RBSE Solutions Class 11 Biology Chapter 28 जीवन की उत्पत्ति एवं जैव विकास

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Class 11 Biology Chapter 28 जीवन की उत्पत्ति एवं जैव विकास RBSE Solutions PDF

Rbse Class 11 Biology Chapter 28 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

Rbse Class 11 Biology Chapter 28 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. फिलोसॉफी जूलोजिक (Philosophie Zoologique) नामक पुस्तक के लेखक हैं
(अ) डार्विन
(ब) लेमार्क
(स) वीजमान
(द) वैलेस
Answer: (ब) लेमार्क
In simple words: फिलोसॉफी जूलोजिक नामक किताब के लेखक लेमार्क हैं, जिन्होंने विकास के सिद्धांतों पर महत्वपूर्ण काम किया था।

🎯 Exam Tip: जीव विज्ञान के महत्वपूर्ण सिद्धांतों और उनसे संबंधित वैज्ञानिकों के नाम याद रखना परीक्षा के लिए बहुत जरूरी है।

 

Question 2. समरूप अंग होते हैं
(अ) उत्पत्ति में समान, कार्य में भिन्न
(ब) उत्पत्ति में भिन्न, कार्य में समान
(स) मनुष्य का हाथ व चमगादड़ के पंख
(द) पक्षी के पंख व व्हेल के फ्लिपर
Answer: (ब) उत्पत्ति में भिन्न, कार्य में समान
In simple words: समरूप अंग वे होते हैं जिनकी बनावट या शुरुआत अलग-अलग होती है, लेकिन वे एक ही तरह का काम करते हैं।

🎯 Exam Tip: समरूप और समजात अंगों के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से समझें; एक में कार्य समान होता है और दूसरे में संरचना।

 

Question 3.
(अ) चमगादड़, तितली एवं पक्षी के पंख
(ब) पक्षी के पंख व मनुष्य के हाथ
(स) मनुष्य का हाथ व चमगादड़ के पंख
(द) पक्षी के पंख व व्हेल के फ्लिपर
Answer: (स) मनुष्य का हाथ व चमगादड़ के पंख
In simple words: यह प्रश्न समजात अंगों के उदाहरणों के बारे में है, जिनमें बनावट समान होती है लेकिन कार्य भिन्न हो सकते हैं।

🎯 Exam Tip: जब प्रश्न में अंगों के उदाहरण दिए हों, तो उनकी उत्पत्ति और कार्य को ध्यान में रखकर समरूप या समजात अंग पहचानें।

 

Question 4. इनमें से कौनसी संरचना मानव में अवशेषी नहीं है
(अ) निमेषक पटल
(ब) इलियम
(स) कर्ण पेशियां
(द) वर्मीफार्म अपेन्डिक्स।
Answer: (ब) इलियम
In simple words: इलियम मानव शरीर का एक जरूरी हिस्सा है, जबकि बाकी विकल्प ऐसे अंग हैं जो अब पूरी तरह से काम नहीं करते हैं या जिनकी जरूरत कम हो गई है।

🎯 Exam Tip: मानव शरीर में अवशेषी अंगों के उदाहरणों को याद रखें, क्योंकि यह विकास के प्रमाणों में से एक है।

 

Question 5. गैलेपेगोस द्वीप समूह किस वैज्ञानिक से सम्बन्धित है?
(अ) माल्थस
(ब) डार्विन
(स) वैलेस
(द) लैमार्क
Answer: (ब) डार्विन
In simple words: डार्विन ने गैलेपेगोस द्वीप समूह पर फिन्चेस का अध्ययन करके प्राकृतिक चयन का सिद्धांत विकसित किया था।

🎯 Exam Tip: चार्ल्स डार्विन के गैलेपेगोस यात्रा और उनके अवलोकन उनके विकासवादी सिद्धांत की नींव थे।

 

Question 6. निम्न में से कौन संयोजी कड़ी है
(अ) आर्कियोप्टेरिक्स
(ब) निओसेरोटोडस
(स) डार्विन की फिंच
(द) ड्रोसोफिला
Answer: (अ) आर्कियोप्टेरिक्स
In simple words: आर्कियोप्टेरिक्स सरीसृप और पक्षियों के बीच की एक कड़ी है, जिसमें दोनों के लक्षण पाए जाते हैं।

🎯 Exam Tip: संयोजी कड़ी वे जीव होते हैं जो दो अलग-अलग समूहों के बीच की कड़ी होते हैं और उनमें दोनों समूहों के लक्षण पाए जाते हैं।

 

Question 7. उविकास के सबसे ठोस प्रमाण मिलते हैं
(अ) अवशेषी अंगों से
(ब) तुलनात्मक संरचना से
(स) तुलनात्मक भौणिकी से
(द) डार्विन
Answer: (द) डार्विन
In simple words: डार्विन के सिद्धांत और संबंधित प्रमाण उविकास को सबसे ठोस रूप से समझाते हैं।

🎯 Exam Tip: उविकास के प्रमाणों में जीवाश्म, तुलनात्मक शरीर रचना और भ्रूण विज्ञान मुख्य हैं, जो इसे मजबूती देते हैं।

 

Question 8. पैन्जेनिसिस सिद्धान्त (पेन्जीनवाद) किसने प्रस्तुत किया
(अ) डार्विन
(ब) ऑपेरिन
(स) लेमार्क
(द) ह्यूगो डि ब्रीज
Answer: (अ) डार्विन
In simple words: पैन्जेनिसिस सिद्धांत चार्ल्स डार्विन ने दिया था, जिसमें बताया गया था कि शरीर के हर हिस्से से छोटे कण (पैन्जीन) प्रजनन अंगों में जाते हैं।

🎯 Exam Tip: विभिन्न वैज्ञानिक सिद्धांतों और उन्हें देने वाले वैज्ञानिकों के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 9. जाति उद्भवन के लिए उत्तरदायी कारक है
(अ) पृथक्करण
(ब) उत्परिवर्तन
(स) संकरण
(द) उपरोक्त सभी
Answer: (द) उपरोक्त सभी
In simple words: नई जातियों के बनने के लिए पृथक्करण, उत्परिवर्तन और संकरण सभी महत्वपूर्ण कारक हैं।

🎯 Exam Tip: जाति उद्भवन एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें कई कारक एक साथ काम करते हैं।

 

Question 10. प्रकृति में प्राकृतिक वरण द्वारा किस प्रकार के प्राणियों का चयन किया जाता है
(अ) अनुकूलतम
(ब) कमजोर
(स) वन्य प्रजाति
(द) सामान्य
Answer: (अ) अनुकूलतम
In simple words: प्राकृतिक चयन में प्रकृति उन जीवों को चुनती है जो अपने वातावरण के लिए सबसे ज्यादा अनुकूल होते हैं।

🎯 Exam Tip: प्राकृतिक वरण का सिद्धांत यह बताता है कि केवल सबसे योग्य जीव ही जीवित रहते हैं और प्रजनन करते हैं।

 

Question 11. किस प्रकार की विभिन्नताएं उविकास की दृष्टि से महत्वहीन होती हैं?
(अ) कायिक विभिन्नताएं
(ब) जननिक विभिन्नताएं
(स) सतत विभिन्नताएं
(द) असतत विभिन्नताएं
Answer: (अ) कायिक विभिन्नताएं
In simple words: कायिक विभिन्नताएं, जो शरीर में होने वाले बदलाव होते हैं और वंशानुगत नहीं होते, विकास के लिए महत्वपूर्ण नहीं मानी जाती हैं।

🎯 Exam Tip: कायिक विभिन्नताएं शरीर की कोशिकाओं में होती हैं, जबकि जननिक विभिन्नताएं प्रजनन कोशिकाओं में होती हैं, जो वंशानुगत होती हैं।

 

Question 12. धन है।
(अ) काायकावाभन्नताए
Answer: (स)
In simple words: प्रश्न के विकल्प स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन उत्तर तालिका में विकल्प (स) सही बताया गया है।

🎯 Exam Tip: वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में, सही विकल्प का चयन करने के लिए सभी दिए गए विकल्पों को ध्यान से पढ़ना महत्वपूर्ण है।

 

Question 13. नदीयां, पहाड़, मरुस्थल आदि बाधाएं किस प्रकार का पृथक्करण उत्पन्न करती हैं
(अ) भौगोलिक
(ब) आवासीय
(स) ऋतुनिष्ठ
(द) कार्यिकीय
Answer: (अ) भौगोलिक
In simple words: जब नदियाँ, पहाड़ या मरुस्थल जैसे प्राकृतिक अवरोधों के कारण जीव अलग हो जाते हैं, तो इसे भौगोलिक पृथक्करण कहते हैं।

🎯 Exam Tip: भौगोलिक पृथक्करण एक ही प्रजाति के जीवों को अलग कर देता है, जिससे वे अलग-अलग विकसित हो सकते हैं।

 

Question 14. भिन्न-भिन्न भौगोलिक क्षेत्र की जातियों को कहते हैं
(अ) निओपैट्रिक
(ब) सिम्पैट्रिक
(स) एलोपैट्रिक
(द) सिबलिंग
Answer: (स) एलोपैट्रिक
In simple words: एलोपैट्रिक जातियाँ वे होती हैं जो अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में पाई जाती हैं और इस कारण एक-दूसरे से प्रजनन नहीं कर पातीं।

🎯 Exam Tip: एलोपैट्रिक जाति उद्भवन में भौगोलिक पृथक्करण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 

Question 15. आनुवांशिक विभिन्नताओं को प्राथमिक स्रोत कोनसा है
(अ) उत्परिवर्तन
(ब) पुनर्योजन
(स) अ व ब दोनों
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
Answer: (स) अ व ब दोनों
In simple words: उत्परिवर्तन (जीन में अचानक बदलाव) और पुनर्योजन (जीनों का मिश्रण) ही आनुवांशिक विभिन्नताओं के मुख्य स्रोत हैं।

