RBSE Solutions Class 12 Sanskrit Chapter 5 मेघदूतपीयूषम्

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Detailed Chapter 5 मेघदूतपीयूषम् RBSE Solutions for Class 12 Sanskrit

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Class 12 Sanskrit Chapter 5 मेघदूतपीयूषम् RBSE Solutions PDF

RBSE Class 12 Sanskrit विजेत्री Chapter 5 वस्तुनिष्ठ प्रश्नाः

 

प्रश्न 1. यक्षः कियत् काल पर्यन्तम् शापितः आसीत्
(क) एक मास पर्यन्तम्
(ख) एक वर्ष पर्यन्तम्
(ग) त्रिमास पर्यन्तम्
(घ) षड्मास पर्यन्तम्
Answer: (ख) एक वर्ष पर्यन्तम्
In simple words: यक्ष को एक साल के लिए श्राप मिला था. इस श्राप के कारण उसे अपनी पत्नी से दूर रहना पड़ा.

🎯 Exam Tip: वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में, सही विकल्प का चुनाव ध्यान से करें और सुनिश्चित करें कि वह प्रश्न के अनुरूप है.

 

प्रश्न 2. अतिकोमलं आशा बन्धः कस्य भवति
(क) अङ्गनानाम्।
Answer: (क) अङ्गनानाम्।
In simple words: औरतों की आशा बहुत कोमल होती है. वे छोटी सी उम्मीद पर भी टिकी रहती हैं.

🎯 Exam Tip: ऐसे प्रश्नों में, कविता या पाठ के मुख्य भाव को समझकर उत्तर दें. अक्सर इसमें भावनाओं का वर्णन होता है.

 

प्रश्न 3. क्षामच्छायं भवनमधुना इत्यस्मिन् पदे क्षामच्छायं कः अस्ति
(क) यक्षः।
(ख) भवनम्
(ग) मेघः
(घ) सूर्यः
Answer: (ख) भवनम्
In simple words: 'क्षामच्छायं भवनम्' का अर्थ है, वह भवन जिसकी शोभा कम हो गई है. यहाँ 'भवनम्' उस स्थान को दर्शाता है जो पहले जैसा सुंदर नहीं रहा.

🎯 Exam Tip: संस्कृत शब्दों का अर्थ समझने के लिए पूरे वाक्य का संदर्भ देखें. एक शब्द का अर्थ अलग-अलग वाक्यों में बदल सकता है.

 

प्रश्न 4. चातकेभ्यः जलं कः ददाति-
(क) मेघः।
(ख) यक्षः
(ग) इन्द्रः
(घ) कुबेरः
Answer: (क) मेघः।
In simple words: चातक पक्षियों को पानी सिर्फ बादल देते हैं. वे किसी और से पानी नहीं पीते. यह उनकी एक खास पहचान है.

🎯 Exam Tip: प्रकृति से जुड़े प्रश्नों में, प्राकृतिक घटनाओं और उनके कारकों पर ध्यान दें. मेघ पानी बरसाने का काम करते हैं.

 

प्रश्न 5. अधोलिखितेषु रिक्तस्थानं पूरयत
1. कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाऽचेतनेषु
2. प्राप्ते मित्रे भवति विमुखः किं पुनर्यस्तथोच्चैः
3. तां कस्याञ्चिद् भवनवलभौ सुप्तपारावतायाम्
4. प्रायः सर्वो भवति करुणा वृत्तिरार्द्धान्तरात्मा।
5. योञ्चा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामाः।
Answer:
1. कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाऽचेतनेषु
2. प्राप्ते मित्रे भवति विमुखः किं पुनर्यस्तथोच्चैः
3. तां कस्याञ्चिद् भवनवलभौ सुप्तपारावतायाम्
4. प्रायः सर्वो भवति करुणा वृत्तिरार्द्धान्तरात्मा।
5. योञ्चा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामाः।
In simple words: इन रिक्त स्थानों में, पाठ में दिए गए श्लोकों या वाक्यों के पूरे भाव को समझाकर सही शब्द भरना होता है. इससे वाक्य का अर्थ पूरा हो जाता है.

🎯 Exam Tip: रिक्त स्थान भरते समय, मूल पाठ को याद रखें और सही शब्दों का प्रयोग करें. इससे आपको पूरे अंक मिलेंगे. पाठ के भाव को समझना महत्वपूर्ण है.

RBSE Class 12 Sanskrit विजेत्री Chapter 5 लघूत्तरात्मकाः प्रश्नाः

 

प्रश्न 1. दूरबन्धुर्गतः कः अस्ति?
Answer: दूरबन्धुः यक्षः अस्ति। यक्ष को अपनी प्रियतमा से दूर रहना पड़ा था. वह अपने स्वामी कुबेर के श्राप के कारण रामगिरि पर्वत पर रह रहा था.
In simple words: यक्ष ही दूर चला गया था.

🎯 Exam Tip: ऐसे सीधे प्रश्नों में, कहानी के मुख्य पात्र को पहचानकर उसका नाम स्पष्ट रूप से बताएं. यह पाठ के आधार पर होना चाहिए.

 

प्रश्न 3. पाठे यक्षण्याः उपमा कया सह कृता?
Answer: पाठ में यक्ष की पत्नी (यक्षणी) की तुलना सीता से की गई है. सीता भी अपने पति राम से दूर थीं, ठीक वैसे ही जैसे यक्षणी अपने पति यक्ष से अलग थी. इससे उनकी विरह वेदना को दिखाया गया है.
In simple words: यक्ष की पत्नी की तुलना सीता से की गई है.

🎯 Exam Tip: उपमा वाले प्रश्नों में, जिसकी उपमा दी गई है और जिससे उपमा दी गई है, दोनों का उल्लेख करें. यह समानता का बिंदु स्पष्ट करता है.

 

प्रश्न 4. मनुष्याणां कृते सुखदुःखयोः दशा किमिव भवति?
Answer: मनुष्यों के जीवन में सुख और दुःख की स्थिति एक पहिये के घूमने जैसी होती है, जिसे 'चक्रनेमिक्रमेण' कहा गया है. पहिये का निचला भाग जैसे ऊपर आता है और ऊपरी भाग नीचे जाता है, वैसे ही सुख और दुःख भी बारी-बारी से आते-जाते रहते हैं. यह दिखाता है कि जीवन में कोई भी स्थिति हमेशा नहीं रहती है.
In simple words: मनुष्यों के जीवन में सुख और दुःख एक पहिये की तरह आते-जाते रहते हैं.

🎯 Exam Tip: जीवन की अस्थिरता दर्शाने वाले प्रश्नों में, 'चक्रनेमिक्रमेण' जैसे शब्दों का प्रयोग करें. यह एक महत्वपूर्ण वाक्यांश है.

RBSE Class 12 Sanskrit विजेत्री Chapter 5 निबन्धात्मकाः प्रश्नाः

 

प्रश्न 1. अस्य पाठस्य द्वितीय-तृतीय संख्यकानां पद्यानां सप्रसङ्ग व्याख्या कार्या।
Answer:
द्वितीयपद्यम्-धूमज्योतिः सलिलमरुतां सन्निपातः क्व मेघः सन्देशार्थाः पटुकरणैः प्राणिभिः प्रापणीयाः ।
इत्यौत्सुक्यादपरिगणयन् गुह्यकस्तं ययाचे, कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाऽचेतनेषु ॥

प्रसंग: यह पद्य हमारी पाठ्यपुस्तक 'मेघदूतपीयूषम्' से लिया गया है, जो कालिदास के 'मेघदूतम्' गीतिकाव्य के पूर्वमेघ भाग से संकलित है. यक्ष अपने स्वामी के अधिकार से हटा दिया गया है और श्राप के कारण पत्नी से दूर, रामगिरि पर्वत पर रहता है. आषाढ़ के पहले दिन मेघ को देखकर वह अपनी प्रियतमा के पास संदेश भेजने की प्रार्थना करता है. वह मेघ को समझाता है कि चेतन संदेशवाहक ही संदेश ले जा सकते हैं, लेकिन यहाँ वह एक जड़ वस्तु से प्रार्थना कर रहा है. यक्ष बताता है कि काम से पीड़ित व्यक्ति चेतन और अचेतन का भेद भूल जाता है. इसलिए वह मेघ से प्रार्थना करता है.
हिन्दी-व्याख्या (सरल शब्दों में): यक्ष कहता है कि बादल तो धुएँ, अग्नि, जल और वायु का समूह है, और संदेश तो समर्थ इंद्रियों वाले प्राणी ही ले जा सकते हैं. फिर भी, अपनी प्रियतमा की जान बचाने की बेचैनी में यक्ष यह सोचे बिना ही मेघ से प्रार्थना कर रहा है. ऐसा इसलिए है क्योंकि काम से पीड़ित व्यक्ति स्वभाव से ही दीन और मजबूर हो जाते हैं, और वे जड़-चेतन के बीच का अंतर भूल जाते हैं. अतः यक्ष ने जड़ मेघ से भी अपनी प्रार्थना की. प्रेम की व्याकुलता में व्यक्ति सही-गलत का विचार नहीं कर पाता है. मेघ को दूत बनाना उसकी गहन विरह-पीड़ा को दर्शाता है.
संस्कृत-व्याख्या: धूम, अग्नि, जल और वायु का समूह मेघ है, जबकि संदेश तो समर्थ इंद्रियों वाले प्राणियों द्वारा ले जाने योग्य होते हैं. उत्सुकता के कारण (अपनी प्रिया के जीवन की रक्षा की चिंता में) यक्ष ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि वह चेतन है या अचेतन. काम से पीड़ित व्यक्ति चेतन और अचेतन सभी के प्रति स्वभाव से ही दीन हो जाते हैं. इसलिए यक्ष ने मेघ से प्रार्थना की.

