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Detailed Chapter 14 राष्ट्रीय आन्दोलन के उदारवादी RBSE Solutions for Class 11 Political Science
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Class 11 Political Science Chapter 14 राष्ट्रीय आन्दोलन के उदारवादी RBSE Solutions PDF
Rbse Class 11 Political Science Chapter 14 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
Rbse Class 11 Political Science Chapter 14 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. आराम कुर्सी के राजनीतिज्ञ किन्हें समझा जाता था?
Answer: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के उदारवादी नेताओं को 'आराम कुर्सी के राजनीतिज्ञ' समझा जाता था. ये नेता अक्सर ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग करके धीरे-धीरे सुधार लाने की कोशिश करते थे.
In simple words: उन नेताओं को 'आराम कुर्सी के नेता' कहा जाता था जो शांतिपूर्ण तरीके से काम करते थे और जल्दी बदलाव नहीं चाहते थे.
🎯 Exam Tip: उदारवादी नेताओं की पहचान और उनकी कार्यप्रणाली को समझना इस प्रश्न के उत्तर के लिए महत्वपूर्ण है.
Question 2. गोपाल कृष्ण गोखले का संक्षिप्त जीवन परिचय बताइए।
Answer: उदारवादी नेता गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 1866 ई. में बम्बई राज्य के कोल्हापुर जिले में हुआ था. महात्मा गाँधी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे, जो उनकी सोच पर गोखले के गहरे प्रभाव को दर्शाता है.
In simple words: गोपाल कृष्ण गोखले एक नरमपंथी नेता थे, जिनका जन्म 1866 में कोल्हापुर में हुआ था. गाँधीजी उन्हें अपना गुरु मानते थे.
🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण नेताओं के जन्म स्थान, वर्ष और उनके उपनाम जैसे प्रमुख विवरणों को हमेशा याद रखें.
Question 4. गाँधीजी गोखले को किस नाम से पुकारते थे?
Answer: गाँधीजी गोखले को पुण्यात्मा गोखले के नाम से पुकारते थे. यह नाम गोखले के नेक और निस्वार्थ स्वभाव को दर्शाता था.
In simple words: गाँधीजी गोखले को 'पुण्यात्मा' कहते थे, जिसका मतलब एक अच्छी आत्मा वाला इंसान होता है.
🎯 Exam Tip: ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के बीच संबंधों और एक-दूसरे को दिए गए उपनामों पर ध्यान दें, क्योंकि वे अक्सर उनकी भूमिका और सम्मान को दर्शाते हैं.
Question 5. गोखले की मृत्यु पर लार्ड कर्जन ने लार्ड सभा में क्या कहा?
Answer: लॉर्ड कर्जन ने गोखले की मृत्यु पर लॉर्ड सभा में कहा था कि "उन्हें कभी किसी भी राष्ट्र का ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसमें उनसे ज्यादा संसदीय प्रतिभा हो.” यह उनके असाधारण राजनीतिक कौशल का प्रमाण था.
In simple words: लॉर्ड कर्जन ने गोखले की मौत पर कहा कि उन्हें गोखले जैसा होशियार और काबिल नेता कहीं नहीं मिला.
🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तियों द्वारा दिए गए प्रसिद्ध उद्धरणों को याद रखना चाहिए, क्योंकि वे अक्सर उनकी महानता को दर्शाते हैं.
Question 6. गोखले क्रमिक सुधारों में विश्वास क्यों रखते थे?
Answer: गोखले क्रमिक सुधारों में विश्वास रखते थे क्योंकि उनका मानना था कि स्वराज्य के लक्ष्य को धीरे-धीरे सुधारों के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है. वे तेजी से बदलाव की बजाय स्थिर और संगठित विकास को प्राथमिकता देते थे.
In simple words: गोखले मानते थे कि देश को आज़ादी धीरे-धीरे सुधार करके ही मिल सकती है, एकदम से नहीं.
🎯 Exam Tip: उदारवादी नेताओं की विचारधारा को समझने के लिए उनके 'क्रमिक सुधारों' पर जोर को स्पष्ट करें.
Question 7. गोखले बहिष्कार के समर्थक क्यों नहीं थे?
Answer: गोखले बहिष्कार के समर्थक नहीं थे क्योंकि उनका मानना था कि बहिष्कार का विचार बहुत उग्र था, जिसमें बदले की भावना झलकती थी. वे शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों में विश्वास रखते थे.
In simple words: गोखले बहिष्कार का साथ नहीं देते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि यह तरीका बहुत गुस्सा और बदला लेने वाला था.
🎯 Exam Tip: उदारवादी और अतिवादी नेताओं की कार्यप्रणालियों में अंतर को स्पष्ट करने के लिए ऐसे महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान दें.
Question 8. तिलक के अनुसार राजनीतिक स्वराज्य से क्या तात्पर्य है?
Answer: तिलक के अनुसार राजनीतिक स्वराज्य का अर्थ है कि अपने देश में अपना शासन होना चाहिए, यानी हर राष्ट्र को अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए. उनका प्रसिद्ध नारा था "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा."
In simple words: तिलक के लिए राजनीतिक स्वराज्य का मतलब था कि हर देश को खुद पर राज करने की आज़ादी मिलनी चाहिए.
🎯 Exam Tip: 'स्वराज्य' जैसे प्रमुख शब्दों की परिभाषा को संबंधित नेता के दृष्टिकोण के अनुसार स्पष्ट रूप से समझाएँ.
Question 9. तिलक ने स्वराज्य प्राप्ति के कौन-से चार साधन बताए।
Answer: तिलक ने स्वराज्य प्राप्ति के लिए चार साधन बताए थे:
1. निष्क्रिय प्रतिरोध
2. स्वदेशी
3. बहिष्कार
4. राष्ट्रीय शिक्षा
ये सभी साधन मिलकर भारतीयों को आत्मनिर्भर बनाने और ब्रिटिश शासन का विरोध करने में मदद करते थे.
In simple words: तिलक ने स्वराज्य पाने के लिए चार रास्ते बताए थे: चुपचाप विरोध करना, अपने देश का सामान अपनाना, विदेशी सामान छोड़ना और राष्ट्रीय शिक्षा पर जोर देना.
🎯 Exam Tip: तिलक जैसे अतिवादी नेताओं द्वारा सुझाए गए साधनों की सूची को सही क्रम और स्पष्टता के साथ प्रस्तुत करें.
Question 10. तिलक के अनुसार स्वदेशी से क्या अभिप्राय था?
Answer: तिलक के अनुसार स्वदेशी का अर्थ देश प्रेम का वह प्रतीक था जो पूरे राष्ट्रीय जीवन को फिर से जगाने का आंदोलन बन गया था. उनका मानना था कि यह एकमात्र तरीका है जिससे अंग्रेजों से मुक्ति मिल सकती है और देश को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है.
In simple words: तिलक मानते थे कि स्वदेशी का मतलब अपने देश से प्यार करना और अपना सामान इस्तेमाल करना है, जिससे हम अंग्रेजों से आज़ाद हो सकें.
🎯 Exam Tip: स्वदेशी की अवधारणा को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय आंदोलन और देशप्रेम के प्रतीक के रूप में स्पष्ट करें.
Question 11. तिलक के अनुसार आध्यात्मिक स्वराज्य से क्या अभिप्राय है?
Answer: तिलक के अनुसार आध्यात्मिक स्वराज्य का अर्थ वह स्वराज्य है जो व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास में सहायक हो. यह स्वराज्य व्यक्ति को नैतिक और आंतरिक रूप से मजबूत बनाता है.
In simple words: तिलक के लिए आध्यात्मिक स्वराज्य का मतलब था वह आजादी जिससे इंसान का मन और आत्मा बेहतर बन सकें.
🎯 Exam Tip: तिलक के 'स्वराज्य' की अवधारणा को समझाते समय, इसके आध्यात्मिक और राजनीतिक दोनों पहलुओं को उजागर करना महत्वपूर्ण है.
Question 12. भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रमुख नायक कौन थे?
Answer: भारत में क्रांतिकारी आंदोलन के प्रमुख नायक सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुभाष चंद्र बोस थे. इन नेताओं ने देश की आजादी के लिए उग्र और साहसी तरीके अपनाए.
In simple words: भारत में आजादी की लड़ाई के बड़े क्रांतिकारी नेता भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुभाष चंद्र बोस थे.
🎯 Exam Tip: क्रांतिकारी आंदोलन के प्रमुख नेताओं के नाम याद रखें और उनकी भूमिका को संक्षेप में स्पष्ट करें.
Question 13. क्रान्तिकारियों के साधन व साध्य के सम्बन्ध में क्या विचार थे?
Answer: क्रांतिकारियों का मानना था कि यदि लक्ष्य श्रेष्ठ है, तो उसे प्राप्त करने के साधनों की श्रेष्ठता पर विचार करना जरूरी नहीं है. उन्होंने लक्ष्य या साध्य को साधनों से अधिक महत्वपूर्ण माना. यह उनकी विचारधारा का एक प्रमुख हिस्सा था.
In simple words: क्रांतिकारियों का मानना था कि अगर मकसद अच्छा है, तो उसे हासिल करने के लिए इस्तेमाल किए गए तरीके चाहे जैसे भी हों, फर्क नहीं पड़ता.
🎯 Exam Tip: क्रांतिकारियों की विचारधारा में 'साध्य' और 'साधन' के बीच के संबंध को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है, खासकर उनके उद्देश्यों की प्राथमिकता को उजागर करते हुए.
Question 14. क्रान्तिकारियों का लक्ष्य क्या था?
Answer: क्रांतिकारियों का मुख्य लक्ष्य भारतीयों को विदेशी शासन से मुक्त कराना था. वे भारत को पूरी तरह से आजाद देखना चाहते थे और इसके लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे.
In simple words: क्रांतिकारियों का सबसे बड़ा मकसद था भारतीयों को अंग्रेजों के राज से आज़ाद कराना.
🎯 Exam Tip: क्रांतिकारी आंदोलन के प्राथमिक उद्देश्य को स्पष्ट और संक्षेप में बताएँ.
Question 1. क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए छापे मारकर धन प्राप्त करना।
Answer: क्रांतिकारी आंदोलन के लिए धन प्राप्त करने के लिए छापे मारकर धन इकट्ठा किया जाता था. यह तरीका उनके संचालन और गतिविधियों को चलाने के लिए आवश्यक था, खासकर हथियार खरीदने जैसे खर्चों के लिए.
In simple words: क्रांतिकारी आंदोलन के लिए पैसे जुटाने हेतु छापे मारे जाते थे ताकि उनके काम चलते रहें.
🎯 Exam Tip: क्रांतिकारी गतिविधियों के वित्तपोषण के तरीकों को स्पष्ट करें.
Rbse Class 11 Political Science Chapter 14 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. उदारवादियों की कार्य प्रणाली समझाइए।
Answer: उदारवादियों की कार्य प्रणाली निम्नलिखित थी:
1. **सुस्त सुधारों के लिए आंदोलन:** उदारवादी राजनीतिक क्षेत्र में सुधार चाहते थे और मानते थे कि ब्रिटिश सरकार के सहयोग से भारत का क्रमिक विकास संभव है. वे धीरे-धीरे बदलाव लाने में विश्वास रखते थे.
2. **संवैधानिक सुधारों में विश्वास:** उदारवादियों को शांतिपूर्ण और संवैधानिक साधनों पर पूरा भरोसा था. वे अपनी माँगें विनम्र और शिष्ट भाषा में प्रार्थना-पत्रों, स्मृति-पत्रों और प्रतिनिधिमंडलों के माध्यम से सरकार के सामने प्रस्तुत करते थे, और उन्हें स्वीकार करने का आग्रह करते थे. यह तरीका उनकी न्यायप्रियता में विश्वास को दर्शाता था.
3. **ब्रिटिश सरकार की न्यायप्रियता में विश्वास:** उदारवादी ब्रिटिश शासन, सभ्यता और संस्कृति में विश्वास करते थे. उनका मानना था कि ब्रिटिश शासन ने शिक्षा, यातायात और संचार के साधनों का भारत में विकास करके इसे आधुनिक युग में प्रवेश कराया है. वे ब्रिटिश सरकार की न्यायप्रियता में दृढ़ विश्वास रखते थे.
In simple words: उदारवादी धीरे-धीरे बदलाव चाहते थे. वे सरकार से मिलकर, चिट्ठियां लिखकर और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बातें मनवाने की कोशिश करते थे. उन्हें ब्रिटिश सरकार के न्याय पर भरोसा था.
🎯 Exam Tip: उदारवादियों की कार्यप्रणाली को समझाते समय, उनके शांतिपूर्ण साधनों, संवैधानिक तरीकों और ब्रिटिश शासन की न्यायप्रियता में विश्वास पर जोर दें.
Question 2. उदारवादियों का ब्रिटिश शासन प्रणाली के सम्बन्ध में क्या दृष्टिकोण था?
Answer: उदारवादियों का ब्रिटिश शासन प्रणाली के संबंध में यह दृष्टिकोण था कि ब्रिटिश शासन भारत के लिए एक वरदान है. वे मानते थे कि ब्रिटिश सरकार के सहयोग और सहायता से भारत का धीरे-धीरे विकास संभव है. उदारवादी नेता राष्ट्रवादी होने के साथ-साथ ब्रिटिश शासन के प्रति कृतज्ञता भी रखते थे. यह व्यवहार उनकी पश्चिमी शिक्षा का परिणाम था. उदारवादियों का विश्वास था कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ बल प्रयोग करने या दबाव बढ़ाने से प्रतिक्रिया होगी और लोगों के साथ अधिक कठोरता से व्यवहार किया जाएगा, जिससे जनता की परेशानी बढ़ जाएगी. उदारवादी ब्रिटिश साम्राज्य से पूरी तरह से मुक्त नहीं होना चाहते थे. वे भारत को साम्राज्य के अधीन एक सम्मानित देश के रूप में देखना चाहते थे. वे भारतीयों द्वारा चलाए जाने वाले शासन के लिए सभी प्रकार के संस्थागत, राजनीतिक और आर्थिक सुधारों के प्रबल पक्षधर थे. उनका अंतिम लक्ष्य पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करना नहीं, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासन प्राप्त करना था. वे भारत के क्रमिक विकास के लिए संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों का समर्थन करते थे.
In simple words: उदारवादी सोचते थे कि ब्रिटिश सरकार भारत के लिए अच्छी है और उसकी मदद से ही देश धीरे-धीरे आगे बढ़ सकता है. वे पूरी आज़ादी नहीं, बल्कि ब्रिटिश राज में ही अपना शासन चाहते थे.
🎯 Exam Tip: उदारवादियों के ब्रिटिश शासन के प्रति दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के लिए उनके 'वरदान' मानने, क्रमिक विकास के विश्वास और स्वशासन के लक्ष्य पर जोर दें, न कि पूर्ण स्वतंत्रता पर.
Question 4. गोखले की स्वशासन की धारणा समझाइए।
Answer: गोपाल कृष्ण गोखले एक उदारवादी राजनेता थे जो क्रमिक सुधारों के मार्ग को अपनाने में विश्वास करते थे. इन सुधारों का अंतिम लक्ष्य भारत के लिए स्वशासन की प्राप्ति था. गोखले का मानना था कि अंग्रेजी नौकरशाही से भारत के प्रशासन में जो आर्थिक और अन्य दोष आ गए हैं, उनका समाधान स्वशासन के माध्यम से ही हो सकता है. सन् 1905 में बनारस में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में गोखले ने अध्यक्षीय भाषण देते हुए कहा कि "कांग्रेस का लक्ष्य यह है कि भारत, भारतीयों के हितों को ध्यान में रखते हुए शासित होना चाहिए. एक निश्चित समयावधि में भारत में ऐसी सरकार गठित हो जानी चाहिए, जैसा कि ब्रिटिश साम्राज्य की अन्य स्वशासित उपनिवेशों की सरकारें हैं." उन्होंने एक से अधिक बार स्पष्ट किया कि भारत को यह स्थिति ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत ही प्राप्त होनी चाहिए. उनका लक्ष्य ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत अधिराज्य की स्थिति प्राप्त करना था, जिससे भारत को अपनी पहचान और अधिकार मिल सकें.
In simple words: गोखले स्वशासन चाहते थे, जिसका मतलब था कि भारत के लोग अपने देश पर खुद शासन करें, लेकिन ब्रिटिश राज के अंदर ही. उनका मानना था कि धीरे-धीरे सुधार करके ही यह संभव है.
🎯 Exam Tip: गोखले की स्वशासन की धारणा को 'अधिराज्य स्थिति' (dominion status) के रूप में स्पष्ट करें, न कि पूर्ण स्वतंत्रता के रूप में.
Question 5. सत्ता के विकेन्द्रीकरण के सन्दर्भ में गोखले के विचार बताइए।
Answer: गोपालकृष्ण गोखले सत्ता के केंद्रीकरण के घोर विरोधी थे और विकेंद्रीकरण चाहते थे. उनका मत था कि सत्ता का केंद्रीकरण प्रशासनिक मनमानी और जनता के कष्टों को बढ़ाता है. इसलिए, भारतीयों को उनके अधिकार तभी मिल सकते हैं जब अंग्रेज सरकार सत्ता के विकेंद्रीकरण की नीति अपनाए. सत्ता के विकेंद्रीकरण हेतु गोखले ने निम्नलिखित सुझाव दिए:
• सत्ता की सबसे अच्छी इकाई पंचायतों के रूप में होनी चाहिए. प्रशासन के सबसे निचले स्तर पर ग्राम पंचायतों को शासन संबंधी पर्याप्त अधिकार दिए जाने चाहिए.
• प्रशासन के मध्य स्तर पर जिला परिषदों का गठन होना चाहिए.
• शिखर पर पुनर्गठित विधान परिषदें होनी चाहिए. ये सभी सुझाव स्थानीय स्तर पर अधिक शक्ति प्रदान करने के लिए थे.
In simple words: गोखले चाहते थे कि सारी ताकत एक जगह न रहे, बल्कि उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा जाए, जैसे गाँव की पंचायतें और जिला परिषदें. उनका मानना था कि इससे लोगों की परेशानी कम होगी.
🎯 Exam Tip: सत्ता के विकेंद्रीकरण के लिए गोखले के सुझावों को क्रमबद्ध और स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध करें, जिससे उनके प्रशासनिक सुधारों का दृष्टिकोण सामने आए.
Question 6. स्वदेशी व बहिष्कार के सन्दर्भ में गोखले के विचार बताइए।
Answer: गोपाल कृष्ण गोखले मूल रूप से रचनात्मक राजनीति के पक्षधर थे. वे स्वदेशी की भावना को देशभक्ति का प्रतीक मानते थे. उनके लिए स्वदेशी केवल एक आर्थिक हथियार नहीं था, बल्कि इसमें जनता की आत्मनिर्भरता की इच्छा और आत्मसम्मान की भावना की सकारात्मक अभिव्यक्ति भी निहित थी. वे स्वदेशी के आर्थिक पक्ष से भी सहमत थे. उनका मत था कि स्वदेशी के माध्यम से ही भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त होगा और भारतीयों में ऐसी भावना जागृत होगी कि वे एक-दूसरे की आर्थिक समस्याओं का समाधान करने में सहयोग करें. स्वदेशी की भावना का यह मौलिक पक्ष आत्मत्याग के नैतिक आदर्श का ही आर्थिक रूपांतरण था. गोखले स्वदेशी के रचनात्मक पक्ष से सहमत होते हुए भी उसके नकारात्मक पक्ष 'बहिष्कार' से सहमत नहीं थे. बहिष्कार का विचार उनके मत में उग्र विचार था, जो अपने आप में ही प्रतिशोध की भावना का संदेश देता था. गोखले का मत था कि 'विदेशी' का परित्याग 'स्वदेशी' को अपनाने का एक सहज परिणाम हो सकता है, किन्तु बहिष्कार स्वदेशी के प्रति समर्पण का सहज परिणाम नहीं, बल्कि एक नकारात्मक दृष्टिकोण है. उन्होंने आर्थिक बहिष्कार की तरह सरकारी नौकरियों के बहिष्कार के प्रस्ताव को भी अव्यावहारिक माना.
In simple words: गोखले स्वदेशी का समर्थन करते थे क्योंकि यह देशप्रेम और आत्मनिर्भरता को बढ़ाता था. लेकिन वे बहिष्कार के खिलाफ थे क्योंकि उन्हें यह तरीका बहुत गुस्सा और बदला लेने वाला लगता था.
🎯 Exam Tip: गोखले के स्वदेशी और बहिष्कार पर विचारों को अलग-अलग स्पष्ट करें, खासकर यह बताते हुए कि वे स्वदेशी के सकारात्मक पहलुओं को स्वीकार करते थे, लेकिन बहिष्कार के नकारात्मक या उग्रवादी पहलू को अस्वीकार करते थे.
Question 7. अतिवादियों की कार्य प्रणाली समझाइए।
Answer: अतिवादियों की कार्य प्रणाली इस धारणा पर आधारित थी कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए संवैधानिक साधन पर्याप्त नहीं हैं. स्वतंत्रता के लिए उग्र आंदोलन आवश्यक है. उन्होंने क्रमिक सुधारों के बजाय पूर्ण स्वराज्य की मांग की और स्वराज्य को अपना उद्देश्य निश्चित करते हुए अपनी नीतियों को परिभाषित किया. अतिवादी स्वराज्य को अधिकारपूर्वक प्राप्त करना चाहते थे और इसकी प्राप्ति के लिए उन्होंने उग्र पद्धति का प्रयोग किया, जिसमें बहिष्कार, स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा जैसे साधनों का उपयोग किया गया.
In simple words: अतिवादी मानते थे कि अंग्रेजों से आज़ादी पाने के लिए शांतिपूर्ण तरीके काम नहीं करेंगे. उन्हें तेज़ी से और कड़े कदम उठाने पड़ेंगे, जैसे आंदोलन और प्रदर्शन.
Question 8. अतिवादियों के कार्यक्रम को बतलाइए।
Answer: स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख अतिवादी नेता बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल थे. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के 1906 से 1919 तक के काल को अतिवादी काल कहा जाता है. अतिवादी भारत में ब्रिटिश शासन को बनाए रखने के एकदम खिलाफ थे. वे भारतीयता पर आधारित स्वराज्य और ब्रिटेन से जल्द से जल्द संबंध विच्छेद के पक्ष में थे. अतिवादियों का कार्यक्रम बहिष्कार, स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा था. वे एक योजनाबद्ध पद्धति और विशेष साधनों का प्रयोग करके आगे बढ़ना चाहते थे. अतिवादियों ने राष्ट्रीय शिक्षा और सत्याग्रह पर भी जोर दिया. उनके द्वारा अपने ही देश में बने माल पर जोर देने से भारतीय उद्योगों को प्रोत्साहन मिला. अतिवादी स्वावलंबन और आत्म-उत्थान का मार्ग अपनाते हुए ब्रिटिश साम्राज्य का विरोध करना चाहते थे. अतिवादियों ने राष्ट्रीय आंदोलन का आधार विस्तृत करते हुए अपना संदेश देश के एक बड़े वर्ग तक पहुँचाया. उन्होंने भारतीयों के मन से अंग्रेज जाति की अजेयता और शक्तिशाली होने का गलत भ्रम समाप्त कर दिया.
