Official GSEB Solutions for Class 10 Hindi: संधि विच्छेद (विग्रह)
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Chapter-wise Solutions for Hindi: संधि विच्छेद (विग्रह)
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संधि के बारे में प्रश्न इस प्रकार होंगे :
दिए हए चार पर्यायों में से –
- गलत संधि बताना।
- उचित संधिविग्रह बताना।
भाषा में शब्दों के मेल का बहुत महत्त्व है। इससे भाषा सरस और समर्थ बनती है। शब्दों का मेल प्रायः समास या संधि के रूप में होता है।
भाषा में संधि का अर्थ है- दो या दो से अधिक शब्दों का निश्चित नियमों के अनुसार मेल करना। शब्दों का यह मेल उनके अंत्य और आदि वर्ण को मिलाकर किया जाता है। जैसे –
सूर्य + अस्त = सूर्यास्त
इस उदाहरण में 'सूर्य' शब्द का अंत्य वर्ण 'अ' (य् + अ) है और 'अस्त' शब्द का आदिवर्ण 'अ' है। व्याकरण के नियम के अनुसार 'अ' और 'अ' मिलकर 'आ' हो जाता है। इसलिए य (य् + अ) का 'अ' 'अस्त' के 'अ' से मिलकर 'आ' हो गया। इस प्रकार दोनों शब्दों की संधि से 'सूर्यास्त' शब्द बना।
इति + आदि = इत्यादि
यहाँ 'ति' (त + इ) के इ तथा 'आदि' के आ में संधि हुई है। नियम के अनुसार 'इ' और 'अ' मिलकर 'य' बनता है। यहाँ 'इ' और 'आ' मिलकर 'या' हो गया है। 'ति' में से 'इ' स्वर निकल जाने पर उसका मूल रूप 'त्' बच गया है। ह और या मिलकर त्या बना है।
सत् + जन - सज्जन
यहाँ 'त' तथा 'ज' में संधि होने से 'ज्ज' रूप बना है।
इस प्रकार दो निश्चित अक्षरों के पास-पास आ जाने के कारण उनके मेल से जो परिवर्तन होता है, उसे संधि कहते हैं।
संधि-विच्छेद : शब्दों की संधि और उसका विच्छेद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
संधि के विच्छेद (विग्रह) की क्रिया संधि से एकदम उल्टी है। बिच्छेद में संधि के कारण आए हुए विकार हटाकर संधि में जड़े हुए शब्दों को उनके मूल रूप में लिखा जाता है।
संधि का संबंध मुख्यतया संस्कृत भाषा के शब्दों अर्थात् तत्सम शब्दों से है। हिन्दी की वर्णमाला संस्कृत की वर्णमाला के अनुसार ही है। उसके अनुसार वर्ण (अक्षर) दो प्रकार के होते हैं :
- स्वर और
- व्यंजन।
जिन वर्णों का उच्चारण स्वतंत्र रूप से हो सकता है या कर सकते हैं, उन्हें स्वर कहते हैं। जिनका उच्चारण करने में स्वर की सहायता की जरूरत पड़ती है, उन्हें व्यंजन कहते हैं।
हिन्दी भाषा की वर्णमाला में निम्नलिखित बारह स्वर और तैंतीस व्यंजन हैं:
| स्वर | व्यंजन |
|---|---|
| अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ | क् ख, ग, घ ङ (क वर्ग) |
| ए, ऐ, ओ, औ | च् छ ज झ ञ् (च वर्ग) |
| ट्ट् ड् द ण् (ट वर्ग) | |
| त् थ् द ध न् (त वर्ग) | |
| प् फ् ब् भ् म् (प वर्ग) | |
| य् र् ल् व् (अंतःस्थ) | |
| श् व् स् ह (ऊष्माक्षर) | |
| (क् त्र ज्ञ) |
स्वरों के प्रकार :
- हस्व स्वर : अ इ उ ऋ
- दीर्घ स्वर : आ ई ऊ ऋ
- दीर्घ एवं संयुक्त स्वर : ए ऐ ओ औ (अं अः)
व्यंजनों के प्रकार :
