GSEB Class 11 Hindi Aaroh Solutions Chapter 20 आओ, मिलकर बचाएँ

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Class 11 Hindi Chapter 20 आओ, मिलकर बचाएँ GSEB Solutions PDF

कविता के साथ

अभ्यास

 

प्रश्न 1. 'माटी का रंग' प्रयोग करते हुए किस बात की ओर संकेत किया गया है ?
Answer: कवयित्री ने 'माटी का रंग' शब्द का उपयोग करके स्थानीय विशेषताओं को सामने लाना चाहा है। संथाल के परगना की माटी का रंग बचाने से मतलब है यहाँ का खाना-पीना, वहाँ के कपड़े, वहाँ के त्योहार, रीति-रिवाज, लोगों का संघर्षशील स्वभाव, निडरता, नाच-गान, सादगी जैसी विशेषताएँ जो जमीन से जुड़ी हैं। कवयित्री यह चाहती हैं कि आधुनिकता के चक्कर में हम अपनी संस्कृति को कम न समझें। हमें अपनी पहचान बनाए रखनी चाहिए।
In simple words: कवयित्री ने स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को 'माटी का रंग' कहा है, और वे चाहती हैं कि आदिवासी लोग आधुनिकता के प्रभाव में अपनी पहचान न खोएं।

 

प्रश्न 2. भाषा में झारखंडीपन से क्या अभिप्राय है ?
Answer: इसका अर्थ है झारखंड की भाषा की प्राकृतिक बोली और उसका खास उच्चारण। कवयित्री भाषा में झारखंडीपन बचाने की बात इसलिए करती हैं क्योंकि भाषा संस्कृति को आगे बढ़ाती है। अगर भाषा बचेगी तो आदिवासी पहचान भी बचेगी। भाषा आदिवासियों के मान-सम्मान और पहचान का प्रतीक है।
In simple words: 'झारखंडीपन' का मतलब है झारखंड की अपनी खास बोली और उच्चारण। कवयित्री इसे बचाना चाहती हैं क्योंकि यह आदिवासी संस्कृति और पहचान का मुख्य हिस्सा है।

 

प्रश्न 3. दिल के भोलेपन के साथ-साथ अक्खड़पन और जुझारूपन को भी बचाने की आवश्यकता पर क्यों बल दिया गया है ?
Answer: दिल का भोलापन सच्चाई और ईमानदारी के लिए जरूरी है, लेकिन हर समय सीधा होना ठीक नहीं होता। भोलेपन का लाभ उठाने वालों के सामने अक्खड़पन दिखाना भी आवश्यक है। अपनी बात मनवाने के लिए थोड़ा कठोर होना भी चाहिए। साथ ही, काम करने की आदत भी आवश्यक है। इसलिए, कवयित्री भोलेपन, अक्खड़पन और जुझारूपन - इन तीनों गुणों को बचाने पर जोर देती हैं।
In simple words: कवयित्री कहती हैं कि भोलापन अच्छा है, पर जरूरत पड़ने पर अक्खड़पन (दृढ़ता) और जुझारूपन (संघर्षशील) भी जरूरी है, ताकि कोई फायदा न उठा सके।

 

प्रश्न 4. प्रस्तुत कविता आदिवासी समाज की किन बुराइयों की ओर संकेत करती है ?
Answer: इस कविता में आदिवासी समाज में सुस्ती, काम के प्रति अरुचि, बाहरी संस्कृति की नकल, शराबखोरी, आलस्य, निरक्षरता, अपनी भाषा से दूरी, परंपराओं को पूरी तरह से गलत समझना आदि बुरी आदतें आ गई हैं। आदिवासी समाज अपनी प्राकृतिक जीवनशैली को भूलता जा रहा है।
In simple words: यह कविता दिखाती है कि आदिवासी समाज में आलस्य, शराबखोरी, अशिक्षा और अपनी परंपराओं को भूलने जैसी खराब आदतें आ गई हैं।

 

प्रश्न 5. इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है से क्या आशय है ?
Answer: कवयित्री पूरी मानव जाति से अपील करती हैं कि इस समय भी हमारे पास बहुत कुछ बाकी है, जिसे अभी भी बचाना चाहिए 'जिसे हर कीमत पर बचाया जाए'। यहाँ दो शब्द बहुत ही महत्वपूर्ण हैं - 'इस दौर में भी' और 'बहुत कुछ'। इस दौर में भी वाक्यांश का कवयित्री ने जानबूझकर उपयोग किया है, क्योंकि वैश्वीकरण और बाजारवाद के इस समय में हमने हर चीज को एक उत्पाद और मानवीय संबंधों को एक समझौते में बदल दिया है।
हर व्यक्ति को एक ग्राहक बना दिया गया है जिससे केवल लाभ या फायदे की ही इच्छा की जा रही है - फिर चाहे वह माता-पिता या अन्य करीबी रिश्ते ही क्यों न हों! लेकिन ऐसे उपभोक्तावादी समय में भी कवयित्री को ऐसा बहुत कुछ दिखता है, जिसे सुरक्षित रखा जा सकता है और दुनिया को जीने लायक बनाया जा सकता है। इस 'बहुत कुछ' में पानी, जमीन और जंगल का संरक्षण, पर्यावरण का ध्यान रखना, मानवीय विश्वास, उनकी टूटती आशाओं को जीवित रखना और छोटे-छोटे सपने आदि कई बातें शामिल हैं। इन्हें सुरक्षित रखना बहुत आवश्यक है।
In simple words: कवयित्री का मतलब है कि आज भी दुनिया में बहुत सी अच्छी चीजें बची हैं जैसे प्रकृति, मानवीय रिश्ते और विश्वास, जिन्हें हमें मिलकर हर कीमत पर बचाना चाहिए, भले ही सब कुछ बाजार बन रहा हो।

 

प्रश्न 6. निम्नलिखित पंक्तियों के काव्य सौंदर्य को उद्घाटित कीजिए।
क. ठंडी होती दिनचर्या में
जीवन की गर्माहट
Answer:
संदर्भ: यह काव्य पंक्तियाँ कवयित्री निर्मला पुतुल द्वारा लिखी 'आओ मिलकर बचाएँ' नामक कविता से ली गई हैं।
व्याख्या: इस पद्यांश में कवयित्री ने आज के समय के मशीनी जीवन जीने वाले लोगों का वर्णन किया है जो घड़ी की सूई की तरह भागते रहते हैं - एक तय रास्ते पर। उनके जीवन में कोई उत्साह या खुशी नहीं है। वहीं आदिवासियों के जीवन में मेहनत के साथ-साथ जीवन की गर्माहट भी है। मतलब रात को खाली समय में ये लोग खुले आकाश के नीचे प्राकृतिक और सुंदर जगह पर समूह में नाचते-गाते और बजाते हुए जीवन का असली आनंद उठाते हैं।
In simple words: कवयित्री बताती हैं कि शहरी जीवन में खुशी कम है, जबकि आदिवासी लोग कड़ी मेहनत के बाद भी प्रकृति के साथ मिलकर जीवन का असली आनंद लेते हैं।