तृतीयपद्यम्-जातं वंशे भुवनविदिते पुष्करावर्तकानां जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोनः ।
तेनार्थित्वं त्वयि विधिवशाद् दूरबन्धुर्गतोऽहं याञ्चा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामाः ॥

प्रसंग: यह पद्य भी महाकवि कालिदास के मेघदूतम् से लिया गया है. यक्ष मेघ से अपनी प्रियतमा के पास संदेश भेजने की प्रार्थना करते हुए उसकी प्रशंसा करता है.
हिन्दी-व्याख्या (सरल शब्दों में): यक्ष मेघ से कहता है कि मैं जानता हूँ कि तुम संसार भर में प्रसिद्ध पुष्करावर्तक नाम के श्रेष्ठ कुल में पैदा हुए हो. तुम इंद्र के प्रधान पुरुष हो और अपनी इच्छा के अनुसार रूप बदल सकते हो. इसलिए भाग्यवश अपनी पत्नी से दूर होने के कारण मैं तुमसे याचक बनकर आया हूँ. क्योंकि श्रेष्ठ व्यक्ति से की गई प्रार्थना अगर सफल न भी हो, तो भी वह अच्छी होती है, लेकिन नीच व्यक्ति से की गई प्रार्थना यदि सफल हो भी जाए, तो भी वह ठीक नहीं होती. इससे यक्ष मेघ के श्रेष्ठ स्वभाव को दर्शाता है. श्रेष्ठ व्यक्ति से सहायता माँगना हमेशा सम्मानजनक होता है, चाहे वह मिले या न मिले, जबकि नीच व्यक्ति से सहायता मिलने पर भी संतोष नहीं होता.
संस्कृत-व्याख्या: हे मेघ! मैं जानता हूँ कि तुम संसार भर में प्रसिद्ध पुष्करावर्तक नाम के कुल में पैदा हुए हो, जो इंद्र के प्रधान पुरुष और इच्छा के अनुसार रूप धारण करने वाले हो. इस उच्च कुल में उत्पन्न होने के कारण और गुणों से युक्त होने के कारण, मैं भाग्यवश अपनी पत्नी से दूर होकर तुम्हारे पास याचक बनकर आया हूँ. क्योंकि श्रेष्ठ व्यक्ति से की गई याचना यदि निष्फल भी हो, तो भी वह उत्तम होती है, लेकिन नीच (गुणहीन) व्यक्ति से की गई याचना यदि सफल भी हो, तो भी वह उत्तम नहीं होती. ऐसा करने से आत्म-सम्मान बना रहता है.
In simple words: यक्ष मेघ से प्रार्थना करता है क्योंकि वह श्रेष्ठ कुल का है और इंद्र का दूत है. यक्ष कहता है कि किसी अच्छे व्यक्ति से मदद मांगना, भले ही वह न मिले, फिर भी बेहतर होता है. नीच व्यक्ति से मदद मिलना भी अच्छा नहीं माना जाता है.

🎯 Exam Tip: सप्रसङ्ग व्याख्या में, पहले प्रसंग बताएं (कवि, काव्य, संदर्भ). फिर सरल हिंदी में व्याख्या करें और अंत में मूल संस्कृत के कठिन शब्दों का अर्थ बताएं. इसमें पाठ की गहराई और संदेश स्पष्ट होना चाहिए.

 

