Step-by-Step Textbook Solutions for Class 12 Sanskrit Chapter 01 मङ्गलाचरणम्
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RBSE Class 12 Sanskrit विजेत्री Chapter 1 वस्तुनिष्ठ प्रश्नाः
Question 1. अस्य पाठस्य प्रथममन्त्रः कस्माद् ग्रन्थाद् उद्धृतोऽस्ति
(क) ऐतरेयोपनिषदः शान्तिपाठात्
(ख) तैत्तिरीयोपनिषदः शान्तिपाठात्
(ग) कठोपनिषदः शान्तिपाठात्
(घ) ऋग्वेदस्य प्रथममण्डलतः
Answer: (घ) ऋग्वेदस्य प्रथममण्डलतः
In simple words: इस पाठ का पहला मंत्र ऋग्वेद के पहले मंडल से लिया गया है। यह प्राचीन वेद ज्ञान का एक हिस्सा है।
🎯 Exam Tip: वेदों और उपनिषदों से उद्धृत मंत्रों के स्रोत को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ऐसे प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
Question 2. अस्य पाठस्य प्रथममन्त्रस्य ऋषिः कः अस्ति?
(क) संवननः
(ख) विश्वामित्रः
(ग) वसिष्ठः
(घ) भरद्वाजः
Answer: (ख) विश्वामित्रः
In simple words: इस पाठ के पहले मंत्र के रचयिता ऋषि विश्वामित्र हैं। ऋषि मंत्रों को देखते और समझते थे।
🎯 Exam Tip: मंत्रों के ऋषियों के नाम याद करना आवश्यक है, क्योंकि यह उनकी मूल रचना से जुड़ा है।
Question 3. ओङ्कारपदस्य अर्थः कः?
(क) मोक्षः
(ख) ब्रह्मसेवकः
(ग) सच्चिदानन्दः
(घ) अभिषेकः
Answer: (ग) सच्चिदानन्दः
In simple words: 'ओङ्कार' शब्द का मतलब सच्चिदानन्द है, जो सत्य, चेतना और आनंद का प्रतीक है। यह ईश्वर का मूल स्वरूप है।
🎯 Exam Tip: 'ओङ्कार' जैसे महत्वपूर्ण शब्दों के शाब्दिक अर्थ और उनके आध्यात्मिक महत्व को समझें।
Question 4. ॐ सह नाववतु वाक्ये 'नौ' पदस्य अर्थः कः?
(क) नावौ
(ख) नद्यौ
(ग) शिवरामौ
(घ) गुरुशिष्यौ
Answer: (घ) गुरुशिष्यौ
In simple words: 'ॐ सह नाववतु' वाक्य में 'नौ' का अर्थ गुरु और शिष्य दोनों हैं। यह मंत्र दोनों के साथ मिलकर बढ़ने की कामना करता है।
🎯 Exam Tip: संस्कृत वाक्यों में सर्वनामों के बहुवचन और द्विवचन रूपों के अर्थ को समझना महत्वपूर्ण है।
RBSE Class 12 Sanskrit विजेत्री Chapter 1 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्नाः
Question 1. 'दाशुषे' इत्यस्य पदस्य अर्थः कः?
Answer: 'दाशुषे' पद का अर्थ 'हवि देने वाले यजमान के लिए' होता है। यह उस व्यक्ति को दर्शाता है जो यज्ञ में आहुति देता है।
In simple words: 'दाशुषे' मतलब उस व्यक्ति के लिए जो यज्ञ में कुछ अर्पित करता है।
🎯 Exam Tip: संस्कृत के कठिन शब्दों का अर्थ याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर वे जो वैदिक संदर्भों में उपयोग होते हैं।
Question 2. तेजस्वि किं अस्तु?
Answer: अधीतम् अर्थात् 'ज्ञान' तेजस्वि हो। यहां ज्ञान को तेजस्वी और प्रभावशाली बनाने की कामना की गई है, ताकि वह प्रकाशमान हो।
In simple words: पढ़ा हुआ ज्ञान तेजस्वी हो।
🎯 Exam Tip: इस तरह के प्रश्नों में, आपको अक्सर एक संक्षिप्त और सीधा उत्तर देना होता है जो मुख्य बिंदु को पकड़ ले।
Question 3. अहं किं वदिष्यामि ?
