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निम्नलिखित प्रत्येक गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए:
1. हाथ की मजदूरी से ही सच्चे ऐश्वर्य की उन्नति होती है। जापान में मैंने कन्याओं और स्त्रियों को ऐसी कलावती देखा है कि वे रेशम के छोटे-छोटे टुकड़ों को अपनी दस्तकारी की बदौलत हजारों की कीमत का बना देती हैं, नाना प्रकार के प्राकृतिक पदार्थों और दृश्यों को अपनी सुई से कपड़े के ऊपर अंकित कर देती हैं। जापान-निवासी कागज, लकड़ी और पत्थर की बड़ी अच्छी मूर्तियाँ बनाते हैं। करोड़ों रुपयों के हाथ के बने हुए जापानी खिलौने विदेशों में बिकते हैं। हाथ की बनी हुई जापानी चीजें मशीन से बनी हुई चीजों को मात करती हैं। संसार के सब बाजारों में उनकी बड़ी मांग रहती है। पश्चिमी देशों के लोग हाथ की बनी हुई जापान की अद्भुत वस्तुओं पर जान देते हैं। यदि भारत के तीस करोड़ नरनारियों की उँगलियाँ मिलाकर कारीगरी के काम करने लगें तो उनकी मजदूरी की बदौलत कुबेर का महल चरणों में आप-ही-आप आ गिरे।
– सरदार पूर्णसिंह
Question 1.
1. जापान की स्त्रियाँ किस कला में निपुण हैं?
2. जापान की हाथ-कारीमरी की कौन-सी चीजों की विदेशों में बड़ी माँग रहती है?
3. इस परिच्छेद के लिए एक उचित शीर्षक दीजिए।
Answer:
1. जापान की महिलाएँ दस्तकारी में माहिर हैं। वे विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक दृश्यों और सामग्रियों को सुई की मदद से रेशम के कपड़ों पर इस तरह दर्शाती हैं कि प्रत्येक टुकड़ा हजारों रुपयों का मूल्यवान बन जाता है।
2. जापान की हाथ से बनी कई चीजों की विदेशों में बहुत माँग है, जिनमें कागज, लकड़ी और पत्थर से बनी मूर्तियाँ और खिलौने मुख्य हैं।
3. उचित शीर्षक: जापान की दस्तकारी
In simple words: जापानी महिलाएँ हस्तकला में कुशल हैं और हाथ से बनी जापानी चीजों, खासकर मूर्तियाँ और खिलौनों की विदेशों में बहुत मांग है। इसका उचित शीर्षक 'जापान की दस्तकारी' है।
Exam Tip: जब गद्यांश से प्रश्न पूछे जाएँ, तो उत्तर देते समय सीधे-सीधे गद्यांश की जानकारी का उपयोग करें, और सुनिश्चित करें कि शीर्षक गद्यांश के मुख्य विचार को दर्शाता हो।
2. खुशामद की कला का अपना विज्ञान है। इसके अपने सिद्धांत हैं। किसकी खुशामद करना, कब खुशामद करना, कैसे खुशामद करना – इसका ज्ञान तो होना ही चाहिए। महिलाओं से मतलब निकालना हो, तो उनके रूप-सौंदर्य और वेशभूषा की प्रशंसा कर दीजिए। पुरुषों से काम निकालना हो, तो उनकी बुद्धि, पराक्रम का बखान कर दीजिए। दाता और दानवीर कहने से कंजूस सेठ के दिल में भी उदारता उमड़ पड़ती है। चापलूसी करते समय सामनेवाले पक्ष की ही प्रशंसा करनी चाहिए। भूलकर भी अपनी बड़ाई नहीं करनी चाहिए। सामनेवाले के किसी शत्रु या द्वेषी की निंदा चापलूसी को और भी असरकारक बना देती है। आदर्श चापलूसी वही है, जिससे सामनेवाला फूलकर कुप्पा हो जाए और चापलूस की मुराद पूरी कर दे।
Question 1.
1. महिलाओं से मतलब निकालने के लिए क्या करना चाहिए?
2. आदर्श चापलूसी कब सिद्ध होगी?
3. पुरुषों से काम निकालने के लिए क्या करना चाहिए?