In simple words: अतिवादियों के नेताओं में तिलक, लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल थे. उनके मुख्य काम थे विदेशी चीज़ों का बहिष्कार करना, अपने देश का सामान अपनाना और लोगों को राष्ट्रीय शिक्षा देना, ताकि भारत आज़ाद हो सके.
🎯 Exam Tip: अतिवादियों के प्रमुख नेताओं और उनके मुख्य कार्यक्रमों (बहिष्कार, स्वदेशी, राष्ट्रीय शिक्षा) को सूचीबद्ध करें, जिससे उनकी आंदोलन रणनीति स्पष्ट हो.
Question 9. तिलक के जीवन परिचय पर प्रकाश डालिए।
Answer: बाल गंगाधर तिलक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में अतिवादी विचारधारा के समर्थक व्यक्ति थे. इनका जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र राज्य के कोंकण जिले के रत्नागिरी में हुआ था. इन्होंने छात्र जीवन में ही देश की स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था. इन्होंने अपने राजनीतिक चिंतन का विषय भारत के लिए स्वराज्य प्राप्ति को बनाया और प्रसिद्ध नारा दिया कि "स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा.” स्वराज्य को एक नया लक्ष्य प्रदान करने वाले 'केसरी' और 'मराठा' समाचार पत्रों के प्रकाशक, भारतीय राष्ट्रवाद के महान ऋषि, बाल गंगाधर तिलक का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में अमूल्य योगदान रहा है. तिलक ने भारत के राष्ट्रीय आंदोलन को भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान पर खड़ा किया. इसके लिए उन्होंने गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव प्रारंभ किए. तिलक ने स्वराज्य के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और निष्क्रिय प्रतिरोध जैसे साधन राष्ट्र को दिए. तिलक आधुनिक भारत के प्रथम सर्वाधिक प्रभावशाली और लोकप्रिय राष्ट्रीय नेता थे. उन्होंने उग्रवादी साधनों के नए युग की शुरुआत की, जिससे लोगों में आजादी की भावना और मजबूत हुई.
In simple words: बाल गंगाधर तिलक का जन्म 1856 में रत्नागिरी में हुआ था. वह एक बड़े नेता थे जिन्होंने "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है" का नारा दिया. उन्होंने गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव शुरू किए और स्वदेशी, बहिष्कार व राष्ट्रीय शिक्षा पर जोर दिया.
🎯 Exam Tip: बाल गंगाधर तिलक के जीवन परिचय में उनके जन्म, प्रमुख नारों, योगदान (केसरी, मराठा, उत्सव) और स्वराज्य प्राप्ति के लिए अपनाए गए साधनों को शामिल करें.
Rbse Class 11 Political Science Chapter 14 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. तिलक के राजनीतिक दर्शन को समझाइये।
Answer: तिलक के राजनीतिक दर्शन को निम्नलिखित बिंदुओं के तहत समझा जा सकता है:
1. **व्यक्ति की स्वतंत्रता संबंधी विचार:** तिलक ने व्यक्ति की स्वतंत्रता को वेदान्त के अनुसार देखा. उन्होंने स्वतंत्रता को आत्मविकास के एक भावनात्मक साधन के रूप में स्वीकार किया. उनकी दृष्टि से स्वतंत्रता व्यक्ति के पूर्ण नैतिक विकास तथा ईश्वर से संबंधित अपनी हितकारी अवधारणा को अपने राजनीतिक चिंतन का आधार बनाया.
2. **पाश्चात्य राजनीतिक एवं भौतिकवादी दर्शन से असहमति:** तिलक पश्चिमी जगत के विभिन्न भौतिक सिद्धांतों से असहमत थे. उनका मत था कि ये सभी सिद्धांत भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक परंपरा के अनुरूप नहीं हैं.
3. **साधन संबंधी विचार:** तिलक की दृष्टि में स्वराज्य की प्राप्ति एक पवित्र लक्ष्य थी. भारत की तत्कालीन परिस्थितियों के संदर्भ में उन्होंने इसे प्राप्त करने के लिए गरमपंथी राजनीतिक साधन अपनाए, जिन्हें 'खुले राजनीतिक साधन' भी कहा जाता है. तिलक ने प्रमुख रूप से स्वराज्य प्राप्ति के लिए चार साधनों-स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और निष्क्रिय प्रतिरोध-को अधिकृत किया. तिलक का विश्वास था कि इनकी मदद से भारतीय जनता में ब्रिटिश शासन के प्रति भय समाप्त किया जा सकता था और उन्हें बलिदान के लिए प्रेरित करके स्वराज्य प्राप्त किया जा सकता था.
4. **प्राचीन भारत के गौरव से प्रभावित राष्ट्रवाद:** भारतीय राष्ट्रवाद को एक निश्चित व मूर्त अवधारणा बनाने का श्रेय तिलक को दिया जा सकता है. तिलक राष्ट्रवाद को भारतीय परंपराओं, भावनाओं एवं परिस्थितियों के अनुरूप ही विकसित करना चाहते थे. तिलक 'स्वदेशी राष्ट्रवाद' के समर्थक थे, जो भारतीय संस्कृति और विरासत को महत्व देता था.
5. **राष्ट्रीयता, एकता एवं सांप्रदायिक सद्भाव संबंधी विचार:** तिलक ने हिंदू-मुस्लिम एकता तथा सांप्रदायिक सद्भाव की नीति का समर्थन किया. वे 'भारतीय राष्ट्रवाद' का विकास करना चाहते थे. इस उद्देश्य से तिलक ने भारत के सभी धार्मिक, सांस्कृतिक एवं भाषायी समुदायों के बीच राष्ट्रीय एकता के संस्कार को विकसित करने तथा उसे अटूट बनाने का प्रयत्न किया.
6. **स्वराज्य संबंधी विचार:** तिलक के अनुसार स्वराज्य मानव के सर्वांगीण विकास एवं उत्थान में सहायक है. तिलक ने स्वराज्य के दो प्रमुख रूप-आध्यात्मिक स्वराज्य और राजनीतिक स्वराज्य-के बारे में बताया है. जहाँ आध्यात्मिक स्वराज्य व्यक्ति के आध्यात्मिक उत्थान में सहायक है, वहीं राजनीतिक स्वराज्य उसके लौकिक उत्थान में सहायक होता है.
ब्रिटिश शासन की स्थापना से भारत में जीवन के सभी क्षेत्रों में निरंतर पतन हो रहा था. इस स्थिति से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय भारतीयों द्वारा पुनः राजनीतिक स्वराज्य प्राप्त करना था. इसलिए तिलक ने अपने अटूट संकल्प को दोहराते हुए, ब्रिटिश सरकार को चुनौती के स्वर में कहा, "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा."
In simple words: तिलक का राजनीतिक सोच था कि हर इंसान को आज़ाद होना चाहिए, और यह आज़ादी सिर्फ अपने देश में अपना राज होने से ही मिल सकती है. उन्होंने विदेशी विचारों को पसंद नहीं किया और स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और विरोध जैसे तरीकों से देश को आज़ाद कराने पर जोर दिया. वे चाहते थे कि लोग अपनी संस्कृति और एकता पर गर्व करें.
🎯 Exam Tip: तिलक के राजनीतिक दर्शन को समझाते समय, उनके 'स्वराज्य' की अवधारणा, स्वदेशी, बहिष्कार जैसे साधनों और पाश्चात्य दर्शन से असहमति जैसे प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करें.
Question 2. गोखले के विचारों पर प्रकाश डालिए।
Answer: गोपालकृष्ण गोखले के विचार निम्नलिखित बिंदुओं में देखे जा सकते हैं:
1. **ब्रिटिश जाति की उदारता एवं न्यायप्रियता में विश्वास:** गोखले को ब्रिटिश जाति की उदारता और न्यायप्रियता में विश्वास था. उनकी शिक्षा-दीक्षा ने उनमें ब्रिटिश उदारवाद के प्रति गहरी आस्था उत्पन्न कर दी थी. गोखले ब्रिटिश राज को भारत के लिए ईश्वरीय वरदान मानते थे. उनके मतानुसार ब्रिटिश शासन का लक्ष्य इंग्लैंड का लाभ नहीं, बल्कि भारत का भौतिक कल्याण करना था. वे केवल शासन ही नहीं करना चाहते थे, वरन् जनता की सहायता करना चाहते थे. ब्रिटिश शासन ने ही भारत को राजनीतिक एकता एवं संपूर्ण भारत को एक समान विधि एवं न्याय-व्यवस्था प्रदान की थी. अंग्रेजी भाषा, शिक्षा पद्धति तथा संचार साधन भी अंग्रेजों ने ही प्रदान किए. अपने विचारों के अनुरूप ही वे एक ओर भारतीय जनता को ब्रिटिश राजभक्त होने के लिए प्रेरित करते थे, तो दूसरी ओर शासन को भी उसके राजनीतिक एवं भौतिक, नैतिक दायित्व का स्मरण कराते थे.
2. **संवैधानिक साधनों में दृढ़ विश्वास:** गोखले व्यावहारिक दृष्टि से अंग्रेजी शासन का संगठित शक्ति से मुकाबला करना असंभव मानते थे. उनका संवैधानिक साधनों में दृढ़ विश्वास था. गोखले के संवैधानिक साधन मूलतः उदारवादी एवं शांतिपूर्ण थे, जैसे-याचिका, स्मरण-पत्र, प्रार्थना-पत्र, अधिवेशन सभा, प्रतिनिधिमंडल, समाचार-पत्र, विचार-विमर्श, रचनात्मक आलोचना आदि.
3. **सत्ता का विकेंद्रीकरण:** गोखले सत्ता के केंद्रीकरण में विश्वास नहीं करते थे. उनके अनुसार सत्ता का केंद्रीकरण प्रशासनिक मनमानी को बढ़ाकर जनता की परेशानियों में वृद्धि करता है. उनके अनुसार, भारतीयों को उनके अधिकार तभी प्राप्त हो सकते थे जब ब्रिटिश सरकार सत्ता के विकेंद्रीकरण की नीति अपनाए.
4. **स्वशासन की धारणा:** गोखले की मान्यता थी कि क्रमिक सुधारों के मार्ग को अपनाया जाए. इनसे ही भारत के लिए स्वशासन की प्राप्ति संभव है. उनको विश्वास था कि ब्रिटिश नौकरशाही के फलस्वरूप प्रशासन में जो दोष प्रवेश कर गए हैं, उनका निवारण स्वशासन द्वारा ही हो सकता है. गोखले का मानना था कि स्वराज्य के लक्ष्य की वास्तविक पूर्ति क्रमिक सुधारों द्वारा ही की जा सकती है. क्रमिक सुधार भारत के वर्तमान एवं भावी सुदृढ़ राष्ट्रवाद के लक्ष्य की प्राप्ति का माध्यम हैं. गोखले आदर्शोन्मुख यथार्थवादी थे. उनका राजनीतिक यथार्थवाद उन्हें इस लक्ष्य को आत्मसात करने के लिए प्रेरित करता था कि भारत के स्वराज्य की कामना की पूर्ति तात्कालिक उद्घोषणा द्वारा नहीं, बल्कि क्रमिक सुधारों द्वारा ही हो सकती थी.
5. **उदारवादी चिंतन में विश्वास:** गोखले उदारवादी चिंतन में विश्वास करते थे. वे जनता की स्वतंत्रता, व्यक्ति की गरिमा का सम्मान, विधि का शासन, मर्यादित सरकार, समानता और न्याय में गहरी आस्था रखते थे.
6. **भारतीय राष्ट्रवाद के समर्थक एवं पोषक:** गोखले एक सच्चे राष्ट्रवादी, उदारवादी एवं राजनीतिक यथार्थवादी थे. वे भारतीय जनता के हितों और स्वाभिमान के सच्चे समर्थक एवं प्रवक्ता थे. इन्होंने अपने राष्ट्रवादी विचारों को व्यावहारिक रूप देने के लिए 12 जून, 1905 को भारत सेवक संघ की स्थापना की. इन्होंने भारतीय जनता में राष्ट्रीय चेतना के प्रसार के लिए राष्ट्रवाद को त्याग, तपस्या, आत्मसंयम तथा कर्तव्य-पालन के साथ जोड़ा.
7. **स्वदेशी का समर्थन:** गोखले स्वदेशी की भावना को देशभक्ति का प्रतीक एवं एक पवित्र विचार मानते थे. उनका मत था कि स्वदेशी के माध्यम से भारत की आर्थिक निर्भरता का मार्ग खुलेगा एवं भारतीयों में ऐसी भावना भी जागृत होगी कि वे एक-दूसरे की आर्थिक समस्याओं का समाधान करने में सहयोग करेंगे.
गोखले ने आर्थिक बहिष्कार की तरह सरकारी नौकरियों के बहिष्कार के प्रस्ताव को भी अव्यावहारिक माना और कहा कि इससे भारतीयों के हितों की कोई वास्तविक पूर्ति नहीं हो सकती थी. बहिष्कार निश्चित रूप से विरोधी पक्ष के क्रोध को पैदा करेगा तथा देश का कोई भी सच्चा शुभचिंतक तब तक ऐसे क्रोध को उकसाने का विकल्प नहीं चुनेगा जब तक कि यह अतिआवश्यक न हो जाए.
In simple words: गोखले मानते थे कि ब्रिटिश शासन भारत के लिए अच्छा था और वे धीरे-धीरे सुधारों से देश को आज़ाद कराना चाहते थे. वे लोगों को यह भी सिखाते थे कि अपना शासन कैसे चलाना है और अपने देश की चीजों का उपयोग कैसे करना है.
🎯 Exam Tip: गोखले के विचारों को उनके उदारवादी दृष्टिकोण, संवैधानिक साधनों पर विश्वास, स्वशासन की अवधारणा, और ब्रिटिश शासन की न्यायप्रियता में उनके विश्वास के आधार पर समझाएँ.
Question 3. क्रान्तिकारियों के लक्ष्य, कार्यक्रम एवं नीतियों पर प्रकाश डालिए।
Answer: क्रांतिकारियों के लक्ष्य, कार्यक्रम एवं नीतियाँ निम्नलिखित थीं:
**लक्ष्य:** क्रांतिकारियों का मुख्य लक्ष्य ब्रिटिश शासन को भारत से पूरी तरह समाप्त करना था. उनका उद्देश्य भारत में क्रांति लाकर विदेशी शासन का अंत करके सच्चा लोकतंत्र स्थापित करना था. उनका उद्देश्य समाज में आतंक का राज्य स्थापित करना नहीं था, बल्कि वे तो ब्रिटिश शासकों के मन में अत्याचारों के विरुद्ध आतंक उत्पन्न करना चाहते थे. क्रांतिकारी नेता केवल ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या करते थे, जो देशभक्तों पर अत्याचार करते थे. क्रांतिकारी भारतीय जनता को संघर्ष की प्रेरणा देना एवं अंग्रेजी शासन के मन में डर पैदा करना चाहते थे. स्वतंत्रता के लिए बलिदान क्रांतिकारियों की प्रेरणा स्रोत था. भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराना, अपनी मातृभूमि का खोया हुआ गौरव पुनः स्थापित करना एवं समस्त भारतवासियों को स्वतंत्रता की खुली हवा में मुक्त विचरण का अहसास दिलाना क्रांतिकारियों के लक्ष्य में सम्मिलित था.
**कार्यक्रम:** क्रांतिकारियों के प्रमुख कार्यक्रम निम्नलिखित थे:
1. लेखों, भाषणों और गुप्त प्रचार द्वारा शिक्षित भारतीयों के मस्तिष्क में विदेशी दासता के प्रति घृणा की भावना उत्पन्न करना.
2. संगीत, नाटक एवं साहित्य द्वारा बेकारी एवं भूख से परेशान लोगों को निडर बनाकर उनमें मातृभूमि के प्रति प्रेम और स्वतंत्रता की भावना उत्पन्न करना.
3. सरकार को वन्दे मातरम् जुलूसों एवं स्वदेशी सम्मेलनों तथा बॉयकॉट के माध्यम से व्यस्त रखना ताकि राष्ट्रीय स्वाधीनता हेतु किए जाने वाले कार्यों को बिना किसी बाधा के संपन्न किया जा सके.
4. बम बनाना, पिस्तौल व बंदूक आदि गुप्त रूप से मंगवाना और विदेशों से शस्त्र प्राप्त करना.
5. क्रांतिकारी आंदोलन के लिए छापे मारकर धन प्राप्त करना ताकि क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन सुगमतापूर्वक किया जा सके.
6. नौजवानों की भर्ती करके उनकी छोटी-छोटी टुकड़ियाँ बनाना. उन्हें शस्त्रों का प्रयोग करना सिखाना ताकि उन्हें एक प्रशिक्षित व शक्ति-संपन्न सैन्य टुकड़ी के रूप में स्थापित किया जा सके.
7. प्रशिक्षित सैन्य टुकड़ियों के नौजवानों को नियमों एवं आज्ञाओं का पूर्ण पालन करने हेतु शिक्षा प्रदान करना कुशल नेतृत्व के निर्देशन में आगामी रणनीतियों का सफलतापूर्वक संचालन किया जा सके.
8. आम जनता में राष्ट्रीयता का भाव जागृत करने के लिए संगीत व नाटकों का जनता के सम्मुख प्रस्तुतीकरण. वीरों की जीवनी और स्वतंत्रता के लिए उनके द्वारा किए गए महान कार्यों की प्रशंसा का प्रसार हो सके.
**नीतियाँ:** क्रांतिकारियों की नीति स्पष्ट थी-वे किसी भी हालत में ब्रिटिश शासन से भारत को स्वतंत्र कराना चाहते थे. उन्होंने भारत माँ के मान-सम्मान की रक्षा हेतु तथा उसके गौरव को बनाए रखने के लिए आवश्यक साधन अपनाने पर बल दिया. उनका मत था कि जो लक्ष्य नैतिक साधनों से प्राप्त नहीं हो सकता, उसे हिंसा एवं बल से प्राप्त किया जाए. क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश शासन को उन्हीं की भाषा में जवाब देते हुए शस्त्रों का प्रयोग भी किया. उनका संदेश था, "तलवार हाथ में लो तथा सरकार को मिटा दो.”
In simple words: क्रांतिकारियों का मकसद भारत को अंग्रेजों से पूरी तरह आज़ाद कराना था. इसके लिए उन्होंने लेख लिखे, नाटक किए, बम बनाए, और छापे मारकर पैसे इकट्ठे किए. वे युवाओं को हथियार चलाना भी सिखाते थे और कहते थे कि आज़ादी के लिए हिंसा भी ज़रूरी हो सकती है.
🎯 Exam Tip: क्रांतिकारियों के लक्ष्यों, कार्यक्रमों और नीतियों को अलग-अलग बिंदुओं में स्पष्ट करें, उनके उग्र दृष्टिकोण और पूर्ण स्वतंत्रता की मांग पर विशेष जोर दें.
Question 4. सुभाषचन्द्र बोस के व्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रकाश डालिए।
Answer: नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक में एक उच्च मध्यम वर्गीय बंगाली परिवार में हुआ था. उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा कटक में अंग्रेजी स्कूल में प्राप्त की, जहाँ उन्होंने भारतीय छात्रों के साथ भेदभाव का अनुभव किया. सन् 1919 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी.ए. की उपाधि प्राप्त करने के बाद, 1920 में उन्होंने भारतीय जनपद सेवा (आईसीएस) की परीक्षा उत्तीर्ण की, परंतु मई, 1921 में उन्होंने आई.ए.एस. से त्यागपत्र दे दिया. इस प्रकार युवक सुभाष ने चौबीस वर्ष की आयु में ही सांसारिक सुख-सुविधा से संपन्न आई.सी.एस. के उच्च पद को ठुकराकर ध्येयनिष्ठ जीवन व्यतीत करने का दृढ़ निश्चय किया. सुभाषचंद्र बोस के कृतित्व का अध्ययन हम निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत कर सकते हैं:
1. **कांग्रेस की सदस्यता एवं असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका:** भारतीय जनपद सेवा से त्याग-पत्र देने के पश्चात् सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने हेतु कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली. उन्होंने असहयोग आंदोलन के दौरान युवकों को कांग्रेस के आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया.
2. **स्वराज्य दल के गठन में सक्रिय भूमिका:** सुभाषचंद्र बोस ने देशबंधु चित्तरंजन दास द्वारा स्थापित स्वराज्य दल के गठन एवं कार्यक्रम का समर्थन किया. उनका विचार था कि अंग्रेजों का विरोध परिषदों के अंदर भी होना चाहिए.
3. **कलकत्ता के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में प्रभावी भूमिका:** बंगाल की प्रांतीय विधान परिषद में 1924 ई. में जब स्वराज्य दल को बहुमत प्राप्त हुआ तो चित्तरंजन दास महापौर बने, उन्होंने सुभाषचंद्र बोस को कलकत्ता निगम का मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया. यहाँ बोस की कार्यप्रणाली प्रशासन के भारतीयकरण की थी. फलस्वरूप बंगाल सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर मांडले (म्यांमार) में तीन वर्ष के लिए निर्वासित कर दिया.
4. **भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में कार्य:** सुभाषचंद्र बोस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उदारवादी दल के कट्टर विरोधी थे. उनका लक्ष्य भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना था. उन्हें दो बार अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया. वह अंग्रेजों को बिना युद्ध में परास्त किए भारत छोड़कर जाने वाले नहीं मानते थे. उन्होंने सभी हिन्दुओं, मुसलमानों, सिखों और ईसाइयों का मन जीत लिया और देश को आजाद कराने के लिए "दिल्ली चलो" का नारा दिया. उनका मूल मंत्र था, "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा."
In simple words: सुभाषचंद्र बोस का जन्म 1897 में कटक में हुआ था. उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया. वे कांग्रेस में शामिल हुए, स्वराज्य दल बनाया और कलकत्ता के मुख्य अधिकारी भी रहे. वे दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए और "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा" का नारा दिया.
🎯 Exam Tip: सुभाषचंद्र बोस के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझाते समय उनके प्रारंभिक जीवन, आईसीएस त्याग, कांग्रेस में भूमिका, स्वराज्य दल में योगदान और 'तुम मुझे खून दो' जैसे प्रमुख नारों को शामिल करें.
