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Detailed Chapter 11 सुमित्रानंदन पंत RBSE Solutions for Class 12 Hindi
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Class 12 Hindi Chapter 11 सुमित्रानंदन पंत RBSE Solutions PDF
RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 11 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 11 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. भारतमाता है –
(क) ग्रामवासिनी
(ख) नगर-वासिनी
(ग) पाताल-वासिनी
(घ) महल-वासिनी
Answer: (क) ग्रामवासिनी
In simple words: भारत माता गाँवों में रहती हैं, इसलिए उन्हें ग्रामवासिनी कहा गया है।
🎯 Exam Tip: कविता के आधार पर भारतमाता के स्वरूप का सटीक वर्णन करें और सही विशेषण चुनें।
Question 2. कविता लिखते समय भारतमाता की संतानों की संख्या कितनी थी
(क) 20 करोड़
Answer: कविता में भारतमाता की संतानों की संख्या तीस करोड़ बताई गई है, जो उस समय भारत की जनसंख्या का प्रतीक था।
In simple words: कवि के अनुसार, उस समय भारतमाता की तीस करोड़ संतानें थीं।
🎯 Exam Tip: कविता के तथ्यों को याद रखें, जैसे कि जनसंख्या या विशेषण, क्योंकि ये अक्सर सीधे पूछे जाते हैं।
RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 11 अतिलघु उत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. कविता में भारतमाता का आँचल कैसा दिखता है?
Answer: कविता में भारतमाता का आँचल श्यामल (गहरा), धूल भरा और मैला-सा दिखाई देता है। यह उनकी गरीबी और दुर्दशा को दिखाता है।
In simple words: कविता में भारतमाता का आँचल गहरा, धूल भरा और गंदा दिखता है।
🎯 Exam Tip: भारतमाता के वर्णन में प्रयुक्त विशेषणों को याद रखें, जैसे 'श्यामल', 'धूलभरा', 'मैला-सा', क्योंकि ये उनके हालात बताते हैं।
Question 2. भारतमाता को किसकी प्रकाशिनी बताया गया है ?
Answer: भारतमाता को गीता की प्रकाशिनी बताया गया है, क्योंकि भारत ही वह भूमि है जहाँ गीता का महान ज्ञान उत्पन्न हुआ था।
In simple words: भारतमाता को गीता का ज्ञान फैलाने वाली कहा गया है।
🎯 Exam Tip: यह महत्वपूर्ण है कि आप भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व से जुड़े विशेषणों को याद रखें।
Question 3. 'धरती कितना देती है' में कवि ने बचपन में क्या बोए थे ?
Answer: 'धरती कितना देती है' कविता में कवि ने बचपन में लोभ के कारण पैसे बोए थे, यह सोचकर कि उनसे धन के पेड़ उगेंगे।
In simple words: कवि ने बचपन में धरती में पैसे बोए थे, धनवान बनने के लिए।
🎯 Exam Tip: कहानी के मुख्य मोड़ और कवि के शुरुआती अनुभवों को याद रखना, कहानी के संदेश को समझने में मदद करता है।
Question 4. ऊपर बढ़ती बेलों की तुलना लेखक ने किससे की है ?
Answer: लेखक (कवि) ने ऊपर की ओर बढ़ती बेलों की तुलना झरने से की है, जो तेजी से ऊपर की ओर बढ़ रहे थे।
In simple words: कवि ने ऊपर बढ़ती बेलों को झरने जैसा बताया है।
🎯 Exam Tip: उपमा और तुलना वाले अंशों पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि वे काव्य सौंदर्य का हिस्सा होते हैं।
Question 5. नए उगे सेम के पौधे कवि को कैसे लगे?
Answer: नए उगे सेम के पौधे कवि को ऐसे लगे जैसे वे छाता ताने खड़े नए मेहमान हों, और ऐसे भी जैसे चिड़ियों के अंडे तोड़कर निकले छोटे बच्चे हों जो उड़ने को तैयार हों।
In simple words: कवि को नए सेम के पौधे छाता ताने मेहमानों या चिड़ियों के अंडे से निकले बच्चों जैसे लगे।
🎯 Exam Tip: कवि द्वारा प्रकृति के चित्रण में प्रयुक्त कल्पना और बिम्बों को समझें, यह आपके उत्तर को और प्रभावशाली बनाएगा।
RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 11 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. पैसे बोकर कवि ने क्या कल्पना की ?
Answer: कवि ने बचपन में लोभ में आकर जमीन में कुछ पैसे बो दिए थे। उसने सोचा था कि उन पैसों से पेड़ उगेंगे और उन पर रुपयों की मधुर फसलें लगेंगी। कवि ने कल्पना की थी कि वह इन रुपयों से खूब धनवान बन जाएगा और फल-फूलकर एक मोटा सेठ बन जाएगा। उसने यह भी सोचा था कि धरती बंजर नहीं, बल्कि रत्न पैदा करने वाली है।
In simple words: कवि ने सोचा था कि पैसे बोने से रुपयों के पेड़ उगेंगे और वह अमीर बन जाएगा।
🎯 Exam Tip: कवि की बचपन की कल्पनाओं को स्पष्ट रूप से बताएं और यह भी बताएं कि वे वास्तविकता से कैसे अलग थीं।
Question 3. भारत माता का संयम किस प्रकार से सफल रहा है ?
