RBSE Solutions Class 10 Social Science Chapter 3 अंग्रेजी साम्राज्य का प्रतिकार एवं सं

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Detailed Chapter 3 अंग्रेजी साम्राज्य का प्रतिकार एवं सं RBSE Solutions for Class 10 Social Science

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Class 10 Social Science Chapter 3 अंग्रेजी साम्राज्य का प्रतिकार एवं सं RBSE Solutions PDF

अंग्रेजी साम्राज्य का प्रतिकार एवं संघर्ष अति लघूत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

 

Question 1. ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना कब हुई थी?
Answer: ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 23 सितंबर, 1600 ईस्वी को हुई थी। यह कंपनी भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से बनाई गई थी, और इसने धीरे-धीरे भारतीय राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत कर ली।
In simple words: ईस्ट इंडिया कंपनी 23 सितंबर, 1600 को बनी थी।

🎯 Exam Tip: तिथि-आधारित प्रश्नों में, सही दिनांक और वर्ष दोनों का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. सुर्जीगाँव की संधि कब और किसके मध्य हुई?
Answer: सुर्जीगाँव की संधि 1803 ईस्वी में हुई थी। यह संधि अंग्रेजों और सिंधिया के शासकों के बीच हुई थी, जिसने मराठा साम्राज्य के पतन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
In simple words: यह संधि 1803 में अंग्रेजों और सिंधिया के बीच हुई।

🎯 Exam Tip: संधियों से संबंधित प्रश्नों में, सही वर्ष और शामिल पक्षों को याद रखना आवश्यक है।

 

Question 3. टीपू सुल्तान कहाँ का शासक था?
Answer: टीपू सुल्तान मैसूर राज्य का शासक था। वह अपने पिता, हैदर अली के बाद मैसूर की गद्दी पर बैठा और अंग्रेजों के खिलाफ अपने साहसी संघर्ष के लिए 'मैसूर का शेर' कहलाया।
In simple words: टीपू सुल्तान मैसूर का शासक था।

🎯 Exam Tip: ऐतिहासिक व्यक्तियों से संबंधित प्रश्नों में, उनके मूल स्थान या शासन क्षेत्र का सटीक उल्लेख करें।

 

Question 4. अमृतसर की संधि कब हुई?
Answer: अमृतसर की संधि 25 अप्रैल, 1809 ईस्वी को हुई थी। यह संधि महाराजा रणजीत सिंह और ब्रिटिश अंग्रेजों के बीच संपन्न हुई थी, जिसने सतलुज नदी को दोनों के बीच सीमा के रूप में स्थापित किया।
In simple words: यह संधि 25 अप्रैल, 1809 को रणजीत सिंह और अंग्रेजों के बीच हुई।

🎯 Exam Tip: ऐतिहासिक संधियों के लिए, तिथि, वर्ष और संबंधित पक्षों की जानकारी सटीक होनी चाहिए।

 

Question 5. संन्यासी अंग्रेजों से क्यों नाराज थे?
Answer: संन्यासी अंग्रेजों से इसलिए नाराज थे क्योंकि अंग्रेजों ने तीर्थ स्थानों पर उनके आने-जाने पर रोक लगा दी थी। इस प्रतिबंध के कारण संन्यासियों में बहुत गुस्सा था, जिसने 18वीं सदी के अंत में एक बड़े विद्रोह को जन्म दिया।
In simple words: अंग्रेजों ने तीर्थ स्थानों पर संन्यासियों के आने पर रोक लगा दी थी, जिससे वे नाराज हो गए।

🎯 Exam Tip: विद्रोह के कारणों को बताते समय, मुख्य कारण को स्पष्ट रूप से लिखें और संक्षेप में समझाएं।

 

Question 8. व्यक्तिगत सत्याग्रह के प्रथम सत्याग्रही कौन थे?
Answer: व्यक्तिगत सत्याग्रह के प्रथम सत्याग्रही आचार्य विनोबा भावे थे। गांधीजी ने 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू किया था, जिसमें विनोबा भावे को अहिंसक प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में पहले सत्याग्रही के रूप में चुना गया।
In simple words: विनोबा भावे व्यक्तिगत सत्याग्रह के पहले नेता थे।

🎯 Exam Tip: आंदोलनों के प्रमुख नेताओं के नाम और उनकी भूमिका को याद रखें।

 

Question 9. बेगू का किसान आंदोलन कब प्रारंभ हुआ?
Answer: बेगू का किसान आंदोलन 1921 ईस्वी में शुरू हुआ था। यह आंदोलन राजस्थान के बेगू क्षेत्र में किसानों द्वारा ब्रिटिश नीतियों और सामंती अत्याचारों के खिलाफ चलाया गया था, जो बिजौलिया आंदोलन से प्रेरित था।
In simple words: बेगू किसान आंदोलन 1921 में शुरू हुआ था।

🎯 Exam Tip: किसान आंदोलनों के प्रश्नों में, प्रारंभ वर्ष और क्षेत्र का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

 

अंग्रेजी साम्राज्य का प्रतिकार एवं संघर्ष लघूत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

 

Question 1. प्रथम अंग्रेज मराठा संघर्ष का उल्लेख कीजिए।
Answer: प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध 1775 से 1782 ईस्वी के बीच लड़ा गया। इस युद्ध में ब्रिटिश सेना को संगठित मराठा सेना ने हरा दिया। इसके बाद 29 जनवरी, 1779 ईस्वी को बड़गाँव की अपमानजनक संधि पर हस्ताक्षर करने पड़े, जिसमें अंग्रेजों द्वारा मराठों से जीते गए क्षेत्र वापस लौटाने पड़े, रघुनाथ राव को पूना दरबार को सौंपना पड़ा, और अंग्रेजों को 41,000 रुपये युद्ध क्षतिपूर्ति के रूप में देने पड़े। इस युद्ध ने ब्रिटिश प्रभुत्व की सीमाओं को उजागर किया।
In simple words: पहला आंग्ल-मराठा युद्ध 1775 से 1782 तक चला, जिसमें अंग्रेजों को हार मिली और उन्हें 1779 में बड़गाँव की संधि करनी पड़ी।

🎯 Exam Tip: युद्धों के परिणामों और संधियों के महत्वपूर्ण प्रावधानों को याद रखना आवश्यक है।

 

Question 2. चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध के क्या परिणाम निकले?
Answer: 1798 ईस्वी में लॉर्ड वेलेजली ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर-जनरल बनकर भारत आए। उनका मुख्य लक्ष्य टीपू सुल्तान को पूरी तरह हराना या उसे अपने अधीन करना था। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए वेलेजली ने सहायक संधि का प्रस्ताव रखा, लेकिन टीपू सुल्तान ने इसे मानने से इनकार कर दिया। अप्रैल 1799 में अंग्रेजों ने टीपू के खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया। 4 मई, 1799 को श्रीरंगपट्टनम का किला जीत लिया गया, जिससे मैसूर की आजादी खत्म हो गई और टीपू सुल्तान लड़ते हुए मारे गए। इस युद्ध ने ब्रिटिश प्रभुत्व को और मजबूत किया और मैसूर को ब्रिटिश नियंत्रण में ला दिया।
In simple words: चौथा आंग्ल-मैसूर युद्ध 1799 में हुआ, जिसमें टीपू सुल्तान मारे गए और मैसूर राज्य अंग्रेजों के अधीन आ गया। लॉर्ड वेलेजली ने सहायक संधि के माध्यम से यह सुनिश्चित किया।

🎯 Exam Tip: विशिष्ट युद्धों के लिए, उसके कारणों, प्रमुख घटनाओं और दीर्घकालिक परिणामों पर ध्यान केंद्रित करें।

 

Question 3. विनायक दामोदर सावरकर का स्वतंत्रता संघर्ष में क्या योगदान है?
Answer: विनायक दामोदर सावरकर ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने 'अभिनव भारत' नामक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की। सावरकर ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 1857 के विद्रोह को 'भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' कहा, न कि सिर्फ एक गदर। उन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल में लंबा समय बिताना पड़ा, जहाँ उन्हें 'दो जन्मों' की सजा सुनाई गई थी, जो उनके त्याग और बलिदान का प्रतीक है।
In simple words: सावरकर ने 'अभिनव भारत' की स्थापना की, 1857 के विद्रोह को 'प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' कहा और स्वतंत्रता के लिए लंबी जेल की सजा भुगती।

🎯 Exam Tip: क्रांतिकारियों के योगदान को बताते समय, उनके द्वारा स्थापित संगठनों, प्रमुख विचारों और त्यागों को हाइलाइट करें।

 