🎯 Exam Tip: आनुवांशिक विभिन्नताएं जीवों में विविधता लाती हैं, जो विकास के लिए जरूरी हैं।

 

Question 16. जीन अन्तर प्रवाह को रोकने वाली प्रक्रिया कहलाती है
(अ) जाति उद्भवन
(ब) अनुकूलन
(स) पृथक्करण
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
Answer: (स) पृथक्करण
In simple words: पृथक्करण वह प्रक्रिया है जो जीवों के बीच जीन के आदान-प्रदान को रोकती है, जिससे नई जातियों का विकास हो सकता है।

🎯 Exam Tip: पृथक्करण के कई रूप होते हैं, जैसे भौगोलिक, पारिस्थितिक और प्रजनन संबंधी, जो जीन प्रवाह को रोकते हैं।

 

Question 17. डार्विन के मतानुसार नई जातियों की उत्पत्ति किसके द्वारा होती
(अ) उत्परिवर्तन द्वारा
(ब) प्राकृतिक वरण द्वारा
(स) संकरण द्वारा
(द) पृथक्करण द्वारा
Answer: (ब) प्राकृतिक वरण द्वारा
In simple words: डार्विन का मानना था कि नई जातियाँ प्राकृतिक वरण के कारण बनती हैं, जहाँ प्रकृति सबसे अनुकूल जीवों का चुनाव करती है।

🎯 Exam Tip: प्राकृतिक वरण का सिद्धांत डार्विन के विकासवाद का मुख्य आधार है।

 

Question 18. सिस्टेमा नैचुरी नामक पुस्तक के लेखक हैं
(अ) सिस्टेमा नैचुरी
(ब) पैलेन्टोलॉजी
(स) फिलोसॉफी जुलोजिक
(द) ऑरीजिन ऑफ स्पीशीज
Answer: (ब)
In simple words: सिस्टेमा नैचुरी एक वर्गीकरण से संबंधित पुस्तक है।

🎯 Exam Tip: "सिस्टेमा नैचुरी" कार्ल लिनिअस द्वारा लिखी गई थी, जो वर्गीकरण विज्ञान की नींव मानी जाती है।

 

Question 19. लैमार्कवाद के समर्थक वैज्ञानिक थे
(अ) समनर
(ब) टॉवर
(स) मैकडूगल
(द) उपरोक्त सभी
Answer: (द) उपरोक्त सभी
In simple words: समनर, टॉवर और मैकडूगल जैसे वैज्ञानिक लैमार्कवाद के समर्थक थे, जो उपार्जित लक्षणों की वंशागति में विश्वास रखते थे।

🎯 Exam Tip: लैमार्कवाद और नव-लैमार्कवाद के बीच के अंतर को समझना महत्वपूर्ण है।

उत्तर तालिका

 

Question 1. अवशेषी अंग किसे कहते हैं? मनुष्य में ऐसे चार अंगों के उदाहरण दीजिये।
Answer: जीवों में ऐसे अंग जो शरीर के लिए अब जरूरी नहीं हैं और छोटे हो गए हैं, उन्हें अवशेषी अंग कहते हैं। ये अंग अतीत में पूर्ण रूप से विकसित और काम करते थे।
उदाहरण:
• मानव की आहारनाल में कृमि रूपी परिशेषिका (Vermiform appendix)
• कर्ण पल्लव की पेशियाँ (Ear muscles)
• निमेषक पटल (Nictitating membrane) जो आँखों के कोने में होती है
• तीसरा मोलर दांत (Third molar tooth) या अकल दाढ़
In simple words: अवशेषी अंग वे होते हैं जिनकी हमारे शरीर में अब खास जरूरत नहीं है, लेकिन हमारे पूर्वजों में वे महत्वपूर्ण थे।

🎯 Exam Tip: अवशेषी अंग जैव विकास के ठोस प्रमाणों में से एक हैं, जो यह दर्शाते हैं कि समय के साथ जीवों के शरीर में बदलाव आते हैं।

 

Question 2. जीवाश्म किसे कहते हैं? जैव विकास में इनका क्या महत्व है?
Answer: लाखों-करोड़ों साल पहले जो जीव-जंतु और पेड़-पौधे जमीन में दब गए थे, उनके बचे हुए अवशेष या निशान को जीवाश्म कहते हैं। जीवाश्म जैव विकास को समझने के लिए ठोस सबूत देते हैं। इनके अध्ययन से पता चलता है कि पृथ्वी पर किस समय कौन-से जीव मौजूद थे और कैसे विकसित हुए।
In simple words: जीवाश्म पुराने जीवों के पत्थर बने अवशेष हैं, जो हमें बताते हैं कि जीव समय के साथ कैसे बदले और विकसित हुए।

🎯 Exam Tip: जीवाश्म हमें समय के साथ जीवों के बदलाव की कहानी बताते हैं और लुप्त हो चुकी प्रजातियों के बारे में जानकारी देते हैं।

 

Question 3. लेमार्क व डार्विन के सिद्धान्तों की तुलना जिराफ के उदाहरण से कीजिये।
Answer:
लेमार्क के अनुसार: लेमार्क ने कहा कि पहले जिराफ हिरण जैसे छोटे थे और जमीन पर घास खाते थे। जब घास सूख गई, तो उन्हें पेड़ों की पत्तियां खानी पड़ीं। पत्तियां खाने के लिए जिराफों ने अपनी गर्दन और आगे के पैरों को लगातार खींचा। इस लगातार उपयोग के कारण उनकी गर्दन और पैर लम्बे हो गए। ये लम्बे लक्षण अगली पीढ़ियों में चले गए और इस तरह आधुनिक लम्बी गर्दन वाले जिराफ बने।
डार्विन के अनुसार: डार्विन के सिद्धांत के अनुसार, जिराफों की आबादी में पहले से ही कुछ छोटे गर्दन वाले और कुछ लम्बे गर्दन वाले जिराफ मौजूद थे। जब घास कम हो गई, तो छोटे गर्दन वाले जिराफ भोजन के लिए संघर्ष करने लगे और जीवित नहीं रह पाए। वहीं, लम्बी गर्दन वाले जिराफ पेड़ों की पत्तियां खाकर जीवित रहे और प्रजनन किया। इस तरह, प्रकृति ने लम्बी गर्दन वाले जिराफों को चुना, और पीढ़ी दर पीढ़ी लम्बी गर्दन वाले जिराफों की संख्या बढ़ती गई।
In simple words: लेमार्क ने कहा कि जिराफ ने अपनी गर्दन को खींचकर लम्बा किया, जबकि डार्विन ने बताया कि पहले से मौजूद लम्बी गर्दन वाले जिराफ ही कठिन परिस्थितियों में जीवित बचे।

🎯 Exam Tip: लेमार्क के 'उपार्जित लक्षणों की वंशागति' और डार्विन के 'प्राकृतिक वरण' के बीच के मुख्य अंतर को स्पष्ट रूप से समझें और उदाहरणों से समझाएँ।

 

Question 4. विभिन्नताओं को विकास का कच्चा माल (raw material) क्यों कहा जाता है?
Answer: विभिन्नताओं को विकास का कच्चा माल इसलिए कहते हैं क्योंकि ये जीव-जंतुओं में नए लक्षण और बदलाव लाती हैं। ये बदलाव प्रकृति के लिए चुनाव करने के अवसर पैदा करते हैं। प्राकृतिक चयन इन विभिन्नताओं में से सबसे अनुकूल बदलावों को चुनता है, जिससे जीव वातावरण में बेहतर तरीके से ढल पाते हैं और समय के साथ नई जातियों का विकास होता है। इस तरह, विभिन्नताएँ ही विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाती हैं।
In simple words: विभिन्नताएँ जीवों में नए बदलाव लाती हैं, जिन पर प्रकृति चुनाव करती है, जिससे विकास आगे बढ़ता है।

🎯 Exam Tip: समझें कि विभिन्नताएँ जीवों को जीवित रहने और प्रजनन करने में कैसे मदद करती हैं, खासकर बदलते पर्यावरण में।

 

Question 5. नव डार्विनवाद से आप क्या समझते हैं?
Answer: डार्विनवाद में कुछ कमियां थीं। बाद में वैज्ञानिकों ने आनुवंशिकी के ज्ञान (जैसे विभिन्नताएं, उत्परिवर्तन, पुनर्योजन, अभिगमन और प्राकृतिक वरण) को मिलाकर डार्विन के सिद्धांत को सुधारा। इसी सुधरे हुए सिद्धांत को नव डार्विनवाद (Neo-Darwinism) कहते हैं। वेलेस, डेवनपोर्ट और वेल्डेन जैसे वैज्ञानिकों ने इसका समर्थन किया और इसमें कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए:
• जो बदलाव शरीर में होते हैं (कायिक विभिन्नताएं) वे आनुवांशिक नहीं होते और अगली पीढ़ी में नहीं जाते, इसलिए वे विकास के लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं।
• केवल गुणसूत्रों और जीवों में होने वाले बदलाव (उत्परिवर्तन और पुनर्योजन) ही अगली पीढ़ी में जाते हैं और इनसे नई जातियाँ बनती हैं।
In simple words: नव डार्विनवाद डार्विन के पुराने सिद्धांत का एक नया और बेहतर रूप है, जिसमें आनुवंशिकी के ज्ञान को जोड़ा गया है ताकि विकास को और अच्छे से समझाया जा सके।

🎯 Exam Tip: नव डार्विनवाद, जिसे 'आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धांत' भी कहते हैं, विकास के कारकों को बेहतर ढंग से समझाता है।

 

Question 6. समजात व समवृत्ति अंगों में अन्तर स्पष्ट कीजिये।
Answer:

समजात अंग (Homologous organ)समवृत्ति अंग (Analogous organ)
1. समान उद्भव व समान मूल संरचना के आधार पर विभिन्न जीवों के अंगों में पाई जाने वाली समानता को समजातता कहते हैं।1. समान कार्य करने पर विभिन्न जीवों के अंगों में पाई जाने वाली बाह्य आकारिकी (Morphological) समानता को समरूपता (समवृत्तिता) कहते है।
2. इनमें मूलभूत संरचना समान होती है।2. इनमें मूल संरचना (Anatomy) भिन्न होती है।
3. इनमें अंगों का भ्रूणीय उद्भव (origin) समान होता है।3. इनमें अंगों का भ्रूणीय उद्भव (origin) बिल्कुल भिन्न होता है।
4. इनमें अंगों के कार्य एवं बाह्य संरचना भिन्न-भिन्न होती है। उदाहरण-मनुष्य के हाथ, घोड़े के अग्रपाद, व्हेल की फ्लिपर4. इनमें अंगों के कार्य एवं बाह्य संरचना समान होती है। उदाहरण-पक्षी के पंख, चमगादड़ के पंख एवं कीट (तितली) के पंख।

In simple words: समजात अंग वे हैं जिनकी बनावट एक जैसी होती है लेकिन काम अलग-अलग होते हैं, जबकि समवृत्ति अंग वे हैं जिनके काम एक जैसे होते हैं लेकिन बनावट अलग-अलग होती है।

🎯 Exam Tip: इन दोनों प्रकार के अंगों के उदाहरणों को अच्छे से समझें और याद रखें, क्योंकि यह विकास के प्रमाणों में महत्वपूर्ण है।

 

Question 7. उत्परिवर्तनवाद के जनक ह्यूगो डि ब्रीज ने किस पौधे पर प्रयोग किया था?
Answer: उत्परिवर्तनवाद के जनक ह्यूगो डि ब्रीज ने 'इवनिंग प्रिमरोज' (Oenothera lamarckiana) पौधे पर अपने प्रयोग किए थे।
In simple words: ह्यूगो डि ब्रीज ने उत्परिवर्तन का सिद्धांत समझाने के लिए इवनिंग प्रिमरोज नामक पौधे का उपयोग किया था।

🎯 Exam Tip: उत्परिवर्तनवाद के जनक और उनके प्रयोगों में उपयोग किए गए जीव का नाम याद रखें।

 

Question 8. उत्परिवर्तन किसे कहते हैं? ये कितने प्रकार के होते हैं? संक्षिप्त में टिप्पणी लिखिये।
Answer: जीवों में अचानक होने वाले और वंशानुगत होने वाले परिवर्तनों को उत्परिवर्तन कहते हैं। ये जीव की जीन संरचना में बदलाव के कारण होते हैं। हॉलैण्ड के वैज्ञानिक ह्यूगो डि ब्रीज ने बताया कि उत्परिवर्तन आनुवंशिक होते हैं और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाते हैं। उत्परिवर्तन ही विकास का एक मुख्य कारण है। इन्हें तीन मुख्य भागों में बांटा जा सकता है:
(1) जीन उत्परिवर्तन (Gene Mutation): यह DNA अणु की संरचना में होने वाले बदलाव हैं। ये दो प्रकार के होते हैं:
• बिन्दु उत्परिवर्तन (Point Mutation): DNA संरचना में किसी एक क्षारक के बदलने से होता है।
(अ) संक्रांति (Transition): इसमें एक प्यूरीन क्षारक की जगह दूसरा प्यूरीन क्षारक या एक पिरिमिडीन क्षारक की जगह दूसरा पिरिमिडीन क्षारक ले लेता है।
(ब) अनुपथन (Transversion): इसमें प्यूरीन और पिरिमिडीन क्षारक की स्थिति आपस में बदल जाती है।
• समग्र उत्परिवर्तन (Gross Mutation): DNA की किसी लंबी श्रृंखला में होने वाले बड़े बदलाव को समग्र उत्परिवर्तन कहते हैं।
(2) गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन (Chromosomal Mutation): गुणसूत्रों पर जीनों की संख्या या क्रम में बदलाव को गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन कहते हैं। ये चार प्रकार के होते हैं:
(अ) विलोपन या न्यूनता (Deletion or Deficiency)
(ब) द्विगुणन (Duplication)
(स) स्थानान्तरण (Translocation)
(द) प्रतिलोमन (Inversion)
(3) जीनोमेटिक उत्परिवर्तन या बहुगुणिता (Genomatic Mutation or Polyploidy): जब जीवों की गुणसूत्र संख्या में कमी या अधिकता हो जाती है, तो इसे बहुगुणिता कहते हैं।
In simple words: उत्परिवर्तन जीवों में अचानक होने वाले आनुवांशिक बदलाव हैं, जो जीन, गुणसूत्र या गुणसूत्रों की संख्या में हो सकते हैं और विकास का कारण बनते हैं।

🎯 Exam Tip: उत्परिवर्तन के विभिन्न प्रकारों और उनके उदाहरणों को समझें, क्योंकि यह आनुवंशिकी और विकास दोनों में महत्वपूर्ण अवधारणा है।

 

Question 9. जाति (Species) के उपसमूहों के नाम बताइये।
Answer: जाति के उपसमूहों में डीम्स (Demes), प्रजाति (race), और सिबलिंग (sibling) शामिल हैं।
जाति उन जीवों का समूह है जो आपस में प्रजनन कर सकते हैं। डीम्स छोटे समूह होते हैं जिनकी आनुवंशिक समानता होती है लेकिन वे भौगोलिक रूप से अलग होते हैं। प्रजाति असमानता वाले छोटे भौगोलिक रूप से अलग समूह होते हैं। सिबलिंग जातियाँ आकार में समान होती हैं लेकिन आपस में प्रजनन नहीं कर सकतीं, जैसे ड्रोसोफिला की कुछ प्रजातियाँ।
In simple words: जाति के छोटे समूह जैसे डीम्स, प्रजाति और सिबलिंग होते हैं, जो भौगोलिक और आनुवंशिक आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं।

🎯 Exam Tip: जीव विज्ञान में 'जाति' की परिभाषा और उसके उपसमूहों को उनके विशेषताओं के साथ याद रखना चाहिए।

 

Question 10. पृथक्करण (Isolation) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
Answer: पृथक्करण वह प्रक्रिया है जिसमें एक जाति के जीव छोटे-छोटे समूहों या उपजातियों में बंट जाते हैं। दूसरे शब्दों में, यह सजीवों के समूहों के बीच जीन प्रवाह को रोकने का एक तरीका है। पृथक्करण जैव विकास में बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नई जातियों के बनने में मदद करता है। यह तब होता है जब समुदायों के बीच भौतिक, भौगोलिक या अन्य तरह के अवरोध (बाधाएं) आ जाते हैं। वेगनर ने सबसे पहले जीवों में पृथक्करण के महत्व को बताया था। मैटकॉफ के अनुसार, कोई भी कारक जो एक ही जाति के सदस्यों को आपस में आज़ादी से प्रजनन करने से रोकता है और उन्हें समूहों में बांट देता है, उसे पृथक्करण कहते हैं।
केलाग का मानना है कि यह एक ऐसा जैविक उत्प्रेरक है जिससे जीवों में बदलाव आते हैं और प्रकृति उन्हें चुनती है। वैलस ने भी प्राकृतिक वरण में पृथक्करण को सहायक माना।
In simple words: पृथक्करण वह प्रक्रिया है जिसमें जीवों के समूह भौगोलिक या अन्य बाधाओं के कारण अलग हो जाते हैं, जिससे वे आपस में प्रजनन नहीं कर पाते और नई जातियाँ बन सकती हैं।

🎯 Exam Tip: पृथक्करण के विभिन्न प्रकारों और उनके प्रभावों को समझना जाति उद्भवन की प्रक्रिया को स्पष्ट करता है।

 

Question 11. जाति उद्भवन के कारक बताइये।
Answer: जाति उद्भवन, यानी नई जातियों के बनने के मुख्य कारक निम्नलिखित हैं:
• अभिगमन (migration): जीवों का एक जगह से दूसरी जगह जाना।
• आनुवंशिक विचलन (genetic drift): आबादी में जीनों की आवृत्ति में अचानक बदलाव।
• उत्परिवर्तन (mutation): जीनों में अचानक होने वाले बदलाव।
• लैंगिक पुनर्मिलन (sexual recombination): प्रजनन के दौरान जीनों का नया संयोजन।
• संकरण (hybridization): दो अलग-अलग जातियों के बीच प्रजनन।
• प्राकृतिक वरण (natural selection): प्रकृति द्वारा अनुकूल जीवों का चुनाव।
• पृथक्करण (isolation): जीवों के समूहों का अलग हो जाना।
In simple words: नई जातियों के बनने के पीछे अभिगमन, आनुवंशिक विचलन, उत्परिवर्तन, प्रजनन का मिश्रण, संकरण, प्राकृतिक चुनाव और अलग-अलग रहना जैसे कई कारण होते हैं।

🎯 Exam Tip: जाति उद्भवन के कारकों को व्यक्तिगत रूप से और एक साथ उनके प्रभाव के संदर्भ में जानें।

 

