RBSE Solutions Class 12 Hindi Chapter 11 बाजार दर्शन

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Detailed Chapter 11 बाजार दर्शन RBSE Solutions for Class 12 Hindi

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Class 12 Hindi Chapter 11 बाजार दर्शन RBSE Solutions PDF

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 11 बाजार दर्शन वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. लेखक ने बाजार की असली कृतार्थता बताई है -
(अ) अभाव जाग्रत करना
(ब) आवश्यकता के समय काम आना।
(स) अधिकाधिक धन कमाना
(द) अनाप-शनाप सामान खरीदना।
Answer: (ब) आवश्यकता के समय काम आना।
In simple words: लेखक के अनुसार बाजार का असली उद्देश्य यह है कि वह लोगों की ज़रूरतों के समय काम आए। बाजार को दिखावा या सिर्फ पैसा कमाने का साधन नहीं बनना चाहिए, बल्कि लोगों की मदद करना चाहिए।

🎯 Exam Tip: यह प्रश्न बाजार के सही और गलत उपयोग को स्पष्ट करता है, ध्यान रखें कि लेखक बाजार के उपभोक्तावादी स्वरूप का विरोध करता है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 11 बाजार दर्शन अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. लेखक के अनुसार बाजार का जादू किस राह से काम करता है?
Answer: लेखक के अनुसार, बाजार का जादू आँखों के रास्ते से काम करता है। ग्राहक बाजार में सजी हुई सुंदर चीज़ों को देखकर उनकी ओर आकर्षित हो जाते हैं और उन्हें खरीदने लगते हैं। इस तरह बाजार अपनी चमक-दमक से लोगों को अपनी तरफ खींचता है।
In simple words: बाजार का जादू हमारी आँखों को पसंद आने वाली चीज़ों से चलता है, जिससे हम उन्हें खरीदने को मजबूर हो जाते हैं।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में 'आँखों के रास्ते' और 'आकर्षण' जैसे शब्दों का प्रयोग करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. लेखक ने किस समय बाजार में जाने की सलाह दी है?
Answer: लेखक सलाह देते हैं कि जब आपका मन खाली हो, यानी जब आपको अपनी ज़रूरतों के बारे में ठीक से पता न हो, तो उस समय बाजार नहीं जाना चाहिए। मन भरा होने पर ही आप बाजार की चकाचौंध से बच सकते हैं।
In simple words: लेखक कहते हैं कि जब आपको पता न हो कि क्या खरीदना है, तब बाजार न जाएँ।

🎯 Exam Tip: उत्तर में 'मन खाली हो' और 'ज़रूरतों का सही पता न हो' जैसे वाक्यांशों का उल्लेख करना आवश्यक है।

 

Question 3. चूरन वाले भगत जी का जीवन हमें क्या शिक्षा देता है?
Answer: चूरन वाले भगत जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि हमें ज़रूरत से ज़्यादा चीज़ें नहीं खरीदनी चाहिएं और न ही ज़रूरत से ज़्यादा पैसा कमाने के पीछे भागना चाहिए। वे संतोषी स्वभाव के व्यक्ति थे, जो केवल अपनी आवश्यकतानुसार ही कमाते थे।
In simple words: भगत जी हमें सिखाते हैं कि हमें अपनी ज़रूरतों के हिसाब से ही चीज़ें खरीदनी चाहिएं और बहुत ज़्यादा पैसे के पीछे नहीं भागना चाहिए।

🎯 Exam Tip: भगत जी के चरित्र की दो मुख्य विशेषताएँ 'संतोष' और 'अनावश्यक संग्रह से मुक्ति' हैं, इन्हें उत्तर में शामिल करें।

 

Question 4. पैसे की 'परचेज पावर' से आप क्या समझते हैं?
Answer: पैसे की 'परचेज पावर' का मतलब है पैसे से चीज़ें खरीदने की ताकत। जितना ज़्यादा पैसा किसी के पास होता है, वह उतनी ही ज़्यादा चीज़ें खरीद सकता है। यह शक्ति ही पैसे की 'परचेज पावर' कहलाती है। पैसे का सही उपयोग करने के लिए इस शक्ति को नियंत्रित रखना ज़रूरी है।
In simple words: 'परचेज पावर' यानी पैसे से चीज़ें खरीदने की क्षमता; ज़्यादा पैसा मतलब ज़्यादा खरीदने की शक्ति।

🎯 Exam Tip: 'खरीदने की शक्ति' और 'पैसे की ताकत' जैसे मुख्य शब्दों पर ज़ोर दें।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 11 बाजार दर्शन लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. जो लोग बाजार का बाजारूपन बढ़ाते हैं, उनसे बाजार पर क्या प्रतिकूल असर पड़ता है?
Answer: बाजार का मुख्य उद्देश्य लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करना है। जो लोग (चाहे बेचने वाले हों या खरीदने वाले) बाजार के इस उद्देश्य को भूलकर केवल धन कमाने या दिखावे में लग जाते हैं, वे बाजार का 'बाजारूपन' बढ़ाते हैं। इससे बाजार अनुचित तरीकों से पैसा कमाने और लोगों का शोषण करने का साधन बन जाता है। इस स्थिति में ग्राहक और विक्रेता दोनों एक-दूसरे को ठगने और धोखा देने की कोशिश करते हैं।
In simple words: जो लोग बाजार को सिर्फ पैसा कमाने या दिखावा करने का साधन बनाते हैं, वे उसके असली उद्देश्य को नुकसान पहुँचाते हैं और शोषण बढ़ाते हैं।

🎯 Exam Tip: उत्तर में 'बाजार का उद्देश्य', 'अनुचित धनोपार्जन', और 'शोषण' जैसे शब्द शामिल करना महत्वपूर्ण है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 11 बाजार दर्शन निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. 'बाजार दर्शन' निबन्ध में लेखक ने बाजार का सही उपयोग करने के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखने पर बल दिया है? आप बाजार का सही उपयोग किस प्रकार करेंगे?
Answer: लेखक ने 'बाजार दर्शन' पाठ में बाजार का सही उपयोग करने के लिए कुछ मुख्य बातों पर ज़ोर दिया है, जो इस प्रकार हैं:
1. हमें ग्राहक के रूप में बाजार जाने से पहले यह ठीक से पता होना चाहिए कि हमारी ज़रूरत की चीज़ें क्या हैं।
2. हमें बाजार में सजी-धजी चीज़ों के आकर्षण में नहीं फंसना चाहिए।
3. हमें अपनी खरीदने की ताकत ('परचेजिंग पावर') का दिखावा नहीं करना चाहिए और अनावश्यक चीज़ें नहीं खरीदनी चाहिएं।
4. हमें केवल अपनी ज़रूरत की चीज़ें ही खरीदनी चाहिएं।
5. बाजार जाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि ज़रूरी चीज़ें खरीदने के लिए हमारे पास पर्याप्त पैसा हो।
6. बाजार में ग्राहक और विक्रेता के बीच अच्छा व्यवहार होना चाहिए; उन्हें एक-दूसरे को धोखा देने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
7. विक्रेता को भी ग्राहक की ज़रूरतें पूरी करनी चाहिए और उसका शोषण नहीं करना चाहिए। बाजार को समाज की सेवा का माध्यम होना चाहिए।
ये बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं और खरीदने वाले तथा बेचने वाले दोनों का मार्गदर्शन करती हैं। मैं स्वयं भी बाजार जाते समय केवल अपनी ज़रूरत की चीज़ें ही खरीदूंगा, बेवजह कोई चीज़ नहीं खरीदूंगा और अपने धन का अनावश्यक दिखावा भी नहीं करूंगा।
In simple words: लेखक कहते हैं कि बाजार जाते समय हमें अपनी ज़रूरतें पता होनी चाहिए, चीज़ों के दिखावे में नहीं फंसना चाहिए, और पैसा खर्च करने का दिखावा नहीं करना चाहिए। हमें केवल काम की चीज़ें खरीदनी चाहिएं और ठगी से बचना चाहिए। मैं भी अपनी ज़रूरतें जानकर ही खरीदूंगा और फिजूलखर्ची से बचूंगा।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में लेखक द्वारा बताई गई बातों को सूचीबद्ध करें और फिर अपने विचार स्पष्ट रूप से बताएँ कि आप उन नियमों का पालन कैसे करेंगे।

 

Question 2. उपभोक्तावाद से प्रभावित समाज में उपभोक्ताओं को शोषण से बचाने के लिए आप क्या सुझाव देना चाहेंगे?
Answer: आजकल की दुनिया में आर्थिक व्यवस्था उपभोक्तावाद से बहुत प्रभावित है। आज के समाज में विकास का मतलब ज़्यादा से ज़्यादा चीज़ों का उपयोग करना माना जाता है। प्रसिद्ध विचारक सुकरात और महात्मा गांधी का मानना था कि हमें कम से कम चीज़ों का उपयोग करना चाहिए। लेकिन अब यह माना जाता है कि अपनी ज़रूरतें बढ़ाने से ही समाज आगे बढ़ता है। चीज़ों का उपयोग करने वाला व्यक्ति 'उपभोक्ता' कहलाता है। अगर गहराई से सोचें, तो उपभोक्ता का शोषण करके अपनी पूंजी बढ़ाना ही उपभोक्तावाद है। बाजार में उपभोक्ता के साथ छल-कपट का व्यवहार होता है।
उपभोक्ताओं को शोषण से बचाने के लिए मैं निम्नलिखित सुझाव देना चाहूंगा:
1. अपनी ज़रूरतों को सीमित रखना चाहिए ताकि अनावश्यक खर्च से बचा जा सके।
2. फिजूलखर्ची से बचना चाहिए और अपनी खरीदने की ताकत का अनावश्यक दिखावा नहीं करना चाहिए।
3. विज्ञापन और आकर्षक प्रस्तावों से प्रभावित न होकर, अपनी वास्तविक ज़रूरत पर ध्यान देना चाहिए।
4. चीज़ें खरीदने से पहले उनकी गुणवत्ता और कीमत की ठीक से जांच करनी चाहिए।
5. बाजार से अनावश्यक वस्तुएँ नहीं खरीदनी चाहिएं और अपनी खरीदारी के प्रति जागरूक रहना चाहिए।
In simple words: उपभोक्तावाद में लोग ज़्यादा चीज़ें खरीदते हैं और उनका शोषण हो सकता है। इसे रोकने के लिए हमें अपनी ज़रूरतें कम रखनी चाहिएं, फिजूलखर्ची से बचना चाहिए, विज्ञापनों से प्रभावित नहीं होना चाहिए, और चीज़ें खरीदने से पहले उनकी जांच करनी चाहिए।

🎯 Exam Tip: उपभोक्तावाद की परिभाषा और उसके नकारात्मक प्रभावों को स्पष्ट करें, फिर अपने सुझावों को बिन्दुवार प्रस्तुत करें।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 11 बाजार दर्शन भाषा सम्बन्धी प्रश्न

 

Question 1. 'तिरस्कार' शब्द 'तिरः + कार' से बना है। यह विसर्ग सन्धि है। विसर्ग सन्धि के निम्न शब्दों का सन्धि विच्छेद कीजिए –
भास्कर, पुरस्कार, निस्सार, निर्बल, निर्जन, वृहस्पति।

Answer: विसर्ग सन्धि के शब्दों का सन्धि विच्छेद इस प्रकार है:
भास्कर = भो: + कर
पुरस्कार = पुरः + कार
निस्सार = निः + सार
निर्बल = निः + बल
निर्जन = नि: + जन
वृहस्पति = वृहः + पति
विसर्ग सन्धि में विसर्ग के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में परिवर्तन होता है, जिससे नया शब्द बनता है।
In simple words: विसर्ग सन्धि में, दो शब्दों को जोड़ने पर विसर्ग में बदलाव आता है। ऊपर दिए गए शब्दों को इसी नियम से अलग किया गया है।

🎯 Exam Tip: विसर्ग संधि के नियमों को ध्यान में रखकर विच्छेद करें, खास तौर पर 'स', 'र', और 'ओ' वाले परिवर्तनों पर।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 11 बाजार दर्शन अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 11 बाजार दर्शन वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. मूल में एक ही तत्व की महिमा सविशेष है। वह तत्व है –
(क) पति
(ख) पत्नी
(ग) मनीबैग
(घ) बाजार।
Answer: (ग) मनीबैग
In simple words: लेखक के अनुसार, बाजार में खरीदारी को प्रभावित करने वाला सबसे खास तत्व 'मनीबैग' है, यानी किसी के पास कितना पैसा है।

🎯 Exam Tip: यह प्रश्न लेखक के विचार को दर्शाता है कि पैसे की शक्ति बाजार के आकर्षण को कैसे प्रभावित करती है।

 

Question 2. 'परिमित' का विलोम शब्द है –
(क) सीमित
(ख) अतुलित
(ग) संयमित
(घ) नियमित
Answer: (ख) अतुलित
In simple words: 'परिमित' का मतलब होता है 'सीमित' या 'मापा हुआ', तो इसका उल्टा होगा 'अतुलित', जिसका अर्थ है 'जिसकी कोई सीमा न हो'।

🎯 Exam Tip: विलोम शब्द के लिए दिए गए शब्द का सही अर्थ जानना ज़रूरी है ताकि सही विपरीत शब्द चुना जा सके।

 

Question 3. 'बाजार में एक जादू है।' यहाँ 'जादू' शब्द का अर्थ है -
(क) सौन्दर्य
(ख) आकर्षण
(ग) दिखावा
(घ) सन्तुष्टि।
Answer: (ख) आकर्षण
In simple words: इस वाक्य में 'जादू' का मतलब है बाजार में रखी चीज़ों की वह शक्ति जो लोगों को अपनी ओर खींचती है, जिसे आकर्षण कहते हैं।

🎯 Exam Tip: इस तरह के प्रश्नों में दिए गए शब्द का पाठ के संदर्भ में सही अर्थ समझना ज़रूरी है।

 

Question 5. क्यों न मैं मोटर वालों के यहाँ पैदा हुआ? इस वाक्य में है -
(क) व्यंग्य शक्ति
(ख) क्रय शक्ति
(ग) विक्रय शक्ति
(घ) मनुष्य की अशक्ति
Answer: (क) व्यंग्य शक्ति
In simple words: यह वाक्य एक व्यक्ति की उस भावना को दिखाता है जहाँ वह दूसरों की समृद्धि को देखकर खुद की स्थिति पर कटाक्ष करता है, जिसे व्यंग्य शक्ति कहते हैं।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में वाक्य के अंदर छिपी भावना को पहचानना आवश्यक है, जो कि यहाँ व्यंग्य है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 11 बाजार दर्शन अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. बाजार से लौटकर मित्र ने लेखक को ढेर सारा सामान खरीदने का क्या कारण बताया?
Answer: बाजार से लौटने पर मित्र ने लेखक को बताया कि उन्होंने अपनी पत्नी के साथ होने और उनके ज़ोर देने पर ढेर सारा सामान खरीदा था। पत्नी का आग्रह खरीदारी का एक बड़ा कारण बना था।
In simple words: मित्र ने बताया कि उसने अपनी पत्नी के साथ जाने और उनके कहने पर बहुत सारी चीज़ें खरीद ली थीं।

🎯 Exam Tip: 'पत्नी के आग्रह' और 'ढेर सारा सामान' जैसे शब्दों का उल्लेख करें।

 

Question 2. फिजूलखर्ची का उत्तरदायी कौन है?
Answer: फिजूलखर्ची का उत्तरदायी कोई एक अकेला व्यक्ति नहीं है, बल्कि यह पति, पत्नी और पति के भारी मनीबैग (यानी बहुत सारे पैसे) के कारण होती है। बाजार का आकर्षण भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है।
In simple words: फिजूलखर्ची के लिए पति, पत्नी और जेब में ज़्यादा पैसा होना सभी जिम्मेदार होते हैं।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में 'पति, पत्नी तथा पति के भारी मनीबैग' इन तीनों कारकों को उत्तर में शामिल करें।

 

Question 3. 'पर्चेजिंग पावर' का क्या तात्पर्य है?
Answer: 'पर्चेजिंग पावर' का तात्पर्य है कि बाजार में कोई भी चीज़ खरीदते समय उसके बदले में पैसा दिया जाता है। धन द्वारा चीज़ें खरीदने की इसी शक्ति को 'पर्चेजिंग पावर' कहते हैं। यह धन की वह ताकत है जिससे हम अपनी ज़रूरत की चीज़ें पा सकते हैं।
In simple words: 'पर्चेजिंग पावर' का मतलब है पैसों से चीज़ें खरीदने की ताकत।

🎯 Exam Tip: इस उत्तर में 'धन द्वारा चीजें खरीदने की शक्ति' को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें।

 

Question 5. 'असन्तोष, तृष्णा और ईष्या से घायल कर मनुष्य को सदा के लिए बेकार बना डाल सकता है-कौन ऐसा कर सकता है?
Answer: बाजार का बहुत ज़्यादा आकर्षण और उसका जादू ही मनुष्य को असंतोष, लालच और ईर्ष्या से घायल करके उसे हमेशा के लिए बेकार बना सकता है। जब लोग बाजार की चकाचौंध में फंसकर अनावश्यक खरीदारी करते हैं, तो वे अपनी शांति खो देते हैं।
In simple words: बाजार का ज़बरदस्त आकर्षण और उसका जादू ही इंसान को लालच, असंतोष और ईर्ष्या से भरकर बेकार बना सकता है।

🎯 Exam Tip: 'बाजार का प्रबल आकर्षण' और 'बाजार का जादू' जैसे वाक्यांशों का उपयोग करें।

 

Question 6. बाजार का आमन्त्रण मूक क्यों होता है?
Answer: बाजार किसी को चीज़ें खरीदने के लिए बोलकर नहीं बुलाता। वहाँ सजी हुई सुंदर चीज़ों को देखकर मनुष्य खुद-ब-खुद उनकी ओर आकर्षित हो जाता है। इसी खामोश बुलावट को बाजार का 'मूक आमंत्रण' कहते हैं, क्योंकि यह बिना बोले ही लोगों को अपनी ओर खींचता है।
In simple words: बाजार बोलकर नहीं बुलाता, बल्कि वहाँ की सजी चीज़ें ही लोगों को अपनी ओर खींचती हैं, इसे ही 'मूक आमंत्रण' कहते हैं।

