RBSE Solutions Class 11 Biology Chapter 33 जन्तु ऊतक

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Detailed Chapter 33 जन्तु ऊतक RBSE Solutions for Class 11 Biology

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Class 11 Biology Chapter 33 जन्तु ऊतक RBSE Solutions PDF

RBSE Class 11 Biology Chapter 33 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 33 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. रक्त है
(अ) उपकला ऊतक
(ब) संयोजी ऊतक
(स) तंत्रिका ऊतक
(द) कोई नहीं।
Answer: (ब) संयोजी ऊतक
In simple words: रक्त एक तरल संयोजी ऊतक है जो शरीर के सभी अंगों को जोड़ता है और पोषक तत्वों का परिवहन करता है। यह शरीर में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

🎯 Exam Tip: संयोजी ऊतक कई प्रकार के होते हैं, जैसे रक्त, अस्थि, उपास्थि, और वसा ऊतक, जो शरीर को सहारा और जोड़ते हैं।

 

Question 2. वह पेशी जो कभी नहीं थकती है
(अ) अरेखित पेशी
(ब) रेखित पेशी
(स) हृदय पेशी
(द) कंकाल पेशी
Answer: (स) हृदय पेशी
In simple words: हृदय पेशी लगातार काम करती रहती है और कभी नहीं थकती, जो दिल को लगातार धड़कने में मदद करती है। यह जीवनभर काम करती रहती है।

🎯 Exam Tip: हृदय पेशी अनैच्छिक होती है, जिसका मतलब है कि हम अपनी इच्छा से इसे नियंत्रित नहीं कर सकते; यह अपने आप काम करती है।

 

Question 3. रैन्वीयर के नोड पाये जाते हैं
(अ) रैवियर के नोड
(ब) श्वान के नोड
(स) द्रुमाश्म
(द) अंतर्ग्रथन
Answer: (अ) रैवियर के नोड
In simple words: तंत्रिका कोशिकाओं में रैन्वीयर के नोड होते हैं, जो ऐक्सॉन (तंत्रिका अक्ष) पर पाए जाते हैं। ये छोटे-छोटे गैप होते हैं जहाँ माइलिन शीथ नहीं होती, जो तंत्रिका आवेगों को तेजी से भेजने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: रैन्वीयर के नोड तंत्रिका आवेगों के "छलांग लगाकर" आगे बढ़ने में सहायता करते हैं, जिससे संदेश बहुत तेजी से पहुंचते हैं।

 

Question 4. एक ध्रुवी तन्त्रिका कोशिकाएँ पायी जाती हैं
(अ) दृष्टि पटल में
(ब) मस्तिष्क में
(स) मेरु रज्जु में
(द) भ्रूण में
Answer: (द) भ्रूण में
In simple words: एक ध्रुवी तंत्रिका कोशिकाएं मुख्य रूप से भ्रूण में पाई जाती हैं, जिनमें एक ही प्रवर्ध होता है। यह विकास के शुरुआती चरणों में महत्वपूर्ण होती हैं।

🎯 Exam Tip: वयस्क जीवों में ये कोशिकाएं कम पाई जाती हैं, क्योंकि तंत्रिका तंत्र के विकास के साथ कोशिकाएं अधिक जटिल हो जाती हैं।

 

Question 5. मज्जायुक्त तंत्रिका पर आवरण होता है
(अ) प्रोटीन का
(ब) वसा का
(स) कार्बोहाइड्रेट का
(द) उपकला का
Answer: (ब) वसा का
In simple words: मज्जायुक्त तंत्रिकाओं पर वसा का एक आवरण होता है जिसे माइलिन शीथ कहते हैं। यह आवरण तंत्रिका आवेगों को तेजी से भेजने में मदद करता है और तंत्रिका को सुरक्षित रखता है।

🎯 Exam Tip: माइलिन शीथ एक इन्सुलेटर (कुचालक) की तरह काम करती है, जो बिजली के तारों पर प्लास्टिक के कवर जैसा होता है, जिससे संदेश बिना रुके और तेजी से पहुंचते हैं।

RBSE Class 11 Biology Chapter 33 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. दो तंत्रिका कोशिकाओं के बीच क्रियात्मक सम्बन्ध क्या कहलाता है?
Answer: दो तंत्रिका कोशिकाओं के बीच क्रियात्मक सम्बन्ध को सिनेप्सिस (Synapses) कहते हैं। इस जगह पर एक तंत्रिका कोशिका से दूसरी तंत्रिका कोशिका तक संदेश पहुँचता है।
In simple words: दो तंत्रिका कोशिकाओं के जुड़ने की जगह को सिनेप्सिस कहते हैं, जहाँ एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक संदेश जाता है।

🎯 Exam Tip: सिनेप्सिस रासायनिक या विद्युत माध्यम से संदेशों को एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक पहुंचाते हैं, जिससे मस्तिष्क और शरीर के बीच संचार होता है।

 

Question 3. कोशिकाकाय में उपस्थित कणीय रचनाओं का नाम लिखिये।
Answer: कोशिकाकाय में उपस्थित कणीय रचनाओं का नाम निसिल्स कणिका है। ये कणिकाएं प्रोटीन बनाने का काम करती हैं, जो तंत्रिका कोशिका के लिए बहुत जरूरी है।
In simple words: कोशिकाकाय में छोटी-छोटी निसिल्स कणिकाएं होती हैं, जो प्रोटीन बनाती हैं।

🎯 Exam Tip: निसिल्स कणिकाएं एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम और राइबोसोम से बनी होती हैं, जो तंत्रिका कोशिका के सामान्य कामकाज के लिए आवश्यक प्रोटीन के संश्लेषण में मदद करती हैं।

 

Question 4. रक्त प्रोटीन गामा ग्लोबुलिन का प्रमुख कार्य क्या है?
Answer: रक्त प्रोटीन गामा ग्लोबुलिन का प्रमुख कार्य प्रतिरक्षी (antibodies) का निर्माण करना है। ये प्रतिरक्षी शरीर को बीमारियों और संक्रमण से बचाते हैं। यह हमारे शरीर के सुरक्षा कवच की तरह काम करता है।
In simple words: गामा ग्लोबुलिन प्रोटीन शरीर की बीमारियों से लड़ने के लिए प्रतिरक्षी बनाती है।

🎯 Exam Tip: प्रतिरक्षी विशिष्ट रोगाणुओं (जैसे बैक्टीरिया और वायरस) को पहचानकर उन्हें नष्ट करने में मदद करते हैं, जिससे शरीर स्वस्थ रहता है।

 

Question 5. उपास्थि की वृद्धि के लिये आवश्यक प्रोटीन का स्रावण किन कोशिकाओं द्वारा किया जाता है?
Answer: उपास्थि की वृद्धि के लिये आवश्यक प्रोटीन 'कान्ड्रिन' का स्रावण उपास्थ्यणु (chondrocyte) द्वारा किया जाता है। ये कोशिकाएं उपास्थि को मजबूत और लचीला बनाने में मदद करती हैं।
In simple words: उपास्थ्यणु कोशिकाएं उपास्थि की वृद्धि के लिए कान्ड्रिन प्रोटीन बनाती हैं।

🎯 Exam Tip: उपास्थि एक लचीला संयोजी ऊतक है जो जोड़ों को चिकनाई देता है और हड्डियों को आपस में रगड़ने से बचाता है।

 

Question 6. तंत्रिका तंत्र की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई का नाम बताइये।
Answer: तंत्रिका तंत्र की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई तंत्रिका कोशिका (न्यूरोन) है। यह संदेशों को भेजने और प्राप्त करने का काम करती है, जिससे हमारा शरीर काम करता है।
In simple words: तंत्रिका तंत्र की सबसे छोटी काम करने वाली इकाई न्यूरोन है।

🎯 Exam Tip: न्यूरॉन शरीर में विद्युत रासायनिक आवेगों (संदेशों) को संचारित करता है, जिससे मस्तिष्क और शरीर के अंगों के बीच तालमेल बनता है।

 

Question 7. श्वान कोशिकाएँ कहाँ स्थित होती हैं?
Answer: श्वान कोशिकाएं तंत्रिका कोशिका (न्यूरोन) में स्थित होती हैं। ये कोशिकाएं तंत्रिका अक्ष के चारों ओर माइलिन शीथ बनाने में मदद करती हैं।
In simple words: श्वान कोशिकाएं न्यूरॉन पर होती हैं, जो उसे कवर करती हैं।

🎯 Exam Tip: श्वान कोशिकाएं माइलिन शीथ के निर्माण से तंत्रिका आवेगों के संचार को तेज करती हैं और तंत्रिका फाइबर को सुरक्षा प्रदान करती हैं।

 

Question 8. रेखित व अनैच्छिक पेशी का उदाहरण दीजिये।
Answer: रेखित पेशी का उदाहरण पाद की पेशियां हैं, जो हमारी इच्छा से हिलती-डुलती हैं। अनैच्छिक पेशी का उदाहरण मूत्राशय, श्वास नली और मूत्रवाहिनी में पाई जाने वाली पेशियां हैं, जिन पर हमारा नियंत्रण नहीं होता। यह शरीर के अंदरूनी अंगों में काम करती हैं।
In simple words: पैर की पेशियां रेखित पेशी हैं, और मूत्राशय की पेशियां अनैच्छिक पेशी हैं।