प्रश्न 2. पाठे प्रयुक्तानां सूक्तीनां जीवने महत्त्वं प्रतिपादयत।
Answer: प्रस्तुत पाठ 'मेघदूत' से संकलित सूक्तियों का जीवन में बहुत महत्व है. कवि ने मनुष्य के स्वभाव के यथार्थ सत्यों को इन सूक्तियों के माध्यम से बताया है. वे इस प्रकार हैं:
(i) कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाऽचेतनेषु॥
इस सूक्ति का अर्थ है कि काम (प्रेम) से पीड़ित व्यक्ति स्वभाव से ही दीन (कमजोर) हो जाता है. काम के प्रभाव से विवेक शक्ति कम हो जाती है और व्यक्ति चेतन-अचेतन में भेद नहीं कर पाता. उदाहरण के लिए, यक्ष ने काम से व्याकुल होकर अचेतन मेघ से प्रार्थना की. इसलिए, जीवन में काम भावनाओं के वश में नहीं होना चाहिए. यह बताता है कि अत्यधिक प्रेम या वासना व्यक्ति की निर्णय शक्ति को प्रभावित कर सकती है.
(ii) याञ्चा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामाः॥
इस सूक्ति का भाव है कि जीवन में श्रेष्ठ व्यक्ति से याचना करनी चाहिए. यदि वह याचना सफल न भी हो, तो भी वह थोड़ी प्रिय (सम्मानजनक) होती है. लेकिन नीच व्यक्ति से की गई सफल याचना भी श्रेष्ठ नहीं होती. इसलिए जीवन में कहीं भी बिना सोचे-समझे याचना नहीं करनी चाहिए. यह आत्म-सम्मान और सही व्यक्ति के चुनाव का महत्व बताता है.
(iii) आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां सद्य:पाति प्रणयिहृदयं विप्रयोगे रुणद्धि॥
इस सूक्ति का भाव है कि 'आशा बलवती है'. जैसे पति से अलग हुई अबला स्त्रियाँ पति के वापस आने की आशा में ही प्राण धारण करती हैं, वैसे ही विपत्ति के समय भी भाग्य के उदय और सुख के आने की आशा से ही जीवन सुखमय होता है. आशा ही मनुष्य को लगातार कर्मशील बनाती है और जीवन के सभी कष्टों को हर लेती है. आशा एक मजबूत सहारा है जो विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति को आगे बढ़ने की शक्ति देती है.
(iv) न क्षुद्रोऽपि प्रथमसुकृतापेक्षया संश्रयाये, प्राप्ते मित्रे भवति विमुखः किं पुनर्यस्तथोच्चैः॥
इस सूक्ति में कवि ने लोक के सामान्य सत्य को बताया है. आमतौर पर यह देखा जाता है कि नीच या गरीब व्यक्ति भी आश्रय प्राप्त करने वाले मित्र के आने पर, पहले किए गए उपकार को याद करके उससे विमुख नहीं होता है. तो जो व्यक्ति श्रेष्ठ (महान) है, उसके बारे में क्या कहना! इसलिए जीवन में अपने आश्रय में आए हुए लोगों का यथाशक्ति सत्कार करना चाहिए. यह कृतज्ञता और उदारता का महत्व बताता है.
(v) मन्दायन्ते न खलु सुहृदामभ्युपेतार्थकृत्याः॥
इस सूक्ति में कहा गया है कि मित्र के कार्य को स्वीकार करने वाले सज्जन उस कार्य को करने में देरी नहीं करते हैं. इसका मतलब है कि वे कार्य को पूरा करके ही आराम करते हैं. सज्जन लोग या तो किसी काम को करने की हाँ नहीं करते, और यदि एक बार स्वीकार कर लेते हैं, तो उसे पूरा करके ही चैन लेते हैं. भर्तृहरि ने भी नीतिशतक में इसी भाव का श्लोक लिखा है. यह मित्रों के प्रति समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाता है.
(vi) आपन्नार्ति प्रशमनफला हि सम्पदः ह्युत्तमानाम्॥
इस सूक्ति का भाव है कि उत्तम स्वभाव के लोगों की धन-संपत्ति विपत्तिग्रस्त लोगों की पीड़ा को दूर करने के लिए होती है. अर्थात, उत्तम प्रकृति के लोग अपनी संपत्ति का उपयोग दूसरों के दुखों को दूर करने के लिए करते हैं. वे संकटग्रस्त प्राणियों की रक्षा के लिए अपने प्राणों तक की बाजी लगा देते हैं. यह परोपकार और दयालुता के महत्व पर जोर देता है.
(vii) सूर्याऽपाये न खलु कमलं पुष्यति स्वामभिख्याम्॥
इस सूक्ति का भाव है कि 'सूर्य के अस्त हो जाने पर कमल अपनी शोभा नहीं रख पाता है'. जिस प्रकार सूर्य के रहने तक कमल की शोभा रहती है, वैसे ही घर के स्वामी के रहने तक घर की शोभा रहती है. सब कुछ होते हुए भी, यदि घर का स्वामी न हो तो घर शोभाहीन लगता है. यह दर्शाता है कि कुछ चीजें अपने मूल आधार के बिना अपनी पहचान खो देती हैं.
(viii) प्रायः सर्वो भवति करुणा वृत्तिरार्दान्तरात्मा ॥
इस सूक्ति का भाव है कि आमतौर पर सभी कोमल हृदय वाले लोग दयालु स्वभाव के होते हैं. मेघ उस यक्षणी की बुरी हालत देखकर 'नए जल के आँसू' बहाएगा. यह बताता है कि मेघ का अंतःकरण (मन) कोमल है. पानी से भरा होने के कारण मेघ का स्वभाव ही करुणा से भर जाता है. यह दिखाता है कि दयालुता एक स्वाभाविक गुण है.
(ix) कान्तोदन्तः सङ्गमात् किञ्चिदूनः॥
इस सूक्ति में कहा गया है कि पति के मित्र द्वारा लाया गया पति का संदेश, पति से मिलने के आनंद से थोड़ा ही कम होता है. यानी, ऐसा संदेश सुनने में भी उतना ही आनंद आता है जितना पति से मिलने पर आता है. पति का संदेशवाहक और उसका संदेश विरहिणी पत्नी के लिए बहुत प्रिय होता है. वह संदेशवाहक का हृदय से सम्मान करती है और उसके संदेश को ध्यान से सुनती है. यह वियोग में प्रेम की गहराई को दर्शाता है.
(x) कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा। नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण॥
इस सूक्ति का भाव है कि जीवन में किसी को भी लगातार सुख या लगातार दुःख नहीं मिला है. जीवन की स्थिति पहिये के किनारे की तरह कभी ऊपर और कभी नीचे जाती रहती है. अर्थात्, जीवन में सुख-दुःख का चक्र लगातार घूमता रहता है. संसार में कोई प्राणी हमेशा सुखी या हमेशा दुखी नहीं रहता. सुख-दुःख आँख-मिचौनी की तरह आते-जाते रहते हैं. यह बताता है कि धैर्य बनाए रखना महत्वपूर्ण है.
(xi) प्रत्युक्तं हि प्रणयिषु सतामीप्सितार्थक्रियैव॥
इस सूक्ति का अर्थ है कि सज्जन लोग अपने प्रियजनों के प्रति उनके इच्छित कार्य को करके ही उत्तर देते हैं. वे केवल कहकर नहीं, बल्कि करके दिखाते हैं. संसार में जो कहता है लेकिन करता नहीं, वह दुर्जन होता है; और जो कहता नहीं, केवल करके दिखाता है, वह सज्जन कहलाता है. जैसे मेघ शरद ऋतु में गरजता है पर बरसता नहीं, लेकिन वर्षा ऋतु में बिना गरजे ही बरसता है. मेघ का मौन यक्ष को आश्वस्त करता है कि वह उसका कार्य अवश्य पूरा करेगा. यह कर्मठता और विश्वसनीयता के महत्व को बताता है.
In simple words: इस पाठ की सूक्तियाँ जीवन के गहरे सच बताती हैं. जैसे, काम से लोग विवेक खो देते हैं, अच्छे लोगों से मदद मांगनी चाहिए, आशा हमें जीने की शक्ति देती है, कृतज्ञ होना चाहिए, और मित्रों का काम बिना देरी के करना चाहिए. ये हमें सिखाती हैं कि धन दूसरों की मदद के लिए है, कुछ चीजें अपने आधार के बिना बेकार हैं, दयालु होना चाहिए, प्रिय का संदेश भी सुख देता है, और सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं. साथ ही, सज्जन लोग बोलकर नहीं, बल्कि काम करके दिखाते हैं.

🎯 Exam Tip: सूक्तियों की व्याख्या करते समय, पहले सूक्ति का अर्थ बताएं. फिर उसका जीवन में क्या महत्व है, यह उदाहरण सहित स्पष्ट करें. इससे आपकी समझ और प्रस्तुति बेहतर होगी.

 

प्रश्न 3. पाठस्य एकादश द्वादश संख्यकानां पद्यानां सप्रसङ्गव्याख्या कार्या
Answer:
एकादश-पद्यम्-नन्वात्मानं बहु विगणयन्नात्मनाऽलम्बलम्बे कल्याणि! त्वमपि नितरां मा गमः कातरत्वम्। कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ॥
प्रसंग: यह पद्य महाकवि कालिदास द्वारा रचित 'मेघदूत' के उत्तरमेघ से लिया गया है. विरह से पीड़ित यक्ष अपनी प्रियतमा को मेघ के माध्यम से संदेश भेजता है. वह अपनी पत्नी को धैर्य रखने के लिए कहता है.
हिन्दी-व्याख्या (सरल शब्दों में): यक्ष अपनी प्रिय पत्नी को संबोधित करते हुए कहता है - "हे कल्याणि! मैं खुद को बहुत अधिक मानकर, किसी तरह अपने प्राणों को धारण किए हुए हूँ (ताकि शाप के अंत में तुम्हें मिल सकूँ). तुम भी बिल्कुल भी अधीर मत होना." वह समझाता है कि इस संसार में किसी को भी हमेशा सुख या हमेशा दुःख नहीं मिलता. जीवन की स्थिति एक पहिये के घूमने जैसी है, जो कभी नीचे जाता है और कभी ऊपर आता है. यह बताता है कि जीवन में बदलाव आते रहते हैं, इसलिए धैर्य रखना चाहिए. शाप की अवधि खत्म होने पर वे फिर से मिलेंगे.
संस्कृत-व्याख्या: हे प्रिये! मैं अपने आप को बहुत अधिक समझता हुआ, स्वयं ही सहारा दे रहा हूँ (यानी किसी तरह प्राण धारण किए हुए हूँ). हे कल्याणि! तुम भी अत्यधिक अधीरता को प्राप्त मत करो. क्योंकि इस संसार में किसे हमेशा सुख मिलता है, या किसे हमेशा दुःख मिलता है? दशा (भाग्य) तो पहिये के घूमने के क्रम से ही कभी नीचे और कभी ऊपर जाती है. इसलिए दुःखों में विचलित नहीं होना चाहिए.

द्वादशपद्यम्-सौम्येदमद्य मदनं विलोकितं बन्धुकृत्यं त्वया व्यवसितं नैषा ममेवोपपन्ना। प्रत्यादेशान्न खलु भवतः धीरतां कल्पयामि याचितश्चातकेभ्यो जलं प्रदिशति ॥
प्रसंग: यह पद्य भी 'मेघदूत' के उत्तरमेघ से उद्धृत है. यक्ष अपनी प्रियतमा के पास प्रेम संदेश भेजने के लिए मेघ से विश्वासपूर्वक कहता है कि वह उसका कार्य अवश्य पूरा करेगा.
हिन्दी-व्याख्या (सरल शब्दों में): यक्ष मेघ से कहता है - "हे शांत स्वभाव के मेघ! यह मेरा मित्र का कार्य, जो मैंने तुम्हें बताया है, तुमने करने का निश्चय कर लिया है, क्या यह बात सही है?" यक्ष कहता है कि वह तुम्हारी चुप्पी को तुम्हारी अस्वीकृति नहीं मानता, बल्कि तुम्हारी गंभीरता मानता है. क्योंकि सज्जन लोग, जिनसे कुछ मांगा जाता है, वे अपनी इच्छा के कार्य को पूरा करके ही जवाब देते हैं, न कि बोलकर. जैसे, चातक पक्षियों के मांगने पर तुम बिना कुछ कहे ही जल दे देते हो. यह बताता है कि श्रेष्ठ व्यक्ति अपने कर्तव्यों को समझते हैं और उन्हें पूरा करते हैं. मेघ का चुप रहना उसकी सहमति और कर्तव्यपरायणता को दर्शाता है.
संस्कृत-व्याख्या: हे साधु मेघ! यह मेरा मित्र का कार्य (संदेश ले जाने का कार्य) तुमने निश्चित कर लिया है, क्या ऐसा ही है? मैं तुम्हारे इस मौन को अस्वीकृति नहीं मानता, क्योंकि सज्जन व्यक्तियों की याचना पर उनके इच्छित कार्य को कर देना ही उनका उत्तर होता है. जैसे, तुम चातक पक्षियों को जल देते हो (बिना कुछ कहे). यह सज्जनों के व्यवहार को दर्शाता है.
In simple words: यक्ष अपनी पत्नी को धैर्य रखने को कहता है, क्योंकि सुख-दुःख पहिये की तरह आते-जाते रहते हैं. वह मेघ से विश्वासपूर्वक कहता है कि मेघ उसका काम पूरा करेगा, क्योंकि सज्जन लोग काम करके दिखाते हैं, न कि सिर्फ कहकर.