 

ख. थोड़ा-सा विश्वास
थोड़ी-सी उम्मीद
थोड़े-से सपने
आओ, मिलकर बचाएँ।
Answer:
सन्दर्भ: यह काव्य पंक्तियाँ कवयित्री निर्मला पुतुल द्वारा लिखी 'आओ, मिलकर बचाएँ' नामक कविता से ली गई हैं।
व्याख्या: कवयित्री ने पूरी मानव जाति के कल्याण और खुशहाली के लिए, पृथ्वी को रहने लायक और उसमें जीने लायक बनाए रखने के लिए जो कुछ भी बचाने के लायक है, उसे बचाने की बात कही है। कवयित्री के विचार से अब भी बहुत कुछ ऐसा है जिसे बचाया जा सकता है और बचाना बहुत जरूरी है। आज हर तरफ अविश्वास फैला हुआ है। लोग अपनी ही परछाईयों से डरते हैं। ऐसे में थोड़ा-सा विश्वास बनाए रखने की जरूरत है - दूसरों का विश्वास पाना और अपना विश्वास बनाए रखना। आज मनुष्य कई तरह की असफलताओं से, शासन-व्यवस्था के खराब आचरण के कारण निराश हो गया है, उसके सपने खत्म हो गए हैं। सपनों का मर जाना सबसे खतरनाक है, इसलिए कवयित्री ने इस उम्मीद और छोटे-छोटे सपनों को बनाए रखने को पहली जरूरत बताया है।
In simple words: कवयित्री कहती हैं कि हमें आज के समय में भी थोड़ा विश्वास, उम्मीद और सपनों को मिलकर बचाना चाहिए, क्योंकि ये चीजें हमें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं।

 

प्रश्न 7. बस्तियों को शहर की किस आबो-हवा से बचाने की आवश्यकता है ?
Answer: आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल ने अपने (आदिवासी) क्षेत्र में अन्य लोगों के घुसपैठ पर अपनी चिंता जताई है। शहर की आबोहवा से बचाने का मतलब है - आदिवासी सभ्यता-संस्कृति, उनकी भाषा, बोली, तीज-त्योहार, खान-पान, वेशभूषा आदि पर हमला। उनके भोलेपन की जगह चालाकी, सहज-सरलता की जगह दिखावा और निश्छलता की जगह कपटपूर्ण व्यवहार, बस्तियों को शहर की नग्नता व जड़ता से बचाने की जरूरत है, पेड़-पौधों से रहित नग्नता से बचाने का प्रयास, शहरी जीवन में उमंग, उत्साह व अपनत्व का अभाव होता है, शहर के लोग अलग-थलग जीवन बिताते हैं। इन सभी से बस्तियों को बचाने की बात कवयित्री करती हैं।
In simple words: कवयित्री को डर है कि शहर की आधुनिक और बनावटी जीवनशैली (आबोहवा) आदिवासियों की सरल संस्कृति, भाषा और परंपराओं को नुकसान पहुँचाएगी, इसलिए वे अपनी बस्तियों को शहरी प्रभाव से बचाने की बात करती हैं।

कविता के आस-पास

 

प्रश्न 1. आप अपने शहर या बस्ती की किन चीजों को बचाना चाहेंगे ?
Answer: मैं खेल के मैदानों, बाग-बगीचों, सड़कों को चौड़ा करने के नाम पर काटे जाने वाले बड़े-बड़े पेड़ों को बचाना चाहूँगा, क्योंकि ये बहुत जरूरी हैं। विभिन्न प्रकार की चिड़िया जो धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं, उन्हें बचाने का प्रयास करूँगा। शहरों के तालाबों, पुरातात्विक इमारतों, पुरानी या प्राचीन ऐतिहासिक स्थलों और इमारतों को भी बचाना चाहूँगा। पानी के बेकार उपयोग को बचाना चाहूँगा। स्कूल, कॉलेज, मंदिर आदि के प्रांगण या परिसर में फर्श सीमेंट का बनाया जा रहा है, जिस पर रोक लगाकर खुशबूदार मिट्टी रहने देना चाहिए जिससे मिट्टी की मीठी सुगंध मिल सके और पेड़-पौधों की जड़ों में पानी पहुँच सके। नामों पर पश्चिमी संस्कृति की नकल से बचना चाहूँगा। शहरों में टूटते संयुक्त परिवारों को बचाना चाहूँगा। वायु, जल, ध्वनि आदि पर्यावरण प्रदूषण से बचना चाहूँगा।
In simple words: मैं अपने शहर के हरे-भरे पेड़ों, तालाबों, ऐतिहासिक इमारतों और शुद्ध हवा-पानी को बचाना चाहूँगा। मैं चाहता हूँ कि लोग पानी का सही उपयोग करें और संयुक्त परिवार जैसी पुरानी परंपराओं को बनाए रखें।

 

प्रश्न 2. आदिवासी समाज की वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी लिखिए।
Answer: आजादी के बाद आदिवासियों को मिले संवैधानिक अधिकारों के कारण उनकी विभिन्न स्थितियों में काफी सुधार हुआ है। आज आदिवासी समाज से कई लोग शिक्षा, राजनीति और विभिन्न प्रकार के सरकारी अधिकारी के पदों पर हैं। मगर यह हकीकत आदिवासी समाज के कुछ लोगों तक ही सीमित है। आदिवासियों का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी गरीबी, अशिक्षा, अंधविश्वास, बेरोजगारी, भूखमरी, कुपोषण, अज्ञानता और बड़े पैमाने पर पलायन से बहुत दूर है। उनकी सबसे बड़ी समस्या पानी, जंगल और जमीन को सुरक्षित रखने की है। विस्थापन की समस्या एक सबसे बड़ी परेशानी है। आदिवासी महिलाओं की स्थिति तो और भी बुरी है। आजादी के बाद भी महिलाएँ दुनिया की सुविधाओं से वंचित हैं। दूसरी तरफ भ्रष्टाचार, विस्थापन, पलायन, डायन-प्रताड़ना और अशिक्षा का अंधेरा आदिवासी हर जगह झेल रहे हैं। आदिवासी अपनी संस्कृति को बचाने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। संक्षेप में कहें तो आदिवासी समाज की स्थिति आज भी जैसी की तैसी है। विकास के नाम पर हमेशा उन्हें ही हाशिए पर धकेला जाता रहा है।
In simple words: आजादी के बाद आदिवासियों की स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ है, पर आज भी बड़ा वर्ग गरीबी, अशिक्षा और विस्थापन जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। उन्हें अपनी संस्कृति और जमीन बचाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ रहा है।

