Official GSEB Solutions for Class 9 Hindi: निबंध लेखन (1st Language)
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Chapter-wise Solutions for Hindi: निबंध लेखन (1st Language)
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निबंध गद्य रचना का श्रेष्ठ रूप है। विषय की अच्छी प्रस्तुति, लेखकीय व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति और भाषा का सटीक, स्पष्ट रूप - ये तीनों ही अच्छे निबंध की मुख्य बातें हैं।
हमारे अनुभव या ज्ञान का कोई भी क्षेत्र अथवा हमारी कल्पना निबंध का विषय हो सकता है: जैसे - विज्ञान, दीपावली, चाँदनी रात, प्रातःकाल, सत्संगति, मित्रता, भिखारी, हिमालय आदि। रचना के हिसाब से निबंध की नीचे दी गई विशेषताएँ हैं:
1. निबंध के वाक्य आपस में जुड़े होते हैं। विचारों में कारण-कार्य संबंध बना रहता है।
2. भाषा विषय के अनुसार होनी चाहिए। गंभीर, चिंतन प्रधान, साहित्यिक विषयों के निबंधों में अक्सर तत्सम शब्दावली का उपयोग होता है, जबकि सरल-सामान्य विषयों के निबंधों में बोलचाल की भाषा होती है।
3. निबंध को प्रभावी और दिलचस्प बनाने के लिए सही जगहों पर उपयुक्त उदाहरणों, लोकोक्तियों, मुहावरों और सूक्तियों का इस्तेमाल करना चाहिए।
प्रस्तुतिकरण के दृष्टिकोण से निबंध के निम्नलिखित प्रकार हैं:
1. वर्णनात्मक (किसी त्योहार का वर्णन, मेले का वर्णन, क्रिकेट मैच का वर्णन आदि)
2. विवरणात्मक (ताजमहल, मेरी पाठशाला आदि)
3. भाव प्रधान (मेरी माँ मेरा प्रिय मित्र आदि।)
5. कल्पना प्रधान (यदि में पक्षी होता, यदि मैं प्रधानमंत्री होता...)
निबंध-लेखन की पूर्व तैयारी:
निबंध लिखने से पहले विषय के अलग-अलग मुद्दों पर सोचना जरूरी है। शिक्षक या दोस्तों के साथ बातचीत करके पहले निबंध की रूपरेखा बना लेनी चाहिए, ताकि कोई बात या बिंदु छूटे नहीं।
रूपरेखा तैयार कर लेने के बाद उससे जुड़ी सामग्री को अलग-अलग स्रोतों से इकट्ठा करना फायदेमंद होता है। (विषय के अनुसार उदाहरणों, उद्धरणों, सूक्तियों, बातों, प्रमाणों का इस्तेमाल)।
रूपरेखा के आधार पर निबंध लिखते समय छात्रों को अपने अनुभव भी प्रसंगानुसार शामिल करने चाहिए।
निबंध के मुख्य भाग को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है - प्रस्तावना या भूमिका, मुख्य अंश और उपसंहार।
प्रस्तावना:
यह निबंध की नींव होती है, इसलिए इसका संक्षिप्त और प्रभावशाली होना बहुत जरूरी है। प्रस्तावना ऐसी होनी चाहिए कि उसे पढ़ने पर पाठक के मन में आगे पढ़ने की उत्सुकता पैदा हो। निबंध का पहला अनुच्छेद ही उसकी प्रस्तावना होती है। इसमें निबंध के विषय के मुख्य बिंदुओं को संक्षिप्त रूप में पेश करना चाहिए।
मुख्य अंश:
प्रस्तावना के बाद और उपसंहार के पहले तक का निबंध का मुख्य हिस्सा माना जाता है। विषयवस्तु को अलग-अलग अनुच्छेदों में बांटकर अपनी बात कहनी चाहिए। ये अनुच्छेद आपस में संबंधित होने चाहिए। मुख्य हिस्से में चार-पांच छोटे अनुच्छेदों में केवल एक ही भाव या विचार रहना चाहिए। यह विभाजन सही और तर्कसंगत होना चाहिए।
उपसंहार:
यह निबंध का आखिरी भाग है। यह भी अक्सर एक अनुच्छेद का होता है। इसमें विषयवस्तु के विवेचन के आधार पर निष्कर्ष पेश किया जाता है। निष्कर्ष में लेखक के विचार या प्रतिक्रिया हो सकती है। उपसंहार स्पष्ट, सुगठित और तर्कसंगत होना चाहिए जिससे पाठक पर स्थायी प्रभाव पड़ सके।
उदाहरण: अपनी पाठ्यपुस्तक का 'तर्क और विश्वास' शीर्षक पाठ देखिए।
नमूने के कुछ निबंध यहाँ दिए जा रहे हैं।
1. गुजरात का नवरात्रि महोत्सव - गरबा
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। यहाँ हर धर्म, संप्रदाय और जाति के लोग अपने-अपने त्योहारों को बहुत धूमधाम से मनाते हैं। इसीलिए भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है। यहाँ हर बार एक त्योहार होता है। हमारे देश में कई प्रकार के त्योहार मनाए जाते हैं जैसे धार्मिक, सामाजिक, राष्ट्रीय आदि। गुजरात का गरबा महोत्सव एक धार्मिक त्योहार है।
यह त्योहार शरद ऋतु के सुंदर वातावरण में आश्विन शुक्ल महीने में धूमधाम और खुशियों के साथ मनाया जाता है।
नवरात्रि नौ रातों में मनाया जाने वाला त्योहार है इसीलिए इसे नवरात्रि कहते हैं। नौ दिनों तक लोग रात को गरबा खेलते हैं और इसके दसवें दिन विजया दशमी मनाते हैं। इस त्योहार को इसलिए मनाते हैं, क्योंकि माता रानी अम्बा ने इस दिन अत्याचारी महिषासुर का वध किया था। नौ दिनों तक उनके बीच युद्ध चला और दसवें दिन अत्याचारी महिषासुर का संहार करके अत्याचार का अंत किया। इसीलिए हर साल यह नवरात्रि महोत्सव मनाया जाता है।
भारत के कई राज्य अपने-अपने लोकनृत्यों के लिए प्रसिद्ध हैं जैसे पंजाब का भांगड़ा नृत्य, असम का बिहु नृत्य, राजस्थान का घूमर, घेर। इसी प्रकार गुजरात का लोकनृत्य गरबा न केवल गुजरात और भारत में, बल्कि पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।
लोग अपने-अपने गली-मोहल्ले में इकट्ठा होकर गोलाकार रूप में गरबा नृत्य करते हैं और अपनी-अपनी मस्ती में पूरी तरह डूबकर झूमने लगते हैं। भक्ति और संगीत का एक अद्भुत माहौल बन जाता है। एक तरफ गायक अपनी मस्ती में माताजी के भजन गाता है तो दूसरी तरफ भक्तजन उसी ताल और लय में झूमने लगते हैं। बीच में माताजी की गरबी रखी जाती है और उसी के आस-पास गोलाकार रूप में भक्तिरस में डूबकर गाते और झूमते हैं। गरबा लोक नृत्य शुरू होने से पहले और खत्म होने के बाद आरती की जाती है। यह क्रम नौ दिन तक चलता है। दसवें दिन दशहरा मनाया जाता है। गुजरात में इस दिन फाफड़ा और जलेबी खाते हैं। दशहरा और नवरात्रि दोनों बुराई पर अच्छाई की, अधर्म पर धर्म की जीत के प्रतीक हैं।
आधुनिक समय में गरबा के मूल रूप में बदलाव हुआ है। गरबा के गीत (गरबी) माताजी से जुड़े हुए नहीं रहे, बल्कि उनमें वर्तमान विषयों का भी समावेश हुआ है। समसामयिक घटनाएँ भी इन गीतों में बुनी जाती हैं। नृत्य पर भी आधुनिकता का असर दिखाई देता है। अब गरबा मोहल्ले और सोसाइटियों से निकलकर बड़े-बड़े क्लबों तक पहुंच गया है। इनमें भक्ति की जगह मनोरंजन, प्रदर्शन लेता जा रहा है, जो एक दुःखद स्थिति है।
गरबा महोत्सव की एक सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस लोक उत्सव में सभी लोग अमीर-गरीब, ऊँच-नीच तथा जाति-पाति का भेद-भाव भूलकर केवल भक्ति और प्रेम रस में डूब जाते हैं। मतलब यह महोत्सव आपस में प्रेम, एकता और भाईचारे की भावना बढ़ाने वाला त्योहार है। यह त्योहार जीत का त्योहार है। हम जीवन में हर क्षेत्र में विजयी बनें और धर्म, न्याय तथा मानवता की रक्षा करें ऐसा संदेश देता है। निःसंदेह यह अनोखा और अद्वितीय त्योहार है। इसमें कोई संदेह नहीं।
2. यदि मैं गुजरात का मुख्यमंत्री होता...
व्यक्ति अपने भविष्य को लेकर कई तरह के सपने देखता रहता है, जो उसकी सोच को भी दिखाते हैं। व्यक्ति की बड़ी इच्छाएँ ही उन सपनों का मूल कारण हैं। मैं अपने जीवन में नेता बनने तथा मुख्यमंत्री पद पर पहुंचने का सपना देखता रहता हूँ। मेरी एकमात्र बड़ी इच्छा गुजरात राज्य का मुख्यमंत्री बनने की है। मुख्यमंत्री पद पर पहुंचकर मैं लोगों की भलाई के काम कर सकूँ तथा गुजरात को उन्नति की ऊंचाईयों पर पहुंचाऊँ ऐसी मेरी इच्छा है।
मुख्यमंत्री पद संभालने पर मेरी सबसे पहली प्राथमिकता राज्य में कानून-व्यवस्था को एकदम सही करना होगा, ताकि राज्य का हर नागरिक बिना डर के अपना काम कर सके। स्त्रियों को किसी प्रकार का डर महसूस न हो, वे स्वतंत्र रूप से घूम सकें। व्यापार-उद्योग के संचालक तथा कर्मचारी अपना-अपना काम नियमों के अनुसार करते रहें। देर रात में भी यदि किसी को आना-जाना पड़े तो वह डरा हुआ न हो। चोरी, छीन-झपट रोकने के लिए पुख्ता व्यवस्था रखना भी इसी के अंतर्गत होगा।
राज्य का हर नागरिक चाहे वह अमीर हो या गरीब, किसी भी धर्म या जाति का हो, राज्य की ओर से सबके साथ एक जैसा व्यवहार होगा, किसी तरह का भेदभाव नहीं रहेगा। सभी अपने राज्य को सुरक्षित महसूस कर सकें, ऐसा शासन प्रदान करना मेरा मुख्य लक्ष्य होगा।
शासन-व्यवस्था के बाद दूसरा क्षेत्र शिक्षा का होगा। हर विद्यार्थी को अच्छी शिक्षा मिले, इसे देखने का काम राज्य सरकार का होगा। अभी तक हमारे यहाँ लड़कियों के लिए मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था है, उसे और आगे बढ़ाकर लड़कों की शिक्षा भी मुफ्त कर सकूँ, तो मैंने अपने कर्तव्य का पालन किया, ऐसा समझूंगा। रोजगार-संबंधी शिक्षा को बढ़ावा दिया जाएगा ताकि विद्यार्थी केवल डिग्रीधारी युवक न बनकर काम के लिए कुशल (skilled) कारीगर के रूप में रोजगार के लिए तैयार हो सकें। नए-नए इनोवेशन, उद्यमी साहस को प्रोत्साहित किया जाएगा ताकि पढ़े-लिखे युवक केवल नौकरी की तलाश में ही न भटकते रहें। इस तरह शिक्षा बेरोजगारी दूर करने का माध्यम बन सकेगी।
कृषि तथा कृषि पर आधारित विभिन्न उद्योगों को प्रोत्साहन दिया जाएगा ताकि ग्रामीणों को उनके अपने निवास के पास रोजगार के अवसर मिल सकें। मुर्गीपालन, पशुपालन, मधुमक्खी पालन, बागबानी आदि के लिए आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराकर युवकों को स्वरोजगार मिले, ऐसे प्रयास किए जाएंगे। रोजगार मिलने से लोगों की सालाना आय में वृद्धि होगी, राज्य समृद्ध होगा। 'प्रजा की खुशी में ही राजा की खुशी होनी चाहिए' - चाणक्य के इस सूत्र वाक्य को हमेशा ध्यान में रखकर काम करूंगा। नियम-कानून बनाते समय हाशिए पर खड़े व्यक्ति को ध्यान में रखा जाएगा। पीने के पानी की आपूर्ति हर जगह होगी, ताकि लोगों को पीने का साफ पानी मिले। वे निरोगी-स्वस्थ बने रहें।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया।
3. राष्ट्रभाषा - हिन्दी
हर राष्ट्र का अपना स्वतंत्र अस्तित्व होता है। हर राष्ट्र में उसकी विशालता के अनुसार विभिन्न प्रांत होते हैं और अक्सर प्रांतीय भाषाएँ अलग-अलग होती हैं। पूरे राष्ट्र का शासन एक ही केंद्र से होता है। राष्ट्र की एकता को मजबूत बनाने के लिए किसी एक ऐसी भाषा की जरूरत होती है जिसके माध्यम से राष्ट्र के ज्यादातर काम पूरे होते हैं। ऐसी भाषा को राष्ट्र भाषा कहा जा सकता है। प्रांतीय भाषा का क्षेत्र सीमित होता है, राष्ट्रभाषा का बड़ा और व्यापक क्षेत्र होता है। प्रांतीय भाषा जरूरी है, प्रांतीय कामकाज के लिए। प्रांतीय भाषाओं से राष्ट्र का काम नहीं चल सकता। पूरे राष्ट्र का काम एक ही भाषा के माध्यम से हो सके इसलिए राष्ट्रभाषा की आवश्यकता होती है।
राष्ट्रभाषा के लिए जरूरी गुण - आमतौर पर किसी भी देश की राष्ट्रभाषा में निम्नलिखित विशेषताएँ होनी ही चाहिए -
1. राष्ट्रभाषा राष्ट्र की अधिकांश जनता की भाषा होनी चाहिए।
2. उसे लिखने-पढ़नेवाले और समझनेवाले लगभग सभी प्रांतों में होने चाहिए।
3. वह हर प्रकार के ज्ञान-विज्ञान की बातें व्यक्त करने में सक्षम होनी चाहिए।
4. राष्ट्रभाषा की लिपि सुंदर और सरल होनी चाहिए।