Question 12. बहुगुणिता (Polyploidy) किसे कहते हैं? इसका क्या महत्व है?
Answer: बहुगुणिता (Polyploidy) तब होती है जब जीवों में गुणसूत्रों की संख्या सामान्य से दोगुनी या उससे अधिक हो जाती है। यह जैव विकास में महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे नई प्रजातियों का निर्माण हो सकता है, खासकर पौधों में। यह जीवों को नए वातावरण के अनुकूल बनने में मदद कर सकती है और नए लक्षणों को जन्म दे सकती है।
बहुगुणिता के प्रकार:
(i) स्वबहुगुणित (Autopolyploids): इनमें मूल गुणसूत्रों के समान दो से अधिक गुणसूत्रों के समुच्चय होते हैं।
(ii) परबहुगुणित (Allopolyploids): दो अलग-अलग जातियों के संकरण से बनी पहली पीढ़ी की संतति में गुणसूत्रों की संख्या दोगुनी होने से बनते हैं। इसमें गुणसूत्रों के दो अलग-अलग समुच्चय होते हैं।
(iii) खण्डीय परबहुगुणित (Segmental Allopolyploids): कुछ परबहुगुणितों में पाए जाने वाले विभिन्न जीन समूह आपस में आंशिक रूप से समान होते हैं, जिससे कुछ गुणसूत्रों के खंड ही समजातीय होते हैं। स्टेबिन्स के अनुसार, ये खण्डीय परबहुगुणित, स्वबहुगुणितों और अगुणितों के बीच की कड़ी होते हैं।
In simple words: बहुगुणिता का मतलब है जब किसी जीव में गुणसूत्रों की संख्या सामान्य से कई गुना ज़्यादा हो जाती है, जो नई प्रजातियों के विकास में मदद करती है।

🎯 Exam Tip: बहुगुणिता विशेष रूप से पौधों में जाति उद्भवन और नई विशेषताओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

 

Question 13. अभिगमन या प्रवास (Migration) किस प्रकार जैव विकास में सहायक होता है?
Answer: अभिगमन या प्रवास जैव विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब जीव एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं, तो वे अपने साथ नए जीन ले जाते हैं या मौजूदा जीनों को नई आबादी में मिलाते हैं। इस प्रक्रिया को जीन विचलन (genetic drift) भी कहते हैं। जब अप्रवासी जीव (immigrants) एक नए क्षेत्र में आते हैं, तो वे स्थानीय आबादी के जीन पूल में नए जीन जोड़ते हैं, जिससे आनुवंशिक विविधता बढ़ती है। इसी तरह, जब उत्प्रवासी जीव (emigrants) एक क्षेत्र से जाते हैं, तो वे वहाँ के कुछ जीनों को हटा देते हैं। यह जीन प्रवाह जीवों को बदलते वातावरण के अनुकूल बनने में मदद करता है और नई जातियों के विकास का कारण बन सकता है। उदाहरण के लिए, रूस के साइबेरिया से आने वाले सारस (क्रेन्स) राजस्थान के भरतपुर स्थित घना पक्षी अभयारण्य में आते हैं और प्रजनन के बाद वापस साइबेरिया लौट जाते हैं।
In simple words: जीवों का एक जगह से दूसरी जगह जाना (प्रवास) नए जीन और विविधता लाता है, जिससे जीव वातावरण में बेहतर तरीके से ढल पाते हैं और विकास होता है।

🎯 Exam Tip: अभिगमन या प्रवास को जीन प्रवाह के रूप में समझें, जो आनुवंशिक विविधता को बढ़ाता या घटाता है, जिससे आबादी में विकासवादी परिवर्तन आते हैं।

 

Question 14. जैव विकास में आनुवंशिक पुर्नयोजन का क्या महत्व है?
Answer: आनुवंशिक पुनर्योजन (Recombination) जैव विकास में बहुत महत्वपूर्ण है। यह वह प्रक्रिया है जिसमें नए जीनों का संयोजन होता है, जिसमें माता और पिता दोनों के गुणसूत्रों का योगदान होता है। युग्मक बनने के दौरान अर्धसूत्री विभाजन होता है और जीन-विनिमय (crossing over) की प्रक्रिया होती है, जिससे पुनर्योजन होता है। जीवों में संयोगिक (Random) प्रजनन से भी नए गुणसूत्रों का मिश्रण होता है। संकरण की प्रक्रिया भी पुनर्योजन को बढ़ाती है, जिससे संकर ओज (hybrid vigor) बनते हैं। इस तरह, आनुवंशिक पुनर्योजन जातीय विकास को बढ़ावा देता है।
In simple words: आनुवंशिक पुनर्योजन माता-पिता के जीनों को मिलाकर नए संयोजन बनाता है, जो जीवों में विविधता लाता है और विकास में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: पुनर्योजन और उत्परिवर्तन दोनों आनुवंशिक विविधता के स्रोत हैं, जो प्राकृतिक वरण के लिए 'कच्चा माल' प्रदान करते हैं।

 

Question 15. हाड़-वीनबर्ग साम्यता नियम की व्याख्या कीजिये।
Answer: हाड़-वीनबर्ग साम्यता नियम बताता है कि यदि किसी बड़ी आबादी में प्रजनन बेतरतीब (random) हो, कोई उत्परिवर्तन न हो, और कोई बाहरी कारक (जैसे प्रवास या प्राकृतिक वरण) न हों, तो पीढ़ी दर पीढ़ी जीनों की आवृत्ति (gene frequency) स्थिर रहती है। इसका मतलब है कि वह आबादी आनुवंशिक संतुलन (Genetic Equilibrium) में रहती है।
हार्डी-वेनबर्ग ने इसे निम्न समीकरण से समझाया:
सभी अलील आवृत्तियों का योग 1 होता है। यदि दो अलील A और a हैं, तो उनकी आवृत्तियों को p और q से दर्शाते हैं।
\( p + q = 1 \)
और व्यष्टिगत आवृत्तियों के लिए:
\( p^2 + 2pq + q^2 = 1 \)
यहाँ,
\( p^2 \) = AA (समयुग्मजी प्रभावी) की आवृत्ति
\( q^2 \) = aa (समयुग्मजी अप्रभावी) की आवृत्ति
\( 2pq \) = Aa (विषमयुग्मजी) की आवृत्ति
यह नियम स्पष्ट करता है कि यदि जीन आवृत्तियां नहीं बदलती हैं, तो आबादी आनुवंशिक संतुलन में रहती है और विकास की दर शून्य होती है।

AAAaaa
36%48%16%

In simple words: हाड़-वीनबर्ग नियम कहता है कि कुछ खास शर्तों में किसी बड़ी आबादी में जीनों की संख्या पीढ़ी दर पीढ़ी नहीं बदलती, यानी कोई विकास नहीं होता।

🎯 Exam Tip: हाड़-वीनबर्ग समीकरण को याद रखें और समझें कि यह कब लागू होता है। इसके अपवाद विकासवादी परिवर्तनों के कारण होते हैं।

जव विकास क प्रमाण (Evidence of organic evolution)-

 

Question 1. जैव विकास के प्रमाण क्या हैं?
Answer: जैव विकास की प्रक्रिया इतनी धीमी होती है कि इसे सीधे तौर पर देखना मुश्किल है। वैज्ञानिकों ने कई तरह के सबूत दिए हैं जो बताते हैं कि सरल जीवों से जटिल जीवों का विकास कैसे हुआ:
• जैव भौगोलिक प्रमाण (Biogeographical Evidence): दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जीवों के वितरण से विकास के सबूत मिलते हैं। कुछ जगहों पर एक ही तरह के जीव पाए जाते हैं, भले ही भौगोलिक परिस्थितियाँ अलग हों, और कुछ जगहों पर अलग-अलग जीव, भले ही परिस्थितियाँ समान हों। उदाहरण के लिए, डार्विन ने गैलेपेगोस द्वीप पर फिन्चेस का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि फिन्चेस अमेरिका के पक्षियों जैसी थीं, लेकिन उनकी चोंच और संरचना में अंतर था, जो वहां के भोजन के अनुसार अनुकूलित हुई थीं।
• तुलनात्मक शारीरिकी से प्रमाण (Evidence of Comparative anatomy): जीवों की शारीरिक संरचनाओं की तुलना करके भी विकास के सबूत मिलते हैं। शारीरिक संरचनाएँ दो प्रकार की होती हैं:
(अ) समजात अंग (Homologous Organs): विभिन्न जातियों के जीवों में ऐसे अंग जिनकी उत्पत्ति (Origin) समान होती है, लेकिन उनकी बाहरी बनावट और काम अलग-अलग होते हैं, उन्हें समजात अंग कहते हैं। जैसे, मनुष्य के हाथ, घोड़े के अग्रपाद, चमगादड़ के पंख और डॉल्फ़िन के फ्लिपर। इन सभी के कंकाल की मूल संरचना एक जैसी होती है, लेकिन ये अलग-अलग काम करते हैं। अंगों की रचना और उद्भव में समानता को समजातता (Homology) कहते हैं।
In simple words: जैव विकास के सबूत हमें बताते हैं कि जीव कैसे बदलते हैं। इनमें जीवों का दुनिया में फैलाव (जैव भौगोलिक प्रमाण) और उनके शरीर के अंगों की तुलना (तुलनात्मक शारीरिकी) शामिल है।

🎯 Exam Tip: जैव विकास के विभिन्न प्रमाणों को उदाहरणों के साथ समझें, क्योंकि ये विकास के सिद्धांत की पुष्टि करते हैं।

चित्र 28.6 : विभिन्न कशेरुकियों के अग्रपादों में समजातता

(ब) समवृत्ति अंग (Analogous organs)

विभिन्न जातियों के जीवों में कुछ अंग ऐसे होते हैं जो समान काम के लिए बदल जाते हैं और एक जैसे दिखते हैं. हालांकि, उनकी शुरुआती बनावट और मूल रचना अलग-अलग होती है. ऐसे अंगों को समवृत्ति अंग कहते हैं, और उनकी समानता को समरूपता कहते हैं. उदाहरण के लिए, कीटों, पक्षियों और चमगादड़ के पंख उड़ने का एक ही काम करते हैं, लेकिन उनकी बनावट और विकास का तरीका अलग होता है. समजात अंगों की तरह, समवृत्ति अंग भी जैव विकास को साबित करते हैं.