🎯 Exam Tip: श्लोकों की व्याख्या करते समय, मुख्य भाव को सरल भाषा में समझाएं. प्रसंग और संदर्भ को स्पष्ट करें. जीवन के साथ उसके संबंध को भी जोड़ें.

RBSE Class 12 Sanskrit विजेत्री Chapter 5 व्याकरणात्मकाः प्रश्नाः

 

प्रश्न 1. अधस्तनेषु पदेषु नामोल्लेखपूर्वकं सन्धिकार्यः

पदम्सन्धिरूपम्सन्धि नाम
(क) \( स्व + अधिकारात् \)स्वाधिकारात्दीर्घ
(ख) \( हि + उत्तमानाम् \)ह्युत्तमानाम्यण्
(ग) \( आत्मना + एव \)आत्मनैववृद्धि
(घ) \( क्षुद्रः + अपि \)क्षुद्रोऽपिविसर्ग-उत्वसन्धिः
(ङ) \( प्रत्यादेशात् + न \)प्रत्यादेशान्नजश्त्व हल्
Answer: (Table presented above)
In simple words: संधि का मतलब है दो शब्दों को जोड़ना. यहाँ पर शब्दों को जोड़कर नया शब्द बनाया गया है और बताया गया है कि उसमें कौन सी संधि का नियम लगा है, जैसे स्वर या व्यंजन संधि.

🎯 Exam Tip: संधि के नियमों को अच्छी तरह से याद करें, खासकर स्वर और व्यंजन संधि के भेद. उदाहरणों का अभ्यास करने से मदद मिलेगी.

 

प्रश्न 2. अधस्तनपदेषु सन्धिविच्छेदो विधेयः

पदानिसन्धि विच्छेदः
(क) रामगिर्याश्रमेषु\( रामगिरि + आश्रमेषु \)
(ख) सुकृतापेक्षया\( सुकृत + अपेक्षया \)
(ग) पुण्योदकेषु\( पुण्य + उदकेषु \)
(घ) ह्यङ्गनानाम्\( हि + अङ्गनानाम् \)
(ङ) यक्षश्चक्रे\( यक्षः + चक्रे \)
Answer: (Table presented above)
In simple words: संधि विच्छेद में, एक जुड़े हुए शब्द को उसके मूल दो या दो से अधिक शब्दों में अलग किया जाता है. इससे शब्द का असली अर्थ समझने में आसानी होती है.

🎯 Exam Tip: संधि विच्छेद करते समय, यह सुनिश्चित करें कि अलग किए गए शब्द अपने आप में अर्थपूर्ण हों. इससे आपको सही विच्छेद करने में मदद मिलेगी.

 

प्रश्न 3. अधोलिखितेषु पदेषु नामोल्लेखपूर्वकं समासोविधीयताम्

पदम्समास नाम
(क) कृतपुण्यैः सहसपुण्यैः
(ख) दशरथस्य पुत्रःदशरथिः
(ग) मघोनः अयम्माघोनम्
(घ) अहोरात्रस्यअहोरात्रम्
(ङ) शोभनं हृदयं यस्य सःसुहृदः (बहुव्रीहिः)
Answer: (Table presented above)
In simple words: समास में, कई शब्दों को मिलाकर एक छोटा शब्द बनाया जाता है, जिससे वाक्य बोलने में आसान हो जाता है.

🎯 Exam Tip: समास के विभिन्न प्रकारों को पहचानना और विग्रह करके उसका नाम बताना महत्वपूर्ण है. इससे आपको पूरे अंक मिलेंगे.

 

प्रश्न 4. अधोलिखितेषु समस्तपदेषु समासविग्रहोविधीयताम्

समस्त पदंसमास विग्रहः
(क) धूमज्योतिःसलिलमरुतांधूमश्च ज्योतिश्च सलिलञ्च मरुच्च तेषां सर्वेषाम् ।
(ख) मद्वियोगःमम वियोगः।
(ग) प्रकृतिपुरुषम्प्रकृतिश्चासौ पुरुषः तम्।
(घ) करुणावृत्तिःकरुणशीला वृत्तिः यस्य सः।
(ङ) चक्रनेमिःचक्रस्य नेमिः।
Answer: (Table presented above)
In simple words: समास विग्रह में, एक छोटे (समस्त) शब्द को उसके मूल बड़े रूप में अलग-अलग शब्दों के साथ समझाया जाता है. इससे उस शब्द का पूरा मतलब समझ में आ जाता है.

🎯 Exam Tip: समास विग्रह करते समय, हर शब्द का अर्थ और उसके संबंध को स्पष्ट करें. इससे आप सही विग्रह कर पाएंगे.

 

प्रश्न 5. अधोलिखितेषु सुबन्तपदेषु विभक्तिः वचनञ्च निर्दिश्यताम्

पदम्विभक्तिःवचनम्
(क) भर्तुःषष्ठीएकवचनम्
(ख) प्राणिभिःतृतीयाबहुवचनम्
(ग) चातकेभ्यःचतुर्थीबहुवचनम्
(घ) साधोसम्बोधनएकवचनम्
(ङ) मूर्ध्वातृतीयाएकवचनम्
(च) गर्जितानाम्षष्ठीबहुवचनम्
(छ) एभिःतृतीयाबहुवचनम्
Answer: (Table presented above)
In simple words: विभक्ति और वचन बताते हैं कि कोई शब्द वाक्य में कैसे इस्तेमाल हुआ है. विभक्ति से शब्द का संबंध पता चलता है, और वचन से यह पता चलता है कि वह एक है या अनेक.

🎯 Exam Tip: सुबन्त पदों की विभक्ति और वचन पहचानने के लिए कारक और धातुरूपों का ज्ञान आवश्यक है. इससे आप सही उत्तर दे पाएंगे.

 

प्रश्न 6. निम्नलिखितानां तिङ्गन्त पदानां धातुः लकारः पुरुषः वचनञ्च पृथक्पृथक् निर्दिष्यताम्।

पदम्धातुःलकारःपुरुषःवचनम्
(ङ) जानामिज्ञालट्उत्तमःएकवचनम्
(च) मोचयिष्यतिमोच् (मुच्)लृट्प्रथमःएकवचनम्
(छ) रमसेरम्लट्मध्यमःएकवचनम्
(ज) सरतिसृलट्प्रथमःएकवचनम्
Answer: (Table presented above)
In simple words: तिङ्गन्त पद वे शब्द होते हैं जो क्रिया का रूप दिखाते हैं. इसमें धातु (क्रिया का मूल रूप), लकार (समय), पुरुष (करने वाला), और वचन (संख्या) बताया जाता है.

🎯 Exam Tip: धातुओं के पांच लकारों (लट्, लृट्, लङ्, लोट्, विधिलिङ्) को याद करना और उनके पुरुषों तथा वचनों का अभ्यास करना महत्वपूर्ण है.

 

प्रश्न 7. अधोलिखितेषु पदेषु प्रकृतिप्रत्ययोः निर्धारणं कुरुत

पदम्प्रकृतिःप्रत्ययः
(क) अधिकारः\( अधि + कृ \)घञ्
(ख) जातम्जन्क्त
(ग) भोग्यम्भुज्ण्यत्
(घ) स्थातव्यम्स्थातव्यत्
(ङ) निहितम्\( नि + हा \)क्त
(च) नीत्वानीक्त्वा
(छ) शमयितुम्शम्तुमुन्
(ज) दृष्ट्वादृश्क्त्वा
Answer: (Table presented above)
In simple words: प्रकृति और प्रत्यय वे शब्द-भाग होते हैं जो एक शब्द के मूल रूप (प्रकृति) में जुड़कर (प्रत्यय) उसका अर्थ या व्याकरणिक रूप बदल देते हैं.