Answer: मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म को वदिष्यामि अर्थात् 'मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म को कहूँगा'। यह मंत्र उस सत्य के प्रति निष्ठा को दर्शाता है जो अनुभवगम्य है।
In simple words: मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म के बारे में बोलूँगा।
🎯 Exam Tip: संस्कृत में क्रियापदों के पुरुष और वचन को सही ढंग से समझना आवश्यक है ताकि वाक्य का सही अर्थ निकल सके।
Question 5. मम वाणी कुत्र प्रतिष्ठिता भवतु?
Answer: मम वाणी मनसि प्रतिष्ठिता भवतु अर्थात् 'मेरी वाणी मन में प्रतिष्ठित हो'। यह कामना की गई है कि वाणी हमेशा मन के विचारों के अनुरूप हो, जिससे बोलने में शुद्धता आए।
In simple words: मेरी वाणी मन में रहे।
🎯 Exam Tip: इस प्रकार के प्रश्नों में, आपको आमतौर पर एक ही शब्द या एक छोटा वाक्यांश उत्तर के रूप में देना होता है।
RBSE Class 12 Sanskrit विजेत्री Chapter 1 लघूत्तरात्मक प्रश्नाः
Question 1. प्रथममन्त्रस्य संस्कृतव्याख्या कर्तव्या?
Answer: प्रथम मंत्र मूल रूप से ऋग्वेद के प्रथम मंडल के प्रथम सूक्त से लिया गया है। इस मंत्र के ऋषि विश्वामित्र हैं, देवता अग्नि हैं और छंद गायत्री है। इस मंत्र में ऋषि विश्वामित्र हवि देने वाले यजमान के कल्याण के लिए अग्निदेव से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे अग्निदेव! यदि आप हवि देने वाले यजमान के लिए कल्याणकारी पदार्थ प्रदान करना चाहते हैं, तो वह कल्याणकारी सभी पदार्थ आप ही प्राप्त कराएं। आपकी विशेष कृपा ही सत्य का स्वरूप है।
In simple words: पहला मंत्र ऋग्वेद से है। ऋषि विश्वामित्र ने अग्निदेव से प्रार्थना की है कि वे यज्ञ करने वाले व्यक्ति का भला करें। अग्निदेव ही कल्याणकारी चीजें दे सकते हैं।
🎯 Exam Tip: मंत्रों की व्याख्या करते समय, उनके मूल ग्रंथ, ऋषि, देवता और छंद का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है, साथ ही सरल भाषा में भावार्थ भी बताना चाहिए।
Question 2. द्वितीयमन्त्रस्य संस्कृतव्याख्या कर्तव्या?
Answer: दूसरा मंत्र मूलतः ऋग्वेद के दशम मंडल के संज्ञान सूक्त से उद्धृत है। इस मंत्र में ऋषि संवनन सभी लोगों के बीच सहयोग की भावना विकसित करने और आपसी मतभेद दूर करने का आवाहन करते हुए कहते हैं कि हे स्तुति करने वालों! जिस प्रकार पहले समय में देवताओं ने अच्छी तरह से जानकर अपने-अपने भाग को स्वीकार किया था, उसी प्रकार आप सभी को साथ चलना चाहिए, साथ बोलना चाहिए, अर्थात् आप सभी की वाणी एक जैसी हो, आपके कथनों में परस्पर विरोध न हो, आपके मन समान रूप से विचारवान हों, अर्थात् आपके विचारों में मतभेद नहीं होना चाहिए। इस मंत्र का उद्देश्य समाज में एकता और सद्भाव स्थापित करना है।
In simple words: दूसरा मंत्र ऋग्वेद के संज्ञान सूक्त से लिया गया है। ऋषि संवनन चाहते हैं कि सब लोग मिलकर रहें, एक-दूसरे की बात सुनें और मन में कोई लड़ाई न हो। जैसे देवता मिलकर काम करते थे, वैसे ही हमें भी करना चाहिए।
