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Detailed Chapter 17 भारतीय जीवन-दर्शन एवं संस्कृति RBSE Solutions for Class 11 Hindi
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Class 11 Hindi Chapter 17 भारतीय जीवन-दर्शन एवं संस्कृति RBSE Solutions PDF
RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 17 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
प्रश्न 1. भारतीय दर्शन में जीवन की रचना है -
(क) पूरक
(ख) चक्रीय
(ग) पूरक एवं चक्रीय
(घ) असत्
Answer: (ख) चक्रीय
In simple words: भारतीय विचारों के अनुसार, जीवन एक चक्र की तरह चलता है, जो कभी खत्म नहीं होता। यह जीवन और मृत्यु के निरंतर प्रवाह को दर्शाता है।
🎯 Exam Tip: वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में, सही विकल्प का चुनाव करते समय, सुनिश्चित करें कि आपका उत्तर भारतीय दर्शन के मूल सिद्धांतों से मेल खाता हो।
प्रश्न 2. जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है –
(क) धर्म
Answer: जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मोक्ष को माना गया है, जिसमें धर्म, अर्थ और काम सहायक होते हैं। मोक्ष की प्राप्ति जीवन के सभी बंधनों से मुक्ति दिलाती है।
In simple words: भारतीय दर्शन में जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य मोक्ष पाना है, जहाँ सभी इच्छाएँ और दुःख समाप्त हो जाते हैं।
🎯 Exam Tip: भारतीय दर्शन के पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को ध्यान में रखें, क्योंकि ये अक्सर जीवन के लक्ष्यों से संबंधित प्रश्नों में महत्वपूर्ण होते हैं।
RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 17 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. 'सर्वभूतहितेरता' से क्या आशय है?
Answer: 'सर्वभूतहितेरता' का मतलब है कि हमें सभी प्राणियों की भलाई और कल्याण में लगे रहना चाहिए। भारतीय संस्कृति में दूसरों के हित को बहुत महत्व दिया गया है।
In simple words: इसका मतलब है कि हमें सभी जीवों का भला सोचना और करना चाहिए।
🎯 Exam Tip: ऐसे शब्दों का अर्थ स्पष्ट करते समय, उनके मूल भाव और भारतीय संस्कृति में उनके महत्व को संक्षेप में बताएं।
प्रश्न 2. 'वसुधैव कुटुम्बकम्' से क्या भावना ध्वनित होती है ?
Answer: 'वसुधैव कुटुम्बकम्' से यह भावना व्यक्त होती है कि पूरी धरती एक परिवार है। इसका अर्थ है कि सभी पृथ्वीवासी एक ही परिवार के सदस्य हैं और उनमें कोई भेदभाव नहीं करना चाहिए। यह भावना पूरे विश्व को एकता का पाठ पढ़ाती है।
In simple words: इसका मतलब है कि पूरी दुनिया एक परिवार की तरह है और हम सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
🎯 Exam Tip: 'वसुधैव कुटुम्बकम्' जैसे सांस्कृतिक वाक्यांशों का अर्थ बताते समय, उसके व्यापक दृष्टिकोण और विश्व बंधुत्व की भावना पर जोर दें।
प्रश्न 3. मनुष्य और पशु में कौन-सा तत्व समान है ?
Answer: मनुष्य और पशु दोनों में आत्मतत्व समान होता है। यह आत्मतत्व ही है जो सभी जीवों में प्राण और चेतना का संचार करता है।
In simple words: मनुष्य और पशु दोनों में आत्मा का तत्व एक समान होता है।
🎯 Exam Tip: भारतीय दर्शन में आत्मतत्व की अवधारणा को सरल शब्दों में व्यक्त करें, यह समझाते हुए कि यह सभी जीवों में कैसे एक समान है।
प्रश्न 4. सृष्टि का सृजन किस तत्व से हुआ है ?
Answer: सृष्टि का सृजन ब्रह्म, जिसे परमात्मतत्व भी कहते हैं, से हुआ है। भारतीय दर्शन के अनुसार ब्रह्म ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल स्रोत है।
In simple words: यह दुनिया ब्रह्म नाम के एक महान शक्ति से बनी है।
🎯 Exam Tip: 'सृजन' और 'ब्रह्म' जैसे शब्दों का सही अर्थ बताएं और स्पष्ट करें कि भारतीय दर्शन में सृष्टि की उत्पत्ति का सिद्धांत क्या है।
RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 17 लघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. सृष्टि निर्माण का क्रम क्या बताया गया है ?
Answer: सृष्टि के निर्माण का क्रम इस प्रकार है: सबसे पहले ब्रह्म ने अपने आप से सृष्टि बनाई। फिर उसमें से चित्त, मन, बुद्धि, अहंकार, ज्ञान और कर्म के अंग, पंचतन्मात्र और पंचमहाभूत उत्पन्न हुए। इन्हीं से सूर्य, वायु, पृथ्वी, जल आदि बने, और फिर वृक्ष, वनस्पति, पर्वत, वन तथा मनुष्य भी उन्हीं से बने। यह सभी चीज़ें ब्रह्म के ही विभिन्न रूप हैं।
In simple words: ब्रह्म ने अपनी इच्छा से सब कुछ बनाया। पहले मन, बुद्धि जैसी चीज़ें बनीं, फिर धरती, पानी, हवा जैसे तत्व और आखिर में पेड़-पौधे और इंसान बने।
🎯 Exam Tip: सृष्टि निर्माण के क्रम को बिंदुवार या क्रमिक रूप से प्रस्तुत करें ताकि वह स्पष्ट और याद रखने योग्य हो।
प्रश्न 2. भारत की चिरंजीविता का रहस्य क्या है ?
Answer: भारत की चिरंजीविता का रहस्य उसकी गहरी जीवन दृष्टि और सर्वहितकारी व्यवस्था में छिपा है। यहाँ की संस्कृति सभी को साथ लेकर चलती है, जिसमें 'वसुधैव कुटुम्बकम्' और 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' जैसी भावनाएँ प्रमुख हैं। यही कारण है कि अनेक संकटों के बावजूद भारतीय सभ्यता आज भी जीवित और विकसित है।
In simple words: भारत हमेशा जीवित क्यों रहा है? क्योंकि यहाँ सब को साथ लेकर चलने का विचार है और सभी के भले की बात सोची जाती है।
🎯 Exam Tip: 'चिरंजीविता' जैसे शब्दों के अर्थ को भारतीय संस्कृति के मूल सिद्धांतों से जोड़कर समझाएं, जैसे एकता और कल्याण का भाव।
प्रश्न 3. धर्म से क्या आशय है ?