Answer:
1. महिलाओं से काम निकलवाने के लिए उनकी सुंदरता और पहनावे की तारीफ करनी चाहिए।
2. आदर्श चापलूसी तभी सफल होगी, जब सुनने वाला अपनी तारीफ सुनकर बहुत खुश हो जाए और चापलूस का उद्देश्य पूरा हो जाए।
3. पुरुषों से काम निकालने के लिए उनकी समझ और बहादुरी की प्रशंसा करनी चाहिए।
In simple words: महिलाओं से काम के लिए उनकी सुंदरता, पुरुषों से काम के लिए उनकी बुद्धि की तारीफ करें। चापलूसी तभी सफल होती है जब सुनने वाला खुश होकर अपना काम कर दे।
Exam Tip: ऐसे प्रश्नों के उत्तर में, गद्यांश में दिए गए विशिष्ट सुझावों को पहचानें और उन्हें स्पष्ट रूप से व्यक्त करें।
3. इस धरती पर प्रभु की सर्वोत्तम रचना मानव है, परन्तु यह सर्वश्रेष्ठ क्यों? सम्भवतः कम लोग ही इसका रहस्य जानते हैं। इस धरती के सभी जीवजन्तु एवं प्राणधारियों में सोना, खाना, पीना, बच्चे पैदा करना आदि अधिकांश बातें समान हैं। विशेषता है तो केवल मानव के धर्म की, जीवन में कर्तव्य और ज्ञान की। यह कैसी विडम्बना है कि मानव इस धरती पर सर्वश्रेष्ठ होने के बावजूद यह नहीं सोच पाता है कि वह इस संसार में क्यों आया है? उसे क्या करना है, कहाँ जाना है? तथा उसके जीवन का ध्येय क्या है? उद्देश क्या है? इन बातों पर विचार करने के बजाय वह अपने शरीर को सुख देनेवाले कार्यों में लिप्त रहता है। किन्तु वह भूल जाता है कि यह शरीर कितना गन्दा है, इससे निकलनेवाली प्रत्येक वस्तु कितनी दुर्गन्धयुक्त और अपवित्र है। आँख, कान, नाक और गुदा द्वारा गन्दा मल निकलता है, जिन्हें एक क्षण के लिए भी हम अपने पास नहीं रख सकते हैं। किन्तु वही मल जब तक शरीर के अन्दर होता है तब तक इसमें किसी भी प्रकार की गन्ध नहीं आती, क्योंकि उसे शुद्ध करनेवाली आत्मा शरीर में होती है। इस आत्मारूपी शक्ति को जानने की तथा उसे उद्गीव करने के लिए कभी सोचा? कभी प्रयत्न किया? योगसाधना इसका मार्ग है। योगसाधना ही मनुष्य को सर्वोत्तम प्राणी सिद्ध कर सकती है।
Question 1.
1. प्रभु की सर्वोत्तम रचना कौन-सी है?
2. कौनकौन सी बातें जीवजन्तु तथा प्राणधारियों में समान हैं?
3. योगसाधना किसका मार्ग है?
Answer:
1. ईश्वर की सबसे उत्तम रचना मनुष्य है।
2. सोना, भोजन करना, पानी पीना और बच्चे पैदा करना जैसी बातें सभी जीव-जंतुओं और जीवित प्राणियों में एक जैसी हैं।
3. योगसाधना अपनी आत्मशक्ति को जानने और उसे विकसित करने का तरीका है।
In simple words: भगवान ने सबसे अच्छा इंसान बनाया है। सभी जीव सोने, खाने, पीने और बच्चे पैदा करने में एक जैसे हैं। योगसाधना हमें अपनी अंदर की शक्ति जानने में मदद करती है।
Exam Tip: गद्यांश से सीधे जानकारी निकालने वाले प्रश्नों में, सुनिश्चित करें कि आपका उत्तर गद्यांश में दिए गए तथ्यों से पूरी तरह मेल खाता हो।
4. हंसने का एक सामाजिक पक्ष भी होता है। हँसकर हम लोगों को अपने निकट ला सकते हैं और व्यंग्य करके उन्हें दूरस्थ बना देते हैं। जिसको भगाना हो उसकी थोड़ी देर हँसी-खिल्ली उड़ाइए, वह तुरंत बोरिया-बिस्तर गोलकर पलायन करेगा। जितनी मुक्त हँसी होगी, उतना समीप व्यक्ति खिचेगा। इसीलिए तो श्रोताओं की सहानुभूति अपनी ओर घसीटने के लिए चतुर वक्ता अपना भाषण किसी रोचक कहानी या घटना से आरंभ करते हैं। जनता यदि हँसी, तो चंगुल में फैसी। सामाजिक नियमों और मूल्यों को मान्यता दिलाने और रूढ़ियों को निष्कासित करने में पुलिस या कानून सहायता नहीं करता, किंतु वहाँ हास्य का चाबुक अचूक बैठता है। हास्य के कोडे, उपहास-डंक और व्यंग्य-बाण मारकर आदमी को रास्ते पर लाया जा सकता है। इस प्रकार गुमराह बने हुए समाज की रक्षा की जा सकती है।
Question 1.