🎯 Exam Tip: मंत्रों के सामाजिक और नैतिक संदेश को स्पष्ट करना आवश्यक है, खासकर जब वे एकता या सद्भाव पर जोर देते हों।
Question 3. अस्य पाठस्य सारः संक्षेपेण लेखनीयः।
Answer:
पाठ परिचय: हमारी भारतीय संस्कृति मंगलमयी है। यहाँ सभी कार्यों की निर्विघ्न समाप्ति के लिए मंगलाचरण होता है। इसलिए अध्यापन में संलग्न गुरुओं को, अध्ययन में लीन छात्रों को मंगलकारी मंत्रों के ज्ञान और स्मरण के लिए यह मंगलाचरण-पाठ प्रस्तुत किया गया है। यह पाठ छात्रों को वैदिक ज्ञान की महत्ता से परिचित कराता है।
In simple words: यह पाठ भारतीय संस्कृति के मंगलाचरण के बारे में है। इसमें गुरुओं और छात्रों को शुभ मंत्रों का ज्ञान दिया गया है ताकि सब काम बिना किसी रुकावट के पूरे हों।
🎯 Exam Tip: पाठ के सार को संक्षेप में लिखते समय, मुख्य विचारों और उसके उद्देश्य को स्पष्ट और सरल शब्दों में प्रस्तुत करें।
तृतीय मंत्र ऐतरेयोपनिषद् के शांतिपाठ से उद्धृत है। इस मंत्र में सभी विघ्नों की शांति के लिए परमात्मा से प्रार्थना की गई है और वाणी व मन की एकरूपता होवे-ऐसी कामना की गई है। यह मानसिक शांति और एकाग्रता के महत्व को बताता है।
चतुर्थ मंत्र तैत्तिरीयोपनिषद् की शिक्षावल्ली के बारहवें अनुवाद से उद्धृत है। यह मंत्र ऋग्वेद के 1/9 मंडल में, यजुर्वेद के 36/9 स्थल में और अथर्ववेद के 19/9/6 स्थल में भी उल्लेखित है। इसमें प्रार्थना की गई है कि परमेश्वर कल्याण करें और गुरु-शिष्यों की लक्ष्य-प्राप्ति में निर्विघ्नता करें। यह गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व पर प्रकाश डालता है।
पंचम मंत्र कठोपनिषद् के शांति-पाठ से संकलित है। इसमें सहयोग की भावना के साथ ही उत्कृष्ट सामर्थ्य प्राप्ति की भी कामना है। यह मंत्र सामूहिक प्रयास और शक्तिवर्धन के लिए प्रेरित करता है।
Question 4. अनेन पाठानुसारेण के कान् च अवन्तु?
Answer: इस पाठ के अनुसार सच्चिदानन्दः परमात्मा, सूर्यदेवः, वरुणः, विष्णुः, ब्रह्मा, इन्द्रः, बृहस्पतिः इत्यादि देवता, स्तोतारम् (स्तुति करने वाले) और गुरुशिष्यौ (गुरु और शिष्य) दोनों की रक्षा करें। यह दिखाता है कि सभी देवता सभी की भलाई के लिए मिलकर काम करते हैं।
In simple words: इस पाठ के अनुसार, परमात्मा, सूर्य, वरुण, विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, बृहस्पति जैसे देवता स्तुति करने वाले और गुरु-शिष्य दोनों की रक्षा करें।
🎯 Exam Tip: पाठ में वर्णित विभिन्न देवताओं और उनके कार्यों को याद रखें, क्योंकि यह उनके महत्व को समझने में मदद करता है।
RBSE Class 12 Sanskrit विजेत्री Chapter 1 व्याकरणात्मक प्रश्नाः
Question 1. अधोलिखितपदेषु सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धेर्नामपि लेखनीयम्।
Answer:
| सन्धिपदम् | विग्रहः | सन्धिर्नाम |
|---|---|---|
| (क) वाङ्मे | वाक्+मे | हल् सन्धिः (अनुस्वार०) |
| (ख) नाववतु | नौ+अवतु | अयादि० |
| (ग) तन्मामवतु | तत्+माम्+अवतु | हल्०, अनुस्वार० |