चित्र 28.7 : समवृत्ति अंग (अ) कीट के पंख (ब) पक्षी के पंख (स) चमगादड़ के पंख।

(स) अवशेषी अंग (Vestigial organs)

जीवों में कुछ ऐसे अंग होते हैं जो समय के साथ छोटे, आधे विकसित या बेकार हो जाते हैं. लेकिन यही अंग उनके पूर्वजों में बहुत महत्वपूर्ण काम करते थे और पूरी तरह से विकसित थे. ऐसे बेकार और अनावश्यक अंगों को अवशेषी अंग कहते हैं. उदाहरण के लिए, मानव की आहारनाल में कृमि रूपी परिशेषिका (आँत का एक छोटा हिस्सा), कर्ण पल्लव की पेशियाँ (कान हिलाने वाली माँसपेशियाँ), पुच्छ कशेरुका (रीढ़ की हड्डी का सबसे निचला हिस्सा), निमेषक पटल (आँख का तीसरा पर्दा), तीसरा मोलर दांत (अक्ल दाढ़) ये सभी अवशेषी अंग हैं.

 

चित्र 28.8 : मनुष्य के कुछ अवशेषी अंग।

(द) पूर्वजता या प्रत्यावर्तन (Atavism or Reversion)

कुछ जीवों या जीव समूहों में कुछ लक्षण जो बहुत समय पहले उनके पूर्वजों में मौजूद थे, अचानक फिर से विकसित हो जाते हैं. इसे पूर्वजता या प्रत्यावर्तन कहते हैं. आमतौर पर, आधुनिक जीवों में ये लक्षण गायब हो चुके होते हैं, लेकिन बहुत समय पहले पूर्वजों में ये सक्रिय अवस्था में थे. उदाहरण के लिए:

  • कुछ मनुष्यों के पूरे शरीर पर बंदरों जैसे लंबे और घने बाल होते हैं.
  • कभी-कभी कुछ मानव शिशुओं में छोटी पूंछ पाई जाती है.
  • कभी-कभी मानव शिशुओं में बड़े और नुकीले कैनाइन दांत पाए जाते हैं, जो मांसाहारी पूर्वजों में होते थे.

 

Question 2. लैमार्कवाद व नव लैमार्कवाद की विवेचना कीजिये।
Answer:

लेमार्कवाद (Lamarckism)

फ्रांस के वैज्ञानिक जीन बैप्टिस्ट डी लेमार्क (1744-1829) ने एक सिद्धांत दिया जिसे लेमार्कवाद कहते हैं. उन्होंने बताया कि वे लक्षण जो कोई जीव अपने जीवन में हासिल करता है, अगली पीढ़ी में चले जाते हैं. लेमार्कवाद के चार मुख्य विचार ये हैं:

  • अंगों का उपयोग तथा अनुपयोग (Use and disuse of organs) – यदि किसी अंग का लगातार उपयोग होता है, तो वह ज्यादा विकसित और मजबूत हो जाता है. अनुपयोगी अंग धीरे-धीरे कमजोर होकर खत्म हो जाते हैं.
  • उपार्जित लक्षणों की वंशागति (Inheritance of acquired character) – इस तरह, जीव अपने जीवनकाल में आंतरिक जैविक शक्तियों, वातावरण के प्रभाव, नई जरूरतों और अंगों के उपयोग या अनुपयोग से नए लक्षण विकसित करते हैं. इन लक्षणों को उपार्जित लक्षण कहते हैं. ये लक्षण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाते हैं और कई पीढ़ियों तक इनके ट्रांसफर से एक नई जाति बनती है, जो अपने पूर्वजों से अलग होती है.

उदाहरण:

  1. जिराफ: लेमार्क ने समझाया कि लाखों साल पहले जिराफ हिरण जैसे छोटे थे और घास खाते थे. जब घास खत्म हुई, तो उन्हें पेड़ों की पत्तियां खानी पड़ीं. पत्तियों तक पहुँचने के लिए उन्हें अपनी गर्दन और अगली टांगों को लगातार ऊपर खींचना पड़ा. इस लगातार उपयोग के कारण उनकी गर्दन और टांगें लंबी होती गईं, और यह लक्षण पीढ़ी-दर-पीढ़ी अगली पीढ़ी में जाता रहा. इस तरह से आज के लंबे गर्दन वाले जिराफ विकसित हुए.
  2. सांपों के पैर का न होना: लेमार्क के अनुसार, सांपों के पैर पहले होते थे. लेकिन जमीन के अंदर बिलों में रहने के कारण पैर रुकावट बने, और धीरे-धीरे बेकार होकर खत्म हो गए.
  3. जलीय पक्षियों में जालयुक्त पाद: बत्तख और अन्य जलीय पक्षियों के पैरों की उंगलियों के बीच की त्वचा तैरने के लिए फैल गई, जिससे जालयुक्त पैर (webbed foot) बने.
  4. कर्णपल्लव की पेशियां: खरगोश, गाय, हाथी, कुत्ते जैसे जानवरों में कान हिलाने वाली पेशियां बहुत विकसित होती हैं क्योंकि वे इनका ज्यादा उपयोग करते हैं. लेकिन मनुष्यों में ये पेशियां छोटी हो गई हैं क्योंकि हम इनका उपयोग नहीं करते हैं.

लेमार्कवाद की आलोचना (Criticism of Lamarckism)

कई वैज्ञानिकों ने लेमार्कवाद को गलत साबित किया है. उन्होंने प्रयोगों और उदाहरणों से दिखाया कि उपार्जित लक्षण पीढ़ी-दर-पीढ़ी नहीं जाते और न ही अंगों का ज्यादा उपयोग होने से वे ज्यादा विकसित होते हैं.

  • जर्मन वैज्ञानिक वीजमान ने 20-22 पीढ़ियों तक चूहों की पूंछ काटी, लेकिन नई संतानों में पूंछ खत्म नहीं हुई और न ही उनकी लंबाई कम हुई.
  • जो लोग लगातार पढ़ते हैं, उनकी आंखें जल्दी कमजोर हो जाती हैं. लेमार्कवाद के अनुसार, उनकी आंखें और मजबूत होनी चाहिए थी.
  • सदियों से भारतीय महिलाएं नाक और कान छिदवाती आ रही हैं, लेकिन यह लक्षण अगली पीढ़ी में नहीं जाता है.
  • लुहार और पहलवान जो जीवनकाल में मजबूत मांसपेशियां बनाते हैं, उनके बच्चों में ये मांसपेशियां जन्म से मजबूत नहीं होती हैं.

चित्र 28.4 : लेमार्क के अनुसार जिराफ में गर्दन के लम्बा होने की प्रक्रिया।

नव लेमार्कवाद (Neo-Lamarckism)

समनर, टॉवर, मैक्डूगल जैसे वैज्ञानिकों ने लेमार्कवाद का समर्थन किया, लेकिन कुछ बदलावों के साथ एक नया सिद्धांत प्रस्तुत किया जिसे नव-लेमार्कवाद कहते हैं.

नव-लेमार्कवाद के अनुसार, अंगों के उपयोग और अनुपयोग का प्रभाव अगली पीढ़ी में तो नहीं जाता, लेकिन बाहरी वातावरण का प्रभाव हार्मोन पर पड़ता है. ये हार्मोन जनन कोशिकाओं को प्रभावित करते हैं, जिससे लक्षण अगली पीढ़ी में चले जाते हैं. साथ ही, वातावरण में बदलाव से कुछ ऐसे भौतिक और रासायनिक परिवर्तन होते हैं जो जनन द्रव्य (germ plasm) को प्रभावित करते हैं. ऐसे परिवर्तन अगली पीढ़ी में निश्चित रूप से दिखाई देते हैं.

In simple words: लेमार्कवाद कहता है कि जीव अपने जीवन में जो लक्षण सीखते हैं, वे अगली पीढ़ी में चले जाते हैं, जैसे जिराफ की लंबी गर्दन. लेकिन वैज्ञानिक प्रयोगों ने इसे गलत साबित किया. नव-लेमार्कवाद कहता है कि बाहरी माहौल (जैसे हार्मोन) ही अगली पीढ़ी में बदलाव लाता है.

🎯 Exam Tip: जब भी विकास के सिद्धांतों की बात हो, तो उनके मुख्य बिंदुओं, उदाहरणों और आलोचनाओं को स्पष्ट रूप से लिखें, जिससे उत्तर पूरा और सटीक लगे.

