GSEB Class 10 Hindi Vyakaran पद विचार (1st Language) Solutions

Get the most accurate GSEB Solutions for Class 10 Hindi पद विचार (1st Language) here. Updated for the 2026-27 academic session, these solutions are based on the latest GSEB textbooks for Class 10 Hindi. Our expert-created answers for Class 10 Hindi are available for free download in PDF format.

Detailed पद विचार (1st Language) GSEB Solutions for Class 10 Hindi

For Class 10 students, solving GSEB textbook questions is the most effective way to build a strong conceptual foundation. Our Class 10 Hindi solutions follow a detailed, step-by-step approach to ensure you understand the logic behind every answer. Practicing these पद विचार (1st Language) solutions will improve your exam performance.

Class 10 Hindi पद विचार (1st Language) GSEB Solutions PDF

आप जानते हैं कि व्याकरणिक दृष्टि से हिन्दी पदों को पाँच प्रकारों में बाँटते हैं:

  1. संज्ञा,
  2. सर्वनाम,
  3. विशेषण,
  4. क्रिया और
  5. अव्यय

इनका परिचय पिछली कक्षाओं में करवाया जा चुका है। संक्षेप में यहाँ उसका पुनरावर्तन करेंगे।

1. संज्ञा

संज्ञा की परिभाषा : किसी वस्तु, स्थान, जाति, समूह या भाव के नाम का ज्ञान करवाने वाले शब्दों को संज्ञा कहते हैं। जैसे : अहमदाबाद, शहर, वीरता, दूध, कक्षा आदि।

संज्ञा के भेद :

1. व्यक्तिवाचक संज्ञा : जिन शब्दों से किसी एक ही स्थान, व्यक्ति या प्राणी का ज्ञान हो उन्हें व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे – बैजू, आगरा, हिमालय, गंगा, रामायण आदि।

2. जातिवाचक संज्ञा : जिन शब्दों से किसी एक ही जाति के संपूर्ण प्राणियों, वस्तुओं और स्थानों आदि का ज्ञान हो उन्हें जातिवाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे – समुद्र, वन, नगर, आदमी, गाय, लड़का, लड़की, नदी।

3. भाववाचक संज्ञा : जिन शब्दों से प्राणियों या वस्तुओं के भाव, गुण-दोष, अवस्था, धर्म, दशा आदि का ज्ञान होता हो तो उसे भाववाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे : मिठास, लालिमा, शिष्टता, क्रोध, सत्य, बुढ़ापा।

4. समुदायवाचक (समूहवाचक) संज्ञा : जिन शब्दों से अनेक व्यक्तियों के या वस्तुओं के समूह का ज्ञान हो उन्हें समुदायवाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे : सेना, कक्षा, परिवार, गुच्छा, बाली।

5. द्रव्यवाचक संज्ञा : जिन शब्दों से किसी धातु, द्रव्य आदि पदार्थ का ज्ञान हो उन्हें द्रव्यवाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे : पानी, लोहा, सोना, तेल, आदि।

संज्ञा शब्दों को वाक्य में प्रयोग करते समय उन्हें वाक्य के लिए 'उपयुक्त' बनाते समय लिंग, वचन तथा कारक के अनुसार उनमें परिवर्तन करना पड़ता है।

संज्ञा लिंग:

लिंग की परिभाषा : शब्द की जाति को लिंग कहते हैं। संज्ञा के जिस रूप से व्यक्ति या वस्तु की नर या मादा जाति का ज्ञान हो, उसे व्याकरण में 'लिंग' कहते हैं। व्याकरणिक लिंग प्राकृतिक लिंगों से मेल खाए यह अनिवार्य नहीं है।

हिन्दी में लिंग के दो प्रकार होते हैं :

1. पुल्लिंग : पुरुष जाति का ज्ञान करवाने वाले शब्द पुलिंग कहलाते हैं। जैसे – राजा, लड़का, शेर, बैल, भाई आदि।

2. स्त्रीलिंग : स्त्री जाति का ज्ञान करवाने वाले शब्द स्त्रीलिंग कहलाते हैं।

कुछ बहुप्रचलित पुल्लिंग एवं स्त्रीलिंग शब्द : नित्य पुल्लिंग शब्द :

अखबार, अभिमान, आकाश, खिलौना, जल, चावल, दूध, दाँत, पहाड़, पेड़, जंगल, सागर आदि।

नित्य स्त्रीलिंग शब्द :

आत्मा, इज्जत, खबर, घास, थकान, पुस्तक, परीक्षा, शाम, कुर्सी, सुई, लता, कलम, डाल आदि।