Answer: भारत माता ने पराधीनता की पीड़ा और कष्टों को बड़े धैर्य और संयम के साथ सहन किया। अब उनकी यह तपस्या और संयम सफल हो गया है। भारतमाता को महात्मा गांधी के अहिंसा का बल मिला है, जिससे उनकी पराधीनता और दुखों का अंत होने वाला है।
In simple words: भारत माता ने धैर्य से दुख सहे, और अब गांधी जी की अहिंसा से उनकी पीड़ा खत्म होने वाली है।
🎯 Exam Tip: गांधीवाद और अहिंसा के प्रभाव को भारतमाता के संदर्भ में स्पष्ट रूप से उल्लेख करें।
Question 4. कवि ने सेम की फलियाँ किस-किस को बाँटीं?
Answer: कवि ने सेम की फलियाँ अपने मित्रों, बंधु-बांधवों, मेहमानों (अभ्यागतों) और भिखारियों को बाँटीं। उन्होंने अपने पड़ोस में रहने वाले सभी परिचित और अपरिचित लोगों को भी सेम की फलियाँ दीं। सभी ने दिन-रात उन फलियों का आनंद लिया।
In simple words: कवि ने सेम की फलियाँ अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, मेहमानों और पड़ोसियों को बाँटीं।
🎯 Exam Tip: उन सभी समूहों का उल्लेख करें जिन्हें कवि ने फलियाँ दी थीं, यह दर्शाता है कि आपने पाठ को ठीक से पढ़ा है।
Question 5. कवि लोभवश क्या नहीं समझ पाया था ?
Answer: कवि ने बचपन में पैसों का लोभ करके जमीन में पैसे बोए थे, लेकिन वह यह नहीं समझ पाया था कि धरती कितनी उदार और देने वाली है। वह यह नहीं जान पाया था कि धरती अपनी संतानों की हर जरूरत के लिए चीजें पैदा करती है और रत्न उत्पन्न करती है। पैसों के पेड़ न उगने पर उसने धरती को बंजर समझ लिया था, उसकी अपार उर्वरता को वह समझ नहीं पाया था।
In simple words: कवि लोभ में धरती की उदारता और उसकी पैदा करने की शक्ति को नहीं समझ पाया था।
🎯 Exam Tip: कवि की गलती और धरती के वास्तविक गुणों के बीच के अंतर को स्पष्ट करें।
RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 11 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. भारत माता की स्थिति कविता में कैसी है ? क्यों?
Answer: कविता में भारत माता को ग्रामवासिनी कहा गया है, जो गरीबी और उदासी की मूर्ति के समान हैं। उनका आँचल धूल और मिट्टी से भरा है, जो खेतों का प्रतीक है। गंगा-यमुना नदियाँ उनके नेत्रों से बहने वाले आँसू हैं। उनकी आँखों में दीनता और निगाहें झुकी हुई हैं। उनके होठों पर रोने और मन में दुख भरा है। वह अपने ही देश में एक प्रवासी की तरह हैं। उनकी तीस करोड़ संतानें नंगी, आधी भूखी, असुरक्षित, शोषित, अज्ञानी, अशिक्षित, गरीब और अपमानित हैं। वे पेड़ के नीचे रहने को मजबूर हैं। मूल्यवान फसलें पैदा करने के बावजूद वे दबी हुई हैं। उनका मन निराशा से भरा है, पर काँपते होठों के पीछे एक हल्की हँसी छिपी है। उनकी स्थिति राहु द्वारा ग्रसित चंद्रमा जैसी है। यह सब भारत की उस समय की गरीबी, पराधीनता और पिछड़ेपन के कारण था।
In simple words: कविता में भारत माता गरीब, दुखी, और अपमानित दिखाई गई हैं, जैसे वे अपने ही घर में बेघर हों। ऐसा इसलिए था क्योंकि भारत तब पराधीन और बहुत पिछड़ा हुआ था।
🎯 Exam Tip: भारतमाता के शारीरिक और भावनात्मक वर्णन के साथ-साथ उनके इस रूप के पीछे के ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों को भी स्पष्ट करें।
Question 2. "रत्न प्रसविनी' किसको कहा गया है तथा क्यों ?
Answer: कवि ने पृथ्वी को 'रत्न प्रसविनी' कहा है। रत्न प्रसविनी का अर्थ है रत्न पैदा करने वाली। कवि ने सेम के बीज बोए थे, और समय आने पर उन पर अनगिनत सेम की फलियाँ लगीं। कवि और उसके परिचितों ने सर्दियों भर उन फलियों को जी भरकर खाया। बचपन में पैसे बोकर कवि ने धरती को बंजर समझा था। लेकिन सेम के बीज बोने के बाद उनका यह भ्रम टूट गया। उन्होंने समझा कि धरती सचमुच रत्न प्रसविनी है, क्योंकि यह जीवन को पोषित करने वाली अनमोल फसलें पैदा करती है।
In simple words: कवि ने पृथ्वी को 'रत्न प्रसविनी' कहा है, जिसका मतलब है रत्न पैदा करने वाली। उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि सेम के बीज बोने पर ढेर सारी फलियाँ उगीं, जिससे कवि को एहसास हुआ कि धरती कितनी उपजाऊ है।
🎯 Exam Tip: 'रत्न प्रसविनी' शब्द का अर्थ और कवि के अनुभव को जोड़कर उत्तर दें, यह आपके विश्लेषण को मजबूत करेगा।
Question 13. कवि की दृष्टि में पृथ्वी पर किसकी फसलें उगाना आवश्यक है तथा क्यों ?