🎯 Exam Tip: विभिन्न प्रकार के प्रत्ययों (कृत, तद्धित, स्त्री) और उनके प्रयोग के नियमों को याद करें. यह शब्दों को सही ढंग से समझने में मदद करेगा.

 

प्रश्न 8. अधोलिखितपदेषु धातूपसर्गप्रत्ययोः निर्धारणं कुरुत।

पदम्उपसर्गःधातुःप्रत्ययः
(क) प्रमत्तःप्रमद्क्त
(ख) सन्निपातःसम्, निपत्घञ्
(ग) उपनतम्उपनम्क्त
(घ) विगणयन्विगण्शतृ
(ङ) सम्भाव्यःसम्भूघञ्
Answer: (Table presented above)
In simple words: उपसर्ग, धातु और प्रत्यय, ये सब मिलकर एक शब्द का अर्थ और रूप तय करते हैं. उपसर्ग शब्द के पहले जुड़ता है, धातु मूल क्रिया होती है, और प्रत्यय अंत में जुड़कर नया शब्द बनाता है.

🎯 Exam Tip: उपसर्गों की पहचान करें और वे धातु के साथ कैसे जुड़ते हैं, यह समझें. यह शब्दों की संरचना को समझने में मदद करेगा.

 

प्रश्न 9. अधस्तनेषु वाक्येषु रेखाङ्कितपदानां शुद्धिं कुरुत
(क) यक्षः भर्तुशापात् क्षीणप्रभावः आसीत्।
(ख) क्षुद्रोऽपि मित्रेण प्राप्ते विमुखः न भवति
(ग) मेघः चातकान् जलं ददाति।
(घ) सूर्याय अस्तं गते कमलं न पुष्यति
(ङ) यक्षः रामगिरिम् दुःखेन जीवनं धारयति स्म।
Answer:
(क) यक्षः भर्तुः शापात् क्षीणप्रभावः आसीत्।
(ख) क्षुद्रोऽपि मित्रे प्राप्ते विमुखः न भवति।
(ग) मेघः चातकेभ्यः जलं ददाति।
(घ) सूर्यापाये कमलं न पुष्यति।
(ङ) यक्षः रामगिरौ दुःखेन जीवनं धारयति स्म।
In simple words: इन वाक्यों में कुछ शब्दों का गलत इस्तेमाल हुआ है. उन्हें ठीक करके सही व्याकरण और अर्थ के साथ फिर से लिखा गया है.

🎯 Exam Tip: वाक्य शुद्धि के लिए, विभक्ति, वचन, कारक और क्रिया के सही प्रयोग पर ध्यान दें. इससे वाक्य शुद्ध बनते हैं.

 

प्रश्न 10. अधस्तनेषु वाक्येषु प्रश्ननिर्माणं कुरुतउत्तर:प्रश्ननिर्माणम्
(क) प्रश्नः-यक्षः कुत्र निवसति स्म?
उत्तर: यक्ष रामगिरि-आश्रमेषु निवसति स्म।
(ख) प्रश्नः-केषां सन्निपातः क्व मेघः?
उत्तर: धूमज्योतिःसलिलमरुतांसन्निपातः क्व मेघः
(ग) प्रश्नः-सुखदुःखं कथं क्रमशः नीचैरुपरि भवति?
उत्तर: सुखदुःखंचक्रनेमिक्रमेण क्रमशः नीचैरुपरि भवति।
Answer:
(क) प्रश्नः-यक्षः कुत्र निवसति स्म?
उत्तर: यक्ष रामगिरि-आश्रमेषु निवसति स्म।
(ख) प्रश्नः-केषां सन्निपातः क्व मेघः?
उत्तर: धूमज्योतिःसलिलमरुतांसन्निपातः क्व मेघः
(ग) प्रश्नः-सुखदुःखं कथं क्रमशः नीचैरुपरि भवति?
उत्तर: सुखदुःखंचक्रनेमिक्रमेण क्रमशः नीचैरुपरि भवति।
In simple words: यहाँ दिए गए वाक्यों के लिए सवाल बनाए गए हैं. सवाल बनाने के लिए 'कौन', 'कहाँ', 'कैसे' जैसे प्रश्नवाचक शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि उत्तर दिए गए वाक्य से मेल खाए.

🎯 Exam Tip: प्रश्न निर्माण करते समय, उत्तर के मुख्य भाग को पहचानें और उसके स्थान पर उचित प्रश्नवाचक शब्द का प्रयोग करें. वाक्य की संरचना समान रखें.

RBSE Class 12 Sanskrit विजेत्री Chapter 5 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

 

प्रश्नः 1. निम्नलिखितशब्दानाम् हिन्द्याम् अर्थं लिखत

संस्कृत शब्दहिन्दी अर्थ
(iv) मघोनःइन्द्र का।
(v) अर्थित्वम्याचक के रूप में।
(vi) रुणद्धिटूटने से रोक लेता है।
(vii) सुप्तपारावतायाम्सोये हुए कबूतरों वाली।
(viii) भवनवलभौमहल की अट्टालिका पर।
(ix) अध्वशेषम्बचे हुए मार्ग को।
(x) वाहयेत्पूर्ण करे।
(xi) वायौ सरतिहवा के बहने पर।
(xii) वारिधाराजल की धारा।
(xiii) लक्षयेथापहचान लेना।
(xiv) असकृत्बार-बार ।
(xv) पेशलं गात्रम्कोमल शरीर को।
Answer: (Table presented above)
In simple words: इन संस्कृत शब्दों का अर्थ हिंदी में दिया गया है. इससे संस्कृत को समझना आसान हो जाता है, क्योंकि हमें पता चलता है कि हर शब्द का क्या मतलब है.

🎯 Exam Tip: संस्कृत शब्दों के अर्थ याद करने से पाठ को समझने में बहुत मदद मिलती है. महत्वपूर्ण शब्दों की एक सूची बनाकर उन्हें दोहराते रहें.

 

प्रश्नः 2. रेखांकितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
1. यक्षः रामगिर्याश्रमेषु वसतिं चक्रे
2. सः भर्तुः शापेन अस्तङ्ग‌मितमहिमा आसीत्
3. सन्देशार्थाः पटुकरणैः प्राणिभिः प्रापणीयाः भवन्ति
4. औत्सुक्यात् गुह्यकः तं येयाचे।
5. कामार्ता: चेतनाऽचेतनेषु प्रकृतिकृपणाः भवन्ति।
6. मेघः पुष्करावर्तकानां वंशे जातः
7. अधिगुणे मोघाऽपि याञ्चा वरम्
8. त्वं दिवसगणनातत्परां भ्रातृजायां द्रक्ष्यसि।
9. आशाबन्धः अङ्गनानां विप्रयोगे प्रणयि हृदयं रुणद्धि
10. आम्रकूटः त्वाम् साधुः वक्ष्यति
11. भवान् सूर्ये दृष्टे पुनरपि अध्वशेषं वाहयेत्
12. सुहृदाम् अभ्युपेतार्थकृत्याः न मन्दायते।
13. उत्तमानां सम्पदः आपन्नाऽऽर्तिप्रशमनफलाः भवन्ति
14. सूर्यापाये कमलं स्वामभिख्यां न पुष्यति।
15. आन्तरात्मा सर्वः करुणावृत्तिः भवति।
16. सीमन्तिनीनां सुहृदुपनतः कान्तोदन्तः संगमात् किञ्चिदूनः भवति।
17. अहम् आत्मानम् आत्मना एव अवलम्बे।
18. जीवनदशा चक्रनेमिक्रमेण नीचैः उपरि च गच्छति
19. प्रत्यादेशात् भवतः धीरतां न कल्पयामि
Answer:
1. यक्षः कुत्र वसतिं चक्रे?
2. सः भर्तुः शापेन कीदृशः आसीत्?
3. सन्देशार्थाः कैः प्रापणीयाः भवन्ति?
4. कस्मात् गुह्यकः तं ययाचे?
5. कामार्ताः केषु प्रकृतिकृपणः भवन्ति?
6. मेघः केषां वंशे जातः?
7. कुत्र मोघाऽपि याञ्चा वरम्?
8. त्वं कीदृशीं भ्रातृजायां द्रक्ष्यसि?
9. कः अङ्गनानां विप्रयोगे प्रणयि हृदयं रुणद्धि?
10. कः त्वम् साधुः वक्ष्यति?
11. भवान् कदा पुनरपि अध्वशेषं वाहयेतू?
12. केषाम् अभ्युपेतार्थकृत्याः न मन्दायते?
13. उत्तमानां सम्पदः कीदृश्यः भवन्ति?
14. सूर्यापाये कमलं किम् न पुष्यति?
15. आन्तरात्मा सर्वः कीदृशः भवति?
16. सीमन्तिनीनां कः संगमात् किञ्चिदूनः भवति?
17. अहम् आत्मानं केन एव अवलम्बे?
18. जीवनदशा कथं नीचैः उपरि च गच्छति?
19. कस्मात् भवतः धीरतां न कल्पयामि?
In simple words: यहाँ दिए गए वाक्यों में से रेखांकित शब्दों को हटाकर प्रश्नवाचक शब्द लगाए गए हैं, ताकि दिए गए वाक्यों को प्रश्न के रूप में बदला जा सके. इससे पता चलता है कि मूल वाक्य में क्या जानकारी दी गई थी.