Question 4. चंपारण किसान आंदोलन पर टिप्पणी लिखिए।
Answer: चंपारण किसान आंदोलन उत्तरी बिहार के चंपारण जिले में नील किसानों पर यूरोपीय बागान मालिकों के अत्याचार के खिलाफ शुरू हुआ था। गांधीजी ने बाबू राजेंद्र प्रसाद की मदद से किसानों की समस्याओं की जांच की और उन्हें शांतिपूर्ण आंदोलन करने को कहा। जून 1917 में एक जांच समिति बनाई गई, जिसकी रिपोर्ट के आधार पर चंपारण कृषि अधिनियम पास किया गया। इस अधिनियम से नील किसानों को जबरदस्ती नील की खेती से मुक्ति मिल गई, जिससे गांधीजी को भारत में अपनी पहली बड़ी सफलता मिली।
In simple words: चंपारण किसान आंदोलन बिहार में नील किसानों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ गांधीजी के नेतृत्व में चला। इसके बाद एक अधिनियम बना जिसने जबरन नील की खेती बंद करवा दी।

🎯 Exam Tip: किसान आंदोलनों पर टिप्पणी लिखते समय, उसके कारण, प्रमुख नेता, घटनाओं और परिणामों का संक्षेप में उल्लेख करें।

 

Question 5. इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना कब और कैसे हुई?
Answer: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 ईस्वी में एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी, ए.ओ. ह्यूम ने की थी। ब्रिटिश सरकार यह चाहती थी कि भारतीयों की भावनाओं और विचारों को जानने के लिए एक मंच हो, ताकि बड़े आंदोलनों को रोका जा सके। कांग्रेस का पहला अधिवेशन 28 दिसंबर, 1885 को बंबई के गोकुल दास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में व्योमेश चंद्र बनर्जी की अध्यक्षता में हुआ। इसमें कुल 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। यह संगठन भारत के स्वतंत्रता संग्राम की नींव बना और भविष्य के आंदोलनों का केंद्र बना।
In simple words: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में ए.ओ. ह्यूम ने की थी। इसका पहला अधिवेशन बंबई में हुआ, जहाँ 72 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और व्योमेश चंद्र बनर्जी अध्यक्ष थे।

🎯 Exam Tip: संगठनों की स्थापना से संबंधित प्रश्नों में, स्थापना वर्ष, संस्थापक, उद्देश्य और प्रारंभिक बैठकों के विवरण को शामिल करें।

 

Question 6. गोविन्द गुरु ने कौन-सा आंदोलन चलाया?
Answer: गोविंद गुरु ने भगत आंदोलन चलाया था। उन्होंने भीलों के सामाजिक और नैतिक सुधार के लिए 'सम्प सभा' की स्थापना की, जिसका उद्देश्य उन्हें हिंदू धर्म के अंतर्गत लाना और उनमें सुधार लाना था। 'भगत पंथ' की स्थापना भी इसी उद्देश्य से की गई थी। मेवाड़, डूंगरपुर, गुजरात और अन्य क्षेत्रों में भीलों के बीच सामाजिक जागरूकता बढ़ने से स्थानीय शासक चिंतित हो गए। जब भीलों को बेगार और उनके जंगल के अधिकारों से वंचित किया गया, तो उन्होंने आंदोलन शुरू कर दिया। गोविंद गुरु को गिरफ्तार कर लिया गया और बाद में छोड़ दिया गया, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने भगत आंदोलन को बेरहमी से दबा दिया और गोविंद गुरु को 10 साल की जेल हुई। यह आंदोलन जनजातीय समुदायों के सशक्तिकरण का प्रतीक बना।
In simple words: गोविंद गुरु ने भीलों के सामाजिक सुधार और अधिकारों के लिए भगत आंदोलन चलाया। उन्होंने 'सम्प सभा' की स्थापना की, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबा दिया और गोविंद गुरु को सजा दी।

🎯 Exam Tip: जनजातीय आंदोलनों के संदर्भ में, नेता, आंदोलन का नाम, उद्देश्य, कारण और ब्रिटिश प्रतिक्रिया को स्पष्ट रूप से बताएं।

 

Question 7. बिजौलिया किसान आंदोलन को समझाइए।
Answer: बिजौलिया किसान आंदोलन राजस्थान के प्रमुख किसान आंदोलनों में से एक था, जिसकी शुरुआत 1897 ईस्वी में गिरधरपुरा गाँव में गंगा राम नामक किसान के घर से हुई थी। यह आंदोलन विभिन्न प्रकार के अत्यधिक लगानों और करों के खिलाफ था, जो किसानों पर अन्यायपूर्ण तरीके से लगाए जाते थे। किसानों की शिकायतों को सुनने के लिए उदयपुर राज्य सरकार ने 1919 में एक आयोग बनाया, जिसने किसानों के पक्ष में कई सिफारिशें कीं। हालाँकि, मेवाड़ सरकार ने इन सिफारिशों पर ध्यान नहीं दिया, जिससे आंदोलन 1941 ईस्वी तक जारी रहा। इस आंदोलन ने अन्य किसान आंदोलनों को प्रेरित किया और किसानों में जागरूकता फैलाई।
In simple words: बिजौलिया किसान आंदोलन 1897 में राजस्थान में शुरू हुआ। यह अत्यधिक करों के खिलाफ था। एक सरकारी आयोग ने किसानों के पक्ष में सिफारिशें कीं, लेकिन उन पर ध्यान न दिए जाने से यह आंदोलन 1941 तक चला।

🎯 Exam Tip: किसान आंदोलनों की व्याख्या करते समय, उसके प्रारंभ, कारणों, मुख्य घटनाओं और परिणामों पर विस्तार से प्रकाश डालें।

 

Question 8. साइमन कमीशन को भारतीयों ने क्यों विरोध किया?
Answer: ब्रिटिश सरकार ने 1919 के भारत सरकार अधिनियम के कामकाज की समीक्षा करने के लिए 1927 ईस्वी में सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक कमीशन बनाया। इस कमीशन में कुल सात सदस्य थे, लेकिन उनमें से कोई भी भारतीय नहीं था। इसी कारण भारतीयों ने इस 'श्वेत कमीशन' का जोरदार विरोध किया, क्योंकि उनका मानना था कि भारत के भविष्य का फैसला करने में भारतीयों की भागीदारी आवश्यक है।
In simple words: साइमन कमीशन का विरोध इसलिए हुआ क्योंकि 1927 में बने इस कमीशन में कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था, जबकि इसे भारत के भविष्य के लिए बनाया गया था।

🎯 Exam Tip: कमीशन या समिति से संबंधित प्रश्नों में, उसके गठन का वर्ष, अध्यक्ष, उद्देश्य और भारतीय प्रतिक्रिया को स्पष्ट करें।

 

Question 9. प्रजामण्डलों की राजस्थान में स्थापना क्यों की गई?
Answer: राजस्थान में प्रजामंडलों की स्थापना मुख्य रूप से 1938 ईस्वी में कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में देशी राज्यों के आंदोलनों को समर्थन मिलने के बाद हुई। इन प्रजामंडलों का मुख्य उद्देश्य देशी रियासतों में जिम्मेदार सरकार की स्थापना करना, सामंती अत्याचारों और शोषण का विरोध करना तथा राजनीतिक जागरूकता बढ़ाना था। वे देश में चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन को गति देना चाहते थे। राजस्थान की सभी रियासतों में अपने-अपने प्रजामंडल सक्रिय थे, जिन्होंने आजादी तक विभिन्न आंदोलनों का संचालन किया और लोगों को उनके अधिकारों के प्रति सचेत किया।
In simple words: प्रजामंडलों की स्थापना राजस्थान में उत्तरदायी शासन स्थापित करने, सामंती शोषण का विरोध करने और राजनीतिक जागरूकता बढ़ाने के लिए की गई थी, खासकर 1938 के कांग्रेस अधिवेशन के बाद।

🎯 Exam Tip: संगठनों के उद्देश्यों को सूचीबद्ध करते समय, उन्हें स्पष्ट और संक्षिप्त बिंदुओं में प्रस्तुत करें।

 

अंग्रेजी साम्राज्य का प्रतिकार एवं संघर्ष निबंधात्मक प्रश्न (Long Answer Type Questions)

 

Question 1. मराठों व मैसूर द्वारा अंग्रेजों से किए गए संघर्ष का वर्णन कीजिए।
Answer: 18वीं सदी में मराठा शक्ति भारत की एक बड़ी ताकत थी, लेकिन 1761 के पानीपत के तीसरे युद्ध के बाद उनकी शक्ति कमजोर हो गई। मराठों और अंग्रेजों के बीच कुल तीन बड़े युद्ध हुए।