1. समाज में हंसी और व्यंग्य का क्या उपयोग होता है?
2. हास्य का चाबुक कौन-सा विशेष कार्य करता है?
3. इस परिच्छेद के लिए एक उचित शीर्षक दीजिए।
Answer:
1. समाज में, हंसी का उपयोग लोगों को करीब लाने के लिए होता है और व्यंग्य का उपयोग उन्हें गलत कामों से दूर करने के लिए होता है।
2. हास्य का चाबुक सामाजिक नियमों और मूल्यों को स्वीकार करने तथा पुरानी प्रथाओं को दूर करने का खास काम करता है।
3. उचित शीर्षक: हास्य-व्यंग्य का प्रभाव
In simple words: समाज में हँसी लोगों को पास लाती है और व्यंग्य उन्हें गलत चीजों से दूर रखता है। हँसी-मजाक से सामाजिक नियम माने जाते हैं और पुरानी सोच खत्म होती है।
Exam Tip: गद्यांश के मुख्य विषयों को ध्यान से पहचानें ताकि आप उसके प्रभाव और उपयोगिता को सही ढंग से बता सकें, खासकर जब शीर्षक पूछा जाए।
5. जीवन एक अनमोल निधि है। यदि आप किसी कारणवश उसका समुचित लाभ अथवा आनंद नहीं उठा पाते, तो आपका पहला कर्तव्य है कि आप अपनी वर्तमान परिस्थिति का अच्छी तरह विश्लेषण करें। आपकी समस्या क्या है, इसे भली-भाँति समझें और अपनी मुश्किलों को दूर करने का उपाय सोचें। इसके विपरीत यदि आप परिस्थितियों को अपने ऊपर हावी होने देते हैं और अपने वास्तविक एवं कल्पित कष्टों से मन को दुःखी बनाए रहते हैं, तो आप अपने जीवन का रस नहीं ले सकते। बहुत संभव है, आपका कष्ट आर्थिक हो। परिवार के कई लोगों के भरणपोषण के लिए आपको अप्रिय अथवा अरुचिकर कार्य भी करने पड़ते हों, आपको काफी वेतन न मिलता हो अथवा किसी गंभीर कष्ट से आप दबे हों, लेकिन घबराने से क्या इन सबका निराकरण हो जाएगा? अतः समस्या से डरिए मत, उसकी शिकायत मत कीजिए, बल्कि जूझने के लिए तैयार हो जाइए।
Question 1.
1. हम जीवन को रसमय कैसे बना सकते हैं?
2. जीवन का सच्चा आनंद कैसे लिया जा सकता है?
3. मनुष्य अरुचिकर कार्य करने के लिए कब तैयार होता है?