| (घ) ब्रह्मासि | ब्रह्मा+असि | दीर्घ० |
| (ङ) तद्वक्तारम् | तत्+वक्तारम् | हल्० (जश्त्व) |
In simple words: संधि का मतलब दो शब्दों को जोड़ना है। इसमें हर शब्द को तोड़कर (विग्रह करके) दिखाया गया है और बताया गया है कि कौन सी संधि का नियम लगा है।
🎯 Exam Tip: संधि विच्छेद और संधि के नाम को सही ढंग से पहचानने के लिए नियमों को ध्यान से समझना महत्वपूर्ण है।
Question 2. अधोलिखितपदेषु उपसर्गः-प्रकृतिः प्रत्ययश्च लिखत।
Answer:
| पदम् | उपसर्ग | प्रकृति | प्रत्यय |
|---|---|---|---|
| पपगारन् | पपगारन् (यह पद अस्पष्ट है, इसे छोड़ दिया जाएगा) | - | - |
| (ङ) अधीतम् | अधि | इङ् | क्त |
| (च) संवदध्वम् | सम् | वद् | ध्वम् (मध्यम०, बहुवचनम्) |
In simple words: शब्दों को बनाने वाले छोटे-छोटे हिस्सों को समझना ज़रूरी है। यहाँ उपसर्ग (शब्द से पहले लगने वाला), प्रकृति (मूल धातु) और प्रत्यय (शब्द के बाद लगने वाला) को अलग-अलग करके दिखाया गया है।
🎯 Exam Tip: उपसर्ग, प्रकृति और प्रत्यय को पहचानना संस्कृत व्याकरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है; इससे शब्दों के अर्थ को समझने में मदद मिलती है।
Question 3. अधोलिखितपदेषु धातुः लकारः पुरुषः वचनञ्च लिखत।
Answer:
| पदम् | धातुः | लकारः | पुरुषः | वचनम् |
|---|---|---|---|---|
| (क) एधि | एध् | लोट् | प्रथमः | एकवचनम् |
| (ख) भवतु | भू | लोट् | प्रथमः | एकवचनम् |
| (ग) असि | अस् | लट् | मध्यमः | एकवचनम् |
| (घ) भुनक्तु | भुज् | लोट् | प्रथमः | एकवचनम् |
| (ङ) करवावहै | कृ | लोट् | उत्तमः | द्विवचनम् |
| (च) अस्तु | अस् | लोट् | प्रथमः | एकवचनम् |
In simple words: संस्कृत में क्रियापदों को समझने के लिए धातु (मूल क्रिया), लकार (काल), पुरुष (कौन बोल रहा है) और वचन (कितने लोग) को जानना ज़रूरी है। यह तालिका इन सभी को दिखाती है।
🎯 Exam Tip: धातु, लकार, पुरुष और वचन की सही पहचान क्रियापदों के सटीक अनुवाद और व्याकरणिक शुद्धता के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 4. निम्नलिखित पदानि प्रयुज्य वाक्यनिर्माणं कर्त्तव्यम।
Answer:
(क) वाक् - मे वाक् मनसि प्रतिष्ठिता भवतु। (मेरी वाणी मन में प्रतिष्ठित हो।) वाणी का मन से संबंध उसकी शुद्धता के लिए जरूरी है।
(ख) भुनक्तु - सह नौ भुनक्तु। (हम दोनों की रक्षा करें।)
(ग) वदिष्यामि - अहं कदापि असत्यं न वदिष्यामि। (मैं कभी असत्य नहीं बोलूँगा।)
(घ) अमृतम् - अहम् अमृतं प्राप्नोमि। (मैं अमृत प्राप्त करता हूँ।)
(ङ) माम् - हे परमेश्वर ! माम् रक्षतु। (हे परमेश्वर! मेरी रक्षा करो।)
In simple words: यहाँ दिए गए शब्दों का उपयोग करके संस्कृत में वाक्य बनाए गए हैं। हर वाक्य में एक शब्द का सही उपयोग दिखाया गया है।
🎯 Exam Tip: वाक्य निर्माण करते समय, दिए गए शब्द का सही विभक्ति और वचन में प्रयोग करना सुनिश्चित करें ताकि वाक्य का अर्थ स्पष्ट हो।
Question 5. निम्नलिखित वाक्येषु वाच्यपरिवर्तनं करणीयम्।
Answer:
(क) अहं सत्यं वदिष्यामि = मया सत्यं वदिष्ये। (मैं सत्य कहूँगा - मेरे द्वारा सत्य कहा जाएगा।)
(ख) वरुणः सर्वान् रक्षति = वरुणेन सर्वे रक्ष्यन्ते। (वरुण सबकी रक्षा करता है - वरुण के द्वारा सबकी रक्षा की जाती है।)
(ग) भवान् विद्यालयं गच्छति = भवता विद्यालयं गम्यते। (आप विद्यालय जाते हैं - आपके द्वारा विद्यालय जाया जाता है।)
(घ) सः शान्तिं प्राप्नोति = तेन शान्तिः प्राप्यते। (वह शांति प्राप्त करता है - उसके द्वारा शांति प्राप्त की जाती है।)
(ङ) वयं संस्कृतं पठामः = अस्माभिः संस्कृतं पठ्यते। (हम संस्कृत पढ़ते हैं - हमारे द्वारा संस्कृत पढ़ी जाती है।) वाच्य परिवर्तन से वाक्य की बनावट बदल जाती है, लेकिन अर्थ वही रहता है।
In simple words: यहाँ वाक्यों को एक वाच्य से दूसरे वाच्य में बदला गया है, जैसे 'मैं करता हूँ' से 'मेरे द्वारा किया जाता है'।
🎯 Exam Tip: वाच्य परिवर्तन के नियमों को समझना बहुत महत्वपूर्ण है, खासकर कर्ता, कर्म और क्रिया के रूपों में होने वाले बदलावों को।
RBSE Class 12 Sanskrit विजेत्री Chapter 1 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
Question. निम्नलिखित संस्कृत शब्दों के अर्थ लिखिए।
Answer:
(ii) भद्रम् - कल्याणकारी पदार्थ।
(iii) सञ्जानाना - अच्छी प्रकार से जानते हुए।
(iv) आविः - हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर।
(v) आणीस्थः - लाने वाले होवें।
(vi) अहोरात्रान् - दिन-रात।
(vii) मित्रः - मित्र (सूर्य) देवता।
(viii) शम् - कल्याणकारी होवे।
(ix) अर्यमा - नेत्र और सूर्यमण्डल के अधिष्ठाता।
(x) अवतु - रक्षा करें। संस्कृत शब्दों के अर्थ समझने से पाठ का भावार्थ बेहतर समझ में आता है।
In simple words: यह कुछ संस्कृत शब्द हैं और उनके हिंदी अर्थ दिए गए हैं। यह शब्दार्थ पाठ को समझने में मदद करते हैं।
🎯 Exam Tip: संस्कृत के महत्वपूर्ण शब्दों और उनके अर्थों को याद करना परीक्षा में बहुत सहायक होता है, खासकर जब गद्यांशों का अनुवाद करना हो।
Question 2. कालांकितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
Answer:
1. त्वम् कस्मै भद्रं करिष्यसि? (तुम किसके लिए कल्याण करोगे?)
2. तव किम् इत्? (तुम्हारा क्या है?)
3. पूर्वे सज्जानानाः देवाः भागं कुत्र उपासते? (पहले सज्जन देवता भाग की कहाँ उपासना करते हैं?)
4. यूयम् केन सह गच्छध्वम्? (तुम किसके साथ जाओगे?)
5. वः कानि संजानताम्? (तुम्हारे क्या समान ज्ञान वाले हों?)
6. मे का मनसि प्रतिष्ठिता भवतु? (मेरी क्या मन में प्रतिष्ठित हो?)
7. मे मनः कुत्र प्रतिष्ठितं भवतु? (मेरा मन कहाँ प्रतिष्ठित हो?)
8. मे कस्य आणीस्थः? (मेरे किसके लाने वाले हो?)
9. अनेन अधीतेन कान् संदधामि? (इस पढ़े हुए से मैं किसको धारण करता हूँ?)
10. अहं किम् वदिष्यामि? (मैं क्या बोलूँगा?)
11. अहं किम् वदिष्यामि? (मैं क्या बोलूँगा?)
12. तत् कम् अवतु? (वह किसकी रक्षा करे?)
13. कम् वक्तारम् अवतु? (वह किसकी रक्षा करे?)
14. त्वम् एव प्रत्यक्षं किम् असि? (तुम ही प्रत्यक्ष क्या हो?)