  • प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध: यह युद्ध 1775 ईस्वी से 1782 ईस्वी तक चला। इस संघर्ष में ब्रिटिश सेना को संगठित मराठा सेना ने हरा दिया, जिससे अंग्रेजों को अपमानजनक संधियाँ करनी पड़ीं।
  • द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध: यह संघर्ष 1802 से 1805 ईस्वी तक चला। इसका मुख्य कारण लॉर्ड वेलेजली की साम्राज्यवादी नीति और मराठा सरदारों के बीच आपसी दुश्मनी थी। इस युद्ध में मराठा सरदार अलग-अलग अंग्रेजों से लड़े और अंततः हार गए।
  • द्वितीय आंग्ल-मैसूर संघर्ष: यह संघर्ष 1780 में शुरू हुआ था। हैदर अली को शुरुआत में सफलता मिली, लेकिन 1782 में उनकी मृत्यु हो गई। टीपू सुल्तान ने एक साल तक युद्ध जारी रखा, लेकिन दोनों पक्ष थक गए और 1784 ईस्वी में मंगलौर की संधि कर ली।
  • तृतीय आंग्ल-मैसूर संघर्ष: यह 1790 ईस्वी में शुरू हुआ। टीपू ने बहादुरी से लड़ाई लड़ी, लेकिन अंत में 23 फरवरी, 1792 ईस्वी को श्रीरंगपट्टनम की संधि करनी पड़ी। इस संधि के तहत मैसूर को अपना काफी क्षेत्र और अंग्रेजों को तीन करोड़ रुपये युद्ध क्षतिपूर्ति के रूप में देने पड़े।
  • चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध: लॉर्ड वेलेजली ने टीपू पर सहायक संधि स्वीकार करने का दबाव डाला, लेकिन टीपू सुल्तान ने मना कर दिया। अंग्रेजों ने 1799 ईस्वी में टीपू के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया, जिसमें टीपू लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, और मैसूर पर अंग्रेजों का नियंत्रण हो गया। यह युद्ध भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था।

In simple words: मराठों और मैसूर दोनों ने अंग्रेजों के खिलाफ कई युद्ध लड़े। मराठा युद्धों में पहले में मराठा जीते, लेकिन बाद में वे कमजोर पड़ गए। मैसूर के हैदर अली और टीपू सुल्तान ने भी अंग्रेजों से वीरता से लड़ाई लड़ी। टीपू सुल्तान श्रीरंगपट्टनम की संधि करने को मजबूर हुए और अंततः चौथे मैसूर युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए, जिससे मैसूर पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया।

🎯 Exam Tip: लंबे उत्तर वाले प्रश्नों में, प्रत्येक संघर्ष के प्रमुख कारणों, घटनाओं, संधियों और परिणामों को अलग-अलग उप-शीर्षकों के साथ विस्तार से समझाएं।

 

Question 2. 1857 ई० के प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष का वर्णन कीजिए।
Answer: 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 10 मई को मेरठ से शुरू हुआ। इसकी मुख्य वजह चर्बी वाले कारतूसों का इस्तेमाल था, जिससे सैनिकों में भारी असंतोष फैल गया। जब 85 सैनिकों को चर्बी वाले कारतूसों का उपयोग करने से मना करने पर दंडित किया गया, तो विद्रोह भड़क उठा। यह विद्रोह तेजी से लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, बरेली, झांसी, बनारस और जगदीशपुर जैसे कई क्षेत्रों में फैल गया।

  • दिल्ली: सैनिकों ने बहादुर शाह जफर को अपना नेता बनाया, लेकिन अंग्रेजों ने जल्द ही इस विद्रोह को दबा दिया।
  • लखनऊ: बेगम हजरत महल के नेतृत्व में यहां विद्रोह शुरू हुआ। मार्च 1858 में सर कॉलिन कैंपबेल ने अंग्रेजों के लिए नगर पर फिर से कब्जा कर लिया।
  • कानपुर: 5 जून, 1857 को क्रांतिकारियों ने इस पर अधिकार कर नाना साहिब को पेशवा घोषित किया। तात्या टोपे ने भी उनका साथ दिया। दिसंबर 1857 में अंग्रेजों ने कानपुर को दोबारा जीत लिया।
  • झांसी: रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी में विद्रोह का नेतृत्व किया। अप्रैल 1858 में सर ह्यूरोज ने झांसी पर हमला किया और रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गईं। उनकी बहादुरी आज भी याद की जाती है।
  • बिहार: जगदीशपुर के जमींदार, 80 वर्षीय कुंवर सिंह ने क्रांति का नेतृत्व किया और कई ब्रिटिश सेनापतियों को हराया।
  • अन्य क्षेत्र: बरेली में बहादुर खान और बनारस में भी विद्रोह हुए, जिन्हें अंग्रेजों ने दबा दिया। दक्षिण भारत में हालांकि सैनिकों की संख्या कम थी, लेकिन वहां भी कई क्रांतिकारी इस संघर्ष में शामिल हुए और बलिदान दिया, जैसे सतारा के रंग बापू जी गुप्ते और हैदराबाद के सैयद अलाउद्दीन।

यह विद्रोह भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था जिसने राष्ट्रीय चेतना जगाई।
In simple words: 1857 का स्वतंत्रता संग्राम 10 मई को मेरठ से चर्बी वाले कारतूसों के कारण शुरू हुआ। यह दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, झांसी और बिहार जैसे कई इलाकों में फैला, जहाँ बहादुर शाह जफर, बेगम हजरत महल, नाना साहिब, रानी लक्ष्मीबाई और कुंवर सिंह जैसे नेताओं ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, लेकिन अंततः अंग्रेजों ने इसे दबा दिया।

🎯 Exam Tip: 1857 के विद्रोह के वर्णन में, उसके कारणों, प्रमुख केंद्रों, नेताओं और अंग्रेजों की दमनकारी नीति को विस्तार से बताएं।

 

Question 3. 1919 ई० में 1949 ई० तक चलाए गए जनआंदोलनों का वर्णन कीजिए।
Answer: 1919 से 1949 के बीच भारत में कई महत्वपूर्ण जनआंदोलन हुए, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को गति दी।

  • असहयोग और खिलाफत आंदोलन: खिलाफत आंदोलन तुर्की के खलीफा के सम्मान में भारतीय मुसलमानों द्वारा चलाया गया था, जिसे गांधीजी ने समर्थन दिया। 1920 में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया, जिसके तहत सरकारी उपाधियों का त्याग, अदालतों का बहिष्कार और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार शामिल था। फरवरी 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया, क्योंकि वे हिंसा के विरुद्ध थे।
  • साइमन कमीशन का विरोध: 1919 के भारत सरकार अधिनियम की समीक्षा के लिए 1927 में साइमन कमीशन बना, जिसमें कोई भारतीय सदस्य नहीं था। 3 फरवरी, 1928 को जब यह बंबई पहुंचा, तो पूरे देश में इसका जोरदार विरोध हुआ।
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन: 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पास होने के बाद, गांधीजी ने 1930 में दांडी मार्च के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया, जिसमें नमक कानून तोड़ा गया। इस आंदोलन में महिलाएं भी सक्रिय रूप से शामिल हुईं और शराब की दुकानों पर धरना दिया। 1931 में गांधी-इरविन समझौता हुआ, लेकिन गांधीजी को दूसरे गोलमेज सम्मेलन से निराशा मिली, और उन्होंने 1932 में फिर से सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया, जिसे अंततः 1933 में वापस ले लिया।
  • व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन: 17 अक्टूबर, 1940 को गांधीजी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया। विनोबा भावे पहले, जवाहरलाल नेहरू दूसरे और ब्रह्मदत्त तीसरे सत्याग्रही बने। इस आंदोलन में लगभग 30,000 लोग गिरफ्तार हुए, जिससे ब्रिटिश सरकार पर दबाव बढ़ा।
  • भारत छोड़ो आंदोलन: 8 अगस्त, 1942 को बंबई में कांग्रेस के अधिवेशन में 'भारत छोड़ो' का प्रस्ताव पारित हुआ। 9 अगस्त को गांधीजी और अन्य प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन पूरे देश में यह आंदोलन स्वतःस्फूर्त रूप से जारी रहा, जिससे ब्रिटिश शासन की नींव हिल गई। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम बड़ा आंदोलन था।

In simple words: 1919-1949 के बीच, असहयोग और खिलाफत आंदोलन, साइमन कमीशन का विरोध, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे कई बड़े आंदोलन हुए। गांधीजी ने अहिंसा के साथ इन आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिससे अंग्रेजों पर भारत छोड़ने का दबाव बढ़ता गया। व्यक्तिगत सत्याग्रह ने भी लोगों में जागरूकता फैलाई और इन सभी आंदोलनों ने भारत को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

🎯 Exam Tip: जनआंदोलनों का वर्णन करते समय, प्रत्येक आंदोलन के प्रमुख उद्देश्य, कारण, नेतृत्व, महत्वपूर्ण घटनाओं और परिणामों को स्पष्ट रूप से बिंदुवार प्रस्तुत करें।

 

Question 4. भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में क्रांतिकारियों का क्या योगदान रहा? उल्लेख कीजिए।
Answer: भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में क्रांतिकारियों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसकी शुरुआत 19वीं सदी के अंत में हुई। महाराष्ट्र, बंगाल, संयुक्त प्रांत और पंजाब क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रमुख केंद्र थे।

