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Detailed Chapter 14 पादप ऊतक तंत्र RBSE Solutions for Class 11 Biology
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Class 11 Biology Chapter 14 पादप ऊतक तंत्र RBSE Solutions PDF
Rbse Class 11 Biology Chapter 14 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न
Rbse Class 11 Biology Chapter 14 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. अधिचर्म ऊतक तंत्र की उत्पत्ति होती है -
(अ) रंभजन से
(ब) त्वचाजन से
(स) वल्कुटजन से
(द) कैल्पिट्रोजन से
Answer: (ब) त्वचाजन से
In simple words: अधिचर्म ऊतक तंत्र, जो पौधों की बाहरी परत बनाता है, त्वचाजन नामक ऊतक से बनता है. यह त्वचाजन ही पौधों में बाहरी सुरक्षा कवच बनाने का काम करता है.
🎯 Exam Tip: पादप ऊतक तंत्र की उत्पत्ति के लिए विभिन्न मेरिस्टेमों के नाम और उनके कार्यों को याद रखें.
Question 2. पत्तियों की दोनों सतहों पर रंध्र पाये जाते हैं -
(अ) एकबीजपत्री पादपों में
(ब) मरुद्भिदों में
Answer: (अ) एकबीजपत्री पादपों में
In simple words: एकबीजपत्री पौधों की पत्तियों की दोनों तरफ छेद (रंध्र) होते हैं. ये छेद पौधों को हवा लेने और पानी छोड़ने में मदद करते हैं.
🎯 Exam Tip: रंध्रों की उपस्थिति और वितरण विभिन्न प्रकार के पौधों (जैसे एकबीजपत्री, द्विबीजपत्री, जलीय) के अनुकूलन का एक महत्वपूर्ण पहलू है.
Question 3.
(अ) लिग्निन
(ब) पेक्टिन
(स) सुबेरिन
(द) सेल्यूलोस
Answer: (स) सुबेरिन
In simple words: प्रश्न 3 का सही विकल्प 'सुबेरिन' है. यह एक ऐसा पदार्थ है जो पौधों में विशेष स्थानों पर पाया जाता है, जो जलरोधी होता है.
🎯 Exam Tip: सुबेरिन और लिग्निन जैसे पदार्थों के रासायनिक गुणों और पौधों में उनके कार्यों को समझना महत्वपूर्ण है.
Question 4. अधिचर्म व अंतस्त्वचा के बीच का क्षेत्र होता है -
(अ) संवहन क्षेत्र
(ब) वल्कुट क्षेत्र
(स) रंभ क्षेत्र
(द) जाइलम क्षेत्र
Answer: (ब) वल्कुट क्षेत्र
In simple words: पौधे में अधिचर्म (सबसे बाहरी परत) और अंतस्त्वचा (अंदर की परत) के बीच की जगह को वल्कुट क्षेत्र कहते हैं. यह क्षेत्र पौधों में भोजन संग्रह और अन्य काम करता है.
🎯 Exam Tip: पौधों के विभिन्न ऊतक परतों (जैसे अधिचर्म, वल्कुट, अंतस्त्वचा, रंभ) के स्थान और कार्यों को याद रखें.
Question 5. मज्जा व मज्जा रश्मियाँ किस ऊतक की बनी होती हैं
(अ) मृदूतक
(ब) स्थूलकोण ऊतक
(स) जाइलम
(द) दृढ़ोतक
Answer: (अ) मृदूतक
In simple words: पौधे के तने के केंद्र में मज्जा और उससे निकलने वाली मज्जा रश्मियाँ, मृदूतक नामक सरल ऊतक से बनी होती हैं. मृदूतक कोशिकाओं का मुख्य काम भोजन जमा करना है.
🎯 Exam Tip: सरल ऊतकों (मृदूतक, स्थूलकोण ऊतक, दृढ़ोतक) की संरचना और उनके मुख्य कार्यों पर ध्यान दें.
Question 6. ऐसा संवहन पूल जिसमें जाइलम व फ्लोएम अलग त्रिज्या पर हो कहलाता है -
(अ) अरीय
(ब) संयुक्त
(स) संकेन्द्री
(द) उभय फ्लोएमी
Answer: (अ) अरीय
In simple words: जब जाइलम और फ्लोएम (जो पौधे में पानी और भोजन पहुंचाते हैं) एक ही वृत्त पर अलग-अलग जगहों पर होते हैं, तो इसे अरीय संवहन पूल कहते हैं. यह जड़ों में पाया जाता है.