🎯 Exam Tip: प्रश्न निर्माण करते समय, रेखांकित शब्द के स्थान पर उपयुक्त प्रश्नवाचक शब्द (किम्, कुत्र, कदा, कथं, कः, केषां, कैः, कीदृशः) का प्रयोग करें. लिंग और वचन का भी ध्यान रखें.

 

प्रश्नः 3. अधोलिखितपद्यांशानाम् हिन्दीभाषया भावार्थं लिखत
(i) कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाऽचेतनेषु॥
(ii) याञ्चा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामाः॥
(iii) आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां सद्य:पाति प्रणयिहृदयं विप्रयोगे रुणद्धि॥
(iv) न क्षुद्रोऽपि प्रथमसुकृतापेक्षया संश्रयाये, प्राप्ते मित्रे भवति विमुखः किं पुनर्यस्तथोच्चैः॥
(v) मन्दायन्ते न खलु सुहृदामभ्युपेतार्थकृत्याः॥
(vi) आपन्नार्ति प्रशमनफला हि सम्पदः ह्युत्तमानाम्॥
(vii) सूर्याऽपाये न खलु कमलं पुष्यति स्वामभिख्याम्॥
(viii) प्रायः सर्वो भवति करुणा वृत्तिरार्दान्तरात्मा ॥
(ix) कान्तोदन्तः सङ्गमात् किञ्चिदूनः॥
(x) कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा। नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण॥
(xi) प्रत्युक्तं हि प्रणयिषु सतामीप्सितार्थक्रियैव॥
Answer:
(i) कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाऽचेतनेषु॥
भावार्थ: काम (प्रेम) से पीड़ित व्यक्ति स्वभाव से ही दीन और कमजोर हो जाते हैं. ऐसे लोग चेतन और अचेतन वस्तुओं के बीच का अंतर भूल जाते हैं. कवि का मतलब है कि प्रेम में व्याकुल होने पर व्यक्ति की सोचने-समझने की शक्ति कम हो जाती है, और वह सही-गलत का विचार नहीं कर पाता, जैसा कि यक्ष ने मेघ से प्रार्थना करके दिखाया. प्रेम में डूबे व्यक्ति को यह भी नहीं सूझता कि चेतन और अचेतन में क्या अंतर है.

(ii) याञ्चा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामाः॥
भावार्थ: श्रेष्ठ गुणों वाले व्यक्ति से की गई प्रार्थना, भले ही वह सफल न हो, फिर भी अच्छी होती है. लेकिन नीच (गुणहीन) व्यक्ति से की गई प्रार्थना, भले ही वह सफल हो जाए, तो भी अच्छी नहीं मानी जाती है. यक्ष मेघ से इसलिए प्रार्थना करता है क्योंकि वह उसे श्रेष्ठ मानता है. इससे यह शिक्षा मिलती है कि मदद हमेशा सम्मानजनक व्यक्ति से ही मांगनी चाहिए, चाहे वह मिले या न मिले, क्योंकि उसमें अपना आत्म-सम्मान बना रहता है.

(iii) आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां सद्य:पाति प्रणयिहृदयं विप्रयोगे रुणद्धि॥
भावार्थ: आशा की डोर, जो फूलों जैसी कोमल होती है, वह अक्सर स्त्रियों के प्रेम से भरे हृदय को वियोग के दिनों में टूटने से बचाए रखती है. यक्ष यह कहता है कि उसकी पत्नी आशा के सहारे ही जीवित रहेगी. आशा एक बहुत बड़ी शक्ति है, खासकर वियोग के समय में, जब व्यक्ति को जीने की कोई वजह नहीं दिखती, तब आशा ही उसे संभाले रखती है.

(iv) न क्षुद्रोऽपि प्रथमसुकृतापेक्षया संश्रयाये, प्राप्ते मित्रे भवति विमुखः किं पुनर्यस्तथोच्चैः॥
भावार्थ: कोई छोटा या गरीब व्यक्ति भी अगर उसे आश्रय मिले और उसे पहले की गई भलाई याद हो, तो वह अपने मित्र से मुंह नहीं मोड़ता. फिर जो व्यक्ति इतना महान हो (जैसे मेघ), वह ऐसा कैसे कर सकता है? यक्ष मेघ से कहता है कि तुमने आम्रकूट पर्वत की आग बुझाई थी, इसलिए वह तुम्हारा मित्र है और तुम्हारी मदद करेगा. यह हमें कृतज्ञता और मित्रता का महत्व सिखाता है.

(v) मन्दायन्ते न खलु सुहृदामभ्युपेतार्थकृत्याः॥
भावार्थ: मित्रों के स्वीकार किए हुए कार्यों में सज्जन लोग कभी देरी नहीं करते हैं. इसका मतलब है कि सज्जन लोग या तो किसी काम को करने की हाँ नहीं करते, और यदि एक बार स्वीकार कर लेते हैं, तो उसे पूरा करके ही चैन लेते हैं. यक्ष मेघ से कहता है कि तुमने मेरा काम स्वीकार कर लिया है, इसलिए तुम उसे पूरा करके ही आराम करोगे. यह मित्रों के प्रति कर्तव्यनिष्ठा और समर्पण को दर्शाता है.

(vi) आपन्नार्ति प्रशमनफला हि सम्पदः ह्युत्तमानाम्॥
भावार्थ: उत्तम स्वभाव वाले लोगों की धन-संपत्ति विपत्तिग्रस्त लोगों की पीड़ा को शांत करने के लिए होती है. अर्थात, अच्छे लोग अपनी संपत्ति का उपयोग दूसरों के दुखों को दूर करने के लिए करते हैं. वे संकट में पड़े प्राणियों की रक्षा के लिए अपनी जान तक दांव पर लगा देते हैं. यह बताता है कि असली धन वह है जो दूसरों के काम आए और उनकी मदद करे. मेघ भी जल बरसाकर प्राणियों की पीड़ा दूर करता है.

(vii) सूर्याऽपाये न खलु कमलं पुष्यति स्वामभिख्याम्॥
भावार्थ: सूर्य के अस्त हो जाने पर कमल अपनी शोभा को बनाए नहीं रख पाता है. जिस प्रकार सूर्य के रहने तक कमल की सुंदरता रहती है, उसी प्रकार घर के मालिक के रहने तक घर की शोभा रहती है. सब कुछ होते हुए भी, यदि घर का स्वामी न हो तो घर शोभाहीन लगता है. यक्ष का घर भी उसके बिना वीरान लगेगा. यह दर्शाता है कि कुछ चीजें अपने मूल आधार या व्यक्ति के बिना अपनी पहचान खो देती हैं.

(viii) प्रायः सर्वो भवति करुणा वृत्तिरार्दान्तरात्मा ॥
भावार्थ: आमतौर पर सभी कोमल हृदय वाले लोग दयालु स्वभाव के होते हैं. यक्ष मेघ से कहता है कि यक्षणी की दुर्दशा देखकर वह (मेघ) भी नए जल के आँसू बहाएगा. यह बताता है कि मेघ का मन भी करुणामय है क्योंकि वह पानी से भरा हुआ है. दयालुता एक स्वाभाविक गुण है जो दूसरों के दुख देखकर जागृत होती है.