Answer: धर्म मानव जीवन के चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक है। इसका अर्थ एक नियंत्रक शक्ति से है, जो मनुष्य के काम और अर्थ को सही दिशा देती है। धर्म का पालन करने से मनुष्य मोक्ष की प्राप्ति की ओर बढ़ता है, जो जीवन का अंतिम लक्ष्य है।
In simple words: धर्म एक नियम है जो इंसान को सही रास्ते पर रखता है, ताकि वह अपने जीवन के बड़े लक्ष्य (मोक्ष) को पा सके।
🎯 Exam Tip: धर्म को केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रखकर, उसे एक नैतिक नियंत्रक शक्ति के रूप में समझाएं जो जीवन के अन्य पुरुषार्थों को संतुलित करती है।
प्रश्न 4. 'कर्मवाद' वैज्ञानिक सिद्धान्त कैसे है ? समझाइए।
Answer: 'कर्मवाद' एक वैज्ञानिक सिद्धांत है क्योंकि यह कार्य-कारण संबंध पर आधारित है। मनुष्य जैसा अच्छा या बुरा सोचता है, बोलता है और करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। अच्छे कर्मों का फल अच्छा और बुरे कर्मों का फल बुरा होता है, यह एक प्राकृतिक नियम की तरह काम करता है। हमारी वर्तमान स्थिति और भविष्य की गति हमारे अपने कर्मों पर निर्भर करती है, ठीक वैसे ही जैसे विज्ञान में हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है।
In simple words: कर्मवाद एक विज्ञान की तरह है क्योंकि यह कहता है कि जैसा हम करेंगे, वैसा ही हमें मिलेगा। अच्छे काम का अच्छा नतीजा, बुरे काम का बुरा नतीजा।
🎯 Exam Tip: कर्मवाद को वैज्ञानिक सिद्धान्त सिद्ध करने के लिए, 'कार्य-कारण' संबंध को स्पष्ट रूप से समझाएं और उदाहरणों का उपयोग करें।
प्रश्न 5. संयम को उपभोग से श्रेष्ठ क्यों माना गया है ?
Answer: भारतीय संस्कृति में देने का महत्व लेने से अधिक है, इसलिए संयम को उपभोग से श्रेष्ठ माना गया है। देने में जो आनंद मिलता है, वह लेने में नहीं होता। दूसरों की सेवा करना आनंददायक होता है। संयम में दूसरों का हित सोचने और उनके लिए त्याग करने का भाव होता है, जबकि उपभोग केवल अपनी इच्छाओं को पूरा करने से जुड़ा है। संयम परोपकार की भावना को बढ़ाता है।
In simple words: संयम अच्छा है क्योंकि इसमें दूसरों का भला करना और चीज़ें बाँटना सिखाया जाता है, जिससे ज्यादा खुशी मिलती है।
🎯 Exam Tip: संयम और उपभोग के बीच के अंतर को स्पष्ट करने के लिए, 'परोपकार' और 'आत्मसंतोष' जैसे शब्दों का प्रयोग करें।
प्रश्न. 6. सभी मनुष्यों की एकात्मता का रहस्य क्या है ?
Answer: सभी मनुष्यों की एकात्मता का रहस्य यह है कि उनमें एक ही आत्मतत्व विद्यमान है। देश, प्रदेश, जाति या धर्म कोई भी हो, सभी मनुष्यों में मूल रूप से एक ही आत्मतत्व का अंश है। यह संपूर्ण सृष्टि एक ही मूल से उत्पन्न हुई है, इसलिए सभी प्राणी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
In simple words: सभी इंसान एक ही आत्मा से बने हैं, इसलिए हम सब एक हैं, चाहे हम कहीं भी रहते हों या कुछ भी मानते हों।
🎯 Exam Tip: एकात्मता को समझाते समय, आत्मतत्व के सार्वभौमिक अस्तित्व पर जोर दें और बताएं कि यह कैसे सभी भेदों से परे है।
प्रश्न 7. मानव की पूर्णता से क्या आशय है ?
Answer: भारतीय जीवन में चार पुरुषार्थ-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष बताए गए हैं। मानव की पूर्णता का आशय इन चारों पुरुषार्थों को संतुलित रूप से प्राप्त करने से है। धर्म द्वारा नियंत्रित अर्थ और काम ही मनुष्य को मोक्ष तक पहुँचाते हैं, जो जीवन का अंतिम लक्ष्य है। इन पुरुषार्थों की रचना मनुष्य को आत्मिक संतोष और जीवन की सच्ची समझ प्रदान करती है।
In simple words: इंसान तभी पूरा होता है जब वह धर्म, पैसा, इच्छा और मोक्ष के नियमों का पालन करके जीवन को जीता है।
🎯 Exam Tip: मानव पूर्णता की अवधारणा को पुरुषार्थ चतुष्टय (चार पुरुषार्थों) से जोड़कर समझाएं और स्पष्ट करें कि इनका संतुलन कैसे महत्वपूर्ण है।
RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 17 निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 2. चारों पुरुषार्थ हमें पूर्णता की ओर ले जाने वाले हैं ?
