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Detailed व्याकरणम् प्रत्यय ज्ञानम् RBSE Solutions for Class 11 Sanskrit
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Class 11 Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय ज्ञानम् RBSE Solutions PDF
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
अभ्यासः 1
Question 1. अधोलिखितेषु पदेषु प्रकृति-प्रत्ययौ लिखतु- (निम्नलिखित पदों में प्रकृति-प्रत्यय लिखिए-)
(i) नीत्वा,
(ii) आगम्य,
(iii) पठित्वा,
(iv) सम्भूय,
(v) अर्चितः,
(vi) स्नातवत्,
(vii) त्यक्तः,
(viii) गच्छत्,
(ix) ददानः,
(x) कुर्वाणः,
(xi) द्रष्टव्यम्,
(xii) भनीयम्,
(xiii) पातुम्,
(xiv) कारकः,
(xv) ज्ञेयः,
(xvi) मन्त्री,
(xvii) स्तुतिः।
Answer:
(i) नी + क्त्वा
(ii) आ + गम् + ल्यप्
(iii) पठ् + क्त्वा
(iv) सम् + भू + ल्यप्
(v) अर्च + क्त
(vi) स्नात् + क्तवतु
(vii) त्यज् + क्त
(viii) गम् + शतृ
(ix) दा + शानच्
(x) कृ + शानच्
(xi) दृश् + तव्यत्
(xii) भू + अनीयर्
(xiii) पा + तुमुन्
(xiv) कृ + ण्वुल्
(xv) ज्ञा + यत्
(xvi) मन्त्र + णिनि
(xvii) स्तुत् + ङीष्
In simple words: प्रत्येक दिए गए शब्द के लिए, उसकी मूल धातु (प्रकृति) और उससे जुड़े प्रत्यय को अलग-अलग करके लिखा गया है, जिससे शब्द का निर्माण हुआ है।
🎯 Exam Tip: प्रकृति-प्रत्यय विच्छेद करते समय मूल धातु और प्रत्यय के सही रूपों को पहचानना महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रत्यय लगने से धातु में परिवर्तन आ सकता है।
अभ्यासः 2
Question. अधोलिखितेषु पदेषु प्रकृति-प्रत्ययौ योजयित्वा पद-निर्माणं कुरुत
(i) कृ+तृय्,
(ii) दण्ड + इनि,
(iii) रेवती + ठक्,
(iv) शिव + अण्,
(v) भस्म + मयट्,
(vi) पटु + तर,
(vii) लघु + तमप्,
(viii) कोकिल + टाप,
(ix) नर्तक + क्ती,
(x) भव + क्ती,
(xi) मूषक + टाप्,
(xii) गोप + ङीष्।
Answer:
(i) कर्तृ
(ii) दण्डी
(iii) रैवतिकः
(iv) शैवः
(v) भस्ममयम्
(vi) पटुतरः
(vii) लघुतमः
(viii) कोकिला
(ix) नर्तकी
(x) भवती
(xi) मूषिका
(xii) गोपी
In simple words: यहाँ दिए गए धातु और प्रत्यय को जोड़कर सही संस्कृत शब्द बनाए गए हैं। प्रत्यय लगाने से शब्द का अर्थ और रूप बदल जाता है।
🎯 Exam Tip: प्रकृति और प्रत्यय को जोड़ते समय सही संधि नियमों और प्रत्यय के विशिष्ट परिवर्तनों को ध्यान में रखें ताकि शब्द का निर्माण व्याकरणिक रूप से सही हो।
अभ्यास-4
Question. अधोलिखितपदेषु प्रकृति-प्रत्यय विभागः क्रियताम् (निम्नलिखित पदों में प्रकृति-प्रत्यय पृथक् कीजियें-)
(क) प्रयुक्तम्,
(ख) भवितव्यम्,
(ग) गन्तुम्,
(घ) पर्यटन्तः,
(ङ) वहमानस्य,
(च) क्रीत्वा,
(छ) दृष्टिः,
(ज) कर्ता,
(झ) अतितराम्,
(ञ) प्रतीक्षमाणः,
(ट) करणीया,
(ठ) प्रत्यभिज्ञाय,
(ड) कारकः,
(ढ) कृतवती,
(ण) विक्रेता।
Answer:
(क) प्रयुक्तम् = प्र + युज् + क्त
(ख) भवितव्यम् = भू + तव्यत्
(ग) गन्तुम् = गम् + तुमुन्
(घ) पर्यटन्तः = परि + अट् + शतृ (प्र.ब.व.)
(ङ) वहमानस्य = वह् + शानच् (ष.ए.व.)
(च) क्रीत्वा = क्री + क्त्वा
(छ) दृष्टिः = दृश् + क्तिन्
(ज) कर्ता = कृ + तृच्
(झ) अतितराम् = अति + तरप् + टाप् (द्वि.ए.व.)
(ञ) प्रतीक्षमाणः = प्रति + ईक्ष् + शानच्
(ट) करणीया = कृ + अनीयर् + टार्
(ठ) प्रत्यभिज्ञाय = प्रति + अभि + ज्ञा + ल्यप्
(ड) कारकः = कृ + ण्वुल्
(ढ) कृतवती = कृ + क्तवतु + ङीप्
(ण) विक्रेता = वि + क्री + तृच्
In simple words: प्रत्येक शब्द को उसकी मूल धातु (प्रकृति) और उससे जुड़े प्रत्यय में अलग किया गया है। यह दिखाता है कि कैसे शब्दों का निर्माण होता है।
🎯 Exam Tip: प्रकृति-प्रत्यय विभाजन करते समय, शब्द में हुए परिवर्तनों को ध्यान से देखें और पहचानें कि कौन सा प्रत्यय किस धातु के साथ जुड़ा है।
अभ्यास-5
Question. रिक्तस्थानानि पूर्याणि (रिक्त-स्थानों की पूर्ति निर्देशानुसार कीजिए-)
(क) रूपं यथा ............................ महार्णवस्य। (शम् + क्त)
(ख) ............................ नृत्यन्ति। (शिखा + इनि)
(ग) सलिलतीरं ............................ पक्षिणः वायसगणाः च। (वस् + णिनि)
(घ) अपयानक्रमो नास्ति ............................ अप्यन्यत्र को भवेत्। (नी + तृच्)
(ङ) तत्किमत्र प्राप्तकालं स्यादिति। ............................ समहात्मास्वकीय सत्यतपोबलमेव तेषां रक्षणोपायम् अमन्यत्। (वि + मृश् + शतृ)
(च) स्मरामि न प्राणिवधं यथाहं ............................ कृच्छ्रे परमेऽपि कर्तुम्। (सम् + चिन्त् + ल्यप्)
(छ) अतः शील विशुद्धौ ............................ (प्र + यत् + तव्यत्)
(ज) ............................ राज संसत्सु श्रुतवाक्या बहुश्रुता (वि + श्रु + क्त + टाप्)
(झ) स लोके लभते कीर्ति परत्र च शुभां ............................ (गम् + क्तिन्)
(ञ) ततः प्रविशति दारकं ............................ रदनिका। (ग्रह् + क्त्वा)
(ट) उष्णं हि ............................ स्वदते। (भुज् + कर्म + शानच्)
(ठ) कालोऽपि नो ............................ यमो वा। (नश् + णिच् + तुमुन्)
Answer:
(क) रूपं यथा शमितं महार्णवस्य।
(ख) शिखिनः नृत्यन्ति।
(ग) सलिलतीरं वासिनः पक्षिणः वायसगणाः च।
(घ) अपयानक्रमो नास्ति नेतृणाम् अप्यन्यत्र को भवेत्।
(ङ) तत्किमत्र प्राप्तकालं स्यादिति। विमृशन् समहात्मास्वकीय सत्यतपोबलमेव तेषां रक्षणोपायम् अमन्यत्।
(च) स्मरामि न प्राणिवधं यथाहं संचिन्त्य कृच्छ्रे परमेऽपि कर्तुम्।
(छ) अतः शील विशुद्धौ प्रयतितव्यम्।
(ज) विश्रुता राज संसत्सु श्रुतवाक्या बहुश्रुता।
(झ) स लोके लभते कीर्ति परत्र च शुभां गतिः।
(ञ) ततः प्रविशति दारकं गृहीत्वा रदनिका।
(ट) उष्णं हि भुञ्जानं स्वदते।
(ठ) कालोऽपि नो नाशयितुम् यमो वा।
In simple words: इन वाक्यों में दिए गए धातु और प्रत्यय को जोड़कर सही शब्द बनाए गए हैं, और फिर उन शब्दों का उपयोग करके रिक्त स्थान भरे गए हैं। यह दिखाता है कि कैसे प्रत्ययों का उपयोग करके वाक्य पूरे किए जाते हैं।
🎯 Exam Tip: रिक्त स्थान भरते समय, वाक्य के अर्थ और व्याकरणिक संरचना को समझना महत्वपूर्ण है। दिए गए संकेत (धातु + प्रत्यय) का उपयोग करके सही शब्द बनाएं और फिर उसे वाक्य में फिट करें।
अभ्यास- 6
Question. प्रकृतिप्रत्ययं योजयित्वा पदरचनां विधाय रिक्तस्थानं पूरयत। (प्रकृति-प्रत्यय को जोड़कर पद-रचना करके रिक्त-स्थान की पूर्ति कीजिये।)
(क) (सम् + उद् + बह् + शतृ) सलिलाऽतिभारं बलाकिनो वारिधरा: नदन्तः।
(ख) शालिवनं (वि + पच् + क्त)
(ग) तान् मत्स्यान् (भक्ष् + तुमुन्) चिन्तयन्ति।
(घ) (मुह् + क्त) मुखेन अतिकरुणं मन्त्रयसि। (क्त) जीवितार्थं कुलं (त्यज् + क्त्वा) यो जनोऽतिदूरं व्रजेत् किं तस्य जीवितेन?
(च) तेन (रक्ष् + अनीयर्) रक्षा भविष्यन्ति।
(छ) भृत्यौ (हस् + शतृ) गृहाभ्यन्तरं पलायेते।
(ज) भो कि (कृ + क्तवतु) सिन्धु।
(झ) स्वपुस्तकालये (नि + सद् + क्त) दूरभाषयन्त्रं बहुषः प्रवर्तयति।
(ञ) वत्स सोमधर मित्रगृहान्नैव (गम् + तव्यत्)
(ट) देवागारे (अपि + धा + क्त) द्वारे भजसे किम्?