Answer:
1. हम स्थितियों का सामना करके और अपने वास्तविक तथा काल्पनिक दुखों से मन को परेशान न होने दें। इस प्रकार हम अपने जीवन को खुशनुमा बना सकते हैं।
2. अपनी स्थिति और मौजूदा समस्या को अच्छी तरह समझकर कठिनाइयों को दूर करने का तरीका सोचने और करने पर जीवन का सही आनंद लिया जा सकता है।
3. जब इंसान को बड़े परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी बहुत परेशान कर रही हो, उसे कम वेतन मिलता हो या किसी गंभीर मुसीबत में फंसा हो, तभी वह अरुचिकर काम करने को तैयार होता है।
In simple words: हम अपनी समस्याओं को समझकर और उन्हें दूर करके जीवन को खुशहाल बना सकते हैं। जब आदमी बहुत परेशान होता है, तभी वह मुश्किल काम करने को तैयार होता है।
Exam Tip: जीवन में कठिनाइयों के बावजूद सकारात्मक रहने और समस्याओं का सामना करने की प्रेरणा को उत्तरों में प्रमुखता से दर्शाएँ।
6. मनुष्य सुख के पीछे लगा रहता है। सुख पाने की, खुश बनने की वह जीवनभर कोशिश करता रहता है। जीवन में आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद उसे सुख मिलता है। उत्सव के दिनों में भी उसे सुख मिलता है। जीवन में आवश्यकताओं का तांता लगा रहता है। एक की पूर्ति के बाद दूसरी सामने आती है। इसलिए पूर्ति के बाद मिलनेवाला सुख अधिक समय तक नहीं रहता। उत्सव में हम किसी आवश्यकता का अनुभव नहीं करते। हम सारे कामकाज छोड़ बैठते हैं। खुशियाँ मनाते - हैं। मेहमानों से मिलते हैं। खाते हैं। खिलाते हैं। अपनी चिंताएं भूल जाते हैं। केवल अपने मनुष्यपन को ख्याल में रखते हैं। स्वार्थ को मन में नहीं लाते। दो दिनों के लिए एक अलग दुनिया बसाते हैं और उसी में खो जाते हैं। बिना कारण घूमते हैं। व्यर्थ में खर्च करते हैं। फिर भी हम खुश रहते हैं! ये दिन हमें सांसारिक बंधन और चिंताओं से दूर खुशी की दुनिया में ले जाते हैं। उत्सव का सुख-टॉनिक जैसा है।
Question 1.
1. मनुष्य जीवनभर किस बात को पाने का प्रयत्न करता है?
2. आवश्यक चीजें मिलने के बाद उनके मिलने का सुख अधिक समय तक क्यों नहीं रहता?
3. इस परिच्छेद के लिए एक उचित शीर्षक दीजिए।
Answer:
1. इंसान जीवनभर खुशी और आनंद प्राप्त करने का प्रयास करता रहता है। उसे पाने के लिए वह अपनी जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करता रहता है।
2. जीवन में जरूरतें खत्म नहीं होती हैं। इसलिए जरूरी चीजें मिलने के बाद भी उनका आनंद ज्यादा देर तक नहीं रहता।
3. उचित शीर्षक: उत्सव का सुख अथवा उत्सवों का महत्त्व
In simple words: इंसान हमेशा खुशी ढूंढता है और अपनी ज़रूरतें पूरी करने की कोशिश करता है। ज़रूरतें कभी खत्म नहीं होतीं, इसलिए चीज़ें मिलने के बाद भी खुशी ज़्यादा देर नहीं टिकती।
Exam Tip: यह गद्यांश मानव स्वभाव और खुशी की प्रकृति पर केंद्रित है; उत्तरों में इस मूल विचार को बनाए रखें।
7. एक युवक का दूसरे युवक को राह दिखाना वैसा ही है, जैसे कि एक अंधा दूसरे अंधे को राह बताए; वे दोनों गड्ढे में गिरेंगे। वही एक विश्वासु मार्गदर्शक बन सकता है; जो कई बार वह रास्ता तय कर चुका है, जिस पर तुम चलना चाहते हो। मैं वैसा ही मार्गदर्शक बनना चाहता हूँ, जो समस्त रास्तों पर चल चुका है और जो अंत में तुम्हें सर्वश्रेष्ठ मार्ग बता सकता है। यदि तुम मुझसे पूछो कि मैं स्वयं बुरे रास्ते की ओर क्यों गया, तो मैं सत्य कहूँगा कि उसका कारण था, किसी अच्छे गुरु का न मिलना। बुरे लोगों के कामों ने मुझे एक ओर खींच लिया और उस समय अच्छे मार्ग बतानेवाले योग्य गुरु उपलब्ध न थे। लेकिन यदि कोई योग्य उपदेशक मेरे कष्टों में सहभागी बनकर मुझे कुछ बताता, तो मैं बहुत-से असुविधापूर्ण और मूर्खताभरे कार्यों से बच जाता, जिनको अनुभवहीन यौवन ने मुझसे करवाया था।
Question 1.
1. विश्वासु मार्गदर्शक कौन बन सकता है?
2. लेखक बुरे मार्गों में क्यों भटक गया?
3. गुरु की आवश्यकता के बारे में लेखक क्या कहता है?
