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Detailed साहित्य का इतिहास आधुनिक काल RBSE Solutions for Class 12 Hindi
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Class 12 Hindi साहित्य का इतिहास आधुनिक काल RBSE Solutions PDF
RBSE Class 12 Hindi साहित्य का इतिहास वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका का सम्पादन भार कब से सँभाला था ?
(क) 1900 ई.
(ख) 1920 ई.
(ग) 1903 ई.
(घ) 1910 ई.
Answer: (क) 1900 ई.
In simple words: महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' पत्रिका का काम 1900 ईस्वी से देखना शुरू किया था।
🎯 Exam Tip: साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रकाशन वर्ष और उनके संपादकों के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर 'सरस्वती' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के लिए।
Question 3. 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' नामक गीत प्रसाद के किस नाटक का है ?
(क) स्कन्द गुप्त
(ख) ध्रुवस्वामिनी
(ग) चन्द्रगुप्त
(घ) चाणक्य
Answer: (ग) चन्द्रगुप्त
In simple words: 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' गीत जयशंकर प्रसाद के 'चन्द्रगुप्त' नाटक का एक हिस्सा है।
🎯 Exam Tip: प्रसिद्ध गीतों और पंक्तियों को उनके लेखक और संबंधित कृतियों से जोड़ना याद रखें, यह अक्सर परीक्षाओं में पूछा जाता है।
Question 4. इनमें से कौन-सा उपन्यास सबसे पहले लिखा गया ?
(क) दिल्ली का दलाल
(ख) सेवासदन
(ग) ठेठ हिन्दी का ठाठ
(घ) चन्द्रकान्ता
Answer: (घ) चन्द्रकान्ता
In simple words: दिए गए उपन्यासों में से 'चन्द्रकान्ता' उपन्यास सबसे पहले लिखा गया था। यह हिन्दी का एक बहुत पुराना और प्रसिद्ध उपन्यास है।
🎯 Exam Tip: हिन्दी साहित्य के विकास क्रम में प्रमुख रचनाओं और उनके प्रकाशन वर्ष को याद रखना मददगार होता है।
Question 5. 'टोपी शुक्ला' किसकी कृति है ?
(क) राही मासूम रजा
(ख) मनोहरश्याम जोशी
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) पाण्डेय बेचन शर्मा
Answer: (क) राही मासूम रजा
In simple words: 'टोपी शुक्ला' राही मासूम रजा द्वारा लिखी गई एक रचना है।
🎯 Exam Tip: प्रमुख लेखकों और उनकी प्रसिद्ध रचनाओं के नाम याद रखना साहित्य के प्रश्नों को हल करने में मदद करता है।
Question 7. 'झूठा सच' का प्रकाशन वर्ष है -
(क) 1947 ई.
(ख) 1957 ई.
(ग) 1960 ई.
(घ) 1968 ई.
Answer: (ग) 1960 ई.
In simple words: 'झूठा सच' नाम की किताब साल 1960 में पहली बार छापी गई थी।
🎯 Exam Tip: साहित्यिक कृतियों के प्रकाशन वर्ष याद रखने से आप उनके ऐतिहासिक संदर्भ को भी समझ सकते हैं।
Question 8. 'लखनऊ मेरा लखनऊ' के लेखक इनमें से कौन है ?
(क) रामदरश मिश्र
(ख) अमृतलाल नागर
(ग) मनोहरश्याम जोशी
(घ) भगवतीचरण वर्मा
Answer: (ख) अमृतलाल नागर
In simple words: 'लखनऊ मेरा लखनऊ' किताब अमृतलाल नागर ने लिखी है।
🎯 Exam Tip: लेखकों और उनकी रचनाओं को याद करते समय, प्रमुख शहरों या स्थानों से संबंधित शीर्षकों पर विशेष ध्यान दें।
Question 9. हिन्दी का सांस्कृतिक उपन्यासकार इनमें से कौन है ?
(क) अज्ञेय
(ख) धर्मवीर भारती
(ग) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(घ) जयशंकर प्रसाद
Answer: (ग) हजारी प्रसाद द्विवेदी
In simple words: हजारी प्रसाद द्विवेदी को हिन्दी साहित्य में सांस्कृतिक उपन्यासकार के रूप में जाना जाता है। उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति की गहरी समझ दिखती है।
🎯 Exam Tip: विभिन्न साहित्यकारों को उनकी लेखन शैली और मुख्य विषयों के आधार पर वर्गीकृत करना याद रखें, जैसे सांस्कृतिक, आंचलिक, या मनोवैज्ञानिक।
Question 12. गणेश शंकर विद्यार्थी किस युग के निबंधकार हैं ?
(क) भारतेन्दु युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) शुक्ल युग
(घ) शुक्लोत्तर युग
Answer: (ख) द्विवेदी युग
In simple words: गणेश शंकर विद्यार्थी द्विवेदी युग के लेखक थे, जिन्होंने निबंध खूब लिखे।
🎯 Exam Tip: विभिन्न साहित्यिक युगों के प्रमुख लेखकों और उनकी विधाओं को याद रखना परीक्षा में मदद करता है।
Question 13. विद्यानिवास मिश्र का निबंध संग्रह 'तुम चन्दन हम पानी' कब प्रकाशित हुआ ?
(क) 1953 ई.
(ख) 1957 ई.
(ग) 1960 ई.
(घ) 1965 ई.
Answer: (ख) 1957 ई.
In simple words: विद्यानिवास मिश्र का निबंध संग्रह 'तुम चन्दन हम पानी' साल 1957 में प्रकाशित हुआ था।
🎯 Exam Tip: लेखकों के महत्वपूर्ण कृतियों के प्रकाशन वर्ष याद रखें, खासकर उन रचनाओं के जो युग परिवर्तन का प्रतीक मानी जाती हैं।
Question 14. इतिहास और संस्कृति की पृष्ठभूमि में लिखने वाला निबंधकार इनमें से कौन है ?
(क) भगवतशरण उपाध्याय
(ख) रामवृक्ष बेनीपुरी
(ग) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(घ) कुबेरनाथ राय
Answer: (घ) कुबेरनाथ राय
In simple words: कुबेरनाथ राय ऐसे निबंधकार हैं जो अपनी रचनाओं में इतिहास और संस्कृति की बातों को मुख्य रूप से बताते हैं।
🎯 Exam Tip: निबंधकारों की लेखन शैली और विषयों की पहचान करना महत्वपूर्ण है। कुबेरनाथ राय जैसे लेखक अक्सर सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विषयों पर लिखते हैं।
RBSE Class 12 Hindi साहित्य का इतिहास अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. भारतेन्दु युग के चार प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
Answer: भारतेन्दु युग के चार प्रमुख कवि इस प्रकार हैं:
1. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
2. प्रताप नारायण मिश्र
3. बदरीनाथ चौधरी 'प्रेमघन'
4. अम्बिकादत्त व्यास।
In simple words: भारतेन्दु युग के मुख्य कवियों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रताप नारायण मिश्र, बदरीनाथ चौधरी 'प्रेमघन' और अम्बिकादत्त व्यास शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: प्रमुख साहित्यिक युगों के कम से कम चार-पांच मुख्य कवियों/लेखकों के नाम उनकी महत्वपूर्ण रचनाओं के साथ याद रखें।
Question 2. भारतेन्दु रचित चार नाटकों के नाम लिखिए।
Answer: भारतेन्दु द्वारा लिखे गए चार नाटक हैं:
1. सत्य हरिश्चन्द्र
2. भारत दुर्दशा
3. नीलदेवी
4. अंधेर नगरी।
In simple words: भारतेन्दु ने 'सत्य हरिश्चन्द्र', 'भारत दुर्दशा', 'नीलदेवी' और 'अंधेर नगरी' जैसे नाटक लिखे हैं।
🎯 Exam Tip: किसी भी लेखक की प्रसिद्ध कृतियों को याद करते समय, नाटक, उपन्यास, कहानी जैसे उनकी विभिन्न विधाओं को अलग-अलग सूचीबद्ध करें।
Question 3. भारतेन्दु युग में किस-किस प्रकार के उपन्यास लिखे गए?
Answer: भारतेन्दु युग में कई तरह के उपन्यास लिखे गए। इनमें सामाजिक, ऐतिहासिक, तिलस्मी, जासूसी और रोमानी (प्रेम) उपन्यास प्रमुख थे।
In simple words: भारतेन्दु काल में सामाजिक, ऐतिहासिक, जासूसी और प्रेम कहानियां वाले उपन्यास लिखे गए।
🎯 Exam Tip: किसी साहित्यिक युग की विशेषता बताते समय, उस समय की प्रमुख साहित्यिक विधाओं और उनकी शैलियों का उल्लेख करें।
Question 6. अयोध्यासिंह उपाध्याय की प्रसिद्धि किसलिए है?
Answer: अयोध्यासिंह उपाध्याय को खड़ी बोली हिन्दी में पहला महाकाव्य 'प्रियप्रवास' लिखने के लिए जाना जाता है। यह उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना है।
In simple words: अयोध्यासिंह उपाध्याय 'प्रियप्रवास' नाम का पहला खड़ी बोली हिन्दी महाकाव्य लिखने के लिए मशहूर हैं।
🎯 Exam Tip: लेखकों को उनकी सबसे महत्वपूर्ण या 'पहली' रचना के लिए याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अक्सर परीक्षाओं में पूछा जाता है।
Question 7. 'उसने कहा था' कहानी के लेखक कौन थे?
Answer: 'उसने कहा था' कहानी के लेखक चन्द्रधर शर्मा गुलेरी थे। यह हिन्दी की एक बहुत ही प्रसिद्ध कहानी है।
In simple words: चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने 'उसने कहा था' कहानी लिखी थी।
🎯 Exam Tip: प्रमुख कहानियों और उनके लेखकों के नाम याद रखना साहित्य से संबंधित प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 8. द्विवेदी युग में किन राष्ट्रीय नेताओं की जीवनियाँ लिखी गई थीं?
Answer: द्विवेदी युग में लाला लाजपतराय, अरविंद घोष, गाँधीजी, मदन मोहन मालवीय और लोकमान्य तिलक जैसे कई राष्ट्रीय नेताओं की जीवनियाँ लिखी गईं।
In simple words: द्विवेदी युग में लाला लाजपतराय, अरविंद घोष, गाँधीजी, मदन मोहन मालवीय और लोकमान्य तिलक जैसे बड़े नेताओं की जीवनियां लिखी गई थीं।
🎯 Exam Tip: किसी साहित्यिक युग के दौरान लिखी गई प्रमुख जीवनियों और उनके विषयों को याद रखें, खासकर जब वे राष्ट्रीय महत्व के हों।
Question 9. स्वामी सत्यदेव परिव्राजक लिखित यात्रावृत्तों के नाम लिखिए।
Answer: स्वामी सत्यदेव परिव्राजक द्वारा लिखे गए यात्रावृत्त हैं:
1. अमरीका दिग्दर्शन
2. मेरी कैलाश-यात्रा
3. अमरीका भ्रमण।
In simple words: स्वामी सत्यदेव परिव्राजक ने 'अमरीका दिग्दर्शन', 'मेरी कैलाश-यात्रा' और 'अमरीका भ्रमण' जैसे यात्रावृत्त लिखे हैं।
🎯 Exam Tip: यात्रा साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले लेखकों और उनकी प्रमुख यात्रावृत्तों को याद रखें।
Question 12. जयशंकर प्रसाद लिखित तीन प्रसिद्ध कहानियों के नाम लिखिए।
Answer: जयशंकर प्रसाद की तीन प्रसिद्ध कहानियाँ हैं:
1. आकाशदीप
2. पुरस्कार
3. गुण्डा।
In simple words: जयशंकर प्रसाद की मशहूर कहानियों में 'आकाशदीप', 'पुरस्कार' और 'गुण्डा' शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: प्रमुख साहित्यकारों की विभिन्न विधाओं की रचनाओं को अलग-अलग याद करें, जैसे कहानियां, नाटक, उपन्यास, कविताएं।
Question 13. छायावादी काव्यधारा के समर्थक चार आलोचकों के नाम लिखिए।
Answer: छायावाद के समर्थक चार आलोचक ये हैं:
1. नन्ददुलारे वाजपेयी
2. डा. नगेन्द्र
3. सुमित्रानंदन पंत
4. शांतिप्रिय द्विवेदी।
In simple words: नन्ददुलारे वाजपेयी, डा. नगेन्द्र, सुमित्रानंदन पंत और शांतिप्रिय द्विवेदी जैसे आलोचकों ने छायावादी काव्यधारा का समर्थन किया था।
🎯 Exam Tip: किसी साहित्यिक धारा के आलोचकों और समर्थकों के नाम याद रखना साहित्य के गहन अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 14. रोमानीधारा की चार रचनाएँ और उनके रचनाकारों के नामों का उल्लेख कीजिए।
Answer: रोमानीधारा की चार रचनाएँ और उनके लेखक इस प्रकार हैं:
1. 'कदलीवन' – नरेन्द्र वर्मा
2. 'पंछी' – गोपालसिंह नेपाली
3. 'छबि के बंधन' – भारत भूषण
4. 'निशा-निमंत्रण'- हरिवंश राय बच्चन।
In simple words: रोमानीधारा की कुछ प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखक हैं: 'कदलीवन' (नरेन्द्र वर्मा), 'पंछी' (गोपालसिंह नेपाली), 'छबि के बंधन' (भारत भूषण) और 'निशा-निमंत्रण' (हरिवंश राय बच्चन)।
🎯 Exam Tip: विभिन्न साहित्यिक धाराओं की प्रमुख रचनाओं को उनके रचनाकारों के साथ याद करें, यह विभिन्न युगों की विशेषताओं को समझने में मदद करता है।
Question 17. नई कविता की एक विशेषता बताइए।
Answer: नई कविता में परंपरागत जीवन मूल्यों की एक नए दृष्टिकोण से व्याख्या की गई है। यह पुरानी सोच को नए नज़रिए से देखती है और उसे आधुनिक संदर्भों में समझाती है।
In simple words: नई कविता पुराने विचारों को नए ढंग से समझाती है।
🎯 Exam Tip: नई कविता की विशेषताओं को संक्षेप में और स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत करें।
Question 18. 'बावरा अहेरी' रचना के रचनाकार कौन हैं? लिखिए।
Answer: 'बावरा अहेरी' रचना के रचयिता सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन हैं, जिन्हें 'अज्ञेय' के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने यह कविता संग्रह लिखा था।
In simple words: 'बावरा अहेरी' को अज्ञेय ने लिखा है।
🎯 Exam Tip: रचना और रचनाकार के नाम सही ढंग से लिखें, वर्तनी की त्रुटि से बचें।
Question 19. धर्मवीर भारती तथा मोहन राकेश लिखित एक-एक एकांकी का नाम लिखिए।
Answer: धर्मवीर भारती द्वारा लिखित एकांकी 'नदी प्यासी थी' है, जबकि मोहन राकेश द्वारा लिखित एकांकी का नाम 'अंडे के छिलके' है। यह दोनों ही प्रसिद्ध एकांकी हैं।
In simple words: धर्मवीर भारती ने 'नदी प्यासी थी' और मोहन राकेश ने 'अंडे के छिलके' एकांकी लिखी।
🎯 Exam Tip: दोनों लेखकों की एकांकी के नाम स्पष्ट रूप से उल्लेखित करें।
Question 20. 'शेखर एक जीवनी' किस गद्य विधा की रचना है?
Answer: 'शेखर एक जीवनी' उपन्यास विधा की रचना है। यह एक लंबी और विस्तृत कहानी है जो एक व्यक्ति के जीवन पर आधारित है।
In simple words: 'शेखर एक जीवनी' एक उपन्यास है।
🎯 Exam Tip: किसी भी साहित्यिक कृति की विधा को पहचानना महत्वपूर्ण है।
Question 21. समकालीन कहानी को और किस नाम से जाना जाता है?