(ठ) ध्यानं (हा + क्त्वा) बहिरेहित्वम्।
(ड) शाकफल (वि + क्री + तृच्) दारकः कथं त्वामतिशेते।
(ढ) स लोके लभते (कृ + क्तिन्)।
(ण) तद् ग्रहाण ताम्बलम् (अलम् + कृ + ण्वुल्)।
Answer:
(क) समुद्वहन्तः सलिलाऽतिभारं बलाकिनो वारिधरा: नदन्तः।
(ख) शालिवनं विपक्कम्।
(ग) तान् मत्स्यान् भक्षितुम् चिन्तयन्ति।
(घ) मुग्ध्र मुखेन अतिकरुणं मन्त्रयसि। (ङ) जीवितार्थं कुलं त्यक्त्वा यो जनोऽतिदूरं व्रजेत् किं तस्य जीवितेन?
(च) तेन रक्षणीय रक्षा भविष्यन्ति।
(छ) भृत्यौ हसन्तौ गृहाभ्यन्तरं पलायेते।
(ज) भो कि कृतवान् सिन्धु।
(झ) स्वपुस्तकालये निषण्णः दूरभाषयन्त्रं बहुषः प्रवर्तयति।
(ञ) वत्स सोमधर मित्रगृहान्नैव गन्तव्यम्।
(ट) देवागारे पिहित द्वारे भजसे किम्?
(ठ) ध्यानं हित्वा बहिरेहित्वम्।
(ड) शाकफल विक्रेतुः दारकः कथं त्वामतिशेते।
(ढ) स लोके लभते कीर्तिम्।
(ण) तद् ग्रहाण ताम्बलम् अलंकारकम्।
In simple words: इस अभ्यास में, रिक्त स्थानों को भरने के लिए दिए गए प्रकृति और प्रत्यय को जोड़कर सही शब्द बनाए गए हैं। यह दिखाता है कि कैसे प्रत्ययों का उपयोग करके वाक्यों को पूरा किया जाता है।
🎯 Exam Tip: रिक्त स्थानों की पूर्ति करते समय, दिए गए प्रकृति-प्रत्यय से बनने वाले शब्द का सही लिंग, वचन और विभक्ति का ध्यान रखें ताकि वह वाक्य में उचित रूप से फिट हो।
अभ्यास - 7
Question. कोष्ठकात् उचितपदं चित्वा रिक्तस्थानं पूरयतः (कोष्ठक से उचित पद चुनकर रिक्तस्थान भरिये।)
(क) इति दारकमादाय ............................ रदनिका। (निष्क्रान्तः/निष्क्रान्ता)
(ख) मम हृदये नित्य ............................ स्तः। (सन्निहिता/सन्निहितः)
(ग) किन्तु अनुज्ञां ............................ गन्तुं शक्येत्। (प्राप्त्वा/प्राप्य)
(घ) वार्तालाप ............................ भृत्यौ रत्ना च बहिरायान्ति। (श्रुतौ/श्रुत्वा)
(ङ) दारकस्य कर्णमेव ............................ प्रवृत्तोऽसि। (भक्तुम्/भज्ञ्जयितुम्)
(च) ............................ अस्मि तवे न्यायालये। (पराजितः/पराजितम्)
(छ) रामदत्तहरणौ आगच्छतः। (धावन्तः/धावन्तौ)
(ज) ............................ त्वाम् साधयष्यामः। (हनित्वा/हत्वा)
Answer:
(क) इति दारकमादाय निष्क्रान्ता रदनिका।
(ख) मम हृदये नित्य सन्निहितौ स्तः।
(ग) किन्तु अनुज्ञां प्राप्य गन्तुं शक्येत्।
(घ) वार्तालाप श्रुत्वा भृत्यौ रत्ना च बहिरायान्ति।
(ङ) दारकस्य कर्णमेव भञ्जयितुम् प्रवृत्तोऽसि।
(च) पराजितः अस्मि तवे न्यायालये।
(छ) रामदत्तहरणौ धावन्तौ आगच्छतः।
(ज) हत्वा त्वाम् साधयष्यामः।
In simple words: प्रत्येक वाक्य में, ब्रैकेट में दिए गए दो शब्दों में से सही शब्द का चुनाव करके रिक्त स्थान भरे गए हैं। यह वाक्य के अर्थ और व्याकरण के अनुसार सही शब्द का चयन करना सिखाता है।
🎯 Exam Tip: कोष्ठक से सही शब्द चुनते समय, वाक्य के लिंग, वचन, क्रिया के काल और अर्थ के साथ शब्द के सामंजस्य को सुनिश्चित करें।
प्रत्यय की परिभाषा- धातु अथवा प्रातिपादिक के बाद जिनका प्रयोग किया जाता है, उन्हें प्रत्यय कहते हैं। अर्थात् किसी धातु अथवा शब्द के बाद किसी विशेष अर्थ को प्रकट करने के लिए जो शब्द या शब्दांश जोड़ा जाता है, उसे 'प्रत्यय कहते हैं। ये प्रत्यय मूलरूप से निरर्थक से प्रतीत होते हैं, किन्तु किसी शब्द के अन्त में प्रयुक्त प्रत्यय अत्यन्त सार्थक होकर शब्द निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
प्रत्यय के भेद-प्रत्ययों के मुख्यतः तीन भेद होते हैं-
- कृत् प्रत्यय
- तद्धित प्रत्यय
- स्त्री प्रत्यय।
1. कृत् प्रत्यय-जिन प्रत्ययों का प्रयोग धातु (क्रिया) के बाद किया जाता है, वे कृत् प्रत्यय कहलाते हैं। अर्थात् मूल धातु के बाद भिन्न-भिन्न अर्थों के बोधक जिन प्रत्ययों को जोड़कर संज्ञा, विशेषण, अव्यय तथा कहीं-कहीं क्रिया पद का निर्माण किया जाता है, उन प्रत्ययों को कृत् प्रत्यय कहा जाता है। जैसे-
कृ + तव्यत् = कर्त्तव्यम्,
पठ् + अनीयर् = पठनीयम्।
[नोट-'कृत् प्रत्ययों' में शतृ, शानच्, तव्यत्, अनीयर, क्तिन्, ल्युट् तथा तृच् प्रत्ययों का अध्ययन अपेक्षित है।]
2. तद्धित प्रत्यय-जिन प्रत्ययों का प्रयोग संज्ञा, सर्वनाम आदि शब्दों के बाद किया जाता है वे तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं। जैसे-
उपगु + अण् = औपगवः,
दशरथ + इ = दाशरथिः,
धन + मतुप् = धनवान्।
3. स्त्री प्रत्यय-जिन प्रत्ययों का प्रयोग पुल्लिंग शब्दों को स्त्रीलिंग में परिवर्तित करने के लिए किया जाता है, वे स्त्री प्रत्यय कहलाते हैं। जैसे-
क्रिया को बनाने के लिए 'कर' या 'करके' अर्थ में उपसर्गरहित क्रियाशब्दों में 'क्त्वा' प्रत्यय जोड़ा जाता है। इस प्रत्यय से बना हुआ शब्द अव्यय शब्द होता है। अतः उसके रूप नहीं चलते हैं, अर्थात् वह सभी विभक्तियों, सभी वचनों, सभी लिंगों तथा सभी पुरुषों में एक जैसा ही रहता है और उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता है। जैसे- 'वह पुस्तक पढ़कर खेलता है।' इस वाक्य का संस्कृत में अनुवाद करने पर 'सः पुस्तक पठित्वा क्रीडति' बना। इस वाक्य में दो क्रियाएँ हैं-प्रथम क्रिया 'पढ़कर' (पठित्वा) तथा दूसरी क्रिया 'खेलंता' (क्रीडति) है। दोनों क्रियाओं का कर्ता एक ही 'वह' (सः) है। यहाँ पठ् मूल क्रिया में क्त्वा' प्रत्यय जोड़ने पर 'क्त्वा' में 'क्' का लोप करने पर 'त्वा' शेष रही। 'पठ् + त्वा' धातु और प्रत्यय के मध्य 'इ' जोड़ने पर 'पठित्वा' पूर्वकालिक क्रिया का रूप बना, जिसका अर्थ-'पढ़कर' या 'पढ़ करके' हुआ। धातु और प्रत्यय के मध्य सब जगह 'इ' नहीं जुड़ता है। "सेट् धातुओं में 'इ' जुड़ता है।" 'इ' केवल वहीं जुड़ता है, जहाँ क्रिया में 'इ' के जोड़े जाने की आवश्यकता होती है। यहाँ सन्धि के सभी नियम भी लगते हैं।
जैसे-
| शब्दः | प्रकृतिः | प्रत्ययः | अर्थ |
|---|---|---|---|
| भूत्वा | भू | + क्त्वा | होकर के |
| कृत्वा | कृ | + क्त्वा | कर के |
| गत्वा | गम् | + क्त्वा | जा कर |
| पठित्वा | पठ | + क्त्वा | पढ़ कर |
| वदित्वा | वद् | + क्त्वा | कह कर |
| लिखित्वा | लिख् | + क्त्वा | लिख कर |
| चलित्वा | चल् | + क्त्वा | चल कर |
| श्रुत्वा | श्रु | + क्त्वा | सुन कर |
| नीत्वा | नी | + क्त्वा | ले जा कर |
| जित्वा | जि | + क्त्वा | जीत कर |
अन्य उदाहरण- क्त्वा प्रत्यय रूप
| 6. दा | = | देना, | दा | + क्त्वा | = | दत्वा | (देकर के) |
| 7. कथ् | = | कहना, | कथय् | + क्त्वा | = | कथयित्वा | (कहकर के) |
| 8. दृश् | = | देखना, | दृश् | + क्त्वा | = | दृष्ट्वा | (देखकर के) |
| 9. धाव् | = | दौड़ना, | धाव् | + क्त्वा | = | धावित्वा | (दौड़कर के) |
| 10. पा | = | पीना, | पी | + क्त्वा | = | पीत्वा | (पीकर के) |
| 11. पच् | = | पकाना, | पच् | + क्त्वा | = | पक्त्वा | (पकाकर के) |
| 12. पत् | = | गिरना, | पत् | + क्त्वा | = | पतित्वा | (गिरकर के) |
| 13. प्रच्छ् | = | पूछना, | पृच्छ | + क्त्वा | = | पृष्ट्वा | (पूछकर के) |
| 14. भक्ष | = | खाना, | भक्षय् | + क्त्वा | = | भक्षयित्वा | (खाकर के) |
| 15. रक्ष | = | रक्षा करना, | रक्ष | + क्त्वा | = | रक्षित्वा | (रक्षा करके) |
| 16. रच् | = | रचना करना, | रचय् | + क्त्वा | = | रचयित्वा | (रचना करके) |
| 17. सृज् | = | रचना करना, | सृज् | + क्त्वा | = | सृष्ट्वा | (रचना करके) |
| 18. स्मृ | = | याद करना, | स्मृ | + क्त्वा | = | स्मृत्वा | (याद करके) |
| 19. स्पृश् | = | छूना, | स्पृश् | + क्त्वा | = | स्पृष्ट्वा | (छूकर के) |
| 20. हस् | = | हँसना, | हस् | + क्त्वा | = | हसित्वा | (हँसकर के) |
| 21. भाष् | = | कहना | भाष् | + क्त्वा | = | भाषित्वा | (कहकर के) |
| 22. वृत् | = | होना, | वृत् | + क्त्वा | = | वृत्तित्वा | (होकर के) |
| 23. अर्जु | = | कमाना, | अर्जु | + क्त्वा | = | अर्जित्वा | (कमाकर के) |
| 24. क्षाल् | = | धोना, | क्षाल् | + क्त्वा | = | क्षालयित्वा | (धोकर के) |