Answer: भारतीय दर्शन में मानव जीवन के चार प्रमुख पुरुषार्थ माने गए हैं: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। ये चारों पुरुषार्थ मिलकर मनुष्य को जीवन में पूर्णता की ओर ले जाते हैं। जीवन के शुरुआती दो पड़ाव, बचपन और युवावस्था, 'अर्थ' से जुड़े हैं, जहाँ विद्या और धन कमाने का लक्ष्य होता है। 'अर्थ' का मतलब सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि वो सभी चीजें हैं जो हम मेहनत से कमाते हैं, जैसे संपत्ति, मान-सम्मान। 'काम' मनुष्य की स्वाभाविक इच्छाओं और भावनाओं से संबंधित है, जैसे प्रेम, द्वेष, लोभ आदि। इन इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'अर्थ' एक साधन है। 'धर्म' इन दोनों, 'अर्थ' और 'काम', को नियंत्रित करने वाली शक्ति है। जब 'अर्थ' और 'काम' धर्म के नियमों में रहकर पूरे किए जाते हैं, तभी वे हमें 'मोक्ष' तक पहुँचाने में मदद करते हैं। 'मोक्ष' जीवन का अंतिम और सर्वोच्च लक्ष्य है, जिसमें आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को जानकर सभी बंधनों से मुक्त हो जाती है। जब मनुष्य को यह ज्ञान हो जाता है, तो उसे अपनी अपूर्णता का अहसास खत्म हो जाता है और वह पूर्णता प्राप्त कर लेता है।
In simple words: हमारे जीवन के चार लक्ष्य हैं - धर्म, पैसा, इच्छा और मोक्ष। जब हम इन चारों को सही तरीके से पूरा करते हैं, तो हम एक पूरा और संतोषजनक जीवन जीते हैं।
🎯 Exam Tip: चारों पुरुषार्थों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें और बताएं कि वे कैसे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और मानव जीवन की पूर्णता में योगदान करते हैं।
RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 17 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न 2. सृष्टि में दिखाई देने वाले सभी भेद –
(क) उचित हैं।
(ख) ऊपरी और आभासी हैं।
(ग) वास्तविक और सच्चे हैं।
(घ) प्राकृतिक हैं।
Answer: (ख) ऊपरी और आभासी हैं।
In simple words: दुनिया में जो अलग-अलग चीजें दिखती हैं, वे सिर्फ ऊपर से ही अलग लगती हैं, असल में सब एक ही हैं।
🎯 Exam Tip: वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में 'भेद' या 'विविधता' के संदर्भ में भारतीय दर्शन के एकात्मता के सिद्धांत को याद रखें।
प्रश्न 3. भारतीय, जापानी, जर्मन, अमेरिकी, मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, पारसी सब समाहित हैं –
(क) देश में
(ख) जाति में
(ग) धर्म में
(घ) आत्मतत्व में।
Answer: (घ) आत्मतत्व में।
In simple words: चाहे कोई कहीं का भी हो या कोई भी धर्म मानता हो, हम सब एक ही आत्मा से जुड़े हैं।
🎯 Exam Tip: ऐसे प्रश्नों में जो विभिन्न संस्कृतियों या धर्मों की बात करते हैं, भारतीय दर्शन के 'एकात्मतत्व' या 'सर्वधर्म समभाव' के सिद्धांत पर केंद्रित उत्तर सही होता है।
प्रश्न 4. अमर तत्व नहीं हैं –
(क) अजर
(ख) अमर
(ग) मनोरंजक
(घ) अविनाशी
Answer: (ग) मनोरंजक
In simple words: जो चीज़ 'मनोरंजक' होती है, वह हमेशा अमर नहीं होती।
🎯 Exam Tip: दिए गए विकल्पों में से सबसे असंगत या विपरीत शब्द चुनें, जो प्रश्न के अर्थ से मेल न खाता हो।
RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 17 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. सम्पूर्ण सृष्टि की रचना किसने की ?
Answer: संपूर्ण सृष्टि की रचना ब्रह्मा ने अपने आप से की है। भारतीय दर्शन के अनुसार, ब्रह्मा ही इस ब्रह्मांड के रचयिता हैं।
In simple words: ब्रह्मा जी ने यह पूरी दुनिया बनाई है।
🎯 Exam Tip: सृष्टि के रचयिता के संबंध में भारतीय पौराणिक कथाओं और दर्शन के अनुसार सही जानकारी दें।
प्रश्न 2. 'सोऽकामयत् एकोऽहम् बहुस्याम्' का क्या अर्थ है ?
Answer: इस संस्कृत वाक्य 'सोऽकामयत् एकोऽहम् बहुस्याम्' का अर्थ है कि "उसने (ब्रह्म ने) इच्छा की कि मैं एक हूँ और अनेक हो जाऊँ।" यह वाक्य ब्रह्म की उस इच्छा को दर्शाता है जिससे उन्होंने स्वयं को विभिन्न रूपों में प्रकट कर सृष्टि का निर्माण किया।
In simple words: इसका मतलब है कि ब्रह्म ने चाहा कि मैं एक से बहुत सारे रूपों में बदल जाऊँ।
🎯 Exam Tip: संस्कृत वाक्यांशों का अर्थ बताते समय, शब्दशः अनुवाद के साथ-साथ उसके पीछे का दार्शनिक भाव भी समझाएं।
प्रश्न 3. सृष्टि में दिखाई देने वाले भेदों की विशिष्टता क्या है ?
Answer: सृष्टि में दिखाई देने वाले सभी भेदों की विशिष्टता यह है कि वे केवल ऊपरी और आभासी हैं। मूल रूप से, सभी चीजें एक ही आत्मतत्व से बनी हैं, इसलिए यह विविधता केवल बाहरी रूप में है, वास्तविक नहीं।
In simple words: दुनिया में जो भी अलग-अलग चीजें दिखती हैं, वे सिर्फ ऊपर से ही अलग हैं, अंदर से सब एक जैसी ही हैं।
🎯 Exam Tip: 'भेदों की विशिष्टता' को समझाते समय, भारतीय दर्शन के 'एकात्मतत्व' के सिद्धांत पर ध्यान केंद्रित करें।
प्रश्न 4. सभी प्राणियों के साथ हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए ?
Answer: समस्त प्राणियों के साथ हमारा व्यवहार प्रेमपूर्ण होना चाहिए। भारतीय संस्कृति हमें सभी जीवों के प्रति दया और प्रेम का भाव रखने की शिक्षा देती है, क्योंकि सबमें एक ही आत्मतत्व विद्यमान है।
In simple words: हमें सभी जीव-जंतुओं से प्यार से पेश आना चाहिए।
🎯 Exam Tip: इस प्रकार के नैतिक प्रश्नों में 'प्रेम', 'दया' और 'समानता' जैसे मूल्यों को उत्तर का आधार बनाएं।
प्रश्न 5. सेवा को क्या माना गया है और उसका प्रकट रूप क्या है ?
Answer: सेवा को धर्म माना गया है और उसका प्रकट रूप पूजा है। भारतीय परंपरा में, किसी जरूरतमंद की सेवा करना ईश्वर की उपासना के समान ही पवित्र कार्य माना जाता है।
In simple words: सेवा करना एक अच्छा धर्म है और यह भगवान की पूजा करने जैसा है।
🎯 Exam Tip: सेवा की अवधारणा को भारतीय धर्म और आध्यात्मिकता से जोड़कर प्रस्तुत करें।
प्रश्न 6. जीवन की गति चक्रीय होने का क्या तात्पर्य है ?
