RBSE Solutions Class 12 Hindi व्याकरण अलंकार

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Class 12 Hindi व्याकरण अलंकार RBSE Solutions PDF

Rajasthan Board RBSE Class 12 Hindi व्याकरण अलंकार

अर्थ और स्वरूप – अलंकार शब्द का सामान्य अर्थ आभूषण है। आभूषण जिस प्रकार शरीर की शोभा बढ़ाने के लिए धारण किए जाते हैं, उसी प्रकार काव्य की शोभा-वृद्धि के लिए अलंकार प्रयोग किए जाते हैं। काव्यशास्त्र के आचार्य दंडी ने भी कहा है

“काव्य शोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते।”

अर्थात् काव्य की शोभा बढ़ाने वाले शब्द ही अलंकार हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी अलंकारों को काव्य में प्रस्तुत भाव को उत्कर्ष देने वाला मानते हैं। काव्य, शब्द तथा अर्थमय है, अत: उसका अलंकरण भी शब्द तथा अर्थमूलक रहा है। कुछ अलंकार केवल शब्द-सौन्दर्य पर आधारित है और कुछ अर्थ-सौन्दर्य पर। शब्द पर आधारित अलंकार एक विशेष शब्द के प्रयोग पर निर्भर रहता है। उसका पर्यायवाची प्रयोग करने पर चमत्कार या शोभा समाप्त हो जाती है। अर्थमूलक अलंकार के प्रायः तीन प्रकार हैं –

  • साम्यमूलक, जो दो पदार्थों की समानता पर आधारित है
  • विरोध मूलक, जिनमें चमत्कारपूर्ण विरोध की कल्पना प्रस्तुत की जाती है और
  • वक्रोक्तिमूलक, जिसमें कथन की वक्रता से शोभा उत्पन्न होती है।

शब्दालंकार तथा अर्थालंकार: अलंकार के मुख्य रूप से दो भेद माने जाते हैं – शब्दालंकार और अर्थालंकार। एक तीसरा भेद 'उभयालंकार' भी होता है।

शब्दालंकार – जहाँ कविता की सुंदरता उसमें इस्तेमाल किए गए शब्दों पर निर्भर करती है, वहाँ शब्दालंकार होता है। अगर उन शब्दों की जगह उनके समान अर्थ वाले दूसरे शब्द रख दिए जाएँ, तो वह सुंदरता या चमत्कार खत्म हो जाता है। क्योंकि यह शब्दों पर आधारित होता है, इसे शब्दालंकार कहते हैं, जैसे –

"कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।”

इस पंक्ति में 'कनक' शब्द का दो बार अलग-अलग अर्थों में प्रयोग करके कविता को सुंदर बनाया गया है। अगर यहाँ 'कनक' का पर्यायवाची 'स्वर्ण' शब्द रख दिया जाए, तो यह सुंदरता समाप्त हो जाएगी। इसलिए, यह सुंदरता 'कनक' शब्द पर आधारित होने के कारण इस पंक्ति में शब्दालंकार है।

अर्थालंकार – जहाँ कविता की सुंदरता या चमत्कार उसके अर्थ पर आधारित होता है, वहाँ अर्थालंकार होता है। इस अलंकार में अगर प्रयोग किए गए शब्दों की जगह उनके पर्यायवाची भी रख दिए जाएँ, तो भी कविता की सुंदरता वैसी ही बनी रहती है, जैसे –

चली आ रही फेन उगलती फन फैलाए व्यालों-सी

अगर इस पंक्ति को इस प्रकार कहें

“उमड़ रही थीं फेन उगलती फन फैलाए सर्पों-सी”

तो भी कविता की सुंदरता वैसी ही बनी रहती है। इसलिए, यहाँ अर्थालंकार है।

शब्दालंकार तथा अर्थालंकार में अन्तर – शब्दालंकार कविता में तब होता है, जब सुंदरता उसमें इस्तेमाल किए गए शब्दों पर निर्भर करती है। अगर शब्द का पर्यायवाची रख दिया जाए तो सुंदरता खत्म हो जाती है। अर्थालंकार तब होता है, जब कविता की सुंदरता उसके अर्थ पर निर्भर करती है। इसी कारण, इसमें शब्दों के पर्यायवाची रख देने पर भी सुंदरता बनी रहती है।

उभयालंकार – जो अलंकार शब्दों और उनके अर्थों दोनों में सुंदरता पैदा करके कविता की शोभा बढ़ाते हैं, वे उभयालंकार कहलाते हैं। इन्हें मिश्रित अलंकार भी कहा जाता है, जैसे-संसृष्टि और संकर।

शब्दालंकार

1. अनुप्रास अलंकार

लक्षण या परिभाषा – जहाँ कविता की पंक्ति में एक वर्ण (अक्षर) या कई वर्णों की आवृत्ति एक से ज्यादा बार होती है, चाहे उनके स्वरों में समानता हो या विषमता, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

प्रस्तुत काव्य-पंक्ति में 'मधुर मुस्कान' में 'म' वर्ण का दो बार प्रयोग हुआ है, भले ही उनके स्वर अलग हों। यहाँ भी अनुप्रास अलंकार की सुंदरता दिखाई देती है।

उदाहरण (3) 'छोरटी है गोरटी या चोरटी अहीर की।'

उपर्युक्त काव्य पंक्ति में अंतिम वर्ण 'ट' और 'र' की एक से अधिक बार आवृत्ति होने से काव्य में सुंदरता आ गई है।

उदाहरण (4) 'विभवशालिनी, विश्वपालिनी दुख हर्ती है, भय निवारिणी, शांतिकारिणी सुख कर्ती है।

उपर्युक्त पंक्ति में पास-पास प्रयोग किए गए शब्द 'विभवशालिनी' और 'विश्वपालिनी' में आखिरी दो वर्ण 'ल', 'न' की आवृत्ति हुई है। इसी तरह 'भयनिवारिणी' और 'शांतिकारिणी' में भी आखिरी दो वर्ण 'र', 'ण' की आवृत्ति हुई है।

उदाहरण (5) 'तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये।'

उपर्युक्त काव्य पंक्ति में 'त' वर्ण की आवृत्ति पाँच बार हुई है। सभी 'त' वर्ण शब्दों के शुरू में आए हैं और उनके स्वर भी समान हैं, इसलिए यहाँ अनुप्रास अलंकार है।

अनुप्रास के भेद – अनुप्रास अलंकार के निम्नलिखित भेद हैं

(1) छेकानुप्रास – अनुप्रास का यह प्रकार है जहाँ एक या एक से अधिक वर्णों की आवृत्ति केवल एक बार होती है, जैसे-'कानन कठिन भयंकर भारी।' इस काव्य पंक्ति में 'क' वर्ण और 'भ' वर्ण केवल दो-दो बार आए हैं, अतः यहाँ छेकानुप्रास अलंकार है।

(2) वृत्यानुप्रास – जहाँ एक या अनेक वर्णों की एक से अधिक बार आवृत्ति होती है, वहाँ वृत्यानुप्रास अलंकार होता है, जैसे-'विरति विवेक विमल विज्ञानी।' इस काव्य पंक्ति में 'व' वर्ण की आवृत्ति अनेक बार हुई है, अतः यहाँ वृत्यानुप्रास है।