🎯 Exam Tip: 'सजी हुई चीजें' और 'आकर्षण' जैसे कीवर्ड्स का उपयोग करें, और बताएं कि यह बुलावा 'बिना बोले' होता है।

 

Question 7. शून्य होने का अधिकार किसको है तथा क्यों?
Answer: शून्य होने का अधिकार केवल परमात्मा को है। परमात्मा स्वयं सम्पूर्ण है और वह इच्छाओं, राग और द्वेष से मुक्त होता है। वह इच्छाशून्य हो सकता है, लेकिन मनुष्य अपूर्ण है और उसकी इच्छाएं होना स्वाभाविक है। मनुष्य को अपनी इच्छाओं को बलपूर्वक दबाने का अधिकार नहीं है।
In simple words: केवल भगवान ही शून्य हो सकते हैं क्योंकि वे हर चीज़ से परे हैं। इंसान अपूर्ण है, इसलिए उसके लिए इच्छाओं से पूरी तरह मुक्त होना मुमकिन नहीं है।

🎯 Exam Tip: उत्तर में 'परमात्मा' की पूर्णता और 'मनुष्य' की अपूर्णता के अंतर को स्पष्ट करें।

 

Question 8. भगत जी को क्या प्राप्त है जो बड़े-बड़े समझदार लोगों को प्राप्त नहीं है?
Answer: भगत जी को संतोष, लोभ से मुक्ति और सही-गलत का विवेक (अन्तर पहचानने की समझ) प्राप्त है। ये ऐसे गुण हैं जो अक्सर बड़े-बड़े समझदार और धनी लोगों में भी मुश्किल से मिलते हैं। भगत जी अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखते हैं और दिखावे से दूर रहते हैं।
In simple words: भगत जी को संतोष, लोभ से मुक्ति और सही-गलत की पहचान है, जो कई समझदार लोगों में भी कम मिलती है।

🎯 Exam Tip: उत्तर में भगत जी के तीन मुख्य गुणों- 'संतोष', 'लोभ से मुक्ति' और 'विवेक' को प्रमुखता दें।

 

Question 9. बाजार की सार्थकता का क्या तात्पर्य है?
Answer: बाजार की सार्थकता का तात्पर्य है कि वह लोगों की ज़रूरतों का सामान आसानी से उपलब्ध कराए। बाजार का असली मकसद ग्राहकों की सेवा करना है, न कि उन्हें ठगना या अनावश्यक खरीदारी के लिए उकसाना। बाजार तभी सार्थक है जब वह समाज की भलाई के लिए काम करे।
In simple words: बाजार का असली मकसद लोगों की ज़रूरतों को पूरा करना है, उन्हें सामान आसानी से दिलाना।

🎯 Exam Tip: उत्तर में 'लोगों की ज़रूरतें पूरी करना' और 'सामान उपलब्ध कराना' जैसे मुख्य बिंदुओं को शामिल करें।

 

Question 10. बाजार के बाजारूपन से क्या आशय है?
Answer: बाजार के बाजारूपन से आशय है कि जब लोग विज्ञापनों और बाहरी चमक-दमक से प्रभावित होकर अनावश्यक चीज़ें खरीदने लगते हैं। इससे बाजार का असली उद्देश्य (लोगों की ज़रूरतें पूरी करना) खत्म हो जाता है और वह केवल दिखावा व शोषण का साधन बन जाता है। बाजार में अनावश्यक चीज़ें बेचने और खरीदने की होड़ बाजारूपन कहलाती है।
In simple words: बाजारूपन का मतलब है जब लोग विज्ञापनों से प्रभावित होकर बिना ज़रूरत के चीज़ें खरीदते हैं, जिससे बाजार का असली मकसद बदल जाता है।

🎯 Exam Tip: 'विज्ञापनों से प्रभावित होकर अनावश्यक खरीदारी' इस विचार को उत्तर में प्रमुखता दें।

 

Question 11. लेखक ने क्यों कहा है कि मैं विद्वान नहीं हूँ जो शब्दों पर अटकें?
Answer: लेखक ने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि वे केवल शब्दों के जाल में उलझना नहीं चाहते। उनका मानना है कि वास्तविक समझ शब्दों से ज़्यादा विचारों और भावनाओं में होती है। वे अपनी बात को सीधे और सरल तरीके से समझाना चाहते हैं, न कि कठिन शब्दों या तर्कों से। लेखक का उद्देश्य ज्ञान को साझा करना है, न कि पांडित्य दिखाना।
In simple words: लेखक कहते हैं कि वे शब्दों के जाल में नहीं फंसते क्योंकि उनका मकसद बातों को सीधे और आसानी से समझाना है, न कि सिर्फ विद्वत्ता दिखाना।

🎯 Exam Tip: उत्तर में लेखक की सीधी और सरल बात कहने की इच्छा को व्यक्त करें, न कि केवल शब्दाडंबर को।

 

Question 12. ग्राहक बाजार में चीजों को देखकर ही उनको खरीदने के लिए आकर्षित होता है। इस तरह बाजार आँख की राहे काम करता है।
Answer: ग्राहक बाजार में सजी हुई चीज़ों को देखकर ही उन्हें खरीदने के लिए आकर्षित होता है। इस तरह बाजार आँखों के रास्ते से काम करता है। बाजार अपनी चमक-दमक से लोगों को प्रभावित करता है और उन्हें चीज़ें खरीदने के लिए उकसाता है। कई बार लोग ज़रूरत न होने पर भी सिर्फ सुंदरता देखकर चीज़ें खरीद लेते हैं।
In simple words: ग्राहक बाजार में चीज़ें देखकर ही उनकी ओर खिंचता है, यानी बाजार आँखों के माध्यम से लोगों को आकर्षित करता है।

🎯 Exam Tip: 'आँखों के रास्ते काम करना' और 'आकर्षण' जैसे शब्दों का उपयोग करें, क्योंकि ये इस विचार के केंद्र में हैं।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 11 बाजार दर्शन लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. 'बाजार दर्शन' जैनेन्द्र जी का कैसा निबन्ध है?
Answer: 'बाजार दर्शन' जैनेन्द्र कुमार जी का एक विचारप्रधान निबन्ध है। इसमें गहन विचारों के साथ-साथ व्यंग्य का पुट भी है। यह निबन्ध बाजार की वास्तविक उपयोगिता को समझाता है। लेखक बताते हैं कि आज के उपभोक्तावादी युग में बाजार का स्वरूप बदल गया है; वह अब सिर्फ दिखावे और ठगी का जाल बन गया है, जो उपभोक्ताओं के शोषण का माध्यम है।
In simple words: 'बाजार दर्शन' जैनेन्द्र जी का एक विचारभरा निबन्ध है, जिसमें बाजार के दिखावे और शोषण पर व्यंग्य किया गया है।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में 'विचारप्रधान निबन्ध' और 'व्यंग्य का पुट' इन दो मुख्य विशेषताओं को दर्शाना ज़रूरी है।

 

Question 2. “यह व्यक्तित्व का प्रश्न नहीं स्त्रीत्व का प्रश्न है।”-लेखक ने ऐसा क्यों कहा है?
Answer: लेखक ने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि उनके मित्र मामूली चीज़ लेने बाजार गए थे, लेकिन लौटे तो उनके पास कई बंडल थे। मित्र ने बताया कि इतना सारा सामान उन्होंने अपनी पत्नी के कारण खरीदा है। लेखक का मानना है कि चीज़ों का संग्रह करना स्त्रियों का स्वाभाविक स्वभाव होता है। आदिकाल से घर-गृहस्थी का काम स्त्रियाँ ही करती आई हैं, इसलिए चीज़ें इकट्ठा करने की भावना उनमें स्वाभाविक रूप से होती है।
In simple words: लेखक ने कहा कि चीज़ें इकट्ठा करना किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि स्त्रियों का स्वभाव है, क्योंकि वे घर-गृहस्थी संभालती हैं।

🎯 Exam Tip: 'वस्तुओं के संग्रह का स्वभाव स्त्रियों का होता है' इस विचार को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें।

 

Question 3. "स्त्री माया न जोड़े तो क्या मैं जोड़ें? इस वाक्य से 'माया' का क्या अर्थ है? स्त्री द्वारा माया जोड़ना प्रकृति प्रदत्त नहीं, परिस्थितिवश है। वे कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जो सभी को माया जोड़ने को विवश करती हैं?
Answer: इस वाक्य में 'माया' का अर्थ है घर के काम आने वाली चीज़ें (गृहोपयोगी वस्तुएँ)। स्त्री द्वारा माया जोड़ना प्रकृति प्रदत्त (स्वाभाविक) नहीं, बल्कि परिस्थितियों के कारण होता है। कुछ परिस्थितियाँ जो स्त्रियों को माया जोड़ने के लिए मजबूर करती हैं, वे इस प्रकार हैं:
1. स्त्रियों को घर के लिए ज़रूरी चीज़ों का ज्ञान पुरुषों से ज़्यादा होता है और मौका मिलने पर वे उन्हें खरीद लेती हैं।
2. भविष्य में चीज़ों के महंगे होने के डर से भी वे चीज़ें खरीद लेती हैं, ताकि बाद में ज़्यादा पैसे खर्च न हों।
3. वे चाहती हैं कि ज़रूरत पड़ने पर उनके घर में किसी चीज़ की कमी न हो, ताकि उन्हें पड़ोसियों से कुछ मांगना न पड़े। इससे उनका आत्मसम्मान बना रहता है।
यह परिस्थिति के प्रति स्त्री की समझदारी और सावधानी को दर्शाता है।
In simple words: यहाँ 'माया' का मतलब घर की ज़रूरी चीज़ें हैं। स्त्रियाँ भविष्य की चिंता, ज़रूरतें पूरी करने और आत्मसम्मान बनाए रखने के लिए चीज़ें जमा करती हैं, यह उनकी समझदारी है।

🎯 Exam Tip: 'माया' का अर्थ 'गृहोपयोगी वस्तुएँ' बताएँ और परिस्थितियों को बिन्दुवार समझाएँ।

 

Question 4. पैसा पावर है। उसकी यह पावर कब प्रमाणित होती है?
अथवा
'पर्चेजिंग पावर के प्रयोग का रस' क्या है?

Answer: पैसा में सचमुच शक्ति होती है, जिसे 'पावर' कहते हैं। यह पावर तब प्रमाणित होती है जब पैसा देकर उसके बदले में कोई चीज़ खरीदी जा सकती है। यदि किसी के पास धन न हो, तो वह अपनी इस शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता। 'पर्चेजिंग पावर' का उपयोग करने का असली सुख तभी मिलता है जब व्यक्ति अपनी पसंद की चीज़ें खरीद पाता है।
In simple words: पैसा में ताकत है, यह तब साबित होता है जब उससे चीज़ें खरीदी जा सकें। अपनी पसंद की चीज़ें खरीदना ही 'पर्चेजिंग पावर' का असली सुख है।

🎯 Exam Tip: 'खरीदने की क्षमता' और 'धन का उपयोग' इन दो मुख्य बिंदुओं को स्पष्ट करें।

 

Question 6. बाजार को "शैतान का जाल' क्यों कहा गया है?
अथवा
बाजार के आकर्षण का क्या दुष्प्रभाव होता है?

Answer: बाजार को 'शैतान का जाल' इसलिए कहा गया है क्योंकि जिस प्रकार एक चालाक शिकारी जाल बिछाकर शिकार को फँसाता है, उसी प्रकार सजे-धजे बाजार अपनी चमक-दमक से ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यह खामोश आकर्षण मनुष्य के मन में और चीज़ें पाने की चाहत पैदा करता है। व्यक्ति सोचने लगता है कि यहाँ सब कुछ है, लेकिन उसके पास बहुत कम है। अपनी ज़रूरतों का सही पता न होने के कारण मनुष्य इस आकर्षण में फंसकर बिना काम की चीज़ें खरीद लेता है। इससे इच्छाओं का वेग बढ़ जाता है और उसका मन लालच, असंतोष और ईर्ष्या से भर जाता है। यह मानसिक बेचैनी उसे पागल बना सकती है और हमेशा के लिए बेकार कर सकती है।
In simple words: बाजार को 'शैतान का जाल' इसलिए कहते हैं क्योंकि यह अपनी चमक-दमक से लोगों को फँसाता है, जिससे वे बिना ज़रूरत की चीज़ें खरीदते हैं और उनका मन लालच तथा असंतोष से भर जाता है।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में बाजार के 'आकर्षण' को 'जाल' के रूप में दर्शाएँ और इसके नकारात्मक प्रभावों को स्पष्ट करें।

 

Question 7. 'बाजार जाओ तो मन खाली न हो'-लेखक के इस कथन का क्या आशय है?
अथवा
बाजार के जादू की जकड़ से बचने का क्या उपाय है?

Answer: 'बाजार जाओ तो मन खाली न हो' - इस कथन का आशय है कि बाजार जाते समय हमें अपनी ज़रूरतों के बारे में ठीक से पता होना चाहिए। यदि मनुष्य को यह नहीं पता कि उसे किस चीज़ की ज़रूरत है, तो वह बाजार के आकर्षण में फंसकर अनावश्यक चीज़ें खरीद लेगा। बाजार से उपयोगी चीज़ें खरीदने में ही बाजार की सार्थकता है। यदि मन भरा होगा, तो मनुष्य बाजार के जादू की पकड़ से बच पाएगा और फिजूलखर्ची से भी बचेगा। इससे अनावश्यक चीज़ों से होने वाली परेशानी से भी बचाव होगा।
In simple words: लेखक का मतलब है कि बाजार जाते समय हमें पता होना चाहिए कि क्या खरीदना है, ताकि हम अनावश्यक चीज़ें न खरीदें और बाजार के आकर्षण से बच सकें।

🎯 Exam Tip: 'अपनी आवश्यकताओं का ज्ञान' और 'फिजूलखर्ची से बचाव' इन मुख्य विचारों को उत्तर में शामिल करें।

 

Question 8. बाजार के दो पक्ष कौन-से हैं? उनकी विशेषताएँ क्या हैं?
Answer: बाजार के दो मुख्य पक्ष हैं: पहला पक्ष 'विक्रेता' या 'बेचने वाला' और दूसरा पक्ष 'क्रेता' या 'ग्राहक'।
**विक्रेता:** विक्रेता दो प्रकार के होते हैं। एक वह विक्रेता जो केवल उतना ही सामान बेचता है जितनी उसे ज़रूरत होती है, जैसे भगत जी। दूसरा वह जो ज़्यादा से ज़्यादा लाभ कमाने के लिए ग्राहकों को आकर्षित करता है और उन्हें अनावश्यक चीज़ें खरीदने के लिए उकसाता है।
**क्रेता:** क्रेता भी दो प्रकार के होते हैं। एक वह जो अपनी ज़रूरतों को जानता है और केवल काम की चीज़ें ही खरीदता है, फिजूलखर्ची से बचता है। दूसरा वह जो बाजार की चमक-दमक में फंसकर बिना ज़रूरत के चीज़ें खरीद लेता है और अपनी 'पर्चेजिंग पावर' का दिखावा करता है।
In simple words: बाजार में दो हिस्से होते हैं - बेचने वाले और खरीदने वाले। बेचने वाले या तो ज़रूरत भर बेचते हैं या ज़्यादा लाभ कमाते हैं। खरीदने वाले या तो ज़रूरत के हिसाब से खरीदते हैं या दिखावे में फंसकर अनावश्यक चीज़ें ले लेते हैं।

🎯 Exam Tip: विक्रेता और क्रेता दोनों के प्रकारों और उनकी विशेषताओं को स्पष्ट रूप से अलग-अलग बताएँ।

 

Question 9. बाजारूपन का क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के व्यक्ति बाजार को बाजारूपन से बचाकर उसे सार्थकता प्रदान करते हैं?
Answer: बाजारूपन का तात्पर्य है बाजार जैसी महत्वपूर्ण संस्था को अपने असली उद्देश्य से भटकाना। बाजार का गठन समाज की ज़रूरतों को ठीक से पूरा करने के लिए होता है। इसी में बाजार की सार्थकता है। कुछ लोग जिन्हें अपनी आवश्यकताओं का सही ज्ञान नहीं होता, वे बाजार में अपनी 'पर्चेजिंग पावर' का गलत इस्तेमाल करते हैं और बिना ज़रूरत के चीज़ें खरीदते हैं। इससे बाजार में जो खराबी आती है, उसे ही 'बाजारूपन' कहते हैं। बाजार को बाजारूपन से बचाकर उसे सार्थक वही ग्राहक बनाते हैं जो अपनी ज़रूरतों को ठीक से समझते हैं और बाजार से केवल उपयोगी चीज़ें ही खरीदते हैं। ऐसे ग्राहक बाजार के सही उद्देश्य को बनाए रखने में मदद करते हैं।
In simple words: बाजारूपन का मतलब है जब लोग बिना ज़रूरत के चीज़ें खरीदते हैं और बाजार अपने असली मकसद से भटक जाता है। अपनी ज़रूरतों को समझने वाले ग्राहक ही बाजार को सही मायने में उपयोगी बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: बाजारूपन की परिभाषा के साथ यह भी बताएँ कि कौन से ग्राहक इसे सार्थक बनाए रखते हैं, जिससे आपका उत्तर पूर्ण हो।

 

Question 10. 'बाजार दर्शन' नामक निबन्ध में किस प्रकार के ग्राहकों के बारे में बताया गया है? आप स्वयं को किस श्रेणी का ग्राहक मानते/मानती हैं?
Answer: 'बाजार दर्शन' निबन्ध में दो प्रकार के ग्राहकों के बारे में बताया गया है:
1. **अनाड़ी ग्राहक:** ये वे ग्राहक होते हैं जिन्हें पता नहीं होता कि उन्हें किस चीज़ की ज़रूरत है। वे बाजार की चमक-दमक में फंसकर अनावश्यक चीज़ें खरीदते रहते हैं।
2. **सजग ग्राहक:** ये वे ग्राहक होते हैं जो अपनी आवश्यकताओं को अच्छी तरह से जानते हैं। वे केवल आवश्यक चीज़ें ही बाजार से खरीदते हैं और धन की बर्बादी से बचते हैं।
मैं स्वयं को दूसरी श्रेणी का यानी 'सजग ग्राहक' मानता/मानती हूँ। मैं अनावश्यक चीज़ें नहीं खरीदता/खरीदती और अपने पैसे का सदुपयोग करता/करती हूँ, जिससे फिजूलखर्ची से बचा जा सके। मैं सिर्फ वही चीज़ें खरीदता/खरीदती हूँ जिनकी मुझे सच में ज़रूरत होती है।
In simple words: निबन्ध में दो तरह के ग्राहक बताए गए हैं- एक जिन्हें पता नहीं क्या खरीदना है और दूसरे जिन्हें अपनी ज़रूरतें पता हैं। मैं खुद को सजग ग्राहक मानता/मानती हूँ क्योंकि मैं सिर्फ काम की चीज़ें खरीदता/खरीदती हूँ और फिजूलखर्ची से बचता/बचती हूँ।