🎯 Exam Tip: विभिन्न प्रकार के संवहन पूलों (अरीय, संयुक्त, संकेन्द्री) की संरचना और उनके पाए जाने वाले स्थानों को जानें.
Question 7. फ्लोएम केन्द्री संवहन पूल पाये जाते हैं -
(अ) डेसीना में
(ब) पर्णागों में
Answer: (अ) डेसीना में
In simple words: फ्लोएम केन्द्री संवहन पूल एक खास तरह का पूल होता है जिसमें फ्लोएम बीच में होता है और जाइलम उसे घेरे रहता है. यह पूल डेसीना जैसे पौधों में मिलता है.
🎯 Exam Tip: संकेन्द्री संवहन पूलों के प्रकार (जाइलम केन्द्री और फ्लोएम केन्द्री) और उनके उदाहरणों को याद रखें.
Question 8.
(अ) वृक्काकार द्वार कोशिका वाले
(ब) सेम के बीज की आकृति वाले
(स) डुगडुगी या डम्बल जैसी द्वार कोशिकाओं वाले
(द) धंसे हुए रंध्र
Answer: (स) डुगडुगी या डम्बल जैसी द्वार कोशिकाओं वाले
In simple words: प्रश्न 8 का सही विकल्प 'डुगडुगी या डम्बल जैसी द्वार कोशिकाओं वाले' है. यह एक विशिष्ट प्रकार की द्वार कोशिका का आकार है जो कुछ पौधों में रंध्रों के आसपास पाई जाती है.
🎯 Exam Tip: विभिन्न पौधों में द्वार कोशिकाओं के आकार और उनके प्रकार (वृक्काकार, डम्बल आकार) को पहचानना सीखें.
Question 9. मरुद्भिद पादपों में रंध्र होते हैं -
(अ) डुगी - डुगी की आकृति वाले
(ब) सेम के बीज जैसे आकृति वाले
(स) उभरे हुये
(द) धंसे हुए
Answer: (द) धंसे हुए
In simple words: मरुस्थल में उगने वाले पौधों में पानी बचाने के लिए उनके रंध्र (छोटे छेद) पत्ती की सतह में अंदर की ओर धंसे हुए होते हैं. यह उन्हें गर्मी और सूखे से बचाता है.
🎯 Exam Tip: मरुद्भिद पौधों में जल संरक्षण के लिए पाए जाने वाले विभिन्न अनुकूलन (जैसे धंसे हुए रंध्र, मोटी क्यूटिकल) को समझें.
Question 10. अधिचर्म में नहीं पाये जाते हैं -
(अ) रंध्र
(ब) अन्तराकोशिक स्थल
(स) उपत्वचा
(द) त्वचारोम
Answer: (ब) अन्तराकोशिक स्थल
In simple words: अधिचर्म (पौधे की बाहरी परत) की कोशिकाओं के बीच कोई खाली जगह नहीं होती है. ऐसा इसलिए होता है ताकि बाहरी आक्रमणों और पानी के नुकसान से बेहतर बचाव हो सके.
🎯 Exam Tip: अधिचर्म की संरचना और कोशिकाओं के बीच अन्तराकोशिक स्थल की अनुपस्थिति के महत्व को जानें.
Rbse Class 11 Biology Chapter 14 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. ऊतक तंत्र कितने प्रकार के होते हैं ? नाम लिखिए।
Answer: ऊतक तंत्र तीन प्रकार के होते हैं -
1. अधिचर्मी या बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र
2. भरण ऊतक तंत्र तथा
3. संवहन ऊतक तंत्र
ये सभी तंत्र मिलकर पौधे के शरीर में विभिन्न कार्य करते हैं. हर एक तंत्र की अपनी विशेष भूमिका होती है, जैसे सुरक्षा या परिवहन.
In simple words: ऊतक तंत्र तीन तरह के होते हैं: अधिचर्मी (बाहरी परत), भरण (अंदरूनी काम) और संवहन (पानी-भोजन पहुंचाना).