Answer: समकालीन कहानी को 'नई कहानी' नाम से भी जाना जाता है। यह हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था।
In simple words: समकालीन कहानियों को 'नई कहानी' भी कहते हैं।
🎯 Exam Tip: पर्यायवाची नामों को याद रखें, क्योंकि प्रश्न में किसी भी नाम का उपयोग हो सकता है।
Question 22. 'मुक्तिबोध' के दो निबंध-संग्रहों के नाम लिखिए।
Answer: 'मुक्तिबोध' के दो निबंध-संग्रह हैं: 'नयी कविता का आत्मसंघर्ष' और 'एक साहित्यिक की डायरी'। ये उनके गहन विचारों को दर्शाते हैं।
In simple words: मुक्तिबोध के दो निबंध संग्रह 'नयी कविता का आत्मसंघर्ष' और 'एक साहित्यिक की डायरी' हैं।
🎯 Exam Tip: लेखक और उनकी रचनाओं के नाम सटीकता से प्रस्तुत करें।
Question 1. भारतेन्दु युग के साहित्य पर समकालीन जन चेतना और पुनर्जागरण का प्रभाव किस रूप में पड़ा? लिखिए।
Answer: भारतेन्दु युग के साहित्य पर उस समय की जागृति और नए विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा। लोग सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्रों में बहुत सक्रिय हो गए, और ये सभी पहलू आपस में जुड़े हुए थे। इस कारण उस समय के कवियों ने देश प्रेम, स्वदेशी चीजों का उपयोग, गायों की रक्षा, बाल विवाह रोकना, शिक्षा का प्रचार और शराबबंदी जैसे विषयों पर खूब लिखा। इस युग की एक खास बात यह थी कि लोगों में देश के प्रति राष्ट्रीय भावना बहुत बढ़ गई थी।
In simple words: भारतेन्दु युग के साहित्य पर उस समय की जागृति और नए विचारों का गहरा असर पड़ा। कवियों ने देश प्रेम, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय एकता जैसे विषयों पर खूब रचनाएँ कीं।
🎯 Exam Tip: भारतेन्दु युग के साहित्य पर पड़े प्रभावों को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहलुओं में बाँटकर लिखें।
Question 2. भारतेन्दुकालीन प्रसिद्ध कवियों का नामोल्लेख कीजिए।
Answer: भारतेन्दु युग में सौ से ज़्यादा कवियों ने अलग-अलग तरह की कविताएँ लिखीं। इनमें मुख्य कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन', प्रतापनारायण मिश्र, जगमोहन सिंह, अम्बिकादत्त व्यास और राधाकृष्णदास थे। इनके अलावा, श्रीधर पाठक (1859-1928) और बालमुकुन्द गुप्त (1865-1907) ने भी इस युग में कविताएँ लिखनी शुरू कर दी थीं।
In simple words: भारतेन्दु युग के मुख्य कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन', प्रतापनारायण मिश्र, जगमोहन सिंह, अम्बिकादत्त व्यास, राधाकृष्णदास, श्रीधर पाठक और बालमुकुन्द गुप्त थे।
🎯 Exam Tip: प्रमुख कवियों के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और उनके समकालीनों के।
Question 3. भारतेन्दु युग में किन-किन विषयों पर नाट्य रचना हुई? लिखिए।
Answer: भारतेन्दु युग में नाटक पौराणिक (पुराने धर्म-कथाओं पर आधारित), ऐतिहासिक (इतिहास से संबंधित), रोमानी (प्रेम कहानियों पर आधारित) और उस समय की सामाजिक समस्याओं को लेकर लिखे गए। ऐतिहासिक नाटकों के उदाहरणों में भारतेन्दु का 'नीलदेवी' और श्रीनिवासदास का 'संयोगिता स्वयंवर' शामिल हैं। रोमानी नाटकों में श्रीनिवासदास का 'रणधीर प्रेममोहिनी' और किशोरीलाल गोस्वामी का 'प्रणयिनी परिणय' प्रमुख हैं।
In simple words: भारतेन्दु युग में पौराणिक, ऐतिहासिक, रोमानी और सामाजिक विषयों पर नाटक लिखे गए थे।
🎯 Exam Tip: नाटकों के प्रकारों के साथ-साथ उनके उदाहरणों को याद रखना बेहतर अंक दिला सकता है।
Question 4. द्विवेदी युग में कविता की भाषा और विषयों में क्या परिवर्तन आया ? इसका श्रेय किसे जाता है?
Answer: द्विवेदी युग में कविता की भाषा और विषयों में बड़ा बदलाव आया। जब आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी 'सरस्वती' पत्रिका के संपादक बने, तो उन्होंने कवियों को अलग-अलग विषयों पर लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके प्रयासों से कविता की मुख्य भाषा ब्रजभाषा की जगह खड़ी बोली बन गई। कवि अब कई तरह के विषयों पर लिखने लगे, और व्याकरण की दृष्टि से भाषा भी मानक और साफ-सुथरी हो गई। इस महत्वपूर्ण बदलाव का श्रेय आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को जाता है।
In simple words: द्विवेदी युग में कविता की भाषा खड़ी बोली बन गई और नए विषयों पर भी लिखा जाने लगा, जिसका श्रेय आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को है।
🎯 Exam Tip: द्विवेदी जी के योगदान को रेखांकित करते हुए भाषा और विषय में आए परिवर्तनों को स्पष्ट करें।
Question 6. द्विवेदी युग के रचनाकार गोपालराम गहमरी किस विधा में लेखन के लिए प्रसिद्ध हैं? लिखिए।
Answer: द्विवेदी युग के लेखक गोपालराम गहमरी जासूसी उपन्यासों के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं। उन्होंने हिंदी में जासूसी उपन्यास लिखने की शुरुआत की। उन्होंने आर्थर कॉनन डॉयल के उपन्यास 'ए स्टडी इन स्कारलेट' का अनुवाद 'गोविन्दराम' नाम से किया था। उनके कुछ जाने-माने जासूसी उपन्यास हैं: 'सरकटी लाश', 'चक्करदार चोरी', 'जासूस', 'गुप्त भेद' और 'जासूस की ऐयारी'।
In simple words: गोपालराम गहमरी द्विवेदी युग के जासूसी उपन्यासकार थे। उन्होंने कई प्रसिद्ध जासूसी उपन्यास लिखे।
🎯 Exam Tip: गोपालराम गहमरी के विशेष योगदान (जासूसी उपन्यास) को याद रखें और उनकी कुछ प्रमुख रचनाओं के नाम भी।
Question 7. द्विवेदीयुगीन कहानीकार प्रेमचंद जी की प्रमुख कहानियों के नाम लिखिए।
Answer: प्रेमचंद जी ने लगभग 300 कहानियाँ लिखी हैं। उनकी कुछ मुख्य कहानियाँ हैं: 'बलिदान', 'आत्माराम', 'बूढ़ीकाकी', 'विचित्र होली', 'गृहदाह', 'परीक्षा', 'आपबीती', 'उद्धार', 'सवासेर गेहूँ', 'शतरंज के खिलाड़ी', 'माता का हृदय', 'कजाकी', 'सुजान भगत', 'इस्तीफा', 'अलग्योझा', 'पूस की रात', 'ठाकुर का कुआं' और 'बेटों वाली विधवा'। ये सभी उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं।
In simple words: प्रेमचंद जी की कुछ खास कहानियाँ 'बलिदान', 'आत्माराम', 'बूढ़ीकाकी', 'शतरंज के खिलाड़ी' और 'पूस की रात' हैं।
🎯 Exam Tip: प्रेमचंद की कहानियों के नाम याद करते समय, उनके मुख्य विषयों या पात्रों को जोड़कर याद करें।
Question 8. द्विवेदी युग में 'संस्मरण' विधा की स्थिति क्या थी? लिखिए।
Answer: द्विवेदी युग में 'संस्मरण' (यादें लिखना) विधा की शुरुआत हुई। 'सरस्वती' पत्रिका में कई संस्मरण प्रकाशित हुए, जिनमें 'महावीर प्रसाद द्विवेदी के अनुमोदन का अन्त' और 'सभा की सभ्यता' प्रमुख थे। रामकुमार खेमका और प्यारेलाल मिश्र जैसे लेखकों ने भी संस्मरण लिखे। इस युग में 'हरिऔध जी के संस्मरण' पुस्तक के रूप में प्रकाशित होने वाला एक खास संस्मरण संग्रह था।
In simple words: द्विवेदी युग में 'संस्मरण' लेखन की शुरुआत हुई और कुछ खास पत्रिका में प्रकाशित हुए।
🎯 Exam Tip: 'संस्मरण' विधा के आरंभिक विकास में 'सरस्वती' पत्रिका की भूमिका और 'हरिऔध जी के संस्मरण' की पहचान करें।
Question 9. छायावाद काल के कहानीकार जैनेन्द्र तथा अज्ञेय की कहानियों में अंतर स्पष्ट करते हुए, अज्ञेय की प्रमुख कहानियों का उल्लेख कीजिए।
Answer: छायावाद काल में जैनेन्द्र और अज्ञेय दोनों ही महत्वपूर्ण कहानीकार थे। जैनेन्द्र की कहानियों के पात्र अपने मन के अंदर की दुनिया (मन:संसार) में डूबे रहते थे, जबकि अज्ञेय के पात्र बाहर की दुनिया और समाज की समस्याओं से जूझते थे। अज्ञेय ने भारतीय समाज की पुरानी सोच, शोषण और दुनिया में चल रहे संघर्षों पर कई कहानियाँ लिखीं। उनका पहला कहानी संग्रह 'त्रिपथगा' है। उनकी अन्य प्रसिद्ध कहानियाँ 'कड़ियाँ', 'अमर वल्लरी', 'मैना', 'सिगनेलर', 'रेल की सीटी', 'रोज' और 'हरसिंगार' हैं।
In simple words: जैनेन्द्र की कहानियाँ मन की दुनिया पर थीं, जबकि अज्ञेय की कहानियाँ समाज की समस्याओं पर। अज्ञेय की प्रमुख कहानियों में 'त्रिपथगा', 'कड़ियाँ' और 'रोज' शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: जैनेन्द्र और अज्ञेय के लेखन शैली के मुख्य अंतरों को स्पष्ट करें और अज्ञेय की प्रमुख कहानियों के नाम याद रखें।
Question 11. छायावाद युग में 'जीवनी' विधा के विकास का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
Answer: छायावाद युग में 'जीवनी' (किसी के जीवन की कहानी) लिखने का काम बहुत हुआ। इस समय देश के बड़े नेताओं पर कई जीवनियाँ लिखी गईं, जैसे 'देशभक्त लाला लाजपतराय', 'बालगंगाधर तिलक' और 'चंपारन में महात्मा गांधी'। भारतीय इतिहास के बड़े पुरुषों और महिलाओं पर भी जीवनियाँ लिखी गईं, जिनमें 'पृथ्वीराज चौहान' और 'महाराणा प्रतापसिंह' प्रमुख हैं।
In simple words: छायावाद युग में जीवनी लेखन बहुत बढ़ा, खासकर राष्ट्रीय नेताओं और ऐतिहासिक हस्तियों पर कई जीवनियाँ लिखी गईं।
🎯 Exam Tip: जीवनी लेखन के विकास में राष्ट्रीय नेताओं और ऐतिहासिक हस्तियों के योगदान को दर्शाएं।
Question 12. छायावाद काल में संस्मरणात्मक रेखाचित्र' नामक नई विधा के लोखकों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
Answer: छायावाद काल में 'संस्मरणात्मक रेखाचित्र' (यादों और चरित्रों का वर्णन) नामक एक नई लेखन विधा शुरू हुई। बनारसीदास चतुर्वेदी और महादेवी वर्मा ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्रीराम शर्मा का 'बोलती प्रतिमा' एक खास रेखाचित्र है। महादेवी वर्मा के प्रसिद्ध रेखाचित्रों में 'रामा', 'बिन्दु' और 'घीसा' शामिल हैं। चतुर्वेदी जी ने संतों, समाजसेवियों और साहित्यकारों पर कई रेखाचित्र लिखे।
In simple words: छायावाद में 'संस्मरणात्मक रेखाचित्र' विधा शुरू हुई, जिसमें बनारसीदास चतुर्वेदी और महादेवी वर्मा ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
🎯 Exam Tip: संस्मरणात्मक रेखाचित्र के प्रमुख लेखकों और उनकी प्रसिद्ध रचनाओं के नाम याद रखें।
Question 13. छायावादोत्तर काल का आरम्भ कब से माना जाता है? इसका संक्षिप्त परिचय दीजिए।
Answer: छायावादोत्तर काल की शुरुआत लगभग 1936 ईस्वी में छायावाद युग के खत्म होने के बाद मानी जाती है। इस दौर के साहित्य में कई नए विचार और धाराएँ देखने को मिलीं। इसमें व्यक्तिगत भावनाओं की गहराई, सामाजिक जागरूकता, प्रेमपूर्ण लेखन और बौद्धिक यथार्थवाद जैसे दृष्टिकोण विकसित हुए। इस समय की मुख्य काव्य धाराएँ थीं: राष्ट्रीय-सांस्कृतिक कविता, उत्तर छायावाद, व्यक्तिगत गीतिकाव्य, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता।
In simple words: छायावादोत्तर काल 1936 ईस्वी के बाद शुरू हुआ। इसमें साहित्य में नए विचार, सामाजिक जागरूकता और कई नई काव्य धाराएँ आईं।
🎯 Exam Tip: छायावादोत्तर काल के आरंभिक वर्ष और उसकी मुख्य साहित्यिक प्रवृत्तियों को याद रखें।
Question 14. छायावाद युग की प्रमुख राष्ट्रीय तथा सांस्कृतिक रचनाओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
Answer: छायावाद युग की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्य धारा में कई महत्वपूर्ण रचनाएँ शामिल हैं। इनमें 'नहुष', 'कुणालगीत', 'जयभारत', 'माता', 'समर्पण', 'युगचरण', 'हुंकार', 'कुरुक्षेत्र' और 'रश्मिरथी' जैसी रचनाएँ प्रमुख हैं। इन रचनाओं में देश प्रेम, संस्कृति और राष्ट्रीय गौरव की भावना को बढ़ावा दिया गया था।
In simple words: छायावाद युग में राष्ट्रीय और सांस्कृतिक विषयों पर 'नहुष', 'जयभारत', 'हुंकार' और 'कुरुक्षेत्र' जैसी कई महत्वपूर्ण रचनाएँ लिखी गईं।
🎯 Exam Tip: छायावाद युग की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक रचनाओं के नाम और उनके मुख्य विषयों को याद रखें।
Question 16. अज्ञेय जी ने 'प्रयोगवाद' के आशय को लेकर क्या कहा है? लिखिए।
Answer: अज्ञेय जी ने 'प्रयोगवाद' शब्द के बारे में फैली गलतफहमी को दूर करते हुए कहा है कि "प्रयोग खुद में कोई लक्ष्य नहीं है, बल्कि वह एक तरीका है।" उन्होंने बताया कि यह दोहरा तरीका है: पहला, कवि जिस सच्चाई को बताना चाहता है, उसे जानने का तरीका; और दूसरा, उस सच्चाई को बताने के तरीके और साधनों को जानने का तरीका। इस युग के कवियों के विचार और विषय अलग-अलग थे। प्रयोगवादी कविताओं में अक्सर मध्यमवर्गीय समाज के गिरते हुए जीवन को दिखाया जाता है।