क से लेकर म् तक के पच्चीस व्यंजनों को बोलते समय जीभ का कोई न कोई भाग मुख के दूसरे भागों का स्पर्श करता है। इसलिए इन पच्चीस व्यंजनों को स्पर्श व्यंजन कहते हैं। उपर्युक्त तालिका के अनुसार इन्हें क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग और प वर्ग में बांटा गया है।
य, र, ल और व का उच्चारण स्वरों और व्यंजनों के बौच का है। इसलिए इन चार व्यंजनों को अर्धस्वर अथवा अंतःस्थ व्यंजन कहते हैं।
श, ष, स् और ह का उच्चारण करते समय मुंह में एक प्रकार की सुरसुराहट-सी होती है। इसलिए इन्हें ऊष्म व्यंजन कहते हैं।
अनुस्वार तथा विसर्ग : अं को अनुस्वार तथा अ: (:) को विसर्ग कहते हैं।
अनुस्वार का उच्चारण 'छ', 'म्' अथवा 'न' की तरह होता है। जैसे- गंगा, चंपा, अंत, वंश, हंस आदि।
विसर्ग का उच्चारण 'ह' की तरह होता है। जैसे – प्रातः, दुःख, क्रमशः, प्रायः आदि।
स्वरान्त शब्द : शब्दों के अन्त में जो स्वर होता है उसके अनुसार शब्दों को अकारान्त, आकारान्त, इकारान्त, ईकारान्त, उकारान्त, ऊकारान्त आदि कहते हैं। जैसे -
- राम, श्याम, केशव (अकारान्त)
- राधा, रमा, माला (आकारान्त)
- गति, मति, रवि (इकारान्त)
- नदी, सती, माधवी (ईकारान्त)
- भानु, धेनु, गुरु, बिन्दु (उकारान्त)
- वधु (ऊकारान्त)
संधि के प्रकार :
स्वरसंधि : दो स्वर पास-पास आने पर उनमें जो परिवर्तन होता है उसे स्वरसंधि कहते हैं। जैसे –
- सूर्य + अस्त = सूर्यास्त [अ + अ = आ]
- नदी + ईश = नदीश [ई + ई = ई]
नीचे स्वरसंधि के कुछ नियम उदाहरणों के साथ दिए गए हैं :
| संधि से पहले | संधि होने के बाद | संधि-नियम |
|---|---|---|
| 1. अधिक + अधिक | अधिकाधिक | \( अ + अ = आ \) |
| 2. परम + आत्मा | परमात्मा | \( अ + आ = आ \) |
| 3. यथा + अर्थ | यथार्थ | \( आ + अ = आ \) |
| 4. रेखा + आकृति | रेखाकृति | \( आ + आ = आ \) |
| 5. कवि + इन्द्र | कवीन्द्र | \( इ + इ = ई \) |
| 6. प्रति + ईक्षा | प्रतीक्षा | \( इ + ई = ई \) |
| 7. देवी + इच्छा | देवीच्छा | \( ई + इ = ई \) |
| 8. नदी + ईश | नदीश | \( ई + ई = ई \) |
| 9. भानु + उदय | भानूदय | \( उ + उ = ऊ \) |
| 10. सिन्धु + ऊर्मि | सिन्धूर्मि | \( उ + ऊ = ऊ \) |
| 11. वधू + उत्सव | वधूत्सव | \( ऊ + उ = ऊ \) |
| 12. वधू + ऊर्मि | वधूर्मि | \( ऊ + ऊ = ऊ \) |
| 13. देव + इच्छा | देवेच्छा | \( अ + इ = ए \) |
| 14. सुर + ईश | सुरेश | \( अ + ई = ए \) |
| 15. यथा + इष्ट | यथेष्ट | \( आ + इ = ए \) |
| 16. महा + ईश | महेश | \( आ + ई = ए \) |
| 17. चन्द्र + उदय | चन्द्रोदय | \( अ + उ = ओ \) |
| 18. किरण + ऊर्जा | किरणोर्जा | \( अ + ऊ = ओ \) |
| 19. पूजा + उत्सव | पूजोत्सव | \( आ + उ = ओ \) |
| 20. महा + ऊर्मि | महोर्मि | \( आ + ऊ = ओ \) |
| 21. ब्रह्म + ऋषि | ब्रह्मर्षि | \( अ + ऋ = अर् \) |
| 22. राजा + ऋषि | राजर्षि | \( आ + ऋ = अर् \) |
| 23. एक + एक | एकैक | \( अ + ए = ऐ \) |
| 24. सदा + एव | सदैव | \( आ + ए = ऐ \) |
| 25. जल + ओघ | जलौघ | \( अ + ओ = औ \) |
| 26. महा + ओषधि | महौषधि | \( आ + ओ = औ \) |
| 27. अधि + अयन | अध्ययन | \( इ + अ = य् + अ = य \) |