🎯 Exam Tip: दोनों प्रकार के ग्राहकों का स्पष्ट विवरण दें और फिर ईमानदारी से अपनी श्रेणी का चुनाव करें, साथ में कारण भी बताएं।

 

Question 11. 'बाजार दर्शन' पाठ में बताया गया है कि कभी-कभी आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं?
Answer: हाँ, मैं इस विचार से पूरी तरह सहमत हूँ कि कभी-कभी आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है। बाजार में चीज़ों का मूल्य माँग और पूर्ति के आधार पर तय होता है। जब माँग कम और पूर्ति ज़्यादा हो तो चीज़ सस्ती बिकती है, लेकिन जब माँग ज़्यादा हो और पूर्ति कम हो तो चीज़ें महंगी बिकती हैं। चालाक विक्रेता इसी बात का फ़ायदा उठाते हैं। वे माल को छिपाकर उसकी कृत्रिम कमी दिखाते हैं और इस तरह लोगों की ज़रूरत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, जिससे वे अधिक कीमत पर चीज़ें बेच सकें। यह तरीका लोगों की आवश्यकता का शोषण करता है। कीमतें अक्सर बनावटी होती हैं ताकि ज़्यादा लाभ कमाया जा सके।
In simple words: हाँ, मैं सहमत हूँ कि ज़रूरत शोषण बन सकती है। जब विक्रेता जानबूझकर चीज़ों की कमी दिखाते हैं और माँग बढ़ाते हैं, तो वे लोगों की ज़रूरतों का फ़ायदा उठाकर उन्हें महंगी बेचते हैं।

🎯 Exam Tip: 'माँग और पूर्ति' के सिद्धांत को समझाएँ और कैसे विक्रेता इसका दुरुपयोग करके शोषण करते हैं, यह स्पष्ट करें।

 

Question 12. आप बाजार की विभिन्न प्रकार की संस्कृतियों से परिचित होंगे। मॉल की संस्कृति, सामान्य बाजार की संस्कृति, हाट की संस्कृति में अंतर स्पष्ट कीजिए।
Answer: बाजार की विभिन्न संस्कृतियाँ इस प्रकार हैं:
1. **मॉल की संस्कृति:** यह आधुनिक और दिखावटी खरीदारी का स्थान है। यहाँ ब्रांडेड और महंगी चीज़ें मिलती हैं। मॉल में ग्राहक को आकर्षित करने के लिए हर चीज़ सजाई जाती है। यहाँ आमतौर पर बड़े शहरों के लोग खरीदारी करते हैं। यह 'पर्चेजिंग पावर' के प्रदर्शन का केंद्र है।
2. **सामान्य बाजार की संस्कृति:** यह मॉल से थोड़ा अलग होता है, जहाँ रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीज़ें मिलती हैं। यहाँ मोल-भाव भी होता है और ग्राहक अपनी आवश्यकताओं के अनुसार खरीदारी करते हैं। यह बाजार मध्यम वर्ग के लोगों के लिए ज़्यादा उपयोगी होता है।
3. **हाट की संस्कृति:** हाट गाँव-कस्बों में लगने वाला साप्ताहिक बाजार होता है। यहाँ उत्पादक सीधे अपना माल लेकर आते हैं और उपभोक्ता उनसे सीधे संपर्क करते हैं। हाट में उपयोगी और सस्ती चीज़ें मिलती हैं। किसान और मजदूर अपनी ज़रूरतें हाट से पूरी करते हैं। यहाँ दिखावा कम और ज़रूरत ज़्यादा महत्वपूर्ण होती है।
मॉल ग्राहक को लुभाता है, सामान्य बाजार ज़रूरतें पूरी करता है, और हाट सीधा संपर्क व किफायती चीज़ें देता है।
In simple words: मॉल में महंगी और ब्रांडेड चीज़ें मिलती हैं, सामान्य बाजार में रोज़ की ज़रूरत का सामान मिलता है, और हाट गाँव में लगने वाला सस्ता बाजार है जहाँ सीधा लेन-देन होता है।

🎯 Exam Tip: तीनों संस्कृतियों की विशेषताओं को स्पष्ट रूप से अलग-अलग बिंदुओं में समझाएँ और उनके मुख्य अंतरों पर प्रकाश डालें।

 

Question 13. 'खाली मन' तथा 'बन्द मन' में बाजार दर्शन के लेखक ने क्या अन्तर बताया है?
Answer: 'बाजार दर्शन' पाठ में लेखक ने 'खाली मन' और 'बंद मन' के बीच अंतर बताया है:
1. **खाली मन:** इसका मतलब है कि व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं का स्पष्ट ज्ञान नहीं है। जब उसे पता नहीं होता कि बाजार से क्या खरीदना है, तो उसका मन 'खाली' कहलाता है। ऐसे मन के साथ बाजार जाने पर व्यक्ति बाजार की चमक-दमक से प्रभावित होकर अनावश्यक चीज़ें खरीद लेता है, जिससे बाद में उसे परेशानी होती है।
2. **बंद मन:** 'बंद मन' का मतलब मन का पूरी तरह से शून्य हो जाना नहीं है, बल्कि इच्छाओं को बलपूर्वक दबाना है, जिससे मन में कोई इच्छा पैदा ही न हो। लेखक के अनुसार, मन को बलपूर्वक बंद करना हठ है और ऐसा करना उचित नहीं है, क्योंकि मनुष्य अपूर्ण है और इच्छाएं होना स्वाभाविक है।
लेखक सलाह देते हैं कि बाजार जाते समय मन को खाली नहीं होना चाहिए, यानी अपनी ज़रूरतें पता होनी चाहिए, लेकिन मन को बलपूर्वक बंद भी नहीं करना चाहिए।
In simple words: 'खाली मन' तब होता है जब हमें पता न हो कि क्या खरीदना है, और हम अनावश्यक चीज़ें खरीद लेते हैं। 'बंद मन' का मतलब है इच्छाओं को जबरदस्ती दबाना, जिसे लेखक सही नहीं मानते।

🎯 Exam Tip: दोनों स्थितियों की परिभाषा और उनके प्रभावों को स्पष्ट रूप से अलग-अलग समझाएँ।

 

Question 14. “बाजार दर्शन' निबन्ध में परमात्मा तथा मनुष्य में क्या अन्तर बताया गया है? मनुष्य को मन को बन्द करने का अधिकार क्यों नहीं है?
Answer: 'बाजार दर्शन' निबन्ध में लेखक ने परमात्मा और मनुष्य के बीच यह अंतर बताया है कि परमात्मा स्वयं सम्पूर्ण है और उसे 'शून्य' कहा गया है, क्योंकि उसमें कोई इच्छा नहीं होती। वह इच्छाओं से परे है। इसके विपरीत, मनुष्य अपूर्ण है और उसमें इच्छाएं होना स्वाभाविक है। मनुष्य को मन को बलपूर्वक बंद करने, यानी इच्छाओं को पूरी तरह खत्म करने का अधिकार नहीं है। ऐसा करना हठ है और मनुष्य की प्रकृति के विरुद्ध है। अपनी अपूर्णता को स्वीकार करके ही मनुष्य सच्चा कर्म कर सकता है।
In simple words: लेखक बताते हैं कि भगवान इच्छाओं से मुक्त और पूर्ण हैं, जबकि इंसान अपूर्ण है और उसकी इच्छाएं होना स्वाभाविक है। इसलिए इंसान को अपने मन को पूरी तरह बंद करने का हक नहीं है।

🎯 Exam Tip: 'परमात्मा की पूर्णता' और 'मनुष्य की अपूर्णता' के मुख्य अंतर पर ध्यान केंद्रित करें।

 

Question 15. चूरन वाले भगत जी पर बाजार का जादू क्यों नहीं चलता? वह बाजार को किस प्रकार सार्थकता प्रदान कर रहे हैं?
Answer: चूरन वाले भगत जी पर बाजार का जादू इसलिए नहीं चलता क्योंकि उन्हें अपनी ज़रूरतों का स्पष्ट ज्ञान है। वे निर्लोभी और संतोषी स्वभाव के हैं। बाजार में भले ही बहुत सारा माल सजा हो, लेकिन उनकी रुचि केवल जीरा और काला नमक खरीदने तक ही रहती है। जैसे ही वे अपनी ज़रूरत की चीज़ें खरीद लेते हैं, बाजार का आकर्षण उनके लिए खत्म हो जाता है। वे चाँदनी चौक के बड़े-बड़े स्टोरों को छोड़कर एक पंसारी की दुकान पर जाते हैं और अपनी ज़रूरत का सामान खरीदते हैं। इस प्रकार, वे अपनी आवश्यकता पूरी करके बाजार को सही सार्थकता प्रदान करते हैं।
In simple words: भगत जी पर बाजार का जादू नहीं चलता क्योंकि उन्हें अपनी ज़रूरतें पता हैं और वे लालची नहीं हैं। वे केवल काम की चीज़ें खरीदकर बाजार को सही मायने में उपयोगी बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: उत्तर में भगत जी के 'संतोषी स्वभाव', 'आवश्यकताओं का ज्ञान' और 'निर्लोभी प्रवृत्ति' को प्रमुखता दें।

 

Question 16. "चौक की चाँदनी दाएँ-बाएँ भूखी-की-भूखी फैली रह जाती है।” कहने का लेखक का तात्पर्य क्या है?
Answer: "चौक की चाँदनी दाएँ-बाएँ भूखी-की-भूखी फैली रह जाती है" - इस कथन का लेखक का तात्पर्य यह है कि जब चूरन वाले भगत जी चाँदनी चौक जाते हैं, तो वे केवल चूरन बनाने के लिए काला नमक और जीरा खरीदते हैं। ये चीज़ें उन्हें एक पंसारी की दुकान से मिल जाती हैं। चाँदनी चौक में बहुत सारी फैंसी चीज़ों के स्टोर हैं, लेकिन भगत जी उन चीज़ों को देखकर प्रभावित नहीं होते। उनकी ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं, तो बाजार की चमक-दमक उनके लिए बेकार हो जाती है। बाजार उन्हें अपनी ओर खींचने में असफल रहता है, जैसे कोई भूखा व्यक्ति खाने की कमी में बैठा हो।
In simple words: लेखक का मतलब है कि जब भगत जी अपनी ज़रूरत का सामान खरीद लेते हैं, तो बाजार की सारी चमक-दमक उनके लिए बेअसर हो जाती है, उन्हें और कुछ नहीं चाहिए होता।

🎯 Exam Tip: 'भगत जी की आवश्यकताओं की पूर्ति' और 'बाजार के आकर्षण का उन पर प्रभाव न पड़ना' इन दो मुख्य विचारों को स्पष्ट करें।

 

Question 17. निस्पृहता की तुलना कबीर की इस सूक्ति से कीजिए
चाह गई चिन्ता मिटी मनुआँ बेपरवाह।
जाको कछु नहिं चाहिए सोइ शहंशाह॥

Answer: कबीर की सूक्ति "चाह गई चिन्ता मिटी मनुआँ बेपरवाह। जाको कछु नहिं चाहिए सोइ शहंशाह॥" का अर्थ है कि जब मन से कोई चाहत या लालच खत्म हो जाता है, तो सारी चिंताएँ मिट जाती हैं और मन बेपरवाह हो जाता है। जिसे संसार में कुछ भी नहीं चाहिए, वही असली बादशाह या शहंशाह है। लेखक ने चूरन वाले भगत जी के उदाहरण से यही बात समझाई है। भगत जी को अपनी सीमित आवश्यकता (जीरा और नमक) से ज़्यादा किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं होती। छः आने की कमाई होते ही वे चूरन बेचना बंद कर देते थे और बचा हुआ चूरन बच्चों में मुफ्त बाँट देते थे। उन्हें बाजार की अन्य चीज़ों में कोई आकर्षण नहीं दिखता और ज़्यादा पैसा कमाने में भी उनकी रुचि नहीं होती। इस प्रकार, बेफिक्र भगत जी कबीर के सच्चे अनुयायी लगते हैं। उनका जीवन हमें संतोष और निस्पृहता का पाठ पढ़ाता है।
In simple words: कबीर कहते हैं कि जिसे कुछ नहीं चाहिए, वही खुश रहता है। भगत जी भी ऐसे ही थे, उन्हें अपनी ज़रूरतों से ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए था, इसलिए वे हमेशा खुश रहते थे, जैसे कबीर के वचनों को जीते हों।

🎯 Exam Tip: कबीर की सूक्ति का अर्थ समझाएँ और फिर उसे भगत जी के जीवन से जोड़कर निस्पृहता के भाव को स्पष्ट करें।

 

Question 18. चाँदनी चौक बाजार में भगत जी के व्यक्तित्व का कौन-सा सशक्त पहलू उभर कर सामने आता है? आपकी दृष्टि में उनका आचरण समाज में शान्ति स्थापित करने में किस तरह सहायक हो सकता है?
Answer: चाँदनी चौक बाजार में भगत जी के व्यक्तित्व का सबसे सशक्त पहलू उनका 'संतोष और आत्म-नियंत्रण' है। वे चूरन बनाने के लिए काला नमक और जीरा खरीदने जाते हैं, लेकिन बाजार के शानदार स्टोरों की चमक-दमक उन्हें ज़रा भी विचलित नहीं करती। वे संतुष्ट मन और खुली आँखों से बाजार जाते हैं, सीधे पंसारी की दुकान से अपनी ज़रूरत का सामान खरीदते हैं और उसके बाद बाजार का आकर्षण उनके लिए शून्य हो जाता है।
उनकी यह जीवनशैली समाज में शांति स्थापित करने में बहुत सहायक हो सकती है। यदि लोग भगत जी की तरह अनावश्यक चीज़ें खरीदने और उनका संग्रह करने से बचेंगे, तो समाज में स्पर्धा (प्रतिस्पर्धा) कम होगी। चीज़ों की कृत्रिम कमी पैदा नहीं होगी, और विक्रेताओं को चीज़ों की बनावटी कमी दिखाकर कीमतें बढ़ाने या लोगों का शोषण करने का अवसर नहीं मिलेगा। इससे समाज में अनावश्यक अशांति और तनाव भी नहीं फैलेगा। भगत जी का आचरण हमें सादा जीवन और उच्च विचार की प्रेरणा देता है।
In simple words: भगत जी का संतोषी और आत्म-नियंत्रित स्वभाव चाँदनी चौक में उभरता है। उनका यह व्यवहार समाज में शांति ला सकता है क्योंकि अगर सब उनकी तरह सिर्फ ज़रूरत का सामान खरीदें, तो दिखावा, लालच और शोषण कम हो जाएगा।

🎯 Exam Tip: भगत जी के 'संतोषी स्वभाव' और 'आत्म-नियंत्रण' को सशक्त पहलू बताएँ, फिर समझाएँ कि कैसे यह समाज में 'स्पर्धा में कमी' और 'शोषण से बचाव' द्वारा शांति लाता है।

 

Question 19. पैसे की व्यंग्य शक्ति से क्या आशय है? पैसे की व्यंग्य शक्ति को पराजित करने वाला कौन-सा बल है?
Answer: पैसे की व्यंग्य शक्ति से आशय है कि पैसे के अभाव में मनुष्य में हीनता की भावना पैदा होती है। पैसा वाला व्यक्ति खुद को बड़ा और दूसरों से श्रेष्ठ समझता है, जबकि पैसे के अभाव वाला व्यक्ति पैसे वालों से ईर्ष्या करता है। वह अपने धनवान रिश्तेदारों से भी ईर्ष्या करने लगता है। यही पैसे की शक्ति उसकी 'व्यंग्य शक्ति' कहलाती है, जो दूसरों को अपनी कमी का एहसास कराती है। यह व्यंग्य शक्ति बहुत कष्टदायक होती है।
पैसे की इस व्यंग्य शक्ति को पराजित करने वाला बल 'आत्मिक, नैतिक तथा धार्मिक बल' है। यह बल उस व्यक्ति में होता है जिसने लालच और संग्रह करने की प्रवृत्ति पर काबू पा लिया हो। यह बल सांसारिक धन और वैभव के बल से भी ऊँचा है। यह बल रखने वाला व्यक्ति बाजार के व्यंग्य से प्रभावित नहीं होता, क्योंकि उसकी इच्छाएँ नियंत्रित होती हैं।
In simple words: पैसे की व्यंग्य शक्ति का मतलब है कि जिसके पास पैसा नहीं होता, उसे अपनी कमी का एहसास होता है और वह दूसरों से ईर्ष्या करता है। इस शक्ति को हराने वाला बल 'आत्मिक और नैतिक बल' है, जो लालच से मुक्त व्यक्ति में होता है।

🎯 Exam Tip: 'पैसे की व्यंग्य शक्ति' की परिभाषा दें और फिर 'आत्मिक, नैतिक तथा धार्मिक बल' को उसके विरोधी के रूप में स्पष्ट करें।

 

Question 20. लेखक ने किस प्रकार के बाजार को मानवता के लिए विडम्बना कहा है?
Answer: लेखक ने उस बाजार को मानवता के लिए विडम्बना कहा है जो अपनी क्रय-शक्ति का प्रदर्शन करता है। वह बाजार मानवता के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बन जाता है। बाजार अपनी चमक-दमक से लोगों को आकर्षित करता है, जिससे वे बिना ज़रूरत के चीज़ें खरीदने लगते हैं। ऐसे बाजार में ग्राहक को वस्तुओं के सही उपयोग की बजाय, केवल उपभोग करने के लिए प्रेरित किया जाता है। जब बाजार का उद्देश्य लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करना न होकर केवल धन कमाना और दिखावा बन जाए, तो वह मानवता के लिए एक विडंबना बन जाता है।
In simple words: लेखक ने ऐसे बाजार को मानवता के लिए विडम्बना कहा है जो लोगों को अनावश्यक चीज़ें खरीदने पर मजबूर करता है और अपनी खरीदने की ताकत का गलत इस्तेमाल करता है, जिससे लोगों का शोषण होता है।