Answer:
1. वह व्यक्ति जो जीवन के बारे में बहुत कुछ जान चुका हो, जिसने जीवन के सभी रास्तों पर चलकर भले-बुरे का भेद समझ लिया हो, वही किसी का भरोसेमंद मार्गदर्शक बन सकता है।
2. लेखक बुरे रास्तों पर इसलिए भटक गया, क्योंकि उसे सही रास्ते पर ले जाने की योग्यता रखने वाले अनुभवी गुरु नहीं मिले।
3. लेखक का विचार है कि एक युवा के जीवन में एक ऐसे अनुभवी गुरु की आवश्यकता है, जो उसे भटकने से बचा सके और सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा दे।
In simple words: एक सच्चा मार्गदर्शक वही है जो जीवन को अच्छे से जानता हो। लेखक बुरे रास्ते पर गया क्योंकि उसे कोई अच्छा गुरु नहीं मिला। वह मानता है कि युवाओं को सही राह दिखाने के लिए एक अच्छे गुरु की बहुत ज़रूरत है।
Exam Tip: गुरु और मार्गदर्शक के महत्व पर ध्यान दें, विशेषकर युवावस्था में सही दिशा प्राप्त करने के लिए।
8. संपूर्ण स्वस्थ मनुष्य लम्बा आयुष्य भोगता है और बीमार व्यक्ति कम, ऐसा नहीं है। हम जानते हैं कि मृत्यु अचानक हो जाती है। मनुष्य को अपना कार्य मन लगाकर, ध्यान लगाकर, जी जान से करना चाहिए। काम करने से दीर्घायु भोग सकते हैं। दुःखी और रोगी व्यक्ति भी जीवन में महान कार्य कर सकते हैं। हम निवृत्त व्यक्तियों से सुनते आए हैं कि मुझे काम तो करना ही पड़ेगा। जीवन की प्रवृत्ति काम है। अगर काम में मन नहीं लगता तो जीवन निकम्मा बन जाता है। कितने साठ-पैंसठ की आयु के लोग उत्साह से काम करते हैं। जीवन को सरल, अर्थपूर्ण और उपयोगी बनाना है तो समझ लो कि प्रवृत्ति ही जीवन है, निवृत्ति मृत्यु समान है।
Question 1.
1. प्रवृत्ति के बारे में लेखक क्या समझते हैं?
2. निवृत्ति के बारे में लेखक के क्या विचार हैं?
3. निवृत्त व्यक्ति क्या कहते हुए सुने गए हैं?
Answer:
1. लेखक समझते हैं कि सक्रिय जीवन ही सच्चा जीवन है। इसलिए व्यक्ति को हमेशा काम में लगा रहना चाहिए। सक्रिय रहने से ही जीवन सरल, सार्थक और उपयोगी बन सकता है।
2. लेखक निष्क्रियता को मौत के समान मानते हैं। निष्क्रिय या खाली रहने से जीवन बेकार हो जाता है।
3. निष्क्रिय व्यक्ति यह कहते हुए सुने गए हैं कि छुट्टी मिलने के बाद भी उन्हें काम तो करना ही पड़ेगा।
In simple words: लेखक के अनुसार, हमेशा काम करते रहना ही सच्चा जीवन है, क्योंकि इससे जीवन बेहतर बनता है। वह खाली बैठने को मौत जैसा मानते हैं।
Exam Tip: जीवन में सक्रियता और काम के महत्व को रेखांकित करें, क्योंकि यह गद्यांश का मुख्य संदेश है।
9. स्त्रियों की शिक्षा का स्वरूप पुरुषों की शिक्षा के स्वरूप से अलग रहना चाहिए। कताई, बुनाई, सिलाई, कटाई आदि की शिक्षा तो उन्हें दी ही जाए, किंतु इसी के साथ उन्हें कुटीर उद्योगों में भी निपुण बनाया जाना चाहिए, जिससे कि बुरा समय आने पर वे किसी की मोहताज न रहें। स्त्रियों को शिक्षित करने से हमारा घर स्वर्ग बन सकता है। नासमझ और फूहड़ औरतों से परिवार के परिवार तबाह हो जाते हैं। जिस घर की स्त्रियाँ सुशिक्षित और सुसंस्कृत होती हैं, वे घर जिंदा विश्वविद्यालय होते हैं। शिक्षा का अर्थ किताबी ज्ञान ही नहीं है और न ही अक्षरज्ञान है, वह तो जीने की कला है।
Question 1.
1. शिक्षा का अर्थ क्या है?
2. बुरे समय में स्त्रियाँ स्वावलम्बी कैसे रह सकती हैं?