  • महाराष्ट्र में क्रांतिकारी आंदोलन: महाराष्ट्र में क्रांतिकारी गतिविधियाँ 1876 ईस्वी में वासुदेव बलवंत फड़के के साथ शुरू हुईं। वीर सावरकर ने 1906 में 'अभिनव भारत' नामक संगठन की स्थापना की। उन्होंने 1857 के संघर्ष को 'भारत का प्रथम स्वतंत्रता युद्ध' बताया। उन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल में लंबे समय तक रखा गया, और 1924 में स्वास्थ्य खराब होने पर रत्नागिरी में नजरबंद कर दिया गया, जिसके बाद उन्हें रिहा किया गया।
  • बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन: बंगाल में पी. मित्रा ने 'अनुशीलन समिति' नामक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की। बंगाल विभाजन के बाद, इस आंदोलन का उद्देश्य स्वराज्य प्राप्त करना बन गया। 1905 में वारिंद्र कुमार घोष ने 'भवानी मंदिर' जैसी किताबें लिखीं और 'युगांतर' और 'संध्या' जैसी पत्रिकाओं ने अंग्रेज विरोधी विचारों को फैलाया। एक और पुस्तक 'मुक्ति कौन पाथे' ने सैनिकों से भारतीय क्रांतिकारियों को हथियार देने का आग्रह किया। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को चुनौती देने में कोई कसर नहीं छोड़ी और अपनी जान देकर स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी।

In simple words: क्रांतिकारी आंदोलन 19वीं सदी के अंत में शुरू हुआ, जिसके केंद्र महाराष्ट्र और बंगाल थे। महाराष्ट्र में वासुदेव बलवंत फड़के और वीर सावरकर ने 'अभिनव भारत' जैसे संगठन बनाए। बंगाल में 'अनुशीलन समिति' और वारिंद्र कुमार घोष ने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई। इन सभी ने स्वतंत्रता के लिए बड़ा योगदान दिया।

🎯 Exam Tip: क्रांतिकारी आंदोलनों का वर्णन करते समय, प्रमुख नेताओं, उनके संगठनों, उनके विचारों और प्रमुख घटनाओं का उल्लेख करें।

 

Question 5. राजस्थान में किसान आंदोलनों का वर्णन कीजिए।
Answer: राजस्थान में किसान आंदोलन किसानों और जनजातीय समुदायों में राजनीतिक चेतना की शुरुआत के साथ शुरू हुए। इनमें बिजौलिया, सीकर, बेगू, बरड़ और नीमूचणा किसान आंदोलन प्रमुख थे।

  • बिजौलिया किसान आंदोलन: यह राजस्थान का सबसे पहला और लंबा किसान आंदोलन था, जो 1897 में शुरू हुआ। यह अत्यधिक लगानों और करों के खिलाफ था। 1919 में एक आयोग ने किसानों के पक्ष में सिफारिशें कीं, लेकिन उन पर ध्यान न दिए जाने से आंदोलन 1941 तक जारी रहा।
  • सीकर किसान आंदोलन: यह आंदोलन नए रावराजा कल्याण सिंह द्वारा भू-राजस्व में 25-50% की वृद्धि के कारण शुरू हुआ। 1931 में राजस्थान जाट क्षेत्रीय सभा की स्थापना के बाद आंदोलन को गति मिली, और 1935 तक किसानों की अधिकांश मांगें मान ली गईं।
  • बेगू किसान आंदोलन: बिजौलिया से प्रेरित होकर, बेगू के किसानों ने 1921 में लगान और बेगार के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। विजय सिंह पथिक ने इसका नेतृत्व किया। मेवाड़ सरकार ने 10 सितंबर, 1923 को पथिक को गिरफ्तार कर लिया, जिसके बाद आंदोलन धीरे-धीरे शांत हो गया।
  • नीमूचणा किसान आंदोलन (अलवर): यह आंदोलन 1921 में अलवर में सूअरों के कारण शुरू हुआ था, जो किसानों की फसलों को बर्बाद कर देते थे और उन्हें मारने पर प्रतिबंध था। किसानों के भारी विरोध के बाद महाराजा ने सूअरों को मारने की अनुमति दे दी। हालांकि, नए भूमि करों में राजपूतों और ब्राह्मणों को विशेष रियायतें दी गईं, जिससे अन्य समुदायों ने इसमें सक्रिय रूप से भाग लिया। राजा ने आंदोलन को दबाने के लिए बल का प्रयोग किया, जिसमें 156 लोग मारे गए और लगभग 600 घायल हुए। इस हिंसक कार्रवाई की पूरे देश में कड़ी आलोचना हुई।

इन आंदोलनों ने राजस्थान के किसानों में अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाई और ब्रिटिश सरकार पर दबाव डाला।
In simple words: राजस्थान में कई किसान आंदोलन हुए, जैसे बिजौलिया, सीकर, बेगू और नीमूचणा। ये आंदोलन अत्यधिक लगान, बेगार और स्थानीय शासकों के अत्याचारों के खिलाफ थे। इन आंदोलनों ने किसानों में जागरूकता पैदा की और ब्रिटिश सरकार को उनकी मांगें मानने पर मजबूर किया।

🎯 Exam Tip: राजस्थान के किसान आंदोलनों का वर्णन करते समय, प्रत्येक आंदोलन का नाम, उसके प्रमुख कारण, वर्ष, नेता और परिणाम स्पष्ट रूप से बताएं।

 

अतिरिक्त प्रश्नोत्तर (More Questions Solved)

अंग्रेजी साम्राज्य का प्रतिकार एवं संघर्ष अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

 

Question 1. ईस्ट इंडिया कंपनी की भारत में पहली व्यापारिक कोठी कहाँ स्थापित हुई थी?
Answer: ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी पहली व्यापारिक कोठी भारत में सूरत में स्थापित की थी। यह उनकी भारत में व्यापारिक गतिविधियों की शुरुआत थी और इसने भारत के व्यापारिक परिदृश्य को बदल दिया।
In simple words: ईस्ट इंडिया कंपनी की पहली व्यापारिक कोठी सूरत में बनी थी।

🎯 Exam Tip: ऐतिहासिक कंपनियों की पहली स्थापना से जुड़े तथ्य याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच कौन-सा युद्ध हुआ?
Answer: सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच प्लासी का युद्ध हुआ था। यह युद्ध 1757 में हुआ, जिसने भारत में ब्रिटिश शासन की नींव रखी और एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।
In simple words: सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच प्लासी का युद्ध हुआ था।

🎯 Exam Tip: ऐतिहासिक युद्धों के प्रमुख पक्षकारों को हमेशा याद रखें।

 

Question 3. मीर कासिम और अंग्रेजों के बीच होने वाले युद्ध का नाम बताएँ।
Answer: मीर कासिम और अंग्रेजों के बीच बक्सर का युद्ध हुआ था। यह युद्ध 1764 में हुआ, जो प्लासी के बाद अंग्रेजों की शक्ति को और मजबूत करने वाला एक महत्वपूर्ण युद्ध था और इसने बंगाल पर अंग्रेजों का नियंत्रण स्थापित किया।
In simple words: मीर कासिम और अंग्रेजों के बीच बक्सर का युद्ध हुआ था।

🎯 Exam Tip: विभिन्न युद्धों के मुख्य पक्षकारों और उनके परिणामों को ध्यान से याद रखें।

 

Question 4. बक्सर के युद्ध का क्या परिणाम निकला?
Answer: बक्सर के युद्ध के बाद, अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार मिल गए, जिसका मतलब था कि उन्हें इन क्षेत्रों से राजस्व वसूलने का अधिकार मिल गया। इस घटना से भारत के स्थानीय उद्योगों और व्यापार को काफी नुकसान हुआ, क्योंकि अंग्रेजों ने अपनी व्यापारिक नीतियों को भारत के खिलाफ मोड़ दिया और अपने हितों को प्राथमिकता दी।
In simple words: बक्सर के युद्ध के बाद, अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और उड़ीसा में कर वसूलने का अधिकार मिल गया, जिससे भारत के व्यापार और उद्योगों को नुकसान हुआ।

🎯 Exam Tip: ऐतिहासिक युद्धों के परिणामों में, राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक प्रभावों को स्पष्ट रूप से बताएं।

 

Question 5. सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच युद्ध के क्या कारण थे?
Answer: सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच युद्ध के कई कारण थे। अंग्रेजों द्वारा दस्तक (ट्रेड पास) का दुरुपयोग, जिससे नवाब को राजस्व का नुकसान हो रहा था, एक बड़ा कारण था। अंग्रेजों ने नवाब की अनुमति के बिना कलकत्ता में अपनी किलेबंदी शुरू कर दी थी, और उन्होंने नवाब के एक भगोड़े दुश्मन को शरण भी दी थी। इन कारणों से सिराजुद्दौला नाराज हो गए, और उन्होंने अंग्रेजों के व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर हमला किया, जिससे प्लासी का युद्ध हुआ। अंग्रेजों की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं भी एक प्रमुख कारक थीं, जो भारत पर नियंत्रण स्थापित करना चाहते थे।
In simple words: सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच युद्ध इसलिए हुआ क्योंकि अंग्रेज अपने व्यापारिक पास का गलत इस्तेमाल कर रहे थे, बिना अनुमति के किले बना रहे थे, और नवाब के दुश्मनों को पनाह दे रहे थे। इन बातों से नवाब नाराज हो गए और युद्ध छिड़ गया।

