RBSE Solutions Class 12 History Chapter 7 राजस्थान का स्वाधीनता संग्राम एवं एकीकरण

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Detailed Chapter 7 राजस्थान का स्वाधीनता संग्राम एवं एकीकरण RBSE Solutions for Class 12 History

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Class 12 History Chapter 7 राजस्थान का स्वाधीनता संग्राम एवं एकीकरण RBSE Solutions PDF

RBSE Class 12 History Chapter 7 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 History Chapter 7 बहुचयनात्मक प्रश्न

 

Question 1. राजस्थान में क्रान्ति की शुरुआत कहाँ से हुई?
(अ) नसीराबाद
(ब) नीमच
(स) मेवाड़
(द) मारवाड़।
Answer: (अ) नसीराबाद
In simple words: राजस्थान में अंग्रेजों के खिलाफ़ विद्रोह सबसे पहले नसीराबाद से शुरू हुआ था. यह वह जगह थी जहाँ पहली बार सैनिकों ने बगावत की थी.

🎯 Exam Tip: राजस्थान में 1857 की क्रान्ति के प्रमुख केन्द्रों और उनकी शुरुआत की तारीखों को याद रखें.

 

Question 2. आऊवा का सम्बन्ध किससे है?
(अ) रामसिंह
Answer: (अ) रामसिंह
In simple words: आऊवा का संबंध रामसिंह से है, जो 1857 की क्रांति के समय एक महत्वपूर्ण स्थानीय नेता थे.

🎯 Exam Tip: आऊवा की क्रांति के प्रमुख नेताओं और उनसे जुड़े महत्वपूर्ण घटनाओं को याद रखें.

 

Question 3. बिजौलिया किसान आन्दोलन के नेतृत्वकर्ता थे?
(अ) नयनूराम शर्मा
(ब) हरिभाऊ उपाध्याय
(स) विजय सिंह पथिक
(द) जमनालाल।
Answer: (स) विजय सिंह पथिक
In simple words: बिजौलिया में किसान आंदोलन को विजय सिंह पथिक ने संभाला था. वे इस बड़े आंदोलन के मुख्य नेता थे.

🎯 Exam Tip: किसान आंदोलनों के प्रमुख नेताओं और उनके योगदान को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर बिजौलिया आंदोलन के लिए.

 

Question 4. 'चेतावनी रा चूगटयाँ' सोरठा किसने लिखा?
(अ) प्रताप सिंह बारहठ
(ब) जोरावर सिंह बारहठ
(स) भारतसिंह बारहठ
(द) केसरी सिंह बारहठ।
Answer: (द) केसरी सिंह बारहठ।
In simple words: केसरी सिंह बारहठ ने 'चेतावनी रा चूंगट्या' नाम का सोरठा लिखा था. यह एक प्रसिद्ध रचना है जो उस समय के शासकों को चेतावनी देती थी.

🎯 Exam Tip: प्रमुख साहित्यकारों और उनकी राष्ट्रभक्ति से जुड़ी रचनाओं को याद रखें, जैसे 'चेतावनी रा चूंगट्या'.

 

Question 5. राजस्थान के एकीकरण में प्रथम चरण में किसका निर्माण हुआ?
(अ) मत्स्य संघ
(ब) राजस्थान संघ
(स) वृहत्तर राजस्थान
(द) मेवाड़ संघ।
Answer: (अ) मत्स्य संघ
In simple words: राजस्थान को एक करने की शुरुआत में सबसे पहले 'मत्स्य संघ' बनाया गया था. यह एकीकरण का पहला कदम था.

🎯 Exam Tip: राजस्थान के एकीकरण के सभी चरणों को उनके नामों और शामिल रियासतों के साथ याद रखना चाहिए.

 

Question 6. महाभारत कालीन क्षेत्र से सम्बन्धित था
(अ) वृहत् राजस्थान
(ब) संयुक्त राजस्थान
(स) सिरोही
(द) मत्स्य संघ।
Answer: (द) मत्स्य संघ
In simple words: 'मत्स्य संघ' उस क्षेत्र से जुड़ा था जिसे महाभारत काल में मत्स्य प्रदेश कहा जाता था.

🎯 Exam Tip: राजस्थान के एकीकरण के विभिन्न संघों के ऐतिहासिक और भौगोलिक संदर्भों को जानना महत्वपूर्ण है.

 

Question 7.
(अ) उदयपुर
(ब) जयपुर
(स) जोधपुर
(द) कोटा।
Answer: (ब) जयपुर
In simple words: इस प्रश्न में दिए गए विकल्पों में से जयपुर सही उत्तर है.

🎯 Exam Tip: यदि प्रश्न में शहर या स्थान से संबंधित विकल्प दिए गए हों, तो उस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखें.

 

Question 8. “सिरोही के विलय” को लेकर हुए आन्दोलन का नेतृत्व किया
(अ) गोकुल भाई भट्ट
(ब) माणिक्य लाल वर्मा
(स) जयनारायण व्यास
(द) हरिभाऊ उपाध्याय।
Answer: (अ) गोकुल भाई भट्ट
In simple words: सिरोही को राजस्थान में मिलाने के लिए गोकुल भाई भट्ट ने आंदोलन चलाया था. वे इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे.

🎯 Exam Tip: विलय आंदोलनों में विभिन्न नेताओं की भूमिका और उनके योगदान को याद रखना चाहिए.

 

Question 9. राजस्थान के प्रथम राज्यपाल बनाए गए
(अ) एन. वी. गाड़गिल
(ब) हीरालाल शास्त्री
(स) गुरुमुख निहाल सिंह
(द) माणिक्य लाल वर्मा।
Answer: (स) गुरुमुख निहाल सिंह
In simple words: राजस्थान के पहले राज्यपाल गुरुमुख निहाल सिंह बने थे.

🎯 Exam Tip: राजस्थान के एकीकरण से संबंधित महत्वपूर्ण पदों और व्यक्तियों के नामों को याद रखना आवश्यक है.

RBSE Class 12 History Chapter 7 अति लघुत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. नीमूचना काण्ड का सम्बन्ध कौन - से जिले से है?
Answer: नीमूचना (नीमूचणा) काण्ड का संबंध अलवर जिले से है. इस घटना से राज्य में किसान आंदोलन के माध्यम से जन जागृति शुरू हुई थी.
In simple words: नीमूचना की घटना अलवर जिले से जुड़ी है, जहाँ किसान आंदोलन ने लोगों को जगाया था.

🎯 Exam Tip: प्रमुख किसान आंदोलनों के स्थान और उनसे जुड़े जिलों को याद रखें.

 

Question 2. गोविन्द गुरु ने कौन - सा आन्दोलन शुरू किया था?
Answer: मोतीलाल तेजावत 'एक्की आन्दोलन' के संस्थापक थे. यह एक आदिवासी आंदोलन था.
In simple words: मोतीलाल तेजावत ने 'एक्की आंदोलन' चलाया था. यह एक खास आदिवासी आंदोलन था.

🎯 Exam Tip: प्रमुख आदिवासी आंदोलनों के नेताओं और उनके द्वारा शुरू किए गए आंदोलनों के नामों को ठीक से याद करें.

 

Question 4. मेवाड़ प्रजामण्डल के नेतृत्व को गति प्रदान करने वाले नेताओं के नाम बताओ।
Answer: मेवाड़ प्रजामण्डल आंदोलन को आगे बढ़ाने वाले नेताओं में माणिक्य लाल वर्मा और बलवन्त सिंह मेहता शामिल थे.
In simple words: माणिक्य लाल वर्मा और बलवन्त सिंह मेहता ने मेवाड़ प्रजामंडल के आंदोलन को तेज़ किया था.

🎯 Exam Tip: प्रजामंडल आंदोलनों में विभिन्न क्षेत्रों के नेताओं और उनके योगदान को जानना महत्वपूर्ण है.

 

Question 5. अर्जुनलाल सेठी व जमनालाल बजाज ने किस क्षेत्र को अपना कर्मक्षेत्र चुना था?
Answer: अर्जुनलाल सेठी और जमनालाल बजाज ने जयपुर प्रजामण्डल के क्षेत्र को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया था.
In simple words: अर्जुनलाल सेठी और जमनालाल बजाज ने जयपुर को अपने आंदोलन का मुख्य स्थान बनाया था.

🎯 Exam Tip: स्वतंत्रता सेनानियों के कार्यक्षेत्र और उनके आंदोलनों से जुड़े स्थानों को याद रखना चाहिए.

 

Question 6. राजस्थान का एकीकरण कितने चरणों में पूर्ण हुआ?
Answer: राजस्थान का एकीकरण सात चरणों में पूरा हुआ था:
1. मत्स्य संघ
2. संयुक्त राजस्थान
3. मेवाड़ को शामिल किया गया
4. वृहत् राजस्थान
5. मत्स्य संघ को शामिल करते हुए वृहत् राजस्थान
6. सिरोही का विलय तथा
7. अजमेर मेरवाड़ा का विलय।
In simple words: राजस्थान को एक करने का काम सात बड़े हिस्सों में हुआ था, जिसमें छोटे-छोटे राज्यों को मिलाकर एक बड़ा राज्य बनाया गया.

🎯 Exam Tip: राजस्थान के एकीकरण के सभी सात चरणों को उनके सही क्रम और मुख्य घटनाओं के साथ याद रखें.

 

Question 7. वृहत् राजस्थान के प्रधानमन्त्री कौन थे?
Answer: वृहत् राजस्थान के प्रधानमन्त्री पं. हीरालाल शास्त्री थे. उन्होंने 4 अप्रैल, 1950 ई. को मंत्रिमंडल की कमान संभाली थी.
In simple words: हीरालाल शास्त्री वृहत् राजस्थान के प्रधानमन्त्री थे. उन्होंने 1950 में मंत्रिमंडल का काम संभाला था.

🎯 Exam Tip: एकीकरण के विभिन्न चरणों में गठित सरकारों के प्रधानमंत्रियों और महत्वपूर्ण व्यक्तियों के नाम याद रखें.

 

Question 8. ब्रिटिशकाल में राजस्थान में स्थित केन्द्रशासित प्रदेश का नाम क्या था?
Answer: ब्रिटिशकाल में राजस्थान में स्थित केन्द्रशासित प्रदेश का नाम अजमेर-मेरवाड़ा था.
In simple words: ब्रिटिश राज के समय, राजस्थान में अजमेर-मेरवाड़ा नाम का एक विशेष इलाका था जिसे सीधे अंग्रेज चलाते थे.

🎯 Exam Tip: ब्रिटिशकाल में राजस्थान की प्रशासनिक इकाइयों और उनके विशिष्ट दर्जे को जानना महत्वपूर्ण है.

RBSE Class 12 History Chapter 7 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. राजस्थान में जागृति के क्या - क्या कारण थे?
Answer: राजस्थान में जन जागृति के कई कारण थे:
पहला, स्वामी दयानन्द सरस्वती का बड़ा प्रभाव था. वे पहले समाज सुधारक थे जिन्होंने 'स्वदेशी' और 'स्वराज्य' की बात उठाई थी.
दूसरा, समाचार-पत्रों और साहित्य का भी बड़ा योगदान था. 'राजपूतानी गजट', 'राजस्थान केसरी' और 'नवीन राजस्थान' जैसे अखबारों ने लोगों को जगाया.
तीसरा, मध्यम वर्ग के लोगों जैसे शिक्षकों, वकीलों और पत्रकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. जयनारायण व्यास और मास्टर भोलानाथ जैसे लोग इसमें शामिल थे.
चौथा, राजस्थान के सैनिकों ने प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लिया. अपने अनुभव साझा करके उन्होंने लोगों को बाहरी दुनिया से परिचित कराया.
पांचवां, बाहरी माहौल और राष्ट्रीय नेताओं के कार्यक्रमों का भी लोगों पर गहरा असर पड़ा, जिससे जन जागृति बढ़ी.
In simple words: राजस्थान में लोग कई वजहों से जागरूक हुए, जैसे स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचार, अखबारों का प्रचार, पढ़े-लिखे लोगों की मेहनत और विश्वयुद्ध के सैनिकों के अनुभव.

🎯 Exam Tip: जन जागृति के कारणों को बिंदुवार समझाते हुए प्रमुख व्यक्तियों और घटनाओं का उल्लेख करें.

 

Question 2. कोटा की क्रान्ति के सन्दर्भ में लिखो।
Answer: 1857 की क्रांति के समय कोटा एक महत्वपूर्ण केंद्र था. कोटा में 15 अक्टूबर को महाराव भीमसेन की दो बटालियनों ने विद्रोह कर दिया. उन्होंने रेजीडेंट बर्टन का सिर काट दिया और महाराव को नज़रबंद कर दिया.
पूरे कोटा पर विद्रोहियों का कब्ज़ा हो गया था. कोटा में लोगों को इकट्ठा करने में महाराव के वकील और विद्वान जयदयाल भटनागर का बड़ा हाथ था. विद्रोहियों ने कोटा छावनी को लूट लिया था. बाद में अंग्रेजों ने नीमच, देवली, एरनपुरा और खेरवाड़ा जैसी छह सैनिक छावनियों के सैनिकों को भी विद्रोह दबाने के लिए भेजा.
In simple words: 1857 की क्रांति में कोटा एक बड़ा केंद्र था, जहाँ सैनिकों ने बर्टन को मार दिया और शहर पर कब्ज़ा कर लिया था. जयदयाल भटनागर ने लोगों को एकजुट किया था.

🎯 Exam Tip: 1857 की क्रांति में विभिन्न छावनियों और रियासतों की भूमिका, प्रमुख नेताओं और घटनाओं का वर्णन करें.

 

Question 3. विजय सिंह पथिक ने जन - जागरण का कार्य किस प्रकार किया?
Answer: विजय सिंह 'पथिक' का असली नाम भूपसिंह था. बिजौलिया आंदोलन में आने से पहले वे एक क्रांतिकारी थे. उन्होंने इस आंदोलन की कमान संभाली और उन्हें तीन साल की जेल हुई.
In simple words: विजय सिंह पथिक, जिनका असली नाम भूपसिंह था, बिजौलिया आंदोलन के नेता बने. वे एक क्रांतिकारी थे और उन्हें इस आंदोलन के लिए जेल भी हुई थी.

🎯 Exam Tip: विजय सिंह पथिक के मूल नाम, क्रांतिकारी गतिविधियों और किसान आंदोलनों में उनकी भूमिका को स्पष्ट रूप से बताएं.

 

Question 4. एक ही परिवार के तीनों शहीद सपूतों का नाम लिखो।
Answer: एक ही परिवार के तीन शहीद क्रांतिकारी केसरी सिंह बारहट, प्रताप सिंह बारहट और जोरावर सिंह बारहट थे.
केसरी सिंह बारहट हिंदी भाषा के समर्थक थे और उन्होंने अपने बच्चों को स्वदेशी शिक्षण संस्थानों में पढ़ने के लिए प्रेरित किया. प्रताप सिंह बारहट अपने पिता के दिखाए रास्ते पर चलकर देश के लिए शहीद हो गए.
कई मुश्किलों और अत्याचारों के बावजूद, उन्होंने अपनी जान दे दी. जोरावर सिंह बारहट का बलिदान भी अतुलनीय है. 1912 में दिल्ली में वायसराय हार्डिंग पर बम फेंकने का साहस भरा काम जोरावर सिंह बारहट ने ही किया था.
In simple words: केसरी सिंह बारहट, प्रताप सिंह बारहट और जोरावर सिंह बारहट एक ही परिवार के तीन शहीद थे. इन सभी ने देश की आज़ादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था.

🎯 Exam Tip: बारहट परिवार के सदस्यों और उनके क्रांतिकारी योगदान को विस्तार से समझाएं, विशेषकर उनके त्याग और बलिदान को.

 

Question 5. गोविन्द गुरु ने आदिवासियों में जागृति का कार्य किस प्रकार किया था?
Answer: गोविन्द गुरु एक महान समाज सुधारक थे जिन्होंने भीलों के सामाजिक और नैतिक उत्थान का बीड़ा उठाया. उन्होंने 'सम्प सभा' की स्थापना की और भीलों को हिंदू धर्म के दायरे में रखने के लिए 'भगत पंथ' बनाया.
सम्प सभा के ज़रिए मेवाड़, डूंगरपुर, ईडर, गुजरात, विजयनगर और मालवा के भीलों में सामाजिक जागरूकता आई. इससे शासक भी चिंतित हो गए और भीलों को 'भगत पंथ' अपनाने के लिए मजबूर किया.
गोविन्द गुरु के प्रयासों से शिक्षा का प्रचार हुआ और सुधार भी होने लगे. जब भीलों में शराब की खपत कम हुई तो आबकारी क्षेत्र को नुकसान हुआ. भीलों में कोई बड़ी राजनीतिक इच्छा नहीं थी, लेकिन उनकी सामाजिक एकता अंग्रेजों और शासकों के लिए एक चुनौती बन गई. भीलों के साथ-साथ दूसरे वर्गों में भी राजनीतिक चेतना फैली.
In simple words: गोविन्द गुरु ने 'सम्प सभा' और 'भगत पंथ' बनाकर भीलों को जगाया. उन्होंने शिक्षा फैलाई और शराब की लत छुड़वाई, जिससे भीलों में सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता आई.

🎯 Exam Tip: गोविन्द गुरु के समाज सुधार आंदोलनों, उनके उद्देश्यों और उनके द्वारा स्थापित संस्थाओं जैसे 'सम्प सभा' और 'भगत पंथ' का विस्तृत वर्णन करें.

 

Question 6. 'मत्स्य संघ' के वृहत् राजस्थान में विलय की प्रक्रिया स्पष्ट कीजिए।
Answer: भौगोलिक, जातीय और आर्थिक रूप से अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली एक जैसे राज्य थे. इन चारों राज्यों के शासकों को 27 फरवरी, 1948 को दिल्ली बुलाया गया और उनके सामने एक संघ का प्रस्ताव रखा गया, जिसे उन्होंने खुशी-खुशी मान लिया.
श्री के.एम. मुंशी के सुझाव पर इस संघ का नाम मत्स्य संघ रखा गया. इस पर 28 फरवरी, 1948 को हस्ताक्षर किए गए. 18 मार्च, 1948 को केंद्रीय मंत्री एन.वी. गाडगिल ने इस संघ का उद्घाटन किया. इस संघ की जनसंख्या 18 लाख और वार्षिक आय दो करोड़ रुपये थी.
धौलपुर के महाराज उदयभान सिंह को राजप्रमुख बनाया गया और एक मंत्रिमंडल का गठन किया गया. अलवर के शोभाराम को मत्स्य संघ का प्रधानमंत्री बनाया गया और संघ में शामिल चारों राज्यों से एक-एक सदस्य को लेकर मंत्रिमंडल बनाया गया.
In simple words: मत्स्य संघ बनाने के लिए अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली के शासकों को दिल्ली बुलाया गया. प्रस्ताव मान लिया गया और के.एम. मुंशी के कहने पर 'मत्स्य संघ' नाम रखा गया. इसका उद्घाटन गाडगिल ने किया और उदयभान सिंह राजप्रमुख बने.

🎯 Exam Tip: मत्स्य संघ के गठन की प्रक्रिया, इसमें शामिल रियासतें, प्रमुख व्यक्तियों और इसके विलय के चरणों को स्पष्ट करें.

 

Question 8. संयुक्त राजस्थान में विलय के लिए मेवाड़ के महाराणा ने क्या-क्या शर्ते रखी थीं?
Answer: संयुक्त राजस्थान के उद्घाटन के तीन दिन बाद, मेवाड़ के विलय पर बातचीत शुरू हुई. सर राममूर्ति ने भारत सरकार को महाराणा की तीन मुख्य मांगें बताईं:
1. महाराणा को संयुक्त राजस्थान का वंशानुगत राजप्रमुख बनाया जाए.
2. उन्हें बीस लाख रुपये वार्षिक प्रिवीपर्स दिए जाएं.
3. उदयपुर को संयुक्त राजस्थान की राजधानी बनाया जाए.
रियासत विभाग ने संयुक्त राजस्थान के शासकों से बात करके मेवाड़ को संयुक्त राज्य राजस्थान में मिलाने का फैसला किया.
In simple words: मेवाड़ के महाराणा ने संयुक्त राजस्थान में शामिल होने के लिए तीन शर्तें रखीं: उन्हें राजप्रमुख बनाया जाए, बीस लाख रुपये भत्ता मिले और उदयपुर राजधानी बने.

🎯 Exam Tip: रियासतों के विलय के दौरान महाराणाओं द्वारा रखी गई शर्तों और रियासत विभाग की प्रतिक्रिया को विस्तार से बताएं.

 

Question 9. रियासत सचिवालय की स्थापना कब एवं क्यों की गई थी?
Answer: भारत 15 अगस्त, 1947 ई. को आज़ाद हुआ. लेकिन भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 की धारा 8 के अनुसार ब्रिटिश सरकार की सर्वोच्चता देशी रियासतों को वापस दे दी गई थी. इसका मतलब था कि देशी रियासतें खुद तय करेंगी कि वे भारत या पाकिस्तान में से किस देश में शामिल होंगी.
अगर कोई रियासत किसी देश में शामिल नहीं होती, तो वह एक आज़ाद राज्य बनी रह सकती थी. अगर ऐसा होता तो भारत कई छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट जाता और देश की एकता ख़त्म हो जाती.
तत्कालीन भारत सरकार का राजनीतिक विभाग, जो पहले देशी रियासतों पर नियंत्रण रखता था, उसे खत्म कर दिया गया. इसके बाद 5 जुलाई, 1947 ई. को सरदार पटेल की अध्यक्षता में रियासत सचिवालय बनाया गया.
In simple words: भारत की आज़ादी के बाद, रियासतों को अपना भविष्य खुद तय करना था. देश की एकता बनाए रखने और रियासतों को भारत में शामिल करने के लिए 5 जुलाई, 1947 को सरदार पटेल ने रियासत सचिवालय की स्थापना की थी.

🎯 Exam Tip: रियासत सचिवालय की स्थापना के उद्देश्य, तारीख और इसमें सरदार पटेल की भूमिका पर ध्यान दें.

