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Detailed Chapter 20 धरा और पर्यावरण RBSE Solutions for Class 11 Hindi
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Class 11 Hindi Chapter 20 धरा और पर्यावरण RBSE Solutions PDF
RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 20 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 20 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. पर्यावरण के प्रति अमेरिकी दृष्टि क्या है?
(a) भोगवादी
(b) संतुलित उपभोग
(c) पृथ्वी माता के समान है
(d) प्रकृति चेतन है।
Answer: (a) भोगवादी
In simple words: अमेरिकी लोग पर्यावरण को केवल अपने इस्तेमाल की चीज़ मानते हैं। वे प्रकृति का उपयोग बिना किसी सीमा के करना चाहते हैं।
🎯 Exam Tip: पश्चिमी देशों की पर्यावरण के प्रति सोच उपभोक्तावादी है, जो संसाधनों का अधिकतम दोहन करना चाहती है।
RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 20 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. भारतीय समाज में प्रकृति के प्रति आस्था के कुछ उदाहरण बताइए।
Answer: भारतीय समाज में पृथ्वी को माता के समान पूजा जाता है। हम नदियों, विशेषकर गंगा को, और तुलसी के पौधे को भी माता मानते हैं। वृक्षों जैसे पीपल की भी पूजा की जाती है। यह सब प्रकृति के प्रति हमारी गहरी आस्था को दिखाता है।
In simple words: भारत में हम पृथ्वी, नदियों और तुलसी जैसे पेड़ों को माता मानते हैं, यह हमारी प्रकृति के प्रति श्रद्धा दिखाता है।
🎯 Exam Tip: ऐसे प्रश्नों में प्रमुख उदाहरणों को सूचीबद्ध करें जो भारतीय संस्कृति में प्रकृति के प्रति सम्मान को दर्शाते हैं, जैसे पृथ्वी, नदियाँ और पवित्र वृक्ष।
Question 2. दुनिया के कितने प्रतिशत संसाधनों का उपयोग अमेरिका करता है?
Answer: अमेरिका पूरी दुनिया के लगभग 40 प्रतिशत संसाधनों का अकेले उपयोग करता है। यह दुनिया की कुल आबादी के एक छोटे से हिस्से के बावजूद है।
In simple words: अमेरिका विश्व के कुल संसाधनों का 40% उपयोग करता है।
🎯 Exam Tip: प्रतिशत आधारित उत्तरों में संख्या को सटीक रूप से याद रखें।
Question 3. भूमि बंजर क्यों होती है?
Answer: भूमि के बहुत अधिक गहराई तक जोतने और रासायनिक खादों का लगातार इस्तेमाल करने से जमीन अपनी उपजाऊ शक्ति खो देती है। इससे मिट्टी खराब होकर बंजर हो जाती है।
In simple words: ज्यादा गहरी जुताई और रासायनिक खादों के उपयोग से जमीन बंजर हो जाती है।
🎯 Exam Tip: भूमि को बंजर बनाने वाले दो मुख्य कारणों-गहरी जुताई और रासायनिक खाद के उपयोग-पर ध्यान दें।
Question 4. किस वैज्ञानिक ने प्राकृतिक पदार्थों को भी सजीव माना है?
Answer: वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु ने यह खोज की थी कि प्राकृतिक पदार्थ भी सजीव होते हैं। उनके शोध ने यह साबित किया कि पौधों में भी जीवन और भावनाएँ होती हैं।
In simple words: जगदीश चंद्र बसु ने प्राकृतिक चीजों को भी जीवित माना।
🎯 Exam Tip: वैज्ञानिक के नाम और उनकी मुख्य खोज को सही ढंग से याद रखें।
Question 5. केंचुए क्या काम करते हैं?
Answer: केंचुए मिट्टी को नरम और छिद्रपूर्ण बनाते हैं, जिससे हवा और पानी आसानी से जमीन में जा पाते हैं। वे मिट्टी की उर्वरक शक्ति को बढ़ाते हैं और पौधों के लिए अच्छी स्थिति बनाते हैं।
In simple words: केंचुए मिट्टी को नरम और उपजाऊ बनाते हैं।
🎯 Exam Tip: केंचुओं के महत्व को बताते हुए उनके दो मुख्य कार्यों - मिट्टी को पोली बनाना और उर्वरक शक्ति बढ़ाना - का उल्लेख करें।
RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 20 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 3. प्राकृतिक संसाधनों के प्रति पश्चिमी देशों की क्या अवधारणा है?
Answer: पश्चिमी देशों का मानना है कि प्राकृतिक संसाधन केवल मानव के उपयोग के लिए हैं। वे प्रकृति को निर्जीव समझते हैं और मानते हैं कि उनका जितना चाहे उतना शोषण किया जा सकता है। यह सोच संसाधनों के अत्यधिक दोहन को बढ़ावा देती है।
In simple words: पश्चिमी देश प्रकृति को सिर्फ उपयोग की चीज मानते हैं और इसका मनचाहा इस्तेमाल करते हैं।
🎯 Exam Tip: पश्चिमी देशों की अवधारणा को 'उपयोगितावादी' के रूप में परिभाषित करें और बताएं कि वे प्रकृति को निर्जीव मानकर उसका अत्यधिक दोहन करते हैं।
Question 4. खेती में रासायनिक द्रव्यों के उपयोग से क्या हानियाँ हैं?
Answer: खेती में रासायनिक द्रव्यों जैसे खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल से भूमि की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। हालांकि, इनसे उपज की मात्रा और वस्तुओं का आकार बढ़ जाता है, लेकिन उनमें मौजूद पोषक तत्व कम हो जाते हैं, जिससे खाने की गुणवत्ता खराब होती है।
In simple words: रासायनिक द्रव्यों से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति घटती है, उपज बढ़ती है पर पोषक तत्व कम हो जाते हैं।
🎯 Exam Tip: रासायनिक द्रव्यों के उपयोग से होने वाले लाभ (उपज में वृद्धि) और हानियाँ (पोषक तत्वों में कमी, मिट्टी की उर्वरता में गिरावट) दोनों को बताएं।
Question 5. भारत की मिट्टी में उर्वरा शक्ति बढ़ने का क्या कारण है?
Answer: भारत में खेती के लिए जमीन को हल से जोता जाता है, जिससे केवल कुछ इंच गहरी खुदाई होती है। इस प्रक्रिया में केंचुए जमीन के भीतर सुरक्षित रहते हैं और मिट्टी को पोली बनाते हैं। इसके अलावा, भारतीय खादें जैसे गोबर की खाद मिट्टी को कोई नुकसान नहीं पहुँचातीं और उसकी उर्वरता शक्ति को बनाए रखती हैं।
In simple words: भारत में हल्की जुताई और प्राकृतिक खाद के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है क्योंकि केंचुए सक्रिय रहते हैं।
🎯 Exam Tip: भारतीय खेती की पारंपरिक तकनीकों, जैसे हल्की जुताई और प्राकृतिक खाद का उपयोग, और केंचुओं के योगदान पर जोर दें।
RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 20 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. विश्व में प्राकृतिक संसाधनों के घटने के मुख्य कारणों पर प्रकाश डालिए।
Answer: विश्व में प्राकृतिक संसाधनों के कम होने के कुछ मुख्य कारण नीचे दिए गए हैं:
1. पश्चिमी देशों की सोच: पश्चिमी देश प्रकृति को सिर्फ एक निर्जीव वस्तु मानते हैं, जिसका उपयोग मनुष्य असीमित रूप से कर सकता है। वे प्राकृतिक संसाधनों का बिना सोचे-समझे बहुत ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। प्रकृति में हर चीज़ की एक सीमा होती है, और उसका गलत या अत्यधिक उपयोग संसाधनों को कम करता है।
2. उद्योगों का भारी उपयोग: पश्चिमी देशों में बड़े-बड़े उद्योगों में विशाल मशीनें इस्तेमाल होती हैं, जिनके लिए बहुत सारा कच्चा माल चाहिए होता है। इस वजह से जंगल, नदियाँ और दूसरे प्राकृतिक साधन बहुत ज्यादा और अनियंत्रित तरीके से इस्तेमाल होते हैं। यह उद्योगों की बढ़ती भूख संसाधनों पर दबाव डालती है।
In simple words: प्राकृतिक संसाधन कम होने के दो बड़े कारण हैं: पश्चिमी देशों की यह सोच कि प्रकृति सिर्फ इस्तेमाल की चीज़ है, और उद्योगों में कच्चे माल की भारी खपत के लिए प्राकृतिक साधनों का अंधाधुंध उपयोग।
🎯 Exam Tip: इन कारणों को स्पष्ट और संक्षिप्त बिंदुओं में प्रस्तुत करें, जिसमें पश्चिमी विचारधारा और औद्योगिक खपत के दोहरे प्रभाव को उजागर किया जाए।