Question 5. सरदार भगत सिंह के राष्ट्रीय आन्दोलन में योगदान को समझाइये।
Answer: सरदार भगत सिंह का राष्ट्रीय आन्दोलन में बहुत बड़ा योगदान था। उनके योगदान को हम नीचे दिए गए बिन्दुओं के अनुसार समझ सकते हैं:
1. **असहयोग आन्दोलन में भूमिका:** 1920 में गाँधीजी ने असहयोग आन्दोलन शुरू किया था। भगत सिंह उस समय नवीं कक्षा के छात्र थे और उन्होंने इसमें बढ़-चढ़ कर भाग लिया। जब गाँधीजी ने 1922 में अचानक आन्दोलन रोक दिया, तो भगत सिंह को बहुत बुरा लगा।
2. **पत्रकारिता और लेखन:** भगत सिंह ने पत्रकारिता का प्रशिक्षण लिया। उन्होंने कानपुर के 'प्रताप' अखबार में 'बलवन्त' नाम से और पंजाब के 'कीर्ति' अखबार में 'विद्रोह' नाम से लेख लिखे। उन्होंने इलाहाबाद के 'चाँद' पत्रिका के 'फाँसी अंक' में भी लेख प्रकाशित किए। भगत सिंह ने जेल में रहते हुए 'बॉयोग्राफी', 'डोर टू डेथ' और 'दि रिवोल्यूशनरी मूवमेण्ट इन इण्डिया' जैसी किताबें भी लिखीं। इन सभी लेखों और किताबों का देश के राष्ट्रीय आन्दोलन पर बहुत गहरा असर पड़ा।
3. **हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना का गठन:** काकोरी कांड के बाद भगत सिंह चन्द्रशेखर आजाद के संपर्क में आए। उन्होंने भारत से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए 'हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना' नाम से एक दल बनाया। इसका मकसद क्रान्ति के लिए हथियार और पैसा जमा करना था। इस क्रान्तिकारी संगठन में भगत सिंह का गुप्त नाम 'बलवन्त' था।
4. **सांडर्स की हत्या:** 20 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में 'साइमन कमीशन' के बहिष्कार के लिए लाला लाजपत राय के नेतृत्व में एक जुलूस निकला था। पुलिस अधीक्षक स्कॉट की लाठियों से लाला लाजपत राय बुरी तरह घायल हो गए और 17 नवम्बर, 1928 को उनका देहान्त हो गया। ब्रिटिश सरकार द्वारा लाला लाजपत राय पर यह हमला भारतीय राष्ट्रवाद को कमजोर करने जैसा था। इस अपमान का बदला लेने के लिए भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ लाहौर में पुलिस अधिकारी सांडर्स की गोली मारकर हत्या कर दी। भगत सिंह स्कॉट को मारना चाहते थे, लेकिन गलती से सांडर्स मारा गया।
5. **केन्द्रीय असेम्बली में बम विस्फोट:** 8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ब्रिटिश शासन को चुनौती देने के लिए दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली हॉल में खाली सरकारी बेंचों पर बम फेंका। उस समय अध्यक्ष विठ्ठल भाई पटेल 'पब्लिक सेफ्टी बिल' पर बोल रहे थे। बम के धमाके से पूरे असेम्बली हॉल में डर का माहौल बन गया। दोनों क्रान्तिकारी वहां से भागे नहीं, बल्कि खड़े होकर 'इंकलाब जिन्दाबाद', 'साम्राज्यवाद का नाश हो' जैसे नारे लगाए। उन्होंने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की ओर से कुछ लाल पर्चे भी फेंके, जिन पर लिखा था कि "बहरे कानों तक अपनी आवाज पहुँचाने के लिए।" भगत सिंह का मकसद किसी की हत्या करना नहीं था, बल्कि अत्याचारी ब्रिटिश शासन को जगाना था। इसके बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने खुद को पुलिस के हवाले कर दिया।
6. **फाँसी की सजा:** पुलिस ने केन्द्रीय असेम्बली बम विस्फोट मामले में सरदार भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और उनके अन्य साथियों को फंसाया। न्यायाधीश हिल्टन ने इस बम कांड में सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 7 अक्टूबर, 1930 को फाँसी की सजा सुनाई। उनके बलिदान से पूरे भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ लोगों में जागरूकता बढ़ी।
In simple words: भगत सिंह भारतीय आज़ादी के लिए एक बहुत बड़े क्रान्तिकारी नेता थे। उन्होंने असहयोग आन्दोलन में भाग लिया, किताबें और लेख लिखे, 'हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना' बनाई, सांडर्स को मारा और असेम्बली में बम फेंका। उनका मकसद ब्रिटिश राज को ख़त्म करके भारत को आज़ाद कराना था।
🎯 Exam Tip: जब किसी व्यक्तित्व के योगदान पर प्रश्न हो, तो उसके जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों और कार्यों को क्रमवार बिंदुओं में लिखें, खासकर उनके आंदोलनों और बलिदानों पर जोर दें।
RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म हुआ
(अ) 1866 ई.
(ब) 1867 ई.
(स) 1868 ई.
(द) 1869 ई.
Answer: (अ) 1866 ई.
In simple words: गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 1866 में हुआ था।
🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण नेताओं के जन्म-मृत्यु वर्ष और स्थान याद रखना ऐतिहासिक प्रश्नों के लिए बहुत जरूरी है।
Question 2. गोपाल कृष्ण गोखले के विचारों की प्रमुख प्रवृत्ति है
(अ) उदारवादी
(ब) अतिवादी
(स) क्रान्तिकारी
(द) इनमें से कोई नहीं।
Answer: (अ) उदारवादी
In simple words: गोपाल कृष्ण गोखले के विचार नरम दल के नेताओं जैसे थे, जो धीरे-धीरे सुधार चाहते थे।
🎯 Exam Tip: उदारवादी नेता संवैधानिक तरीकों से सुधारों में विश्वास रखते थे, जबकि अतिवादी नेता उग्र आन्दोलनों के पक्षधर थे।
Question 3. तिलक की राजनीतिक पद्धति का साधन नहीं है
(अ) स्वदेशी
(ब) बहिष्कार
(स) निष्क्रिय प्रतिरोध
(द) अनुनय-विनय।
Answer: (द) अनुनय-विनय।
In simple words: तिलक उन तरीकों का इस्तेमाल नहीं करते थे जिनमें अंग्रेजों से सिर्फ विनती करना शामिल हो।
🎯 Exam Tip: बाल गंगाधर तिलक जैसे अतिवादी नेता स्वदेशी, बहिष्कार और निष्क्रिय प्रतिरोध को स्वराज्य प्राप्ति के प्रमुख साधनों के रूप में देखते थे।
Question 4. क्रान्तिकारियों का लक्ष्य नहीं था।
(अ) ब्रिटिश शासन को समाप्त करना
(ब) ब्रिटिश शासन को बनाए रखना
Answer: (ब) ब्रिटिश शासन को बनाए रखना
In simple words: क्रान्तिकारी ब्रिटिश शासन को भारत से पूरी तरह खत्म करना चाहते थे, न कि उसे बनाए रखना।
🎯 Exam Tip: क्रान्तिकारी नेताओं का मुख्य उद्देश्य भारत को ब्रिटिश राज से पूरी तरह आजाद कराना था, भले ही इसके लिए बल का प्रयोग करना पड़े।
RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रारम्भिक चरण किस विचारधारा के आधिपत्य के रूप में जाना जाता है-
(अ) उदारवाद
(ब) अतिवाद
(स) गाँधीवाद
(द) क्रान्तिकारी।
Answer: (अ) उदारवाद
In simple words: भारत में आज़ादी की लड़ाई की शुरुआत में, ज्यादातर नेता उदारवादी सोच रखते थे।
🎯 Exam Tip: भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को मुख्य रूप से तीन चरणों में बांटा जाता है- उदारवादी चरण, अतिवादी चरण और गाँधीवादी चरण।
Question 2. उदारवादियों की आस्था थी
(अ) धीरे-धीरे सुधारों के लिए आन्दोलन में
(ब) संवैधानिक साधनों के प्रयोग में
(स) अंग्रेजों की न्याय व निष्पक्ष भावना में विश्वास
(द) उपर्युक्त सभी।
Answer: (द) उपर्युक्त सभी।
In simple words: उदारवादी लोग धीरे-धीरे बदलाव, कानूनी तरीकों और अंग्रेजों की ईमानदारी में विश्वास रखते थे।
🎯 Exam Tip: उदारवादी नेता ब्रिटिश शासन को भारत के लिए वरदान मानते थे और मानते थे कि ब्रिटिश सरकार भारत में न्यायपूर्ण शासन स्थापित करेगी।
Question 3. आराम कुर्सी के राजनीतिज्ञ थे
(अ) उदारवादी
(ब) अतिवादी
(स) गाँधीवादी
(द) उपर्युक्त सभी।
Answer: (अ) उदारवादी
In simple words: उदारवादी नेताओं को कभी-कभी 'आराम कुर्सी के राजनीतिज्ञ' कहा जाता था क्योंकि वे शांतिपूर्ण तरीकों से काम करते थे।
🎯 Exam Tip: यह नाम उदारवादी नेताओं को इसलिए दिया गया था क्योंकि वे सभाएं करने, याचिकाएं भेजने और संवैधानिक तरीकों से बदलाव लाने में विश्वास करते थे।
Question 4. "बहुत ही छोटी आयु में उन्होंने अपने आपको देश सेवा के लिए पूर्णतया समर्पित कर दिया और विविध रूपों में देश की अपरिमित [यहां से प्रश्न की सामग्री अगले पृष्ठ पर जारी है]
Question 5. भारत के किस उदारवादी नेता ने ब्रिटिश सरकार से नाइटहुड उपाधि लेने से इंकार कर दिया था
(अ) लाला लाजपतराय
(ब) गोपालकृष्ण गोखले
(स) दादा भाई नौरोजी
(द) विपिन चन्द्रपाल।
Answer: (ब) गोपालकृष्ण गोखले
In simple words: गोपाल कृष्ण गोखले ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी जाने वाली 'नाइटहुड' की उपाधि लेने से मना कर दिया था।
🎯 Exam Tip: यह तथ्य गोपाल कृष्ण गोखले के मजबूत राष्ट्रीय विचारों और ब्रिटिश शासन के प्रति उनकी स्वतंत्र सोच को दर्शाता है।
Question 6. ब्रिटिश जाति की उदारता और न्यायप्रियता में विश्वास करते थे
(अ) गोपालकृष्ण गोखले
(ब) सुभाषचन्द्र बोस
(स) भगतसिंह
(द) बाल गंगाधर तिलक
Answer: (अ) गोपालकृष्ण गोखले
In simple words: गोपाल कृष्ण गोखले को अंग्रेजों के न्याय करने के तरीके और उनकी उदारता पर भरोसा था।
🎯 Exam Tip: उदारवादी नेता मानते थे कि ब्रिटिश सरकार भारत में शिक्षा और विकास लाएगी, इसलिए वे उसके प्रति निष्ठा रखते थे।
Question 7. गोखले ने अपना सार्वजनिक जीवन प्रारम्भ किया
(अ) डॉक्टर के रूप में
(ब) राजनेता के रूप में
(स) अध्यापक के रूप में
(द) अधिकारी के रूप में।
Answer: (स) अध्यापक के रूप में
In simple words: गोपाल कृष्ण गोखले ने शुरुआत में एक शिक्षक के तौर पर काम करना शुरू किया था।
🎯 Exam Tip: गोखले फर्ग्यूसन कॉलेज में अध्यापक थे और बाद में इसके प्राचार्य भी बने, जिससे उनका सार्वजनिक जीवन शुरू हुआ।
Question 8. यह कथन किसका है, "स्वराज्य के लक्ष्य की वास्तविक पूर्ति क्रमिक सुधारों द्वारा ही सम्भव है।”
(ब) गोपालकृष्ण गोखले का
Answer: (ब) गोपालकृष्ण गोखले का
In simple words: गोपाल कृष्ण गोखले का मानना था कि आज़ादी केवल धीरे-धीरे बदलाव करके ही मिल सकती है।
🎯 Exam Tip: यह कथन उदारवादी नेताओं की सोच को दर्शाता है, जो मानते थे कि अचानक बड़े बदलाव से समाज में अस्थिरता आ सकती है।
Question 9. महात्मा गाँधी के राजनीतिक गुरु थे
(अ) गोपाल कृष्ण गोखले
(ब) जवाहर लाल नेहरू
(स) बाल गंगाधर तिलक
(द) दादा भाई नौरोजी।
Answer: (अ) गोपाल कृष्ण गोखले
In simple words: महात्मा गाँधी अपने राजनीतिक विचारों और मार्गदर्शन के लिए गोपाल कृष्ण गोखले को अपना गुरु मानते थे।
🎯 Exam Tip: गोखले की उदारवादी विचारधारा ने गाँधीजी के शुरुआती राजनीतिक विचारों को काफी प्रभावित किया था।
Question 10. "हमारे समय के किसी भी व्यक्ति को जनता पर इतना अधिक प्रभाव नहीं पड़ा, जितना तिलक का। स्वराज्य के सन्देश का किसी ने इतने आग्रह से प्रचार नहीं किया, जितना लोकमान्य ने।” यह कथन है
(अ) सुभाषचन्द्र बोस का
(ब) महात्मा गाँधी को
(स) भगतसिंह का
(द) राजगुरु का।
Answer: (ब) महात्मा गाँधी को
In simple words: महात्मा गाँधी ने कहा था कि बाल गंगाधर तिलक ने स्वराज्य के विचार को लोगों के बीच सबसे ज्यादा फैलाया।
🎯 Exam Tip: इस कथन से बाल गंगाधर तिलक के प्रभाव और उनकी लोकप्रियता का पता चलता है, विशेषकर 'स्वराज्य' के उनके नारे के कारण।
Question 11. अतिवादियों को मुख्य उद्देश्य था
(अ) स्वराज्य
(ब) स्वदेशी
(स) बहिष्कार
(द) उपर्युक्त सभी।
Answer: (द) उपर्युक्त सभी।
In simple words: अतिवादी नेता स्वराज्य पाना, देश के बने सामान इस्तेमाल करना और विदेशी चीजों का बहिष्कार करना चाहते थे।
🎯 Exam Tip: अतिवादियों का लक्ष्य ब्रिटिश शासन को कमजोर करके भारत को पूर्ण स्वराज्य दिलाना था, जिसके लिए वे इन साधनों का प्रयोग करते थे।
Question 12. प्रमुख अतिवादी नेता थे
(द) उपर्युक्त सभी।
Answer: (द) उपर्युक्त सभी।
In simple words: लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिन चन्द्र पाल) प्रमुख अतिवादी नेता थे।
🎯 Exam Tip: 'लाल-बाल-पाल' की तिकड़ी भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में अतिवादी विचारधारा के प्रमुख चेहरे थे।
Question 13. बाल गंगाधर तिलक का जन्म हुआ?
(अ) 1856 ई. में
(ब) 1866 ई. में
(स) 1867 ई. में
(द) 1869 ई. में।
Answer: (अ) 1856 ई. में
In simple words: बाल गंगाधर तिलक का जन्म 1856 में हुआ था।
🎯 Exam Tip: जन्मतिथि और स्थान जैसे तथ्य ऐतिहासिक प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।
Question 14. निम्न में से किस अतिवादी नेता का स्वतन्त्रता सम्बन्धी दृष्टिकोण मूलतः आध्यात्मिक व नैतिक था
(अ) लाला लाजपत राय
(ब) विपिन चन्द्रपाल
(स) बाल गंगाधर तिलक
(द) इनमें से कोई नहीं।
Answer: (स) बाल गंगाधर तिलक
In simple words: बाल गंगाधर तिलक का मानना था कि आज़ादी आत्मा के विकास और सही मूल्यों के लिए जरूरी है।
🎯 Exam Tip: तिलक ने स्वराज्य को केवल राजनीतिक लक्ष्य ही नहीं, बल्कि व्यक्ति के नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान का भी साधन माना।
Question 15. भारतीय राष्ट्रवाद को सर्वप्रथम एक सुनिश्चित व मूर्त अवधारणा बनाने का श्रेय किसे दिया जाता है
(अ) स्वामी विवेकानन्द को
(ब) बाल गंगाधर तिलक को।
(स) विपिन चन्द्रपाल को
(द) दादा भाई नौरोजी को।
Answer: (ब) बाल गंगाधर तिलक को।
In simple words: बाल गंगाधर तिलक ने भारतीय राष्ट्रवाद को एक साफ और मजबूत विचार के रूप में लोगों के सामने रखा।
🎯 Exam Tip: तिलक ने भारतीय संस्कृति और परम्पराओं को राष्ट्रवाद का आधार बनाकर इसे जन-आन्दोलन में बदला।
Question 16. निम्न में से किस स्वतन्त्रता सेनानी ने स्वदेशी आन्दोलन के दौरान समर्थ गुरु रामदास के नाम पर अनेक समर्थ विद्यालय खुलवाये
(अ) बाल गंगाधर तिलक
(ब) भगतसिंह
(स) राजगुरु
Answer: (अ) बाल गंगाधर तिलक
In simple words: बाल गंगाधर तिलक ने स्वदेशी आन्दोलन के समय गुरु रामदास के नाम पर बहुत से स्कूल खुलवाए।
🎯 Exam Tip: तिलक ने राष्ट्रीय शिक्षा को स्वदेशी आन्दोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना, ताकि भारतीय बच्चों को अपनी संस्कृति के अनुसार शिक्षित किया जा सके।
Question 17. राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रमुख क्रान्तिकारी थे
(अ) सरदार भगतसिंह
(ब) चन्द्रशेखर आजाद
(स) सुभाषचन्द्र बोस
(द) उपर्युक्त सभी।
Answer: (द) उपर्युक्त सभी।
In simple words: सरदार भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद और सुभाषचन्द्र बोस, ये सभी भारत के बड़े क्रान्तिकारी नेता थे।
🎯 Exam Tip: इन नेताओं ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सीधे संघर्ष और बलिदान का रास्ता अपनाया, जिससे राष्ट्रीय आन्दोलन को नई दिशा मिली।
Question 18. छापे मारकर धन हासिल करते थे
(अ) उदारवादी
(ब) अतिवादी
(स) क्रान्तिकारी
(द) उपर्युक्त सभी।
Answer: (स) क्रान्तिकारी
In simple words: क्रान्तिकारी अपनी गतिविधियों को चलाने के लिए छापा मारकर पैसा इकट्ठा करते थे।
🎯 Exam Tip: क्रान्तिकारी आन्दोलनों को चलाने के लिए वित्तीय संसाधनों की जरूरत होती थी, जिसके लिए वे अक्सर ऐसे तरीके अपनाते थे।
Question 19. क्रान्तिकारियों को मुख्य लक्ष्य था
(अ) भारतीयों को विदेशी शासन से मुक्त कराना
(ब) भारत को अधिराज्य बनाना।
(स) असहयोग आन्दोलन चलाना
(द) उपर्युक्त सभी।
Answer: (अ) भारतीयों को विदेशी शासन से मुक्त कराना
In simple words: क्रान्तिकारियों का सबसे बड़ा लक्ष्य भारत को अंग्रेजों की गुलामी से पूरी तरह आज़ाद कराना था।
🎯 Exam Tip: क्रान्तिकारी पूर्ण स्वतंत्रता के समर्थक थे, न कि अधिराज्य या ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन स्वशासन के।
Question 20. सरदार भगतसिंह का जन्म हुआ
(अ) 1866 ई. में
(ब) 1907 ई. में
(स) 1928 ई. में
(द) 1942 ई. में।
Answer: (ब) 1907 ई. में
In simple words: सरदार भगतसिंह का जन्म 1907 में हुआ था।
🎯 Exam Tip: महान नेताओं की जन्मतिथियाँ और उनसे जुड़ी घटनाएँ अक्सर परीक्षा में पूछी जाती हैं।
Question 22. लाहौर के पुलिस अधिकारी साण्डर्स की हत्या में कौन-कौन से क्रान्तिकारी शामिल थे
(अ) भगत सिंह, राजगुरु, आजाद
(ब) भगतसिंह, लाला लाजपत राय
(स) सुभाषचन्द्र बोस, बिस्मिल
(द) इनमें से कोई नहीं।
Answer: (अ) भगत सिंह, राजगुरु, आजाद
In simple words: सांडर्स की हत्या में भगत सिंह, राजगुरु और चन्द्रशेखर आजाद शामिल थे।
🎯 Exam Tip: यह घटना लाला लाजपत राय की लाठीचार्ज में हुई मौत का बदला लेने के लिए की गई थी, जो क्रान्तिकारी आन्दोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी।
Question 23. काकोरी की ट्रेन डकेती में भाग लिया था
(अ) चन्द्रशेखर आजाद ने
(ब) सुभाषचन्द्र बोस ने
(स) मैडम कामा ने
(द) तिलक ने
Answer: (अ) चन्द्रशेखर आजाद ने
In simple words: चन्द्रशेखर आजाद काकोरी ट्रेन डकैती में शामिल थे, जहाँ क्रान्तिकारियों ने सरकारी खजाना लूटा था।
🎯 Exam Tip: काकोरी कांड क्रान्तिकारी आन्दोलन की एक प्रमुख घटना थी, जिसका उद्देश्य हथियार खरीदने के लिए धन जुटाना था।
Question 24. अल्फ्रेड पार्क का सम्बन्ध निम्न में से किस क्रान्तिकारी से था
(अ) सुभाषचन्द्र बोस
(ब) चन्द्रशेखर आजाद
(स) राजगुरु
(द) भगतसिंह।
Answer: (ब) चन्द्रशेखर आजाद
In simple words: चन्द्रशेखर आजाद ने इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों से लड़ते हुए अपनी जान दी थी।
🎯 Exam Tip: अल्फ्रेड पार्क, जिसे अब 'आजाद पार्क' के नाम से जाना जाता है, चन्द्रशेखर आजाद के बलिदान का प्रतीक है।
Question 28. दिल्ली चलो का नारा किस क्रान्तिकारी ने दिया था
(अ) भगतसिंह
(ब) राजगुरु
(स) चन्द्रशेखर
(द) सुभाषचन्द्र बोस
Answer: (द) सुभाषचन्द्र बोस
In simple words: सुभाषचन्द्र बोस ने 'दिल्ली चलो' का प्रसिद्ध नारा दिया था ताकि लोग ब्रिटिश राज के खिलाफ एकजुट होकर दिल्ली की ओर बढ़ें।
🎯 Exam Tip: 'दिल्ली चलो' का नारा आजाद हिन्द फौज के नेतृत्व में दिया गया था, जिसने भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष को एक नई दिशा दी।
Question 27. आजाद हिन्द की अस्थायी सरकार की स्थापना किसने की
(अ) सुभाषचन्द्र बोस
(ब) रास बिहारी बोस
(स) दादा भाई नौरोजी
(द) इनमें से कोई नहीं।
Answer: (अ) सुभाषचन्द्र बोस
In simple words: सुभाषचन्द्र बोस ने सिंगापुर में आजाद हिन्द की अस्थायी सरकार बनाई थी।
🎯 Exam Tip: यह अस्थायी सरकार भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने के लिए विदेश में बनाई गई एक महत्वपूर्ण पहल थी।
RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. ब्रिटिश सरकार के प्रति उदारवादी नेताओं का क्या दृष्टिकोण था?
