NCERT Class 7 Hindi Malhar Chapter 05 Nahin Hona Beemar (नहीं होना बीमार) PDF Download

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पाठ 5: नहीं होना बीमार

एक दिन मुझे साथ लेकर नानीजी हमारे पड़ोसी सुधाकर काका को देखने गई, जो बीमार था वे अस्पताल में भर्ती थे अस्पताल जाने का यह मेरा पहला अवसर था।

एक बड़े से वार्ड में कई एक जैसे पलंग लाइन से लगे हुए थे सब पर एक जैसी सफ़ेद चादर और लाल कुशला सफ़ेद दीवारें, ऊँची छत, खिड़कियों पर हरे पर्दे और फर्श एकदम चमकता हुआ एक पलंग पर सुधाकर काका लेटे हुए थे एकदम पास पहुँचने पर दिखाई दिया।

हमें देखकर सुधाकर काका जैसे खुश हो गया। नानीजी ने उनके सिर पर हाथ फेरा और उनके सिराहने खड़ी हो गई और हालचाल पूछने लगीं।

अस्पताल का माहौल मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था। बड़ी-बड़ी खिड़कियों के पास हरे-हरे पेड़ झम रहे थे न ट्रैफिक का शोरगुल, न धूल, न मच्छर-मखौड़ी...। सिर्फ लोगों के धीरे-धीरे बातचीत करने की धीमी-धीमी गुनगुना बाकी एकदम शांति।

तभी सफ़ेद कपड़ों में एक नर्स आई। नर्स ने नानीजी को देखकर अभिवादन में सिर हिलाया।

और काका को दवा खिलाई। नानीजी काका के लिए सब्जियों की खीर बनाकर लाई थी। नर्स से पूछा कि खिला दूँ? नर्स के हाँ कहने पर दिखाई दिया।

हमें देखकर सुधाकर काका जैसे खुश हो गया। नानीजी ने उनके सिर पर हाथ फेरा और उनके सिराहने खड़ी हो गई और हालचाल पूछने लगीं।

"क्या हो गया??"

"मेरे सिर में दर्द हो रहा है पेट भी दुख रहा है और मुझे बुखार भी है।"

नानीजी चली गईं।

मैं रजाई में पड़ा-पड़ा घर में चल रही गतिविधियों का अनुमान लगाता रहा। अब छोटे मामा नहाकर निकले अब कुमार मोसी रोज की तरह नाश्ता छोड़कर कॉलेज बस पकड़ने भागी। अब मुन्न अपना जूता दूंड रहा है। तेजराम की वकान पर कितने ग्राहक बैठे हैं? महेश भी सेंटर ने।

क्या मरीबत है। पड़े रहो! आखिर कब तक कोई पड़ा रह सकता है? इससे तो स्कूल चला जाता तो हो ठीक रहता सजा मिलती तो मिल जाती। कितना मजा आता जब रिसेस में टेले पर जाकर नमक मिर्च लगे अमरुद खाते कट-कट!।

फिर झापकी लग गई।

लेकिन भूख के कारण ठीक से नींद भी नहीं आ रही थी और आँखें जरा लगातीं भी तो खाने ही खाने की चीजें दिखाई देती गर्मागर्म खस्ता कचौड़ी...। माँ की बर्फी... बेसन की चिक्कि...। गोलगप्पे। और सबसे ऊपर साबूदाने की खीर! पता नहीं क्यों साबूदाने की खीर सिर्फ उपवास और बीमारी में ही बनाई जाती है। जैसे गुड़िया सिर्फ होली-दिवाली और पंजिरे के दिन ही बनाई जाती है। क्यों? क्या ये चीजें जब इच्छा हो तब नहीं बनाई जा सकतीं कोई मना करता है?

हे भगवान! यह तो अच्छी खासी बीमारियत हो गई पूरा दिन कोई कैसे लेटा रहे? और शाम को...। क्या शाम को भी नानीजी बाहर जाने वेंगे? सारे बच्चे हल्ला मचाते हुए आँगन में खेल रहे होंगे और मैं बिस्तर में पड़ा झाख मार रहा होऊँगा। अकलमंद! और बना बीमारा! और आज दिया गया होमवर्क! किसके कारपी माँगोगी? मैं रुआँसा हो गया।

पास के क्षेत्र में होती खटर-पटर से अंदाजा हुआ कि मुन्न स्कूल से आ गया है तो क्या एक बज गया? अब बस्तों की सवांज आ रही है। शायद सब लोग खाना खाने बैठ रहे हैं। मुन्न एक बार भी मुझे देखने नहीं आया। आया भी हो गया। पास के क्षेत्र में होती खटर-पटर से अंदाजा हुआ कि मुन्न स्कूल से आ गया है तो क्या एक बज गया? अब बस्तों की सवांज आ रही है। शायद सब लोग खाना खाने बैठ रहे हैं। मुन्न एक बार भी मुझे देखने नहीं आया। आया भी हो गया। तो क्या?