Question 2. प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से होने वाली हानियाँ बताइए।
Answer: प्राकृतिक संसाधन एक सीमित मात्रा में ही उपलब्ध होते हैं, और उनका बहुत ज्यादा उपयोग करना हानिकारक होता है। इसके अत्यधिक दोहन से उनकी संख्या कम हो जाती है। उद्योगों को कच्चा माल नहीं मिल पाता, नदियों में पानी और जंगलों में पेड़ कम हो जाते हैं। इससे प्राकृतिक संसाधनों की कमी आ जाती है, जिससे जरूरत के हिसाब से पानी और वन उत्पाद नहीं मिल पाते। साथ ही, जल और वायु प्रदूषण भी बढ़ जाता है। पेड़ों के कटने से हवा में ऑक्सीजन कम होती है, और जमीन बंजर होने से खेती की उपज घटती है। उद्योगों में उत्पादन भी कम होने लगता है। लोगों का स्वास्थ्य खराब होता है और उन्हें कैंसर जैसी गंभीर बीमारियाँ घेर लेती हैं। मनुष्य का जीवन प्रकृति के हिसाब से नहीं रह पाता और वह बनावटी हो जाता है। पर्यावरण प्रदूषण की गंभीर समस्याएँ पैदा होती हैं, जिससे मानव जीवन ही खतरे में पड़ जाता है।
In simple words: प्राकृतिक संसाधनों के ज्यादा उपयोग से उनकी संख्या घट जाती है, प्रदूषण बढ़ता है, लोगों का स्वास्थ्य खराब होता है, और अंततः मानव जीवन खतरे में पड़ जाता है।
🎯 Exam Tip: अत्यधिक दोहन के बहुआयामी प्रभावों-संसाधन कमी, प्रदूषण वृद्धि, स्वास्थ्य समस्याएं और जीवन शैली में बदलाव-को क्रमबद्ध तरीके से बताएं।
Question 3. प्रकृति के प्रति भारतीय चिन्तनधारा पर एक टिप्पणी लिखिए।
Answer: भारत में पृथ्वी को माँ के समान माना जाता है। सिर्फ पृथ्वी ही नहीं, नदियों को भी माँ के बराबर सम्मान दिया जाता है, जैसे गंगा को 'गंगा माँ' कहते हैं, और तुलसी को भी माँ मानते हैं। पेड़ों को पूजा जाता है, जैसे पीपल की पूजा होती है। पेड़ों-पौधों और सभी जीवों को सजीव प्राणी मानते हैं। प्रकृति के हर जीव और वस्तु का ध्यान रखा जाता है। भारतीय संस्कृति में चिड़ियों और कबूतरों को दाना खिलाया जाता है। भारतीय मानते हैं कि प्रकृति में जीवन है और उसकी सुरक्षा तथा सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। प्रकृति से मिली हर चीज़ और जीव-जंतु का संसार में कोई न कोई खास उद्देश्य है। इस उद्देश्य को समझना, विश्व रचना में अपना स्थान पहचानना और उसे बचाए रखना हर इंसान का फर्ज है। जब हम प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चलते हैं, तभी पर्यावरण सुरक्षित रहता है। भारतीय सोच के अनुसार प्रकृति के विरुद्ध चलना गलत है, इसलिए भारत के लोग प्रकृति और उससे जुड़ी चीज़ों के प्रति गहरा सम्मान रखते हैं, और उसे माँ के समान मानते हैं।
In simple words: भारतीय सोच प्रकृति को माँ के समान मानती है, नदियों और पेड़ों की पूजा करती है, और मानती है कि सभी जीव-जंतुओं का अपना महत्व है। यह प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर चलने पर जोर देती है।
🎯 Exam Tip: भारतीय संस्कृति के मुख्य मूल्यों, जैसे पृथ्वी को माता मानना, नदियों और वृक्षों की पूजा, और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की अवधारणा को विस्तार से समझाएं।
RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 20 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 20 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. भारतीय मन नदियों के प्रति भावना रखता है –
(a) माता
Answer: (a) माता
In simple words: भारतीय लोग नदियों को माँ के समान मानते हैं।
🎯 Exam Tip: भारतीय संस्कृति में नदियों के प्रति आदर भाव को उजागर करने वाले सही शब्द का चयन करें।
Question 2. प्राचीनकाल से भारत में अवधारणा है –
(a) प्रकृति के शोषण की
(b) प्रकृति से मेलजोल की
(c) प्रकृति को निर्जीव मानने की
(d) प्रकृति को उपभोग की वस्तु मानने की
Answer: (b) प्रकृति से मेलजोल की
In simple words: भारत में हमेशा से प्रकृति के साथ मिलकर रहने की परंपरा रही है।
🎯 Exam Tip: भारतीय दर्शन में प्रकृति के साथ संतुलन और सह-अस्तित्व की केंद्रीय अवधारणा पर ध्यान दें।
Question 3. 'जी सेवन' देशों की जनसंख्या है, विश्व की जनसंख्या की
(a) 18 प्रतिशत
(b) 15 प्रतिशत
(c) 11 प्रतिशत
(d) 10 प्रतिशत।
Answer: (c) 11 प्रतिशत
In simple words: विश्व की कुल आबादी में से, जी-सेवन देशों में 11 प्रतिशत लोग रहते हैं।
🎯 Exam Tip: 'जी सेवन' देशों के जनसंख्या प्रतिशत को सटीक रूप से याद रखें।
Question 4. 'पेड़ पौधों में जीवन है-यह खोज करने वाले वैज्ञानिक हैं
(a) न्यूटन
(b) डार्विन
(c) जगदीश चंद्र वसु
(d) आइंस्टाइन।
Answer: (c) जगदीश चंद्र वसु
In simple words: जगदीश चंद्र बसु वह वैज्ञानिक थे जिन्होंने बताया कि पेड़ों में भी जीवन होता है।
🎯 Exam Tip: वैज्ञानिक के नाम और उनके मुख्य योगदान को सटीक रूप से याद रखें।
Question 5. हमारे देश में वनभूमि है।
(a) 11 प्रतिशत
(b) 12 प्रतिशत
(c) 20 प्रतिशत
Answer: (a) 11 प्रतिशत
In simple words: भारत में कुल भूमि का 11 प्रतिशत हिस्सा जंगल है।
🎯 Exam Tip: भारत में वर्तमान वनभूमि के प्रतिशत को सही ढंग से याद रखें।
Question 1. 'माता भूमि पुत्रोऽहम् पृथिव्या' का क्या अर्थ है?
Answer: इस संस्कृत सूक्ति का अर्थ है कि "पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं।" यह भाव पृथ्वी के प्रति आदर और जिम्मेदारी को दर्शाता है, जैसे एक बच्चा अपनी माँ के प्रति रखता है।
In simple words: इसका मतलब है कि धरती हमारी माँ है और हम उसके बच्चे हैं।
🎯 Exam Tip: सूक्ति का अर्थ स्पष्ट और सरल शब्दों में समझाएं, जिसमें 'माता' और 'पुत्र' के रिश्ते का महत्व शामिल हो।
Question 2. कबूतरों और चिड़ियों को दाना चुगाने और चींटियों को आटा देने के पीछे क्या भाव है?
Answer: कबूतरों और चिड़ियों को दाना देने, तथा चींटियों को आटा खिलाने के पीछे यह भाव है कि सभी जीव-जंतु इस संसार का हिस्सा हैं। उनका भी जीवन में महत्व है और उनके अस्तित्व की जरूरत है। यह सभी जीवों के प्रति दया और सहजीवन की भावना को दर्शाता है।
In simple words: इसका मतलब है कि सभी जीव महत्वपूर्ण हैं और हमें उनकी देखभाल करनी चाहिए।
🎯 Exam Tip: इस कार्य के पीछे की मुख्य भावना-सभी जीवों के प्रति सम्मान और उनके अस्तित्व के महत्व को उजागर करें।
Question 3. भारत में प्रकृति के साथ किस प्रकार के व्यवहार की शिक्षा दी गई है?
Answer: भारत में हमें यह सिखाया जाता है कि प्रकृति सजीव है, यानी उसमें जीवन है। इसलिए हमें प्रकृति के साथ तालमेल और सम्मान का व्यवहार करना चाहिए। यह हमें प्रकृति का शोषण करने के बजाय उसकी रक्षा करने के लिए प्रेरित करता है।
In simple words: भारत प्रकृति को जीवित मानता है, इसलिए उसके साथ मेलजोल और सम्मान से रहने की शिक्षा देता है।
🎯 Exam Tip: भारतीय परंपरा में प्रकृति को सजीव मानने और उसके साथ सामंजस्यपूर्ण संबंध स्थापित करने पर जोर दें।
Question 4. धरती को माता क्यों कहा जाता है?
Answer: धरती को माता इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह हम सभी जीव-जंतुओं को धारण करती है और हमारा पालन-पोषण करती है। जिस तरह एक माँ अपने बच्चों की देखभाल करती है, उसी तरह पृथ्वी हमें भोजन, पानी और रहने की जगह देती है।
In simple words: धरती हमें पालती-पोसती है और सहारा देती है, इसलिए उसे माँ कहते हैं।
🎯 Exam Tip: धरती के पालन-पोषण और सहारा देने वाले गुणों को माँ के समान बताते हुए उत्तर दें।
Question 5. मनुष्य का अस्तित्व किस पर निर्भर है?