Answer: उदारवादी नेताओं का मानना था कि ब्रिटिश सरकार भारत के विकास में मदद कर सकती है। वे सोचते थे कि अंग्रेजों के सहयोग से ही भारत धीरे-धीरे आगे बढ़ पाएगा और आधुनिक बन पाएगा। उदारवादी नेता ब्रिटिश शासन को भारत के लिए एक वरदान मानते थे।
In simple words: उदारवादी नेताओं का मानना था कि ब्रिटिश सरकार भारत को आगे बढ़ाने में मदद कर सकती है और देश का विकास उसके सहयोग से ही संभव है।
🎯 Exam Tip: उदारवादी नेताओं के इस दृष्टिकोण ने उनके शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों को प्रभावित किया, क्योंकि वे ब्रिटिश न्याय और निष्पक्षता पर विश्वास करते थे।
Question 2. गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म कब और कहाँ हुआ?
Answer: गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 1866 ई. में बम्बई प्रान्त (अब महाराष्ट्र) के कोल्हापुर जिले में हुआ था। वे एक प्रमुख सामाजिक और राजनीतिक नेता थे जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
In simple words: गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 1866 में महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में हुआ था।
🎯 Exam Tip: ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के जन्मस्थान और जन्मतिथि याद रखना उनकी जीवनी और योगदान को समझने में सहायक होता है।
Question 4. गोपाल कृष्ण गोखले कब व किसके निमन्त्रण पर दक्षिण अफ्रीका गए?
Answer: गोपाल कृष्ण गोखले 1912 ई. में महात्मा गाँधी के निमन्त्रण पर दक्षिण अफ्रीका गए थे। वहां उन्होंने भारतीय समुदाय के अधिकारों के लिए गाँधीजी के अहिंसक आन्दोलन में अपना समर्थन दिया और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
In simple words: गोपाल कृष्ण गोखले 1912 में महात्मा गाँधी के कहने पर दक्षिण अफ्रीका गए थे।
🎯 Exam Tip: यह यात्रा गोखले और गाँधीजी के बीच गहरे संबंध को दर्शाती है और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में दोनों नेताओं की सहभागिता का प्रतीक है।
Question 5. दक्षिण अफ्रीका में गोपाल कृष्ण गोखले ने क्या महत्वपूर्ण कार्य किया?
Answer: गोपाल कृष्ण गोखले ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय सत्याग्रहियों और दक्षिण अफ्रीका की सरकार के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता कराया। यह समझौता वहाँ के भारतीयों के अधिकारों और स्थितियों को बेहतर बनाने में मदद करने के लिए था। इस काम से गाँधीजी भी बहुत प्रभावित हुए थे।
In simple words: गोखले ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय लोगों और सरकार के बीच एक समझौता कराया था।
🎯 Exam Tip: यह समझौता गोखले की राजनयिक क्षमताओं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय अधिकारों की वकालत करने की उनकी प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
Question 6. किस भारतीय उदारवादी नेता ने 'भारत मन्त्री' की परिषद की सदस्यता ग्रहण करने से इंकार कर दिया?
Answer: गोपाल कृष्ण गोखले ने 'भारत मन्त्री' की परिषद की सदस्यता ग्रहण करने से इंकार कर दिया था। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे ब्रिटिश सरकार की नीतियों से पूरी तरह सहमत नहीं थे और भारत के लिए और अधिक अधिकारों की वकालत करना चाहते थे।
In simple words: गोपाल कृष्ण गोखले ने 'भारत मन्त्री' की परिषद में शामिल होने से मना कर दिया था।
🎯 Exam Tip: यह घटना गोखले के स्वतंत्र विचारों और ब्रिटिश सरकार के साथ उनके सहयोग की सीमाओं को दर्शाती है।
Question 7. गोखले के राजनीतिक दर्शन की कोई दो मुख्य बातें बताइए।
Answer: गोखले के राजनीतिक दर्शन की दो मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
1. **ब्रिटिश जाति की उदारता एवं न्यायप्रियता में विश्वास:** गोखले ब्रिटिश शासन की ईमानदारी और न्याय में विश्वास रखते थे। वे मानते थे कि ब्रिटिश सरकार भारत के हित में काम करेगी और धीरे-धीरे सुधार लाएगी।
2. **राष्ट्रवाद के समर्थक एवं पोषक:** गोखले एक सच्चे राष्ट्रवादी थे। वे भारतीय जनता के हितों और स्वाभिमान का समर्थन करते थे तथा राष्ट्र के विकास में योगदान देना चाहते थे।
In simple words: गोखले अंग्रेजों की ईमानदारी पर भरोसा करते थे और वे भारत के प्रति सच्चे देशभक्त थे।
🎯 Exam Tip: उदारवादी नेताओं की विचारधारा को समझने के लिए ब्रिटिश शासन के प्रति उनके विश्वास और राष्ट्रवाद के प्रति उनके दृष्टिकोण को जानना महत्वपूर्ण है।
Question 8. भारत सेवक संघ की स्थापना कब और किसने की?
Answer: भारत सेवक संघ (Servants of India Society) की स्थापना 12 जून, 1905 को गोपालकृष्ण गोखले ने की थी। इस संस्था का उद्देश्य भारतीय युवकों को देश सेवा के लिए प्रशिक्षित करना और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता को बढ़ावा देना था।
In simple words: भारत सेवक संघ 1905 में गोपालकृष्ण गोखले ने बनाया था ताकि नौजवान देश की सेवा करें।
🎯 Exam Tip: यह संस्था गोखले के सामाजिक सुधार और नैतिक राष्ट्रवाद के प्रति समर्पण को दर्शाती है, जिसका लक्ष्य देश को आत्म-सुधार के माध्यम से मजबूत करना था।
Question 9. गोखले के अनुसार स्वशासन का क्या अर्थ है?
Answer: गोखले के अनुसार, सत्ता का केन्द्रीकरण (सारी ताकत एक जगह होना) प्रशासनिक स्वेच्छाचारिता को बढ़ाता है, जिससे जनता को बहुत कष्ट होता है। इसलिए, स्वशासन का अर्थ यह है कि भारतीयों को उनके अधिकार तभी मिल सकते हैं जब ब्रिटिश सरकार सत्ता को विकेन्द्रीकृत करने की नीति अपनाए। गोखले मानते थे कि स्वशासन धीरे-धीरे सुधारों से ही मिल सकता है।
In simple words: गोखले के लिए स्वशासन का मतलब था कि सारी ताकत एक जगह न होकर बंटी हुई हो, ताकि लोग अपनी समस्याओं को सुलझा सकें और देश में धीरे-धीरे सुधार हों।
🎯 Exam Tip: गोखले का स्वशासन का विचार ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर संवैधानिक सुधारों और क्रमिक विकास के माध्यम से भारतीयों को अधिक अधिकार प्रदान करने पर केंद्रित था।
Question 11. गोखले ने हाबहाउस विकेन्द्रीकरण आयोग के समक्ष सत्ता के विकेन्द्रीकरण के लिए कौन-कौन से सुझाव दिए ?
Answer: गोखले ने हाबहाउस विकेन्द्रीकरण आयोग के समक्ष सत्ता के विकेन्द्रीकरण (शक्ति को बांटना) के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए:
1. **ग्राम पंचायतें:** उन्होंने कहा कि प्रशासन की सबसे छोटी और प्रभावी इकाई पंचायतें होनी चाहिए। इन पंचायतों को शासन से संबंधित पर्याप्त अधिकार दिए जाने चाहिए ताकि वे अपने गाँव के मामलों का निपटारा कर सकें।
2. **जिला परिषदें:** प्रशासन के मध्यम स्तर पर जिला परिषदों का गठन किया जाना चाहिए। ये परिषदें जिले के विकास और प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं।
3. **विधान परिषद:** उन्होंने सुझाव दिया कि सबसे ऊपरी स्तर पर पुनर्गठित विधान परिषदें हों। ये परिषदें कानून बनाने और व्यापक प्रशासनिक मामलों पर निर्णय लेने में मदद करें।
In simple words: गोखले ने सरकार को सुझाव दिया कि सत्ता को नीचे तक बांटा जाए- गाँव में पंचायतें हों, बीच में जिला परिषदें हों और ऊपर विधान परिषदें हों।
🎯 Exam Tip: ये सुझाव गोखले की दूरदर्शिता को दर्शाते हैं कि स्थानीय स्वशासन और विकेंद्रीकरण भारत में प्रभावी प्रशासन के लिए आवश्यक थे।
Question 12. गोखले की राजनीतिक विचारधारा का मुख्य लक्ष्य क्या था?
Answer: गोखले की राजनीतिक विचारधारा का मुख्य लक्ष्य भारत के शासन में राजनीतिक, प्रशासनिक एवं आर्थिक सुधार करना था। वे धीरे-धीरे और संवैधानिक तरीकों से भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन दिलाना चाहते थे। उनका मानना था कि इन सुधारों से ही भारत का समग्र विकास संभव है।
In simple words: गोखले चाहते थे कि भारत के राजकाज, प्रशासन और पैसे के मामलों में सुधार हों, ताकि देश धीरे-धीरे खुद अपना शासन कर सके।
🎯 Exam Tip: गोखले का लक्ष्य पूर्ण स्वतंत्रता नहीं, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहते हुए भारतीयों को स्वशासन के अधिक अधिकार दिलाना था।
Question 13. गोखले ने राष्टवादी विचारों को व्यावहारिक रूप देने के लिए कौन-सी संस्था की स्थापना की?
Answer: गोखले ने राष्ट्रवादी विचारों को असल जिंदगी में उतारने के लिए 'भारत सेवक संघ' (Servants of India Society) की स्थापना की थी। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य शिक्षित भारतीयों को देश सेवा के लिए तैयार करना और उनमें राष्ट्रवाद की भावना जगाना था।
In simple words: गोखले ने देश को आगे बढ़ाने के लिए 'भारत सेवक संघ' नाम की संस्था बनाई थी।
🎯 Exam Tip: भारत सेवक संघ का गठन गोखले के नैतिक और आध्यात्मिक राष्ट्रवाद के सिद्धांत का एक प्रत्यक्ष उदाहरण था।
Question 14. गोखले के क्रमिक सुधारों का अन्तिम लक्ष्य क्या था?
Answer: गोखले के क्रमिक सुधारों का अन्तिम लक्ष्य भारतवर्ष में अंग्रेजी साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन की प्राप्ति था। वे मानते थे कि धीरे-धीरे संवैधानिक सुधारों के माध्यम से ही भारत अपनी शासन व्यवस्था में हिस्सेदारी बढ़ा सकता है और अंततः स्वशासन प्राप्त कर सकता है।
In simple words: गोखले चाहते थे कि भारत को अंग्रेजों के राज में ही धीरे-धीरे खुद अपना शासन करने का अधिकार मिल जाए।
🎯 Exam Tip: क्रमिक सुधारों पर गोखले का जोर इस बात को दर्शाता है कि वे तत्कालीन ब्रिटिश शासन की शक्ति का सम्मान करते हुए व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते थे।
Question 15. गोखले के स्वदेशी के सम्बन्ध में क्या विचार थे?
Answer: गोखले स्वदेशी की भावना को देशभक्ति का प्रतीक और एक पवित्र विचार मानते थे। उनके लिए स्वदेशी सिर्फ एक आर्थिक हथियार नहीं था, बल्कि इसमें जनता की आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान की भावना छिपी थी। वे चाहते थे कि भारत अपने दम पर खड़ा हो और अपने उत्पाद बनाए।
In simple words: गोखले के लिए स्वदेशी का मतलब सिर्फ देश का सामान इस्तेमाल करना नहीं, बल्कि अपने देश से प्यार करना और खुद पर भरोसा करना था।
🎯 Exam Tip: स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय उद्योगों को बढ़ावा दिया और आत्मनिर्भरता की भावना जगाई, जो स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।
Question 17. बाल गंगाधर तिलक द्वारा शुरु किए गए दो उत्सवों के नाम लिखिए।
Answer: बाल गंगाधर तिलक द्वारा शुरु किए गए दो उत्सवों के नाम निम्नलिखित हैं:
1. **गणपति पूजा:** तिलक ने गणेशोत्सव को एक सार्वजनिक त्योहार के रूप में मनाना शुरू किया ताकि लोग एक साथ आएं और राष्ट्रीय भावना मजबूत हो।
2. **शिवाजी उत्सव:** उन्होंने शिवाजी महाराज की जयंती को भी एक बड़े उत्सव के रूप में मनाया, ताकि लोगों में देशभक्ति और गर्व की भावना जागे।
In simple words: तिलक ने गणेश चतुर्थी और शिवाजी जयंती जैसे त्योहारों को शुरू किया ताकि लोग एक साथ मिलें और देश के लिए प्यार महसूस करें।
🎯 Exam Tip: इन उत्सवों का उद्देश्य धार्मिक एकता और सांस्कृतिक गौरव के माध्यम से लोगों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ना था।
Question 18. अतिवादी नेताओं ने स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु किस प्रकार के साधन अपनाये जाने का समर्थन किया?
Answer: अतिवादी नेताओं ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए उग्र साधन अपनाए जाने का समर्थन किया। उनका मानना था कि शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके पर्याप्त नहीं हैं, और आजादी पाने के लिए जोरदार आंदोलन और बलिदान की जरूरत है। वे ब्रिटिश सरकार को चुनौती देने में विश्वास रखते थे।
In simple words: अतिवादी नेता आजादी पाने के लिए तेज और जोशीले तरीके अपनाने पर जोर देते थे, बजाय धीरे-धीरे चलने के।
🎯 Exam Tip: अतिवादी नेताओं का दृष्टिकोण उदारवादियों से भिन्न था, जो संवैधानिक तरीकों को प्राथमिकता देते थे। अतिवादी 'स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है' के नारे में विश्वास रखते थे।
Question 19. भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दो अतिवादी नेताओं के नाम लिखिए।
Answer: भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दो अतिवादी नेताओं के नाम निम्नलिखित हैं:
1. **बाल गंगाधर तिलक**
2. **लाला लाजपत राय**
इनके साथ विपिन चन्द्र पाल भी प्रमुख अतिवादी नेता थे, जिन्हें 'लाल-बाल-पाल' की तिकड़ी के नाम से जाना जाता है।
In simple words: बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय भारत के दो बड़े अतिवादी नेता थे।
🎯 Exam Tip: अतिवादी नेताओं ने कांग्रेस के नरमपंथी दृष्टिकोण से हटकर पूर्ण स्वराज्य और उग्र राष्ट्रीयता की वकालत की।
Question 20. उदारवादी विचारधारा एवं अतिवादी विचारधारा में कोई एक अन्तर बताइए।
Answer: उदारवादी विचारधारा और अतिवादी विचारधारा में एक मुख्य अन्तर यह है कि उदारवादी ब्रिटिश शासन को भारतीयों के लिए एक वरदान मानते थे, जबकि अतिवादी उसे एक अभिशाप मानते थे। उदारवादी धीरे-धीरे सुधारों और संवैधानिक तरीकों में विश्वास रखते थे, जबकि अतिवादी तीव्र आन्दोलन और पूर्ण स्वराज्य की मांग करते थे।
In simple words: उदारवादी सोचते थे कि अंग्रेज भारत के लिए अच्छे हैं, पर अतिवादी सोचते थे कि अंग्रेज बुरे हैं।
🎯 Exam Tip: दोनों विचारधाराओं के बीच यह मूलभूत अंतर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की रणनीति और दिशा को निर्धारित करता था।
Question 21. अतिवादियों के कार्यक्रम का उल्लेख कीजिए।
Answer: अतिवादियों के कार्यक्रम में बहिष्कार, स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा मुख्य थे। वे ब्रिटिश उत्पादों का बहिष्कार करके, भारतीय उद्योगों को बढ़ावा देकर और अपनी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली विकसित करके स्वराज्य प्राप्त करना चाहते थे। उनका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से कमजोर करना था।
In simple words: अतिवादी बहिष्कार, स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा जैसे तरीके अपनाकर आज़ादी चाहते थे।
🎯 Exam Tip: ये कार्यक्रम ब्रिटिश शासन के खिलाफ जन-आन्दोलन खड़ा करने और भारतीयों में आत्मनिर्भरता की भावना जगाने के लिए थे।
Question 22. अतिवादियों के कार्यक्रम का मूल आधार क्या था?
Answer: अतिवादियों के कार्यक्रम का मूल आधार स्वराज्य, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा था। उनका मानना था कि इन साधनों के माध्यम से ही भारतीय जनता ब्रिटिश शासन के निरंकुशता का विरोध कर सकती है और पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त कर सकती है। वे देश प्रेम और आत्म-सम्मान की भावना को जगाना चाहते थे। प्रमुख अतिवादी नेता लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक एवं विपिन चन्द्र पाल थे।
In simple words: अतिवादी स्वराज्य, अपने देश का सामान, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा को अपने आंदोलन की नींव मानते थे।
🎯 Exam Tip: ये चारों स्तम्भ अतिवादी विचारधारा के मुख्य आधार थे, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद को एक नई और मुखर दिशा दी।
Question 24. बाल गंगाधर तिलक का जन्म कब व कहाँ हुआ?
Answer: बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को बम्बई प्रान्त (अब महाराष्ट्र) के कोंकण जिले के रत्नागिरी में हुआ था। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख नेता और अतिवादी विचारधारा के जनक थे।
In simple words: बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में हुआ था।
🎯 Exam Tip: उनकी जन्मतिथि और स्थान को याद रखना, भारतीय राष्ट्रवाद में उनके योगदान को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 25. स्वराज्य, स्वदेशी, बहिष्कार एवं राष्ट्रीय शिक्षा का सन्देश किसने दिया?
Answer: स्वराज्य, स्वदेशी, बहिष्कार एवं राष्ट्रीय शिक्षा का सन्देश बाल गंगाधर तिलक ने दिया था। उन्होंने इन साधनों को भारत की स्वतंत्रता प्राप्त करने और ब्रिटिश शासन को चुनौती देने का मुख्य आधार माना। उनके विचारों ने भारतीय जनता को एकजुट किया और उन्हें आत्म-निर्भर बनने के लिए प्रेरित किया।
In simple words: बाल गंगाधर तिलक ने स्वराज्य, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा का विचार लोगों को दिया।
🎯 Exam Tip: यह चतुर्भुज कार्यक्रम अतिवादी आंदोलन का मूल था, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को कमजोर कर भारतीयों को पूर्ण स्वशासन दिलाना था।
Question 26. "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूँगा।" यह नारा किस विचारक का है?
Answer: यह नारा लोकमान्य बालगंगाधर तिलक का है। इस नारे ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में लोगों में जोश भर दिया और स्वराज्य की मांग को एक मजबूत आधार प्रदान किया। यह तिलक के अडिग संकल्प और भारतीय जनता के अधिकारों के प्रति उनके विश्वास को दर्शाता है।
In simple words: यह प्रसिद्ध नारा बाल गंगाधर तिलक ने दिया था, जिसका मतलब था कि स्वराज्य हर भारतीय का जन्म से अधिकार है।
🎯 Exam Tip: यह नारा अतिवादी आंदोलन का सबसे शक्तिशाली उद्घोष था, जिसने लाखों भारतीयों को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए प्रेरित किया।
Question 27. तिलक के राजनीतिक दर्शन के कोई दो बिन्दु लिखिए।
Answer: तिलक के राजनीतिक दर्शन के दो मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं:
1. **व्यक्ति और समाज का आधार नैतिकता है:** तिलक का मानना था कि व्यक्ति और समाज दोनों को नैतिक मूल्यों पर आधारित होना चाहिए। वे नैतिकता को सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते थे।
2. **स्वतंत्रता सम्बन्धी दृष्टिकोण मूलतः आध्यात्मिक व नैतिक है:** तिलक के अनुसार स्वतंत्रता केवल राजनीतिक आजादी नहीं, बल्कि व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास और नैतिक उत्थान के लिए भी जरूरी है।
In simple words: तिलक का मानना था कि राजनीति में नैतिकता जरूरी है और स्वतंत्रता लोगों की आध्यात्मिक भलाई के लिए भी जरूरी है।
🎯 Exam Tip: तिलक के दर्शन में भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों का गहरा प्रभाव था, जो उन्हें अन्य समकालीन नेताओं से अलग करता था।
Question 28. तिलक के अनुसार स्वतन्त्रता को स्पष्ट कीजिए।
Answer: तिलक के अनुसार, स्वतंत्रता व्यक्ति के नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास का भावनात्मक सामर्थ्य एवं शक्ति है। उनका मानना था कि स्वतंत्रता केवल बाहरी राजनीतिक आज़ादी नहीं, बल्कि व्यक्ति की आंतरिक शक्ति और आत्मा का विकास भी है। स्वतंत्रता ही व्यक्ति को अपने उच्चतम नैतिक और आध्यात्मिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करती है।
In simple words: तिलक कहते थे कि स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ आज़ादी नहीं, बल्कि लोगों के नैतिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत होने की शक्ति है।
🎯 Exam Tip: तिलक का स्वतंत्रता संबंधी दृष्टिकोण केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन के मूल्यों से भी प्रेरित था, जिसमें आत्म-विकास और धर्म का महत्व था।
Question 29. तिलक के अनुसार स्वराज्य के दो प्रमुख रूप कौन-कौन से हैं?
Answer: तिलक ने स्वराज्य के दो प्रमुख रूप बताए हैं:
1. **आध्यात्मिक स्वराज्य:** यह व्यक्ति के आध्यात्मिक उत्थान और आत्मिक विकास से संबंधित है।
2. **राजनैतिक स्वराज्य:** यह राष्ट्र को राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने और अपने देश में अपना शासन स्थापित करने से संबंधित है।
जहाँ आध्यात्मिक स्वराज्य व्यक्ति के आध्यात्मिक उत्थान में सहायक है वहीं राजनीतिक स्वराज्य उसके लौकिक उत्थान में सहायक होता है।
In simple words: तिलक के अनुसार, स्वराज्य दो तरह का होता है- एक जो हमारी आत्मा को ऊपर उठाए (आध्यात्मिक स्वराज्य) और दूसरा जो देश को आज़ाद करे (राजनैतिक स्वराज्य)।
🎯 Exam Tip: यह विभाजन तिलक के दर्शन की गहराई को दर्शाता है, जिसमें वे केवल राजनीतिक मुक्ति ही नहीं, बल्कि व्यक्ति और समाज के समग्र उत्थान को भी महत्व देते थे।
Question 30. तिलक ने अपने राजनीतिक चिन्तन में किस बात पर अधिक बल दिया है?
Answer: तिलक ने अपने राजनीतिक विचारों में मुख्य रूप से लक्ष्य की पवित्रता पर जोर दिया है. उनका मानना था कि अच्छा लक्ष्य प्राप्त करने के लिए सही साधनों का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण होता है.
In simple words: तिलक ने अपने राजनीतिक विचारों में यह सिखाया कि हमारा लक्ष्य हमेशा पवित्र और सही होना चाहिए.
🎯 Exam Tip: राजनीति में साधन और साध्य दोनों की पवित्रता पर गाँधीजी के विचारों से तुलना करके याद रखना उपयोगी रहेगा.
Question 31. तिलक ने स्वराज्य के साध्य की प्राप्ति के लिए किन-किन साधनों का समर्थन किया?
