युद्ध लड़ने का तरीका कितना प्रभावी और भयानक था।
काव्यगत सौन्दर्य:
- राणा प्रताप की वीरता का अद्भुत वर्णन हुआ है।
- रस: वीर रस।
- छंद: मुक्त, तुकान्त।
- शैली: ओजपूर्ण।
- अलंकार: अतिशयोक्ति, उत्प्रेक्षा।
- भावसाम्य: कवि सोहनलाल द्विवेदी जी ने भी स्वतंत्रता के लिए ऐसे ही भाव व्यक्त किए हैं: "अशेष रक्त तोल दो स्वतन्त्रता का मोल दो कड़ी युगों की खोल दो डरो नहीं, मरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो।"
In simple words: राणा प्रताप युद्ध में अलग-अलग तरीके अपना रहे थे, कभी घोड़े पर, कभी उतरकर लड़ रहे थे। उनकी तलवार तेजी से चल रही थी और उनके हमले से इतनी हलचल हो रही थी कि मानो कोई देवी खून पीने आई हो।
🎯 Exam Tip: वीर रस के वर्णन में कवि अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग अक्सर करते हैं, क्योंकि यह वीरता को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है।
Question 4. वह हाथी दल पर टूट पड़ा, मानो उस पर पवि छूट पड़ा। कट गई वेग से भू, ऐसा शोणित का नाला फूट पड़ा। जो साहस कर बढ़ता उसको, केवल कटाक्ष से टोक दिया। जो वीर बना नभ-बीच फेंक, बरछे पर उसको रोक दिया।
Answer: प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि श्यामनारायण पाण्डेय द्वारा रचित 'हल्दीघाटी' कविता से ली गई हैं। इन पंक्तियों में कवि महाराणा प्रताप के असीम पराक्रम का वर्णन कर रहे हैं। कवि कहते हैं कि राणा प्रताप शत्रु सेना के हाथी दल (दल = समूह) पर ऐसे टूट पड़े, मानो उन पर कोई वज्रपात (पवि = भाला) टूट पड़ा हो। उनके तीव्र प्रहार से इतनी तीव्रता से खून (शोणित = रक्त, लहू) का नाला बह निकला, मानो धरती पर एक जलधारा फूट पड़ी हो। यदि कोई शत्रु राणा प्रताप पर हमला करने की हिम्मत करता, तो वे उसे केवल अपनी तिरछी निगाहों से वहीं रोक देते थे। और यदि कोई वीर सैनिक हवा में हमला करता, तो राणा प्रताप उसे अपने भाले से हवा के बीच में ही रोक देते थे। राणा प्रताप की इस शक्ति और नियंत्रण से उनकी युद्ध क्षमता स्पष्ट होती है।
काव्यगत सौन्दर्य:
- राणा प्रताप की वीरता का अद्भुत चित्रण हुआ है।
- रस: वीर रस।
- छंद: मुक्त, तुकान्त।
- शैली: ओजपूर्ण।
- भाषा: साहित्यिक खड़ी बोली।
- अलंकार: उपमा, अनुप्रास, अतिशयोक्ति।
- भावसाम्य: महाकवि भूषण ने छत्रसाल की वीरता का वर्णन इन पंक्तियों में किया है: "भुज भुजगेस की वै संगिनी भुजंगिनी-सी, खेदि-खेदि खाती दीह दारुन दलन के।"
In simple words: राणा प्रताप ने हाथियों की सेना पर ऐसे हमला किया जैसे कोई बिजली गिर गई हो, और इतना खून बहा कि जमीन पर खून की नदी बहने लगी। वे किसी भी दुश्मन को सिर्फ एक नज़र से रोक सकते थे, और हवा में किए गए हमलों को अपने भाले से बीच में ही थाम लेते थे।
🎯 Exam Tip: अलंकार पहचानते समय, ध्यान दें कि 'मानो' जैसे शब्द उत्प्रेक्षा अलंकार की पहचान होते हैं, जबकि बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात अतिशयोक्ति होती है।
Question 5. क्षण उछल गया अरि घोड़े पर, क्षण लड़ा सो गया घोड़े पर। बैरी दल से लड़ते-लड़ते, क्षण खड़ा हो गया घोड़े पर । क्षण में गिरते रुण्डों से, मदमस्त गजों के शुण्डों से । घोड़ों के विकल वितुण्डों से, पट गई भूमि नरमुण्डों से ।।