🎯 Exam Tip: तीनों प्रकार के ऊतक तंत्रों के नाम और उनके मुख्य कार्यों को संक्षेप में याद रखें.
Question 2. ऊतक तंत्र कितने प्रकार के होते हैं ? नाम लिखिए।
Answer: ऊतक तंत्र तीन प्रकार के होते हैं -
1. अधिचर्मी या बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र
2. भरण ऊतक तंत्र तथा
3. संवहन ऊतक तंत्र
ये सभी तंत्र मिलकर पौधे के शरीर में विभिन्न कार्य करते हैं. हर एक तंत्र की अपनी विशेष भूमिका होती है, जैसे सुरक्षा या परिवहन.
In simple words: ऊतक तंत्र तीन तरह के होते हैं: अधिचर्मी (बाहरी परत), भरण (अंदरूनी काम) और संवहन (पानी-भोजन पहुंचाना).
🎯 Exam Tip: तीनों प्रकार के ऊतक तंत्रों के नाम और उनके मुख्य कार्यों को संक्षेप में याद रखें.
Question 3. एधा किस प्रकार के संवहन पूलों में पायी जाती है ?
Answer: एधा संपार्श्विक (colletral) और द्विसंपार्श्विक (bicollateral) वर्धी (open) संवहन पूलों में पायी जाती है. यह एधा ही पौधे को मोटाई में बढ़ने में मदद करती है, जिससे द्वितीयक वृद्धि होती है.
In simple words: एधा उन संवहन पूलों में होती है जो खुले होते हैं, जैसे संपार्श्विक और द्विसंपार्श्विक पूल. यह पौधों को मोटा होने में मदद करती है.
🎯 Exam Tip: एधा की उपस्थिति और अनुपस्थिति के आधार पर संवहन पूलों के खुले (वर्धी) और बंद (अवर्धी) प्रकारों को जानें.
Question 4. रंध्रयंत्र के. कौन-कौन से घटक हैं ?
Answer: रंध्र छिद्र, द्वार कोशिकाएँ और सहायक कोशिकाएँ मिलकर रंध्रयंत्र या रंध्र उपकरण (stomatal apparatus) बनाती हैं. ये तीनों मिलकर पौधों में गैसों के आदान-प्रदान और वाष्पोत्सर्जन को नियंत्रित करते हैं.
In simple words: रंध्रयंत्र में तीन चीजें होती हैं: रंध्र का छेद, उसे खोलने-बंद करने वाली द्वार कोशिकाएँ और उनकी मदद करने वाली सहायक कोशिकाएँ.
🎯 Exam Tip: रंध्रयंत्र के तीनों घटकों के नाम और उनके कार्यों को स्पष्ट रूप से याद रखें.
Question 5. मार्ग कोशिकाएँ कहाँ मिलती हैं ?
Answer: मार्ग कोशिकाएँ अंतस्त्वचा में मिलती हैं. ये अंतस्त्वचा की मोटी भित्ति वाली कोशिकाओं के बीच कुछ पतली भित्ति वाली कोशिकाएँ होती हैं, जो प्रोटोजाइलम के सामने स्थित होती हैं. ये कोशिकाएँ पानी को संवहन ऊतकों तक पहुंचाने में मदद करती हैं.
In simple words: मार्ग कोशिकाएँ अंतस्त्वचा में मिलती हैं. ये पतली दीवारों वाली कोशिकाएँ होती हैं जो पानी को अंदर जाने देती हैं.
🎯 Exam Tip: मार्ग कोशिकाओं के स्थान (अंतस्त्वचा में, प्रोटोजाइलम के सामने) और उनके कार्य (जल परिवहन) पर ध्यान दें.
Question 6. संयुक्त संवहन पूल किसे कहते हैं ?
Answer: जब जाइलम और फ्लोएम एक ही त्रिज्या पर होते हैं और आपस में मिलकर संवहन पूल बनाते हैं, तो इसे संयुक्त संवहन पूल कहते हैं. यह पौधों के तनों में आमतौर पर पाया जाता है.
In simple words: जब जाइलम और फ्लोएम एक ही लाइन में एक साथ मिलते हैं, तो उसे संयुक्त संवहन पूल कहते हैं.
🎯 Exam Tip: संयुक्त संवहन पूल की परिभाषा और यह अरीय संवहन पूल से कैसे भिन्न है, इसे स्पष्ट रूप से जानें.