वचन

वचन का परिभाषा : शब्द के जिस रूप से उसके एक या अनेक होने का ज्ञान हो, उसे वचन कहते हैं।

वचन दो प्रकार के होते हैं :

1. एकवचन : शब्द के जिस रूप से एक प्राणी या वस्तु का ज्ञान हो उसे एकवचन कहते हैं। जैसे - लड़का, नदी, किताब, गाँव आदि।

2. बहुवचन : शब्द के जिस रूप से अनेक प्राणियों या वस्तुओं का ज्ञान हो उसे बहुवचन कहते हैं। जैसे - लड़के, नदियाँ, किताबें, गाँवें आदि।

वचन का वाक्य रचना पर प्रभाव :

लिंग की तरह ही वचन का भी विशेषण, संबंधकारक, क्रियाविशेषण और क्रिया शब्दों पर प्रभाव पड़ता है और वचन परिवर्तन होने पर इनके रूप में भी बदलाव हो जाता है।

जैसे –

  • बैजू नया खिलौना लाया।
  • बैजू नए खिलोने लाया।

संबंध-कारक में परिवर्तन :

  • एकवचन : जग्गू का दोस्त अच्छा है।
  • बहुवचन : जग्गू के दोस्त अच्छे है।

क्रियाविशेषण में परिवर्तन :

  • एकवचन : वह पढ़ता-पढ़ता सो गया।
  • बहुवचन : वे पढ़ते-पढ़ते सो गए।
  • एकवचन : नेता ने भाषण दिया।
  • बहुवचन : नेताओं ने भाषण दिये।

एकवचन शब्दों के बहुवचन रूप :

एकवचनबहुवचन
लड़कालड़के
मुर्गामुर्गे
बेटीबेटियाँ
नदीनदियाँ
वस्तुवस्तुएँ
धेनुधेनुएँ
वधूवधूएँ
चुहियाचुहियाँ
बुढ़ियाबुढ़ियाँ
आपआपलोग
प्रजाप्रजाजन
कर्मचारीकर्मचारीगण
टोपीटोपियाँ
सेविकासेविकाएँ
रानीरानियाँ
चादरचादरें
मूर्तिमूर्तियाँ
गधागधे
तिथितिथियाँ
लिपिलिपियाँ
पुस्तकपुस्तकें
रातरातें
चिड़ियाचिड़ियाँ
कुटियाकुटियाँ
लतालताएँ
शाखाशाखाएँ
वस्तुवस्तुएँ
ऋतुऋतुएँ
पाठशालापाठशालाएँ
गाड़ीगाड़ियाँ
बहूबहुएँ
खिलौनाखिलौने
पुत्रीपुत्रियाँ
बातबातें
नारीनारियाँ
बछियाबछियों
उपवनउपवनों
युवतीयुवतियाँ

कारकः

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से वाक्य के अन्य शब्दों को उनका संबंध सूचित हो उस रूप को कारक कहते हैं। अर्थात् संज्ञा या सर्वनाम के आगे जब ने, को, से, में आदि विभक्तियाँ लगती हैं उन्हें कारक कहते हैं।

कारक के भेद :

हिन्दी में कारक आठ हैं। विभक्ति से बने शब्द रूप को 'पद' कहा जाता है। हिन्दी कारक-विभक्तियों के चिह्न निम्न हैं :

  • कर्ता – ने
  • कर्म - को
  • करण – से, द्वारा
  • सम्प्रदान – को, के, लिए
  • अपादान – से
  • सम्बन्ध – का, की, के, रा, री, रे, ना, नी, ने
  • अधिकरण – में, पर, पै
  • सम्बोधन – हे, अहो, अरे, अबे आदि।
कर्ताकारकवाक्य में जो काम करनेवाले के रूप में आता है उसे कर्ता कहते हैं।
कर्मकारकवाक्य में क्रिया का फल जिस शब्द पर पड़ता है, उसे कर्म कहते हैं।
करणकारकवाक्य में जिस शब्द के द्वारा क्रिया के संबंध का ज्ञान होता है, उसे करण कहते हैं।
सम्प्रदानकारकजिसके लिए कुछ किया जाता है या जिसको कुछ दिया जाता है, इसका ज्ञान करानेवाले शब्द को सम्प्रदानकारक कहते हैं।
अपादानकारकसंज्ञा के जिस रूप में किसी वस्तु के अलगाव का ज्ञान होता है उसे अपादानकारक कहते हैं।
सम्बन्धकारकसर्वनाम या संज्ञा के जिस रूप से अन्य किसी शब्द के साथ संबंध प्रकट होता है, उसे सम्बन्धकारक कहते हैं।
अधिकरणकारकजिस शब्द से कार्य करने की सूचना हो अर्थात् जो शब्द क्रिया का आधार सूचित करता है, उसे अधिकरणकारक कहते है।
सम्बोधनकारकजिस संकेत के द्वारा संबोधन करना, पुकारना, दुःख, हर्ष या आश्चर्य का मान प्रकट किया जाता है, उसे सम्बोधनकारक कहते हैं।