| 28. इति + आदि | इत्यादि | \( इ + आ = य् + आ = या \) |
| 29. देवी + आगमन | देव्यागमन | \( ई + आ = य् + आ = या \) |
| 30. सु + अस्थ | स्वस्थ | \( उ + अ = व् + अ = व \) |
| 31. सु + आगत | स्वागत | \( उ + आ = व् + आ = वा \) |
| 32. प्रति + एक | प्रत्येक | \( इ + ए = य् + ए = ये \) |
| 33. महा + ऐश्वर्य | महैश्वर्य | \( आ + ऐ = ऐ \) |
| 34. नि + ऊनता | न्यूनता | \( इ + ऊ = य् + ऊ + यू \) |
| 35. पृथु + ई | पृथ्वी | \( उ + ई = व् + ई = वी \) |
ए, ऐ, ओ और औ के पश्चात् कोई भी स्वर आए तो उनकी जगह क्रमशः अय, आय, अव और आव होता है। जैसे -
| 36. ने + अन | नयन | न् + अय् + अन |
| 37. गै + अक | गायक | ग् + आय् + अक |
| 38. भो + अन | भवन | भ् + अव् + अन |
| 39. पौ + अक | पावक | प् + आव् + अक |
व्यंजनसंधि : हिन्दी भाषा की वर्णमाला का परिचय आगे दिया जा चुका है। उनमें से व्यंजनों के बारे में विशेष जानकारी संक्षेप में यहाँ दी जाती है:
| अघोष (कठोर) व्यंजन | घोष (मृदु) व्यंजन | अंतःस्थ व्यंजन | ऊष्म व्यंजन |
|---|---|---|---|
| \( क् ख् \) | \( ग् घ् ङ \) | \( य् र् ल् व् \) | \( श् ष् स् ह \) |
| \( च् छ \) | \( ज् झ ञ् \) | ||
| \( ट् ठ \) | \( ड् ढ ण् \) | ||
| \( त् थ् \) | \( द् ध् न् \) | ||
| \( प् फ् \) | \( ब् भ् म् \) |
| संधि से पहले | संधि होने के बाद | नियम |
|---|---|---|
| 1. वाक् + ईश्वरी | वागीश्वरी | \( क्, च्, ट्, त्, प् \) के बाद अनुनासिक वर्ण को छोड़कर दूसरा कोई स्वर अथवा घोष व्यंजन आए तो \( क्, च्, ट्, त्, प् \) के स्थान पर उसके वर्ग का तीसरा अक्षर हो जाता है। इन उदाहरणों में \( क् \) का \( ग् \), \( ट् \) का \( ड् \), \( त् \) का \( द् \) और \( प् \) का \( ब् \) हुआ है। |
| दिक् + गज | दिग्गज | |
| दिक् + भ्रान्ति | दिग्भ्रान्ति | |
| षट् + आनन | षडानन | |
| सत् + आनन्द | सदानन्द | |
| अप् + ज | अब्ज | |
| 2. वाक् + मय | वाङ्मय | \( क्, च्, ट्, त्, प् \) के पश्चात् कोई अनुनासिक व्यंजन आए तो \( क्, च्, ट्, त्, प् \) के स्थान पर क्रमशः उस वर्ग का पाँचवाँ अक्षर होता है। इन उदाहरणों में \( क् \) के पश्चात् \( म् \), \( ट् \) के पश्चात् \( म् \) तथा \( त् \) के पश्चात् \( म \) और \( न \) अनुनासिक व्यंजन आए हैं। इसलिए \( क् \) का \( ङ् \), \( ट् \) का \( ण् \) तथा \( त् \) का \( न् \) हुआ है। |
| षट् + मास | षण्मास | |
| तत् + मय | तन्मय | |
| जगत् + नाथ | जगन्नाथ | |
| 3. जगत् + ईश्वर | जगदीश्वर | \( त् \) के बाद कोई स्वर, घोष व्यंजन अथवा \( य, र, व \) आए तो \( त् \) के बदले \( द् \) हो जाता है। इन उदाहरणों में \( त् \) के बाद क्रमशः आ, ई (स्वर), \( भ्, घ्, ध \) (घोष व्यंजन) और \( र् \) आए हैं। इसलिए नियम के अनुसार \( त् \) का \( द् \) हुआ है। |
| भगवत् + भक्ति | भगवद्भक्ति | |
| उत् + घाटन | उद्घाटन | |
| सत् + धर्म | सद्धर्म | |
| तत् + रूप | तद्रूप | |