(ix) कान्तोदन्तः सङ्गमात् किञ्चिदूनः॥
भावार्थ: पति के मित्र द्वारा लाया गया पति का संदेश, पति से मिलने के आनंद से थोड़ा ही कम होता है. यानी, ऐसा संदेश सुनने में भी उतना ही आनंद आता है जितना पति से मिलने पर आता है. पति का संदेशवाहक और उसका संदेश विरहिणी पत्नी के लिए बहुत प्रिय होता है. वह संदेशवाहक का हृदय से सम्मान करती है और उसके संदेश को ध्यान से सुनती है. वियोग की स्थिति में, प्रिय का संदेश भी सांत्वना और खुशी देता है, जिससे प्रिय से मिलने की इच्छा और बढ़ जाती है.

(x) कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा। नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण॥
भावार्थ: जीवन में किसे हमेशा सुख या हमेशा दुःख मिला है? जीवन की स्थिति पहिये के किनारे की तरह कभी ऊपर और कभी नीचे जाती रहती है. अर्थात्, जीवन में सुख-दुःख का चक्र लगातार घूमता रहता है. संसार में कोई प्राणी हमेशा सुखी या हमेशा दुखी नहीं रहता. यह बताता है कि जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, इसलिए धैर्य बनाए रखना आवश्यक है. हर मुश्किल समय के बाद अच्छा समय जरूर आता है.

(xi) प्रत्युक्तं हि प्रणयिषु सतामीप्सितार्थक्रियैव॥
भावार्थ: सज्जन लोग अपने प्रियजनों के प्रति उनके इच्छित कार्य को करके ही उत्तर देते हैं. वे केवल कहकर नहीं, बल्कि करके दिखाते हैं. संसार में जो कहता है लेकिन करता नहीं, वह दुर्जन होता है; और जो कहता नहीं, केवल करके दिखाता है, वह सज्जन कहलाता है. जैसे मेघ शरद ऋतु में गरजता है पर बरसता नहीं, लेकिन वर्षा ऋतु में बिना गरजे ही बरसता है. यक्ष कहता है कि मेघ का मौन उसे आश्वस्त कर रहा है कि वह उसका कार्य अवश्य पूरा करेगा. यह कर्मठता और विश्वसनीयता के महत्व को बताता है.
In simple words: इन सभी पद्यांशों में जीवन के महत्वपूर्ण संदेश दिए गए हैं. ये बताते हैं कि प्रेम से लोग कैसे कमजोर होते हैं, अच्छे लोगों से मदद मांगना क्यों बेहतर है, आशा कैसे सहारा देती है, कृतज्ञता क्यों जरूरी है, मित्रों का काम कैसे करना चाहिए, धन का सही उपयोग क्या है, कुछ चीजें अपने आधार के बिना कैसे अधूरी हैं, दयालुता एक स्वाभाविक गुण है, प्रिय का संदेश कैसे खुशी देता है, जीवन में सुख-दुःख कैसे आते-जाते हैं, और सज्जन लोग काम करके कैसे जवाब देते हैं.

🎯 Exam Tip: भावार्थ लिखते समय, मूल संस्कृत पद्यांश का सीधा हिंदी अनुवाद न करें, बल्कि उसके गहरे अर्थ और संदेश को सरल और स्पष्ट भाषा में समझाएं. जीवन के संदर्भ में उसका महत्व भी बताएं.

 

प्रश्नः 3. अधोलिखितपद्यांशानाम् हिन्दीभाषया भावार्थं लिखत
(i) कामार्ता हि चेतनेषु॥
(ii) याचा मोघाः लब्धकामा ॥
(iii) आशाबन्धः रुणद्धि॥
(iv) ने क्षुदोऽपि तथोच्चः ॥
(v) मन्दायन्ते न "कृत्याः ॥
(vi) आपन्नार्ति ह्युत्तमानाम्॥
(vii) सूर्याऽपाये “स्वामभिख्याम्॥
(viii) प्रायः सर्वो रान्तरात्मा
(ix) कान्तोदन्तः किञ्चिदूनः ॥
(x) कस्यात्यन्तं चक्रनेमिक्रमेण ॥
(xi) प्रत्युक्तं हि क्रियैव ॥
Answer:
(ix) महिलाओं के लिए, पति के मित्र द्वारा लाया गया संदेश पति से मिलने जितना ही खुशी देता है। उन्हें संदेश सुनकर वैसी ही खुशी होती है जैसी पति से मिलकर होती है। पति का संदेश लाने वाला व्यक्ति और उसका संदेश पत्नी को बहुत प्यारा लगता है। वह उस संदेश लाने वाले का दिल से सम्मान करती है और उसकी बातें बहुत ध्यान से सुनती है। संदेश सुनकर उसे बहुत खुशी मिलती है। विरह में जी रही पत्नियों के लिए यह संदेश एक बड़ी राहत होता है, जो उन्हें हिम्मत देता है।
In simple words: पति के दोस्त से मिला संदेश पत्नी को बहुत खुशी देता है, लगभग पति से मिलने जितनी ही. पत्नी उसे ध्यान से सुनती है और सम्मान करती है.
(x) जीवन में किसी को भी हमेशा सुख या हमेशा दुःख नहीं मिलता। जीवन की स्थिति एक पहिये के किनारे की तरह है, जो कभी ऊपर तो कभी नीचे जाती रहती है। सुख और दुःख जीवन में बारी-बारी से आते-जाते रहते हैं। जैसे पहले हम खुश थे, अब दुखी हैं, और शाप खत्म होने पर फिर खुश होंगे। इसलिए धैर्य रखना बहुत जरूरी है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि हर बदलाव एक नया अनुभव लेकर आता है, चाहे वह सुखद हो या दुखद।
In simple words: जीवन में सुख-दुख हमेशा आते-जाते रहते हैं, जैसे पहिये का किनारा ऊपर-नीचे होता है. हमें मुश्किल समय में हिम्मत रखनी चाहिए.
(xi) संसार में जो व्यक्ति केवल बातें करता है लेकिन काम नहीं करता, उसे बुरा व्यक्ति कहते हैं। लेकिन जो व्यक्ति बिना बोले ही अपना काम कर देता है, उसे अच्छा व्यक्ति कहते हैं। जैसे, एक बुरा व्यक्ति बोलता है पर करता नहीं, जबकि एक अच्छा व्यक्ति बिना बोले ही कर देता है। मेघ के बारे में भी यही बात सच है कि वह शरद ऋतु में केवल गरजता है, बरसता नहीं, लेकिन वर्षा ऋतु में बिना गरजे ही बरस जाता है। यक्ष मेघ से कहता है कि उसकी चुप्पी यह भरोसा दिला रही है कि वह अपना काम जरूर करेगा। अक्सर, कर्मठता शब्दों से कहीं अधिक मूल्यवान होती है, खासकर भरोसेमंद रिश्तों में।
In simple words: बुरे लोग सिर्फ बातें करते हैं, अच्छे लोग काम करते हैं. जैसे बादल गरजते नहीं पर बरसते हैं. यक्ष को मेघ की चुप्पी पर भरोसा है कि वह काम करेगा.

🎯 Exam Tip: भावार्थ लिखते समय मूल पद्यांश के सभी मुख्य बिंदुओं को सरल और स्पष्ट भाषा में समझाना महत्वपूर्ण है।

 

प्रश्न 4. अधोलिखितपद्यानाम् अन्वयं लिखत
(i) कश्चित् कान्ता ..................................................... रामगिर्याश्रमेषु ॥
(ii) जातं वंशे ..................................................... लब्धकामा।
(iii) तं चेद्वायौ ..................................................... ह्युत्तमानाम् ॥
(iv) इत्याख्याते ..................................................... किंचिदूनः।
(v) नन्वात्मानं ..................................................... चक्रनेमिक्रमेण ॥
Answer: इन पद्यों के अन्वय को समझने के लिए, दिए गए हिंदी अनुवादों का ध्यानपूर्वक अध्ययन करें। अन्वय पद्य के शब्दों को गद्य के रूप में क्रमबद्ध करना होता है, जिससे उसका अर्थ स्पष्ट हो जाए।
In simple words: अन्वय जानने के लिए, इन कविताओं का हिंदी अनुवाद देखें और शब्दों को सही क्रम में समझें.