(3) श्रुत्यानुप्रास – जहाँ ऐसे वर्णों की आवृत्ति होती है, जिनका उच्चारण मुख के एक ही स्थान से होता है, वहाँ श्रुत्यानुप्रास होता है, जैसे-'दिनान्त था, थे दिननाथ डूबते।' इस काव्य पंक्ति में एक ही उच्चारण-स्थान 'दन्त' से उच्चरित होने वाले अनेक वर्ण 'त, थ, द, न' की आवृत्ति हुई है, अतः यहाँ श्रुत्यानुप्रास है।

(4) अन्त्यानुप्रास – छन्द के चरणों के अंत में जहाँ एक जैसे वर्णों का प्रयोग होता है, वहाँ अन्त्यानुप्रास अलंकार होता है, जैसे 'काली काली अलकों में, आलस-मद-नत पलकों में।'

उपर्युक्त काव्य पंक्तियों के अंतिम वर्ण एक समान हैं। अतः इन तुकान्त (एक जैसी तुक वाली) पंक्तियों में अन्त्यानुप्रास है।

नोट – कुछ विद्वान् अनुप्रास का एक और भेद 'लाटानुप्रास' भी मानते हैं। लाटानुप्रास अलंकार में शब्दों या वाक्यांशों की आवृत्ति होती है और उनके अर्थ में कोई अंतर नहीं होता, लेकिन अन्वय-भेद या वर्ण-भेद से अर्थ (तात्पर्य) बदल जाता है, जैसे –

2. श्लेष अलंकार

लक्षण या परिभाषा – काव्य में जहाँ एक ही शब्द के एक से अधिक अर्थ प्रकट होकर कविता को सुंदर बनाते हैं, वहाँ श्लेष अलंकार होता है।

उदाहरण (1) बलिहारी नृप कूप की, गुन बिन बूंद न देइ ।'

प्रस्तुत काव्य पंक्ति में 'गुन' शब्द में श्लेष अलंकार है। 'गुन' शब्द के यहाँ दो अर्थ लिए गए हैं। राजा (नृप) के पक्ष में 'गुन' का अर्थ 'गुण' या 'विशेषता' है और कुएँ (कूप) के पक्ष में 'गुन' का अर्थ 'रस्सी' है। अतः यहाँ श्लेष अलंकार है।

उदाहरण (2) विमलाम्बरा रजनी वधू, अभिसारिका सी जा रही।'

प्रस्तुत काव्य पंक्ति में 'विमलाम्बरा' शब्द के दो अलग-अलग अर्थ हैं। रात्रि (रजनी) के पक्ष में 'विमलाम्बरा' शब्द का अर्थ 'स्वच्छ आकाश वाली' है और अभिसारिका (वह स्त्री जो अपने प्रेमी से मिलने जाती है) के पक्ष में 'स्वच्छ वस्त्रों वाली' है। अतः यहाँ श्लेष अलंकार है।

उदाहरण (3) 'पानी गये न ऊबरै, मोती, मानुस, चून।'

प्रस्तुत काव्य पंक्ति में 'पानी' शब्द के अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग अर्थ हैं। मोती के संदर्भ में 'पानी' का अर्थ 'चमक' है, मनुष्य के संदर्भ में 'पानी' का अर्थ 'प्रतिष्ठा' है और आटे (चून) के संदर्भ में 'पानी' का अर्थ 'जल' है। अतः यहाँ श्लेष अलंकार है।

उदाहरण (4) चरन धरत चिंता करत, चितवत चारिहुँ ओर। सुबरन को ढूंढत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर ।।'

प्रस्तुत दोहे की दूसरी पंक्ति में 'सुबरन' शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसे कवि, व्यभिचारी और चोर तीनों ही खोज रहे हैं। यहाँ 'सुबरन' के तीन अर्थ हैं-कवि के लिए 'अच्छे शब्द', व्यभिचारी के लिए 'अच्छा रूप-रंग' और चोर के लिए 'स्वर्ण'। अर्थात् यहाँ श्लेष अलंकार है।

उदाहरण (5) 'मंगन को देखि पटे देत बार-बार है।`

इस काव्य पंक्ति में 'पट' शब्द के दो अर्थ हैं। पहला अर्थ है कि कोई व्यक्ति भिखारी को देखकर बार-बार कपड़े देता है, और दूसरा अर्थ है कि भिखारी को देखते ही दरवाजा बंद कर लेता है। अतः यहाँ श्लेष अलंकार की सुंदरता दिखाई देती है।

श्लेष अलंकार के भेद - श्लेष अलंकार के दो भेद माने गए हैं - (i) अभंग पद श्लेष तथा (ii) सभंग पद श्लेष। जब शब्द के विभिन्न अर्थ शब्द के टुकड़े किए बिना ही स्पष्ट हो जाते हैं, तो उसे अभंग पद श्लेष अलंकार कहते हैं, जैसे-'पानी गये न ऊबरै' पंक्ति में भी 'पानी' शब्द के टुकड़े किए बिना ही उसके तीनों अर्थ स्पष्ट हो जाते हैं। लेकिन, जहाँ विभिन्न अर्थों को जानने के लिए शब्द के टुकड़े करने पड़ें, वहाँ सभंग पद श्लेष अलंकार माना जाता है, जैसे

"चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यों न सनेह गंभीर। को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के वीर ।।'

उदाहरण (1) 'काली घटा का घमण्ड घटा, नभ-मण्डल तारक-वृन्द लिखे।'

उपर्युक्त काव्य पंक्ति में शरद ऋतु के आने पर उसके सौंदर्य का वर्णन किया गया है। वर्षा के खत्म होने पर शरद ऋतु के आने से काली घटा का घमंड कम हो गया है। 'घटा' शब्द दो बार आया है, लेकिन पहली 'घटा' का अर्थ 'बादल की घटा' है जबकि दूसरी 'घटा' का अर्थ 'कम होना' है। अतः यहाँ यमक अलंकार का प्रयोग हुआ है।

उदाहरण (2) "कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय।। वा खाये बौराय जग, या पाये बौराय ।।”

उपर्युक्त दोहे में 'कनक' शब्द का प्रयोग दो बार हुआ है, लेकिन पहले 'कनक' का अर्थ 'धतूरा' है और दूसरे 'कनक' का अर्थ 'स्वर्ण' (सोने) है। अतः यहाँ यमक अलंकार का प्रयोग हुआ है।

उदारहण (3) 'सुन्यौ कहूँ तरु अरक ते, अरक समान उदोतु।'

उपर्युक्त काव्य पंक्ति में 'अरक' शब्द का प्रयोग दो बार हुआ है। यहाँ पहले 'अरक' का अर्थ 'आक' (एक पौधा) है और दूसरे 'अरक' का अर्थ 'सूर्य' है, अतः इस पंक्ति में यमक अलंकार का सौंदर्य है।

उदाहरण (4) कहै कवि बेनी, बेनी ब्याल की चुराई लीनी रति-रति सोभा सब रति के सरीर की।

पहली पंक्ति में 'बेनी' शब्द दो बार आया है। पहली बार 'बेनी' शब्द कवि का नाम है और दूसरी बार 'बेनी' का अर्थ 'चोटी' है। इसी प्रकार दूसरी पंक्ति में 'रति' शब्द तीन बार आया है। पहली बार 'रति-रति' का अर्थ 'थोड़ी-थोड़ी सी' है और दूसरे स्थान पर 'रति' का अर्थ 'कामदेव की सबसे सुंदर पत्नी' है। इस प्रकार 'बेनी' और 'रति' शब्दों की आवृत्ति से काव्य में सुंदरता आ गई है और यह यमक अलंकार है।

उदाहरण (5) भजन कह्यौ ताते भज्यौ, भज्यौ न एको बार। दूरि भजन जाते कह्यौ, सो ते भज्यो गॅवार।।