Answer: कवि चाहता है कि हमारी धरती सुख-सुविधा से भरपूर हो। इसके लिए वह चाहता है कि लोग मेहनत से काम करें और उनमें काम करने की क्षमता का विकास हो। कवि की दृष्टि में पृथ्वी पर मानव ममता, समानता और कार्यक्षमता की फसलें उगाना आवश्यक है। ऐसा इसलिए ताकि मनुष्यों के बीच प्रेम और समान व्यवहार हो, कोई भेदभाव न रहे, और सभी खुशी से रह सकें।
In simple words: कवि धरती पर मानव प्रेम, समानता और काम करने की क्षमता जैसी फसलें उगाना चाहता है, ताकि सब लोग सुख और भाईचारे से रहें।
🎯 Exam Tip: कवि के विचारों को स्पष्ट रूप से बताएं और यह भी बताएं कि वे क्यों इन मूल्यों को महत्वपूर्ण मानते हैं।
Question 14. 'धरती कितना देती है। – कविता की 'हम जैसा बोंयेंगे वैसा ही पायेंगे' -पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
Answer: 'हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे' -पंक्ति में 'धरती कितना देती है' कविता का मुख्य सार छिपा है। कवि ने पैसे बोए तो उसका प्रयास बेकार गया, लेकिन सेम के बीज बोने पर उसे सफलता मिली। इसका अर्थ है कि किसी भी कार्य की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे सही तरीके से किया गया है या नहीं। यदि हमारी कार्य-प्रणाली सही है और हम अच्छे कर्म करते हैं, तो हमें निश्चित रूप से सफलता मिलती है।
In simple words: इस पंक्ति का मतलब है कि हम जैसे काम करेंगे, वैसा ही फल पाएंगे। अच्छे काम से अच्छा नतीजा मिलता है।
🎯 Exam Tip: इस पंक्ति के अर्थ को कवि के अनुभवों और कर्मवाद के सिद्धांत से जोड़कर स्पष्ट करें।
Question 15. "यह धरती कितना देती है, धरती माता' – धरती को कवि ने माता कहा है। आपकी दृष्टि से इसका कारण क्या हो सकता है ?
Answer: कवि ने धरती को माता इसलिए कहा है क्योंकि माँ अपने बच्चों का पालन-पोषण करती है और उन्हें समर्थ बनाती है। माँ अपने बच्चों से बहुत स्नेह करती है और हमेशा उनका भला चाहती है। ठीक इसी तरह, धरती भी अपने सभी प्राणियों और मनुष्यों की माता है। वह अपने अनमोल पदार्थों को पैदा करके उनकी जरूरतों को पूरा करती है। पृथ्वी पर उगने वाली चीजों से ही मनुष्यों का जीवन चलता है। यह अनेक प्रकार की फसलें और असंख्य चीजें उत्पन्न करती है। इसी सब को देखकर कवि ने धरती को 'धरती माता' कहा है, जो अपने प्यारे पुत्रों को बहुत कुछ देती है।
In simple words: कवि ने धरती को माता इसलिए कहा क्योंकि वह माँ की तरह अपने बच्चों (जीवों) का पालन-पोषण करती है, उनकी जरूरतें पूरी करती है और बहुत कुछ देती है।
🎯 Exam Tip: माँ और धरती के बीच की समानता को स्पष्ट करें, खासकर पालन-पोषण और निस्वार्थ भाव से देने के संदर्भ में।
Question 2. "धरती कितना देती है” पंत के भाग्यवादी दर्शन पर आधारित है-क्या अथवा हैं ? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए। अथवा धरती कितना देती है” कविता में कवि ने कर्मवाद का संदेश दिया है। स्पष्ट कीजिए। अथवा धरती कितना देती है कविता का अन्त हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे” कहने के साथ हुआ है। क्या इसका अर्थ यह निकाला जा सकता है कि पंत भाग्यवादी थे और अपनी रचना से भाग्यवादी दर्शन का प्रचार कर रहे थे।”
Answer: पंत की विचारधारा समय के साथ बदलती रही है। वे महर्षि अरविन्द, महात्मा गांधी और कार्ल मार्क्स जैसे विचारकों से प्रभावित थे। हालांकि, इनमें से किसी को भी भाग्यवादी नहीं कहा जा सकता। पंत प्रगतिवादी थे और उनके लेखन पर मार्क्स के दर्शन का प्रभाव दिखाई देता है। उनकी शुरुआती रचनाएँ छायावाद के अंतर्गत आती थीं, जिसमें पलायन की प्रवृत्ति दिखती है, लेकिन यह प्रबल नहीं थी। इस पलायन को भाग्यवाद कहा जा सकता है। छायावाद अक्सर सौंदर्य और प्रेम के चित्रण में डूबा होता है।
पंत प्रकृति के सुंदर चित्रकार और प्रेमी थे। "छोड़ द्रुमों को मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया, बाले तेरे बाल जाल में कैसे उलझा दें लोचन?" जैसी पंक्तियाँ लिखने वाला कवि प्रकृति प्रेमी भाग्यवादी नहीं हो सकता। 'धरती कितना देती है' कविता भाग्यवादी विचारों पर आधारित नहीं है। यह कर्मवाद का संदेश देती है। कविता में कहा गया है कि सत्कर्मों से ही धरती को मनुष्यों के रहने लायक बनाया जा सकता है। कवि ने कहीं भी यह संदेश नहीं दिया है कि हमें सब कुछ भाग्य पर छोड़ देना चाहिए। इसलिए, पंत को भाग्यवादी दर्शन का उपदेशक नहीं कहा जा सकता।
In simple words: पंत भाग्यवादी नहीं थे, बल्कि कर्मवाद पर विश्वास करते थे। 'धरती कितना देती है' कविता बताती है कि हमें अच्छे काम करने चाहिए, क्योंकि भाग्य पर सब कुछ छोड़ना सही नहीं है।
🎯 Exam Tip: कवि के विचारों को स्पष्ट करते हुए, उनके कर्मवाद के सिद्धांत पर जोर दें और भाग्यवादी होने के दावे का खंडन करें।
Question 3. "मैं अबोध था मैंने गलत बीज बोये थे' कवि ने बचपन में क्या गलती की थी ? कवि की गलती को आप किस। प्रकार सुधारना चाहेंगे ?