Answer: जीवन की गति चक्रीय होने का तात्पर्य यह है कि जीवन जहाँ से शुरू होता है, घूमकर वहीं वापस आ जाता है। यह एक निरंतर चक्र की तरह है, जिसमें जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म शामिल हैं। इसका मतलब है कि जीवन कभी खत्म नहीं होता, सिर्फ उसका रूप बदलता रहता है, जैसे सागर से पानी बादल बनता है और फिर बारिश बनकर वापस सागर में मिल जाता है।
In simple words: इसका मतलब है कि जीवन एक पहिए की तरह चलता रहता है, जहाँ से शुरू होता है वहीं वापस आ जाता है, यह कभी खत्म नहीं होता।
🎯 Exam Tip: चक्रीय गति को समझाने के लिए जीवन के विभिन्न चरणों या प्रकृति के उदाहरणों का उपयोग करें ताकि अवधारणा स्पष्ट हो सके।
प्रश्न 8. भारत में कथा-कहानियों, गीतों, कहावतों आदि के द्वारा किस बात को सामान्य जन को बताया गया है ?
Answer: भारत में कथा-कहानियों, गीतों-भजनों और कहावतों के माध्यम से सामान्य लोगों को यह बताया गया है कि जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है। यह 'कर्मवाद' का सिद्धांत है जो बताता है कि हमारे कर्मों का परिणाम हमें अवश्य मिलता है।
In simple words: कहानियों और गीतों से लोगों को सिखाया जाता है कि जैसा काम करोगे, वैसा ही नतीजा मिलेगा।
🎯 Exam Tip: भारतीय लोक कथाओं और गीतों के माध्यम से नैतिक शिक्षाओं को प्रस्तुत करें, खासकर कर्मफल के सिद्धांत को।
प्रश्न 9. जो सबसे अधिक शक्तिशाली है. योग्यतम है, वही पाएगा' कथन में किस पश्चिमी सिद्धान्त की ओर संकेत है ?
Answer: 'जो सबसे अधिक शक्तिशाली है, योग्यतम है, वही पाएगा' कथन में प्रसिद्ध वैज्ञानिक डार्विन के 'योग्यतम की उत्तरजीविता' (Survival of the fittest) सिद्धांत की ओर संकेत है। यह पश्चिमी विचार है, जो संघर्ष और प्रभुत्व पर केंद्रित है।
In simple words: यह बात डार्विन के उस विचार की तरफ इशारा करती है कि सबसे ताकतवर और काबिल ही जीतता है।
🎯 Exam Tip: पश्चिमी और भारतीय दर्शन के बीच के अंतर को स्पष्ट करें, जहाँ भारतीय दर्शन में संरक्षण और समन्वय पर जोर दिया जाता है।
प्रश्न 10. मानव जीवन का लक्ष्य क्या है ?
Answer: मानव जीवन का मुख्य लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है। भारतीय दर्शन के अनुसार, मोक्ष वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति सभी सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर परम आनंद प्राप्त करता है।
In simple words: इंसान की जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद मोक्ष पाना है, यानी सब दुखों से आजादी।
🎯 Exam Tip: मोक्ष को भारतीय जीवन के अंतिम और सर्वोच्च लक्ष्य के रूप में संक्षिप्त और स्पष्ट रूप से परिभाषित करें।
प्रश्न 11. 'पुरुषार्थ चतुष्ट्य क्या है ?
Answer: 'पुरुषार्थ चतुष्ट्य' का मतलब मानव जीवन के चार प्रमुख लक्ष्य हैं: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन चारों को प्राप्त करने से जीवन में संतुलन और पूर्णता आती है।
In simple words: पुरुषार्थ चतुष्ट्य का मतलब है जीवन के चार मुख्य लक्ष्य - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
🎯 Exam Tip: पुरुषार्थ चतुष्ट्य के चारों घटकों को सूचीबद्ध करें और प्रत्येक का संक्षिप्त अर्थ बताएं।
प्रश्न 12. भारत एवं भारतीय संस्कृति के अक्षय होने का क्या कारण है ?
Answer: भारत और भारतीय संस्कृति के अक्षय (कभी खत्म न होने) का कारण उसकी जीवन को देखने की समग्र दृष्टि और सर्वहितकारी व्यवस्था है। भारतीय संस्कृति हमेशा दूसरों के कल्याण और एकता पर जोर देती है, जिससे यह समय के साथ लचीली और स्थायी बनी हुई है।
In simple words: भारत और उसकी संस्कृति इसलिए हमेशा बने रहते हैं क्योंकि वे सभी का भला सोचते हैं और सबको साथ लेकर चलते हैं।
🎯 Exam Tip: भारतीय संस्कृति की अमरता के कारणों को उसके समावेशी और कल्याणकारी मूल्यों से जोड़कर समझाएं।
RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 17 लघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 2. सृष्टि की रचना के सम्बन्ध में भारतीय मत क्या है ?
Answer: भारतीय मत के अनुसार, यह पूरी सृष्टि परमतत्व अर्थात् ब्रह्म से उत्पन्न हुई है और उसी में समाई हुई है। उपनिषदों में कहा गया है कि 'सोऽकामयत् एकोऽहम् बहुस्याम्', जिसका अर्थ है कि ब्रह्म ने स्वयं को अनेक रूपों में प्रकट करने की इच्छा की। इस प्रकार, यह सृष्टि ब्रह्म का ही विस्तार है और ब्रह्म स्वयं इसमें व्याप्त भी है।
In simple words: भारतीय सोच कहती है कि यह दुनिया ब्रह्म से बनी है और ब्रह्म ही इसमें हर जगह मौजूद है।
🎯 Exam Tip: सृष्टि की उत्पत्ति के भारतीय सिद्धांत को स्पष्ट करने के लिए उपनिषदों के प्रमुख वाक्यांशों का उपयोग करें।
प्रश्न 3. संसार में दिखाई देने वाले भेद कैसे हैं ?