| 4. सत् + चरित्र | सच्चरित्र | \( त् \) अथवा \( द् \) के पश्चात् \( च \) वर्ग का वर्ण या \( ल \) आए तो \( त् \) और \( द् \) अपने बादवाले वर्ण का रूप ले लेते हैं। इन उदाहरणों में \( त् \) के पश्चात् \( च, ज \) और \( ल \) वर्ण आए हैं। इसलिए \( त् \) क्रमशः \( च्, ज्, ल \) में बदल गया है। |
| सत् + जन | सज्जन | |
| विपद + जाल | विपज्जाल | |
| उत् + लेख | उल्लेख | |
| 5. उत् + श्वास | उच्छ्वास | \( त् \) अथवा \( द् \) के बाद \( श् \) आए तो \( त् \) अथवा \( द् \) का \( च् \) और \( श् \) का \( छ \) हो जाता है। यदि \( त् \) के बाद \( ह \) आए तो \( त् \) के बदले \( द् \) और \( ह \) के स्थान पर \( ध \) हो जाता है। 'उत् + हार' में \( त् \) के बाद \( ह \) वर्ण है, इसलिए \( त् \) का \( द् \) तथा \( ह \) का \( ध \) होकर 'उद्धार' हुआ है। |
| उत् + शिष्ट | उच्छिष्ट | |
| उत् + हार | उद्धार | |
| 6. आ + छादन | आच्छादन | 'छ' के पहले कोई स्वर हो तो 'छ' के बदले 'च्छ' हो जाता है। पहले उदाहरण में 'छ' के पहले 'आ' और दूसरे में 'इ' स्वर आया है। इसलिए छा का च्छा तथा छे का 'च्छे' हुआ है। |
| परि + छेद | परिच्छेद | |
| 7. अलम् + कार | अलंकार (अलङ्कार) | \( म् \) के बाद कोई व्यंजन आए तो \( म् \) अनुस्वार अथवा उसी वर्ग के अनुनासिक व्यंजन में बदल जाता है। 'अलम् + कार' में \( म् \) के बाद 'क' व्यंजन आया है। इसलिए \( म् \) अनुस्वार (\( \text{०} \)) में बदल गया है। इसी प्रकार 'क' अपने वर्ग के अनुनासिक 'ङ्' में बदल जाता है। तब उसे 'अलंकार' के बदले 'अलङ्कार' लिखेंगे। इसी प्रकार 'सम् + चित्' में 'म्' के बाद 'च' आया है, इसलिए \( म् \) अनुस्वार में बदल गया है। 'संचित' के बदले 'सञ्चित' भी लिख सकते हैं, पर यह प्रयोग सामान्य व्यवहार में प्रचलित नहीं है। इसलिए हम सन्तोष के बदले 'संतोष' और 'सम्पूर्ण' के बदले 'संपूर्ण' ही लिखते हैं। |
| सम् + चित | संचित (सञ्चित) | |
| सम् + तोष | संतोष (सन्तोष) | |
| सम् + पूर्ण | संपूर्ण (सम्पूर्ण) | |
| सम् + हार | संहार | |
| 8. सम् + योग | संयोग | \( म् \) के बाद अंतःस्थ या ऊष्म व्यंजन हो तो \( म् \) के बदले अनुस्वार का प्रयोग होता है। \( य्, र्, ल्, व् \) ये अंतःस्थ व्यंजन तथा \( स् \) ऊष्म व्यंजन है। इसलिए संधि में 'म्' अनुस्वार में बदल गया है। |
| सम् + रक्षण | संरक्षण | |
| सम् + लाप | संलाप | |
| किम् + वदन्ती | किंवदन्ती | |
| सम् + सार | संसार | |
| 9. नि + सेध | निषेध | यदि अ और आ को छोड़कर किसी स्वर के बाद \( स् \) आए तो \( स् \) के बदले \( ष् \) हो जाता है। 'नि + सेध' में 'इ' स्वर के बाद 'से' (\( स् \)) आया है। इसलिए '\( स् \)' का '\( ष \)' हुआ है। इसी प्रकार अन्य उदाहरणों में भी '\( स् \)' का '\( ष \)' हुआ है। |
| अभि + सेक | अभिषेक | |
| वि + सम | विषम | |
| सु + सुप्त | सुषुप्त | |