Question 7. अपकेन्द्री जाइलम किसे कहते हैं ?
Answer: जब जाइलम का विकास अक्ष के केंद्रीय भाग से शुरू होकर बाहर की ओर होता है, तो इस प्रकार के विकास को अपकेन्द्री (centrifugal) जाइलम या परिवर्धन कहते हैं. इसमें प्रोटोज़ाइलम केंद्र से दूर और मेटाज़ाइलम केंद्र के पास होता है.
In simple words: जब जाइलम अंदर से बाहर की ओर बढ़ता है, तो उसे अपकेन्द्री जाइलम कहते हैं.
🎯 Exam Tip: जाइलम के विकास के प्रकारों (अभिकेन्द्री, अपकेन्द्री, मध्यादिदारुक) को उनके प्रोटोज़ाइलम और मेटाज़ाइलम की स्थिति के साथ याद रखें.
Question 8. प्रथम निर्मित जाइलम का क्या नाम है ?
Answer: अंतस्त्वचा की कोशिकाओं में जब मंड कणों की उपस्थिति होती है तो इसे मंड आच्छद (starch sheath) कहते हैं. यह परत पौधे में भोजन भंडारण का काम करती है.
In simple words: जब अंतस्त्वचा की कोशिकाओं में मंड जमा होता है, तो उसे मंड आच्छद कहते हैं. यह मंड जमा करने का काम करती है.
🎯 Exam Tip: मंड आच्छद की परिभाषा और पौधे में इसके कार्य को संक्षेप में स्पष्ट करें.
Rbse Class 11 Biology Chapter 14 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. ऊतक तंत्र की परिभाषा लिखिये।
Answer: किसी विशेष कार्य को करने के लिए अनेक ऊतक (जिनका उद्गम भी समान होता है) मिलकर एक इकाई की तरह कार्य करते हैं. ऊतकों के ऐसे समूह को ऊतक तंत्र कहते हैं. ये ऊतक तंत्र पौधे के जीवित रहने और बढ़ने के लिए आवश्यक विभिन्न कार्यों को कुशलता से करते हैं.
In simple words: एक जैसे काम करने वाले कई ऊतकों के समूह को ऊतक तंत्र कहते हैं.
🎯 Exam Tip: ऊतक तंत्र की परिभाषा में 'समान उद्गम' और 'एक विशेष कार्य' शब्दों को शामिल करना सुनिश्चित करें.
Question 2. बुलीफार्म कोशिकाएँ कहाँ पाई जाती हैं ? इनका क्या कार्य है ?
Answer: कुछ पौधों, खासकर एकबीजपत्री पौधों की पत्तियों में कुछ ऊपरी अधिचर्म कोशिकाएँ फूली हुई होती हैं. इन्हें बुलीफार्म कोशिकाएँ कहते हैं. ये कोशिकाएँ जल संग्रह कर फूल जाती हैं, जिससे पत्तियाँ खुल जाती हैं. जैसे ही ये कोशिकाएँ जल छोड़ती हैं, पत्तियाँ मुड़कर बंद हो जाती हैं. उदाहरण के लिए, ये ग्रेमेनी कुल के पादपों की पत्तियों में मिलती हैं, जहां वे पानी की कमी के दौरान पत्ती को मोड़ने में मदद करती हैं, जिससे वाष्पोत्सर्जन कम होता है.
In simple words: बुलीफार्म कोशिकाएँ एकबीजपत्री पौधों की पत्तियों में होती हैं. जब इनमें पानी भरता है तो पत्तियाँ खुलती हैं, और जब पानी कम होता है तो पत्तियाँ मुड़कर बंद हो जाती हैं ताकि पानी बच सके.
🎯 Exam Tip: बुलीफार्म कोशिकाओं के स्थान (एकबीजपत्री पत्तियों में), संरचना (फूली हुई) और कार्य (जल संतुलन, पत्ती का मुड़ना) को स्पष्ट रूप से समझाएं.