कारकों के उदाहरण :

  • राम ने पुस्तक पढ़ी। (कर्ताकारक)
  • बच्चे पढ़ते हैं (कर्ताकारक)
  • स्वेता ने पुस्तक पढ़ी। (कर्ताकारक)
  • मोहन गाँव जाता है। (कर्ताकारक)
  • तुमने नहीं पहचाना। (कर्ताकारक)
  • मोहन ने राम को कलम दी। (कर्मकारक)
  • मोहन कलम से लिखता है। (करणकारक)
  • हम आँखों से देखते हैं। (करणकारक)
  • मोहन कलम से पत्र लिखता है।। (करणकारक)
  • पिताजी राम के लिए किताब लाए। (सम्प्रदानकारक)
  • ब्राह्मण को दान दिया। (सम्प्रदानकारक)
  • बालक छत से गिर पड़ा। (अपादानकारक)
  • मैं घर से जा रहा हूँ। (अपादानकारक)
  • राम का भाई (संबंधकारक)
  • राम के पिता (संबंधकारक)
  • राम की बहन (संबंधकारक)
  • अपना घर (संबंधकारक)
  • अपने लोग (संबंधकारक)
  • अपनी माँ (संबंधकारक)
  • मेरा घर (संबंधकारक)
  • मेरे लोग (संबंधकारक)
  • मेरी पुस्तक (संबंधकारक)
  • राम घर में हैं। (अधिकरणकारक)
  • राम पेड़ पर चढ़ा। (अधिकरणकारक)
  • हे राम (संबोधनकारक)
  • ओ भगवान (संबोधनकारक)
  • अरे ! मत करो (संबोधनकारक)

संज्ञा से नए शब्द रूप बनाना

भाववाचक संज्ञा बनाना : आप जानते ही हैं कि जिस शब्द से किसी वस्तु या व्यक्ति के गुण, दशा, अवस्था, स्वभाव, भाव, व्यापार (कार्य) अथवा धर्म का ज्ञान होता हो, उसे भाववाचक संज्ञा कहते हैं; जैसे – दया, ममता, बचपना, दरिद्रता, क्रोध, चढ़ाई, घबराहट, मिठास आदि।

लक्षण : भाववाचक संज्ञा की पहचान के लिए कुछ चिह्न हैं जो शब्द के अंत में प्रत्यय के रूप में जुड़े होते हैं। ये प्रत्यय हैं – ई, त्व, ता, पन, पा, हट, वट, स, क तथा व। इन प्रत्ययों के जुड़ने से बने एक-एक उदाहरण इस प्रकार हैं –

  • भला – भलाई
  • शिव – शिवत्व
  • सज्जन – सज्जनता
  • बच्चा - बचपन
  • बूढ़ा – बुढ़ापा
  • चिकना – चिकनाहट
  • सजाना – सजावट
  • मीठा – मिठास
  • वैद्य – वैद्यक
  • लघु- लाघव

भाववाचक संज्ञाएँ संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण तथा क्रिया से बनती हैं। कुछ उदाहरण नीचे दिए जा रहे हैं –

संज्ञा शब्दों से भाववाचक संज्ञा :

  • शूर – शौर्य
  • शिशु – शैशव, शिशुता
  • धीरज – धैर्य
  • मित्र – मित्रता, मैत्री
  • ब्राह्मण – ब्राह्मणत्व
  • दास – दासता, दासत्व
  • ठग – ठगी
  • गुरु – गुरुता, गुरुत्व, गौरव
  • सखा – सखा
  • पुरुष – पौरुष, पुरुषत्व
  • किशोर – कैशोर्य, किशोरपन
  • पशु – पशुता, पशुत्व
  • बंधु – बंधुत्व
  • डाकू – डाका, डकैती
  • नारी – नारीत्व
  • साधु – साधुता, साधुत्व
  • नर - नरत्व
  • प्रभु – प्रभुता, प्रभुत्व
  • भाई – भाईचार

सर्वनाम से भाववाचक संज्ञा

निजनिजत्वअपनाअपनापनस्वस्वत्व
परायापरायापनसर्वसर्वस्वममममता, ममत्व

विशेषण से भाववाचक संज्ञा :