Answer: कवि ने बचपन में यह गलती की थी कि उसने लोभ के कारण जमीन में पैसे बो दिए थे। वह तब नासमझ था और उसे लगा था कि पैसे के पेड़ उगेंगे और उन पर रुपयों के फल लगेंगे, जिससे वह धनवान बन जाएगा।
मैं कवि की गलती को इस प्रकार सुधारना चाहूँगा: मैं कोशिश करूँगा कि सभी पृथ्वीवासी भाई-भाई की तरह मिलकर रहें। वे एक-दूसरे से प्रेम करें और सबके प्रति ममता की भावना अपने मन में रखें। मैं सभी मनुष्यों को कार्य-कुशल देखना चाहूँगा। सभी लोग काम करने में सक्षम हों ताकि उन्हें सफलता मिले। इससे धरती पर सुख-सम्पन्नता का वातावरण बनेगा और सभी लोग सुखपूर्वक रह सकेंगे। धन सुख का एक जरिया है। मैं चाहूँगा कि सभी लोग सही साधनों का उपयोग करके धन कमाएँ। धन से सुख मिलता है, लेकिन धन के अभाव में अनेक दुःख आते हैं। यह कहा गया है कि 'धन से धर्म' भी होता है। मैं व्यापार करूँगा या कारखाना लगाऊँगा ताकि समाज की जरूरतें पूरी हों और मैं अपना तथा समाज का जीवन सुखमय बना सकूँ।
In simple words: कवि ने बचपन में पैसे बोकर धनवान बनने की गलती की थी। मैं इस गलती को ऐसे सुधारना चाहूँगा कि सब लोग प्रेम से रहें, मेहनत करें, और सही तरीके से धन कमाकर समाज का भला करें।
🎯 Exam Tip: कवि की गलती को स्पष्ट रूप से बताएं और फिर अपने सुधारों को वास्तविक और सामाजिक रूप से उपयोगी बिंदुओं में प्रस्तुत करें।
Question 4. "यह धरती कितना देती है' – कविता का प्रतिपाद्य क्या है ? लिखिए। अथवा यह धरती कितना देती है” – कविता में कवि ने क्या संदेश दिया है ?
Answer: 'यह धरती कितना देती है' कविता का मुख्य संदेश यह है कि गलत प्रयास कभी फलदायी नहीं होते। यदि मनुष्य सही दिशा में प्रयास करता है और अच्छे कर्म करता है, तो उसे हमेशा अच्छा परिणाम मिलता है। मनुष्य जैसा बोता है, वैसा ही काटता है। यदि वह अच्छे कर्म करेगा, तो उसे अच्छा फल मिलेगा और असफलता का डर नहीं होगा। जिस तरह मिट्टी में अच्छे बीज बोने पर अच्छी फसल मिलती है, उसी तरह हमारे कर्मों का फल भी वैसा ही होता है। कवि तुलसीदास ने भी कहा है कि "जो जस करहिं सो तस फल चाखा" (जो जैसा करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है)।
पंत जी इस कविता के अंत में कहते हैं कि "हम जैसा बोयेंगे, वैसा ही पायेंगे"। अच्छे कर्मों का परिणाम हमेशा अच्छा होता है। इसलिए, मनुष्यों को अपने जीवन में अच्छे काम करने चाहिए। अच्छे काम करके ही संसार को सुखमय बनाया जा सकता है। हमें इस धरती पर मनुष्यों में प्रेम, ममता, समानता और कार्यकुशलता की फसल पैदा करनी चाहिए। जब संसार में प्रेम, ममता, समानता और कार्यकुशलता का वातावरण बनेगा, तो यह धरती स्वर्ग के समान सुखमय हो जाएगी। यही इस कविता का मुख्य विषय है और यही इसकी प्रेरणा भी है। कवि इस कविता के माध्यम से हमें अच्छे कर्म करने का संदेश देते हैं।
In simple words: 'यह धरती कितना देती है' कविता सिखाती है कि हम जैसे कर्म करेंगे, वैसा ही फल पाएंगे। अच्छे काम करने से अच्छा नतीजा मिलता है और संसार में प्रेम, समानता बनी रहती है।
🎯 Exam Tip: कविता के केंद्रीय संदेश को स्पष्ट करें और इसे कर्मवाद के सिद्धांत से जोड़कर उदाहरण सहित समझाएं।
Question 5. आपने धरती कितना देती है कविता पढ़ी है। इसके अनुसार आप भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए क्या कार्य योजना प्रस्तुत करेंगे ?