In simple words: अज्ञेय ने कहा कि 'प्रयोगवाद' खुद कोई लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह सच्चाई को जानने और उसे बताने का एक तरीका है।
🎯 Exam Tip: अज्ञेय द्वारा 'प्रयोगवाद' की परिभाषा और उसके दोहरे उद्देश्य को स्पष्ट रूप से समझाएं।
Question 17. 'तार सप्तक' प्रथम तथा द्वितीय के कवियों का नामोल्लेख कीजिए।
Answer: 'प्रथम तार सप्तक' (1943 में प्रकाशित) के सात कवि थे: नेमिचन्द जैन, गजानन माधव मुक्तिबोध, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरिजा कुमार माथुर, रामविलास शर्मा और अज्ञेय। 'द्वितीय तार सप्तक' (1951 में प्रकाशित) के सात कवि थे: भवानीप्रसाद मिश्र, शकुन्तला माथुर, हरिनारायण व्यास, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय और धर्मवीर भारती।
In simple words: 'प्रथम तार सप्तक' के कवि नेमिचन्द जैन, मुक्तिबोध, भारतभूषण अग्रवाल आदि थे, और 'द्वितीय तार सप्तक' के कवि भवानीप्रसाद मिश्र, शकुन्तला माथुर, धर्मवीर भारती आदि थे।
🎯 Exam Tip: दोनों 'तार सप्तक' के कवियों के नाम याद रखना परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 18. 'प्रयोगवादी कवि यथार्थवादी हैं।' इस कथन पर प्रकाश डालिए।
Answer: यह कथन सही है कि प्रयोगवादी कवि यथार्थवादी होते हैं। वे अपनी कविताओं में भावनाओं की बजाय समझ और बुद्धिमानी को महत्व देते हैं। ये कवि मध्यम वर्ग के लोगों के जीवन की उलझनों, निराशाओं, अविश्वास, हार और मानसिक लड़ाई-झगड़े को बहुत ही समझदारी से सामने लाते हैं। प्रयोगवादी कविता ने छोटे आदमी की कमियों और खूबियों को दिखाते हुए, उसके प्रति हमदर्दी के साथ सोचने का एक नया तरीका बताया है।
In simple words: प्रयोगवादी कवि यथार्थवादी होते हैं, वे भावनाओं की जगह सच्चाई और समझ को दिखाते हैं। उन्होंने मध्यमवर्गीय जीवन की समस्याओं को सहानुभूति से सामने रखा।
🎯 Exam Tip: प्रयोगवादी कवियों की यथार्थवादी सोच और मध्यम वर्ग के जीवन पर उनके चित्रण को स्पष्ट करें।
Question 19. 'नई कविता' का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
Answer: 'नई कविता' दरअसल 'प्रयोगवाद' का ही आगे बढ़ा हुआ रूप है। डॉ. शिवकुमार शर्मा के अनुसार, ये दोनों एक ही काव्य धारा की दो अलग-अलग अवस्थाएँ हैं। 1943 से 1953 ईस्वी के बीच कविता में जितने भी नए प्रयोग हुए, वे सब 'नई कविता' का ही नतीजा थे। इस तरह 'प्रयोगवाद' उस काव्य धारा की शुरुआती अवस्था थी, और 'नई कविता' उसका पूरी तरह से विकसित रूप है।
In simple words: 'नई कविता' 'प्रयोगवाद' का ही विकसित रूप है, जिसमें 1943 से 1953 के बीच हुए नए काव्य प्रयोग शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: 'नई कविता' और 'प्रयोगवाद' के संबंध को स्पष्ट करें, और 'नई कविता' को 'प्रयोगवाद' की विकसित अवस्था के रूप में बताएं।
Question 21. समकालीन नाटकों पर राजनीतिक सिद्धान्तहीनता की प्रवृत्ति का प्रभाव किस रूप में पड़ा ? लिखिए।
Answer: उस समय की राजनीति में सिद्धांतों की कमी, मौके का फायदा उठाना, चीजों को बहुत सरल बनाना और बौद्धिक दिवालियापन जैसी बातों ने लोगों को बहुत परेशान किया। इसका असर नाटककारों पर भी पड़ा। उन्होंने अपने नाटकों में राजनीतिक संस्थाओं की धोखाधड़ी को दिखाया। डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल ने 'रक्त कमल' और 'चतुर्भुज राक्षस' जैसे नाटक लिखे, जबकि संतोष कुमार नौटियाल ने 'चाय पार्टियाँ' और कणाद ऋषि भटनागर ने 'जहर' जैसे नाटक रचे।
In simple words: समकालीन नाटकों पर राजनीतिक बेईमानी और अवसरवादिता का असर दिखा, नाटककारों ने अपने नाटकों में इन समस्याओं को उठाया।
🎯 Exam Tip: राजनीतिक सिद्धांतहीनता के प्रभावों को नाटककारों की रचनाओं के उदाहरणों के साथ स्पष्ट करें।
RBSE Class 12 Hindi साहित्य का इतिहास निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. हिन्दी साहित्य के आधुनिककाल के सूत्रधार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और उनकी रचनाओं का परिचय दीजिए।
Answer: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (1850-1885) को हिंदी साहित्य के आधुनिक काल का जनक माना जाता है। वे सेठ अमीचन्द के वंश में पैदा हुए थे, और उनके पिता गोपालचन्द्र 'गिरिधरदास' भी कवि थे। हरिश्चन्द्र जी ने बचपन से ही अपनी काव्य प्रतिभा दिखाई, जिसके कारण उन्हें 'भारतेन्दु' की उपाधि मिली। वे कवि होने के साथ-साथ पत्रकार भी थे और 'कविवचनसुधा' तथा 'हरिश्चन्द्र चन्द्रिका' जैसी पत्रिकाएँ निकालते थे। उनकी 70 से ज़्यादा काव्य रचनाएँ हैं, जिनमें 'प्रेम-मालिका', 'प्रेम-सरोवर', 'वर्षा-विनोद' और 'प्रेम-फुलवारी' खास हैं। उन्होंने हिंदी, ब्रज और उर्दू तीनों भाषाओं में लिखा। उनकी कविताओं में पुरानी परंपरा और नए विचार दोनों दिखते हैं। वे देशप्रेमी भी थे और कविता के क्षेत्र में नए युग की शुरुआत करने वाले थे।
In simple words: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को हिंदी साहित्य के आधुनिक काल का संस्थापक माना जाता है। वे कवि और पत्रकार थे, जिन्होंने 'कविवचनसुधा' जैसी पत्रिकाएँ निकालीं। उनकी प्रमुख रचनाओं में 'प्रेम-मालिका' और 'प्रेम-सरोवर' शामिल हैं, और उन्होंने हिंदी, ब्रज तथा उर्दू में कविताएँ लिखीं।
🎯 Exam Tip: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के जीवन, पत्रकारिता, काव्य और भाषा में योगदान को विस्तार से बताएं।
Question 2. भारतेन्दु युग में किन विषयों पर उपन्यास लिखे गए? संक्षेप में उत्तर दीजिए।
Answer: भारतेन्दु युग में कई विषयों पर उपन्यास लिखे गए। इस दौर में सामाजिक, ऐतिहासिक, तिलस्मी-ऐयारी (जादू-टोना और छल-कपट वाली), जासूसी और रोमानी (प्रेम कहानियों वाली) उपन्यास खूब लिखे गए। लाला श्रीनिवासदास का 'परीक्षागुरु' अंग्रेजी तरीके का पहला मौलिक उपन्यास माना जाता है। इससे पहले श्रद्धाराम फुल्लौरी ने 'भाग्यवती' नामक एक छोटा सामाजिक उपन्यास लिखा था। इस युग के प्रमुख उपन्यासकारों में किशोरीलाल गोस्वामी, बालकृष्ण भट्ट और देवकीनन्दन खत्री शामिल थे, जिन्होंने विभिन्न प्रकार के उपन्यास लिखकर हिंदी उपन्यास साहित्य को समृद्ध किया।
In simple words: भारतेन्दु युग में सामाजिक, ऐतिहासिक, तिलस्मी, जासूसी और प्रेम कहानियों पर उपन्यास लिखे गए, जिनमें 'परीक्षागुरु' और 'भाग्यवती' जैसे उपन्यास खास थे।
🎯 Exam Tip: भारतेन्दु युग में उपन्यास के प्रकारों और प्रमुख उपन्यासकारों के नाम तथा उनकी रचनाओं को याद रखें।
Question 4. हिन्दी कहानी का जन्म किस युग में माना जाता है? इस युग में हिन्दी कहानी के विकास पर प्रकाश डालिए।
Answer: हिंदी कहानी का जन्म लगभग 1900 ईस्वी में द्विवेदी युग में माना जाता है, और 1912 से 1918 ईस्वी तक यह पूरी तरह से स्थापित हो गई। 'सरस्वती' पत्रिका के प्रकाशन के साथ ही हिंदी कहानी का विकास तेजी से हुआ। शुरुआत में किशोरीलाल गोस्वामी की 'इन्दुमती' (1900), माधव प्रसाद की 'मन की चंचलता' और बंगमहिला की 'दुलाईवाली' जैसी कहानियाँ आईं। बाद में जयशंकर प्रसाद ने 'छाया' (1912) संग्रह के साथ कई कहानियाँ लिखीं, और फिर प्रेमचंद की 'पंच परमेश्वर' जैसी रचनाएँ आईं। चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' की 'उसने कहा था' (1915) भी बहुत प्रसिद्ध हुई। इस प्रकार, 1900 से 1918 तक हिंदी कहानी ने अपनी पहचान बनाई और एक महत्वपूर्ण विधा बन गई।
In simple words: हिंदी कहानी का जन्म लगभग 1900 ईस्वी में द्विवेदी युग में हुआ। 'सरस्वती' पत्रिका के प्रकाशन से इसका विकास तेजी से हुआ, जिसमें किशोरीलाल गोस्वामी, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद और चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' जैसे लेखकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
🎯 Exam Tip: हिंदी कहानी के विकास में द्विवेदी युग की भूमिका, प्रमुख पत्रिकाएँ और कहानीकारों के नाम याद रखें।
Question 5. छायावाद काल में 'नाटक' विधा के विकास पर प्रकाश डालिए।
Answer: छायावाद काल को हिंदी नाटक साहित्य के लिए 'प्रसाद युग' कहना सही है, क्योंकि जयशंकर प्रसाद ने इस विधा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने 1918 ईस्वी से पहले ही नाटक लिखने शुरू कर दिए थे। उनकी शुरुआती रचनाओं में 'सज्जन', 'कल्याणी-परिणय' और 'राज्यश्री' शामिल हैं। इसके अलावा, 'विशाख', 'अजातशत्रु', 'स्कन्दगुप्त' और 'ध्रुवस्वामिनी' जैसे नाटकों ने हिंदी नाट्य साहित्य को बहुत ऊँचाई दी। जिस तरह प्रेमचंद ने उपन्यास और कहानी में नाम कमाया, उसी तरह प्रसाद ने नाटक के क्षेत्र में अपना स्थान बनाया।
In simple words: छायावाद काल को 'प्रसाद युग' भी कहते हैं, क्योंकि जयशंकर प्रसाद ने 'सज्जन', 'स्कन्दगुप्त' और 'ध्रुवस्वामिनी' जैसे कई प्रसिद्ध नाटक लिखकर इस विधा को आगे बढ़ाया।
🎯 Exam Tip: जयशंकर प्रसाद के योगदान को केंद्र में रखते हुए छायावाद युग में नाटक के विकास को समझाएं।
Question 6. छायावाद काल में प्रेमचंद के समकालीन उपन्यासकारों के कृतित्व का परिचय दीजिए।
Answer: छायावाद काल में प्रेमचंद के समय के कई उपन्यासकार थे। विश्वंभरनाथ शर्मा 'कौशिक' ने 'माँ' और 'भिखारिणी' जैसे उपन्यास लिखकर प्रेमचंद की तरह ही सफलता पाई। चतुरसेन शास्त्री ने 'हृदय की परख' और 'अमर अभिलाषा' जैसे उपन्यास लिखे। प्रतापनारायण श्रीवास्तव ने आदर्शवादी उपन्यास 'विदा' की रचना की। शिवपूजन सहाय ने गाँव के जीवन पर आधारित उपन्यास 'देहाती दुनिया' लिखा। बेचन शर्मा 'उग्र' ने 'चन्द हसीनों के खुतूत' और 'शराबी' जैसे बेबाक उपन्यास लिखे, जिनमें समाज की सच्चाई को बिना किसी झिझक के दिखाया गया। जयशंकर प्रसाद के 'कंकाल' और 'तितली' भी इसी दौर के महत्वपूर्ण उपन्यास हैं। जैनेन्द्र ने 'परख' और 'सुनीता' जैसे उपन्यासों में व्यक्ति के मन की उलझनों को दिखाया। वृन्दावनलाल वर्मा ने ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की शुरुआत की, और प्रेम कहानियों वाले उपन्यासों का श्रेय सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' को जाता है।
In simple words: छायावाद काल में प्रेमचंद के समय के उपन्यासकारों में विश्वंभरनाथ शर्मा 'कौशिक', चतुरसेन शास्त्री, बेचन शर्मा 'उग्र', जयशंकर प्रसाद और जैनेन्द्र जैसे लेखक थे, जिन्होंने विभिन्न विषयों पर उपन्यास लिखे।
🎯 Exam Tip: प्रेमचंद के समकालीन प्रमुख उपन्यासकारों और उनकी एक-दो प्रसिद्ध रचनाओं के नाम याद रखें।
Question 7. 'छायावाद काल में ललित निबन्धों की परंपरा भी फूली-फली।' इस कथन पर टिप्पणी लिखिए।
Answer: यह बात सही है कि छायावाद काल में 'ललित निबंध' (व्यक्तिगत भावनाओं और कलात्मक शैली में लिखे गए निबंध) की परंपरा खूब फली-फूली। इस समय कई ललित निबंधकार सामने आए। गुलाबराय के 'ठलुआ-क्लब', 'फिर निराशा क्यों' और 'मेरी असफलताएँ' जैसे संग्रहों में कुछ बेहतरीन व्यक्तिगत निबंध मिलते हैं। उनके निबंधों में 'मेरा मकान' और 'प्रीतिभोज' जैसे शीर्षक खास हैं। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने भी 'पंचपात्र' संग्रह में 'अतीत स्मृति' और 'उत्सव' जैसे व्यक्तिगत निबंध लिखे, जिनमें लेखक की भावनाएँ और व्यंग्य का सुंदर मेल देखने को मिलता है। शांतिप्रिय द्विवेदी, शिवपूजन सहाय और माखनलाल चतुर्वेदी भी इस समय के प्रमुख ललित निबंधकार थे।
In simple words: छायावाद काल में ललित निबंधों की परंपरा बहुत विकसित हुई। गुलाबराय और पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जैसे लेखकों ने व्यक्तिगत भावनाओं और व्यंग्य से भरे कई सुंदर निबंध लिखे।
🎯 Exam Tip: ललित निबंध की विशेषताओं को बताते हुए छायावाद काल के प्रमुख ललित निबंधकारों के नाम और उनकी कृतियों को उल्लेख करें।
Question 9. प्रयोगवादी और नई कविता के प्रमुख कवियों का नामोल्लेख करते हुए उनकी कुछ रचनाओं का परिचय भी दीजिए।