Answer: मनुष्य का अस्तित्व पूरी तरह से पृथ्वी और प्रकृति पर निर्भर करता है। हमें जीने के लिए जो हवा, पानी, भोजन और रहने की जगह मिलती है, वह सब प्रकृति से ही आती है। अगर प्रकृति स्वस्थ नहीं होगी, तो मनुष्य भी जीवित नहीं रह पाएगा।
In simple words: इंसान का जीवन धरती और प्रकृति पर ही टिका हुआ है।
🎯 Exam Tip: मनुष्य के जीवन के लिए प्रकृति की मूलभूत आवश्यकताओं और निर्भरता पर जोर दें।
Question 6. प्रकृति पर संकट आने का क्या आशय है?
Answer: प्रकृति पर संकट आने का मतलब है कि पर्यावरण में गंभीर समस्याएँ पैदा हो रही हैं। जैसे, पर्यावरण प्रदूषित होना, मौसम का चक्र बदलना, और पूरी पृथ्वी का तापमान बढ़ना। ये सभी संकेत दिखाते हैं कि प्रकृति अब खतरे में है।
In simple words: प्रकृति पर संकट का मतलब है कि पर्यावरण प्रदूषण बढ़ रहा है, मौसम बदल रहा है, और धरती का तापमान बढ़ रहा है।
🎯 Exam Tip: प्रकृति पर संकट के प्रमुख लक्षणों-प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, और तापमान वृद्धि-का उल्लेख करें।
Question 7. प्रकृति पर आए संकट के लिए कौन उत्तरदायी हैं?
Answer: प्रकृति पर आए संकट के लिए मुख्य रूप से विकसित देश जिम्मेदार हैं। अमेरिका जैसे विकसित देशों की आबादी भले ही दुनिया की कुल आबादी का 5 प्रतिशत हो, लेकिन वे दुनिया के कुल संसाधनों का लगभग 40 प्रतिशत उपयोग करते हैं। इस अत्यधिक खपत से ही प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बढ़ रहा है।
In simple words: प्रकृति पर संकट के लिए विकसित देश जिम्मेदार हैं क्योंकि वे बहुत अधिक संसाधनों का उपयोग करते हैं।
🎯 Exam Tip: विकसित देशों की अत्यधिक संसाधन खपत और पर्यावरणीय प्रभाव को उजागर करते हुए स्पष्ट उत्तर दें।
Question 9. पर्यावरण प्रदूषण के लिए विकसित देश किनको दोषी ठहराते हैं तथा क्यों?
Answer: पर्यावरण प्रदूषण के लिए विकसित देश विकासशील देशों को दोषी ठहराते हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वे विकासशील देशों के प्राकृतिक संसाधनों पर अपना कब्जा जमाना चाहते हैं। इस तरह वे अपनी गलतियों का ठीकरा दूसरों पर फोड़ते हैं।
In simple words: विकसित देश प्रदूषण के लिए विकासशील देशों को दोषी मानते हैं ताकि उनके संसाधनों पर कब्जा कर सकें।
🎯 Exam Tip: विकसित देशों के आरोप के पीछे के वास्तविक मकसद-संसाधन पर नियंत्रण-को स्पष्ट करें।
Question 10. प्रकृति के बारे में पश्चिम की दृष्टि कैसी है?
Answer: प्रकृति के बारे में पश्चिमी देशों की सोच उपभोक्तावादी है। वे प्रकृति को सिर्फ अपनी जरूरतों को पूरा करने वाली एक वस्तु मानते हैं। उनके लिए प्रकृति का उपयोग करना ही उसका एकमात्र उद्देश्य है, न कि उसका सम्मान या संरक्षण करना।
In simple words: पश्चिम प्रकृति को केवल इस्तेमाल करने वाली एक चीज मानता है।
🎯 Exam Tip: पश्चिमी दृष्टि को 'उपभोक्तावादी' के रूप में परिभाषित करें, जो प्रकृति को केवल मानव उपयोग की वस्तु मानती है।
Question 11. अगले 50 सालों में अमेरिका मरुस्थल क्यों हो जाएगा?
Answer: अमेरिका में खेती में रासायनिक खादों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। अगर रासायनिक खादों का यह अत्यधिक उपयोग जारी रहा, तो अगले 50 सालों में अमेरिका की उपजाऊ जमीन मरुस्थल में बदल जाएगी। ये खादें मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता को नष्ट कर देती हैं।
In simple words: रासायनिक खादों के लगातार उपयोग से अमेरिका की जमीन 50 साल में मरुस्थल बन सकती है।
🎯 Exam Tip: रासायनिक खादों के दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभावों पर जोर दें, जो मिट्टी को बंजर बनाकर मरुस्थलीकरण का कारण बनते हैं।
Question 12. पश्चिम की विकास की अवधारणा क्या है?
Answer: पश्चिमी देशों की विकास की अवधारणा में प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन शामिल है। इसमें खनिजों और तेल को निकालना, जंगलों को काटना, बड़े-बड़े उद्योग लगाना, मशीनों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करना और खेती में रासायनिक खादों का प्रयोग करना मुख्य बातें हैं। यह सब प्रकृति का शोषण करके विकास करने पर आधारित है।
In simple words: पश्चिम की विकास की अवधारणा में खनिज, तेल, जंगल, उद्योग, मशीन और रासायनिक खाद का अत्यधिक उपयोग शामिल है।
🎯 Exam Tip: पश्चिमी विकास मॉडल के प्रमुख घटकों-संसाधन दोहन, औद्योगिकीकरण और गहन कृषि-को स्पष्ट करें।
Question 13. रासायनिक द्रव्यों के प्रयोग के क्या दुष्परिणाम हो रहे हैं?
Answer: रासायनिक द्रव्यों के प्रयोग से लोगों का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। इन द्रव्यों के खाने की चीजों में चले जाने से शरीर में कई तरह के नए रोग पैदा हो रहे हैं, जिनमें कैंसर जैसी गंभीर बीमारियाँ भी शामिल हैं। यह हमारे पूरे स्वास्थ्य तंत्र को कमजोर कर रहा है।
In simple words: रासायनिक द्रव्यों के उपयोग से लोगों का स्वास्थ्य खराब हो रहा है और कई नई बीमारियाँ जैसे कैंसर हो रही हैं।
🎯 Exam Tip: रासायनिक द्रव्यों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर नकारात्मक प्रभावों, विशेषकर नई बीमारियों और कैंसर के संबंध में, बताएं।
Question 14. केंचुओं का कृषि भूमि में क्या महत्व है?
Answer: केंचुए कृषि भूमि के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। वे जमीन के भीतर गहराई तक जाकर मिट्टी को पोली और भुरभुरी बनाते हैं, जिससे हवा और पानी जड़ों तक आसानी से पहुँच पाते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरक शक्ति बढ़ती है और फसलें बेहतर उगती हैं। वे एक तरह से मिट्टी के प्राकृतिक किसान होते हैं।
In simple words: केंचुए मिट्टी को पोली और उपजाऊ बनाकर कृषि भूमि के लिए बहुत उपयोगी होते हैं।
🎯 Exam Tip: केंचुओं के मिट्टी को पोली बनाने और उर्वरता बढ़ाने के दो प्रमुख कार्यों को महत्व के साथ बताएं।
Question 16. फ्रांसिस बेकन के प्रकृति के बारे में क्या विचार थे?
Answer: फ्रांसिस बेकन का मानना था कि प्रकृति की सभी वस्तुएँ निर्जीव हैं। उनका विचार था कि प्रकृति केवल मनुष्य के उपयोग के लिए बनी है और उसका अधिकतम लाभ उठाया जाना चाहिए। इस सोच ने प्रकृति के शोषण को बढ़ावा दिया।
In simple words: फ्रांसिस बेकन मानते थे कि प्रकृति की सभी चीजें जड़ हैं और मनुष्य को उनका उपयोग करना चाहिए।
🎯 Exam Tip: फ्रांसिस बेकन के प्रकृति को 'निर्जीव' और 'उपयोग की वस्तु' मानने वाले विचार को स्पष्ट करें।
Question 17. प्रकृति के भण्डार का असीमित उपभोग क्यों संभव नहीं है?
Answer: प्रकृति के भण्डार सीमित हैं, वे असीमित नहीं हैं। अगर हम इन सीमित संसाधनों का बिना सोचे-समझे बहुत ज्यादा उपयोग करेंगे, तो वे बहुत जल्दी खत्म हो जाएँगे। इसलिए उनका असीमित उपभोग संभव नहीं है।
In simple words: प्रकृति के संसाधन सीमित हैं, इसलिए उनका असीमित उपयोग संभव नहीं है, अन्यथा वे जल्द खत्म हो जाएँगे।
🎯 Exam Tip: प्रकृति के संसाधनों की 'सीमितता' पर जोर दें और बताएं कि असीमित उपभोग से उनका शीघ्र समाप्त होना तय है।
Question 18. प्रकृति से खिलवाड़ करने के क्या दो दुष्परिणाम दिखाई देने लगे हैं?