Answer: संसार में हमें भले ही कई तरह के भेद दिखाई देते हैं, जैसे विभिन्न वस्तुएं या प्राणी एक-दूसरे से अलग दिखते हैं, लेकिन ये सभी भेद केवल ऊपरी और आभासी हैं। मूल रूप से, सभी पदार्थों और जीवों में एक ही जीवनतत्व या आत्मतत्व मौजूद है। यह विविधता केवल बाहरी रूप में है, जबकि आंतरिक रूप से सब एक हैं।
In simple words: दुनिया में जो भी अलग-अलग चीजें दिखती हैं, वे बस ऊपर से ही अलग हैं, लेकिन अंदर से सब एक ही जीवन शक्ति से जुड़े हैं।
🎯 Exam Tip: 'भेद' को 'आभासी' सिद्ध करने के लिए 'आत्मतत्व' या 'एक ही जीवन' की अवधारणा को प्रमुखता से प्रस्तुत करें।
प्रश्न 4. सम्पूर्ण सृष्टि में कैसा आन्तरिक सम्बन्ध है ?
Answer: संपूर्ण सृष्टि में आंतरिक संबंध एकात्मता का है, जिसका अर्थ है कि पूरी सृष्टि मूलतः एक है। सभी प्राणियों, जड़-चेतन वस्तुओं और मनुष्यों में एक ही आत्मतत्व मौजूद है। जापानियों, भारतीयों, अमेरिकियों, हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, यहूदियों, पारसियों, जैनियों और बौद्धों में भी वही आत्मतत्व है। यह संबंध प्रेम और अपनत्व का है।
In simple words: सारी दुनिया अंदर से एक-दूसरे से जुड़ी हुई है, क्योंकि सबमें एक ही आत्मा का अंश है, इसलिए सब एक हैं।
🎯 Exam Tip: एकात्मता के सिद्धांत को विभिन्न देशों, धर्मों और प्राणियों के उदाहरणों से समझाएं ताकि इसकी सार्वभौमिकता स्पष्ट हो सके।
प्रश्न 5. मनुष्य को दूसरों की सेवा करने में आनन्द क्यों आता है ?
Answer: मनुष्य को दूसरों की सेवा करने में आनंद इसलिए आता है क्योंकि सभी मनुष्यों के अंदर एक समान आत्मतत्व मौजूद है। इस आत्मतत्व का स्वभाव ही प्रेम है। जब हम किसी से प्रेम करते हैं, तो उसकी सेवा करने से हमें खुशी मिलती है। चूंकि सभी मनुष्यों में प्रेम का स्वाभाविक संबंध है, इसलिए दूसरों की सेवा करने से आत्मिक संतोष और खुशी मिलती है।
In simple words: हम दूसरों की मदद करके खुश होते हैं क्योंकि हम सबके अंदर एक ही प्यार करने वाली आत्मा है।
🎯 Exam Tip: दूसरों की सेवा में आनंद की अनुभूति को आत्मतत्व के स्वभाव और प्रेम की भावना से जोड़कर स्पष्ट करें।
प्रश्न 6. सेवा कितने प्रकार की होती है ? उसका प्रकट रूप क्या है ?
Answer: सेवा अनेक प्रकार की होती है, जैसे वृद्धों की सेवा, गुरु की सेवा, रोगियों की सेवा, गरीबों की सेवा और संपूर्ण सृष्टि की सेवा। भारत में इन सभी सेवाओं को श्रेष्ठ धर्म माना गया है। सेवा का प्रकट रूप पूजा है, क्योंकि किसी भी प्राणी की सेवा करना ईश्वर की उपासना करने जैसा ही है।
In simple words: सेवा कई तरह की होती है, जैसे बड़ों की, बीमारों की मदद करना। यह सब भगवान की पूजा जैसा ही है।
🎯 Exam Tip: सेवा के विभिन्न रूपों को सूचीबद्ध करें और उसके आध्यात्मिक महत्व को उजागर करें।
प्रश्न 8. जीवन की क्या विशेषता है ?
Answer: जीवन की प्रमुख विशेषता उसकी चक्रीय गति है, जिसके कारण जीवन अजर, अमर और अविनाशी है। यह कभी समाप्त नहीं होता, बल्कि केवल रूप बदलता रहता है। मूल तत्व हमेशा एक जैसा रहता है और सभी प्राणियों में परमात्म तत्व का ही अंश होता है। इसलिए जीवन को भी अविनाशी माना जाता है।
In simple words: जीवन की खास बात यह है कि यह हमेशा चलता रहता है, कभी मरता नहीं, बस अपना रूप बदलता रहता है।
🎯 Exam Tip: जीवन की 'चक्रीय गति' और 'अविनाशी' होने की विशेषताओं को स्पष्ट करें, जो भारतीय दर्शन का मुख्य भाग है।
प्रश्न 9. चक्रीय गति मानव के व्यवहार से कैसे सम्बन्धित है ?
Answer: चक्रीय गति का संबंध मानव व्यवहार से भी है। मनुष्य अपने मन, वाणी और कर्म से दूसरों के साथ जैसा व्यवहार करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। 'जैसी करनी वैसी भरनी' का सिद्धांत इसी से जुड़ा है। अच्छा व्यवहार करने पर अच्छा फल मिलता है और बुरा व्यवहार करने पर बुरा फल मिलता है, यह एक निरंतर चलने वाला चक्र है।
In simple words: हमारे कामों का नतीजा वापस हम तक आता है, जैसे मन, वचन और कर्म से हम जैसा करते हैं, वैसा ही हमें मिलता है।
🎯 Exam Tip: मानव व्यवहार और कर्मफल के सिद्धांत को चक्रीय गति से जोड़कर समझाएं, यह बताते हुए कि हमारे कर्मों का प्रभाव कैसे वापस हम पर आता है।
प्रश्न 10. 'कर्मवाद' का सिद्धान्त क्या है ?