ऊँचाऊँचाईचतुरचतुराईनिम्ननिम्नता
चालाकचालाकीउच्चउच्चतामजदूरमजदूरी
मोटामोटापा, मोटाईकायरकायरतालघुलघुता, लघुत्व, लाघव
अच्छाअच्छाईशीतलशीतलताबुराबुराई
तीखातीखापनकालाकालिमामधुरमाधुर्य, मधुरता
चिकनाचिकनाहटवृद्धवृद्धत्व, वार्द्धक्यमूढ़मूढ़ता, मूढत्व
कंजूसकंजूसीक्रूरक्रूरतागंभीरगांभीर्य
वाँकावाकपन----

क्रिया से भाववाचक संज्ञा :

पहचानना-पहचानपढ़नापढ़ाईकहनाकहानी, कहावत
लिखनालिखाई, लिखावटरोनारुलाईबुलानाबुलावा, बुलाहट
बोनाबुवाईहसनाहसीकमानाकमाई
थिरकनाथिरकनदिखानादिखावटकाटनाकटाई
पीनापानमारनामारचलनाचाल
जलनाजलन----

कर्तृवाचक संज्ञा

प्रत्ययकर्तृवाचक संज्ञा
- चर् + अनभचर, जलचर, निशाचर, गुप्तचर
- अकगायक, ग्राहक, कृषक, दीपक, पाठक, रक्षक, साधक, वाचक, निवेशक, चालक
- अनमोहन, दमन, साधन, पावन
- इन् (ई)योगी, रोगी, भोगी, द्वेषी, दोषी, लोभी, गुणी, सुखी, दुःखी
-ताअध्येता, अभिनेता, ज्ञाता, दाता, नेता, श्रोता, भोक्ता, विक्रेता, प्रणेता, रचयिता, हंता
विद्-वेत्ताइतिहासविद्, इतिहासवेत्ता, शास्त्रविद्, कलाविद्, तत्त्ववेत्ता, प्राच्यवेत्ता, भाषाविद्, विधिवेत्ता
- अकड़घुमक्कड़, पियक्कड़, भुलक्कड़, बुझक्कड़, फक्कड़, भुक्खड़
आकाउड़ाका, लड़ाका, भड़ाका
- इयडाकिया, धुनिया, जड़िया, नचनिया, रसिया, रसोइया
इड़ीगंजेड़ी, भंगेड़ी, नशेड़ी
एरालुटेरा, चितेरा
ऐतलठैत, डकैत, भलैत
ओरा (ओड़ा)चटोरा, भगोड़ा, कठफोड़ा
औता/औतीसमझौता, चुकौती, चुनौती, कसौटी, छुड़ौती, बपौती, बुढ़ौती, मनौती, फिरौती
औना/औनीखिलौना, पहरौनी, बिछौना, मिचौनी
वालाकरनेवाला, कहनेवाला, नाचनेवाला, ढोनेवाला, सुननेवाला, गानेवाला (इनके लिए संस्कृत शब्द क्रमशः कर्ता, कथक, नर्तक, वाहक, श्रोता, गायक का प्रयोग भी हिंदी में होता है।)
कारकथाकार, ग्रंथकार, टीकाकार, पत्रकार, स्वर्णकार, वार्ताकार, संगीतकार, नाटककार, चाटुकार, चित्रकार, कुंभकार, चर्मकार, साहित्यकार, मूर्तिकार, गीतकार
कारीआक्रमणकारी, कांतिकारी, दमनकारी, षड्यंत्रकारी
मारपाकेटमार, छापामार, मक्खीमार, लट्ठमार
खोरब्याजखोर, सूदखोर, गोताखोर
आरकुम्हार, चमार, लुहार, सुनार
धरगदाधर, मुरलीधर, गंगाधर, गिरिधर, चक्रधर
अर्थीविद्यार्थी, शोधार्थी, सम्मानार्थी
आगममेधागम, वर्षागम, विधागम, धनागम
जीवीबुद्धिजीवी, मसिजीवी, कृषिजीवी, परजीवी, क्षणजीवी

स्वयं हल कीजिए :

उचित प्रत्यय लगाकर कर्तृवाचक संज्ञा बनाइए :

लेनाटीकाविधिमेघपढ़नाकिरायाविप्लवपूजाभ्रमक्रांतिबुद्धिउड़नालिखना
लूटनानाचद्वेषभाष्यगदाकहानीसंन्यासकविताचामशिक्षालट्ठपत्रभागन
संग्रहइतिहाससोनाभूखविधियज्ञशास्त्रघूमनाअर्थशास्त्रलोहायशमसि-