| 25. कुप् | = | क्रोध करना, | कुप् | + क्त्वा | = | कुपित्वा | (क्रोध करके) |
(ii) ल्यप् प्रत्यय-'ल्यप्' प्रत्यय में 'ल्' तथा 'प्' का लोप हो जाने पर 'य' शेष रहता है। समासेऽनज पूर्वे ल्यप् धातु से पूर्व कोई उपसर्ग हो तो वहाँ 'क्त्वा' के स्थान पर 'ल्यप्' प्रत्यय प्रयुक्त होता है। यह 'ल्यप्' प्रत्यय भी 'कर' या 'करके' अर्थ में होता है। यह अव्यय शब्द होता है अतः रूप नहीं चलते हैं। जिन उपसर्गों के साथ 'ल्यप्' वाले रूप अधिक प्रचलित हैं, उनके उदाहरण यहाँ प्रस्तुत हैं-
| शब्द | उपसर्ग | प्रकृति (धातु) | प्रत्यय |
|---|---|---|---|
| सम्भूय | सम् | भू | ल्यप् |
| विहस्य | वि | हस् | ल्यप् |
| आगत्य | आ | गम् | ल्यप् |
| प्रचल्य | प्र | चल् | ल्यप् |
| विक्रीय | वि | क्री | ल्यप् |
| आदाय | आ | दा | ल्यप् |
| विज्ञाय | वि | ज्ञा | ल्यप् |
| प्राप्य | प्र | आप् | ल्यप् |
| संपठ्य | सम् | पठ् | ल्यप् |
| विनीय | वि | नी | ल्यप् |
(i) किसी कार्य की समाप्ति का ज्ञान कराने के लिए अर्थात् भूतकाल के अर्थ में क्त और क्तवतु प्रत्यय होते हैं।
(ii) क्त प्रत्यय धातु से भाववाच्य या कर्मवाच्य में होता है और इसको 'त' शेष रहता है। क्तवतु प्रत्यय कर्तृवाच्य में होता है और उसका 'तवत्' शेष रहता है।
(iii) क्त और क्तवतु के रूप तीनों लिंगों में चलते हैं। क्त प्रत्यय के रूप पुल्लिंग में राम के समान, स्त्रीलिंग में 'आ' लगाकर रमा के समान और नपुंसकलिंग में फल के समान चलते हैं। क्तवतु के रूप पुल्लिंग में भगवत् के समान, स्त्रीलिंग में 'ई' जुड़कर नदी के समान तथा नपुंसकलिंग में जगत् के समान चलते हैं।
जैसे-
| धातुः | क्त-प्रत्यययुक्तः शब्दः | क्तवतु-प्रत्यययुक्तः शब्दः |
|---|---|---|
| अर्च | अर्चितः | अचिर्तवत् |
| जि | जितः | जितवत् |
| स्मृ | स्मृतः | स्मृतवत् |
| कृ | कृतः | कृतवत् |
| गम् | गतः | गतवत् |
| भू | भूतः | भूतवत् |
| पठ् | पठितः | पठितवत् |
| स्ना | स्नातः | स्नातव्त |
| त्यज् | त्यक्तः | त्यक्तवत् |
| तृप् | तृप्तः | तृप्तवत् |
अन्य उदाहरण क्त प्रत्ययान्त रूप
| J. लू | = | मारा गया | लु | + क्त | = | लुत: | मारा गया |
| 9. नु | = | स्तुति करना | नु | + क्त | = | नुतः | स्तुति की |
| 7. आ + नी | = | लाना | आ + नी + क्त | = | आनीतः | लाया | |
| 8. परि + त्यज् | = | त्यागना | परि + त्यज् + क्त | = | परित्यक्तः | त्याग दिया | |
| 9. पा | = | पीना | पा + क्त | = | पीतः | पिया | |
| 10. वच् | = | कहना | वच् + क्त | = | उक्तः | कहा | |
| 11. हस् | = | हँसना | हस् + क्त | = | हसितः | हँसा | |
| 12. नश् | = | नष्ट होना | नश् + क्त | = | नष्टः | नष्ट हुआ | |
| 13. पत् | = | गिरना | पत् + क्त | = | पतितः | गिरा | |
| 14. नम् | = | झुकना, नमस्कार करना | नम् + क्त | = | नतः | झुका, नमस्कार किया | |
| 15. गै | = | गाना | गै + क्त | = | गीतः | गाया | |
| 16. दुह | = | दुहना | दुह् + क्त | = | दुग्धः | दुहा | |
| 17. आ + रुह | = | चढ़ना | आ + रुह् + क्त | = | आरूढः | चढ़ा | |
| 18. उप + विश् | = | बैठना | उप + विश् + क्त | = | उपविष्टः | बैठा | |
| 19. आ + कर्ण | = | सुनना | आ + कर्ण + क्त | = | आकर्णितः | सुना | |
| 20. धृ | = | धारण करना | धृ + क्त | = | धृतः | धारण किया | |
| 21. भृ | = | पालन करना | भृ + क्त | = | भृतः | पालन किया | |
| 22. अनु + भू | = | अनुभव करना | अनु + भू + क्त | = | अनुभूतः | अनुभव किया | |
| 23. सम् + दिश् | = | सन्देश देना | सम् + दिश् + क्त | = | संदिष्टः | संदेश दिया | |
| 24. आ + हु | = | बुलाना | आ + हु + क्त | = | आहूतः | बुलाया | |
| 25. स्था | = | खड़ा होना | स्था + क्त | = | स्थितः | खड़ा हुआ | |
| 26. क्षि | = | क्षीण होना | क्षि + क्त | = | क्षीणः | क्षीण हुआ | |
| 27. भिद् | = | अलग होना | भिद् + क्त | = | भिन्नः | अलग हुआ | |
| 28. छिद् | = | काटना | छिद् + क्त | = | छिन्नः | काटा हुआ | |
| 29. अव + तृ | = | उतरना | अव + तृ + क्त | = | अवतीर्णः | उतरा | |
| 30. प्रच्छ | = | पूछना | प्रच्छ् + क्त | = | पृष्टः | पूछा |
(v-vi) शतृ एवं शानच्-प्रत्यय (लट् शतृशानचाव प्रथमा समानाधिकरणे)-वर्तमान काल में 'हुआ' अथवा 'रहा', 'रहे' अर्थ का बोध कराने के लिए 'शतृ' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। 'शतृ' प्रत्यय सदैव परस्मैपदी धातुओं (क्रिया-शब्दों) से ही जुड़ता है। 'शतृ' के 'श्' और 'ऋ' का लोप होता है, और 'अत्' शेष रहता है।
शानच् प्रत्यय भी 'शतृ' प्रत्यय के ही समान वर्तमान काल में 'हुआ' अथवा 'रहा', 'रही', 'रहे' अर्थ का बोध कराने के लिए प्रयुक्त होता है। 'शानच्' प्रत्यय केवल आत्मनेपदी धातुओं में ही जुड़ता है। 'शानच्' प्रत्यय में से 'श्' और 'च्' का लोप होकर 'आन' शेष रहता है। 'आन' के स्थान पर अधिकतर 'मान' हो जाता है। यहाँ 'शानच्' प्रत्यय से बने कुछ क्रियापदों के उदाहरण पुल्लिंग में ही दिये जा रहे हैं। छात्र इन्हें समझें और कण्ठाग्र कर लें।
| गम् | + शतृ | = | गच्छत् | = | (जाता हुआ) |
|---|---|---|---|---|---|
| पठ् | + शतृ | = | पठत् | = | (पढ़ता हुआ) |
| चुर | + शतृ | = | चोरयत् | = | (चुराता हुआ) |
| भक्ष् | + शतृ | = | भक्षयत् | = | (खाता हुआ) |
| हृ | + शतृ | = | हरत् | = | (हरण करता हुआ) |
| 4. गण् | गिनना | गणय् + शतृ | = | गणयन् | (गिनता हुआ) |
| 5. चल् | चलना | चल् + शतृ | = | चलन् | (चलता हुआ) |
| 6. जि (जय्) | जीतना | जय् + शतृ | = | जयन् | (जीतता हुआ) |
| 7. कथ् | कहना | कथय् + शतृ | = | कथयन् | (कहता हुआ) |
| 8. दृश् | देखना | पश्य् + शतृ | = | पश्यन् | (देखता हुआ) |
| 9. धाव् | दौड़ना | धाव् + शतृ | = | धावन् | (दौड़ता हुआ) |
| 10. पा | पीना | पिब् + शतृ | = | पिबन् | (पीता हुआ) |
| 11. पच् | पकाना | पच् + शतृ | = | पचन् | (पकाता हुआ) |
| 12. पत् | गिरना | पत् + शतृ | = | पतन् | (गिरता हुआ) |
| 13. प्रच्छ् | पूछना | पृच्छ + शतृ | = | पृच्छन् | (पूछता हुआ) |
| 14. भू | होना | भव् + शतृ | = | भवन् | (होता हुआ) |
| 15. रक्ष | रक्षा करना | रक्ष् + शतृ | = | रक्षन् | (रक्षा करता हुआ) |
| 16. रच् | रचना करना | रचय् + शतृ | = | रचयन् | (रचना करता हुआ) |
| 17. लिख् | लिखना | लिख् + शतृ | = | लिखन् | (लिखता हुआ) |
| 18. वद् | बोलना | वद् + शतृ | = | वदन् | (बोलता हुआ) |
| 19. सृज् | रचना करना | सृज् + शतृ | = | सृजन् | (रचना करता हुआ) |
| 20. स्मृ | याद करना | स्मृ + शतृ | = | स्मरन् | (स्मरण करता हुआ) |
| 21. स्पृश् | छूना | स्पृश् + शतृ | = | स्पृशन् | (छूता हुआ) |
| 22. हस् | हँसना | हस् + शतृ | = | हसन् | (हँसता हुआ) |
| 23. अर्जु | कमाना | अर्ज + शतृ | = | अर्जन् | (कमाता हुआ) |
| 24. क्षाल् | धोना | क्षाल् + शतृ | = | क्षालयन् | (धोता हुआ) |
| 25. कुप् | क्रोध करना | कुप्य् + शतृ | = | कुप्यन् | (क्रोध करता हुआ) |
| 26. कूज् | चहचहाना | कूज् + शतृ | = | कूजन् | (कूजता हुआ) |
| 27. कृष् | जोतना | कर्ष + शतृ | = | कर्षन् | (जोतता हुआ) |
| 28. खाद् | खाना | खाद् + शतृ | = | खादन् | (खाता हुआ) |
| 34. तृ | तरना | तर् + शतृ | = | तरन् | (तरता हुआ) |
| 35. त्यज् | त्यागना | त्यज् + शतृ | = | त्यजन् | (त्यागता हुआ) |
| 36. धृ | रखना | धर् + शतृ | = | धरन् | (रखता हुआ) |
| 37. नम् | झुकना | नम् + शतृ | = | नमन् | (झुकता हुआ) |
| 38. नश् | नष्ट होना | नश्य् + शतृ | = | नश्यन् | (नष्ट होता हुआ) |
| 39. पाल् | पालना | पालय् + शतृ | = | पालयन् | (पालता हुआ) |
| 40. पीड् | दुःख देना | पीडय् + शतृ | = | पीडयन् | (दुःख देता हुआ) |
| धातु | + प्रत्यय | = | शानच् प्रत्यय युक्त शब्द | अर्थ | |
|---|---|---|---|---|---|
| कृ | + शानच् | = | कुर्वाणः | (करते हुए) | |
| दा | + शानच् | = | ददानः | (देते हुए) | |
| गम् | + शानच् | = | गच्छमानः | (ले जाते हुए) | |
| पठ् | + शानच् | = | पठ्यमानः | (पढ़ते हुए) | |