🎯 Exam Tip: 'क्रय-शक्ति का प्रदर्शन' और 'अनावश्यक खरीदारी' इन बिंदुओं को स्पष्ट करें, जिससे बाजार का नकारात्मक स्वरूप सामने आए।

 

Question 21. 'किश्त क्रय पद्धति' में आपको बाजार का कौन-सा रूप दिखाई देता है? क्या यह पद्धति ग्राहक के हित में है?
Answer: 'किश्त क्रय पद्धति' (EMI) में बाजार का मायावी और उपभोक्तावादी रूप दिखाई देता है। यह पद्धति ग्राहक के हित में बिल्कुल नहीं है, बल्कि यह उसके शोषण का एक छिपा हुआ तरीका है। इसमें जिस ग्राहक के पास तुरंत भुगतान करने के लिए पैसा नहीं होता, उसे भी अनावश्यक वस्तुएँ खरीदने के लिए प्रेरित किया जाता है। इससे ग्राहक कर्ज में डूब जाता है और उसे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इस पद्धति का मुख्य उद्देश्य ग्राहक का भला करना नहीं, बल्कि उत्पादक को माल बेचने और फाइनेंसर को ब्याज का लाभ दिलाना है। ग्राहक की जेब तो केवल कटती ही है।
In simple words: किश्त पर चीज़ें बेचने की पद्धति बाजार का दिखावटी और शोषण वाला रूप है। यह ग्राहक के लिए अच्छी नहीं है क्योंकि इससे वह अनावश्यक चीज़ें खरीदकर कर्ज में फंस जाता है, जबकि फायदा सिर्फ बेचने वाले और कर्ज़ देने वाले को होता है।

🎯 Exam Tip: किश्त पद्धति को 'मायावी' और 'उपभोक्तावादी' रूप में दर्शाएँ और ग्राहक के 'शोषण' पर ज़ोर दें।

 

Question 22. दूरदर्शन पर 'जागो ग्राहक जागो' जैसे विज्ञापन दिखाकर ग्राहक को शोषण के विरुद्ध सजग किया जाता है। क्या आप इस तरह के विज्ञापनों से संतुष्ट हैं? इनमें आप क्या सुधार करना चाहेंगे?
Answer: 'जागो ग्राहक जागो' जैसे विज्ञापन ग्राहकों के हित में एक अच्छा कदम हैं, जो उन्हें जागरूक ग्राहक बनने के उपाय बताते हैं। लेकिन 'बाजार दर्शन' जैसे निबंध और 'जागो ग्राहक जागो' जैसे कार्यक्रम एक तरफा लगते हैं। इनमें सारा ज़ोर ग्राहक पर ही होता है। बाजार में ग्राहक और विक्रेता दोनों होते हैं। केवल ग्राहक को सावधान करके बाजार को जन-हितैषी नहीं बनाया जा सकता।
इन विज्ञापनों में सुधार के लिए मैं यह सुझाव देना चाहूंगा कि विक्रेता पक्ष को भी सुधारा जाए। भ्रामक विज्ञापन, कम तोलना, मिलावट जैसी कई समस्याएँ हैं, जिनका दायित्व विक्रेताओं का है। उनकी मनमानी पर भी रोक लगानी चाहिए। विज्ञापनों को केवल ग्राहक को नहीं, बल्कि विक्रेता को भी उसकी ज़िम्मेदारियों के बारे में जागरूक करना चाहिए।
In simple words: 'जागो ग्राहक जागो' विज्ञापन अच्छे हैं, पर वे सिर्फ ग्राहकों पर ध्यान देते हैं। मैं चाहता हूँ कि इनमें विक्रेताओं को भी उनकी ज़िम्मेदारियों के बारे में बताया जाए, ताकि धोखाधड़ी और मिलावट जैसी समस्याएँ रुकें।

🎯 Exam Tip: विज्ञापनों की सराहना करें, लेकिन उनकी एकतरफा प्रकृति को उजागर करें और 'विक्रेता पक्ष' को भी शामिल करने का सुझाव दें।

 

Question 23. प्रेमचन्द की कहानी 'ईदगाह' के पात्र हामिद तथा उसके दोस्तों का बाजार से क्या सम्बन्ध बनता है। विचार कर उत्तर दीजिए।
Answer: प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'ईदगाह' में हामिद और उसके दोस्तों का बाजार से अलग-अलग संबंध बनता है:
1. **हामिद:** हामिद कहानी का मुख्य पात्र है। वह अपने दोस्तों के साथ ईदगाह जाता है, लेकिन उसके पास ज़्यादा पैसे नहीं होते। वह मिठाइयों और खिलौनों के बजाय एक चिमटा खरीदता है, जो टिकाऊ और उपयोगी है। हामिद को हम 'खाली जेब पर भरे मन वाले ग्राहक' की श्रेणी में रख सकते हैं, क्योंकि उसके पास पैसे कम हैं, लेकिन उसे अपनी ज़रूरत की सही पहचान है।
2. **हामिद के दोस्त:** हामिद के दोस्त 'भरी जेब और खाली मन' वाले ग्राहकों की श्रेणी में आते हैं। उनके पास पैसे तो होते हैं, लेकिन उन्हें अपनी वास्तविक ज़रूरतों का पता नहीं होता। वे खिलौने और मिठाइयाँ खरीदते हैं, जो जल्दी नष्ट हो जाती हैं और चिमटे जितने उपयोगी नहीं होते।
इस प्रकार, हामिद बाजार का सही उपयोग करता है, जबकि उसके दोस्त बाजार के आकर्षण में फंसकर अनावश्यक खरीदारी करते हैं। हामिद का बाजार से संबंध समझदारी और ज़रूरत पर आधारित है, जबकि उसके दोस्तों का संबंध दिखावा और तात्कालिक इच्छा पर आधारित है।
In simple words: 'ईदगाह' कहानी में हामिद ने ज़रूरत के हिसाब से चिमटा खरीदा, भले ही उसके पास कम पैसे थे। उसके दोस्तों ने पैसे होते हुए भी फिजूल के खिलौने और मिठाई खरीदी। हामिद का बाजार से समझदारी का रिश्ता था, जबकि दोस्तों का दिखावे का।

🎯 Exam Tip: हामिद और उसके दोस्तों के बाजार संबंधों को 'खाली जेब-भरे मन' और 'भरी जेब-खाली मन' की श्रेणियों में बाँटकर स्पष्ट करें।

 

Question 24. “गड़रिया बगैर कहे ही उसके दिल की बात समझ गया, पर अँगूठी कबूल नहीं की। काली दाढ़ी के बीच पीले दाँतों की हँसी हँसते हुए बोला- मैं कोई राजा नहीं हूँ जो न्याय की कीमत वसूल करूँ? मैंने तो अटका काम निकाल दिया और यह अँगूठी मेरे किस काम की ।
करने वाला व्यक्ति है। दोनों अपने आप में मस्त हैं। दोनों की अवस्था देखकर मैं सोचता हूँ कि सुख संतोष में है। आवश्यकताओं के पीछे दौड़ने में नहीं है। अधिक धन कमाने तथा उसके प्रदर्शन में जीवन का वास्तविक आनन्द नहीं है। इच्छाओं पर नियंत्रण के बिना मनुष्य सुखी नहीं रह सकता, मनुष्य को अनावश्यक वस्तुओं के संग्रह से बचना चाहिए।

Answer: इस उद्धरण में गड़रिया उस व्यक्ति का प्रतीक है जो अपनी ज़रूरतों को सीमित रखता है और संतोषी जीवन जीता है। वह बिना कहे दूसरे की बात समझ जाता है लेकिन अँगूठी इसलिए कबूल नहीं करता क्योंकि उसे उसकी ज़रूरत नहीं है। वह हँसते हुए कहता है कि वह कोई राजा नहीं है जो न्याय के नाम पर कीमत वसूले। उसने तो बस अटका हुआ काम निकाला है और यह अँगूठी उसके किस काम की। इसका तात्पर्य यह है कि गड़रिया पैसे और दिखावे के लालच से मुक्त है।
लेखक आगे कहता है कि ऐसे व्यक्ति सुख और संतोष में होते हैं। असली खुशी आवश्यकताओं के पीछे भागने या ज़्यादा धन कमाने और उसका प्रदर्शन करने में नहीं है। जीवन का वास्तविक आनंद इच्छाओं पर नियंत्रण रखने में है। मनुष्य तभी सुखी रह सकता है जब वह अनावश्यक चीज़ों के संग्रह से बचे और लालच को त्यागे। गड़रिया जैसा व्यक्ति बिना किसी लालच के दूसरों की मदद करता है।
In simple words: गड़रिया बिना लालच के दूसरों की मदद करता है और अँगूठी भी नहीं लेता क्योंकि उसे ज़रूरत नहीं है। लेखक इसी बात से समझाते हैं कि असली खुशी कम चाहने, संतोषी रहने और दिखावे से दूर रहने में है, न कि ज़्यादा पैसा कमाने में।

🎯 Exam Tip: गड़रिया के चरित्र से 'संतोष' और 'निस्पृहता' के गुणों को जोड़ें, और यह स्पष्ट करें कि लेखक इन गुणों को 'वास्तविक आनंद' का स्रोत क्यों मानते हैं।

 

Question 25. "वह अर्थशास्त्र सरासर औंधा है। वह मायावी शास्त्र है। वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है।” -लेखक के इस कथन पर बाजार के सन्दर्भ में टिप्पणी कीजिए।
Answer: लेखक का यह कथन बाजार के उपभोक्तावादी स्वरूप पर एक तीखी टिप्पणी है। लेखक अर्थशास्त्र को बाजार का शास्त्र कहते हैं क्योंकि यह बाजार को पोषण देता है। यह बताता है कि ग्राहक को कैसे आकर्षित किया जाए, अनावश्यक चीज़ें खरीदने के लिए कैसे उकसाया जाए और उनका शोषण कैसे किया जाए। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में बाजार ग्राहक का दुश्मन बन जाता है। ऐसे बाजार में ग्राहक के साथ छल-कपट और शोषणपूर्ण व्यवहार होता है। जनता के लिए बाजार की उपयोगिता खत्म हो जाती है। ऐसे बाजार में शैतानी शक्ति होती है, जिसका लक्ष्य समाज की ज़रूरतों को पूरा करना नहीं, बल्कि ज़्यादा से ज़्यादा धन कमाना बन जाता है।
इसलिए लेखक ने इसे 'उल्टी सोच वाला' (सरासर औंधा), 'मायावी' (छल-कपट भरा) और 'अनीति-शास्त्र' (जो नीति के विरुद्ध हो) कहा है। यह समाज में अमीरी-गरीबी और आर्थिक असमानता पैदा करता है, क्योंकि यह धन को 'दानाय' (दान के लिए) नहीं, बल्कि 'मदाय' (घमंड के लिए) बढ़ावा देता है। अंततः इससे राष्ट्रीय धन का ज़्यादातर हिस्सा कुछ ही लोगों के हाथ में केंद्रित हो जाता है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि आजकल का अर्थशास्त्र गलत है क्योंकि यह बाजार को लोगों का शोषण करने और ज़्यादा पैसा कमाने का तरीका सिखाता है। यह लोगों को बिना ज़रूरत के चीज़ें खरीदने पर मजबूर करता है, जिससे समाज में असमानता बढ़ती है।

🎯 Exam Tip: लेखक द्वारा उपयोग किए गए विशेषणों ('औंधा', 'मायावी', 'अनीति-शास्त्र') को समझाएँ और उन्हें बाजार के नकारात्मक पहलुओं से जोड़ें।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 11 बाजार दर्शन निबंधात्मक प्रश्न

 

Question 1. 'बाजार दर्शन' पाठ के आधार पर चूरन वाले भगत जी की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
Answer: 'बाजार दर्शन' पाठ में चूरन वाले भगत जी का उल्लेख एक शांत, संतुष्ट और सुखी मनुष्य के रूप में हुआ है। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. **संतोषी:** भगत जी बहुत संतोषी हैं। वे अपनी कम कमाई से ही संतुष्ट रहते हैं। छः आने की कमाई होते ही वे चूरन बेचना बंद कर देते हैं और पच्चीसवाँ पैसा भी स्वीकार नहीं करते। बचा हुआ चूरन वे बच्चों में मुफ्त बाँट देते हैं। उन्हें अपनी ज़रूरतों से ज़्यादा की चाह नहीं होती।
2. **लोभहीन:** भगत जी में किसी भी प्रकार का लोभ नहीं है। वे व्यापार को सिर्फ लाभ कमाने या शोषण का ज़रिया नहीं मानते। उनके लिए व्यापार एक सेवा की तरह है।
3. **तृष्णा से मुक्त:** भगत जी में लालच का भाव नहीं है। उनमें चीज़ें इकट्ठा करने की भावना भी नहीं है। वे केवल जीवनयापन के लिए ज़रूरी पैसा ही कमाना चाहते हैं। उन्हें अपनी ज़रूरतों का ठीक-ठीक पता है और वे सिर्फ उतना ही सामान खरीदते हैं, जैसे चौक बाजार से जीरा और काला नमक। बाकी बाजार उन्हें आकर्षित नहीं कर पाता।
4. **सम्माननीय:** भगत जी भले ही धनवान या बहुत पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन अपने संतोषपूर्ण और निष्पाप स्वभाव के कारण वे सभी के लिए सम्माननीय हैं। बाजार में लोग उनका अभिवादन करते हैं, क्योंकि उनका जीवन सिद्धांतों पर आधारित है।
इन गुणों के कारण भगत जी बाजार के मायावी आकर्षण से मुक्त रहते हैं और सच्चे अर्थों में सुखी जीवन जीते हैं।
In simple words: भगत जी बहुत संतोषी थे, उन्हें किसी चीज़ का लालच नहीं था। वे सिर्फ अपनी ज़रूरत भर कमाते थे और बाकी चूरन मुफ्त बाँट देते थे। वे अपनी ज़रूरतों को जानते थे और दिखावे से दूर रहते थे, इसलिए सब उनका सम्मान करते थे।

🎯 Exam Tip: भगत जी के चरित्र की प्रत्येक विशेषता को एक अलग बिंदु के रूप में समझाएँ, जैसे 'संतोषी', 'लोभहीन', 'तृष्णा से मुक्त' और 'सम्माननीय'।

 

Question 3. यदि सभी उपभोक्ता भगत जी की तरह हो जाये तो बाजार तथा ग्राहकों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? समझाकर लिखिए।
Answer: यदि सभी उपभोक्ता भगत जी की तरह समझदार और संतोषी हो जाएँ, तो बाजार और ग्राहकों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ेगा। भगत जी जैसे उपभोक्ता अपनी ज़रूरतों को ठीक से जानते हैं और बाजार से केवल वही चीज़ें खरीदते हैं जिनकी उन्हें सच में ज़रूरत होती है। वे बाजार के आकर्षण से प्रभावित नहीं होते और केवल उतना ही धन कमाते हैं जितनी उन्हें ज़रूरत होती है। उनमें चीज़ें इकट्ठा करने की भावना नहीं होती।
अगर सभी ऐसा करने लगें तो:
1. बाजार को अनावश्यक रूप से चीज़ों का विज्ञापन करके लोगों को लुभाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। ग्राहक विज्ञापनों में नहीं फसेंगे और बाजार उनका शोषण नहीं कर पाएगा।
2. ग्राहक अपनी ज़रूरतों को जान लेंगे और उन्हें पता होगा कि किस चीज़ की ज़रूरत कहाँ से मिलेगी। वे बाजार में बेकार भटकेंगे नहीं।
3. ग्राहक अनावश्यक चीज़ें खरीदने में अपना पैसा बर्बाद नहीं करेंगे। वे अनिश्चय का शिकार नहीं होंगे और खाली हाथ बाजार से नहीं लौटेंगे।
4. वे केवल अपनी ज़रूरत की चीज़ें ही खरीदेंगे और चीज़ों का संग्रह नहीं करेंगे, जिससे लालच और असंतोष खत्म होगा।
इस तरह बाजार अपने असली उद्देश्य, यानी लोगों की ज़रूरतें पूरी करने पर ध्यान देगा और ग्राहक शोषण से बच सकेंगे।
In simple words: अगर सभी भगत जी की तरह अपनी ज़रूरतें समझकर सिर्फ काम की चीज़ें खरीदें, तो बाजार लोगों को बेवजह लुभाना बंद कर देगा। ग्राहक न तो ठगे जाएँगे और न ही फिजूलखर्ची करेंगे, जिससे बाजार सबके लिए अच्छा बन जाएगा।

🎯 Exam Tip: भगत जी के गुणों को आधार बनाकर, सोचें कि यह बदलाव बाजार के उद्देश्य, विज्ञापन और ग्राहकों के व्यवहार पर कैसे सकारात्मक प्रभाव डालेगा।

 

Question 4. बाजार किसी का धर्म, जाति, रंग, लिंग या क्षेत्र नहीं देखता वह सिर्फ उसकी क्रय-शक्ति देखता है। इस तरह वह सामाजिक समता की रचना कर रहा है। आप इससे कहाँ तक सहमत हैं?
Answer: यह बात काफी हद तक सही कही जा सकती है कि बाजार किसी का धर्म, जाति, रंग, लिंग या क्षेत्र नहीं देखता, वह सिर्फ उसकी 'क्रय-शक्ति' (खरीदने की क्षमता) देखता है। इस दृष्टि से बाजार सभी मनुष्यों को समान मानता है और कोई भेदभाव नहीं करता। इस तरह बाजार एक समतामूलक समाज बनाने में योगदान दे रहा है।
हालांकि, अगर इस बात पर गहराई से विचार किया जाए तो यह पूरी तरह सही नहीं है। जब सांप्रदायिक दंगे होते हैं, तो एक समुदाय के लोग दूसरे समुदाय की दुकानों को जलाने से नहीं हिचकते। पड़ोसी दुकानदार भी कभी-कभी एक-दूसरे के विरोधी हो जाते हैं। आर्थिक क्षेत्र में भी बाजार समानता का व्यवहार नहीं करता। वहाँ अमीर और गरीब ग्राहकों में भेदभाव होता है। गरीब व्यक्ति की ऊँची और बड़ी दुकानों में घुसने की हिम्मत भी नहीं होती, क्योंकि उसकी क्रय-शक्ति कम होती है। इसलिए बाजार हमेशा सामाजिक समता की रचना करता है, यह कहना मुश्किल है।
In simple words: यह बात कुछ हद तक सच है कि बाजार सिर्फ पैसे देखता है, धर्म या जाति नहीं। पर पूरी तरह नहीं, क्योंकि दंगे जैसी घटनाओं में भेदभाव होता है और आर्थिक रूप से अमीर-गरीब में अंतर हमेशा रहता है।