Answer: तिलक ने स्वराज्य के लक्ष्य को पाने के लिए इन तरीकों का समर्थन किया था:
1. निष्क्रिय प्रतिरोध
2. स्वदेशी का प्रचार
3. बहिष्कार
4. राष्ट्रीय शिक्षा। ये सभी तरीके लोगों को एक साथ लाने और अंग्रेजों का विरोध करने में मदद करते थे.
In simple words: तिलक ने स्वराज्य पाने के लिए अहिंसक विरोध, अपने देश की चीजों का उपयोग, विदेशी चीजों का बहिष्कार और अपने देश की शिक्षा पर जोर दिया था.
🎯 Exam Tip: इन चारों साधनों को 'गरमपंथी साधन' भी कहा जाता है, जो उदारवादियों के 'संवैधानिक साधनों' से अलग थे.
Question 32. भारतीय राष्ट्रवाद को सर्वप्रथम एक सुनिश्चित व मूर्त अवधारणा बनाने का श्रेय किसको है?
Answer: भारतीय राष्ट्रवाद को पहली बार एक स्पष्ट और ठोस रूप देने का श्रेय बाल गंगाधर तिलक को दिया जाता है. उन्होंने भारतीय गौरव और संस्कृति को राष्ट्रवाद से जोड़ा.
In simple words: बाल गंगाधर तिलक ने सबसे पहले भारत के राष्ट्रवाद को एक साफ और समझने लायक विचार बनाया.
🎯 Exam Tip: तिलक ने राष्ट्रवाद को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आधार भी दिया था.
Question 33. सर्वप्रथम स्वराज्य का विचार देने का श्रेय किसको है?
Answer: सबसे पहले 'स्वराज्य' का विचार स्वामी दयानन्द सरस्वती ने दिया था. उन्होंने 'स्वराज्य' को भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य बताया.
In simple words: 'स्वराज्य' का विचार सबसे पहले स्वामी दयानन्द सरस्वती ने शुरू किया था.
🎯 Exam Tip: दयानन्द सरस्वती का 'स्वराज्य' का विचार मुख्य रूप से आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आजादी से जुड़ा था.
Question 34. स्वदेशी राष्ट्रवाद के समर्थक कौन थे?
Answer: स्वदेशी राष्ट्रवाद के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे. उन्होंने स्वदेशी को देशप्रेम का प्रतीक माना और इसे आत्मनिर्भरता से जोड़ा.
In simple words: बाल गंगाधर तिलक स्वदेशी राष्ट्रवाद के मुख्य समर्थक थे.
🎯 Exam Tip: स्वदेशी राष्ट्रवाद में सिर्फ अपने देश की चीजें इस्तेमाल करना ही नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और पहचान पर गर्व करना भी शामिल था.
Question 35. तिलक ने अपने राजनीतिक चिन्तन का केन्द्र किसे बनाया?
Answer: तिलक ने अपने राजनीतिक विचारों का केंद्र 'हिन्दू पुनरुत्थानवादी राष्ट्रवाद' को बनाया. उन्होंने भारतीय संस्कृति और परंपराओं को मजबूत करके राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया.
In simple words: तिलक ने अपने विचारों का केंद्र हिंदू राष्ट्रवाद को बनाया था.
🎯 Exam Tip: तिलक का 'पुनरुत्थानवादी राष्ट्रवाद' भारतीय गौरव और स्वाभिमान को फिर से जगाने पर केंद्रित था, न कि किसी धर्म विशेष पर.
Question 37. तिलक सम्पूर्ण भारत के संदर्भ में किस प्रकार के राष्ट्रवाद का विकास करना चाहते थे?
Answer: तिलक पूरे भारत के लिए 'भारतीय राष्ट्रवाद' का विकास करना चाहते थे. उनका लक्ष्य सभी भारतीयों को एकजुट करना और उनमें देशप्रेम की भावना जगाना था, ताकि वे अंग्रेजों के शासन से मुक्ति पा सकें.
In simple words: तिलक पूरे भारत के लिए एक ही भारतीय राष्ट्रवाद चाहते थे.
🎯 Exam Tip: तिलक का राष्ट्रवाद सिर्फ राजनीतिक आजादी तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें भारत की सांस्कृतिक पहचान और गौरव को भी शामिल किया गया था.
Question 38. उग्र राष्ट्रीय साधन अथवा गरमपंथी साधन अथवा उग्र राष्ट्रवादी संवैधानिक साधन से क्या आशय है?
Answer: 'उग्र राष्ट्रीय साधन' या 'गरमपंथी साधन' उन राजनीतिक तरीकों को कहते हैं, जिन्हें बाल गंगाधर तिलक ने ब्रिटिश शासन की मनमानी का विरोध करने और स्वराज्य पाने के लिए अपनाया था. इनमें खुले तौर पर विरोध करना, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा जैसे तरीके शामिल थे, जो अंग्रेजों से मुक्ति दिलाने के लिए जरूरी माने गए.
In simple words: 'उग्र साधन' का मतलब था कि अंग्रेजों के खिलाफ खुलकर और मजबूत तरीके से लड़ना, ताकि देश को आजादी मिल सके.
🎯 Exam Tip: 'उग्र राष्ट्रीय साधन' का उद्देश्य सिर्फ विरोध जताना नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन पर दबाव डालकर उन्हें मजबूर करना था.
Question 39. तिलक के अनुसार स्वदेशी का विचार क्या था?
Answer: तिलक के अनुसार, स्वदेशी का मतलब सिर्फ अपने देश की चीजों का इस्तेमाल करना नहीं था, बल्कि यह भारत के आध्यात्मिक विकास और राजनीतिक स्वराज्य पाने का एक मुख्य आधार था. बाद में यह पूरे राष्ट्रीय जीवन को फिर से मजबूत करने का एक बड़ा आंदोलन बन गया.
In simple words: तिलक मानते थे कि स्वदेशी से हमारा देश मजबूत बनेगा और हमें आध्यात्मिक तथा राजनीतिक आजादी भी मिलेगी.
🎯 Exam Tip: स्वदेशी आंदोलन ने लोगों में आत्मनिर्भरता और आत्म-सम्मान की भावना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
Question 40. बहिष्कार आन्दोलन का प्रारम्भिक उद्देश्य क्या था?
Answer: बहिष्कार आंदोलन का शुरुआती लक्ष्य ब्रिटिश शासन के आर्थिक हितों पर दबाव डालना था. इसका मकसद अंग्रेजों को बंगाल विभाजन के अपने फैसले को वापस लेने के लिए मजबूर करना था, क्योंकि इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान हो रहा था.
In simple words: बहिष्कार आंदोलन इसलिए शुरू किया गया था ताकि अंग्रेजों पर दबाव पड़े और वे बंगाल का बंटवारा रद्द कर दें.
🎯 Exam Tip: बहिष्कार एक आर्थिक हथियार था, जिसका उपयोग अंग्रेजों को आर्थिक रूप से कमजोर करके अपनी मांगें मनवाने के लिए किया गया.
Question 41. तिलक बहिष्कार को एक प्रभावशाली शस्त्र क्यों मानते थे?
Answer: तिलक बहिष्कार को एक बहुत ताकतवर हथियार मानते थे क्योंकि उनका मानना था कि इसके जरिए भारत की बिना हथियार वाली जनता बिना किसी हिंसा के ब्रिटिश शासन से आजादी पा सकती है. यह अंग्रेजों को आर्थिक रूप से कमजोर कर सकता था.
In simple words: तिलक का मानना था कि बहिष्कार से बिना लड़ाई के भी ब्रिटिश राज से आजादी मिल सकती है, इसलिए यह एक मजबूत हथियार था.
🎯 Exam Tip: बहिष्कार ने लोगों को एकजुट किया और दिखाया कि वे अंग्रेजों के बिना भी अपना काम चला सकते हैं, जिससे आत्मविश्वास बढ़ा.
Question 43. भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन के उदय के कोई दो कारण लिखिए।
Answer: भारत में क्रांतिकारी आंदोलन के उदय के दो मुख्य कारण ये थे:
1. अंग्रेजों द्वारा उदारवादी और उग्रवादी आंदोलनों को दबाना. जब शांतिपूर्ण विरोध काम नहीं आया, तो लोग उग्र तरीकों की ओर मुड़े.
2. अंग्रेजों की नस्लीय भेदभाव की नीति. अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार भी लोगों में गुस्सा भर रहा था.
In simple words: क्रांतिकारी आंदोलन इसलिए शुरू हुआ क्योंकि अंग्रेज शांतिपूर्ण आंदोलनों को दबाते थे और भारतीयों के साथ नस्लीय भेदभाव करते थे.
🎯 Exam Tip: क्रांतिकारी आंदोलन का उदय ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी, जब लोगों को लगा कि न्याय के लिए उन्हें कठोर कदम उठाने होंगे.
Question 44. स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु क्रान्तिकारियों के कार्यक्रम में सम्मिलित किन्हीं दो उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
Answer: स्वतंत्रता पाने के लिए क्रांतिकारियों के कार्यक्रम में ये दो मुख्य उद्देश्य शामिल थे:
1. भारतीयों के मन में राष्ट्रीयता, स्वतंत्रता और मातृभूमि के लिए प्यार जगाना. वे लोगों को देश के लिए लड़ने के लिए तैयार करना चाहते थे.
2. क्रांतिकारी आंदोलन के लिए छापे मारकर धन इकट्ठा करना. उन्हें अपने कामों के लिए पैसे की जरूरत थी, इसलिए वे छापे मारकर धन जुटाते थे.
In simple words: क्रांतिकारियों का उद्देश्य लोगों में देशप्रेम जगाना और अपने काम के लिए पैसे इकट्ठा करना था.
🎯 Exam Tip: क्रांतिकारियों का लक्ष्य सिर्फ हिंसा नहीं था, बल्कि लोगों को जगाना और अपने आंदोलन के लिए संसाधन जुटाना भी था.
Question 45. भारतीय क्रान्तिकारियों ने किस देश से प्रेरणा ली?
Answer: भारतीय क्रांतिकारियों ने आयरलैंड देश से प्रेरणा ली थी. आयरलैंड में भी स्वतंत्रता के लिए उग्र आंदोलन चल रहे थे, जिसने भारतीय क्रांतिकारियों को प्रभावित किया.
In simple words: भारतीय क्रांतिकारियों ने आयरलैंड से आजादी के लिए लड़ने की प्रेरणा ली.
🎯 Exam Tip: आयरलैंड का स्वतंत्रता संग्राम भारतीय क्रांतिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण था, क्योंकि दोनों देशों में उपनिवेशवादी शासन के खिलाफ संघर्ष चल रहा था.
Question 46. किन्हीं दो क्रान्तिकारी नेताओं के नाम लिखिए।
Answer: दो प्रमुख क्रांतिकारी नेता ये थे:
1. सरदार भगतसिंह
2. चन्द्रशेखर आजाद. इन दोनों ने भारत की आजादी के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी.
In simple words: सरदार भगतसिंह और चंद्रशेखर आजाद भारत के दो बड़े क्रांतिकारी नेता थे.
🎯 Exam Tip: इन नेताओं ने अपनी वीरता और बलिदान से लाखों भारतीयों को आजादी के लिए लड़ने की प्रेरणा दी.
Question 47. सरदार भगतसिंह का जन्म कब व कहाँ हुआ?
Answer: सरदार भगतसिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गाँव में हुआ था. उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था, जो पहले से ही देशभक्ति और क्रांति से जुड़ा था.
In simple words: भगतसिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907 को पंजाब के बंगा गाँव में हुआ था.
🎯 Exam Tip: भगतसिंह का जन्म स्थान और तारीख महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य हैं जो उनकी जीवनी से जुड़े हैं.
Question 49. भगतसिंह द्वारा लिखित किन्हीं दो पुस्तकों के नाम लिखिए।
Answer: भगतसिंह द्वारा लिखी गई दो पुस्तकें ये थीं:
1. बॉयोग्राफी
2. डोर टू डेथ. ये किताबें उन्होंने जेल में रहते हुए लिखी थीं और इनमें उनके विचार साफ झलकते हैं.
In simple words: भगतसिंह ने 'बॉयोग्राफी' और 'डोर टू डेथ' नाम की दो किताबें लिखीं.
🎯 Exam Tip: भगतसिंह की किताबें उनके क्रांतिकारी विचारों और दर्शन को समझने में मदद करती हैं.
Question 50. 'जेल नोट बुक' नामक पुस्तक किसने लिखी?
Answer: 'जेल नोट बुक' नामक पुस्तक भगतसिंह ने लिखी थी. उन्होंने यह किताब जेल में बंद रहने के दौरान अपने विचारों और अनुभवों को दर्ज करने के लिए लिखी थी.
In simple words: 'जेल नोट बुक' भगतसिंह ने जेल में लिखी थी.
🎯 Exam Tip: यह पुस्तक भगतसिंह के राजनीतिक, सामाजिक और दार्शनिक विचारों का एक महत्वपूर्ण संग्रह है.
Question 51. केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंकने के पश्चात् इन्कलाब जिन्दाबाद, 'साम्राज्यवाद का नाश हो' के नारे किसने लगाए।
Answer: केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने के बाद 'इंकलाब जिंदाबाद' और 'साम्राज्यवाद का नाश हो' के नारे भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने लगाए थे. उन्होंने ये नारे अपनी आवाज बहरे कानों तक पहुंचाने के लिए लगाए थे.
In simple words: केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने के बाद भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 'इंकलाब जिंदाबाद' और 'साम्राज्यवाद का नाश हो' के नारे लगाए थे.
🎯 Exam Tip: ये नारे सिर्फ आवाज नहीं थे, बल्कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक मजबूत संदेश थे जो पूरे देश में गूंजा.
Question 52. 'इन्कलाब जिन्दाबाद' का नारा किसने दिया?
Answer: 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा भगतसिंह ने दिया था. यह नारा क्रांति और स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया और पूरे भारत में फैल गया.
In simple words: भगतसिंह ने 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा दिया था.
🎯 Exam Tip: यह नारा आज भी परिवर्तन और विरोध के प्रतीक के रूप में उपयोग किया जाता है.
Question 53. केन्द्रीय असेम्बली में बमकाण्ड के दौरान किस विधेयक पर विचार हो रहा था?
Answer: केंद्रीय असेंबली में बम कांड के दौरान 'पब्लिक सेफ्टी बिल' पर विचार हो रहा था. यह बिल अंग्रेजों को लोगों को बिना मुकदमे के गिरफ्तार करने की शक्ति देता था.
In simple words: बम फेंकते समय 'पब्लिक सेफ्टी बिल' पर बहस चल रही थी.
🎯 Exam Tip: क्रांतिकारियों ने इस बिल का विरोध करने और अपनी आवाज उठाने के लिए बम फेंका था, ताकि सरकार को जगाया जा सके.
Question 54. चन्द्रशेखर आजाद का जन्म कब व कहाँ हुआ?
Answer: चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के बहोर नामक गाँव में हुआ था. वे बचपन से ही निडर और देशप्रेमी थे.
In simple words: चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्य प्रदेश के बहोर गाँव में हुआ था.
🎯 Exam Tip: चंद्रशेखर आजाद ने अपनी मातृभूमि के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया और हमेशा आजाद रहे.
Question 55. चन्द्रशेखर आजाद कब भारतीय क्रान्तिकारी दल में सम्मिलित हुए थे?
Answer: चंद्रशेखर आजाद 1920-21 के असहयोग आंदोलन के बाद भारतीय क्रांतिकारी दल में शामिल हुए थे, जब महात्मा गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया था. उस समय कई युवा क्रांतिकारी समूहों में शामिल हो रहे थे.
In simple words: चंद्रशेखर आजाद 1920 के बाद भारतीय क्रांतिकारी दल में शामिल हुए थे.
🎯 Exam Tip: असहयोग आंदोलन के स्थगन के बाद कई युवाओं में निराशा थी, जिससे वे क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर आकर्षित हुए.
Question 56. चन्द्रशेखर आजाद ने किस ट्रेन डकेती में भाग लिया था?
Answer: चंद्रशेखर आजाद ने काकोरी ट्रेन डकैती में भाग लिया था. यह घटना 9 अगस्त, 1925 को हुई थी, जिसमें क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाने को लूटकर अपने आंदोलन के लिए धन इकट्ठा किया था.
In simple words: चंद्रशेखर आजाद काकोरी ट्रेन डकैती में शामिल थे.
🎯 Exam Tip: काकोरी कांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने ब्रिटिश सरकार को हिला दिया था.
Question 57. पुलिस अधिकारी साण्डर्स की हत्या में कौन - कौन से क्रान्तिकारी सम्मिलित थे?
Answer: पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या में सरदार भगतसिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद शामिल थे. उन्होंने लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए यह कदम उठाया था.
In simple words: भगतसिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद ने सांडर्स को मारा था.
🎯 Exam Tip: सांडर्स की हत्या अंग्रेजों के खिलाफ एक सीधा और साहसी कदम था, जिसने भारतीय क्रांतिकारियों के संकल्प को दिखाया.
Question 58. चन्द्रशेखर आजाद ने क्या प्रतिज्ञा की थी?
Answer: चंद्रशेखर आजाद ने यह कसम खाई थी कि, "दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहेंगे, आजाद ही रहेंगे." उन्होंने यह प्रतिज्ञा की थी कि वे कभी अंग्रेजों के हाथों जिंदा नहीं पकड़े जाएंगे, चाहे इसके लिए उन्हें अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े.
In simple words: चंद्रशेखर आजाद ने कसम खाई थी कि वे कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आएंगे और हमेशा आजाद रहेंगे.
🎯 Exam Tip: आजाद की यह प्रतिज्ञा उनके नाम के साथ हमेशा जुड़ी रही और उन्होंने इसे अपने अंतिम क्षणों तक निभाया.
Question 59. सरदार भगतसिंह एवं उनके साथियों को ब्रिटिश शासन में कब फाँसी दी?
Answer: सरदार भगतसिंह और उनके साथियों (राजगुरु और सुखदेव) को ब्रिटिश शासन ने 23 मार्च, 1931 को फाँसी दी थी. यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक काला दिन था, लेकिन इसने लोगों में क्रांति की आग और तेज कर दी.
In simple words: भगतसिंह और उनके साथी 23 मार्च, 1931 को फाँसी पर लटकाए गए थे.
🎯 Exam Tip: 23 मार्च को हर साल 'शहीद दिवस' के रूप में मनाया जाता है, जो इन महान क्रांतिकारियों के बलिदान की याद दिलाता है.
Question 60. नेताजी के नाम से किस क्रान्तिकारी को जाना जाता है?
Answer: नेताजी के नाम से सुभाषचंद्र बोस को जाना जाता है. उन्हें यह सम्मान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके अतुलनीय योगदान और उनके नेतृत्व के लिए दिया गया था.
In simple words: सुभाषचंद्र बोस को 'नेताजी' कहते हैं.
🎯 Exam Tip: 'नेताजी' उपाधि उनके साहसिक नेतृत्व और राष्ट्र के प्रति अगाध प्रेम का प्रतीक है.
Question 61. सुभाषचन्द्र बोस का जन्म कब वे कहाँ हुआ?
Answer: सुभाषचंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक में हुआ था. उनका जन्म एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था और वे बचपन से ही मेधावी छात्र थे.
In simple words: सुभाषचंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक में हुआ था.
🎯 Exam Tip: 23 जनवरी को 'पराक्रम दिवस' के रूप में मनाया जाता है, जो नेताजी सुभाषचंद्र बोस के जन्मदिन को समर्पित है.
Question 62. सुभाषचन्द्र बोस ने राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने के लिए किस पद से त्याग – पत्र दिया था?
Answer: सुभाषचंद्र बोस ने राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होने के लिए भारतीय जनपद सेवा (आईसीएस) के पद से इस्तीफा दे दिया था. उन्होंने ब्रिटिश सरकार की गुलामी करने के बजाय देश सेवा को चुना.
In simple words: सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय जनपद सेवा (आईसीएस) की नौकरी छोड़ दी थी ताकि वे देश की आजादी की लड़ाई में शामिल हो सकें.
🎯 Exam Tip: आईसीएस उस समय सबसे प्रतिष्ठित नौकरियों में से एक थी, लेकिन सुभाषचंद्र बोस ने इसे त्यागकर देश के प्रति अपनी निष्ठा साबित की.
Question 64. फारवर्ड ब्लॉक की स्थापना कब व किसने की?
Answer: फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना मई, 1939 में सुभाषचंद्र बोस ने की थी. उन्होंने कांग्रेस से मतभेदों के बाद इस पार्टी का गठन किया था, जिसका उद्देश्य वामपंथी विचारों को मजबूत करना था.
In simple words: फॉरवर्ड ब्लॉक को सुभाषचंद्र बोस ने मई, 1939 में बनाया था.
🎯 Exam Tip: फॉरवर्ड ब्लॉक का मुख्य उद्देश्य भारत को ब्रिटिश शासन से पूरी तरह आजाद कराना और समाजवादी समाज की स्थापना करना था.
Question 65. आजाद हिन्द फौज का गठन किसने किया?
Answer: आजाद हिंद फौज का गठन सुभाषचंद्र बोस ने किया था. उन्होंने भारतीय सैनिकों को एकजुट करके इस फौज का निर्माण किया, ताकि वे अंग्रेजों के खिलाफ लड़ सकें.
In simple words: सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज बनाई थी.
🎯 Exam Tip: आजाद हिंद फौज ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
Question 66. आजाद भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना कहाँ की गयी?
Answer: आजाद भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना सिंगापुर में की गई थी. सुभाषचंद्र बोस ने अक्टूबर 1943 में इस सरकार की घोषणा की, जिसका उद्देश्य भारत को ब्रिटिश राज से मुक्त कराना था.
In simple words: आजाद भारत की अस्थायी सरकार सिंगापुर में बनी थी.
🎯 Exam Tip: इस अस्थायी सरकार को कई देशों ने मान्यता दी थी, जिससे यह भारत की स्वतंत्रता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था.
Question 67. आजाद भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना कब व किसने की?
Answer: आजाद भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना 21 अक्टूबर, 1943 को सुभाषचंद्र बोस ने की थी. इसका उद्देश्य विदेशों में रहकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष को जारी रखना था.
In simple words: सुभाषचंद्र बोस ने 21 अक्टूबर, 1943 को आजाद भारत की अस्थायी सरकार बनाई.
🎯 Exam Tip: इस सरकार ने भारतीयों को यह संदेश दिया कि उनकी आजादी का संघर्ष विदेशों में भी जारी है.
Question 68. भारतीय राष्ट्रीय सेना को सुभाषचन्द्र बोस ने क्या नारा दिया था?
Answer: भारतीय राष्ट्रीय सेना (आजाद हिंद फौज) को सुभाषचंद्र बोस ने 'दिल्ली चलो' का युद्ध नारा दिया था. यह नारा सैनिकों को दिल्ली की ओर बढ़कर ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित करता था.
In simple words: सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रीय सेना को 'दिल्ली चलो' का नारा दिया था.