5. उसकी वर्णमाला हर प्रकार की ध्वनि को व्यक्त और स्पष्ट करने में सक्षम होनी चाहिए।
6. यह राष्ट्रीय चेतना के अनुरूप होनी चाहिए।
7. उस भाषा का साहित्य समृद्ध होना चाहिए।
उक्त सभी विशेषताएँ हिन्दी भाषा में मिलती हैं, जैसे:
1. हिन्दी राष्ट्र की अधिकांश जनता की बोली जाने वाली भाषा है।
2. हिन्दी को लिखने, पढ़ने और समझनेवाले हर प्रांत में मिलते हैं।
3. हिन्दी भाषा संस्कृत भाषा के अधिक पास है और संस्कृत भाषा के शब्द अक्सर सभी भाषाओं में मिलते हैं।
4. हिन्दी भाषा की लिपि सुंदर, सरल है। हिन्दी विश्व की एकमात्र वैज्ञानिक वर्णमाला वाली भाषा है, जो हर ध्वनि को व्यक्त करने में सक्षम है।
5. हिन्दी भाषा का साहित्य समृद्ध है।
6. हिन्दी भाषा स्वयं वैज्ञानिक होने के साथ-साथ इसमें वैज्ञानिक तत्वों को ग्रहण करने की क्षमता है। विज्ञान से जुड़ी शब्दावली का हिन्दी में रूपांतरण सरलता से हो सकता है।
7. हिन्दी भाषा की लिपि देवनागरी है, जिसमें संस्कृत, पाली, प्राकृत आदि प्राचीन भाषाएँ लिखी गई हैं। इसी से मिलती-जुलती लिपि में गुजराती, पाली, प्राकृत आदि प्राचीन भाषाएँ लिखी जाती हैं।
इसलिए यह अक्सर अधिकतर प्रांतों में लिखने में सरल बन जाती है। ऊपर बताई गई सभी विशेषताओं को देखते हुए हिन्दी ही राष्ट्रभाषा के मानदंडों पर सही उतरती है, इसीलिए हिन्दी को राष्ट्रभाषा का स्थान दिया गया है।
देश को स्वतंत्र हुए साठ साल से ज्यादा हो गए फिर भी कुछ प्रांत हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सम्मान नहीं दे रहे हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं। जैसे -
1. कुछ स्वार्थी नेताओं की स्वार्थी भावनाएँ उन्हें राष्ट्र हित की नहीं अपने हित की चिंता सताती रहती है। वे अपनी भाषा का राग अलाप कर अपने प्रांत पर छा जाना चाहते हैं।
2. कुछ लोगों की भावनाएँ इतनी संकीर्ण होती हैं कि वे सोचते हैं यदि हिन्दी को हमने राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया तो हिन्दी भाषी हमारे ऊपर छा जाएंगे।
3. कुछ लोग जिनके दिमाग में अभी भी गुलामी की बू है, जिनके बच्चे विदेशों में अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं वे जन-संपर्क और राष्ट्र का ज्यादातर काम अंग्रेजी में चाहते हैं जिससे आम जनता पर उनका प्रभुत्व बना रहे।
कुछ लोग जो किसी भी कारण से राष्ट्र-भाषा हिन्दी को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं वे राष्ट्र का अहित कर रहे हैं। उन्हें राष्ट्र की एकता, समृद्धि, सांस्कृतिक विकास और राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने के लिए हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में अपनाना चाहिए। इसी में उनका हित है, राष्ट्र का हित है। हमें भारतेन्दु बाबू की इन पंक्तियों का ध्यान रखना चाहिए -
निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल। बिनु निज भाषा ज्ञान के मिट तन हिय को शूल।।
4. मेरे जीवन का लक्ष्य
हमारे जीवन का कोई न कोई एक लक्ष्य जरूर होना चाहिए। किन्तु यह समझते-समझते हम 13-14 वर्ष की उम्र तक पहुंच जाते हैं। आठवीं कक्षा में पढ़ते समय यह तय कर लेना चाहिए कि आगे मुझे क्या करना है? कैसे करना है? यह हमारी क्षमता, परिस्थिति तथा योग्यता के अनुसार हो, तभी हम उस लक्ष्य को पाने में सफल हो सकेंगे।
मनुष्य को अपनी आजीविका के लिए ऐसे क्षेत्र का चुनाव करना चाहिए जिसमें उसकी रुचि हो। परिवार, सगे-संबंधियों या मित्रों के कहने में आकर अपनी रुचि के विपरीत क्षेत्र में जाने वाले अच्छे-अच्छे विद्यार्थी भी बाद में असफल हो सकते हैं, इसकी संभावना बहुत ज्यादा रहती है। मेरी रुचि शिक्षा में खासकर अध्यापन में है। अतः मैं इसी क्षेत्र में जाना चाहूँगा।
मेरे इस चुनाव के पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला यह कि देश की आने वाली पीढ़ी को तैयार करना मैं अपना गुरुऋण चुकाने का एक अवसर मानता हूँ, जो शिक्षकों ने जो दिया है, उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाकर। एक अच्छे शिक्षक का सम्मान सभी विद्यार्थी तथा अभिभावक करते हैं, उन्हें समाज द्वारा पूरा मान-सम्मान मिलता है। यह ऐसा पेशा है जिसमें आपके काम में कम से कम बाहरी दखलंदाजी हो सकती है। आप बहुत कुछ स्वयं सीखते रहते हैं और विद्यार्थियों को नया देते रह सकते हैं।
इस क्षेत्र में जाने के लिए रुचि के साथ-साथ अभी से मैं पूरा पाठ्यक्रम अच्छी तरह से समझता जा रहा हूँ। छोटी से छोटी बात, सूक्ष्म से सूक्ष्म मुद्दों पर भी ध्यान दे रहा हूँ। ज्ञान के अलावा शिक्षक के लिए जिन दो बातों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वे हैं - सादगी तथा उदारता। उस दिशा में अभी से अपने जीवन व्यवहार को ढालने का मेरा प्रयास है। यहाँ उदारता से मतलब सभी प्रकार के लोगों के साथ एक समान और पक्षपातरहित व्यवहार है। शिक्षक के लिए सभी विद्यार्थी एक जैसे होने चाहिए। उनके निर्माण में उसे किसी तरह का जबरदस्ती नहीं रखना चाहिए। विद्यार्थी की रुचि, योग्यता के अनुसार उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहना चाहिए। मुझे इस समय वे गुरुजन याद आते हैं जिन्होंने मुझमें इन मूल्यों का बीज बोया था। देश के लिए अच्छे नागरिकों के निर्माण में एक शिक्षक के रूप में मेरा भी योगदान रहे, ऐसी मेरी भावना है।
चाणक्य का प्रसिद्ध कथन है - 'शिक्षक कभी साधारण नहीं होता।' शिक्षक बनकर मैं भी पूरी कोशिश करूंगा कि वह असाधारणता मुझमें आ सके और अपने विद्यार्थियों को उसमें फायदा पहुंचा सकूँ। गुरु और ईश्वर को लेकर रहीम का प्रसिद्ध दोहा तो सभी को पता ही होगा -
गुरु-गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पाँय। बलिदारी गुरु आपनो, जिन गोबिंद दियो बताय।।
गुरु की कृपा से ही गोबिंद की प्राप्ति होती है, अतः गुरु का महत्व किसी से कम नहीं।
5. मेरा प्रिय खेल : क्रिकेट
[प्रस्तावना - क्रिकेट का जन्म - खेलने की रीति - आधुनिक क्रिकेट - उपसंहार]
प्रस्तावना: जिस प्रकार शिक्षा मानव के दिमाग को स्वस्थ बनाने के लिए जरूरी है, उसी प्रकार खेल शरीर को स्वस्थ बनाने के लिए बहुत जरूरी हैं। मानव जीवन में खेलकूद का महत्वपूर्ण स्थान है। विश्व में कई प्रकार के खेल खेले जाते हैं। उन्हीं में से क्रिकेट भी एक खास खेल है। क्रिकेट एक अंतर्राष्ट्रीय खेल है। हालाँकि यह विदेशी खेल है। फिर भी भारतीय खिलाड़ियों ने विश्व में कई रिकॉर्ड बनाए हैं।
क्रिकेट का जन्म साल 1478 के फ्रांसीसी खेलों में क्रिकेट की पहली चर्चा में मिलता है। इस खेल का नियमानुसार पहला प्रदर्शन 1840 में फ्रांस के मिल फोर्ड नामक स्कूल में हुआ। आज यह अपनी लोकप्रियता के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। विदेशों में इसकी शिक्षा देने के लिए क्लबों की स्थापना की गई। इससे भारत, श्रीलंका, वेस्टइंडीज, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड, पाकिस्तान की टीमें विश्व में अपनी खास जगह रखती हैं।
खेलने की रीति: यह एक बहुत बड़े मैदान में खेला जाने वाला खेल है। खिलाड़ियों की दो अलग-अलग टीमें होती हैं। तीन-तीन डंडे 22 गज के फासले पर गाड़ दिए जाते हैं। इन डंडों को विकेट कहते हैं। विकेटों के समानांतर दो रेखाएँ चार फुट की दूरी पर खींची जाती हैं। खेल शुरू होने से पहले निर्णायक (अंपायर) और दोनों टीमों के कप्तान को फील्डिंग या बल्लेबाजी करने को कहता है। खेल शुरू होता है। एक टीम फील्डिंग करती है तथा दूसरी टीम बैटिंग। हर टीम में 11 - 11 सदस्य होते हैं। यदि बल्लेबाज की गेंद फील्ड के बाहर बाउंड्री पार करे तो छह रन माने जाते हैं। रन संख्या शॉट मारकर विकेटों के बीच दौड़कर भी बढ़ाई जाती है। एक टीम के दो खिलाड़ी बल्ला लेकर आगे जाते हैं। गेंद फेंकने वाला गेंद फेंकता है, दूसरी टीम का खिलाड़ी गेंद रोकता है। खेलते-खेलते जब दस खिलाड़ी आउट हो जाते हैं, तो फिर दूसरी टीम खेल शुरू करती है, जिस टीम के रन ज्यादा होते हैं वह जीती हुई मानी जाती है।
आधुनिक क्रिकेट: आधुनिक क्रिकेट में टेस्ट क्रिकेट के साथ-साथ वन-डे - इंटरनेशनल तथा ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट का भी आगमन हुआ है। भारतीय टीम ने साल 1983 में पहला वर्ल्डकप अपने नाम किया था। तथा साल 2007 में पहला ही ट्वेंटी-ट्वेंटी वर्ल्डकप की विजेता बनी। वन-डे वर्ल्डकप कपिलदेव तथा ट्वेंटी वर्ल्डकप वर्तमान कप्तान महेंद्रसिंह धोनी ने दिलाया है। सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के शहंशाह हैं। तथा भारत के सबसे सफल कप्तान के रूप में कोलकाता के टाइगर सौरव गांगुली तथा विराट कोहली का नाम आता है।
आज क्रिकेट केवल खेल मात्र नहीं रह गया है। अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट संघ तथा अलग-अलग देशों के क्रिकेट संघों ने विभिन्न प्रकार की नियमित प्रतिस्पर्धाओं के आयोजन द्वारा इसे मनोरंजन का साधन बना दिया है। सट्टेबाजी तथा मैच फिक्सिंग जैसे दोषों के कारण इस जेंटलमैन गेम की छवि को नुकसान पहुँचा है। आशा करें कि निकट भविष्य में खेल को इनसे मुक्ति मिलेगी और वह फिर से अपने स्वर्णिम दिनों को वापस ला सकेगा।
उपसंहार: आज क्रिकेट का खेल पूरे विश्व में प्रसिद्ध और लोकप्रिय है। स्वास्थ्य और मनोरंजन के दृष्टिकोण से यह खेल पूरी तरह से सक्षम है। हमारे भारतीय क्रिकेट के खिलाड़ी आज विश्व में अपना रिकॉर्ड स्थापित कर रहे हैं। खेलों के माध्यम से मानव में कई अच्छे गुण उत्पन्न होते हैं। खेलों से उसमें जीवन के संघर्षों से लड़ना और उनमें सफलता पाना आता है। खेल हमेशा खिलाड़ी भावना से ही खेला जाना चाहिए।
6. वर्षाऋतु
भारत ऋतुओं का देश है। भारत में छह ऋतुएँ होती हैं। वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर। ये सभी अपने-अपने समय पर आती हैं और भारत के प्राकृतिक सौंदर्य में चार चाँद लगा देती हैं। वैसे तो हर ऋतु सुहानी होती है लेकिन अपने सौंदर्य और प्रभाव के कारण जैसे वसंत ऋतु को ऋतुओं का राजा कहा गया है उसी प्रकार वर्षाऋतु को ऋतुओं की रानी कहा गया है।
वर्षा जीवनदायिनी है। वह सजीवों के लिए जल प्राप्ति का सबसे बड़ा और सबसे सुलभ स्रोत है। आज के बढ़ते जल संकट के समय - वर्षाजल का संचय करके उसके सही इस्तेमाल की तकनीक को और भी अधिक विकसित करना जीवन है।
वर्षाऋतु के आने से पहले गर्मी का डर छाया होता है। गर्मी के तेज ताप से लोग घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं करते। नदी, नाले, तालाब सूख जाते हैं। पशु-पक्षी परेशान होकर छाया की शरण में चले जाते हैं।
'देख जेठ की दोपहरी, छाया चाहनी छाँह।' फिर प्राणी जीवन का तो कहना ही क्या? सभी वर्षा रानी के आने का इंतजार करते हैं। ऐसे समय में बादलों की गड़गड़ाहट के साथ वर्षाऋतु का आगमन होता है। वर्षा की पहली फुहार के साथ ही धरती खुशी से झूम उठती है। प्राणी जगत आनंदित होकर वर्षा रानी का स्वागत करता है।