🎯 Exam Tip: अपनी सहमति और असहमति दोनों पहलुओं को स्पष्ट रूप से बताएँ। उदाहरणों के साथ समझाएँ कि बाजार कब समतामूलक लगता है और कब नहीं।

 

Question 5. `बाजार दर्शन' निबन्ध में बाजार जाने के सन्दर्भ में मन की कई स्थितियों का उल्लेख हुआ है। प्रत्येक स्थिति के बारे में अपनी मत व्यक्त कीजिए।
Answer: `बाजार दर्शन' निबंध में बाजार जाने के सन्दर्भ में मन की निम्नलिखित तीन स्थितियाँ बताई गई हैं:

  • (क) खाली मन: यह तब होता है जब व्यक्ति को बाजार जाते समय यह पता नहीं होता कि उसे क्या खरीदना है। इस अवस्था में व्यक्ति बाजार की चकाचौंध से प्रभावित होकर अनावश्यक चीजें खरीद लेता है। बाद में ये चीजें उसे आराम देने की बजाय परेशानी देती हैं, और उसका पैसा भी बर्बाद हो जाता है। इसलिए, हमेशा अपनी आवश्यकताओं को स्पष्ट करके ही बाजार जाना चाहिए।
  • (ख) खुला मन: मन खुला होने का मतलब है कि बाजार जाने वाले को अपनी जरूरतों का साफ ज्ञान हो। ऐसे लोग बाजार के जादू से प्रभावित नहीं होते। वे केवल अपनी जरूरत की चीजें खरीदते हैं और बाजार को सार्थक बनाते हैं। इससे वे फिजूलखर्ची से भी बचे रहते हैं। एक स्पष्ट मन हमें अनावश्यक खरीदारी से बचाता है।
  • (ग) बन्द मन: मन बन्द होना मतलब यह नहीं कि मन में कोई इच्छा ही न हो। मन में इच्छाएँ पैदा न होना, कामनाओं से मुक्त होना, मन को बन्द करना कहलाता है। लेखक कहते हैं कि मन को बन्द करने का अधिकार मनुष्य को नहीं है। यह अधिकार केवल परमात्मा का है क्योंकि वही सम्पूर्ण है। मनुष्य अपूर्ण है और उसमें इच्छाएँ होना स्वाभाविक है। मन में जबरदस्ती इच्छाएँ पैदा न होने देना उसका दमन करना है, जो कि मनुष्य के लिए न तो संभव है और न ही सही।

In simple words: लेखक ने बताया है कि बाजार जाते समय हमारा मन तीन तरह का हो सकता है: खाली मन (जब पता न हो क्या खरीदना है), खुला मन (जब जरूरत पता हो), और बन्द मन (जब कोई इच्छा ही न हो, जो कि गलत है)। हमें अपनी जरूरतें समझकर ही बाजार जाना चाहिए।

🎯 Exam Tip: विभिन्न मनःस्थितियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें और बताएं कि वे बाजार के अनुभव को कैसे प्रभावित करती हैं।

 

Question 6. पैसे की शक्ति तथा शक्तिहीनता से सम्बन्धित किन्हीं दो साहित्यिक प्रसंगों का उल्लेख कीजिए।
Answer: पैसे में बहुत शक्ति होती है। पैसे को 'पर्चेजिंग पावर' या 'क्रय-शक्ति' कहते हैं। पैसे के बल पर व्यक्ति मकान, कोठी, और कोई भी संपत्ति या सामान खरीद सकता है। इससे मनुष्य किसी का श्रम, ईमानदारी, और पवित्रता भी खरीद सकता है। साहित्य में इसके कई उदाहरण मिलते हैं:

एक प्रसंग प्रेमचन्द की प्रसिद्ध कहानी 'नमक का दरोगा' से संबंधित है। उस कहानी में जमींदार पंडित अलोपीदीन ने दरोगा बंशीधर को नमक की गाड़ियाँ छोड़ने के लिए चालीस हजार रुपये तक की रिश्वत देने की कोशिश की। लेकिन ईमानदार दरोगा बंशीधर ने रिश्वत स्वीकार नहीं की और अलोपीदीन को बंदी बना लिया। यह प्रसंग दिखाता है कि धन-बल हर चीज को नहीं खरीद सकता, खासकर ईमानदारी को।

वहीं, पैसे की शक्तिहीनता भी इसी कहानी में देखी जाती है। दरोगा बंशीधर को रिश्वत न लेने के कारण अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। यह दर्शाता है कि पैसे न होने पर या गलत तरीके से पैसा न कमाने पर व्यक्ति को समाज में मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं। यह दिखाता है कि पैसे की कमी व्यक्ति को कमजोर महसूस करा सकती है।
In simple words: पैसे में खरीदने की बहुत शक्ति होती है, लेकिन यह सब कुछ नहीं खरीद सकती, जैसे ईमानदारी। कहानी 'नमक का दरोगा' में दरोगा बंशीधर ने पैसे की शक्ति को हराया, पर उसे नौकरी गँवानी पड़ी, जिससे पैसे की शक्तिहीनता भी दिखती है।

🎯 Exam Tip: साहित्यिक उदाहरणों को संक्षेप में स्पष्ट करें और बताएं कि वे पैसे की शक्ति और शक्तिहीनता के विचार को कैसे प्रदर्शित करते हैं।

 

Question 7. `बाजार दर्शन' के आधार पर बाजार के जादू' को स्पष्ट करते हुए उससे बचने के उपाय बताइए।
Answer: `बाजार दर्शन' निबंध में जैनेन्द्र जी ने बाजार के जादू के बारे में बताया है। बाजार में एक तरह का जादू होता है। यह जादू ग्राहक को अपनी आकर्षक चीजों से लुभाता है और उन्हें खरीदने के लिए प्रेरित करता है। बाजार का यह आकर्षण बहुत मजबूत होता है। इसमें पड़कर लोग ऐसी चीजें भी खरीद लेते हैं जिनकी उन्हें जरूरत नहीं होती। यह जादू उन लोगों पर ज्यादा असर करता है जिनका मन खाली होता है और जिनकी जेब भरी होती है। अगर हमें अपनी जरूरतों का ठीक से पता नहीं होता, तो हम पैसे के बल पर अनावश्यक चीजें खरीद लेते हैं।

बाजार के जादू से बचने के लिए यह जरूरी है कि हमें बाजार जाने से पहले यह पता हो कि हमें क्या खरीदना है। ऐसा करने से हम केवल जरूरत की चीजें ही खरीदेंगे और बाजार के आकर्षण का हम पर कोई असर नहीं होगा। हमें बाजार को केवल अपनी जरूरत पूरी करने का साधन मानना चाहिए। हमें अपनी खरीदने की शक्ति का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए और न ही अपने घमंड को दिखाना चाहिए। ऐसा करके हम बाजार के जादू से बच सकते हैं और उसका सही उपयोग भी कर पाएंगे। जब हम अपनी जरूरतों को समझते हैं, तो हम अनावश्यक चीजों पर पैसे खर्च करने से बच जाते हैं।
In simple words: बाजार का जादू हमें सुन्दर चीजों से अपनी ओर खींचता है, और हम बिना जरूरत की चीजें खरीद लेते हैं, खासकर जब मन खाली हो। इससे बचने के लिए, बाजार जाने से पहले हमें अपनी जरूरतों को अच्छी तरह से जान लेना चाहिए और केवल वही खरीदना चाहिए जिसकी हमें सच में जरूरत हो।

🎯 Exam Tip: बाजार के जादू की परिभाषा दें और फिर उससे बचने के लिए स्पष्ट और व्यावहारिक उपाय बताएं।

 

Question 8. बाजार लोगों की सुख-शांति कैसे छीन लेता है? वह सादा जीवन उच्च विचार' के सिद्धान्त के किस प्रकार विरुद्ध है? लिखिए।
Answer: बाजार अक्सर लोगों की सुख-शांति छीन लेता है क्योंकि यह उपभोक्तावाद को बढ़ावा देता है। यह लोगों को ऐसी चीजें खरीदने के लिए उकसाता है जो उन्हें असल में नहीं चाहिए होतीं। बाजार हमें सिखाता है कि अपनी जरूरतें बढ़ाने और उन्हें बाजार से पूरा करने से ही जीवन में तरक्की होती है।

बाजार की चमक-दमक और आकर्षण बहुत तेज होता है, जिससे लोग उसके जादू में फंस जाते हैं। वे फिजूलखर्ची करने लगते हैं और धीरे-धीरे कर्ज में डूबकर गरीब हो जाते हैं। महाभारत में युधिष्ठिर ने कहा था कि सुखी वही है जो ऋणी नहीं है। आज की बाजार व्यवस्था लोगों को कर्ज में डुबोकर उनकी सुख-शांति छीन रही है। यह व्यवस्था हमें लगातार नई चीजों की लालच में फंसाती रहती है।

भारत में 'सादा जीवन उच्च विचार' का सिद्धांत हमेशा से माना जाता रहा है। लेकिन बाजार इसके ठीक उल्टा, दिखावटी और खर्चीली जीवन-शैली को बढ़ावा देता है। यह लोगों को दिखाता है कि ज्यादा चीजें होने से ही वे खुश रह सकते हैं। इससे जीवन में सादगी खत्म हो जाती है और लोग दिखावे में पड़ जाते हैं। इस तरह बाजार भारतीय संस्कृति के मूल सिद्धांतों के खिलाफ काम करता है।
In simple words: बाजार हमें अनावश्यक चीजें खरीदने का लालच देकर हमारी सुख-शांति छीन लेता है और कर्ज में डाल देता है। यह 'सादा जीवन उच्च विचार' के सिद्धांत के खिलाफ है क्योंकि यह दिखावे और फिजूलखर्ची को बढ़ावा देता है।

🎯 Exam Tip: बताएं कि बाजार कैसे लोगों को लालच में फंसाकर उनकी सुख-शांति छीनता है और फिर स्पष्ट करें कि यह 'सादा जीवन उच्च विचार' के सिद्धांत के विपरीत कैसे है।

 

Question 9. `बाजार दर्शन' निबन्ध में बाजार जाने के सन्दर्भ में मन की कई स्थितियों का उल्लेख हुआ है। प्रत्येक स्थिति के बारे में अपनी मत व्यक्त कीजिए।
Answer: `बाजार दर्शन' निबंध में बाजार जाने के सन्दर्भ में मन की निम्नलिखित तीन स्थितियाँ बताई गई हैं:

  • (क) खाली मन: यह तब होता है जब व्यक्ति को बाजार जाते समय यह पता नहीं होता कि उसे क्या खरीदना है। इस अवस्था में व्यक्ति बाजार की चकाचौंध से प्रभावित होकर अनावश्यक चीजें खरीद लेता है। बाद में ये चीजें उसे आराम देने की बजाय परेशानी देती हैं, और उसका पैसा भी बर्बाद हो जाता है। इसलिए, हमेशा अपनी आवश्यकताओं को स्पष्ट करके ही बाजार जाना चाहिए।
  • (ख) खुला मन: मन खुला होने का मतलब है कि बाजार जाने वाले को अपनी जरूरतों का साफ ज्ञान हो। ऐसे लोग बाजार के जादू से प्रभावित नहीं होते। वे केवल अपनी जरूरत की चीजें खरीदते हैं और बाजार को सार्थक बनाते हैं। इससे वे फिजूलखर्ची से भी बचे रहते हैं। एक स्पष्ट मन हमें अनावश्यक खरीदारी से बचाता है।
  • (ग) बन्द मन: मन बन्द होना मतलब यह नहीं कि मन में कोई इच्छा ही न हो। मन में इच्छाएँ पैदा न होना, कामनाओं से मुक्त होना, मन को बन्द करना कहलाता है। लेखक कहते हैं कि मन को बन्द करने का अधिकार मनुष्य को नहीं है। यह अधिकार केवल परमात्मा का है क्योंकि वही सम्पूर्ण है। मनुष्य अपूर्ण है और उसमें इच्छाएँ होना स्वाभाविक है। मन में जबरदस्ती इच्छाएँ पैदा न होने देना उसका दमन करना है, जो कि मनुष्य के लिए न तो संभव है और न ही सही।

In simple words: लेखक ने बताया है कि बाजार जाते समय हमारा मन तीन तरह का हो सकता है: खाली मन (जब पता न हो क्या खरीदना है), खुला मन (जब जरूरत पता हो), और बन्द मन (जब कोई इच्छा ही न हो, जो कि गलत है)। हमें अपनी जरूरतें समझकर ही बाजार जाना चाहिए।

🎯 Exam Tip: विभिन्न मनःस्थितियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें और बताएं कि वे बाजार के अनुभव को कैसे प्रभावित करती हैं।

 

Question 10. “जो लोग बाजार से लाभ नहीं उठा सकते, न उसे लाभ दे ही सकते हैं, वे बाजार का बाजारूपन ही बढ़ाते हैं।” इस कथन के आधार पर स्पष्ट कीजिए-
(अ) बाजार से लाभ कौन नहीं उठा सकता?
(ब) बाजार को लाभ कौन नहीं दे पाता?
(स) बाजारूपन क्या है तथा कैसे बढ़ता है?
Answer:

(अ) बाजार से लाभ वे लोग नहीं उठा सकते जिन्हें अपनी आवश्यकताओं का सही ज्ञान नहीं होता। वे बाजार की चमक-दमक से प्रभावित होकर बिना सोचे-समझे अनावश्यक चीजें खरीद लेते हैं। इस तरह वे अपनी क्रय शक्ति का गलत प्रदर्शन करते हैं। ऐसी फिजूलखर्ची से उन्हें खुशी की बजाय परेशानी मिलती है, और उनका पैसा भी बर्बाद होता है। जब हमें पता ही न हो कि हमें क्या चाहिए, तो हम बाजार का सही उपयोग नहीं कर पाते।

(ब) बाजार को लाभ वे लोग नहीं दे पाते जो केवल अपनी 'पर्चेजिंग पावर' का प्रदर्शन करने जाते हैं। ऐसे लोगों के कारण बाजार का असली उद्देश्य, यानी लोगों की जरूरतों को पूरा करना, बिगड़ जाता है। वे बाजार को सिर्फ शोषण का साधन बना देते हैं। बाजार का मूल उद्देश्य सेवा करना है, लेकिन जब लोग सिर्फ दिखावे के लिए खरीदारी करते हैं, तो बाजार अपने असली मकसद से भटक जाता है।

(स) बाजारूपन का मतलब है जब बाजार अपने असली उद्देश्य, यानी लोगों की जरूरतों को पूरा करने, से भटक जाता है। यह तब होता है जब बाजार सिर्फ चीजों का प्रदर्शन करने और ग्राहकों को शोषण करने का साधन बन जाता है। बाजारूपन तब बढ़ता है जब लोग बिना अपनी जरूरत जाने अनावश्यक चीजें खरीदने लगते हैं। जब ग्राहक अपनी खरीदने की शक्ति का अनुचित प्रदर्शन करते हैं और विक्रेता उन्हें ठगने की कोशिश करते हैं, तब बाजार में छल-कपट बढ़ता है और समाज में सद्भाव खत्म हो जाता है। ऐसे में बाजार लोगों के बीच अविश्वास पैदा करता है।
In simple words: वे लोग बाजार से लाभ नहीं उठा सकते जो अपनी जरूरतें नहीं जानते और अनावश्यक चीजें खरीदते हैं, जिससे वे बाजार को भी लाभ नहीं दे पाते। बाजारूपन तब बढ़ता है जब लोग सिर्फ दिखावे के लिए खरीदारी करते हैं और बाजार अपने सेवा के उद्देश्य से हटकर शोषण का अड्डा बन जाता है।

🎯 Exam Tip: प्रश्न के तीनों भागों का अलग-अलग उत्तर दें और बाजारूपन की अवधारणा को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें।

 

Question. जैनेन्द्र के बाजार दर्शन निबन्ध का सारांश लिखिए।
Answer:
परिचय: `बाजार दर्शन' जैनेन्द्र कुमार का विचार प्रधान निबंध है। इसमें लेखक ने बाजार की आवश्यकता और उपयोगिता पर विचार किया है। बाजार एक ऐसी जगह है जिसका उद्देश्य लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करना है, न कि उनका शोषण करना। यह सिर्फ वस्तुओं के प्रदर्शन की जगह नहीं है। यह निबंध हमें बाजार के सही उपयोग और उसके बुरे प्रभावों के बारे में बताता है।

अनावश्यक क्रय: लेखक के एक मित्र एक छोटी सी चीज खरीदने बाजार गए थे, पर कई बंडल लेकर लौटे। उन्होंने बताया कि यह सब उन्होंने अपनी पत्नी के कारण खरीदा है। लेखक ने स्वीकार किया कि पत्नी का प्रभाव अधिक होता है और घर के सामान इकट्ठा करने की जिम्मेदारी अक्सर स्त्रियों की होती है। लेकिन, फिजूलखर्ची पुरुष भी करते हैं और अपनी गलती छिपाने के लिए पत्नी का बहाना बनाते हैं। पैसे की शक्ति भी अनावश्यक खरीदारी का कारण बनती है; जिसके पास जितना पैसा होता है, वह उतनी ही ज्यादा चीजें खरीदता है।

बाजार का जादू: बाजार में एक खास आकर्षण होता है। सजी हुई चीजें ग्राहकों को अपनी ओर खींचती हैं। जिन लोगों को अपनी जरूरतें पता नहीं होतीं और जिनकी जेब में खूब पैसा होता है, वे इस आकर्षण में फंस जाते हैं। वे बिना जरूरत के चीजें खरीद लेते हैं और बाद में उन्हें परेशानी होती है।

जादू से रक्षा: लेखक के एक और मित्र बाजार गए, बहुत देर रुके, पर कुछ नहीं खरीदा और खाली हाथ लौट आए। बाजार का जादू उन्हीं पर चलता है जिनकी जेब भरी हो और मन खाली हो। मन खाली होने का मतलब है अपनी जरूरत का पता न होना। यदि हमें अपनी जरूरत पता हो, तो हम अनावश्यक चीजें खरीदने से बच सकते हैं। बाजार तभी जाना चाहिए जब मन खाली न हो, यानी हमें पता हो कि क्या खरीदना है।