Answer: प्रयोगवादी और नई कविता के मुख्य कवियों में अज्ञेय सबसे आगे हैं, जिनकी प्रमुख रचनाएँ 'हरीघास पर क्षणभर' और 'बावरा अहेरी' हैं। गिरिजाकुमार माथुर की कविताओं में प्रयोग और भावना का अच्छा मेल दिखता है, उनकी रचनाओं में 'नाश और निर्माण' और 'धूप के धान' खास हैं। गजानन माधव मुक्तिबोध को नई कविता का अगुवा कहा जाता है, उनकी 'चाँद का मुँह टेढ़ा है' और 'भूरी-भूरी खाक धूल' जैसी रचनाओं में आम लोगों का जीवन झलकता है। भवानी प्रसाद मिश्र की प्रमुख रचनाएँ 'कमल के फूल' और 'सतपुड़ा के जंगल' हैं। शमशेर बहादुर सिंह की 'चुका भी नहीं हूँ मैं' और 'काल तुझसे होड़ मेरी' भी खास रचनाएँ हैं।
In simple words: अज्ञेय, गिरिजाकुमार माथुर, मुक्तिबोध, भवानी प्रसाद मिश्र और शमशेर बहादुर सिंह प्रयोगवादी और नई कविता के प्रमुख कवि हैं, जिनकी कई महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं।
🎯 Exam Tip: प्रमुख कवियों के नाम और उनकी कम से कम दो-दो रचनाओं को याद रखें, जो प्रयोगवाद और नई कविता की विशिष्टता दर्शाती हों।
Question 10. छायावादोत्तर काल में यात्रावृत्त' विधा के विकास पर प्रकाश डालिए।
Answer: छायावादोत्तर काल में 'यात्रावृत्त' (यात्रा के अनुभव लिखना) विधा का खूब विकास हुआ। आजादी के बाद भारत के संबंध दुनिया के कई देशों से बने, जिससे भारतीयों का विदेश आना-जाना बढ़ गया। कई लोगों ने साम्यवादी देशों की यात्रा की। स्वामी सत्यदेव परिव्राजक, राहुल सांकृत्यायन और पं. नेहरू जैसे लेखकों ने इस विधा में खास योगदान दिया। इस समय रूस से जुड़े यात्रावृत्त ज्यादा लिखे गए, क्योंकि भारत के रूस से संबंध मजबूत थे। राहुल सांकृत्यायन का 'रूस में पच्चीस मास' और डॉ. नगेन्द्र का 'तंत्रालोक से यंत्रालोक तक' जैसी रचनाएँ प्रमुख हैं। अन्य लेखकों ने चीन और जापान जैसे देशों की यात्राएँ भी लिखीं।
In simple words: छायावादोत्तर काल में भारतीयों की विदेश यात्राएँ बढ़ने से 'यात्रावृत्त' विधा का विकास हुआ, जिसमें स्वामी सत्यदेव परिव्राजक और राहुल सांकृत्यायन जैसे लेखकों ने रूस, चीन, जापान आदि देशों के यात्रा अनुभव लिखे।
🎯 Exam Tip: यात्रावृत्त के विकास में ऐतिहासिक संदर्भ (स्वतंत्रता प्राप्ति) और प्रमुख लेखकों की रचनाओं को जोड़कर बताएं।
Question 11. समकालीन हिन्दी साहित्य में हुए कहानी आंदोलनों का और कहानीकारों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
Answer: समकालीन हिंदी साहित्य में कई कहानी आंदोलन हुए, जैसे नई कहानी, सचेतन कहानी (महीप सिंह द्वारा), अकहानी (निर्मल वर्मा द्वारा) और समानान्तर कहानी (कमलेश्वर द्वारा)। इन आंदोलनों के तहत कई प्रमुख कहानीकारों ने अपनी रचनाएँ दीं। मृदुला गर्ग की 'दुनिया का कायदा', मंजुल भगत की 'सफेद कौआ', मार्कण्डेय की 'हंसा जाई अकेला', और राजी सेठ की 'तीसरी हथेली' जैसी कहानियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा, ज्ञानरंजन, ओम गोस्वामी, उदयप्रकाश और ममता कालिया जैसे लेखकों ने भी कई महत्वपूर्ण कहानियाँ लिखीं, जिनमें समाज और जीवन के अलग-अलग पहलू दिखाए गए।
In simple words: समकालीन हिंदी साहित्य में नई कहानी, सचेतन कहानी, अकहानी और समानान्तर कहानी जैसे आंदोलन हुए, जिनमें मृदुला गर्ग, निर्मल वर्मा, कमलेश्वर और मार्कण्डेय जैसे लेखकों ने कई महत्वपूर्ण कहानियाँ लिखीं।
🎯 Exam Tip: कहानी आंदोलनों के नाम, उनके प्रवर्तक और एक-दो प्रमुख कहानियों के उदाहरणों को याद रखें।
Question 12. नई कहानी, सचेतन कहानी, अकहानी और समानान्तर कहानी का अंतर स्पष्ट कीजिए।
Answer:
**नई कहानी:** मार्कण्डेय के अनुसार, नई कहानी वे हैं जो कलात्मक रूप से अच्छी हैं, जीवन के लिए उपयोगी हैं और जीवन के किसी नए पहलू को दिखाती हैं।
**सचेतन कहानी:** इसे लगभग 1964 में महीपसिंह ने शुरू किया था। इसमें विचारों और सोच को खास महत्व दिया गया।
**अकहानी:** 1960 के आसपास कुछ लेखकों ने कहानी के पुराने नियमों को मानने से इनकार कर दिया और अपनी अलग पहचान बनाने की बात कही। निर्मल वर्मा को इस आंदोलन का जनक माना जाता है।
**समानान्तर कहानी:** इस आंदोलन को कमलेश्वर ने लगभग 1971 में शुरू किया। इन कहानियों में गरीब वर्ग के लोगों की मुश्किलों, भेदभाव और समस्याओं को खुलकर दिखाया गया। 'सारिका' पत्रिका ने इसे बढ़ावा दिया।
In simple words: नई कहानी कलात्मक और उपयोगी है, सचेतन कहानी विचारों पर जोर देती है, अकहानी पुराने नियमों को नहीं मानती, और समानान्तर कहानी गरीब वर्ग की समस्याओं को दिखाती है।
🎯 Exam Tip: प्रत्येक कहानी आंदोलन की मुख्य विशेषता, आरंभ का समय और प्रमुख प्रवर्तक के नाम याद रखें।
भारतेन्दु-युग अथवा पुनर्जागरण-काल
यह बात ध्यान देने वाली है कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा संपादित मासिक पत्रिका 'कविवचनसुधा' का प्रकाशन 1868 ईस्वी में शुरू हुआ था। इसलिए, भारतेन्दु-युग का आरंभ 1868 ईस्वी से मानना सही है। इसी हिसाब से, 'सरस्वती' पत्रिका के प्रकाशन-वर्ष (1900 ईस्वी) को भारतेन्दु-युग के अंत का समय माना जा सकता है। भारतेन्दु युग में कवियों ने देश प्रेम, स्वदेशी चीजों के उपयोग, गायों की रक्षा, बाल विवाह रोकने और भ्रूण-हत्या की निन्दा जैसे विषयों को ज्यादा अपनाया।
🎯 Exam Tip: भारतेन्दु-युग के आरंभ और अंत की तिथियाँ 'कविवचनसुधा' और 'सरस्वती' पत्रिकाओं के प्रकाशन से जुड़ी हैं, यह मुख्य बात याद रखें।
इस युग में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन', प्रतापनारायण मिश्र, जगमोहनसिंह, अम्बिकादत्त व्यास, राधाकृष्णदास, श्रीधर पाठक (1859-1928), बालमुकुन्द गुप्त (1865-1907) और हरिऔध (1865-1945) की कविताएँ प्रकाशित होनी शुरू हो गई थीं।
🎯 Exam Tip: भारतेन्दु युग के प्रमुख कवियों और उनकी जन्म-मृत्यु की तिथियों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
हरिश्चन्द्र जी ने बचपन से ही अपनी काव्य प्रतिभा का परिचय दिया था। उस समय के साहित्यकारों ने उन्हें 'भारतेन्दु' की उपाधि से सम्मानित किया। उन्होंने 'कविवचनसुधा' और 'हरिश्चन्द्र चन्द्रिका' जैसी पत्रिकाएँ भी निकालीं। उनकी काव्य-कृतियों की संख्या लगभग 70 है।
🎯 Exam Tip: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की उपाधि और उनके द्वारा संपादित पत्रिकाओं के नाम अक्सर पूछे जाते हैं।
बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन
भारतेन्दु की तरह ही 'प्रेमघन' ने भी कविता और गद्य दोनों में बहुत साहित्य रचा। 'जीर्ण जनपद', 'आनन्द अरुणोदय', 'मयंक-महिमा' और 'वर्षा-बिन्दु' उनकी प्रसिद्ध काव्य-कृतियाँ हैं।
🎯 Exam Tip: 'प्रेमघन' की मुख्य काव्य-कृतियों के नाम याद रखें।
प्रतापनारायण मिश्र
प्रतापनारायण मिश्र के मुख्य रचना-क्षेत्र कविता, निबंध और नाटक थे। 'प्रेमपुष्पावली', 'मन की लहर', 'लोकोक्ति शतक', 'तृप्यन्ताम्' और 'श्रृंगार विलास' उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं।
🎯 Exam Tip: प्रतापनारायण मिश्र की प्रसिद्ध रचनाओं के नाम याद रखें।
जगमोहनसिंह
ठाकुर जगमोहनसिंह (1857-1899) मध्यप्रदेश की विजय-राघवगढ़ रियासत के राजकुमार थे। 'प्रेमसम्पत्तिलता' (1885), 'श्यामालता' (1885), 'श्यामा-सरोजिनी' (1886) और 'देवयानी' (1886) उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं।
🎯 Exam Tip: जगमोहनसिंह की प्रमुख प्रेम-संबंधी रचनाओं और उनके प्रकाशन वर्ष को ध्यान में रखें।
अम्बिकादत्त व्यास
व्यास जी संस्कृत और हिंदी के अच्छे विद्वान थे। 'पावस पचासा' (1886), 'सुकवि सतसई' (1887) और 'हो हो होरी' (1891) उनकी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं।
🎯 Exam Tip: अम्बिकादत्त व्यास की प्रसिद्ध रचनाओं के नाम और उनके विषय (संस्कृत-हिंदी विद्वता) महत्वपूर्ण हैं।
राधाकृष्णदास
कविता के अलावा राधाकृष्णदास ने उपन्यास और आलोचना के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण साहित्य रचना की है। उनकी कविताओं में भक्ति, श्रृंगार और उस समय की सामाजिक-राजनीतिक चेतना को विशेष स्थान मिला है।
🎯 Exam Tip: राधाकृष्णदास की बहुमुखी प्रतिभा और उनकी रचनाओं के मुख्य विषयों को याद रखें।
अन्य कवि
भारतेन्दु काल के अन्य कवियों का योगदान भी याद रखने लायक है। नवनीत चतुर्वेदी, जगन्नाथदास 'रत्नाकर', गोविन्द गिल्लाभाई, दिवाकर भट्ट, रामकृष्ण वर्मा बलवीर, राजेश्वरीप्रसाद सिंह 'प्यारे', गुलाबसिंह और कृष्णदेवशरण सिंह 'गोप' जैसे नाम उल्लेखनीय हैं।
🎯 Exam Tip: भारतेन्दु युग के अन्य कवियों के नाम और उनके योगदान को सामान्य रूप से समझें।
भारतेन्दु युग का गद्य साहित्य
भारतेन्दुकालीन साहित्य सांस्कृतिक जागृति का साहित्य है। इस युग में गद्य की लगभग सभी विधाओं-नाटक, उपन्यास, कहानी, निबंध और आलोचना आदि का विकास और लेखन हुआ।
🎯 Exam Tip: भारतेन्दु युग में गद्य साहित्य का मुख्य उद्देश्य सांस्कृतिक चेतना को जगाना था और सभी विधाओं का विकास हुआ।
नाटक
भारतेन्दु अपने युग के सबसे अच्छे नाटककार थे। उन्होंने अनुवादित और मौलिक दोनों तरह के नाटक लिखे। उन्होंने 'विद्यासुन्दर', 'रत्नावली', 'पाखण्ड विडम्बन', 'भारत जननी', 'मुद्राराक्षस' और 'सत्य हरिश्चन्द्र' सहित 17 नाटक-नाटिकाओं की रचना की। इस युग में पौराणिक, ऐतिहासिक, रोमानी और उस समय की समस्याओं पर आधारित नाटक लिखे गए। जीवनदास, राधाचरण गोस्वामी, राधाकृष्णदास, बालकृष्ण भट्ट और गोपालराम गहमरी इस युग के प्रसिद्ध नाटककार थे।
In simple words: भारतेन्दु युग में नाटक पौराणिक, ऐतिहासिक, रोमानी और सामाजिक विषयों पर लिखे गए, जिसमें भारतेन्दु हरिश्चन्द्र प्रमुख नाटककार थे।
🎯 Exam Tip: भारतेन्दु जी की नाटक रचनाएँ और नाटक के मुख्य विषयों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
उपन्यास
इस युग के उपन्यासकारों में लाला श्रीनिवासदास (1851-1887), किशोरीलाल गोस्वामी (1865-1932), बालकृष्ण भट्ट (1844-1914), ठाकुर जगमोहन सिंह (1857-1899), राधाकृष्णदास (1865-1907), लज्जाराम शर्मा (1863-1931), देवकीनन्दन खत्री (1861-1913) और गोपालराम गहमरी (1866-1946) प्रमुख हैं। भारतेन्दु काल में सामाजिक, ऐतिहासिक, तिलस्मी-ऐयारी और जासूसी उपन्यास खूब लिखे गए।
In simple words: भारतेन्दु युग के प्रमुख उपन्यासकारों के नाम और उस युग में लिखे गए उपन्यासों के प्रकारों को याद रखें।
🎯 Exam Tip: भारतेन्दु युग के उपन्यास साहित्य के प्रकारों और प्रमुख लेखकों के योगदान पर ध्यान दें।
कहानी
'सरस्वती' (1900) पत्रिका के प्रकाशन के साथ ही हिंदी कहानी का विकास हुआ। शुरुआती लेखकों में किशोरीलाल गोस्वामी, माधवप्रसाद मिश्र, बंगमहिला, रामचन्द्र शुक्ल और जयशंकर प्रसाद प्रमुख थे। 'सरस्वती' में रामचन्द्र शुक्ल की 'ग्यारह वर्ष का समय' (1903) और बंगमहिला की 'दुलाईवाली' (1907) कहानियाँ प्रकाशित हुईं। ऐतिहासिक कहानियों में वृन्दावन लाल वर्मा प्रमुख हैं। जयशंकर प्रसाद ने कई कहानियाँ लिखीं, और उनका कहानी संग्रह 'छाया' नाम से सन् 1912 में प्रकाशित हुआ। राधिकारमण सिंह की कहानी 'कानों में कंगना' (1913) 'इंदु' पत्रिका में छपी। कुछ समय बाद प्रेमचंद भी आए, जिनकी कहानियाँ 'सरस्वती' में प्रकाशित हुईं। चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' की प्रसिद्ध कहानी 'उसने कहा था' सन् 1915 में 'सरस्वती' पत्रिका में छपी थी। ज्वालादत्त शर्मा, विश्वंभरनाथ शर्मा 'कौशिक' और पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जैसे नाम भी उल्लेखनीय हैं।
In simple words: हिंदी कहानी का विकास 'सरस्वती' पत्रिका से शुरू हुआ, जिसमें किशोरीलाल गोस्वामी, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद और चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' जैसे लेखकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
🎯 Exam Tip: हिंदी कहानी के विकास में 'सरस्वती' पत्रिका की भूमिका और प्रमुख कहानीकारों तथा उनकी प्रसिद्ध कहानियों को याद रखें।
निबंध