मेंढ़कों की टर्र-टर्र, झींगुरों की झनकार, पपीहे की पी-पी की आवाज वातावरण को मधुर बना देती है। कवि ने कहा है -
दादुर टर टर करते, झिल्ली बजती झन झन। म्याउ म्याउ रे मोर, पीउ चातक के गण।
ऐसा वातावरण किसके मन को मोहित नहीं करता? पेड़-पौधे लहलहाने लगते हैं। धरती से भीनी खुशबू निकलती है। चारों ओर हरियाली छा जाती है। छोटे-छोटे बच्चे वर्षा के जल में नहाने निकल पड़ते हैं। बहते हुए पानी में कागज की नाव बनाकर तैराते हुए खुशी से झूम उठते हैं। ग्रामीण युवतियों का आनंद गीतों के स्वरों में व्यक्त होता है। जगह-जगह झूले पड़ जाते हैं। झूलों पर ग्रामीण युवतियों का भोला और अल्हड़ यौवन झूमने लगता है।
भारत कृषि प्रधान देश है। भारत की कृषि का आधार वर्षा ही है। वर्षा के आगमन के साथ किसान हल-बैलों के साथ खेतों में पहुंच जाते हैं। वर्षा अन्न और जल का आधार है, इसलिए वर्षाऋतु हमारी भाग्य विधात्री तथा जीवन-दात्री है। वर्षा से ही वनस्पति का विकास होता है। जंगलों का विकास होता है। वनस्पति तथा जंगलों का विकास बढ़ते हुए प्रदूषण को रोकता है। इस तरह वर्षा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों में हमारी जीवन-दात्री है। पानी प्राणी जगत का जीवन है और पानी का एकमात्र आधार वर्षा है।
जहाँ वर्षा से हमें कई लाभ हैं, वहीं कुछ हानियाँ भी हैं। ज्यादा बारिश से नदियों में बाढ़ आ जाती है। बाढ़ के आने से जानमाल की बहुत हानि होती है। अधिक वर्षा आने से फसल को नुकसान पहुँचता है। बहुत से मकान गिर जाते हैं। बहुत से लोग बेघर हो जाते हैं। वर्षाऋतु में कई रोगों के कीटाणु पैदा हो जाते हैं। बीमारी फैलाने का डर पैदा हो जाता है। जहाँ वर्षा से कई लाभ हैं, वहाँ ये सामान्य हानियाँ लाभ को देखते हुए बहुत कम हैं। सचमुच वर्षा प्राणी-जीवन का स्रोत है। अन्य सभी ऋतुओं के सौंदर्य में सहायक है।
7. दूरदर्शन का समाज पर प्रभाव
दूरदर्शन का टेलीविजन विज्ञान रूपी देवता का अनोखा वरदान है, एक अद्भुत आविष्कार है। स्कॉटलैंड के वैज्ञानिक जॉन लॉगी बेयर्ड का यह अद्भुत आविष्कार आज सारी दुनिया का दिल जीत चुका है।
दूरदर्शन जादू का पिटारा है। बच्चों को अपनी पढ़ाई का टाइम-टेबल भले याद न हो, पर दूरदर्शन के दैनिक कार्यक्रम उन्हें जरूर याद रहते हैं। बूढ़े लोग भी टी.वी. के कार्यक्रमों का आनंद लेकर अपने नीरस जीवन को मजेदार बना लेते हैं। गृहिणियाँ टी.वी. का आनंद लेने के लिए अपने सारे काम पहले ही पूरे कर देती हैं। जिनके घर टी.वी. नहीं होता, वे पड़ोसी के टी.वी. से दिल बहलाते हैं। सचमुच, टी.वी. ने सबके दिलों पर जादू कर दिया है।
दूरदर्शन पर देश-विदेश के कोने-कोने की खबरें मूल दृश्यों के साथ पेश की जाती हैं। बाढ़, अकाल, भूकंप जैसी आपदाओं के समय दूरदर्शन के सचित्र और जीवंत प्रसारण पीड़ितों के प्रति लोगों के दिलों में हमदर्दी जगा देते हैं। मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धन के क्षेत्र में दूरदर्शन ने बहुत ज्यादा लोकप्रियता प्राप्त की है। इसके द्वारा फिल्म, नाटक, नृत्य, सांस्कृतिक कार्यक्रम, कविसम्मेलन आदि का आनंद हम घर बैठे ही ले सकते हैं। दूरदर्शन पर क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल या टेनिस का मैच देखने में अनोखा ही आनंद मिलता है। दूरदर्शन कार्यक्रमों की कुछ श्रेणियाँ लोगों के दिलों में बस जाती हैं। प्रायोजित कार्यक्रम भी लोगों का अच्छा मनोरंजन करते हैं। व्यापारिक विज्ञापनों के प्रसारण की आकर्षक शैलियाँ और संगीतमय धुनें देखते-सुनते ही बनती हैं।
दूरदर्शन शिक्षा के प्रसार और लोक-जागरण का क्रांतिकारी माध्यम है। दूरदर्शन के कार्यक्रमों की प्रेरणा से आज धार्मिक, सामाजिक, सांप्रदायिक, संकीर्णताओं की दीवारें गिर रही हैं। दूरदर्शन के माध्यम से राष्ट्रीय एकता, सद्भावना और सहयोग की जड़ें मजबूत हो रही हैं। दूरदर्शन पर पेश होने वाले शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम ज्ञान-विज्ञान के प्रसार में बहुत योगदान दे रहा है।
इस समय दूरदर्शन के अलावा सैकड़ों राष्ट्रीय तथा प्रादेशिक चैनलों का प्रसारण शुरू हो जाने से जन आकांक्षाओं की पूर्ति हो सकी है। अपनी भाषा के चैनलों के माध्यम से वे समाचारों के अलावा मनोरंजन, खेल जगत तथा सिनेमा जगत के लगातार संपर्क में रहते हैं। फिर भी दूरदर्शन की उत्कृष्ट सेवाएँ उन्हें अपनी ओर आकर्षित करती ही हैं। दूरदर्शन विज्ञान की एक अनोखी देन है, जो कंप्यूटर तथा स्मार्ट फोन से जुड़कर बहुत ज्यादा फैल चुका है। एकता तथा विश्वबंधुत्व का संदेश देकर यह मानव जाति की अनोखी सेवा कर रहा है।
इतना उपयोगी होने पर भी दूरदर्शन अपने कुछ नुकसान भी डाल रहा है। विद्यार्थी अपनी पढ़ाई से ज्यादा दूरदर्शन में रुचि लेते हैं, जिससे उनकी शैक्षणिक प्रगति पर बुरा असर पड़ता है। टी.वी. पर मैचों के प्रसारण के दिनों में दफ्तरों में काम की उपेक्षा होती है। हर दिन टी.वी. देखने से बच्चों की आँखों पर बुरा असर पड़ रहा है। अलग-अलग चैनलों पर प्रसारित होने वाले कुछ कार्यक्रम हिंसा, फैशनपरस्ती आदि को बढ़ावा देते हैं।
इसके बावजूद दूरदर्शन की उपयोगिता कम नहीं होती। सचमुच, दूरदर्शन आधुनिक विज्ञान का एक अनोखा वरदान है, एक अद्भुत उपहार है। यह घर-घर का आभूषण और जीवन का एक अभिन्न अंग बनता जा रहा है।
8. वर्तमान भारत की समस्याएँ
हर राष्ट्र के विकास के लिए कई राष्ट्रों से संघर्ष करना पड़ता है, जिससे कई समस्याएँ पैदा होती हैं। भारत को भी उसकी आजादी की शुरुआत में ही कुछ समस्याएँ मिलीं। आज आजादी के 62 वर्ष बाद इन समस्याओं का वंशवृक्ष शाखा-प्रशाखा युक्त होकर विकसित हो चुका है। यदि आज भारत को समस्याओं का देश कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इनमें एक राष्ट्र के रूप में भारत के सामने मुख्य समस्याएँ निम्नलिखित हैं -
1. राष्ट्रीय चरित्र का अभाव:
राष्ट्र केवल एक निश्चित भूभाग का नाम ही नहीं, उसमें रहने वाले व्यक्तियों का एक निश्चित संगठन भी है। आजादी की लड़ाई के दिनों में भारतीयता-स्वदेशी की जो भावना उभरी थी, आजादी मिलने के कुछ सालों बाद ही गायब हो गई। हम पूरे राष्ट्रीय भी नहीं बन पाए थे कि अंतर्राष्ट्रीय हो गए। राष्ट्रीयता के अभाव में हम बंगाली, पंजाबी, गुजराती, तमिल, मराठी, वगैरह बनकर रह गए। देश का व्यक्ति 'भारतीय' नहीं बन पाया, परिणामस्वरूप देश में प्रांतवाद, क्षेत्रीयवाद को बढ़ावा मिला। एक ही प्रांत के अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के बीच भी अंतर बढ़ता गया। व्यक्ति संकुचित होकर स्वार्थी बनने लगा, फलस्वरूप प्रांत और केंद्र के बीच, प्रांत और अन्य प्रांत के बीच संघर्ष की नौबत आई है। एक प्रांत को क्षेत्र के आधार पर विभाजन की मांग, नए प्रांत बनाने के लिए अदालत अथवा किसी प्रांत द्वारा स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की इच्छा के लिए संघर्ष इसी संकुचितता और स्वार्थ का ही परिणाम है। आज भारतीय राष्ट्र की पंजाब समस्या, असम समस्या, गोरखा लैंड, बोडोलैंड आदि को इस संदर्भ में देखा जा सकता है।
2. सांप्रदायिक सौहार्द तथा भावात्मक एकता की कमी:
भारत विभाजन के समय हुए सांप्रदायिक दंगों की भयावहता का भूत अभी भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा है। आजादी के इतने सालों के बाद आज भी जगह-जगह छोटी-मोटी बातों को लेकर हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क उठते हैं, जिससे जान-माल की हानि तो होती ही है, राष्ट्र की असांप्रदायिक छवि भी उभरने नहीं पाती। एक ही गांव-शहर में रहने वाले ये अलग-अलग धर्मों के लोग आपस में मेल-जोल नहीं रख रहे हैं, वे एक-दूसरे को शक की नजर से देखते हैं, परिणामस्वरूप डर और भय की स्थिति हमेशा बनी रहती है, जो जरा सी बात पर दंगों का रूप ले लेती है।
इसी तरह कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक रहने वाले विभिन्न धर्मों-जातियों के लोग सांस्कृतिक दृष्टि से भिन्नता लिए हुए हैं। 'विविधता में एकता' की बात करते हम भले ही नहीं थकते, किन्तु वास्तविकता यही है कि हमारे तमाम प्रयास भावात्मक एकता को मजबूत कर सकने में असफल रहे हैं।
3. सामाजिक असमानता-छुआछूत की समस्या:
जन्म के आधार पर जाति-निर्धारण के कारण जन्म से ही व्यक्ति का सामाजिक स्तर निश्चित हो जाने से असमानता का विकास हुआ। आज भी इसी तरह का दृष्टिकोण हर जगह दिखाई दे रहा है। खासकर ग्रामीण समाज में एक जाति के अंतर्गत ही जो विभिन्न सामाजिक स्तरीकरण दिखाई देता है, वह हमारी वर्णाश्रम व्यवस्था की पुरानी परंपरा का परिणाम है। फलस्वरूप एक ही समाज में कुछ शूद्र कही जाने वाली जातियाँ उसी समाज की अन्य जातियों के लिए अछूत बन गई हैं। समाज-सुधारकों, महापुरुषों के तमाम प्रयासों के बावजूद भी इस छुआछूत की मूल भावना में कोई खास बदलाव नहीं पड़ा है। कानून की दृष्टि में अपराध होने पर भी छुआछूत की भावना हमारे समाज में अभी भी है।
4. जनसंख्या वृद्धि, तद्जन्य समस्याएँ:
'जन' राष्ट्र की पूंजी है, किन्तु यही जनवृद्धि पाकर राष्ट्र के लिए समस्या बन सकते हैं। हमारे देश में जनसंख्या आज एक समस्या बनी हुई है और इसने कई समस्याओं को जन्म दिया है।
जनसंख्या वृद्धि के कारण देश में खाद्यान्न की कमी, गरीबी, बेरोजगारी जैसी समस्याओं को बढ़ावा मिला है। जिस गति से जनसंख्या में वृद्धि हुई, उससे हम रोजगार के अवसर नहीं जुटा पा रहे हैं, फलस्वरूप बेरोजगारी दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। लोगों की प्राथमिक आवश्यकता की पूर्ति के हमारे तमाम प्रयास विफल हो रहे हैं। स्वास्थ्य पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। देश के सभी लोगों के लिए हम प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करा सकने में असफल रहे हैं, इतना ही नहीं उनके आवास-भोजन भी स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयुक्त नहीं है। बढ़ती हुई आबादी के कारण हमें खाद्यान्न आयात करना पड़ता है। कृषिप्रधान देश के लिए यह एक अपमानजनक स्थिति है। आबादी-वृद्धि ने अशिक्षा को भी बढ़ावा दिया है, लोगों के रहन-सहन का स्तर नीचा गया है। सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं की तमाम कोशिशों के बावजूद जनसंख्या वृद्धि की दर में अपेक्षित गिरावट अभी तक नहीं आई है। जनसंख्या का यह विस्फोट हमारे लिए एक सिरदर्द बनकर रह गया है।
6. नवीनतम आर्थिक सुधारों का आरंभिक दुष्प्रभाव
भारत सरकार द्वारा नोटबंदी तथा जी.एस.टी. (गुड्स एंड सर्विस टैक्स) को जितनी तेजी से लागू किया गया, उससे तो यही लगता है कि इन अच्छी योजनाओं का लाभ मिलने के बजाय यह सामान्य जनजीवन को अस्त-व्यस्त करने वाला बन गया। हमारा देश अभी पूरी तरह से डिजिटल विश्व में रम नहीं पाया है। करोड़ों भारतीय जो अल्पशिक्षा तथा बुनियादी ढांचे के अभाव के कारण इनके बुरे प्रभावों का शिकार बने। छोटे-छोटे घरेलू-लघु उद्योगों पर इतनी मार पड़ी की वे संभल नहीं पाए। इसके कारण बेरोजगारी की समस्या और विकट बनी। योजनाएँ भले ही उत्तम हों किन्तु अधूरे अमलीकरण ने उसे दुःखदायक बना दिया।