Answer: प्रकृति से छेड़छाड़ करने के दो बड़े दुष्परिणाम अब साफ दिखने लगे हैं:
1. धरती का वायुमंडल गर्म हो रहा है: प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ने से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, जिससे जलवायु परिवर्तन हो रहा है।
2. प्राणवायु कम हो रही है: पेड़ों की कटाई और प्रदूषण के कारण हवा में ऑक्सीजन, जो हमारे लिए प्राणवायु है, की मात्रा कम हो रही है।
In simple words: प्रकृति से खिलवाड़ के कारण धरती का तापमान बढ़ रहा है और हवा में ऑक्सीजन कम हो रही है।
🎯 Exam Tip: दो प्रमुख दुष्परिणामों-ग्लोबल वार्मिंग और ऑक्सीजन की कमी-को स्पष्ट रूप से बताएं।
Question 19. 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा' का क्या अर्थ है?
Answer: 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा' का अर्थ है कि "त्याग की भावना से उपभोग करो।" इसका मतलब है कि हमें किसी भी वस्तु का उपयोग करते समय दूसरों के हितों और भविष्य की पीढ़ियों का ध्यान रखना चाहिए। हमें जरूरत से ज्यादा इकट्ठा नहीं करना चाहिए, बल्कि जरूरत के हिसाब से ही चीजों का इस्तेमाल करना चाहिए।
In simple words: इसका अर्थ है कि चीजों का उपयोग त्याग की भावना से करें, यानी दूसरों का भी ध्यान रखें और जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल न करें।
🎯 Exam Tip: इस सूत्र के मूल अर्थ 'त्यागपूर्वक उपभोग' को समझाएं और इसके पीछे की सामाजिक जिम्मेदारी को बताएं।
Question 20. विकास के लिए विश्व के सामने कौन-सा मार्गदर्शक सिद्धान्त रखा जाना चाहिए?
Answer: विकास के लिए विश्व के सामने यह भारतीय सिद्धान्त रखा जाना चाहिए कि विकास प्रकृति को नुकसान पहुँचाए बिना, उसके साथ तालमेल बिठाकर किया जाए। हमें प्रकृति का शोषण करने के बजाय उसके संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए। यह स्थायी और संतुलित विकास का मार्ग है।
In simple words: विकास प्रकृति को नुकसान पहुँचाए बिना उसके साथ संतुलन बनाकर होना चाहिए, यह भारतीय सिद्धान्त है।
🎯 Exam Tip: भारतीय दर्शन के 'प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण विकास' के सिद्धान्त को स्पष्ट करें।
RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 20 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 2. पश्चिम की उपभोगवादी दृष्टि क्या है?
Answer: पश्चिम की उपभोगवादी दृष्टि यह मानती है कि प्रकृति निर्जीव है और इसका एकमात्र उद्देश्य मनुष्य की जरूरतों को पूरा करना है। इसलिए वे मानते हैं कि प्रकृति का जितना हो सके उतना दोहन और शोषण करना गलत नहीं है। उनका मानना है कि प्रकृति की हर वस्तु मनुष्य को सुख देने के लिए ही बनी है, इसलिए उसका उपयोग करना उचित है।
In simple words: पश्चिम की उपभोगवादी सोच प्रकृति को निर्जीव मानती है और मानती है कि इसका उपयोग मनुष्य के सुख के लिए किया जाना चाहिए, इसलिए इसका शोषण गलत नहीं है।
🎯 Exam Tip: पश्चिम की उपभोगवादी दृष्टि को स्पष्ट करें, जिसमें प्रकृति को निर्जीव मानने और उसके असीमित उपयोग पर बल दिया जाता है।
Question 3. पश्चिम की अवधारणा का क्या दुष्परिणाम दिखाई दे रहा है?
Answer: पश्चिम की विकास अवधारणा के कई दुष्परिणाम अब साफ दिख रहे हैं। आज प्राकृतिक संसाधनों जैसे खनिज और तेल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है, और जंगल तेजी से काटे जा रहे हैं। बड़े-बड़े कारखानों में जमीन और उत्पादन का उपयोग हो रहा है, जिससे विशाल मशीनें बन रही हैं। बड़े-बड़े इलाकों में मशीनों और रासायनिक खादों की मदद से खेती की जा रही है। यह सब प्रकृति का अत्यधिक शोषण कर रहा है, जिसके हानिकारक प्रभाव पर्यावरण पर दिख रहे हैं।
In simple words: पश्चिम की अवधारणा के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है, जंगल कट रहे हैं, और रासायनिक खेती से पर्यावरण को नुकसान पहुँच रहा है।
🎯 Exam Tip: पश्चिमी अवधारणा के मुख्य दुष्परिणामों-संसाधन दोहन, वन विनाश, और रासायनिक खेती के बढ़ते चलन-को उजागर करें।
Question 4. 'हम भी बड़े उत्साह से उसी ओर बढ़ रहे हैं'-कौन किस ओर बढ़ रहा है?
Answer: "हम भी बड़े उत्साह से उसी ओर बढ़ रहे हैं" का मतलब है कि विकासशील देश, जिनमें भारत भी शामिल है, पश्चिमी देशों की विकास की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। ये देश भी पश्चिमी देशों के समान विकास के उस मॉडल को अपना रहे हैं, जहाँ प्रकृति का अत्यधिक दोहन और संसाधनों का असीमित उपयोग किया जाता है। वे भी प्रकृति के शोषण पर आधारित विकास की ओर बढ़ रहे हैं।
In simple words: विकासशील देश, जैसे भारत, पश्चिमी देशों के उस विकास मॉडल को उत्साह से अपना रहे हैं, जो प्रकृति का अत्यधिक दोहन करता है।
🎯 Exam Tip: कथन का अर्थ समझाएं और बताएं कि विकासशील देश पश्चिमी देशों के विकास मॉडल का अनुसरण कर रहे हैं, जो संसाधनों के अत्यधिक उपयोग पर आधारित है।
Question 5. रासायनिक खाद के प्रयोग से क्या लाभ तथा हानि हैं?
Answer: रासायनिक खाद के प्रयोग से कुछ लाभ और हानियाँ दोनों हैं। लाभ यह है कि खेतों में पैदा होने वाली वस्तुओं का आकार बढ़ जाता है और कुल पैदावार की मात्रा भी बढ़ जाती है। हालांकि, सबसे बड़ी हानि यह है कि रासायनिक खाद से पैदा हुई चीजों की पोषण क्षमता बहुत कम हो जाती है। इन वस्तुओं के लगातार सेवन से शरीर में कई तरह के नए और घातक रोग, जैसे कैंसर, पैदा हो सकते हैं।
In simple words: रासायनिक खाद से उपज और आकार बढ़ता है, पर पोषण कम हो जाता है और कैंसर जैसे रोग हो सकते हैं।
🎯 Exam Tip: रासायनिक खाद के तात्कालिक लाभ (अधिक उपज) और दीर्घकालिक हानियाँ (पोषण में कमी, स्वास्थ्य जोखिम) दोनों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें।
Question 6. विकास की अवधारणा को जंगलों पर क्या प्रभाव हुआ है?
Answer: विकास की आधुनिक अवधारणा का जंगलों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। उद्योगों को स्थापित करने के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों को काटकर जमीन साफ की जाती है। इन उद्योगों के लिए कच्चा माल भी जंगलों से ही मिलता है। अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देशों में जंगल लगभग पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। भारत में भी स्वतंत्रता के समय 22 प्रतिशत वन थे, जो अब घटकर सिर्फ 11 प्रतिशत रह गए हैं। यह दिखाता है कि विकास के नाम पर जंगल तेजी से खत्म हो रहे हैं।
In simple words: विकास के लिए उद्योग लगाने और कच्चे माल के लिए जंगल काटे जा रहे हैं, जिससे भारत सहित कई देशों में वन क्षेत्र तेजी से घट गया है।
🎯 Exam Tip: उद्योगों के लिए भूमि और कच्चे माल की आवश्यकता के कारण होने वाले वन विनाश और भारत में वन क्षेत्र में हुई कमी के आंकड़े बताएं।
Question 8. पश्चिम के वैज्ञानिकों का प्रकृति के सम्बन्ध में क्या मत है?
Answer: पश्चिम के शुरुआती वैज्ञानिकों जैसे फ्रांसिस बेकन का मत था कि प्रकृति निर्जीव है। बेकन मानते थे कि प्रकृति की सभी चीजें जड़ हैं और उनका उपयोग मनुष्य को ही करना चाहिए। देकार्त भी प्रकृति को एक मशीन के पुर्जों के समान टुकड़ों-टुकड़ों में देखने को कहते थे। न्यूटन तक यह विचार कायम रहा कि प्रकृति सिर्फ मनुष्य के उपयोग की वस्तु है और उसमें कोई जीवन नहीं है।
In simple words: पश्चिम के वैज्ञानिकों, जैसे बेकन, देकार्त और न्यूटन, का मानना था कि प्रकृति निर्जीव है और मनुष्य के उपयोग के लिए बनी है।
🎯 Exam Tip: प्रमुख पश्चिमी वैज्ञानिकों के नाम और प्रकृति को लेकर उनके 'निर्जीव' और 'उपयोगितावादी' मत को संक्षेप में बताएं।
Question 9. आइंस्टाइन का प्रकृति के बारे में क्या मानना था?