इस युग के निबंध लेखकों में महावीरप्रसाद द्विवेदी, गोविन्दनारायण मिश्र, बालमुकुन्द गुप्त, माधवप्रसाद मिश्र, मिश्रबन्धु (श्यामबिहारी मिश्र और शुकदेवबिहारी मिश्र), सरदार पूर्णसिंह, चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी', जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी और श्यामसुन्दरदास प्रमुख हैं। सरदार पूर्णसिंह (1881-1939) इस युग के सबसे अच्छे निबंधकार हैं।
In simple words: द्विवेदी युग के प्रमुख निबंधकारों में महावीरप्रसाद द्विवेदी और सरदार पूर्णसिंह जैसे नाम शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: द्विवेदी युग के प्रमुख निबंधकारों के नाम और सरदार पूर्णसिंह के विशेष योगदान को याद रखें।
व्यंग्यात्मक निबंधों की सृष्टि की है। इनमें हरिशंकर परसाई प्रमुख हैं।
🎯 Exam Tip: हिंदी में व्यंग्यात्मक निबंधों के प्रमुख लेखक के रूप में हरिशंकर परसाई का नाम याद रखें।
अन्य गद्य विधाएँ
जीवनी साहित्य
इस युग में जीवनी-साहित्य का बहुत विकास हुआ। लोकप्रिय नेताओं, संत-महात्माओं, साहित्यकारों, विदेशी महापुरुषों, वैज्ञानिकों, खिलाड़ियों और उद्योगपतियों से जुड़ी जीवनियाँ बहुत अधिक संख्या में लिखी गईं। महात्मा गांधी इस युग के सबसे प्रिय नेता थे, इसलिए उन पर कई जीवनियाँ लिखी गईं। भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस पर भी कई लोगों ने जीवनियाँ लिखीं। महात्मा बुद्ध और शंकराचार्य जैसे धार्मिक गुरुओं के जीवन पर आधारित जीवनियाँ भी लिखी गईं। भारतीय इतिहास के महान पुरुषों, जैसे शिवाजी और गुरुगोविन्द सिंह, और विदेशी महापुरुषों पर भी जीवनियाँ लिखी गईं।
🎯 Exam Tip: जीवनी साहित्य के विकास में प्रमुख नेताओं और ऐतिहासिक हस्तियों के जीवन पर लिखी गई जीवनियों का महत्व समझें।
स्टालिन, कार्लमार्क्स, माओत्से तुंग और मुसोलिनी जैसे विदेशी पुरुष भी थे। साहित्यकारों में प्रेमचंद बहुत लोकप्रिय थे, इसलिए उन पर भी सबसे ज्यादा जीवनियाँ लिखी गईं। उनकी पत्नी द्वारा 'प्रेमचन्द घर में' (1956) नामक जीवनी बहुत महत्वपूर्ण है। उनके बेटे अमृतराय ने भी 'कलम का सिपाही' (1967) नाम से प्रेमचंद पर जीवनी लिखी। सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' पर भी कई जीवनियाँ लिखी गईं, जैसे गंगाप्रसाद पाण्डेय द्वारा लिखित 'महाप्राण निराला'। शांति जोशी ने 'सुमित्रानन्दन पंत जीवन और साहित्य' (1970) और विष्णुप्रभाकर ने 'आवारा मसीहा' लिखा।
🎯 Exam Tip: प्रेमचंद और निराला जैसे साहित्यकारों पर लिखी गई प्रमुख जीवनियों के नाम और उनके लेखकों को याद रखें।
आत्मकथा
इस काल में आत्मकथाएँ भी बहुत अधिक मात्रा में लिखी गईं। श्यामसुन्दरदास, हरिभाऊ उपाध्याय, राहुल सांकृत्यायन, वियोगी हरि, यशपाल, स्वामी सत्यदेव परिव्राजक, शांतिप्रिय द्विवेदी, देवेन्द्र सत्यार्थी, चतुरसेन शास्त्री, देवराज उपाध्याय, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, सेठ गोविन्ददास, पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र', संतराम बी.ए., भुवनेश्वरप्रसाद मिश्र माधव, हरिवंशराय बच्चन, वृन्दावनलाल वर्मा और रामविलास शर्मा की आत्मकथाएँ इसी युग में प्रकाशित हुईं। इस दौरान राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्तियों की आत्मकथाएँ भी सामने आईं, जिनमें राजेन्द्रप्रसाद, अलगूराय शास्त्री और जानकीदेवी बजाज जैसी आत्मकथाएँ खास हैं।
🎯 Exam Tip: आत्मकथा लेखन के विकास में प्रमुख लेखकों के नाम और उनके द्वारा लिखी गई प्रसिद्ध आत्मकथाओं को याद रखें।
यात्रावृत्त
स्वामी सत्यदेव परिव्राजक, कन्हैयालाल मिश्र आर्योपदेशक, सन्तराम, राहुल सांकृत्यायन, सेठ गोविन्ददास और पं. नेहरू जैसे लोग इस विधा में खास थे। इस समय रूस से जुड़े यात्रावृत्त ज्यादा लिखे गए, क्योंकि भारत के रूस से संबंध मजबूत थे। दिल्ली से मास्को, रूस में पच्चीस मास और रूस में छियालीस दिन जैसी रचनाएँ इस बात का प्रमाण हैं। इसी तरह लेखकों ने चीन और जापान जैसे अन्य देशों से जुड़ी कई यात्राओं का वर्णन किया है। कैलाश मानसरोवर', 'ज्योतिपुंज हिमालय', 'किन्नर देश में' और 'अरे यायावर रहेगा याद' जैसे स्वदेश-यात्रा संबंधी यात्रावृत्त भी बहुत प्रकाशित हुए।
🎯 Exam Tip: यात्रावृत्त के विकास में राहुल सांकृत्यायन और स्वामी सत्यदेव परिव्राजक के योगदान और प्रमुख यात्रावृत्तों के नाम याद रखें।
संस्मरण तथा रेखाचित्र
इन विधाओं के हिंदी लेखकों में बनारसीदास चतुर्वेदी का स्थान सबसे खास है। उन्होंने 'हमारे आराध्य' और 'संस्मरण' जैसे संस्मरण और 'सेतुबंध' जैसे रेखाचित्र संग्रह प्रस्तुत किए। श्रीराम शर्मा अपने अद्भुत शब्द शिल्प के लिए प्रसिद्ध हैं। 'लाल तारा', 'माटी की मूरतें' और 'गेहूँ' उनकी कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं।
🎯 Exam Tip: संस्मरण और रेखाचित्र विधा के प्रमुख लेखक बनारसीदास चतुर्वेदी और श्रीराम शर्मा के नाम याद रखें, साथ ही उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ भी।
छायावाद
रामचन्द्र शुक्ल ने छायावाद की शुरुआत सन् 1918 से मानी है। इस काल के आसपास साहित्य में एक नया मोड़ आया, जो पुरानी काव्य-पद्धति को छोड़कर एक नई पद्धति बनाने का संकेत था। निराला की 'जूही की कली' (1916) और पंत की 'पल्लव' की कुछ कविताएँ सन् 1920 के आसपास आ चुकी थीं। प्रसाद, निराला आदि कवि भी इसी युग के थे। माखनलाल चतुर्वेदी, रामनरेश त्रिपाठी और बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' जैसे रचनाकार भी अपने युग के आंदोलनों में सक्रिय थे और कविताएँ लिखते थे। कवित्व की दृष्टि से यह काव्य भावनाओं की गहराई, सूक्ष्मता और अभिव्यंजना-शिल्प के उत्कर्ष के कारण श्रेष्ठ है। छायावादी काव्य में ही अपने युग के जन-जीवन की समग्रता की अभिव्यक्ति मिलती है। छायावाद का युग भारत की पहचान की खोज का युग था। इस युग की एक प्रमुख प्रवृत्ति राष्ट्रीय और सांस्कृतिक काव्य का सृजन है। इस राष्ट्रीय सांस्कृतिक धारा के मुख्य कवि माखनलाल चतुर्वेदी, सियारामशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' और सुभद्राकुमारी चौहान आदि हैं।
🎯 Exam Tip: छायावाद की शुरुआत (सन् 1918), इसके मुख्य कवि (प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी) और इसकी राष्ट्रीय-सांस्कृतिक विशेषताओं को याद रखें।
छायावादी कवि
छायावादी कवियों में जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', भगवतीचरण वर्मा, डॉ. रामकुमार वर्मा, मोहनलाल महतो वियोगी और लक्षमीनारायण मिश्र जैसे प्रमुख नाम हैं। इस काल में प्रेम और मस्ती का साहित्य भी खूब लिखा गया।
In simple words: छायावाद के चार स्तंभ (जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा) और अन्य प्रमुख कवियों के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है।
🎯 Exam Tip: छायावाद के चार स्तंभ (प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी) और अन्य प्रमुख कवियों के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है।
RBSE Class 12 Hindi साहित्य का इतिहास निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. हिन्दी साहित्य के आधुनिककाल के सूत्रधार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और उनकी रचनाओं का परिचय दीजिए।
Answer: कविवर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (1850-1885) एक प्रसिद्ध परिवार में पैदा हुए थे। उनके पिता गोपालचन्द्र 'गिरिधरदास' भी अपने समय के एक जाने-माने कवि थे। भारतेन्दु ने बचपन में ही अपनी काव्य प्रतिभा का परिचय दे दिया था। उस समय के साहित्यकारों ने उन्हें 'भारतेन्दु' की उपाधि से सम्मानित किया। वे एक कवि होने के साथ-साथ पत्रकार भी थे। उन्होंने 'कविवचनसुधा' और 'हरिश्चन्द्र चन्द्रिका' जैसी पत्रिकाएँ निकालीं। उनकी कुल 70 काव्य-कृतियाँ हैं, जिनमें 'प्रेम-मालिका', 'प्रेम-सरोवर', 'गीत गोविन्दानन्द', 'वर्षा-विनोद', 'विनय-प्रेम-पचासा', 'प्रेम-फुलवारी', और 'वेणु-गीति' बहुत खास हैं। उन्होंने हिंदी, ब्रज और उर्दू तीनों भाषाओं में कविताएँ लिखीं। उनकी कविताओं में जहाँ पुरानी परंपरा की विशेषताएँ दिखती हैं, वहीं नई काव्यधारा की शुरुआत भी होती है। वे देशभक्त भी थे और हिंदी कविता के नए युग के शुरुआती दौर के अगुआ थे।
In simple words: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के प्रमुख कवि और पत्रकार थे। उन्होंने 'कविवचनसुधा' और 'हरिश्चन्द्र चन्द्रिका' जैसी पत्रिकाएँ निकालीं। उनकी 70 काव्य-कृतियाँ हैं और वे देशभक्त भी थे।
🎯 Exam Tip: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के साहित्यिक योगदान को स्पष्ट रूप से समझाएँ और उनकी प्रमुख रचनाओं के नाम ज़रूर शामिल करें, खासकर पत्रिकाओं के नाम।
Question 2. भारतेन्दु युग में किन विषयों पर उपन्यास लिखे गए? संक्षेप में उत्तर दीजिए।
Answer: भारतेन्दु युग में कई उपन्यास लिखे गए और वे सभी तरह के विषयों पर आधारित थे। इस युग में अंग्रेजी ढंग का पहला मौलिक उपन्यास लाला श्रीनिवासदास का 'परीक्षागुरु' माना जाता है। इससे पहले श्रद्धाराम फुल्लौरी ने 'भाग्यवती' नाम का एक छोटा सामाजिक उपन्यास लिखा था। इस युग के प्रमुख उपन्यासकारों में लाला श्रीनिवासदास, किशोरीलाल गोस्वामी, बालकृष्ण भट्ट, ठाकुर जगमोहन सिंह, राधाकृष्णदास, लज्जाराम शर्मा, देवकीनन्दन खत्री और गोपालराम गहमरी शामिल हैं। भारतेन्दु काल में सामाजिक, ऐतिहासिक, तिलस्मी-ऐयारी, जासूसी और रोमानी (प्रेम कथा पर आधारित) उपन्यास बहुत लिखे गए। सामाजिक उपन्यासों में 'भाग्यवती', 'परीक्षागुरु', 'रहस्यकथा', 'नूतन ब्रह्मचारी', 'सौ अजान एक सुजान', 'निस्सहाय हिन्दू', 'धूर्त रसिकलाल', 'स्वतंत्र रमा और परतन्त्र लक्ष्मी' जैसी रचनाएँ खास हैं। किशोरीलाल गोस्वामी के 'त्रिवेणी वा सौभाग्यश्रणी' और देवकीनन्दन खत्री के 'चन्द्रकान्ता', 'चन्द्रकान्ता सन्तति', 'नरेन्द्र मोहिनी', 'वीरेन्द्र वीर' भी उल्लेखनीय हैं।
In simple words: भारतेन्दु युग में सामाजिक, ऐतिहासिक, तिलस्मी-ऐयारी, जासूसी और रोमानी विषयों पर आधारित कई उपन्यास लिखे गए। 'परीक्षागुरु' और 'भाग्यवती' इस दौर के महत्वपूर्ण उपन्यास हैं।
🎯 Exam Tip: उपन्यास के विभिन्न प्रकारों को सूचीबद्ध करें और प्रत्येक श्रेणी से एक या दो उदाहरण प्रस्तुत करें ताकि आपका उत्तर विस्तृत लगे।
Question 3. मैथिलीशरण गुप्त- द्विवेदी युग के प्रसिद्ध कवि हैं। इनका जन्म चिरगांव (झांसी) में हुआ था। ये द्विवेदी काल के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि थे। द्विवेदी के स्नेह और प्रोत्साहन से इनकी काव्य-कला में निखार आया। इनकी प्रथम पुस्तक 'रंग में भंग' है किन्तु इनकी ख्याति का मूलाधार 'भारत-भारती' है। उत्तर- भारत में राष्ट्रीयता के प्रचार और प्रसार में भारत-भारती' के योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता। भारत-भारती' ने हिंदी-मनीषियों में जाति और देश के प्रति गर्व और गौरव की भावनाएँ उत्पन्न की और तभी से ये राष्ट्रकवि के रूप में विख्यात हुए। ये रामभक्त कवि भी थे। 'मानस' के पश्चात् हिन्दी में रामकाव्य का दूसरा स्तम्भ इनके द्वारा रचित 'साकेत' ही है। खड़ी बोली के स्वरूप-निर्धारण और विकास में इनका अन्यतम योगदान है। गुप्त जी के प्रमुख काव्य ग्रंथ हैं- 'जयद्रथ वध', भारत-भारती, 'पंचवटी', 'झंकार', 'साकेत', 'यशोधरा', 'द्वापर', 'जयभारत', 'विष्णुप्रिया' आदि। 'प्लासी का युद्ध', 'मेघनाद-वध', 'वृत्त-संहार' आदि इनके अनूदित काव्य हैं।
Answer: मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदी युग के बहुत प्रसिद्ध कवि थे, जिनका जन्म झांसी के चिरगांव में हुआ था। वे द्विवेदी काल के सबसे लोकप्रिय कवियों में से एक थे। आचार्य द्विवेदी के मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से उनकी काव्य कला और भी निखर गई। उनकी पहली पुस्तक 'रंग में भंग' थी, लेकिन उनकी असली पहचान 'भारत-भारती' से मिली। इस पुस्तक ने भारत में राष्ट्रीयता फैलाने में बहुत मदद की, जिसके लिए उन्हें 'राष्ट्रकवि' कहा जाने लगा। वे भगवान राम के भक्त भी थे और 'मानस' के बाद हिंदी रामकाव्य का दूसरा महत्वपूर्ण ग्रंथ 'साकेत' उन्होंने ही लिखा। खड़ी बोली हिंदी को सही रूप देने और विकसित करने में उनका बहुत बड़ा योगदान था। गुप्त जी के मुख्य काव्य ग्रंथों में 'जयद्रथ वध', 'भारत-भारती', 'पंचवटी', 'झंकार', 'साकेत', 'यशोधरा', 'द्वापर', 'जयभारत', और 'विष्णुप्रिया' शामिल हैं। उन्होंने 'प्लासी का युद्ध', 'मेघनाद-वध', और 'वृत्त-संहार' जैसे कुछ काव्यों का अनुवाद भी किया था।