6. आर्थिक असमानता की समस्या:
आर्थिक दृष्टि से भारत में संपत्ति का विभाजन असमान है। देश की अधिकांश पूंजी कुछ उद्योगपति घरानों में सीमित हो गई है। गांव, शहर के बीच अंतर बढ़ा है, फलस्वरूप गांव का व्यक्ति शहर की ओर पलायन कर रहा है। गांव में पूंजी के अभाव में रोजगार-धंधे में भी कमी आई है।
पूंजी के एकत्रीकरण ने शोषण को बढ़ावा दिया है। शोषण के कारण श्रमिक संगठनों का जन्म हुआ है। दोनों ही स्थितियां अपनी चरम सीमा पर राष्ट्र की गति में बाधक बनी है। औद्योगिक क्षेत्रों में बढ़ती हुई श्रमिक अशांति, उद्योग-धंधों का बंद होना आदि आर्थिक विषमता के ही परिणाम है।
7. दहेज, नारी - विषयक अन्य समस्याएँ:
कहने को तो हम स्त्री-पुरुष को समान मानते हैं। किन्तु व्यवहार में आज भी नारी का दर्जा दूसरे दर्जे के नागरिक जैसा ही है। समाज में बेटी का जन्म आज भी दुख का कारण है। स्त्री-जाति के शोषण, दहेज की मांग, दहेज न मिलने पर स्त्री को जला देने के क्रम आदि स्त्री-पुरुष समानता की हमारी बात की सच्चाई खोल रहे हैं। नारी-शिक्षा के अभाव ने भी शोषण को बढ़ावा दिया है। जीवन के हर क्षेत्र में आज समान रूप से प्रवेश होने के बावजूद भी एक बहुत बड़ा नारी समुदाय सामाजिक न्याय से वंचित है। कहीं-कहीं तो अन्याय-अत्याचार अपनी सीमा को लांघ जाते हैं, नारी की व्यथा-कथा दयनीय है। नारी में जागरूकता का अभाव, अशिक्षा, निम्नतर सामाजिक स्थिति ही उसकी दुर्दशा के मुख्य कारण हैं।
8. राजनीति में आतंकवाद का प्रवेश:
स्वतंत्र भारत की नींव राष्ट्रपिता ने अहिंसा और सहिष्णुता पर रखी थी। समय बीतते-बीतते हमारे राजनैतिक नेताओं ने अपने निहित स्वार्थ की पूर्ति के लिए जाने-अनजाने ऐसे तत्वों को आश्रय देना शुरू किया जो अपराधी मनोवृत्ति के थे। सत्ता और अपराध का यह गठबंधन आतंकवाद के रूप में जन्म ले चुका है। मत प्राप्ति के लिए जबरन मतदान केंद्रों पर कब्जा से लेकर प्रत्याशियों का अपहरण एवं उनकी हत्या की घटनाएं इस बात की साक्षी हैं। राजनीति में आतंकवाद के प्रवेश से उग्रता को बढ़ावा मिला है, नक्सलवाद इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। हम समझौते के बजाय बल द्वारा अपनी समस्याओं के समाधान की ओर अनजाने में अग्रसर हो रहे हैं। यह राष्ट्र के विघटन का कारण बन सकता है।
9. एक कुत्ते की आत्मकथा
आत्म परिचय:
मैं एक कुत्ता हूँ आपकी जानी-पहचानी जाति का एक अभागा प्राणी। आज मुझे मानव समाज से कुछ शिकायतें करनी हैं। इसीलिए मैं आपको अपनी आपबीती सुनाना चाहता हूँ।
जन्म और बचपन:
मेरा जन्म गाँव के एक किसान के घर में हुआ था। मैं अपनी माँ की प्यारी संतान था। हम पांच-छह भाई-बहनों ने एक साथ जन्म लिया था। माँ ने बड़े प्यार से हमारा पालन पोषण किया और अपने मीठे दूध तथा यहां-वहां के रोटी के टुकड़ों से हमें पुष्ट किया। जब हमने चलना सीख लिया तो आसपास के बच्चे मुझे उठाकर अपने घर ले जाने लगे। वे कभी-कभी मुझे दूध भी पिलाते थे। अपने भाई-बहनों में मैं सबसे सुंदर बन गया।
मालिक के घर:
एक दिन उस गाँव में एक व्यापारी आया। अचानक उसकी नजर मुझ पर पड़ी और पता नहीं उसने मुझ में क्या खासियत देखी कि जाते समय वह मुझे अपने साथ लेता गया। विदाई का वह दृश्य मैं जीवनभर नहीं भूल सकता। मुझे अलग होते देखकर मेरी माँ और भाई-बहन बहुत बेचैन हो गए थे।
सुखी जीवन:
उस व्यापारी के घर में बहुत-से बच्चे थे। मेरे पहुंचते ही सबने मुझे अपना दोस्त बना लिया। मालकिन ने मुझे अपनी गोद में बिठाया और मेरी पीठ पर हाथ फेरा। मेरा नाम 'टीपू' रखा गया। बढ़िया खाना, दिनभर आराम और सबका लाड़-प्यार। जंजीर होते हुए भी मैं आजाद रहता था। मेहमानों को देखकर मैं भौंका करता था। एक बार मालिक के घर में रात को कुछ चोर घुस आए। उनके आते ही मुझे शक हुआ और मैं भौंकने लगा। एक चोर के पैर में तो मैंने अपने दांत गड़ा दिए। सब लोग जाग गए। देखा कि आँगन में गहनों की पेटी पड़ी है। मेरे भौंकने और काटने से चोर सब कुछ छोड़कर नौ दो ग्यारह हो गए थे। सबने मेरी खूब तारीफ की।
बुढ़ापा और उपेक्षा:
किन्तु समय गुजरने के साथ मेरे उत्साह, शक्ति और रंग-रूप फीके पड़ते गए। धीरे-धीरे मैं मालिक के घर में सबकी उपेक्षा का पात्र बनता गया। एक दिन मालिक का पुत्र 'बुलडॉग' जाति का एक नया कुत्ता ले आया। मैंने भौं-भौं करके अपना विरोध प्रकट किया, किन्तु डंडे मारकर मुझे घर से बाहर निकाल दिया गया।
उपसंहार:
आज मैं अपनी बची हुई जिंदगी यहां-वहां घूमकर काट रहा हूँ। जाड़े की ठिठुरन ने मेरे जीवन को अधमरा बना दिया है। सोचता हूँ, क्या मेरा मालिक और साल-छह महीने मुझे रोटी नहीं खिला सकता था? पर मनुष्य तो आखिर स्वार्थ का पुतला है! उसमें इतनी दया कहाँ कि वह मेरे दिल के दर्द को समझ पाए।
10. विद्यार्थी और अनुशासन
किसी भवन की मजबूती उसकी आधारशिला पर निर्भर करती है। भवन की आधारशिला जितनी गहरी और मजबूत होगी, भवन उतना ही मजबूत और विशाल बनाया जा सकेगा। इसी प्रकार मानव की महानता, समृद्धि, सुख-शांति, स्वास्थ्य आदि छात्रावस्था यानी विद्यार्थी जीवन पर आधारित है। यह अवस्था उस कोमल शाखा की तरह है, जिसे मनचाही दिशा में, मन चाहे रूप में मोड़ा जा सकता है। अतः मानव जीवन की इस प्रारंभिक और अनोखी अवस्था को सच्चरित्रता, सदाचारिता, संयम और अनुशासन से सुरक्षित रखना चाहिए।
विद्यार्थी की पहली पाठशाला उसका घर है, परिवार है और गुरु है उसकी माँ। बालक अपने परिवार में प्रेम, सहयोग, अनुशासन आदि से परिचित होता है। छात्रावस्था भोली और कोमल अवस्था होती है। इस अवस्था में न तो बुद्धि पूरी तरह विकसित होती है और न विचार परिपक्व। इसलिए इस अवस्था यानी विद्यार्थी जीवन को माता-पिता अच्छी शिक्षा दे सकते हैं।
11. समय का सदुपयोग
प्रस्तावना :
समय का प्रभाव बड़ा प्रबल होता है। यह सभी को प्रभावित करता है। समय के सदुपयोग से गरीबी, अमीरी में बदल जाती है। असत्य सत्य सिद्ध हो जाता है। लघुता प्रभुता में बदल जाती है और यही नहीं, असंभव संभव में बदल जाता है परन्तु समय के बीत जाने पर पछताने से कोई लाभ नहीं होता। कहा भी है –
का वर्षा जब कृषि सुखाने। समय चूकि पुनि का पछाताने।।
कहावत है कि 'समय पीछे से गंजा होता है।' अर्थात् समय के निकल जाने पर आप उसे पीछे से नहीं पकड़ सकते। अतः सही समय पर उठाया गया कदम ही उसे उपयोगी बना सकता है।
खोया हुआ धन लौटकर आ सकता है, खोया हुआ स्वास्थ्य भी प्रयत्न करके पुनः प्राप्त किया जा सकता है, किन्तु खोया हुआ समय वापस नहीं मिल सकता। अतः हमें अपने जीवन का एक-एक क्षण बहुमूल्य मानकर व्यतीत करना चाहिए। समय के संबंध में संस्कृत नीतिकारों का कथन द्रष्टव्य है –
काव्य शास्त्र विनोदेन, कालो गच्छति धीमताम्।
अर्थात् बुद्धिमान व्यक्तियों का समय तो काव्य शास्त्र आदि के अध्ययन में व्यतीत होता है। अतएव समय का सबसे अच्छा उपयोग तो ज्ञानार्जन हेतु विभिन्न पुस्तकों का अध्ययन ही है।
लक्ष्य निर्धारण :
जीवन को सुखी और सफल बनाने के लिये सबसे बड़ी आवश्यकता जीवन में लक्ष्य निर्धारित करने की है। एक बार लक्ष्य निर्धारित कर लेने के पश्चात् हमारी सारी शक्ति. उसी लक्ष्य को प्राप्त करने में लग जानी चाहिए। लक्ष्यहीन व्यक्ति इधर-उधर भटकता फिरता है। लक्ष्य निर्धारण करने में हमें अपनी रूचि को देखना होगा। जिस विषय में हमारी अधिक रुचि हो, उसी दिशा में हमें अपना लक्ष्य स्थापित करना चाहिए। इससे हमें शीघ्र सफलता मिलने की सम्भावना रहती है।
शरीर की स्वस्थता :
शरीर आत्मा का मन्दिर है, मस्तिष्क का निवास स्थान है। अतएव शरीर की स्वस्थता परम आवश्यक है। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का वास होता है। मन की स्वस्थता शरीर की स्वस्थता पर निर्भर है। अतएव अपने बहुमूल्य समय में से कुछ समय अपने शरीर को स्वस्थ बनाये रखने के लिए दें। शरीर के स्वस्थ रहने पर ही हम अपना, अपने समाज का और अपने राष्ट्र का हित चिंतन कर सकते हैं।
धनोपार्जन :
उदर पूर्ति हेतु धनोपार्जन करने के लिए भी हमें समय देना चाहिए। बिना धन के हम जीवन निर्वाह नहीं कर सकते। जीवन में धन साधन मात्र ही होना चाहिए, साध्य नहीं। धन के लोभ में हमें जीवन के इस महत्त्वपूर्ण तत्त्व को नहीं भूलना चाहिए। अतएव धन के प्रति हमारे हृदय में आसक्ति नहीं होनी चाहिए।
समय की पाबन्दी :
समय का सदुपयोग करने के लिए समय की पाबन्दी भी नितान्त आवश्यक है। किसी काम को आलस्यवश टालना नहीं चाहिए। आलस्य मानव जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है। जो व्यक्ति आलस में पड़कर समय को व्यर्थ में बर्बाद करता रहता है, समय भी उस व्यक्ति को कुचलकर समाप्त कर देता है। जो काम कल के ऊपर टाला गया वह कभी पूरा नहीं हो पाता। अतएव जीवन को नियमित बनाना अत्यन्त आवश्यक है।
उपसंहार :
समय के सदुपयोग पर ही मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शक्तियों का विकास निर्भर करता है। उससे मन को। अपूर्व शान्ति मिलती है। समय का मूल्य जाननेवाला व्यक्ति सदा अच्छे अवसर का स्वागत करने के लिए तैयार रहता है। सौभाग्य प्रत्येक व्यक्ति का दरवाजा एक बार खटखटाता है और जो व्यक्ति उसका स्वागत नहीं करता, उसे फिर जीवन में उससे निराश होना पड़ता है। अतएव यदि हम चाहते हैं कि हम अपने जीवन में सफल और महान बनें तो हमें जीवन के एक-एक बहुमूल्य क्षण का उपयोग करना चाहिए। समय के सदुपयोग पर ही जीवन की सफलता निर्भर है।
17. दहेज प्रथा : एक सामाजिक अभिशाप
प्रस्तावना :
दहेज और दायज शब्द समानार्थी है जिनका अर्थ विवाह के अवसर पर कन्या के संरक्षकों द्वारा वर पक्ष को दी जानेवाली धनराशि से लगाया जाता है। साधारणतया दहेज वह सम्पत्ति है जो एक व्यक्ति विवाह के समय अपनी पत्नी अथवा उसके परिवारवालों से पाता है।
दहेज का प्रचलन :
दहेज प्रथा का प्रचलन प्राचीनकाल से ही विद्यमान है। तुलसीकृत रामचरित मानस में शिव-पार्वती के विवाह के पिता हिमवान अपनी बेटी के विवाह के अवसर पर अपार सम्पत्ति और दास-दासी प्रदान करते हैं। इसी प्रकार दहेज प्रथा का उल्लेख अन्य भारतीय ग्रन्थों में मिलता है। प्राचीन काल में हमारा देश भारत एक समृद्ध देश था। इसलिए इसे सोने की चिड़िया की संज्ञा दी जाती है। माता-पिता अपनी सम्पत्ति का एक भाग लाड़ली कन्याओं को विवाह के अवसर पर अपनी स्वेच्छा से दिया करते थे। उस समय तक समाज में इसके पीछे कोई लालच व सौदेबाजी की भावना नहीं थी।
दहेज एक कुप्रथा के रूप में :
आज का युग भौतिकवादी युग है। इसमें धन को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाता है, परिणामस्वरूप जिन लोगों के पास धन अधिक होता है, वे अनुकूल लड़के को धन देकर क्रय कर लेते हैं। कन्या की शिक्षा व सुन्दरता पर ध्यान नहीं दिया जाता है। वस्तुत: दहेज एक पापपूर्ण चक्र है जो एक बार चलने पर कभी समाप्त नहीं होता। वास्तव में निर्धन माता-पिता के लिए दहेज एक अभिशाप बन चुका है, जिसके कारण वह अपनी लाड़ली पुत्री को किसी सद्गृहस्थ को देने में सदा असमर्थ रहते हैं।