 

Question 10. प्रजामण्डल आन्दोलन का संक्षेप में वर्णन करें।
Answer: जोधपुर में जयनारायण व्यास, बीकानेर में कन्हैयालाल ढूँढ, मेवाड़ में माणिक्य लाल वर्मा, कोटा में नयनूराम शर्मा, बूंदी में पथिक जी, राम नारायण चौधरी, माँगीलाल भव्य, तनसुख लाल मित्तल, जयपुर में अर्जुन लाल सेठी, सेठ जमनालाल बजाज, हीरालाल शास्त्री, अलवर में पं. हरिनारायण शर्मा ने प्रजामण्डल आन्दोलन चलाया. इसी प्रकार भरतपुर में श्रीगणेश जगन्नाथ दास अधिकारी तथा धौलपुर में स्वामी श्रद्धानन्द ने प्रजामण्डल आन्दोलन का नेतृत्व किया.
In simple words: प्रजामण्डल आंदोलन राजस्थान के विभिन्न राज्यों में लोगों को जागरूक करने और उत्तरदायी शासन की मांग करने के लिए चलाया गया था, जिसमें कई प्रमुख नेता शामिल थे.

🎯 Exam Tip: प्रजामण्डल आंदोलनों के उद्देश्यों, प्रमुख नेताओं और विभिन्न रियासतों में उनके प्रभावों को संक्षेप में स्पष्ट करें.

RBSE Class 12 History Chapter 7 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. बिजौलिया किसान आन्दोलन की सफलता में विजय सिंह पथिक के योगदान को रेखांकित कीजिए।
Answer:
1. जीवन - परिचय:
बिजौलिया आंदोलन के नेता विजय सिंह 'पथिक' का असली नाम भूपसिंह था. उनका जन्म बुलन्दशहर जिले के गुठावल गाँव में 1907 में हुआ था. 1907 में, भूपसिंह प्रसिद्ध क्रांतिकारी रास बिहारी बोस और शचीन्द्र 'सान्याल' के संपर्क में आए और क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गए. बोस ने उन्हें राजस्थान में क्रांति आयोजित करने के लिए खरवा के ठाकुर गोपाल सिंह के पास भेजा.
जब देश में क्रांति की योजना सफल नहीं हुई और क्रांतिकारी पकड़े जाने लगे, तो भूपसिंह को भी पकड़कर टाटागढ़ के किले में बंद कर दिया गया. लेकिन वे वहाँ से भाग निकले. उन्होंने अपनी दाढ़ी बढ़ाई और अपना नाम भूपसिंह से बदलकर विजय सिंह 'पथिक' रख लिया. तभी से वे जीवनभर इसी नाम से जाने गए. संयोग से उनकी मुलाकात सीताराम दास से हुई. सीताराम दास के कहने पर विजय सिंह पथिक ने बिजौलिया आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार कर लिया.
उनकी मौजूदगी से किसानों में उत्साह बढ़ गया. माणिक्य लाल वर्मा, साधु सीताराम दास, भंवरलाल सुनार और प्रेमचंद भील के सहयोग से पथिक ने किसानों को पंचायतों के ज़रिए संगठित किया और उन्हें युद्ध-कोष में धन देने से मना कर दिया. किसानों ने महाराणा और जागीरदार को अर्ज़ी भेजी, लेकिन महाराणा ने किसान नेताओं को गिरफ्तार करने और आंदोलन को दबाने का आदेश दिया. पथिक जी भूमिगत हो गए और दूर से आंदोलन का संचालन करने लगे.
2. समाचार - पत्रों का सहयोग:
विजय सिंह पथिक ने कानपुर से छपने वाले समाचार-पत्र 'प्रताप' के ज़रिए बिजौलिया के किसान आंदोलन को पूरे देश में चर्चा का विषय बना दिया. इससे जागीरदारों का दमन और बढ़ गया. माणिक्य लाल वर्मा, साधु सीताराम दास जैसे नेताओं को बंदी बना लिया गया. किसानों पर बड़े अत्याचार हुए, लेकिन उन्होंने आंदोलन जारी रखा. बिजौलिया आंदोलन की ख़बरें फैलाने के लिए पथिक ने 'प्रताप' के संपादक श्री गणेश शंकर विद्यार्थी को राखी भेजकर संबंध मज़बूत किए.
3. राजस्थान सेवा - संघ की स्थापना:
1919 में पथिक ने राजस्थान सेवा-संघ की स्थापना की, जिसका मुख्यालय अजमेर में था. पथिक जी ने यहीं से बिजौलिया किसान आंदोलन चलाया. दिसंबर 1919 में वे अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए और वहाँ बिजौलिया का मुद्दा उठाना चाहते थे. लोकमान्य तिलक ने यह प्रस्ताव पेश किया और केलकर ने इसका समर्थन किया.
लेकिन मदन मोहन मालवीय के विरोध के कारण कांग्रेस में इस प्रस्ताव पर चर्चा नहीं हो सकी, क्योंकि वे देशी राज्यों के मामलों में दखल नहीं देना चाहते थे. लेकिन मालवीय जी ने पथिक जी को आश्वासन दिया कि वे खुद महाराणा से मिलकर इसे सुलझाने की कोशिश करेंगे. इस तरह बिजौलिया किसान आंदोलन राष्ट्रीय नेताओं की नज़रों में आ गया.
4. राजपूताना मध्य भारत सभा:
पथिक जी इस आंदोलन को राष्ट्रीय महत्व का बनाना चाहते थे. इसलिए उन्होंने इस मामले को 'राजपूताना मध्य भारत सभा' के ज़रिए उठाना चाहा. भवानी दयाल की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया गया. इसकी सूचना महाराणा को दी गई, लेकिन महाराणा नहीं चाहते थे कि कोई बाहरी एजेंसी बिजौलिया के मामले में हस्तक्षेप करे. महाराणा ने खुद एक आयोग बनाया.
5. माणिक्यलाल वर्मा का प्रतिनिधि मंडल:
माणिक्य लाल वर्मा की अध्यक्षता में एक प्रतिनिधि दल उदयपुर गया. श्री वर्मा ने किसानों की समस्याओं को आयोग के सामने विस्तार से रखा. सदस्य भी प्रस्ताव से सहमत थे. इसी दौरान पं. मदन मोहन मालवीय भी उदयपुर आ गए थे. लेकिन महाराणा ने न तो आयोग और न ही मालवीय जी की सलाह को माना. ब्रिटिश सरकार ने इस आंदोलन की तुलना रूस की क्रांति से की और इसे दबाने का फैसला किया.
1920 में बिजौलिया के किसान नागपुर के कांग्रेस अधिवेशन में गए. यहाँ किसानों ने इस आंदोलन से गांधी जी को परिचित कराया और उनका आशीर्वाद लिया. यह वही समय था जब असहयोग आंदोलन पूरे भारत में फैल चुका था. ब्रिटिश सरकार असहयोग आंदोलन को लेकर चिंतित थी, और इधर किसान आंदोलन बेगू, पारसौली और दक्षिण-पश्चिमी पहाड़ी क्षेत्रों में भी फैल चुका था.
6. समझौते का प्रयास:
ब्रिटिश सरकार को डर था कि मेवाड़ का किसान आंदोलन कहीं भारत में चल रहे असहयोग आंदोलन से न जुड़ जाए. इसलिए एम.जी. हॉलैण्ड के प्रयासों से किसानों और जागीरदारों के बीच समझौता हो गया. इस समझौते के तहत किसानों पर लगे पैंतीस लागतों को खत्म कर दिया गया और लगान कम कर दिया गया. किसानों पर दर्ज मुकदमे वापस ले लिए गए. इस तरह बिजौलिया के किसानों की मुख्य माँगें मान ली गईं और उनकी पंचायतों को मान्यता मिल गई. यह बिजौलिया के किसानों की तीसरी जीत थी.
7. पथिक जी का पुनः नेतृत्व संभालना:
1922 में, पथिक जी के प्रयासों से किसानों और प्रशासन के बीच समझौता हुआ. जब बिजौलिया का आंदोलन फैल गया, तो पथिक जी ने आंदोलन की बागडोर संभाली और उन्हें तीन साल की जेल हुई. जेल से छूटने के बाद उन्हें मेवाड़ राज्य में प्रवेश से रोक दिया गया.
इसलिए उन्होंने बिजौलिया की सीमा पर स्थित ग्वालियर राज्य के फूसरिया गाँव से किसान-पंचायत का मार्गदर्शन करना शुरू किया. 1927 में जब बिजौलिया आंदोलन में माल भूमि छोड़ने का सवाल उठा, तो पथिक जी ने किसानों को भूमि छोड़ने की सलाह दी. शायद वे बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों को समझ नहीं पाए. पथिक जी का यह फैसला गलत साबित हुआ. उन्होंने किसान पंचायत की मध्यस्थता से त्याग-पत्र दे दिया.
भूमि जब्त होने पर किसानों का मनोबल टूट गया. पथिक जी के हाथ से नेतृत्व निकल गया और अखिल भारतीय स्तर पर स्थानांतरित हो गया. इसके बाद बिजौलिया किसान आंदोलन का नेतृत्व श्री हरिभाऊ उपाध्याय को सौंप दिया गया. अंततः हम कह सकते हैं कि इस आंदोलन ने न केवल मेवाड़ में, बल्कि राजस्थान की अन्य रियासतों में भी नई चेतना जगा दी.
In simple words: विजय सिंह पथिक बिजौलिया आंदोलन के मुख्य नेता थे. उन्होंने अखबारों के ज़रिए आंदोलन को पूरे देश में फैलाया. राजस्थान सेवा-संघ और राजपूताना मध्य भारत सभा बनाकर राष्ट्रीय स्तर पर लोगों को जोड़ा. उनके प्रयासों से किसानों की ज़मीन पर लगे टैक्स कम हुए और आंदोलन को बड़ी सफलता मिली.

🎯 Exam Tip: विजय सिंह पथिक के जीवन परिचय, आंदोलन में उनकी भूमिका, मीडिया का उपयोग और आंदोलन के परिणामों पर विस्तृत जानकारी दें.

 

Question 2. आदिवासी आन्दोलन में भगत व एकी आन्दोलन को विस्तार से समझाइए।
Answer: राजस्थान के दक्षिणी भाग में भील जनजाति रहती है, खासकर डूंगरपुर, मेवाड़, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और कुशलगढ़ जैसे इलाकों में. भील एक पुरानी जनजाति है जो अपने सामाजिक और आर्थिक स्तर को लेकर जागरूक रहती है. जब उनके पुराने अधिकारों का हनन हुआ, तो उन्होंने अंग्रेजों या शासकों के खिलाफ़ आवाज़ उठाई.
1. गोविन्द गुरु व भगत आन्दोलन:
गोविन्द गुरु एक महान समाज सुधारक थे जिन्होंने भीलों के सामाजिक और नैतिक सुधार के लिए काम किया. उन्होंने उन्हें सामाजिक रूप से संगठित करके मुख्यधारा में लाने की कोशिश की.
2. सम्प - सभा की स्थापना:
गोविन्द गुरु ने भीलों की सेवा के लिए 1883 में 'सम्प-सभा' बनाई. राजस्थान की भाषा में 'सम्प' का मतलब 'प्रेम' होता है. इस सभा के ज़रिए मेवाड़, डूंगरपुर, ईडर, गुजरात, विजयनगर और मालवा के भीलों में सामाजिक जागरूकता आई. इससे शासक डर गए और भीलों को 'भगत पंथ' छोड़ने के लिए मजबूर करने लगे.
जब उन्हें बिना मज़दूरी के काम करने और जंगल में उनके मूल अधिकारों से वंचित किया गया, तो वे आंदोलन करने पर मजबूर हो गए. गोविन्द गुरु के प्रयासों से शिक्षा का प्रचार हुआ और सुधार भी होने लगे. उदाहरण के लिए, जब भील मानगढ़ की पहाड़ी पर गए जो बांसवाड़ा राज्य की सीमा पर है.
अक्टूबर 1913 में उन्होंने संदेश भेजकर भीलों को मानगढ़ की पहाड़ी पर इकट्ठा होने को कहा. भारी संख्या में भील हथियार लेकर इकट्ठा हो गए. उन्होंने बांसवाड़ा राज्य के दो सिपाहियों को मार दिया और किले पर हमला किया. इस घटना से बांसवाड़ा, ईडर और डूंगरपुर राज्य सतर्क हो गए.
ए.जी.जी. की मंज़ूरी मिलने के बाद 6 से 10 नवंबर, 1913 के बीच मेवाड़ भील की दो कंपनियाँ, 104 वेलेजली राइफल्स की एक कंपनी, राजपूत रेजिमेंट की एक कंपनी और जाट रेजिमेंट की एक कंपनी मानगढ़ की पहाड़ी पर पहुँची और गोलाबारी करके भीलों को मार दिया. सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस घटना में पंद्रह सौ भील मारे गए. कई इतिहासकारों ने इस नरसंहार को जलियांवाला बाग हत्याकांड से भी भयानक बताया है.
इस तरह भगत आंदोलन को बेरहमी से कुचल दिया गया. गोविन्द गुरु को दस साल की जेल हुई. यह साफ था कि भीलों की कोई बड़ी राजनीतिक इच्छा नहीं थी, लेकिन उनकी सामाजिक एकता अंग्रेजों और शासकों के लिए एक चुनौती बन गई. गोविन्द गुरु अहिंसा के समर्थक थे और उनकी सफेद झंडा शांति का प्रतीक था. इस आंदोलन के दूरगामी परिणाम हुए. भीलों के साथ-साथ समाज के दूसरे वर्गों में भी राजनीतिक चेतना जागी.
मोतीलाल तेजावत व एकी आन्दोलन:
अंग्रेजों द्वारा भगत आंदोलन को कुचलने के बाद भीलों का आंदोलन कुछ समय के लिए शांत हो गया. फिर भी भगत आंदोलन का प्रभाव भीलों में राजनीतिक चेतना पर पड़ा. भीलों के खिलाफ सरकारी नीतियां जारी रहीं. 1917 में भी और गरासियों ने मिलकर महाराणा को पत्र लिखकर दमनकारी नीति और बेगार के खिलाफ अपना विरोध जताया. जब कोई परिणाम नहीं निकला, तो 1921 में बिजौलिया किसान आंदोलन से प्रभावित होकर फिर महाराणा को अत्यधिक लगानों और कामगारों के शोषणपूर्ण व्यवहार के खिलाफ़ शिकायत दर्ज की गई.
जब इन सभी अहिंसक प्रयासों का कोई परिणाम नहीं निकला, तो भोमट के खालसा क्षेत्रों के भीलों ने लगान और बेगार देने से इनकार कर दिया. 1921 में भीलों को मोतीलाल तेजावत का नेतृत्व मिला. तेजावत ने भीलों को लगान और बेगार न देने के लिए प्रेरित किया. 'एक्की आंदोलन' के नाम से जाना जाने वाला यह आंदोलन जनजातियों के राजनीतिक जागरण का प्रतीक माना जा सकता है.
डूंगरपुर के महारावल ने आंदोलन फैलने के डर से अपने राज्य से सभी प्रकार की बेगारें खत्म कर दीं. जागीरी क्षेत्रों में भीलों को यह सुविधा न मिलने के कारण 'एक्की आंदोलन' तेजावत के नेतृत्व में भोमट क्षेत्र के अलावा सिरोही और गुजरात क्षेत्र में भी फैल गया.
अंग्रेजी सरकार ने अब दमनकारी नीति अपनाई. 7 अप्रैल, 1922 को ईडर क्षेत्र में माल नामक स्थान पर मेजर सटन के अधीन मेवाड़ भील कोर ने गोलीबारी की. 3 जून, 1929 को ईडर राज्य ने तेजावत को गिरफ्तार कर मेवाड़ सरकार को सौंप दिया.
In simple words: आदिवासी आंदोलन में गोविन्द गुरु ने 'सम्प सभा' और 'भगत पंथ' बनाकर भीलों को एकजुट किया. मोतीलाल तेजावत ने 'एक्की आंदोलन' चलाकर भीलों को लगान और बेगार के खिलाफ़ लड़ने के लिए प्रेरित किया, जिससे आदिवासियों में राजनीतिक जागरूकता आई.

🎯 Exam Tip: भगत आंदोलन और एकी आंदोलन के उद्देश्यों, नेताओं, महत्वपूर्ण घटनाओं और उनके परिणामों को विस्तार से बताएं.

 