15. कः सह भुनक्तु? (कौन साथ-साथ रक्षा करे?) प्रश्न निर्माण से वाक्यों को गहराई से समझने में मदद मिलती है।
In simple words: यहाँ दिए गए वाक्यों से प्रश्न बनाए गए हैं। इसमें मूल वाक्य के अर्थ को समझते हुए 'क्या', 'कौन', 'कहाँ' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके सवाल पूछा गया है।
🎯 Exam Tip: प्रश्न निर्माण करते समय, कालांकित शब्द की विभक्ति, वचन और लिंग का ध्यान रखना चाहिए ताकि सही प्रश्नवाचक शब्द का प्रयोग हो सके।
Question 3. अधोलिखितानां मन्त्रांशानां वाक्यानां भावार्थं लिखते
(क) संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
(ख) वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठितो मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम्।
(ग) तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।
Answer:
(क) भावार्थ-प्रस्तुत मन्त्रांश ऋग्वेद के दशम मंडल के संज्ञानसूक्त से उद्धृत है। ऋषि संवनन ने इस मन्त्रांश में वैचारिक मतभेदों को भुलाकर सभी सांसारिक प्राणियों को एकमत होने की प्रेरणा देते हुए कहा है कि हे स्तुति करने वालो! जैसे पूर्व में सभी देवता एकमत होकर अपने-अपने तत्त्व भाग को ग्रहण करते थे, उसी प्रकार तुम सब भी साथ-साथ मिलकर चलो, साथ मिलकर बोलो अर्थात् तुम सब लोगों की वाणी एक जैसी हो, कथनों में परस्पर विरोध न हो, तुम लोगों के मन समान रूप से विचारवान् हों अर्थात् तुम्हारे विचारों में मत-भिन्नता नहीं होनी चाहिए। यह मंत्र सामाजिक एकता और सद्भाव का संदेश देता है।
(ख) भावार्थ-प्रस्तुत मन्त्रांश ऐतरेयोपनिषद् के शांति पाठ से उद्धृत है। इस मन्त्रांश में वाणी एवं मन की एकरूपता होने की कामना करते हुए कहा गया है कि- हे सच्चिदानन्द परमात्मा! मेरी वाणी मन में प्रतिष्ठित होवे और मेरा मन वाणी में प्रतिष्ठित होवे, अर्थात् मन और वाणी एकरूपता को प्राप्त होवे, जिससे मेरे संकल्प (विचार) और वचन (वाणी) पूर्णतः शुद्धरूप से एक होकर ज्ञानरूपी लक्ष्य को प्राप्त करें। यह मानसिक एकाग्रता और वाणी की पवित्रता का महत्व दर्शाता है।
(ग) भावार्थ-प्रस्तुत मन्त्रांश कठोपनिषद् के शांति पाठ से उद्धृत है। इस मंत्रांश में परस्पर सहयोग एवं उत्कृष्टता की कामना करते हुए कहा गया है कि-हे परमात्मा! हम दोनों गुरु-शिष्य की सभी प्रकार से रक्षा करो। हम दोनों द्वारा प्राप्त ज्ञान (विद्या) तेजस्विनी होवे अर्थात् हम कहीं भी परास्त नहीं होवें हम दोनों के हृदय में हमेशा प्रेम-भाव रहे, द्वेष कभी नहीं होवे। यहाँ गुरु-शिष्य के मधुर एवं पावन सम्बन्ध को दर्शाया गया है। यह शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग और प्रेम के महत्व को बताता है।
In simple words: (क) यह मंत्र कहता है कि सभी लोग मिलकर चलें, मिलकर बोलें और सबके मन एक जैसे हों ताकि कोई झगड़ा न हो।
(ख) यह मंत्र चाहता है कि मेरी वाणी मन में और मेरा मन वाणी में रहे, ताकि जो सोचूँ वही बोलूँ और सत्य प्राप्त करूँ।
(ग) यह मंत्र गुरु और शिष्य के लिए कहता है कि वे एक-दूसरे की रक्षा करें, उनका ज्ञान तेजस्वी हो, और उनके बीच कभी कोई नफरत न हो।