Answer: 'कर्मवाद' का सिद्धांत यह है कि हमारे विचार, शब्द और कर्मों का परिणाम हमें ही भोगना पड़ता है। यदि हम किसी का भला सोचते, बोलते या करते हैं, तो हमारा भी भला होता है। इसके विपरीत, यदि हम किसी का बुरा सोचते, बोलते या करते हैं, तो उसका बुरा परिणाम हमें ही मिलता है। मनुष्य की वर्तमान स्थिति और भविष्य की दिशा उसके अपने कर्मों पर ही निर्भर करती है।
In simple words: कर्मवाद का नियम कहता है कि हम जैसा काम करते हैं, वैसा ही हमें मिलता है। अच्छे काम का अच्छा फल और बुरे काम का बुरा फल।
🎯 Exam Tip: कर्मवाद को एक 'कार्य-कारण' संबंध के रूप में प्रस्तुत करें और स्पष्ट करें कि यह कैसे मानव जीवन को प्रभावित करता है।
प्रश्न 11. भारत में लौकिक जीवन में कर्म पर विश्वास किस प्रकार प्रगट हुआ है ?
Answer: भारत में लौकिक जीवन में कर्म पर विश्वास कथा-कहानियों, भजनों, गीतों, कहावतों और मुहावरों के माध्यम से प्रकट हुआ है। जैसे अनपढ़ किसान भी कहता है 'जैसा बोओगे वैसा काटोगे', और भिखारी कहता है 'एक पैसा दोगे वह दस लाख देगा'। ये सभी लोकोक्तियाँ दर्शाती हैं कि भारतीय समाज में 'जैसी करनी वैसी भरनी' के सिद्धांत पर गहरा विश्वास है।
In simple words: भारत में लोग मानते हैं कि हर काम का नतीजा मिलता है, यह बात कहानियों और कहावतों में भी बताई जाती है।
🎯 Exam Tip: कर्मफल के सिद्धांत को लोक-कथाओं और दैनिक जीवन के उदाहरणों से समझाएं ताकि वह आसानी से समझ में आ सके।
प्रश्न 12. कर्म के सिद्धान्त का मनुष्य के व्यवहार पर क्या प्रभाव होता है ?
Answer: कर्मफल के सिद्धांत का मनुष्य के व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इस सिद्धांत के कारण हमारे व्यवहार में कर्तव्य को महत्वपूर्ण माना जाता है। लोग समझते हैं कि अच्छे कर्म करने से अच्छा फल मिलेगा, इसलिए वे नैतिक और सही मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं। यह सिद्धांत लोगों को जिम्मेदारी से काम करने और दूसरों के प्रति अच्छा व्यवहार रखने के लिए प्रेरित करता है।
In simple words: कर्म के नियम से इंसान अच्छा व्यवहार करने की कोशिश करता है क्योंकि उसे पता है कि अच्छे काम का अच्छा नतीजा मिलेगा।
🎯 Exam Tip: कर्म सिद्धांत के नैतिक प्रभावों को उजागर करें, यह बताते हुए कि यह कैसे व्यक्तियों को अपने कर्तव्यों और अच्छे व्यवहार के प्रति प्रेरित करता है।
प्रश्न 14. 'यही रचना हमें पूर्णत्व की ओर ले जाती है' कथन पर विचारपूर्ण टिप्पणी कीजिए।
Answer: 'यही रचना हमें पूर्णत्व की ओर ले जाती है' कथन भारतीय संस्कृति के पुरुषार्थ चतुष्टय - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संदर्भ में है। इन चारों पुरुषार्थों को जीवन में सिद्ध करना ही मानव जीवन का लक्ष्य है। मोक्ष की प्राप्ति, जो अंतिम पुरुषार्थ है, मानव आत्मा को सभी बंधनों से मुक्त करती है और उसे पूर्णता प्रदान करती है। धर्म एक नियामक शक्ति के रूप में अर्थ और काम को नियंत्रित करके मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। इस प्रकार, इन पुरुषार्थों का सामंजस्यपूर्ण पालन ही मनुष्य को आत्मिक पूर्णता और मुक्ति की ओर ले जाता है।
In simple words: यह बात बताती है कि धर्म, पैसा, इच्छा और मोक्ष जैसे जीवन के लक्ष्य हमें एक पूरा और खुशहाल इंसान बनाते हैं, जिससे हमें शांति मिलती है।
🎯 Exam Tip: कथन की व्याख्या पुरुषार्थ चतुष्टय से जोड़कर करें और स्पष्ट करें कि ये लक्ष्य कैसे मानव को पूर्णता की ओर अग्रसर करते हैं।
RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 17 निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. 'जैसी करनी वैसी भरनी' का क्या आशय है ? कर्म के सिद्धान्त के सन्दर्भ में इसे स्पष्ट कीजिए।
Answer: 'जैसी करनी वैसी भरनी' का आशय यह है कि मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार ही फल भोगता है। यह कर्म के सिद्धांत का मूल आधार है। भारतीय दर्शन में कर्म के तीन रूप बताए गए हैं: मन से सोचना, वाणी से कहना और कार्य रूप में करना। यदि कोई प्राणी किसी का अहित सोचता है, अप्रिय बात कहता है, या अनुचित काम करता है, तो उसे उसका बुरा परिणाम भुगतना पड़ता है। इसके विपरीत, दूसरों का हित सोचना, मधुर बोलना और परोपकार करना प्रशंसनीय होता है और उसका अच्छा फल प्राप्त होता है। कर्मवाद का सिद्धांत बताता है कि जीवन का स्वरूप और उसकी गति हमारे कर्मों के अनुसार ही तय होती है। दैनिक जीवन में भी लोग इसी सिद्धांत पर विश्वास करते हैं, जैसे किसान कहता है 'जैसा बोओगे, वैसा काटोगे' या गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है 'जो जस करहिं, सो तस फल चाखा'।
In simple words: 'जैसा करोगे वैसा भरोगे' का मतलब है कि हमारे हर काम का नतीजा हमें ही मिलता है। अच्छे काम का अच्छा और बुरे काम का बुरा फल।
🎯 Exam Tip: कर्म के सिद्धांत को 'जैसी करनी वैसी भरनी' लोकोक्ति से जोड़कर स्पष्ट करें, जिसमें कर्म के विभिन्न रूपों और उनके परिणामों का उल्लेख हो।
प्रश्न 2. "अपने मूल स्वरूप को सर्वार्थ में जानना और उसी में स्थित होना ही जीवन का सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है" -कथन के आधार पर बताइए कि
Answer: इस कथन के आधार पर, मानव जीवन का सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है। मोक्ष का अर्थ है अपने मूल स्वरूप यानी आत्मतत्व को जानना और उसी में स्थिर हो जाना। मनुष्य जब अपने इस आत्मिक स्वरूप को पहचान लेता है, तो वह संसार के सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है। यह मोक्ष ही हमें पूर्णता की ओर ले जाता है, जहाँ 'अर्थ' और 'काम' धर्म के नियंत्रण में रहकर मोक्ष पाने में सहायक होते हैं। इस अवस्था में व्यक्ति यह जान जाता है कि वह शुद्ध-बुद्ध आत्मा है और परमतत्व के साथ एकाकार हो जाता है। यह मिलन ही आत्मिक पूर्णता है, जिससे जीवन के सभी दुख और बंधन समाप्त हो जाते हैं।
In simple words: यह बात बताती है कि अपने असली स्वरूप को जानना और उसमें रहना ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है, जिसे मोक्ष कहते हैं।
🎯 Exam Tip: मोक्ष को 'मूल स्वरूप' और 'आत्मज्ञान' से जोड़कर व्याख्या करें, यह बताते हुए कि यह कैसे मानव जीवन को पूर्णता और मुक्ति की ओर ले जाता है।
प्रश्न 3. भारत और उसकी संस्कृति अनेक संकट आने पर भी जीवित है-इसका आपकी दृष्टि में क्या कारण है ?