 

Question 3. डार्विनवाद तथा नव डार्विनवाद की विवेचना कीजिये।
Answer:

डार्विनवाद (Darwinism) या 'प्राकृतिक वरण का सिद्धान्त' (Theory of Natural Selection)

डार्विन ने अपने सिद्धांत में ये बातें बताईं:

  • जीवों में अत्यधिक सन्तानोत्पत्ति की क्षमता (Enormous capacity of reproduction) – डार्विन के अनुसार, हर जीव बहुत सारी संतानें पैदा करता है ताकि अपनी जाति को बनाए रख सके. जैसे, एक मादा सीप एक मौसम में 10 लाख अंडे देती है, और एक कवक 7 खरब बीजाणु बनाता है. यदि सभी अंडे या बीजाणु पूरी तरह विकसित हो जाएं, तो कुछ ही पीढ़ियों में पूरी पृथ्वी भर जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं होता क्योंकि सभी अंडे और बच्चे विकसित होने से पहले ही मर जाते हैं.
  • जीवन संघर्ष (Struggle for existence) – बहुत सारी संतानें पैदा होने के बाद भी जीवों की संख्या लगभग स्थिर रहती है क्योंकि जीवों को जगह और भोजन के लिए लड़ना पड़ता है. इसी लड़ाई को जीवन संघर्ष कहते हैं. यह संघर्ष जीव के जीवनभर चलता रहता है. इसलिए जीव बहुत सारी संतानें पैदा करते हैं ताकि कुछ सदस्य संघर्ष में जीतकर अपनी जाति को आगे बढ़ा सकें. जीवन संघर्ष सभी जीवों में होता है और यह तीन तरह का होता है:
    • अन्तःजातीय संघर्ष (Intra specific Struggle) – एक ही जाति के सदस्यों की जरूरतें समान होती हैं, इसलिए उनके बीच भोजन, जगह और जीवनसाथी के लिए संघर्ष होता है.
    • अन्तर्जातीय संघर्ष (Intera specific Struggle) – अलग-अलग जातियों के जीवों में समान जरूरतों के लिए संघर्ष होता है.
    • वातावरणीय संघर्ष (Environmental Struggle) – सभी जीव गर्मी, सर्दी, बारिश, बाढ़, सूखा, हवा आदि जैसी कई वातावरणीय स्थितियों से बचने के लिए संघर्ष करते हैं.
  • विभिन्नताएं व वंशानुगति – कुछ जीव दूसरों की तुलना में कम संघर्ष करते हैं और वातावरण के साथ ज्यादा अनुकूल होते हैं. उनमें कुछ अलग-अलग गुण होते हैं. डार्विन ने बताया कि जो जीव वातावरण के अनुकूल होते हैं, वे जीवित रहते हैं और बाकी नष्ट हो जाते हैं. ये गुण अगली पीढ़ी में जाते हैं और यह क्रम पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है.
  • समर्थ का जीवत्व या प्राकृतिक वरण – डार्विन के अनुसार, जीवन संघर्ष में वही जीव सफल होते हैं जो वातावरण के अनुसार ज्यादा अनुकूल होते हैं. ऐसे जीव ही जीवन संघर्ष में सफल और विजयी होते हैं. इसके विपरीत, बेकार गुणों वाले सदस्य जीवन की जरूरतों से वंचित रह जाते हैं और किसी न किसी अवस्था में नष्ट हो जाते हैं. इस जीवन संघर्ष में वातावरण के प्रति अनुकूलित जीव ही जीवित रहते हैं और जो अनुकूलित नहीं होते, वे नष्ट हो जाते हैं. इसे 'प्राकृतिक वरण' कहते हैं.

उदाहरण:

  1. चीता, तेंदुआ और शेर एक जैसे दिखते हैं और मांसाहारी हैं. इनके पंजों पर नुकीले नाखून होते हैं. शुरुआत में ये तीनों एक ही जाति के सदस्य थे, लेकिन वातावरण के अनुकूल होने के कारण उनमें बदलाव आए और नई जातियां बन गईं. इसी तरह कुत्ता, गीदड़ और भेड़िया भी एक ही पूर्वज से आए थे, लेकिन अलग-अलग वातावरण में बदलाव और अनुकूलन के कारण तीन अलग-अलग जातियां बन गईं. डार्विन के अनुसार, पृथ्वी पर जितनी भी जीवित जातियां हैं, वे सभी प्राकृतिक वरण से बनी हैं.
  2. डार्विन के अनुसार, शुरुआत में जिराफ की दो जातियां थीं - छोटी गर्दन वाली और लंबी गर्दन वाली. सूखे जैसी प्राकृतिक आपदा के कारण जब छोटी वनस्पति खत्म हो गई, तो छोटी गर्दन वाले जिराफ खत्म हो गए, लेकिन लंबी गर्दन वाले जिराफ पेड़ों की पत्तियां खाकर जीवित रहे. इस तरह प्रकृति ने मजबूत को चुना.
  3. डार्विन ने गैलापागोस द्वीप समूह पर 20-22 तरह के पक्षियों का अध्ययन किया और पाया कि ये पक्षी अमेरिका में पाए जाने वाले पक्षियों जैसे ही हैं. लेकिन अलग-अलग वातावरण में भोजन के अनुकूल होने के कारण इनकी चोंच के आकार और बनावट में अंतर आ गया. इन पक्षियों को डार्विन की फिंचेस कहते हैं.

चित्र 28.5 : डार्विन की फिंचे

डार्विनवाद की आलोचना (Criticism of Darwinism)

भले ही डार्विनवाद को विकास को समझाने के लिए काफी समर्थन मिला है, लेकिन कुछ वैज्ञानिकों ने इस पर कई आपत्तियां उठाई हैं, जो ये हैं:

  • डार्विनवाद कायिक परिवर्तनों (जो शरीर में होते हैं और अगली पीढ़ी में नहीं जाते) तथा जननिक परिवर्तनों (जो जनन कोशिकाओं में होते हैं और अगली पीढ़ी में जाते हैं) के बीच अंतर नहीं कर पाया.
  • यह उन कारणों को स्पष्ट नहीं कर सका जिनसे विभिन्नताएं (बदलाव) उत्पन्न होती हैं, क्योंकि ये अचानक और अप्रत्याशित होती हैं.
  • डार्विनवाद ने बताया कि प्राकृतिक चयन हमेशा फायदेमंद होता है, लेकिन कुछ गुण ऐसे होते हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ते रहते हैं, पर उनका कोई फायदा नहीं होता.
  • डार्विन ने अवशेषी अंगों (जैसे शरीर में मौजूद ऐसे अंग जो अब काम नहीं आते) और ऐसे अंगों के बारे में नहीं बताया जो बहुत छोटे होते हैं, लेकिन जिनके बिना जीवन संभव नहीं है.
  • यह सिद्धांत अंगों के अत्यधिक उपयोग या अनुपयोग से उनके विकास पर कोई प्रकाश नहीं डालता.

नव-डार्विनवाद (Neo-Darwinism)

डार्विन के प्राकृतिक वरण के सिद्धांत में कई नई खोजें और शोध किए गए, जिससे यह विचार बदल गया. डार्विनवाद के इस बदले हुए रूप को ही नव-डार्विनवाद कहते हैं. इस विचार के समर्थक वैज्ञानिक वालेस, अर्नेस्ट, वेल्डेन, डेवनपोर्ट आदि हैं. इन्होंने प्रयोगों से प्राकृतिक वरण को सही साबित किया.

प्राकृतिक वरण के पक्ष में उदाहरण

  • डेवनपोर्ट के चूजों पर प्रयोग – डेवनपोर्ट ने अलग-अलग रंगों के चूजों (काले, भूरे, सफेद, धारीदार) को खुले में छोड़ दिया. उनमें से सफेद चूजे शिकारी पक्षियों (बाज) द्वारा आसानी से देखे जाने के कारण मारे गए, जबकि बाकी चूजे वातावरण के रंगों से मिलते-जुलते होने के कारण बच गए.
  • सेसोनोला का प्रयोग – इस प्रयोग में सेसोनोला ने मेंटिस रिलिजिओसा (एक प्रकार का कीड़ा) के अलग-अलग रंगों के चयन के मूल्य की जांच की. उन्होंने धब्बेदार मेंटिस और वातावरण की पृष्ठभूमि में दिखने वाले साफ मेंटिस को एक ही वातावरण में रखा. कुछ समय बाद देखा गया कि जो मेंटिस पौधों के रंग से मिलते-जुलते थे, वे बच गए, जबकि अलग-अलग रंग के और आसानी से पहचाने जाने वाले मेंटिस शिकारी पक्षियों द्वारा खा लिए गए.
  • औद्योगिक कृष्णता (Industrial Melanism) – इंग्लैंड में पहले हल्के रंग के भूरे पिपर्ड मोथ (Bis toll betularit) होते थे, जो ओक पेड़ की पत्तियों पर पाए जाते थे. एक और कीट था जो गहरे भूरे रंग का काला शलभ था, जो बहुत कम मिलता था. औद्योगिक क्रांति के साथ, कोयले के ज्यादा उपयोग से वातावरण में गंदगी बढ़ी और पेड़ों के तनों पर कालिख जम गई, जिससे उनका रंग काला हो गया. इसका असर भूरे शलभों पर खराब पड़ा. वे शिकारी पक्षियों द्वारा आसानी से पहचाने जाने के कारण मारे जाने लगे, और उनकी संख्या कम हो गई, जबकि काले शलभों की संख्या बढ़ गई. बाद में, कोयले की जगह पेट्रोलियम का उपयोग होने लगा. वातावरण में कालिख और धुएं की मात्रा कम हो गई, और पेड़ों के तने फिर से भूरे हो गए. इससे शलभों की संख्या पर फिर असर पड़ा. काले शलभ शिकारी पक्षियों द्वारा आसानी से पहचाने जाने के कारण मारे जाने लगे, और उनकी संख्या कम होने लगी, जबकि भूरे शलभ वातावरण के रंग से मिलते-जुलते होने के कारण सुरक्षित हो गए और उनकी संख्या फिर से बढ़ने लगी. वैज्ञानिकों ने इस घटना को औद्योगिक कृष्णता कहा.

In simple words: डार्विनवाद कहता है कि जीव संघर्ष करते हैं और सबसे अनुकूल जीव ही जीवित रहते हैं (प्राकृतिक चयन). इसमें संतानोत्पत्ति, जीवन संघर्ष और विविधताएं शामिल हैं. नव-डार्विनवाद ने डार्विन के विचारों में कुछ बदलाव किए, जो आधुनिक खोजों पर आधारित हैं.

🎯 Exam Tip: डार्विनवाद और लेमार्कवाद दोनों ही विकास के महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं. तुलना करते समय, दोनों के मुख्य बिंदुओं, उदाहरणों और आलोचनाओं को अलग-अलग समझाना चाहिए.

 

Question 4. उत्परिवर्तन वाद का वर्णन कीजिये।
Answer:

उत्परिवर्तनवाद या डी व्रीज का सिद्धान्त (Theory of Mutation or Theory of De-vries)

डी ब्रीज (1901) ने इवनिंग प्रिमरोज (Oenothera lamarckiana - 4 O'clock plant) के पौधों पर रिसर्च के बाद बताया कि जीव अचानक से बदल जाते हैं. ये बदलाव पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाते हैं और नए बदलाव पैदा करते हैं. ये पौधे मूल पौधों से बिल्कुल अलग हो जाते हैं. यही नहीं, ये अलग-अलग लक्षण अगली पीढ़ी में जाते हैं.