Hindi Digest Std 11 Gseb आओ, मिलकर बचाएँ Important Questions And Answers

प्रश्नों के उत्तर लिनिए :

 

प्रश्न 1. 'आओ मिलकर बचाएँ' कविता का केन्द्रीय भाव स्पष्ट कीजिए।
Answer: इस कविता में दोनों पक्षों का वास्तविक चित्रण हुआ है। बड़े संदर्भ में यह कविता समाज में उन चीजों को बचाने की बात करती है जिनका होना एक स्वस्थ सामाजिक वातावरण के लिए जरूरी है। प्रकृति के विनाश और विस्थापन के कारण आज आदिवासी समाज संकट में है, जो कविता का मूल स्वरूप है। कवयित्री को लगता है कि हम अपनी पारंपरिक भाषा, भावनात्मकता, भोलेपन और ग्रामीण संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। प्राकृतिक नदियाँ, पहाड़, मैदान, मिट्टी, फसलें, हवाएँ - ये सब आधुनिकता का शिकार हो रहे हैं। आज के वातावरण में विकृतियाँ बढ़ रही हैं, जिन्हें हमें खत्म करना है। हमें प्राचीन संस्कारों और प्राकृतिक चीजों को बचाना है। वह कहती हैं कि निराश होने की बात नहीं है, क्योंकि अभी भी बचाने के लिए बहुत कुछ बचा है।
In simple words: यह कविता बताती है कि आदिवासी समाज प्रकृति और अपनी परंपराओं को खो रहा है, जो कि स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी हैं। कवयित्री लोगों को इन चीजों को बचाने की उम्मीद देती हैं।

 

प्रश्न 2. 'बचाएँ डूबने से, पूरी की पूरी बस्ती हड़िया में' – आशय स्पष्ट कीजिए।
Answer: शराब आदिवासियों के जीवन से जुड़ी एक अटूट समस्या है। खुशी और गम दोनों ही मौकों पर आदिवासी लोग अक्सर शराब का सेवन करते हैं। इसका एक कारण उनकी जीवन-शैली, श्रमशीलता, अशिक्षा, अज्ञानता और जीवन की खुशी भी है। कवयित्री निर्मला पुतुल ने शराब के कारण आदिवासियों की जिंदगी बर्बाद होते देखा था। इतना ही नहीं वह जिस क्षेत्र में रहती थी वहाँ के आदिवासी हंडिया दारू बनाने और बेचने का व्यापार करते थे। यह दारू पीने के बहाने कई बाहरी-शहरी लोग उस बस्ती में आते थे। हुड़दंग मचाते थे। हँसी-मजाक, गाली-गलौज, मारपीट आम बात थी। उनकी बहु-बेटियों की इज्जत से खेलते थे। शराब के नशे में उन्हें लालच बताकर महत्वपूर्ण कागज़ात पर हस्ताक्षर करवा लेते थे। इसीलिए निर्मला पुतुल आदिवासियों की पूरी की पूरी बस्तियों को शराब में डूबने (बर्बाद होने) से बचाने का आग्रह करती हैं।
In simple words: इस पंक्ति का मतलब है कि आदिवासी बस्तियों को शराब की लत से बचाना है, क्योंकि शराब खुशी-गम में उनके जीवन का हिस्सा बन गई है और बाहरी लोग इसका फायदा उठाकर उन्हें धोखा देते हैं, जिससे उनका जीवन बर्बाद हो रहा है।

योग्य विकल्प पसंद करके रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए।

 

प्रश्न 1. निर्मला पुतुल का जन्म एक .............परिवार में हुआ था।
(A) आदिवासी
(B) ब्राह्मण
(C) वैश्य
(D) राजपूत
Answer: (A) आदिवासी
In simple words: निर्मला पुतुल का जन्म आदिवासी परिवार में हुआ था।

 

प्रश्न 2. निर्मला पुतुल का जन्म 6 मार्च सन् ............ हुआ था।
(A) 1972
(B) 1973
(C) 1974
(D) 1975
Answer: (A) 1972
In simple words: निर्मला पुतुल का जन्म 6 मार्च 1972 को हुआ था।

 

प्रश्न 3. 'नगाड़े की तरह बजते शब्द' काव्य संग्रह ............ द्वारा रचित है।
(A) महादेवी
(B) निर्मला पुतुल
(C) सुभद्रा कुमारी चौहान
(D) मीरा
Answer: (B) निर्मला पुतुल
In simple words: 'नगाड़े की तरह बजते शब्द' कविता संग्रह को निर्मला पुतुल ने लिखा है।

 

प्रश्न 4. निर्मला पुतुल को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार सन् ........ में मिला।
(A) 2011
(B) 2010
(C) 2013
(D) 2015
Answer: (B) 2010
In simple words: निर्मला पुतुल को 2010 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

 

प्रश्न 5. 'आओ मिलकर बचाएँ' कविता मूलतः ............ भाषा में लिखी गई है।
(A) खड़ी बोली
(B) मैथिली
(C) संथाली
(D) अवधी
Answer: (C) संथाली
In simple words: 'आओ मिलकर बचाएँ' कविता असल में संथाली भाषा में लिखी गई थी।

 

प्रश्न 6. 'आओ मिलकर बचाएँ' कविता का हिन्दी अनुवाद ............ ने किया है।
(A) पंत
(B) निराला
(C) अशोक सिंह
(D) अज्ञेय
Answer: (C) अशोक सिंह
In simple words: अशोक सिंह ने 'आओ मिलकर बचाएँ' कविता का हिन्दी में अनुवाद किया है।

 

प्रश्न 7. शहरी आबो-हवा ............ का प्रतीक है।
(A) भ्रष्टाचार
(B) प्रदूषण
(C) संस्कृति
(D) अपसंस्कृति
Answer: (D) अपसंस्कृति
In simple words: शहरी माहौल की दिखावटी और खराब जीवनशैली को 'अपसंस्कृति' कहा गया है।

 

प्रश्न 8. खुशी और गम दोनों ही प्रसंगों में आदिवासी लोग प्रायः..............का सेवन करते हैं।
(A) गाँजा
(B) अफीम
(C) हुक्का
(D) शराब
Answer: (D) शराब
In simple words: आदिवासी लोग खुशी और दुख दोनों में अक्सर शराब पीते हैं।