🎯 Exam Tip: मंत्रों के भावार्थ को लिखते समय, मूल संदेश को सरल और स्पष्ट भाषा में व्यक्त करना चाहिए, साथ ही उसके स्रोत और महत्व को भी बताना चाहिए।
Question 4. अधोलिखितमन्त्रयोः अन्वयं लिखत
(क) यदङ्ग दाशुषे त्वेत्तत्सत्यमङ्गिरः॥
Answer: (क) यदङ्ग दाशुषे त्वेत्तत्सत्यमङ्गिरः॥
अन्वयः – (हे) अङ्गः दाशुषे तत् त्वेत् (अग्ने) सत्यम् अङ्गिरः (अस्ति)। (हे अग्निदेव! जो हवि देने वाले यजमान के लिए तुम चाहते हो, वही सत्य है।)
In simple words: हे अग्निदेव, आप हवि देने वाले के लिए जो चाहते हैं, वही सच्चा है।
🎯 Exam Tip: अन्वय लिखते समय, वाक्य के शब्दों को व्याकरणिक क्रम में व्यवस्थित करें ताकि उसका अर्थ स्पष्ट हो जाए।
(i) कर्तृक्रियापदचयनम्
Question. अधोलिखितमन्त्रांशेषु कर्तृक्रियापदचयनं कुरुत
(क) यत् त्वम् दाशुषे भद्रम् करिष्यसि।
(ख) देवी भागं यथा पूर्वे सज्जानाना उपासते।
(ग) से वो मनांसि जानताम्।
(घ) वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता।
(ङ) त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
(च) ॐ सह नाववतु
Answer:
| कर्तृपदम् | क्रियापदम् |
|---|---|
| (क) त्वम् | करिष्यसि |
| (ख) देवाः | उपासते |
| (ग) वः | जानताम् |
| (घ) वाङ् | प्रतिष्ठिता |
| (ङ) त्वम् | असि |
| (च) नौ | अवतु |
In simple words: हर वाक्य में कर्ता (जो काम कर रहा है) और क्रिया (जो काम किया जा रहा है) को अलग-अलग करके दिखाया गया है। यह वाक्य की मूल संरचना को समझने में मदद करता है।
🎯 Exam Tip: कर्ता और क्रियापद को सही ढंग से पहचानना वाक्य के अर्थ को समझने और व्याकरणिक रूप से सही उत्तर देने के लिए महत्वपूर्ण है।
(ii) विशेषण-विशेष्यचयनम्
Question. (क) "यथापूर्वे सज्जानानाः देवाः भागं उपासते"इत्यत्र 'देवाः'। इत्यस्य विशेषणपदं किम्?
Answer: सञ्जानानाः। यहां 'देवाः' (देवता) विशेष्य है और 'सञ्जानानाः' (अच्छी प्रकार से जानते हुए) उसकी विशेषता बताता है।
In simple words: 'देवाः' का विशेषण 'सञ्जानानाः' है, जिसका मतलब है 'अच्छी तरह जानने वाले देवता'।
🎯 Exam Tip: विशेषण और विशेष्य को पहचानने के लिए देखें कि कौन सा शब्द संज्ञा की विशेषता बता रहा है।
Question. (ख) "अनेनाधीतेनाहोरात्रीन्संदधामि।" इत्यत्र 'अनेन' इत्यस्य विशेष्यपदं किम्?
Answer: अधीतम्। यहां 'अनेन' (इस) विशेषण है और 'अधीतम्' (पढ़ा हुआ) विशेष्य है।
In simple words: 'अनेन' का विशेष्य 'अधीतम्' है, जिसका मतलब है 'इस पढ़े हुए से'।
🎯 Exam Tip: विशेषण हमेशा विशेष्य के लिंग, वचन और विभक्ति के अनुसार होता है, यह याद रखना पहचान में मदद करता है।
Question. (ग) "तद्ववक्तारमवतु" इत्यत्र 'तद्' इत्यस्य विशेष्यपदं किम्?
Answer: प्रत्यक्षम्। यहां 'तद्' (वह) विशेषण है और 'प्रत्यक्षम्' (प्रत्यक्ष) विशेष्य है।
In simple words: 'तद्' का विशेष्य 'प्रत्यक्षम्' है, जिसका मतलब है 'वह प्रत्यक्ष'।
🎯 Exam Tip: सर्वनाम विशेषण के रूप में भी कार्य कर सकते हैं, इसलिए वाक्य के संदर्भ में विशेष्य को पहचानना आवश्यक है।
Question. (ङ) “शं नो विष्णुरुरुक्रमः।” इत्यत्र 'उरुक्रमः' इत्यस्य विशेष्यपदं किम्?