In simple words: मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदी युग के प्रसिद्ध राष्ट्रकवि थे, जिन्होंने 'भारत-भारती' और 'साकेत' जैसी महत्वपूर्ण रचनाएँ लिखीं। उन्होंने खड़ी बोली हिंदी के विकास में अहम भूमिका निभाई और राष्ट्रीयता की भावना जगाई।
🎯 Exam Tip: मैथिलीशरण गुप्त को 'राष्ट्रकवि' क्यों कहा जाता है, इस बिंदु को अपनी उत्तर में ज़रूर शामिल करें और उनकी प्रमुख रचनाओं के नाम याद रखें।
Question 4. हिन्दी कहानी का जन्म किस युग में माना जाता है? इस युग में हिन्दी कहानी के विकास पर प्रकाश डालिए।
Answer: हिंदी कहानी का जन्म करीब 1900 ई. में द्विवेदी युग में माना जाता है। यह 1912 से 1918 ई. के बीच पूरी तरह से स्थापित हो गई। 'सरस्वती' (1900) पत्रिका के शुरू होने के साथ ही हिंदी कहानी भी तेजी से विकसित हुई। शुरुआती लेखकों में किशोरीलाल गोस्वामी, माधवप्रसाद मिश्र, बंगमहिला, रामचन्द्र शुक्ल, जयशंकर प्रसाद और वृन्दावनलाल वर्मा जैसे नाम खास हैं। किशोरीलाल गोस्वामी की कहानी 'इन्दुमती' 1900 ई. में 'सरस्वती' में छपी थी। माधव प्रसाद की 'मन की चंचलता', भगवानदीन की 'प्लेग की चुडैल' और रामचन्द्र शुक्ल की 'ग्यारह वर्ष का समय' तथा बंगमहिला की 'दुलाईवाली' कहानियाँ भी इसी दौर की हैं। ऐतिहासिक कहानियाँ लिखने वालों में वृन्दावन लाल वर्मा की 'राखीबन्द भाई' खास थी। जयशंकर प्रसाद ने भी बहुत कहानियाँ लिखीं, जिनका संग्रह 'छाया' नाम से 1912 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद प्रेमचंद का आगमन हुआ। उनकी कहानियाँ भी 'सरस्वती' में छपीं, जैसे 'सौत', 'पंच परमेश्वर', 'सज्जनता का दण्ड', 'ईश्वरीय न्याय', 'दुर्गा का मन्दिर'। चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' की प्रसिद्ध कहानी 'उसने कहा था' 1915 में 'सरस्वती' में प्रकाशित हुई। ज्वालादत्त शर्मा की 'मिलन', विश्वंभरनाथ शर्मा 'कौशिक' की 'रक्षाबंधन', और पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की 'झलमला' जैसी कहानियाँ भी इसी समय की हैं। इस तरह 1900 के आस-पास हिंदी कहानी का जन्म हुआ और 1918 तक यह पूरी तरह से विकसित होकर साहित्य में अपनी खास जगह बना ली।
In simple words: हिंदी कहानी का जन्म द्विवेदी युग में लगभग 1900 ई. में हुआ। 'सरस्वती' पत्रिका के प्रकाशन से इसका विकास हुआ, जिसमें किशोरीलाल गोस्वामी, प्रेमचंद और चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' जैसे लेखकों ने महत्वपूर्ण कहानियाँ लिखीं।
🎯 Exam Tip: हिंदी कहानी के उद्भव की तिथि और प्रमुख लेखकों की कहानियों के साथ उनके नाम अवश्य लिखें।
Question 5. छायावाद काल में 'नाटक' विधा के विकास पर प्रकाश डालिए।
Answer: छायावाद काल को हिंदी नाटक साहित्य के लिए 'प्रसाद युग' कहना सही रहेगा। जयशंकर प्रसाद ने 1918 ई. से पहले ही नाटक लिखने शुरू कर दिए थे। उनकी शुरुआती रचनाएँ 'सज्जन', 'कल्याणी-परिणय', 'प्रायश्चित', 'करुणालय' और 'राज्यश्री' थीं। इसके अलावा, 'विशाख', 'अजातशत्रु', 'कामना', 'जनमेजय का नाग यज्ञ', 'स्कन्दगुप्त', 'एक घूँट', 'चन्द्रगुप्त' और 'ध्रुवस्वामिनी' जैसी रचनाओं ने हिंदी नाट्य साहित्य को एक खास ऊँचाई दी। उपन्यास और कहानी के क्षेत्र में जो स्थान प्रेमचंद का है, वही नाटक के क्षेत्र में प्रसाद का माना जाता है। इस युग में 'स्वर्णविहान', 'रक्षाबंधन', 'पाताल विजय', 'प्रतिशोध', 'शिवासाधना' जैसे नाटक भी लिखे गए। लक्ष्मीनारायण मिश्र ने 'अशोक', 'संन्यासी', 'मुक्ति का रहस्य', 'राक्षस का मन्दिर', 'राजयोग', 'सिन्दूर की होली', 'आधी रात' जैसे नाटक लिखे। अम्बिकादत्त त्रिपाठी, रामचरित उपाध्याय, रामनरेश त्रिपाठी, गंगाप्रसाद अरोड़ा, गौरीशंकर प्रसाद, परिपूर्णानन्द, वियोगी हरि, गोकुलचन्द्र वर्मा, कैलाशनाथ भटनागर, लक्ष्मीनारायण गर्ग, सेठ गोविन्ददास और अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' जैसे नाटककार भी इस काल में हुए। यह काल नाटक साहित्य के लिए बहुत समृद्ध था। इस काल में ऐतिहासिक, धार्मिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक और यथार्थवादी नाटक लिखे गए।
In simple words: छायावाद काल को 'प्रसाद युग' भी कहते हैं, क्योंकि जयशंकर प्रसाद ने 'स्कन्दगुप्त' और 'ध्रुवस्वामिनी' जैसे कई महत्वपूर्ण नाटक लिखे। इस युग में ऐतिहासिक, धार्मिक, सामाजिक और यथार्थवादी नाटक बहुत विकसित हुए।
🎯 Exam Tip: जयशंकर प्रसाद को इस काल का प्रमुख नाटककार बताते हुए उनकी महत्वपूर्ण रचनाओं का उल्लेख करें।
Question 6. छायावाद काल में प्रेमचंद के समकालीन उपन्यासकारों के कृतित्व का परिचय दीजिए।
Answer: प्रेमचंद के समय में लगभग ढाई सौ से ज़्यादा उपन्यासकार थे। विश्वंभरनाथ शर्मा 'कौशिक' ने 'माँ' और 'भिखारिणी' जैसे उपन्यास लिखकर प्रेमचंद के लेखन का सफल अनुकरण किया। चतुरसेन शास्त्री ने 'हृदय की परख', 'हृदय की प्यास', 'अमर अभिलाषा' और 'आत्मदाह' जैसे उपन्यास लिखे। प्रतापनारायण श्रीवास्तव ने 'विदा' और 'विजय' जैसे आदर्शवादी उपन्यास रचे। शिवपूजन सहाय ने अपने आंचलिक उपन्यास 'देहाती दुनिया' को लिखा। प्रेमचंद के युग के एक और बेधड़क उपन्यासकार बेचन शर्मा 'उग्र' ने 'चन्द हसीनों के खुतूत' (1927), 'दिल्ली का दलाल', 'बुधुआ की बेटी' और 'शराबी' जैसे उपन्यास लिखे। उन्होंने समाज की बुराइयों और उसकी कड़वी सच्चाइयों को बिना किसी लाग-लपेट के सामने रखा। ऋषभचरण जैन ने 'दिल्ली का कलंक' और 'दिल्ली का व्यभिचार' जैसे विवादित विषयों पर उपन्यास लिखे। जयशंकर प्रसाद भी इस दौर के महत्वपूर्ण उपन्यासकार थे, जिन्होंने 'कंकाल' और 'तितली' जैसे उपन्यास लिखे। 'कंकाल' खास तौर पर प्रसिद्ध है। जैनेन्द्र ने 'परख', 'सुनीता' और 'त्यागपत्र' जैसे उपन्यासों में व्यक्ति के मन के सवालों और उलझनों को दिखाया। वृन्दावनलाल वर्मा ने ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की शुरुआत की, और राहुल सांकृत्यायन ने कुछ उपन्यासों का अनुवाद किया। प्रेम पर आधारित उपन्यास लिखने का श्रेय सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' को जाता है।
In simple words: प्रेमचंद के समय में कई उपन्यासकार थे जिन्होंने सामाजिक बुराइयों, प्रेम, और ऐतिहासिक विषयों पर लिखा। विश्वंभरनाथ शर्मा 'कौशिक', चतुरसेन शास्त्री, बेचन शर्मा 'उग्र', जयशंकर प्रसाद और जैनेन्द्र इस युग के मुख्य उपन्यासकार थे।
🎯 Exam Tip: प्रमुख समकालीन उपन्यासकारों के नाम और उनकी कम से कम एक-एक रचना का उल्लेख करें।
Question 7. 'छायावाद काल में ललित निबन्धों की परंपरा भी फूली-फली।' इस कथन पर टिप्पणी लिखिए।
Answer: छायावाद काल में कई ललित निबंधकार सामने आए, जिससे इस परंपरा का विकास हुआ। ललित निबंधों की दृष्टि से गुलाबराय की कुछ रचनाएँ बहुत खास हैं। उनके संग्रहों जैसे 'ठलुआ-क्लब', 'फिर निराशा क्यों', और 'मेरी असफलताएँ' में कुछ बेहतरीन व्यक्तिगत निबंध शामिल हैं। उनके निबंध 'मेरा मकान', 'मेरे नापिताचार्य', 'मेरी दैनिकी का एक पृष्ठ', और 'प्रीतिभोज' में ललित निबंधों की सारी विशेषताएँ मौजूद हैं। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने भी कुछ व्यक्तिगत निबंध लिखे, जो 'पंचपात्र' में संकलित हैं। उनके निबंधों जैसे 'अतीत स्मृति', 'उत्सव', 'रामलाल पण्डित', और 'श्रद्धांजलि के दो फूल' में लेखक की भावुकता, अपनेपन और व्यंग्यपूर्ण प्रतिक्रिया का सुन्दर मेल देखने को मिलता है। इस काल के अन्य ललित निबंधकारों में शान्तिप्रिय द्विवेदी, शिवपूजन सहाय, बेचन शर्मा 'उग्र', रघुवीरसिंह और माखनलाल चतुर्वेदी के नाम भी लिए जा सकते हैं।
In simple words: छायावाद काल में ललित निबंधों की परंपरा बहुत विकसित हुई। गुलाबराय और पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जैसे लेखकों ने व्यक्तिगत भावनाओं, व्यंग्य और अपनी सोच पर आधारित कई सुंदर निबंध लिखे।
🎯 Exam Tip: ललित निबंध की विशेषताओं को बताते हुए प्रमुख निबंधकारों और उनकी रचनाओं के नाम अवश्य शामिल करें।
आत्मकथा
हिंदी में आत्मकथा लेखन की शुरुआत बनारसीदास जैन ने अपनी रचना 'अर्धकथानक' से की थी। सत्यानन्द अग्निहोत्री ने 'मुझमें देव-जीवन का विकास' नाम से अपनी आत्मकथा लिखी। भाई परमानन्द ने 'आपबीती' और मोहनदास करमचंद गाँधी ने 1923 में अपनी 'आत्मकथा' लिखी। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की 'तरुण के स्वप्न' भी इस युग की एक महत्वपूर्ण आत्मकथा है।
In simple words: हिंदी में आत्मकथाएँ लिखने की शुरुआत बनारसीदास जैन ने की। सत्यानन्द अग्निहोत्री, भाई परमानन्द, महात्मा गांधी और सुभाषचन्द्र बोस ने भी इस काल में अपनी आत्मकथाएँ लिखीं।
🎯 Exam Tip: प्रमुख आत्मकथा लेखकों और उनकी रचनाओं के नाम याद रखें।
यात्रावृत्त
छायावाद युग में यात्रा-वृत्तांत भी खूब लिखे गए। इस युग के यात्रा-वृत्तांत लेखकों में स्वामी सत्यदेव परिव्राजक और राहुल सांकृत्यायन का विशेष योगदान है। 'पृथ्वी प्रशिक्षण', 'मेरी जर्मन यात्रा', 'ज्ञान के उद्यान में' और 'मेरी तिब्बत यात्रा' इस काल के प्रसिद्ध यात्रा-वृत्तांत हैं।
In simple words: छायावाद युग में यात्रा-वृत्तांत खूब लिखे गए। स्वामी सत्यदेव परिव्राजक और राहुल सांकृत्यायन प्रमुख लेखक थे, जिन्होंने अपनी यात्राओं के अनुभव लिखे।
🎯 Exam Tip: प्रमुख यात्रा-वृत्तांत लेखकों के नाम और उनकी महत्वपूर्ण कृतियों को याद करें।
संस्मरण तथा रेखाचित्र
इस युग में संस्मरण और रेखाचित्र भी काफी मात्रा में लिखे गए। 'सरस्वती' पत्रिका में रामकुमार खेमका, कृपानाथ मिश्र, रामनारायण मिश्र, भगवानदीन दुबे, रामेश्वरी नेहरू और श्रीमन्नारायण अग्रवाल के संस्मरण प्रकाशित हुए। इलाचन्द्र जोशी का 'मेरे प्राथमिक जीवन की स्मृतियाँ' और वृन्दावनलाल वर्मा का 'कुछ संस्मरण' भी उल्लेखनीय हैं। इस युग में संस्मरणात्मक रेखाचित्रों की एक नई विधा का भी विकास हुआ। श्रीराम शर्मा, बनारसीदास चतुर्वेदी और महादेवी वर्मा ने इसमें बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया। श्रीराम शर्मा का 'बोलती प्रतिमा' खास तौर पर उल्लेखनीय है।
In simple words: छायावाद युग में संस्मरण और रेखाचित्र भी बहुत लिखे गए। श्रीराम शर्मा और महादेवी वर्मा ने इस विधा में महत्वपूर्ण काम किया।
🎯 Exam Tip: संस्मरण और रेखाचित्र की मुख्य विशेषताएँ और प्रमुख लेखकों के नाम याद रखें।
छायावादोत्तर काल (1936 से)
1936 ई. के बाद का समय छायावादोत्तर काल कहलाता है। इस दौरान साहित्य कई विचारधाराओं से होकर गुजरा। जीवन के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण, काव्य की शैली और विषय-वस्तु में नए बदलाव आए। इस समय के साहित्य में व्यक्तिगत अनुभवों की गहराई, सामाजिक भावनाओं का विस्तार, रोमानी और बौद्धिक यथार्थवाद जैसे विचार विकसित हुए। इस काल में राष्ट्रीय-सांस्कृतिक कविता, उत्तर छायावाद, वैयक्तिक गीतिकाव्य, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता जैसी काव्यधाराएँ प्रमुख रूप से उभरीं। राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्य धारा की मुख्य कृतियों में 'नहुष', 'युगचरण', 'क्वासि', 'हम विषपायी जनम के', 'उन्मुक्त', 'हुंकार', 'कुरुक्षेत्र', 'रश्मिरथी', 'वासवदत्ता', 'चित्रा', 'युगाधार', 'विसर्जन', 'कैकयी' प्रमुख हैं। उत्तर छायावाद के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ हैं- 'तुलसीदास', 'अणिमा', 'अर्चना' (निराला); 'स्वर्णकिरण', 'स्वर्णधूलि', 'मधुज्वाल', 'युगपथ', 'उत्तरा', 'रजतशिखर', 'शिल्पी', 'अतिमा', 'कला और बूढ़ा चाँद', 'लोकायतन' (सुमित्रानन्दन पन्त); 'दीपशिखा' (महादेवी वर्मा); 'रूप अरूप', 'शिप्रा', 'मेघगीत', 'अवन्तिका' (जानकीवल्लभ शास्त्री)। व्यक्तिगत गीत काव्य में रोमानी धारा की कविताएँ आती हैं। इस प्रवृत्ति के अन्तर्गत आने वाली प्रमुख कविताएँ हैं- 'निशा निमंत्रण', 'सतरंगिनी', 'मिलन यामिनी', 'रसवन्ती', 'लाल चूनर', 'जीवन और यौवन', 'रागिनी', 'नवीन', 'नींद के बादल' और 'मंजीर', 'छवि के बन्धन'।