🎯 Exam Tip: युद्धों के कारणों को बताते समय, राजनीतिक, आर्थिक और व्यक्तिगत मतभेदों को स्पष्ट रूप से उजागर करें।

 

Question 7. द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध के क्या कारण थे?
Answer: द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के मुख्य कारण थे कि अंग्रेज पहले आंग्ल-मैसूर युद्ध की हार का बदला लेना चाहते थे। हैदर अली भी अंग्रेजों द्वारा गुंटूर पर कब्जा करने से नाराज थे, जिसे अंग्रेजों ने 1768 में मैसूर को लौटाने का वादा किया था। इन कारणों से हैदर अली ने निजाम और मराठों के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ फिर से युद्ध छेड़ दिया, जिससे दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ गया और युद्ध अनिवार्य हो गया।
In simple words: अंग्रेज पहले युद्ध की हार का बदला लेना चाहते थे, और हैदर अली अंग्रेजों के गुंटूर पर कब्जे से नाराज थे। इन्हीं कारणों से दूसरा आंग्ल-मैसूर युद्ध हुआ।

🎯 Exam Tip: युद्धों के कारणों को बताते समय, पिछली घटनाओं और प्रमुख शासकों के हितों के टकराव पर ध्यान दें।

 

Question 8. तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध के क्या कारण थे?
Answer: तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के कई कारण थे। अंग्रेज मैसूर के बढ़ते प्रभाव को खत्म करना चाहते थे। टीपू सुल्तान अपनी मालाबार तट की सुरक्षा के लिए कोचीन में डचों से कागनूर और आइकोट के किले खरीदना चाहते थे। लेकिन अंग्रेजों के सहयोगी त्रावणकोर के राजा ने इन किलों को खरीद लिया, जिससे टीपू सुल्तान नाराज हो गए। अप्रैल 1790 ईस्वी में, टीपू ने त्रावणकोर पर हमला किया, जिसके जवाब में लॉर्ड कार्नवालिस ने मैसूर पर विशाल सेना के साथ आक्रमण कर दिया, जिससे तीसरा युद्ध शुरू हुआ।
In simple words: तीसरा आंग्ल-मैसूर युद्ध इसलिए हुआ क्योंकि अंग्रेज मैसूर को कमजोर करना चाहते थे, टीपू सुल्तान कोचीन के किले खरीदना चाहते थे जो त्रावणकोर के राजा ने खरीद लिए, और टीपू ने त्रावणकोर पर हमला कर दिया।

🎯 Exam Tip: युद्धों के कारणों की व्याख्या करते समय, आर्थिक, राजनीतिक और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों को शामिल करें।

 

Question 9. प्रथम अंग्रेज सिख संघर्ष के क्या परिणाम निकले?
Answer: प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध के बाद, अंग्रेजों ने 13 फरवरी, 1846 को लाहौर पर कब्जा कर लिया। 1 मार्च, 1846 को लाहौर की संधि हुई, जिसके तहत जालंधर दोआब का क्षेत्र ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल कर लिया गया। सिखों को युद्ध क्षतिपूर्ति के रूप में 1.5 करोड़ रुपये अंग्रेजों को देने पड़े, और उनकी सेना की संख्या भी सीमित कर दी गई। इस संधि ने सिख साम्राज्य को काफी कमजोर कर दिया और पंजाब में ब्रिटिश प्रभाव बढ़ा।
In simple words: पहले आंग्ल-सिख युद्ध के बाद, अंग्रेजों ने लाहौर पर कब्जा कर लिया, जालंधर दोआब को अपने राज्य में मिला लिया, सिखों को 1.5 करोड़ रुपये युद्ध हर्जाना देना पड़ा और उनकी सेना छोटी कर दी गई।

🎯 Exam Tip: संबंधित युद्धों के परिणामों में, क्षेत्रीय बदलाव, आर्थिक क्षतिपूर्ति और सैन्य सीमाओं का उल्लेख करें।

 

Question 10. द्वितीय अंग्रेज-सिख संघर्ष के क्या कारण थे?
Answer: द्वितीय आंग्ल-सिख संघर्ष के कई कारण थे। 1847-48 में अंग्रेजों ने पंजाब में ऐसे सुधार किए जो सिखों के खिलाफ थे, जिससे उनमें असंतोष फैल गया। सेना से हटाए गए सिख सैनिकों की नाराजगी, रानी जिन्दा के अधिकारों को छीनना और बदला लेने की इच्छा भी मुख्य कारण थे। ब्रिटिश रेजीडेंट का पंजाब के आंतरिक मामलों में अत्यधिक दखल और लॉर्ड डलहौजी की पंजाब को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने की इच्छा ने इस युद्ध को अनिवार्य बना दिया। यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद का एक और उदाहरण था जिसके कारण सिखों को अपना साम्राज्य गंवाना पड़ा।
In simple words: दूसरा आंग्ल-सिख युद्ध अंग्रेजों की सिख-विरोधी नीतियों, निकाले गए सैनिकों की नाराजगी, रानी जिन्दा के अधिकार छीनने, और लॉर्ड डलहौजी की पंजाब को हड़पने की इच्छा के कारण हुआ।

🎯 Exam Tip: युद्ध के कारणों का विश्लेषण करते समय, ब्रिटिश की साम्राज्यवादी नीतियों, स्थानीय असंतोष और प्रमुख राजनीतिक घटनाओं को जोड़कर बताएं।

 

Question. भारत के एक ऐसे क्रांतिकारी का नाम बताएँ जिन्हें एक जन्म का नहीं, बल्कि दो जन्मों की सजा दी गई थी?
Answer: विनायक दामोदर सावरकर वह क्रांतिकारी थे जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने 'दो जन्मों' की सजा सुनाई थी। उन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल (काला पानी) में रखा गया था, जो उनके अदम्य साहस और स्वतंत्रता के प्रति समर्पण का प्रतीक है।
In simple words: विनायक दामोदर सावरकर को अंग्रेजों ने 'दो जन्मों' की सजा दी थी।

🎯 Exam Tip: प्रसिद्ध क्रांतिकारियों के त्याग और बलिदान से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को याद रखें, जैसे कि उन्हें मिली सजा।

 

Question 13. प्रजामंडल की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी?
Answer: प्रजामंडल आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि इसने महिलाओं को घर की सीमाओं से बाहर लाकर उन्हें पुरुषों के समान अधिकार और भागीदारी के लिए प्रेरित किया। इस आंदोलन ने महिलाओं में राजनीतिक और सामाजिक चेतना जगाई, जिससे वे स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से शामिल हुईं और समाज में अपनी जगह बनाई।
In simple words: प्रजामंडल आंदोलन ने महिलाओं को घरों से बाहर निकलकर पुरुषों के बराबर आने में मदद की, जिससे वे आंदोलनों में भाग ले सकें।

🎯 Exam Tip: आंदोलनों की उपलब्धियों पर प्रकाश डालते समय, सामाजिक बदलावों और समानता के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करें।

 

Question 14. जयपुर प्रजामंडल के आंदोलन में भाग लेनेवाली महिलाओं के नाम बताइए।
Answer: जयपुर प्रजामंडल के आंदोलनों में कई महिलाओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इनमें रमादेवी देशपांडे, सुशीला देवी, इंदिरा देवी और अंजना देवी चौधरी जैसे नाम प्रमुख हैं। इन महिलाओं ने अपने साहस और दृढ़ संकल्प से स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया और समाज को प्रेरित किया।
In simple words: जयपुर प्रजामंडल के आंदोलन में रमादेवी देशपांडे, सुशीला देवी, इंदिरा देवी और अंजना देवी चौधरी जैसी महिलाओं ने हिस्सा लिया।

🎯 Exam Tip: विभिन्न आंदोलनों में महिला नेताओं के योगदान और उनके नामों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 15. प्रजामंडलों के कार्यकर्ताओं ने किस तरह के सामाजिक सुधार किए?
Answer: प्रजामंडलों के कार्यकर्ताओं ने कई सामाजिक सुधारों पर काम किया। उन्होंने शिक्षा के प्रसार, बेगार प्रथा को खत्म करने और दलितों तथा आदिवासियों के उत्थान पर विशेष ध्यान दिया। इन प्रयासों से समाज में जागरूकता बढ़ी और सामाजिक असमानता को दूर करने में मदद मिली, जिससे एक बेहतर समाज का निर्माण हुआ।
In simple words: प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं ने शिक्षा फैलाने, बेगार प्रथा खत्म करने और दलितों-आदिवासियों की भलाई के लिए काम किया।