Answer: 'धरती कितना देती है' कविता के अनुसार, यह धरती माता अपने बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए अनेक चीजें पैदा करती है और उनका जीवन सुखमय बनाती है। भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए मेरी कार्य योजना में मानवों के प्रति प्रेम, ममता और समानता के भाव विकसित करना शामिल है। हमें उनमें कार्य-कुशलता उत्पन्न करनी चाहिए। इसी से यह धरती सुख-संपन्नता से पूर्ण होगी। यह कविता हमें प्रेरणा देती है कि हम पृथ्वी पर लोगों के लिए उपयुक्त वातावरण बनाएं। मैं भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए निम्नलिखित कार्य करना चाहूँगा:
1. मैं धरती पर रहने वाले सभी लोगों को समान मानूँगा और उनसे भी यही कहूँगा।
2. मैं चाहूँगा कि पृथ्वीवासियों में देश, प्रांत, जाति, धर्म, रंग, रूप, लिंग, धनी या गरीब के आधार पर कोई भेदभाव न हो।
3. मैं प्रयास करूँगा कि सभी पृथ्वीवासी भाई-भाई की तरह मिलकर रहें, एक-दूसरे से प्रेम करें और सबके प्रति ममता की भावना रखें।
4. मैं सभी मनुष्यों को कार्य-कुशल देखना चाहूँगा ताकि वे काम करने में सक्षम हों और उन्हें सफलता मिले। इससे धरती पर सुख-संपन्नता का वातावरण बनेगा और सभी लोग सुखपूर्वक रह सकेंगे।
5. धन सुख का एक जरिया है। मैं चाहूँगा कि सभी लोग उचित साधनों से धन कमाएँ। धन से सुख मिलता है, लेकिन धन के अभाव में अनेक दुःख आते हैं। 'धनात् धर्मः' भी कहा गया है।
In simple words: मैं भारत के अच्छे भविष्य के लिए लोगों में प्यार, समानता और काम करने की लगन बढ़ाना चाहूँगा। सभी लोग बिना भेदभाव के एक-दूसरे की मदद करें और सही तरीके से धन कमाकर खुशी से रहें।
🎯 Exam Tip: कविता के संदेश को अपनी कार्य योजना में शामिल करें और व्यावहारिक बिंदुओं में बताएं कि आप भारत के भविष्य को कैसे बेहतर बनाना चाहेंगे।
जीवन - परिचय
Question. सुमित्रानन्दन पंत को जन्म उत्तराखण्ड के जिला अल्मोड़ा के कौसानी नामक ग्राम में सन् 1900 ई. में हुआ था। आपके पिता का नाम पं. गंगादत्त पंत था। जन्म के कुछ समय बाद ही इनकी माता चल बसीं। आपका मूल नाम गुसाईं दत्त था। बाद में आपने अपना नाम सुमित्रानन्दन पंत रखी। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। सन् 1918 ई. में काशी के क्वींस कॉलेज से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। जब आप इलाहाबाद म्योर सेंट्रल कॉलेज में पढ़ रहे थे, तभी सन् 1921 में महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर कॉलेज छोड़ दिया। बाद में आपने स्वाध्याय द्वारा अंग्रेजी, संस्कृत, बँगला भाषाओं का गहन अध्ययन किया। आप इलाहाबाद में आकाशवाणी के अधिकारी रहे। पंत आजीवन अविवाहित रहकर हिन्दी की सेवा में लगे रहे। आपकी साहित्य सेवा के लिए भारत सरकार ने सन् 1961 में आपको 'पद्म भूषण' से अलंकृत किया। 28 दिसम्बर, सन् 1977 को आपका देहावसान हो गया।
Answer: यह सुमित्रानन्दन पंत जी का विस्तृत जीवन परिचय है। इसमें उनके जन्म, शिक्षा, साहित्य यात्रा, स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी, और प्राप्त सम्मानों का वर्णन किया गया है। यह बताता है कि उनका मूल नाम गुसाईं दत्त था, और उन्होंने बाद में अपना नाम सुमित्रानन्दन पंत रखा। उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर पढ़ाई छोड़ दी और स्वअध्ययन से कई भाषाएँ सीखीं। उन्होंने आजीवन अविवाहित रहकर हिन्दी साहित्य की सेवा की और उन्हें 'पद्म भूषण' जैसे सम्मानों से नवाजा गया।
In simple words: यह सुमित्रानन्दन पंत जी के जीवन के बारे में है, जिसमें बताया गया है कि वे कहाँ पैदा हुए, कैसे पढ़े, गांधी जी से कैसे प्रभावित हुए, और उन्होंने जीवन भर हिंदी साहित्य की सेवा की।
🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण तिथियों, स्थानों, पुरस्कारों और पंत जी के मूल नाम को याद रखना जीवनी संबंधित प्रश्नों के लिए आवश्यक है।
साहित्यिक परिचय