Question. राजस्थान में क्रान्ति के केन्द्र कहाँ थे और क्या परिणाम रहे?
Answer: जब भारत में 1857 का स्वतंत्रता संग्राम फैला, तो राजस्थान भी इससे अछूता नहीं रहा. जब राजस्थान में 1857 की क्रांति की आग फैली, तो ब्रिटिश सरकार चिंतित हो गई. राजस्थान में मुख्य रूप से छह सैनिक छावनियाँ थीं: नसीराबाद, नीमच, देवली, कोटा, एरनपुरा और खेरवाड़ा.
राजस्थान में क्रान्ति के प्रमुख केन्द्र:
(1) नसीराबाद:
राजस्थान में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत नसीराबाद से हुई. 28 मई, 1857 को शाम चार बजे नसीराबाद में सैनिकों ने विद्रोह कर दिया. अंग्रेजों द्वारा नसीराबाद में सैनिकों को निहत्था करने की कोशिश ने आग में घी का काम किया. यह अफवाह भी फैल रही थी कि सैनिकों को जो वेतन मिलता है और जो कारतूस दिए जाते हैं, उनमें गाय का मांस मिलाया जाता है.
27 मई को यह खबर भी फैली कि डीसा से यूरोपीय सैनिकों की एक टुकड़ी नसीराबाद आ रही है जो वहाँ के सैनिकों की जगह लेगी. इस खबर ने अंग्रेजों के खिलाफ भावना को चरम सीमा पर पहुँचा दिया. नसीराबाद की स्थिति खराब होने लगी. सैनिकों ने विद्रोह कर दिया, लेकिन फर्स्ट रेजिमेंट बॉम्बे लांसर ने विद्रोहियों का साथ नहीं दिया और ब्रिटिश आदेश का पालन करते हुए उन पर गोली चलाई. हालांकि, लाइट और ग्रेनेडियर कंपनी ने गोली चलाने से मना कर दिया.
ब्रिगेडियर मेकल को अपने यूरोपीय साथियों के साथ पीछे हटने को मजबूर होना पड़ा. कर्नल पैनी, जो कोर कमांडर थे, घटना स्थल पर ही मारे गए. संभवतः इसका कारण उनका घबरा जाना था. दो अन्य ब्रिटिश अधिकारियों की भी मृत्यु हुई, दो घायल हुए और इसके साथ ही नसीराबाद क्रांतिकारियों के हाथ में चला गया. अगले दिन क्रांतिकारियों ने नसीराबाद छावनी को नष्ट कर दिया और दिल्ली की ओर बढ़ गए.
लेफ्टिनेंट माल्टर और लेफ्टिनेंट हेथकोट के नेतृत्व में लगभग एक हज़ार मेवाड़ के सैनिकों ने क्रांतिकारियों का पीछा किया, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. संभवतः इसका कारण यह था कि मेवाड़ और मारवाड़ के जागीरदारों ने नसीराबाद के विद्रोहियों को अपने प्रदेश से आसानी से गुज़रने दिया. यह इस बात का संकेत था कि मेवाड़ और मारवाड़ की सहानुभूति क्रांतिकारियों के साथ थी.
सैनिकों में पुनः असन्तोष:
12 जून, 1857 को उड़ीसा से यूरोपीय सेनाओं की पहली टुकड़ी नसीराबाद पहुँची और 10 जुलाई, 1857 को एजेंट गवर्नर जनरल द्वारा इस टुकड़ी को नीमच भेजा गया. इस घटना ने नसीराबाद में सैनिकों में फिर से असंतोष पैदा किया. बारहवीं बॉम्बे नेटिव इन्फेंट्री के सैनिक बहुत उत्तेजित हो गए, लेकिन उन्हें तुरंत निहत्था कर दिया गया.
नीमच में क्रान्ति:
क्रांति का दूसरा केंद्र नीमच बना. 2 जून को कर्नल अबॉट ने हिंदू और मुसलमान सिपाहियों को गंगा और कुरान की शपथ दिलाई कि वे ब्रिटिश शासन के प्रति वफादार रहेंगे. कर्नल अबॉट ने खुद बाइबिल पर हाथ रखकर शपथ ली कि वे अपने सिपाहियों का पूरा सहयोग लेंगे. लेकिन 3 जून, 1857 को जब नसीराबाद की क्रांति की खबर नीमच पहुँची, तो उसी दिन रात ग्यारह बजे वहाँ भी विद्रोह हो गया.
स्थल सेना ने पूरी छावनी को घेर लिया और उसमें आग लगा दी. यहाँ तक कि ब्रिगेडियर मेजर के बंगले को भी आग लगा दी गई. बंगलों पर तैनात सैनिकों ने क्रांतिकारियों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया और कुछ समय बाद वे भी उनके साथ मिल गए. ऐसा माना जाता है कि दो स्त्रियाँ तुरंत मारी गईं और कई बच्चों को आग की लपटों में झोंक दिया गया. लगभग चालीस ब्रिटिश स्त्री-पुरुषों और बच्चों को क्रांतिकारियों ने घेर लिया.
अगर उदयपुर (मेवाड़) के सैनिक सही समय पर मदद के लिए नहीं पहुँचते, तो संभवतः उनका जीवन भी खत्म हो जाता. 5 जून को क्रांतिकारियों ने आगरा होते हुए दिल्ली की ओर कूच किया. उन्होंने आगरा जेल में बंद सभी कैदियों को रिहा कर दिया और सरकारी खज़ाने से एक लाख छब्बीस हज़ार नौ सौ रुपये लूटकर अपने साथ ले गए, लेकिन आगरा का बाज़ार सुरक्षित रहा.
नीमच के क्रांतिकारी देवली पहुँचे और उन्होंने छावनी में आग लगा दी. ऐसा माना जाता है कि देवली छावनी को पहले ही खाली कर दिया गया था और वहाँ से ब्रिटिश अधिकारियों को मेवाड़ स्थित जहाजपुर कस्बे में भेज दिया गया था. क्रांतिकारियों ने कोटा रेजिमेंट के साठ व्यक्तियों को देवली छावनी से अपने साथ चलने के लिए मजबूर किया, लेकिन रास्ते में ये सैनिक भाग निकलने में सफल हो गए और कुछ दिनों बाद वापस देवली पहुँच गए.
आस-पास के अन्य स्थानों की स्थिति भी विस्फोटक होती जा रही थी. मालवा, महू, सलूंबर जैसे स्थानों पर भी क्रांतिकारियों के हमले बढ़ रहे थे. उदयपुर स्थित खेरवाड़ा और सलूंबर की स्थिति ज़्यादा नाज़ुक हो चुकी थी. कैप्टन शावर्स के विचार में इन क्षेत्रों की रक्षा करना बहुत मुश्किल हो गया था. 12 अगस्त, 1857 को नीमच में द्वितीय कैवलरी के कमांडर कर्नल जेक्सन ने इस सूचना के आधार पर कि भारतीय सेना में विद्रोह होने वाला है और उनकी योजना सभी यूरोपीय अधिकारियों की हत्या कर देने की है, यूरोपीय सैनिकों को बुला भेजा.
इस घटना ने नीमच स्थित भारतीय सैनिकों को उत्तेजित कर दिया और परिणामस्वरूप वहाँ फिर से क्रांति की ज्वालाएँ भड़कने लगीं. उत्तेजना में एक यूरोपीय सिपाही की हत्या कर दी गई. दो अन्य सिपाही घायल हो गए और लेफ्टिनेंट विलयेयर किसी यूरोपीय की बंदूक से ही घायल हो गए. सैनिकों ने कर्नल जेक्सन के आदेश का पालन करने से इनकार कर दिया. यहाँ तक कि यूरोपीय अधिकारियों के बीच भी आदेश दिए जाने संबंधी वाद-विवाद उठ खड़े हुए, अतः यह निश्चित किया गया कि नीमच के क्रांतिकारियों को दबाने के लिए और अधिक सैनिक बुलाए जाएँ. लेकिन इसी बीच उदयपुर की सहायता से क्रांति को दबा दिया गया.
(2) आऊवा (मारवाड़) ठिकाना व ठाकुर खुशाल सिंह का नेतृत्व:
अगस्त, 1857 में क्रांति की ज्वालाएँ पूरे राज्य में फैलने लगीं. 21 अगस्त को एरनपुरा स्थित जोधपुर सेनाओं ने विद्रोह कर दिया.
इसके बाद आऊवा के ठाकुर खुशाल सिंह ने भी क्रांतिकारियों को सहयोग देना शुरू किया. इसका मुख्य कारण यह था कि पिछले कुछ सालों से ठाकुर खुशाल सिंह और जोधपुर महाराजा के बीच संबंध तनावपूर्ण थे और वर्तमान परिस्थितियों में ठाकुर खुशाल सिंह ने अवसर का लाभ उठाना चाहा. 8 सितंबर, 1857 को महाराजा जोधपुर की सेनाओं और क्रांतिकारियों एवं आऊवा के ठाकुर की सशस्त्र सेनाओं के बीच पाली के पास विढोड़ा और चेलावास में संघर्ष हुआ. महाराजा जोधपुर की सेनाओं को न केवल हार का सामना करना पड़ा, बल्कि उनके ज़्यादातर अस्त्र-शस्त्र क्रांतिकारियों के हाथ लग गए.
जोधपुर किले के किलेदार 'अनारसिंह' और महाराजा के कई वफादार सहयोगी इस युद्ध में मारे गए. लेफ्टिनेंट हैटकोच, जिसे राजस्थान में ब्रिटिश एजेंट गवर्नर जनरल लॉरेंस ने भेजा था, बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचा सका. उसकी पूरी संपत्ति क्रांतिकारियों ने लूट ली. इन गंभीर परिस्थितियों को समझते हुए गवर्नर जनरल लॉरेंस ने खुद आऊवा की ओर बढ़ने का फैसला किया.
उसने ब्यावर के पास सशस्त्र बटालियन तैयार की और आऊवा की ओर कूच किया. 18 सितंबर को गवर्नर जनरल लॉरेंस के नेतृत्व में ब्रिटिश सशस्त्र सेनाओं ने आऊवा पर हमला किया, लेकिन वे सफल नहीं हुए. विद्रोही सैनिकों ने न केवल हमला विफल किया, बल्कि कई ब्रिटिश अधिकारियों को भी मार डाला, जिनमें जोधपुर स्थित ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मॉक मेसन और एक यूरोपीय अधिकारी शामिल थे. साथ ही, जोधपुर सेना के कई सैनिक भी क्रांतिकारियों के हाथों मारे गए और बंदी बना लिए गए.
क्रांतिकारियों ने मॉक मेसन का सिर धड़ से अलग करके किले पर लटका दिया, जो उनकी जीत का प्रतीक था. गवर्नर जनरल लॉरेंस को पीछे हटना पड़ा और आऊवा से लगभग तीन मील दूर एक गाँव में शरण लेनी पड़ी. बाद में वह अजमेर वापस आया.
गवर्नर जनरल लॉरेंस की हार को ब्रिटिश सरकार ने बहुत गंभीरता से लिया, क्योंकि इस घटना का पूरे राजस्थान पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता था. इसलिए ब्रिटिश सरकार ने आदेश दिया कि हर कीमत पर आऊवा ठाकुर को कुचल दिया जाना चाहिए. दूसरी ओर, क्रांतिकारियों ने किसालदार, अब्दुल अली, अब्बास अली खाँ, शेख मुहम्मद बख्श और हिंदू तथा मुसलमान सिपाहियों के नाम पर मारवाड़ और मेवाड़ की जनता से अपील की कि वे उनकी हर संभव सहायता करें.
ठाकुर खुशाल सिंह ने भी मेवाड़ के प्रमुख जागीरदार ठाकुर समंद सिंह से अंग्रेजों के खिलाफ़ मदद देने का प्रस्ताव किया. ठाकुर समंद सिंह और मारवाड़ के कई प्रमुख जागीरदारों ने चार हज़ार सैनिकों की मदद का आश्वासन दिया. 9 अक्टूबर, 1857 को आसोप के ठाकुर श्योनाथ सिंह, पुलनियावास के ठाकुर अजीत सिंह, बोगावा के ठाकुर जोधसिंह, बांता के ठाकुर पेम सिंह, बसवाना के ठाकुर चाँद सिंह, तुलगिरी के ठाकुर जगत सिंह ने दिल्ली सम्राट से मदद लेने के लिए दिल्ली की ओर प्रस्थान किया. ठाकुर समंद सिंह ने भी ऊपर बताए गए जागीरदारों का साथ दिया.
जनवरी, 1858 को ब्रिटिश सैनिकों की मदद के लिए बंबई की सैनिक टुकड़ी नसीराबाद पहुँची. रास्ते में सिरोही के ठाकुर के अधीन सेवा के किले को नष्ट कर दिया गया और 19 जनवरी, 1858 को टुकड़ी आऊवा पहुँची. इस सेना की मदद करने वाले 18 क्रांतिकारियों को मार दिया गया और सात को हिरासत में ले लिया गया.
दूसरी ओर, आऊवा गाँव में 124 लोगों को बंदी बनाया गया, जिन्हें तुरंत गोली मार दी गई. साथ ही, आऊवा ठाकुर के निवास स्थान को भी मिट्टी में मिला दिया गया. इस प्रकार 24 जनवरी, 1858 को आऊवा पर ब्रिटिश सैनिकों का कब्ज़ा हो गया.
ऐसा माना जाता है कि सैन्य कार्रवाई के दौरान कई निहत्थे नागरिकों को भी मार दिया गया, जिनके शव गलियों में पड़े थे. ब्रिटिश सेना को भी काफी नुकसान हुआ और उनके कम से कम दस सैनिक घायल हुए. ब्रिटिश सैनिकों ने आऊवा में भयानक अत्याचार किए. भौरता, भीमालिया और लंबीया गाँवों को पूरी तरह तबाह कर दिया और इस प्रकार जनता में डर फैलाकर ब्रिटिश सैनिक नसीराबाद की ओर बढ़े.
15 सितंबर, 1857 को मेजर बर्टन को ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट के रूप में कोटा जाने का आदेश मिला. इसके बाद कोटा महाराव के वकील मेजर बर्टन को लेने के लिए नीमच पहुँचे. 5 अक्टूबर को मेजर बर्टन अपने दो बेटों के साथ कोटा के लिए रवाना हुए. मेजर बर्टन की पत्नी, बेटी और उनके तीन बेटे नीमच में ही रुक गए थे. 12 अक्टूबर को मेजर बर्टन अपने दोनों बेटों के साथ कोटा पहुँचे. उसी दिन दिल्ली का पतन हुआ और ऐसा माना जाता है कि इस अवसर पर कोटा महाराव को तोपों की सलामी दी गई.
अगले दिन कोटा महाराव ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट से उनके निवास स्थान पर मिलने गए और उसी दिन शाम को पॉलिटिकल एजेंट अपने दोनों बेटों के साथ महाराव से मिलने आए. ऐसा माना जाता है कि अपनी बातचीत के दौरान पॉलिटिकल एजेंट ने महाराव से अनुरोध किया कि वह अपने कुछ प्रमुख सहयोगियों को पद से हटा दें. लेकिन 15 अक्टूबर को कोटा महाराव की दो बटालियनों ने ब्रिटेन के खिलाफ विद्रोह कर दिया और मेजर बर्टन, उनके दोनों बेटे, एक असिस्टेंट सर्जन और एक स्थानीय क्रिश्चियन डॉक्टर की हत्या कर दी.
यही नहीं, मेजर बर्टन का सिर काट लिया गया और क्रांतिकारी उसे अपने साथ ले गए. क्रांतिकारियों को जनता का भी सहयोग मिला और इसे जन-आंदोलन का रूप दे दिया. कोटा की क्रांति में जयदयाल माथुर और मेहराब खाँ की मुख्य भूमिका रही. ब्रिटिश सेनाओं को पीछे हटना पड़ा. पांच महीने तक लगातार कोटा पर क्रांतिकारियों का आधिपत्य रहा.
अन्य राज्यों का योगदान:
जयपुर, टोंक, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, लंगरपुर जैसे राज्यों में भी अंग्रेज विरोधी भावना मौजूद थी. भरतपुर की सेना, गुर्जर और मेव जनता ने भी खुले तौर पर विद्रोह में भाग लिया. जयपुर की जनता ने रास्ते से गुज़रती सेना का अपमान किया और अंग्रेज विरोधी भावना व्यक्त की. येक के नवाब की सेना ने भी विद्रोह किया. उन्होंने बकाया वेतन वसूला और दिल्ली गए.
In simple words: 1857 की क्रांति में राजस्थान में नसीराबाद, नीमच, कोटा और आऊवा जैसे कई केंद्र थे. इन जगहों पर सैनिकों और लोगों ने विद्रोह किया. अंग्रेजों ने इन्हें दबाने की कोशिश की, लेकिन लोगों ने विरोध जारी रखा. इससे अंग्रेजों को कई जगह हार मिली, पर अंत में वे विद्रोह को दबाने में सफल रहे.

🎯 Exam Tip: राजस्थान में 1857 की क्रांति के प्रमुख केंद्रों (नसीराबाद, नीमच, कोटा, आऊवा) का वर्णन करें, साथ ही प्रत्येक केंद्र की महत्वपूर्ण घटनाओं, नेताओं और परिणामों को स्पष्ट करें.

 

Question 4. राजस्थान के एकीकरण के चरणों का वर्णन कीजिए।
Answer: राजस्थान का एकीकरण सात मुख्य चरणों में पूरा हुआ था, जो इस प्रकार हैं:
1. मत्स्य संघ (18 मार्च 1948): इसमें अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली रियासतें शामिल थीं। यह भौगोलिक, जातीय और आर्थिक रूप से एक जैसे राज्य थे, जिन्होंने मिलकर मत्स्य संघ बनाया। इसका उद्घाटन केंद्रीय मंत्री एन.वी. गाडगिल ने किया और शोभाराम कुमावत इसके प्रधानमंत्री बने।
2. संयुक्त राजस्थान (25 मार्च 1948): इस चरण में कोटा, बूँदी, झालावाड़, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़ और शाहपुरा जैसी नौ रियासतें शामिल हुईं। पहले कुछ शासक अपना संघ बनाना चाहते थे, लेकिन बाद में संयुक्त राजस्थान में शामिल होने को राजी हो गए।
3. मेवाड़ का संयुक्त राजस्थान में विलय (18 अप्रैल 1948): दूसरे चरण के बाद, मेवाड़ रियासत को संयुक्त राजस्थान में शामिल करने पर बातचीत शुरू हुई। महाराणा ने कुछ शर्तें रखीं, जैसे उन्हें वंशानुगत राजप्रमुख बनाना और वार्षिक प्रिवीपर्स देना। उदयपुर को राजधानी बनाने की मांग भी थी। इन शर्तों पर सहमति बनने के बाद, महाराणा भूपाल सिंह ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए और पंडित नेहरू ने इसका उद्घाटन किया।
4. वृहत् राजस्थान (30 मार्च 1949): मेवाड़ के विलय के बाद, जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर जैसी बड़ी रियासतों का विलय भी आसान हो गया। ये राज्य पाकिस्तान सीमा पर थे, जिससे इनकी सुरक्षा महत्वपूर्ण थी। सरदार पटेल ने उदयपुर में एक सभा में वृहत् राजस्थान के गठन की घोषणा की। जयपुर के महाराजा मानसिंह को राजप्रमुख बनाया गया और जयपुर को राजधानी घोषित किया गया। हीरालाल शास्त्री इसके पहले प्रधानमंत्री बने।
5. मत्स्य संघ का वृहत् राजस्थान में विलय (15 मई 1949): मत्स्य संघ में कुछ प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी समस्याएँ थीं। इसे उत्तर प्रदेश या राजस्थान में विलय करने का विकल्प था। श्री शंकरराव देव की अध्यक्षता में बनी एक समिति की सिफारिश पर मत्स्य संघ को वृहत् राजस्थान में मिला दिया गया, जिससे एक बड़ा और मजबूत राज्य बना।
6. सिरोही का विलय (26 जनवरी 1950): सिरोही के विलय को लेकर थोड़ी समस्या थी, क्योंकि कुछ नेता माउंट आबू को गुजरात में मिलाना चाहते थे। लेकिन जनता की भावनाओं को देखते हुए, माउंट आबू सहित सिरोही के अधिकांश क्षेत्र को राजस्थान में शामिल कर लिया गया।
7. अजमेर-मेरवाड़ा का विलय (1 नवंबर 1956): ब्रिटिश काल में अजमेर-मेरवाड़ा एक केंद्र शासित प्रदेश था। लंबे समय से इसे राजस्थान में शामिल करने की मांग थी। राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश के बाद, अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र को राजस्थान में मिला दिया गया। इस तरह राजस्थान का एकीकरण पूरा हुआ और राजप्रमुख का पद समाप्त कर राज्यपाल का पद शुरू किया गया।
In simple words: राजस्थान को एक साथ लाने की प्रक्रिया सात चरणों में पूरी हुई। इसमें अलग-अलग समय पर छोटे-बड़े राज्यों को मिलाकर एक बड़ा राज्य बनाया गया, जिसमें मत्स्य संघ, संयुक्त राजस्थान, मेवाड़ का विलय, वृहत् राजस्थान, मत्स्य संघ का दोबारा विलय, सिरोही और अंत में अजमेर-मेरवाड़ा शामिल थे।

🎯 Exam Tip: राजस्थान के एकीकरण के सभी सात चरणों को उनकी तारीखों और शामिल रियासतों के साथ याद रखें, क्योंकि यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है।

 

Question 5. राजस्थान के एकीकरण के पूर्व राजस्थान की रियासतों की स्थिति व उनकी समस्याएँ लिखिए।
Answer: 15 अगस्त, 1947 को भारत को आजादी मिली। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 की धारा 8 के अनुसार, ब्रिटिश सरकार की सर्वोच्चता देशी रियासतों को वापस दे दी गई। इसका मतलब था कि देशी रियासतें खुद तय कर सकती थीं कि वे भारत या पाकिस्तान में शामिल होंगी या स्वतंत्र राज्य के रूप में रहेंगी।
अगर सभी रियासतों को स्वतंत्र रहने दिया जाता, तो भारत कई छोटे-छोटे टुकड़ों में बँट जाता, जिससे देश की एकता खत्म हो जाती। उस समय भारत सरकार का राजनीतिक विभाग, जो रियासतों पर नियंत्रण रखता था, खत्म कर दिया गया। 5 जुलाई, 1947 को सरदार वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में रियासत सचिवालय बनाया गया। इसका काम सभी छोटी-बड़ी रियासतों को मिलाकर एक संयुक्त राज्य बनाना था, जो भाषा, संस्कृति और भौगोलिक सीमाओं के हिसाब से एक हो।
स्वतंत्रता के समय राजस्थान में 22 छोटी-बड़ी रियासतें थीं और अजमेर-मेरवाड़ा का एक छोटा क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन था। इन सभी को मिलाकर एक इकाई बनाना बहुत मुश्किल काम था। सितंबर 1946 में, अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् ने तय किया कि पूरा राजस्थान एक इकाई के रूप में भारतीय संघ में शामिल हो। भारत सरकार के रियासत सचिवालय ने नियम बनाया कि केवल वही रियासतें स्वतंत्र रह सकती हैं जिनकी सालाना आय एक करोड़ रुपये और जनसंख्या दस लाख से ज्यादा हो। राजस्थान में केवल जोधपुर, जयपुर, उदयपुर और बीकानेर ही इस शर्त को पूरा करते थे। बाकी छोटी रियासतें समझती थीं कि स्वतंत्र भारत में मिलकर ही वे मजबूत इकाइयाँ बन सकती हैं।
In simple words: आजादी से पहले, राजस्थान की रियासतें तय नहीं कर पा रही थीं कि वे भारत में शामिल हों, पाकिस्तान में, या स्वतंत्र रहें। यह भारत की एकता के लिए एक बड़ी समस्या थी, और केवल कुछ ही बड़ी रियासतें स्वतंत्र रह सकती थीं।

🎯 Exam Tip: एकीकरण से पहले की रियासतों की समस्याओं, जैसे उनकी स्वायत्तता की स्थिति और भारत सरकार की एकीकरण नीति, को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 1. 1857 की क्रान्ति से पूर्व जिस शासक ने ब्रिटिश विरोधी भावना प्रदर्शित की, वह था।
(a) डूंगरपुर का महारावल जसवन्त सिंह
(b) जोधपुर का शासक मानसिंह
(c) उदयपुर का शासक स्वरूप सिंह
(d) भरतपुर का शासक जसवन्त सिंह।
Answer: (b) जोधपुर का शासक मानसिंह
In simple words: जोधपुर के शासक मानसिंह ने 1857 की क्रांति से पहले अंग्रेजों के खिलाफ अपनी नाराजगी दिखाई थी।

🎯 Exam Tip: उन शासकों के नाम याद रखें जिन्होंने 1857 की क्रांति से पहले या उसके दौरान ब्रिटिश विरोधी भावनाएं दिखाईं।

 

Question 2. राजस्थान के ईंग जी व जवाहर जी अत्यन्त लोकप्रिय थे, क्योंकि।
(a) वे क्रान्तिकारी नेता थे।
(b) वे जनहित के कार्यों में लगे हुए थे
(c) वे अंग्रेजों की छावनियाँ व सम्पत्ति, लूटते थे
(d) उन्होंने अपनी जागीर बढ़ाने में अनेक लोकहित के कार्य करवाये थे।
Answer: (c) वे अंग्रेजों की छावनियाँ व सम्पत्ति, लूटते थे
In simple words: ईंग जी और जवाहर जी इसलिए लोकप्रिय थे क्योंकि वे अंग्रेजों की छावनियों और खजानों को लूटते थे और गरीब लोगों की मदद करते थे।

🎯 Exam Tip: क्रांतिकारियों की लोकप्रियता के कारणों पर ध्यान दें, खासकर उनके जनहितकारी कार्यों और ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों के संदर्भ में।

 

Question 4. राजस्थान में 1857 की क्रान्ति का सूत्रपात कहाँ से हुआ?
(a) नसीराबाद
(b) आऊवा
(c) नीमच
(d) मेवाड़।
Answer: (a) नसीराबाद
In simple words: 1857 की क्रांति राजस्थान में सबसे पहले नसीराबाद से शुरू हुई थी।

🎯 Exam Tip: 1857 की क्रांति के मुख्य केंद्रों और उनकी शुरुआत की तारीखों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 5. 1857 की क्रान्ति का सूत्रपात नसीराबाद से हुआ, क्योंकि।
(a) नसीराबाद में अंग्रेजों के विरुद्ध आक्रोश अधिक था
(b) नसीराबाद के सैनिकों से चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग करने को कहा गया था
(c) 15 र्वी बंगाल इन्फेन्ट्री को अजमेर से नसीराबाद भेज दिया था
(d) नसीराबाद के सैनिकों को दिल्ली के क्रान्तिकारियों का सन्देश प्राप्त हो गया।
Answer: (b) नसीराबाद के सैनिकों से चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग करने को कहा गया था
In simple words: नसीराबाद में क्रांति इसलिए शुरू हुई क्योंकि सैनिकों को चर्बी वाले कारतूसों का इस्तेमाल करने के लिए कहा गया था, जिससे वे गुस्सा हो गए।

🎯 Exam Tip: 1857 की क्रांति के तात्कालिक कारणों को समझें, विशेषकर चर्बी वाले कारतूसों के विवाद को।

 

Question 6. वीर सतसई की रचना किसने की?
(a) सागरमल गोपा
(b) सूर्यमल्ल मिश्रण
(c) साधु सीताराम
(d) जयनारायण व्यास।
Answer: (b) सूर्यमल्ल मिश्रण
In simple words: 'वीर सतसई' नामक पुस्तक सूर्यमल्ल मिश्रण ने लिखी थी।

🎯 Exam Tip: राजस्थान के प्रमुख साहित्यिक कृतियों और उनके लेखकों के नाम याद रखें।

 

Question 8. नीमच में क्रान्ति प्रारम्भ हुई।
(a) 28 मई, 1857
(b) 30 जून, 1857
(c) 3 जून, 1857
(d) 3 अप्रैल, 1857.
Answer: (c) 3 जून, 1857
In simple words: नीमच में क्रांति 3 जून, 1857 को शुरू हुई थी।