खाली और बन्द मन: मन खाली न रहे इसका मतलब यह नहीं है कि मन को पूरी तरह से बन्द कर दिया जाए। मन को शून्य करने का अधिकार केवल परमात्मा को है क्योंकि वह पूर्ण है। मनुष्य तो अपूर्ण है और उसमें इच्छाएँ होना स्वाभाविक है। मन को जबरदस्ती बन्द करना गलत है। सच्चा ज्ञान अपनी अपूर्णता को स्वीकार करने में है। हमें मन को अपनी इच्छाओं को दबाने की बजाय नियंत्रित करना चाहिए।

चूरनवाले भगत जी: लेखक के पड़ोसी भगत जी चूरन बेचते हैं। उनका चूरन प्रसिद्ध है। वे केवल छः आने की कमाई होते ही बाकी चूरन बच्चों को मुफ्त में बाँट देते हैं। उन्हें बाजार की चमक-दमक या ज्यादा धन कमाने की लालच नहीं होती। वे अपनी जरूरत का सामान, जैसे काला नमक और जीरा, एक छोटी दुकान से खरीदते हैं और बाकी बाजार उनके लिए कोई मायने नहीं रखता। वे संतोषी और निर्लोभ व्यक्ति हैं।

पैसे की व्यंग्य शक्ति: पैसे की शक्ति बहुत चुभने वाली होती है। पैदल चलते व्यक्ति को मोटर पास से निकलने पर लगता है जैसे मोटर उस पर व्यंग्य कर रही हो कि तेरे पास यह नहीं है। यह व्यंग्य व्यक्ति को अपने परिवार के प्रति कृतघ्न भी बना सकता है। लेकिन भगत जी पर इस व्यंग्य का कोई असर नहीं होता क्योंकि वे तृष्णा और संग्रह से मुक्त हैं। यह आत्मिक, नैतिक और धार्मिक बल ही हमें पैसे के व्यंग्य से बचाता है।
In simple words: `बाजार दर्शन' निबंध बाजार के जादू, पैसे की शक्ति और हमारे मन की स्थितियों के बारे में है। लेखक हमें अपनी जरूरतों को समझकर, अनावश्यक खरीदारी से बचकर और संतोषी बनकर बाजार का सही उपयोग करने की सीख देते हैं, ताकि हम बाजार के शोषण से बच सकें।

🎯 Exam Tip: सारांश लिखते समय निबंध के सभी प्रमुख बिंदुओं (जैसे बाजार का जादू, मन की स्थितियाँ, भगत जी का उदाहरण, पैसे की शक्ति) को संक्षेप में और तार्किक क्रम में प्रस्तुत करें।

 

→ महत्त्वपूर्ण गद्यांशों की संदर्भ सहित व्याख्याएँ

 

Question 1. उनका आशय था कि यह पत्नी की महिमा है। उस महिमा का मैं कायल हूँ। आदिकाल से इस विषय में पति से पत्नी की ही प्रमुखता प्रमाणित है और यह व्यक्तित्व का प्रश्न नहीं, स्त्रीत्व का प्रश्न है। स्त्री माया न जोड़े, तो क्या मैं जोड़ें? फिर भी सच सच है और वह यह कि इस बात में पत्नी की ओट ली जाती है। मूल में एक और तत्व की महिमा सविशेष है। वह तत्व है मनीबेग, अर्थात् पैसे की गरमी यो एनर्जी॥ (पृष्ठ सं. 42)
Answer:
कठिन शब्दार्थ-आशय = मतलब। महिमा = बड़ाई। कायल होना = मान लेना। आदिकाल = बहुत पुराना समय। प्रमुखता = सबसे आगे होना। माया = धन। ओट लेना = बहाना बनाना। मूल = जड़। एनर्जी = शक्ति।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित 'बाजार दर्शन' पाठ से लिया गया है। इसके लेखक जैनेन्द्र कुमार हैं। लेखक के एक मित्र बाजार से बहुत सारा सामान खरीद कर लाए थे और उन्होंने इसका कारण अपनी पत्नी को बताया था। लेखक इसी बात पर अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं।

व्याख्या-लेखक कहते हैं कि उनके मित्र ने इतनी खरीदारी की जिम्मेदारी अपनी पत्नी पर डाल दी और कहा कि यह उनकी पत्नी की महानता है। लेखक इस बात को मानते हैं कि सामान खरीदने और इकट्ठा करने में प्राचीन काल से ही पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की भूमिका ज्यादा रही है। यह केवल एक व्यक्ति का सवाल नहीं बल्कि स्त्री स्वभाव से जुड़ा है। लेखक कहते हैं कि धन-दौलत और संपत्ति इकट्ठा करना अक्सर स्त्रियों का काम माना जाता है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि पुरुष अपनी फिजूलखर्ची के लिए पत्नी का बहाना बनाते हैं। लेखक बताते हैं कि खरीदारी ज्यादा होने का एक और बड़ा कारण पैसे की गर्मी या खरीदने की शक्ति है। जिसके पास जितना ज्यादा पैसा होता है, वह उतनी ही अधिक खरीदारी करता है।

विशेष-
1. ज्यादा खरीदारी और घर में चीजें इकट्ठा करना स्त्रियों का स्वाभाविक गुण माना जाता है, पर पुरुष भी अपनी फिजूलखर्ची के लिए पत्नी का बहाना बनाते हैं।
2. ज्यादा चीजें खरीदने के लिए ज्यादा पैसा पास में होना बहुत जरूरी है।
3. भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्द हैं, साथ ही उर्दू और अंग्रेजी के शब्द (जैसे मनीबैग, एनर्जी) और मुहावरे (जैसे ओट लेना) भी प्रयोग हुए हैं।
4. इस शैली में व्यंग्य और विनोद का पुट साफ दिखता है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि खरीदारी के लिए अक्सर पत्नियों को जिम्मेदार ठहराया जाता है, जो कि स्त्रियों का स्वाभाविक गुण है। पर असल में पैसा और उसे खर्च करने की शक्ति ही ज्यादा खरीदारी का मुख्य कारण होती है।

🎯 Exam Tip: साहित्यिक गद्यांशों की व्याख्या करते समय, कठिन शब्दों का अर्थ स्पष्ट करें और फिर संदर्भ के साथ मूल विचार को सरल शब्दों में समझाएं।

 

Question 2. पैसा पावर है। पर उसके सबूत में आस-पास माल-टाल न जमा हो, तो क्या वह खाक पावर है। पैसे को देखने के लिए बैंक-हिसाब देखिए, पर पाल-असबाब मकान-कोठी तो अनदेखे भी दीखते हैं। पैसे की उस पर्चेजिंग पॉवर के प्रयोग में ही पावर का रस है। लेकिन न Loading [MathJax]/extensions/MathMenu.js को फिजूल समझते हैं। वे पैसा बहाते नहीं हैं और बुद्धिमान होते हैं। बुद्धि और
Answer:
कठिन शब्दार्थ-पावर = शक्ति। सबूत = प्रमाण। खाक = बेकार। पाल-असबाब = घर का सामान। पर्चेजिंग पावर = क्रय शक्ति।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित `बाजार दर्शन' पाठ से लिया गया है। इसके लेखक जैनेन्द्र कुमार हैं। लेखक यहां पैसे की शक्ति और उसके प्रदर्शन के बारे में बता रहे हैं। वे कहते हैं कि पैसे का असली सुख उसे खर्च करने में है, न कि उसे सिर्फ इकट्ठा करने में।

व्याख्या-लेखक कहते हैं कि पैसा एक बड़ी शक्ति है, यानी धन में खरीदने की क्षमता होती है। लेकिन अगर यह शक्ति दिखाई न दे, यानी आसपास घर का सामान या संपत्ति जमा न हो, तो उस शक्ति का क्या फायदा? पैसे को सिर्फ बैंक खाते में देखकर उसकी शक्ति का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। बल्कि घर के सामान, मकान और कोठी जैसी चीजें दूर से ही पैसे की शक्ति को दिखाती हैं। पैसे की खरीदने की शक्ति का असली मजा उसे खर्च करने में आता है, यानी चीजें खरीदने में।

लेखक आगे बताते हैं कि कुछ लोग पैसे खर्च करना फिजूलखर्ची मानते हैं। वे पैसा नहीं बहाते बल्कि बहुत समझदार होते हैं। वे अपने पैसे को खर्च करके उसकी शक्ति का आनंद नहीं लेते, बल्कि उसे इकट्ठा करके रखते हैं। उन्हें अपनी संपत्ति और पैसे की ताकत पर पूरा भरोसा होता है और वे मन में घमंड महसूस करते हैं। यह एक तरह का दिखावा है जहां पैसा सिर्फ इकट्ठा किया जाता है।

विशेष-
1. भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्द, उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग है, जिससे भाषा समृद्ध लगती है।
2. शैली चुटीली और विचारात्मक है, जो पाठक को सोचने पर मजबूर करती है।
3. यह गद्यांश बताता है कि लोग पैसे की शक्ति दिखाने के लिए ढेर सारा सामान और संपत्ति इकट्ठा करते हैं।
4. कुछ लोग पैसे खर्च करने में संयम बरतते हैं और उसे जोड़कर ही संतुष्ट रहते हैं।
In simple words: पैसा एक ताकत है, और उसकी असली खुशी उसे खर्च करके चीजें खरीदने में है, न कि बस उसे जमा करके रखने में। कुछ लोग पैसे इकट्ठा करके अपनी ताकत दिखाते हैं, जबकि कुछ उसे खर्च करने में खुशी पाते हैं।

🎯 Exam Tip: पैसे की 'पावर' और उसके प्रदर्शन के विभिन्न पहलुओं को उदाहरणों के साथ स्पष्ट करें और बताएं कि लेखक किस प्रकार की शक्ति को प्राथमिकता देते हैं।

 

Question 3. मैंने मन में कहा, ठीक। बाजार आमन्त्रित करता है कि आओ मुझे लूटो और लूटो। सब भूल जाओ, मुझे देखो। मेरा रूप और किसके लिए है? मैं तुम्हारे लिए हैं। नहीं कुछ चाहते हो तो भी देखने में क्या हरज है। अजी आओ भी। इस आमन्त्रण में यह खूबी है कि आग्रह नहीं है आग्रह तिरस्कार जगाता है। लेकिन ऊँचे बाजार का आमन्त्रण मूक होता है और उससे चाह जगती है। चाह मतलब अभाव। चौक बाजार में खड़े होकर आदमी को लगने लगता है कि उसके अपने पास काफी नहीं है। और चाहिए, और चाहिए। मेरे यहाँ कितना परिमित है और यहाँ कितनी अतुलित है। ओह! कोई अपने को न जाने तो बाजार का यह चौक उसे कामना से विकल बना छोड़े। विकल क्यों पागल। असन्तोष, तृष्णा और ईष्या से घायल कर मनुष्य को सदा के लिए बेकार बना डाल सकता है। (पृष्ठ सं. 43)
Answer:
कठिन शब्दार्थ-आमन्त्रित करना = बुलाना। हरज = नुकसान, हानि। तिरस्कार = अपमान। मूक = चुप, शब्दहीन। चाह = इच्छा। परिमित = सीमित। अतुलित = बहुत ज्यादा। विकल = परेशान।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित `बाजार दर्शन' शीर्षक निबंध से लिया गया है। इसके लेखक जैनेन्द्र कुमार हैं। लेखक बाजार के आकर्षण का वर्णन करते हुए कहते हैं कि बाजार ग्राहकों को अपनी ओर खींचता है, उन्हें चीजें खरीदने के लिए प्रेरित करता है। लेखक बताते हैं कि बाजार का आमंत्रण कितना शक्तिशाली होता है।

व्याख्या-लेखक कहते हैं कि बाजार ग्राहकों को बुलाता है कि आओ, मुझे देखो और जो चाहो खरीद लो। बाजार कहता है कि मेरा रूप तुम्हारे लिए ही है, भले ही तुम्हें कुछ खरीदना न हो, पर देखने में क्या हर्ज है। इस बुलावे की खासियत यह है कि इसमें कोई जबरदस्ती नहीं है। जबरदस्ती करने से अपमान महसूस होता है। लेकिन बड़े बाजारों का बुलावा चुपचाप होता है, और यह बुलावा लोगों के मन में चीजों को पाने की इच्छा जगाता है। 'चाह' का मतलब है किसी चीज की कमी महसूस करना।

बाजार में खड़े होकर व्यक्ति को लगता है कि उसके पास चीजें कम हैं और उसे और चीजें चाहिए। वह सोचता है कि उसके पास कितनी कम चीजें हैं और दूसरों के पास कितनी ज्यादा। लेखक कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति अपने आपको नहीं जानता, तो बाजार उसे अपनी इच्छाओं से इतना परेशान कर देता है कि वह पागल सा हो जाता है। असंतोष, लालच और ईर्ष्या की भावनाएं मनुष्य को घायल करके उसे हमेशा के लिए बेकार बना सकती हैं। यह आकर्षण हमें हमेशा नई चीजों की ओर धकेलता रहता है।

विशेष-
1. बाजार में सजी हुई चीजें ग्राहकों को अपनी ओर खींचती हैं और उन्हें खरीदने के लिए बेचैन करती हैं।
2. बाजार के आकर्षण से प्रभावित व्यक्ति अनावश्यक चीजें खरीदकर खुद को ठगा हुआ महसूस करता है।
3. भाषा समझने में आसान है, विषय के अनुसार है और प्रवाहपूर्ण है। छोटे वाक्यों का प्रयोग भाषा को प्रभावशाली बनाता है।
4. इस शैली में विचारात्मक और चिंतनशील भाव हैं।
In simple words: बाजार हमें चुपचाप अपनी ओर खींचता है और हमारे मन में नई चीजें खरीदने की इच्छा जगाता है। यदि हम अपनी जरूरतों को नहीं जानते, तो बाजार हमें असंतोष, लालच और ईर्ष्या से भरकर बेकार कर सकता है।

🎯 Exam Tip: बाजार के मूक आमंत्रण की शक्ति को बताएं और स्पष्ट करें कि यह कैसे ग्राहकों के मन में असंतोष और अनावश्यक इच्छाएं जगाता है।

 

Question 4. बाजार में एक जादू है। वह जादू आँख की राह काम करता है। वह रूप का जादू है पर जैसे चुम्बक का जादू लोहे पर ही चलता है, वैसे ही इस जादू की भी मर्यादा है। जेब भरी हो और मन खाली हो, ऐसी हालत में जादू का असर खूब होता है। जेब खाली पर मन भरा न हो, तो भी जादू चल जाएगा। मन खाली है, तो बाजार की अनेकानेक चीजों का निमन्त्रण उस तक पहुँच जाएगा। कहीं हुई उस वक्त जेब भारी तब तो फिर वह मन किसकी मानने वाला है। (पृष्ठ सं. 44)
Answer:
कठिन शब्दार्थ-राह = रास्ता। जादू = आकर्षण। चुम्बक = लोहे को आकर्षित करने वाली धातु। मर्यादा = सीमा। असर = प्रभाव। निमन्त्रण = बुलावा।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित `बाजार दर्शन' शीर्षक निबंध से लिया गया है। इसके लेखक जैनेन्द्र कुमार हैं। लेखक ने बताया है कि बाजार में एक मजबूत आकर्षण होता है। यह ग्राहकों को खरीदारी के लिए खींचता है। इस आकर्षण से बचने के लिए अपनी जरूरतों का सही ज्ञान होना जरूरी है। अगर ऐसा नहीं होता, तो मनुष्य इच्छाओं में फंसकर परेशान होता है।

व्याख्या-लेखक कहते हैं कि बाजार में एक जादू है जो आँखों के रास्ते काम करता है। यह चीजों के बाहरी रूप का जादू है। जैसे चुंबक केवल लोहे को ही खींचता है, वैसे ही इस बाजार के जादू की भी एक सीमा होती है। यह जादू तभी असरदार होता है जब किसी व्यक्ति की जेब तो भरी हो, पर उसका मन खाली हो (यानी उसे पता न हो कि उसे क्या खरीदना है)। अगर जेब खाली हो, लेकिन मन भरा न हो (यानी तब भी जरूरतें स्पष्ट न हों), तो भी बाजार का जादू थोड़ा असर कर सकता है।

अगर मन खाली है, तो बाजार में मौजूद हर चीज उसे अपनी ओर बुलाती हुई महसूस होगी। लेकिन, सबसे ज्यादा असर तब होता है जब जेब भरी हो और मन खाली हो। ऐसी स्थिति में व्यक्ति का मन किसी भी नियम को नहीं मानता और वह अनावश्यक चीजें खरीदने लगता है। यह जादू हमें बिना सोचे-समझे खर्च करने पर मजबूर कर देता है।
In simple words: बाजार का जादू हमें आँखों से खींचता है, खासकर जब हमारी जेब भरी हो और मन खाली हो (यानी हमें पता न हो क्या खरीदना है)। इस जादू का असर तभी होता है जब हम अपनी जरूरतों को ठीक से नहीं पहचानते।

🎯 Exam Tip: बाजार के जादू की तुलना चुंबक से करें और बताएं कि यह किन परिस्थितियों में सबसे अधिक प्रभावी होता है।

 

Question 5. पर उस जादू की जकड़ से बचने का एक सीधा-सा उपाय है। वह यह कि बाजार जाओ तो मन खाली न हो। मन खाली हो, तब बाजार न जाओ। कहते हैं लू में जाना हो, तो पानी पीकर जाना चाहिए। पानी भीतर हो, लू का लूपन व्यर्थ हो जाता है। मन लक्ष्य में भरा हो तो बाजार भी फैला-का-फैला ही रह जायगा। तब वह घाव बिलकुल नहीं दे सकेगा, बल्कि कुछ आनन्द ही देगा। तब बाजार तुमसे कृतार्थ होगा, क्योंकि तुम कुछ-न-कुछ सच्चा लाभ उसे दोगे। बाजार की असली कृतार्थता है आवश्यकता के समय काम आना। (पृष्ठ सं. 44)
Answer:
कठिन शब्दार्थ-जादू = आकर्षण। जकड़ = पकड़। लू = गर्मी। लूपन = गर्मी का प्रभाव। लक्ष्य = उद्देश्य। घाव देना = अनुचित प्रभाव डालना। कृतार्थ = आभारी, सफल।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित `बाजार दर्शन' शीर्षक निबंध से लिया गया है। इसके लेखक जैनेन्द्र कुमार हैं। लेखक बाजार के प्रबल आकर्षण से बचने का उपाय बता रहे हैं। वे कहते हैं कि बाजार जाने से पहले मन में स्पष्टता होनी चाहिए ताकि उसका जादू हम पर असर न करे।