दहेज उन्मूलन अधिनियम के द्वारा सरकार ने इस कुप्रथा को कानूनी अपराध घोषित कर दिया है परंतु यह प्रथा इतनी मजबूत हो चुकी है कि इसे अकेली सरकार दूर नहीं कर सकती। इस कार्य में समाज-सुधारकों को आगे आना चाहिए। अंतजातीय विवाहों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए जिससे विवाह के लिए वर ढूँढने के क्षेत्र का विस्तार हो सके। - तमाम कानूनों, समाज सुधारों के बावजूद इसका मात्र स्वरूप बदला है, नकद के बजाय, मकान-फ्लैट-बंगले तथा आभूषणों के रूप में यह और भी विकराल रूप धारण कर रहा है। उत्तर भारत में स्थिति बदतर हो रही है।
दहेज एक सामाजिक बुराई हैं :
दहेज प्रथा अब एक आम बुराई बन चुकी है। अतः इसे समाप्त करने के लिए शिक्षा का प्रसार किया जाना चाहिए, जिससे समाज में नवीन मूल्यों का निर्माण हो सके। साथ ही लोग इस प्रथा का विरोध करने के लिए प्रेरित हो। शिक्षित नवयुवक व नवयुवतियाँ इस कुप्रथा का कड़ा विरोध करे। दहेज-प्रथा के उन्मूलन के लिए स्त्रियों में शिक्षा को बढ़ावा और उनको उन्नतिशील बनाने की अति आवश्यकता है। जब उनमें शिक्षा का अच्छा विकास हो जाएगा तो उनका स्तर पुरुष के बराबर बन जाएगा : परिणामस्वरूप सामाजिक क्षेत्र में उनका महत्त्व बढ़ेगा, आत्मविश्वास बढ़ेगी। इन सब कारणों से वे स्वयं ही इतनी सक्षम हो जायेगी कि अपने लिए वर का चयन कर सकें। ऐसा होने पर माता-पिता स्वयं ही दहेज की चिंता से मुक्त हो जायेंगे। इस दूषित प्रथा को समाप्त करने के लिए देश में कवियों, उपन्यासकारों, नाट्यकारों तथा चलचित्र निर्माणकर्ताओं को
चाहिए कि वे दहेजप्रथा उन्मूलन में अपना सहयोग दे और ऐसे वातावरण का निर्माण करें, जिससे समाज में लोग दहेज को एक बुराई समझकर उसका त्याग करें।
उपसंहार :
यदि समाज के लोगों को जीवित रखना है तो इस बुराई का समय रहते अन्त किया जाना बहुत जरूरी है, जैसा कि ए. एस. आल्टेकर ने कहा है – 'अब समय आ गया है कि मनुष्य को समाज में दहेज जैसी कुप्रथा का अन्त कर देना चाहिए। जिसने समाज की अनेक निर्दोष कन्याओं को आत्मदाह करने को मजबूर कर दिया है। ऐसा होने पर समाज को इस महाव्याधि से मुक्ति मिल सकेगी।
13. जंगलों का महत्त्व
प्रस्तावना :
वृक्षारोपण कार्यक्रम या वन महोत्सव से हमारा तात्पर्य पृथ्वी को हरा-भरा बनाने से है। इसके लिये हमें अधिकाधिक मात्रा में वृक्ष उगाने चाहिये क्योंकि वृक्ष धरा के आभूषण है और इनसे हमें अनगिनत लाभ हैं।
वृक्षारोपण की प्राचीन सांस्कृतिक परम्परा :
प्रकृति भारत की सदा सहचरी रही है। भारतीय संस्कृति का विकास वनों से ही हुआ। प्राचीन भारत में वनों का बड़ा महत्त्व था। ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम कोलाहल से दूर वनों में स्थित थे। वन महोत्सव भारत का राष्ट्रीय पर्व होता है। सारंगधर पद्धति में लिखा है 'धर्म और अर्थ से अनेक पुत्रों के जन्म से क्या लाभ है ? इससे तो अच्छा मार्ग में लगाया गया एक वृक्ष होता है जो लोगों को छाया और फल देता है। दस कुओं के निर्माण का पुण्य एक तालाब बनवाने के बराबर होता है और दस तालाबों के निर्माण का पुण्य एक झील के बराबर होता है और दस पुत्रों का पुण्य एक वृक्ष लगाने के समान होता है। भारतीयों ने वनों की परम्परा को अक्षुण्य तथा अनवरत् बनाये रखने के लिए अनेक व्रत और पर्यो की प्रथा चालू की थी। जैसे – बहुलाचतुर्थी, वटमावस, व्रत सावित्री पूनम, हरियाली तीज आदि। इन पर्यो पर वृक्ष-पूजन और नवीन वृक्षारोपण होता है। भारतीयों को वन-विज्ञान का पर्याप्त ज्ञान था। हरे वृक्षों को काटना पाप था। ऋषियों ने हरे वृक्ष काटनेवालों के लिये दण्ड का विधान निर्धारित किया था।
वृक्षों से लाभ :
वृक्षों से हमें लकड़ी प्राप्त होती है जिनसे कुर्सी, मेज, फर्नीचर आदि बनते हैं। बच्चों के खिलौने भी लकड़ी से बनते हैं।
वनों से मनुष्यों को फल-फूल, गोंद, कपूर, कत्था आदि अनेक वस्तुएँ प्राप्त होती है। इन वस्तुओं से वह आर्थिक लाभ प्राप्त करता है। पशुओं को इनसे चारा मिलता है। वन बादलों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं जिससे वहाँ वर्षा हो जाती है। वर्षा के जल को वृक्ष सोख लेते हैं। और मिट्टी को उपजाऊ बना देते हैं। भूमि का कटाव भी नहीं हो पाता।
मानव जीवन के लिए ऑक्सीजन आवश्यक है। वन के वृक्ष ऑक्सीजन छोड़ते हैं और वातावरण में उसका सन्तुलन बनाये रखते हैं। यही नहीं, वे जहरीली कार्बन डाइओक्साइड को ग्रहण कर पचा लेते हैं। वन जंगली जानवरों की शरण स्थली है, उन्हें भी जीने का हक है अतः उनके शिकार पर रोक लगाकर उनकी नस्ल का संरक्षण किया जा रहा है। इस प्रकार सभी के लाभ एवं सुरक्षा के लिए वनों का महत्त्व है।
वन महोत्सव :
मध्य युग में वनों के राष्ट्रीय महत्त्व को भूला दिया गया। जनसंख्या वृद्धि के कारण वनों को काटकर वन श्री को नष्ट किया गया। नवीन वृक्षारोपण बंद हो गया। हरितिमा शनैः शनैः मिटती गई। भूमि की उर्वरा शक्ति घटती गई। नदी, सरोवर और जलाशय सूखने लगे। वृक्षों का अभाव खटकने लगा, इसलिए सन् 1950 ई. में राजस्थान के बढ़ते हुए रेगिस्तान को रोकने के लिये तत्कालीन राज्यपाल श्री के. एस. मुन्सी ने वन सम्पदा को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से 'वन महोत्सव' का श्रीगणेश किया। अब भारत सरकार नवीन वृक्षारोपण में प्रयत्नशील है। सरकारी कार्यक्रमों में वृक्षारोपण पर पर्याप्त बल दिया जा रहा है। आज पुनः सम्पूर्ण भारत में वृक्षारोपण तीव्र गति से किया जा रहा है। प्रतिवर्ष लाखों, करोड़ों पौधे सरकारी तथा गैरसरकारी संस्थाओं द्वारा लगाये जाते हैं किन्तु पर्याप्त देख-रेख के अभाव में वे काल कवलित हो जाते हैं। लगाए जानेवाले पौधों के संरक्षण में जनभागीदारी का अभाव है। हमें इस क्षेत्र में जनसहयोग को बढ़ाने की जरूरत है।
उपसंहार :
वृक्षों का बहुत महत्त्व है, यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो गई है। शासकीय एवं व्यक्तिगत स्तर पर लोगों को वृक्षारोपण कार्यक्रम पर पूरा-पूरा ध्यान देना चाहिए, क्योंकि वृक्ष लेते कुछ नहीं है, देते ही देते हैं। सत्य ही कहा गया है -
‘वृक्ष धरा के भूषण हैं, करते दूर प्रदूषण हैं।’
14. समाज में नारी का स्थान
प्रस्तावना :
नारी सृष्टि की आधारशिला है। उसके बिना हर रचना अधूरी है, हर कला रंगहीन। वह पुरुष की माता भी है, प्रेमिका भी, सहचरी भी और सहयोगिनी भी। भारत की संस्कृति में नारियों को महिमामय एवं गरिमामय स्थान प्राप्त रहा है। 'यत्र नार्यास्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' अर्थात् जहाँ नारियाँ पूजित होती है, वहाँ देवता रमण करते हैं। यह भारतीयों की नारी दृष्टि का परिचायक है। प्राचीन भारत की नारी केवल पूजा और श्रद्धा की वस्तु ही नहीं अपितु उसने वेद मंत्रों की रचना कर अपने युद्ध कौशल से महाबलियों को परास्त कर, अपने तर्क से महापण्डितों को पराजित कर तथा अपने बुद्धि-चातुर्य से राज्य का संचालन कर यह प्रमाणित कर दिया था कि यदि समुचित अवसर प्राप्त हो और साधन सुलभ हो तो वह प्रत्येक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकती हैं।
मध्ययुग में नारी :
आगे चलकर भारतीय समाज में नारी की स्थिति बदलती गयी। वह केवल भोग्या हो गयी – पुरुष के राग – रंग का साधन बनकर उसकी कृपा पर जीवित रहना ही उसकी नियति बन गयी। जिन स्त्रियों ने वेद मंत्रों की रचना की थी, उन्हें वेद पाठ के अधिकार से वंचित कर दिया गया। जिन्हों ने युद्धभूमि में अपनी शूरता का परिचय दिया था, उन्हें कोमलांगी कहकर चौखट लांघने तक की इजाजत नहीं दी गयी। पुरुष प्रधान समाज व्यवस्था में वह मात्र एक दासी बनकर रह गयी। मुस्लिम युग में स्त्रियों पर और भी बन्धन डाल दिये गये, क्योंकि विदेशियों की दृष्टि किसी देश की धन सम्पदा पर ही नहीं, वहाँ की स्त्रियों पर भी होती थी। स्त्रियों पर अधिकार हो जाने से बड़ी सफलतापूर्वक जाति-परिवर्तन, धर्म-परिवर्तन या समाज परिवर्तन किया जा सकता था। अतः स्त्रियों को अपहरण एवं बलात्कार से बचाने के लिये पर्दा-प्रथा की शुरुआत हुई। वह घर के बाहर नहीं निकल सकती थी। उसकी शिक्षा या उसके अर्थोपार्जन का प्रश्न ही नहीं उठता था। वह बस दासी थी, सेविका थी, परिचारिका थी, आज्ञापालिका थी।
आधुनिक युग और नारी :
आधुनिक युग में जब हम पाश्चात्य जीवन संस्कृति के अधिक निकट आये, तब हमें लगा कि स्त्रियों की आधी जनसंख्या को पालतू पशु-पक्षी की तरह बाँधकर खिलाते रहना मानवता का बहुत बड़ा अपमान है। एक ओर 'नारी तुम केवल श्रद्धा हो' और दूसरी और 'नारी नरकरय द्वारम्', ये दोनों ही दृष्टिकोण अतिवादी हैं। हमें उसे मात्र मानवी मानकर वे सारी सुख-सुविधाएँ देनी चाहिए जो हम खुद अपने लिये चाहते हैं। 19-20 वीं शताब्दी में प्राय: सभी धर्म सुधारकों और राजनेताओं ने स्त्रियों को प्रारम्भ में ही हमारी नारी दृष्टि परिवर्तित हुई। स्त्रियों की शिक्षा संस्थाएँ खुली, उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में खुलकर भाग लिया, साहित्य और कला के क्षेत्र में उन्होंने नाम तथा यश अर्जित किया और धर्म तथा आध्यात्म के क्षेत्र में भी उन्होंने बहुत कुछ उल्लेखनीय स्थान प्राप्त किया।
जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ भारतीय महिलाएँ पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल रही हों; चाहे वह सशस्त्र सेनाबल हो, टेक्नोलॉजी का क्षेत्र हो, परंपरागत व्यवसाय या उद्योग आदि का क्षेत्र हो। हर जगह भारतीय स्त्री पुरुषों से प्रतिस्पर्धा करती हुई आगे बढ़ रही है।
उपसंहार :
आज की नारी अपने पाँवों पर खड़ी है। पश्चिमी शैली के अन्धानुकरण ने उसकी गरिमा और प्रतिष्ठा छीन ली है। आज के अधिकांश परिवारों का टूटना और घुटन के मूल में नारी की अदम्य इच्छाएँ या अप्रिय महत्त्वाकांक्षाएँ ही हैं। उसे बहुत सँभलकर अपनी आस्था के चर ग उठाने होंगे।
15. जल-संकट
मनुष्य को जीवित रहने के लिए सबसे जरूरी चीजों में हवा, जल तथा भोजन का समावेश है। हवा के बिना आप चंद मिनटों तक जीवित रह सकते हैं और जल के बिना चंद घंटों या चंद रोज। मनुष्य के शरीर का
लगभग सत्तर प्रतिशत भाग जल है। मनुष्य को हर एक-दो घंटे में पानी की प्यास लगती है, जिसे मिटाने के लिए उसे पानी या पानी मिश्रित आहार ग्रहण करना जरूरी हो जाता है। कहा गया है – 'जल है तो जीवन है।’