Answer: वैज्ञानिक आइंस्टाइन ने भारतीय दर्शन का अध्ययन किया था, इसलिए उनका प्रकृति के प्रति मत अपने से पहले के पश्चिमी वैज्ञानिकों से अलग था। वे पूरी पृथ्वी को निर्जीव नहीं मानते थे। उनके अनुसार, मनुष्य इस पूरे ब्रह्मांड का एक छोटा सा हिस्सा है और हमें चीजों को अलग-अलग टुकड़ों में नहीं, बल्कि समग्रता से देखना चाहिए। उनका सूक्ष्म परमाणु विकास का विचार मूलतः भारतीय अवधारणा से प्रभावित था, जिससे पता चलता है कि भारतीय दर्शन का उन पर गहरा प्रभाव था।
In simple words: आइंस्टाइन, भारतीय दर्शन से प्रभावित होकर, प्रकृति को निर्जीव नहीं मानते थे और उसे समग्रता से देखने की बात कहते थे।
🎯 Exam Tip: आइंस्टाइन के भारतीय दर्शन से प्रभावित होने और प्रकृति को समग्रता से देखने के उनके दृष्टिकोण पर प्रकाश डालें।
Question 10. प्रकृति के भण्डार से मनुष्य को कितना ग्रहण करना चाहिए? भारतीय चिन्तन इस बारे में क्या कहता है?
Answer: भारतीय चिन्तन के अनुसार, प्रकृति के भण्डार सीमित हैं, असीमित नहीं। जबकि पश्चिमी विचार असीमित उपभोग को सही मानता है, भारतीय चिन्तन कहता है कि हमें प्रकृति से केवल अपनी वास्तविक जरूरतों को पूरा करने के लिए ही लेना चाहिए। अगर हम अवास्तविक इच्छाओं को पूरा करने के लिए प्रकृति का शोषण करेंगे, तो प्रकृति को नुकसान होगा और वह खत्म हो जाएगी।
In simple words: भारतीय चिन्तन कहता है कि प्रकृति से केवल उतनी ही चीजें लेनी चाहिए जितनी हमारी असली जरूरत है, क्योंकि उसके संसाधन सीमित हैं।
🎯 Exam Tip: भारतीय दर्शन के 'सीमित उपभोग' और 'आवश्यकताओं की पूर्ति' के सिद्धांत को स्पष्ट करें, जो पश्चिमी 'असीमित उपभोग' से भिन्न है।
Question 11. हम विकास की दिशा में किस प्रकार आगे बढ़ सकते हैं?
Answer: हम भारत की प्राचीन सोच को अपनाकर विकास की दिशा में सफलतापूर्वक आगे बढ़ सकते हैं। हमें प्रकृति को अपनी माँ के समान मानना चाहिए और उसके संसाधनों का उपयोग संयम और जिम्मेदारी के साथ करना चाहिए। विकास के लिए प्रकृति का अंधाधुंध शोषण करने की पश्चिमी सोच ठीक नहीं है। हमें ऐसा विकास करना चाहिए जो प्रकृति को हानि न पहुँचाए।
In simple words: हम भारतीय परंपरा के अनुसार प्रकृति को माँ मानकर और उसके संसाधनों का संयमित उपयोग करके विकास की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
🎯 Exam Tip: भारतीय दृष्टिकोण के 'प्रकृति को माता मानना' और 'संयमपूर्वक उपभोग' के सिद्धांतों को विकास के मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत करें।
Question 12. भारत संसार को विकास का कौन-सा पथ दिखा सकता है?
Answer: दुनिया के सभी देश विकास करना चाहते हैं। भारत उन्हें अपना एक खास तरीका सिखा सकता है। भारत बता सकता है कि विकास का सही मार्ग वह है जिसमें प्रकृति को कोई नुकसान पहुँचाए बिना उसके संसाधनों का जिम्मेदारी से और संयमपूर्वक उपयोग किया जाए। यह प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर स्थायी विकास का रास्ता है।
In simple words: भारत विश्व को वह विकास पथ दिखा सकता है जहाँ प्रकृति को बिना नुकसान पहुँचाए, उसके संसाधनों का संयमित उपयोग किया जाए।
🎯 Exam Tip: भारत के 'प्रकृति-हितैषी और संयमित विकास' के मॉडल को वैश्विक समाधान के रूप में प्रस्तुत करें।
भारतीय दर्शन के अनुसार मनुष्य का धरती के साथ माता और पुत्र का सम्बन्ध है। यह सम्बन्ध केवल धरती के साथ ही नहीं है, उससे जुड़ी हुई सभी चीजों से भी है। भारत में नदियों को माता कहते हैं। गंगा को माता कहा जाता है। तुलसी को भी माता कहते हैं। माता कहने के पीछे पवित्रता और सम्मान की भावना होती है। इसी के कारण पीपल के पेड़ की पूजा होती है, यह पूजा प्रकृति के प्रति पूज्यभाव उत्पन्न करने के लिए की जाती है। भारत में लोगों को दूध पिलाया जाता है। चिड़ियों और कबूतरों को दाना चुगाया जाता है। चींटियों को आटा डाला जाता है।
इसके पीछे भाव यह है कि सभी जीवों के जीवन का इस संसार में कोई न कोई प्रयोजन है। पेड़-पौधे तथा सभी जीव-जन्तु प्रकृति के ही अंग हैं। संसार की रचना केवल मनुष्य से पूरी नहीं हो सकती। भारतीय मन कहता है कि प्रत्येक प्राणी के अस्तित्व को जानना चाहिए तथा उसके संसार में होने के प्रयोजन को भी समझाना चाहिए। विश्व की रचना में उसका क्या स्थान है, इसको पहचानना तथा उसको बनाए रखना जरूरी है। प्रकृति के साथ सामंजस्य की स्थापना तभी हो सकती है। इसी को भारत में धर्म कहते हैं। उसको पहचान कर उसके नियमों को जानकर और उसके अनुसार ही हमें अपनी रचना और विकास करना होगा। तभी प्रकृति के साथ हमारा समन्वय हो सकेगा। इस प्रकार जो विकास होगा, वह स्थायी होगा तथा उससे प्रकृति को भी किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुँचेगी।
Question 2. विश्व में पर्यावरण संकट के लिए उत्तरदायी कौन है?
Answer: मानव जाति का अस्तित्व पृथ्वी और प्रकृति पर निर्भर करता है, लेकिन अब यह खतरे में है। पृथ्वी का वायुमंडल गर्म हो रहा है, और इससे मौसम चक्र भी बदल रहा है। पृथ्वी के इस प्रदूषित पर्यावरण के लिए मुख्य रूप से विकसित देश जिम्मेदार हैं, भारत जैसे विकासशील देश नहीं। विकसित देशों ने अपने विकास के लिए प्रकृति का अनावश्यक दोहन किया है। अमेरिका, जो दुनिया के कुल प्रदूषण का 14 प्रतिशत पैदा करता है, खुद पर बहुत शोर मचाता है और विकासशील देशों को जिम्मेदार ठहराता है। अमेरिका की जनसंख्या दुनिया का 5 प्रतिशत है, लेकिन वह विश्व के 40 प्रतिशत संसाधनों का उपयोग करता है। 'जी सेवेन' कहलाने वाले सात बड़े अमीर देश, जिनकी जनसंख्या दुनिया की 11 प्रतिशत है, 70 प्रतिशत संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं। ये सभी देश विकसित हैं और सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं। विकासशील देशों पर पर्यावरण को प्रदूषित करने का आरोप लगाना उनकी एक चाल है क्योंकि उनके संसाधन खत्म हो चुके हैं और अब उन्हें अपने उद्योगों के लिए कच्चे माल की जरूरत है, जो वे एशिया और अफ्रीका से पूरा करना चाहते हैं। इसलिए वे यह भ्रम फैला रहे हैं।
In simple words: पर्यावरण संकट के लिए विकसित देश जिम्मेदार हैं क्योंकि वे प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन और प्रदूषण करते हैं, जबकि अपनी गलती विकासशील देशों पर थोपते हैं ताकि उनके संसाधनों पर कब्जा कर सकें।
🎯 Exam Tip: विकसित देशों के अत्यधिक संसाधन उपयोग और प्रदूषण में उनकी बड़ी भूमिका पर जोर दें, साथ ही उनके द्वारा विकासशील देशों पर आरोप लगाने के पीछे के मकसद को भी स्पष्ट करें।
Question 3. दीनदयाल शोध संस्थान की ओर से गोंडा में चल रहे प्रयोगों को देखकर जापानी वैज्ञानिकों ने क्या कहा?