Answer: प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि श्यामनारायण पाण्डेय की 'हल्दीघाटी' कविता से ली गई हैं, जिसमें वे राणा प्रताप के शौर्य और युद्धभूमि में फैली भयानक स्थिति का वर्णन कर रहे हैं। कवि कहते हैं कि यदि कोई शत्रु (अरि) राणा प्रताप पर हमला करने के लिए अपने घोड़े पर उछलता भी था, तो वह तुरंत वहीं ढेर हो जाता था। राणा प्रताप इतनी शक्ति से लड़ते थे कि कभी-कभी अपने घोड़े पर खड़े भी हो जाते थे। उनके इस प्रचंड पराक्रम से शत्रुओं के विशाल झुंडों को वे खदेड़-खदेड़कर उन पर हमला करते थे। राणा प्रताप के हमलों से शत्रुओं के सिरविहीन शरीर (रुण्ड) और हाथियों (वितुण्ड) की सूंडें (शुण्ड) गिर रही थीं। हाथियों और घोड़ों की भयंकर व्याकुलता के कारण पूरी युद्धभूमि इंसानी खोपड़ियों (नरमुण्डों) से भर गई थी। यह दिखाता है कि युद्ध कितना भीषण और विनाशकारी था।
काव्यगत सौन्दर्य:
- कवि के माध्यम से राणा प्रताप के पराक्रम का ओजस्वी वर्णन किया गया है।
- भाषा: खड़ी बोली।
- रस: वीर रस।
- अलंकार: पुनरुक्तिप्रकाश, अतिशयोक्ति।
- शैली: ओजपूर्ण।
- भावसाम्य: महाकवि भूषण द्वारा वीर रस का ऐसा ही वर्णन किया गया है: "निकसत म्यान ते मयूखें अलैभानु कैसी, फारें तमतोम से गयंदन के जाल को। लागति लपटि कंठ बैरिन के नागिनी सी, रुद्रहिं रिझावै दै दै मुंडन के माल को।"
In simple words: राणा प्रताप के हमले से दुश्मन घोड़े पर ही गिर जाते थे। उनके लड़ने के तरीके से युद्धभूमि में इतनी लाशें और हाथियों की सूंडें गिर रही थीं कि पूरी जमीन इंसानी खोपड़ियों से ढक गई थी।
🎯 Exam Tip: युद्ध के दृश्यों का वर्णन करते समय, कवि अक्सर अतिशयोक्ति का उपयोग करते हैं ताकि घटना की तीव्रता और वीरता को प्रभावी ढंग से व्यक्त किया जा सके।
Question 6. ऐसा रण, राणा करता था, पर उसको था सन्तोष नहीं। क्षण-क्षण आगे बढ़ता था वह, पर कम होता था रोष नहीं।। कहता था लड़ता मान कहाँ, मैं कर लें रक्त-स्नान कहाँ? जिस पर तय विजय हमारी है, वह मुगलों का अभिमान कहाँ?
Answer: प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि श्यामनारायण पाण्डेय की 'हल्दीघाटी' कविता से ली गई हैं, जिनमें कवि राणा प्रताप के अद्भुत शौर्य और मुग़ल सेना पर उनके प्रभाव का वर्णन कर रहे हैं। कवि कहते हैं कि राणा प्रताप युद्धभूमि (रण) में ऐसे भयानक तरीके से लड़ रहे थे, फिर भी उन्हें संतोष नहीं हो रहा था। वे हर पल आगे बढ़ते जा रहे थे, और उनका गुस्सा (रोष) जरा भी कम नहीं हो रहा था। राणा प्रताप मानसिंह (मुग़ल सेना के सेनापति) को ललकारते हुए कहते हैं कि मानसिंह कहाँ है, और वह रक्त से स्नान कैसे कर सकता है (अर्थात् वह उनसे लड़ने की हिम्मत कैसे कर सकता है)? राणा प्रताप पूरे विश्वास के साथ कहते हैं कि युद्ध में विजय उनकी ही निश्चित है, और उनके जीवित रहते मुगलों का घमंड (अभिमान) कायम नहीं रह सकता। यह राणा प्रताप के अटूट आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।
काव्यगत सौन्दर्य:
- कवि ने राणा प्रताप के अप्रतिम शौर्य का वर्णन किया है।
- भाषा: खड़ी बोली।
- रस: वीर रस।
- अलंकार: अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश, श्लेष।
- शैली: ओजपूर्ण।
- भावसाम्य: स्वदेश के प्रति कवि माखनलाल चतुर्वेदी ने ऐसे ही पंक्तियों का उद्गार किया है: "बलि होने की परवाह नहीं, मैं हूँ, कष्टों का राज्य रहे, मैं जीता, जीता, जीता हूँ माता के हाथ स्वराज्य रहे।"