 

प्रश्न 9. कवयित्री जिस इलाके में रहती थी वहाँ के आदिवासी.............. बनाने और बेचने का धंधा करते थे।
(A) हंडिया दारू
(B) शरबत
(C) इन
(D) कपड़ा
Answer: (A) हंडिया दारू
In simple words: कवयित्री के क्षेत्र में आदिवासी लोग हंडिया दारू बनाते और बेचते थे।

 

प्रश्न 10. कवयित्री आदिवासी ............ बस्ती को शहरी अपसंस्कृति से बचाने का आहवान करती है।
(A) दुमका
(B) संथाल
(C) दोनों
(D) कोई नहीं
Answer: (B) संथाल
In simple words: कवयित्री संथाल आदिवासी बस्ती को शहरी अपसंस्कृति से बचाने के लिए कहती हैं।

 

प्रश्न 11. कवयित्री अपनी क्षेत्रीय भाषा ............ को बचाने की बात करती हैं।
(A) भोजपुरी
(B) राजस्थानी
(C) झारखंडी
(D) कोई नहीं
Answer: (C) झारखंडी
In simple words: कवयित्री अपनी स्थानीय भाषा 'झारखंडी' को बचाने पर जोर देती हैं।

 

प्रश्न 12. भाषा ............ की वाहक होती है।
(A) संस्कृति
(B) समाज
(C) विचार
(D) कोई नहीं
Answer: (A) संस्कृति
In simple words: भाषा किसी भी समाज की संस्कृति को आगे ले जाने का काम करती है।

 

प्रश्न 13. कवयित्री ............ की इच्छा करती है ताकि रोकर मन की पीड़ा और वेदना को कम कर सके।
(A) एकांत
(B) उत्साह
(C) भीड़
(D) मेला
Answer: (A) एकांत
In simple words: कवयित्री अकेलेपन की इच्छा करती हैं ताकि रोकर अपने मन का दर्द कम कर सकें।

 

प्रश्न 14. कवयित्री का जीवन के प्रति ............ दृष्टिकोण है।
(A) नकारात्मक
(B) सकारात्मक
(C) विद्रोहात्मक
(D) कोई नहीं
Answer: (B) सकारात्मक
In simple words: कवयित्री का जीवन के प्रति एक सकारात्मक और आशावादी नजरिया है।

 

प्रश्न 15. कवयित्री ने आज के युग को ............ से युक्त बताया है।
(A) विश्वास
(B) उत्साहित
(C) अविश्वास
(D) उम्मीद
Answer: (C) अविश्वास
In simple words: कवयित्री के अनुसार, आज का समय अविश्वास और शक से भरा हुआ है।

 

प्रश्न 16. कवयित्री का स्वर ............ है।
(A) निराशावादी
(B) आशावादी
(C) विचारात्मक
(D) कोई नहीं
Answer: (B) आशावादी
In simple words: कवयित्री हमेशा आशावादी नजरिया रखती हैं और उम्मीद भरा संदेश देती हैं।

 

प्रश्न 17. बूढ़ों के लिए ...... की शान्ति कवयित्री चाहती है।
(A) चट्टान
(B) दीवार
(C) घर
(D) पहाड़ों
Answer: (D) पहाड़ों
In simple words: कवयित्री वृद्ध लोगों के लिए पहाड़ों जैसी शांति की इच्छा करती हैं।

योग्य विकल्प चुनकर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए।

 

प्रश्न 1. 'आओ मिलकर बचाएँ' कविता ............ की है। (राजी सेठ, निर्मला पुतुल, महादेवी, सुभद्रा)
Answer: निर्मला पुतुल
In simple words: 'आओ मिलकर बचाएँ' कविता निर्मला पुतुल ने लिखी है।

 

प्रश्न 2. 'फूटेगा नया विद्रोह', 'अपने घर की तलाश में' काव्य संग्रह की लेखिका.......... ( मृणाल पाण्डे, मन्नू भंडारी, निर्मला पुतुल, दुष्यंत कुमार)
Answer: निर्मला पुतुल
In simple words: 'फूटेगा नया विद्रोह' और 'अपने घर की तलाश में' कविता संग्रह निर्मला पुतुल ने लिखे हैं।

 

प्रश्न 3. 'आओ मिलकर बचाएँ' कविता मूलतः ............ भाषा में लिखी गई है। (गुजराती, उड़िया, बंगला, संथाली)
Answer: संथाली
In simple words: 'आओ मिलकर बचाएँ' कविता असल में संथाली भाषा में लिखी गई है।

 

प्रश्न 4. कवयित्री बस्तियों को ......... की आबो-हवा से बचाना चाहती है। (फैशन, विदेश, शहर, गाँव)
Answer: शहर
In simple words: कवयित्री बस्तियों को शहर के माहौल और प्रभाव से सुरक्षित रखना चाहती हैं।

 

प्रश्न 5. बचाएँ डूबने से पूरी की पूरी बस्ती को ............ में। (हड़िया, बाल्टी, मटका, बोटल)
Answer: हड़िया
In simple words: कवयित्री पूरी बस्ती को शराब की लत में डूबने से बचाना चाहती हैं।

 

प्रश्न 6. ............आदिवासियों के जीवन से जुड़ी एक अभिन्न समस्या है। (नशा, नृत्य, गान, वादन)
Answer: शराब
In simple words: शराब आदिवासियों के जीवन की एक बहुत बड़ी और गहरी समस्या है।

 

प्रश्न 7. निर्मला पुतुल आदिवासियों की पूरी की पूरी बस्तियों को ............ में डूबने से बचाने का आग्रह करती है। (समुद्र, शराब, कर्ज, नदी)
Answer: शराब
In simple words: निर्मला पुतुल चाहती हैं कि आदिवासियों की बस्तियाँ शराब के कारण बर्बाद न हों।

 

प्रश्न 8. ............ आदिवासियों के गौरव, स्वाभिमान और अस्मिता का प्रतीक है। (भाषा, विचार, आंदोलन, संवाद)
Answer: भाषा
In simple words: भाषा आदिवासियों के मान-सम्मान और पहचान का चिन्ह है।

 

प्रश्न 9. ठंडी होती दिनचर्या में जीवन की ............ कवयित्री बचाना चाहती है। (मर्माहट, हरापन, सूखापन, निरालापन)
Answer: गर्माहट
In simple words: कवयित्री ठंडी होती दिनचर्या में जीवन के उत्साह और जोश को बचाना चाहती हैं।

 