| चुर | + शानच् | = | चोरयमाणः | (चुराते हुए) | |
| भक्ष् | + शानच् | = | भक्षयमाणः | (खाते हुए) | |
| हृ | + शानच् | = | हरमाणः | (हरण करते हुए) | |
| नी | + शानच् | = | नयमानः | (ले जाते हुए) | |
| 4. वृध् | बढ़ना | वध् + शानच् | = | वधमानः | (बढ़ते हुए) |
| 5. भाष् | कहना | भाष् + शानच् | = | भाषमाणः | (कहते हुए) |
| 6. याच् | माँगना | याच् + शानच् | = | याचमानः | (माँगते हुए) |
| 7. रुच् | अच्छा लगना | रोच् + शानच् | = | रोचमाणः | (अच्छा लगते हुए) |
| 8. मुद् | प्रसन्न होना | मोद् + शानच् | = | मोदमानः | (प्रसन्न होते हुए) |
| 9. लभ् | पाना | लभ् + शानच् | = | लभमानः | (पाते हुए) |
| 10. यत् | कोशिश करना | यत् + शानच् | = | यतमानः | (कोशिश करते हुए) |
| 11. कृ | करना | कृ + शानच् | = | कुर्वाणः | (करते हुए) |
| 12. एध् | बढ़ना | एध् + शानच् | = | एधमानः | (बढ़ते हुए) |
| 13. जन् | पैदा होना | जाय् + शानच् | = | जायमानः | (पैदा होता हुआ) |
| 14. ताड् | पीटना | ताड् + शानच् | = | ताड्यमानः | (पीड़ता हुआ) |
| 15. युध् | लड़ना | युध् + शानच् | = | युध्यमानः | (लड़ते हुए) |
| 16. दू | दुःखी होना | दू + शानच् | = | दूयमानः | (दुःखी होते हुए) |
| 17. भृ | पालन करना | भृ + शानच् | = | भ्रियमाणः | (पालन किया जाता हुआ) |
| 18. हृष् | प्रसन्न होना | हृष् + शानच् | = | हृष्यमाणः | (प्रसन्न होते हुए) |
(vii) तव्यत् प्रत्यय (तव्यत्तव्यानीयरः)- 'तव्यत्' प्रत्यय 'चाहिए' अथवा 'योग्य' अर्थ में प्रयुक्त होता है। 'तव्यत्' प्रत्यय में से 'त्' का लोप होने पर 'तव्य' शेष रहता है। 'तव्यत्' प्रत्ययान्त शब्दों के रूप तीनों लिंगों में चलते हैं। यहाँ केवल पुल्लिंग के ही रूप दिये जा रहे हैं। छात्र इन्हें समझें
उदाहरण-
| धातु | + प्रत्यय | = | तव्यत्-प्रत्यययुक्तः शब्द | अर्थ |
|---|---|---|---|---|
| पठ् | तव्यत् | = | पठितव्यः | (पढ़ना चाहिए) |
| भू | + तव्यत् | = | भवितव्यः | (होना चाहिए) |
| गम् | तव्यत् | = | गन्तव्यः | (जाना चाहिए) |
| नी | + तव्यत् | = | नेतव्यः | (ले जाना चाहिए) |
| दा | + तव्यत् | = | दातव्यः | (देना चाहिए) |
| दृश् | + तव्यत् | = | द्रष्टव्यः | (देखना चाहिए) |
| त्यज् | + तव्यत् | = | त्यक्तव्यः | (त्यागना चाहिए) |
| भक्ष | तव्यत् | = | भक्षितव्य | (खाना चाहिए) |
| कृ | + तव्यत् | = | कर्तव्यः | (करना चाहिए) |
| वच् | तव्यत् | = | वक्तव्यः | (कहना चाहिए) |
| S.No. | मूल धातु (Root Verb) | धातु का अर्थ (Meaning) | धातु + प्रत्यय (Root + Suffix) | तव्यत्-प्रत्यययुक्तःशब्द (Word with Tavyat Suffix) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|---|---|---|---|
| 4. | चुर् | चुराना | \( \text{चोरय्} + \text{तव्यत्} \) | चोरयितव्यः | (चुराना चाहिए) |
| 5. | चल् | चलना | \( \text{चल्} + \text{तव्यत्} \) | चलितव्यः | (चलना चाहिए) |
| 6. | चर् | चलना | \( \text{चर्} + \text{तव्यत्} \) | चरितव्यः | (चलना चाहिए) |
| 7. | जि | जीतना | \( \text{जय्} + \text{तव्यत्} \) | जेतव्यः | (जीतना चाहिए) |
| 8. | कथ् | कहना | \( \text{कथय्} + \text{तव्यत्} \) | कथयितव्यः | (कहना चाहिए) |
| 9. | धाव् | दौड़ना | \( \text{धाव्} + \text{तव्यत्} \) | धावितव्यः | (दौड़ना चाहिए) |
| 10. | पा | पीना | \( \text{पा} + \text{तव्यत्} \) | पातव्यः | (पीना चाहिए) |
| 11. | पच् | पकाना | \( \text{पच्} + \text{तव्यत्} \) | पक्तव्यः | (पकाना चाहिए) |
| 12. | पत् | गिरना | \( \text{पत्} + \text{तव्यत्} \) | पतितव्यः | (गिरना चाहिए) |
| 13. | प्रच्छ् | पूछना | \( \text{प्रच्छ्} + \text{तव्यत्} \) | प्रष्टव्यः | (पूछना चाहिए) |
| 14. | भाष् | कहना | \( \text{भाष्} + \text{तव्यत्} \) | भाषितव्यः | (कहना चाहिए) |
| 15. | रक्ष | रक्षा करना | \( \text{रक्ष्} + \text{तव्यत्} \) | रक्षितव्यः | (रक्षा करनी चाहिए) |
| 16. | रच् | रचना करना | \( \text{रचय्} + \text{तव्यत्} \) | रचयितव्यः | (रचना करनी चाहिए) |
| 17. | लिख् | लिखना | \( \text{लेख्} + \text{तव्यत्} \) | लेखितव्यः | (लिखना चाहिए) |
| 18. | वद् | बोलना | \( \text{वद्} + \text{तव्यत्} \) | वदितव्यः | (बोलना चाहिए) |
| 19. | वृत् | होना | \( \text{वर्तृ} + \text{तव्यत्} \) | वर्तितव्यः | (होना चाहिए) |
| 20. | वृध् | बढ़ना | \( \text{वर्ध} + \text{तव्यत्} \) | वर्धितव्यः | (बढ़ना चाहिए) |
| 21. | सृज् | रचना करना | \( \text{सृज्} + \text{तव्यत्} \) | स्रष्टव्यः | (बनाना चाहिए) |
| 22. | स्मृ | याद करना | \( \text{स्मर्} + \text{तव्यत्} \) | स्मर्तव्यः | (याद करना चाहिए) |
| 23. | स्पृश् | छूना | \( \text{स्पृश्} + \text{तव्यत्} \) | स्प्रष्टव्यः | (छूना चाहिए) |
(viii) अनीयर् प्रत्यय- 'अनीयर्' प्रत्यय भी 'चाहिए' अथवा 'योग्य' अर्थ में प्रयुक्त होता है। 'अनीयर्' प्रत्यय में से 'र' का लोप होने पर 'अनीय' शेष रहता है। अनीयर् प्रत्ययान्त शब्दों के रूप तीनों लिंगों में चलते हैं। यहाँ केवल पुल्लिंग के ही रूप दिए जा रहे हैं। छात्र इन्हें समझें और कण्ठाग्र कर लें।
| मूल धातु (Root Verb) | प्रत्यय (Suffix) | अनीयर् प्रत्यय से बना रूप (Word with Aniyar Suffix) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|---|---|
| नी | \( + \text{ अनीयर्} \) | नयनीयः | (ले जाना चाहिए) |
| दृश् | \( + \text{ अनीयर्} \) | दर्शनीयः | (देखना चाहिए) |
| त्यज् | \( + \text{ अनीयर्} \) | त्यजनीयः | (त्यागना चाहिए) |
| भक्ष् | \( + \text{ अनीयर्} \) | भक्षणीयः | (खाना चाहिए) |
| कृ | \( + \text{ अनीयर्} \) | करणीयः | (करना चाहिए) |
| वच् | \( + \text{ अनीयर्} \) | वचनीयः | (कहना चाहिए) |
अन्य उदाहरण-
| S.No. | मूल धातु (Root Verb) | धातु का अर्थ (Meaning) | धातु + प्रत्यय (Root + Suffix) | अनीयर् प्रत्यय से बना रूप (Word with Aniyar Suffix) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|---|---|---|---|
| 1. | अर्जु | कमाना | \( \text{अर्जु} + \text{अनीयर्} \) | अर्जनीयः | (कमाना चाहिए) |
| 2. | क्रुध् | क्रोध करना | \( \text{क्रोध्} + \text{अनीयर्} \) | क्रोधनीयः | (क्रोध करना चाहिए) |
| 3. | गण् | गिनना | \( \text{गण्} + \text{अनीयर्} \) | गणनीयः | (गिनना चाहिए) |
| 4. | चुर् | चुराना | \( \text{चोर्} + \text{अनीयर्} \) | चोरणीयः | (चुराना चाहिए) |
| 5. | चल् | चलना | \( \text{चल्} + \text{अनीयर्} \) | चलनीयः | (चलना चाहिए) |
| 6. | चर् | चलना | \( \text{चर्} + \text{अनीयर्} \) | चरणीयः | (चलना चाहिए) |
| 7. | जि | जीतना | \( \text{जय्} + \text{अनीयर्} \) | जयनीयः | (जीतना चाहिए) |
| 8. | कथ् | कहना | \( \text{कथ्} + \text{अनीयर्} \) | कथनीयः | (कहना चाहिए) |
| 9. | धाव् | दौड़ना | \( \text{धाव्} + \text{अनीयर्} \) | धावनीयः | (दौड़ना चाहिए) |
| 10. | पा | पीना | \( \text{पा} + \text{अनीयर्} \) | पानीयः | (पीना चाहिए) |
| 11. | पच् | पकाना | \( \text{पच्} + \text{अनीयर्} \) | पचनीयः | (पकाना चाहिए) |
| 12. | पत् | गिरना | \( \text{पत्} + \text{अनीयर्} \) | पतनीयः | (गिरना चाहिए) |
| 13. | प्रच्छ् | पूछना | \( \text{प्रच्छ्} + \text{अनीयर्} \) | प्रच्छनीयः | (पूछना चाहिए) |
| 14. | भक्ष | खाना | \( \text{भक्षु} + \text{अनीयर्} \) | भक्षणीयः | (खाना चाहिए) |
| 15. | भाष् | कहना | \( \text{भाष्} + \text{अनीयर्} \) | भाषणीयः | (कहना चाहिए) |
| 16. | रक्ष | रक्षा करना | \( \text{रक्ष} + \text{अनीयर्} \) | रक्षणीयः | (रक्षा करनी चाहिए) |
| 17. | रच् | रचना करना | \( \text{रच्} + \text{अनीयर्} \) | रचनीयः | (रचना करनी चाहिए) |
| 18. | लिख् | लिखना | \( \text{लेख्} + \text{अनीयर्} \) | लेखनीयः | (लिखना चाहिए) |
| 19. | वद् | बोलना | \( \text{वद्} + \text{अनीयर्} \) | वदनीयः | (बोलना चाहिए) |