Question 3. बाह्य आदिदारुक व अन्तः आदिदारुक में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer:
| बाह्य आदिदारुक (Exarch) | अन्तः आदिदारुक (Endarch) |
|---|---|
| 1. यह स्थिति जड़ के संवहन पूल में पाई जाती है. | 1. स्तम्भ में पाई जाती है. |
| 2. इनमें आदिदारु (Protoxylem) बाहर की ओर तथा अनुदारु (Metaxylem) अन्दर की ओर स्थित होते हैं. | 2. आदिदारु अन्दर की ओर तथा अनुदारु बाहर की ओर स्थित होते हैं. |
| 3. दारु का विकास बाहर से अन्दर की ओर अग्रसर होता है. | 3. विकास अन्दर से बाहर की ओर अग्रसर होता है. |
In simple words: बाह्य आदिदारुक जड़ों में होता है, जहाँ छोटे जाइलम बाहर होते हैं. अन्तः आदिदारुक तनों में होता है, जहाँ छोटे जाइलम अंदर होते हैं.
🎯 Exam Tip: बाह्य और अन्तः आदिदारुक के बीच के अंतर को स्पष्ट करने के लिए उनके पाए जाने वाले स्थान और प्रोटोज़ाइलम-मेटाज़ाइलम की सापेक्ष स्थिति पर ध्यान दें.
Question 5. प्रोटोजाइलम तथा मेटाजाइलम में विभेद कीजिए।
Answer:
| आदिदारु (Protoxylem) | अनुदारु (Metaxylem) |
|---|---|
| 1. यह पौधों के अपरिपक्क भागों में पहले बनने वाला जाइलम है. | 1. यह पौधों के विकसित भागों में आदिदारु के बाद बनता है. |
| 2. यह पौधे के विभिन्न भागों के विकसित होने से पहले परिपक्व हो जाता है. | 2. यह पौधे के विभिन्न भागों के विकसित होने के बाद परिपक्व होता है. |
| 3. आदिदारु की कोशिकाओं के विकसित होने पर चारों तरफ विकसित हो रही कोशिकाएँ दबाव डालती हैं. | 3. इसमें ऐसा नहीं होता है. |
| 4. इसमें टाइलोसिस (tylosis) व तन्तु नहीं मिलते हैं. | 4. इसमें टाइलोसिस व तन्तु मिलते हैं. |
| 5. इसमें कोशिकाभित्ति पर लिग्निन का स्थूलन वलयाकार व सर्पिलाकार होता है. | 5. इसमें जालिकावत तथा गर्ती स्थूलन मिलते हैं. |
In simple words: प्रोटोज़ाइलम वह जाइलम है जो पौधे में पहले बनता है और छोटा होता है, जबकि मेटाज़ाइलम बाद में बनता है और बड़ा होता है. प्रोटोज़ाइलम अपरिपक्व हिस्सों में होता है और मेटाज़ाइलम विकसित हिस्सों में.
🎯 Exam Tip: प्रोटोज़ाइलम और मेटाज़ाइलम के बीच के मुख्य अंतर (समय, स्थान, आकार, स्थूलन का प्रकार) को याद रखें.
Rbse Class 11 Biology Chapter 14 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 7. बाह्यत्वचीय अधिवृद्धियाँ कौन-कौन सी होती हैं ?
Answer: अनेक पौधों में अधिचर्म की कोशिकाएँ त्वचारोम (trichomes) उत्पन्न करती हैं. इनमें मुख्यरूप से मूल अधिचर्म कोशिकाओं से एक कोशिकीय मूलरोम, तने, पत्तियों व पुष्पों के विभिन्न भागों व फलों पर उपस्थित एक या बहुकोशिक रोम स्तम्भ रोम व शल्क उत्पन्न करते हैं. मूल रोम जल अवशोषण का कार्य करते हैं तथा अन्य रोम वाष्पोत्सर्जन कम करने, आर्द्रता ग्रहण कर नमी या आर्द्रता बनाये रखने व संरक्षण प्रदान करने का कार्य करते हैं. ये पौधे को बाहरी वातावरण से सुरक्षा भी प्रदान करते हैं.
In simple words: बाह्यत्वचीय अधिवृद्धियाँ पौधों की बाहरी परत पर उगने वाली संरचनाएँ हैं, जैसे मूलरोम और त्वचारोम. मूलरोम पानी सोखते हैं, और त्वचारोम पानी बचाने और सुरक्षा का काम करते हैं.