Answer: कुछ समय पहले जापान से कुछ वैज्ञानिक भारत आए थे और उन्होंने दीनदयाल शोध संस्थान की ओर से गोंडा में चल रहे विभिन्न प्रयोगों को देखा। उन्होंने भारतीय खेती का भी अध्ययन किया। भारत में हजारों सालों से खेती हो रही है, फिर भी यहाँ की मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनी हुई है, जबकि रासायनिक खादों का उपयोग बहुत कम होता है। उन्होंने देखा कि भारत की प्राकृतिक और कम लागत वाली कृषि प्रणाली बहुत टिकाऊ और फायदेमंद है, जो मिट्टी की उर्वरक शक्ति को बनाए रखती है, जबकि रासायनिक खादों से यह शक्ति लगातार घटती जाती है।
In simple words: जापानी वैज्ञानिकों ने गोंडा में भारतीय खेती के प्राकृतिक और टिकाऊ तरीकों को देखकर कहा कि यह कम लागत वाली और मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने में बहुत अच्छी है।
🎯 Exam Tip: जापानी वैज्ञानिकों की टिप्पणी में भारतीय खेती के पारंपरिक, कम लागत वाले और टिकाऊ पहलुओं पर जोर दें, जो मिट्टी की उर्वरता बनाए रखते हैं।
Question 4. जंगलों को कटने से रोकना जरूरी क्यों बताया गया है?
Answer: दुनियाभर में जंगलों का विनाश तेजी से हो रहा है। अमेरिका और पश्चिमी देशों में तो जंगल लगभग खत्म हो चुके हैं। किसी भी देश के संतुलित विकास के लिए 33 प्रतिशत भूमि पर जंगल होने चाहिए। अब विकसित देश एशिया और अफ्रीका पर अपनी नजरें जमाए हुए हैं। भारत में स्वतंत्रता के समय 22 प्रतिशत जंगल थे, जो अब आँकड़ों के अनुसार सिर्फ 11 प्रतिशत रह गए हैं, और कुछ का मानना है कि यह केवल 6 प्रतिशत ही बचे हैं। अगर वनों का विनाश इसी तरह जारी रहा, तो संसार को कई गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ेगा: पर्यावरण प्रदूषण बढ़ेगा, धरती का तापमान बढ़ेगा, मौसम चक्र गड़बड़ा जाएगा, ग्लेशियर पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा और तटीय इलाके डूब जाएँगे। उद्योगों को कच्चा माल नहीं मिलेगा, वर्षा प्रभावित होगी, और प्रकृति अपना भयानक रूप दिखाएगी, जिससे भयानक बाढ़ और भूकंप आ सकते हैं। इसलिए, जंगलों की अनियंत्रित कटाई तुरंत रोकनी चाहिए और नए पेड़ लगाकर उनका संरक्षण करना चाहिए।
In simple words: जंगलों को काटना रोकना बहुत जरूरी है क्योंकि वन विनाश से प्रदूषण बढ़ता है, तापमान बढ़ता है, मौसम बिगड़ता है, प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं, और संसाधन खत्म होते हैं, जिससे मानव जीवन खतरे में पड़ जाता है।
🎯 Exam Tip: वन विनाश के बहुआयामी प्रभावों-पर्यावरण, जलवायु, आर्थिक और प्राकृतिक आपदाओं-को विस्तृत रूप से बताएं, और इनके समाधान के रूप में वन संरक्षण के महत्व पर जोर दें।
धरा और पर्यावरण
लेखक-परिचय
जीवन-परिचय-कुप. सी. सुदर्शन का जन्म दक्षिण भारत में हुआ था। आपने मध्य प्रदेश के जबलपुर विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण की तथा विज्ञान प्रौद्योगिकी में डिग्री प्राप्त की। साहित्यिक परिचय-सुदर्शन जी बहुभाषाविद्, विलक्षण प्रतिभाशाली, मौलिक चिन्तक, ओजस्वी वक्ता तथा पत्रकार हैं। आप अहिन्दी भाषी होते हुए भी हिन्दी के श्रेष्ठ निबन्धकार हैं। जटिल और कठिन विषय को सरल, सुबोध भाषा-शैली में प्रस्तुत करने में आप सिद्धहस्त हैं। विश्व की मौलिक समस्याओं का आपको ज्ञान है। भारतीय संस्कृति और मौलिक विचारों को भी आपको गहरा ज्ञान है। कृतियाँ-आपने हिन्दी में अनेक मौलिक निबन्धों की रचना की है।
पाठ का सार
'माता भूमि पुत्रोऽहम् पृथिव्या' (पृथ्वी माता है, मैं इसका पुत्र हूँ) इस विचार से हम प्रकृति और नदियों में अपनी माता के दर्शन करते हैं। गंगा और तुलसी को माता मानते हैं। अश्वत्थ की पूजा करते हैं। चिड़ियों को दाना और चींटियों को आटा डालते हैं। इस सृष्टि में प्रत्येक पेड़, जीव-जन्तु का एक प्रयोजन है। अतः भारत में प्रकृति को माता माना जाता है। धरती और प्रकृति हमारा पालन करती है। मनुष्य की रक्षा इन सबकी रक्षा पर निर्भर है। आज पृथ्वी और प्रकृति संकटग्रस्त हैं। खनिजों का दोहन, जंगलों की कटाई, विशाल मशीनों वाले उद्योग, रासायनिक खादों वाली खेती आदि पश्चिम के उपभोक्तावाद की देन हैं। रासायनिक तथा मशीनी खेती के कारण अमेरिका की भूमि बंजर हो चुकी है। अगले 50 वर्षों में वह मरुस्थल हो जायेगा। रासायनिक खादों से पैदावार बढ़ती है परन्तु फसल के पोषण का गुण घट जाता है। वह अनेक भीषण कैंसर जैसे रोगों का कारण बनता है। दुर्भाग्य से भारत भी इसी दिशा में बढ़ रहा है। जापान से भारत आए वैज्ञानिकों ने पाया कि भारत की कृषि प्रणाली अधिक उपयोगी है। वह स्थायी लाभ देने वाली, कम लागत की तथा टिकाऊ है। उसके कारण भारत की भूमि की उर्वराशक्ति बनी हुई है। अमेरिका तथा योरोपीय देशों के जंगले नष्ट हो चुके हैं। अब उनकी निगाह एशिया और अफ्रीका पर है। किसी राष्ट्र के विकास के लिए 33 प्रतिशत जंगल आवश्यक हैं। स्वतंत्रता के समय हमारे देश में 22 प्रतिशत वन थे। अब ये 11 प्रतिशत शेष रह गए हैं। कुछ मानते हैं कि 6 प्रतिशत ही हैं। जंगलों की सुरक्षा जरूरी है। उनके नष्ट होने से प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है। प्राणवायु कम होती है तथा वायुमण्डल में ताप बढ़ता है, भूकम्प-बाढ़ आदि प्रकोप होते हैं। अतः वनों का संरक्षण आवश्यक है। फ्रांसिस बेकन से न्यूटन तक के पश्चिमी विचारक प्रकृति को निर्जीव और मानव को उपयोग की वस्तु मानते रहे हैं। आइंस्टाइन की इस सोच में कुछ सुधार हुआ है। यह सोचना गलत है कि प्रकृति का भण्डार असीमित है और उसका सीमाहीन प्रयोग किया जा सकता है। भारतीय विचारधारा के अनुसार उसकी भी एक सीमा है। प्रकृति मानव की वास्तविक आवश्यकताओं को तो पूरा कर सकती है परन्तु अवास्तविक आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम नहीं है। प्रकृति की सुरक्षा, संख्या और उसका सहयोग ही विकास का सच्चा पथ है। भारत के पास इस सम्बन्ध में एक दृष्टि है, जिसे वह विश्व को दे सकता है। यह दृष्टि 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:' अर्थात् त्यागपूर्वक भोग करने की है। विज्ञान भी आज इस दृष्टि का समर्थन कर रहा है। इसी के आधार पर विश्व के विकास का मार्ग तय होना चाहिए।
शब्दार्थ-
(पृष्ठ सं. 120) मातृ = माता। अश्वत्थ = पीपल। अस्तित्व = जीवन। प्रयोजन = उद्देश्य। समन्वय = सामंजस्य, मेलजोल। आयोजित करना = योजना बनाना। सुसंगत = उचित। अवधारणा = विचारधारा।
(पृष्ठ सं. 121) धरा = पृथ्वी। पोषण = पालना। पर्यावरण = वातावरण। सम्पदा = सम्पत्ति। अमर्यादित = नियंत्रणहीन। शोषण = सोखना, विनाश। संसाधन = उपकरण, वस्तुएँ। हस्तगत करना = प्राप्त करना। उपलब्ध = प्राप्त। उपभोगवादी = प्रयोग करने, इस्तेमाल करने की। दृष्टि = निगाह, विचारधारा। जड़ = निर्जीव। आत्मतत्व = आत्मा। अस्तित्व = होना, स्थिति। सर्वं खल्वमिदंत ब्रह्म = यह समस्त संसार ब्रह्म है। दैत्याकार = विशाल। अवधारणा = विश्वास, विचार। बंजर = अनुपजाऊ। मरुस्थल = रेगिस्तान। क्षमता = सामर्थ्य। द्रव्य = पदार्थ॥
(पृष्ठ सं. 122) उर्वरा शक्ति = उपजाऊपन। पोली = खोखली। दुष्चक्र = हानिकारक ढंग। पद्धति = प्रणाली। टिकाऊ = स्थायी। आँकड़े = गणना। जिम्मेदारी। प्रतिबद्ध = अटल, दृढ़।
महत्त्वपूर्ण गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ
1. माता भूमि पुत्रोऽहम् पृथिव्या' केवल पृथ्वी के संबंध में ही नहीं अपितु भारतीय मन, प्रकृति को और नदियों को भी मातृस्वरूप में ही दर्शन करता है। गंगा को हम माता कहते हैं, तुलसी को हमने माता माना, अश्वत्थ वृक्ष की हमने पूजा की और इन सबके माध्यम से समाज के मन में प्रकृति के प्रति पूज्य भाव उत्पन्न किया। हम तो लोगों को दूध पिलाते हैं, कबूतरों, चिड़ियों को दाना चुगाते हैं, हम तो चींटियों तक को आटा डालते हैं क्योंकि इन सबके अस्तित्व का कोई प्रयोजन है। इस विश्व के प्रत्येक पेड़-पौधे, जीव-जन्तु का अपना एक प्रयोजन है। इस प्रयोजन को जानकर सारे विश्व की रचना में उसका क्या स्थान है, इसको पहचानकर उसको बनाए रखें तभी समन्वय ठीक से बैठेगा। इसी को हमारे यहाँ धर्म कहा है।