| 20. | वृत् | होना | \( \text{वर्तु} + \text{अनीयर्} \) | वर्तनीयः | (होना चाहिए) |
| 21. | वृध् | बढ़ना | \( \text{वर्ध} + \text{अनीयर्} \) | वर्धनीयः | (बढ़ना चाहिए) |
| 22. | सृज् | रचना करना | \( \text{सर्जु} + \text{अनीयर्} \) | सर्जनीयः | (रचना करनी चाहिए) |
| 23. | स्मृ | याद करना | \( \text{स्मर्} + \text{अनीयर्} \) | स्मरणीयः | (याद करना चाहिए) |
| 24. | नि + विद् | निवेदन करना | \( \text{निवेद्} + \text{अनीयर्} \) | निवेदनीयः | (निवेदन करना चाहिए) |
तुमुन् प्रत्यय- 'तुमुन्' प्रत्यय में से 'मु' के 'उ' एवं अन्तिम अक्षर 'न्' का लोप हो जाने पर 'तुम्' शेष रहता है। 'तुमुन्' प्रत्यय से बना रूप अव्यय होता है। अतः उसके रूप नहीं चलते हैं। 'तुमुन्' प्रत्यय से बने कतिपय शब्दों के उदाहरण यहाँ प्रस्तुत हैं-
| धातु (Root Verb) | प्रत्यय (Suffix) | तुमुन्ः प्रत्यययुक्तःशब्द (Word with Tumun Suffix) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|---|---|
| गम् | \( + \text{ तुमुन्} \) | गन्तुम् | (जाने के लिए) |
| कृ | \( + \text{ तुमुन्} \) | कर्तुम् | (करने के लिए) |
| पठ् | \( + \text{ तुमुन्} \) | पठितुम् | (पढ़ने के लिए) |
| दा | \( + \text{ तुमुन्} \) | दातुम् | (देने के लिए) |
| दृश् | \( + \text{ तुमुन्} \) | द्रष्टुम् | (देखने के लिए) |
अन्य उदाहरण-
| S.No. | धातु (Root Verb) | प्रत्यय (Suffix) | तुमुन् से बना रूप (Word with Tumun Suffix) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|---|---|---|
| 1. | अस् | \( + \text{ तुमुन्} \) | भवितुम् | (होने के लिए) |
| 2. | इष् | \( + \text{ तुमुन्} \) | एषितुम् | (चाहने के लिए) |
| 3. | क्रुध् | \( + \text{ तुमुन्} \) | क्रोद्धम् | (क्रोध करने के लिए) |
| 4. | गण् | \( + \text{ तुमुन्} \) | गणयितुम् | (गिनने के लिए) |
| 5. | चुर | \( + \text{ तुमुन्} \) | चोरयितुम् | (चुराने के लिए) |
| 6. | चल् | \( + \text{ तुमुन्} \) | चलितुम् | (हिलने के लिए) |
| 7. | जि | \( + \text{ तुमुन्} \) | जेतुम् | (जीतने के लिए) |
| 8. | कथ् | \( + \text{ तुमुन्} \) | कथयितुम् | (कहने के लिए) |
| 9. | धाव् | \( + \text{ तुमुन्} \) | धावितुम् | (दौड़ने के लिए) |
| 10. | नी | \( + \text{ तुमुन्} \) | नेतुम् | (ले जाने के लिए) |
| 11. | पा | \( + \text{ तुमुन्} \) | पातुम् | (पीने के लिए) |
| 12. | पच् | \( + \text{ तुमुन्} \) | पक्तुम् | (पकाने के लिए) |
| 13. | पत् | \( + \text{ तुमुन्} \) | पतितुम् | (गिरने के लिए) |
| 14. | प्रच्छ् | \( + \text{ तुमुन्} \) | प्रष्टुम् | (पूछने के लिए) |
| 15. | भू | \( + \text{ तुमुन्} \) | भवितुम् | (होने के लिए) |
| 16. | भक्षु | \( + \text{ तुमुन्} \) | भक्षयितुम् | (खाने के लिए) |
| 17. | रक्ष | \( + \text{ तुमुन्} \) | रक्षितुम् | (रक्षा करने के लिए) |
| 18. | रच् | \( + \text{ तुमुन्} \) | रचयितुम् | (रचना करने के लिए) |
| 19. | लिख् | \( + \text{ तुमुन्} \) | लेखितुम् | (लिखने के लिए) |
| 20. | वद् | \( + \text{ तुमुन्} \) | वदितुम् | (बोलने के लिए) |
| 21. | सृज् | \( + \text{ तुमुन्} \) | स्रष्टुम् | (रचना करने के लिए) |
| S.No. | धातु (Root Verb) | प्रत्यय (Suffix) | तुमुन् से बना रूप (Word with Tumun Suffix) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|---|---|---|
| 28. | क्षाल् | \( + \text{ तुमुन्} \) | क्षालयितुम् | (धोने के लिए) |
| 29. | कुप् | \( + \text{ तुमुन्} \) | कोपितुम् | (क्रोध करने के लिए) |
| 30. | कूज् | \( + \text{ तुमुन्} \) | कूजितुम् | (कूजने के लिए) |
| 31. | कृष् | \( + \text{ तुमुन्} \) | कर्तुम् | (जोतने के लिए) |
| 32. | खाद् | \( + \text{ तुमुन्} \) | खादितुम् | (खाने के लिए) |
| 33. | खन् | \( + \text{ तुमुन्} \) | खनितुम् | (खोदने के लिए) |
| 34. | चिन्त् | \( + \text{ तुमुन्} \) | चिन्तयितुम् | (सोचने के लिए) |
| 35. | चर् | \( + \text{ तुमुन्} \) | चरितुम् | (चलने के लिए) |
| 36. | जीव् | \( + \text{ तुमुन्} \) | जीवितुम् | (जीने के लिए) |
| 37. | तुल् | \( + \text{ तुमुन्} \) | तोलयितुम् | (तोलने के लिए) |
| 38. | तृ | \( + \text{ तुमुन्} \) | तरितुम् | (तैरने के लिए) |
| 39. | त्यज् | \( + \text{ तुमुन्} \) | त्यक्तुम् | (त्यागने के लिए) |
| 40. | धृ | \( + \text{ तुमुन्} \) | धर्तुम् | (रखने के लिए) |
(नोट-जिस क्रिया के साथ तुमुनन्त क्रिया आती है, उस क्रिया का और तुमुनन्त क्रिया का कर्ता एक ही होना चाहिए। भिन्न-भिन्न कर्ता होने पर तुमुनन्त क्रिया का प्रयोग नहीं हो सकता।)
ण्वुल् प्रत्यय- धातु से धातु का कर्ता बनाने के लिए इसका 'व' लगाया जाता है जो 'अक' में परिवर्तित हो जाता है। इससे बने शब्दों के रूप तीनों लिंगों में क्रमशः राम, रमा और फल की तरह चलते हैं। धातु के अन्तिम 'अ', 'इ', 'उ', 'ऋ' की वृद्धि होकर क्रमशः 'आ', 'ऐ', 'औ' तथा 'आर्' हो जाता है। धातु की उपधा के 'अ', 'इ', 'उ', 'ऋ' का क्रमशः 'आ', 'ए', 'ओ', 'अर्' होता है। अकारान्त में 'युक्' (य) लगता है तथा कुछ धातुओं में गुण-वृद्धि न होकर सीधा जुड़ जाता है। जैसे-
| धातु (Root Verb) | प्रत्यय (Suffix) | ण्वुल् (अक) से बना रूप (Word with Nvul Suffix) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|---|---|
| गम् | \( + \text{ ण्वुल् (अक)} \) | गमकः | (जाने वाला) |
| कृ | \( + \text{ ण्वुल् (अक)} \) | कारकः | (करने वाला) |
| पठ् | \( + \text{ ण्वुल् (अक)} \) | पाठकः | (पढ़ने वाला) |
| दा | \( + \text{ ण्वुल् (अक)} \) | दायकः | (देने वाला) |
| दृश् | \( + \text{ ण्वुल् (अक)} \) | दर्शकः | (देखने वाला) |
अन्य उदाहरण-
नी \( + \text{ ण्वुल्} = \) नायकः (नी \( = \text{ ने} + \text{ ण्वुल् (अक)} = \text{ नायूअक} = \text{ नायकः} \)), श्रु \( + \text{ ण्वुल्} = \) श्रावक, लिख् \( + \text{ ण्वुल्} = \) लेखकः, युज् \( + \text{ ण्वुल्} = \) योजकः, गै \( + \text{ ण्वुल्} = \) गायकः, रक्ष \( + \text{ ण्वुल्} = \) रक्षकः, हन् \( + \text{ ण्वुल्} = \) घातकः।
(xi) तृच् प्रत्यय- 'कर्ता' अर्थ में अर्थात् हिन्दी भाषा में 'करने वाला' इस अर्थ में धातु के साथ 'तृच्' प्रत्यय होता है। इसका 'तृ' भाग शेष रहता है और 'च' का लोप हो जाता है। तृच्-प्रत्ययान्त शब्दों के रूप तीनों लिंगों में चलते हैं। यहाँ केवल पुल्लिंग के ही उदाहरण प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
| धातु (Root Verb) | प्रत्यय (Suffix) | तृच् से बना रूप (Word with Tric Suffix) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|---|---|
| भृ | \( + \text{ तृच्} \) | भर्तृ | (भर्ता) |
अन्य उदाहरण-
| S.No. | धातु (Root Verb) | प्रत्यय (Suffix) | तृच् से बना रूप (Word with Tric Suffix) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|---|---|---|
| श्रु | \( + \text{ तृच्} \) | श्रोतृ | श्रोता | |
| दा | \( + \text{ तृच्} \) | दातृ | दाता | |
| हन् | \( + \text{ तृच्} \) | हन्तृ | हन्ता | |
| नी | \( + \text{ तृच्} \) | नेतृ | नेता | |
| जि | \( + \text{ तृच्} \) | जेतृ | जेता | |
| ज्ञा | \( + \text{ तृच्} \) | ज्ञातृ | ज्ञाता | |
| धा | \( + \text{ तृच्} \) | धातृ | धाता | |
| दृश् | \( + \text{ तृच्} \) | द्रष्ट्र | द्रष्टा | |
| पठ् | \( + \text{ तृच्} \) | पठितृ | पठिता | |
| रक्ष | \( + \text{ तृच्} \) | रक्षितृ | रक्षिता | |
| सृज् | \( + \text{ तृच्} \) | सृष्ट् | स्रष्टा | |
| युध् | \( + \text{ तृच्} \) | योद्ध | योद्धा | |
| भू | \( + \text{ तृच्} \) | भवितृ | भवितृ | |
| आप् | \( + \text{ तृच्} \) | आपृ | आप्रा | |
| आस् | \( + \text{ तृच्} \) | असितृ | असिता | |