सर्वनाम

सर्वनाम की परिभाषा : संज्ञा के स्थान पर उपयोग होने वाले शब्दों को सर्वनाम कहते हैं। जैसे – मैं, तू, वह, आप, यह, वे कोई, कुछ, क्या, कौन, जो, आदि।

सर्वनाम के भेद : हिन्दी में सर्वनाम के 6 भेद हैं।

1. पुरुषवाचक सर्वनाम : बोलनेवाले, सुननेवाले या किसी अन्य व्यक्ति के लिए उपयोग होनेवाले सर्वनामों को पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं :

1. उत्तम पुरुष : वक्ता का लेखक अपने नाम के बदले जिस शब्द का प्रयोग करे वह उत्तम पुरुष-वाचक सर्वनाम कहलाता है। जैसे : मैं, हम।

2. मध्यम पुरुष : वक्ता या लेखक जिस शब्द को श्रोता या पाठक के लिए प्रयोग करे, उसे मध्यम पुरुष-वाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे – तू, तुम, तेरा, तुम्हारा, आपका आदि।

3. अन्य पुरुष : जो सर्वनाम वक्ता या लेखक द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के लिए उपयोग हो, उसे अन्य पुरुष-वाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे – वह, वे, उसे, उनका आदि।

2. निजवाचक सर्वनाम : जिन शब्दों से निजपन (स्वयं) का ज्ञान होता है, उन्हें निजवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे- स्वयं, खुद, अपना, अपने आप आदि।

3. निश्चयवाचक सर्वनाम : जो सर्वनाम पास या दूर की किसी वस्तु की ओर संकेत करते हैं उन्हें निश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे – यह, वह, ये आदि।

4. अनिश्चयवाचक सर्वनाम : जिन सर्वनाम शब्दों से किसी प्राणी अथवा पदार्थ का निश्चित ज्ञान नहीं होता है उन्हें अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं : जैसे – कई, कुछ, किसी, कोई आदि।

5. संबंधवाचक सर्वनाम : जिन सर्वनाम शब्दों से एक बात का दूसरी बात से संबंध सूचित होता हो, वे संबंधवाचक सर्वनाम कहलाते हैं। जैसे – जो, सो, वह आदि।

6. प्रश्नवाचक सर्वनाम : जिन सर्वनाम शब्दों से प्रश्न का ज्ञान होता हो, उन्हें प्रश्नवाचक सर्वनाम कहा जाता है। जैसे- क्या, कौन, किसे, किसको इत्यादि।

सर्वनाम शब्दों के रूपरचना : परिवर्तन नहीं होता। केवल संबंधकारक में लिंग के कारण मेरा-मेरी, तेरा-तेरी, तुम्हारा-तुम्हारी, उसका-उसकी, उनका-उनकी आदि रूप बनते हैं।

2. वचन तथा कारक के आधार पर सर्वनाम में परिवर्तन होता है। जैसे – मैं, तुम, यह, वह विभक्तिरहित बहुवचनकर्ता के रूप में क्रमशः हम, तुम और वे हो जाते हैं।

3. मैं, तुम, यह, वह के रूपों में कारक की विभक्तियाँ जोड़कर लिखी जाती हैं; जैसे – मैंने, तुमने, इसने, उसने, इसका, उसका इत्यादि। विभक्ति दुहरी होगी तो पहली जोड़ी जायगी, दूसरी नहीं। जैसे – इसके लिए, तुम्हारे द्वारा, मेरे लिए, उसके लिए आदि।

विशेषण

विशेषण की परिभाषा :

संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बतानेवाले शब्दों को विशेषण कहते हैं। जैसे – सुन्दर, छोटा, ईमानदार, लाल आदि।

विशेष्य :

जिन संज्ञा या सर्वनाम शब्दों की विशेषता बताई जाती है, उन्हें विशेष्य कहते हैं। जैसे : वृक्ष पर मीठे फल लगे हैं।

विशेषण के भेद :

विशेषण के मुख्य पाँच भेद हैं :

1. गुणवाचक विशेषण : जिस शब्द से संज्ञा या सर्वनाम के गुण दोष, रंग, आकार, दशा, स्थान, समय, दिशा आदि का ज्ञान हो उसे गुणवाचक विशेषण कहते हैं :

जैसे :

  • आलसी, अच्छा, कंजूस, सफेद
  • अच्छे लड़के पढ़ने में ध्यान देते हैं।
  • सफेद गाय खेत में चर रही है।