In simple words: छायावादोत्तर काल 1936 के बाद का समय है, जिसमें कई नई काव्यधाराएँ जैसे राष्ट्रीय-सांस्कृतिक कविता, प्रगतिवाद और नई कविता विकसित हुईं। इसमें व्यक्तिगत और सामाजिक भावनाओं को गहराई से दिखाया गया।
🎯 Exam Tip: छायावादोत्तर काल की समय-सीमा और इसमें विकसित प्रमुख काव्यधाराओं का उल्लेख करें।
प्रगतिवाद
जो काव्य मार्क्सवादी विचारों को अपनाकर सामाजिक चेतना और भावों को अपना लक्ष्य बनाकर चला, उसे प्रगतिवाद कहा गया। इसके विकास में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों ने मदद की, साथ ही छायावाद की हल्की काव्यधारा भी सहायक बनी। भारत में 1935 ई. के आस-पास साम्यवादी आंदोलन जोर पकड़ने लगा। प्रगतिवाद के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं- 'युगवाणी', 'ग्राम्या' (पंत), 'कुकुरमुत्ता' (निराला), 'युग की गंगा' (केदारनाथ अग्रवाल), 'युगधारा' (नागार्जुन), 'धरती' (त्रिलोचन), 'जीवन के गान', 'प्रलय सृजन' (शिवमंगलसिंह सुमन), 'अजेय खंडहर', 'पिघलते पत्थर', 'मेधावी' (रांघेय राघव), 'मुक्तिमार्ग', 'जागते रहो' (भारतभूषण अग्रवाल)। अन्य प्रमुख कवियों में शिवमंगलसिंह सुमन (1915), त्रिलोचन (1917), मुक्तिबोध, अज्ञेय, भारतभूषण अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह और धर्मवीर भारती शामिल हैं।
In simple words: प्रगतिवाद मार्क्सवादी दर्शन पर आधारित काव्य है जो सामाजिक चेतना को दिखाता है। पंत, निराला, नागार्जुन और रांघेय राघव इस धारा के प्रमुख कवि थे।
🎯 Exam Tip: प्रगतिवाद की परिभाषा और उसके प्रमुख कवियों की सूची उनकी एक-दो रचनाओं के साथ प्रस्तुत करें।
नई कविता
प्रयोगवाद का विकास ही आगे चलकर 'नई कविता' के रूप में बदल गया। प्रयोगवाद और नई कविता के बीच कोई स्पष्ट अंतर रेखा खींचना मुश्किल है। नई कविता जीवन को पूरी तरह से स्वीकार करके उसे जीने की इच्छा दिखाती है। नई कविता में अनुभूति की सच्चाई को दर्शाया गया है। इसमें पुराने मूल्यों को व्यंग्य के रूप में अस्वीकार किया गया है। कुल मिलाकर नई कविता में नयापन, बौद्धिकता, बहुत ज़्यादा व्यक्तिगतता, पल भर का महत्व, भोग और वासना, सच्चाई, आधुनिक युग का एहसास, प्रेम की भावना, लोक संस्कृति और नया शिल्प विधान जैसी विशेषताएँ देखने को मिलती हैं।
In simple words: नई कविता प्रयोगवाद का ही अगला रूप है। इसमें जीवन को स्वीकार करना, व्यक्तिगत भावनाओं को दिखाना और पुराने मूल्यों पर व्यंग्य करना इसकी मुख्य विशेषताएँ हैं।
🎯 Exam Tip: नई कविता की प्रमुख विशेषताओं को संक्षेप में स्पष्ट करें।
प्रयोगवाद एवं नई कविता के प्रमुख कवि
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', गिरिजा कुमार माथुर, गजानन माधव मुक्तिबोध, भवानी प्रसाद मिश्र, शमशेर बहादुर सिंह और धर्मवीर भारती प्रयोगवाद और नई कविता के जाने-माने कवि हैं। अज्ञेय द्वारा संपादित तीनों 'सप्तकों' में इनकी महत्वपूर्ण रचनाएँ शामिल हैं।
In simple words: अज्ञेय, गिरिजा कुमार माथुर, मुक्तिबोध, भवानी प्रसाद मिश्र, शमशेर बहादुर सिंह और धर्मवीर भारती प्रयोगवाद और नई कविता के मुख्य कवि हैं।
🎯 Exam Tip: इन कवियों के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है क्योंकि ये दोनों काव्यधाराओं में प्रमुख हैं।
छायावादोत्तर गद्य साहित्य
नाटक - उपेन्द्रनाथ अश्क ऐसे पहले नाटककार थे जिन्होंने हिंदी नाटक को सिर्फ प्रेम-कथाओं से निकालकर आधुनिक विचारों से जोड़ा। उनके प्रमुख नाटकों में 'छठा बेटा', 'कैद', 'उड़ान', 'भंवर', 'अंजो दीदी', 'अंधी गली' और 'पैंतरे' शामिल हैं। विष्णु प्रभाकर, जगदीशचन्द्र माथुर, धर्मवीर भारती, डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल, मोहन राकेश आदि अन्य प्रमुख नाटककार थे। इस काल में बहुत से गीति-नाट्य भी लिखे गए। सुमित्रानन्दन पन्त ने 'रजतशिखर', 'शिल्पी', सेठ गोविन्ददास ने 'स्नेह या स्वर्ग' (1946) और 'कर्ण' जैसे गीति-नाट्य लिखे। गिरिजाकुमार माथुर ने 'कल्पान्तर', 'सृष्टि की साँझ' और 'लौह देवता' जैसे नाटकों की रचना की।
In simple words: छायावादोत्तर काल में उपेन्द्रनाथ अश्क जैसे नाटककारों ने हिंदी नाटक को आधुनिक बनाया। इस दौरान कई गीति-नाट्य भी लिखे गए।
🎯 Exam Tip: छायावादोत्तर नाटक की आधुनिकता पर जोर दें और प्रमुख नाटककारों की रचनाओं का उल्लेख करें।
एकांकी नाटक - इस समय के प्रमुख एकांकीकार भुवनेश्वर, रामकुमार वर्मा, उदयशंकर भट्ट, अश्क, सेठ गोविन्ददास और जगदीशचन्द्र माथुर थे।
In simple words: भुवनेश्वर, रामकुमार वर्मा और उदयशंकर भट्ट छायावादोत्तर काल के प्रमुख एकांकी लेखक थे।
🎯 Exam Tip: एकांकी विधा के प्रमुख लेखकों के नाम याद रखना आवश्यक है।
उपन्यास - प्रेमचंद के बाद हिंदी उपन्यास कई पड़ावों से गुजरे। इन्हें मोटे तौर पर तीन दशकों में बाँटा जा सकता है- 1950 ई. तक के उपन्यास, 1950 से 1960 ई. तक के उपन्यास और 1960 के बाद के उपन्यास। 1950 का दशक मुख्य रूप से फ्रायड और मार्क्स की विचारधारा से प्रभावित था। 1960 का दशक प्रायोगिक विशेषताओं वाला था और उसके बाद के उपन्यास आधुनिकतावादी विचारों से भरे थे। फ्रायड से प्रभावित उपन्यासकारों में जैनेन्द्र जी प्रमुख हैं। अज्ञेय के उपन्यास 'शेखर एक जीवनी' (1941) के प्रकाशन से हिंदी उपन्यास को एक नई दिशा मिली। इस काल के प्रमुख उपन्यासकार जैनेन्द्र, अज्ञेय, इलाचन्द्र जोशी, यशपाल, रामेश्वर शुक्ल, भगवती चरण वर्मा, उपेन्द्रनाथ अश्क और अमृतलाल नागर थे। ऐतिहासिक उपन्यासकारों में वृन्दावनलाल वर्मा, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, यशपाल, राहुल सांकृत्यायन और रांघेय राघव प्रमुख थे। फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास सही मायने में आंचलिक थे। उनका 'मैला आंचल' (1954) बहुत प्रसिद्ध हुआ। नागार्जुन, रांघेयराघव जैसे लेखक आंचलिक उपन्यासकार थे। मनोवैज्ञानिक उपन्यासों में धर्मवीर भारती जैसे लेखक सामाजिक यथार्थ पर भी लिखते थे।
In simple words: प्रेमचंद के बाद हिंदी उपन्यास में कई बदलाव आए, जो फ्रायड और मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित थे। जैनेन्द्र, अज्ञेय, रेणु और धर्मवीर भारती जैसे लेखकों ने मनोवैज्ञानिक, आंचलिक और ऐतिहासिक उपन्यास लिखे।
🎯 Exam Tip: प्रेमचंदोत्तर उपन्यासों की प्रमुख धाराओं और प्रत्येक धारा से जुड़े उपन्यासकारों के नाम व उनकी मुख्य कृतियाँ प्रस्तुत करें।
कहानी - हिंदी कहानी गद्य की एक मुख्य विधा है। नई कविता की तरह 'नई कहानी' का भी विकास हुआ। इसके बाद सचेतन कहानी और अ-कहानी आंदोलन भी चले। 1962 के भारत-चीन युद्ध ने रोमांटिक कहानियों को छोड़कर हमें यथार्थ की दुनिया से परिचित कराया। इसके बाद 1970 के दशक में कहानियाँ तनाव, अकेलेपन और निराशा जैसे विषयों पर केंद्रित थीं। यशपाल ने प्रगतिवाद से प्रेरित होकर धन की असमानता पर जोर दिया। इलाचन्द्र जोशी ने अपनी कहानियों में मनोवैज्ञानिक केस-स्टडी को अपनाया। अश्क की कहानियों में विविधता दिखती है। विष्णुप्रभाकर, कमल जोशी, निर्गुण, भैरवप्रसाद गुप्त और अमृतराय जैसे लेखक नई पीढ़ी के कहानीकार हैं। विष्णुप्रभाकर की 'धरती अब भी घूम रही है' कहानी आधुनिक विचारों के करीब है। कमल जोशी की 'शिराजी' और 'पत्थर की आँखें' प्रसिद्ध कहानियाँ हैं। 1960 के दशक में युग के बदलाव और तनाव भी कहानियों में दिखाई देते हैं। मोहन राकेश तनावों के कहानीकार हैं। उनके कहानी संग्रहों में 'नये बादल', 'जानवर और जानवर' और 'एक और जिन्दगी' शामिल हैं। राजेन्द्र यादव की कहानियों में आधुनिक सोच को व्यापक सामाजिकता से जोड़ा गया है। उन्होंने व्यक्तिगत भावनाओं पर विशेष ध्यान दिया। कमलेश्वर की कहानियों में युग के बदलाव का गहरा प्रभाव दिखता है। नरेश मेहता, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, धर्मवीर भारती, कुंवर नारायण और रामदरश मिश्र जैसे कवियों ने अपने तरीके से कहानियाँ लिखीं। महिला लेखिकाओं में मन्नू भण्डारी, कृष्णा सोबती, शिवानी, उषा प्रियंवदा, रजनी पन्निकर और मेहरुन्निसा परवेज प्रमुख हैं। इनकी दुनिया पुरुषों से कुछ अलग थी। 1970 के दशक की शुरुआत में निर्मल वर्मा की कहानियाँ बहुत चर्चित रहीं। इस दशक को 'मोहभंग का दशक' भी कहा जा सकता है। चीन से हार के बाद पुरानी पीढ़ी के प्रति गुस्सा यहीं से शुरू हुआ। ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, गंगाप्रसाद विमल, गिरिराज किशोर, रवीन्द्र कालिया, महेन्द्र भल्ला, ज्ञानप्रकाश और काशीनाथ सिंह जैसे अन्य लेखक भी इस दौर के महत्वपूर्ण कहानीकार हैं।
In simple words: हिंदी कहानी ने नई कहानी, सचेतन और अ-कहानी आंदोलनों के साथ विकास किया। यशपाल, प्रेमचंद, मोहन राकेश और महिला लेखिकाएँ जैसे मन्नू भण्डारी ने सामाजिक यथार्थ, मनोवैज्ञानिक और तनावपूर्ण विषयों पर कहानियाँ लिखीं।
🎯 Exam Tip: कहानी आंदोलनों के नाम और प्रत्येक आंदोलन से जुड़े प्रमुख कहानीकारों और उनकी महत्वपूर्ण कहानियों का उल्लेख करें।
निबंध - आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की समीक्षात्मक निबंधों की परंपरा को नन्ददुलारे वाजपेयी ने आगे बढ़ाया। जयशंकर प्रसाद के निबंधों में उनकी गहरी समझ, संतुलित विचार और रचनात्मकता दिखाई देती है। इस काल के सबसे महत्वपूर्ण निबंधकार हजारीप्रसाद द्विवेदी हैं। उनके ललित निबंधों में सांस्कृतिक विरासत, नया जीवन-बोध, जीने की इच्छा और नई सामाजिक समस्याओं को सुलझाने की कोशिश दिखती है। जैनेन्द्र का स्थान भी महत्वपूर्ण है, उन्होंने धर्म, राजनीति, संस्कृति, साहित्य, काम, प्रेम और विवाह जैसे विषयों पर निबंध लिखे। हिंदी में शान्तिप्रिय द्विवेदी ने समीक्षात्मक निबंधों के अलावा अन्य विषयों पर भी निबंध लिखे। रामधारीसिंह 'दिनकर' ने भी समय-समय पर महत्वपूर्ण निबंध लिखे, जैसे 'अर्धनारीश्वर', 'मिट्टी की ओर', 'रेती के फूल', 'हमारी सांस्कृतिक एकता', 'प्रसाद, पन्त और मैथिलीशरण', 'राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय साहित्य'। समीक्षात्मक निबंधकारों में डॉ. नगेन्द्र के निबंधों में व्यक्तिगत अनुभव ज़्यादा दिखते हैं। साहित्य से हटकर ललित निबंध लिखने वालों में आनन्द कौसल्यायन, वासुदेव शरण अग्रवाल और यशपाल भी महत्वपूर्ण हैं।
In simple words: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, जैनेन्द्र और रामधारीसिंह 'दिनकर' जैसे लेखकों ने हिंदी निबंध को आगे बढ़ाया। उनके निबंधों में समीक्षात्मक, ललित, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत विषय शामिल थे।
🎯 Exam Tip: निबंध के प्रमुख लेखकों के नाम और उनकी कुछ प्रसिद्ध निबंध-संग्रहों या निबंधों का उल्लेख करें।
अन्य गद्य विधाएँ
जीवनी साहित्य - इस युग में जीवनी साहित्य का बहुत विकास हुआ। इसमें लोकप्रिय नेताओं, संत-महात्माओं, साहित्यकारों, विदेशी महापुरुषों, वैज्ञानिकों, खिलाड़ियों और उद्योगपतियों से संबंधित जीवनियाँ खूब लिखी गईं। महात्मा गांधी इस युग के सबसे प्रिय नेता थे, इसलिए उन पर कई जीवनियाँ लिखी गईं। भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद और सुभाषचन्द्र बोस पर भी कई लेखकों ने जीवनियाँ लिखीं। महात्मा बुद्ध और शंकराचार्य जैसे संतों के जीवन पर भी लिखा गया। भारतीय इतिहास के महापुरुषों जैसे शिवाजी, रणजीत सिंह, गुरुगोविन्द सिंह, भीष्म पितामह और युधिष्ठिर की जीवनियाँ भी लिखी गईं। विदेशी महापुरुषों पर भी जीवनियाँ लिखी गईं, जैसे स्टालिन, कार्लमार्क्स, माओत्से तुंग और मुसोलिनी। साहित्यकारों में प्रेमचंद बहुत लोकप्रिय थे, इसलिए उन पर भी कई जीवनियाँ लिखी गईं। उनकी पत्नी शिवरानी देवी ने 88 अध्यायों में 'प्रेमचन्द घर में' (1956) नाम से जीवनी लिखी, जो बहुत महत्वपूर्ण है। उनके बेटे अमृतराय ने भी 'कलम का सिपाही' (1967) नाम से प्रेमचंद पर जीवनी लिखी। सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' पर भी कई जीवनियाँ लिखी गईं, जिनमें गंगाप्रसाद पाण्डेय की 'महाप्राण निराला' और रामविलास शर्मा की 'निराला की साहित्य साधना' शामिल हैं। शांति जोशी की 'सुमित्रानन्दन पंत जीवन और साहित्य' (1970) और विष्णुप्रभाकर की 'आवारा मसीहा' भी प्रसिद्ध जीवनियाँ हैं।