उपर्युक्त दोहे में 'भजन' और 'भज्यौ' शब्दों की आवृत्ति हुई है। 'भजन' शब्द के दो अर्थ हैं, पहला 'भजन-पूजन' और दूसरा 'भाग जाना'। इसी प्रकार पहले 'भज्यौ' का अर्थ 'भजन किया' और दूसरे 'भज्यौ' का अर्थ 'भाग गया'। इस तरह 'भजन' और 'भज्यौ' शब्दों की आवृत्ति ने दोहे में सुंदरता पैदा कर दी है। कवि अपने मन को समझाते हुए कहते हैं-हे मेरे मन! जिस परमात्मा का मैंने तुम्हें भजन करने को कहा, तुम उससे भाग खड़े हुए और जिन सांसारिक इच्छाओं से दूर रहने को कहा, तुम उन्हीं की पूजा करने लगे। इस प्रकार इन अलग-अलग अर्थों वाले शब्दों की आवृत्ति से दोहे में सौंदर्य (यमक अलंकार) उत्पन्न हो गया है।

उदाहरण (6) तो पर वारौं उरबसी सुनि राधिके सुजान। तू मोहन के उरबसी है उरबसी समान ।।

4. उपमा अलंकार

लक्षण या परिभाषा – 'उपमा' का सामान्य अर्थ है-किसी एक वस्तु की किसी दूसरी वस्तु से तुलना करना। अतः जहाँ किसी प्रस्तुत (जिसका वर्णन हो रहा हो) वस्तु की तुलना उसके गुणों, धर्मों या क्रियाओं के आधार पर किसी अप्रस्तुत वस्तु से की जाती है, वहाँ उपमा अलंकार होता है।

दूसरे शब्दों में, बहुत अधिक समानता के कारण भले ही दो चीजें बिल्कुल अलग हों, जहाँ उनके रूप, रंग, गुण आदि के आधार पर किसी एक वस्तु की तुलना किसी दूसरी श्रेष्ठ या प्रसिद्ध वस्तु से की जाए, वहाँ उपमा अलंकार होता है।

उपमा के अंग - उपमा अलंकार के निम्नलिखित चार अंग होते हैं –

(1) उपमेय – जिस वस्तु का वर्णन किया जाता है, यानी जिस प्रस्तुत वस्तु की तुलना की जाती है, उसे उपमेय कहते हैं, जैसे-'कमल जैसे कोमल हाथों ने' काव्य पंक्ति में 'हाथों' का वर्णन किया जा रहा है। अतः यहाँ 'हाथ' उपमेय है। उपमेय को 'प्रस्तुत' या 'वर्णित' भी कहते हैं।

(2) उपमान – जिस अप्रस्तुत वस्तु से प्रस्तुत वस्तु यानी उपमेय की समानता दिखाई जाती है, उसे उपमान कहते हैं, जैसे-'कमल-जैसे कोमल हाथों ने' काव्य पंक्ति में हाथों की समानता 'कमल' से दिखाई गई है, अतः यहाँ 'कमल' उपमान है।

(3) साधारण धर्म – उपमेय और उपमान के जिस गुण में समानता दिखाई जाती है, उसे साधारण धर्म कहते हैं। इसे सामान्य या समान धर्म भी कहा जाता है, जैसे-'कमल-जैसे कोमल हाथों ने' काव्य पंक्ति में 'कोमलता' समान धर्म है।

(4) वाचक शब्द – समान गुण को व्यक्त करने वाला शब्द 'वाचक शब्द' कहलाता है। वाचक शब्द द्वारा उपमेय और उपमान की समानता बताई जाती है, जैसे-'कमल-जैसे कोमल हाथों ने' काव्य पंक्ति में 'सदृश' वाचक शब्द है। जिन शब्दों की सहायता से उपमा अलंकार की पहचान होती है, वे हैं-सा, सी, तुल्य, सम, जैसा, ज्यों, सरिस, के समान आदि।

उदाहरण (1) विदग्ध होके कण धूलि-राशि का, तपे हुए लौह-कणों समान था।'

उपर्युक्त काव्य पंक्तियों में धूल के कणों की समानता तपे हुए लोहे के कणों से दिखाई गई है। अतः यहाँ उपमा अलंकार है। इस पंक्ति में 'धूल का कण' उपमेय है, 'लौहकण' उपमान है, 'विदग्धता' साधारण या समान धर्म है और 'समान' वाचक शब्द है।

उदाहरण (2) 'हरि सा हीरा छाँड़ि है, करै और की आस। ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रैदास ।।'

उपर्युक्त दोहे में 'हरि' की तुलना अप्रस्तुत 'हीरा' से की गई है। अतः यहाँ उपमा अलंकार है। उपमा अलंकार के चारों अंग यहाँ मौजूद हैं। 'हरि' उपमेय है, 'हीरा' उपमान है (क्योंकि हरि की उपमा हीरे से दी गई है), 'दुर्लभता' समान या साधारण धर्म है और 'सा' वाचक शब्द है।

उपमा के भेद – उपमा अलंकार के निम्नलिखित तीन भेद हैं –

(1) पूर्णोपमा – जिस उपमा में उसके चारों अंग (उपमेय, उपमान, साधारण धर्म तथा वाचक शब्द) मौजूद हों, वह पूर्णोपमा कहलाती है, जैसे-'दोनों बाँहें कलभकर-सी, शक्ति की पेटिका हैं।' प्रस्तुत काव्य पंक्ति में उपमा के चारों अंग उपमेय (दोनों बाँहें),

उपमान (कलभकर), साधारण धर्म (शक्ति की पेटिका), और वाचक शब्द (सी) सभी उपस्थित हैं, अतः यहाँ पूर्णोपमा अलंकार है।

(2) लुप्तोपमा – जिस उपमा में उसके चारों अंगों में से एक या एक से अधिक अंग गायब हों, वह लुप्तोपमा कहलाती है, जैसे-'कमल-सदृश कोमल हाथों ने, झुका दिया धनु वज्र कठोर।'

प्रस्तुत प्रथम आधी पंक्ति में पूर्णोपमा है, क्योंकि यहाँ उपमा के चारों अंगों का उल्लेख है। लेकिन दूसरी आधी पंक्ति में उपमेय (धनु), उपमान (वज्र) तथा साधारण धर्म (कठोर) का ही उल्लेख है। यहाँ वाचक शब्द गायब है, अतः लुप्तोपमा अलंकार है।

इसी प्रकार एक और उदाहरण देखिए –

'मखमल के झूले पड़े हाथी-सा टीला'।

उपर्युक्त काव्य पंक्ति में 'टीला' उपमेय है, 'मखमल के झूले पड़े हाथी' उपमान है, और 'सा' वाचक शब्द है, लेकिन इसमें साधारण धर्म नहीं है। वह छुपा हुआ है। कवि का मतलब है-'मखमल के झूले पड़े विशाल हाथी-सा टीला।' यहाँ 'विशाल' जैसा कोई साधारण धर्म छुपा है, अतः यहाँ लुप्तोपमा अलंकार है।

(3) मालोपमा – जिस उपमा में एक ही उपमेय के कई उपमान मौजूद हों, वह मालोपमा कहलाती है, जैसे-'माँ शारदा तुषार, कुन्द, हीरे के सदृश धवल हैं।`

प्रस्तुत पंक्ति में एक ही उपमेय शारदा (सरस्वती) की समानता कुन्द, तुषार और हीरे (तीन-तीन उपमानों) द्वारा दिखाई गई है, अतः यहाँ मालोपमा अलंकार है।