2. परिमाणवाचक विशेषण : वे शब्द जो संज्ञा या सर्वनाम की मापतौल संबंधी विशेषता प्रकट करें वे परिमाणवाचक विशेषण कहलाते हैं।

जैसे :

  • थोड़ा, अधिक, सारा, किलो।
  • मैंने ज्यादा खाना खा लिया।

1. निश्चित परिमाणवाचक विशेषण : जिन विशेषणों द्वारा किसी वस्तु के निश्चित परिमाण (माप-तौल) का पता चले वे निश्चित परिमाणवाचक विशेषण होते हैं। जैसे – पाँच लीटर, दो किलो। आज घर में पाँच लीटर दूध आया।

2. अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण : जिन शब्दों से किसी वस्तु के निश्चित परिमाण का ज्ञान न हो, वे अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण हैं। जैसे – कुछ, थोड़ा, ज्यादा, कम आदि। कुछ पैसे दे दो।

3. संख्यावाचक विशेषण : जिन शब्दों से संज्ञा या सर्वनाम की संख्या का ज्ञान हो, उन्हें संख्यावाचक विशेषण कहते हैं।

जैसे -

  • आधा लाख, पाँच हजार।
  • आधी रोटी से पेट नहीं भरता।

संख्यावाचक विशेषण के दो भेद हैं –

निश्चित संख्यावाचक : जिन विशेषणों से निश्चित संख्या का ज्ञान होता है, उन्हें निश्चित संख्यावाचक विशेषण कहते हैं। जैसे :

  • मैंने पाँच केले खाए।

अनिश्चित संख्यावाचक : जिन विशेषणों से किसी निश्चित संख्या का ज्ञान न हो उन्हें अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण कहते हैं। जैसे :

  • अनेक लोग भाषण सुनने गए।

4. सार्वनामिक विशेषण : जो सर्वनाम शब्द विशेषण के रूप में प्रयुक्त हों, उन्हें सार्वनामिक विशेषण कहते हैं। जैसे : उस लड़के को बुलाओ। किसी काम में लग जाओ। विशेषण की अवस्थाएँ : विशेषण की अधिकता या कमी की दृष्टि से तीन अवस्थाएँ होती हैं :

(1) मूलावस्था : जब विशेष्य किसी की विशेषता को सामान्य रूप से ही बताए, किसी अन्य से तुलना न हो उसे मूलावस्था कहते हैं। जैसे :

2. उत्तरावस्था : जिसके द्वारा किसी एक की विशेषता की किसी दूसरे की उसी विशेषता से तुलना की जाए, उसे उत्तरावस्था कहते हैं। जैसे :

  • सुहेल जग्गू से अधिक चतुर है।

3. उत्तमावस्था : जिसके द्वारा व्यक्ति या वस्तु की विशेषता सबसे बढ़-चढ़ कर बताई जाए, उसे उत्तमावस्था कहते हैं। जैसे –

  • श्रेयस सभी विद्यार्थियों में चतुरतम है।

विशेषण की अवस्थाओं के कुछ शब्द रूप इस प्रकार हैं :

मूलावस्था।उत्तरावस्थाउत्तमावस्था
सुन्दरसुन्दरतरसुन्दरतम
उच्चउच्चतरउच्चतम
प्राचीनप्राचीनतरप्राचीनतम
निम्ननिम्नतरनिम्नतम
महानमहानतरमहानतम
योग्ययोग्यतरयोग्यतम

विशेषण बनाना :

हिन्दी में कुछ शब्द मूल रूप से ही विशेषण होते हैं; जैसे – मोटा, पतला, ऊँचा, नीचा, काला, लाल, चालाक, योग्य, अयोग्य, धूर्त, प्रवीण, निपुण आदि। संस्कृत से आये कुछ प्रत्यय युक्त विशेषण शब्द हिन्दी में मूल शब्द की तरह प्रयुक्त होते हैं, जैसे – सहिष्णु, आप्त, गुप्त, दीप्त, तृप्त, ध्यात, मृत, लिप्त, व्यस्त, युक्त, दत्त, कष्ट, नष्ट, भ्रष्ट, शिष्ट, कृष्ण, पूर्ण, रूग्ण, नग्न, भिन्न, यत्न, रुद्ध, लब्ध, बुद्ध, वृद्ध, सूर, पार्थिव, कुटिल, जटिल इत्यादि।

विशेषण बनानेवाले प्रमुख हिन्दी प्रत्यय हैं – इक, इत, इन, ई, ईय, इल, ईन, ईला, निष्ठ, अनीय, मान, मती, मय। इन प्रत्ययों से बने कुछ विशेषण शब्दों की सूची नीचे दी गई है –