| कथ् | \( + \text{ तृच्} \) | कथयितृ | कथयिता | |
| क्री | \( + \text{ तृच्} \) | क्रेतृ | क्रेता | |
| ग्रह | \( + \text{ तृच्} \) | ग्रहीतृ | ग्रहीता | |
| चिन्त् | \( + \text{ तृच्} \) | चिन्तयितृ | चिन्तयिता | |
| चुर् | \( + \text{ तृच्} \) | चोरयितृ | चोनयिता | |
| जन् | \( + \text{ तृच्} \) | जनयितृ | जनयिता | |
| वच् | \( + \text{ तृच्} \) | वक्तृ | वक्ता | |
| भी | \( + \text{ तृच्} \) | भेतृ | भेता | |
| भुज् | \( + \text{ तृच्} \) | भोक्तृ | भोक्ता | |
| याच् | \( + \text{ तृच्} \) | याचितृ | याचिता | |
| रक्ष | \( + \text{ तृच्} \) | रक्षितृ | रक्षिता | |
| रुद् | \( + \text{ तृच्} \) | रुदितृ | रुदिता | |
| लभ् | \( + \text{ तृच्} \) | लब्धृ | लब्धा | |
| वद् | \( + \text{ तृच्} \) | वदितृ | वदिता | |
| 4 | वृध् | \( + \text{ तृच्} \) | वर्धितृ | वर्धिता |
| S.No. | धातु (Root Verb) | प्रत्यय (Suffix) | तृच् से बना रूप (Word with Tric Suffix) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|---|---|---|
| स्मृ | \( + \text{ तृच्} \) | स्मर्तृ | स्मर्ता | |
| हस् | \( + \text{ तृच्} \) | हसितृ | हसिता | |
| स्तु | \( + \text{ तृच्} \) | स्तोतृ | स्तोता | |
| खाद् | \( + \text{ तृच्} \) | खादितृ | खादिता | |
| रच् | \( + \text{ तृच्} \) | रचयितृ | रचयिता | |
| पाठि | \( + \text{ तृच्} \) | पाठयितृ | पाठयिता |
(xii) यत् प्रत्यय- यह भी कृत्य प्रत्यय है जो कर्म एवं भाववाच्य में 'चाहिए' अथवा 'योग्य' के अर्थ में प्रयोग होता है। 'यत्' का स्वरान्त धातुओं से केवल 'य' लगाया जाता है। ऋकारान्त धातुओं से नहीं लगता। यह 'अ' उपधा वाली 'प', वर्गान्त धातुओं से भी लगाया जाता है। धातु के अन्तिम 'आ', 'इ', 'ई', 'का', 'ए' तथा 'उ' का 'अत्' हो जाता है। 'अ' उपधा वाली 'प' वर्गान्त धातुओं से इसका सीधा 'य' लगता है। जैसे-
| शब्द (Word) | धातु (Root) | प्रत्यय (Suffix) | शब्द (Word) | धातु (Root) | प्रत्यय (Suffix) |
|---|---|---|---|---|---|
| देयः | दा | यत् | ध्येयः | ध्यै | यत् |
| पेयः | पा | यत् | शप्यः | शप् | यत् |
| चेयः | चिं | यत् | जप्यः | जप् | यत् |
| नेयः | नी | यत् | लभ्यः | लभ् | यत् |
| ज्ञेयः | ज्ञा | यत् | लप्यः | लप् | यत् |
(xiii) णिनि प्रत्यय- ग्रह आदि गण के शब्दों (ग्राही, उत्साही, मन्त्री, अयाची, अवादी, विषयी, अपराधी आदि) में 'णिनि' का 'इन्' लगता है। जैसे-
ग्रह् \( + \text{ णिनि} = \) ग्राहिन्, ग्राही, उत्साह् \( + \text{ णिनि} = \) उत्साही, मन्त्र \( + \text{ णिनि} = \) मन्त्री, अयाच् \( + \text{ णिनि} = \) अयाची, अवद् \( + \text{ णिनि} = \) अवादी, विषम् \( + \text{ णिनि} = \) विषयी, अपराध् \( + \text{ णिनि} = \) अपराधी। इसी प्रकार-वासी \( = \text{ वस्} + \text{ णिनि} \)। कारिणम् \( = \text{ कृ} + \text{ णिनि} \)। दर्शिन् \( = \text{ दृश्} + \text{ णिनि} \)।
(xiv) अच् प्रत्यय-
(i) पच् आदि धातुओं के अनन्तर 'अच्' प्रत्यय का 'अ' लगाकर कर्तृबोधक शब्द बनाये जाते हैं। जैसे-
पच् \( + \text{ अच्} = \) पचः,
वद् \( + \text{ अच्} = \) वदः,
चल् \( + \text{ अच्} = \) चलः।
(ii) कर्म के योग में 'अर्ह' धातु के अनन्तर अच् प्रत्यय लगता है। यथा-
उदाहरण-
| धातु (Root Verb) | प्रत्यय (Suffix) | शब्द (Word) | धातु (Root Verb) | प्रत्यय (Suffix) | शब्द (Word) |
|---|---|---|---|---|---|
| कृ | \( + \text{ क्तिन्} \) | कृतिः | भज् | \( + \text{ क्तिन्} \) | भक्तिः |
| कृ | \( + \text{ क्तिन्} \) | कीर्ति: | दृश् | \( + \text{ क्तिन्} \) | दृष्टिः |
| क्रम् | \( + \text{ क्तिन्} \) | क्रान्तिः | सृज् | \( + \text{ क्तिन्} \) | सृष्टिः |
| गम् | \( + \text{ क्तिन्} \) | गतिः | तृप् | \( + \text{ क्तिन्} \) | तृष्टिः |
| नी | \( + \text{ क्तिन्} \) | नीतिः | श्रु | \( + \text{ क्तिन्} \) | श्रुतिः |
| भ्रम् | \( + \text{ क्तिन्} \) | भ्रान्तिः | वृष् | \( + \text{ क्तिन्} \) | वृष्टिः |
| शम् | \( + \text{ क्तिन्} \) | शान्तिः | ऋध् | \( + \text{ क्तिन्} \) | ऋद्धिः |
| स्था | \( + \text{ क्तिन्} \) | स्थितिः | युज् | \( + \text{ क्तिन्} \) | युक्तिः |
अन्य उदाहरण-
| धातु (Root Verb) | प्रत्यय (Suffix) | शब्द (Word) | धातु (Root Verb) | प्रत्यय (Suffix) | शब्द (Word) |
|---|---|---|---|---|---|
| आप् | \( + \text{ क्तिन्} \) | आप्तिः | वृध् | \( + \text{ क्तिन्} \) | वृद्धिः |
| आ \( + \text{ सद्} \) | \( + \text{ क्तिन्} \) | आसक्तिः | दम् | \( + \text{ क्तिन्} \) | शक्तिः |
| आ \( + \text{ हु} \) | \( + \text{ क्तिन्} \) | आहुतिः | दीप | \( + \text{ क्तिन्} \) | दीप्तिः |
| उप \( + \text{ लभ्} \) | \( + \text{ क्तिन्} \) | उपलब्धिः | नम् | \( + \text{ क्तिन्} \) | नतिः |
| जन् | \( + \text{ क्तिन्} \) | जातिः | पच् | \( + \text{ क्तिन्} \) | पक्तिः |
| ज्ञप् | \( + \text{ क्तिन्} \) | ज्ञप्तिः | पुष् | \( + \text{ क्तिन्} \) | पुष्टिः |
| यम् | \( + \text{ क्तिन्} \) | यतिः | प्री | \( + \text{ क्तिन्} \) | प्रीतिः |
| रम् | \( + \text{ क्तिन्} \) | रीतिः | सिध् | \( + \text{ क्तिन्} \) | सिद्धिः |
| रुह | \( + \text{ क्तिन्} \) | रूढ़िः | स्मृ | \( + \text{ क्तिन्} \) | स्मृतिः |
| वि \( + \text{ श्रम्} \) | \( + \text{ क्तिन्} \) | विश्रान्तिः | शुध् | \( + \text{ क्तिन्} \) | शुद्धिः |
| वृत् | \( + \text{ क्तिन्} \) | वृत्तिः | हन् | \( + \text{ क्तिन्} \) | हतिः |
(2) तद्धित प्रत्यय
जो प्रत्यय शब्दों के योग में प्रयुक्त किये जाते हैं, वे तद्धित प्रत्यय कहे जाते हैं।
1. इनि प्रत्यय- 'अत इनिठनौ'-अकारान्त शब्दों से 'वाला' या 'युक्त' अर्थ में 'इनि' और 'ठन्' प्रत्यय होते हैं। 'इनि' का 'इन्' और 'ठन्' का 'ठ' शेष रहता है।
(i) 'इनि' प्रत्यय अकारान्त के अतिरिक्त आकारान्त शब्दों में भी लग सकता है। जैसे-माया \( + \text{ इनि} = \) मायिन्, शिखा \( + \text{ इनि} = \) शिखिन्, वीणा \( + \text{ इनि} = \) वीणिन् आदि।
(ii) इनि प्रत्ययान्त शब्द के रूप पुल्लिंग में 'करिन्' के समान, स्त्रीलिंग में 'ई' लगाकर 'नदी' के समान और 'नपुंसकलिंग' में 'मनोहारिन्' के समान चलते हैं।
| मूल शब्द (Root Word) | प्रत्यय (Suffix) | इनि से बना रूप (Word with Ini Suffix) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|---|---|
| दण्ड | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | दण्डिन् | दण्डी |
| बल | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | बलिन् | बली |
| धन | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | धनिन् | धनी |
| गुण | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | गुणिन् | गुणी |
| सुख | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | सुखिन् | सुखी |
| दुःख | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | दुःखिन् | दुःखी |
| माया | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | मायिन् | मायी |
| शाला | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | शालिन् | शाली |
| माला | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | मालिन् | माली |
| पताका | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | पताकिन् | पताकी |
| वीणा | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | वीणिन् | वीणी |
| वर्ण | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | वर्णिन् | वर्णी |
| पुष्कर | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | पुष्करिन् | पुष्करी |
| ज्ञान | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | ज्ञानिन् | ज्ञानी |
| योग | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | योगिन् | योगी |