व्याख्या-लेखक कहते हैं कि बाजार के जादू की पकड़ से बचने का एक आसान तरीका है: जब बाजार जाओ तो अपना मन खाली न रखो। इसका मतलब है कि तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम्हें क्या खरीदना है। अगर मन खाली है, यानी तुम्हें अपनी जरूरतों का पता नहीं है, तो उस समय बाजार नहीं जाना चाहिए। लेखक एक उदाहरण देते हैं कि जैसे अगर गर्मी में लू में जाना हो, तो पहले खूब पानी पीकर जाना चाहिए। जब शरीर में पर्याप्त पानी होता है, तो लू का बुरा असर नहीं होता।

इसी तरह, अगर मन किसी खास उद्देश्य से भरा हो, तो बाजार कितना भी बड़ा और आकर्षक क्यों न हो, उसका कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा। तब बाजार हमें दुख नहीं देगा, बल्कि खुशी देगा। ऐसा करने पर बाजार भी हमारा आभारी होगा, क्योंकि हम उसे कुछ सच्चा लाभ देंगे। बाजार का असली मकसद तो जरूरत के समय काम आना है। इस प्रकार, अपनी इच्छाओं को समझकर ही हमें बाजार का सामना करना चाहिए।

विशेष-
1. बाजार का आकर्षण एक जादू के समान है जो ग्राहकों को खींचता है।
2. बाजार का जादू उन पर ज्यादा असर करता है जिनकी जेब भरी होती है और जिन्हें अपनी जरूरतों का सही ज्ञान नहीं होता। ऐसे लोग ही अनावश्यक चीजें खरीदते हैं।
3. भाषा समझने में आसान है, विषय के अनुसार है और मुहावरों का प्रयोग भी किया गया है।
4. इस शैली में विचार-विवेचनात्मक भाव हैं।
In simple words: बाजार के जादू से बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि बाजार जाते समय हमारा मन खाली न हो। हमें अपनी जरूरतें पता होनी चाहिए, तभी बाजार हमें खुशी देगा और हम उसका सही उपयोग कर पाएंगे।

🎯 Exam Tip: लेखक द्वारा दिए गए "पानी पीकर लू में जाना" जैसे उदाहरणों का उपयोग करके अपने उत्तर को प्रभावी बनाएं।

 

Question 6. यहाँ एक अन्तर चीन्ह लेना बहुत जरूरी है। मन खाली नहीं रहना चाहिए, इसका मतलब यह नहीं है कि वह मन बन्द रहना चाहिए। जो बन्द हो जायगा, वह शून्य हो जायगा। शून्य होने का अधिकार बस परमात्मा का है जो सनातन भाव से सम्पूर्ण है। शेष सब अपूर्ण हैं। इससे मन बन्द नहीं रह सकता। सब इच्छाओं का निरोध कर लोगे, यह झूठ है। और अगर इच्छानिरोधस्तपः का ऐसा ही नकारात्मक अर्थ हो, तो वह तप झूठ है। वैसे तप की राह रेगिस्तान को जाती होगी, मोक्ष की राह वह नहीं है। ठाट देकर मन को बन्द कर रखना जड़ता है। लोभ का यह जीतना नहीं है कि जहाँ लोभ होता है, यानी मन में, वहाँ नकार हो! यह तो लोभ की ही जीत है और आदमी की हार। आँख अपनी फोड़ डाली, तब लोभनीय के दर्शन से बचे तो क्या हुआ? ऐसे क्या लोभ मिट जाएगा? और कौन कहता है कि आँख फूटने पर रूप दीखना बन्द हो जायगा? क्या आँख बन्द करके ही हम सपने नहीं लेते हैं? और वे सपने क्या चैन-भंग नहीं करते हैं। (पृष्ठ सं. 44)
Answer:
कठिन शब्दार्थ-चीन्ह लेना = पहचान लेना। सनातन भाव = हमेशा से रहने वाला। निरोध = रोकना। इच्छानिरोधस्तपः = इच्छाओं को रोकना तपस्या है। नकारात्मक = नकारात्मक। मोक्ष = मुक्ति। लोभनीय = लालच देने वाला।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित `बाजार दर्शन' शीर्षक विचारात्मक निबंध से लिया गया है। इसके लेखक जैनेन्द्र कुमार हैं। लेखक बाजार के जादू से बचने के लिए मन को खाली न रखने की सलाह देते हैं, पर साथ ही यह भी स्पष्ट करते हैं कि मन को पूरी तरह से बन्द करना सही नहीं है।

व्याख्या-लेखक कहते हैं कि यह समझना बहुत जरूरी है कि मन खाली न रखने का मतलब यह नहीं कि मन को पूरी तरह से बन्द कर दिया जाए। इन दोनों बातों में अंतर है। जो मन बन्द हो जाएगा, वह शून्य हो जाएगा। शून्य होने का अधिकार केवल परमात्मा को है क्योंकि वही हमेशा से पूर्ण और सम्पूर्ण है। बाकी सभी अपूर्ण हैं। इसलिए मन को बन्द नहीं किया जा सकता। यह सोचना गलत है कि हम अपनी सभी इच्छाओं को पूरी तरह से रोक लेंगे, उन पर काबू पा लेंगे। इच्छाओं को रोकना तपस्या है, लेकिन अगर तपस्या का मतलब सिर्फ इच्छाओं को दबाना है, तो वह तपस्या झूठी है। ऐसे तप से कोई लाभ नहीं मिलता, यह मोक्ष का रास्ता नहीं है।

लेखक आगे कहते हैं कि मन को जबरदस्ती बन्द रखना मूर्खता है। ऐसा करने से हम लोभ पर विजय नहीं पा सकते। अगर हम अपनी आँखें फोड़ दें ताकि हमें लालच देने वाली चीजें न दिखें, तो इससे लोभ खत्म नहीं होगा, यह तो लोभ की ही जीत और मनुष्य की हार होगी। आँखें बन्द करने पर भी हम सपने देखते हैं, और वे सपने हमारी शांति भंग कर सकते हैं। इसलिए, मन को जबरदस्ती दबाने से कोई फायदा नहीं है। हमें अपनी इच्छाओं को समझना और नियंत्रित करना चाहिए।

विशेष-
1. लेखक ने यहाँ मन की स्थिति और इच्छाओं के नियंत्रण पर गहरा आध्यात्मिक चिंतन किया है।
2. मन को दबाना या उसे पूरी तरह से खुला छोड़ना, दोनों ही मनुष्य के लिए ठीक नहीं हैं।
3. भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग है और यह प्रवाहपूर्ण है।
4. शैली विचारात्मक और चिंतनशील है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि मन को खाली न रखना अच्छा है, पर मन को पूरी तरह से बन्द कर देना गलत है। केवल परमात्मा ही इच्छा-रहित हो सकता है। जबरदस्ती इच्छाओं को दबाना तपस्या नहीं है, क्योंकि ऐसा करने से लोभ खत्म नहीं होता, बल्कि हम खुद को ही नुकसान पहुंचाते हैं।

🎯 Exam Tip: मन को खाली न रखने और मन को बन्द न करने के बीच के अंतर को स्पष्ट करें और बताएं कि मनुष्य के लिए इच्छाओं का सही नियंत्रण क्यों जरूरी है।

 

Question 7. पैसे को अपने आहत गर्व में बिलखता ही छोड़ देता है। ऐसे आदमी के आगे क्या पैसे की व्यंग्य-शक्ति कुछ भी चलती होगी? क्या वह शक्ति कुंठित रहकर सलज्ज ही न हो जाती होगी? (पृष्ठ सं. 45)
Answer:
कठिन शब्दार्थ-आहत = घायल। गर्व = घमंड। बिलखता = रोता हुआ। व्यंग्य-शक्ति = कटाक्ष करने की ताकत। कुंठित = कमजोर। सलज्ज = शर्मिंदा।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित `बाजार दर्शन' शीर्षक विचारात्मक निबंध से लिया गया है। इसके लेखक जैनेन्द्र कुमार हैं। लेखक के पड़ोसी, चूरन बेचने वाले भगत जी का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि बाजार का जादू उन पर असर नहीं करता। वे पैसे के आकर्षण से प्रभावित नहीं होते।

व्याख्या-लेखक कहते हैं कि भगत जी जैसे संतोषी और लोभरहित व्यक्ति के सामने पैसे का घमंड या उसकी व्यंग्य-शक्ति बेकार हो जाती है। पैसा, जो आमतौर पर लोगों को अपनी ओर खींचता है और उन्हें अपनी कमी का एहसास कराता है, ऐसे व्यक्ति के सामने खुद ही घायल और रोता हुआ महसूस होता है।

लेखक सवाल करते हैं कि ऐसे व्यक्ति के सामने पैसे की व्यंग्य-शक्ति कैसे चल सकती है, जो तृष्णा और संग्रह से मुक्त है? ऐसे व्यक्ति के सामने पैसे की शक्ति कमजोर पड़ जाती होगी और शर्मिंदा होकर चुप हो जाती होगी। भगत जी का व्यक्तित्व इतना मजबूत है कि वे अपनी सीमित जरूरतों को पूरा करके ही संतुष्ट रहते हैं। वे छह आने कमाते ही चूरन बेचना बंद कर देते हैं और बाकी बच्चों में मुफ्त बांट देते हैं। उन्हें ज्यादा धन कमाने या बाजार की चमक-दमक से कोई लगाव नहीं है। यही कारण है कि पैसे की व्यंग्य-शक्ति उन पर असर नहीं करती।

विशेष-
1. भगत जी के लिए बाजार सिर्फ जरूरत की चीजें खरीदने का स्थान है, न कि आकर्षण का।
2. भगत जी संग्रह की बजाय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन कमाना पसंद करते हैं।
3. भाषा सहज, विषय के अनुसार और प्रवाहपूर्ण है।
4. शैली वर्णनात्मक और विचारात्मक है, जो भगत जी के चरित्र को उजागर करती है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि भगत जी जैसे संतोषी व्यक्ति के सामने पैसे का घमंड और उसकी व्यंग्य-शक्ति बेकार हो जाती है। ऐसे लोग अपनी जरूरतों से संतुष्ट रहते हैं, इसलिए पैसा उन्हें लालच में नहीं फंसा पाता और खुद ही कमजोर महसूस करता है।

🎯 Exam Tip: भगत जी के चरित्र की विशेषताओं को बताते हुए स्पष्ट करें कि कैसे उनके जैसे लोग पैसे की व्यंग्य-शक्ति से अप्रभावित रहते हैं।

 

Question 8. पैसे की व्यंग्य-शक्ति की सुनिए। वह दारुण है। मैं पैदल चल रहा हूँ कि पास ही धूल उड़ाती निकल गई मोटर। वह क्या निकली मेरे कलेजे को कौंधती एक कठिन व्यंग्य की लीक ही आर-से-पार हो गई। जैसे किसी ने आँखों में उँगली देकर दिखा दिया हो कि देखो, उसका नाम है मोटर, और तुम उससे वंचित हो! यह मुझे अपनी ऐसी विडम्बना मालूम होती है कि बस पूछिए नहीं। मैं सोचने को हो आता हूँ कि हाय, ये ही माँ-बाप रह गए थे जिनके यहाँ मैं जन्म लेने को था। क्यों न मैं मोटरवालों के यहाँ हुआ। उस व्यंग्य में इतनी शक्ति है कि जरा में मुझे अपने संगों के प्रति कृतघ्न कर सकती है। (पृष्ठ सं. 45)
Answer:
कठिन शब्दार्थ-दारुण = भयंकर, कष्टदायक। कौंधती = चमकती हुई, चुभती हुई। व्यंग्य की लीक = कटाक्ष की रेखा। वंचित = रहित। विडम्बना = दुर्भाग्य। कृतघ्न = अहसान न मानने वाला।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित `बाजार दर्शन' शीर्षक विचारात्मक निबंध से लिया गया है। इसके लेखक जैनेन्द्र कुमार यहाँ पैसे की व्यंग्य-शक्ति के प्रभाव का वर्णन कर रहे हैं। वे बताते हैं कि कैसे धन का अभाव व्यक्ति को अंदर तक प्रभावित कर सकता है।

व्याख्या-लेखक कहते हैं कि पैसे की व्यंग्य-शक्ति बहुत कष्टदायक होती है। वे एक उदाहरण देते हैं: जब वे पैदल चल रहे थे, तभी धूल उड़ाती हुई एक मोटर उनके पास से गुजरी। उस मोटर का निकलना उन्हें ऐसा लगा जैसे किसी ने उनकी आँखों में उँगली डालकर दिखाया हो कि "देखो, यह मोटर है और तुम इससे वंचित हो!" यह एक बहुत ही तीखा और कठिन कटाक्ष था जो उनके दिल को भेद गया।

लेखक को यह अपना बहुत बड़ा दुर्भाग्य लगा। वे सोचने लगे कि काश उनका जन्म किसी मोटरवाले के घर हुआ होता। वे यह सोचने पर मजबूर हो गए कि उनके माता-पिता वही क्यों थे जिनके यहाँ उनका जन्म हुआ। इस व्यंग्य में इतनी शक्ति थी कि यह कुछ ही देर में व्यक्ति को अपने सगे-संबंधियों के प्रति भी अहसान फरामोश बना सकती है। यह दिखाता है कि धन का अभाव मनुष्य को किस हद तक नकारात्मक विचारों में डुबो सकता है। यह व्यक्ति को अपने वर्तमान जीवन से असंतुष्ट कर देता है।

विशेष-
1. पैसे में बहुत तेज व्यंग्य शक्ति होती है जो मनुष्य को गहराई तक प्रभावित करती है।
2. एक छोटी सी मोटर भी लेखक को अपने परिवार के प्रति कृतघ्न बना देती है।
3. भाषा गंभीर और विषय के अनुसार है, जिसमें उद्धरण शैली का प्रयोग किया गया है।
4. शैली विचारात्मक है, जो पाठक को जीवन के यथार्थ पर सोचने पर मजबूर करती है।
In simple words: लेखक बताते हैं कि जब उनके पास से मोटर गुजरी, तो उन्हें लगा जैसे पैसे की शक्ति उन पर कटाक्ष कर रही हो कि उनके पास मोटर क्यों नहीं है। इस व्यंग्य ने उन्हें इतना दुखी कर दिया कि वे सोचने लगे कि काश उनका जन्म किसी अमीर घर में हुआ होता।

🎯 Exam Tip: पैसे की व्यंग्य-शक्ति के प्रभाव को लेखक के व्यक्तिगत अनुभव के माध्यम से स्पष्ट करें और बताएं कि यह कैसे मनुष्य को प्रभावित कर सकती है।

 

Question 9. उस बल को नाम जो दो, पर वह निश्चय उस तल की वस्तु नहीं है जहाँ पर संसारी वैभव फलता-फूलता है। वह कुछ अपर जाति का तत्व है। लोग स्पिरिचुअल कहते हैं, आत्मिक, धार्मिक, नैतिक कहते हैं। मुझे योग्यता नहीं कि मैं उन शब्दों में अन्तर देखें और प्रतिपादन करूं। मुझे शब्द से सरोकार नहीं। मैं विद्वान नहीं कि शब्दों पर अटकें; लेकिन इतना तो है कि जहाँ तृष्णा है, बटोर रखने की स्पृहा है-वहाँ उस बल का बीज नहीं है। बल्कि यदि उसी बल को सच्चा बल मानकर बात की जाय तो कहना होगा कि संचय की तृष्णा और वैभव की चाह में व्यक्ति की निर्बलता ही प्रमाणित होती है। निर्बल ही धन की ओर झुकता है। वह अबलता है। वह मनुष्य पर धन की और चेतन पर जड़ की विजय है। (पृष्ठ सं. 46)
Answer:
कठिन शब्दार्थ-तल = स्तर। वैभव = धन-दौलत। अपर जाति = दूसरी तरह का। स्पिरिचुअल = आध्यात्मिक। प्रतिपादन = सिद्ध करना। सरोकार = मतलब। अटकें = उलझें। तृष्णा = लालच। स्पृहा = इच्छा। संचय = इकट्ठा करना। अबलता = कमजोरी। चेतन = बुद्धिमान। जड़ = बेजान।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित `बाजार दर्शन' शीर्षक विचारात्मक निबंध से लिया गया है। इसके लेखक जैनेन्द्र कुमार यहाँ उस आंतरिक बल की बात कर रहे हैं जो हमें भौतिक इच्छाओं और संग्रह की प्रवृत्ति से बचाता है। वे बताते हैं कि यह बल धन के व्यंग्य से कहीं ज्यादा मजबूत होता है।

व्याख्या-लेखक कहते हैं कि इस आंतरिक बल को भले ही कोई कोई भी नाम दे, लेकिन यह निश्चित रूप से उस भौतिक संसार की चीज नहीं है जहाँ धन-दौलत और सुख-सुविधाएँ फलती-फूलती हैं। यह एक अलग तरह का तत्व है जिसे लोग आध्यात्मिक, आत्मिक, धार्मिक या नैतिक बल कहते हैं। लेखक कहते हैं कि मुझ में उतनी क्षमता नहीं है कि मैं इन शब्दों के बीच का अंतर समझा सकूँ, और मुझे शब्दों के जाल में उलझना भी पसंद नहीं है। वे कहते हैं कि मैं इतना विद्वान नहीं हूँ कि शब्दों पर अटकूँ।

लेकिन लेखक यह बात साफ कहते हैं कि जहाँ लालच और चीजों को इकट्ठा करने की इच्छा होती है, वहाँ इस आंतरिक बल का कोई निशान नहीं होता। बल्कि, अगर इस आंतरिक बल को सच्चा बल मानें, तो यह कहना सही होगा कि धन इकट्ठा करने का लालच और भौतिक सुख की चाह में ही व्यक्ति की कमजोरी दिखती है। जो कमजोर होता है, वही धन की ओर झुकता है। यह मनुष्य की एक बड़ी कमजोरी है। यह दिखाता है कि कैसे धन पर हमारी बुद्धि (चेतन) की हार होती है और धन (जड़) की जीत होती है। यह बल हमें सही राह दिखाता है।