प्रत्यय-इक

संज्ञाविशेषणसंज्ञाविशेषणसंज्ञाविशेषण
कर्म-कार्मिक
अलंकार-आलंकारिक
समाज-सामाजिक
संकेत-सांकेतिक
परिवार-पारिवारिक
लोक-लौकिक
संसार-सांसारिक
उद्योग-औद्योगिक
सप्ताह-साप्ताहिक
इतिहास-ऐतिहासिक
अधुना-आधुनिक
विधान-वैधानिक
यंत्र-यांत्रिक
हृदय-हार्दिक
देव-दैविक
व्यवहार-व्यावहारिक
धर्म-धार्मिक
संस्कृति-सांस्कृतिक
साहित्य-साहित्यिक
कल्पना-काल्पनिक
दिन-दैनिक
मास-मासिक
मुख-मौखिक
अध्यात्म-आध्यात्मिक
व्यक्ति-वैयक्तिक
चरित्र-चारित्रिक
योग-यौगिक
देह-दैहिक
वेद-वैदिक
सेना-सैनिक
नीति-नैतिक
संप्रदाय-सांप्रदायिक
भूत-भौतिक
परलोक-पारलौकिक
विज्ञान-वैज्ञानिक
भूगोल-भौगोलिक
प्रयोग-प्रायोगिक
तत्काल-तात्कालिक
बुद्धि-बौद्धिक
इच्छा-ऐच्छिक

'इक' प्रत्यय जुड़ने पर आरंभ के स्वर में अक्सर वृद्धि होती है। यहाँ 'अ' का 'आ', 'इ' का 'ई', 'ए' का 'ऐ', 'उ' का 'ऊ' और 'ओ' का 'औ' बन जाता है।

जब कोई शब्द दो शब्दों से बना होता है, तो दोनों में भी वृद्धि होती है; जैसे – परलोक से पारलौकिक, अधिदेव से आधिदैविक आदि। कुछ जगहों पर वृद्धि नहीं भी होती; जैसे – कम से क्रमिक और श्रम से श्रमिक।

प्रत्यय – इतः

संज्ञाविशेषणसंज्ञाविशेषणसंज्ञाविशेषण
पुलकपुलकितआनंदआनंदितमर्यादामर्यादित
पुष्पपुष्पितफलफलितकंटककंटकित
कलंककलंकिततरंगतरंगितहर्षहर्षित
कुसुमकुसुमितसुरभिसुरभितयोजनायोजित
पल्लवपल्लवितमोहमोहितअपमानअपमानित
विलंबविलंबितसम्मानसम्मानितक्षुधाक्षुधित
अपेक्षाअपेक्षितनिंदानिंदितउपेक्षाउपेक्षित
संकोचसंकुचितद्रवद्रवितअंकअंकित
लक्ष्यलक्षितगर्वगर्वितघृणाघृणित
संचयसंचित

विशेष : इन विशेषणों में कुछ भूतकालिक कृदंत भी हो सकते हैं; जैसे – रक्षित, मुदित, लांछित, स्थापित, सिंचित, शिक्षित, पतित आदि।

प्रत्यय – ई (संज्ञा के अलावा अव्ययों में भी लगकर विशेषण की रचना करता है।)

संज्ञाविशेषणसंज्ञाविशेषणसंज्ञाविशेषण
दुःखदुःखीविजयविजयीसुखसुखी
विनयविनयीप्रेमप्रेमीसंयमसंयमी
भीतरभीतरीदानदानीबाहरबाहरी
धनधनीद्वेषद्वेषीनामनामी
उद्यमउद्यमीयोगयोगीध्यानध्यानी
बलबलीकोधकोधीविरोधविरोधी
जापानजापानीहिंदुस्तानहिन्दुस्तानीअहमदाबादअहमदाबादी
बनारसबनारसीदेहातदेहातीशहरशहरी
पाकिस्तानपाकिस्तानीरूसरूसीचीनचीनी
ज्ञानज्ञानीअनुभवअनुभवीराक्षसराक्षसी
तामस्तामसीराजस्राजसीउपकारउपकारी
अपकारअपकारीमौनमौनीरोगरोगी
ऋणऋणीभोगभोगीयोगयोगी
स्वर्णस्वर्णिमअंतअंतिम

प्रत्यय - इर

मदमदिररुचिरुचिररक्तरक्तिम

प्रत्यय-ईय

भारतभारतीयस्वर्गस्वर्गीयआत्माआत्मीय
नरकनारकीयपर्वतपर्वतीयमानवमानवीय
ईश्वरईश्वरीयप्रांतप्रांतीयचुंबकचुंबकीय
दर्शनदर्शनीयशासकशासकीयविभागविभागीय
शरदशारदीयराष्ट्रराष्ट्रीयविचारविचारणीय