🎯 Exam Tip: विभिन्न क्रांति केंद्रों में विद्रोह की सही तारीखें याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 9. राजस्थान में ताँत्या येपे को शरण देने वाला सामन्त था।
(a) आऊवा का ठकुर कुशाल सिंह
(b) कोयरिया को रावत जोधसिंह
(c) आसोप के ठकुर शिवनाथ सिंह
(d) गूलर के ठकुर विशन सिंह।
Answer: (b) कोयरिया को रावत जोधसिंह
In simple words: रावत जोधसिंह, कोयरिया के एक सामन्त थे, जिन्होंने ताँत्या टोपे को छिपाने में मदद की थी।

🎯 Exam Tip: उन स्थानीय नेताओं और सामंतों के नामों को जानें जिन्होंने 1857 की क्रांति के दौरान क्रांतिकारियों का समर्थन किया।

 

Question 10. राजस्थान के जिस शासक ने ताँत्या येपे की सहायता की, वह है।
(a) जोधपुर का राव केसरी सिंह
(b) भरतपुर का शासक जसवन्त सिंह
(c) डूंगरपुर का महारावल जसवन्त सिंह
(d) उदयपुर का शासक स्वरूप सिंह।
Answer: (a) जोधपुर का राव केसरी सिंह
In simple words: जोधपुर के राव केसरी सिंह ने ताँत्या टोपे की मदद की थी।

🎯 Exam Tip: ताँत्या टोपे की सहायता करने वाले विभिन्न शासकों और उनकी भूमिकाओं को याद रखें।

 

Question 11. राजस्थान में क्रान्ति की असफलता का प्रमुख कारण था।
(a) कुशल नेतृत्व का अभाव
(d) उपर्युक्त सभी
Answer: (d) उपर्युक्त सभी
In simple words: राजस्थान में क्रांति की असफलता का मुख्य कारण कुशल नेतृत्व की कमी और अन्य कारक थे।

🎯 Exam Tip: 1857 की क्रांति की असफलता के विभिन्न कारणों को विस्तार से समझना चाहिए, जैसे नेतृत्व की कमी, साधनों का अभाव और सामंतों का असहयोग।

 

Question 12. क्रान्ति का अन्त सर्वप्रथम कहाँ हुआ?
(a) नसीराबाद में
(b) दिल्ली में
(c) नीमच में
(d) देवली में।
Answer: (b) दिल्ली में
In simple words: 1857 की क्रांति का अंत सबसे पहले दिल्ली में हुआ था।

🎯 Exam Tip: क्रांति के प्रमुख घटनाओं के अंत और उनके स्थानों को याद रखें।

 

Question 13. आऊवा में जिस ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेण्ट की हत्या की गई, वह है।
(a) सेवील की
(b) मेजर बर्टन की
(c) मोकमेंसन की
(d) कर्नल बुक की।
Answer: (s) मोकमेंसन की
In simple words: आऊवा में ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मोकमेसन की हत्या कर दी गई थी।

🎯 Exam Tip: ब्रिटिश अधिकारियों के नाम और उन स्थानों को याद रखें जहाँ उनकी हत्याएँ हुईं, क्योंकि यह क्रांति के महत्वपूर्ण घटनाक्रम का हिस्सा है।

 

Question 14. वंश भाष्कर के रचचिता है।
(a) सूर्यमल्ल मिश्रण
(b) श्यामलदास
(c) बाँकीदास
(d) दयालदास।
Answer: (a) सूर्यमल्ल मिश्रण
In simple words: 'वंश भास्कर' नामक ग्रंथ सूर्यमल्ल मिश्रण ने लिखा था।

🎯 Exam Tip: प्रमुख ऐतिहासिक ग्रंथों और उनके रचनाकारों के नाम याद रखें।

 

Question 15. अंग्रेजों से की गई सन्धियों से सर्वाधिक प्रभावित हुए।
(a) सामन्त
(b) राजा
(c) प्रजा
(d) सैनिक।
Answer: (c) प्रजा
In simple words: अंग्रेजों के साथ हुई संधियों से सबसे ज्यादा आम जनता प्रभावित हुई थी।

🎯 Exam Tip: संधियों के परिणामों को समझें और पहचानें कि समाज का कौन सा वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ।

 

Question 17. बिजौलिया के किसानों को सर्वप्रथम संगठित होकर आवाज उठाने की सलाह दी थी।
(a) नानजी पटेल ने
(b) साधु सीतारामदास ने
(c) फतहकरण चारण ने
(d) ठाकरी पटेल ने।
Answer: (b) साधु सीतारामदास ने
In simple words: बिजौलिया के किसानों को सबसे पहले साधु सीतारामदास ने एकजुट होकर अपनी बात रखने की सलाह दी थी।

🎯 Exam Tip: किसान आंदोलनों में प्रमुख नेताओं की भूमिका और उनके प्रारंभिक योगदान को याद रखें।

 

Question 18. बीसवीं शताब्दी में बिजौलिया किसान आन्दोलन प्रारम्भ होने का प्रमुख कारण था।
(a) जागीरदार पृथ्वी सिंह ने किसानों को पूर्व में दी गई रियासतें रद्द कर दीं।
(b) किसानों पर तलवार – लाग नाम से नई लागत लगा दी गई।
(c) किसानों की खड़ी फसल में आग लगवा दी गई।
(d) किसानों की बहू – बेटियों को बेरहमी से पीटा गया।
Answer: (b) किसानों पर तलवार – लाग नाम से नई लागत लगा दी गई।
In simple words: बिजौलिया किसान आंदोलन का मुख्य कारण 'तलवार – लाग' जैसे नए और भारी कर थे जो किसानों पर लगाए गए थे।

🎯 Exam Tip: किसान आंदोलनों के मूल कारणों को समझें, खासकर अन्यायपूर्ण करों और प्रथाओं को।

 

Question 19. जिस किसान आन्दोलन की गूंज इंग्लैण्ड के हाउस ऑफ कॉमन्स में सुनाई पड़ी, वह था।
(a) बिजौलिया किसान आन्दोलन
(b) शेखावटी किसान आन्दोलन
(c) सीकर किसान आन्दोलन
(d) बेगूं किसान आन्दोलन।
Answer: (c) सीकर किसान आन्दोलन
In simple words: सीकर किसान आंदोलन इतना महत्वपूर्ण था कि इसकी चर्चा इंग्लैंड की संसद (हाउस ऑफ कॉमन्स) में भी हुई थी।

🎯 Exam Tip: उन आंदोलनों को विशेष रूप से याद रखें जिनकी चर्चा राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुई।

 

Question 21. मेवाड़ के भोमट क्षेत्र में 'सम्प सभा' की स्थापना की।
(a) गोविन्द गुरु
(b) सुर्जी भगत
(c) दामोदरदास राठी
(d) माणिक्य लाल वर्मा।
Answer: (a) गोविन्द गुरु
In simple words: गोविन्द गुरु ने मेवाड़ के भोमट क्षेत्र में 'सम्प सभा' बनाई थी ताकि आदिवासी लोगों को एक साथ लाया जा सके।

🎯 Exam Tip: विभिन्न सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों के संस्थापक और उनके उद्देश्यों को याद रखें।

 

Question 22. जिस आन्दोलन को बोल्शेविक की संज्ञा दी जाती है।
(a) बिजौलिया आन्दोलन
(b) बेगूं आन्दोलन
(c) शेखावाटी आन्दोलन
(d) बूंदी आन्दोलन।
Answer: (b) बेगूं आन्दोलन
In simple words: बेगूं किसान आंदोलन को 'बोल्शेविक आंदोलन' भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें किसानों ने बड़े पैमाने पर विद्रोह किया था।

🎯 Exam Tip: विभिन्न किसान आंदोलनों के विशेष नामों या उपनामों को याद रखें जो उन्हें दिए गए थे।

 

Question 23. राजस्थान में सर्वप्रथम किसान आन्दोलन प्रारम्भ हुआ।
(a) बिजौलिया में
(b) अलवर में
(c) शेखावाटी में
(d) जयपुर में।
Answer: (a) बिजौलिया में
In simple words: राजस्थान में पहला किसान आंदोलन बिजौलिया में शुरू हुआ था।

🎯 Exam Tip: राजस्थान में किसान आंदोलनों की शुरुआत और उनके मुख्य केंद्र को याद रखें।

 

Question 24. 'एक्की' आन्दोलन के माध्यम से जनजातियों को संगठित किया।
(a) विजय सिंह पथिक ने
Answer: (a) विजय सिंह पथिक ने
In simple words: विजय सिंह पथिक ने 'एक्की आंदोलन' का उपयोग करके आदिवासी समुदायों को एकजुट किया।

🎯 Exam Tip: 'एक्की' आंदोलन और जनजातीय आंदोलनों से जुड़े प्रमुख नेताओं के नाम याद रखें।

 

Question 25. “यदि मैं राज्य की नौकरी करूंगा तो अंग्रेजों को देश से बाहर कौन निकालेगा?” शब्द किसके थे।
(a) विजय सिंह पथिक के
(b) अर्जुनलाल सेठी के
(c) जोरावर सिंह के
(d) गोपाल सिंह खरवा के।
Answer: (b) अर्जुनलाल सेठी के
In simple words: यह प्रसिद्ध कथन अर्जुनलाल सेठी का था, जो देश की आजादी के लिए अपने समर्पण को दर्शाता है।

🎯 Exam Tip: प्रमुख नेताओं के प्रसिद्ध कथनों को याद रखें, क्योंकि वे उनके विचारों और आंदोलनों को दर्शाते हैं।

 

Question 26. 1885 में राजस्थान से प्रकाशित होने वाला समाचार – पत्र है।
(a) राजस्थान समाचार
(b) राजपूताना गजट
(c) नवीन राजस्थान
(d) तरुण राजस्थान।
Answer: (b) राजपूताना गजट
In simple words: 1885 में 'राजपूताना गजट' राजस्थान से प्रकाशित होने वाला एक महत्वपूर्ण समाचार पत्र था।

🎯 Exam Tip: राजस्थान के शुरुआती समाचार पत्रों के नाम और उनके प्रकाशन वर्ष को याद रखें।

 

Question 27. 'नवजीवन' समाचार – पत्र प्रकाशित होता था।
(a) जयपुर से
(b) ब्यावर से
(c) अजमेर से
(d) उदयपुर से।
Answer: (d) उदयपुर से
In simple words: 'नवजीवन' समाचार पत्र उदयपुर से छपता था।

🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण समाचार पत्रों के प्रकाशन स्थलों को याद रखें।

 

Question 28. 'मारवाड़ हितकारिणी सभा' की स्थापना की।
(a) जयनारायण व्यास ने
(b) आनन्दराज सुराणा ने
(c) कस्तूरकरण ने
(d) चाँदमल सुराणा ने।
Answer: (a) जयनारायण व्यास ने
In simple words: 'मारवाड़ हितकारिणी सभा' की स्थापना जयनारायण व्यास ने की थी।

🎯 Exam Tip: प्रमुख सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के संस्थापक और उनके उद्देश्यों को याद रखें।

 

Question 30. एकीकृत राजस्थान के निर्माण में जो 'मत्स्य संघ' बना, उसमें सम्मिलित थे।
(a) जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, कोटा और अलवर।
(b) उदयपुर, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ और टोंक।
(c) शाहपुरा, किशनपुर, झालावाड़, जैसलमेर और करौली।
(d) अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली।
Answer: (d) अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली।
In simple words: मत्स्य संघ में अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली रियासतें शामिल थीं।

🎯 Exam Tip: एकीकरण के विभिन्न चरणों में शामिल रियासतों के समूहों को याद रखें।

 

Question 31. मार्च, 1948 ई. संयुक्त राजस्थान का प्रधानमत्री जिसे बनाया गया।
(a) श्री जयनारायण व्यास
(b) श्री शोभालाल कुमावत
(c) पं. हीरालाल शास्त्री
(d) श्री गोकुल प्रसाद असावा।
Answer: (d) श्री गोकुल प्रसाद असावा।
In simple words: मार्च 1948 में श्री गोकुल प्रसाद असावा को संयुक्त राजस्थान का प्रधानमंत्री बनाया गया था।

🎯 Exam Tip: एकीकरण के विभिन्न चरणों में बने प्रधानमंत्री और राजप्रमुख के नामों को याद रखें।

 

Question 32. 'मत्स्य संघ' की राजधानी थी।
(a) अलवर
(b) भरतपुर
(c) धौलपुर
(d) करौली।
Answer: (a) अलवर
In simple words: मत्स्य संघ की राजधानी अलवर थी।

🎯 Exam Tip: एकीकरण के दौरान विभिन्न संघों की राजधानियों को याद रखें।

 

Question 34. एकीकरण के फलस्वरूप राजस्थान के पाँच चरणों में जो राज्य सम्मिलित नहीं हुए, वे हैं।
(a) सिरोही व अजमेर
(b) बाँसवाड़ा व झालावाड़
(c) प्रतापगढ़ व शाहपुरा
(d) जोधपुर व जैसलमेर।
Answer: (a) सिरोही व अजमेर
In simple words: एकीकरण के पहले पाँच चरणों में सिरोही और अजमेर राज्य शामिल नहीं हुए थे, उन्हें बाद में जोड़ा गया।

🎯 Exam Tip: एकीकरण के बाद के चरणों में शामिल हुए राज्यों पर विशेष ध्यान दें।

 

Question 35. अजमेर का राजस्थान में विलीनीकरण जिस वर्ष हुआ, वह है।
(a) 1947 ई. में
(b) 1948 ई. में
(c) 1956 ई. में
(d) 1965 ई. में।
Answer: (c) 1956 ई. में
In simple words: अजमेर को राजस्थान में 1956 में मिलाया गया था।

🎯 Exam Tip: राजस्थान के एकीकरण के अंतिम चरण और प्रमुख विलय की तारीखों को याद रखें।

 

Question. (i) मिलान करो।

प्रजामण्डलस्थापना वर्ष
1. जोधपुर(क) 1943 ई.
2. जैसलमेर(ख) 1938 ई.
3. कोटा(ग) 1936 ई.
4. बूँदी(घ) 1936 ई.
5. अलवर(ङ) 1931 ई.
6. धौलपुर(च) 1944 ई.
7. बांसवाड़ा(छ) 1931 ई.
8. डूंगरपुर(ज) 1945 ई.
9. जयपुर राज्य प्रजामण्डल(झ) 1939 ई.

 

RBSE Class 12 History Chapter 7 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. राजस्थान में जन-जागृति के कोई दो कारण लिखिए।
Answer: राजस्थान में लोगों को जगाने वाले दो मुख्य कारण थे:
1. स्वामी दयानन्द सरस्वती का प्रभाव: उन्होंने लोगों को अपने देश और अपनी भाषा के लिए सोचने पर मजबूर किया।
2. समाचार-पत्रों और किताबों का योगदान: इन चीज़ों ने लोगों को बाहरी दुनिया और अपने अधिकारों के बारे में जानकारी दी, जिससे उनमें जागरूकता बढ़ी।
In simple words: स्वामी दयानंद सरस्वती और अख़बारों ने लोगों को अपने अधिकारों और देश के बारे में जागरूक किया।

🎯 Exam Tip: जब भी जन-जागृति के कारणों के बारे में पूछा जाए, तो समाज सुधारकों और संचार माध्यमों (जैसे अख़बार) की भूमिका को ज़रूर बताएं।

 

Question 2. 'राजस्थान केसरी' समाचार – पत्र के प्रकाशक कौन थे?
Answer: 'राजस्थान केसरी' अख़बार को प्रकाशित करने वाले 'विजय सिंह पथिक' थे। यह अख़बार लोगों में देशप्रेम की भावना जगाने में मदद करता था।
In simple words: 'राजस्थान केसरी' अख़बार विजय सिंह पथिक ने छापा था।

🎯 Exam Tip: ऐतिहासिक अख़बारों के नाम और उनके प्रकाशकों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे स्वतंत्रता आंदोलनों में सहायक रहे थे।

 

Question 4. वीर सतसई की रचना किसने थी?
Answer: 'वीर सतसई' नामक पुस्तक की रचना सूर्यमल्ल मिश्रण ने की थी। यह उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है।
In simple words: सूर्यमल्ल मिश्रण ने 'वीर सतसई' लिखी थी।

🎯 Exam Tip: प्रमुख साहित्यकारों और उनकी कृतियों के नाम याद रखें, खासकर वे जो इतिहास और राष्ट्रीय भावना से जुड़े हों।

 

Question 5. 1857 ई. में राजस्थान में सर्वप्रथम क्रान्ति कहाँ आरम्भ हुई?
Answer: 1857 की क्रांति सबसे पहले नसीराबाद में शुरू हुई थी। यह राजस्थान में अंग्रेजों के खिलाफ़ विद्रोह का पहला बड़ा केंद्र था।
In simple words: राजस्थान में 1857 की क्रांति सबसे पहले नसीराबाद में शुरू हुई थी।

🎯 Exam Tip: 1857 की क्रांति के शुरुआती केंद्रों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये विद्रोह के फैलाव को समझने में मदद करते हैं।

 

Question 6. नसीराबाद में क्रान्ति होने के बाद वहाँ के ब्रिटिश अधिकारी भागकर कहाँ गये?
Answer: नसीराबाद में क्रांति शुरू होने के बाद, वहाँ मौजूद ब्रिटिश अधिकारी नीमच भाग गए थे। उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए ऐसा किया था।
In simple words: नसीराबाद में क्रांति के बाद, ब्रिटिश अधिकारी नीमच भाग गए।

🎯 Exam Tip: क्रांति के दौरान ब्रिटिश अधिकारियों के पलायन और सुरक्षित स्थानों की जानकारी अक्सर महत्वपूर्ण होती है।

 

Question 7. राजस्थान में क्रान्ति के प्रमुख केन्द्र कौन - कौन से थे?
Answer: राजस्थान में 1857 की क्रांति के मुख्य केंद्र नसीराबाद, नीमच, देवली, आऊवा, कोटा, एरिनपुरा, सलूम्बर और कोठारिया थे। इन जगहों पर क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के खिलाफ़ आवाज़ उठाई थी।
In simple words: नसीराबाद, नीमच, देवली, आऊवा, कोटा, एरिनपुरा, सलूम्बर और कोठारिया राजस्थान में क्रांति के मुख्य केंद्र थे।

🎯 Exam Tip: क्रांति के प्रमुख केंद्रों को हमेशा भौगोलिक दृष्टि से याद रखने का प्रयास करें, यह लंबे समय तक याद रखने में मदद करता है।

 

Question 8. आऊवा में किस ब्रिटिश पोलिटिकल एजेण्ट की हत्या कर दी गई?
Answer: आऊवा में ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेण्ट मोकमेसन की हत्या कर दी गई थी। यह घटना क्रांति के दौरान एक महत्वपूर्ण मोड़ थी।
In simple words: आऊवा में ब्रिटिश अधिकारी मोकमेसन को मार दिया गया था।

🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण घटनाओं और उनमें शामिल व्यक्तियों के नाम याद रखना ऐतिहासिक प्रश्नों के लिए आवश्यक है।

 

Question 9. ताँत्या टोपे को राजस्थान के किस शासक ने सहायता दी?
Answer: सलूम्बर के रावल केसरी सिंह ने ताँत्या टोपे को सहायता दी थी। उन्होंने ताँत्या टोपे के विद्रोह में उनका समर्थन किया था।
In simple words: सलूम्बर के रावल केसरी सिंह ने ताँत्या टोपे की मदद की थी।

🎯 Exam Tip: क्रांतिकारियों को सहयोग देने वाले स्थानीय शासकों के नाम और उनके योगदान को विशेष रूप से याद रखें।

 

Question 10. ताँत्या टोपे को दगाबाजी से पकड़ने वाला कौन था?
Answer: ताँत्या टोपे को नरवर के जागीरदार मानसिंह ने विश्वासघात करके अंग्रेजों के हाथों पकड़वाया था। इसी के कारण अप्रैल 1859 में उन्हें फांसी दी गई।
In simple words: नरवर के जागीरदार मानसिंह ने ताँत्या टोपे को धोखा देकर पकड़वाया था।

🎯 Exam Tip: स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेताओं के पतन के कारणों और उनमें शामिल व्यक्तियों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 12. राजस्थान में क्रान्ति की असफलता के क्या कारण थे?
Answer: राजस्थान में क्रांति असफल होने के मुख्य कारण थे: नेताओं की कमी और सभी क्रांतिकारियों के बीच तालमेल की कमी। स्थानीय शासक भी पूरी तरह से सहयोग नहीं कर पाए।
In simple words: क्रांति की असफलता का कारण अच्छे नेतृत्व और तालमेल की कमी थी।

🎯 Exam Tip: किसी भी बड़े आंदोलन की असफलता के मुख्य कारण हमेशा नेतृत्व, संगठन और संसाधनों की कमी होते हैं।

 

Question 13. ताँत्या टोपे की असफलता का प्रमुख कारण क्या था?
Answer: ताँत्या टोपे की असफलता का मुख्य कारण राजस्थान के शासकों से पूरा सहयोग न मिलना और उनके अपने साथी द्वारा दिया गया धोखा था। इन कारणों से उन्हें अपेक्षित मदद नहीं मिल पाई।
In simple words: ताँत्या टोपे की असफलता का कारण शासकों का असहयोग और उनके अपने साथी का विश्वासघात था।

🎯 Exam Tip: व्यक्तिगत संघर्षों और विश्वासघात के पहलू अक्सर ऐतिहासिक घटनाओं के मोड़ को निर्धारित करते हैं, इसे ध्यान में रखें।

 

Question 14. अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का प्रमुख केन्द्र कहाँ था तथा वहाँ के किस शासक ने क्रान्तिकारियों को सहयोग दिया?
Answer: अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का मुख्य केंद्र आऊवा था। यहाँ के ठाकुर खुशाल सिंह ने क्रांतिकारियों को बहुत मदद दी थी। उन्होंने अपने क्षेत्र में विद्रोहियों का साथ दिया।
In simple words: अंग्रेजों के खिलाफ़ विद्रोह का केंद्र आऊवा था, और ठाकुर खुशाल सिंह ने क्रांतिकारियों की मदद की।

🎯 Exam Tip: स्थानीय विद्रोहों और उन्हें समर्थन देने वाले स्थानीय नेताओं के नाम को हमेशा याद रखें।

 

Question 15. 1857 की क्रान्ति से पूर्व किस शासक ने ब्रिटिश विरोधी भावना प्रदर्शित की?
Answer: 1857 की क्रांति से पहले जोधपुर के शासक मानसिंह ने ब्रिटिश विरोधी भावना दिखाई थी। उन्होंने अंग्रेजों की नीतियों का खुलकर विरोध किया था।
In simple words: 1857 की क्रांति से पहले जोधपुर के मानसिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ़ गुस्सा दिखाया था।