डी ब्रीज की खोजों को 'उत्परिवर्तन सिद्धान्त' कहते हैं. इस सिद्धान्त की मुख्य बातें ये हैं:

  • प्रकृति में उत्परिवर्तन अगली पीढ़ी में जाते हैं और इनसे नई जातियां बनती हैं.
  • प्रकृति में नई जीव-जातियों की उत्पत्ति छोटे-छोटे और अस्थिर बदलावों (variations) के धीरे-धीरे इकट्ठा होने और क्रमिक विकास से नहीं होती, बल्कि अचानक और स्थायी (अगली पीढ़ी में जाने वाले) परिवर्तनों (उत्परिवर्तनों) से होती है.
  • जाति का पहला सदस्य जिसमें उत्परिवर्तित लक्षण दिखाई देता है, उसे उत्परिवर्तक (mutant) कहते हैं. यह सदस्य उत्परिवर्तित लक्षण के लिए शुद्ध नस्ल (pure-breeding) होता है.
  • सभी जीव-जातियों में उत्परिवर्तन की जन्मजात प्रवृत्ति (inherent tendency) होती है, जो कभी बहुत कम, कभी ज्यादा और कभी बिल्कुल गायब होती है.
  • उत्परिवर्तनों पर प्राकृतिक चयन का प्रभाव पड़ता है. फायदेमंद उत्परिवर्तन जमा होते जाते हैं और हानिकारक उत्परिवर्तन वाले जीव प्राकृतिक चयन से खत्म हो जाते हैं.
  • उत्परिवर्तन किसी भी दिशा में हो सकता है. इसलिए ये फायदेमंद भी हो सकते हैं और हानिकारक भी.
  • अंगों के विकास की शुरुआती अवस्था को उत्परिवर्तन सिद्धांत से समझाया जा सकता है.

उत्परिवर्तन सिद्धान्त की आलोचना (Criticism of Mutation Theory)

पादप शास्त्री जोहन्सन ने डी ब्रीज की तरह के प्रयोग करके उत्परिवर्तनवाद का समर्थन किया, लेकिन अन्य वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत की आलोचना की, जिनके तर्क ये हैं:

  • डी ब्रीज के प्रिमरोज पौधे में मिलने वाले विभिन्न म्यूटेशन और अजीब संयोग सभी जीवों में समान रूप से नहीं मिलते.
  • प्रिमरोज में जो विभिन्नताएं डी ब्रीज ने देखीं, वे जीन्स में अचानक परिवर्तनों के कारण नहीं, बल्कि गुणसूत्रों के अनियमित विभाजन और संयोजन के कारण थीं.
  • जीवों के बीच पाए जाने वाले अलगाव (discontinuity) को उत्परिवर्तनवाद के आधार पर नहीं समझाया जा सकता है.
  • आमतौर पर, हर जीव वातावरण के अनुसार अनुकूलन (adaptability) की क्षमता रखता है. क्योंकि उत्परिवर्तन अचानक और अनिश्चित होते हैं, इनसे प्रभावित जीवों की अनुकूलन की क्षमता पर डी ब्रीज ने स्पष्ट नहीं किया.
  • योजक कड़ियों (Connecting links) से जैव विकास में जो एक क्रम दिखाई देता है, उसका स्पष्टीकरण भी उत्परिवर्तन सिद्धांत से नहीं मिलता. इसलिए, केवल उत्परिवर्तन को ही विकास का आधार नहीं माना जा सकता.
  • फिर भी उत्परिवर्तन विकास के लिए एक आधार प्रदान करते हैं, लेकिन केवल उत्परिवर्तनों को ही जैव विकास का आधार नहीं माना जा सकता.

In simple words: उत्परिवर्तनवाद बताता है कि जीव अचानक हुए बदलावों से नई जातियां बनाते हैं. ये बदलाव पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाते हैं. लेकिन इस सिद्धांत की आलोचना भी हुई है क्योंकि सभी बदलाव हमेशा फायदेमंद नहीं होते और अचानक होते हैं.

🎯 Exam Tip: उत्परिवर्तनवाद की व्याख्या करते समय, उसके मुख्य बिंदुओं, प्रकारों और आलोचनाओं को क्रम से समझाएं ताकि पूरी जानकारी मिल सके.

 

Question 5. विभिन्नताओं से आप क्या समझते हैं? इनके कारणों को वर्णन कीजिये तथा जैव विकास में इनके महत्व पर टिप्पणी लिखिये।
Answer:

विभिन्नताएं (Variations)

जीवों में बदलाव होना प्रकृति का नियम है और यह जीवों के विकास के लिए जरूरी है. यह सब जानते हैं कि कोई भी दो व्यक्ति एक जैसे नहीं होते और एक व्यक्ति के दो समान अंग भी पूरी तरह से समान नहीं होते. यह संसार के सभी प्राणियों और पौधों की जातियों में देखा जा सकता है. विभिन्नता विकास के लिए एक बढ़ता हुआ (progressive) कदम है. 'निकट संबंधी जीवों' (एक ही जाति के जीव) के सदस्यों के लक्षणों में पाए जाने वाले अंतर या असमानताओं को विभिन्नताएं कहते हैं.

विभिन्नताओं के कारण

विभिन्नताएं इन कारणों से हो सकती हैं:

  • तापमान, प्रकाश, पोषक तत्वों, विकिरणों जैसी वातावरणीय परिस्थितियों से जीवों में विभिन्नताएं उत्पन्न हो जाती हैं.
  • हमारे आनुवंशिक पदार्थ जीन और गुणसूत्र होते हैं. इनकी संख्या और बनावट में बदलाव से भी विभिन्नताएं उत्पन्न होती हैं.
  • नए बच्चे का जन्म नर और मादा के मिलने से होता है. इस दो-माता-पिता (Dual parentage) के कारण दो जीवों के आनुवंशिक पदार्थ मिलते हैं, जिसके परिणामस्वरूप जीवों में जीन में बदलाव होता है और विभिन्नताएं उत्पन्न होती हैं.

विभिन्नताओं के प्रकार (Types of Variations)

विभिन्नताओं को तीन समूहों में बांटा गया है:

  • कायिक तथा जननिक विभिन्नताएं (Somatic or Germinal variations)- कायिक विभिन्नताएं वे हैं जो जीव के जीवनकाल में बाहरी प्रभावों से उत्पन्न होती हैं या जीव उन्हें खुद हासिल करता है. इन्हें हासिल की गई विभिन्नताएं भी कहते हैं. जैसे, ज्यादा समय तक धूप में रहने पर त्वचा का रंग काला पड़ जाना, पहलवान की विकसित मांसपेशियां आदि कायिक विभिन्नता के उदाहरण हैं. जननिक विभिन्नताएं वे हैं जो जनन द्रव्य (germ plasm) में जीनों के फिर से जुड़ने (recombination of genes) या उत्परिवर्तन (mutation) से उत्पन्न होती हैं. इससे यह स्पष्ट है कि जननिक विभिन्नताएं वातावरण के प्रभाव से नहीं होतीं. ये विभिन्नताएं जीन के फिर से जुड़ने, गुणसूत्रों की बनावट में बदलाव, जीनों के रासायनिक स्वभाव में बदलाव, बहुगुणिता और विकिरणों आदि से उत्पन्न हो सकती हैं. आंखों का नीला, काला, भूरा रंग और बालों का सीधा या घुंघराले होना जननिक विभिन्नताओं के उदाहरण हैं.
  • अनिर्धारित तथा निर्धारित विभिन्नताएं (Indeterminate and determinate variations)- अनिर्धारित विभिन्नताएं किसी खास नियम के अनुसार उत्पन्न नहीं होतीं. ये बदलाव किसी भी दिशा में हो सकते हैं. ऐसा माना जाता है कि डार्विन का प्राकृतिक चयन इन पर असर डालता है. निर्धारित विभिन्नताएं किसी अप्रत्यक्ष प्रभाव से नियंत्रित होती हैं और किसी निश्चित दिशा में ये बदलाव होते हैं. ये विभिन्नताएं अक्सर अनुकूल दिशा की ओर ही अपना प्रभाव उत्पन्न करती हैं. आयरिश बारहसिंगों में उनके सींग लगातार बढ़ते गए, हालांकि ये उनकी मौत का कारण बने.
  • सतत एवं असतत विभिन्नताएं (Continuous and discontinuous variations)- सतत विभिन्नताएं छोटे-छोटे बदलाव हैं जो धीरे-धीरे लगातार होते रहते हैं.
लक्षणसतत विभिन्नताएंअसतत विभिन्नताएं
उपस्थितियह प्राणियों में सामान्य रूप से पाई जाती है।ये प्रायः अचानक उत्पन्न होने वाली विभिन्नताएं हैं।
अन्य नामउच्चावचनउत्परिवर्तन या स्पोर्ट्स
स्थायित्व व वंशागतिस्थाई एवं वंशागत नहीं होती है।स्थाई एवं वंशागत होती है।
कारणप्रायः युग्मक निर्माण के दौरान जीन विनिमय द्वारा उत्पन्न होती है।जीन या जीनोम में परिवर्तन के कारण उत्पन्न होती है।

विभिन्नताएं के महत्व (Significance of Variations)

  • विभिन्नताएं जैव विकास प्रक्रिया की कच्ची सामग्री (raw material) हैं.
  • विभिन्नताओं से जानवरों और पौधों में फायदेमंद बदलाव होते हैं.
  • विभिन्नताएं जानवर को बदले हुए वातावरण के प्रति अनुकूलित होने में मदद करती हैं.
  • विभिन्नताएं जानवर को जीवित रहने के संघर्ष में मजबूत बनाती हैं.