पानी केवल मनुष्य के लिए समस्त सजीव सृष्टि के लिए आवश्यक है, जिस पर मनुष्य का जीवन अवलंबित है। जल के अभाव में भूमि की उर्वरा शक्ति समाप्त हो जाती है। रेगिस्तान इसके प्रमाण हैं। बिना नमी (जल का ही एक रूप) के वनस्पतियाँ नहीं उगेंगी। वनस्पति के अभाव में मनुष्य को आहार तथा श्वसन के लिए प्राणवायु (ऑक्सीजन) की उपलब्धता घट जाएगी, संदिग्ध हो जाएगी। अन्य जीव-जंतु भी पानी के अभाव में जीवित नहीं रह सकेंगे। हम मनुष्य तो पीने के अलावा पानी का अनेक तरह से उपयोग करते हैं। सफाई के लिए, सिंचाई के लिए, भोजन पकाने तथा बर्तनों को साफ करने-धोने के लिए, कल कारखानों में, वाष्पशक्ति से चलनेवाले संयंत्रों में इत्यादि। यह सूची अनंत है। समस्त सजीवों को जन्म से लेकर मृत्यु तक पानी की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है, इसीलिए कहा जाता है कि 'पानी जीवन का आधार है।’
सामान्य रूप से पृथ्वी का दो तिहाई भाग जल है, भूमि के नीचे भी जल के भंडार हैं, पर्वत शिखरों पर जल बरफ के रूप में है। प्रतिवर्ष वर्षा द्वारा हमें जल मिलता है। इन सबके बावजूद हमें उपयोग में लानेवाले जल की कमी निरंतर बनी है। इसके मुख्य कारणों में उपलब्ध जल की गुणवत्ता तथा गुणवत्ता युक्त जल की मात्रा की कमी है। भूपृष्ठ पर मिलनेवाला अधिकांश जल प्रदूषित है, वह पेय जल के रूप में प्रयोग करने योग्य नहीं है। हम उसका शुद्धीकरण करके पीने के लिए उपयोग करते हैं। बढ़ती हुई जनसंख्या को सभी कार्यों के लिए जल सभी स्थानों पर उपलब्ध नहीं है। बड़े-बड़े शहरों में जल की आपूर्ति एक विकट प्रश्न है। आस-पास के चालीस-पचास किलोमीटर दूर के जलस्रोतों से पाइपों द्वारा पानी का परिवहन करके शहरों में पहुँचाया जाता है। वर्षा का असमान वितरण तथा जलस्रोतों – नदी, तालाब, झीलों आदि के गिरते जलस्तर से यह संकट दिन-प्रतिदिन गहराता जाता है। बड़े नगरों में तो सुएज प्लांट द्वारा जल का ट्रीटमेंट करके कल-कारखानों के प्रयोग योग्य जल आपूर्ति की जाती है, फिर भी जल की कमी हमेशा बनी रहती है।
जल की कमी के साथ एक दूसरी समस्या जुड़ी है जल के प्रदूषण की। अधिकांश नदियों में छोड़ा जानेवाला औद्योगिक कचरा उन्हें इतना प्रदूषित कर चुका है कि उनका पानी पीना तो दूर रहा, सफाई या सिंचाई के लायक भी नहीं बचा है। उनके पानी से सिंचाई करके उगाई जानेवाली फसलें, साग-सब्जियाँ प्रदूषित होती हैं, जो आहार योग्य नहीं है। इनके खाने से नाना किस्म की बीमारियाँ पनप रही हैं। भोपाल के आसपास की स्थिति इस समय बदतर हो गई है।
जल संकट के निवारण का उपाय है – जल का जितना जरूरी हो, उतना ही उपयोग, जल को यूँ ही बहने से रोकना, जल स्रोतों की नियमित रूप से सफाई, औद्योगिक स्रोतों से निकलनेवाले कचरे का शुद्धीकरण करने के बाद ही उसे जलस्रोत में छोड़ा जाए। ये उपाय भी बहुत कारगर नहीं हो पायेंगे। यदि हम जल को बचायेंगे नहीं। आज आप जल बचाएँगे तो कल जल आपको बचायेगा। सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर बड़ी नदियों तथा अन्य जल स्रोतों की सफाई करके उन्हें बचाने का कार्यक्रम शुरू हुआ है पर उसमें हमें आशानुरूप सफलता नहीं मिली है। इस पीढ़ी को जल बचाने के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करना है ताकि आनेवाली पीढ़ी को जीवन के लिए जल उपलब्ध हो सके।
16. मेरी प्रिय पुस्तक – रामचरित मानस
पुस्तकें मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र हैं। ये हमारे लिए सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक ज्ञान का साधन हैं। एक पीढ़ी द्वारा संचित उत्कृष्ट ज्ञान पुस्तकों द्वारा अगली पीढ़ी को पहुँचाने का काम पुस्तकों के माध्यम से होता है। कुछ पुस्तकें एक-दो बार पढ़ने के बाद उन्हें दुबारा पढ़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जब कि कुछ पुस्तकें हमें बार-बार पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है। मैं जिस पुस्तक की बात कर रहा हूँ वह है गोस्वामी तुलसीदासरचित – 'रामचरित मानस।’
बचपन से ही रामचरित मानस को सुनने का मुझे सौभाग्य मिला। मेरी दादी प्रतिदिन रामचरित मानस का एक अंश पढ़ती थीं, हम बैठकर उसे सुनते थे। जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती गई, समझ में आया कि यह केवल एक किताब नहीं है बल्कि हमारे जीवन व्यवहार का संविधान है। माँ के प्रति बालक के कर्तव्य, भाई-भाई का प्रेम, पति-पत्नी का आदर्श संबंध, मित्रता, राजा-प्रजा के अधिकार एवं कर्तव्य सभी का एक उदार आदर्श रूप रामचरित मानस में मिलता है। यही कारण है कि यह ग्रंथ उत्तर भारत के लगभग प्रत्येक हिन्दू के घर में मिलता है। इस काव्यग्रंथ को एक धर्मग्रंथ का-सा दरजा मिला है।
इस ग्रंथ के रचयिता तुलसीदास जीने राम के चरित्र का आलेखन 'स्वांतः सुखाय' किया है। मूलकथा वाल्मीकि रामायण से ग्रहण किया है, किन्तु उसमें अपनी रुचि, परिस्थिति के अनुरूप परिवर्धन, परिमार्जन किया है। तुलसीदासजी इसमें 'नाना पुराण निगमागम' का सार देना चाहते हैं। इस उद्देश्य से राम के चरित का आलेखन किया है। इस ग्रंथ की भाषा अवधी है, किन्तु प्रत्येक सर्ग (कांड) के आरंभ में संस्कृत के श्लोक हैं। यानी तुलसीदास जी चाहते तो इसे संस्कृत में भी लिख सकते थे, किन्तु उन्होंने इसे अवधी में लिखकर इसे लोगभोग्य बनाया।
रामचरित मानस सात कांडों (सर्गों) में विभाजित एक सुबद्ध महाकाव्य है। बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड, लंकाकांड, उत्तरकांड। तुलसीदास कथा के साथ-साथ स्थलविशेष की महिमा, ऋतुओं का वर्णन, मानवचरित्रों के गुण-दोष का आलेखन भी करते गए हैं। प्रत्येक पाठक को इसमें उसकी रुचि के अनुकूल सामग्री मिल ही जाती है।
रामचरित मानस आदर्श की स्थापना का महाकाव्य है। इससे प्रभावित होनेवाले व्यक्ति रामचरित मानस के नायक 'राम' से अवश्य प्रभावित होता है और जीवन में उनके सद्गुणों को आचरण में लाने का प्रयास करता है, इसी तरह 'सीता' का आदर्श चरित्र भी महिलाओं को अपार प्रेरणा देता है। भाषा की सुबोधता तथा सहज ग्राह्यता इसकी उपादेयता में कई गुना वृद्धि करता हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। इस ज्ञान के ग्रंथ को हमें भक्तिपूर्वक पारायण करना चाहिए।
17. भारतीय किसान की दशा
कहने को तो हम भारतीय किसान जगत का तात तथा अन्नदाता जैसे आदरसूचक शब्दों से उसका परिचय हैं। इसमें वास्तविकता भी है। किसान ग्रीष्म-वर्षा-ठंड की परवाह किये बिना खेती में कठोर परिश्रम करके अन्न तथा फल-सब्जी-दूध आदि भोजनोपयोगी सामग्री का उत्पादन करके लोगों तक पहुँचाने का काम करता है, इस अर्थ में वह अन्नदाता तो है ही। किन्तु आज भारतीय किसान की क्या हालत है, इसका पता आपको समाचारों में किसान आत्महत्या की खबरों से चल जाता होगा। किसान की आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण है, उस पर बढ़ता कर्जा यानी कुल मिलाकर देखा जाय तो भारतीय किसान की वर्तमान दशा असंतोषजनक है।
भारतीय किसान की असंतोषजनक होने के कई कारण हैं, उनमें से एक है भूमि का असमान वितरण। भारत में बड़े, मझोले तथा लघुस्तर के किसान तो है ही, साथ ही भूमिहीन किसान भी हैं जो दूसरे की जमीन भाड़े पर या बटाईदारी में लेकर खेती करते हैं। वस्तुओं की महँगाई तथा मजदूरी में बेतहाशा वृद्धि से कृषि की लागत में वृद्धि हुई है। खाद, बीज, सिंचाई, जुताई महँगी हो गई है। परिश्रम से खेती करके फसल उगाने के बाद भी किसान को उसकी लागत भी नहीं मिल पाती। किसानों को आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। किसान को मंडी में औने-पौने दाम पर अपनी चीजें बेचनी पड़ती है। उसने कृषि साधनों या खादबीज आदि के लिए जो ऋण लिया होता है, उसे चुकाना असंभव हो जाता है। लेनदार बैंकों के तगादे पर तगादे उसे बेचन कर देते हैं। पुरानी कहावत है 'किसान कर्ज में जन्म लेता है और कर्ज में ही मर जाता है।’
प्रकृति भी कभी-कभी किसान का साथ नहीं देती। अधिकांश भारतीय कृषि वर्षा पर आधारित है, जो समय पर न होने से या तो पिछड़ जाती है और उत्पादन कम होता है अथवा हो-ही नहीं पाती। कभी अतिवृष्टि, ओला-पत्थर आदि के कारण फसल नष्ट हो जाती है या खराब हो जाती है, जिसका उचित मूल्य बाजार में नहीं मिल पाता। हमारी व्यवस्था कुछ ऐसी है कि जैसे ही किसान के घर में अनाज या दूसरे उत्पादन पहुँचते हैं, मंडियों में उनका दाम गिर जाता है। भंडारण की समस्या से जूझ रहा किसान अपना माल मंडी के हवाले कर देता है और कभी-कभी तो गुस्से में यूँही सड़क पर छोड़कर अपना आक्रोश तथा हताशा व्यक्त करता
कभी निम्नकोटि के बीज किसानों को वितरित किये जाते हैं, जिससे उसकी सारी मेहनत पर पानी फिर जाता है। किसान कहाँ जाए, शिकायत करने। सरकारों के कानों पर जू तक नहीं रेंगती। हालांकि सरकार कुछ उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करती है, किन्तु वह मूल्य भी किसानों को नहीं मिल पाता। अधिकारियों-कर्मचारियों तथा व्यापारियों की सांठ-गांठ से किसान ठगा जाता है। सरकारें बार-बार कर्ज माफी की घोषणा करती हैं, किन्तु उसकी शर्ते भी किसानों को ऋणमुक्त नहीं करा पाती । 'फसल बीमा योजना' की बहुविज्ञापित वास्तविकता यह है कि किसानों को बीमा की रकम के रूप में 50 पैसे, रुपए – दो रुपये या 10 रुपये से कम के चेक किसानों को मिलते हैं। यह अन्नदाता के साथ कैसा भद्दा मजाक है।
सरकारें वचन देती है – स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने का किन्तु उनकी नियत साफ नहीं है। उसमें लागत मूल्य पर 50% लाभ की गणना करने का प्रावधान है किन्तु धूर्त अफसरशाही लागत मूल्य की व्याख्या ही बदल देती है, जिसमें भूमि की लागत तथा किसान का श्रम नहीं गिनने का उपक्रम करके
किसानों के साथ धोखा होता है। जब किसान सरकारी खरीद केन्द्रों पर अनाज लेकर पहुँचता है, तो बोरे नदारद। खुले में माल रखकर हानि उठाने के अलावा उसके पास कोई चारा ही नहीं बचता।
कहाँ तक गिनाया जाय। गन्ना किसानों का वर्षों का बकाया चीनी मिलों पर चढ़ जाता है और जब तक सरकारें चीनी मिलों को कोई पैकेज घोषित नहीं करती तब उसमें की थोड़ी राशि भी नहीं मिल पाती है। अन्नदाता त्राहिमाम पुकार जाता है। परिवार की दुरावस्था देखकर हताशा में वह आत्महत्या जैसा कदम उठाकर अपने आप को स्वयं दंडित करता है। किसानों की दशा के सुधार के लिए यदि ठोस कदम शीघ्र न उठाए गए तो यह हालात दिन-पर-दिन बदतर होते जाएँगे।
18. बेरोजगारी की समस्या
व्यक्ति अपने परिवार के पालनपोषण के लिए कोई न कोई आर्थिक प्रवृत्ति करता ही है, फिर वह चाहे मजदूरी, खेती, कल-कारखाने में अथवा सरकारी-गैरसरकारी संस्थान में छोटी या बड़ी नौकरी है। वह स्वरोजगार-जैसे लुहारी, बढ़ईगिरी जैसी कारीगरी से अर्थोपार्जन करके घर-परिवार चलाता है अथवा छोटी-मोटी दुकानदारी से अथवा फल-सब्जी आदि बेचकर या चाय-पान की रेहड़ी लगाकर। ये तथा ऐसे ही अन्य काम व्यक्ति का रोजगार कहलाते हैं। तकनीकी दृष्टि से काम करना चाहनेवाले व्यक्ति को योग्यता के मुताबिक काम न मिलना ही बेरोजगारी है। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो मौसमी कामधंधे या मजदूरी करते हैं और कुछ समय के लिए उनके पास कोई काम नहीं होता। ऐसे व्यक्ति अर्धबेरोजगार कहलाते हैं। हमारे देश में पूर्ण बेरोजगार तथा अर्ध बेरोजगार व्यक्तियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।