| कुमुद | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | कुमुदिन् | कुमुदी |
| पद्म | \( + \text{ (इनि) इन्} \) | पद्मिन् | पद्मी |
2. ठक् प्रत्यय- 'रेवतादिभ्यष्ठक्-रेवती, अक्ष, दधि, मरीच' आदि शब्दों में अपत्य अर्थ में 'ठक्' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। 'ठक्' प्रत्यय में से 'ककार' का लोप होने पर 'ठ' शेष रहती है। 'ठ' के स्थान पर 'ठस्येकः' सूत्र से 'इक्' हो जाता है।
'जानकार', 'करने वाला' या 'सम्बन्धी' अर्थ में भाववाचक संज्ञा बनाने के लिए संज्ञा या विशेषण शब्दों में 'ठक्' प्रत्यय का 'इक' लगाया जाता है। इससे बने शब्दों का प्रयोग पुल्लिंग में राम की तरह होता है। प्रत्यय लगाते समय शब्द की 'ति' अर्थात् अन्तिम स्वर सहित उसके बाद वाले हल वर्ण का लोप हो जाता है। शब्द के आरम्भ में 'अ', 'क', 'आ', 'इ', 'क', 'ऐ' तथा 'उ', 'क', 'औ' हो जाता है।
| मूल शब्द (Root Word) | प्रत्यय (Suffix) | ठक् से बना रूप (Word with Thak Suffix) | अर्थ (Meaning) | मूल शब्द (Root Word) | प्रत्यय (Suffix) | ठक् से बना रूप (Word with Thak Suffix) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मास | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | मासिकः | मासिकः | समाज | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | सामाजिकः | सामाजिकः |
| संस्कृति | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | सांस्कृतिकः | सांस्कृतिकः | संसार | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | सांसारिकः | सांसारिकः |
| सप्ताह | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | साप्ताहिकः | साप्ताहिकः | यज्ञ | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | याज्ञिकः | याज्ञिकः |
| लक्षण | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | लाक्षणिकः | लाक्षणिकः | शब्द | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | शाब्दिकः | शाब्दिकः |
| अस्ति | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | आस्तिकः | आस्तिकः | साहित्य | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | साहित्यिकः | साहित्यिकः |
| मात्रा | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | मात्रिकः | मात्रिकः | नास्ति | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | नास्तिकः | नास्तिकः |
| पशु | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | पाशविकः | पाशविकः | वर्ण | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | वार्णिकः | वार्णिकः |
| इतिहास | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | ऐतिहासिकः | ऐतिहासिकः | अह्न | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | आह्निकः | आह्निकः |
| नीति | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | नैतिकः | नैतिकः | दिन | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | दैनिकः | दैनिकः |
| इह | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | ऐहिक: | ऐहिक: | विशेष | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | वैशेषिकः | वैशेषिकः |
| निकट | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | नैकटिकः | नैकटिकः | विधान | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | वैधानिक: | वैधानिक: |
| भूत | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | भौतिकः | भौतिकः | शिव | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | शैविकः | शैविकः |
| बुद्धि | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | बौद्धिकः | बौद्धिकः | पुराण | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | पौराणिकः | पौराणिकः |
| भूमि | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | भौमिकः | भौमिकः | मूल | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | मौलिकः | मौलिकः |
| रेवती | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | रैवतिकः | रैवतिकः | देह | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | दैहिकः | दैहिकः |
| वेद | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | वैदिकः | वैदिकः | वेतन | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | वैतनिकः | वैतनिकः |
| देव | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | दैविकः | दैविकः | लोक | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | लौकिकः | लौकिकः |
| विवाह | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | वैवाहिकः | वैवाहिकः | नी | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | नाविकः | नाविकः |
| सप्ताह | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | साप्ताहिकः | साप्ताहिकः | आत्मन् | \( + \text{ ठक् (इक)} \) | आत्मिकः | आत्मिकः |
3. अण् प्रत्यय- 'अश्वपत्यादिभ्यश्च'-अश्वपति, गणपति, कुलपति, गृहपति, धर्मपति, सभापति, प्राणपति, क्षेत्रपति, इत्यादि शब्दों से अपत्य अर्थ बताने के लिए 'अर्' प्रत्यय होता है। 'अण' का 'अ' शेष रहता है, जैसे-
अश्वपतेः अपत्यम् \( = \) अश्वपत्यम्,
गणपतेः अपत्यम् \( = \) गणपत्यम्।
(i) इसी तरह अपत्य या सन्तान, पुत्र, पौत्र, वंश आदि अर्थ को बताने के लिए षष्ठी विभक्त्यन्त शब्दों से 'अर्' प्रत्यय होता है। जैसे-
उपगोः अपत्यं पुमान् \( = \) औपगवः (उपगु का पुत्र),
वसुदेवस्य अपत्यं पुमान् \( = \) वासुदेवः (वसुदेव का पुत्र)।
मनोः अपत्यं \( = \) मानवः।
(ii) शिव, मगध, पर्वत, पृथा, मनु आदि (शिवादि गण के शब्दों) से अपत्य अर्थ में 'अर्' प्रत्यय होता है।
(iii) नदी वाचक तथा मनुष्य जाति के स्त्रीवाचक जो शब्द संज्ञाएँ (नाम) हों तथा जिनके आदि में दीर्घ वर्ण न हो, उनसे अपत्य अर्थ में अण् प्रत्यय होता है। जैसे-
यमुनायाः अपत्यम् \( = \) यमुना \( + \text{ अण्} = \) यामुनः
नर्मदायाः अपत्यम् \( = \) नर्मदा \( + \text{ अण्} = \) नार्मदः
(iv) ऋषिवाचक, कुलवाचक, वृष्णि कुलवाचक, कुरुवंश वाचक, शब्दों से अपत्य अर्थ में 'अण्' प्रत्यय होता है। जैसे-
वसिष्ठस्य अपत्यम् \( = \) वसिष्ठ \( + \text{ अण्} = \) वासिष्ठः
विश्वामित्रस्य अपत्यम् \( = \) विश्वामित्र \( + \text{ अण्} = \) वैश्वामित्रः
भृगोः अपत्यम् \( = \) भृगु \( + \text{ अण्} = \) भार्गवः
श्वफलकस्य अपत्यम् \( = \) श्वफलक \( + \text{ अण्} = \) श्वाफलकः
नकुलस्य अपत्यम् \( = \) नकुल \( + \text{ अण्} = \) नकुलः
सहदेवस्य अपत्यम् \( = \) सहदेव \( + \text{ अण्} = \) साहदेवः
(v) इसी प्रकार सन्तान अर्थ के समान ही अन्य अर्थों को बताने के लिए भी 'अण्' प्रत्यय होता है। जैसे-
हरिद्र्या रक्तं \( = \) हरिद्रा \( + \text{ अण्} = \) हारिद्रम्
देवदारो विकारः \( = \) देवदारु \( + \text{ अण्} = \) दैवदारवः
पृथिव्याः ईश्वर \( = \) पृथिवी \( + \text{ अण्} = \) पार्थिवः
सुहृदः भावः \( = \) सुहृत् \( + \text{ अण्} = \) सौहार्दम् ।
4. मयट् प्रत्यय- 'मयड्वैतयोभषायामभक्ष्याच्छादनयोः'-विकार और अवयव के अर्थ में 'मयट्' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। 'मयट्' प्रत्यय में से 'टकार' का लोप होने पर 'मय' शेष रहता है। जैसे-
| प्रकृति (Root) | प्रत्यय (Suffix) | शब्द (Word) |
|---|---|---|
| भस्म | \( + \text{ मयट्} \) | भस्ममयम् |
| सुवर्ण | \( + \text{ मयट्} \) | सुवर्णमयम् |
| सम | \( + \text{ मयट्} \) | सममयम् |
| देवदत्त | \( + \text{ मयट्} \) | देवदत्तमयम् |
| मूळ शब्द (Root Word) | अर्थ (Meaning) | प्रत्यय (Suffix) | पुल्लिंग (Masculine) | स्त्रीलिंग (Feminine) | नपुंसकलिंग (Neuter) |
|---|---|---|---|---|---|
| कुशलः | (दक्ष) | तमप् | कुशलतमः | कुशलतमा | कुशलतमम् |
| निपुणः | (निपुण) | तमप् | निपुणतमः | निपुणतमा | निपुणतमम् |
| निकृष्टः | (निम्न) | तमप् | निकृष्टतमः | निकृष्टतमा | निकृष्टतमम् |