5. रूपक अलंकार

लक्षण या परिभाषा - जहाँ उपमेय और उपमान में कोई अंतर न दिखाकर दोनों को एक ही मान लिया जाता है, वहाँ रूपक अलंकार होता है। भले ही रूपक में उपमेय और उपमान दोनों मौजूद होते हैं, लेकिन उनमें इतनी ज्यादा समानता होती है कि वे दोनों एक जैसे दिखते हैं। इसका मतलब यह है कि रूपक में प्रस्तुत वस्तु (उपमेय) पर अप्रस्तुत वस्तु (उपमान) को आरोपित कर दिया जाता है। इस प्रकार उपमेय और उपमान में कोई अंतर नहीं रहता।

उदाहरण (1) 'अम्बर-पनघट में डुबो रही, तारा-घट उषा-नागरी।'

प्रस्तुत काव्य पंक्ति में उपमेय 'अम्बर' को उपमान 'पनघट' का, उपमेय 'तारा' को उपमान 'घट' का और उपमेय 'उषा' को उपमान 'नागरी' का भेद-रहित आरोप किया गया है। अतः यहाँ रूपक अलंकार है।

उदाहरण (2) 'तेरे नयन-कमल बिनु जल के।'

प्रस्तुत काव्य पंक्ति में नयन (उपमेय) और कमल (उपमान) में कोई अंतर नहीं दिखाया गया है, अतः यहाँ रूपक अलंकार है।

उदाहरण (5) 'अपलक नभ नील नयन विशाल'

इस पंक्ति में खुले आकाश पर अपलक विशाल नयन का आरोप है, अतः यहाँ रूपक अलंकार है।

उदाहरण (6) 'शशि-मुख पर पूँघट डाले अंचल में दीप छिपाये।'

यहाँ 'मुख' उपमेय में 'शशि' उपमान का कोई अंतर न दिखाते हुए आरोप होने से रूपक अलंकार का चमत्कार है।

उदाहरण (7) 'मन-सागर, मनसा लहरि, बूड़े-बहे अनेक।'

इस पंक्ति में 'मन' पर सागर का और 'मनसा' (इच्छा) पर लहर का आरोप होने से रूपक अलंकार है।

उदाहरण (8) 'विषय-वारि मन-मीन भिन्न नहिं होत कबहुँ पल एक।”

उपर्युक्त काव्य पंक्ति में विषय पर 'वारि' (जल) का और मन पर 'मीन' (मछली) को एक मानकर आरोप होने से रूपक अलंकार की सुंदरता है।

उदाहरण (9) उदित उदयगिरि-मंच पर, रघुवर बाल-पतंग। विकसे संत-सरोज सब, हरषे लोचन-श्रृंग।।

उपर्युक्त दोहे में उदयगिरि पर 'मंच' का, रघुवर पर 'बाल-पतंग' (सूर्य) का, संतों पर 'सरोज' (कमल) का एवं लोचनों पर 'भृगों' (भौंरों) का कोई भेद न दिखाते हुए आरोप होने से रूपक अलंकार है।

6. उत्प्रेक्षा अलंकार

लक्षण या परिभाषा – जहाँ उपमेय (जिसकी तुलना की जाए) में उपमान (जिससे तुलना की जाए) की संभावना व्यक्त की जाती है, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। भले ही उपमेय और उपमान में अंतर होता है, फिर भी समान गुणों के कारण ऐसी संभावना व्यक्त की जाती है।

संभावना व्यक्त करने के लिए 'मानो', 'मनु', 'मनहुँ', जनहुँ', 'जानो', 'ज्यों', 'मनो', 'यथा', 'जनु' आदि वाचक शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

उदाहरण (1) 'लट-लटकनि मनु मत्त मधुपगन मादक मदहिं पिए।'

प्रस्तुत काव्य पंक्ति में उपमेय 'लट-लटकनि' में उपमान 'मत्त मधुपगन' (मस्त भौंरों का समूह) की संभावना व्यक्त की गई है, अतः यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है।

उदाहरण (2) 'जनक बाम दिसि सोह सुनयना। हिमगिरि संग बनी जनु मयना।'

प्रस्तुत काव्य पंक्तियों में उपमेय (जनक और सुनयना) में उपमान (हिमगिरि और मयना) की संभावना व्यक्त की गई है, अतः उत्प्रेक्षा अलंकार है।

उदाहरण (4) 'मानो माई घनघन अंतर दामिनि। घन दामिनि दामिनि घन अंतर, सोभित हरि-बृज भामिनि।।'

उपर्युक्त काव्य पंक्तियों में रासलीला का सुंदर दृश्य दिखाया गया है। रास के समय हर गोपी को लगता था कि श्रीकृष्ण उसके साथ नृत्य कर रहे हैं। गोरी गोपियाँ और श्याम वर्ण कृष्ण मंडलाकार नाचते हुए ऐसे लगते हैं, मानो बादल और बिजली, बिजली और बादल साथ-साथ शोभायमान हो रहे हों। अतः यहाँ गोपिकाओं में बिजली की और कृष्ण में बादल की संभावना व्यक्त की गई है। अतः उत्प्रेक्षा अलंकार है।

उदाहरण (5) सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर, आतप पर्यो प्रभात।।

उपर्युक्त काव्य-पंक्तियों में श्रीकृष्ण के सुंदर श्याम शरीर में नीलमणि पर्वत की और उनके शरीर पर शोभायमान पीले वस्त्र में सुबह की धूप की मनमोहक कल्पना की गई है।

उदाहरण (6) 'कहती हुई यों उत्तरा के, नेत्र जल से भर गये। हिम के कणों से पूर्ण मानो, हो गये पंकज नये ।।'

इन पंक्तियों में उत्तरा के आँसू भरे नेत्रों (उपमेय) में ओस जल-कण से भरे कमल (उपमान) की संभावना की गई है। 'मानो' वाचक शब्द का प्रयोग किया गया है।

उदाहरण (7) 'चमचमात चंचल नयन, बिच घूघट पट छीन। मनहुँ सुरसरिता विमल, जल उछरते जुग मीन।।'

यहाँ पतले घूँघट में स्वच्छ नदी के जल की और चंचल नयनों में दो उछलती हुई मछलियों की अद्भुत संभावना की गई है। अतः यह उत्प्रेक्षा अलंकार का सुंदर उदाहरण है।

उत्प्रेक्षा के भेद – उत्प्रेक्षा अलंकार के निम्नलिखित तीन भेद हैं

(1) वस्तूत्प्रेक्षा – जहाँ उपमेय वस्तु में उपमान वस्तु की संभावना की जाती है, यानी एक वस्तु को दूसरी वस्तु मान लिया जाता है, वहाँ वस्तूत्प्रेक्षा होती है, जैसे –

'प्राणप्रिया मुख जगमगै, नीले अंचल चीर। मनहुँ कलानिधि झलमले, कालिन्दी के नीर।।

उपर्युक्त काव्य पंक्तियों में 'मुख' में 'कलानिधि' (चाँद) की तथा 'नीले अंचल चीर' में 'कालिन्दी के नीर' (यमुना नदी के जल) की संभावना की गई है, अतः यहाँ वस्तूत्प्रेक्षा है।