हमारे यहाँ बेरोजगारी का सबसे बड़ा कारण जनसंख्या का विस्फोट है। सरकारी या गैरसरकारी क्षेत्र में जितने रोजगार का सृजन होता है उसके हजारों गुना लोग बेरोजगार होते हैं। इस कारण कभी-कभी उच्च योग्यता वाला व्यक्ति भी निचले दरजे की नौकरी में लग जाना चाहता है। छोटा-मोटा रोजगार-धंधा या मजदूरी करके परिवार के लिए आर्थिक उपार्जन करता है। बेरोजगारी का एक बहुत बड़ा कारण हमारी शिक्षा या गिरता स्तर भी है, जिस कारण हमें योग्य व्यक्ति नहीं मिलते हैं और डिग्रीधारियों की संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होती है और नई नौकरियाँ ऊँट के मुँह में जीरा सिद्ध होती है। शारीरिक श्रमवाले कामों के प्रति तिरस्कार का भाव भी कम नहीं है। आज का नौजवान खेती, पशुपालन का व्यवसाय करने की अपेक्षा चपरासी या चौकीदार की नौकरी के लिए लालायित दिखता है। स्वरोजगार या औद्योगिक साहस का अभाव भी बेरोजगारी का एक बड़ा कारण है। इसके साथ ही अकुशल या अर्धकुशल लोगों की बहुतायत भी बेरोजगारी का एक बड़ा कारण है।
बेरोजगारी अपने आप में तो समस्या है ही साथ ही वह अपने स्थान अनेक नई समस्याओं को भी जन्म देती है। इनमें सबसे प्रमुख है भुखमरी। बच्चों को शिक्षा न दिलाकर काम पर भेजने को मजबूर लोगों को आपने देखा होगा। बेरोजगार व्यक्ति के परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने से वह बीमारियों, तनाव का भोग बनता है। नौयुवक और गैरकानूनी कार्य करने लगते हैं, कभी-कभी तो देश के विरुद्ध-कार्य भी वे करते हैं।
बेरोजगारी की समस्या का हल क्या है ? इसका कोई तात्कालिक अल्पकालीन समाधान संभव नहीं है। व्यक्ति स्वरोजगार की ओर बढ़े तभी कुछ राहतजनक स्थिति निर्मित हो सकती है। पढ़ा लिखा व्यक्ति व्यावहारिक ज्ञान तथा कार्य-कुशलता (Work - Skiil) प्राप्त करे तो कहीं रोजगार-धंधा मिल सकता है। सरकारों से आशा रखना की वे सबको नौकरी दे सकेंगी यह पूर्णवाली नहीं है। पढ़ाई करनेवाले भली-भाँति अच्छी शिक्षा प्राप्त करें तो आज के स्पर्धात्मक दौर में कहीं टिक सकेंगे अन्यथा नहीं।
19. स्वच्छ भारत – स्वस्थ भारत
गंदगी रोगों की जन्मदात्री है, यह सभी समझदार व्यक्तियों को मालूम है। इसके विरुद्ध स्वच्छता हमें अनेक रोगों से बचाती है। हर युग में समाज सुधारकों ने स्वच्छता पर बल दिया है। हमारे वर्तमान लोकप्रिय प्रधानमंत्री जीने स्वच्छता अभियान को एक आंदोलन का रूप दिया है, जिसका नाम है – स्वच्छ भारत – स्वस्थ भारत। निकट अतीत में गांधीजी ने रचनात्मक कार्यक्रम में आजादी के पूर्व स्वच्छता आंदोलन का प्रसार किया था, उसी से प्रभावित है, यह नारा।
अपने घर-गाँव-शहर के साथ सार्वजनिक स्थानों की सफाई के लिए भी सबको प्रोत्साहित किया है। गाँवों में खुले में शौच न करने के लिए केवल बातें ही नहीं कीं अपितु गाँव-गाँव में घर-घर में शौचालय बनवाने के लिए हर व्यक्ति को पूर्ण आर्थिक सहायता प्रदान की है। इससे खुले में शौच जाना महद् अंश तक रूका है, वातावरण को स्वच्छ बनाने में मदद मिली है।
गंगा की सफाई का महाभियान चल रहा है, तो समुद्र तथा पर्वतों से कचरे को हटाने का अभियान भी जोरों पर है। ये अभियान केवल सरकार नहीं चला रही अपितु समग्र निवासी इसमें शामिल हैं। इन्हें प्रोत्साहित करने का काम हमारे लोकप्रिय खिलाड़ी, नेता, अभिनेता, बुद्धिजीवी सभी कर रहे हैं। एवरेस्ट पर्वत शिखर के सफाई का अभियान का एक चरण अभी पूरा हुआ है। इसी तरह गंगा ही नहीं, अपितु अन्य नदियों की सफाई में भी लोग लगे हैं। जल प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए कल-कारखानों द्वारा छोड़े जानेवाले प्रदूषित जल को शुद्ध करने की व्यवस्था की जा रही है, किन्तु अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि औद्योगिक इकाइयों इसमें पूर्ण सहयोग नहीं कर रही हैं।
अभी-अभी पता चला है कि औद्योगिक प्रदूषित जल से भोपाल के आसपास की भूमि भी प्रदूषित हो चुकी हैं। इनमें उगनेवाली सब्जियाँ भी प्रदूषित हैं और गंभीर रोगों का कारण बन रही हैं। यही दशा सभी बड़े नगरों के आस-पास के गाँवों की है। पीने तथा इस्तेमाल के लिए स्वच्छ जल की व्यवस्था एक भगीरथ कार्य है। हवा-पानी-भूमि के प्रदूषण के कारण जनस्वास्थ्य के सम्मुख भयंकर खतरे उपस्थित हैं। इस कारण इन्हें दूर करने, रोकने तथा कम करने की और सबका ध्यान गया है। स्वास्थ्य के लिए यह एक गंभीर चुनौती है।
बढ़ते शहरीकरण ने शहरों के अंदर तथा आसपास मलिन बस्तियों का प्रसार किया है, जिनमें जीवन के लिए
रहनेवाले गरीब लोगों का स्वास्थ्य-स्तर गिरा है साथ ही शहरों में प्रदूषण भी बढ़ा है। इनमें भी सुधार की अत्यंत जरूरत है।
शहरों में दोपहिए तथा चार पहियेवाले वाहनों की संख्या में वृद्धि तेजी से हुई है, जिससे वायु प्रदूषण के साथ ही ध्वनि प्रदूषण भी बढ़ा है। ध्वनि प्रदूषण के बढ़ते स्तर के कारण बहरेपन का खतरा भी दिखाई दे रहा है।
समग्रतया देखें तो जल, वायु, भूमि के प्रदूषण को रोकने पर ही स्वच्छता हो सकती है। स्वच्छ वातावरण अच्छे स्वास्थ्य की अनिवार्य शर्त है, यह हमें भूलना नहीं चाहिए। 'स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क वास करता है।’
20. गणतंत्र दिवस (26 जनवरी)
प्रत्येक राष्ट्र में सामाजिक, धार्मिक त्यौहारों या पर्वो के साथ कुछ राष्ट्रीय पर्व भी मनाए जाते हैं। 1947 में स्वतंत्रता मिलने पर स्वाधीनता दिवस (15 अगस्त) हमारा पहला राष्ट्रीय पर्व बना। राष्ट्रीय पर्यो का एक ऐतिहासिक संदर्भ होता है। भारत के राष्ट्रीय पर्यो में गणतंत्र दिवस का अत्यंत महत्त्व है, जिसे हम प्रतिवर्ष 26 जनवरी को मनाते हैं।
यूँ तो भारत देश 15 अगस्त, 1947 को ही आजाद हो गया था किन्तु वह आजादी अधूरी थी क्योंकि उस समय तक देश का कोई अपना संविधान नहीं था। संविधान सभा के गठन के पश्चात् नवम्बर, 1949 में हमारा संविधान बनकर तैयार हुआ। इस संविधान को पूर्ण स्वराज्य की माँग (1930) वाले लाहौर अधिवेशन की याद में 26 जनवरी, 1950 से लागू किया गया। इसीलिए हम प्रतिवर्ष 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं।
गणतंत्र दिवस भारत में तो बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है, साथ ही विश्व में जहाँ कहीं भी भारतीय रहते हैं वहाँ भी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। सरकारी स्तर पर मुख्य आयोजन राजधानी दिल्ली में नई दिल्ली के इंडिया गेट के निकट इसका भव्य आयोजन होता है। इस दिन भारत के महामहिम राष्ट्रपति पहले ध्वजारोहण करते हैं तथा सेना के तीनों अंगों की सलामी लेते हैं। सैनिक परेड में अस्त्र-शस्त्र का प्रदर्शन किया जाता है। देश के राज्यों की झाँकियाँ राजपथ पर निकलती हैं। स्कूल-कॉलेजों से चुने हुए एन.सी.सी. कैडेट्स भी परेड में शामिल होते हैं। देश के विभिन्न कोने से आए लोक कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।
राज्य सरकारें भी अपनी-अपनी राजधानी में अर्धसैनिक बलों, पुलिस तथा स्कूली छात्रों की परेड का आयोजन करती हैं। राज्यपाल महोदय ध्वजारोहण करते हैं। शहरों तथा गाँवों के स्कूल-कॉलेजों में भी यह दिवस अत्यंत उल्लास के साथ मनाया जाता है। ध्वजारोहण के पश्चात् अतिथि का अभिभाषण होता है। तत्पश्चात् सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं। कॉलेजों में एन.सी.सी. के कैडेट्स ध्वज को सलामी देते हैं।
राजधानी दिल्ली के भव्य आयोजन को देखने के लिए अपार जनसमूह एकत्र होता है। यही हाल राज्य तथा जिला एवं ग्राम स्तर के आयोजनों का होता है।
गणतंत्र दिवस हमें एक प्रभुत्त्वसंपन्न राष्ट्र के नागरिक के रूप में अपने कर्तव्यों की याद दिलाता है तथा उन शहीदों का स्मरण कराता है जिन्होंने अपना बलिदान देकर हमें यह अमूल्य स्वाधीनता दिलाई तथा एक गणतंत्र के निर्माण भगीरथ कार्य किया है। हमें भी राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन सर्वोत्कृष्ट ढंग से करने के लिए सदैव तत्पर रहना पड़ेगा। संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों की रक्षा तथा कर्तव्यों का पालन करना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है।
21. बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ
भारत के सामाजिक सरोकारों को ध्यान में रखते हुए हमारे वर्तमान लोकप्रिय प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्रभाई मोदी ने सत्तासीन होने पर यह नारा दिया – बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।
पिछले कई दशकों में भारत में स्त्री-पुरुष की संख्या का अनुपात जिस तेजी से विषम हुआ है, यह स्थिति पूरे उत्तर और मध्य भारत की है। पंजाब, हरियाना, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात तथा मध्य प्रदेश में जन्मदर में बालिकाओं का अनुपात घटा है। इसका सबसे बड़ा कारण हमारी मानसिकता है, जो बालिका के जन्म को भार समझती है। स्त्री गर्भ का भ्रूण परीक्षण करवाकर उसे नष्ट कराने का उपक्रम सामान्य जन द्वारा निकट अतीत में हो रहा है। परिणामस्वरूप आज स्त्रियों की जनसंख्या में कमी आई है। इसी को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री ने हरियाणा से इस आंदोलन का शुभारंभ किया। प्रसिद्ध सिनेतारिका माधुरी दीक्षित इसकी ब्रांड अंबेसडर हैं। बेटी बचाओ के संदर्भ गर्भवती महिलाओं का उचित पोषक खुराक और डॉक्टरी सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। ग्राम स्तर से शुरू करके जिला स्तर पर इसकी देखरेख की जा रही है। बालिकाओं की जन्मदर में होनेवाली कमी को रोकने तथा उनके जन्म को प्रोत्साहित करके 'बेटी बचाओ' का कार्यक्रम पूरा किया। जा सकता। साथ 'बचाओ' के अंतर्गत उसके उत्तम लालन-पालन, शिक्षा व्यवस्था को भी शामिल किया गया है। उनके पालन-पोषण में लिंग संबंधी भेदभाव न हो, इसका भी ध्यान रखना है। यह छोटी-सी पहल, एक बहुत बड़े परिवर्तन का आगज है।
‘बेटी पढ़ाओ’ रूढिगत मानसिकता पर प्रहार है जो बेटी को केवल चूल्हा-चौके तक सीमित करने की हिमायत करती है। बालिकाओं को शिक्षा सुचारु ढंग से दी जाए ताकि उनका व्यक्तित्व सर्वांगीण विकास हो और वे समाज तथा देश के नवनिर्माण में नये सिरे से जुट जाएँ। भारतीय युवती जीवन के हर क्षेत्र में आगे निकलने को तत्पर है। उसको उच्च शिक्षा मिले तो. वह राज्य तथा देश के लिए नीति निर्धारण में अपनी सक्रिय भूमिका निभा सकती है।
आइए, हम सब मिलकर यह शपथ लें कि भ्रूण का परीक्षण नहीं करवायेंगे, न ही स्त्री भ्रूण का गर्भपात
विकास के लिए सदा प्रयत्नशील रहेंगे। तब प्रधानमंत्री का यह नारा सार्थक होगा और देश की सामाजिक कुरीतियों का विनाश होगा।
22. स्मार्ट फोन
समकालीन समय में विज्ञान तथा टेक्नोलॉजी ने जिन अद्भुत उपकरणों का आविष्कार किया है, उनमें से एक है स्मार्ट फोन। यह भी एक तरह मोबाइल फोन है जो अन्य संचार सुविधाओं से लैस होकर स्मार्ट बन गया है।