In simple words: राणा प्रताप इतनी बहादुरी से लड़ रहे थे, पर उन्हें संतोष नहीं था। वे हर पल आगे बढ़ रहे थे और उनका गुस्सा कम नहीं हो रहा था। वे दुश्मनों को चुनौती दे रहे थे कि वे कैसे जीतेंगे, क्योंकि जीत तो उनकी ही तय थी और मुग़लों का घमंड कभी नहीं चलेगा।
🎯 Exam Tip: किसी भी कविता की व्याख्या करते समय, कवि की देशभक्ति या विशिष्ट संदेश को उजागर करना चाहिए, जैसा कि यहाँ राणा प्रताप के शौर्य और आत्मविश्वास में है।
काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध
Question 1. 'हल्दी घाटी' कविता का सौन्दर्य कवि की ओजपूर्ण शैली में प्रस्फुटित हुआ है। कविता से उदाहरण देते हुए कथन की पुष्टि कीजिए ।
Answer: 'हल्दी घाटी' कविता में कवि ने महाराणा प्रताप की वीरता को ओजपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया है, जो पाठक में जोश और उत्साह भर देती है। इस कथन की पुष्टि के लिए निम्नलिखित उदाहरण दिए जा सकते हैं, जो कवि की सशक्त और प्रभावी शैली को दर्शाते हैं:
(क) मेवाड़-केसरी देख रहा,
केवल रण का न तमाशा था।
वह दौड़-दौड़ करता था रण,
वह मान-रक्त का प्यासा था।।
(ख) कहता था लड़ता मान कहाँ, मैं कर लें रक्त-स्नान कहाँ? जिस पर तय विजय हमारी है, वह मुगलों का अभिमान कहाँ?
ये पंक्तियाँ राणा प्रताप के अदम्य साहस, युद्ध कौशल और आत्मविश्वास को इतनी प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती हैं कि पाठक के मन में भी वीर रस का संचार हो जाता है। यह ओजपूर्ण शैली युद्ध के तीव्र माहौल और योद्धा के दृढ़ निश्चय को बखूबी चित्रित करती है।
In simple words: 'हल्दी घाटी' कविता की सुंदरता उसकी जोशीली लिखने की शैली में है। कविता में राणा प्रताप के युद्ध और बहादुरी को ऐसे शब्दों में बताया गया है, जिससे पढ़ने वाले को भी उत्साह और जोश महसूस होता है।
🎯 Exam Tip: किसी भी कविता की शैली का विश्लेषण करते समय, हमेशा कविता से ही उपयुक्त उदाहरण देकर अपने तर्क को मजबूत करें।
Question 2. निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार का नाम सहित स्पष्टीकरण कीजिए-
(क) कट गई वेग से भू, ऐसा । शोणित का नाला फूट पड़ा।
(ख) घोड़ों के विकल वितुण्डों से, पट गई भूमि नरमुण्डों से ।
Answer:
(क) कट गई वेग से भू, ऐसा । शोणित का नाला फूट पड़ा।
इन पंक्तियों में 'अतिशयोक्ति' और 'उपमा' अलंकार का प्रयोग किया गया है। अतिशयोक्ति इसलिए है क्योंकि खून के नाले का इतनी तेजी से बहना कि जमीन कट जाए, बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहा गया है। उपमा अलंकार इसलिए है क्योंकि खून के नाले को भूमि कटने से निकलने वाले जल के नाले के समान बताया गया है।
(ख) घोड़ों के विकल वितुण्डों से, पट गई भूमि नरमुण्डों से ।
इन पंक्तियों में 'अतिशयोक्ति' और 'अनुप्रास' अलंकार का प्रयोग किया गया है। अतिशयोक्ति इसलिए है क्योंकि युद्धभूमि का इतनी बड़ी संख्या में नरमुण्डों (मानव खोपड़ियों) से पट जाना बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है। अनुप्रास अलंकार इसलिए है क्योंकि 'विकल वितुण्डों' में 'व' वर्ण की आवृत्ति हुई है।
In simple words: पहली पंक्तियों में बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बात कही गई है कि खून का नाला बहने से जमीन कट गई (अतिशयोक्ति)। दूसरी पंक्तियों में भी युद्ध में गिरी हुई खोपड़ियों की संख्या को बहुत ज्यादा दिखाया गया है (अतिशयोक्ति)।