प्रश्न 10. कवयित्री आदिवासियों के ............ के साथ का सहअस्तित्व और सहजीवन दोनों को बचाये रखने की बात करती है। (अनेकता, एकता, प्रकृति, संस्कृति)
Answer: प्रकृति
In simple words: कवयित्री आदिवासियों के प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन को बनाए रखने की बात करती हैं।

 

प्रश्न 11. नाचने के लिए खुला ............। (मैदान, आंगन, झरोखा)
Answer: आंगन
In simple words: कवयित्री चाहती हैं कि नाचने के लिए खुला आंगन बना रहे।

 

प्रश्न 12. पशुओं के लिए हरी-हरी ............। (घास, मिर्च, मैदान)
Answer: घास
In simple words: कवयित्री पशुओं के लिए हरी-हरी घास को बचाना चाहती हैं।

 

प्रश्न 13. कवयित्री अविश्वास के दौर में थोड़ा-सा..................उम्मीद व सपने बचाए रखने की बात करती हैं। (विश्वास, सुख, दुःख, विचार)
Answer: विश्वास
In simple words: कवयित्री अविश्वास के समय में थोड़ा-सा विश्वास, उम्मीद और सपनों को बचाना चाहती हैं।

 

प्रश्न 14. कवयित्री में ............ को बचाने की तड़प मिलती है। (लोग, परियेश, घर, पैसा)
Answer: परिवेश
In simple words: कवयित्री को अपने आस-पास के माहौल और परिवेश को बचाने की गहरी इच्छा है।

 

प्रश्न 15. ............ की आबो-हवा अपसंस्कृति का प्रतीक है। (बस्ती, शहर, गाँव, विदेश)
Answer: शहर
In simple words: शहर का माहौल आधुनिक अपसंस्कृति को दर्शाता है।

सही या गलत बताइए।

 

प्रश्न 1. 'आओ मिलकर बचाएँ' कविता निर्मला पुतुल की नहीं है।
Answer: गलत
In simple words: यह कथन गलत है क्योंकि 'आओ मिलकर बचाएँ' कविता निर्मला पुतुल ने ही लिखी है।

 

प्रश्न 2. निर्मला पुतुल का जन्म एक आदिवासी परिवार में दुधनी कुरुवा, जिला दुमका संथाल परगना झारखंड में हुआ था।
Answer: सही
In simple words: यह बात सच है कि निर्मला पुतुल का जन्म झारखंड के दुमका जिले के संथाल परगना के दुधनी कुरुवा गाँव में एक आदिवासी परिवार में हुआ था।

 

प्रश्न 3. निर्मला पुतुल के पिता और चाचा शिक्षक थे।
Answer: सही
In simple words: यह सही है कि निर्मला पुतुल के पिता और चाचा दोनों शिक्षक के पद पर थे।

 

प्रश्न 4. 'आओ मिलकर बचाएँ' कविता समाज में उन चीजों को बचाने की बात करती है जिनका होना स्वस्थ सामाजिक-प्राकृतिक परिवेश के लिए जरूरी है।
Answer: सही
In simple words: यह बात सही है कि कविता उन चीजों को बचाने पर जोर देती है जो एक अच्छे समाज और प्रकृति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।

 

प्रश्न 5. काष्यांश में निहित संदेश यह है कि हम अपनी प्राकृतिक धरोहर नदी, पर्वत, पेड़, पौधे, मैदान, हवाएँ आदि को प्रदूषित होने से बचाएँ।
Answer: सही
In simple words: इस कविता का मुख्य संदेश यह है कि हमें अपनी नदियों, पहाड़ों, पेड़ों, मैदानों और हवा जैसी प्राकृतिक चीजों को गंदगी से बचाना चाहिए।

 

प्रश्न 6. कवयित्री को अपनी संस्कृति से प्यार नहीं है।
Answer: गलत
In simple words: यह कथन गलत है क्योंकि कवयित्री को अपनी संस्कृति से बहुत प्यार है और वे उसे बचाना चाहती हैं।

 

प्रश्न 7. कवयित्री आदिवासियों के भोलेपन, अक्खड़पन व संघर्ष करने की प्रवृत्ति को बचाना नहीं चाहती है।
Answer: गलत
In simple words: यह कथन गलत है, क्योंकि कवयित्री आदिवासियों के भोलेपन, निडर स्वभाव और संघर्ष करने की इच्छा को बचाना चाहती हैं।

 

प्रश्न 8. आदिवासियों की दिनचर्या का अंग धनुष, तीर व कुल्हाड़ियाँ होती हैं।
Answer: सही
In simple words: यह सही है कि आदिवासियों के हर दिन के जीवन में धनुष, तीर और कुल्हाड़ियाँ बहुत जरूरी औजार होते हैं।

 

प्रश्न 9. कवयित्री जंगलों की ताजा हवा, नदियों की पवित्रता, पहाड़ों के मौन, मिट्टी की खुशबू, स्थानीय गीतों व फसलों की लहलहाहट को नहीं बचाना चाहती है।
Answer: गलत
In simple words: यह गलत है क्योंकि कवयित्री जंगलों की ताज़ी हवा, नदियों की पवित्रता, पहाड़ों की शांति, मिट्टी की खुशबू और स्थानीय गीतों को बचाना चाहती हैं।

 

प्रश्न 10. भीतर की आग' का आशय आंतरिक जोश व संघर्ष करने की क्षमता है।
Answer: सही
In simple words: 'भीतर की आग' का मतलब है अंदर का जोश और किसी भी चुनौती से लड़ने की ताकत।

 

वैसी ही मुद्रा में सूनेपन को सत्कार दिया। चंचल चरणों से चल खिड़की दरवाजों के पार झाँक जाने क्या देखा...... क्या जाना..... काग़ज पर निरुद्देश्य रेखाएँ खींच, बहुत हर्षित हो जाने किस मूरत को पहचाना.... और तभी कोई ज्यों खिलती है अकस्मात् कई दिनों बाद लगा – आज नहीं हूँ खाली हूँ। निश्चय ही मैं कुछ अच्छा लिखनेवाली हूँ। आज आँख खुलते ही किरन एक शर्मीली सिरहाने आ डोली, थपकी-सी मलय-बात बड़े निकट अस्फुट स्वर में जैसे कुछ बोली। देखा तो जान पड़ासुबह नहीं मेरी है। किस ने यह जादू की छड़ी यहाँ फेरी है : दीवारें ! – और...... और.... अजब-अजब लगता है सभी ठौर....। धीरे से उठकर अपनी ही अंजलि में अपना मुख धर मैं ने बहुत देर अपने से प्यार किया; कमरे में जैसे हों अतिथि कहीं – – कीर्ति चौधरी