🎯 Exam Tip: सामाजिक सुधारों से संबंधित प्रश्नों में, शिक्षा, समानता और कमजोर वर्गों के उत्थान जैसे प्रमुख बिंदुओं को बताएं।

 

Question 16. अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद की स्थापना का मुख्य उद्देश्य क्या था?
Answer: अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद की स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारतीय रियासतों में राजाओं के अधीन रहते हुए वैध और शांतिपूर्ण तरीकों से जिम्मेदार सरकार स्थापित करना था। इसका लक्ष्य रियासतों के लोगों को राजनीतिक अधिकार दिलाना और उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ना था, जिससे पूरे देश में एकता बनी रहे।
In simple words: इस परिषद का मुख्य उद्देश्य देशी रियासतों में राजाओं के तहत एक ऐसी सरकार बनाना था जो लोगों के प्रति जिम्मेदार हो, और यह काम शांतिपूर्ण ढंग से करना था।

🎯 Exam Tip: संगठनों के उद्देश्यों को बताते समय, उनके मुख्य लक्ष्यों और कार्यप्रणाली को स्पष्ट करें।

 

Question 17. गाँधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन शुरू करने के क्या कारण थे?
Answer: गांधीजी ने असहयोग आंदोलन 1920 ईस्वी में कई कारणों से शुरू किया। रोलट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड और हंटर कमेटी की रिपोर्ट की वजह से वे बहुत दुखी थे। तुर्की के विभाजन और खलीफा के पद को खत्म करने से भारतीय मुसलमानों में भी असंतोष था, जिसे खिलाफत आंदोलन के माध्यम से गांधीजी ने समर्थन दिया। इन सभी घटनाओं ने गांधीजी को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन शुरू करने के लिए प्रेरित किया। इसका लक्ष्य स्वराज प्राप्त करना था और अंग्रेजों पर नैतिक दबाव बनाना था।
In simple words: गांधीजी ने असहयोग आंदोलन रोलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड, तुर्की विभाजन और खिलाफत मुद्दे जैसे कई कारणों से 1920 में शुरू किया था।

🎯 Exam Tip: आंदोलन के कारणों का उल्लेख करते समय, विभिन्न घटनाओं और संबंधित मुद्दों को जोड़कर बताएं।

 

भारत में किसान आंदोलन के कारण

  • ब्रिटिश सरकार की भू-राजस्व नीतियां।
  • बार-बार पड़ने वाले लंबे अकाल।
  • जमींदारों और सामंतों द्वारा किसानों से बहुत अधिक कर वसूलना।
  • व्यापारी और साहूकारों द्वारा किसानों को झूठे कर्ज के जाल में फंसाना।

 

Question 2. प्रजामंडल आंदोलन में महिलाओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इस कथन की व्याख्या करें।
Answer: प्रजामंडल आंदोलनों में अनेक महिलाओं ने आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया और गिरफ्तारियाँ दीं। जयपुर प्रजामंडल के आंदोलनों में रमादेवी देशपांडे, सुशीला देवी, इंदिरा देवी और अंजना देवी चौधरी जैसी प्रमुख महिलाओं ने भाग लिया। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जोधपुर में गोरजा देवी, सावित्री देवी भाटी, सिरेकंवर व्यास और राजकौर व्यास जैसी महिलाओं ने गिरफ्तारियाँ दीं। उदयपुर में माणिक्य लाल वर्मा की पत्नी नारायणदेवी अपने छह महीने के बेटे के साथ जेल गईं। इन महिलाओं ने अपने साहस और भागीदारी से आंदोलन को मजबूत किया और समाज में महिलाओं की भूमिका को स्थापित किया।
In simple words: प्रजामंडल आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में रमादेवी देशपांडे, सुशीला देवी, इंदिरा देवी, अंजना देवी चौधरी, गोरजा देवी, सावित्री देवी भाटी और नारायणदेवी जैसी अनेक महिलाओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया और गिरफ्तारियाँ भी दीं।

🎯 Exam Tip: महिला स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को बताते समय, उनके नाम और उन्होंने जिन आंदोलनों में भाग लिया, उनका उल्लेख करें।

 

Question 3. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में प्रजामंडल का क्या योगदान था? ।
Answer: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में प्रजामंडलों का महत्वपूर्ण योगदान था। राजस्थान की सभी रियासतों में प्रजामंडल सक्रिय थे और उन्होंने आजादी मिलने तक कई आंदोलन चलाए। प्रजामंडलों का मुख्य लक्ष्य देशी रियासतों में जिम्मेदार सरकार स्थापित करना, सामंती अत्याचारों और शोषण का विरोध करना तथा राजनीतिक जागरूकता बढ़ाना था। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि इसने महिलाओं को घर से बाहर लाकर पुरुषों के बराबर लाकर खड़ा किया। प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं ने शिक्षा का प्रसार, बेगार प्रथा को खत्म करने और दलितों व आदिवासियों के उत्थान जैसे सामाजिक सुधारों पर भी काम किया। इन प्रयासों से राजस्थान की जनता में राजनीतिक जागरूकता बढ़ी और उन्हें अपने अधिकारों के प्रति सचेत किया।
In simple words: प्रजामंडलों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में देशी रियासतों में जिम्मेदार सरकार स्थापित करने, सामंती शोषण का विरोध करने और राजनीतिक जागरूकता फैलाने में मदद की। उन्होंने महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई और सामाजिक सुधारों पर भी काम किया।

🎯 Exam Tip: राष्ट्रीय आंदोलन में क्षेत्रीय संगठनों के योगदान का विश्लेषण करते समय, उनके स्थानीय उद्देश्यों और बड़े राष्ट्रीय लक्ष्यों के बीच संबंध स्थापित करें।

 

Question 4. असहयोग आंदोलन के अंतर्गत ब्रिटिश सरकार को किस तरह का विरोध किया गया तथा गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन को क्यों वापस लिया?
Answer: असहयोग आंदोलन के तहत ब्रिटिश सरकार का विरोध कई तरीकों से किया गया, जिसमें सरकारी उपाधियों का त्याग, विधान सभाओं का बहिष्कार, अदालतों का बहिष्कार, सरकारी शैक्षणिक संस्थानों का त्याग और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार शामिल था। इस आंदोलन के दौरान, 5 फरवरी, 1922 ईस्वी को उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा गाँव में एक शांतिपूर्ण जुलूस पर पुलिस ने अत्याचार किया, जिसके जवाब में भीड़ ने पुलिस चौकी को आग लगा दी। इस घटना में 21 सिपाही और एक थानेदार की मौत हो गई। गांधीजी हिंसा के सख्त खिलाफ थे, इसलिए इस हिंसक घटना के बाद उन्होंने 12 फरवरी, 1922 को असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। वह चाहते थे कि आंदोलन पूरी तरह अहिंसक रहे और सही दिशा में आगे बढ़े।
In simple words: असहयोग आंदोलन में लोगों ने सरकारी चीजों और विदेशी सामान का बहिष्कार किया। गांधीजी ने इस आंदोलन को 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद वापस ले लिया, क्योंकि वे हिंसा के खिलाफ थे।

🎯 Exam Tip: असहयोग आंदोलन के विरोध के तरीकों और उसके वापसी के मुख्य कारण (चौरी-चौरा घटना) को स्पष्ट रूप से समझाएं।

 

Question 5. भारत छोड़ो आंदोलन में लोगों की किस तरह की प्रतिक्रिया थी?
Answer: भारत छोड़ो आंदोलन 8 अगस्त, 1942 ईस्वी को शुरू हुआ था। 9 अगस्त को गांधीजी और सभी प्रमुख नेताओं को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन इसके बावजूद आंदोलन पूरे देश में स्वतःस्फूर्त रूप से जारी रहा। आंदोलनकारियों ने अपनी समझ के अनुसार प्रतिक्रिया दी, जिसमें शांतिपूर्ण हड़तालें, सार्वजनिक सभाएँ, लगान देने से इनकार और सरकारी कामकाज में असहयोग शामिल था। पूरे देश में कारखाने, स्कूल और कॉलेज बंद हो गए। पुलिस थानों, डाकखानों और रेलवे स्टेशनों पर हमले हुए। कई शहरों, कस्बों और गाँवों में समानांतर सरकारें भी स्थापित की गईं। गांधीजी ने इस आंदोलन को 'अंतिम संघर्ष' बताया था, और इसने ब्रिटिश राज की नींव हिला दी।
In simple words: भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद भी पूरे देश में चलता रहा। लोगों ने हड़तालें कीं, सरकार का विरोध किया, और कई जगह समानांतर सरकारें भी बनाईं, जिससे अंग्रेजों पर बहुत दबाव पड़ा।