🎯 Exam Tip: रेखित पेशियां (कंकाल पेशियां) हमारी मर्जी से काम करती हैं, जबकि अनैच्छिक पेशियां (चिकनी पेशियां) अपने आप काम करती हैं और शरीर के आंतरिक कार्यों को नियंत्रित करती हैं।

 

Question 9. एक स्वस्थ मनुष्य में प्रति 100 मिली. रक्त में उपस्थित हिमोग्लोबीन की मात्रा लिखिये।
Answer: एक स्वस्थ मनुष्य में प्रति 100 मिली. रक्त में लगभग 12 से 16 ग्राम हिमोग्लोबीन उपस्थित होता है। यह मात्रा लिंग और उम्र के हिसाब से थोड़ी बदल सकती है। हिमोग्लोबीन रक्त में ऑक्सीजन ले जाने का मुख्य काम करता है।
In simple words: एक स्वस्थ व्यक्ति के 100 मिलीलीटर रक्त में 12 से 16 ग्राम हिमोग्लोबीन होता है।

🎯 Exam Tip: हिमोग्लोबीन लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाता है और ऑक्सीजन को फेफड़ों से शरीर के अन्य भागों तक पहुंचाता है, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड को वापस फेफड़ों तक लाता है।

 

Question 10. रेखित पेशी तन्तुक की प्रोटीन के नाम लिखिए।
Answer: रेखित पेशी तन्तुक की प्रोटीन का नाम एक्टिन व मायोसिन है। ये दोनों प्रोटीन एक साथ मिलकर पेशियों को सिकुड़ने और फैलने में मदद करती हैं, जिससे शरीर में गति होती है।
In simple words: रेखित पेशी के तन्तुओं में एक्टिन और मायोसिन प्रोटीन होते हैं।

🎯 Exam Tip: एक्टिन पतले फिलामेंट होते हैं और मायोसिन मोटे फिलामेंट होते हैं, जो स्लाइडिंग फिलामेंट मॉडल के अनुसार एक-दूसरे पर फिसलकर पेशी संकुचन करते हैं।

 

Question 11. उपास्थि की आधात्री किस प्रोटीन की बनी होती है?
Answer: उपास्थि की आधात्री कॉन्ड्रिन प्रोटीन की बनी होती है। यह प्रोटीन उपास्थि को उसकी खास लचीली संरचना देती है। यह उपास्थि को मजबूत और थोड़ा नरम बनाती है।
In simple words: उपास्थि की आधात्री कॉन्ड्रिन प्रोटीन से बनी होती है।

🎯 Exam Tip: कॉन्ड्रिन प्रोटीन के साथ-साथ, उपास्थि की आधात्री में कोलेजन फाइबर और इलास्टिन फाइबर भी हो सकते हैं, जो उपास्थि के प्रकार पर निर्भर करता है।

 

Question 12. लाल रक्त कणिका का जीवन काल बताइये।
Answer: लाल रक्त कणिका का जीवन काल लगभग 120 दिन का होता है। इतने समय बाद ये कणिकाएं नष्ट हो जाती हैं और नई कणिकाएं बनती हैं।
In simple words: लाल रक्त कणिकाएं लगभग 120 दिन तक जीवित रहती हैं।

🎯 Exam Tip: पुरानी लाल रक्त कणिकाएं प्लीहा (spleen) और यकृत (liver) में टूट जाती हैं, और नई कणिकाएं अस्थि मज्जा (bone marrow) में बनती हैं, जिससे रक्त का संतुलन बना रहता है।

 

Question 13. हिपेरिन का स्रावण करने वाले श्वेताणु का नाम लिखिये।
Answer: हिपेरिन का स्रावण करने वाले श्वेताणु का नाम बेसीफिल (Basophil) है। हिपेरिन एक प्राकृतिक रक्त को पतला करने वाला पदार्थ है जो रक्त वाहिकाओं के अंदर रक्त के थक्के जमने से रोकता है।
In simple words: बेसीफिल नाम के श्वेताणु हिपेरिन बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: बेसीफिल एलर्जी प्रतिक्रियाओं में भी भूमिका निभाते हैं और हिस्टामाइन जैसे अन्य पदार्थों को भी छोड़ते हैं।

 

Question 14. थक्का बनाने में सहायक रुधिर कणिका का नाम बताइये।
Answer: थक्का बनाने में सहायक रुधिर कणिका का नाम रुधिर पट्टिकाणु (Blood platelet) हैं। चोट लगने पर ये कोशिकाएं एक साथ जमा होकर रक्तस्राव को रोकने में मदद करती हैं, जिससे खून का बहना रुक जाता है।
In simple words: रुधिर पट्टिकाणु खून का थक्का बनाने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: प्लेटलेट्स बहुत छोटे होते हैं और इनमें नाभिक नहीं होता। ये अस्थि मज्जा में मेगाकैरियोसाइट्स नामक बड़ी कोशिकाओं से बनते हैं।

 

Question 15. अंतर्विष्ट पट्ट (Intercalated disc) किस पेशी ऊतक में पाये जाते हैं?
Answer: अंतर्विष्ट पट्ट (intercalated disc) हृदय पेशी ऊतक में पाये जाते हैं। ये पट्ट हृदय पेशी कोशिकाओं को एक साथ जोड़ते हैं और उन्हें एक साथ काम करने में मदद करते हैं, जिससे हृदय तालबद्ध तरीके से सिकुड़ता है।
In simple words: अंतर्विष्ट पट्ट हृदय की पेशी में पाए जाते हैं।

🎯 Exam Tip: ये विशेष संरचनाएं हृदय की कोशिकाओं के बीच तेजी से विद्युत संकेतों के संचार को सुनिश्चित करती हैं, जिससे हृदय एक इकाई के रूप में कार्य करता है।

 

Question 16. तंत्रिका ऊतक की अतंत्रिकीय कोशिका का नाम लिखिये।
Answer: तंत्रिका ऊतक की अतंत्रिकीय कोशिका का नाम ग्लियल कोशिका है। ये कोशिकाएं न्यूरॉन्स को सहारा और पोषण देती हैं और उनके कामकाज में मदद करती हैं।
In simple words: तंत्रिका ऊतक में ग्लियल कोशिकाएं न्यूरॉन्स की मदद करती हैं।

🎯 Exam Tip: ग्लियल कोशिकाएं न्यूरॉन्स की तुलना में संख्या में अधिक होती हैं और मस्तिष्क के कार्य, मरम्मत और रखरखाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

अस्थि व उपास्थि में अन्तर

(Difference between Bone & Cartilage)

अस्थि (Bone)उपास्थि (Cartilage)
1. अस्थि ऊतक का मैट्रिक्स ओसीन नामक प्रोटीन का बना होता है।1. उपास्थि का मैट्रिक्स कॉन्ड्रिन नामक प्रोटीन का बना होता है।
2. यह ऊतक परमाणु कोशिकाओं का बना होता है।2. यह ऊतक उपस्थाणु कोशिकाओं का बना होता है।
3. यह ऊतक कठोर होता है।3. यह ऊतक लचीला होता है।
4. अस्थि ऊतक में एक केन्द्रीय गुहिका पाई जाती है जिसे अस्थि मज्जा कहते हैं।4. उपास्थि ऊतक में केन्द्रीय गुहिका का अभाव होता है।
5. अस्थि कोशिकाएँ क्रमानुसार स्थित होती हैं।5. उपास्थि कोशिकाओं के विन्यास में कोई नियम नहीं होता है।
6. अस्थि ऊतक में हैवर्सियन तन्त्र पाया जाता है।6. इस ऊतक में ऐसा कोई तन्त्र नहीं होता है।

 

Question 2. ऐच्छिक पेशियां किन्हें और क्यों कहते हैं?
Answer: रेखित पेशियों को ऐच्छिक पेशियां कहते हैं क्योंकि इनमें हल्की और गहरी धारियां होती हैं। प्रत्येक पेशी तन्तुओं से बनी होती है। इन पेशियों में संकुचन हमारी इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है, इसलिए इन्हें ऐच्छिक पेशियां (voluntary muscles) कहते हैं। ये पेशियां शरीर को हमारी मर्जी से हिलाने-डुलाने में मदद करती हैं।
In simple words: रेखित पेशियों को ऐच्छिक पेशियां कहते हैं क्योंकि हम इन्हें अपनी मर्जी से हिला सकते हैं और इनमें धारियां होती हैं।

🎯 Exam Tip: ऐच्छिक पेशियां आमतौर पर हड्डियों से जुड़ी होती हैं और इन्हें कंकाल पेशियां भी कहा जाता है, जो शरीर की गति के लिए जिम्मेदार होती हैं।

 

Question 3. यदि रक्त में लसिकाणुओं का निर्माण बन्द हो जावे तो शरीर पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
Answer: यदि रक्त में लसिकाणुओं का निर्माण बंद हो जाए तो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (immunity) खत्म हो जाएगी। लसिकाणु प्रतिविष (antitoxin) भी बनाते हैं जो रोगाणुओं से निकले जहरीले पदार्थों को नष्ट करते हैं। इनके न होने पर शरीर आसानी से बीमार पड़ जाएगा और वसा का शरीर में एक जगह से दूसरी जगह जाना भी रुक जाएगा। लसिकाणु शरीर को संक्रमण से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
In simple words: यदि लसिकाणु नहीं बनेंगे, तो शरीर की बीमारियों से लड़ने की ताकत खत्म हो जाएगी और शरीर बहुत बीमार पड़ेगा।