 

प्रश्न 1. मलय समीर का बहना कवयित्री को कैसा लगा ?
Answer: मलय समीर का बहना कवि को ऐसा लगता है जैसे कोई बहुत करीब से फुसफुसा रहा हो।
In simple words: कवयित्री को मलय समीर की हवा बहना ऐसा लगा, जैसे कोई पास आकर धीरे से कुछ कह रहा हो।

 

प्रश्न 2. कवयित्री के हर्षित होने का क्या कारण है ?
Answer: कागज पर बिना किसी उद्देश्य के रेखाएँ खींचते समय उन्हें लगा कि इनसे कोई अज्ञात आकृति उभर रही है, रेखाओं से बनी आकृति देखकर, भविष्य में एक सुंदर रचना की उम्मीद है, इसलिए कवयित्री खुश हैं।
In simple words: कवयित्री कागज पर कुछ भी बनाते समय महसूस करती हैं कि एक नई कलाकृति बन रही है, जिससे उन्हें भविष्य में कुछ अच्छा लिखने की आशा मिलती है, और वे खुश हो जाती हैं।

 

प्रश्न 3. 'आज नहीं हूँ खाली' से क्या तात्पर्य है ?
Answer: कवयित्री को लगता है कि वह निश्चित रूप से कुछ अच्छा लिखने वाली हैं, इसलिए वे आज खाली नहीं हैं।
In simple words: कवयित्री का मतलब है कि उन्हें महसूस हो रहा है कि वे आज कुछ अच्छा लिखने वाली हैं, इसलिए वे बेकार नहीं हैं।

 

प्रश्न 4. 'अस्फुट स्वर' का अर्थ बताइए।
Answer: जिन स्वरों के उच्चारण में ध्वनि बहुत धीमी होती है, जिसे कोई सुन न सके उसे अस्फुट (जो स्पष्ट नहीं है) कहते हैं। सामान्य भाषा में उसे फुसफुसाना कहते हैं।
In simple words: 'अस्फुट स्वर' का अर्थ है बहुत धीमी आवाज, जो ठीक से सुनाई न दे, जैसे कोई फुसफुसा रहा हो।

 

प्रश्न 5. 'चंचल चरणों से चल' में कौन-सा अलंकार है ?
Answer: 'चंचल चरणों से चल' में अनुप्रास अलंकार है।
In simple words: इस पंक्ति में 'च' वर्ण की पुनरावृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है।

आओ, मिलकर बचाएँ Summary In Hindi

कवि परिचय :

निर्मला पुतुल का जन्म एक आदिवासी परिवार में 6 मार्च, सन् 1972 में गाँव दुधनी कुरुवा, जिला दुमका, संताल परगना, झारखंड में हुआ था। आपकी मुख्य रचनाएँ हैं - 'फूटेगा नया विद्रोह', 'नगाड़े की तरह बजते शब्द', 'अपने घर की तलाश में' (तीनों काव्यसंग्रह), ओनोड़हें (संताली कविता संग्रह)। निर्मला पुतुल की शुरुआती शिक्षा अपने गाँव में ही पूरी हुई।

फिर राजनीति शास्त्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। नर्सिंग में डिप्लोमा किया। संताली हिन्दी, नागपुरी, बांग्ला, खोरटा, भोजपुरी, अंगिका और अंग्रेजी आदि भाषाओं पर आपका अधिकार है। पिछले 15 वर्षों से भी अधिक समय से शिक्षा, सामाजिक विकास, मानवाधिकार और आदिवासी महिलाओं के समान उत्थान के लिए व्यक्तिगत, सामूहिक और संस्थागत स्तर पर लगातार सक्रिय रही हैं।

आदिवासी महिलाओं के विस्थापन, पलायन, उत्पीड़न, स्वास्थ्य शिक्षा, लिंग भेद, संवेदनशीलता, मानवाधिकार, संपत्ति पर अधिकार जैसे मुद्दों को उठाती रही हैं। कवयित्री अपने बचपन से ही यह देखती आ रही थी कि बस्ती के लोग हंडिया में दारू बेचने का धंधा करते हैं और बाहर के लोग, शहरी लोग, ठेकेदार, दलाल आदि हर शाम हुड़दंग मचाते, गाली-गलौज और मारपीट करते हैं। आदिवासियों को कई तरह के झूठे लालच देकर मुर्गा-दारू की महफिल और बहू-बेटियों की इज्जत से भी खेलते। कुछ समय बाद जब कवयित्री के भीतर विचार - पकने लगे, समझदारी आने लगी तब भीतर एक विद्रोह पनपने लगा। फिर अपने असंतोष और विद्रोह को कविता के रूप में ढालने लगी और अपने विचारों को स्पष्ट रूप देने के लिए कलम को हथियार बनाकर लड़ने लगी।

इस प्रकार निर्मला पुतुल ने एक सामान्य महिला से कवयित्री तक का सफर तय किया। आपकी रचनाओं का मुख्य विषय आदिवासियों के जीवन में व्याप्त, अशिक्षा, गरीबी, शोषण, अन्याय, अत्याचार, पुरुष प्रधानता, जलजमीन और जंगल से जुड़ाव, पढ़े-लिखे आदिवासियों की स्वार्थपरता, व्यसन, कड़ी मेहनत, सादगी, भोलापन आदि है। आपके सामाजिक और साहित्यिक योगदान के लिए कई संस्थाओं ने आपको सम्मानित किया है जैसे:

  • साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा साहित्य सम्मान 2001
  • झारखंड सरकार द्वारा 'राजकीय सम्मान' 2006
  • हिमाचल प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित (2008)
  • राष्ट्रीय युवा पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद कोलकाता (2009)
  • राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (2010)

पाठ्य-रचना की विशेषताएँ :

'आओ मिलकर बचाएँ' कविता मूल रूप से संथाली भाषा में लिखी गई है, जिसका हिन्दी अनुवाद अशोक सिंह ने किया है। प्रस्तुत कविता में कवयित्री ने आदिवासी जीवनशैली की रक्षा करने, उसे बाहरी प्रभाव (शहरी संस्कृति) से बचाने, नशे में डूबे लोगों को नशे से मुक्त करने, अपनी भाषा और क्षेत्रीयता की पहचान को बचाने, आदिवासियों की पवित्रता और भोलेपन - के साथ ही उनके जीवन संघर्ष, पहचान, जुझारूपन, स्वाभिमान, भीतर की आग, जल-जमीन और जंगल से उनकी आत्मीयता, उनकी पुरानी संस्कृति (लोकगीत-नृत्य, परिधान, भाषा आदि) को बचाने, प्रकृति के विनाश, आदिवासियों के विस्थापन और संबंधित समस्याओं के लिए उचित समाधान, पर्यावरण का संरक्षण आदि मुद्दों को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ दर्शाया है।