🎯 Exam Tip: 'अतिशयोक्ति' अलंकार में बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाता है, जबकि 'उपमा' में एक वस्तु की तुलना दूसरी से की जाती है, और 'अनुप्रास' में किसी वर्ण की आवृत्ति होती है।
Question 3. श्री श्यामनारायण पाण्डेय की पुस्तक में दी गई कविता वीर रस से परिपूर्ण है। वीर रस की परिभाषा देते हुए पाठ से दो उदाहरण दीजिए ।
Answer: हाँ, श्री श्यामनारायण पाण्डेय की 'हल्दीघाटी' कविता वीर रस से भरी हुई है।
(क) वीर रस की परिभाषा: जब किसी कठिन या दुष्कर कार्य को करने का उत्साह मन में आता है, जैसे शत्रुओं की बढ़ती हुई शक्ति, गरीबों पर अत्याचार, या धर्म के पतन को रोकना, तो इस उत्साह से जो भाव उत्पन्न होता है, उसे 'वीर रस' कहते हैं। उत्साह इसका स्थायी भाव है।
(ख) वीर रस के अव्यय (प्रमुख अंग):
- स्थायी भाव: उत्साह
- आलम्बन (जिसके कारण भाव जगे): अत्याचारी शत्रु
- उद्दीपन (भाव को बढ़ाने वाले): शत्रु का अहंकार, युद्ध के वाद्य, यश की इच्छा आदि
- अनुभाव (बाहरी क्रियाएँ): गर्व भरी बातें कहना, प्रहार करना, रोमांच महसूस होना आदि
- संचार भाव (अस्थायी भाव): आवेग, उग्रता, गर्व, उत्सुकता, चपलता आदि
उदाहरण:
पाठ से उदाहरण के तौर पर, ये पंक्तियाँ वीर रस को दर्शाती हैं:
"वह हाथी दल पर टूट पड़ा, मानो उस पर पवि छूट पड़ा। कट गई वेग से भू, ऐसा । शोणित का नाला फूट पड़ा।"
इन पंक्तियों में महाराणा प्रताप का अपार साहस और युद्ध में उनकी भयंकर वीरता का चित्रण है, जो पाठक के मन में उत्साह और जोश भर देता है।
In simple words: वीर रस उस भावना को कहते हैं जब किसी मुश्किल काम को करने या दुश्मनों से लड़ने का बहुत जोश आता है। इसका मुख्य भाव 'उत्साह' होता है। राणा प्रताप का हाथियों की सेना पर हमला करना, जिससे खून की नदियाँ बह गईं, इसका अच्छा उदाहरण है।
🎯 Exam Tip: वीर रस की परिभाषा देते समय उसके स्थायी भाव 'उत्साह' का उल्लेख करना और कविता से सीधा उदाहरण देना बहुत महत्वपूर्ण है।
Question 4. कविता में आए निम्नलिखित मुहावरों को अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए- तमाशा देखना, रक्त का प्यासा होना, हलचल मचाना।
Answer: कविता में आए मुहावरों का वाक्य प्रयोग इस प्रकार है:
- तमाशा देखना: (केवल दर्शक बने रहना, कुछ न करना) वाक्य: हल्दीघाटी के युद्ध में मुगल सेना राणा प्रताप के रण-कौशल का तमाशा देखती रह गई।
- रक्त का प्यासा होना: (किसी को मारने या चोट पहुँचाने के लिए बहुत गुस्से में होना) वाक्य: राणा प्रताप शत्रु सेना पर इस भाँति टूट पड़ता था मानो वह रक्त का प्यासा हो।
- हलचल मचाना: (अशांति या गड़बड़ी पैदा करना) वाक्य: हल्दीघाटी के युद्ध में राणा प्रताप अपने घोड़े चेतक पर सवार होकर जिस ओर मुड़ जाते थे, उसी ओर मुगल सेना में हलचल मच जाती थी।
In simple words: 'तमाशा देखना' मतलब सिर्फ देखना, कुछ न करना। 'रक्त का प्यासा होना' मतलब किसी का खून बहाने को तैयार रहना। 'हलचल मचाना' मतलब बहुत शोर-शराबा या गड़बड़ी करना।
🎯 Exam Tip: मुहावरों का प्रयोग करते समय, उनके सही अर्थ को समझना और वाक्य में उसे सटीक ढंग से बिठाना आवश्यक है ताकि अर्थ स्पष्ट हो सके।
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