3. इस परिच्छेद के लिए एक उचित शीर्षक दीजिए।
Answer:
1. शिक्षा का सही मतलब सुंदरता से जीवन जीना सीखने की कला है। सिर्फ किताबी ज्ञान या अक्षरों का ज्ञान शिक्षा नहीं है।
2. कताई, बुनाई, सिलाई जैसे काम सीखकर और छोटे उद्योगों में कुशल होकर, महिलाएँ बुरे समय में भी आत्मनिर्भर रह सकती हैं।
3. उचित शीर्षक: स्त्री-शिक्षा का महत्त्व अथवा शिक्षा और स्त्रियाँ
In simple words: शिक्षा केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। महिलाएँ हस्तशिल्प सीखकर मुश्किल समय में खुद पर निर्भर रह सकती हैं।
Exam Tip: स्त्री शिक्षा को केवल अकादमिक ज्ञान तक सीमित न रखें, बल्कि इसे व्यावहारिक कौशल और आत्मनिर्भरता से जोड़ें।
10. मैं पहाड़ की बेटी हूँ। मेरे पिता इतने ऊँचे हैं कि आकाश को छूते हैं। जब मैं छोटी थी तब बहुत चंचल थी। जब मैं कुछ बड़ी हुई तब दूर तक दौड़ लगाने लगी। अब मुझे नयी-नयी दुनिया देखने की चाह होने लगी। पिता की गोद छोड़कर चलती बनी। मेरा मार्ग वन-प्रान्तरों से गुजर रहा था। मैं बहुत ही प्रसन्न थी। किनारों पर खड़े पेड़ों ने झुक-झुककर मेरा स्वागत किया। बादलों ने पानी बरसाकर मेरी शक्ति बढ़ा दी। अपने को सुखद वातावरण में पाकर मेरे हृदय में उदारता के भाव जाग्रत हुए। प्यासे पक्षियों को तथा पथिकों को जल पिलाने में मुझे बहुत सुकून मिलता था। खेतों की सिंचाई करने के लिए मुझसे नहरें और नालियाँ निकाली गई। खेतों को हरे-भरे होते हुए देख मेरा हृदय बाँसों उछलने लगा। मेरे जल से विद्युत शक्ति उत्पन्न होने लगी। कल-कारखाने चलने लगे। लेकिन इन कारखानों का कचरा वे लोग मुझमें डालने लगे। मेरा निर्मल जल धीरे-धीरे गन्दा हो गया। मेरे उपकार का यह बदला? मनुष्य कितना स्वार्थी है? भगवान, इसे सन्मति देना।
Question 1.
1. नदी के पिता कौन है?
2. बचपन में नदी का स्वभाव कैसा था?
3. नदी को किस बात का दुःख है?
Answer:
1. नदी के पिता एक बहुत ऊँचा पर्वत हैं।
2. बचपन में नदी का स्वभाव बहुत चंचल था।
3. नदी को इस बात का दुःख है कि लोगों ने कारखानों का कचरा डालकर उसके साफ पानी को गंदा कर दिया है।
In simple words: नदी के पिता ऊँचे पहाड़ हैं, और बचपन में वह बहुत चंचल थी। नदी को दुख है कि लोगों ने उसके साफ पानी को कारखानों के कचरे से गंदा कर दिया है।
Exam Tip: पर्यावरण प्रदूषण के परिणामों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के महत्व पर जोर दें, क्योंकि यह गद्यांश का मूल संदेश है।
11. तक्षशिला, नालन्दा आदि विद्या केन्द्र हमारी संस्कृति, सभ्यता और कला के गढ़ थे। ज्ञान के क्षेत्र में देश और जाति का भेद लुप्त हो जाता है। विद्यालयों में पढ़ने के लिए यूरोप तथा रशिया के सुदूर देशों से भी विद्यार्थी आते थे। यहाँ की शिक्षा प्रणाली प्राचीन गुरुकुलों के ढंग की थी। छात्रों और अध्यापकों में परस्पर बड़ा प्रेम था। नालन्दा के करीब 700 वर्ष के जीवन में एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता, जिसमें किसी विद्यार्थी ने बुरा आचरण करके इसे कलंकित किया हो। नालन्दा की शिक्षा सर्वांगीण थी। बौद्ध धर्म के अतिरिक्त वेद, व्याकरण, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, दर्शन, साहित्य, कलाएँ तथा खगोल, ज्योतिष आदि शास्त्रों की भी शिक्षा दी जाती थी। यहाँ व्याकरण, तर्कशास्त्र, आयुर्वेद और शिल्पकला की शिक्षा अनिवार्य थी। विद्यार्थी पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान दिया जाता था। यहाँ करीब 1500 अध्यापक पढ़ाते थे। अध्यापक अपने-अपने विषय के पूर्ण ज्ञाता थे। बारहवीं शताब्दी में मुहम्मद बखत्यार खिलजी ने नालन्दा पर अचानक आक्रमण कर उसको तहस-नहस कर दिया। आज तो उसके केवल खंडहर रह गये हैं, जिनके दर्शनकर हम अब भी प्रेरणा ले सकते हैं।
Question 1.