🎯 Exam Tip: 'दिल्ली चलो' जैसे नारे सैनिकों में जोश भर देते थे और उन्हें अपने लक्ष्य की याद दिलाते थे.
Question 69. आजाद भारत की अस्थायी सरकार को कितने देशों ने मान्यता प्रदान की?
Answer: आजाद भारत की अस्थायी सरकार को नौ देशों ने मान्यता दी थी. इन देशों में जापान, जर्मनी, इटली और बर्मा (म्यांमार) जैसे राष्ट्र शामिल थे, जिन्होंने ब्रिटिश विरोधी शक्तियों का समर्थन किया था.
In simple words: आजाद भारत की अस्थायी सरकार को नौ देशों ने मान्यता दी थी.
🎯 Exam Tip: अंतरराष्ट्रीय मान्यता ने इस अस्थायी सरकार को एक मजबूत राजनीतिक पहचान दी.
Question 70. जयहिन्द का नारा किसने दिया?
Answer: 'जय हिंद' का नारा सुभाषचंद्र बोस ने दिया था. यह नारा भारतीय राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया और आज भी देशभक्ति के भाव को व्यक्त करने के लिए उपयोग किया जाता है.
In simple words: 'जय हिंद' का नारा सुभाषचंद्र बोस ने दिया था.
🎯 Exam Tip: 'जय हिंद' का नारा आज भी भारतीय सेना और आम जनता में राष्ट्रीय एकता और गर्व का प्रतीक है.
RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. ब्रिटिश सरकार के प्रति उदारवादी नेताओं का क्या दृष्टिकोण था?
Answer: उदारवादी नेताओं का मानना था कि ब्रिटिश सरकार के सहयोग और मदद से ही भारत का धीरे-धीरे विकास हो सकता है. वे ब्रिटिश शासन को न्यायप्रिय मानते थे.
In simple words: उदारवादी नेता सोचते थे कि ब्रिटिश सरकार की मदद से ही भारत आगे बढ़ सकता है.
🎯 Exam Tip: उदारवादियों का यह दृष्टिकोण उनकी संवैधानिक तरीकों और शांतिपूर्ण आंदोलन में विश्वास को दर्शाता है.
Question 2. गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म कब और कहाँ हुआ?
Answer: गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 1866 ई. में बम्बई प्रांत के कोल्हापुर जिले में हुआ था. वे एक महान उदारवादी नेता थे, जिन्हें महात्मा गांधी अपना राजनीतिक गुरु मानते थे.
In simple words: गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 1866 में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुआ था.
🎯 Exam Tip: गोखले का जन्म स्थान और वर्ष भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व से जुड़ा है, इसलिए इसे याद रखना जरूरी है.
Question 1. गोपाल कृष्ण गोखले ब्रिटिश जाति की उदारता एवं न्यायप्रियता में विश्वास करते थे? इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
Answer: गोपाल कृष्ण गोखले ब्रिटिश लोगों के उदार और न्यायपूर्ण स्वभाव में विश्वास रखते थे. उनकी शिक्षा-दीक्षा ने उनमें ब्रिटिश उदारवाद के प्रति गहरा विश्वास पैदा किया. गोखले ब्रिटिश शासन को भारत के लिए भगवान का एक वरदान मानते थे. उनके अनुसार, ब्रिटिश शासन का लक्ष्य सिर्फ इंग्लैंड को फायदा पहुंचाना नहीं, बल्कि भारत का भौतिक विकास भी था. वे सोचते थे कि ब्रिटिश शासन ने ही भारत को राजनीतिक एकता और एक समान न्याय व्यवस्था दी है, साथ ही अंग्रेजी भाषा और शिक्षा जैसे संचार साधन भी दिए. वे चाहते थे कि जनता ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार रहे और सरकार भी अपने नैतिक कर्तव्यों को याद रखे.
In simple words: गोखले मानते थे कि अंग्रेज न्यायप्रिय और उदार थे. उन्हें लगता था कि ब्रिटिश राज ने भारत को एकता और विकास दिया है, इसलिए वे अंग्रेजों के साथ मिलकर काम करना चाहते थे.
🎯 Exam Tip: यह कथन उदारवादी विचारधारा की नींव को समझाता है, जो शांतिपूर्ण सुधारों और ब्रिटिश न्याय में विश्वास रखती थी.
Question 2. 'गोपाल कृष्ण गोखले संवैधानिक साधनों एवं वैधानिक आन्दोलनों में अडिग विश्वास करते थे' कथन को स्पष्ट कीजिए।
Answer: गोपाल कृष्ण गोखले संवैधानिक तरीकों और कानूनी आंदोलनों में पक्का विश्वास रखते थे. वे उग्र विचारों, हिंसक साधनों या गैर-कानूनी तरीकों को भारत के लिए हानिकारक मानते थे और उनके खिलाफ थे. वे चाहते थे कि भारत में स्वशासन संवैधानिक तरीकों से ही मिले. गोखले व्यावहारिक रूप से ब्रिटिश शासन की ताकत का मुकाबला करना मुश्किल मानते थे. उनके संवैधानिक साधन मुख्य रूप से उदारवादी और शांतिपूर्ण थे, जैसे-याचिकाएं, प्रार्थना-पत्र, स्मरण-पत्र, प्रतिनिधि-मंडल, समाचार-पत्र, विचार-विमर्श, सभाएं और रचनात्मक आलोचना. उन्होंने निष्क्रिय प्रतिरोध को भी कानूनी आंदोलन के रूप में ही स्वीकार किया.
In simple words: गोखले मानते थे कि आजादी पाने के लिए सिर्फ कानूनी और शांतिपूर्ण तरीके ही सही हैं. वे हिंसा या गैर-कानूनी कामों के खिलाफ थे और ब्रिटिश सरकार से मिलकर काम करना चाहते थे.
🎯 Exam Tip: गोखले का विश्वास था कि ब्रिटिश सरकार को याचिकाएं और बातचीत से ही प्रभावित किया जा सकता है, न कि टकराव से.
Question 3. 'बाल गंगाधर तिलक का राष्ट्रवाद प्राचीन भारत के गौरव से प्रभावित था-इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
Answer: बाल गंगाधर तिलक का राष्ट्रवाद पुराने भारत की शान से प्रेरित था. भारतीय राष्ट्रवाद को एक स्पष्ट और ठोस रूप देने का श्रेय तिलक को जाता है. गोखले के विपरीत, तिलक राष्ट्रवाद को भारतीय परंपराओं, भावनाओं और परिस्थितियों के अनुसार विकसित करना चाहते थे. तिलक 'स्वदेशी राष्ट्रवाद' के समर्थक थे. तिलक का मानना था कि "हम अपनी संस्थाओं का अंग्रेजीकरण नहीं करना चाहते." वे उदारवादियों के इस विचार से सहमत नहीं थे कि भारत की राजनीतिक एकता ब्रिटिश शासन के कारण है. तिलक ने 'हिंदू राष्ट्र' का विचार सामने रखा और हिंदुओं को उनकी पूरी पहचान दिलाने की बात कही. इसलिए तिलक का राष्ट्रवाद 'समग्र राष्ट्रवाद' कहलाता है.
In simple words: तिलक का राष्ट्रवाद पुराने भारत की महान संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा था. वे चाहते थे कि भारत अपनी पुरानी शान और पहचान के साथ आगे बढ़े, न कि अंग्रेजों के तरीकों को अपनाकर.
🎯 Exam Tip: तिलक ने राष्ट्रवाद को सिर्फ राजनीतिक आजादी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे भारतीय संस्कृति और सभ्यता से जोड़कर एक गहरा भावनात्मक रूप दिया.
Question 4. स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु अतिवादी आन्दोलन के विशिष्ट पक्षों को स्पष्ट कीजिए।
Answer: स्वतंत्रता पाने के लिए अतिवादी आंदोलन के खास पहलू ये थे:
1. वे ब्रिटिश शासन को भारतीयों के लिए फायदेमंद नहीं मानते थे और विदेशी शासन का सहयोग करने से मना करते थे.
2. उन्हें ब्रिटिश न्याय और ईमानदारी पर भरोसा नहीं था.
3. वे दया या भीख मांगने के बजाय स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता से अपने अधिकार चाहते थे. तिलक कहते थे, "हमारा आदर्श दया नहीं, आत्मनिर्भरता है."
4. वे जनता को सीधे राजनीतिक काम करने के लिए प्रेरित करते थे और जागरूकता बढ़ाने के लिए नए नारे देते थे.
5. अतिवादी नेता स्वतंत्रता पाने के लिए संवैधानिक तरीकों को अधूरा मानते थे. उनका मानना था कि स्वराज्य दान में नहीं, बल्कि अपनी ताकत से मिलता है.
6. अतिवादियों ने भारतीय संस्कृति के प्रति गर्व की भावना को बढ़ावा दिया. उन्होंने लोगों को अपनी विरासत पर गर्व करना सिखाया.
In simple words: अतिवादी नेता ब्रिटिश राज पर भरोसा नहीं करते थे. वे आजादी पाने के लिए अपनी ताकत पर भरोसा करते थे और लोगों को सीधे आंदोलन करने के लिए प्रेरित करते थे, साथ ही भारतीय संस्कृति पर गर्व करना सिखाते थे.
🎯 Exam Tip: अतिवादियों का यह रुख उदारवादियों से बिल्कुल अलग था, जो शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों में विश्वास रखते थे. अतिवादियों ने सीधे कार्रवाई पर जोर दिया.
Question 5. बाल गंगाधर तिलक के अनुसार स्वदेशी के विचार को स्पष्ट कीजिए।
Answer: बाल गंगाधर तिलक के अनुसार स्वदेशी का विचार देशप्रेम का प्रतीक था. वे कहते थे कि यह एक बहुत असरदार तरीका है जो हमें आजादी दिला सकता है. तिलक के लिए स्वदेशी सिर्फ भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता तक सीमित नहीं था, बल्कि वे इसे भारत के आध्यात्मिक उत्थान और राजनीतिक स्वराज्य पाने का मुख्य आधार मानते थे. उनका स्वदेशी आंदोलन पूरे राष्ट्रीय जीवन को फिर से जगाने का आंदोलन बन गया. तिलक ने स्वदेशी के राजनीतिक महत्व को समझाते हुए कहा, "अगर हम गोरे लोगों की गुलामी में नहीं रहना चाहते हैं, तो हमें स्वदेशी के आंदोलन को पूरी ताकत से चलाना होगा. यही एकमात्र ऐसा प्रभावशाली तरीका है जो हमें मुक्ति दिला सकता है."
In simple words: तिलक मानते थे कि स्वदेशी का मतलब सिर्फ अपने देश की चीजें इस्तेमाल करना नहीं, बल्कि देश से प्यार करना और खुद को मजबूत बनाना है. यह हमें अंग्रेजों से आजादी दिला सकता है.
🎯 Exam Tip: स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय उद्योगों को बढ़ावा दिया और लोगों में आत्मनिर्भरता की भावना जगाई, जो स्वतंत्रता संग्राम के लिए बहुत जरूरी था.
Question 6. बहिष्कार आन्दोलन को स्पष्ट कीजिए। बहिष्कार के सम्बन्ध में बाल गंगाधर तिलक के विचारों को बताइए।
Answer: बहिष्कार आंदोलन का मतलब था विदेशी वस्तुओं का त्याग करना. बाल गंगाधर तिलक ने 1905 के कांग्रेस के बनारस अधिवेशन में बहिष्कार (बॉयकॉट) प्रस्ताव का समर्थन किया. उदारवादियों के विरोध के बावजूद कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया. बहिष्कार आंदोलन का शुरुआती मकसद ब्रिटिश शासन के आर्थिक हितों पर दबाव डालकर उन्हें बंगाल विभाजन का फैसला रद्द करने के लिए मजबूर करना था. तिलक मानते थे कि बहिष्कार की भावना सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी थी. वे बहिष्कार को एक शक्तिशाली राजनीतिक हथियार मानते थे, जिससे भारत की बिना हथियार वाली जनता बिना किसी हिंसा के ब्रिटिश शासन से आजादी पा सकती थी.
In simple words: बहिष्कार आंदोलन का मतलब विदेशी चीजों का त्याग करना था. तिलक मानते थे कि इससे अंग्रेजों पर दबाव पड़ेगा और भारत को आजादी मिलेगी. यह एक शांतिपूर्ण लेकिन मजबूत हथियार था.
🎯 Exam Tip: बहिष्कार आंदोलन ने लोगों को एकजुट किया और उन्हें ब्रिटिश वस्तुओं पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए प्रेरित किया, जिससे राष्ट्रीय चेतना बढ़ी.
Question 7. बाल गंगाधर तिलक ने स्वराज्य की प्राप्ति के लिए निष्क्रिय प्रतिरोध के साधन को अत्यन्त महत्वपूर्ण साधन माना? क्यों? स्पष्ट कीजिए।
Answer: बाल गंगाधर तिलक ने स्वराज्य पाने के लिए निष्क्रिय प्रतिरोध को एक बहुत महत्वपूर्ण तरीका माना. उन्होंने इसे महत्वपूर्ण इसलिए माना क्योंकि निष्क्रिय प्रतिरोध का आधार यह विचार था कि अन्यायपूर्ण कानूनों का विरोध करना हर व्यक्ति का कर्तव्य है. तिलक निष्क्रिय प्रतिरोध के तरीके को मूल रूप से संवैधानिक भी मानते थे. उनके अनुसार, यह तरीका कानून, न्याय, नैतिकता और जनमत के अनुसार था. तिलक की निष्क्रिय प्रतिरोध नीति में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं थी. वास्तव में निष्क्रिय प्रतिरोध स्वेच्छा से सामूहिक असहयोग की नीति पर आधारित था. तिलक आर्थिक, कानूनी, प्रशासनिक और न्यायिक सहित सभी क्षेत्रों में ब्रिटिश नौकरशाही के प्रति निष्क्रिय प्रतिरोध के रूप में जनता का सहयोग चाहते थे.
In simple words: तिलक ने निष्क्रिय प्रतिरोध को आजादी पाने का एक अहम तरीका माना क्योंकि इससे बिना हिंसा के ब्रिटिश कानूनों का विरोध किया जा सकता था. उनका मानना था कि यह तरीका कानून और नैतिकता के हिसाब से सही था.
🎯 Exam Tip: निष्क्रिय प्रतिरोध का लक्ष्य ब्रिटिश सरकार को बिना किसी हिंसक टकराव के जन सहयोग से कमजोर करना था.
Question 8. 'बाल गंगाधर तिलक ने शिक्षा को अपने राजनीतिक साध्य, स्वराज्य की प्राप्ति के लिए एक आधारभूत साधन के रूप में स्वीकार किया- कथन को स्पष्ट कीजिए।
Answer: बाल गंगाधर तिलक राष्ट्र के विकास में शिक्षा की बहुत अहम भूमिका मानते थे. तिलक ने शिक्षा को अपने राजनीतिक लक्ष्य यानी स्वराज्य पाने का एक मुख्य आधार माना. उन्होंने 'न्यू इंग्लिश स्कूल', 'दक्षिण शिक्षा समाज' और 'फर्ग्यूसन कॉलेज' की स्थापना की. बाद में स्वदेशी आंदोलन के दौरान उन्होंने समर्थ गुरु रामदास के नाम पर कई 'समर्थ विद्यालय' खुलवाए. वे चाहते थे कि छात्रों को इस तरह से शिक्षा दी जाए कि उनमें स्वराज्य पाने की गहरी भावना पैदा हो. वे मातृभाषा में शिक्षा देने के पक्ष में थे. राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओं के छात्रों ने राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया और जनता में राष्ट्रीय चेतना फैलाई.
In simple words: तिलक मानते थे कि शिक्षा ही स्वराज्य पाने का रास्ता है. उन्होंने स्कूल और कॉलेज खोले ताकि बच्चों को ऐसी शिक्षा मिले जिससे वे देश से प्यार करें और आजादी के लिए लड़ें.
🎯 Exam Tip: तिलक ने शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय भावना और स्वशासन के लिए तैयारी का एक शक्तिशाली उपकरण माना.
Question 9. बाल गंगाधर तिलक के मतानुसार राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली एवं पाठ्यक्रम में कौन-कौन से गुण होने चाहिए?
Answer: बाल गंगाधर तिलक के अनुसार राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली और पाठ्यक्रम में ये गुण होने चाहिए:
1. बच्चों को धार्मिक शिक्षा मिलनी चाहिए ताकि उनमें नैतिक मूल्य बढ़ें. यह शिक्षा छात्रों में धार्मिक सद्भाव को बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए.
2. भारत की अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाओं के लिए देवनागरी लिपि को अपनाया जाना चाहिए.
3. भारत में औद्योगिक विकास के लिए तकनीकी शिक्षा का इंतजाम करना चाहिए. इससे युवाओं को रोजगार मिलेगा और भारत आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनेगा.
4. विद्यार्थियों को राजनीतिक शिक्षा देनी चाहिए ताकि वे राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को समझें और राष्ट्र के विकास में सक्रिय भूमिका निभा सकें.
5. शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो छात्रों में धार्मिक सहिष्णुता की भावना विकसित करे.
In simple words: तिलक चाहते थे कि हमारी शिक्षा में धार्मिक और नैतिक बातें सिखाई जाएं, क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा मिले, तकनीकी शिक्षा हो ताकि लोगों को नौकरी मिले और बच्चों को देश के प्रति अपने कर्तव्य समझ आएं.
🎯 Exam Tip: तिलक की शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य सिर्फ ज्ञान देना नहीं, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना था जो आत्मनिर्भर हों, नैतिक हों और देश के प्रति समर्पित हों.
Question 10. क्रान्तिकारी आन्दोलन के उत्थान के प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
क्रान्तिकारी आन्दोलन से क्या आशय है? इसके उदय के क्या कारण थे?
Answer: क्रांतिकारी आंदोलन का मतलब था एक ऐसी विचारधारा जिसने अंग्रेजों के खिलाफ हिंसा और बल का उपयोग करके स्वतंत्रता पाने की कोशिश की. इसका उदय कई कारणों से हुआ:
1. उदारवादियों और अतिवादियों के बहुत प्रयासों के बाद भी उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली, जिससे लोगों में निराशा बढ़ी.
2. ब्रिटिश शासन ने भारतीयों पर ध्यान देने के बजाय उन पर अत्याचार करना शुरू कर दिया. उन्होंने कई दमनकारी कानून बनाए और स्वतंत्रता आंदोलन के बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया.
3. जुलूसों और सभाओं पर रोक लगा दी गई, और बंगाल विभाजन के खिलाफ आंदोलन करने वाले हजारों लोगों को जेल भेजा गया, जहां उन पर बहुत अत्याचार हुए.
ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के कारण भारतीय राजनीति में एक नई विचारधारा का जन्म हुआ, जिसे क्रांतिकारी आंदोलन कहा गया. इस आंदोलन के समर्थक हिंसा का उपयोग करके ब्रिटिश शासन को खत्म करना और स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहते थे. प्रमुख क्रांतिकारी नेताओं में सुभाषचंद्र बोस, भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, वीर सावरकर आदि शामिल थे.
In simple words: क्रांतिकारी आंदोलन तब शुरू हुआ जब शांतिपूर्ण तरीकों से आजादी नहीं मिली. अंग्रेजों के अत्याचार, नेताओं की गिरफ्तारी और बंगाल विभाजन जैसे कारणों ने लोगों में गुस्सा भर दिया, जिससे उन्होंने हिंसा का रास्ता अपनाया और आजादी के लिए लड़ने लगे.
🎯 Exam Tip: क्रांतिकारी आंदोलन ब्रिटिश राज के दमन और उदारवादी व अतिवादी प्रयासों की सीमित सफलता के जवाब में एक मजबूत प्रतिक्रिया थी.
Question 11. क्रान्तिकारियों की प्रमुख नीतियों का उल्लेख कीजिए।
Answer: क्रांतिकारियों की नीतियां बहुत साफ थीं. वे किसी भी हाल में ब्रिटिश शासन से भारत को आजाद कराना चाहते थे. उन्होंने भारत माँ के सम्मान की रक्षा और उसके गौरव को बनाए रखने के लिए जरूरी तरीकों पर जोर दिया. उनका मानना था कि अगर कोई लक्ष्य नैतिक तरीकों से प्राप्त नहीं हो सकता, तो उसे हिंसा और बल से प्राप्त किया जाना चाहिए. क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश शासन को उन्हीं की भाषा में जवाब देते हुए हथियारों का भी इस्तेमाल किया. उनका संदेश था, "तलवार हाथ में लो और सरकार को मिटा दो."
In simple words: क्रांतिकारियों का मुख्य लक्ष्य भारत को अंग्रेजों से आजाद कराना था. वे मानते थे कि अगर जरूरत पड़े तो हिंसा का इस्तेमाल भी सही है, ताकि देश का सम्मान वापस लाया जा सके.
🎯 Exam Tip: क्रांतिकारियों की नीतियां सीधे और साहसिक कार्रवाई पर केंद्रित थीं, जो ब्रिटिश शासन को चुनौती देने के लिए आवश्यक मानी गईं.
Question 12. क्रान्तिकारियों के प्रमुख लक्ष्य क्या थे? संक्षेप में बताइए।
Answer: क्रांतिकारियों का मुख्य लक्ष्य भारत से ब्रिटिश शासन को पूरी तरह से खत्म करना था. क्रांतिकारी ब्रिटिश शासकों के मन में अत्याचारों के खिलाफ डर पैदा करना चाहते थे. क्रांतिकारी नेता सिर्फ उन ब्रिटिश अधिकारियों को मारते थे, जो भारतीय देशभक्तों पर ज्यादा अत्याचार करते थे.
क्रांतिकारी भारतीय जनता को संघर्ष के लिए प्रेरित करना और अंग्रेजी शासन के मन में डर पैदा करना चाहते थे. स्वतंत्रता के लिए बलिदान क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत था. भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराना, अपनी मातृभूमि की खोई हुई शान को वापस लाना और सभी भारतीयों को आजादी की खुली हवा में सांस लेने का एहसास दिलाना क्रांतिकारियों के लक्ष्यों में शामिल था.
In simple words: क्रांतिकारियों का मुख्य लक्ष्य भारत को अंग्रेजों से पूरी तरह आजाद कराना था. वे लोगों में देशप्रेम जगाना, अंग्रेजों को डराना और उन ब्रिटिश अधिकारियों को हटाना चाहते थे जो भारतीयों पर अत्याचार करते थे.
🎯 Exam Tip: क्रांतिकारियों का उद्देश्य सिर्फ शासन बदलना नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज की स्थापना करना था जहाँ सभी को न्याय और स्वतंत्रता मिले.