🎯 Exam Tip: लसिकाणु श्वेत रक्त कोशिकाओं का एक प्रकार हैं जो प्रतिरक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और संक्रमण और कैंसर से लड़ने में मदद करते हैं।

 

Question 5. हृदय पेशी ऊतक की संरचना को समझाइए।
Answer: हृदय पेशियां केवल रीढ़ वाले जानवरों के हृदय की दीवारों में मिलती हैं। हृदय पेशी तन्तु छोटे, बेलनाकार और शाखित होते हैं। शाखित होने के कारण ये एक-दूसरे से जुड़कर एक जाल बनाते हैं। इनके अंदरूनी हिस्से (सार्कोप्लाज्म) में एक नाभिक (केन्द्रक) होता है। इनमें अंतर्विष्ट पट्ट (intercalated disc) पाए जाते हैं, जो इन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटते हैं। इन टुकड़ों में गहरी और हल्की धारियां होती हैं, जैसी रेखित पेशियों में होती हैं। हृदय पेशियों पर हमारी इच्छा का कोई नियंत्रण नहीं होता है, इसलिए ये अनैच्छिक होती हैं। यह पेशियां अपने आप बिना रुके एक ताल में सिकुड़ती और फैलती हैं, जिसे हृदय की धड़कन कहते हैं।
In simple words: हृदय पेशियां दिल की दीवारों में होती हैं, ये शाखित होती हैं और इनमें धारियां होती हैं। इन पर हमारा नियंत्रण नहीं होता और ये हमेशा धड़कती रहती हैं।

🎯 Exam Tip: अंतर्विष्ट पट्ट हृदय की कोशिकाओं को विद्युत रूप से जोड़ते हैं, जिससे हृदय की सभी कोशिकाएं एक साथ सिकुड़ती हैं और रक्त को कुशलता से पंप किया जाता है।

 

Question 6. प्रवर्थों की संख्या के आधार पर न्यूरोन्स के प्रकार उदाहरण सहित लिखिए।
Answer: न्यूरॉन्स (तंत्रिका कोशिकाएं) में प्रवर्थों की संख्या के आधार पर मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं:

  • एक ध्रुवीय (Unipolar) तंत्रिका कोशिका: इन कोशिकाओं में केवल एक छोटा प्रवर्ध (एक्सॉन) होता है। ये अकशेरुकी जीवों में ज्यादा, लेकिन कशेरुकी जीवों में सिर्फ भ्रूण में मिलते हैं। उदाहरण के लिए, कशेरुकी जीवों में मेरु तंत्रिकाओं के पृष्ठमूल गुच्छकों में 'मिथ्या एक ध्रुवीय तंत्रिका कोशिकाएं' (Pseudo unipolar neurons) होती हैं।
  • द्विधुवीय (Bipolar) तंत्रिका कोशिका: इनमें दो प्रवर्ध होते हैं, एक एक्सॉन और एक डेन्ड्रोन। ये नेत्रों की रेटिना, सुनने वाले अंगों के कॉक्लिया (cochlea) और सूंघने वाले उपकला (olfactory epithelium) में पाई जाती हैं।
  • बहुध्रुवीय (Multipolar) तंत्रिका कोशिका: इनमें एक एक्सॉन और कई डेन्ड्रोन होते हैं। कशेरुकी जीवों में ज्यादातर तंत्रिका कोशिकाएं इसी प्रकार की होती हैं, जैसे मस्तिष्क और मेरु रज्जु में।

तंत्रिका कोशिकाएं एक-दूसरे से चिपकी नहीं रहतीं, बल्कि इनके बीच संयोजी ऊतक, तंत्रिबंध (Neuroglia) होता है जो इन्हें आपस में बांधे रखता है। दो तंत्रिका कोशिकाओं के प्रवर्धों के बीच क्रियात्मक संबंध को सिनेप्स (Synapse) कहते हैं।
In simple words: न्यूरॉन्स तीन तरह के होते हैं: एक ध्रुवीय (एक प्रवर्ध, जैसे भ्रूण में), द्विधुवीय (दो प्रवर्ध, जैसे आंखों में), और बहुध्रुवीय (कई प्रवर्ध, जैसे मस्तिष्क में)। ये सब मिलकर संदेश भेजते हैं।

🎯 Exam Tip: न्यूरॉन्स की संरचना उनके कार्य के लिए महत्वपूर्ण है। एक ध्रुवीय और द्विधुवीय न्यूरॉन्स आमतौर पर विशिष्ट संवेदी कार्यों से जुड़े होते हैं, जबकि बहुध्रुवीय न्यूरॉन्स अधिकांश मोटर और इंटरन्यूरॉन कार्यों में शामिल होते हैं।

 

Question 7. उपास्थिकोरक (chondrioblast) एवं उपास्थ्यणु (chondrocytes) के कार्य लिखिए।
Answer:

  • उपास्थिकोरक (Chondrioblast) का कार्य: उपास्थिकोरक का मुख्य कार्य उपास्थ्यणु (chondrocyte) कोशिकाओं का निर्माण करना है। ये कोशिकाएं उपास्थि के विकास और मरम्मत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  • उपास्थ्यणु (Chondrocyte) का कार्य: उपास्थ्यणु का मुख्य कार्य कॉन्ड्रिन प्रोटीन का स्रावण करना है। यह प्रोटीन उपास्थि को उसका लचीलापन और वृद्धि प्रदान करती है। ये कोशिकाएं उपास्थि के मैट्रिक्स को बनाए रखने में भी मदद करती हैं।

In simple words: उपास्थिकोरक कोशिकाएं उपास्थ्यणु बनाते हैं, और उपास्थ्यणु कॉन्ड्रिन प्रोटीन बनाकर उपास्थि को लचीला और बढ़ने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: उपास्थिकोरक सक्रिय रूप से विभाजित होते हैं और उपास्थि के विकास में योगदान करते हैं, जबकि उपास्थ्यणु परिपक्व कोशिकाएं होती हैं जो उपास्थि के मैट्रिक्स को बनाए रखती हैं।

 

Question 8. रुधिर प्लाज्मा के प्रमुख अवयव एवं उनके कार्य लिखिए।
Answer: रुधिर प्लाज्मा, रक्त का तरल भाग है, जो लगभग 55 प्रतिशत होता है। इसके प्रमुख अवयव और उनके कार्य निम्न प्रकार हैं:

अवयवप्रतिशतप्रमुख कार्य
1. जल90-92%पोषक तत्वों, हार्मोन और अपशिष्ट उत्पादों का परिवहन।
2. कार्बनिक पदार्थ
- ऐल्बुमिन4.5%परासरण दाब उत्पन्न करना, विलेय विभव निर्माण।
- ग्लोबुलिन- \( \alpha \), \( \beta \), \( \gamma \)2.5%\( \alpha \), \( \beta \)-परिवहन, \( \gamma \)-एंटीबॉडी निर्माण।
- फाइब्रिनोजन0.3%रुधिर स्कंदन (थक्का जमना)।
- प्रोथ्रोम्बिनअल्परुधिर स्कंदन।
- ग्लूकोस0.1%पोषक पदार्थ, कोशिकीय ईंधन।
- ऐमीनो अम्ल0.04%पोषक पदार्थ।
- वसा, अम्ल, ग्लिसरॉल0.5%पोषक पदार्थ।
- हॉर्मोन, एन्जाइमअल्पनियामक पदार्थ और जैव उत्प्रेरक।
- यूरिया, यूरिक अम्ल0.04%अपशिष्ट पदार्थ।
3. अकार्बनिक पदार्थ
- \( \text{Na}^+, \text{K}^+, \text{Ca}^{2+}, \text{Mg}^{2+} \), \( \text{Cl}^-, \text{HCO}_3^-, \text{HPO}_4^2- \), \( \text{SO}_4^2- \) आदि आयन0.9%विलेय विभव एवं pH नियमन।
4. गैसेंश्वसन कार्यिकी के महत्वपूर्ण अवयव।

In simple words: रुधिर प्लाज्मा में पानी, प्रोटीन (जैसे ऐल्बुमिन, ग्लोबुलिन), ग्लूकोस, वसा, हार्मोन, आयन और अपशिष्ट पदार्थ होते हैं। ये सभी शरीर में पोषक तत्वों को लाने-ले जाने और शरीर के कामकाज को ठीक रखने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: प्लाज्मा न केवल पोषक तत्वों और अपशिष्ट उत्पादों का परिवहन करता है, बल्कि यह शरीर के तापमान और पीएच संतुलन को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 