| 10. भर् + अन | भरण | ऋ, \( र् \) अथवा \( ष \) के बाद तुरंत \( न् \) आए अथवा उनके बीच में स्वर, क वर्ग या य वर्ग का वर्ण, अनुस्वार अथवा \( य्, व्, ह \) हो तो भी \( न् \) का \( ण् \) हो जाता है। 'भर् + अन' में \( र् \) के बाद 'अ' स्वर आया है। इसलिए '\( न् \)' का '\( ण \)' होकर 'भरण' बना है। इसी प्रकार 'परि + मान' में रि (\( र् \)) के बाद '\( न् \)' आया है। इन दोनों के बीच 'मा' (म-प वर्ग) है, इसलिए नियमानुसार '\( न् \)' का '\( ण \)' हुआ है। |
| नारा + अयन | नारायण | |
| राम + अयन | रामायण | |
| पार + अयन | पारायण | |
| परि + मान | परिमाण |
विसर्गसंधि : अ : (:) को विसर्ग कहते हैं। अतः, प्रातः, स्वतः आदि विसर्गवाले शब्द हैं। विसर्गसंधि के उदाहरण और मुख्य नियम इस प्रकार हैं:
| संधि से पहले | संधि होने के बाद | नियम |
|---|---|---|
| 1. मनः + विनोद | मनोविनोद | विसर्ग के पहले अ और बाद में अंतःस्थ या घोष व्यंजन आने पर विसर्ग का ओ हो जाता है। 'मनः + विनोद' में विसर्ग के पहले अ (\( न् + अ + न \)) और बाद में \( व \) अंतःस्थ व्यंजन है। इसलिए विसर्ग का 'ओ' होकर 'मनोविनोद' बना है। 'तमः + गुण' में विसर्ग के पहले अ तथा बाद में घोष व्यंजन \( ग \) है। इसलिए \( मः \) का 'मो' हो गया है। |
| मनः + रथ | मनोरथ | |
| मनः + भाव | मनोभाव | |
| तपः + वन | तपोवन | |
| (March 20) | ||
| तमः + गुण | तमोगुण | |
| 2. उष: + काल | उष:काल | विसर्ग के पहले अ हो तथा इसके पश्चात् \( क, ख, प् \) या \( फ् \) हो तो विसर्ग में कोई परिवर्तन नहीं होता। 'उषः + काल' में विसर्ग के बाद \( क् \) है, इसलिए विसर्ग ज्यों का त्यों बना हुआ है। इसी प्रकार 'रजःकण' और 'अंतःपुर' में भी विसर्ग का लोप या रूपांतर नहीं हुआ है। |
| रजः + कण | रजःकण | |
| अंतः + पुर | अंतःपुर | |
| 3. नि: + जन | निर्जन | विसर्ग के पहले अ या आ के सिवाय कोई दूसरा स्वर हो और बाद में कोई घोष व्यंजन या स्वर हो तो विसर्ग का \( र् \) हो जाता है। इन उदाहरणों में विसर्ग के पहले क्रमशः इ, इ, उ और ई-ये स्वर आए हैं और उनके बाद घोष व्यंजन क्रमशः \( ज्, द्, ग्, व् \) आए हैं, इसलिए विसर्ग का \( र् \) में रूपांतर हो गया है। |
| निः + दय | निर्दय | |
| दुः + गुण | दुर्गुण | |
| आशी: + वाद | आशीर्वाद | |
| 4. निः + आहार | निराहार | इन उदाहरणों में उपर्युक्त नियम के अनुसार पहले विसर्ग का \( र् \) हुआ है। जैसे- निर् + आहार। फिर \( र् \) में बाद के स्वर आ में मिल जाने पर 'रा' हो गया है। इसी प्रकार अन्य उदाहरणों में भी '\( र् \)' में उसके बाद के स्वर मिल गए हैं। |
| दुः + उपयोग | दुरुपयोग | |
| निः + ईह | निरीह | |
| 5. निः + रस | नीरस | विसर्ग के पहले अ या आ के अतिरिक्त ह्रस्व स्वर हो और बाद में \( र् \) आए तो पहले का ह्रस्व स्वर दीर्घ हो जाता है। 'निः + रस' तथा 'निः + रव' में विसर्ग के पहले ह्रस्व इ है और बाद में \( र् \) आया है। इसलिए विसर्ग के पहले आया हुआ ह्रस्व \( इ \) दीर्घ होकर \( ई \) में बदल गया है। |
| निः + रव | नीरव | |
| 6. निः + कपट | निष्कपट | विसर्ग के पहले \( इ \) अथवा \( उ \) हो और उसके बाद में \( क, ख, प्, फ् \) आए तो विसर्ग \( ष् \) में बदल जाता है। इन उदाहरणों में विसर्ग के पहले \( इ \) या \( उ \) स्वर आया है और उसके बाद \( क् \) या \( फ् \) है, इसलिए विसर्ग का \( ष् \) हो गया है। |