Question. हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य का पंत पर गहरा प्रभाव पड़ा। आपने बाल्यावस्था से ही काव्य-साधना आरम्भ कर दी थी। पन्त छायावाद के प्रमुख कवि हैं। आपके साहित्य पर गाँधी जी तथा मार्क्स का भी प्रभाव है। आप प्रकृति के अनुपम चितेरे हैं। आपको प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है। आपको अपनी कला और बूढ़ा चाँद', रचना पर 'साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा 'लोकायतन' महाकाव्य पर उत्तर प्रदेश सरकार तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। आपकी (1968) 'चिदम्बरा' रचना। पर ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिल चुका है।
Answer: यह सुमित्रानन्दन पंत जी के साहित्यिक जीवन का परिचय है। इसमें बताया गया है कि हिमालय के प्राकृतिक सौंदर्य का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने बचपन से ही कविता लिखना शुरू कर दिया था। पंत जी छायावाद के प्रमुख कवि थे, और उनके साहित्य पर गांधीजी और मार्क्सवाद का प्रभाव था। उन्हें प्रकृति का महान चित्रकार और 'सुकुमार कवि' कहा जाता था। उन्हें 'कला और बूढ़ा चाँद' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार और 'लोकायतन' के लिए उत्तर प्रदेश सरकार व सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिला। उनकी 'चिदम्बरा' रचना को 1968 में ज्ञानपीठ पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
In simple words: पंत जी को प्रकृति से बहुत प्यार था और वे छायावाद के बड़े कवि थे। उन्हें गांधी जी और मार्क्स के विचारों ने प्रभावित किया। उन्हें अपनी कविताओं 'कला और बूढ़ा चाँद' और 'चिदम्बरा' के लिए बड़े पुरस्कार मिले।
🎯 Exam Tip: पंत जी की काव्यधारा (छायावाद), प्रेरणा स्रोत (प्रकृति, गांधी, मार्क्स) और प्रमुख कृतियों तथा पुरस्कारों को याद रखें।
कृतियाँ
Question. पंत जी की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैंमहाकाव्य-लोकायतन। काव्य – संग्रह-वीणा, पल्लव, गुंजन (छायावादी प्रभाव ), ), युगान्त, युगवाणी, ग्राम्या (प्रगतिवादी प्रभाव), स्वर्ण किरण, स्वर्ण धूलि, युगपथ, उत्तरा, अतिमा, रजत रश्मि, कला और बूढ़ी चाँद तथा चिदम्बरा
Answer: पंत जी की प्रमुख रचनाओं में महाकाव्य 'लोकायतन' शामिल है। उनके काव्य-संग्रहों में 'वीणा', 'पल्लव', 'गुंजन' (जो छायावादी प्रभाव दर्शाते हैं), 'युगान्त', 'युगवाणी', 'ग्राम्या' (जो प्रगतिवादी प्रभाव दर्शाते हैं), 'स्वर्ण किरण', 'स्वर्ण धूलि', 'युगपथ', 'उत्तरा', 'अतिमा', 'रजत रश्मि', 'कला और बूढ़ा चाँद' और 'चिदम्बरा' शामिल हैं। ये रचनाएँ उनकी विविध काव्य यात्रा को दर्शाती हैं।
In simple words: पंत जी ने कई किताबें लिखीं, जिनमें एक बड़ी कविता 'लोकायतन' है। उनकी दूसरी कविताओं के संग्रह में 'वीणा', 'पल्लव', 'गुंजन', 'ग्राम्या', 'चिदम्बरा' आदि शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: पंत जी की प्रमुख कृतियों को महाकाव्य और काव्य-संग्रह की श्रेणियों में याद रखें, साथ ही उनके प्रभावों (छायावाद, प्रगतिवाद) को भी समझें।
सम्पादन
Question. - रूपाभ।
Answer: पंत जी ने 'रूपाभ' पत्रिका का संपादन भी किया था। यह उनके साहित्यिक योगदान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
In simple words: पंत जी ने 'रूपाभ' नाम की एक पत्रिका का संपादन किया था।
🎯 Exam Tip: कवि के संपादन कार्य को भी उनके साहित्यिक योगदान के एक हिस्से के रूप में याद रखें।
कविताओं का सारांश:
भारत माता
Question. पंतजी की 'भारत माता' कविता उनकी 'ग्राम्या' नामक कविता-संग्रह से ली गई है। इसमें स्वतंत्रता से पूर्व के भारत के ग्रामीण-जीवन का चित्रण हुआ है। भारतमाता ग्रामवासिनी है। हरे-भरे खेत उसका मटमैला आँचल है। गंगा-यमुना उसकी अश्रुधारा हैं। वह मिट्टी की बनी उदास प्रतिमा है। उसकी चितवन में दीनता, अधरों पर रोदन और मन में दुःख व्याप्त है। उसकी तीस करोड़ संतानें नंगी, भूखी, अशिक्षित, निर्धन तथा शोषित हैं। वह पददलित, कुंठित मन वाली तथा काँपते मौन होठों वाली है। वह राहुग्रस्त चन्द्रमा के समान है। उसकी भौंहें चिन्ताग्रस्त तथा नेत्र आँसुओं से भरे हैं। गीता का उपदेश देने वाली भारत माता अज्ञान से ग्रस्त है। आज अहिंसा का सहारा पाकर उसका तप और संयम सफल हो गया है। भारतीयों को भय, अज्ञान और श्रम की थकान दूर हो गई है। भारतमाता जग-जननी तथा जीवन विकासिनी है। वह ग्रामों में रहने वाली है। धरती कितना देती है।