काव्य का सार संथाली भाषा में लिखी गई निर्मला पुतुल की इस कविता का अशोक सिंह द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद यहाँ दिया गया है। संथाली समाज के सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों पक्षों के यथार्थ को उजागर करते हुए कवयित्री उन मूल्यों, चीजों को बचाने की बात कर रही है जिनका एक स्वस्थ सामाजिक वातावरण तथा उज्ज्वल भविष्य के लिए बहुत जरूरी है। विस्थापन, प्रकृति विनाश के कारण आदिवासी समाज का संकट ही कविता का मूल स्वर है।

काव्य का भावार्थ :

अपनी बस्तियों को नंगी होने से शहर की आबो-हवा से बचाएँ उसे

इस काव्यांश में प्रसिद्ध आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल ने अपने (आदिवासी) इलाके में हो रही अन्य लोगों की घुसपैठ पर अपनी चिंता जताई है। गैर-आदिवासी लोगों के स्वार्थ, लोभ और लालच के कारण जंगल और पहाड़ों के साथ आदिवासियों की बस्तियाँ भी उजड़ रही हैं। यहाँ बस्तियों को नंगी होने से मतलब यही है कि घने जंगलों को मिटाकर विकास के नाम पर विभिन्न तरह के निर्माण हो रहे हैं। उनके एकांत निवास में बाधा पहुँच रही है। शहर की आबोहवा से बचाने का तात्पर्य है आदिवासी सभ्यता-संस्कृति (उनकी भाषा, बोली, तीज-त्योहार, खान-पान, वेश-भूषा आदि) पर हमला। उनके भोलेपन की जगह चालाकी, सहज-सरलता की जगह दिखावा और निश्छलता की जगह कपटपूर्ण व्यवहार से बचाने की बात कवयित्री करती है।

बचाएँ डूबने से पूरी की पूरी बस्ती को हड़िया में

शराब आदिवासियों के जीवन से जुड़ी एक अटूट समस्या है। खुशी और गम दोनों ही मौकों पर आदिवासी लोग अक्सर शराब का सेवन करते हैं। इसका एक कारण उनकी जीवन-शैली, श्रमशीलता, अशिक्षा, अज्ञानता और जीवन की मस्ती भी है। कवयित्री निर्मला पुतुल ने शराब के कारण आदिवासियों की जिंदगी बर्बाद होते देखा था। इतना ही नहीं वह जिस क्षेत्र में रहती थी वहाँ के आदिवासी हंडिया दारू बनाने और बेचने का व्यापार करते थे। यह दारू पीने के बहाने कई बाहरी-शहरी लोग उस बस्ती में आते थे, हुड़दंग मचाते थे। हँसी-मजाक, गाली-गलौज, मारपीट आम बात थी। उनकी बहू-बेटियों की इज्जत से खेलते थे। शराब के नशे में उन्हें लालच बताकर महत्वपूर्ण कागज़ात पर हस्ताक्षर करवा लेते थे। इसीलिए निर्मला पुतुल आदिवासियों की पूरी की पूरी बस्तियों को शराब में डूबने (बर्बाद होने) से बचाने का आग्रह करती हैं।

अपने चेहरे पर सन्थाल परगना की माटी का रंग भाषा में झारखंडीपन

इस काव्यांश में निर्मला पुतुल ने अपनी क्षेत्रीयता की सभी खासियतों और विशेषताओं को बचाने की बात करती है और अपनी क्षेत्रीय भाषा (झारखंडी) को बचाने की भी बात करती है। संथाल के परगना की माटी का रंग बचाने से मतलब है वहाँ का खान-पान, वहाँ की वेश-भूषा, वहाँ के तीज-त्योहार, वहाँ के रीति-रिवाज और झारखंड की आबोहवा, फूल, लहर, तितली, नदी-नाले, घास-पत्ती, ओस-बूंद संक्षेप में झारखंड के आदिवासी क्षेत्र की आदिम महक आदि सब-कुछ को बचाने की बात है।

भाषा में झारखंडीपन को बचाने की बात कवयित्री इसलिए करती है कि भाषा संस्कृति की वाहक होती है। भाषा बचेगी तो आदिवासी पहचान बचेगी। भाषा आदिवासियों के गौरव, स्वाभिमान और पहचान का प्रतीक है।

ठंडी होती दिनचर्या में जीवन की गर्माहट मन का हरापन भोलापन दिल का अक्खड़पन, जुझारूपन भी भीतर की आग धनुष की डोरी तीर का नुकीलापन कुल्हाड़ी की धार जंगल की ताज़ा हवा नदियों की निर्मलता पहाड़ों का मौन गीतों की धुन मिट्टी का सोंधापन फसलों की लहलहाहट

प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री ने आज के समय के मशीनी जीवन जीने वाले इंसान का वर्णन किया है जो घड़ी की सूई की तरह भागते रहते हैं - एक तय रास्ते पर। उनके जीवन में कोई उत्साह या खुशी नहीं है। वहीं आदिवासियों के जीवन में कड़ी मेहनत के साथ-साथ जीवन की गर्माहट भी है। मतलब रात को खाली समय में ये लोग खुले आकाश के नीचे प्राकृतिक और सुंदर जगह पर समूह में नाचते-गाते और बजाते हुए जीवन का असली आनंद उठाते हैं।

इसी सामूहिक भावना और प्राकृतिक आनंद को बचाए रखने के साथ ही कवयित्री बचाना चाहती - मन का हरापन और दिल का भोलापन अर्थात् पवित्रता, प्रेम और विश्वास। भोलेपन के साथ ही यह आदिवासियों का अपना जुझारूपन और अक्खड़ता अर्थात् स्वाभिमान और अन्याय, अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने की जिद को भी बचाए रखना चाहती है।

इसके लिए बहुत जरूरी है उनके भीतर की आग, धनुष के नुकीले तीर, धारदार कुल्हाड़ी। ये सारे औजार गुस्सा, विरोध और विद्रोह के प्रतीक हैं। जल, जमीन और जंगल को बचाए रखने में और विस्थापन के खिलाफ आवाज उठाने के लिए ये सब कुछ जरूरी है। इसके साथ ही जरूरी है जंगल की ताज़ा हवा, नदियों की पवित्रता, जिसके लिए आज का मनुष्य बहुत तरसता है।