सन्दर्भ एवं प्रसंग-
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक अपरा में संकलित 'धरा और पर्यावरण' शीर्षक निबन्ध से लिया गया है। इसके रचयिता कुप.सी. सुदर्शन हैं। भारत में पृथ्वी तथा प्रकृति को जड़ें अर्थात निर्जीव नहीं माना जाता। उसके साथ भारतीयों का सम्बन्ध माता और संतान के समान होता है।
व्याख्या-
लेखक भारतीय चिन्तन के बारे में बता रहे हैं। भारतीय दर्शन में पृथ्वी को माता तथा मनुष्य को उसका पुत्र माना जाता है। पृथ्वी के बारे में ही नहीं, भारतीय प्रकृति और नदियों को भी माता के रूप में देखते हैं। वे गंगा को माता कहते हैं। तुलसी को माँ मानते हैं। पीपल के पेड़ की पूजा करते हैं। इन सबके द्वारा वे समाज में लोगों के मन में प्रकृति के प्रति पूजा और सम्मान की भावना पैदा करते हैं। वे लोगों को दूध पिलाते हैं, चिड़ियों-कबूतरों को दाना चुगाते हैं तथा चींटियों को आटा डालते हैं। इसका कारण यह है कि वे भारतीय संस्कृति में इन सबके जीवन का कोई न कोई उद्देश्य है। इस संसार में जितने पेड़-पौधे हैं और जीव-जन्तु हैं, सबका जन्म किसी उद्देश्य के अन्तर्गत ही हुआ है। इस उद्देश्य के बारे में जाननी तथा समस्त संसार की रचना में उनके स्थान की पहचान करना और उनके अस्तित्व की रक्षा करना आवश्यक है। संसार में सामंजस्य की स्थापना तभी हो सकती है। अतः भारत में इसको धर्म अर्थात् पवित्र कर्तव्य माना गया है।
विशेष-
(i) भारतीय विचारधारा में प्रत्येक जीव का महत्व स्वीकार किया गया है। उसकी रक्षा को धर्म कहा गया है।
(ii) भाषा सरल, संस्कृतनिष्ठ तथा प्रवाहपूर्ण है।
(iii) शैली विवेचनात्मक-विचारधारा है॥
(iv) माताभूमि पुत्रोऽहम् पृथिव्या' जैसी सूक्तियों का सफल प्रयोग हुआ है।
2. पश्चिम की उपभोगवादी दृष्टि में से प्रकृति के इस अमर्यादित उपभोग का विचार-विकास हुआ है। धरा या प्रकृति उनके लिए पूज्य नहीं अपितु उपभोग की वस्तु है, उनका अस्तित्व ही मनुष्य को सुख देने के लिए है, उनमें कोई जीवन नहीं। अतः उनका जितना अधिकतम शोषण किया जा सकता है, करो। अपने महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु की खोज से पूर्व तक वे सब पेड़-पौधों को जड़
महत्त्वपूर्ण गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ
Question 1. माता भूमि पुत्रोऽहम् पृथिव्या' केवल पृथ्वी के संबंध में ही नहीं अपितु भारतीय मन, प्रकृति को और नदियों को भी मातृस्वरूप में ही दर्शन करता है। गंगा को हम माता कहते हैं, तुलसी को हमने माता माना, अश्वत्थ वृक्ष की हमने पूजा की और इन सबके माध्यम से समाज के मन में प्रकृति के प्रति पूज्य भाव उत्पन्न किया। हम तो लोगों को दूध पिलाते हैं, कबूतरों, चिड़ियों को दाना चुगाते हैं, हम तो चींटियों तक को आटा डालते हैं क्योंकि इन सबके अस्तित्व का कोई प्रयोजन है। इस विश्व के प्रत्येक पेड़-पौधे, जीव-जन्तु का अपना एक प्रयोजन है। इस प्रयोजन को जानकर सारे विश्व की रचना में उसका क्या स्थान है, इसको पहचानकर उसको बनाए रखें तभी समन्वय ठीक से बैठेगा। इसी को हमारे यहाँ धर्म कहा है।
Answer: यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'अपरा' के 'धरा और पर्यावरण' निबंध से लिया गया है। इसके लेखक कुप. सी. सुदर्शन हैं। भारतीय सोच के अनुसार, पृथ्वी और प्रकृति को निर्जीव नहीं माना जाता, बल्कि उनका संबंध माता और संतान जैसा है। लेखक बताते हैं कि भारतीय विचार में पृथ्वी को माँ और इंसान को उसका पुत्र माना जाता है। सिर्फ पृथ्वी ही नहीं, नदियों को भी माँ के समान आदर दिया जाता है, जैसे गंगा और तुलसी को। लोग पीपल के पेड़ों की पूजा करते हैं, चिड़ियों-कबूतरों को दाना खिलाते हैं और चींटियों को आटा भी डालते हैं। यह सब इसलिए किया जाता है क्योंकि भारतीय संस्कृति मानती है कि इस दुनिया में हर पेड़-पौधे और जीव-जन्तु का कोई-न-कोई खास मकसद है। हर इंसान का कर्तव्य है कि वह इस मकसद को समझे और इस दुनिया के हर हिस्से के महत्व को जानकर उसे बनाए रखे। तभी इस संसार में संतुलन बना रहेगा। इसी को भारत में धर्म यानी पवित्र कर्तव्य कहा गया है। यह दिखाता है कि भारतीय विचारधारा हर जीव के महत्व को मानती है और उसकी रक्षा को एक धर्म मानती है। 'माता भूमि पुत्रोऽहम् पृथिव्या' जैसी कहावतें इस विचार को अच्छे से बताती हैं।
In simple words: यह गद्यांश बताता है कि भारत में हम पृथ्वी, नदियों और प्रकृति को माँ मानते हैं। हम पेड़ों की पूजा करते हैं, पशु-पक्षियों को दाना डालते हैं क्योंकि हमारा मानना है कि हर जीव का अपना महत्व है। इस संतुलन को बनाए रखना ही हमारा धर्म है।
🎯 Exam Tip: सप्रसंग व्याख्या में सबसे पहले पाठ और लेखक का नाम लिखें। फिर, पूरे गद्यांश का सरल भाषा में अर्थ समझाएं और अंत में उसकी मुख्य बातें या संदेश बताएं।
Question 2. पश्चिम की उपभोगवादी दृष्टि में से प्रकृति के इस अमर्यादित उपभोग का विचार-विकास हुआ है। धरा या प्रकृति उनके लिए पूज्य नहीं अपितु उपभोग की वस्तु है, उनका अस्तित्व ही मनुष्य को सुख देने के लिए है, उनमें कोई जीवन नहीं। अतः उनका जितना अधिकतम शोषण किया जा सकता है, करो। अपने महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु की खोज से पूर्व तक वे सब पेड़-पौधों को जड़ मानते थे।
Answer: यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'अपरा' के 'धरा और पर्यावरण' निबंध से लिया गया है। इसके लेखक कुप. सी. सुदर्शन हैं। लेखक समझाते हैं कि पश्चिमी देशों ने प्रकृति को सिर्फ इस्तेमाल करने की चीज़ माना है, जिससे प्रकृति को बहुत नुकसान हुआ है। पश्चिमी देशों की सोच है कि प्रकृति कोई पूजनीय नहीं है, बल्कि यह सिर्फ मनुष्य के इस्तेमाल के लिए बनी है। वे पृथ्वी को भी अपने उपयोग की वस्तु मानते हैं। उनका मानना है कि प्रकृति में मौजूद हर चीज़ सिर्फ मनुष्य को खुशी देने के लिए है और उसमें कोई जीवन नहीं होता। इसलिए उनका विचार था कि प्रकृति का जितना हो सके, उतना अधिक शोषण करना चाहिए और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। पश्चिमी देशों की इस उपभोगवादी सोच के कारण प्रकृति का बिना रोक-टोक के इस्तेमाल बढ़ता गया। हालांकि, भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु ने यह खोज की कि पेड़-पौधों में भी जीवन होता है। लेकिन उनकी इस खोज से पहले तक पश्चिमी लोग पेड़-पौधों को निर्जीव ही मानते थे। इस दृष्टिकोण से मानव ने प्रकृति का भी बहुत अहित किया है।
In simple words: इस हिस्से में पश्चिमी देशों की सोच बताई गई है कि प्रकृति केवल इस्तेमाल करने की चीज़ है, पूजनीय नहीं। वे मानते थे कि प्रकृति निर्जीव है और मनुष्य को सुख देने के लिए ही बनी है, इसलिए इसका जितना चाहें, उतना उपयोग करना सही है। इस सोच से प्रकृति को बहुत नुकसान हुआ है।
🎯 Exam Tip: पश्चिमी और भारतीय दृष्टिकोण की तुलना करते समय, दोनों के मुख्य बिंदुओं को स्पष्ट रूप से अलग-अलग बताएं। शोषण और उपभोग जैसे शब्दों का प्रयोग सही संदर्भ में करें।
Question 3. जंगल कटते जा रहे हैं। अमेरिका और पश्चिम के देश तो अपने जंगलों को खा गए हैं। अब उनकी दृष्टि एशिया-अफ्रीका पर है। राष्ट्र के सन्तुलित विकास के लिए 33 प्रतिशत जंगल आवश्यक हैं। स्वतंत्रता के समय हमारे देश में 22 प्रतिशत जंगल थे। आँकड़ों के अनुसार अब ये 11 प्रतिशत शेष रह गए हैं और कुछ लोगों का मानना है कि केवल 6 प्रतिशत ही बचे हैं। हम यदि वन देवता को ही समाप्त कर देंगे तो कौन देव हमारी रक्षा रक्षा करेगा। क्या हमें वनों के दोहन का अमर्यादित उपयोग तुरंत नहीं रोकना चाहिए?