Answer: पंत जी की 'भारत माता' कविता उनके 'ग्राम्या' संग्रह से ली गई है। यह कविता आजादी से पहले के ग्रामीण भारत और भारतमाता की दुर्दशा को दिखाती है। भारतमाता को एक गाँव में रहने वाली स्त्री के रूप में दर्शाया गया है। उनके खेत मटमैले आँचल हैं, गंगा-यमुना उनके आँसू हैं। वह मिट्टी की एक उदास मूर्ति जैसी हैं, जिनकी नजर में गरीबी, होठों पर रोना और मन में दुख भरा है। वह अपने ही देश में एक प्रवासी की तरह हैं। उनकी तीस करोड़ संतानें कपड़ेहीन, भूखी, अनपढ़, गरीब और सताई हुई हैं। वे दबी हुई, निराश और खामोश हैं, राहु से घिरे चंद्रमा जैसी। उनकी भौंहें चिंता से भरी हैं और आंखें आँसुओं से। गीता का ज्ञान देने वाली भारतमाता खुद अज्ञान से घिरी हैं। लेकिन, अब गांधीजी की अहिंसा का सहारा मिलने से उनकी तपस्या सफल हो गई है। भारतीयों का डर, अज्ञान और मेहनत की थकान दूर हो गई है। भारतमाता पूरी दुनिया की जननी और जीवन देने वाली हैं, जो गाँवों में रहती हैं। यह कविता 'धरती कितना देती है' का भी जिक्र करती है।
In simple words: 'भारत माता' कविता आजादी से पहले के ग्रामीण भारत की गरीबी और दुख को दिखाती है। भारत माता को गाँव में रहने वाली, उदास और गरीब स्त्री के रूप में दिखाया गया है, जिसकी संतानें भी दुख में हैं। गांधीजी की अहिंसा से उनकी पीड़ा अब कम हो रही है।
🎯 Exam Tip: भारतमाता के वर्णन में प्रयुक्त प्रतीकों और विशेषणों को स्पष्ट रूप से समझाएं, और स्वतंत्रता-पूर्व भारत की स्थिति को उसके संदर्भ में बताएं।
Question. 'धरती कितना देती है' पन्त जी की सत्कर्म की प्रेरणा देनी वाली रचना है। मनुष्य यदि सही दिशा में प्रयत्न करे तो उसको सफलता अवश्य मिलती है। बचपन में कवि ने छिपकर पैसे बोए थे, सोचा था कि उनके पेड़ उगेंगे और रुपयों की फसलें उत्पन्न होंगी। वह खूब धनवान बन जाएगा। किन्तु ऐसा नहीं हुआ वह पेड़ों के उगने का इंतजार ही करता रहा। उसने बचपन में अबोधावस्था में गलत बीज
Answer: 'धरती कितना देती है' पंत जी की एक ऐसी रचना है जो अच्छे कर्म करने की प्रेरणा देती है। यह बताती है कि यदि मनुष्य सही दिशा में प्रयास करे, तो उसे निश्चित रूप से सफलता मिलती है। कवि ने अपने बचपन में छिपकर पैसे बोए थे, यह सोचकर कि उनसे पैसों के पेड़ उगेंगे और रुपयों की फसल होगी, जिससे वह बहुत अमीर बन जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और वह पेड़ों के उगने का इंतजार ही करता रहा। कवि ने बचपन की नादानी में गलत बीज बो दिए थे।
In simple words: 'धरती कितना देती है' कविता हमें अच्छे काम करने की सीख देती है। कवि ने बचपन में गलत सोचकर पैसे बोए थे, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली, क्योंकि उसने सही बीज नहीं बोए थे।
🎯 Exam Tip: कविता के मूल संदेश (कर्मवाद) को कवि के बचपन के अनुभव से जोड़कर स्पष्ट करें। यह दिखाएं कि कैसे गलत बीज बोने से गलत परिणाम मिलते हैं।
पद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्याएँ।
भारत माता
भारत माता
ग्रामवासिनी।।
खेतों में फैला है श्यामल,
धूल भरा मैला सा आँचल,
गंगा यमुना में आँसू जल,
मिट्टी की प्रतिमा
उदासिनी!
दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन
अधरों में विर नीरव रोदन,
युग-युग के तम से विषण्ण मन,
वह अपने घर में।
प्रवासिनी !
विशेष -
- भारतमाता के चित्रण के माध्यम से भारत के गाँवों की दुर्दशा का वर्णन हुआ है।
- विता पर गाँधीवाद तथा प्रगतिवाद का प्रभाव है।
- मानवीकरण, रूपक, अनुप्रास अलंकार है।
- भाषा साहित्यिक, प्रवाहपूर्ण खड़ी बोली है।
तीस कोटि संतान नग्न तन,
अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्र जन,
मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन,
नत-मस्तक
तरु तल निवासिनी!