Answer: विष्णुः। यहां 'उरुक्रमः' (विशाल पगों वाले) विशेषण है और 'विष्णुः' (भगवान विष्णु) विशेष्य हैं।
In simple words: 'उरुक्रमः' का विशेष्य 'विष्णुः' है, जिसका मतलब है 'विशाल पगों वाले विष्णु'।
🎯 Exam Tip: पौराणिक या धार्मिक ग्रंथों से उद्धृत वाक्यों में विशेषण-विशेष्य की पहचान करते समय, देवताओं के नामों और उनके विशेषणों पर ध्यान दें।
(iii) सर्वनाम-संज्ञा प्रयोगः
Question. अधोलिखितमन्त्रांशेषु कालांकितसर्वनामपदस्य स्थाने संज्ञापदस्य प्रयोगं कृत्वा वाक्यं पुनः लिखत
(क) त्वम् दाशुषे भद्रं करिष्यसि।
(ख) वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता
(ग) तत् वक्तारम् अवतु
(घ) शं नो भवत्वर्यमा।
(ङ) सह नौ भुनक्तु।
Answer:
(क) अग्ने ! दाशुषे भद्रं करिष्यसि।
(ख) वाङ् स्तोतुः मनसि प्रतिष्ठिता।
(ग) परमात्मा वक्तारम् अवतु।
(घ) शं स्तोतृणां भवत्वर्यमा।
(ङ) सह गुरुशिष्यौ भुनक्तु। सर्वनाम के स्थान पर संज्ञा का प्रयोग करने से वाक्य अधिक विशिष्ट और स्पष्ट होता है।
In simple words: यहाँ कुछ वाक्यों में सर्वनाम (जैसे 'तुम', 'वह') को हटाकर उनकी जगह सही संज्ञा (जैसे 'अग्नि', 'परमात्मा') का इस्तेमाल किया गया है।
🎯 Exam Tip: सर्वनाम के स्थान पर संज्ञा का प्रयोग करते समय, यह सुनिश्चित करें कि संज्ञा उचित विभक्ति और वचन में हो और वाक्य का अर्थ न बदले।
Question. निम्नलिखितवाक्येषु कालांकित पदानां सर्वनामपदं लिखत
(क) यदङ्ग दाशुषे त्वमग्ने।
(ख) यथा पूर्वे ते देवाः भागं उपासते।
(ग) तन्माम् वक्तारमवतु
(घ) अनेन अधीतेन अहोरात्रान् संदधामि।
(ङ) तस्मै ब्रह्मणे नमः।
Answer:
(क) त्वम्,
(ख) ते,
(ग) तत्
(घ) अनेन
(ङ) तस्मै। संज्ञा के स्थान पर सर्वनाम का प्रयोग करने से वाक्य में संक्षिप्तता आती है।
In simple words: यहाँ दिए गए वाक्यों में संज्ञा (नाम) की जगह सही सर्वनाम (जो नाम के लिए इस्तेमाल हो) लिखा गया है।
🎯 Exam Tip: संज्ञा के लिए सही सर्वनाम का चुनाव करते समय, संज्ञा के लिंग, वचन और विभक्ति का ध्यान रखना चाहिए।
Question. अधोलिखितवाक्येषु कालांकितपदानां पर्यायबोधकपदानि लिखत
(क) त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि।
(ख) देवा भागं उपासते।
(ग) वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता।
(घ) शं नो मित्रः वरुणः।
(ङ) शं न इन्दो बृहस्पतिः।
Answer:
(क) कल्याणम्, श्रेष्ठम्।
(ख) देवताः, सुराः।
(ग) वाणी, वचनम्, कथनम्।
(घ) सूर्यः, आदित्यः, रविः।
(ङ) शचिः, देवराजः, सुरेन्द्रः। पर्यायवाची शब्द एक ही अर्थ वाले विभिन्न शब्दों को जानने में मदद करते हैं।
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Question. अधोलिखितवाक्येषु कालांकितपदानां विलोमार्थकपदानि लिखत
(क) त्वेत्तत् सत्यम् अङ्गिरः।
(ख) यथा पूर्वे सज्जानाना उपासते।
(ग) मे मनः वाचि प्रतिष्ठितम्
(घ) तत् माम् अवतु।
(ङ) नौ अधीतम् तेजस्वि अस्त
Answer:
(क) असत्यम्
(ख) वर्तमाने।
(ग) अप्रतिष्ठितम्
(घ) त्वाम्
(ङ) अनधीतम्। विलोम शब्द विपरीत अर्थ वाले शब्दों की समझ को बढ़ाते हैं।
In simple words: यहाँ कुछ शब्दों के उल्टे अर्थ वाले शब्द (विलोम शब्द) दिए गए हैं।
🎯 Exam Tip: विलोम शब्द आपके शब्द ज्ञान को बढ़ाते हैं और सही अर्थ को समझने में सहायता करते हैं।
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