(3) फलोत्प्रेक्षा – जहाँ किसी ऐसी चीज़ में फल या उद्देश्य की संभावना की जाती है जो वास्तव में फल या उद्देश्य नहीं होता, उसे ही फल या उद्देश्य मान लिया जाता है, वहाँ फलोत्प्रेक्षा होती है, जैसे – नित्य ही नहाती क्षीरसिन्धु में कलाधर है, सुन्दर तवानन की समता की इच्छा से।'

यहाँ कलाधर (चन्द्रमा) द्वारा क्षीरसागर में स्नान करने का उद्देश्य, प्रयोजन या फल नायिका के मुख की समानता प्राप्त करना माना गया है, जबकि चन्द्रमा के क्षीरसागर में नहाने का वास्तविक प्रयोजन यह है कि चन्द्रमा की उत्पत्ति ही क्षीरसागर से हुई है। अतः यहाँ जो फल नहीं है, उसमें फल की संभावना के कारण फलोत्प्रेक्षा अलंकार है।

7. उदाहरण अलंकार

जहाँ एक बात कहकर उसके उदाहरण के रूप में दूसरी बात कही जाए और दोनों को उपमावाचक शब्द-'जैसे', 'ज्यों', 'मिस' आदि से जोड़ा जाए, वहाँ उदाहरण अलंकार होता है। जैसे – नीकी पै फीकी लगै, बिन अवसर की बात। जैसे बरनत युद्ध में, रस श्रृंगार न सुहात।।

प्रस्तुत पद में 'अच्छी बात को भी बिना अवसर के फीका लगना' की पुष्टि 'युद्ध में श्रृंगार रस' की बात कहकर की गई है और दोनों को 'जैसे' उपमा वाचक शब्द से जोड़ा गया है। अतः यह उदाहरण अलंकार है।

उदाहरण (1) सबै सह सहायक सबल के, कोई न निबल सहाय। पवन जगावत आग ज्यों, दीपहिं देत बुझाय।।

उक्त पंक्तियों में शक्तिशाली और कमजोर के प्रति दुनिया के व्यवहार को हवा के व्यवहार से बताया गया है, जो आग को तो और तेज करती है और दीपक को बुझा देती है। दोनों को 'ज्यों' उपमा वाचक शब्द से जोड़ा गया है।

उदाहरण (2) जो पावै अति उच्च पद, ताको पतन निदान। ज्यों तपि-तपि मध्याहन लौं, असत होत है भान।।

प्रस्तुत काव्य – पंक्तियों में उच्च पद पर पहुँचकर नीचे आने के सामान्य कथन की पुष्टि सूर्य के दोपहर में तपकर शाम को अस्त होने से की गई है। दोनों को 'ज्यों' उपमावाचक शब्द से जोड़ा गया है।

8. विरोधाभास अलंकार

जहाँ पर विरोध न होने पर भी विरोध होने जैसा लगे, यानी कवि शब्दों का प्रयोग इस प्रकार करता है कि सुनने पर चीजों में विरोध महसूस हो, लेकिन जब अर्थ स्पष्ट होता है तो विरोध खत्म हो जाता है, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है। जैसे

तंत्री-नाद, कवित्त-रस, सरस राग रति-रंग। अनबूड़े बूड़े, तिरे, जे डूबे सब अंग।।

यहाँ आशय यह है कि आँखों का लावण्य मीठा लगता है। 'लुनाई' का शाब्दिक अर्थ है-लवणयुक्त अर्थात् खारा। खारापन यहाँ मीठा लग रहा है, यह एक विरोधाभास है, लेकिन 'लुनाई' का मतलब यहाँ सुंदरता के रूप में प्रकट होने से विरोध समाप्त हो गया है।

उदाहरण (2) विसमय यह गोदावरी, अमृतन के फल देते। केसव जीवन हार को, असेस दुख हर लेत।।

प्रस्तुत पंक्तियों में गोदावरी को 'विसमय' (जहर) बताया गया है, जो विरोध दिखाता है। परन्तु जब 'विस' का अर्थ 'जल' निकलता है तो विरोध समाप्त हो जाता है। अतः यह विरोधाभास अलंकार है।

RBSE Class 12 Hindi अलंकार अभ्यास-प्रश्न

RBSE Class 12 Hindi अलंकार वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. अलंकार की विशेषता है
(क) अलंकार काव्य की आत्मा है।
(ख) अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाते हैं।
(ग) अलंकार काव्य का अंतरंग तत्त्व है।
(घ) अलंकार के बिना काव्य असंभव है।
Answer: (ख) अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाते हैं।
In simple words: अलंकार कविता को और सुंदर बनाते हैं, जैसे गहने शरीर को सुंदर बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: अलंकार की मूल विशेषता पर केंद्रित रहें और समझें कि यह काव्य के बाहरी सौंदर्य को बढ़ाता है।

 

Question 2. अनुप्रास अलंकार का उदाहरण है
(क) पानी गए न ऊबरै, मोती, मानस, चून
(ख) कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय
(ग) मीठी लगै अँखियान लुनाई
(घ) भगवान भक्तों की भंयकर भूरि भीति भगाइये
Answer: (घ) भगवान भक्तों की भंयकर भूरि भीति भगाइये
In simple words: इस पंक्ति में 'भ' अक्षर बार-बार आया है, जिससे इसमें अनुप्रास अलंकार है।

🎯 Exam Tip: अनुप्रास अलंकार को पहचानने के लिए एक ही अक्षर की लगातार आवृत्ति पर ध्यान दें।

 

Question 3. 'विसमय यह गोदावरी, अमृतन के फल देत।' पंक्ति में अलंकार है-
(क) विरोधाभास
(ख) उत्प्रेक्षा
Answer: (क) विरोधाभास
In simple words: यहाँ 'विसमय' (जहर) और 'अमृत' (जीवन देने वाला) एक साथ कहे गए हैं, जो सुनने में विरोधाभास लगता है।

🎯 Exam Tip: विरोधाभास तब होता है जब दो विरोधी बातें एक साथ कही जाएँ, लेकिन असल में उनका कोई गहरा अर्थ होता है।

 

Question 5. निम्न में अर्थालंकार है –
(क) अनुप्रास
(ख) उपमा
(ग) श्लेष
(घ) यमक
Answer: (ख) उपमा
In simple words: उपमा अलंकार में शब्दों के अर्थ के आधार पर समानता दिखाई जाती है, इसलिए यह अर्थालंकार है।

🎯 Exam Tip: शब्दालंकार में शब्दों की सुंदरता होती है, जबकि अर्थालंकार में अर्थ की सुंदरता होती है।

 

Question 6. उपमा वाचक शब्द है –
(क) मिस
(ख) ज्यों
(ग) जैसे
(घ) उपर्युक्त सभी
Answer: (घ) उपर्युक्त सभी
In simple words: ये सभी शब्द किसी एक चीज़ की तुलना दूसरी चीज़ से करने के लिए इस्तेमाल होते हैं।

🎯 Exam Tip: वाचक शब्द वे होते हैं जो उपमा अलंकार में तुलना को स्पष्ट करते हैं; इन्हें याद रखना चाहिए।

 

Question 7. 'कालिंदी कुल कदम्ब की डारन।' पंक्ति में अलंकार है –
(क) अनुप्रास
(ख) यमक
(ग) श्लेष
(घ) उपमा
Answer: (क) अनुप्रास
In simple words: इस पंक्ति में 'क' अक्षर कई बार आया है, जिससे यहाँ अनुप्रास अलंकार है।

🎯 Exam Tip: अक्षर की आवृत्ति पर ध्यान दें, यह अनुप्रास अलंकार का सबसे सीधा पहचान चिह्न है।