विशेष-
1. लेखक ने मनुष्य के आंतरिक बल को भौतिक धन से ऊपर रखा है।
2. उन्होंने बताया कि धन की लालसा व्यक्ति की कमजोरी को दर्शाती है।
3. भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग है और यह प्रवाहपूर्ण है।
4. शैली गहन विचारात्मक है, जो आत्मिक और नैतिक मूल्यों पर जोर देती है।
In simple words: लेखक उस खास आंतरिक शक्ति की बात करते हैं जो धन-दौलत के लालच से अलग है, जिसे लोग आध्यात्मिक बल कहते हैं। वे कहते हैं कि जहाँ लालच होता है, वहाँ यह बल नहीं होता, और धन इकट्ठा करने की चाह ही मनुष्य की असली कमजोरी है।

🎯 Exam Tip: आध्यात्मिक बल और भौतिक धन के बीच के अंतर को स्पष्ट करें और बताएं कि लेखक के अनुसार सच्चा बल क्या है।

 

Question 10. बाजार से हठ-पूर्वक विमुखता उनमें नहीं है, लेकिन अगर उन्हें जीरा और काला नमक चाहिए तो सारे चौक-बाजार की सत्ता उनके लिए तभी तक है, तभी तक उपयोगी है, जब तक वहाँ जीरा मिलता है। जरूरत भर जीरा वहाँ से ले लिया कि फिर सारा चौक उनके लिए आसानी से नहीं के बराबर हो जाता है। वह जानते हैं कि जो उन्हें चाहिए वह है। जीरा नमक। बस इस निश्चित प्रतीति के बल पर शेष सब चाँदनी चौक का आमन्त्रण उन पर व्यर्थ होकर बिखरा रहता है। चौक की चाँदनी दाएँ-बाएँ भूखी-की-भूखी फैली रह जाती है, क्योंकि भगत जी को जीरा चाहिए वह तो कोने वाली पंसारी की दुकान से मिल जाता है और वहाँ से सहज भाव में ले लिया गया है। इसके आगे आस-पास अगर चाँदनी बिछी रहती है। तो बड़ी खुशी बिछी रहे, भगत जी उस बेचारी का कल्याण ग्ल्याण ही चाहते हैं। (पृष्ठ सं. 46)
Answer:
कठिन शब्दार्थ-हठ-पूर्वक = जिद्द से। विमुखता = मुंह फेरना। सत्ता = अस्तित्व। प्रतीति = विश्वास। आमन्त्रण = बुलावा। व्यर्थ = बेकार। भूखी-की-भूखी = प्रभावहीन। पंसारी = मसाले बेचने वाला।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सृजन' में संकलित `बाजार दर्शन' शीर्षक विचारात्मक निबंध से लिया गया है। इसके लेखक जैनेन्द्र कुमार यहाँ चूरन बेचने वाले भगत जी के चरित्र का वर्णन कर रहे हैं। वे बताते हैं कि कैसे भगत जी बाजार के आकर्षण से अप्रभावित रहते हैं और केवल अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ही बाजार जाते हैं।

व्याख्या-लेखक कहते हैं कि भगत जी बाजार से जानबूझकर दूर नहीं भागते, लेकिन अगर उन्हें सिर्फ जीरा और काला नमक चाहिए, तो पूरे बाजार का महत्व उनके लिए तभी तक है जब तक उन्हें वह सामान मिल जाए। जैसे ही वे अपनी जरूरत का जीरा और नमक खरीद लेते हैं, बाकी पूरा बाजार उनके लिए बेकार हो जाता है। उन्हें पता है कि उन्हें सिर्फ जीरा और नमक चाहिए। इस दृढ़ विश्वास के कारण चाँदनी चौक का सारा आकर्षण उन पर कोई असर नहीं डाल पाता।

बाजार की चमक-दमक और सुन्दरता उनके लिए प्रभावहीन हो जाती है, क्योंकि भगत जी को जीरा और नमक तो कोने की एक पंसारी की दुकान से आसानी से मिल जाता है। वे सहज भाव से उसे खरीद लेते हैं। इसके बाद, अगर आसपास कितनी भी रोशनी और चमक हो, भगत जी को उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वे उस दिखावटी बाजार का भी भला ही चाहते हैं, लेकिन खुद उसके आकर्षण में नहीं फंसते। यह दिखाता है कि अपनी जरूरतों को स्पष्ट रूप से जानना कितना महत्वपूर्ण है।

विशेष-
1. यह गद्यांश बताता है कि अपनी आवश्यकताओं का ज्ञान होने पर ही फिजूलखर्ची से बचा जा सकता है।
2. लेखक ने भगत जी का उदाहरण देकर बाजार की सही उपयोगिता और उससे कैसे बचा जाए, यह समझाया है।
3. भाषा समझने में आसान है, विषय के अनुसार है और प्रवाहपूर्ण है।
4. शैली विचारात्मक और वर्णनात्मक है, जो भगत जी के चरित्र को गहराई से प्रस्तुत करती है।
In simple words: भगत जी बाजार सिर्फ अपनी जरूरत का सामान (जैसे जीरा, नमक) खरीदने जाते हैं। जैसे ही उन्हें वह मिल जाता है, बाजार की सारी चमक-दमक उनके लिए बेकार हो जाती है। उनका दृढ़ निश्चय उन्हें बाजार के जादू से बचाता है।

🎯 Exam Tip: भगत जी के उदाहरण का उपयोग करके स्पष्ट करें कि कैसे अपनी जरूरतों को जानना बाजार के अनावश्यक आकर्षण से बचने में मदद करता है।

 

Question 9. बाजारूपन का क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के व्यक्ति बाजार को बाजारूपन से बचाकर उसे सार्थकता प्रदान करते हैं?
Answer: बाजारूपन का अर्थ है जब बाजार अपनी मुख्य पहचान खो देता है। बाजार का मुख्य काम लोगों की जरूरतों को पूरा करना होता है। कुछ लोग अपनी आवश्यकताओं को ठीक से नहीं जानते, वे दिखावे के लिए बहुत सारी चीजें खरीद लेते हैं। इससे बाजार में एक बुरा असर पड़ता है, जिसे बाजारूपन कहते हैं। जो ग्राहक अपनी जरूरतें समझते हैं और केवल उपयोगी चीजें खरीदते हैं, वे बाजार को इस बाजारूपन से बचाते हैं और उसे सही मायने में उपयोगी बनाते हैं। बाजार को हमेशा समाज की सेवा करनी चाहिए, न कि केवल मुनाफा कमाने का जरिया बनना चाहिए।
In simple words: जब बाजार सिर्फ दिखावा बन जाता है और लोग बिना जरूरत के चीजें खरीदते हैं, तो इसे बाजारूपन कहते हैं। समझदार ग्राहक जो केवल जरूरी चीजें खरीदते हैं, वे बाजार को सही रखते हैं।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में बाजारूपन की परिभाषा और उसे बचाने के तरीके दोनों बताने हैं। ध्यान रहे कि आप केवल एक पहलू पर ही ध्यान न दें।

 

Question 10. 'बाजार दर्शन' नामक निबन्ध में किस प्रकार के ग्राहकों के बारे में बताया गया है? आप स्वयं को किस श्रेणी का ग्राहक मानते/मानती हैं?
Answer: 'बाजार दर्शन' निबंध में दो तरह के ग्राहकों के बारे में बताया गया है। एक वे ग्राहक होते हैं जिन्हें पता नहीं होता कि उन्हें क्या खरीदना है। वे बाजार की चमक-दमक देखकर बिना सोचे-समझे चीजें खरीदते रहते हैं। दूसरे वे ग्राहक होते हैं जो अपनी जरूरतों को अच्छे से जानते हैं। वे केवल वही चीजें खरीदते हैं जिनकी उन्हें सचमुच आवश्यकता होती है, और इस तरह वे पैसे की बर्बादी से बचते हैं। मैं खुद को दूसरी श्रेणी का समझदार ग्राहक मानता/मानती हूँ। मैं फालतू चीजें नहीं खरीदता/खरीदती और अपने पैसे का सही उपयोग करता/करती हूँ, ताकि फिजूलखर्ची से बच सकूँ। समझदारी से खरीदारी करना न केवल व्यक्तिगत लाभ देता है, बल्कि बाजार को भी स्वस्थ रखता है।
In simple words: लेखक ने दो तरह के ग्राहक बताए हैं- एक जो बिना सोचे खरीदते हैं और दूसरे जो सिर्फ जरूरी चीजें खरीदते हैं। मैं खुद को समझदार ग्राहक मानता/मानती हूँ जो केवल काम की चीजें खरीदता/खरीदती है।

🎯 Exam Tip: अपने जवाब में दोनों प्रकार के ग्राहकों का स्पष्ट वर्णन करें और फिर बताएँ कि आप किस श्रेणी में आते हैं और क्यों।

 

Question 11. 'बाजार दर्शन' पाठ में बताया गया है कि कभी-कभी आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं?
Answer: हाँ, मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि कभी-कभी आवश्यकता ही शोषण का रूप ले लेती है। बाजार में चीजों की कीमत उसकी माँग और उपलब्धता पर निर्भर करती है। जब माँग कम होती है और चीजें ज्यादा होती हैं, तो वे सस्ती बिकती हैं। लेकिन जब माँग ज्यादा होती है और चीजें कम होती हैं, तो उनकी कीमत बढ़ जाती है। चालाक दुकानदार इस बात का फायदा उठाते हैं। वे चीजों को छिपाकर उनकी कमी का दिखावा करते हैं। इससे लोगों की आवश्यकता बढ़ जाती है और वे ज्यादा कीमत पर चीजें खरीदने को मजबूर हो जाते हैं। यह वास्तव में आवश्यकता का शोषण है क्योंकि कीमतें जानबूझकर बढ़ाई जाती हैं ताकि दुकानदार अधिक लाभ कमा सकें।
In simple words: हाँ, जरूरत ही शोषण बन सकती है। दुकानदार कभी-कभी चीजों की कमी दिखाकर या माँग बढ़ाकर उन्हें महंगा बेचते हैं, जिससे ग्राहक को ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में अपनी सहमति या असहमति स्पष्ट करें और फिर अपने विचार के समर्थन में बाजार के नियमों और विक्रेताओं के व्यवहार का तर्क दें।

 

Question 12. आप बाजार की विभिन्न प्रकार की संस्कृतियों से परिचित होंगे। मॉल की संस्कृति, सामान्य बाजार की संस्कृति, हाट की संस्कृति में क्या अन्तर है?
Answer: बाजार की अलग-अलग संस्कृतियों में कई अंतर होते हैं। मॉल की संस्कृति बड़े शहरों में होती है, जहाँ ब्रांडेड और महंगी चीजें एक ही जगह मिलती हैं। यह सुविधा और दिखावे पर जोर देती है। सामान्य बाजार की संस्कृति में स्थानीय दुकानें और विक्रेता होते हैं, जहाँ रोजमर्रा की चीजें मिल जाती हैं और लोग मोल-भाव भी कर सकते हैं। हाट की संस्कृति गाँवों और छोटे कस्बों में होती है, जहाँ किसान और छोटे व्यापारी सीधे अपनी चीजें बेचने आते हैं। यहाँ चीजें सस्ती और ताजा मिलती हैं, और यह सीधे संपर्क पर आधारित होती है, जिसमें लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी होती हैं। हर बाजार का अपना महत्व है और वह समाज के एक विशेष वर्ग की जरूरतों को पूरा करता है।
In simple words: मॉल बड़े शहरों में ब्रांडेड चीजों का, सामान्य बाजार रोजमर्रा की चीजों का, और हाट गाँवों में ताजी व सस्ती चीजों का बाजार है। हर जगह का अपना अलग तरीका है।

🎯 Exam Tip: तीनों संस्कृतियों- मॉल, सामान्य बाजार और हाट- का स्पष्ट अंतर उनके उद्देश्य, उत्पादों और ग्राहकों के आधार पर बताएँ।

 

Question 13. 'खाली मन' तथा 'बन्द मन' में बाजार दर्शन के लेखक ने क्या अन्तर बताया है?
Answer: 'बाजार दर्शन' निबंध में लेखक ने 'खाली मन' और 'बंद मन' में अंतर बताया है। 'खाली मन' का मतलब है जब किसी व्यक्ति को बाजार जाने पर यह पता नहीं होता कि उसे क्या खरीदना है, क्योंकि उसे अपनी जरूरतों की ठीक से जानकारी नहीं होती। ऐसा मन बाजार की चमक-दमक से आसानी से प्रभावित हो जाता है। इसके विपरीत, 'बंद मन' का मतलब मन को पूरी तरह से दबा देना या शून्य कर देना है, ताकि उसमें किसी भी इच्छा का जन्म ही न हो। लेखक कहते हैं कि मन को जबरदस्ती बंद करना ठीक नहीं है, क्योंकि इच्छाओं को हठपूर्वक दबाने से मन सुखी नहीं रह सकता। मनुष्य को अपनी इच्छाओं को पहचानना चाहिए, न कि उन्हें पूरी तरह से खत्म करने की कोशिश करनी चाहिए।
In simple words: 'खाली मन' तब होता है जब आपको पता नहीं होता कि क्या खरीदना है। 'बंद मन' का मतलब है सारी इच्छाओं को दबा देना, जो लेखक के अनुसार गलत है।

🎯 Exam Tip: 'खाली मन' और 'बंद मन' की परिभाषा और उनके प्रभावों को स्पष्ट रूप से समझाएँ, जैसा कि लेखक ने पाठ में बताया है।

 

Question 14. “बाजार दर्शन' निबन्ध में परमात्मा तथा मनुष्य में क्या अन्तर बताया गया है? मनुष्य को मन को बन्द करने का अधिकार क्यों नहीं है?
Answer: 'बाजार दर्शन' निबंध में लेखक ने परमात्मा और मनुष्य के बीच एक बड़ा अंतर बताया है। परमात्मा को पूर्ण और शून्य माना गया है, जिसका अर्थ है कि वह इच्छाओं से परे है। वहीं, मनुष्य अपूर्ण है और उसके मन में इच्छाओं का उठना स्वाभाविक है। मनुष्य की अपूर्णता ही उसकी पहचान है। मनुष्य को अपने मन को पूरी तरह से बंद करने या इच्छाओं को शून्य करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि इच्छाएँ मनुष्य के स्वभाव का हिस्सा हैं। अगर मनुष्य अपनी इच्छाओं को जबरदस्ती दबाएगा, तो वह पूर्ण नहीं हो पाएगा और उसका जीवन निरर्थक हो जाएगा। सही ज्ञान हमें अपनी अपूर्णता को स्वीकार करने और उसी के अनुसार जीने में मदद करता है।
In simple words: परमात्मा इच्छाओं से मुक्त और पूर्ण है, जबकि मनुष्य अपूर्ण है और उसमें इच्छाएँ होती हैं। इसलिए, मनुष्य को अपने मन को पूरी तरह से बंद करने या इच्छाओं को खत्म करने का अधिकार नहीं है।

🎯 Exam Tip: परमात्मा और मनुष्य के बीच के अंतर को 'पूर्णता' और 'अपूर्णता' के संदर्भ में समझाएँ और यह भी बताएँ कि मनुष्य को अपनी इच्छाओं को पूरी तरह से क्यों नहीं दबाना चाहिए।

 

Question 15. चूरन वाले भगत जी पर बाजार का जादू क्यों नहीं चलता? वह बाजार को किस प्रकार सार्थकता प्रदान कर रहे हैं?
Answer: भगत जी को अपनी जरूरतों का बिल्कुल सही ज्ञान है। वह लालच और संतोष से दूर हैं। बाजार में कितनी भी आकर्षक चीजें क्यों न सजी हों, भगत जी की रुचि उनमें नहीं होती। उन्हें केवल जीरा और काला नमक खरीदना होता है, और वे एक साधारण पंसारी की दुकान से इसे खरीद लेते हैं। बाजार का आकर्षण उन पर बिल्कुल काम नहीं करता। भगत जी अपनी जरूरत का सामान खरीदकर बाजार को सही मायने में उपयोगी बनाते हैं। वे फिजूलखर्ची नहीं करते और न ही दिखावा करते हैं। इस प्रकार, अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद, बाजार की चकाचौंध उनके लिए मायने नहीं रखती।
In simple words: भगत जी अपनी जरूरतें जानते हैं और लालची नहीं हैं, इसलिए बाजार का जादू उन पर नहीं चलता। वे केवल जरूरी चीजें खरीदकर बाजार को सही उपयोगिता देते हैं।

🎯 Exam Tip: भगत जी के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं जैसे 'आत्म-संतोष' और 'जरूरत का ज्ञान' को उनके बाजार के व्यवहार से जोड़कर समझाएँ।

 

Question 16. "चौक की चाँदनी दाएँ-बाएँ भूखी-की-भूखी फैली रह जाती है।” कहने का लेखक का तात्पर्य क्या है?
Answer: इस कथन का अर्थ है कि चाँदनी चौक (बाजार) की चमक-दमक और आकर्षक वस्तुएँ भगत जी जैसे संतोषी व्यक्ति पर कोई असर नहीं डाल पातीं। भगत जी को चूरन बनाने के लिए केवल काला नमक और जीरा चाहिए होता है, जो उन्हें एक सामान्य पंसारी की दुकान पर मिल जाता है। बाजार में मौजूद फैंसी स्टोरों और महंगी चीजों की सुंदरता उन्हें प्रभावित नहीं करती। भगत जी अपनी आवश्यकता पूरी करने के बाद उन सभी आकर्षक चीजों को देखकर भी आगे बढ़ जाते हैं, क्योंकि उनके लिए उन चीजों का कोई महत्व नहीं रहता। बाजार की सारी सजावट और भव्यता उनके सामने ऐसी लगती है जैसे वह भूखी-की-भूखी (प्रभावहीन) फैली रह गई हो।
In simple words: इस वाक्य का मतलब है कि बाजार की चमक-दमक और आकर्षक चीजें भगत जी जैसे संतुष्ट व्यक्ति पर कोई असर नहीं डाल पातीं, क्योंकि वे केवल अपनी जरूरत की चीजें खरीदते हैं।

🎯 Exam Tip: इस वाक्यांश की व्याख्या करते समय भगत जी के चरित्र और बाजार की 'जादू' शक्ति के बीच के विपरीत संबंध को स्पष्ट करें।

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