🎯 Exam Tip: क्रांति के पूर्व की घटनाओं और शासकों के रुख को समझना अक्सर क्रांति के कारणों को स्पष्ट करता है।

 

Question 16. राजस्थान में बढ़ाठे के जागीरदार ईंग सिंह और जवाहर सिंह की लोकप्रियता का क्या कारण था?
Answer: ईंग सिंह और जवाहर सिंह दोनों ब्रिटिश छावनियों और सरकारी खजानों को लूटते थे। वे लूटे हुए धन से गरीबों की मदद करते थे, इसलिए वे लोगों में बहुत लोकप्रिय थे।
In simple words: ईंग सिंह और जवाहर सिंह ब्रिटिश खजाने लूटकर गरीबों की मदद करते थे, इसलिए वे लोगों के चहेते थे।

🎯 Exam Tip: स्थानीय लोक नायकों की लोकप्रियता के कारणों में अक्सर उनके सामाजिक कार्य और विदेशी शासन का विरोध शामिल होता है।

 

Question 17. कोटा में किस ब्रिटिश अधिकारी की हत्या की गई?
Answer: कोटा में ब्रिटिश अधिकारी मेजर बर्टन की हत्या कर दी गई थी। यह घटना 1857 की क्रांति के दौरान कोटा में हुई थी।
In simple words: कोटा में ब्रिटिश अधिकारी मेजर बर्टन को मार दिया गया था।

🎯 Exam Tip: क्रांति के दौरान प्रमुख ब्रिटिश अधिकारियों की हत्याएं अक्सर विद्रोह की गंभीरता को दर्शाती हैं।

 

Question 19. 1857 की क्रान्ति राजस्थान के किन राज्यों में सैनिक विद्रोह के रूप में प्रस्फुटित हुई?
Answer: 1857 की क्रांति राजस्थान में नसीराबाद और नीमच में सैनिक विद्रोह के रूप में शुरू हुई थी। इन जगहों पर सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ़ विद्रोह कर दिया था।
In simple words: राजस्थान में 1857 की सैनिक क्रांति नसीराबाद और नीमच में हुई थी।

🎯 Exam Tip: उन स्थानों को याद रखना महत्वपूर्ण है जहाँ सैनिक विद्रोह हुए, क्योंकि ये क्रांति के शुरुआती चरणों को दर्शाते हैं।

 

Question 20. साहित्यकार चारणों – भाटों ने आऊवा ठाकुर की प्रशंसा में गीत किन भावनाओं के कारण लिखे?
Answer: साहित्यकार चारणों और भाटों ने आऊवा के ठाकुर की प्रशंसा में गीत उनकी अंग्रेजी विरोधी भावनाओं के कारण लिखे थे। वे ठाकुर के साहस और देशभक्ति से प्रभावित थे।
In simple words: चारणों-भाटों ने आऊवा ठाकुर की प्रशंसा उनके अंग्रेजी विरोधी विचारों के लिए की थी।

🎯 Exam Tip: साहित्य और लोकगीत अक्सर जन भावनाओं और ऐतिहासिक घटनाओं को दर्शाते हैं; इनके महत्व को समझें।

 

Question 21. मेवाड़ के महाराणा ने माल हाकिम हमीद हुसैन को बिजौलिया क्यों भेजा?
Answer: मेवाड़ के महाराणा ने माल हाकिम हमीद हुसैन को बिजौलिया इसलिए भेजा था ताकि वे जागीरदार द्वारा लगाए गए गैर-कानूनी करों (लागतों) की जाँच कर सकें।
In simple words: महाराणा ने हमीद हुसैन को बिजौलिया में गलत करों की जाँच करने के लिए भेजा था।

🎯 Exam Tip: शासकों द्वारा भेजी गई जाँच समितियों और उनके उद्देश्यों को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर जब वे किसान आंदोलनों से संबंधित हों।

 

Question 22. विजय सिंह पथिक ने बिजौलिया किसान आन्दोलन का नेतृत्व क्यों स्वीकार किया?
Answer: विजय सिंह पथिक ने बिजौलिया किसान आंदोलन का नेतृत्व इसलिए स्वीकार किया क्योंकि वे किसानों को बहुत अधिक लगान से दुखी देख रहे थे। वे किसानों को न्याय दिलाना चाहते थे।
In simple words: विजय सिंह पथिक ने किसानों के भारी लगान से दुखी होकर बिजौलिया आंदोलन संभाला।

🎯 Exam Tip: आंदोलन के नेताओं और उनके आंदोलन से जुड़ने के कारणों को हमेशा समझने का प्रयास करें।

 

Question 23. 'पीवल' और 'बारानी' भूमि से आप क्या समझते हैं?
Answer: 'पीवल' भूमि वह ज़मीन होती है जहाँ सिंचाई की व्यवस्था होती है, यानी वह सिंचित भूमि है। 'बारानी' भूमि वह ज़मीन होती है जहाँ सिंचाई की कोई व्यवस्था नहीं होती और वह केवल बारिश पर निर्भर करती है, यानी असिंचित भूमि है।
In simple words: पीवल भूमि सिंचित होती है, जबकि बारानी भूमि बिना सिंचाई के बारिश पर निर्भर करती है।

🎯 Exam Tip: कृषि संबंधी शब्दों और उनके अर्थों को सटीक रूप से याद रखें, क्योंकि यह भूमि व्यवस्था के प्रश्नों में सहायक होगा।

 

Question 24. सीकर का किसान आन्दोलन कैसे समाप्त हुआ?
Answer: सीकर का किसान आंदोलन सीकर के राव राजा और किसानों के बीच जयपुर राज्य के दखल के बाद खत्म हुआ। जयपुर राज्य के हस्तक्षेप से एक समझौता हो पाया।
In simple words: जयपुर राज्य के दखल के बाद सीकर का किसान आंदोलन खत्म हो गया।

🎯 Exam Tip: किसी भी आंदोलन के समाधान में बाहरी शक्तियों या समझौतों की भूमिका को पहचानना महत्वपूर्ण है।

 

Question 25. डाबला – काण्ड क्या था? इसमें किस राजनीतिक दल ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की?
Answer: डाबला-कांड 13 मार्च, 1947 को हुआ था, जब पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे परिषद् कार्यकर्ताओं और किसानों पर हमला कर दिया। इस घटना में 'लोक परिषद्' नामक राजनीतिक दल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
In simple words: डाबला-कांड में पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे किसानों पर हमला किया था, और लोक परिषद् ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई।

🎯 Exam Tip: प्रमुख घटनाओं के साथ-साथ उनमें शामिल राजनीतिक दलों के योगदान को भी याद रखें।

 

Question 26. भीलों को सामाजिक समुदाय में संगठित करने वाले कौन थे?
Answer: सुर्जी भगत और गोविन्द गुरु ने भीलों को सामाजिक रूप से संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने भील समुदाय में जागरूकता फैलाई।
In simple words: सुर्जी भगत और गोविन्द गुरु ने भीलों को एकजुट किया।

🎯 Exam Tip: जनजाति आंदोलनों में समाज सुधारकों की भूमिका को हमेशा प्रमुखता से उजागर करें।

 

Question 27. राजस्थान की दो प्रमुख जनजातियों के नाम लिखिए।
Answer: राजस्थान की दो मुख्य जनजातियाँ भील और मीणा हैं। ये दोनों जनजातियाँ राज्य के इतिहास और संस्कृति में महत्वपूर्ण रही हैं।
In simple words: राजस्थान की दो मुख्य जनजातियाँ भील और मीणा हैं।

🎯 Exam Tip: राजस्थान की प्रमुख जनजातियों के नाम और उनकी सांस्कृतिक विरासत को याद रखना उपयोगी होता है।

 

Question 28. भील आन्दोलन के प्रमुख नेताओं के नाम लिखिए।
Answer: भील आंदोलन के मुख्य नेता गोविन्द गुरु और मोतीलाल तेजावत थे। इन्होंने भील समुदाय के अधिकारों के लिए संघर्ष किया था।
In simple words: गोविन्द गुरु और मोतीलाल तेजावत भील आंदोलन के प्रमुख नेता थे।

🎯 Exam Tip: जनजाति आंदोलनों के नेताओं और उनके योगदान को विशेष रूप से याद रखें।

 

Question 29. बिजौलिया क्षेत्र के किसान किस जाति के थे?
Answer: बिजौलिया क्षेत्र के किसान मुख्य रूप से धाकड़ जाति के थे। उन्होंने इस आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था।
In simple words: बिजौलिया के किसान धाकड़ जाति के थे।

🎯 Exam Tip: किसान आंदोलनों में शामिल प्रमुख जातियों को याद रखना उनके सामाजिक संदर्भ को समझने में मदद करता है।

 

Question 30. बिजौलिया आन्दोलन का उद्देश्य क्या था?
Answer: बिजौलिया किसान आंदोलन का मुख्य उद्देश्य था कि जागीरदार किसानों पर जो भारी कर, अलग-अलग लागतें और बेगार-प्रथा थोपते थे, उनके खिलाफ आवाज़ उठाना। इसका लक्ष्य किसानों को न्याय दिलाना था।
In simple words: बिजौलिया आंदोलन का उद्देश्य भारी करों और बेगार-प्रथा के खिलाफ़ किसानों को न्याय दिलाना था।

🎯 Exam Tip: किसी भी आंदोलन के मूल उद्देश्य को स्पष्ट रूप से बताना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उसके महत्व को दर्शाता है।

 

Question 31. धाकड़ किसानों के कौन - से दो नेता 1897 में किसानों की दुर्दशा को व्यक्त करने उदयपुर महाराणा के पास गए?
Answer: 1897 में धाकड़ किसानों के दो नेता, नानाजी पटेल और ठाकरी पटेल, किसानों की खराब हालत बताने के लिए उदयपुर के महाराणा के पास गए थे।
In simple words: नानाजी पटेल और ठाकरी पटेल 1897 में किसानों की हालत बताने महाराणा के पास गए थे।

🎯 Exam Tip: किसानों के शुरुआती प्रतिनिधियों और उनके द्वारा उठाई गई समस्याओं की जानकारी याद रखना आंदोलन के विकास को समझने में सहायक है।

 

Question 32. विजय सिंह पथिक का वास्तविक नाम क्या था?
Answer: विजय सिंह पथिक का असली नाम भूपसिंह था। उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने के बाद यह नाम अपनाया था।
In simple words: विजय सिंह पथिक का असली नाम भूपसिंह था।

🎯 Exam Tip: कुछ महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों के असली नामों को याद रखना उनके इतिहास को समझने में मदद करता है।

 

Question 34. गोविन्द गुरु ने भीलों को संगठित करने के लिए किस संस्था की स्थापना की?
Answer: गोविन्द गुरु ने भीलों को एकजुट करने के लिए 'सम्प सभा' नामक संस्था की स्थापना की थी। इस सभा का उद्देश्य भीलों में सामाजिक और नैतिक सुधार लाना था।
In simple words: गोविन्द गुरु ने भीलों को एकजुट करने के लिए 'सम्प सभा' बनाई थी।

🎯 Exam Tip: समाज सुधारकों द्वारा स्थापित संस्थाओं के नाम और उनके उद्देश्यों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 35. भीलों में राष्ट्रीय चेतना को फैलाने में अभूतपूर्व योगदान देने वाले व्यक्तियों के नाम लिखिए।
Answer: भीलों में राष्ट्रीय चेतना फैलाने में विजय सिंह पथिक, माणिक्य लाल वर्मा और हरिभाऊ उपाध्याय ने बहुत बड़ा योगदान दिया था। उन्होंने भीलों को अपने अधिकारों के लिए जागरूक किया।
In simple words: विजय सिंह पथिक, माणिक्य लाल वर्मा और हरिभाऊ उपाध्याय ने भीलों में राष्ट्रीय भावना जगाई।

🎯 Exam Tip: जनजाति समूहों में राष्ट्रीय भावना जगाने वाले नेताओं के नाम और उनके प्रयासों को हमेशा याद रखें।

 

Question 36. 1927 ई. में स्थापित 'राजस्थान मध्य भारत सभा' का मुख्य उद्देश्य क्या था?
Answer: 1927 ई. में बनी 'राजस्थान मध्य भारत सभा' का मुख्य उद्देश्य था कि वह कांग्रेस की गतिविधियों के बारे में लोगों को जानकारी दे। यह सभा लोगों को राजनीतिक रूप से जागरूक करना चाहती थी।
In simple words: 'राजस्थान मध्य भारत सभा' का उद्देश्य लोगों को कांग्रेस की गतिविधियों के बारे में बताना था।

🎯 Exam Tip: राष्ट्रीय आंदोलन में क्षेत्रीय सभाओं की भूमिका और उनके उद्देश्यों को याद रखना सहायक होता है।

 

Question 37. राजस्थान में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक – परिषद् की शाखाओं के नाम लिखिए।
Answer: राजस्थान में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक-परिषद् की शाखाओं को प्रजामण्डल, प्रजा परिषद् या लोक परिषद् कहा जाता था। ये सभी स्थानीय स्तर पर राजनीतिक जागरूकता फैलाते थे।
In simple words: अखिल भारतीय देशी राज्य लोक-परिषद् की शाखाओं को प्रजामण्डल, प्रजा परिषद् या लोक परिषद् कहते थे।

🎯 Exam Tip: विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं के स्थानीय नामों और उनके कार्यों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 38. मेवाड़ में प्रजामण्डल की स्थापना के बाद प्रथम अधिवेशन में क्या लक्ष्य रखा गया?
Answer: मेवाड़ में प्रजामण्डल की स्थापना के बाद पहले अधिवेशन में यह तय किया गया कि राज्य में लोगों को खुद की सरकार चलाने का अधिकार (उत्तरदायी शासन) मिले और उन्हें नागरिक अधिकार भी दिए जाएँ।
In simple words: मेवाड़ प्रजामण्डल के पहले अधिवेशन में उत्तरदायी शासन और नागरिक अधिकारों की माँग की गई।

🎯 Exam Tip: प्रजामण्डलों के शुरुआती लक्ष्यों और उनके पहले अधिवेशनों के महत्व को समझना आंदोलन के उद्देश्यों को दर्शाता है।

 

Question 39. दिसम्बर, 1927 ई. में 'देशी राज्य लोक – परिषद्' की स्थापना क्यों हुई?
Answer: दिसम्बर, 1927 ई. में 'देशी राज्य लोक-परिषद्' की स्थापना इसलिए हुई ताकि देशी राज्यों के लोगों को एक साथ जोड़ा जा सके। इसका उद्देश्य लोगों में राजनीतिक एकता लाना था।
In simple words: 'देशी राज्य लोक-परिषद्' की स्थापना देशी राज्यों के लोगों को एकजुट करने के लिए की गई थी।

🎯 Exam Tip: किसी भी संस्था की स्थापना के कारण और उसके मुख्य उद्देश्य को याद रखना ऐतिहासिक संदर्भ को स्पष्ट करता है।

 

Question 41. 'राजपूताना मध्य भारत सभा' का अधिवेशन कहाँ व किसकी अध्यक्षता में हुआ?
Answer: 'राजपूताना मध्य भारत सभा' का अधिवेशन अजमेर में हुआ था और इसकी अध्यक्षता जमनालाल बजाज ने की थी।
In simple words: 'राजपूताना मध्य भारत सभा' का अधिवेशन जमनालाल बजाज की अध्यक्षता में अजमेर में हुआ था।

🎯 Exam Tip: प्रमुख राजनीतिक सभाओं के आयोजन स्थल और उनके अध्यक्षों के नाम अक्सर परीक्षा में पूछे जाते हैं।

 

Question 42. 'कोटा राज्य प्रजामण्डल' को प्रथम अधिवेशन कब और किसकी अध्यक्षता में हुआ?
Answer: 'कोटा राज्य प्रजामण्डल' का पहला अधिवेशन नयनूराम शर्मा की अध्यक्षता में माँगरोल में हुआ था।
In simple words: 'कोटा राज्य प्रजामण्डल' का पहला अधिवेशन नयनूराम शर्मा की अध्यक्षता में माँगरोल में हुआ था।

🎯 Exam Tip: विभिन्न प्रजामण्डलों के पहले अधिवेशनों की जानकारी, विशेषकर उनके अध्यक्ष और स्थान, महत्वपूर्ण होते हैं।

 

Question 43. बीकानेर प्रजामण्डल की स्थापना कहाँ और किसने की?
Answer: बीकानेर प्रजामण्डल की स्थापना बीकानेर में मघाराम वैद्य ने की थी। यह प्रजामण्डल बीकानेर में राजनीतिक जागरूकता फैलाने का काम करता था।
In simple words: मघाराम वैद्य ने बीकानेर में बीकानेर प्रजामण्डल की स्थापना की थी।

🎯 Exam Tip: प्रजामण्डलों के संस्थापक और उनके स्थापना स्थलों को याद रखना सहायक होता है।

 

Question 44. 1911 ई. में दिल्ली दरबार के समय मेवाड़ का महाराणा कौन था?
Answer: 1911 ई. में दिल्ली दरबार के समय मेवाड़ के महाराणा फतह सिंह थे। उन्होंने दरबार में भाग लिया था।
In simple words: 1911 में दिल्ली दरबार के समय महाराणा फतह सिंह मेवाड़ के शासक थे।

🎯 Exam Tip: प्रमुख ऐतिहासिक आयोजनों के समय महत्वपूर्ण रियासतों के शासकों के नाम याद रखें।

 

Question 45. राजस्थान मध्य भारत सभा' का गठन किन कार्यकर्ताओं ने मिलकर किया था?
Answer: 'राजस्थान मध्य भारत सभा' का गठन सेठ जमनालाल बजाज और विजय सिंह पथिक जैसे कार्यकर्ताओं ने मिलकर किया था। इसका उद्देश्य राजनीतिक गतिविधियों को बढ़ावा देना था।
In simple words: सेठ जमनालाल बजाज और विजय सिंह पथिक ने 'राजस्थान मध्य भारत सभा' बनाई थी।

🎯 Exam Tip: किसी भी संस्था के संस्थापकों या मुख्य सदस्यों के नाम याद रखें, खासकर जब वे राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े हों।

 

Question 46. 'मारवाड़ हितकारिणी' सभा की ओर से किन दो पुस्तिकाओं का प्रकाशन किया गया?
Answer: 'मारवाड़ हितकारिणी' सभा ने दो पुस्तिकाएँ प्रकाशित की थीं: 'मारवाड़ की अवस्था' और 'पोपाबाई की पोल'। ये पुस्तिकाएँ मारवाड़ की तत्कालीन स्थिति को उजागर करती थीं।
In simple words: 'मारवाड़ हितकारिणी' सभा ने 'मारवाड़ की अवस्था' और 'पोपाबाई की पोल' नाम की दो किताबें छापी थीं।

🎯 Exam Tip: सामाजिक या राजनीतिक संगठनों द्वारा प्रकाशित महत्वपूर्ण साहित्य और उनके शीर्षकों को याद रखें।

 

Question 48. 30 दिसम्बर, 1940 ई. को 'प्रजा – परिषद्' का पहला राजनीतिक सम्मेलन किसकी अध्यक्षता में हुआ?
Answer: 30 दिसम्बर, 1940 ई. को 'प्रजा-परिषद्' का पहला राजनीतिक सम्मेलन जयनारायण व्यास की अध्यक्षता में हुआ था।
In simple words: 'प्रजा-परिषद्' का पहला सम्मेलन जयनारायण व्यास की अध्यक्षता में हुआ था।

🎯 Exam Tip: प्रमुख सम्मेलनों के आयोजकों और उनकी अध्यक्षता करने वाले व्यक्तियों के नाम याद रखें।

 

Question 49. अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् के सातवें अधिवेशन की अध्यक्षता किसने की?
Answer: अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् के सातवें अधिवेशन की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की थी।
In simple words: जवाहरलाल नेहरू ने अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् के सातवें अधिवेशन की अध्यक्षता की थी।

🎯 Exam Tip: अखिल भारतीय स्तर के सम्मेलनों के अध्यक्षों के नाम अक्सर महत्वपूर्ण होते हैं।

 

Question 50. प्रतापगढ़ में किसके नेतृत्व में उत्तरदायी मन्त्रिमण्डल का गठन किया गया?
Answer: प्रतापगढ़ में प्रो. गोकुलदास असावा के नेतृत्व में उत्तरदायी मंत्रिमंडल का गठन 14 अगस्त, 1947 को किया गया था।
In simple words: प्रतापगढ़ में गोकुलदास असावा के नेतृत्व में सरकार बनी थी।

🎯 Exam Tip: विभिन्न राज्यों में अंतरिम सरकारों के गठन और उनके नेताओं को याद रखना एकीकरण प्रक्रिया को समझने में मदद करता है।

 

Question 51. सितम्बर, 1946 ई. अखिल भारतीय देशी राज्य लोक – परिषद् ने राजस्थान के सम्बन्ध में क्या निर्णय लिया था?
Answer: सितम्बर, 1946 ई. में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक-परिषद् ने यह तय किया था कि पूरे राजस्थान को एक इकाई के रूप में भारतीय संघ में शामिल किया जाना चाहिए।
In simple words: 1946 में, अखिल भारतीय देशी राज्य लोक-परिषद् ने राजस्थान को भारत में एक इकाई के रूप में जोड़ने का फैसला किया।

🎯 Exam Tip: एकीकरण से पहले की प्रमुख समितियों के निर्णयों को याद रखना रियासतों के एकीकरण के चरणों को समझने में मदद करता है।

 

Question 52. राजस्थान की कौन – सी रियासत अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रख सकती थी?
Answer: राजस्थान में केवल उदयपुर, जोधपुर, जयपुर और बीकानेर ही ऐसी रियासतें थीं जो अपनी पहचान बनाए रख सकती थीं। इन रियासतों की आय और जनसंख्या भारत सरकार के मानदंडों को पूरा करती थी।
In simple words: उदयपुर, जोधपुर, जयपुर और बीकानेर ही अपनी अलग पहचान रख सकते थे।

🎯 Exam Tip: उन रियासतों के नाम याद रखें जो भारत सरकार के मानदंडों के अनुसार अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रख सकती थीं।

 