🎯 Exam Tip: त्वचारोम और मूलरोम दोनों के प्रकार (एककोशिकीय, बहुकोशिकीय) और उनके विशिष्ट कार्यों (अवशोषण, वाष्पोत्सर्जन नियंत्रण, सुरक्षा) को विस्तार से बताएं.
Question 8. मरुद्भिद पादपों में रंध्र धंसे हुए क्यों होते हैं ?
Answer: मरुस्थल की वनस्पति को कम जल प्राप्त होता है तथा तापक्रम की अधिकता होने से गर्म व शुष्क हवाएँ चलती हैं. मरुद्भिद द्विबीजपत्री की पर्ण में निचली सतह पर अधिक से अधिक रंध्र उपस्थित होते हैं. इनकी पर्ण की निचली सतह में गर्त बन जाते हैं तथा इन गर्गों में रंध्र पाये जाते हैं, इन्हें गर्तीयरंध्र (sunken stomata) कहते हैं, उदाहरण - कनेर की पर्ण. इन्हीं गर्गों में अधिक संख्या में रोम भी पाये जाते हैं जो रंध्रों को ढके रखते हैं. इस स्थिति के कारण रंध्र शुष्क हवा के सम्पर्क में कम आते हैं व रोम भी इनकी रक्षा करते हैं. अतः इन पर्णों के द्वारा वाष्पोत्सर्जन क्रिया में कम से कम जल की हानि होती है व पौधा प्रतिकूल परिस्थिति में भी जीवित रहता है. यह एक महत्वपूर्ण अनुकूलन है जो इन पौधों को शुष्क वातावरण में जीवित रहने में मदद करता है.
In simple words: मरुस्थल के पौधों में रंध्र पत्ती की सतह के अंदर धंसे होते हैं ताकि वे गर्म और सूखी हवा से बचे रहें और कम पानी गंवाएं. रोम भी रंध्रों को ढककर पानी बचाने में मदद करते हैं.
🎯 Exam Tip: मरुद्भिद पौधों में पानी बचाने के लिए धंसे हुए रंध्रों की भूमिका और रोमों के सुरक्षात्मक कार्य को विस्तार से समझाएं.
Question 3. निम्नांकित में अन्तर बताइये –
(i) अरीय, संयुक्त व संकेन्द्री संवहन पूल
(ii) जाइलम व फ्लोयम
Answer:
(i) अरीय, संयुक्त व संकेन्द्री संवहन पूलों में अन्तर -
| अरीय संवहन पूल | संयुक्त संवहन पूल | संकेन्द्री संवहन पूल |
|---|---|---|
| जाइलम व फ्लोएम अलग-अलग त्रिज्याओं पर एकान्तर क्रम में व्यवस्थित होते हैं. | जाइलम व फ्लोएम एक ही त्रिज्या पर होते हैं तथा दोनों मिलकर संवहन पूल बनते हैं. | इनमें जाइलम व फ्लोएम दोनों एक संवहन पूल में होते हैं किन्तु इन दोनों में से एक केन्द्र में तथा दूसरा बाह्य होता है. |
| ये अवर्षी होते हैं. | ये वर्धी होते हैं किन्तु एकबीजपत्री तने में अवर्षी होते हैं. | अवधी होते हैं. |
| जाइलम परिवर्धन बाह्यआदिदारुक (exarch) या अभिकेन्द्री (centripetal) होता है. | जाइलम परिवर्धन अन्तः आदिदारुक (endarch) या अपकेन्द्री (centrifugal) होता है. | इनमें मध्यादिदारुक (mesarch) तथा विभेदन दोनों प्रकार का अभिकेन्द्री या अपकेन्द्री होता है. |
(ii) जाइलम व फ्लोयम में अन्तर (Differences in Xylem and Phloem) -
| जाइलम (Xylem) | फ्लोयम (Phloem) |
|---|---|
| 1. यह जटिल व कठोर ऊतक है. | 1. यह जटिल व कोमल ऊतक है. |
| 2. यह जल संवाहक ऊतक (water conducting tissue) है. | 2. यह खाद्य पदार्थ संवाहक ऊतक है. |
| 3. इसमें संवहन का मार्ग पौधे में नीचे से ऊपर का होता है. | 3. संवहन का मार्ग ऊपर से नीचे की ओर होता है. |
| 4. इसमें चार घटक होते हैं – वाहिनिकाएँ, वाहिकाएँ, काष्ठ मृदूतक तथा काष्ठ तन्तु. | 4. इसमें भी चार घटक होते हैं-चालनी नलिकाएँ, सहकोशिकायें, फ्लोयम मृदूतक तथा फ्लोयम तन्तु. |
| 5. इनमें चार घटकों में से केवल काष्ठ मृदूतक सजीव होते हैं व शेष तीन मृत ऊतक होती है. | 5. इसमें भी चार घटकों में से फ्लोयम तन्तु मृत होते हैं शेष तीनों घटक सजीव होते हैं. |
In simple words: अरीय पूल में जाइलम और फ्लोएम अलग-अलग जगहों पर होते हैं, संयुक्त पूल में वे एक साथ एक लाइन में होते हैं, और संकेन्द्री पूल में एक ऊतक बीच में होता है और दूसरा उसे घेरता है. जाइलम पानी पहुंचाता है और फ्लोएम भोजन पहुंचाता है.