Answer: यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'अपरा' के 'धरा और पर्यावरण' निबंध से लिया गया है। इसके लेखक कुप. सी. सुदर्शन हैं। लेखक कहते हैं कि पश्चिमी देशों ने प्रकृति का बहुत गलत इस्तेमाल किया है और जंगलों को लगातार काटा जा रहा है। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने अपने जंगलों को पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब वे कच्चे माल के लिए एशिया और अफ्रीका के जंगलों पर नजर गड़ाए हुए हैं। किसी भी देश के सही विकास के लिए 33 प्रतिशत ज़मीन पर जंगल होने चाहिए। लेकिन भारत में आजादी के समय 22 प्रतिशत जंगल थे, जो अब घटकर 11 प्रतिशत रह गए हैं। कुछ लोग तो मानते हैं कि केवल 6 प्रतिशत ही जंगल बचे हैं। लेखक सवाल करते हैं कि अगर हम अपने वन रूपी देवताओं को ही खत्म कर देंगे, तो हमारी रक्षा कौन करेगा? इसलिए, वनों को बिना सोचे-समझे काटना तुरंत बंद करना बहुत जरूरी है। वनों का अंधाधुंध कटान पर्यावरण असंतुलन का एक बड़ा कारण है।
In simple words: इस अंश में बताया गया है कि जंगल तेजी से खत्म हो रहे हैं, खासकर पश्चिमी देशों में। भारत में भी जंगल बहुत कम बचे हैं। लेखक कहते हैं कि अगर हम जंगलों को ऐसे ही काटते रहे, तो यह हमारे लिए खतरनाक होगा, इसलिए जंगलों को काटना तुरंत रोकना चाहिए।
🎯 Exam Tip: पर्यावरण संबंधी प्रश्नों में आंकड़ों का उपयोग करें (जैसे जंगल का प्रतिशत) ताकि आपका उत्तर तथ्यात्मक और मजबूत लगे। समाधान पर जोर दें।
Question 4. हम मानकर चलते हैं कि प्रकृति का भण्डार असीमित है और असीमित भण्डार से हम असीमित उपभोग कर सकते हैं। किन्तु भारतीय चिन्तन हमसे कहता है कि प्रकृति का भंडार असीमित नहीं है, उसका भंडार सीमित है। मनुष्य की वास्तविक आवश्यकताओं के लिए तो प्रकृति के पास साधन हैं किन्तु अगर हम अवास्तविक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसका शोषण करेंगे तो हम प्रकृति को नष्ट करेंगे। सीमित साधनों में असीमित उपयोग नहीं हो सकता।
Answer: यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'अपरा' के 'धरा और पर्यावरण' निबंध से लिया गया है। इसके लेखक कुप. सी. सुदर्शन हैं। लेखक समझाते हैं कि लोग अक्सर यह गलतफहमी रखते हैं कि पृथ्वी पर मौजूद प्राकृतिक चीजें बहुत सारी हैं और उनका कितना भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इस सोच के कारण लोग प्रकृति का बिना सोचे-समझे दुरुपयोग कर रहे हैं, जिससे प्रकृति और खुद उनके लिए भी खतरा पैदा हो रहा है। लेखक बताते हैं कि यह मानना गलत है कि प्रकृति के भंडार असीमित हैं। बल्कि, प्रकृति के भंडार सीमित हैं। भारतीय विचार के अनुसार, प्रकृति में इतनी चीजें जरूर हैं कि वह मनुष्य की सभी असली जरूरतों को पूरा कर सके। लेकिन अगर हम अपनी अवास्तविक या लालच भरी इच्छाओं को पूरा करने के लिए प्रकृति का शोषण करेंगे, तो हम प्रकृति को बर्बाद कर देंगे। सीमित चीज़ों का असीमित इस्तेमाल करना संभव नहीं है। यह गद्यांश प्रकृति की सीमाओं के बारे में बताता है और प्रकृति के अत्यधिक दोहन से होने वाले बुरे परिणामों से हमें सावधान करता है।
In simple words: इस हिस्से में समझाया गया है कि हमें लगता है प्रकृति के पास सब कुछ असीमित है, लेकिन भारतीय सोच के अनुसार यह गलत है। प्रकृति की चीजें सीमित हैं। यह हमारी सच्ची जरूरतों को पूरा कर सकती है, लेकिन अगर हम लालच में इसका ज्यादा इस्तेमाल करेंगे, तो यह नष्ट हो जाएगी।
🎯 Exam Tip: "सीमित साधनों में असीमित उपयोग नहीं हो सकता" जैसे मुख्य वाक्य को अपने उत्तर में शामिल करें। प्रकृति और मानव की जरूरतों के बीच संतुलन पर जोर दें।
Question 5. हमें अपनी प्राचीन दृष्टि अपनाते हुए नया विकास पथ अपनाना होगा। पश्चिम प्रकृति के शोषण में विश्वास करता है। हम प्रकृति को माता मान उसके दूध पर पलने वाले हैं। हमारा उपभोग संयमित है। हमारे वर्तमान के लिए भी यही विकास पथ श्रेष्ठ है और यही शेष संसार को नष्ट होने के मार्ग से बचाने वाली मार्गदर्शक विकास पथ हो सकता है। हमारे ऊपर बहुत बड़ा दायित्व है क्योंकि हमारे पास एक जीवन दृष्टि है। हमारी इस दृष्टि और तत्वज्ञान का समर्थन अब विज्ञान भी करने लगा है। उसके आधार पर एक नए विकास पथ की संरचना के लिए हम प्रतिबद्ध हों।
Answer: यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'अपरा' के 'धरा और पर्यावरण' निबंध से लिया गया है। इसके लेखक कुप. सी. सुदर्शन हैं। लेखक कहते हैं कि हमें विकास के लिए अपनी पुरानी भारतीय सोच को अपनाना चाहिए। पश्चिमी देश प्रकृति का सिर्फ शोषण करने में विश्वास करते हैं, लेकिन भारत में हम प्रकृति को माँ की तरह पूजते हैं और मानते हैं कि हम उसी के सहारे जीते हैं। हमें प्रकृति की चीजों का इस्तेमाल सोच-समझकर करना चाहिए। आज के समय में विकास का यही तरीका सबसे अच्छा है। यही तरीका दुनिया को विनाश से बचा सकता है। यह हमारी बड़ी जिम्मेदारी है, क्योंकि हमारे पास जीवन को देखने का एक खास नजरिया है। अब विज्ञान भी हमारी इस सोच और ज्ञान को सही मान रहा है। इसलिए, हमें इस आधार पर एक नया विकास रास्ता बनाने के लिए पक्का इरादा करना चाहिए। पर्यावरण संकट पश्चिम की गलत नीतियों का नतीजा है, और भारतीय दृष्टिकोण को अपनाकर इस संकट से बचा जा सकता है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि हमें पश्चिमी देशों की तरह प्रकृति का शोषण नहीं करना चाहिए। हमें भारतीय सोच अपनानी चाहिए, जिसमें प्रकृति को माँ माना जाता है और उसका इस्तेमाल संयम से किया जाता है। यही सही विकास का रास्ता है जो दुनिया को बचा सकता है।
🎯 Exam Tip: भारतीय और पश्चिमी विकास अवधारणाओं के बीच अंतर को स्पष्ट करें। भारतीय दृष्टिकोण को एक समाधान के रूप में प्रस्तुत करें और 'प्रतिबद्ध' जैसे सकारात्मक शब्दों का प्रयोग करें।
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