| निः + कंप | निष्कंप | |
| दुः + कर्म | दुष्कर्म | |
| निः + फल | निष्फल | |
| 7. निः + चय | निश्चय | विसर्ग के बाद \( च् \) या \( छ \) आने पर विसर्ग \( श् \) में बदल जाता है। विसर्ग के बाद \( त् \) या \( थ \) आने पर विसर्ग \( स् \) में बदल जाता है। 'निः + चय' में विसर्ग के बाद \( च् \) है। 'निः + छल' में विसर्ग के बाद \( छ \) है। इसलिए 'निश्चय' और 'निश्छल' में विसर्ग के बदले \( श् \) का प्रयोग हुआ है। |
| निः + चिन्त | निश्चिन्त | |
| निः + छल | निश्छल | |
| निः + तेज | निस्तेज | |
| 8. निः + संदेह | निःसंदेह, निस्संदेह | विसर्ग के पश्चात् \( श्, ष, स् \) आने पर विसर्ग में कोई परिवर्तन नहीं होता अथवा विसर्ग के स्थान पर आगे आया हुआ अक्षर (\( श, ष, स् \)) रखा जाता है। (विकल्प संधि) 'निः + सहाय' में विसर्ग के बाद '\( स् \)' है, इसलिए विसर्ग को उसी रूप में रखने पर 'निःसहाय' रूप बना है। विसर्ग को उसके आगे के \( स् \) में बदल देने पर संधि का रूप 'निस्सहाय' होगा। व्यवहार में 'निःसहाय' और 'निस्सहाय' दोनों ही रूपों का प्रयोग होता है। |
| निः + सहाय | निःसहाय, निस्सहाय | |
| निः + संग | निःसंग, निस्संग | |
| दुः + शासन | दुःशासन, दुश्शासन |
महत्वपूर्ण संधि-विच्छेद :
- दुर्लभ = दुस \( (दुः) \) + लभ
- उच्छ्वास = उत् + श्वास
- पुरुषार्थ = पुरुष + अर्थ
- नाविक = नौ + इक
- निष्प्राण = निस् + प्राण
- निराश्रय = निस् \( (निः) \) + आश्
- दुश्चिन्ता = दुर् \( (दुः) \) + चिन्ता
- शिलालेख = शिला + आलेख
- व्यापक = वि + आपक
- आनन्दोपभोग = आनन्द + उपभोग
- नास्तिकता = न + आस्तिकता
- निर्माण = निस् \( (निः) \) + मान
- अध्ययन = अधि + अयन
- उन्मुक्त = उत् + मुक्त
- सज्जन = सत् + जन
- निर्दोष = निस् \( (निः) \) + दोष
- रवीन्द्र = रवि + इन्द्र
- उल्लेख = उत् + लेख
- निराहार = निस् \( (निः) \) + आहार
- निषिद्ध = निस् \( (निः) \) + सिद्ध
- उज्ज्वलता = उत् + ज्वलता
- गौरागिनी = गौर + अंगिनी
- आशीर्वाद = आशी: + वाद
- निर्णय = निस् \( (निः) \) + नय
- निरीक्षण = निस \( (निः) \) + ईक्षण
- नीरव = निस् \( (निः) \) + रव
- उन्मत्त = उत् + मत्त
- साकार = स + आकार
- राजेन्द्र = राजा + इन्द्र
- व्यर्थ = वि + अर्थ
- नदीश = नदी + ईश
- अधिकांश = अधिक + अंश
- मनोवृत्ति = मनस् + वृत्ति
- महत्त्वाकांक्षा = महत्त्व + आकांक्षा
- अनावश्यक = अन् + आवश्यक
- व्यवस्था = वि + अवस्था
- पर्याप्त = परि + आप्त
- सदैव = सदा + एव
- यद्यपि = यदि + अपि
- यतीन्द्र = यति + इन्द्र
- निरन्तर = निस् \( (निः) \) + अन्तर
- अन्वेषण = अनु + एषण
- अनभिज्ञ = अन् + अभिज्ञ
- वृद्धाश्रम = वृद्ध + आश्रम
- निर्विरोध = निस् \( (निः) \) + विरोध
- साष्टांग = स + अष्ट + अंग
- यथोचित = यथा + उचित
- कमलेश = कमल + इश
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