Question 13. भारतीय राष्टीय आन्दोलन के प्रमुख क्रान्तिकारी नेताओं का उल्लेख कीजिए।
Answer: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों का योगदान बहुत बड़ा है. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख क्रांतिकारी नेताओं में ये शामिल थे: सरदार भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु, सुभाषचंद्र बोस, अजीत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, खुदीराम बोस, रासबिहारी बोस, बटुकेश्वर दत्त, अरविंद घोष, श्यामजी कृष्ण वर्मा, वीर सावरकर, लाला हरदयाल, राजेंद्र लाहिड़ी, रोशन सिंह, अशफाक उल्लाह खाँ, मैडम भीखाजी कामा, अवध बिहारी, रवींद्रनाथ सान्याल, मदल लाल धींगरा, चापेकर बंधु, दामोदर व बालकृष्ण, सतीशचंद्र बोस, हेमचंद्र कानूनगो, प्रफुल्ल चाकी आदि.
In simple words: भारत की आजादी की लड़ाई में कई बड़े क्रांतिकारी नेता थे, जैसे भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाषचंद्र बोस, राजगुरु और सुखदेव.
🎯 Exam Tip: इन सभी नेताओं ने अपने-अपने तरीके से ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ी और देश के लिए अपना जीवन कुर्बान कर दिया.
Question 14. क्रान्तिकारियों ने लक्ष्य प्राप्ति के लिए कौन-कौन से साधन अपनाये? संक्षेप में बताइए।
Answer: क्रांतिकारियों का मुख्य लक्ष्य ब्रिटिश शासन को खत्म करना था. इस लक्ष्य को पाने के लिए उन्होंने हिंसा, लूट और हत्या जैसे तरीके अपनाए. उनका मानना था कि अगर कोई लक्ष्य नैतिक तरीकों से प्राप्त नहीं हो सकता, तो उसे हिंसा और बल से प्राप्त किया जा सकता है. उनका उद्देश्य सिर्फ हत्या और लूटपाट करना नहीं था, बल्कि वे एक असली क्रांति लाना चाहते थे.
क्रांति से उनका मतलब अन्याय पर आधारित समाज व्यवस्था को बदलना था. वे पूरे देश में क्रांति करके विदेशी शासन को उखाड़ फेंकना चाहते थे. शासकों से बदला लेने के लिए वे उन पर बम फेंकते थे, गोली चलाते थे और रेल की पटरियों को उखाड़ते थे.
In simple words: क्रांतिकारियों ने आजादी पाने के लिए हिंसा, लूट और हत्या जैसे तरीके अपनाए. वे मानते थे कि अगर सही लक्ष्य के लिए ये तरीके जरूरी हों तो इनका इस्तेमाल करना चाहिए.
🎯 Exam Tip: क्रांतिकारियों के साधन भले ही हिंसक दिखें, लेकिन उनका अंतिम उद्देश्य ब्रिटिश अत्याचार को खत्म कर भारत में न्यायपूर्ण और स्वतंत्र समाज स्थापित करना था.
Question 16. भगतसिंह द्वारा केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंकने की घटना को बताइए।
Answer: ब्रिटिश शासन को चुनौती देने के लिए भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली के केंद्रीय असेंबली हॉल में खाली सरकारी बेंचों पर बम फेंका था. उस समय अध्यक्ष विट्ठलभाई पटेल 'पब्लिक सेफ्टी बिल' पर बोल रहे थे. बम के धमाके से असेंबली हॉल में दहशत फैल गई.
इस घटना के बाद दोनों क्रांतिकारियों ने असेंबली हॉल में खड़े होकर 'इंकलाब जिंदाबाद' और 'साम्राज्यवाद का नाश हो' के नारे लगाए. उन्होंने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की ओर से कुछ पर्चे भी बांटे, जिनमें लिखा था-"बहरे कानों तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए." उनका बम फेंकने का उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं था, बल्कि अत्याचारी ब्रिटिश प्रशासन को जगाना था. इसके बाद भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने खुद को पुलिस के हवाले कर दिया.
In simple words: भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 1929 में केंद्रीय असेंबली में खाली जगह पर बम फेंका. उन्होंने ये बम सरकार को जगाने के लिए फेंके थे, न कि किसी को मारने के लिए, और फिर खुद ही पुलिस को सौंप दिया.
🎯 Exam Tip: यह घटना भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी, जिसने ब्रिटिश सरकार को भारतीयों की आवाज सुनने पर मजबूर किया.
Question 17. लाहौर के पुलिस अधिकारी साण्डर्स की हत्या किसने और क्यों की? बताइए।
Answer: 30 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के बहिष्कार जुलूस का नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे. इस दौरान पुलिस अधीक्षक स्कॉट ने उन पर लाठियों से हमला किया, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं और 17 नवंबर, 1928 को उनका देहांत हो गया. लाला लाजपत राय पर यह हमला भारतीय राष्ट्रवाद को कुचलने जैसा था.
इस अपमान का बदला लेने के लिए चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह और राजगुरु ने लाहौर के पुलिस कार्यालय के बाहर सहायक पुलिस अधीक्षक सांडर्स की 17 दिसंबर, 1928 को गोली मारकर हत्या कर दी. वे स्कॉट को मारना चाहते थे, लेकिन गलती से सांडर्स मारा गया. तीनों क्रांतिकारी पुलिस की आंखों में धूल झोंकते हुए लाहौर से भाग निकले.
In simple words: भगतसिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद ने लाहौर में पुलिस अधिकारी सांडर्स को मार दिया था. उन्होंने ऐसा लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए किया, जिन्हें पुलिस की लाठीचार्ज में चोट लगी थी.
🎯 Exam Tip: यह घटना ब्रिटिश राज के खिलाफ भारतीय क्रांतिकारियों के मजबूत इरादे को दर्शाती है और लाला लाजपत राय के बलिदान का बदला था.
Question 19. काकोरी टेन डकेती एवं सांडर्स हत्याकाण्ड में चन्द्रशेखर आजाद की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
Answer: **काकोरी ट्रेन डकैती:** चंद्रशेखर आजाद हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के सदस्य थे. इस दल को ब्रिटिश अत्याचार से लड़ने के लिए हथियारों की जरूरत थी, जिसके लिए धन की आवश्यकता थी. इसलिए, सितंबर 1925 में योजनाबद्ध तरीके से काकोरी में ब्रिटिश सरकार के खजाने वाली ट्रेन को लूट लिया गया. यह योजना बहुत सावधानी से बनाई गई थी, फिर भी ब्रिटिश सरकार को इसकी जानकारी मिल गई. काकोरी कांड में शामिल क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर उन पर मुकदमे चलाए गए, जिनमें से कुछ को फाँसी हुई और बाकी को लंबी सजा मिली. चंद्रशेखर आजाद भी रामप्रसाद बिस्मिल के साथ इसमें शामिल थे, लेकिन ब्रिटिश सरकार अथक प्रयासों के बावजूद उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकी.
**सांडर्स हत्या कांड:** 20 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के बहिष्कार जुलूस का नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे. इस दौरान पुलिस अधीक्षक स्कॉट की लाठियों से लाला लाजपत राय घायल हो गए और अंततः 17 नवंबर, 1928 को उनका देहांत हो गया. इस अपमान का बदला लेने के लिए चंद्रशेखर आजाद सहित उनके साथी भगतसिंह और राजगुरु ने ब्रिटिश सरकार से बदला लेने का फैसला किया. उन्होंने लाहौर के पुलिस कार्यालय के बाहर सहायक पुलिस अधीक्षक सांडर्स की 17 दिसंबर, 1928 को गोली मारकर हत्या कर दी. तीनों क्रांतिकारी पुलिस की आंखों में धूल झोंककर लाहौर से भाग निकले.
In simple words: चंद्रशेखर आजाद काकोरी ट्रेन डकैती और सांडर्स की हत्या दोनों में शामिल थे. काकोरी में उन्होंने धन जुटाने के लिए ट्रेन लूटी, और सांडर्स को मारकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया. वे कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए.
🎯 Exam Tip: चंद्रशेखर आजाद ने इन दोनों घटनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे ब्रिटिश शासन को सीधे चुनौती मिली और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को गति मिली.
Question 21. सुभाषचन्द्र बोस के जीवन परिचय को संक्षेप में बताइए।
Answer: नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक में एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था. उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा कटक के इंग्लिश स्कूल में पूरी की, जहाँ उन्होंने भारतीय छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को महसूस किया. 1919 में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी.ए. की डिग्री ली और 1920 में भारतीय जनपद सेवा (आईसीएस) की परीक्षा पास की. लेकिन मई 1921 में उन्होंने आईसीएस से इस्तीफा दे दिया. इस तरह, 24 साल की उम्र में उन्होंने एक आरामदायक नौकरी को छोड़कर देश सेवा का दृढ़ निश्चय किया. वे भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के मजबूत समर्थक थे. 1928 में कलकत्ता कांग्रेस में उन्होंने औपनिवेशिक या अधिराज्य स्वायत्तता का विरोध करते हुए पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव रखा. जनवरी 1941 में वे गुप्त रूप से कलकत्ता से काबुल और फिर बर्लिन पहुंचे. 4 जुलाई 1943 को उन्होंने सिंगापुर में आजाद हिंद फौज का नेतृत्व संभाला और 21 अक्टूबर, 1943 को सिंगापुर में ही आजाद हिंद सरकार की स्थापना की.
In simple words: सुभाषचंद्र बोस का जन्म 1897 में कटक में हुआ था. उन्होंने आईसीएस की नौकरी छोड़कर देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी. वे भारत की पूरी आजादी चाहते थे और उन्होंने आजाद हिंद फौज बनाई.
🎯 Exam Tip: सुभाषचंद्र बोस का जीवन हमें त्याग, साहस और निस्वार्थ देशप्रेम की प्रेरणा देता है, जिन्होंने अपने सिद्धांतों पर कभी समझौता नहीं किया.
Question 22. भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस में सुभाषचन्द्र बोस की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
Answer: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सुभाषचंद्र बोस की भूमिका- भारतीय जनपद सेवा (आईसीएस) से इस्तीफा देने के बाद मई 1921 में, सुभाषचंद्र बोस राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हुए. वे फरवरी 1938 में हरिपुरा अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. जनवरी 1939 में त्रिपुरा अधिवेशन में महात्मा गांधी के विरोध के बावजूद भी वे दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए. यह महात्मा गांधी की शायद सबसे बड़ी हार थी. हालांकि, कांग्रेस कार्यकारिणी में गांधीजी के समर्थकों का बहुमत था, इसलिए उन्होंने अप्रैल 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. मई 1939 में उन्होंने कांग्रेस के भीतर ही 'फॉरवर्ड ब्लॉक' की स्थापना की. इसका उद्देश्य कांग्रेस में वामपंथी विचारधारा को संगठित और सक्रिय करना था.
In simple words: सुभाषचंद्र बोस आईसीएस की नौकरी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए. वे दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने, लेकिन महात्मा गांधी से मतभेदों के कारण उन्होंने इस्तीफा दे दिया और अपनी पार्टी 'फॉरवर्ड ब्लॉक' बनाई.
🎯 Exam Tip: सुभाषचंद्र बोस कांग्रेस के भीतर रहते हुए भी अपनी अलग विचारधारा और कार्यप्रणाली रखते थे, जो उन्हें एक विशिष्ट नेता बनाती थी.
Question 23. सुभाषचन्द्र बोस के कार्यों का मूल्यांकन कीजिए।
Answer: सुभाषचंद्र बोस ने भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में एक क्रांतिकारी राष्ट्रवादी के तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने हमेशा औपनिवेशिक स्वतंत्रता (दूसरे देश के अधीन रहना) का विरोध किया और भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे। गांधीजी के अहिंसा के विचार पर उनका पूरा भरोसा नहीं था। जब गांधीजी ने 1922 में अपना असहयोग आंदोलन वापस लिया, तो बोस ने इसे देश का बड़ा दुर्भाग्य माना। इसी तरह, उन्होंने 1931 में गांधीजी द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन को वापस लेने को 'असफलता की स्वीकृति' कहा। सुभाषचंद्र बोस एक कुशल राजनीतिज्ञ और महान सेनानायक थे। उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। भारत की आज़ादी के लिए उन्होंने बहुत त्याग और समर्पण दिखाया।
In simple words: सुभाषचंद्र बोस एक बड़े क्रांतिकारी नेता थे जो भारत की पूरी आज़ादी चाहते थे। उन्हें गांधीजी की अहिंसा नीतियों पर पूरा भरोसा नहीं था और उन्होंने देश के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया।
🎯 Exam Tip: सुभाषचंद्र बोस के योगदानों को स्पष्ट करते समय उनके महत्वपूर्ण निर्णयों और राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी भूमिका पर ध्यान दें, जैसे कि उनकी स्वतंत्रता की अवधारणा और गांधीजी से भिन्न विचार।
RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. गोपालकृष्ण गोखले का जीवन परिचय देते हुए उनके विचारों का मूल्यांकन कीजिए।
Answer: गोपालकृष्ण गोखले आधुनिक भारत के एक उदारवादी नेता थे, जिन्होंने देश सेवा को कर्तव्य माना। उनका जन्म 1866 ई. में बम्बई प्रांत के कोल्हापुर जिले में हुआ था। 20 साल की उम्र में वे एक अंग्रेजी विद्यालय में शिक्षक बने, जो बाद में फर्ग्यूसन कॉलेज बन गया। गोखले इस कॉलेज के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। अपनी इंग्लैंड यात्राओं के दौरान, गोखले ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ब्रिटिश समिति और उसके समाचार पत्र 'इंडिया' को सक्रिय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांधीजी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे और उन्होंने ब्रिटिश सरकार से 'नाइटहुड' की उपाधि लेने से इनकार कर दिया था। वे ब्रिटिश जाति की उदारता और न्यायप्रियता में विश्वास रखते थे।
**उदारवादी मूल्यों में आस्था:** गोखले ने व्यक्ति, समाज और शासन में विकासवादी तरीकों और उदारवादी मूल्यों का समर्थन किया। उन्होंने सोचा कि ब्रिटिश शासन के सहयोग से ही भारत शांति और व्यवस्था बनाए रख सकता है।
**उदारवादी आर्थिक चिंतन का विकास:** गोखले ने उदारवादी आर्थिक चिंतन को बढ़ावा दिया। उन्होंने उस समय भारत की खराब आर्थिक स्थिति के कारणों पर प्रकाश डाला और भारत के आर्थिक विकास पर विचार किया। गोखले के विचार 'आर्थिक राष्ट्रवाद' का समर्थन करते थे।
**राजनीति में सांप्रदायिकता का विरोध:** गोखले ने राजनीति में सांप्रदायिकता का विरोध किया और धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा दिया। उनका मानना था कि जब तक हिंदू और मुसलमानों के बीच आपसी सहयोग नहीं होगा, तब तक भारत का कोई भविष्य नहीं हो सकता।
**राजनीति के अध्यात्मीकरण पर बल:** गोखले उन पहले व्यक्तियों में से थे जिन्होंने राजनीति में आध्यात्मिकता को रेखांकित किया। उन्होंने अपने विचारों का आधार साध्य की पवित्रता के साथ-साथ साधनों की पवित्रता को भी बनाया। उन्होंने राजनीति को केवल सत्ता के संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना का पवित्र साधन माना। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने 12 जून, 1905 को 'भारत सेवक समाज' की स्थापना की, ताकि युवाओं को नैतिक और आध्यात्मिक कर्तव्यों के रूप में राष्ट्र सेवा का प्रशिक्षण मिल सके। गोखले के विचारों से प्रभावित होकर गांधीजी ने उन्हें अपना राजनीतिक गुरु माना। गोखले जैसे नेताओं ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा दी।
In simple words: गोखले एक उदारवादी नेता थे जिन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से भारत के विकास पर जोर दिया। उन्होंने सोचा कि ब्रिटिश सरकार की मदद से ही भारत आगे बढ़ सकता है और लोगों के बीच एकता होनी चाहिए।
🎯 Exam Tip: गोखले के जीवन परिचय को उनके प्रमुख विचारों (जैसे उदारवाद, आर्थिक चिंतन, सांप्रदायिकता और आध्यात्मिकता) के साथ जोड़कर लिखें। ब्रिटिश शासन के प्रति उनके दृष्टिकोण और 'भारत सेवक समाज' की स्थापना का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।
Question 2. गोखले के विचारों पर प्रकाश डालिए।
Answer: गोपालकृष्ण गोखले के विचार आधुनिक भारत के ऐसे उदारवादी नेता थे, जिन्होंने देश सेवा के लिए राजनीति को कर्तव्य भावना के साथ अपनाया। उनका जन्म 1866 ई. में तत्कालीन बम्बई प्रांत के कोल्हापुर में हुआ था। 20 वर्ष की उम्र में यह एक अंग्रेजी विद्यालय में शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए। यह विद्यालय आगे चलकर फग्युसन कॉलेज के रूप में विकसित हुआ। गोखले इस कॉलेज के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए।
अपनी इंग्लैण्ड की यात्राओं में गोखले ने भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की 'ब्रिटिश समिति' तथा उसके पत्र 'इण्डिया' को सक्रिय करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। गाँधीजी इन्हें अपनी राजनैतिक गुरु मानते थे। इन्होंने ब्रिटिश सरकार की नाइटहुड की उपाधि लेने में मना कर दिया। इन्हें ब्रिटिश जाति की उदारता तथा न्यायप्रियता में विश्वास था। गोखले को मानव स्वभाव की मूलभूत अच्छाई में विश्वास था। उनकी शिक्षा-दीक्षा ने उनमें ब्रिटिश उदारवाद के प्रति गहरी आस्था उत्पन्न कर दी थी। गोखले ब्रिटिश राज को भारत के लिए ईश्वरीय वरदान मानते थे। उनके मतानुसार ब्रिटिश शासन के कारण ही भारत में आधुनिक राष्ट्रीय चेतना तथा लोकतान्त्रिक विचारों का समय आया था। गोखले के अनुसार ब्रिटिश शासन का लक्ष्य इंग्लैण्ड का लाभ नहीं है वरन् भारत का भौतिक कल्याण करना था। वे केवल शासन ही नहीं करना चाहते थे, वरन् जनता की सहायता करना चाहते थे। ब्रिटिश शासन ने ही भारत को राजनीतिक एकता एवं सम्पूर्ण भारत को एक समान विधि एवं न्यायव्यवस्था प्रदान की थी, यही नहीं अंग्रेजी भाषा, शिक्षा पद्धति तथा संचार साधन भी प्रदान किया। अपने विचारों के अनुरूप ही वे एक ओर भारतीय जनता को ब्रिटिश राजभक्त होने के लिए प्रेरित करते थे, तो दूसरी ओर शासन को भी उसके राजनीतिक एवं भौतिक, नैतिक दायित्व का स्मरण कराते थे।
गोखले का संवैधानिक साधनों तथा वैधानिक आन्दोलनों में अडिग विश्वास था। वे उग्र विचारों, साधनों तथा असंवैधानिक मार्ग को भारत के लिए अहितकर समझते थे तथा इसके विरुद्ध थे। वे ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत स्वशासन के लक्ष्य को संवैधानिक तरीकों से ही प्राप्त करना चाहते थे। वे व्यावहारिक दृष्टि से ब्रिटिश शासन की संगठित शक्ति की मुकाबला करना असम्भव मानते थे। गोखले के संवैधानिक साधन मूलतः उदारवादी तथा शान्तिपूर्ण, यथा-याचिका, प्रार्थना - पत्र, स्मरण - पत्र, प्रतिनिधि - मण्डल, समाचार-पत्र, विचार-विमर्श, अधिवेशन, सभा, रचनात्मक आलोचना आदि थे। उन्होंने निष्क्रिय प्रतिरोध की नीति पर आधारित जन आन्दोलनों को भी वैधानिक साधन ही स्वीकार किया।
In simple words: गोखले ने ब्रिटिश शासन के भीतर रहकर ही सुधारों का समर्थन किया। उन्होंने प्रार्थना, याचिका और शांतिपूर्ण तरीकों पर भरोसा किया, क्योंकि उनका मानना था कि हिंसा से नुकसान होगा।
🎯 Exam Tip: गोखले के विचारों को संक्षेप में बताते हुए उनके संवैधानिक तरीकों में विश्वास, ब्रिटिश शासन की न्यायप्रियता पर उनका भरोसा और स्वदेशी आंदोलन के प्रति उनके सकारात्मक दृष्टिकोण पर जोर दें।
Question 3. 'बाल गंगाधर तिलक का राष्ट्रवाद प्राचीन भारत के गौरव से प्रभावित था-इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
Answer: बाल गंगाधर तिलक का राष्ट्रवाद प्राचीन भारतीय गौरव से प्रभावित था। तिलक ने भारतीय राष्ट्रवाद को एक निश्चित और ठोस रूप दिया। गोखले के विपरीत, तिलक राष्ट्रवाद को भारतीय परंपराओं, भावनाओं और परिस्थितियों के अनुसार विकसित करना चाहते थे। वे 'स्वदेशी राष्ट्रवाद' के समर्थक थे। तिलक का मानना था, "हम अपनी संस्थाओं का अंग्रेजीकरण नहीं करना चाहते।" वे उदारवादियों के इस विचार से सहमत नहीं थे कि भारत की राजनीतिक एकता ब्रिटिश शासन की देन है। तिलक ने 'हिंदू राष्ट्र' के विचार को प्रस्तुत किया और हिंदुओं को उसकी संपूर्णता में प्रकट किया। इस प्रकार तिलक द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रवाद 'समग्र राष्ट्रवाद' कहलाता है। तिलक ने भारत की राष्ट्रीयता को भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान पर खड़ा किया। इसके लिए उन्होंने 'गणेश उत्सव' एवं 'शिवाजी उत्सव' प्रारम्भ किए। तिलक ने स्वराज्य के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा तथा निष्क्रिय प्रतिरोध जैसे साधन राष्ट्र को प्रदान किए। तिलक आधुनिक भारत के प्रथम सर्वाधिक प्रभावशाली एवं लोकप्रिय राष्ट्रीय नेता थे। उन्होंने काँग्रेस में गुणात्मक परिवर्तन किया।