स्मार्ट फोन ने जनसंचार की दुनिया में क्रांति ला दी है। अब यह केवल संदेश या समाचार के आदान-प्रदान या नये-पुराने गानों सुनने का साधन नहीं है बल्कि सूचनाओं, चित्रों डीवीडी को शीघ्रता से आदान-प्रदान का विशिष्ट उपकरण बन गया है। इंटरनेट से जुड़कर यह भी कम्प्यूटर के सारे काम करता है। इस तरह यह एक अत्यंत उपयोगी डिवाइस हो गया है।
ई-मेल, फोटो-फिल्म का आदान-प्रदान तत्काल संभव बना है। लोगों के बीच शीघ्रता से समाचार का विश्वसनीय साधन है।
इतना ही नहीं ऐसे फोन से आप अपनी विविध विषयों की पुस्तकें पीडिया फॉर्म में डाउनलोड कर सकते हैं और अपनी इच्छा एवं सुविधा के मुताबिक उन्हें पढ़ सकते हैं। स्मार्ट फोन द्वारा इंटरनेट के माध्यम से तरह-तरह की सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती हैं। इसकी मदद से फोटा खींचना, प्रिंट निकाला, आँकड़े (डाटा) का संकलन, संयोजन, प्रोजेक्ट बनाने का काम आसानी से हो सेकता है। स्मार्टफोन के वॉट्स एप तथा फेसबुक का उपयोग करके देश-विदेश में बसे अपने परिचितों-मित्रों के संपर्क में रहते हैं।
यह तो स्मार्ट फोन का शुक्ल पक्ष। जहाँ इससे अनेक लाभ हैं वहाँ हानियाँ भी कम नहीं हैं। विशेषकर माध्यमिक कक्षाओं का छात्र वर्ग इसके दुष्प्रभावों से अनजान होने के कारण स्मार्ट फोन के चंगुल में फँस कर अपना कीमती समय सोशल मीडिया को देखने में बरबाद करता है। स्मार्ट फोन इनके लिए स्टेटस सिंबल बन गया है। स्मार्ट फोन पर उपस्थित कतिपय ऊल जलूल फिल्में, पॉर्न संदेश आदि में उनको इतना तो आनंद आता है कि वे अपनी पढ़ाई-लिखाई छोड़कर स्मार्ट फोन के पीछे अपना कीमती समय बरबाद करके अपने भविष्य को जोखिम में भी डालते हैं। इससे उनके स्वास्थ्य तथा पढ़ाई पर भी गहरा दुष्प्रभाव पड़ता है। स्मार्ट फोन के कारण किशोर-अपराध में वृद्धि हुई है।
किसी भी वस्तु का अच्छा या बुरा होना उसके उपयोग पर निर्भर रहने में हैं। स्मार्ट फोन भी विज्ञान का अद्भुत वरदान है, इसका दुरुपयोग इसे अभिशाप बना सकता है। छात्रों को विशेष रूप से टीन-एजर्स को इसके उपयोग में अत्यंत सावधानी रखनी चाहिए।
23. इंटरनेट (आंतर-जाल)
Answer: 'इंटरनेट' का मतलब होता है आंतरिक जाल। यह एक जाल है जो सिर्फ कंप्यूटर से जुड़ा है। कंप्यूटर केवल गणना का काम ही नहीं करता, बल्कि बहुत तरह की जानकारी भी अपनी मेमोरी में जमा करता है। इस जमा की हुई सूचना को आपस में बदलने के लिए कंप्यूटरों का एक-दूसरे से जुड़ा होना ही इंटरनेट कहलाता है। यह मानव जाति के लिए एक अद्भुत उपहार है।
इंटरनेट कई क्षेत्रों की बहुत सारी सूचनाओं को अपने अंदर समेटे हुए है। यह आम लोगों और खास विषयों या क्षेत्रों में काम करने वालों, दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी है। आज इंटरनेट जरूरत से ज्यादा बढ़कर एक अनिवार्य चीज बन चुका है। अब यह बड़े शहरों से निकलकर छोटे कस्बों और गांवों तक फैल गया है। कंप्यूटर के बिना भी स्मार्टफोन या मोबाइल फोन के माध्यम से इंटरनेट का उपयोग किया जा रहा है।
इंटरनेट की मदद से दुनिया के किसी भी कोने में बैठा व्यक्ति संसार में हो रही गतिविधियों की जानकारी कुछ सेकंडों में पा सकता है। इंटरनेट की मदद से लोग आपस में बातें कर सकते हैं और विचार-विमर्श कर सकते हैं। इसके सामने दूसरे साधन कम प्रभावी साबित हुए हैं। सूचनाओं का यह विशाल भंडार बेजोड़ है।
इंटरनेट का उपयोग बहुत बड़े और विस्तृत रूप में हो रहा है। यात्रा टिकटों की बुकिंग, बैंकिंग के काम, ऑफिस के पत्र-व्यवहार, ताजा समाचार जानने या अखबार पढ़ने के साथ ही इंटरनेट पर कविता, कहानी, चुटकुले भी पढ़े जा सकते हैं। मनचाही फिल्में देखी जा सकती हैं और गाने सुने जा सकते हैं। टीवी के कार्यक्रम भी देखे जा सकते हैं। इंटरनेट ने सूचना संचार की दुनिया में एक बड़ी क्रांति ला दी है। उपयोगिता और फायदे के हिसाब से यह किसी वरदान से कम नहीं है।
जैसे एक सिक्के के दो पहलू होते हैं, वैसे ही इंटरनेट से मिलने वाली सामग्री का एक नकारात्मक पक्ष भी है। इसका गलत उपयोग करके सांप्रदायिक दंगे भड़काने, जातिगत नफरत बढ़ाने, और वर्ग-संघर्ष पैदा करने का काम पिछले कुछ सालों में भारत में भी देखा गया है। इंटरनेट द्वारा तरह-तरह की अफवाहें जंगल की आग की तरह फैलती हैं। इतना ही नहीं, कम उम्र के लोगों द्वारा इसका उपयोग अश्लील दृश्यों और फिल्मों को देखने से उनमें बुराई आना और फैलना स्वाभाविक है। इसलिए इंटरनेट का उपयोग किन चीजों के लिए करना है, इसका ज्ञान उपयोगकर्ता को होना चाहिए, नहीं तो यह उसके लिए एक अभिशाप भी बन सकता है।
इंटरनेट हर आयु वर्ग के व्यक्ति के लिए उपयोगी है। यह उपयोग करने वाले पर निर्भर करता है कि वह उसका कितना अच्छा उपयोग करके अपने जीवन में फायदा उठाता है। यदि कोई व्यक्ति इसका गलत उपयोग करता है, तो इसमें इंटरनेट का कोई दोष नहीं है, दोष उपयोग करने वाले की सोच का है।
Exam Tip: जब आप इंटरनेट पर निबंध लिख रहे हों, तो इसके फायदे और नुकसान, साथ ही समाज पर इसके प्रभाव को संतुलित रूप से बताना महत्वपूर्ण है।
24. समाचारपत्र और उसकी उपयोगिता
Answer: समाचार पत्र हमें खबरें देने वाला कागज है। छपाई की शुरुआत के साथ ही समाचार पत्र का अस्तित्व संभव हुआ। भारत में समाचार का पहला जन्म बंगाल में हुआ था।
समाचार पत्र लोगों की इच्छाओं, आकांक्षाओं और जिज्ञासा को शांत करने का एक बहुत महत्वपूर्ण तरीका है। कहा गया है - इस अंधेरे संसार में अखबार एक दीपक है। यह आपको सही रास्ता दिखाता है और आपकी आंखें चार कर देता है (यानी आपको सब कुछ दिखाता है)।
आज समाचार पत्र हमारे रोजमर्रा के जीवन का एक जरूरी हिस्सा है। सुबह हर मध्यमवर्गीय या उच्चवर्गीय व्यक्ति अपने दैनिक काम खत्म करने के बाद अखबार ढूंढता है।
समाचार पत्र में क्या छापना है और क्या नहीं, इसका निर्णय करने वाला व्यक्ति संपादक कहलाता है। एक अच्छा संपादक लोगों की भावनाओं और विचारों को आवाज देता है। वह हर पृष्ठ की सामग्री के बीच तालमेल बिठाता है। उसका मुख्य काम पहले पृष्ठ की खबरों की हेडलाइन पर ध्यान देना और संपादकीय लेख प्रस्तुत करना है।
संपादक के अधीन काम करने वाले संवाददाता, खास संवाददाता और विभिन्न स्रोतों से सामग्री संपादक तक पहुंचाते हैं। यह सामग्री संपादक के निर्देशों के अनुसार विभिन्न पृष्ठों पर तैयार की जाती है। समाचार पत्र में खबरों के अलावा लेख, संपादकीय, संपादक के नाम पत्र, पाठकों का कोना या इसी तरह के अन्य स्थायी कॉलम होते हैं, जो रोज या हफ्ते के खास दिनों में छपते हैं। इस सामग्री के साथ विज्ञापन भी जोड़े जाते हैं। असल में विज्ञापनों से होने वाली आय ही समाचार पत्र के प्रकाशन का सबसे बड़ा आर्थिक स्रोत है।
पूरी तरह तैयार समाचार पत्र वितरक एजेंटों द्वारा पहुंचाया जाता है, जहां से वह गांव-गांव, शहर-शहर में लोगों तक हॉकर के माध्यम से पहुंचता है।
इस तरह से प्राप्त समाचार की सबसे बड़ी उपयोगिता यह है कि वह आपको अपने आस-पास के जगत, प्रमुख राजनीतिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और खेलकूद की घटनाओं से परिचित कराता है। लेख-संपादकीय के माध्यम से वह जनमत को भी प्रभावित और शिक्षित करता है। लोकमत के निर्माण का एक महत्वपूर्ण साधन होने के कारण ही उसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। यह सरकारों के कामकाज पर बारीकी से नजर रखते हैं। इस तरह समाचार पत्र एक बहुत ही शक्तिशाली उपकरण के रूप में सामने आता है। पत्रकारिता के शुरुआती वर्षों में एक कहावत मशहूर थी – – 'अगर तोप सामने हो तो अखबार निकालो।' अखबार केवल नीतियों-कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार ही नहीं करता, बल्कि गलत नीतियों का विरोध भी करता है।
Exam Tip: समाचार पत्र पर निबंध लिखते समय, इसकी भूमिका, लाभ और समाज पर प्रभाव के विभिन्न पहलुओं को कवर करना सुनिश्चित करें। एक अच्छी संरचना में परिचय, मुख्य भाग और निष्कर्ष शामिल होने चाहिए।
25. स्वदेश प्रेम (हमारा प्यारा भारत)
Answer: स्वदेश प्रेम का मतलब है अपने देश से प्यार, देश के प्रति वफादारी और सम्मान का भाव। इसे एक तरह से राष्ट्रीयता भी कह सकते हैं। एक हिंदी कवि ने कहा है –
जो भावों से भरा नहीं, जिसमें प्रेम की धारा नहीं बहती,
वह हृदय नहीं, पत्थर है, जिसमें देश से प्यार नहीं।
हमारा देश भारत है और हम सब भारतीय हैं। हमारा एक बहुत ही शानदार अतीत है। भारत ने कभी भी किसी दूसरे देश पर हमला नहीं किया। इसके बजाय, सदियों पहले कई विदेशी आक्रमणकारियों ने हम पर हमले किए, लेकिन जो भी यहां आया, वह यहीं का होकर रह गया। हम एक ऐसा देश हैं जो सभी को अपने अंदर समा लेता है। इसलिए रवींद्रनाथ ने इसे 'मानव जाति का महासागर' कहा था। हमारे यहां कई धर्मों, संप्रदायों, जातियों-प्रजातियों के लोग रहते हैं। इस विविधता में एकता ही हमारी सबसे खास पहचान और ताकत है। सदियों से मिल-जुलकर रहने वाली भारतीय जनता बहुत सहनशील है। सहनशीलता ही भारतीयता की पहचान है।
हजारों साल की गुलामी के बाद, हमने अहिंसक संघर्ष से आजादी पाई। अहिंसा हमारे लिए एक स्वाभाविक धर्म है। हमें अपने अतीत पर गर्व है।
भारत हमारी मातृभूमि है। दुष्यंत-शकुंतला के महान पुत्र भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा है। त्याग और तपस्या की इस भूमि ने पूरी मानवता को प्रेम, भाईचारे और संयम का संदेश दिया है। हमारा देश धर्म, संस्कृति और दर्शन का संगम और मानवता का पोषण करने वाला देश है। इन्हीं खासियतों के कारण इकबाल ने कहा था – 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा।'
हमारा देश उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक और पूर्व में अरुणाचल-मिजोरम से लेकर पश्चिम में गुजरात तक फैला हुआ है। दिखने में अलग-अलग होते हुए भी यह एक है। हमारी भाषाएं भले ही अलग हों, वेशभूषा भी अलग-अलग हो, लेकिन हम सभी इस देश को अपना मानते हैं। यह हमारा देश है।
हमारा देश भारत महान पुरुषों की जन्मभूमि रहा है। ईश्वर ने यहां बार-बार अवतार लिया है। ऋषि-मुनियों की तपस्या से यह पवित्र बना है। हमें अपने देश पर बहुत गर्व है। हर नागरिक को देश के सम्मान की रक्षा के लिए खुद को बलिदान करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।
इस देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले हमारे वीर सैनिक किसी एक प्रांत, जाति, धर्म, या भाषा के नहीं होते, बल्कि यहां की सभी जातियों, धर्मों, भाषाओं और प्रांतों से चुने जाते हैं। विविधता में सच्ची एकता की पहचान हमारी भारतीय सेना है। ये वीर सैनिक किसी भी शत्रु का सामना करने में सक्षम हैं और अवसर आने पर अपना सबसे बड़ा बलिदान देते हैं। यह उनका देश प्रेम ही है, जो हमारे लिए गर्व और सम्मान की बात है।
Exam Tip: स्वदेश प्रेम पर निबंध लिखते समय, भारत की विविधता में एकता, ऐतिहासिक महत्व, सांस्कृतिक विरासत और देशभक्ति की भावना पर जोर देना महत्वपूर्ण है।
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