Question 9. लसीका किसे कहते हैं? यह किस प्रकार का ऊतक है?
Answer: लसीका (Lymph) एक साफ, हल्के पीले रंग का तरल पदार्थ है। रक्त की छोटी रक्त केशिकाएं (Blood capillaries) शरीर के सभी अंगों तक नहीं पहुंच पातीं। रक्त प्लाज्मा और श्वेत रक्त कोशिकाएं, रक्त कोशिकाओं की दीवारों (जो एंडोथिलियम स्तर से बनी होती हैं) से छनकर ऊतक कोशिकाओं के बीच के स्थान में पहुंच जाती हैं, इसी छने हुए द्रव को लसीका कहते हैं।
लसीका का संघटन रक्त प्लाज्मा के समान होता है, लेकिन इसमें घुले हुए पदार्थों की सांद्रता अलग होती है। इस तरल भाग में पोषक तत्व, अपशिष्ट पदार्थ, आयन, गैसें और हार्मोन होते हैं। ये पदार्थ ऊतकों और अंगों की कोशिकाओं के बीच लसीका के माध्यम से आदान-प्रदान होते हैं। लसीका एक तरल संयोजी ऊतक है, जो प्रतिरक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
In simple words: लसीका वह तरल पदार्थ है जो रक्त केशिकाओं से छनकर ऊतकों के बीच जमा होता है। यह रक्त प्लाज्मा जैसा होता है लेकिन इसमें कुछ चीजें कम होती हैं। यह एक तरल संयोजी ऊतक है जो पोषक तत्व और अपशिष्ट पदार्थों को ले जाता है।

🎯 Exam Tip: लसीका प्रणाली शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो शरीर को संक्रमण से बचाने और शरीर से अतिरिक्त तरल पदार्थ और विषाक्त पदार्थों को हटाने में मदद करती है।

 

Question 11. कैल्सिभूत उपास्थि की कठोरता का कारण लिखिए।
Answer: कैल्सिभूत उपास्थि के मैट्रिक्स में कैल्सियम कार्बोनेट \( \text{(CaCO}_3) \) के कण पाए जाते हैं, जिसके कारण यह हड्डी के समान कठोर हो जाती है। यह इसकी विशेष कठोरता का कारण है। उदाहरण के लिए, मेंढक की अंसमेखला में सुप्रास्केपुला तथा श्रोणि मेखला में प्यूबिस इसी प्रकार की उपास्थि से बनी होती है।
In simple words: कैल्सिभूत उपास्थि में कैल्सियम कार्बोनेट होने के कारण यह हड्डी जैसी कठोर हो जाती है।

🎯 Exam Tip: यह उपास्थि शरीर में उन जगहों पर पाई जाती है जहाँ मजबूती और कठोरता की आवश्यकता होती है, जैसे कि कुछ हड्डियों के विकास के शुरुआती चरणों में।

 

Question 12. उपकला ऊतक की प्रमुख विशेषताएं लिखिए।
Answer: उपकला ऊतक की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • सुरक्षात्मक आवरण: इनका मुख्य काम शरीर और आंतरिक अंगों के लिए सुरक्षात्मक आवरण बनाना है। ये अंदर स्थिर ऊतकों को चोट, हानिकारक पदार्थों और जीवाणुओं से बचाते हैं।
  • चयनात्मक पारगम्यता: शरीर और आंतरिक अंगों का बाहरी वातावरण से पदार्थों का आदान-प्रदान इन्हीं उपकला आवरणों के माध्यम से होता है। ये आवरण चयनात्मक होते हैं, यानी केवल जरूरी पदार्थ ही इनसे आर-पार जा सकते हैं।
  • अवशोषण, गैसीय विनिमय और उत्सर्जन: आहारनाल की भीतरी सतह पर ये पोषक पदार्थों और पानी के अवशोषण में मदद करते हैं। श्वसन अंगों में गैसीय विनिमय का कार्य करते हैं और उत्सर्जन अंगों में उत्सर्जन का काम भी करते हैं।
  • संवेदी ग्रहण: त्वचा पर ये संवेदांगों में संवेदना ग्रहण (संवेदी रिसेप्शन) का काम करते हैं।
  • पदार्थों का संवहन: कई नालवत् अंगों (जैसे श्वास नाल, जनन वाहिनियों) में ये श्लेष्म (mucus) या अन्य तरल पदार्थों के संवहन में सहायता करते हैं।
  • पुनरुदभवन (Regeneration) की क्षमता: इनमें पुनरुदभवन की बहुत अधिक क्षमता होती है। इसलिए, क्षत ऊतकों पर ये जल्दी से फिर से बनकर घावों को भरने में मदद करते हैं।

In simple words: उपकला ऊतक शरीर को बचाता है, जरूरी चीजें अंदर लेता है, बेकार चीजें बाहर निकालता है, संवेदना महसूस करता है, तरल पदार्थों को ले जाता है, और चोट लगने पर खुद को ठीक कर लेता है।

🎯 Exam Tip: उपकला ऊतक शरीर की सतहों और गुहाओं को ढकता है, साथ ही ग्रंथियों का निर्माण भी करता है, जो स्राव और उत्सर्जन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 

Question 13. तंत्रिका कोशिका का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer: तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) का नामांकित चित्र बनाने में कोशिकाकाय (Soma) या सेल बॉडी, जिसमें केन्द्रक और निसिल्स कणिकाएं होती हैं, को दर्शाना चाहिए। इससे डेन्ड्राइट्स (द्रुमाश्म) निकलकर संदेश प्राप्त करते हैं। एक लम्बा एक्सॉन (तंत्रिकाक्ष) संदेशों को दूर ले जाता है, जिस पर माइलिन शीथ और रैन्वीयर के नोड होते हैं। एक्सॉन के अंत में टर्मिनल बटन या अन्तर्ग्रथन होते हैं। एक तंत्रिका कोशिका का चित्र एक जटिल संरचना को दर्शाता है, जो शरीर में संकेतों के संचरण के लिए आवश्यक है।
In simple words: तंत्रिका कोशिका के चित्र में उसके मुख्य भाग, जैसे सेल बॉडी (जिसमें केन्द्रक होता है), डेन्ड्राइट्स (जो संदेश लेते हैं), और एक्सॉन (जो संदेश आगे भेजता है), दिखाने चाहिए।

🎯 Exam Tip: चित्र बनाते समय सभी प्रमुख भागों जैसे कोशिकाकाय, डेन्ड्राइट, तंत्रिकाक्ष, माइलिन आवरण, रैन्वीयर के नोड और अन्तर्ग्रथन को स्पष्ट रूप से लेबल करें।

 

Question 14. पेशी ऊतक के कार्य लिखिए।
Answer: पेशी ऊतक के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं:

  • गति और गमन: यह जीवों में चलने और अंगों को हिलाने में मदद करता है।
  • रासायनिक ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलना: पेशियां रासायनिक ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलती हैं, जिससे गति पैदा होती है।
  • शारीरिक प्रक्रियाओं में सहायता: पेशियां शरीर के कई महत्वपूर्ण कार्यों में सहायक होती हैं, जैसे सांस लेना (संवातन), भोजन को पचाना (क्रमानुकुंचन), रक्त का परिवहन, और अपशिष्ट पदार्थों का उत्सर्जन।

In simple words: पेशी ऊतक शरीर को हिलाने-डुलाने, चीजों को अंदर ले जाने (जैसे भोजन) और शरीर के कई जरूरी काम करने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: पेशी ऊतक शरीर के तापमान को बनाए रखने में भी योगदान देता है, क्योंकि पेशी संकुचन से गर्मी उत्पन्न होती है।

 

Question 15. रेखित व अरेखित पेशी में अन्तर लिखिए।
(Difference between Striated & Unstriated Muscle)
Answer:

रेखित पेशियाँ (Striped muscles)अरेखित पेशियाँ (Unstriped muscles)
1. इनकी कोशिकाएँ बेलनाकार होती हैं और पेशीचोल नामक झिल्ली से ढकी रहती हैं।1. इनकी कोशिकाएँ पतली, लम्बी और संकरी होती हैं।
2. इनमें हल्की और गहरी धारियां (पट्टियाँ) होती हैं।2. इनमें कोई धारियां नहीं होती हैं।
3. ये बहु-नाभिकीय होती हैं (कई केन्द्रक होते हैं)।3. ये एक-नाभिकीय होती हैं (एक ही केन्द्रक होता है)।
4. ये जन्तु की इच्छा से सिकुड़ती व फैलती हैं, इसलिए ये ऐच्छिक होती हैं।4. ये स्वतः ही सिकुड़ती एवं फैलती हैं, इसलिए ये अनैच्छिक होती हैं।
5. ये अस्थियों से जुड़ी रहती हैं, इसलिए इन्हें कंकाल पेशी भी कहते हैं।5. ये पेशियाँ आंतरिक अंगों में पायी जाती हैं (जैसे आंत, मूत्राशय)।
6. लगातार काम करने पर इनमें थकान महसूस होती है, इसलिए आराम जरूरी है।6. लगातार काम करने पर भी इनमें थकान का अनुभव नहीं होता है।

In simple words: रेखित पेशियां हमारी मर्जी से काम करती हैं, हड्डियों से जुड़ी होती हैं, और थक जाती हैं। अरेखित पेशियां अपनी मर्जी से काम करती हैं, अंदरूनी अंगों में होती हैं, और थकती नहीं हैं।

🎯 Exam Tip: रेखित पेशियां तीव्र और शक्तिशाली संकुचन के लिए होती हैं, जबकि अरेखित पेशियां धीमे, लंबे समय तक चलने वाले संकुचन के लिए होती हैं जो शरीर के आंतरिक अंगों के कार्यों को नियंत्रित करती हैं।