🎯 Exam Tip: तीनों प्रकार के संवहन पूलों की संरचनाओं को चित्रों के माध्यम से समझें, और जाइलम व फ्लोएम के घटकों व कार्यों के अंतर को ध्यानपूर्वक याद करें.
Question 3. निम्नांकित में अन्तर बताइये – (i) अरीय, संयुक्त व संकेन्द्री संवहन पूल (ii) जाइलम व फ्लोयम
Answer:
(i) **जाइलम (Xylem):**
सबसे पहले बनने वाली जाइलम कोशिकाओं को आदिदारु (Protoxylem) कहते हैं। ये कोशिकाएं छोटी और पतली होती हैं। बाद में बनने वाले जाइलम को अनुदारु (Metaxylem) कहते हैं। ये कोशिकाएं आदिदारु से लंबी और चौड़ी होती हैं। जाइलम का विकास तीन तरीकों से हो सकता है:
(अ) **बाह्यआदिदारुक (Exarch):** इसमें जाइलम का विकास तने या जड़ के बाहर से केंद्र की ओर होता है। इसका मतलब है कि आदिदारु (Protoxylem) बाहर की तरफ होता है। इस तरह के विकास को अभिकेन्द्री (centripetal) परिवर्धन कहते हैं। यह आमतौर पर जड़ों में पाया जाता है। बाह्यआदिदारुक विकास जड़ों में पानी के कुशल परिवहन में मदद करता है।
(ब) **अन्तः आदिदारुक (Endarch):** इसमें जाइलम का विकास केंद्र से बाहर की ओर होता है। इसका मतलब है कि आदिदारु (Protoxylem) केंद्र की तरफ होता है। इस तरह के विकास को अपकेन्द्री (centrifugal) परिवर्धन कहते हैं। यह आमतौर पर तनों में पाया जाता है। अंतःआदिदारुक विकास तने के भीतर पानी के वितरण के लिए महत्वपूर्ण है।
(स) **मध्यादिदारुक (Mesarch):** जब आदिदारु (Protoxylem) अनुदारु (Metaxylem) से चारों तरफ से घिरा होता है, या जब जाइलम का विकास दोनों दिशाओं (केंद्र की ओर और बाहर की ओर) में होता है, तो इसे मध्यादिदारु परिवर्धन कहते हैं। यह फर्न (Ferns) और पत्तियों में देखा जाता है। मध्यादिदारु व्यवस्था विभिन्न वृद्धि स्थितियों के अनुकूल होकर लचीली जल आपूर्ति प्रदान करती है।
(ii) **फ्लोयम (Phloem):**
सबसे पहले बनने वाले फ्लोयम को आदिपोषवाह या प्रोटोफ्लोयम (Protophloem) कहते हैं। बाद में बनने वाले फ्लोयम को अनुपोषवाह या मेटाफ्लोयम (Metaphloem) कहते हैं। प्रोटोफ्लोयम और मेटाफ्लोयम पौधे की वृद्धि के साथ शर्करा के परिवहन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
(iii) **एधा (Cambium):**
एधा जाइलम और फ्लोयम के बीच में होती है। यह प्राथमिक विभज्योतक ऊतक से बनी होती है। इसकी कोशिकाएँ आयताकार और पतली दीवारों वाली होती हैं। यह पौधों में साइड में पाई जाती है। जब एधा मौजूद होती है, तो संवहन पूल को वर्धा (खुला) कहा जाता है। एधा एक महत्वपूर्ण वृद्धि ऊतक है जो पौधों को चौड़ाई में बढ़ने में सक्षम बनाता है।
**(ब) संयुक्त संवहन पूल (Conjoint vascular bundles):**
संयुक्त संवहन पूल वे होते हैं जहाँ जाइलम और फ्लोयम एक ही त्रिज्या (लाइन) पर होते हैं। ये मिलकर एक संवहन पूल बनाते हैं। ये ज्यादातर तनों में पाए जाते हैं और दो प्रकार के होते हैं:
1. **बहिःफ्लोयमी या संपार्शिवक (Collateral):** ये ज्यादातर पौधों के तनों में पाए जाते हैं। इनमें जाइलम केंद्र की तरफ और फ्लोयम बाहर की तरफ होता है। द्विबीजपत्री तनों में इनमें एधा (cambium) होती है (इसलिए ये खुले होते हैं), जबकि एकबीजपत्री तनों में एधा नहीं होती (इसलिए ये बंद होते हैं)। संपार्शिवक बंडल यह सुनिश्चित करते हैं कि पानी आंतरिक रूप से और भोजन बाहरी रूप से वितरित हो, जो अधिकांश तनों के लिए विशिष्ट है।
2. **उभयफ्लोयमी या द्विसंपार्शिवक (Bicollateral):** इन संवहन पूलों में जाइलम के दोनों तरफ (केंद्र और परिधि की तरफ) फ्लोयम होता है। ये हमेशा वर्धा (खुले) होते हैं, मतलब इनमें एधा होती है। इनका क्रम बाहरी फ्लोयम, बाहरी एधा, जाइलम, भीतरी एधा और भीतरी फ्लोयम होता है। ये आमतौर पर कुकरबिटेसी (कद्दू परिवार) के पौधों में पाए जाते हैं। उभयफ्लोयमी बंडल अतिरिक्त परिवहन क्षमता प्रदान करते हैं, जो अक्सर उच्च चयापचय दर वाले पौधों में पाए जाते हैं।
**(स) संकेन्द्री (Concentric):**
संकेन्द्री संवहन पूल दो प्रकार के होते हैं:
1. **जाइलम केन्द्री या दारुकेन्द्री (Amphicribal):** इसमें जाइलम केंद्र में होता है और फ्लोयम उसे चारों तरफ से घेरे रहता है। यह फर्न जैसे कुछ पौधों में पाया जाता है। एम्फिस्क्रिबल बंडल यह सुनिश्चित करते हैं कि केंद्रीय जल-संचालन जाइलम भोजन-संचालन फ्लोयम द्वारा अच्छी तरह से संरक्षित रहे।
2. **फ्लोयम केन्द्री या पोषवाहकेन्द्री (Amphivasal):** इसमें फ्लोयम केंद्र में होता है और जाइलम उसे चारों तरफ से घेरे रहता है। यह युक्का (Yucca) और ड्रेसीना (Dracaena) जैसे पौधों में पाया जाता है। संकेन्द्री पूलों में कभी भी एधा नहीं होती, इसलिए ये हमेशा अवर्धा (बंद) होते हैं। एम्फिवसाल बंडल केंद्रीय भोजन-संचालन फ्लोयम की रक्षा करते हैं, जो युक्का जैसे पौधों में आम है।
In simple words: जाइलम पानी पहुंचाता है और फ्लोयम भोजन। जाइलम तीन तरह से विकसित होता है: बाहर से अंदर (जड़ों में), अंदर से बाहर (तनों में), या दोनों तरफ से (फर्न में)। संवहन पूल जाइलम और फ्लोयम के एक साथ होने के तरीके हैं। संयुक्त पूल में जाइलम और फ्लोयम एक ही लाइन में होते हैं (जैसे तनों में), जबकि संकेन्द्री पूल में एक ऊतक दूसरे को पूरी तरह से घेरे रहता है।
🎯 Exam Tip: जब भी आप संवहन पूलों का वर्णन करें, तो हमेशा जाइलम, फ्लोयम और एधा की सापेक्ष स्थिति पर ध्यान दें। यह इन संरचनाओं के प्रकार को निर्धारित करने वाला मुख्य कारक है।
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