In simple words: इस युग में कई नेताओं, संतों और साहित्यकारों की जीवनियाँ लिखी गईं। महात्मा गांधी, प्रेमचंद और निराला जैसे व्यक्तित्वों पर विशेष रूप से बहुत लिखा गया।
🎯 Exam Tip: जीवनी लेखन में प्रमुख हस्तियों के नाम और उनकी संबंधित जीवनियों का उल्लेख करें।
आत्मकथा - इस काल में बहुत सारी आत्मकथाएँ लिखी गईं। श्यामसुन्दरदास, हरिभाऊ उपाध्याय, राहुल सांकृत्यायन, वियोगी हरि, यशपाल, स्वामी सत्यदेव परिव्राजक, शांतिप्रिय द्विवेदी, देवेन्द्र सत्यार्थी, चतुरसेन शास्त्री, देवराज उपाध्याय, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, सेठ गोविन्ददास, पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र', संतराम बी.ए., भुवनेश्वरप्रसाद मिश्र माधव, हरिवंशराय बच्चन, वृन्दावनलाल वर्मा और रामविलास शर्मा की आत्मकथाएँ इसी युग में प्रकाशित हुईं। इस समय के राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की आत्मकथाएँ भी प्रकाशित हुईं, जिनमें राजेन्द्रप्रसाद, अलगूराय शास्त्री, जानकीदेवी बजाज, नरदेव शास्त्री, मोरारजी देसाई और बलराज मधोक जैसे नाम खास हैं।
In simple words: इस युग में श्यामसुन्दरदास, राहुल सांकृत्यायन, हरिवंशराय बच्चन और राजेन्द्रप्रसाद जैसे कई लेखकों और नेताओं ने अपनी आत्मकथाएँ लिखीं।
🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण आत्मकथा लेखकों और उनकी कृतियों को याद रखें।
यात्रावृत्त - स्वामी सत्यदेव परिव्राजक, कन्हैयालाल मिश्र आर्योपदेशक, सन्तराम, राहुल सांकृत्यायन, सेठ गोविन्ददास और पं. नेहरू जैसे लेखक यात्रावृत्त लेखन में खास थे। इस समय रूस से संबंधित यात्रावृत्त अधिक लिखे गए क्योंकि रूस से हमारे संबंध अच्छे थे। 'दिल्ली से मास्को', 'रूस में पच्चीस मास', 'रूस में छियालीस दिन' जैसे यात्रावृत्त इसी दौर के हैं। इसी तरह लेखकों ने चीन, जापान और अन्य देशों से संबंधित कई यात्राओं का वर्णन किया है। स्वदेश-यात्रा से संबंधित यात्रावृत्त भी काफी संख्या में प्रकाशित हुए हैं। 'कैलाश मानसरोवर' और 'कैलाश दर्शन', 'ज्योतिपुंज हिमालय', 'किन्नर देश में', 'अरे यायावर रहेगा याद' और 'आखिरी चट्टान तक' जैसे यात्रावृत्त उल्लेखनीय हैं।
In simple words: स्वामी सत्यदेव परिव्राजक, राहुल सांकृत्यायन और पं. नेहरू जैसे लेखकों ने इस युग में कई यात्रावृत्त लिखे, जिनमें रूस और भारत की यात्राओं का वर्णन प्रमुख था।
🎯 Exam Tip: यात्रावृत्त के मुख्य लेखकों के नाम और उनके कुछ प्रसिद्ध यात्रा-वृत्तांतों का उल्लेख करें।
संस्मरण तथा रेखाचित्र - इन विधाओं के हिंदी लेखकों में बनारसीदास चतुर्वेदी का एक खास स्थान है। उन्होंने 'हमारे आराध्य' और 'संस्मरण' नाम से संस्मरणात्मक रचनाएँ लिखीं, और 'रेखाचित्र' तथा 'सेतुबंध' नाम से रेखाचित्र संग्रह प्रस्तुत किए। श्रीराम शर्मा जैसे लेखक अपने अद्भुत शब्द-शिल्प के लिए प्रसिद्ध थे। 'लाल तारा', 'माटी की मूरतें' और 'गेहूँ' उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। इस युग के अन्य संस्मरण लेखकों में राजा राधिकारमणप्रसाद सिंह का नाम भी महत्वपूर्ण है। उनके 'टूटा तारा' (1940) संग्रह में 'मौलवी साहब' और 'देवी बाबा' जैसे संस्मरण पढ़ने लायक हैं। विनयमोहन शर्मा, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, शिवपूजन सहाय, सत्यवती मल्लिक, देवेन्द्र सत्यार्थी, उपेन्द्रनाथ अश्क, राहुल सांकृत्यायन, डॉ. नगेन्द्र, जगदीश चन्द्र माथुर और सेठ गोविन्ददास ने भी संस्मरण तथा रेखाचित्र लिखे। संस्मरण साहित्य को बेहतर बनाने वाले कवियों में माखनलाल चतुर्वेदी का 'समय के पाँव' (1962), रामधारीसिंह दिनकर का 'लोकदेव नेहरू' (1965) और 'संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ' (1969) तथा हरिवंशराय बच्चन का 'नये पुराने झरोखे' (1962) उल्लेखनीय हैं। कैलाशनाथ काटजू, इन्द्र विद्यावाचस्पति, संपूर्णानन्द, पद्मिनी मेनन, परिपूर्णानन्द कृष्णा सोबती, विष्णु प्रभाकर और फणीश्वरनाथ रेणु की कृतियाँ भी महत्वपूर्ण हैं। संस्मरण साहित्य की सबसे अनमोल निधि वे पत्रिकाएँ हैं जिनमें ये नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं। 'सरस्वती' में मनोरंजक संस्मरण, 'नई धारा' में 'मुझे याद है', 'धर्मयुग' में 'एक दिन की बात', 'अविस्मरणीय' और 'जब मैं सोलह साल की थी' जैसे शीर्षकों के अंतर्गत अनेक संस्मरण छपे।
In simple words: बनारसीदास चतुर्वेदी और श्रीराम शर्मा जैसे लेखकों ने संस्मरण और रेखाचित्र विधा को विकसित किया। इसमें राजा राधिकारमणप्रसाद सिंह, माखनलाल चतुर्वेदी और हरिवंशराय बच्चन जैसे कई लेखकों ने योगदान दिया।
🎯 Exam Tip: संस्मरण और रेखाचित्र के प्रमुख लेखकों के नाम और उनकी मुख्य कृतियाँ याद रखें।
समकालीन हिंदी साहित्य
समकालीन नाटक - 1960 के बाद नाटक अन्य विधाओं की तुलना में कम लिखे गए। पिछले दशकों में हिंदी नाटक में नयापन और प्रयोगशीलता आई है। मोहन राकेश के बाद हिंदी नाटक निराशा और हारने की भावना से बाहर निकला है। उनके बाद कई नाटककारों ने नई तकनीक, नई रंगमंच और प्रयोगधर्मिता के आधार पर नाटक की संभावनाओं को जीवित किया। इन नाटककारों ने जीवन की उलझनों, अंदरूनी लड़ाइयों, तनावों और जटिल स्थितियों को नए तरीके से नाटकों में दिखाया। भीष्म साहनी, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, ज्ञानदेव अग्निहोत्री, मणिमधुकर मुद्राराक्षस, शंकर शेष और सुरेन्द्र वर्मा जैसे लेखक इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। कुछ ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं के माध्यम से भारतीयों की पहचान खोजने का प्रयास भी किया गया। इनमें शंकर शेष का 'खजुराहो का शिल्पी', दयाप्रकाश का 'इतिहास-चक्र', लक्ष्मीनारायण भारद्वाज का 'अश्वत्थामा', जयशंकर त्रिपाठी का 'कुरुक्षेत्र का सवेरा', लक्ष्मीनारायण लाल का 'राम की लड़ाई', 'नरसिंह कथा', 'एक सत्य हरिश्चन्द्र', गिरिराज किशोर का 'प्रजा ही रहने दो', नरेन्द्र कोहली का 'शंबूक की हत्या', सुरेन्द्र वर्मा का 'छोटे सैयद बड़े सैयद' और 'आठवाँ सर्ग' खास हैं। राजनीति की सिद्धांतहीनता, अवसरवादिता और बौद्धिक कमजोरी ने लोगों को झकझोर दिया। इस समस्या पर आधारित कई नाटक भी लिखे गए। लक्ष्मी नारायण लाल, ऋषि भटनागर, शरद जोशी, शंकर शेष और मणि मधुकर जैसे नाम इस क्षेत्र में उल्लेखनीय हैं।
In simple words: 1960 के बाद हिंदी नाटक में नयापन आया, जिसमें भीष्म साहनी और शंकर शेष जैसे लेखकों ने जीवन की जटिलताओं और ऐतिहासिक-पौराणिक विषयों पर नाटक लिखे।
🎯 Exam Tip: समकालीन नाटक की विशेषताएँ बताएँ और प्रमुख नाटककारों की रचनाओं के उदाहरण दें।
समकालीन कहानी - राजनीतिक और सामाजिक भटकाव के कारण नई पीढ़ी का रचनात्मक और मानसिक स्तर बेहतर हुआ है। पुरानी पीढ़ी की सोच से इनके मूल्य अलग हैं। ये पिछली पीढ़ी की तरह मुश्किलों से भागते नहीं, बल्कि उनका सामना करते हैं। अब इस कहानी का स्वर अस्तित्ववादी नहीं बल्कि मानववादी हो गया है। समकालीन कहानी जिसे 'नई कहानी' भी कहते हैं, में शहरी जीवन का प्रभाव ज़्यादा दिखा। आज के शहरी जीवन में ऊपरी सहानुभूति, अंदरूनी ईर्ष्या, स्वार्थपरता और जीवन की बनावटीपन को कमलेश्वर, निर्मल वर्मा और अमरकान्त की कहानियों में देखा जा सकता है।
In simple words: समकालीन कहानी, जिसे 'नई कहानी' भी कहते हैं, में शहरी जीवन, मानवीय मूल्य और सामाजिक भटकाव को कमलेश्वर और निर्मल वर्मा जैसे लेखकों ने दिखाया।
🎯 Exam Tip: समकालीन कहानी की मुख्य विशेषताओं को रेखांकित करें और प्रमुख कहानीकारों के नाम बताएँ।
समकालीन उपन्यास - समकालीन दौर का ज़्यादातर लेखन व्यक्ति पर केंद्रित रहा और लेखक ने व्यक्ति के माध्यम से समय और समाज की स्थितियों को सामने लाया। इस प्रवृत्ति की सबसे ज़्यादा स्पष्ट अभिव्यक्ति 'गोबर गणेश', 'किस्सा गुलाम' और 'आपका बन्टी' जैसे उपन्यासों में हुई है। नए उपन्यासकारों में बौद्धिकता है और वे हर विषय को बौद्धिक कसौटी पर परखने और निश्चित राय देने में सक्षम हैं। आज के उपन्यासों में शारीरिक और भावनात्मक संबंधों का बहुत बारीकी से परीक्षण किया गया है। समकालीन कुछ प्रमुख उपन्यासकार और उनके उपन्यास इस प्रकार हैं- मृदुला गर्ग (चित्त कोबरा, उसके हिस्से की धूप, वंशज, अनित्य), निर्मल वर्मा (वे दिन, लाल टीन की छत), श्रीकान्त वर्मा (दूसरी बार), राजकमल चौधरी (मछली मरी हुई), यशपाल (क्यों फँसे?), गोविन्द मिश्र (वह अपना चेहरा), मनोहरश्याम जोशी (कुरु-कुरु स्वाहा, कसप), कृष्णा सोबती (सूरजमुखी अंधेरे के), भीष्म साहनी (कड़ियाँ), गिरिराज किशोर (चिड़ियाघर), लक्ष्मीकान्त वर्मा (टैराकोटा), श्रीलाल शुक्ल (राग दरबारी), राही मासूम रजा (आधा गाँव, टोपी शुक्ला, हिम्मत जौनपुरी), मणि मधुकर (सफेद मेमने), नरेन्द्र कोहली (दीक्षा), प्रभाकर माचवे (परन्तु, क्षमा, सांचा), कमलेश्वर (सुबह दोपहर शाम, काली आंधी) शैलेश मटियानी (बोरीवली से बोरी बन्दर), बदी उज्जमा (एक चूहे की मौत)।
In simple words: समकालीन उपन्यास व्यक्ति-केंद्रित थे और सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर केंद्रित थे। मृदुला गर्ग, निर्मल वर्मा, श्रीलाल शुक्ल और राही मासूम रजा जैसे लेखकों ने कई महत्वपूर्ण उपन्यास लिखे।
🎯 Exam Tip: समकालीन उपन्यासों की प्रमुख विशेषताओं के साथ-साथ महत्वपूर्ण उपन्यासकारों और उनकी कृतियों का उल्लेख करें।
समकालीन निबंध - आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की निबंध परंपरा यहाँ रुकी नहीं बल्कि नई सोच को भी व्यक्त किया गया। अज्ञेय, विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय, निर्मल वर्मा, रमेशचन्द्र शाह, शरद जोशी, जानकीवल्लभ शास्त्री, रामेश्वर शुक्ल 'अंचल', नेमिचन्द्र जैन, विष्णु प्रभाकर, जगदीश चतुर्वेदी, डॉ. देवराज, डॉ. नामवरसिंह और विवेकीराय जैसे लेखकों ने हिंदी निबंध परंपरा को न केवल आगे बढ़ाया बल्कि उसमें कुछ खास प्रयोग भी किए जिससे हिंदी निबंध को नई ऊर्जा मिली। मुक्तिबोध ने 'नयी कविता का आत्मसंघर्ष', 'नये साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र', 'समीक्षा की समस्याएँ' और 'एक साहित्यिक की डायरी' जैसे निबंध संग्रहों से नई समीक्षा को गति दी। नए निबंधकारों में विजयदेवनारायण साही की भूमिका भी उल्लेखनीय है। उनके निबंध 'लघुमानव के बहाने हिन्दी कविता पर एक बहस' ने सभी का ध्यान खींचा। निर्मल वर्मा ने भी हिंदी निबंध को नया रूप दिया। इन निबंधों में उनकी रचनात्मक बौद्धिक यात्राओं का एक रोमांचक संसार है। नेमिचन्द्र जैन ने निर्मल जी से अलग निबंध लिखे। उनके 'अधूरे साक्षात्कार', 'रंगदर्शन', 'बदलते परिप्रेक्ष्य' और 'जनान्तिक' जैसे समीक्षात्मक निबंधों ने अपनी अलग पहचान बनाई। रामविलास शर्मा की निबंध शैली हिंदी-गद्य में स्पष्ट, सशक्त और विचारशील है। 'विराम चिह्न', 'मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य', 'परम्परा का मूल्यांकन', 'मानव सभ्यता का विकास', 'भाषा युगबोध और कविता', 'कथा-विवेचना और गद्य शिल्प' और 'मार्क्स और पिछड़े हुए समाज' जैसे निबंध संग्रह उन्होंने लिखे। हिंदी व्यंग्य साहित्य भी प्रगति कर रहा है। इस क्षेत्र में कुबेरनाथ राय, विवेकीराय, शरद जोशी और रवीन्द्र कालिया जैसे लेखकों ने हिंदी निबंध की एक मजबूत व्यंग्य-शैली विकसित की है।
In simple words: समकालीन निबंध परंपरा में रामचन्द्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे लेखकों के विचारों को आगे बढ़ाया गया। अज्ञेय, निर्मल वर्मा और रामविलास शर्मा ने नए विषयों और शैलियों पर निबंध लिखे, जिसमें व्यंग्य भी शामिल था।
🎯 Exam Tip: समकालीन निबंध की मुख्य विशेषताओं, प्रमुख निबंधकारों और उनकी रचनाओं को स्पष्ट रूप से दर्शाएँ।
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