RBSE Class 12 Hindi अलंकार अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. अलंकार की परिभाषा लिखिए।
Answer: काव्य की शोभा बढ़ाने वाले शब्दों को अलंकार कहते हैं। जिस प्रकार आभूषण शरीर की सुंदरता बढ़ाते हैं, वैसे ही अलंकार कविता को सुंदर बनाते हैं।
In simple words: अलंकार ऐसे शब्द हैं जो कविता को सुंदर बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: परिभाषा में 'शोभा बढ़ाने वाले' और 'काव्य' इन मुख्य शब्दों का प्रयोग करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. अलंकार कितने प्रकार के होते हैं?
Answer: अलंकार मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं - 1. शब्दालंकार तथा 2. अर्थालंकार। कुछ विद्वान उभयालंकार को भी एक प्रकार मानते हैं।
In simple words: अलंकार दो तरह के होते हैं: शब्दालंकार और अर्थालंकार।

🎯 Exam Tip: अलंकारों के मुख्य दो भेदों को याद रखना पर्याप्त है; 'उभयालंकार' का उल्लेख वैकल्पिक हो सकता है।

 

Question 3. अनुप्रास अलंकार का लक्षण बताइए।
Answer: जहाँ काव्य में एक वर्ण या अनेक वर्णों की एक बार या अनेक बार क्रम-सहित आवृत्ति होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। इससे कविता में विशेष सौंदर्य आता है।
In simple words: जब कविता में एक ही अक्षर बार-बार आता है, तो वह अनुप्रास अलंकार होता है।

🎯 Exam Tip: 'वर्णों की आवृत्ति' यह मुख्य शब्द है जिसे लक्षण बताते समय लिखना चाहिए।

 

Question 4. यमक अलंकार का उदाहरण दीजिए।
Answer: यमक अलंकार का एक उदाहरण है: “कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। वा खाये बौराय जग, या पाये बौराय।।” यहाँ 'कनक' शब्द दो बार आया है और दोनों बार इसके अर्थ अलग हैं - एक का अर्थ 'धतूरा' (जिसे खाने से लोग पागल हो जाते हैं) और दूसरे का अर्थ 'सोना' (जिसे पाकर लोग घमंड में पागल हो जाते हैं)।
In simple words: "कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय" यह यमक अलंकार का उदाहरण है, जहाँ एक 'कनक' का मतलब धतूरा और दूसरे 'कनक' का मतलब सोना है।

🎯 Exam Tip: यमक अलंकार के उदाहरण में एक ही शब्द का दोहराव और उसके अलग-अलग अर्थ स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए।

 

Question 6. यमक अलंकार का लक्षण तथा उदाहरण लिखिए।
Answer: जहाँ काव्य में एक या अनेक शब्दों की एक या अनेक बार आवृत्ति होती है और उनके अर्थ हर बार अलग-अलग होते हैं, वहाँ यमक अलंकार होता है। यह अलंकार शब्द के अर्थ बदलने से कविता में चमत्कार लाता है।
उदाहरण – “सारंग ने सारंग गह्यौ सारंग बोल्यौ आई। जो सारंग सारंग कहे, तो सारंग छुट्यो जाई ।।”
यहाँ 'सारंग' शब्द की अनेक बार आवृत्ति हुई है और उसके अर्थ क्रमशः मोर, सर्प, बादल, बोली या ध्वनि हैं। अतः यहाँ यमक अलंकार है।
In simple words: यमक अलंकार में एक शब्द कई बार आता है, लेकिन हर बार उसका अर्थ अलग होता है। जैसे 'सारंग' शब्द के अलग-अलग मतलब होते हैं जैसे मोर या बादल।

🎯 Exam Tip: यमक अलंकार में शब्द की आवृत्ति और उसके भिन्न अर्थों को स्पष्ट रूप से बताना आवश्यक है।

 

Question 7. श्लेष अलंकार की परिभाषा और उदाहरण दीजिए।
Answer: जहाँ एक ही शब्द अनेक अर्थों को प्रकट करता हुआ केवल एक बार प्रयुक्त होता है, वहाँ श्लेष अलंकार होता है। इस अलंकार में एक शब्द के भीतर कई अर्थ छिपे होते हैं। यथा- 'दक्षिण में रहकर भी मैं उत्तर का अभिलाषी हूँ।'
यहाँ 'उत्तर' शब्द का एक बार प्रयोग हुआ है, फिर भी इसके दो अर्थ निकलते हैं: 'पत्रोत्तर' (जवाब) तथा 'उत्तर दिशा'। अतः यहाँ श्लेष अलंकार है।
In simple words: श्लेष अलंकार वह है जहाँ एक ही शब्द के कई अर्थ निकलते हैं। जैसे 'उत्तर' शब्द का मतलब जवाब या दिशा हो सकता है।

🎯 Exam Tip: श्लेष अलंकार में एक शब्द के बहु-अर्थी होने पर जोर दें और यह बताएं कि वह शब्द एक ही बार आता है।

 

Question 8. कोकिल, केकी, कीर कुंजते हैं कानन में’-इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है? स्पष्ट कीजिए।
Answer: इस पंक्ति में अनुप्रास अलंकार है। जहाँ कविता में वर्णों की आवृत्ति से चमत्कार उत्पन्न किया जाता है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। इस पंक्ति में 'क' वर्ण की अनेक बार आवृत्ति हुई है, जो कविता को सुंदर बना रही है। अतः यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
In simple words: इस पंक्ति में 'क' अक्षर बार-बार आया है, इसलिए यह अनुप्रास अलंकार है।

🎯 Exam Tip: उदाहरण में किस वर्ण की आवृत्ति हो रही है, उसे स्पष्ट रूप से बताएं और अनुप्रास अलंकार की परिभाषा को जोड़ें।

 

Question 9. निम्नलिखित पंक्ति में उपस्थित अलंकार का नाम तथा लक्षण लिखिए 'जीवन को जीवन आधार जग जीवन है'।
Answer: इस पंक्ति में यमक अलंकार है। जहाँ एक शब्द की भिन्न-भिन्न अर्थों के साथ आवृत्ति हो, वहाँ यमक अलंकार होता है। उपर्युक्त पंक्ति में 'जीवन' शब्द तीन बार आया है। पहला 'जीवन' का अर्थ 'प्राणी', दूसरा 'जीवन' का अर्थ 'जीवित रहना' और तीसरा 'जीवन' का अर्थ 'जल' है। अतः यहाँ यमक अलंकार है।
In simple words: इस पंक्ति में 'जीवन' शब्द तीन बार आया है, और हर बार इसका अर्थ अलग है (जैसे प्राणी, जीवित रहना, जल), इसलिए यह यमक अलंकार है।

🎯 Exam Tip: यमक अलंकार में शब्द की आवृत्ति और प्रत्येक बार उसके अलग अर्थों को स्पष्ट रूप से बताना अनिवार्य है।