स्वर्ण शस्य पर-पदतल कुंठित,
धरती सा सहिष्णु मन कुंठित,
क्रंदन कंपित अधर मौन स्मित, राहु-ग्रसित
शरदेन्दु हासिनी
चिंतित भृकुटि-क्षितिज तिमिरांकित
नमित नयन तन वाष्पाच्छादित
आनन श्री छाया शशि उपमित,
ज्ञान मूढ़
गीता प्रकाशिनी।
सफल आज उसका तप संयम,
पिला अहिंसा स्तन्य सुधोपम,
हरती जन-मन-भय, भव-तम-श्रम,
जग जननी
जीवन विकासिनी।
भारतमाता।
ग्रामवासिनी।
मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोए थे,
सोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे।
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेगी,
और फूल फलकर मैं मोटा सेठ बनूंगा
पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा,
बंध्या मिट्टी ने न एक भी पैसा उगला।
सपने जाने कहाँ मिटे, कब धूल हो गए।
मैं हताश हो, बाट जोहता रहा दिनों तक,
बाल कल्पना के अपलक पाँवड़े बिछाकर।
मैं अबोध था, मैंने गलत बीज बोये थे,
ममता को रोपा, तृष्णा को सींचा था।
कितने ही मधु पतझर बीत गए अनजाने,
ग्रीष्म तपे, वर्षा फूली, शरदें मुसकाई
सी-सी कर हेमन्त कपे, तरु झरे खिले वन,
औ, जब फिर से गाढ़ी ऊदी लालसा लिए,
गहरे कजरारे बादल बरसे धरती पर
मैंने कौतूहलवश आँगन के कोने की
गीली तह में यों ही उँगली से सहलाकर
बीज सेम के दबा दिये मिट्टी के नीचे
भू के अंचल में मणि-माणिक बाँध दिए हों।
विशेष -
- कवि ने वसन्ते, ग्रीष्म, वर्षा, शरद तथा हेमन्त ऋतुओं का सुन्दर चित्रण किया है।
- काव्य में छ: ऋतुओं का वर्णन होता रहा है। कवि ने शिशिर ऋतु को भुला दिया है।
- भाषा संस्कृतनिष्ठ, साहित्यिक खड़ी बोली है।
- मानवीकरण पुनरुक्ति, अनुप्रास, उपमा अलंकार आदि के प्रयोग हुए हैं। अतुकान्त छन्द भी लिया गया है।
देखा-आंगन के कोने में कई नवागत
छोटा-छोटा छाता ताने खड़े हुए हैं।
छाता कहूँ कि विजय-पताकाएँ जीवन की,
या हथेलियाँ, खोले थे वे नन्ही प्यारी
जो भी हो, वे हरे-हरे उल्लास से भरे
पंख मार कर उड़ने को उत्सुक लगते थे
डिम्ब तोड़कर निकले चिड़ियों के बच्चों से।
विशेष -
- सेम के नए उगे पौधों का काव्यमय चित्रण हुआ है।
- भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण तथा विषयानुरूप है।
- पुनरुक्ति, संदेह, उपमा अलंकार के प्रयोग हुए हैं।
- मुक्त छंद अतुकान्त है।
- पैसे तो नहीं उगे किन्तु सेम के बीज उग आए। कवि बताना चाहता है कि सही ढंग से प्रयत्न करने पर ही सफलता मिलती है।
निर्निमेष, क्षणभर में उनको रहा देखता
सहसा मुझे स्मरण हो आया-कुछ दिन पहले
बीज सेम के रोपे थे मैंने आँगन में,
और उन्हीं से बौने पौधों की यह पलटन
बेलें फैल गईं बल खा आँगन में लहरा,
और सहारा लेकर बाडे सी दृटी का
हरे-हरे सौ झरने फूट पड़े ऊपर को।
विशेष -
- कवि ने सेम के बीज बोये थे। उनसे उत्पन्न बेलें आँगन में छा गई थीं।
- भाषा सरल, सरस तथा प्रवाहपूर्ण है।
- मानवीकरण, रूपक, अनुप्रास अलंकार के प्रयोग हुए हैं।
- अतुकान्त युक्त छंद है।
मैं अवाक् रह गया-वंश कैसे बढ़ता है।
छोटे, तारों-से छितरे, फूलों के छींटे।
झागों-से लिपटे लहरी श्यामल लतरों पर
सुन्दर लगते थे, मावस के हँसमुख नभ-से
चोटी के मोती-से, आँचल के बूटों-से,
ओह, समय पर उनमें कितनी फलियाँ टूटीं।
कितनी सारी फलियाँ, कितनी प्यारी फलियाँ
पतली चौड़ी कलियाँ, उफ उनकी क्या गिनती
विशेष -
- कवि ने आँगन में सेम के बीज रोपे थे। उनसे उत्पन्न बेलें असंख्य फलियों से लद गए।
- फलियों का मार्मिक चित्रण किया गया है।
- अनुप्रास, उपमा तथा संदेह अलंकार है। पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार भी है। अतुकान्त युक्त छंद को प्रयोग किया गया है।
- भाषा बोधगम्य, साहित्यिक तथा प्रवाहपूर्ण खड़ी बोली है।
आ, इतनी फलियाँ टूटीं, जाड़ों भर खाईं।
सुबो शाम वे घर-घर पकीं, पड़ोस पास के
जाने-अनजाने सब लोगों में बँटवाई,
बंधु-बांधवों, मित्रों, अभ्यागत मँगतों ने,
जी भर-भर दिन-रात मुहल्ले भर ने खाईं।
कितनी सारी फलियाँ कितनी सारी फलियाँ
विशेष -
- सेम की बेलों पर लगने वाली फलियाँ असंख्य थीं। कवि ने अपने परिचितों तथा अन्य लोगों को मुक्तहस्ते फलियाँ बाँटीं।
- इन पंक्तियों में कवि बताना चाहता है कि पृथ्वी माता अपनी संतान के लिए मुक्त मन से आवश्यकता की चीजें प्रदान करती
- भाषा सरल तथा प्रवाहपूर्ण है।
- अतुकान्त मुक्तक छंद है। पुनरुक्ति प्रकाश तथा अनुप्रास अलंकार है।
यह धरती कितना देती है, धरती माता
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रों को।
नहीं समझ पाया था मैं उसके महत्व को,
बचपन में निज स्वार्थ लोभवश पैसे बोकर।
रत्न-प्रसविनी है वसुधा अब समझ सका हूँ।
इसमें सच्ची ममता के दाने बोने हैं।
इसमें मानवता समता के दाने बोने हैं,
जिससे उगल सके फिर धूलि सुनहरी फसलें।
मानवता के जीवन श्रम से हँसें दिशाएँ।
हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे।
विशेष -
- इन पंक्तियों में कवि ने सत्कर्म करने की प्रेरणा तथा संदेश दिया है।
- कवि कर्मवाद के सिद्धान्त से प्रभावित दिखाई दे रहा है।
- भाषा बोधगम्य सरस तथा साहित्यिक है।
- अनुप्रास तथा रूपक अलंकार हैं। अतुकान्त मुक्त छंद है
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