Answer: भारत और उसकी संस्कृति अनेक संकटों के बावजूद जीवित है, इसका मुख्य कारण उसकी उदार और समावेशी जीवन दृष्टि है। भारत एक बहुत प्राचीन देश है जहाँ अनेक आक्रमण हुए और हजारों साल तक गुलामी भी रही, फिर भी इसकी संस्कृति बनी रही। यहाँ 'सर्वभूतहितेरता' (सभी प्राणियों का कल्याण) और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (पूरी धरती एक परिवार है) जैसी भावनाएँ हैं, जो इसे लचीला और मजबूत बनाती हैं। भारतीय संस्कृति संघर्ष के बजाय समन्वय और एकता पर जोर देती है, जिससे यह विभिन्न संस्कृतियों को अपने में समाहित कर लेती है। यही कारण है कि यह आज भी जीवंत और प्रासंगिक बनी हुई है।
In simple words: भारत और उसकी संस्कृति इसलिए जीवित है क्योंकि यह सबको साथ लेकर चलती है, सभी का भला सोचती है और बदलावों को अपनाती है।
🎯 Exam Tip: भारतीय संस्कृति की जीवंतता के कारणों को उसके समावेशी मूल्यों, समन्वय की भावना और 'अतिथि देवो भव' जैसे सिद्धांतों से जोड़कर समझाएं।
भारतीय जीवन दर्शन एवं संस्कृति लेखिका-परिचय
जीवन-परिचय-
इंदुमति काटदरे गुजरात निवासी हैं। आपकी शिक्षा गुजरात में ही संपन्न हुई। बाद में आप विसनगर महाविद्यालय में अंग्रेजी की प्राध्यापिका हो गईं। आपने पुनरुत्थान विद्यापीठ की स्थापना की, जिसकी आप संस्थापक कुलपति हैं। आपको गुजराती, मराठी, संस्कृत, हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषाओं पर समान अधिकार है। उनकी प्रमुख रचनाएँ शिक्षा योजना, वर-वधूचयन एवं विवाह संस्कार, अर्थशास्त्रः भारतीय दृष्टि, धर्म शिक्षा-कर्म शिक्षा एवं शास्त्र शिक्षा हैं।
पाठ-सार
प्रस्तुत पाठ 'भारतीय जीवन दर्शन एवं संस्कृति' 'शिशु वाटिका तत्व एवं व्यवहार' नामक पुस्तक से लिया गया है। इसमें भारतीय चिंतन की समग्रता और श्रेष्ठता को सरल ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
उपनिषदों में ब्रह्म को परमतत्व कहते हैं, ब्रह्म से समस्त सृष्टि हुई है। इस सृष्टि के विविध रूपों के वही सृजक हैं। सम्पूर्ण सृष्टि एक है और अमरतत्व का विस्तार है। इसमें ऊपर से भेद दिखाई देते हैं परन्तु मूल में एक ही जीवन है, जो अखण्ड है। सम्पूर्ण सृष्टि का आन्तरिक सम्बन्ध एकात्मता से है। एक ही आत्मतत्व सभी मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों आदि में है। आत्मतत्व ही प्रकृति प्रेम है। अतः सभी मनुष्यों और जीवों में स्वाभाविक संबंध प्रेम का है। प्रत्येक देश, जाति, धर्म के मनुष्य इसी सम्बन्ध से जुड़े हैं। इसी कारण दूसरों की सेवा करने में आनन्द आता है। वृद्ध, रोगी, गुरु, दरिद्र के दुःख दूर करने में सुख मिलता है। प्रेम, सेवा, त्याग, संयम आदि का आत्मीयपूर्ण व्यवहार इसी कारण होता है।
भारतीय दर्शन में जीवन की रचना पूरक एवं चक्रीय है। जीवन की गति चक्रीय होने का तात्पर्य है कि यह जहाँ से आरम्भ होता है। वहाँ इसका अन्त होता है। सागर के पानी से बादल, वर्षा, नदी बनते हैं फिर नदी सागर में मिल जाती है। मनुष्य का जीवन गर्भ, शिशु बाल, किशोर, युवा, प्रौढ़ और वृद्ध होकर मृत्यु तक पहुँचता है फिर एक जन्म से दूसरे जन्म की यात्रा का चक्र चलता है, इस चक्रीय गति का कारण नाश नहीं होता, आत्म-तत्व अजर, अमर और अविनाशी है। अतः सम्पूर्ण सृष्टि भी अविनाशी है। इसका केवल रूप बदलना है। जड़-चेतन सब में मूल तत्व 'आत्म' है। सभी जीव परमात्मा तत्व के एक अंश आत्मतत्व हैं।
इस चक्रीय गति का हमारे व्यवहार से सम्बन्ध है। हम जैसा करेंगे, वैसे ही उसका फल मिलेगा। यह व्यवहार सोचने, बोलने और करने से जुड़ा है। किसी के लिए बुरा सोचने, बोलने या करने वाले को वैसा ही फल प्राप्त होता है। अतः सबसे विवेकयुक्त व्यवहार अपेक्षित है।
हमारे यहाँ अधिकार नहीं कर्तव्य अपेक्षित हैं। हमारी सोच लेने की नहीं देने की है, संघर्ष नहीं समन्वय की है। हमारे यहाँ सबल निर्बल का शोषण नहीं संरक्षण करता है। शक्तिशाली और योग्यतम ही जीवित रहेगा-यह पाश्चात्य विचार है। निर्बल का संरक्षण और पोषण भारतीय जीवन दृष्टि है। भारतीय मनीषियों ने व्यवहार के चार आयाम बताये हैं, इनको पुरुषार्थ कहते हैं। पुरुषार्थ चार हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