🎯 Exam Tip: अन्वय करते समय क्रियापद को अंत में रखने और सभी कारकों को सही जगह पर लगाने का ध्यान रखें।

 

प्रश्नः 5. पाठ्यपुस्तकाधारितं भाषिककार्यम्
(क) कर्तृक्रियापदचयनम्प्रश्नः-अधोलिखितपद्यांशेषु कर्तृक्रियापदयोः चयनं कुरुत
(i) कश्चित् यक्षः रामगिर्याश्रमेषु वसतिं चक्रे।
(ii) औत्सुक्यात् गुह्यकः तं तयाचे।
(iii) कामार्ताः चेतनाऽचेतनेषु प्रकृतिकृपणाः भवन्ति।
(iv) दूरबन्धुः अहम् त्वयि अर्थित्वं गतः।
(v) त्वम् भ्रातृजायाम् अवश्यं द्रक्ष्यसि।
(vi) आम्रकूटः त्वाम् साधु मूर्ना वक्ष्यति।
(vii) भवान् सूर्ये दृष्टे पुनरपि अध्वशेषं वाहयेत्।
(viii) सूर्यापाये कमलं स्वामभिख्यां न पुष्यति।
(ix) सा उन्मुखी त्वां वीक्ष्य श्रोष्यति एव।
Answer:
(iii) कामार्ताः - भवन्ति
(iv) दूरबन्धुः अहम् - गतः
(v) त्वम् - द्रक्ष्यसि
(vi) आम्रकूटः - वक्ष्यति
(vii) भवान् - वाहयेत्
(viii) कमलम् - पुष्यति
(ix) सा उन्मुखी - श्रोष्यति
(x) अहम् - अवलम्बे
In simple words: प्रत्येक वाक्य में काम करने वाले (कर्ता) और उस काम को दर्शाने वाले (क्रिया) शब्दों को पहचानें। कर्ता वह होता है जो क्रिया करता है।

🎯 Exam Tip: कर्ता और क्रिया का सही मेल (वचन, पुरुष) व्याकरण की शुद्धता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

 

(ख) विशेषणविशेष्यचयनम्
प्रश्नः (i) ‘अस्तङ्गमितमहिमा यक्षः रामगिर्याश्रमेषु वसतिं चक्रे।' इत्यत्र 'यक्षः इत्यस्य विशेषणपदं किम्?
Answer: अस्तङ्गमितमहिमा। यक्ष का महिमा अस्त हो गई है।
In simple words: 'अस्तङ्गमितमहिमा' शब्द 'यक्ष' की विशेषता बता रहा है, यानी कैसा यक्ष।

🎯 Exam Tip: विशेषण हमेशा विशेष्य के लिंग, वचन और विभक्ति के अनुसार ही होता है।

 

प्रश्नः (ii) 'पटुकरणैः प्राणिभिः प्रापणीयाः सन्देशार्थाः क्व?' इत्यत्र 'पटुकरणैः' इत्यस्य विशेष्यपदं किम्?
Answer: प्राणिभिः। 'पटुकरणैः' यानी 'तेज इंद्रियों वाले' शब्द 'प्राणिभिः' यानी 'प्राणियों' की विशेषता बता रहा है।
In simple words: 'पटुकरणैः' शब्द 'प्राणिभिः' की विशेषता है, इसलिए 'प्राणिभिः' विशेष्य है।

🎯 Exam Tip: विशेष्य वह शब्द है जिसकी विशेषता बताई जाती है, और विशेषण वह शब्द है जो विशेषता बताता है।

 

प्रश्नः (iii) त्वां मघोनः कामरूपं प्रकृतिपुरुषं जानामि' इत्यत्र 'कामरूपम्' इत्यस्य विशेष्यपदं किम्?
Answer: प्रकृतिपुरुषम्। 'कामरूपम्' यानी 'इच्छानुसार रूप धारण करने वाला' शब्द 'प्रकृतिपुरुषम्' की विशेषता है।
In simple words: 'कामरूपम्' शब्द 'प्रकृतिपुरुषम्' की विशेषता है, इसलिए 'प्रकृतिपुरुषम्' विशेष्य है।

🎯 Exam Tip: वाक्य में विशेषण और विशेष्य को पहचानना अर्थ समझने में बहुत मदद करता है।

 

प्रश्नः (iv) 'अधिगुणे मोघा याञ्चा वरम्।' इत्यत्र विशेषणपदं किम्?
Answer: मोघा। 'मोघा' शब्द 'याञ्चा' यानी 'याचना' की विशेषता बताता है, जिसका अर्थ है 'व्यर्थ' या 'निष्फल'।
In simple words: 'मोघा' शब्द 'याञ्चा' की विशेषता है, यह बताता है कि याचना कैसी है।

🎯 Exam Tip: विशेषण हमेशा संज्ञा या सर्वनाम के बारे में अतिरिक्त जानकारी देता है।

 

प्रश्नः (v) 'दूरबन्धुः अहं त्वयि अर्थित्व गतः।' इत्यत्र विशेष्यपदं किम्?
Answer: अहम्। 'दूरबन्धुः' शब्द 'अहम्' यानी 'मैं' की विशेषता बता रहा है, जिसका अर्थ है 'जिसका कोई मित्र दूर हो'।
In simple words: 'दूरबन्धुः' शब्द 'अहम्' की विशेषता बता रहा है, इसलिए 'अहम्' विशेष्य है।

🎯 Exam Tip: विशेष्य कभी-कभी एक सर्वनाम भी हो सकता है, जिसकी विशेषता विशेषण द्वारा बताई जाती है।

 

प्रश्नः (vii) 'आशाबन्धः सघः पाति प्रणयि हृदयं रुणाब्दि।' इत्यत्र विशेषणपदं किम्?
Answer: हृदयम्। 'प्रणयि' शब्द 'हृदयम्' की विशेषता बताता है, लेकिन यहाँ उत्तर में स्वयं 'हृदयम्' को ही विशेषणपद बताया गया है, जो कि यहाँ 'आशा' के बंधन से जुड़े होने को दर्शाता है।
In simple words: यहाँ 'हृदयम्' शब्द को विशेषणपद के रूप में बताया गया है, जो 'प्रणयि' (प्रेमपूर्ण) होने के संदर्भ में है।

🎯 Exam Tip: कुछ विशेष स्थितियों में, एक संज्ञा भी वाक्य में विशेषण की भूमिका निभा सकती है या विशेषण और विशेष्य एक ही शब्द से जुड़े हो सकते हैं।

 

प्रश्नः (viii) 'अधुना मद्वियोगेन क्षामच्छायं भवनं लक्ष्येथाः।' इत्यत्र विशेषणपदं किम्?
Answer: क्षामच्छायम्। 'क्षामच्छायम्' शब्द 'भवनं' यानी 'घर' की विशेषता है, जिसका अर्थ है 'जिसकी परछाईं फीकी पड़ गई हो'।
In simple words: 'क्षामच्छायम्' शब्द 'भवनं' की विशेषता है, यह बताता है कि भवन कैसा है।

🎯 Exam Tip: विशेषण को पहचानने के लिए 'कैसा?' या 'कैसी?' जैसे प्रश्न पूछें।

 

प्रश्नः (ix) 'त्वामपि नवजलमयम् अस्त्रम् मोचयिष्यति।' इत्यत्र विशेषणपदं किम्?
Answer: नवजलमयम्। 'नवजलमयम्' शब्द 'अस्त्रम्' यानी 'आँसुओं' की विशेषता है, जिसका अर्थ है 'नए जल से भरे हुए'।
In simple words: 'नवजलमयम्' शब्द 'अस्त्रम्' की विशेषता है, यह बताता है कि आँसू कैसे हैं।

🎯 Exam Tip: विशेषण शब्द अक्सर विशेष्य से पहले आता है, लेकिन कभी-कभी उसके बाद भी आ सकता है।

 

प्रश्नः (x) 'त्वमपि नितरां कातरत्वं मा गमः इत्यत्र विशेष्यपदं किम्?
Answer: कातरत्वम्। 'नितरां' शब्द 'कातरत्वम्' यानी 'कायरता/घबराहट' की विशेषता है। यहाँ 'कातरत्वम्' ही विशेष्य है।
In simple words: 'कातरत्वम्' वह शब्द है जिसकी विशेषता 'नितरां' (बहुत अधिक) बता रहा है।

🎯 Exam Tip: विशेष्य पद वह होता है जिसके गुण या दोष का वर्णन विशेषण करता है।

 

(घ) समानविलोमपदचयनम्
प्रश्नः अधोलिखितवाक्येषु रेखांङ्गितपदानां पर्यायबोधकपदानि लिखत
1. जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु तरुषु वसतिं चक्रे।
2. धूमज्योतिः सलिल-मरुतां सन्निपातः मेघः क्व?
Answer:
1. वृक्षेषु
2. वारिदः, जलदः।
In simple words: दिए गए शब्दों के समान अर्थ वाले शब्द लिखें।

🎯 Exam Tip: पर्यायवाची शब्दों को याद करने से शब्दावली बढ़ती है और भाषा का प्रयोग अधिक प्रभावी होता है।

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RBSE Solutions Class 12 Sanskrit Chapter 5 मेघदूतपीयूषम्

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