Question 53. राजस्थान व आन्दोलन समिति के अध्यक्ष श्री राममनोहर लोहिया ने क्या माँग की थी?
Answer: राजस्थान व आंदोलन समिति के अध्यक्ष श्री राममनोहर लोहिया ने माँग की थी कि जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर और मत्स्य संघ को मिलाकर एक मजबूत 'संयुक्त राजस्थान' बनाया जाए और उसे भारतीय संघ में शामिल किया जाए।
In simple words: राममनोहर लोहिया ने कई राज्यों को मिलाकर एक मजबूत संयुक्त राजस्थान बनाने की माँग की थी।

🎯 Exam Tip: प्रमुख नेताओं की मांगों और उनके द्वारा प्रस्तावित एकीकरण के मॉडल को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 55. संयुक्त राजस्थान का महाराज प्रमुख कौन था?
Answer: 25 मार्च, 1948 को मेवाड़ के विलय से पहले, संयुक्त राजस्थान के महाराज प्रमुख कोटा के महाराव भीम सिंह थे। लेकिन 18 अप्रैल, 1948 को मेवाड़ के विलय के बाद यह पद मेवाड़ के महाराणा भूपाल सिंह को दे दिया गया था।
In simple words: पहले कोटा के महाराव भीम सिंह महाराज प्रमुख थे, फिर मेवाड़ के महाराणा भूपाल सिंह बने।

🎯 Exam Tip: एकीकरण के विभिन्न चरणों में प्रमुख पदों पर नियुक्त व्यक्तियों के नाम और उनके बदलाव को ध्यान में रखें।

 

Question 56. वृहत् राजस्थान की राजधानी कौन – सी थी?
Answer: 30 मार्च, 1949 को बने वृहत् राजस्थान की राजधानी जयपुर थी। जयपुर को अपनी ऐतिहासिक और भौगोलिक महत्व के कारण यह स्थान दिया गया।
In simple words: वृहत् राजस्थान की राजधानी जयपुर थी।

🎯 Exam Tip: विभिन्न एकीकरण चरणों में राज्यों की राजधानियों को याद रखना एक महत्वपूर्ण तथ्य है।

 

Question 57. रियासतों के एकीकरण का श्रेय किसे दिया जाता है?
Answer: रियासतों के एकीकरण का पूरा श्रेय सरदार वल्लभ भाई पटेल को दिया जाता है। उनकी दूरदर्शिता और कूटनीति के कारण ही भारत का एकीकरण संभव हो पाया।
In simple words: सरदार वल्लभ भाई पटेल को रियासतों के एकीकरण का श्रेय दिया जाता है।

🎯 Exam Tip: भारत के एकीकरण में सरदार पटेल की भूमिका को हमेशा प्रमुखता से याद रखें।

 

Question 58. राजस्थान दिवस कब और क्यों मनाया जाता है?
Answer: राजस्थान दिवस 30 मार्च, 1949 को मनाया जाता है। इस दिन वृहत् राजस्थान का निर्माण पूरा हुआ था, और इसी खुशी में यह दिन राजस्थान दिवस के रूप में मनाया जाता है।
In simple words: 30 मार्च को वृहत् राजस्थान बनने की खुशी में राजस्थान दिवस मनाया जाता है।

🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण दिवसों की तारीखें और उनके पीछे के ऐतिहासिक कारणों को याद रखना सहायक होता है।

 

Question 59. 'मत्स्य – संघ' का निर्माण कब और किन राज्यों के विलय से हुआ?
Answer: 'मत्स्य-संघ' का निर्माण 18 मार्च, 1948 को अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली रियासतों को मिलाकर हुआ था।
In simple words: 'मत्स्य-संघ' 18 मार्च, 1948 को अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली को मिलाकर बना था।

🎯 Exam Tip: राजस्थान के एकीकरण के पहले चरण 'मत्स्य-संघ' की तारीख और उसमें शामिल राज्यों को याद रखें।

 

Question 60. 'मत्स्य – संघ' की राजधानी क्या थी? इसके प्रधानमन्त्री कौन थे?
Answer: 'मत्स्य-संघ' की राजधानी अलवर थी और इसके पहले प्रधानमन्त्री श्री शोभाराम थे।
In simple words: मत्स्य-संघ की राजधानी अलवर थी, और शोभाराम इसके प्रधानमन्त्री थे।

🎯 Exam Tip: एकीकरण के प्रत्येक चरण में राजधानी और प्रधानमन्त्री के नाम को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 61. किस आधार पर राजस्थान के प्रथम संघ का नाम 'मत्स्य – संघ' रखा गया?
Answer: राजस्थान के पहले संघ का नाम 'मत्स्य-संघ' श्री के.एम. मुंशी के सुझाव पर रखा गया था। यह नाम महाभारत काल में इस क्षेत्र के नाम पर आधारित था।
In simple words: 'मत्स्य-संघ' नाम महाभारत काल के संदर्भ में के.एम. मुंशी के सुझाव पर रखा गया था।

🎯 Exam Tip: ऐतिहासिक नामों और उनके पीछे के तर्क को समझना अक्सर बेहतर याद रखने में मदद करता है।

 

Question 63. जयपुर के राजा मानसिंह ने वृहत् राजस्थान में जयपुर रियासत के विलय के सम्बन्ध में क्या शर्त रखी?
Answer: जयपुर के महाराज मानसिंह ने वृहत् राजस्थान में विलय के लिए यह शर्त रखी थी कि जयपुर के महाराजा को वृहत् राजस्थान का वंशानुगत राजप्रमुख बनाया जाए और जयपुर को भविष्य में राजस्थान की राजधानी बनाया जाए।
In simple words: मानसिंह ने शर्त रखी कि वे स्वयं राजप्रमुख बनें और जयपुर को राजधानी बनाया जाए।

🎯 Exam Tip: एकीकरण के दौरान विभिन्न शासकों द्वारा रखी गई शर्तों को याद रखें, क्योंकि ये एकीकरण प्रक्रिया को प्रभावित करती थीं।

 

RBSE Class 12 History Chapter 7 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. राजस्थान में 1857 की क्रान्ति की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए।
Answer: 1857 में जब भारत में स्वतंत्रता संग्राम फैला, तो राजस्थान में भी इसकी शुरुआत हुई। उस समय राजस्थान में ब्रिटिश एजेंट गवर्नर पैट्रिक लॉरेन्स थे। राजस्थान में नसीराबाद, नीमच, देवली, कोटा, एरिनपुरा और खेरवाड़ा सहित छह मुख्य सैनिक छावनियां थीं। ये छावनियां क्रांति के मुख्य केंद्र बनीं, जहाँ सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया।
In simple words: 1857 में राजस्थान में क्रांति नसीराबाद, नीमच, देवली, कोटा, एरिनपुरा और खेरवाड़ा जैसी सैनिक छावनियों से शुरू हुई, जब अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह भड़क उठा।

🎯 Exam Tip: 1857 की क्रांति के प्रमुख केंद्रों और उनमें शामिल ब्रिटिश अधिकारियों के नाम को हमेशा याद रखें।

 

Question 2. 1857 के स्वाधीनता संग्राम में दामोदरदास राठी का क्या योगदान है?
Answer: दामोदरदास राठी (1882-1918) राजस्थान के अग्रणी स्वतंत्रता प्रेमियों में से एक थे। वे एक उद्योगपति थे और राव गोपाल सिंह व अरविन्द घोष के संपर्क में थे। राठी ने ब्यावर में आर्य समाज और होमरूल आंदोलन की शाखाएँ खोलीं। उन्होंने सनातन धर्म शिक्षा संस्था भी स्थापित की। वे तिलक की उग्र नीति के समर्थक थे और सामाजिक सुधार व शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ क्रांतिकारी गतिविधियों में भी शामिल थे। उन्होंने क्रांतिकारियों को आर्थिक मदद भी दी।
In simple words: दामोदरदास राठी एक उद्योगपति और स्वतंत्रता प्रेमी थे, जिन्होंने ब्यावर में आर्य समाज और होमरूल आंदोलन की शाखाएं खोलीं और क्रांतिकारियों की मदद की।

🎯 Exam Tip: स्वतंत्रता संग्राम में आर्थिक और सामाजिक सुधारों के लिए काम करने वाले व्यक्तियों के योगदान को विशेष रूप से याद रखें।

 

Question 3. 1857 ई. की क्रान्ति में आऊवां के खुशाल सिंह के योगदान का वर्णन करो।
Answer: 1857 की क्रांति में आऊवा के ठाकुर खुशाल सिंह ने क्रांतिकारियों का साथ दिया। उनके और जोधपुर महाराजा के बीच पुराने विवाद थे, जिसका फायदा उन्होंने इस मौके पर उठाया। 8 सितंबर, 1857 को पाली के पास बिठोड़ा और चेलावास में खुशाल सिंह की सेनाओं ने जोधपुर की सेनाओं को हरा दिया। इस हार से ब्रिटिश एजेंट गवर्नर जनरल लॉरेन्स खुद आऊवा की ओर बढ़े। 18 सितंबर को ब्रिटिश सेना ने आऊवा पर हमला किया, लेकिन वह असफल रही। क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मोक मेसन को मार डाला और उनका सिर किले पर लटका दिया, जो उनकी जीत का प्रतीक बना।
In simple words: ठाकुर खुशाल सिंह ने 1857 की क्रांति में अंग्रेजों और जोधपुर की सेनाओं के खिलाफ़ महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ी, जिसमें ब्रिटिश अधिकारी मोक मेसन मारे गए।

🎯 Exam Tip: स्थानीय विद्रोहों के नेताओं और उनकी मुख्य लड़ाइयों को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर जब उनमें ब्रिटिश अधिकारियों की हार हुई हो।

 

Question 4. 1857 ई. के स्वाधीनता संग्राम में तात्या टोपे के राजस्थान आगमन की घटना का विवरण दीजिए।
Answer: 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान तात्या टोपे का राजस्थान आना एक महत्वपूर्ण घटना थी। ग्वालियर में असफल होने के बाद, वे मदद के लिए लालसोट होते हुए टोंक आए, जहाँ सेना ने उनका समर्थन किया। वहाँ से वे सलूंबर गए और रावल केसरी सिंह ने उनकी सहायता की। अंग्रेजों ने 9 अगस्त, 1858 को उन्हें बनास नदी के तट पर हराया। इसके बाद वे हाड़ौती आए और झालरापाटन पर कब्जा कर लिया, लेकिन सितंबर में अंग्रेजों ने उन्हें फिर हराया। दिसंबर 1858 में तात्या टोपे फिर राजस्थान आए और बांसवाड़ा होते हुए दौसा व सीकर भी गए, लेकिन अंग्रेजी सेनाओं ने उन्हें हर जगह पराजित किया। आखिर में नरवर के जागीरदार मानसिंह के धोखे के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और अप्रैल 1859 में फांसी दे दी गई।
In simple words: तात्या टोपे कई बार राजस्थान आए, उन्हें स्थानीय शासकों से मदद भी मिली, लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें बार-बार हराया और आखिर में एक धोखे के कारण उन्हें फांसी दे दी गई।

🎯 Exam Tip: किसी भी क्रांतिकारी नेता के आंदोलनों का भौगोलिक फैलाव और उनके पतन के कारण हमेशा याद रखें।

 

Question 5. 1857 की स्वतन्त्रता संग्राम की असफलता के क्या कारण थे?
Answer: 1857 का स्वतंत्रता संग्राम राजस्थान में कई कारणों से असफल रहा। सितंबर 1857 में मुगल बादशाह बहादुरशाह और उनके परिवार को रंगून भेज दिया गया, जिससे क्रांति धीमी पड़ गई। तात्या टोपे की गिरफ्तारी के साथ ही राजस्थान में पहला स्वतंत्रता संग्राम खत्म हो गया। राजस्थान में क्रांति की असफलता के मुख्य कारण थे: नेतृत्व की कमी, क्रांतिकारियों में आपसी तालमेल का अभाव, रणनीति की कमी, और स्थानीय शासकों का अंग्रेजों को समर्थन। इससे ब्रिटिश सत्ता फिर से मजबूत हो गई।
In simple words: 1857 की क्रांति राजस्थान में नेतृत्व की कमी, आपसी तालमेल की कमी, गलत रणनीति और स्थानीय शासकों के अंग्रेजों को समर्थन के कारण असफल रही।

🎯 Exam Tip: किसी भी बड़े आंदोलन की असफलता के कारणों में हमेशा नेतृत्व, रणनीति, संगठन और बाहरी समर्थन की भूमिका को शामिल करें।

 

Question 6. राजस्थान में क्रान्ति के प्रवाह को रोकने हेतु ब्रिटिश सरकार ने देशी राज्यों के प्रति किस नीति को परिवर्तित किया?
Answer: राजस्थान के शासकों ने क्रांति के फैलाव को रोकने में अंग्रेजों का साथ दिया। अंग्रेज शासकों ने यह समझ लिया कि भारत पर राज करने के लिए देशी राजा उनके लिए उपयोगी हैं। इसलिए, अंग्रेजों ने अपनी नीति बदल दी। उन्होंने शासकों को खुश करने के लिए 'गोद निषेध' का नियम खत्म कर दिया, राजाओं को अंग्रेजी शिक्षा दी जाने लगी, और उनकी सेवाओं के लिए उन्हें पुरस्कार व उपाधियाँ दी गईं। इससे ब्रिटिश शासन और पश्चिमी सभ्यता के प्रति उनकी आस्था बढ़ गई।
In simple words: अंग्रेजों ने राजस्थान में क्रांति रोकने के लिए देशी राजाओं को अपना मददगार बनाया। उन्होंने 'गोद निषेध' प्रथा खत्म की और राजाओं को सम्मान दिया, जिससे वे अंग्रेजों के वफादार बन गए।

🎯 Exam Tip: ब्रिटिश सरकार की नीतियों में हुए बदलावों और उनके प्रभावों को हमेशा याद रखें, खासकर वे जो भारतीय शासकों से संबंधित थे।

 

Question 7. राजस्थान में किसान आन्दोलन के क्या कारण थे?
Answer: बीसवीं सदी की शुरुआत तक, राजस्थान के राज्यों में अंग्रेजों का दखल और नियंत्रण बहुत बढ़ गया था। अंग्रेजों को नियमित कर और बढ़ते खर्चों के कारण किसानों और शासकों के पारंपरिक संबंधों में बदलाव आ गया। किसानों पर नए कर लगाए गए और जबरदस्ती बेगार ली जाने लगी। शासकों और जागीरदारों को अब बाहरी हमलों का डर नहीं था, इसलिए वे जनता पर अधिक शोषण करने लगे। अंग्रेजी नियंत्रण से पश्चिमी विचारों का प्रभाव भी पड़ा, जिससे शासकों और जागीरदारों की जीवनशैली बदल गई और उनके खर्चे बढ़ गए। इन खर्चों को पूरा करने के लिए किसानों का और अधिक आर्थिक शोषण हुआ, जिसके परिणामस्वरूप संगठित किसान आंदोलन शुरू हो गए।
In simple words: अंग्रेजों के बढ़ते नियंत्रण, नए करों, बेगार और शासकों के बढ़ते खर्चों के कारण किसानों का शोषण हुआ, जिससे आंदोलन शुरू हुए।

🎯 Exam Tip: किसान आंदोलनों के मूल कारणों में हमेशा आर्थिक शोषण, भारी कर और बेगार-प्रथा शामिल होती हैं।

 

Question 8. अलवर के किसान आन्दोलन पर प्रकाश डालिए।
Answer: अलवर राज्य में भी जन-जागरूकता किसान आंदोलन से शुरू हुई। जंगली सूअरों के उपद्रव से परेशान किसानों ने आंदोलन चलाया। महाराजा ने सूअरों को मारने का आदेश देकर समझौता किया। बाद में, किसानों ने लगान बढ़ाने के खिलाफ नीमूचणा गाँव में एक सभा की। सैनिकों ने गांव छोड़कर जा रहे लोगों पर गोलियां चलाईं, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। महात्मा गाँधी ने इस घटना का विरोध किया, जिसे नीमूचणा कांड कहा गया। अंग्रेजी शासन पर दबाव पड़ा और अलवर के महाराजा ने किसानों से समझौता किया।
In simple words: अलवर में जंगली सूअरों और लगान वृद्धि के खिलाफ़ किसान आंदोलन हुआ। नीमूचणा कांड में कई लोग मारे गए, जिसके बाद महाराजा को समझौता करना पड़ा।

🎯 Exam Tip: किसान आंदोलनों में स्थानीय मुद्दों (जैसे जंगली सूअर) और बड़े राजनीतिक कारणों (जैसे लगान वृद्धि) दोनों को ध्यान में रखें।

 

Question 9. राजस्थान में हुए किसान आन्दोलन का महत्व बताइए।
Answer: राजस्थान और राष्ट्रीय स्तर पर किसान आंदोलनों का बहुत महत्व था। इन आंदोलनों ने शासकों और अंग्रेजी सरकार की दमनकारी नीतियों को पूरे देश के सामने रखा। उन्होंने राजनीतिक जागरूकता को बढ़ाया और सामंती व्यवस्था को खत्म करने तथा लोकतांत्रिक शासन की भावना को मजबूत किया। किसानों और जनता को राष्ट्रीय नेताओं और कांग्रेस का भी समर्थन मिला, जिससे इन आंदोलनों को और ताकत मिली।
In simple words: राजस्थान के किसान आंदोलनों ने दमनकारी नीतियों को उजागर किया, राजनीतिक चेतना बढ़ाई, और सामंती व्यवस्था को खत्म करने में मदद की।

🎯 Exam Tip: आंदोलनों के महत्व को बताते समय, उनके राजनीतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावों को हमेशा स्पष्ट करें।

 

Question 10. भीलों की प्रकृति और उनके चरित्र का उल्लेख कीजिए।
Answer: भील भारत की सबसे पुरानी जातियों में से एक माने जाते हैं। भीलों की उत्पत्ति को लेकर कई कहानियाँ प्रचलित हैं। 'बाणभट्ट' के 'कादम्बरी' में और 'कथा-सरित्सागर' में 'भील' शब्द का उपयोग मिलता है। कुछ विद्वानों के अनुसार 'भील' शब्द 'भिल्ला' शब्द से बना है। भील समुदाय अपनी परम्पराओं, सामाजिक और आर्थिक स्थिति को लेकर बहुत जागरूक रहा है। वे अपने अधिकारों के हनन पर हमेशा विरोध करते थे, चाहे वह अंग्रेजों के खिलाफ़ हो या स्थानीय शासकों के खिलाफ़।
In simple words: भील भारत की पुरानी जाति है, जो अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर जागरूक रही है और हमेशा अन्याय का विरोध करती थी।

🎯 Exam Tip: जनजातियों के बारे में लिखते समय, उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सांस्कृतिक पहचान और उनकी संघर्षशीलता पर ध्यान दें।

 

Question 11. एक्की आन्दोलन के प्रवर्तक मोतीलाल तेजावत के बारे में आप क्या जानते हैं?
Answer: मोतीलाल तेजावत ने 1921 ई. में भीलों का नेतृत्व संभाला और 'एक्की आंदोलन' शुरू किया। उन्होंने भीलों को लगान और बेगार न देने के लिए प्रेरित किया। यह आंदोलन जनजातियों में राजनीतिक जागरूकता का प्रतीक बन गया। डूंगरपुर के महारावल ने आंदोलन के फैलने के डर से सभी प्रकार की बेगारें अपने राज्य से खत्म कर दीं। अंग्रेजी सरकार ने 7 अप्रैल, 1922 को ईडर क्षेत्र में गोलीबारी की और 3 जून, 1929 को ईडर राज्य ने तेजावत को गिरफ्तार कर मेवाड़ सरकार को सौंप दिया।
In simple words: मोतीलाल तेजावत ने भीलों का 'एक्की आंदोलन' शुरू किया, उन्हें लगान न देने के लिए प्रेरित किया, जिससे जनजातियों में जागरूकता आई, लेकिन अंततः उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

🎯 Exam Tip: जनजाति आंदोलनों के प्रमुख नेताओं और उनके योगदान के साथ-साथ उनके संघर्षों और गिरफ्तारी के विवरण को भी याद रखें।

 

Question 12. मीणा आन्दोलन के क्या कारण थे?
Answer: मीणा आंदोलन के कई कारण थे। 1924 में अंग्रेजी सरकार ने मीणाओं को 'जरायम पेशा कौम' (जन्मजात अपराधी जाति) घोषित कर दिया, जिससे उन्हें रोज पुलिस थाने में हाजिरी देनी पड़ती थी। उनकी आर्थिक स्थिति खराब थी क्योंकि उनके पास आय के साधन कम थे। इस अपमानजनक कानून के विरोध में छोटू लाल, महादेव, जवाहर राम जैसे नेताओं ने 'मीणा जाति सभा' बनाई। शिक्षा के प्रसार और सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी आवाज उठाई गई। ठक्कर बापा के प्रयासों से जयपुर राज्य ने इस कानून को खत्म कर दिया, और बाद में जरायम पेशा अधिनियम 1952 में रद्द कर दिया गया।
In simple words: मीणा आंदोलन का कारण उन्हें 'अपराधी जाति' घोषित करना, रोज थाने में हाजिरी देना और खराब आर्थिक स्थिति थी, जिसके खिलाफ नेताओं ने सभाएं कीं।

🎯 Exam Tip: किसी भी जनजाति आंदोलन के कारणों में अक्सर भेदभावपूर्ण कानून, आर्थिक शोषण और सामाजिक उत्पीड़न शामिल होते हैं।

 

Question 13. मेवाड़ प्रजामण्डल आन्दोलन का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
Answer: मेवाड़ राजस्थान का एक महत्वपूर्ण राज्य था। कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन के बाद माणिक्य लाल वर्मा और बलवन्त सिंह मेहता ने 24 अप्रैल, 1938 को मेवाड़ प्रजामण्डल की स्थापना की। 11 मई, 1938 को इसे गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया। वर्मा जी ने अपनी गतिविधियां अजमेर से जारी रखीं और मेवाड़ के शासन की कटु आलोचना करती हुई एक पुस्तिका प्रकाशित की। फरवरी 1939 में उन्हें उदयपुर आने पर पीटा गया, जिसकी गाँधी जी ने 'हरिजन' में निंदा की। वर्मा जी को दो साल की जेल हुई, लेकिन 1941 में पाबंदी हट गई और प्रजामण्डल की शाखाएं पूरे राज्य में फैल गईं। 25-26 नवंबर, 1941 को पहला अधिवेशन हुआ, जिसमें उत्तरदायी शासन की मांग की गई।
In simple words: माणिक्य लाल वर्मा और बलवन्त सिंह मेहता ने 1938 में मेवाड़ प्रजामण्डल की स्थापना की, जो उत्तरदायी शासन के लिए संघर्षरत रहा और राज्यभर में फैल गया।