RBSE Class 11 Biology Chapter 33 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. बहुधुवीय मज्जावृत तंत्रिका कोशिकाएँ शरीर में कहाँ पाई जाती हैं? इनकी संरचना को आरेख चित्र द्वारा समझाइये।
Answer: बहुधुवीय मज्जावृत तंत्रिका कोशिकाएँ शरीर में मस्तिष्क, मेरु रज्जु और गैग्लिया में पाई जाती हैं। ये सबसे आम प्रकार की तंत्रिका कोशिकाएं हैं।
तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue): तंत्रिका ऊतक तंत्रिका कोशिका (न्यूरोन) और ग्लियल कोशिकाओं से बना होता है। न्यूरोन तंत्रिका तंत्र की मूल इकाई है।
तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) की संरचना: एक न्यूरॉन के मुख्य भाग हैं:

  • सोमा (Soma) या कोशिकाकाय: यह कोशिका का मुख्य भाग है, जिसमें केन्द्रक और कोशिका द्रव्य होता है। कोशिका द्रव्य में निसिल्स कणिकाएँ (प्रोटीन संश्लेषण के लिए) और न्यूरोफाइब्रिल्स (सूक्ष्म तन्तु) होते हैं।
  • द्रुमिकाएँ (Dendrites): ये सोमा से निकलने वाले छोटे, शाखित प्रवर्ध होते हैं जो अन्य न्यूरॉन्स से संदेश प्राप्त करते हैं और उन्हें सोमा की ओर भेजते हैं।
  • तंत्रिकाक्ष (Axon): यह सोमा से निकलने वाला एक लम्बा प्रवर्ध है जो संदेशों को सोमा से दूर ले जाता है और दूसरे न्यूरॉन्स, मांसपेशियों या ग्रंथियों तक पहुंचाता है।

तंत्रिकाक्ष की विशेषताएँ:
तंत्रिकाक्ष का अधिकांश भाग एक सफेद, मोटी, अकोशिकीय परत से ढका होता है जिसे मज्जा आच्छद (medullary sheath) कहते हैं। यह श्वान कोशिकाओं (Schwann cells) द्वारा बनता है। मज्जा आच्छद के बाहर की ओर एक पतली झिल्ली होती है जिसे तंत्रिकाछद (neurolemma) कहते हैं।
मज्जा आच्छद में जगह-जगह संकीर्णन होते हैं जिन्हें रैन्वीयर की पर्व सन्धियाँ (nodes of Ranvier) कहते हैं। ये नोड तंत्रिका आवेगों को तेजी से भेजने में मदद करते हैं। दो पर्व सन्धियों के बीच के हिस्से को पर्व (Node) कहते हैं।
तंत्रिकाक्ष से कहीं-कहीं पार्श्व शाखाएं (Collateral fibres) निकलती हैं। इसके दूरस्थ सिरे पर तंत्रिकाक्ष शाखित हो जाता है और प्रत्येक शाखा के अंतिम सिरे पर बटन (terminal button) होते हैं, जो सिनेप्स बनाते हैं।
ग्लियल कोशिकाएं (Glial cells): ये कोशिकाएं सहायक (supporting) और पैकिंग (packing) कोशिकाएं होती हैं, जो न्यूरॉन्स को सहारा देती हैं। ये न्यूरॉन्स की तुलना में संख्या में दस गुना अधिक होती हैं और तंत्रिका ऊतक के कामकाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। तंत्रिका कोशिकाएं इस तरह शरीर में सूचना का संचार करती हैं।
In simple words: बहुधुवीय तंत्रिका कोशिकाएं दिमाग और रीढ़ की हड्डी में मिलती हैं। इनकी बनावट में एक मुख्य हिस्सा (सेल बॉडी), संदेश लेने वाले डेंड्राइट्स और संदेश भेजने वाला एक लम्बा एक्सॉन होता है। एक्सॉन पर एक कवर (माइलिन शीथ) और रैन्वीयर के नोड होते हैं जो संदेश को तेजी से पहुंचाते हैं। ग्लियल कोशिकाएं न्यूरॉन की मदद करती हैं।

🎯 Exam Tip: न्यूरॉन के विभिन्न भागों (डेंड्राइट, सोमा, एक्सॉन) और उनके कार्यों को स्पष्ट रूप से समझें, क्योंकि ये तंत्रिका तंत्र के कामकाज की मूल बातें हैं। माइलिन शीथ और रैन्वीयर के नोड्स का महत्व भी याद रखें।

 

Question 2. स्तनधारियों के रक्ताणुओं व श्वेताणुओं के प्रकार एवं उनके कार्य का वर्णन कीजिये।
Answer: स्तनधारियों के रक्त में दो मुख्य प्रकार की रक्त कणिकाएँ होती हैं: रक्ताणु (लाल रक्त कणिकाएँ) और श्वेताणु (श्वेत रक्त कणिकाएँ)।

(अ) रक्ताणु (लाल रक्त कोशिकाएँ - Red Blood Cells / Erythrocytes)

  • विशेषताएँ: इन्हें इरिथ्रोसाइट्स भी कहते हैं। ये संख्या में सबसे अधिक होती हैं (लगभग 99% रक्त कणिकाएँ)। इनका व्यास लगभग 7-8 µm और मोटाई 2 µm होती है। ये वृत्ताकार, उभयावतल (biconcave) और केन्द्रक रहित होती हैं। इनमें माइटोकॉन्ड्रिया, एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम, और गॉल्जीकाय का अभाव होता है।
  • जीवनकाल: लगभग 120 दिन।
  • हिमोग्लोबीन: इनमें हिमोग्लोबीन होता है, जो रक्त को लाल रंग देता है और ऑक्सीजन का परिवहन करता है। हिमोग्लोबीन ऑक्सीजन से जुड़कर ऑक्सी-हिमोग्लोबीन बनाता है।
  • कार्य: फेफड़ों से ऑक्सीजन को शरीर के ऊतकों तक पहुंचाना और ऊतकों से कार्बन डाइऑक्साइड को वापस फेफड़ों तक लाना।
  • निर्माण: लाल अस्थि मज्जा (red bone marrow) में।
  • नष्ट होना: पुरानी RBCs प्लीहा और यकृत में टूट जाती हैं।

(ब) श्वेताणु (श्वेत रक्त कोशिकाएँ - White Blood Cells / Leucocytes)
  • विशेषताएँ: इन्हें ल्यूकोसाइट्स भी कहते हैं। ये रंगहीन होती हैं क्योंकि इनमें हिमोग्लोबीन नहीं होता। ये लाल रक्त कोशिकाओं से बड़ी, अनियमित आकार की और केन्द्रक युक्त होती हैं। इनमें माइटोकॉन्ड्रिया और गॉल्जीकाय पाए जाते हैं।
  • जीवनकाल: 4-5 दिनों से कई दिनों तक।
  • कार्य: ये शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का हिस्सा हैं और संक्रमण से लड़ते हैं। इनमें अमीबीय गति होती है जिससे ये रक्त वाहिकाओं से बाहर निकलकर संक्रमण वाले स्थान पर पहुँच सकती हैं।

श्वेताणु दो मुख्य प्रकार के होते हैं:
(I) कणिकामय श्वेत रक्ताणु (Granulocytes): इनके कोशिका द्रव्य में कणिकाएँ होती हैं जो अभिरंजक ग्रहण करती हैं। ये गोल, अमीबॉय आकार के होते हैं और इनका केन्द्रक 2-5 पिण्डों में बंटा होता है। ये तीन प्रकार के होते हैं:
  • इओसिनोफिल्स (Eosinophils): ये अम्लीय अभिरंजक (इओसिन) ग्रहण करते हैं। मनुष्य के रक्त में 1-4% होते हैं। ये एलर्जी प्रतिक्रियाओं और परजीवी संक्रमणों में महत्वपूर्ण होते हैं।
  • बेसोफिल्स (Basophils): ये क्षारीय अभिरंजक ग्रहण करते हैं। रक्त में इनकी संख्या सबसे कम (0.5-1%) होती है। ये हिपेरिन, हिस्टामाइन और सेरोटोनिन का स्रावण करते हैं, जो सूजन और एलर्जी में भूमिका निभाते हैं।
  • न्यूट्रोफिल्स (Neutrophils): ये उदासीन अभिरंजक ग्रहण करते हैं। रक्त में इनकी संख्या सबसे अधिक (60-70%) होती है। ये सबसे सक्रिय श्वेत रुधिराणु हैं और जीवाणुओं का भक्षण (phagocytosis) करते हैं, जिससे शरीर को संक्रमण से बचाते हैं।

(II) कणिकाविहीन श्वेतरक्ताणु (Agranulocytes): इनके कोशिका द्रव्य में कणिकाएँ नहीं होती हैं। इनमें एक गोल या वृक्काकार केन्द्रक होता है। ये दो प्रकार के होते हैं:
  • लिम्फोसाइट्स (Lymphocytes): ये कुल श्वेताणुओं का लगभग 25-30% भाग बनाते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं: बी-लिम्फोसाइट्स (प्रतिरक्षी बनाते हैं) और टी-लिम्फोसाइट्स (कोशिका-मध्यस्थ प्रतिरक्षा में शामिल)। ये शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • मोनोसाइट्स (Monocytes): ये संख्या में 4-10% होते हैं और सबसे बड़े श्वेत रक्त कणिकाएँ हैं। इनका केन्द्रक बड़ा और वृक्काकार होता है। ये मैक्रोफेज में विकसित होकर मृत कोशिकाओं और जीवाणुओं का भक्षण करते हैं।