गीतों की धुन जो आजकल डी. जे. और टी.वी. आदि में सुनाई देती है, बोलने की परंपरा से गाने वाले लोगों के मुँह से नहीं। चारों ओर के शोरगुल और ध्वनि-प्रदूषण के बीच पहाड़ों के जैसा मौन और मिट्टी का सौंधापन अर्थात् चारों ओर फैला हुआ सीमेंट-कोंक्रिट के आँगन में मिट्टी का सौंधापन खो गया है। आदिवासियों के कच्चे घर-आँगन में गोबर से लिपे आँगन और झोपड़ी, दोनों मिल जायेंगे। साथ ही मिल जायेगी फसलों की लहलहाट। आशय यह है कि कवयित्री आदिवासियों के प्रकृति साथ का सहअस्तित्व और सहजीवन दोनों को बचाए रखने की बात करती है।

नाचने के लिए खुला आँगन गाने के लिए गीत हँसने के लिए थोड़ी-सी खिलखिलाहट रोने के लिए मुट्ठी भर एकान्त बच्चों के लिए मैदान पशुओं के लिए हरी-हरी घास बूढ़ों के लिए पहाड़ों की शान्ति

आदिवासी खाए बिना रह सकता है, मगर गाए-बजाए और नाचे बिना नहीं रह सकता। मुख्य धारा से दूर एकांत, दुर्गम स्थानों में रहने वाला यह समाज कम से कम साधनों और सीमित इच्छाओं में भी मस्ती भरा जीवन जी लेता है। ये लोग प्रकृति का उपयोग करते हैं - उपभोग नहीं। इसीलिए ये सिर्फ बच्चों के खेलने के लिए मैदान, अपने पशुओं को चराने के लिए आवश्यकता भर की हरी-हरी घास और बड़े-बूढ़ों के लिए पहाड़ों जैसी शांति, बस।

और इस अविश्वास-भरे दौर में थोड़ा-सा विश्वास थोड़ी-सी उम्मीद थोड़े-से सपने आओ, मिलकर बचाएँ कि इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है, अब भी हमारे पास !

कविता के आखिरी पड़ाव में कवयित्री ने पूरी मानव जाति के कल्याण और सुखकारी जीवन के लिए, पृथ्वी को रहने लायक और उसमें जीने लायक बनाए रखने के लिए जो कुछ भी बचाने लायक है, उसे बचाने की बात कही है। वैसे मनुष्य ने अपने व्यक्तिगत लोभ और लालच के लिए प्रकृति का मनमाने ढंग से शोषण किया है, उसकी प्राकृतिकता को खंडित किया है, जिसके बुरे परिणाम मनुष्य अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकंप, भूस्खलन, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और उनसे होने वाले विभिन्न रोगों के रूप में भोग रहा है।

बावजूद इसके कवयित्री के अनुसार अब भी बहुत कुछ ऐसा है जिसे बचाया जा सकता है और बचाने की अनिवार्यता है। आज चारों और अविश्वास फैला हुआ है। व्यक्ति अपनी ही परछाइयों से डर रहा है। ऐसे में थोड़ा-सा विश्वास बनाए रखने की आवश्यकता है - दूसरों का विश्वास अर्जित करने की और अपना विश्वास बनाए रखने की।

आज मनुष्य कई तरह की असफलताओं से, शासन-व्यवस्था के खराब आचरण के कारण निराश हो गया है, उसके सपने मर गए हैं। सपनों का मर जाना सबसे खतरनाक है, इसलिए कवयित्री ने इस उम्मीद और छोटे-छोटे सपनों को बनाए रखने को पहली जरूरत बताया है। अंत में कवयित्री पूरी मानवजाति से अपील करती हैं कि इस दौर में भी हमारे पास बहुत कुछ बचा है, जिसे अभी भी बचाने के लिए हर कीमत पर बचाया जाए।

यहाँ दो शब्द बहुत ही महत्वपूर्ण हैं - 'इस दौर में भी' और 'बहुत कुछ'। इस दौर में भी वाक्यांश का कवयित्री ने जानबूझकर उपयोग किया है, क्योंकि वैश्वीकरण और बाजारवाद के इस समय में हमने हर चीज को एक उत्पाद और मानवीय संबंधों को एक समझौते में बदल दिया है। हर व्यक्ति को एक ग्राहक बना दिया गया है जिससे केवल लाभ या फायदे की ही इच्छा की जा रही है - फिर चाहे वह माता-पिता या अन्य करीबी रिश्ते ही क्यों न हों!

लेकिन ऐसे उपभोक्तावादी समय में भी कवयित्री को ऐसा बहुत कुछ दिखता है, जिसे सुरक्षित रखा जा सकता है और दुनिया को जीने लायक बनाया जा सकता है। इस 'बहुत कुछ' में पानी, जमीन और जंगल का संरक्षण, पर्यावरण का ध्यान रखना, मानवीय विश्वास और छोटे-छोटे सपने आदि कई बातें शामिल हैं। इन्हें सुरक्षित रखना बहुत आवश्यक है।

शब्द-छवि :

  • आबोहवा - जलवायु
  • माटी - मिट्टी
  • सोंधापन - सुगंध
  • उम्मीद - आशा
  • दौर - समय
  • गर्माहट - नया उत्साह
  • मन का हरापन - मन की खुशियाँ
  • आग - गर्मी
  • अक्खड़पन - किसी बात को लेकर रुखाई से तन जाने का भाव
  • जुझारूपन - जूझने या संघर्ष करने की प्रवृत्ति
  • नंगी होना - मर्यादाहीन होना
  • झारखंडीपन - झारखंड का पुट
  • ठंडी होती - धीमी पड़ती
  • दिनचर्या - दैनिक कार्य
  • निर्मलता - पवित्रता
  • मौन - चुप्पी
  • एकांत - अकेलापन
  • हड़िया - दारू, शराब

शब्द-छवि :

  • आबो-हवा - जलवायु
  • माटी - मिट्टी
  • सोंधापन - सुगंध
  • उम्मीद - आशा
  • दौर - समय
  • गर्माहट - नया उत्साह
  • मन का हरापन - मन की खुशियाँ
  • आग - गर्मी
  • अक्खड़पन - किसी बात को लेकर रुखाई से तन जाने का भाव
  • जुझारूपन - जूझने या संघर्ष करने की प्रवृत्ति
  • नंगी होना - मर्यादाहीन होना
  • झारखंडीपन - झारखंड का पुट
  • ठंडी होती - धीमी पड़ती
  • दिनचर्या - दैनिक कार्य
  • निर्मलता - पवित्रता
  • मौन - चुप्पी
  • एकांत - अकेलापन
  • हड़िया - दारू, शराब

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