...खो खाना खा रहे हो। खुशबू तो दाल-चावल की आ रही है। अरहर की दाल में हींग-जीरे का बधार और ऊपर से बारीक कटा हुआ धनिया और आधा चम्मच देसी घी। फिर उसमें उन्होंने नीब निचोड़ा होगा। थोड़ा-सा इस बीमार को भी दे देकी।

...लेकिन खुशबू तो किसी और चीज की है। क्या हरी मिर्च तली गई है? उसे दाल-चावल में मसलकर खा रहें हैं। जब रहा नहीं गया तो मैं रजाई फेंककर खड़ा हो गया। दूसरे पहले और फर्श एकदम चमकता हुआ।

हाँ, दाल-चावल, तली हुई हरी मिर्ची

लेकिन मुन्न आम चूस रहा था। आम! इस मौसम में! जरुर बंबई वाले चाचाजी ने भेजे होंगे। कैसे चूस रहा है। पूरी गुडली मुँह में घुसेड़ दी। ऊसर मोहम्मा मा! जरुर बंबई वाले चाचाजी ने भेजे होंगे। कैसे चूस रहा है। पूरी गुडली मुँह में घुसेड़ दी। कमसे कम एक बार आकर नहीं पूछा कि तु क्या खाएगा? पूछते तो मैं साबूदाने की खीर ही तो माँगता हूँ?

...नो खाना खा रहे हो। चबाने की आवाजें आ रहीं हैं। देखो! उन्होंने एक बार भी आकर नहीं पूछा कि तु क्या खाएगा? पूछते तो मैं साबूदाने की खीर ही तो माँगता हूँ?

शिक्षक की टिप्पणी

इस कहानी का नायक एक बीमार बच्चा है जो घर में अकेला है। जब शरीर में दर्द होता है और मन उदास होता है, तब बहुत छोटी-छोटी बातें भी बड़ी लगने लगती हैं। कहानी में बच्चे के मन की उथल-पुथल को देखिए - कभी वह भूख की शिकायत करता है, कभी अकेलेपन से रोता है, कभी दूसरों को देखकर ईर्ष्या करता है। यह बीमारी की असली पीड़ा है।

लेखक से परिचय

स्वयं प्रकाश हिंदी के जाने-माने लेखक थे। उनकी कहानियाँ बच्चों और बड़ों के दिलों को छू जाती हैं। स्वयं प्रकाश की कहानियों पढ़ते हुए लगता है मानो वे हमारे ही जीवन की कहानियाँ हैं। हमारी ही अनुभव उन्होंने लिख दिए हैं। उन्होंने बच्चों के लिए कई मनोरंजक कहानियाँ लिखीं हैं, जिनमें उनके साहित्यिक कारनामें, मित्रता और जीवन के छोटे-छोटे लेकिन महत्वपूर्ण पहलुओं का बड़ी रोचकता से प्रस्तुत किया गया है।

स्वयं प्रकाश की कहानियों की विशेषता यह है कि उन्हें पढ़ते समय ऐसा लगता है, जैसे कोई पुराना मित्र बात कर रहा हो। उनकी कहानियों ने केवल मनोरंजन नहीं की, बल्कि सोचने-समझने के लिए नई दिशाएं भी देती हैं। माता और भाग, अगली किताब, ज्योति रथ के साथी, फीनिक्स आदि इनकी कई रचनाएं हैं।

शिक्षक की टिप्पणी

आप इस कहानी को पढ़ते समय ध्यान दीजिए कि लेखक ने बीमार बच्चे के मन की दुनिया को कितनी सूक्ष्मता से दिखाया है। जब आप अकेले या बीमार होते हो, तो क्या आपका मन भी ऐसे ही इधर-उधर भटकता है? कहानी खत्म होने से पहले ही सोच लीजिए कि अगर आप बीमार होते तो क्या चाहते?

मुख्य बिंदु

  • जब हम बीमार होते हैं तो हमारा मन बहुत अशांत रहता है और छोटी-छोटी बातें भी बड़ी लगने लगती हैं।
  • अकेलापन और बीमारी मिलकर हमें उदास और ईर्ष्यालु बना देते हैं, जैसे कहानी में बच्चा अपने भाई को खाना खाते देखकर दुखी हो जाता है।
  • बीमारी के दिनों में घर का माहौल, खाने की चीजें, और आसपास की गतिविधियाँ - सब कुछ हमारे ध्यान में आता है और सब कुछ हमें अधूरा लगता है।
  • परिवार के सदस्यों का साथ और प्रेम ही बीमारी के कड़वे दिनों को सहने लायक बना देते हैं।

यह अध्याय के पहले 5 पृष्ठों का पूर्वावलोकन है। पूरा अध्याय पाने के लिए नीचे क्लिक करें।

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