(C) रुधिर प्लेटलेट्स (Blood platelets):
  • विशेषताएँ: ये बहुत छोटे (व्यास 2-4 µm) होते हैं, अनियमित आकार के और केन्द्रक रहित होते हैं।
  • जीवनकाल: 5-7 दिन।
  • कार्य: ये रक्त के स्कंदन (clotting) में सहायता करते हैं, जिससे चोट लगने पर रक्तस्राव बंद हो जाता है।

In simple words: रक्त में लाल रक्त कोशिकाएं (रक्ताणु) ऑक्सीजन ले जाती हैं और श्वेत रक्त कोशिकाएं (श्वेताणु) शरीर को बीमारियों से बचाती हैं। प्लेटलेट्स खून का थक्का जमाने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: रक्त में प्रत्येक प्रकार की कोशिका का विशिष्ट कार्य होता है, और उनकी संख्या में कोई भी असंतुलन विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। लाल रक्त कोशिकाओं में हिमोग्लोबीन का कार्य और श्वेत रक्त कोशिकाओं के विभिन्न प्रकारों की प्रतिरक्षा भूमिका को विशेष रूप से याद रखें।

 

Question 2. स्तनधारियों के रक्ताणुओं व श्वेताणुओं के प्रकार एवं उनके कार्य का वर्णन कीजिये।
Answer: रक्त का तरल भाग प्लाज्मा कहलाता है, जो पूरे रक्त का लगभग 55% होता है। बचा हुआ 45% भाग रक्त कणिकाएँ होती हैं।

(अ) प्लाज्मा (Plasma)
यह हल्के पीले रंग का एक साफ और निर्जीव तरल है जो रक्त का 55% बनाता है। इसमें 90-92% पानी, 6-8% प्रोटीन, 0.9% लवण और 0.1% ग्लूकोज होता है। प्लाज्मा में कई मुख्य तत्व होते हैं और उनके काम नीचे दिए गए हैं:

2. कार्बनिक पदार्थमात्रामुख्य कार्य
ऐल्बुमिन4.5%परासरण दाब पैदा करना (विलेय विभव निर्माण)
ग्लोबुलिन-α, β, γ2.5%α, β-परिवहन, γ-ऐन्टीबॉडी निर्माण
फाइब्रिनोजन0.3%रक्त का जमना
प्रोश्रोम्बिनकमरक्त का जमना
ग्लूकोज0.1%पोषक तत्व, कोशिका के लिए ऊर्जा
ऐमीनो अम्ल0.04%पोषक तत्व
वसा, अम्ल, ग्लिसरॉल0.5%पोषक तत्व
हॉर्मोन, एन्जाइमकमशरीर के लिए नियामक तत्व
यूरिया, यूरिक अम्ल0.04%अपशिष्ट पदार्थ
3. अकार्बनिक पदार्थ
\( \text{Na}^+, \text{K}^+, \text{Ca}^{2+}, \text{Mg}^{2+}, \text{Cl}^-, \text{HCO}_3^-, \text{HPO}_4^-, \text{SO}_4^{2-} \), आदि आयन0.9%विलेय विभव और pH को नियंत्रित करना
4. गैसें
\( \text{O}_2, \text{CO}_2, \text{N}_2 \)श्वसन क्रिया के महत्वपूर्ण भाग

(ब) रुधिर कणिकाएं (Blood Corpusles)
ये तीन तरह की होती हैं:
लाल रुधिर कोशिकाएँ (Red blood cells), श्वेत रुधिर कोशिकाएँ (White blood cells) और रुधिर पट्टिकाणु (Blood Platelets) को मिलाकर संगठित पदार्थ कहा जाता है। ये पूरे रक्त का 45% भाग बनाती हैं।

(A) लाल रुधिर कोशिकाएँ (RBCs)
इन्हें इरिथ्रोसाइट्स भी कहते हैं। इनकी संख्या बहुत ज्यादा होती है। ये कुल रक्त कणिकाओं का लगभग 99% होती हैं। इनका व्यास 7 से 8 \( \mu \) और मोटाई लगभग 2 \( \mu \)m होती है। ये गोल, डिस्क जैसे और दोनों तरफ से दबे हुए होते हैं। इनमें केंद्रक नहीं होता। केंद्रक के अलावा माइटोकॉन्ड्रिया, एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम और गॉल्जी बॉडी भी नहीं होते। एक स्वस्थ पुरुष में 50-55 लाख प्रति घन मिमी. और महिलाओं में 45 लाख प्रति घन मिमी. रक्त कणिकाएँ होती हैं। इनमें हीमोग्लोबिन होता है जो ऑक्सीजन ले जाने का काम करता है। हीमोग्लोबिन में प्रोटीन ग्लोबिन होता है जो हीम नामक लाल रंग के पदार्थ से जुड़ा होता है। रक्त का लाल रंग इसी हीम के कारण होता है। अस्थि मज्जा में लाल रक्त कणिकाएं बनती हैं।
इरिथ्रोसाइट्स का जीवनकाल 120 दिन का होता है। पुरानी लाल रक्त कणिकाओं को प्लीहा और यकृत में तोड़ दिया जाता है। इसलिए प्लीहा को 'रक्त कणिकाओं का कब्रिस्तान' भी कहते हैं। हीमोग्लोबिन का प्रोटीन भाग एमीनो अम्लों में टूट जाता है। हीम समूह के लोहे को यकृत में जमा कर लिया जाता है, और बाकी भाग को बिलिरुबिन और बिलिवर्डिन नामक पीले रंगों में बदलकर शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।

(B) श्वेत रुधिर कोशिकाएँ (White blood cells)
इन्हें ल्यूकोसाइट्स भी कहते हैं। इनमें हीमोग्लोबिन नहीं होता, इसलिए ये रंगहीन होती हैं। इनकी आकृति बड़ी और अनियमित होती है, और ये अपनी आकृति बदल सकती हैं। इनकी संख्या लाल रक्त कोशिकाओं से बहुत कम होती है, औसतन 7000-8000 प्रति घन मिमी. होती है। इनमें केंद्रक पाया जाता है। केंद्रक होने के कारण इन्हें असली कोशिकाएँ कहा जाता है। ये कोशिकाएँ शरीर को संक्रमण से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
अन्य कोशिकाओं की तरह इनमें माइटोकॉन्ड्रिया और गॉल्जी बॉडी भी होते हैं। इनका आकार लगभग 8 से 15 \( \mu \) होता है। इनका जीवनकाल 4-5 दिन से कई दिन तक हो सकता है। अमीबा जैसी गति इनकी एक खासियत है।

(1) कणिकामय श्वेत रक्ताणु (Granulocytes)
इनके कोशिका द्रव्य में छोटे-छोटे कण होते हैं जो खास रंगों से रंगे जा सकते हैं। इसलिए इन्हें कणिकामय श्वेत रक्ताणु कहते हैं। ये गोल होते हैं लेकिन सक्रिय रूप से अमीबा जैसी गति दिखाते हैं। इनका केंद्रक 2-5 हिस्सों में बंटा होता है और असममित होता है। इसलिए इन्हें पॉलीमार्फोन्यूक्लियर रक्त कणिकाएँ भी कहते हैं।
इनका औसत आकार 10 से 12 \( \mu \) होता है। ये कुल श्वेत रक्त कोशिकाओं का लगभग 65% होती हैं। ये अस्थि मज्जा में बनती हैं।
इन कोशिकाओं को रंगों के प्रति सक्रियता के आधार पर तीन प्रकार में बांटा जाता है:

• इओसिनोफिल्स (Eosinophils)
इनके कोशिका द्रव्य में अम्लीय रंग (जैसे इओसिन) ग्रहण करने वाले कण होते हैं। मनुष्य के रक्त में 1-4% इओसिनोफिल्स पाए जाते हैं। इनका व्यास लगभग 10-15 \( \mu \) होता है। इनका केंद्रक दो स्पष्ट हिस्सों में बंटा होता है जो एक पतले धागे से जुड़े होते हैं। इनका औसत जीवनकाल 8-12 दिन होता है। ये संक्रमण से बचाते हैं और एलर्जी प्रतिक्रियाओं में महत्वपूर्ण काम करते हैं।

• न्यूट्रोफिल्स (Neutrophils)
इनकी संख्या सबसे ज्यादा होती है, लगभग 60-70% होती है। प्रति घन मिमी. रक्त में 4000 से 5000 होती हैं। इनका व्यास 12-15 \( \mu \) होता है। इनकी कणिकाएँ छोटी और संख्या में ज्यादा होती हैं। ये उदासीन रंग से रंगे जाते हैं। इनका केंद्रक 3 से 7 हिस्सों का बना होता है जो एक धागे से जुड़े होते हैं। इसलिए इन्हें पॉलीमॉर्फोन्यूक्लियर ल्यूकोसाइट्स भी कहते हैं।
महिलाओं में कुछ न्यूट्रोफिल्स के केंद्रक से एक छोटा गोल हिस्सा जुड़ा होता है, जिसे ड्रम स्टिक कहते हैं। यह बार काय की तरह, एक X क्रोमोसोम के बदलने से बनता है। ये सबसे सक्रिय श्वेत रक्त कणिकाएँ होती हैं। ये केशिकाओं से बाहर निकलकर अमीबा जैसी गति दिखाती हैं। ये हानिकारक बाहरी पदार्थों और जीवाणुओं को खाकर खत्म करती हैं। इनका जीवनकाल 2 से 4 दिन होता है।