🎯 Exam Tip: प्रजामण्डल आंदोलनों के संस्थापकों, उनके संघर्षों और महत्वपूर्ण घटनाओं को कालक्रम के अनुसार याद रखें।

 

Question 15. एकीकरण के पूर्व राजस्थान की रियासतों की क्या स्थिति थी?
Answer: 15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हुआ, लेकिन भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 की धारा 8 के तहत ब्रिटिश सरकार ने भारतीय देशी रियासतों पर अपनी सर्वोच्चता वापस देशी रियासतों को सौंप दी। इसका मतलब था कि देशी रियासतें खुद तय कर सकती थीं कि वे भारत या पाकिस्तान में शामिल हों या स्वतंत्र रहें। अगर सभी रियासतें स्वतंत्र रहतीं तो भारत कई छोटे टुकड़ों में बंट जाता। इस समस्या को हल करने के लिए 5 जुलाई, 1947 को सरदार वल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता में रियासत सचिवालय बनाया गया।
In simple words: आजादी से पहले, देशी रियासतें स्वतंत्र रहने या भारत-पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला खुद कर सकती थीं, जिससे भारत के कई टुकड़ों में बंटने का खतरा था।

🎯 Exam Tip: स्वतंत्रता के समय रियासतों की स्थिति और उनके विकल्पों को समझना भारत के एकीकरण की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करता है।

 

Question 16. राजस्थान गठन के प्रारम्भिक प्रयास किए गए?
Answer: आजादी के समय राजस्थान में 22 छोटी-बड़ी रियासतें थीं और अजमेर-मेरवाड़ा का छोटा सा क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन था। इन सभी को मिलाकर एक इकाई बनाना बहुत मुश्किल था। सितंबर 1946 में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् ने निर्णय लिया कि पूरे राजस्थान को भारतीय संघ में एक इकाई के रूप में शामिल किया जाए। भारत सरकार के रियासत सचिवालय ने तय किया कि केवल वे रियासतें स्वतंत्र रह सकती हैं जिनकी वार्षिक आय एक करोड़ रुपये और जनसंख्या दस लाख से अधिक हो। राजस्थान में केवल चार रियासतें- जोधपुर, जयपुर, उदयपुर और बीकानेर- ही इन मानदंडों को पूरा करती थीं। छोटी रियासतें समझ गई थीं कि स्वतंत्र भारत में मिलकर स्वावलंबी इकाइयां बनाना ही एकमात्र विकल्प था।
In simple words: आजादी के समय राजस्थान में कई छोटी रियासतें थीं। इन्हें एक करने के लिए मानदंड तय किए गए, जिसमें केवल चार बड़ी रियासतें ही स्वतंत्र रह सकती थीं, बाकी को मिलकर एक इकाई बनानी थी।

🎯 Exam Tip: एकीकरण के प्रारंभिक प्रयासों में रियासतों की संख्या, उनके मानदंड और एकजुट होने की आवश्यकता को हमेशा याद रखें।

 

Question 17. राजस्थानी राज्यों की प्रमुख रियासतों की क्या-क्या समस्याएँ थीं?
Answer: आजादी के बाद राजस्थानी राज्यों की प्रमुख रियासतों की कई समस्याएं थीं। जैसे कि, गाँधीजी की हत्या में अलवर राज्य का नाम आने से अलवर विवादित हो गया था। जोधपुर की भौगोलिक स्थिति महत्वपूर्ण थी और पाकिस्तान की तरफ से उसे अपनी ओर मिलाने की चर्चा चल रही थी। मेवाड़ के महाराणा और जागीरदार अपनी ऐतिहासिक स्थिति के कारण संघ में विलय नहीं चाहते थे। बीकानेर भी सीमांत राज्य होने के कारण भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण था, लेकिन शासक स्वतंत्र रहना चाहते थे।
In simple words: राजस्थानी रियासतों की समस्याओं में अलवर का विवाद, जोधपुर पर पाकिस्तान का प्रभाव, मेवाड़ की स्वतंत्रता की इच्छा और बीकानेर का सीमांत महत्व शामिल थे।

🎯 Exam Tip: एकीकरण से पहले विभिन्न रियासतों की विशेष समस्याओं और उनके कारणों को समझना ऐतिहासिक संदर्भ को स्पष्ट करता है।

 

RBSE Class 12 History Chapter 7 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 18. एकीकृत राजस्थान का गठन कितने चरणों में पूर्ण हुआ?
Answer: एकीकृत राजस्थान का गठन पाँच चरणों में पूरा हुआ।
In simple words: Rajasthan became one state in five main steps.

🎯 Exam Tip: Remember the total number of integration phases for Rajasthan, as this is a key factual detail.

 

Question 19. मत्स्य संघ का निर्माण किस प्रकार हुआ?
Answer: अलवर, भरतपुर, धौलपुर, और करौली - ये चार princely states geographical, ethnic, and economic थे। In order to integrate these four states, their rulers were called to Delhi on February 27, 1948. A proposal for union was presented to them, which they happily accepted. On the suggestion of Shri K.M. Munshi, this union was named 'Matsya Sangh'. It was inaugurated on March 18, 1948, by Central Minister N.V. Gadgil. The Matsya Union had a population of 1.8 million and an annual income of Rs 20 million. The Maharaja of Dholpur, Udayabhan Singh, was appointed as its Rajpramukh (head), and a council of ministers was formed. Shobharam (Alwar) became the Chief Minister of Matsya Union. One member from each of the four states was included in the council of ministers. Gopilal Yadav (Bharatpur), Master Bholanath (Alwar), Dr. Mangal Singh (Dholpur), and Chiranjilal Sharma (Karauli) took the oath.
In simple words: Four nearby states with similar features joined together on February 27, 1948, to form the Matsya Union. It was named by K.M. Munshi and inaugurated on March 18, 1948. Shobharam from Alwar became the Chief Minister.

🎯 Exam Tip: Note the key dates, names of states, and important personalities involved in the formation of the Matsya Union.

 

Question 20. मेवाड़ का संयुक्त राजस्थान में विलय किस प्रकार हुआ?
Answer: Three days after the United Rajasthan was inaugurated, discussions began about merging Mewar into it. Sir Ramamurti told the Indian government about three main demands from the Maharaja of Mewar. First, the Maharaja wanted to be the hereditary Rajpramukh of United Rajasthan. Second, he asked for an annual privy purse of Rs 20 lakh. Third, he wanted Udaipur to be the capital of United Rajasthan. The Department of States discussed with the rulers of United Rajasthan and decided to merge Mewar into the United State of Rajasthan. The Maharaja was made the lifelong Rajpramukh, a position that would end after his death. Udaipur became the capital of United Rajasthan, but the legislative assembly would meet in Kota once a year. The Maharaja of Mewar requested Rs 20 lakh as privy purse, but he was given Rs 10 lakh, along with an annual grant of Rs 5 lakh for religious ceremonies. On April 1, 1948, Mewar signed the Instrument of Accession.
In simple words: Mewar joined United Rajasthan after its Maharaja made three demands: hereditary leadership, a large annual payment, and Udaipur as capital. After some negotiation, he was made lifelong leader and Udaipur became capital, receiving a privy purse of Rs 10 lakhs and an additional Rs 5 lakhs for religious purposes.

🎯 Exam Tip: Understand the specific demands made by the Mewar Maharaja and the final terms of the merger, including the roles and financial settlements.

 

Question 21. जयपुर राज्य का वृहत् राजस्थान में किस प्रकार विलय हुआ?
Answer: Shri V.P. Menon, Secretary of the States Department, visited Jaipur on January 11, 1949, and held talks with the Maharaja of Jaipur. Maharaja Sawai Man Singh was hesitant but eventually agreed to join Greater Rajasthan on the condition that he would be the hereditary Rajpramukh and Jaipur would be the future capital of Rajasthan. Shri Menon assured him that his terms for merger would be considered later. On January 14, 1949, Sardar Patel announced the formation of Greater Rajasthan at a public meeting in Udaipur. The Maharaja of Mewar was made the lifelong Maharaja Pramukh. The rulers of Jaipur were appointed Rajpramukh, while the rulers of Jodhpur and Kota became Senior Up-Rajpramukh. The rulers of Bundi and Dungarpur were made Junior Up-Rajpramukh. The Rajpramukh and his council of ministers were kept under the general control of the Central Government. The Rajpramukh had to sign a new Instrument of Accession and accept the federal and concurrent lists as per the Constitution.
In simple words: Jaipur joined Greater Rajasthan after its Maharaja agreed, asking to be the hereditary head and Jaipur to be the capital. Sardar Patel announced Greater Rajasthan's formation on January 14, 1949, with the Maharaja of Jaipur as Rajpramukh and Udaipur as the capital.

🎯 Exam Tip: Highlight the crucial role of V.P. Menon and Sardar Patel in negotiating the merger of Jaipur and the conditions set by its ruler.

 

Question 22. अजमेर मेरवाड़ा का विलय किस प्रकार हुआ?
Answer: During British rule, Ajmer-Merwara was a Chief Commissioner's province. The Rajputana Provincial Assembly of the All India States Peoples' Conference always demanded that Ajmer-Merwara should be included in Greater Rajasthan. After the 1952 general elections, a Congress ministry was formed in Ajmer-Merwara under the leadership of Shri Haribhau Upadhyay. The Congress leadership in Ajmer-Merwara was never in favor of merging Ajmer with Rajasthan. After the formation of the ministry in Ajmer-Merwara, the Congress leadership argued that it should remain a small state for administrative reasons. This matter was also handed over to the State Reorganisation Commission. The Commission rejected the arguments of the Congress leaders and recommended that the region of Ajmer-Merwara should be merged with Rajasthan. Accordingly, on November 1, 1956, Ajmer-Merwara, along with the Mount Abu region of Sirohi, was merged with Rajasthan.
In simple words: Ajmer-Merwara, a British-ruled area, was merged with Rajasthan on November 1, 1956, after a commission recommended it, despite initial opposition from local leaders who wanted it to remain a separate small state.

🎯 Exam Tip: Note the political dynamics and the final recommendation of the State Reorganisation Commission that led to Ajmer-Merwara's merger.

 

Question 23. एकीकृत राजस्थान में राजतन्त्र के अन्तिम अवशेषों की समाप्ति किस प्रकार हुई?
Answer: Even after the formation of integrated Rajasthan, the last remnants of monarchy remained in the form of the newly created post of Rajpramukh. The rulers of first-class states were called Governors, while those of second-class states were called Rajpramukhs. Both Governors and Rajpramukhs were appointed by the President, but the Rajpramukh was chosen only from the former rulers of the merged princely states in the respective state. The newly elected Parliament of India abolished the post of Rajpramukh through the Seventh Amendment to the Constitution on November 1, 1956. Sardar Gurumukh Nihal Singh was sworn in as the first Governor of the state. Thus, with the cleverness, wisdom, and skilled policy of Sardar Patel, and the powerful pressure of public opinion against the reluctance of the rulers of Rajasthan, the dream of Rajasthan's integration was realised.
In simple words: The last signs of monarchy, like the Rajpramukh post, were removed on November 1, 1956, by a constitutional amendment. The newly elected Parliament of India abolished this position, and Sardar Gurumukh Nihal Singh became the first Governor. This completed Rajasthan's integration.

🎯 Exam Tip: Remember the date of the abolition of the Rajpramukh post and the first Governor's name, as these mark the end of monarchy in Rajasthan.

 

RBSE Class 12 History Chapter 7 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. राजस्थान में 1857 की क्रान्ति की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए।
Answer: When the 1857 War of Independence spread in India, the Agent to the Governor-General in Rajasthan was Patrick Lawrence. British Residents were also appointed in various states. For example, Captain C.L. Showers in Udaipur, Captain William in Jaipur, Eden, Captain Mock Mason in Jodhpur, Major Burton in Kota, and Major Nixon in Bharatpur. Rajasthan mainly had six military cantonments: Nasirabad, Neemuch, Deoli, Kota, Erinpura, and Kherwara. In Neemuch, the Bengal Native Artillery, First Bengal Cavalry, 72nd Bengal Infantry, and 7th Infantry Gwalior were stationed. Some British contingents were also deployed in Deoli and Kota. Additionally, Bhil troops were stationed in Erinpura, Beawar, and Kherwara, along with the First Bengal Cavalry. It is clear that during the War of Independence, not a single European soldier was stationed in all of Rajasthan. That's why when the fire of the 1857 War of Independence spread in Rajasthan, the British government became concerned.
In simple words: In 1857, Rajasthan had six main army camps. British officers were present in many states. The local army mostly consisted of Indian soldiers, with very few Europeans. When the rebellion began, the British became worried.

🎯 Exam Tip: Focus on the names of the main cantonments and the British officers stationed in Rajasthan during 1857, as well as the general composition of forces.

 

Question 2. 1857 के स्वाधीनता संग्राम में दामोदरदास राठी का क्या योगदान है?
Answer: Damodardas Rathi (1882-1918) is considered a leading freedom fighter of Rajasthan. He was an industrialist and was in contact with Rao Gopal Singh and Arvind Ghosh. He established the Sanatan Dharma School, College, and Nav Bharat Vidyalaya for public welfare in Beawar. He was a strong supporter of Tilak's aggressive policies. All his revolutionary activities also focused on social reform and the spread of education.
In simple words: Damodardas Rathi was a key freedom fighter from Rajasthan. He was a businessman who supported revolutionaries and established schools. He also worked for social reforms.

🎯 Exam Tip: Remember Damodardas Rathi's role as an industrialist, his connections to other leaders, and his contributions to education and social reform.

 

Question 3. 1857 ई. की क्रान्ति में आऊवां के खुशाल सिंह के योगदान का वर्णन करो।
Answer: On January 19, 1858, Colonel Holmes besieged the fort of Auwa, and 124 people from the village were arrested and shot. On January 24, 1858, British soldiers took control of Auwa. Khushal Singh showed great courage in this revolution, but due to lack of cooperation, the rebellion could not be well-organized and successful.
In simple words: Khushal Singh bravely fought against the British in Auwa in 1858. However, due to a lack of support, his efforts were not successful, and the British took control of Auwa.

🎯 Exam Tip: Focus on Khushal Singh's leadership and bravery at Auwa, and the reasons for the ultimate failure of the rebellion there.

 

Question 4. 1857 ई. के स्वाधीनता संग्राम में तात्या टोपे के राजस्थान आगमन की घटना का विवरण दीजिए।
Answer: Tatya Tope's arrival in Rajasthan was a significant event during the 1857 War of Independence. After his failure in Gwalior, Tatya Tope came to Tonk via Lalsot for help. The army in Tonk supported him. From there, he went to Salumber. The Rawat of Salumber assisted him. The British defeated Tatya Tope on August 9, 1858, and he was defeated again five days later on the banks of the Banas River. After this, Tatya Tope came to Hadoti and captured Jhalrapatan, but the British defeated him twice in September, so he left Rajasthan. In December 1858, Tatya Tope returned to Rajasthan and also visited Banswara, Salumber, Bhindar, Dausa, and Sikar in January 1858. Here too, the British army defeated and chased him away. Due to the betrayal of Mansingh, the jagirdar of Narwar, Tatya Tope was arrested by the British and hanged in April 1859.
In simple words: Tatya Tope entered Rajasthan after losing in Gwalior. He got help from some local rulers but was defeated multiple times by the British army. He kept moving between different regions of Rajasthan. Finally, he was betrayed by a local leader, captured by the British, and hanged in 1859.

🎯 Exam Tip: Keep track of Tatya Tope's movements within Rajasthan, the support he received, and the circumstances leading to his eventual capture and death.

 

Question 5. 1857 की स्वतन्त्रता संग्राम की असफलता के क्या कारण थे?
Answer: On September 21, 1857, Mughal Emperor Bahadur Shah, his wife Begum Zinat Mahal, and their sons were arrested and sent to Rangoon. By mid-1858, the revolutionary activities had slowed down considerably. With the arrest of Tatya Tope, the first war of independence in India ended in Rajasthan. During this time, strong anti-British sentiments were visible in Rajasthan. The public openly expressed hatred towards the British. The people of Udaipur publicly abused Captain Showers when he went to meet the Maharani. The army of Jodhpur threw stones at Captain Sutherland's memorial. The people of Kota, Bharatpur, Alwar, and Tonk supported the revolutionaries against the rulers' policies. Despite this, the revolution failed in Rajasthan. The main reasons for the failure of this revolution were- (1) Lack of leadership: Rajasthan was divided into nineteen states. Despite revolutions in many places, there was no common leader for the rebels. Rajput rulers contacted the Maharana of Mewar, but the Maharana handed over all correspondence to the British. The jagirdars of Marwar, Auwa, and Kota did not have proper contact and coordination with the revolutionaries. (3) Lack of strategy: The efforts of the revolutionaries were not planned. After the rebellion, there was fragmentation among them. On the other hand, the British systematically destroyed the power of the revolutionaries. The British army was led by skilled military officers. Their supplies and weapons were coming from all over India, while the revolutionary soldiers lacked resources. For example, in addition to the British, Karauli and Patiala also provided assistance to the British to suppress the revolutions of Kota and Dholpur. (4) Non-cooperation of rulers: The non-cooperation of the rulers of Rajasthan was also a major reason for the failure. Moreover, most of the rulers of Rajasthan provided full support to the British not only in Rajasthan but also outside Rajasthan. This short-sighted policy of the rulers significantly contributed to the re-establishment of British rule.
In simple words: The 1857 revolution failed in Rajasthan because of several reasons. There was no single strong leader for the rebels. The British had better planning and more resources. Many local rulers did not support the revolutionaries; instead, some even helped the British. This lack of unity and strategy led to the failure.

🎯 Exam Tip: Categorize the reasons for failure (lack of leadership, poor strategy, ruler non-cooperation) and provide specific examples for each to score well.

 

Question 6. राजस्थान में क्रान्ति के प्रवाह को रोकने हेतु ब्रिटिश सरकार ने देशी राज्यों के प्रति किस नीति को परिवर्तित किया?
Answer: The rulers of Rajasthan acted as a barrier to stop the flow of the revolution. The British rulers understood that for ruling India, native kings were useful to them. Therefore, the British policy changed. To satisfy the rulers, the doctrine of 'lapse' was abolished. Arrangements were made for the English education of the kings. They were given awards and titles for their services so that their faith in the British Crown and Western civilisation could increase. (2) Destruction of the power of jagirdars: During the rebellion, the jagirdar class struggled against the British. Consequently, after the revolution, the British adopted a policy of destroying the power of the jagirdar class. Instead of military service provided by the jagirdars, cash payments were taken. Consequently, the jagirdars had to disband their armies. Court fees were started to be taken from the jagirdars. Their judicial rights were snatched away, and their right to collect road tax was also abolished. Laws were made so that the merchant class could recover their debts through the court. As a result of this policy, the influence of the merchant class and the public on the jagirdars ended. (4) Means of transport: During the struggle, the British army faced difficulties in transporting troops from one place to another. After the rebellion, transport facilities were developed keeping in mind military and commercial interests. Nasirabad, Neemuch, and Deoli were connected to Ajmer and Agra by roads. Railway companies were encouraged to construct railway lines. The British government also pressured native states to build roads and railways, which led to rapid development of transport facilities. (5) Social changes: The British government expanded the English education system. On the other hand, due to the increasing importance of English education, the middle class developed. This class, with its English education, made significant contributions in other fields. The British protected the Vaishya class for their commercial interests. In course of time, the influence of the Brahmin and Rajput classes declined. Through Mayo College, royal families were instilled with Western ideas and extravagance. The British used to collect fixed taxes and military expenses from every jagirdar. Earlier, in Akol and other places, it was not possible to waive taxes, so the public was pressured to collect taxes.
In simple words: After the 1857 rebellion, the British changed their policy towards native states. They stopped taking over states (abolished the Doctrine of Lapse) and started giving rewards and education to kings to gain their loyalty. They also reduced the power of jagirdars and improved transport to move troops faster. English education became more important, leading to social changes and the rise of the middle class.

🎯 Exam Tip: Focus on the shift in British policy towards native states, the reasons for these changes, and their long-term social and administrative consequences.