**तिलक के विचारों का मूल्यांकन:**
1. **राष्ट्रीय आन्दोलन में अतिवादी युग के जनक:** तिलक ने राष्ट्रीय आंदोलन के एक नए अतिवादी युग की शुरुआत की। उन्होंने राजनीति में यथार्थवादी और व्यावहारिक दृष्टिकोण का समर्थन किया। इसीलिए उन्हें 'आधुनिक कौटिल्य' भी कहा जाता है।
2. **भारतीयों को अपने अधिकारों के प्रति सचेत करना:** तिलक ने "स्वराज्य को जन्मसिद्ध अधिकार" बताकर भारतीयों को अपने अधिकारों के प्रति सचेत किया और उनमें शक्ति का संचार किया, साथ ही एक नया महान लक्ष्य प्रस्तुत किया।
3. **आधुनिक राष्ट्रवाद का प्रतिपादन:** तिलक ने स्वामी दयानंद के समान प्राचीन वैदिक चिंतन से प्रेरणा लेकर भारतीयता पर आधारित आधुनिक राष्ट्रवाद का प्रतिपादन किया। इसीलिए नेहरू उन्हें "भारतीय राष्ट्रवाद का पिता" कहते थे। राजनीतिक साधनों की दृष्टि से उन्होंने एक नए युग की शुरुआत की।
4. **अंग्रेजों के चरित्र में गुणात्मक परिवर्तन करना:** तिलक ने काँग्रेस के चरित्र में गुणात्मक परिवर्तन कर दिया। उन्होंने एक ब्रिटिश भक्त संस्था को अपने तेजस्वी विचारों और कार्यों से ब्रिटिश शासन से संघर्ष करने वाली संस्था में रूपान्तरित कर दिया। तिलक ने काँग्रेस में आन्दोलन की जिस परम्परा को प्रारम्भ किया, गाँधीजी ने उसे लक्ष्य तक पहुँचाया। वे आधुनिक भारत के प्रथम सर्वाधिक प्रभावशाली एवं लोकप्रिय राष्ट्रीय नेता थे।
5. **सभी सम्प्रदायों के प्रति समान भाव:** तिलक के आलोचक उन पर गणपति एवं शिवाजी उत्सव के माध्यम से हिन्दुत्व को बढ़ावा देने का आरोप भी लगाते हैं परन्तु उन्होंने कभी किसी सम्प्रदाय के प्रति वैमनस्य का परिचय नहीं दिया। उन्होंने केवल जनसंगठन के लिए उत्सवों का आयोजन किया था, जिसका अपेक्षित परिणाम भी प्राप्त हुआ।
6. **स्वराज्य प्राप्ति हेतु हिंसा का सहारा नहीं लेना:** वेलेन्टाइन शिरोल तिलक को "भारतीय अशान्ति का जनक" बताते हैं लेकिन यह उचित नहीं है क्योंकि तिलक गरमपंथी अवश्य थे, किन्तु उन्होंने स्वराज्य प्राप्ति लिए हिंसा का सहारा कभी नहीं लिया।
In simple words: तिलक का राष्ट्रवाद भारत के पुराने गौरव से जुड़ा था। उन्होंने 'स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है' का नारा दिया और स्वदेशी, बहिष्कार, और राष्ट्रीय शिक्षा जैसे साधनों का उपयोग किया।
🎯 Exam Tip: तिलक के राष्ट्रवाद को समझाते समय, 'स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है' जैसे नारों और गणेश व शिवाजी उत्सवों के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना जगाने के उनके प्रयासों पर विशेष ध्यान दें।
Question 4. स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु अतिवादी आन्दोलन के विशिष्ट पक्षों को स्पष्ट कीजिए।
Answer: स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अतिवादी आंदोलन के कुछ खास पहलू थे:
1. वे ब्रिटिश शासन को भारतीयों के लिए फायदेमंद नहीं मानते थे और विदेशी शासन का सहयोग नहीं करते थे।
2. उन्हें ब्रिटिशों की न्यायप्रियता और ईमानदारी पर विश्वास नहीं था।
3. वे दया याचना के बजाय, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता से अपने अधिकार प्राप्त करना चाहते थे। तिलक ने कहा था, "हमारा आदर्श दया नहीं, आत्मनिर्भरता है।"
4. वे जनता को सीधी राजनीतिक कार्रवाई करने और जागरूकता बढ़ाने के लिए नए नारे देने पर जोर देते थे।
5. अतिवादी नेता स्वतंत्रता पाने के लिए संवैधानिक तरीकों को अपर्याप्त मानते थे। उन्होंने साफ कहा कि स्वराज्य दान में नहीं मिलता, बल्कि अपनी शक्ति से प्राप्त किया जाता है।
6. अतिवादियों ने भारतीय संस्कृति के प्रति आत्म-गौरव की भावना को बढ़ावा दिया। यह आंदोलन भारत की आजादी की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाया।
In simple words: अतिवादियों का मानना था कि ब्रिटिश शासन अच्छा नहीं है। वे चाहते थे कि लोग खुद के बल पर आज़ादी पाएं, न कि दया मांगकर।
🎯 Exam Tip: अतिवादी आंदोलन के विशिष्ट पक्षों को बताते समय उनके ब्रिटिश शासन के प्रति अविश्वास, आत्मनिर्भरता पर जोर और प्रत्यक्ष कार्रवाई की वकालत जैसे मुख्य बिंदुओं को उजागर करें।
Question 5. बाल गंगाधर तिलक के अनुसार स्वदेशी के विचार को स्पष्ट कीजिए।
Answer: बाल गंगाधर तिलक ने स्वदेशी को देशप्रेम का प्रतीक बताया। वे स्वदेशी को एक प्रभावशाली साधन मानते थे जो भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्ति दिला सकता है। तिलक के लिए स्वदेशी सिर्फ भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता तक सीमित नहीं था, बल्कि वे इसे भारत के आध्यात्मिक उत्थान और राजनीतिक स्वराज्य प्राप्त करने का मुख्य आधार भी मानते थे। उनका स्वदेशी आंदोलन पूरे राष्ट्रीय जीवन के पुनरुत्थान का आंदोलन बन गया। स्वदेशी के राजनीतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए तिलक ने कहा, "यदि हम गोरे लोगों की गुलामी में नहीं रहना चाहते हैं तो हमें स्वदेशी के आन्दोलन को पूरी ताकत के साथ चलाना होगा। यही एकमात्र ऐसा प्रभावशाली साधन है जो हमें मुक्ति दिला सकता है।" स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करके हम अपने देश को मजबूत बना सकते हैं।
In simple words: तिलक के अनुसार, स्वदेशी सिर्फ अपने देश का सामान खरीदना नहीं, बल्कि देश के प्रति प्रेम और अपनी आजादी पाने का एक बड़ा रास्ता था।
🎯 Exam Tip: स्वदेशी के विचार को समझाते समय, इसे केवल आर्थिक नहीं, बल्कि देशभक्ति और आध्यात्मिक उत्थान के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करें, जैसा कि तिलक ने माना था।
Question 6. बहिष्कार आन्दोलन को स्पष्ट कीजिए। बहिष्कार के सम्बन्ध में बाल गंगाधर तिलक के विचारों को बताइए।
Answer: बाल गंगाधर तिलक ने बहिष्कार, यानी बॉयकाट, के प्रस्ताव का समर्थन 1905 के कांग्रेस के बनारस अधिवेशन में किया। उदारवादियों के विरोध के बावजूद, कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया। बहिष्कार आंदोलन का शुरुआती उद्देश्य ब्रिटिश शासन के आर्थिक हितों पर दबाव डालकर उन्हें बंगाल विभाजन के फैसले को रद्द करने के लिए मजबूर करना था। तिलक बहिष्कार की भावना को सिर्फ आर्थिक पहलू तक सीमित नहीं मानते थे। तिलक बहिष्कार को एक शक्तिशाली राजनीतिक हथियार मानते थे, जिसकी मदद से भारत की निहत्थी जनता, बिना किसी हिंसक संघर्ष के ही, ब्रिटिश शासन से मुक्ति पा सकती थी। बहिष्कार करके हम विदेशी वस्तुओं और सेवाओं को अस्वीकार कर अपनी शक्ति दिखा सकते हैं।
In simple words: बहिष्कार आंदोलन का मतलब था विदेशी चीजों को छोड़ देना। तिलक ने इसे ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालने और बिना लड़ाई के आजादी पाने का एक तरीका माना।
🎯 Exam Tip: बहिष्कार आंदोलन को बताते समय, यह स्पष्ट करें कि इसका उद्देश्य ब्रिटिश आर्थिक हितों को चोट पहुंचाना और भारत को स्वतंत्रता दिलाना था, न कि केवल आर्थिक कारण।
Question 7. बाल गंगाधर तिलक ने स्वराज्य की प्राप्ति के लिए निष्क्रिय प्रतिरोध के साधन को अत्यन्त महत्वपूर्ण साधन माना? क्यों? स्पष्ट कीजिए।
Answer: बाल गंगाधर तिलक ने स्वराज्य प्राप्ति के लिए निष्क्रिय प्रतिरोध को एक बहुत महत्वपूर्ण साधन माना। इसका कारण यह था कि उनके निष्क्रिय प्रतिरोध के दर्शन का आधार यह विचार था कि अन्यायपूर्ण कानूनों का विरोध करना व्यक्ति का कर्तव्य है। तिलक निष्क्रिय प्रतिरोध की पद्धति को मूल रूप से संवैधानिक भी मानते थे। उनके मतानुसार, यह पद्धति कानून, न्याय, नैतिकता और लोकमत के अनुकूल थी। निष्क्रिय प्रतिरोध की नीति में हिंसक प्रतिरोध के लिए कोई जगह नहीं थी। वास्तव में, निष्क्रिय प्रतिरोध स्वेच्छा से सामूहिक असहयोग की नीति थी। तिलक आर्थिक, वैधानिक, प्रशासनिक और न्यायिक सहित सभी क्षेत्रों में ब्रिटिश नौकरशाही के प्रति निष्क्रिय प्रतिरोध के रूप में जनता का असहयोग प्राप्त करना चाहते थे। यह लोगों को बिना हथियार उठाए अपनी बात रखने का तरीका था।
In simple words: तिलक ने सोचा कि ब्रिटिश सरकार के गलत कामों का शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करना बहुत जरूरी है, ताकि लोग बिना हिंसा के आजादी पा सकें।
🎯 Exam Tip: निष्क्रिय प्रतिरोध को समझाते समय, इसे एक गैर-हिंसक लेकिन शक्तिशाली संवैधानिक साधन के रूप में प्रस्तुत करें, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश प्रशासन के हर क्षेत्र में असहयोग करना था।
Question 8. 'बाल गंगाधर तिलक ने शिक्षा को अपने राजनीतिक साध्य, स्वराज्य की प्राप्ति के लिए एक आधारभूत साधन के रूप में स्वीकार किया-कथन को स्पष्ट कीजिए।
Answer: बाल गंगाधर तिलक राष्ट्र के विकास में शिक्षा की भूमिका को बहुत महत्वपूर्ण मानते थे। उन्होंने शिक्षा को अपने राजनीतिक लक्ष्य, स्वराज्य की प्राप्ति के लिए एक बुनियादी साधन के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने 'न्यू इंग्लिश स्कूल', 'दक्षिण शिक्षा समाज' और 'फर्ग्यूसन कॉलेज' की स्थापना की। बाद में स्वदेशी आंदोलन के दौरान, उन्होंने समर्थ गुरु रामदास के नाम पर कई 'समर्थ विद्यालय' खुलवाए। वे छात्रों को इस तरह शिक्षित करने के पक्ष में थे कि उनमें स्वराज्य प्राप्त करने की तीव्र भावना उत्पन्न हो। वे मातृभाषा में शिक्षा का समर्थन करते थे। राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओं के छात्रों ने राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया और जनता में राष्ट्रीय चेतना फैलाई। शिक्षा लोगों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में जागरूक करती है।
In simple words: तिलक का मानना था कि शिक्षा आजादी पाने का एक अहम जरिया है। उन्होंने कई स्कूल खोले और छात्रों को देशप्रेम और स्वराज्य के बारे में पढ़ाया।
🎯 Exam Tip: इस कथन को स्पष्ट करते हुए तिलक द्वारा स्थापित शैक्षिक संस्थानों और उनके शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना जगाने के प्रयासों पर प्रकाश डालें।
Question 9. बाल गंगाधर तिलक के मतानुसार राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली एवं पाठ्यक्रम में कौन-कौन से गुण होने चाहिए?
Answer: बाल गंगाधर तिलक के अनुसार राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली और पाठ्यक्रम में निम्नलिखित गुण होने चाहिए:
1. यह भारत की विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के लिए देवनागरी लिपि को अपनाए।
2. भारत में औद्योगिक विकास के लिए तकनीकी शिक्षा का प्रबंध किया जाना चाहिए। इससे युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे और भारत आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनेगा।
3. विद्यार्थियों को राजनीतिक शिक्षा दी जानी चाहिए ताकि वे राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों से परिचित हों और राष्ट्रीय उत्थान में सक्रिय भूमिका निभा सकें।
4. विद्यार्थियों को धार्मिक शिक्षा भी दी जानी चाहिए। यह शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए कि छात्रों में धार्मिक सहिष्णुता की भावना विकसित हो सके।
यह शिक्षा पद्धति न केवल ज्ञान देती है, बल्कि चरित्र निर्माण और देशभक्ति को भी बढ़ावा देती है।
In simple words: तिलक चाहते थे कि शिक्षा हमारी अपनी भाषाओं में हो, तकनीकी ज्ञान दे, बच्चों को राजनीति और धर्म की अच्छी बातें सिखाए, और उन्हें अपने देश से प्यार करना सिखाए।
🎯 Exam Tip: तिलक के शिक्षा संबंधी विचारों को बताते समय तकनीकी शिक्षा, राजनीतिक जागरूकता, धार्मिक सहिष्णुता और मातृभाषा के महत्व जैसे मुख्य बिंदुओं को शामिल करें।
Question 10. क्रान्तिकारी आन्दोलन के उत्थान के प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए। अथवा क्रान्तिकारी आन्दोलन से क्या आशय है? इसके उदय के क्या कारण थे?
Answer: क्रांतिकारी आंदोलन का अर्थ है कि यह आंदोलन उदारवादियों और अतिवादियों के बहुत प्रयासों के बाद भी स्वतंत्रता पाने में अधिक सफल नहीं हुआ था। ब्रिटिश शासन ने इस पर ध्यान देने के बजाय भारतीय जनता पर दमन और अत्याचार करना शुरू कर दिया। उन्होंने कई दमनकारी कानून बनाए और स्वतंत्रता आंदोलन में लगे बड़े-बड़े नेताओं को जेल में डालना शुरू कर दिया। जुलूसों और सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया और हजारों लोगों को बंगाल विभाजन के विरोध में आंदोलन करने के कारण जेल भेज दिया गया। जेल में उन पर बहुत अत्याचार किए गए। ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति के परिणामस्वरूप, भारतीय राजनीतिक क्षेत्र में राष्ट्रीय आंदोलन की एक नई विचारधारा का जन्म हुआ, जिसे क्रांतिकारी आंदोलन कहा गया। इसके समर्थक हिंसात्मक साधनों द्वारा ब्रिटिश शासन को नष्ट करके स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहते थे। प्रमुख क्रांतिकारी नेताओं में सुभाषचंद्र बोस, भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, वीर सावरकर आदि शामिल थे। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य अन्यायपूर्ण ब्रिटिश शासन का अंत करना था।
In simple words: क्रांतिकारी आंदोलन तब शुरू हुआ जब शांतिपूर्ण तरीके से आजादी नहीं मिली। ब्रिटिश सरकार ने लोगों पर जुल्म किए, जिससे गुस्सा बढ़ा और लोगों ने हथियार उठाकर आजादी की लड़ाई लड़ने का फैसला किया।
🎯 Exam Tip: क्रांतिकारी आंदोलन के कारणों को समझाते समय ब्रिटिश दमनकारी नीतियों, उदारवादी और अतिवादी तरीकों की असफलता, और नेताओं के प्रति ब्रिटिश क्रूरता पर जोर दें।
Question 11. क्रान्तिकारियों की प्रमुख नीतियों का उल्लेख कीजिए।
Answer: क्रांतिकारियों की नीतियां बहुत स्पष्ट थीं। वे किसी भी कीमत पर ब्रिटिश शासन से भारत को आजाद कराना चाहते थे। उन्होंने भारत मां के मान-सम्मान की रक्षा और उसके गौरव को बनाए रखने के लिए आवश्यक साधन अपनाने पर जोर दिया। उनका मानना था कि जो लक्ष्य नैतिक साधनों से प्राप्त नहीं हो सकता, उसे हिंसा और बल से प्राप्त किया जाना चाहिए। क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश शासन को उन्हीं की भाषा में जवाब देते हुए हथियारों का उपयोग भी किया। उनका संदेश था, "तलवार हाथ में लो तथा सरकार को मिटा दो।"
**क्रान्तिकारियों के प्रमुख कार्यक्रम निम्नलिखित थे:**
1. लेखों, भाषणों और गुप्त प्रचार के द्वारा शिक्षित भारतीयों के मन में विदेशी गुलामी के प्रति नफरत पैदा करना।
2. संगीत, नाटक और साहित्य के माध्यम से बेरोजगार और भूखे लोगों को निडर बनाकर उनमें मातृभूमि के प्रति प्रेम और स्वतंत्रता की भावना भरना।
3. सरकार को 'वन्दे मातरम्' जुलूसों, स्वदेशी सम्मेलनों और बायकाट के माध्यम से व्यस्त रखना ताकि राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए किए जाने वाले कार्यों को बिना किसी बाधा के पूरा किया जा सके।
4. बम बनाना, पिस्तौल और बंदूक आदि गुप्त रूप से मंगवाना और विदेशों से हथियार प्राप्त करना।
5. क्रांतिकारी आंदोलन के लिए छापे मारकर धन प्राप्त करना ताकि क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन आसानी से हो सके।
6. नौजवानों की भर्ती करके उनकी छोटी-छोटी टुकड़ियां बनाना और उन्हें हथियारों का प्रयोग करना सिखाना ताकि उन्हें एक प्रशिक्षित और शक्तिशाली सैन्य टुकड़ी के रूप में तैयार किया जा सके।
7. प्रशिक्षित सैन्य युवाओं को नियमों और आज्ञाओं का पूरी तरह से पालन करने के लिए शिक्षा देना ताकि कुशल नेतृत्व में आगामी रणनीतियों का सफलतापूर्वक संचालन किया जा सके।
8. आम जनता में राष्ट्रीयता का भाव जगाने के लिए संगीत और नाटकों का जनता के सामने प्रस्तुतीकरण। वीरों की जीवनी और स्वतंत्रता के लिए उनके द्वारा किए गए महान कार्यों की प्रशंसा का प्रसार हो सके।
In simple words: क्रांतिकारियों का लक्ष्य भारत को ब्रिटिश राज से आज़ाद कराना था, चाहे उसके लिए हिंसा का रास्ता ही क्यों न अपनाना पड़े। उन्होंने लोगों में देशप्रेम जगाने और सरकार के खिलाफ हथियार उठाने के लिए कई तरीके अपनाए।
🎯 Exam Tip: क्रांतिकारियों की नीतियों को बताते समय उनके मुख्य लक्ष्य (ब्रिटिश शासन का अंत), हिंसा का उपयोग, और आम जनता को जागरूक करने के लिए अपनाए गए तरीकों पर जोर दें।
Question 12. क्रान्तिकारियों के प्रमुख लक्ष्य क्या थे? संक्षेप में बताइए।
Answer: क्रांतिकारियों का मुख्य लक्ष्य ब्रिटिश शासन को भारत से पूरी तरह समाप्त करना था। क्रांतिकारी ब्रिटिश शासकों के मन में अत्याचारों के विरुद्ध डर पैदा करना चाहते थे। क्रांतिकारी नेता केवल उन्हीं ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या करते थे, जो भारतीय देशभक्तों पर अधिक अत्याचार करते थे। क्रांतिकारी भारतीय जनता को संघर्ष की प्रेरणा देना और अंग्रेजी शासन के मन में डर पैदा करना चाहते थे। स्वतंत्रता के लिए बलिदान क्रांतिकारियों का प्रेरणा स्रोत था। भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराना, अपनी मातृभूमि को खोया हुआ गौरव फिर से स्थापित करना और सभी भारतवासियों को स्वतंत्रता की खुली हवा में स्वतंत्र रूप से घूमने का एहसास दिलाना, क्रांतिकारियों के लक्ष्य में शामिल था। वे चाहते थे कि हर भारतीय आजादी से जी सके।
In simple words: क्रांतिकारियों का मुख्य लक्ष्य ब्रिटिश शासन को खत्म करना, अत्याचारी अंग्रेजों को डराना, और भारतीयों को विदेशी गुलामी से पूरी तरह आज़ाद कराना था।
🎯 Exam Tip: क्रांतिकारियों के लक्ष्यों को बताते समय ब्रिटिश शासन को समाप्त करने, अत्याचारों का विरोध करने और भारतवासियों को पूर्ण स्वतंत्रता दिलाने पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 13. भारतीय राष्टीय आन्दोलन के प्रमुख क्रान्तिकारी नेताओं का उल्लेख कीजिए।
Answer: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों का योगदान अतुलनीय है। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख क्रांतिकारी नेताओं में सरदार भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु, सुभाषचंद्र बोस, अजीत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, खुदीराम बोस, रासबिहारी बोस, बटुकेश्वर दत्त, अरविंद घोष, श्यामजी कृष्ण वर्मा, वीर सावरकर, लाला हरदयाल, राजेंद्र लाहिड़ी, रोशन सिंह, अशफाक उल्लाह खां, मैडम भीखाजी कामा, अवध बिहारी, रवींद्रनाथ सान्याल, मदल लाल धींगरा, चापेकर बंधु, दामोदर व बालकृष्ण, सतीशचंद्र बोस, हेमचंद्र कानूनगो, प्रफुल्ल चाकी आदि प्रमुख थे। इन सभी नेताओं ने देश की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
In simple words: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के मुख्य क्रांतिकारी नेताओं में भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु, सुभाषचंद्र बोस, और वीर सावरकर जैसे कई बड़े नाम शामिल थे।
🎯 Exam Tip: प्रमुख क्रांतिकारी नेताओं के नाम याद रखें और उनके योगदान को संक्षेप में बताएं। कुछ महत्वपूर्ण नामों को हाइलाइट करना फायदेमंद होगा।
Question 14. क्रान्तिकारियों ने लक्ष्य प्राप्ति के लिए कौन-कौन से साधन अपनाये? संक्षेप में बताइए।
Answer: क्रांतिकारियों का मुख्य लक्ष्य ब्रिटिश शासन का अंत करना था। इसके लिए उन्होंने हिंसक तरीके, लूट और हत्या जैसे साधन अपनाए। उनका मानना था कि यदि लक्ष्य श्रेष्ठ है, तो साधनों की श्रेष्ठता पर विचार करना जरूरी नहीं है। उनका उद्देश्य हत्या या लूटमार करना नहीं था, बल्कि वे एक वास्तविक क्रांति लाना चाहते थे। क्रांति से उनका मतलब अन्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को बदलना था। वे देशव्यापी क्रांति करके विदेशी शासन को उखाड़ फेंकना चाहते थे। शासकों से बदला लेने के लिए वे उन पर बम फेंकते, गोली चलाते और रेल की पटरियों को उखाड़ते थे। यह सब वे देश को गुलामी से मुक्त कराने के लिए करते थे।
In simple words: क्रांतिकारियों ने आजादी पाने के लिए हिंसक रास्ते अपनाए, जैसे बम फेंकना, गोली चलाना और लूटपाट करना, क्योंकि वे ब्रिटिश राज को पूरी तरह खत्म करना चाहते थे।
🎯 Exam Tip: क्रांतिकारियों द्वारा अपनाए गए साधनों को बताते समय, उनके मुख्य उद्देश्य (वास्तविक क्रांति लाना और ब्रिटिश शासन को समाप्त करना) और इन साधनों के पीछे के तर्क पर जोर दें।
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