| जड़ः | (मूर्ख) | तमप् | जड़तमः | जड़तमा | जड़तमम् |
| महत् | (महान्) | तमप् | महत्तमः | महत्तमा | महत्तमम् |
| विद्वत् | (विद्वान्) | तमप् | विद्वत्तमः | विद्वत्तमा | विद्वत्तमम् |
6. 'तरप् प्रत्यय- दो वस्तुओं में से एक को श्रेष्ठ या निकृष्ट बताने के लिए शब्द में 'तरप्' प्रत्यय जोड़ा जाता है। इसमें से 'तर' शेष रहता है और इसके तीनों लिंगों में रूप चलते हैं। 'तरप्' प्रत्यय विशेषण शब्दों में लगता है। पुल्लिंग में इस प्रत्यय से बने शब्दों के रूप 'राम' के समान, स्त्रीलिंग में 'रमा' के समान तथा नपुंसलिंग में 'फल' के समान चलते हैं। जैसे-
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) | प्रत्यय (Suffix) | पुल्लिंग (Masculine) | स्त्रीलिंग (Feminine) | नपुंसकलिंग (Neuter) |
|---|---|---|---|---|---|
| चतुरः | (चतुर) | तरप् | चतुरतरः | चतुरतरा | चतुरतरम् |
| मृदुः | (कोमल) | तरप् | मृदुतरः | मृदुतरा | मृदुतरम् |
| गुरुः | (भारी) | तरप् | गुरुतरः | गुरुतरा | गुरुतरम् |
| पटुः | (चतुर) | तरप् | पटुतरः | पटुतरा | पटुतरम् |
| उच्चः | (ऊँचा) | तरप् | उच्चतरः | उच्चतरा | उच्चतरम् |
| निम्नः | (नीचा) | तरप् | निम्नतरः | निम्नतरा | निम्नतरम् |
| प्रियः | (प्यारा) | तरप् | प्रियतरः | प्रियतरा | प्रियतरम् |
| अल्पः | (छोटा) | तरप् | अल्पतरः | अल्पतरा | अल्पतरम् |
| लघुः | (छोटा) | तरप् | लघुतरः | लघुतरा | लघुतरम् |
| बहुः | (बहुत) | तरप् | बहुतरः | बहुतरा | बहुतरम् |
| सुन्दरः | (सुन्दर) | तरप् | सुन्दरतरः | सुन्दरतरा | सुन्दरतरम् |
| कृशः | (दुर्बल) | तरप् | कृशतरः | कृशतरा | कृशतरम् |
| अन्यः | (दूसरा) | तरप् | अन्यतरः | अन्यतरा | अन्यतरम् |
| दूरः | (दूर) | तरप् | दूरतरः | दूरतरा | दूरतरम् |
| दीर्घः | (बड़ा) | तरप् | दीर्घतरः | दीर्घतरा | दीर्घतरम् |
| स्थिरः | (स्थिर) | तरप् | स्थिरतरः | स्थिरतरा | स्थिरतरम् |
| स्थूलः | (भारी) | तरप् | स्थूलतरः | स्थूलतरा | स्थूलतरम् |
(3) स्त्री प्रत्यय
जो प्रत्यय पुल्लिंग शब्दों से स्त्रीलिंग शब्द बनाने के लिए लगाए जाते हैं, उन्हें स्त्री प्रत्यय कहते हैं। टाप्, ङीप्, ङीष्, छीन्, ऊङ, ति इत्यादि स्त्री प्रत्यय हैं।
1. टाप् प्रत्यय- पुल्लिंग से स्त्रीलिंग शब्द बनाने के लिए अजादिगण के शब्दों से, अकारान्त शब्दों से तथा प्रत्यय के 'अक' अन्त वाले शब्दों में 'टाप्' प्रत्यय लगता है। इसमें से 'आ' शेष रहता है। जैसे-
| मूल शब्द (Root Word) | प्रत्यय (Suffix) | स्त्रीलिंग शब्द (Feminine Word) | मूल शब्द (Root Word) | प्रत्यय (Suffix) | स्त्रीलिंग शब्द (Feminine Word) |
|---|---|---|---|---|---|
| पटक | टाप् (आ) | चटका | ज्यष्ठ | टाप् (आ) | ज्यष्ठा |
| बाल | टाप् (आ) | बाला | मन्द | टाप् (आ) | मन्दा |
| वैश्य | टाप् (आ) | वैश्या | वत्स | टाप् (आ) | वत्सा |
| क्षत्रिय | टाप् (आ) | क्षत्रिया | शूद्र | टाप् (आ) | शूद्रा |
| शंक | टाप् (आ) | शंका | मूषक | टाप् (आ) | मूषिका |
| गंग | टाप् (आ) | गंगा |
(ii) अकारान्त शब्दों से
| मूल शब्द (Root Word) | प्रत्यय (Suffix) | स्त्रीलिंग शब्द (Feminine Word) | मूल शब्द (Root Word) | प्रत्यय (Suffix) | स्त्रीलिंग शब्द (Feminine Word) |
|---|---|---|---|---|---|
| मध्यम | टाप् (आ) | मध्यमा | सरल | टाप् (आ) | सरला |
| चपल | टाप् (आ) | चपला | चतुर | टाप् (आ) | चतुरा |
| उत्तम | टाप् (आ) | उत्तमा | चञ्चल | टाप् (आ) | चञ्चला |
| प्रथम | टाप् (आ) | प्रथमा | दक्ष | टाप् (आ) | दक्षा |
| द्वितीय | टाप् (आ) | द्वितीया | क्रूर | टाप् (आ) | क्रूरा |
(iii) जिन शब्दों के अन्त में प्रत्यय का 'अक' हो उनमें 'टाप्' लगाने पर 'अक' का 'इक' करके 'आ' लगाया जाता है। जैसे-
| मूल शब्द (Root Word) | प्रत्यय (Suffix) | निर्मित शब्द (Derived Word) | मूल शब्द (Root Word) | प्रत्यय (Suffix) | निर्मित शब्द (Derived Word) |
|---|---|---|---|---|---|
| बालक | टाप् (आ) | बालिका | परिचारक | टाप् (आ) | परिचारिका |
| गायक | टाप् (आ) | गायिका | नायक | टाप् (आ) | नायिका |
| चालक | टाप् (आ) | चालिका | पालक | टाप् (आ) | पालिका |
| धावक | टाप् (आ) | धाविका | श्रावक | टाप् (आ) | श्राविका |
| याचक | टाप् (आ) | याचिका | वाचक | टाप् (आ) | वाचिका |
| शायक | टाप् (आ) | शायिका | स्थापक | टाप् (आ) | स्थापिका |
| दायक | टाप् (आ) | दायिका | साधक | टाप् (आ) | साधिका |
| घातक | टाप् (आ) | घातिका | मूषक | टाप् (आ) | मूषिका |
| वादक | टाप् (आ) | वादिका | सूचक | टाप् (आ) | सूचिका |
| प्रसारक | टाप् (आ) | प्रसारिका | प्रचारक | टाप् (आ) | प्रचारिका |
| पाठक | टाप् (आ) | पाठिका | नामक | टाप् (आ) | नामिका |
| कारक | टाप् (आ) | कारिका | सूतक | टाप् (आ) | सूतिका |
2. ङीष् प्रत्यय- 'षिद्गौरादिभ्यश्च'-जहाँ 'ष' का लोप हुआ हो (षित्) तथा गौर, नर्तक, नट, द्रोण, पुष्कर आदि गौरादिगण में पठित शब्दों से स्त्रीलिंग में 'ङीष्' (ई) प्रत्यय होता है।
| पुल्लिंग शब्द (Masculine Word) | प्रत्यय (Suffix) | स्त्रीलिंग शब्द (Feminine Word) | पुल्लिंग शब्द (Masculine Word) | प्रत्यय (Suffix) | स्त्रीलिंग शब्द (Feminine Word) |
|---|---|---|---|---|---|
| आचार्य | ङीष् | आचार्याणी | शूद्र | ङीष् | शूद्री |
| यवन | ङीष् | यवनानी | ब्राह्मण | ङीष् | ब्राह्मणी |
| मातुल | ङीष् | मातुलानी | मृग | ङीष् | मृगी |
अन्य उदाहरण
निम्नलिखित शब्दों से 'ङीप्' के स्थान पर 'ङीष्' प्रत्यय लगता है। इसमें भी 'ई' ही लगता है। जैसे-
(i) गौरादि गण के शब्दों में-
| पुल्लिंग शब्द (Masculine Word) | प्रत्यय (Suffix) | स्त्रीलिंग शब्द (Feminine Word) | पुल्लिंग शब्द (Masculine Word) | प्रत्यय (Suffix) | स्त्रीलिंग शब्द (Feminine Word) |
|---|---|---|---|---|---|
| गौर | \( + \text{ ङीष्} \) | गौरी | मत्स्य | \( + \text{ ङीष्} \) | मत्स्यी |
| द्रोण | \( + \text{ ङीष्} \) | द्रोणी | पुष्कर | \( + \text{ ङीष्} \) | पुष्करी |
| मातामह | \( + \text{ ङीष्} \) | मातामही | पितामह | \( + \text{ ङीष्} \) | पितामही |
| महत् | \( + \text{ ङीष्} \) | महती | बदर | \( + \text{ ङीष्} \) | बदरी |
| भृङ्ग | \( + \text{ ङीष्} \) | भृङ्गी | नर्तक | \( + \text{ ङीष्} \) | नर्तकी |
| मनुष्य | \( + \text{ ङीष्} \) | मनुषी | माधुर्य | \( + \text{ ङीष्} \) | माधुरी |
(ii) गुणवाचक 'उ' अन्त वाले शब्दों से
| पुल्लिंग शब्द (Masculine Word) | प्रत्यय (Suffix) | स्त्रीलिंग शब्द (Feminine Word) | पुल्लिंग शब्द (Masculine Word) | प्रत्यय (Suffix) | स्त्रीलिंग शब्द (Feminine Word) |
|---|---|---|---|---|---|
| मृदु | \( + \text{ ङीष्} \) | मृद्वी | पटु | \( + \text{ ङीष्} \) | पट्वी |
| लघु | \( + \text{ ङीष्} \) | लघ्वी | साधु | \( + \text{ ङीष्} \) | साध्वी |
| मधु | \( + \text{ ङीष्} \) | मध्वी | बहु | \( + \text{ ङीष्} \) | बह्वी |
(iii) निम्नलिखित शब्दों में शब्द के पश्चात् आनुक् (आन्) लगाकर ङीष् का 'ई' लगाया जाता है
| पुल्लिंग शब्द (Masculine Word) | प्रत्यय (Suffix) | स्त्रीलिंग शब्द (Feminine Word) | पुल्लिंग शब्द (Masculine Word) | प्रत्यय (Suffix) | स्त्रीलिंग शब्द (Feminine Word) |
|---|---|---|---|---|---|
| इन्द्र | \( + \text{ ङीष्} \) | इन्द्राणी | वरुण | \( + \text{ ङीष्} \) | वरुणानी |
| भव | \( + \text{ ङीष्} \) | भवानी | शर्व | \( + \text{ ङीष्} \) | शर्वाणी |
| मातुल | \( + \text{ ङीष्} \) | मातुलानी | रुद्र | \( + \text{ ङीष्} \) | रुद्राणी |
| आचार्य | \( + \text{ ङीष्} \) | आचार्याणी | आर्य | \( + \text{ ङीष्} \) | आर्याणी |
| क्षत्रिय | \( + \text{ ङीष्} \) | क्षत्रियाणी | उपाध्याय | \( + \text{ ङीष्} \) | उपाध्यायानी |
| हिम | \( + \text{ ङीष्} \) | हिमानी | अरण्य | \( + \text{ ङीष्} \) | अरण्यानी। |
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