🎯 Exam Tip: भारत छोड़ो आंदोलन में लोगों की प्रतिक्रिया को बताते समय, नेताओं की गिरफ्तारी के बाद स्वतःस्फूर्त प्रकृति और विभिन्न प्रकार के विरोध प्रदर्शनों को उजागर करें।

 

Question 6. भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के प्रथम अधिवेशन में क्या उद्देश्य बताए गए थे?
Answer: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पहले अधिवेशन में चार मुख्य उद्देश्य निर्धारित किए गए थे।

  1. देश की प्रगति के लिए काम करने वाले लोगों को एक-दूसरे से परिचित कराना और उन्हें एक साथ लाना।
  2. आने वाले समय के लिए कार्यक्रमों और रणनीतियों पर विचार-विमर्श करना।
  3. ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति अपनी वफादारी बनाए रखते हुए भी, भारत सरकार के उन कार्यों का विरोध करना जो ब्रिटिश सिद्धांतों के खिलाफ थे।
  4. यह संगठन अप्रत्यक्ष रूप से भारत की संसद के रूप में काम करेगा, जो इस धारणा को गलत साबित करेगा कि भारतीय प्रतिनिधि शासन चलाने में सक्षम नहीं हैं।

इन उद्देश्यों ने कांग्रेस को एक मजबूत मंच प्रदान किया और भारतीय राजनीति को नई दिशा दी।
In simple words: कांग्रेस के पहले अधिवेशन के मुख्य उद्देश्य थे: देश के लिए काम करने वालों को जोड़ना, भविष्य के कार्यक्रम तय करना, ब्रिटिश सरकार के गलत कामों का विरोध करना, और यह दिखाना कि भारतीय भी शासन चलाने में सक्षम हैं।

🎯 Exam Tip: संगठनों के प्रारंभिक उद्देश्यों को बताते समय, भविष्य की योजनाओं और निहित राजनीतिक संदेशों को स्पष्ट करें।

 

Question 7. अलवर के नीमूचणा किसान आंदोलन के बारे में व्याख्या करें।
Answer: अलवर का नीमूचणा किसान आंदोलन 1921 ईस्वी में सूअरों के कारण शुरू हुआ था। ये सूअर किसानों की फसलों को बर्बाद कर देते थे, और उन्हें मारने पर प्रतिबंध लगा हुआ था। किसानों के भारी विरोध के बाद, महाराजा को सूअरों को मारने की अनुमति देनी पड़ी। 1923-1924 में, महाराजा ने नए भूमि कर लागू किए, जिसमें राजपूतों और ब्राह्मणों को रियायत दी गई थी, लेकिन बाद में यह विशेषाधिकार खत्म कर दिया गया। इससे राजपूत भी आंदोलन में शामिल हो गए। राजा ने इस आंदोलन को दबाने के लिए गोलियां चलवाईं और घर जला दिए, जिसमें 156 लोग मारे गए और लगभग 600 घायल हुए। इस हिंसक कार्रवाई की पूरे देश में कड़ी आलोचना हुई, और इसने किसानों के संघर्ष को उजागर किया।
In simple words: अलवर का नीमूचणा किसान आंदोलन 1921 में सूअरों के कारण शुरू हुआ था, जो किसानों की फसल बर्बाद करते थे। राजा ने सूअरों को मारने की इजाजत दी, लेकिन नए करों और भेदभाव के कारण आंदोलन जारी रहा। राजा ने इसे दबाने के लिए गोलीबारी और आगजनी की, जिससे कई लोग मारे गए और घायल हुए।

🎯 Exam Tip: स्थानीय किसान आंदोलनों की व्याख्या करते समय, उसके विशेष कारणों (जैसे सूअर), सरकार की प्रतिक्रिया और हिंसक घटनाओं का उल्लेख करें।

 

अंग्रेजी साम्राज्य का प्रतिकार एवं संघर्ष निबंधात्मक प्रश्न (Long Answer Type Questions)

 

Question 1. राजस्थान के विभिन्न भागों में किसान आंदोलन के क्या कारण थे?
Answer: राजस्थान के विभिन्न हिस्सों में किसान आंदोलनों के कई कारण थे:

  1. शासकों की लापरवाही: ब्रिटिश प्रभाव में आकर शासकों ने अपनी प्रजा पर ध्यान देना कम कर दिया। शासक और जागीरदार ब्रिटिश सत्ता पर निर्भर हो गए थे, जिससे उनकी किसानों के प्रति पुरानी जिम्मेदारी खत्म हो गई।
  2. बढ़ता राजस्व और बेगार: किसानों से लिया जाने वाला राजस्व बहुत बढ़ा दिया गया था, साथ ही बेगार (बिना मजदूरी का काम) और विभिन्न लागों (अतिरिक्त कर) में भी अचानक वृद्धि हुई। कुछ राज्यों में ऐसे लागों की संख्या 300 से अधिक थी।
  3. कृषक मजदूरों की बढ़ती संख्या: अन्य व्यवसायों से विस्थापित लोग कृषि पर निर्भर हो गए, जिससे कृषक मजदूरों की संख्या बढ़ गई। इसके कारण जागीरदारों का किसानों के प्रति रवैया और सख्त हो गया, जिससे उनका शोषण और बढ़ा।
  4. कृषि उत्पादों का मूल्य: कृषि उत्पादों के मूल्यों में गिरावट और मुनाफा दोनों ही किसानों के लिए लाभकारी नहीं थे। जब कीमतें गिरती थीं, तो किसानों की बचत कम हो जाती थी; और जब कीमतें बढ़ती थीं, तो भी उन्हें ज्यादा फायदा नहीं मिलता था क्योंकि जागीरदार लगान फसल के रूप में लेते थे।
  5. सामंतों के व्यवहार में बदलाव: अंग्रेजों की प्रशासनिक व्यवस्था अपनाने के कारण सामंतों का किसानों के प्रति पारंपरिक उदार और पैतृक दृष्टिकोण बदल गया, जिससे किसानों का शोषण बढ़ गया और उनमें असंतोष पैदा हुआ।

ये सभी कारण मिलकर किसानों को आंदोलन करने पर मजबूर कर रहे थे, जिससे राजस्थान में कई किसान विद्रोह हुए।
In simple words: राजस्थान में किसान आंदोलन कई कारणों से हुए: शासकों ने ब्रिटिश प्रभाव में जनता की उपेक्षा की, राजस्व और बेगार बहुत बढ़ा दिए गए, कृषि मजदूरों की संख्या बढ़ी और उनका शोषण हुआ, कृषि उत्पादों का उचित मूल्य नहीं मिला, और सामंतों का किसानों के प्रति व्यवहार कठोर हो गया।

🎯 Exam Tip: किसान आंदोलनों के कारणों को समझाते समय, आर्थिक शोषण, प्रशासनिक नीतियां और सामाजिक बदलाव जैसे विभिन्न पहलुओं को बिंदुवार प्रस्तुत करें।

 

Question 2. 1857 के विद्रोह के क्या कारण थे?
Answer: भारत में 1857 के विद्रोह के कई मुख्य कारण थे:

  1. लॉर्ड डलहौजी की हड़प नीति: लॉर्ड डलहौजी ने उत्तराधिकार के नियमों में बदलाव किया, जिसे 'व्यपगत सिद्धांत' या 'डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स' कहा जाता है। इस नीति के अनुसार, अगर किसी राजा का अपना पुत्र नहीं होता था, तो वह गोद लिए हुए पुत्र को अपना उत्तराधिकारी नहीं बना सकता था। इससे झांसी, सतारा, कोल्हापुर और जैतपुर जैसे कई राज्य ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिए गए, जिससे इन राज्यों के शासकों में गहरा असंतोष फैल गया।
  2. अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीतियां: अंग्रेजों ने भारत के विभिन्न राज्यों को अलग-अलग तरीकों से अपने साम्राज्य में मिलाया, जिससे वहां के राजाओं, जमींदारों, आम नागरिकों और सैनिकों में भारी असंतोष पैदा हुआ। यह नीति ब्रिटिश प्रभुत्व स्थापित करने की उनकी गहरी इच्छा का परिणाम थी।
  3. धार्मिक और सामाजिक हस्तक्षेप: ब्रिटिश सरकार ने भारतीय समाज और धर्म में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया था, जैसे ईसाई धर्म का प्रचार और सती प्रथा जैसे सामाजिक सुधारों के माध्यम से। इससे लोगों में यह डर फैल गया कि अंग्रेज उन्हें ईसाई बनाना चाहते हैं और उनकी संस्कृति को नष्ट करना चाहते हैं।
  4. चर्बी वाले कारतूस की घटना: यह अफवाह फैली कि नई राइफल के कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी लगी हुई है। इससे हिंदू और मुस्लिम दोनों सैनिक भड़क गए, क्योंकि यह उनके धार्मिक भावनाओं के खिलाफ था, और उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में हिस्सा लिया। यह घटना विद्रोह का तात्कालिक कारण बनी।