'मोक्ष' जीवन का लक्ष्य है।'काम' का अर्थ है-सभी प्रकार की इच्छाएँ। इनकी सिद्धि के लिए 'अर्थ' अपेक्षित है। अर्थ अर्थात धन साधन है। सभी प्रकार के उद्यम, व्यापार आदि के द्वारा प्राप्त सम्पत्ति, मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा अर्थ हैं। धर्म इनको नियंत्रण में रखने वाली व्यवस्था है। धर्म की व्यवस्था के अन्तर्गत चलकर ही अर्थ और काम मोक्ष का माध्यम बनते हैं। जीवन का लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है। आत्मा की अनुभूति होना ही मोक्ष. अर्थात् समस्त बंधनों से मुक्ति है। संसार में अनेक राष्ट्रों और संस्कृतियों का उदय हुआ और वे काल
महत्वपूर्ण गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ
1. उपनिषदों में वर्णन आता है कि ब्रह्म जिसे हम परमात्म तत्त्व भी कहते हैं, उसने एक से अनेक होने की कामना की-'सोऽकामयत् एकोऽहम् बहुस्याम् इति।' इस प्रकार उस ब्रहम ने अपने में से ही समग्र सृष्टि का सृजन किया। उसी सृष्टि में से चित्त बना, मन बना, बुद्धि बनी, अहंकार बना तथा ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, पंचतन्मात्रा.एवं पंचमहाभूत आदि की उत्पत्ति हुई। उन्हीं में से सूर्य, वायु, पृथ्वी, जल आदि बने। उन्हीं में से वृक्ष, वनस्पति, पर्वत, अरण्य तथा मनुष्य बने। इन सबमें वह आत्मतत्त्व स्वयं अनुस्यूत ही है। स्वयं के इन विविध स्वरूपों का सृजक भी वह स्वयं ही है।
सन्दर्भ एवं प्रसंग- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक अपरा में संकलित 'भारतीय जीवन-दर्शन एवं संस्कृति' शीर्षक निबन्ध से लिया गया है। इसकी लेखिका इन्दुमति काटदरे हैं।
व्याख्या- लेखिका बताती हैं कि उपनिषदों के अनुसार, परमतत्व ब्रह्म ने स्वयं यह इच्छा की कि वह एक से अनेक रूपों में प्रकट हो। इसी इच्छा से उन्होंने संपूर्ण सृष्टि की रचना की। इस सृष्टि में सबसे पहले चित्त, मन, बुद्धि और अहंकार उत्पन्न हुए। इसके बाद ज्ञान के पाँच अंग (आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा) और कर्म के पाँच अंग (हाथ, पैर, वाणी, गुदा और उपस्थ) बने। पंचतन्मात्रा (रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द) और पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश) भी ब्रह्म से ही उत्पन्न हुए। फिर इन्हीं तत्वों से सूर्य, वायु, पृथ्वी, जल और अंततः वृक्ष, वनस्पतियाँ, पहाड़, वन और मनुष्य भी बने। लेखिका जोर देती हैं कि इन सभी रूपों में वह आत्मतत्व स्वयं ही मौजूद है। इस प्रकार, सृष्टि के ये अनेक रूप उसी परमतत्व की ही रचना हैं और वह परमतत्व स्वयं इन सभी में समाया हुआ है।
विशेष-
- सृष्टि की उत्पत्ति की भारतीय विचारधारा का वर्णन किया गया है।
- संपूर्ण सृष्टि की रचना परमात्मा ने की है तथा वह स्वयं भी सभी में व्याप्त है।
- भाषा संस्कृतनिष्ठ तथा प्रवाहपूर्ण है।
- शैली विचार-विश्लेषणात्मक है।
2. जब सब में एक ही आत्मतत्व है तो हमारा सबके साथ स्वाभाविक संबंध प्रेम का है क्योंकि आत्मतत्व का स्वभाव ही प्रेम है। जब हम एक-दूसरे के साथ प्रेम से जुड़ते हैं तो हमें दूसरे को देने में आनंद आता है, दूसरों की सेवा करने में आनन्द आता है। हम पहले दूसरों का विचार करते हैं, बाद में स्वयं का विचार करते हैं। दूसरों के दुःख से दुखी होते हैं और उनका दुःख दूर करने की हमारी स्वाभाविक इच्छा होती है।
सन्दर्भ एवं प्रसंग- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक अपरा में संकलित 'भारतीय जीवन-दर्शन एवं संस्कृति' शीर्षक पाठ से लिया गया है। इसकी लेखिका इन्दुमति काटदरे हैं।
व्याख्या- लेखिका कहती हैं कि समस्त सृष्टि में परमात्मा स्वयं व्याप्त है और यह उसी का प्रकट रूप है। परमात्मा के इस स्वरूप को आत्मतत्व कहा गया है। आत्मतत्व का स्वभाव प्रेम है। सभी जीवों में एक ही आत्मतत्व व्याप्त है। अतः सभी के बीच प्रेम का संबंध होना स्वाभाविक है। जब हमारा एक-दूसरों के साथ प्रेम का संबंध है तो एक दूसरे को कुछ देने में आनन्द आता है। हमें दूसरों की सेवा करने में प्रसन्नता प्राप्त होती है, पहले हम दूसरों के हित की बात सोचते हैं फिर अपना हित सोचते हैं। हम दूसरों को दुःखी देखकर दुःखी होते हैं और उसका दुःख दूर करना चाहते हैं। ऐसा होना मनुष्य का स्वभाव है क्योंकि यही स्वभाव आत्मतत्व का है।
विशेष-
- परमात्मा का स्वभाव प्रेम है। सभी प्राणी उसका ही स्वरूप हैं। अतः उनका स्वभाव भी प्रेम करना है।
- भाषा संस्कृतनिष्ठ है तथा विषयानुरूप है।
- शैली विचारात्मक है।
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