RBSE Class 12 Hindi अलंकार लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. उपमा तथा उत्प्रेक्षा अलंकारों का अन्तर समझाइए।
Answer: उपमा अलंकार में उपमेय (जिसकी तुलना की जाती है) को उपमान (जिससे तुलना की जाती है) के जैसा बताया जाता है। इसमें समानता दिखाने के लिए 'सा', 'सी', 'जैसे' जैसे शब्दों का प्रयोग होता है। वहीं, उत्प्रेक्षा अलंकार में उपमेय में उपमान होने की सिर्फ़ संभावना जताई जाती है, उसे उपमान मान लिया जाता है। इसमें 'मानो', 'जनु', 'मनु' जैसे कल्पना सूचक शब्दों का प्रयोग होता है। उपमा में तुलना होती है, जबकि उत्प्रेक्षा में कल्पना या संभावना। उदाहरण के लिए: उपमा: 'लघु तरणि हंसिनी-सी सुन्दर' - यहाँ 'तरणि' (छोटी नाव) को 'हंसिनी' के समान सुंदर कहा गया है। उत्प्रेक्षा: 'लघु तरणि मानो हंसिनी तिरती लहर पर' - यहाँ 'तरणि' में 'हंसिनी' के तैरने की संभावना व्यक्त की गई है, जहाँ 'मानो' शब्द संभावना दिखाता है।In simple words: उपमा अलंकार में हम दो चीजों को एक जैसा बताते हैं, जैसे 'राम शेर जैसा बहादुर है', जबकि उत्प्रेक्षा अलंकार में हम एक चीज को दूसरी चीज मान लेते हैं या उसकी कल्पना करते हैं, जैसे 'राम मानो शेर ही है'।

🎯 Exam Tip: To differentiate, remember that Upama shows similarity (जैसे, सा, सी), while Utpreksha shows a strong possibility or assumption (मानो, जनु, मनहुँ).

 

Question 2. रूपक अलंकार का लक्षण तथा उदाहरण लिखिए।
Answer: रूपक अलंकार वहाँ होता है जहाँ उपमेय (जिसकी तुलना हो) और उपमान (जिससे तुलना हो) में कोई अंतर नहीं दिखाया जाता। उन्हें एक ही मान लिया जाता है, जैसे वे एक ही चीज हों, और उपमेय को उपमान का ही रूप दे दिया जाता है। इस प्रकार, रूपक अलंकार में भेद को खत्म कर दिया जाता है और दोनों को अभिन्न बताया जाता है। यह अक्सर किसी गहरी समानता या गुण को दर्शाने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए: "अम्बर-पनघट में डुबो रही, तारा-घट उषा-नागरी।" इस पंक्ति में, आकाश (अम्बर) को पनघट, तारों (तारा) को घड़ा (घट) और सुबह (उषा) को चतुर स्त्री (नागरी) मान लिया गया है। यहाँ कोई तुलना नहीं बल्कि सीधा रूप है।In simple words: रूपक अलंकार में दो अलग-अलग चीजों को बिना किसी भेद के एक ही मान लिया जाता है।

🎯 Exam Tip: In Rupak Alankar, the words 'जैसे', 'सा', 'सी' are usually absent, as there is no comparison, but a direct identification.

 

Question 4. अनुप्रास तथा यमक अलंकार का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer: अनुप्रास अलंकार में काव्य में एक ही वर्ण (अक्षर) बार-बार आता है, जिससे सुन्दरता बढ़ती है। इसमें वर्णों की पुनरावृत्ति होती है, भले ही उनके स्वर अलग-अलग हों। यह ध्वनिगत सौंदर्य पर आधारित होता है। वहीं, यमक अलंकार में एक ही शब्द बार-बार आता है, लेकिन हर बार उसका अर्थ अलग होता है। यह शब्दों की पुनरावृत्ति है, जो हर बार नया अर्थ देती है। उदाहरण के लिए: अनुप्रास: 'लट लटकनि मनु मत्त मधुपगन मादक मधुहिं पिए।' - यहाँ 'म' और 'ट' वर्ण कई बार आए हैं। यमक: 'कर से कर कर्म ठगि जग में, पद से चल ऊँचा पद पाओ।' - यहाँ 'कर' शब्द दो बार आया है, एक बार 'हाथ' के लिए और दूसरी बार 'करना' क्रिया के लिए। इसी तरह 'पद' शब्द भी 'पैर' और 'स्थान' के लिए आया है।In simple words: अनुप्रास अलंकार में एक ही अक्षर बार-बार आता है, जबकि यमक अलंकार में एक ही शब्द बार-बार आता है लेकिन हर बार उसका मतलब बदल जाता है।

🎯 Exam Tip: Anupraas focuses on repeating *sounds* (वर्णों की आवृत्ति), while Yamak focuses on repeating *words* that have different meanings (शब्दों की आवृत्ति, भिन्न अर्थ).

 

Question 5. उपमा तथा रूपक अलंकार का अंतर समझाइए।
Answer: उपमा अलंकार में दो अलग-अलग चीजों (उपमेय और उपमान) के बीच उनके गुणों, स्वभाव या क्रियाओं के आधार पर समानता दिखाई जाती है। इसमें 'सा', 'सी', 'जैसे', 'समान' जैसे तुलनात्मक शब्दों का प्रयोग होता है। इसके विपरीत, रूपक अलंकार में उपमेय और उपमान को एक ही मान लिया जाता है, उनके बीच कोई अंतर नहीं दिखाया जाता। इसमें तुलना वाले शब्द नहीं होते, बल्कि सीधा आरोप होता है। दोनों ही अलंकारों में अप्रस्तुत वस्तु की मदद से प्रस्तुत वस्तु की शोभा बढ़ाई जाती है। उदाहरण के लिए: उपमा: 'कमल समान मृदुल पग तेरे' - यहाँ पैरों को कमल के समान कोमल बताया गया है। रूपक: 'चरण कमल' - यहाँ सीधे चरणों को कमल का रूप दे दिया गया है, कोई तुलना नहीं।In simple words: उपमा अलंकार दो चीजों को 'जैसा' बताती है, जबकि रूपक अलंकार सीधे-सीधे एक चीज को दूसरी चीज 'मान' लेता है।

🎯 Exam Tip: Look for comparison words (like 'similar to', 'like') in Upama and for direct identification (one thing *is* another) in Rupak.

 

Question 6. निम्नलिखित वाक्यों में प्रयुक्त अलंकारों का नाम बताते हुए उनके लक्षण लिखिए –
(क) 'पानी गये न ऊबरै, मोती मानुष चूने।'
(ख) 'माया-दीपक नर पतंग, भ्रमि-भ्रमि इवै पड़न्त।'
Answer:
(क) श्लेष अलंकार: इस पंक्ति में श्लेष अलंकार है। श्लेष अलंकार वहाँ होता है जहाँ एक शब्द का प्रयोग सिर्फ़ एक बार होता है, लेकिन उसके कई अर्थ निकलते हैं जो प्रसंग के अनुसार अलग-अलग होते हैं। इस पंक्ति में 'पानी' शब्द के तीन अर्थ हैं: चमक (मोती के लिए), प्रतिष्ठा (मनुष्य के लिए) और जल (चूने के लिए)। (ख) रूपक अलंकार: इस पंक्ति में रूपक अलंकार है। रूपक अलंकार में उपमेय (जिसकी तुलना हो) और उपमान (जिससे तुलना हो) में कोई अंतर नहीं माना जाता, उन्हें एक ही मान लिया जाता है। यहाँ माया को दीपक और मनुष्य को पतंगे का रूप दिया गया है, जिससे दोनों में अभेद स्थापित होता है।In simple words:
(क) श्लेष अलंकार: एक शब्द के कई मतलब निकलें, तो वह श्लेष अलंकार है।
(ख) रूपक अलंकार: जब एक चीज को दूसरी चीज का ही रूप दे दिया जाए, तो वह रूपक अलंकार है।

🎯 Exam Tip: For Shlesh, one word has multiple meanings relevant to the context. For Rupak, there's a direct identification without comparison.