ये सभी कारण मिलकर एक बड़े विद्रोह में बदल गए, जिसने भारत में ब्रिटिश शासन को चुनौती दी और स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखी।
In simple words: 1857 के विद्रोह के मुख्य कारण थे लॉर्ड डलहौजी की हड़प नीति, अंग्रेजों की साम्राज्य विस्तार की नीतियां, धर्म में हस्तक्षेप का डर, और चर्बी वाले कारतूसों की अफवाह, जिसने सैनिकों और जनता को अंग्रेजों के खिलाफ भड़का दिया।

🎯 Exam Tip: 1857 के विद्रोह के कारणों को विस्तृत रूप से समझाते समय, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और सैन्य कारणों को अलग-अलग बिंदुओं में बताएं।

 

Question 3. भारत के जनजातीय आंदोलन के बारे में व्याख्या करें।
Answer: ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों के कारण भारत में कई आदिवासी समूह नाराज हो गए और उन्होंने सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। इनमें कोल, संथाल, मुंडा, भील और रोमसी जनजाति के लोग मुख्य थे।
1. **संन्यासी विद्रोह**- बंगाल में 1769-70 में भयानक अकाल पड़ने के बाद, जब अंग्रेजी शासन ने किसानों से बहुत सख्ती से कर वसूले, तो संन्यासी लोग नाराज हो गए। वे खेती के साथ-साथ धार्मिक यात्राएँ भी करते थे, लेकिन जब अंग्रेजों ने तीर्थ स्थानों पर जाने पर रोक लगा दी, तो संन्यासियों ने विद्रोह शुरू कर दिया।
2. **कोल विद्रोह**- अंग्रेजी सरकार की गलत नीतियों और स्थानीय शासकों के खराब व्यवहार के कारण कोल जनजाति का बहुत शोषण हुआ। इसी शोषण के खिलाफ उन्होंने विद्रोह किया। यह विद्रोह राँची, सिंहभूम, हजारीबाग, पलामू और मानभूम जैसे जिलों में फैल गया था।
3. **संथाल विद्रोह**- संथाल विद्रोह 1855-56 में अंग्रेजी शासन के खिलाफ एक बड़ा विद्रोह था। संथाल लोगों पर भूमिकर अधिकारियों का बुरा व्यवहार, पुलिस द्वारा परेशान करना और जमींदारों-साहूकारों द्वारा जबरदस्ती पैसे वसूलना इस विद्रोह के मुख्य कारण थे।
4. **भील विद्रोह**- भील जनजाति पश्चिमी तट के खानदेश जिले में रहती थी। 1812-19 तक इन लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया, जो उनके नए शासक थे। खेती की समस्याओं और नई सरकार के डर के कारण यह विद्रोह हुआ।
5. **रोमसी विद्रोह**- पश्चिमी घाट में रहने वाली रोमसी जनजाति भी अंग्रेजी शासन व्यवस्था से बहुत नाखुश थी। 1822 में उनके नेता चित्तर सिंह ने विद्रोह कर दिया और सतारा के आसपास के इलाकों को लूटा। 1825-26 में फिर से विद्रोह हुए, जिन्हें सेना ने दबा दिया। ये आंदोलन दिखाते हैं कि कैसे स्थानीय लोग अपने अधिकारों और परंपराओं की रक्षा के लिए विदेशी शासन के खिलाफ खड़े हुए।
In simple words: अंग्रेजों की नीतियों और शोषण से नाराज होकर भारत के आदिवासी समुदायों ने कई विद्रोह किए। संन्यासी, कोल, संथाल, भील और रोमसी विद्रोह उनमें से प्रमुख थे। वे अपनी जमीन, धर्म और सम्मान के लिए लड़े।

🎯 Exam Tip: जनजातीय आंदोलनों के कारणों और उनके प्रमुख नेताओं को याद रखें, साथ ही उन क्षेत्रों को भी जहाँ ये आंदोलन हुए थे।

 

Question 4. ब्रिटिश शासन काल में चलाए गए प्रमुख किसान आंदोलन के बारे में व्याख्या करें।
Answer: ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण किसान बहुत असंतुष्ट थे। इसलिए उन्होंने भारत के कई हिस्सों में आंदोलन किए। इनमें से कुछ मुख्य आंदोलन इस प्रकार हैं:
1. **बंगाल में नील उगाने वाले किसानों का विद्रोह**- यह आंदोलन अंग्रेज जमीन मालिकों के खिलाफ किया गया था। इसमें किसानों को जमींदारों, साहूकारों और गाँव के सभी लोगों का साथ मिला। 19वीं सदी में कुछ अंग्रेज अफसरों ने बंगाल और बिहार में जमीन लेकर नील की खेती शुरू की। वे किसानों को ऐसी शर्तों पर नील उगाने के लिए मजबूर करते थे जो उनके लिए बिल्कुल फायदेमंद नहीं थीं।
4. **चंपारण किसान आंदोलन**- उत्तरी बिहार के चंपारण जिले में, यूरोपीय नील के मालिक भारतीय किसानों पर बहुत जुल्म करते थे। इन किसानों ने इसके खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। बाद में, सरकार ने एक नया कृषि कानून बनाया जिसके तहत नील किसानों को जबरदस्ती नील की खेती करने से रोक दिया गया।
5. **खेड़ा किसान आंदोलन**- यह आंदोलन मुंबई सरकार के खिलाफ हुआ था। 1818 की वसंत में फसलें खराब हो गईं, लेकिन फिर भी मुंबई सरकार लगान की मांग कर रही थी। जबकि नियम यह कहते थे कि अगर फसल 25% से कम हो, तो लगान माफ हो जाना चाहिए। किसानों ने इसके खिलाफ आंदोलन शुरू किया। इन आंदोलनों ने ब्रिटिश सरकार को किसानों के शोषणकारी तरीकों पर सोचने के लिए मजबूर किया और कई जगह सुधार हुए।
In simple words: किसानों ने ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण कई आंदोलन किए। बंगाल में नील किसानों का विद्रोह, चंपारण आंदोलन (जबरदस्ती नील की खेती के खिलाफ) और खेड़ा आंदोलन (लगान माफी के लिए) इनमें मुख्य थे। इन आंदोलनों ने किसानों के अधिकारों की लड़ाई को आगे बढ़ाया।

🎯 Exam Tip: किसान आंदोलनों के मुख्य कारण (जैसे अत्यधिक लगान, शोषण) और उनके परिणामस्वरूप हुए सुधारों पर ध्यान दें।

 

Question 5. काँग्रेस के काल को कितने चरणों में बाँटा जा सकता है। प्रत्येक चरण की विस्तारपूर्वक व्याख्या करें।
Answer: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समय को मुख्य रूप से दो चरणों में बांटा जा सकता है। पहला चरण 1885 से 1905 तक था, जिसे उदारवादी दौर कहते हैं। दूसरा चरण 1905 से 1919 तक था, जिसे गरमपंथी दौर कहा जाता है।
**प्रथम चरण (उदारवादी युग)**: कांग्रेस के पहले चरण के नेता जैसे दादाभाई नौरोजी और फिरोजशाह मेहता अंग्रेजी शासन के पक्ष में थे। उन्हें लगता था कि अंग्रेज न्यायप्रिय लोग हैं और उनके जाने से देश में अव्यवस्था फैल जाएगी। इस समय कांग्रेस ने आजादी की मांग नहीं की, बल्कि भारतीयों के लिए कुछ छूट और सुविधाएँ मांगीं। उन्होंने ब्रिटिश शासन के भीतर ही सुधारों की वकालत की।
**गरमपंथी चरण**: 19वीं सदी के आखिर और 20वीं सदी की शुरुआत में कांग्रेस में गरमपंथी सोच वाले लोगों का प्रभाव बढ़ा। लोकमान्य तिलक जैसे नेताओं का मानना था कि स्वराज के बिना कोई सामाजिक सुधार या अच्छी शिक्षा संभव नहीं है। तिलक, विपिन चंद्र पाल, अरविंद घोष और लाला लाजपत राय इस आंदोलन के मुख्य नेता थे। गरमपंथियों ने विदेशी सामानों का बहिष्कार करने और स्वदेशी उत्पादों को अपनाने के लिए जोर दिया। इन दोनों चरणों ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जहाँ उदारवादियों ने संवैधानिक सुधारों पर जोर दिया और गरमपंथियों ने पूर्ण स्वराज की नींव रखी।
In simple words: कांग्रेस के काल को दो मुख्य भागों में बांटा गया है। पहले चरण (1885-1905) में उदारवादी नेता थे जो अंग्रेजों से सुधार चाहते थे। दूसरे चरण (1905-1919) में गरमपंथी नेता थे जो स्वराज चाहते थे और उन्होंने विदेशी चीजों का बहिष्कार करने को कहा।

🎯 Exam Tip: कांग्रेस के दोनों चरणों के बीच के मुख्य अंतरों को जानें- उदारवादियों का लक्ष्य, तरीके, और नेता बनाम गरमपंथियों का लक्ष्य, तरीके, और नेता।

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