(II) कणिकाविहीन श्वेतरक्ताणु (Agranulocytes)
इनके कोशिका द्रव्य में कणिकाएँ नहीं होती हैं। इनमें सिर्फ एक केंद्रक होता है जो गोल या किडनी के आकार का होता है। एक केंद्रक होने के कारण इन्हें मोनोन्यूक्लियर ल्यूकोसाइट्स कहते हैं। ये कुल ल्यूकोसाइट्स का लगभग 25 से 30% भाग बनाती हैं। इनका निर्माण थाइमस, प्लीहा और लसिका ग्रंथियों में होता है। इनका औसत आकार 8-20 \( \mu \)m होता है। ये मृत कोशिकाओं को हटाने का काम भी करते हैं और 'सफाईकर्मी' कहलाते हैं। इन्हें घुमक्कड़ कोशिकाएँ भी कहते हैं। प्रति घन मिमी. रक्त में इनकी संख्या 200-700 तक होती है।

• मोनोसाइट्स (Monocytes)
ये संख्या में 4 से 10% होते हैं, लेकिन इनका आकार लगभग 15 से 20 \( \mu \) (सबसे बड़ा) होता है। इनका केंद्रक बड़ा अंडाकार, किडनी के आकार का होता है और परिधि की ओर स्थित होता है। कोशिका द्रव्य लिम्फोसाइट्स की तुलना में ज्यादा होता है। ये न्यूट्रोफिल्स की तरह शरीर में घुसने वाले छोटे जीवों को अंदर लेकर खाकर खत्म करते हैं।

(C) रुधिर प्लेटलेट्स (Blood platelets)
ये बहुत छोटे होते हैं (व्यास 2-4 \( \mu \)m)। इनका निर्माण लाल अस्थि मज्जा में पाई जाने वाली बड़ी महाकेन्द्रक कोशिकाओं या मेगाकैरियोसाइट्स से होता है। इनकी आकृति अनियमित होती है और इनमें केंद्रक नहीं होता है। इनकी संख्या लगभग 1.5 से 3.5 लाख प्रति घन मिमी. होती है। इनका जीवनकाल 5-7 दिन होता है। ये रक्त के थक्के बनाने में मदद करते हैं जिससे रक्त वाहिनियों के कटने पर खून का बहना रुक जाता है। प्लेटलेट्स रक्तस्राव को रोकने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
In simple words: रक्त में प्लाज्मा और रक्त कोशिकाएँ होती हैं। लाल रक्त कोशिकाएँ ऑक्सीजन ले जाती हैं, श्वेत रक्त कोशिकाएँ शरीर को बीमारियों से बचाती हैं, और प्लेटलेट्स खून जमाने में मदद करती हैं।

🎯 Exam Tip: रक्त घटकों के प्रकारों और उनके कार्यों को स्पष्ट रूप से याद रखें, क्योंकि यह जीव विज्ञान में एक मूलभूत विषय है। विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं के नाम और उनके विशिष्ट कार्य अक्सर पूछे जाते हैं।

 

Question 3. स्तनधारियों की अस्थि के अनुप्रस्थ काट का सचित्र वर्णन कीजिये।
Answer: अस्थि (Bone) की संरचना को समझने के लिए इसे विभिन्न भागों में बांटा जा सकता है:

(1) पेरिआस्टियम (Periosteum)
यह अस्थि का बाहरी आवरण होता है जो एक संयोजी ऊतक से बना होता है। पेरिआस्टियम में दो परतें होती हैं:
• बाह्य परत (Outer Layer): इस परत में रक्त नलिकाएँ, तंत्रिकाएँ और कुछ वसा कोशिकाएँ होती हैं।
• आन्तरिक परत (Inner Layer): यह ऑस्टियोब्लास्ट्स या अस्थि बनाने वाली कोशिकाओं की एक परत होती है। ये कोशिकाएँ ओसीन नामक प्रोटीन बनाती हैं और अस्थि के मैट्रिक्स को बढ़ने में मदद करती हैं।

(2) एण्डोआस्टियम (Endosteum)
यह ऑस्टियोब्लास्ट कोशिकाओं की एक पतली परत होती है, जो मज्जा गुहा (हड्डी के अंदर की खाली जगह) को घेरे रहती है। एंडोआस्टियम की ऑस्टियोब्लास्ट कोशिकाएँ भी ओसीन बनाती हैं और अस्थि के मैट्रिक्स को अंदर से बढ़ाती हैं। इस प्रकार अस्थि में बाहर और अंदर दोनों तरफ से वृद्धि होती है। एंडोस्टियम के अंदर मज्जा गुहा होती है।

(3) मैट्रिक्स (Matrix)
अस्थि का मैट्रिक्स पेरिऑस्टियम और एंडोऑस्टियम के बीच होता है और यह ओसीन से बना होता है। पेरिऑस्टियम की ऑस्टियोब्लास्ट कोशिकाएँ अस्थि के मैट्रिक्स को अंदर की ओर बढ़ाती हैं, जबकि एंडोऑस्टियम की ऑस्टियोब्लास्ट कोशिकाएँ भी ऐसा करती हैं। स्तनधारी जानवरों की हड्डियों की संरचना बहुत जटिल, मजबूत और घनी होती है। इनके मैट्रिक्स में, रक्त की आपूर्ति के लिए कई नलिकाएँ बनती हैं, जिन्हें हैवर्सियन नलिकाएँ कहते हैं। हैवर्सियन नलिकाएँ एक-दूसरे से कई तिरछी नलिकाओं से जुड़ी होती हैं, जिन्हें वोल्कमैन्स नलिकाएँ कहते हैं। प्रत्येक हैवर्सियन नलिका 8-15 एक-दूसरे के समानांतर लेमेली (पतली प्लेटें) से घिरी होती है। इन लेमेली में ऑस्टियोसाइट्स (अस्थि कोशिकाएँ) भी होती हैं। इस प्रकार बनी जटिल संरचना को हैवर्सियन-तंत्र कहते हैं।

(4) मज्जा गुहा (Marrow cavity)
एंडोऑस्टियम के अंदर मज्जा गुहा होती है। इसमें अर्ध-ठोस, मुलायम, वसायुक्त ऊतक होता है जिसे अस्थि मज्जा कहते हैं। इसमें कई वसा कोशिकाएँ, रक्त नलिकाएँ और तंत्रिकाएँ होती हैं। अस्थि मज्जा दो तरह की होती है:
• पीला अस्थि मज्जा (Yellow bone marrow): यह मज्जा गुहा के ज्यादातर बीच के हिस्से में होता है और इसका रंग पीला होता है। यह वसा को जमा करता है।
• लाल अस्थि मज्जा (Red bone marrow): यह मज्जा गुहा के दोनों सिरों पर होता है और इसका रंग लाल होता है। लाल अस्थि मज्जा में एरिथ्रोब्लास्ट्स कोशिकाएँ होती हैं जो लाल रक्त कणिकाओं (RBC) को बनाती हैं।
In simple words: हड्डी में बाहरी परत (पेरिऑस्टियम) और अंदरूनी परत (एंडोऑस्टियम) होती है। बीच में मैट्रिक्स होता है जिसमें ओसीन प्रोटीन होता है और मज्जा गुहा में अस्थि मज्जा होता है, जो रक्त कोशिकाएँ बनाता है।

🎯 Exam Tip: हड्डी के विभिन्न भागों और उनके कार्यों को याद रखें। हैवर्सियन प्रणाली, जो हड्डी के रक्त आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है, और विभिन्न प्रकार की अस्थि मज्जा को अच्छी तरह समझें।

 

Question 4. पेशी ऊतक के प्रकार एवं संरचना का वर्णन कीजिए।
Answer: पेशी ऊतक (Muscular tissue)
उच्च श्रेणी के जीवों में चलने-फिरने और अंगों की गति के लिए पेशी ऊतक पाए जाते हैं। इनमें सिकुड़ने की क्षमता होती है। पेशी ऊतक पेशी कोशिकाओं से बना होता है। पेशी कोशिकाएँ लंबी और पतली होती हैं, इसलिए इन्हें पेशी तंतु भी कहते हैं। पेशी तंतु के अंदर कई पेशी तंतुक (मायोफाइब्रिल्स) होते हैं। पेशियों में सिकुड़ने और उत्तेजित होने की क्षमता के कारण ये गति और चाल में बहुत महत्वपूर्ण हैं। गति के अलावा, पेशियाँ पाचन, श्वसन, परिवहन, उत्सर्जन और प्रजनन जैसे कई महत्वपूर्ण कार्य भी करती हैं। पेशी ऊतक तीन प्रकार के होते हैं:

(1) रेखित पेशियाँ (Striated muscles)
इन्हें कंकाली पेशियाँ भी कहते हैं क्योंकि ये हड्डियों से जुड़ी रहती हैं। प्रत्येक रेखित पेशी कोशिका एक बेलनाकार और बहुकेंद्रकी होती है। इसकी कोशिका झिल्ली को सार्कोलेमा और कोशिका द्रव्य को सार्कोप्लाज्म कहते हैं। सार्कोप्लाज्म में कई बहुत छोटे पेशी तंतुक एक-दूसरे के समानांतर दिशा में संयोजी ऊतक झिल्ली से बंधे पूलों में रहते हैं। पेशी तंतुओं के इन पूलों को फैसिकुलाई और इन्हें बांधने वाली झिल्ली को एपिमाइसियम कहते हैं। बड़ी पेशियों में कई फैसिकुलाई एक झिल्ली से जुड़े होते हैं जिसे पेरिमाइसियम कहते हैं। प्रत्येक पेशी तंतु के बाहर संयोजी ऊतक होता है जिसमें तंत्रिकाएँ और लसीका कोशिकाएँ फैली रहती हैं। ऊतक के इस भाग को एंडोमाइसियम कहते हैं।
गहरी पट्टियों को A पट्टियाँ (Anisotropic band) और हल्की पट्टियों को I पट्टियाँ (Isotropic band) कहते हैं। प्रत्येक I पट्टी के बीच एक गहरी Z पट्टी होती है। यह I पट्टी को दो बराबर भागों में बांटती है। Z पट्टी को क्राउसे झिल्ली भी कहते हैं। A पट्टियों के बीच एक कम गहरा क्षेत्र होता है जिसे H बैंड कहते हैं। इसी तरह दो Z पट्टियों के बीच की संरचनात्मक इकाई को सारकोमियर कहते हैं। हर पेशी तंतुक में कई सारकोमियर होते हैं जो एक सीधी लाइन में व्यवस्थित रहते हैं। प्रत्येक सारकोमियर में मायोसिन और एक्टिन नामक दो प्रकार के प्रोटीन तंतुओं की खास व्यवस्था होती है। रेखित पेशियों का संकुचन तेज होता है, लेकिन प्राणी की इच्छा शक्ति से नियंत्रित होता है। इसलिए इन पेशियों को ऐच्छिक पेशियाँ भी कहते हैं।

(2) चिकनी पेशियाँ (Smooth muscles)
इन्हें अरेखित पेशियाँ भी कहते हैं। इस ऊतक की पेशी तंतु आमतौर पर अलग-अलग होते हैं। लेकिन कुछ जगहों पर ये समूहों में भी होते हैं। ये समूह संयोजी ऊतकों से बंधे रहते हैं। हर तंतु एक पेशी कोशिका होती है। ये लंबे, तर्क के आकार (spindle shape) की होती हैं। इसके चारों ओर प्लाज्मा झिल्ली का आवरण होता है जिसे सार्कोलेमा कहते हैं। कोशिका में भरे कोशिका द्रव्य को सार्कोप्लाज्म कहते हैं। इसमें एक बड़ा और स्पष्ट केंद्रक पाया जाता है। सार्कोप्लाज्म में कई पेशी तंतु पूरी लंबाई में समानांतर फैले रहते हैं। पेशियों में संकुचन धीमी गति से लंबे समय तक होता है। इन पर जानवर की इच्छा का नियंत्रण नहीं होता, इसलिए इन्हें अनैच्छिक पेशियाँ कहते हैं। इस प्रकार की पेशियाँ शरीर के आंतरिक अंगों में पाई जाती हैं, इसलिए इन्हें आंतरिक पेशियाँ भी कहा जाता है। ये पेशियाँ मूत्राशय, श्वासनली, मूत्रवाहिनियों, रक्त वाहिनियों और आंत में पाई जाती हैं।

(3) हृदय पेशियाँ (Cardiac muscles)
ये पेशियाँ केवल रीढ़ वाले जानवरों के हृदय की दीवार में पाई जाती हैं। हृदय पेशी तंतु छोटे, बेलनाकार और शाखित होते हैं। शाखित होने के कारण ये एक-दूसरे से जुड़कर जाल बनाते हैं। इनके सार्कोप्लाज्म में एक केंद्रक बीच में होता है। इनमें अंतर्विष्ट पट्ट (intercalated disc) पाए जाते हैं जिनके कारण यह छोटे-छोटे खंडों में बंटा रहता है। प्रत्येक खंड में रेखित पेशी तंतु के समान गहरी और हल्की पट्टियाँ पाई जाती हैं। इन पर इच्छा शक्ति का नियंत्रण नहीं होता, इस तरह कार्य की दृष्टि से ये अनैच्छिक होती हैं। हृदय की पेशियाँ अपने आप बिना रुके एक लय में लगातार सिकुड़ती और फैलती रहती हैं, जिसे हृदय की गति या धड़कन कहते हैं। यह पेशी शरीर के सबसे मेहनती अंगों में से एक है।
In simple words: पेशी ऊतक तीन प्रकार के होते हैं: रेखित (जो हड्डियों से जुड़े होते हैं और हमारी इच्छा से काम करते हैं), चिकनी (जो आंतरिक अंगों में होते हैं और हमारी इच्छा के बिना काम करते हैं), और हृदय (जो केवल हृदय में होते हैं और अपने आप धड़कते रहते हैं)।

🎯 Exam Tip: तीनों प्रकार की पेशियों के बीच के अंतर, उनकी स्थिति, नियंत्रण और मुख्य कार्यों पर ध्यान दें। प्रत्येक प्रकार की पेशी ऊतक की विशिष्ट विशेषताओं को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 5. उपास्थि के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
Answer: उपास्थि (Cartilage)
यह सहायक संयोजी ऊतक हड्डी की तुलना में नरम और लचीला होता है। इस ऊतक के चारों ओर एक पतली लेकिन मजबूत झिल्ली होती है जिसे पेरिकॉन्ड्रियम कहते हैं। यह झिल्ली पारगम्य होती है जिससे पोषक तत्व अंदर जा सकते हैं। आंतरिक संरचना में जेली जैसा मैट्रिक्स होता है। यह कॉन्ड्रिन नामक प्रोटीन से बना होता है। मैट्रिक्स में कई छोटी-बड़ी तरल भरी खाली जगहें होती हैं, जिन्हें अवकाशिकाएँ या रिक्तिकाएँ कहते हैं। रिक्तिकाओं में गोल या अंडाकार उपास्थ्यणु (Chondrocyte) होते हैं। एक रिक्तिका में इनकी संख्या एक से चार तक होती है। इनसे कॉन्ड्रिन प्रोटीन का स्रावण होता है। परिधीय भाग में पेरिकॉन्ड्रियम के नीचे अधिक सक्रिय कोशिकाएँ होती हैं। इन्हें उपास्थिकोरक कहते हैं। इनसे उपास्थ्यणु बनते हैं। सभी प्रकार की उपास्थियों की संरचना समान होती है लेकिन इनमें पाए जाने वाले तंतुओं और रासायनिक पदार्थों के आधार पर यह ऊतक चार प्रकार का होता है:

(अ) काचाभ उपास्थि (Hyaline cartilage)
इसे सूत्रविहीन उपास्थि कहते हैं क्योंकि इसमें कोई तंतु नहीं होते। इसका मैट्रिक्स साफ, अर्ध-पारदर्शी और हल्के नीले रंग का होता है। इसलिए इसका रंग हल्का नीला दिखाई देता है। यह श्वास नली, हायॉइड हड्डी, स्टर्नम (छाती की हड्डी) और पैरों व पसलियों के आखिरी सिरों पर पाया जाता है। यह शरीर की हड्डियों को जोड़ने और गति में मदद करता है।

(ब) तन्तुमय उपास्थि (Fibrous cartilage)
इस प्रकार की उपास्थि बहुत मजबूत होती है और इसके मैट्रिक्स में कई सफेद कोलेजन तंतुओं के गुच्छे होते हैं। स्तनधारी जानवरों में यह अक्सर रीढ़ की हड्डियों के बीच (इंटरवर्टेब्रल डिस्क में) और जघन संधि में पाया जाता है।

(स) कैल्सीफाइड उपास्थि (Calcified cartilage)
इसके मैट्रिक्स में कैल्शियम कार्बोनेट (\( \text{CaCO}_3 \)) के कण पाए जाते हैं, जिनके कारण यह हड्डी के समान कठोर हो जाती है। इसकी बाकी संरचना काचाभ उपास्थि जैसी ही होती है। मेंढक की अंसमेखला (कंधे की हड्डी) में सुप्रास्केपुला और श्रोणि मेखला (पेट की हड्डी) में प्यूबिस इसी उपास्थि की बनी होती है। इसकी कठोरता इसे सहारा देने में सक्षम बनाती है।

(द) प्रत्यास्थ या लचीली उपास्थि (Elastic cartilage)
यह उपास्थि भी तंतुमय उपास्थि के समान होती है, लेकिन इसमें सफेद कोलेजन तंतुओं की जगह पीले कोलेजन तंतु पाए जाते हैं जो इसे लचीला बनाते हैं। यह हमारे बाहरी कान के पिन्ना (बाहरी कान), एपिग्लोटिस (जो खाना खाते समय श्वास नली को बंद करता है) और स्तनधारियों की नाक के सिरे पर पाई जाती है। इसका लचीलापन इसे आसानी से मुड़ने और वापस अपनी जगह आने में मदद करता है।
In simple words: उपास्थि हड्डी से नरम और लचीली होती है। यह चार प्रकार की होती है: काचाभ (साफ, नीली, तंतु रहित), तंतुमय (मजबूत, सफेद तंतु वाली), कैल्सीफाइड (कैल्शियम के कारण कठोर) और प्रत्यास्थ (लचीली, पीले तंतु वाली)।

🎯 Exam Tip: उपास्थि के चारों प्रकारों, उनकी संरचनात्मक विशेषताओं (जैसे तंतुओं की उपस्थिति या अनुपस्थिति), और शरीर में उनके विशिष्ट स्थानों को याद रखें। प्रत्येक प्रकार का कार्य भी महत्वपूर्ण है।

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