 

Question 7. निम्रलिखित काव्य पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकारों का नाम लिखते हुए, उनके लक्षण लिखिए
(क) उदित उदय गिरि मंच पर, रघुवर बाल-पतंग। विकसे संत-सरोज सब, हरषे लोचन श्रृंग।।
(ख) निकसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाई।
Answer:
(क) रूपक अलंकार: इन पंक्तियों में रूपक अलंकार है। रूपक अलंकार वहाँ होता है जहाँ उपमेय और उपमान के बीच कोई अंतर नहीं दिखाया जाता, बल्कि उन्हें एक ही मान लिया जाता है। यहाँ 'उदयगिरि' को 'मंच', 'रघुवर' को 'बाल-सूर्य', 'संतों' को 'कमल' और 'लोचनों' को 'भौंरे' का रूप दिया गया है, जो सीधे आरोप का उदाहरण है। (ख) उत्प्रेक्षा अलंकार: इन पंक्तियों में उत्प्रेक्षा अलंकार है। उत्प्रेक्षा अलंकार तब होता है जब उपमेय में उपमान की संभावना व्यक्त की जाती है, भले ही उनमें कुछ भिन्नता हो। इसमें 'जनु', 'मानो', 'मनु' जैसे शब्दों का प्रयोग होता है जो संभावना को दर्शाते हैं।In simple words:
(क) रूपक अलंकार: यहाँ एक चीज को दूसरी चीज का रूप दिया गया है।
(ख) उत्प्रेक्षा अलंकार: यहाँ एक चीज में दूसरी चीज होने की संभावना बताई गई है।

🎯 Exam Tip: Look for direct identification in Rupak and words indicating possibility or assumption like 'मानो', 'जनु' in Utpreksha.

 

Question 8. यमक तथा श्लेष अलंकारों का अंतर सोदाहरण लिखिए।
Answer: यमक अलंकार में एक ही शब्द काव्य में बार-बार आता है, लेकिन हर बार उसका अर्थ अलग होता है। इससे काव्य में विशेष चमत्कार उत्पन्न होता है और वह अधिक प्रभावशाली बनता है। इसके विपरीत, श्लेष अलंकार में एक ही शब्द का प्रयोग केवल एक बार होता है, लेकिन उसके एक से अधिक अर्थ निकलते हैं जो प्रसंग के अनुसार होते हैं। उदाहरण के लिए: यमक अलंकार: 'नगन जड़ातीं थीं वे नगन जड़ाती हैं।' - यहाँ 'नगन' शब्द दो बार आया है। पहले 'नगन' का अर्थ है 'रत्नों से जड़ी हुई' और दूसरे 'नगन' का अर्थ है 'नग्न' (वस्त्रहीन)। श्लेष अलंकार: 'पानी गए न ऊबरै मोती मानुस चून।' - यहाँ 'पानी' शब्द एक ही बार आया है, लेकिन इसके तीन अर्थ हैं: 'चमक' (मोती के लिए), 'प्रतिष्ठा' (मनुष्य के लिए) और 'जल' (आटे के लिए)।In simple words: यमक में एक शब्द बार-बार आता है और हर बार उसका मतलब बदलता है। श्लेष में एक शब्द एक ही बार आता है, पर उसके कई मतलब होते हैं।

🎯 Exam Tip: Yamak involves repetition of the *same word* with *different meanings*. Shlesh involves a *single word* that has *multiple meanings* depending on the context.

 

Question 9. यमक एवं श्लेष अलंकारों का एक-एक उदाहरण लिखिए।
Answer:
यमक अलंकार का उदाहरण: 'तीन बेर खाती थी, वे तीन बेर खाती हैं।' इस पंक्ति में 'तीन बेर' शब्द का प्रयोग दो बार हुआ है। पहले 'तीन बेर' का अर्थ है 'तीन बार' (समय) और दूसरे 'तीन बेर' का अर्थ है 'तीन बेर के फल'। यह दोनों अर्थ अलग-अलग संदर्भों में प्रयुक्त हुए हैं। श्लेष अलंकार का उदाहरण: 'रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती मानुस चून।' इस दोहे में 'पानी' शब्द एक ही बार आया है, लेकिन इसके तीन अर्थ हैं: 'चमक' (मोती के लिए), 'प्रतिष्ठा' (मनुष्य के लिए) और 'जल' (आटे के लिए)। एक शब्द कई अर्थों को दर्शाता है।In simple words:
यमक: 'तीन बेर खाती थी, वे तीन बेर खाती हैं।' (यहाँ 'बेर' का मतलब समय और फल दोनों है)।
श्लेष: 'पानी गए न ऊबरै, मोती मानुस चून।' (यहाँ 'पानी' का मतलब चमक, इज़्ज़त और जल है)।

🎯 Exam Tip: Always provide a clear example for each अलंकार asked, and if definitions are also requested, ensure they are distinct.

 

Question 10. निम्नलिखित काव्यांशों में प्रयुक्त अलंकारों के नाम बताइए -
(क) निकल रही थी कर्म वेदना करुणा विकल कहानी-सी।
(ख) चरण कमल बंद हरिराई।
(ग) ताड़ वृक्ष मानो छूने चला अम्बर तल को।
(घ) नील कमल सी आँखें उसकी जाने क्या-क्या कह गईं।
(ङ) मैया मैं तो चन्द्र खिलौना लैहों।
(च) पाकर प्रथम प्रेमभरी पाती प्यारी प्रियतम की।
Answer:
(क) उपमा अलंकार: इस पंक्ति में 'कहानी-सी' शब्द का प्रयोग हुआ है, जो वेदना और करुणा की तुलना एक कहानी से कर रहा है। (ख) रूपक अलंकार: यहाँ 'चरण' (उपमेय) को सीधे 'कमल' (उपमान) का रूप दिया गया है, कोई अंतर नहीं दिखाया गया। (ग) उत्प्रेक्षा अलंकार: इस पंक्ति में 'मानो' शब्द का प्रयोग हुआ है, जो ताड़ वृक्ष द्वारा आकाश को छूने की संभावना व्यक्त कर रहा है, जैसे वह सच में छूने जा रहा हो। (घ) उपमा अलंकार: 'नील कमल सी' शब्द आँखों की तुलना नील कमल से कर रहा है, समानता दिखाई गई है। (ङ) रूपक अलंकार: 'चन्द्र खिलौना' में चन्द्रमा (उपमेय) को सीधे खिलौना (उपमान) का रूप दिया गया है। (च) अनुप्रास अलंकार: इस पंक्ति में 'प' वर्ण की आवृत्ति कई बार हुई है ('पाकर', 'प्रथम', 'प्रेमभरी', 'पाती', 'प्यारी', 'प्रियतम'), जिससे काव्य में सुन्दरता आई है।In simple words:
(क) उपमा अलंकार: यहाँ दर्द को एक कहानी के जैसा बताया है।
(ख) रूपक अलंकार: यहाँ पैरों को सीधे कमल का फूल मान लिया है।
(ग) उत्प्रेक्षा अलंकार: यहाँ पेड़ को आकाश छूने की कल्पना की गई है।
(घ) उपमा अलंकार: यहाँ आँखों को नीले कमल के जैसा बताया है।
(ङ) रूपक अलंकार: यहाँ चाँद को ही खिलौना मान लिया है।
(च) अनुप्रास अलंकार: यहाँ 'प' अक्षर बार-बार आया है।

🎯 Exam Tip: Identify keywords like 'सी', 'जैसे' for Upama, 'मानो', 'जनु' for Utpreksha, and look for direct identification in Rupak. For Anupraas, identify repeating sounds.

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