1. तक्षशिला, नालन्दा किसके गढ़ थे?
2. इन विद्यालयों में कहाँ-कहाँ से विद्यार्थी आते थे?
3. 700 वर्षों के इतिहास में नालन्दा में कौन-सा उदाहरण नहीं मिलता?
Answer:
1. तक्षशिला और नालन्दा भारतीय संस्कृति, सभ्यता और कला के गढ़ थे।
2. इन विद्यालयों में भारत के विभिन्न भागों तथा रशिया और यूरोप के दूर-दराज के देशों से छात्र आते थे।
3. 700 वर्षों के इतिहास में ऐसा एक भी उदाहरण नहीं मिलता जिसमें किसी छात्र ने बुरा व्यवहार करके नालन्दा को बदनाम किया हो।
In simple words: तक्षशिला और नालंदा भारतीय संस्कृति और कला के महत्वपूर्ण केंद्र थे, जहाँ भारत और दूर के देशों से छात्र पढ़ने आते थे। नालंदा के 700 साल के इतिहास में किसी छात्र के बुरे व्यवहार का कोई उदाहरण नहीं मिलता।
Exam Tip: प्राचीन भारतीय शिक्षा केंद्रों के महत्व, उनकी शिक्षण प्रणाली और उनके वैश्विक प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करें।
12. हमारे पूर्वजों ने स्त्री का बड़ा महत्त्व माना है। उन्होंने स्त्री को धार्मिक कार्यों में अग्रस्थान दिया है और उसकी बड़ी प्रशंसा की है। वे मानते थे कि जिस घर में विदुषी नारी होती है, वहाँ के नरनारी सद्गुणों से विभूषित हो जाते हैं। इसीलिए तो मनु ने कहा है कि "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" अर्थात् जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। स्त्री तो घर की रानी है। उसका प्रभाव बच्चों पर सबसे ज्यादा होता है। बचपन में बालकों पर जो गहरे संस्कार पड़ते हैं, वे हमेशा के लिए रहते हैं। इस प्रकार स्त्री के कारण ही मानवसमाज ने उन्नति की है। स्त्री ही दुनिया में बड़े-बड़े महापुरुष : पैदा करती है। मानवसमाज की उन्नति में उसका जितना हाथ है उतना किसी और का नहीं है। उसकी प्रेरणा से संसार में मनुष्य-रत्न पैदा होते हैं और मानवसमाज को उन्नति के पथ पर ले जाते हैं।
Question 1.
1. हमारे पूर्वजों ने स्त्री को क्या महत्त्व दिया है?
2. बालकों के जीवन-निर्माण में स्त्री का क्या योगदान होता है?
3. इस परिच्छेद के लिए एक उचित शीर्षक दीजिए।
Answer:
1. हमारे पूर्वजों ने स्त्री के महत्व को स्वीकार करते हुए उसे धार्मिक और अन्य कार्यों में पहला स्थान दिया है।
2. स्त्री घर की रानी है, बच्चों पर उसका प्रभाव सबसे अधिक होता है। इसलिए बच्चों के जीवन को बनाने में स्त्री का योगदान ज्यादा होता है।
3. उचित शीर्षक: नारी की महत्ता
In simple words: हमारे पूर्वजों ने स्त्री को बहुत महत्वपूर्ण माना है और उन्हें धार्मिक कार्यों में आगे रखा है। बच्चे के विकास में स्त्री का बहुत बड़ा हाथ होता है। इस गद्यांश का सही शीर्षक 'नारी की महत्ता' है।
Exam Tip: स्त्री के सामाजिक, पारिवारिक और आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित करें, और मनु के श्लोक को उसके महत्व की पुष्टि के रूप में प्रस्तुत करें।
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