 

Question 3. मारवाड़ और अलवर के किसान आन्दोलनों की विवेचना कीजिए।
अथवा
राजस्थान के प्रमुख किसान आन्दोलनों की विवेचना कीजिए।
अथवा
सीकर की विवेचना कीजिए।
Answer:
**1. Marwar Peasant Movement:**
Due to being a desert region, there was not much attention paid to land settlement by farmers and administrators here. However, political awareness about farmers' problems was higher here compared to other states. Active public opinion for farmers' problems was formed through the Marwar Hitkarini Sabha. In 1936, when the state government announced the end of 119 types of cesses, farmers tried to get them removed from jagir areas as well. In 1939, the Marwar Lok Parishad supported the farmers' demands and encouraged them to agitate against the jagirdars. In 1941, the Parishad appointed a committee to submit its report on 'lag' and 'begar'. To weaken the farmers' movement, a parallel organisation named 'Marwar Kisan Sabha' was formed in June 1941. However, this objective was not successful. In 1941-42, meetings were held by the Jat Farmer Reform Society to enforce the state government to reduce land revenue.
The jagirdars began cruel and barbaric atrocities on the workers of the Kisan Sabhas and Lok Parishad, culminating in the Dabara incident on March 13, 1947. On this day, the police attacked a peaceful procession of Parishad workers and farmers. This incident was widely condemned, but the state government blamed the farmers and Lok Parishad workers instead of punishing the culprits. This serious problem was resolved only after independence. The farmers of Marwar were led by dedicated leaders like Jaynarayan Vyas and Radhakrishnan Tat.
**2. Alwar Peasant Movement (Nimuchana Incident):**
Public awakening also began in Alwar state with a peasant movement. The farmers, troubled by the damage caused by wild boars, started an agitation. The Maharaja compromised and ordered the killing of boars. Later, farmers organised a meeting in Nimuchana village to protest against the increase in land revenue. Soldiers fired on people leaving the village, in which hundreds of men, women, and children were killed. Mahatma Gandhi protested against the Nimuchana incident. The British government was pressured by this incident, and they, along with the Maharaja of Alwar, reached a compromise with the farmers. Apart from this, the farmers of Marwar, Shekhawati, and Jaipur also protested against the atrocities committed in their states.
**3. Sikar and Shekhawati Peasant Movement:**
In the early 20th century, like other areas of Rajasthan, farmers in the Sikar thikana were also suffering from oppression. There was no proper record of farmers' land, and there was no fair system for determining land revenue. The rates of land revenue were very high. Despite droughts and crop failures, no attention was paid to the farmers' condition during land revenue collection. In addition to land revenue, farmers were subjected to various cesses and forced labour.
The peasant movement began when the Rao Raja Kalyan Singh of Sikar thikana increased land revenue by 25 to 50 percent in 1923. Despite low rainfall, new rates of land revenue were collected. Under the leadership of Ramnarayan Chaudhary, the secretary of Rajasthan Seva Sangh, farmers protested against this. In 1931, the establishment of the 'Rajasthan Jat Regional Sabha' gave new energy to the peasant movement.
To organise farmers on religious grounds, Thakur Deshraj decided to hold a 'Jat Prajapati Mahayagya' in Palathana. This yagna began in Sikar on Vasant Panchami, January 20, 1934, under the supervision of Yagyacharya Pt. Khemraj Sharma. After the yagna, farmers wanted to take the yagnapati Pt. Hukum Singh in a procession on an elephant, but the Rao Raja Kalyan Singh and the jagirdars opposed it. This created anger among the people against the jagirdars and led to a tense atmosphere. The famous peasant leader Chhoturam informed the Maharaja of Jaipur by telegram that if any harm came to a single farmer, there would be heavy losses in other places, and Jaipur state would have to bear serious consequences. Ultimately, facing the farmers' stubbornness, the Sikar thikana had to yield.
A large women's conference was organised under the leadership of Mrs. Durga Devi Sharma, Mrs. Phoola Devi, Mrs. Ramabai Joshi, Mrs. Uttama Devi, and others. The Sikar thikana imposed Section 144 to stop this conference. Despite this, the women's conference was held by breaking the law. About ten thousand women participated in this conference. On April 25, 1935, when revenue officials reached Kudan village to collect land revenue, farmers refused to pay, encouraged by an elderly woman, Dhapi Dadi.
The police suppressed the farmers' protest by firing, in which four farmers - Chetram, Tikuram, Tulchharam, and Asharam - were martyred, and 175 were arrested. After this brutal massacre, the Sikar peasant movement was also heard in the British Parliament. In June 1935, when a question was asked about this in the House of Commons, the Maharaja of Jaipur was pressured to mediate, and the jagirdars had to compromise.
By the end of 1935, most of the farmers' demands were accepted. The prominent leaders who led the movement included Sardar Harilal Singh, Netram Singh, Ghorir, Prithvisingh Gothra, Panne Singh Batdanaou, Harusinh Palathana, Goru Singh Katardaiya, Eshwar Singh Bhairupura, Lekhram Kaswali, and others.
**4. Shekhawati Movement:**
This movement was an extension of the Sikar peasant movement. Here, the five villages (Panch Pane) of Bisau, Dadlod, Malsisar, Mandawa, and Nawalgarh were troubled by the inefficiency of the state administration and the global economic depression of 1929-30. The All India Jat Mahasabha supported their problems in its annual conference in Jhunjhunu, which gave moral strength to the farmers. Due to the lack of proper hearing, farmers decided not to pay land revenue.
In 1934 and 1936, some agreements were drafted but could not be implemented due to the opposition of the jagirdars. In 1938, the Jaipur Prajamandal also gave moral support to this movement. Between 1942-46, the Jaipur state tried to implement various agreements to satisfy both parties, but a permanent solution came only after 1947.
In simple words: The Marwar movement started due to high taxes and forced labor. The Alwar movement began because of wild boars destroying crops and increased land revenue. The Sikar and Shekhawati movements were also against high taxes and unfair rules. In all these, farmers protested and some leaders were killed, but eventually, many demands were met or compromises were reached.

🎯 Exam Tip: When discussing peasant movements, focus on the core grievances (taxes, forced labor, land rights), key events (like Dabara or Nimuchana), and the leadership that emerged in each region.

 

Question 4. मेवाड़, मारवाड़ तथा बीकानेर में प्रजामण्डल की गतिविधियों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
Answer:
**1. Introduction:**
In 1938, the Congress passed a resolution at its Haripura session supporting the freedom struggle run by the people in princely states. This resolution gave moral support to the freedom struggle going on in these states. Activities of Prajamandals in these states included:
**2. Mewar Prajamandal:**
Following the Haripura session of the Congress, Manikyalal Verma and Balwant Singh Mehta established the Mewar Prajamandal on April 24, 1938. It was declared illegal on May 11, 1938, and Vermaji was expelled. Vermaji continued his activities from Ajmer and published a booklet named 'Mewar Ka Vartman Shasan' (Present Rule of Mewar), bitterly criticising the rulers. In February 1939, when he came to Udaipur, he was arrested and beaten. Gandhiji strongly condemned this incident in the 'Harijan' issue of February 18, 1939. Manikyalal Verma was sentenced to two years in prison. Later, in 1941, the ban on Mewar Prajamandal was lifted.
Consequently, its branches were established throughout the state. Its first session was held on November 25-26, 1941, presided over by Vermaji, where Acharya Kripalani and Vijay Lakshmi Pandit also came to Udaipur. The demand for responsible government in Mewar was raised at the session.
Before the Quit India Movement, Vermaji participated in a meeting of princely state workers in Bombay. Upon returning to Udaipur, he wrote a letter to the Maharana to sever ties with the British government. He threatened an agitation if this was not done. On August 21, 1942, Vermaji was arrested, which led to a complete strike and arrests in Udaipur.
Students also participated in this movement. The movement spread to Nathdwara, Bhilwara, and Chittorgarh. The 1942 movement here was different from movements in other parts of Rajasthan. Leaders here considered this movement a part of the All India movement.
When the Indian political situation changed, Prajamandal leaders were released. In 1945, the ban on Prajamandal was lifted. Processions began to promote political awareness, and anniversaries of national leaders were celebrated. Vermaji called the seventh session of the 'All India Native States Peoples' Conference' in Udaipur from December 31 to January 1, 1946.
Jawaharlal Nehru presided over it. In 1946, the Maharana formed the Constituent Assembly, which included nominated members from the Prajamandal. The Prajamandal rejected its report. On March 2, 1947, the Prajamandal also rejected the newly declared constitution.
The draft of the new constitution prepared by Shri K.M. Munshi in May 1947 was also rejected. Thus, the progressive reforms of the Maharana continued to be opposed. Eventually, Udaipur agreed to join the Indian Union and became part of the democratic process.
**3. Marwar Prajamandal:**
Political activities began in Jodhpur in 1918 when Chandmal Surana established the 'Marwar Hitkarini Sabha' to protect the rights of citizens. In 1936, this organisation was declared illegal. The Jodhpur unit of the All India States Peoples' Conference, 'Marwar Rajya Lok Parishad', actively continued political activities in Jodhpur. Especially after the Jodhpur Prajamandal was declared illegal, the Lok Parishad continued its struggle for constitutional rights and responsible government. The Parishad demanded that elections be held on a regional basis instead of a communal basis. In March 1940, after the Parishad was declared an illegal organisation, its members focused on peaceful protests.
Its leaders like Ranchheddas Gahani, Mathuradas Mathur, Kanhaiyalal Indramal Jain, Anand Raj Surana, Bhanwarlal Sarraf, and others focused on popularising the Parishad's ideology. On the other hand, the government tried to turn the demand for political rights into a struggle between the Parishad and the jagirdars. In 1942, the Lok Parishad launched a movement against atrocities and for responsible government in the state.
Vyasji shifted his attention from the Parishad and appointed himself the first dictator, conducting the Quit India Movement in Jodhpur. Prominent leaders were arrested, and Bal Mukund Bissa died during a hunger strike. On November 4, 1947, the Parishad celebrated the Legislative Assembly Protest Day. In 1948, a responsible government was formed only after signing the Instrument of Accession.
**4. Bikaner Prajamandal:**
The early leaders of Bikaner included Kanhaiya Lal Hundh and Swami Gopal Das. They established the 'Sarvahitkarini Sabha' in Churu. To awaken the public to their rights, he opened a girls' school. The Maharaja also became suspicious of this creative work and banned it, calling it a conspiracy. In April 1932, when the Maharaja went to London for the Round Table Conference, a pamphlet named 'Bikaner Ek Digdarshan' was distributed, revealing the actual oppressive policies of Bikaner.
Upon returning, the Maharaja implemented the Public Safety Act. Swami Gopal Das, Chandanmal Bahed, Satyanarayan Sarraf, Khubchand Sarraf, and others were arrested under the 'Bikaner Conspiracy Case'. Protests against this black law continued. On October 4, 1936, prominent leaders were exiled, including lawyer Mukta Prasad, Madh Ram Vaidya, and Lakshmidas.
Raghuvar Dayal established the Bikaner Praja Parishad on July 22, 1942, with the aim of establishing responsible government under the Maharaja's leadership. After the death of Gangasingh Ji in 1943, Sardul Singh ascended the throne, who also believed in suppression. On October 26, 1944, 'Bikaner Daman Virodhi Diwas' (Bikaner Suppression Protest Day) was celebrated, which was the first public protest in the state.
The farmers of Dudhwakhara started a movement with the support of the Praja Parishad against the oppression of jagirdars. In March 1940, the Press Act was passed, which imposed restrictions on the press. Meanwhile, political activities in India intensified, and the Maharaja announced responsible government. On June 30, 1946, the police fired at the Praja Parishad conference being held in Raisingh Nagar.
In simple words: The Prajamandal movement aimed to establish responsible government. In Mewar, Manikyalal Verma led the movement, facing arrests and bans, but eventually gained support. In Marwar, the movement started with the Marwar Hitkarini Sabha, protesting high taxes and forced labor, leading to clashes with jagirdars. In Bikaner, leaders like Swami Gopal Das fought for public rights and against oppressive state policies, facing arrests and exiles, but eventually forming the Praja Parishad.

🎯 Exam Tip: When describing Prajamandal activities, clearly state the key leaders, their goals, and the challenges or successes they faced in each princely state.

 

Question 5. वृहत्तर राजस्थान का निर्माण किस प्रकार हुआ?
अथवा
राजस्थान के एकीकरण के चतुर्थ एवं पंचम चरण का उल्लेख कीजिए।
Answer:
**1. Fourth Stage of Rajasthan's Integration: Formation of Greater Rajasthan:**
With the merger of Mewar, the integration of the remaining states became easy and certain. Public opinion for the merger and integration of Jaipur, Jodhpur, Bikaner, and Jaisalmer also intensified. The borders of Jodhpur, Bikaner, and Jaisalmer states were adjacent to Pakistan, creating a constant fear of attack.
Furthermore, from the perspective of transport and communication facilities, this region was quite backward, and its development was beyond the economic capacity of these states. Dr. Jaiprakash Narayan, a leader of the Socialist Party, demanded the immediate formation of Greater Rajasthan at a public meeting on November 9, 1948. The All India Rajasthan Movement Committee was formed at the national level, chaired by Dr. Rammanohar Lohia, who also demanded an integrated Rajasthan.
Shri V.P. Menon, Secretary of the States Department, began talks with the concerned rulers. He went to Jaipur on January 11, 1949, and held discussions with the Maharaja of Jaipur. Maharaja Sawai Man Singh was hesitant but eventually agreed to Greater Rajasthan on the condition that the Maharaja of Jaipur would be the hereditary Rajpramukh of Greater Rajasthan and Jaipur would be the future capital of Rajasthan.
Menon assured that the terms of the merger would be considered later and accepted the merger. After the Maharaja of Jaipur approved the draft of the merger, information was sent to Bikaner and Jodhpur by telegram. The rulers of Bikaner and Jodhpur also eventually approved the draft of the merger after some hesitation. On January 14, 1949, Sardar Patel announced the formation of Greater Rajasthan at a public meeting in Udaipur.
The Maharaja of Mewar was declared lifelong Maharaja Pramukh. The rulers of Jaipur were appointed Rajpramukh, while the rulers of Jodhpur and Kota became Senior Up-Rajpramukh, and the rulers of Bundi and Dungarpur became Junior Up-Rajpramukh. The Rajpramukh and his council of ministers were kept under the general control of the Central Government. The Rajpramukh had to sign a new Instrument of Accession and accept the federal and concurrent lists as per the Constitution.
The ruler of Jaipur was granted Rs 18 lakh, the ruler of Jodhpur Rs 17.5 lakh, the ruler of Bikaner Rs 17 lakh, and the ruler of Jaisalmer Rs 2.8 lakh as privy purses. Jaipur was declared the capital, and to maintain the importance of other large cities of Rajasthan, some state-level government offices were established, such as the High Court in Jodhpur, the Education Department in Bikaner, the Mining Department in Udaipur, and the Agriculture Department in Bharatpur.
**2. Fifth Stage of Rajasthan's Integration: Merger of Matsya Union into Greater Rajasthan:**
At the time of the formation of the Matsya Union, it was made clear to the rulers of all four states included in it that in the future, this union could be merged with Rajasthan or Uttar Pradesh. Meanwhile, the Matsya Union was functioning independently, but the government was facing several problems. The unrest among the Meos was a matter of concern for the government.
The anti-government movement by the Bharatpur Kisan Sabha and Nagarik Sabha was also at its peak. The Bharatpur Kisan Sabha demanded a separate existence for Bharatpur and Dholpur under the name of Braj Pradesh. Now, there was a fear that the Matsya Union itself might disintegrate. To address this apprehension, the rulers and Chief Ministers of all four states were called to Delhi on May 10, 1949. The crucial point was whether these states would merge with the neighbouring state of Uttar Pradesh or Rajasthan.
While Alwar and Karauli were in favour of merging with Rajasthan, Bharatpur and Dholpur were keen on merging with Uttar Pradesh. To resolve the issue, a committee was formed under the chairmanship of Shri Shankar Rao Dev. According to the committee's recommendation, public opinion in Bharatpur and Dholpur was in favour of merging with Rajasthan. On May 15, 1948, the Matsya Union merged with Rajasthan.
Pandit Hiralal Shastri remained the Chief Minister of Rajasthan, and Shri Shobharam Shastri, the Chief Minister of Matsya Union, was included in the council of ministers. Thus, the Matsya Union also became a part of Rajasthan.
In simple words: The fourth stage formed Greater Rajasthan by merging Jaipur, Jodhpur, Bikaner, and Jaisalmer. Jaipur became the capital, and its Maharaja became the Rajpramukh. The fifth stage involved merging the Matsya Union (Alwar, Bharatpur, Dholpur, Karauli) into Greater Rajasthan. This happened after talks resolved whether it would join Rajasthan or Uttar Pradesh, with public opinion favoring Rajasthan.

🎯 Exam Tip: When detailing the integration stages, remember the specific states involved in each phase, the designated capital, and the roles of key political figures like Sardar Patel and V.P. Menon.

 

Question 6. राजस्थान में अन्तिम चरणों में कौन-कौन से राज्य सम्मिलित हुए?
अथवा
सिरोही, अजमेर – मेरवाड़ा का राजस्थान में विलय कब हुआ? समझाइए।
Answer: The issue of Sirohi: The leaders of Gujarat wanted to make Mount Abu, a tourist center located in Sirohi, a part of Gujarat. Therefore, in November 1947, Sirohi was also placed under the Gujarat States Agency. On April 10, 1948, Hiralal Shastri wrote a letter to Sardar Patel stating that "Sirohi means Gokul Bhai, and without Gokul Bhai, we cannot run Rajasthan." Meanwhile, public opinion in Rajasthan was highly agitated over the issue of Sirohi. On April 18, 1948, a delegation of Rajasthan workers met Pandit Nehru at the inauguration of United Rajasthan and informed him about the public sentiments regarding Sirohi. After Pandit Nehru's discussion with Sardar Patel, with great tact, in January 1950, Sirohi, including Mount Abu (304 square miles and 89 villages), was merged with Gujarat, and the rest of Sirohi was merged with Rajasthan. Ajmer-Merwara was a Chief Commissioner's province during the British period. The Rajputana Provincial Assembly of the All India States Peoples' Conference always demanded that not only the province but also the Ajmer-Merwara region should be included in Greater Rajasthan. However, the Congress leadership of Ajmer opposed this demand. After the general elections of 1952, a Congress ministry was formed in Ajmer-Merwara under the leadership of Shri Haribhau Upadhyay. Since this Congress leadership was never in favor of merging Ajmer with Rajasthan, and now with the formation of the ministry in Ajmer-Merwara, the Congress leadership argued that it should be kept as a small state for administrative reasons. This matter was also referred to the State Reorganisation Commission. The Commission rejected the arguments of the Congress leaders and recommended that the Ajmer-Merwara region should be merged with Rajasthan. Accordingly, on November 1, 1956, Ajmer-Merwara, along with the Mount Abu region of Sirohi, was merged with Rajasthan. Thus, the process of integration of Rajasthan, which began in March 1948, was completed on November 1, 1956. Even after the formation of integrated Rajasthan, the last remnants of monarchy remained in the form of the newly created post of Rajpramukh. The newly elected Parliament of India abolished the post of Rajpramukh through the Seventh Amendment to the Constitution on November 1, 1956. Sardar Gurumukh Nihal Singh was sworn in as the first Governor of the state. Thus, with the cleverness, wisdom, and skilled policy of Sardar Patel, and the powerful pressure of public opinion against the reluctance of the rulers of Rajasthan, the dream of Rajasthan's integration was realised.
In simple words: In the final stages of integration, Sirohi and Ajmer-Merwara joined Rajasthan. Sirohi was initially disputed, with some parts going to Gujarat and the rest to Rajasthan in January 1950. Ajmer-Merwara, a British-controlled area, was merged with Rajasthan on November 1, 1956, after a commission recommended it, completing the state's formation and ending the princely rule.

🎯 Exam Tip: Focus on the specific challenges and political negotiations involved in integrating Sirohi and Ajmer-Merwara, noting the final dates and the impact on the administrative structure.

 

Question 7. राजस्थान के एकीकरण में योगदान देने वाले प्रमुख व्यक्तियों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
Answer: The prominent individuals who contributed to the integration of Rajasthan were:
1. **Vijay Singh Pathik:** His real name was Bhoop Singh. He led the Bijoliya peasant movement. He started the 'Rajasthan Kesari' newspaper from Wardha. He is considered the father of the peasant movement in India.
2. **Arjunlal Sethi:** Born in a Jain family in Jaipur in 1880. Sethi Ji is called the pioneer of public awakening in Jaipur state. Revolutionary Rash Behari Bose entrusted Sethi Ji with the task of armed revolution in Rajasthan. Sethi Ji established the Jain Education Society in Jaipur in 1907. He made great efforts for Hindu-Muslim unity.
3. **Kesrisingh Barahath:** Born in Shahpura (Bhilwara) in 1872. He established the Veer Bharat Sabha in 1910. He composed the 'Chetavni Ri Chunganitya' soratha (a type of poem) and is also known as 'Rajasthan Kesari'.
4. **Pratap Singh Barahath:** He was the son of Kesrisingh Barahath. In 1912, he threw a bomb at Hardinge, and in 1918, he died due to the tortures given in Bareilly Jail. He also received training at Arjunlal Sethi's Jain Vardhaman Pathshala.
5. **Sagar Mal Gopa:** Born in Jaisalmer, he strongly opposed the atrocities of the then Maharawal Jawahar Singh of Jaisalmer. He emphasised political awareness and the spread of education in Jaisalmer. He was jailed on charges of treason and subjected to inhumane atrocities.
6. **Swami Gopal Das:** Born in Churu, he awakened public consciousness through public service. Maharaja Gangasingh of Bikaner jailed Swami Gopal Das for a long period on charges of conspiring against Bikaner state, where he died in 1939.
7. **Damodar Das Rathi:** Born in Pokaran, Jaisalmer. He established the Sanatan Dharma School, College, and Nav Bharat Vidyalaya for public welfare. He provided financial assistance for revolutionary activities.
8. **Motilal Tejawat:** Born in Koliyari village near Udaipur in 1887. He started the 'Ekki Andolan' to protest against the atrocities committed against the Bhils. He became famous as 'Bawaji' among the tribals.
9. **Manikyalal Verma:** Born in Bijoliya. He established the Mewar Prajamandal. He dedicated his life to serving the Dalits and the oppressed.
10. **Govind Guru:** A great social reformer who worked for the social and moral upliftment of the Bhils. He organised them socially and brought them into the mainstream. For this goal, he established the 'Samp Sabha' and the 'Bhagat Panth' to keep them within the Hindu religion.
11. **Hiralal Shastri:** Born in Jobner (Jaipur) on November 24, 1899. He became the first Chief Minister of Greater Rajasthan on March 30, 1949. He also presided over the Jaipur Prajamandal.
12. **Gokul Bhai Bhatt:** Born in Hathal village, Sirohi district, in 1898. He made tireless efforts for alcohol prohibition in Rajasthan. He also established the Sirohi Prajamandal.
13. **Jaynarayan Vyas:** Born in Jodhpur. He also served as the Chief Minister of Rajasthan.
14. **Balwant Singh Mehta:** From 1915, he remained a long-time operator of the Prataap Sabha, a motivator of political awakening in Rajasthan, and played an important role in public awareness. He became the first president of the Mewar Prajamandal in 1938. After independence, he was selected as a member of the Constituent Assembly.
In simple words: Many important people helped unite Rajasthan. Vijay Singh Pathik led farmer movements. Arjunlal Sethi worked for public awareness and Hindu-Muslim unity. Kesrisingh Barahath wrote patriotic poems and supported revolutionaries, as did his son Pratap Singh Barahath. Others like Sagar Mal Gopa, Swami Gopal Das, Damodar Das Rathi, Motilal Tejawat, Manikyalal Verma, Govind Guru, Hiralal Shastri, Gokul Bhai Bhatt, Jaynarayan Vyas, and Balwant Singh Mehta all played roles in political awakening, social reform, and leading movements for independence and integration.

🎯 Exam Tip: When introducing key figures, highlight their main contributions, associated movements, and significant achievements in the context of Rajasthan's integration and public awakening.

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