In simple words: विभिन्नताएं जीवों में होने वाले बदलाव हैं जो उन्हें नए माहौल के अनुकूल बनने में मदद करती हैं. ये बदलाव जीवों के विकास के लिए बहुत जरूरी होते हैं और कई कारणों से होते हैं, जैसे जीन में बदलाव या माहौल का असर.

🎯 Exam Tip: विभिन्नताओं का वर्णन करते समय, उनके प्रकारों (कायिक, जननिक, सतत, असतत) और कारणों को स्पष्ट करें, साथ ही जैव विकास में उनके महत्व को भी बताएं.

 

Question 6. जाति उदभवन क्या होता है? जाति निर्माण की प्रक्रिया के प्रमुख कारकों का वर्णन कीजिये।
Answer:

जाति की अवधारणा (Concept of Species)

स्पेशीज (Species) एक लैटिन शब्द है जिसका मतलब 'प्रकार' (kind) है. परिभाषा के अनुसार, जाति जीवों का वह समूह है जिनके आनुवंशिक लक्षण समान होते हैं और वे आपस में प्रजनन कर सकते हैं. इससे संतान पैदा हो सकती है. जाति वर्गीकरण की सबसे छोटी इकाई है.

जाति के प्रकार (Type of Species)

  • एकलप्ररूपी या मोनोटिपिक जाति (Monotypic Species)- जब मूल जाति ही बदल कर नई जाति बन जाती है, यानी जाति छोटे-छोटे समूहों में नहीं बँटती है.
  • बहुप्ररूपी या पोलीटिपिक जाति (Polytypic Species)- जब एक जाति कई प्रजातियों या उपसमूहों में बँटकर अनेक जातियां बनाती है. उदाहरण: अमेरिका में सांग गौरैया की कई उपजातियों को मिलाकर एक जाति 'पारसेला मेलोडियो' नाम दिया गया है.

जाति उद्भवन (Specification)

पूर्वज जातियों से नई जातियों की उत्पत्ति को जाति उद्भवन कहते हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि जीवों की संख्या बढ़ने से वे एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं (migration) या उनके रहने की भौगोलिक जगहों में बदलाव होता है. इससे जातियों के छोटे समूह बन जाते हैं. इन समूहों में आपसी प्रजनन भी रुक जाता है. ये समूह या तो माहौल के संघर्ष में नष्ट हो जाते हैं या फिर बदलावों के कारण खुद को माहौल के अनुकूल बना लेते हैं. धीरे-धीरे लंबे समय बाद उनका जीनपूल अपनी पूर्वज जाति से अलग हो जाता है और इस तरह नई जाति बन जाती है.

जाति उद्भवन दो प्रकार का होता है

(अ) भिन्नदेशीय जाति उद्भवन (Allopatric Specification)

जब एक जाति के जीव अपने रहने की जगह छोड़कर बहुत दूर चले जाते हैं और नई जगहों पर बस जाते हैं, तो उनके आवासों के बीच भौगोलिक बाधाएं उत्पन्न हो जाती हैं. नए आवास में जीव समूह के आनुवंशिक बदलावों के कारण ये समूह नई जाति में बदल जाते हैं. उदाहरण: डार्विन की फिंचेस.

(ब) एकदेशीय जाति उद्भवन (Sympatric Specification)

कभी-कभी अलग-अलग आवासों के जीव किसी प्राकृतिक कारणों से भौगोलिक अलगाव खत्म होने के बाद आपस में संपर्क में आने पर प्रजनन कर लेते हैं और नई जातियों का निर्माण होता है. जानवरों में इस तरह का जाति उद्भवन कम होता है. पौधों में यह एक सामान्य प्रक्रिया है. इस प्रक्रिया में उत्पन्न संकर (hybrid) संतान कहलाती है.

जाति उद्भवन के कारण

जाति उद्भवन के मुख्य कारण हैं: अभिगमन (migration), आनुवंशिक विचलन (genetic drift), उत्परिवर्तन (mutation), लैंगिक पुनर्मिलन (sexual recombination), संकरण (hybridization), प्राकृतिक वरण (natural selection), और पृथक्करण (isolation).

In simple words: जाति उद्भवन का मतलब है नई जातियों का बनना. यह तब होता है जब जीव एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं या उनके जींस में बदलाव होते हैं. भौगोलिक बाधाएं और आनुवंशिक बदलाव नई जातियां बनाने में मदद करते हैं.

🎯 Exam Tip: जाति उद्भवन को परिभाषित करें और उसके प्रकारों तथा कारणों को स्पष्ट रूप से समझाएं. उदाहरणों का प्रयोग करने से उत्तर ज्यादा प्रभावी होगा.

 

Question 7. पृथक्करण (Isolation) किस प्रकार उविकास में सहायक होता है? समझाइये।
Answer:

जो चीज एक ही जाति के सदस्यों को आपस में स्वतंत्र रूप से प्रजनन करने से रोकती है और उन्हें समूहों में बांट देती है, उसे पृथक्करण (isolation) कहते हैं.

वैज्ञानिक केलाग मानते हैं कि यह एक ऐसा जैविक उत्प्रेरक (biological catalyst) है जिससे ऐसी स्थितियां बनती हैं कि जीवों में बदलाव होते हैं और प्रकृति खुद उन्हें चुन लेती है. वैलेस ने भी पृथक्करण को प्राकृतिक चयन में मददगार माना है. समुदायों के बीच भौतिक, भौगोलिक या किसी और तरह की रुकावटें (barriers) पृथक्करण का कारण बनती हैं.

पृथक्करण के प्रकार

पृथक्करण के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं:

  • भौगोलिक पृथक्करण (Geographical Isolation)- विकासविद् मोरिज वेग्नर के अनुसार, पृथ्वी पर सभी जातियों के निर्माण में भौगोलिक पृथक्करण एक महत्वपूर्ण कारण था. इसमें कई रुकावटें आती हैं, जैसे पहाड़, जमीन पर पानी वाली जगहें, रेगिस्तान, वन, पर्वत आदि. इनके कारण जीवों के बीच की दूरी बढ़ जाती है और वे एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं. अब उनमें आपस में प्रजनन संभव नहीं होता और जीव खास जगह पर रहने के लिए अनुकूल हो जाते हैं. गैलापागोस द्वीप पर पाई जाने वाली डार्विन फिंचेज भौगोलिक पृथक्करण का एक उदाहरण हैं.
  • स्थानिक पृथक्करण (Spatial Isolation)- इस प्रकार के पृथक्करण में जातियां बहुत दूर फैली होती हैं. यह दूरी इतनी ज्यादा होती है कि जीवों में पृथक्करण हो जाता है. जैसे, उत्तरी गोलार्ध में पाई जाने वाली एलीफैंटसील मिरोंगा एंगासटीरोस्ट्रिस दक्षिणी गोलार्ध में पाई जाने वाली मिरोंगा लिओनिना से अलग होती हैं. दोनों के आवासों के बीच 3000 मील लंबा समुद्र उन्हें अलग रखता है.
  • जननिक पृथक्करण (Reproductive Isolation)- जीवों में कई जैविक कमियां होती हैं, जिनके कारण वे आपस में प्रजनन नहीं कर पाते हैं. इसे जननिक पृथक्करण कहते हैं. इसे दो समूहों में बांटा जा सकता है:

(अ) पूर्वसंगमी या युग्मनजपूर्ण पृथक्करण (Prezygotic Isolation)-

ये वे स्थितियां और कारक हैं जिनसे जीव आपस में प्रजनन नहीं कर पाते हैं. यह निम्न प्रकार का होता है:

  • आवासीय पृथक्करण (Ecological Isolation) – जब जीव आवास में अंतर के कारण आपस में प्रजनन नहीं कर पाते हैं, तो इसे आवासीय या पारिस्थितिकी पृथक्करण कहते हैं.
  • ऋत्विक पृथक्करण (Seasonal Isolation) – जीवों में प्रजनन के मौसम में अंतर के कारण, एक ही आवास में रहते हुए भी, वे आपस में प्रजनन नहीं कर पाते हैं.
  • आकारिकी पृथक्करण (Morphological Isolation) – प्राणियों के शरीर के आकार में अंतर के कारण भी वे आपस में प्रजनन नहीं कर पाते हैं.
  • कार्यिकी पृथक्करण (Physiological Isolation) – जीवों में जननांगों की संरचना और कार्य खास होती है. इसलिए, साथ-साथ रहते हुए भी, एक प्रजाति के नर दूसरी प्रजाति की मादा से प्रजनन नहीं कर पाते हैं, जैसे ड्रोसोफिला नामक मक्खियों में.

पृथक्करण का महत्व

पृथक्करण जाति उद्भवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. यह जीवों में आपसी प्रजनन को रोकता है और उन्हें नए आवास में रहने के लिए अनुकूल बनाता है. इससे जीवों में नए लक्षण पैदा होते हैं. परिणामस्वरूप, प्राकृतिक चयन प्रभावित होता है, जिससे नई जातियों के निर्माण में मदद मिलती है.

In simple words: पृथक्करण तब होता है जब जीव आपस में प्रजनन नहीं कर पाते, अक्सर भौगोलिक रुकावटों के कारण. यह जीवों को अपने माहौल के अनुकूल बनने और नए गुण विकसित करने में मदद करता है, जिससे नई जातियां बनती हैं.

🎯 Exam Tip: पृथक्करण को समझाते समय, उसके विभिन्न प्रकारों (जैसे भौगोलिक, स्थानिक, जननिक) और प्रत्येक के उदाहरणों पर ध्यान दें. यह भी बताएं कि यह विकास की प्रक्रिया में कैसे मदद करता है.

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