प्रत्यय – ईन

संज्ञाविशेषणसंज्ञाविशेषणसंज्ञाविशेषण
रंगरंगीनकुलकुलीनप्रातःकालप्रातःकालीन
युगयुगीननवनवीनग्रामग्रामीण
शालाशालीनविश्वजनविश्वजनीनसर्वजनसर्वजनीन
सर्वांगसर्वांगीणनमकनमकीनसंगसंगीन

प्रत्यय – आ

ठंडठंडी/ठंडानीलनीलामैलामैला
भूखभूखाप्यासप्यासाझूठझूठा

प्रत्यय - इल (वाला)

फेनफेनिलजटाजटिलरोमरोमिल
उर्मिउर्मिलपंकपंकिलस्वप्नस्वप्निल

प्रत्यय – ईला

हठहठीलाचमकचमकीला
रंगरंगीलारसरसीलानोकनुकीला
जोशजोशीलाविषविषैलानशानशीला

प्रत्यय - इतर

आर्यआर्येतरहिन्दीहिंदीतरइतरइतरेतर
सहजसहजेतरशिक्षाशिक्षेतरपाठ्यपाठ्येतर

प्रत्यय - उक्

इच्छाइच्छुकभावभावुकभिक्षाभिक्षुक
कामकामुक

प्रत्यय-कीय

स्वस्वकीयनाभिनाभिकीयपरपरकीय
राजराजकीयदेवदेवकीय

प्रत्यय - तन

अधुनाअधुनातननवनूतनअद्यअद्यतन
पुरापुरातनप्राक्प्राक्तन

प्रत्यय - तम

अंतरअंतरतमनिकटनिकटतमअधिकअधिकतम
महत्महत्तमन्यूनन्यूनतमश्रेष्ठश्रेष्ठतम
निम्ननिम्नतमनवीननवीनतमलघुलघुतम
आधुनिकआधुनिकतमप्रियप्रियतमसरलसरलतम

प्रत्यय - दायक/दायी

आनंदआनंददायक / आनंददायीफलफलदायी/फलदायक
पीड़ापीड़ादायक/पीड़ादायीवरवरदायक/वरदायी
लाभलाभदायक/लाभदायीभयभयदायक/भयदायी
जीवनजीवनदायक/जीवनदायीशांतिशांतिदायक/शांतिदायी

प्रत्यय - निष्ठ

कर्तव्यकर्तव्यनिष्ठधर्मधर्मनिष्ठ
सत्यसत्यनिष्ठकर्मकर्मनिष्ठ

प्रत्यय - अनीय

सम्मानसम्माननीयपूज्यपूजनीयदयादयनीय
विश्वासविश्वसनीयआदरआदरणीयनिंदानिंदनीय

प्रत्यय-मय

आनंदआनंदमयदुःखदुःखमयगौरवगौरवमय
सुखसुखमयकंटककंटकमयअनअन्नमय
शांतिशांतिमयअनुरागअनुरागमयप्राणप्राणमय

प्रत्यय - मान/मती

बुद्धिबुद्धिमान/बुद्धिमतीशक्तिशक्तिमानश्रीश्रीमान/श्रीमती
धी (बुद्धि)धीमानकीर्तिकीर्तिमान्वृद्धिवृद्धिमान

प्रत्यय - य

मानमान्यमुखमुख्यचिताचित्य
पूजापूज्यसभासेव्यसेवासेव्य
उपासनाउपास्यमृत्यमर्त्यबाहरबाहर
नासिकानासिक्यअंतअन्त्यदंतदंत
कथाकथ्यसंध्यासांध्यजनजन्य
न्यायन्याय्यआदिआद्य

प्रत्यय - र

कुंजकुंजरमुखमुखरमधुमधुर

प्रत्यय - ल

वत्सवत्सलशीतशीतल

प्रत्यय - वादी

भाग्यभाग्यवादीसमाजसमाजवादीबुद्धिबुद्धिवादी
यथार्थयथार्थवादीआशाआशावादीपूँजीपूँजीवादी

प्रत्यय - विद्

कानूनकानूनविद्न्यायन्यायविद्इतिहासइतिहासविद्
ज्योतिषज्योतिषविद्हस्तरेखाहस्तरेखाविद्शास्त्रशास्त्रविद्

प्रत्यय - वान/वती

गुणगुणवान/गुणवतीरूपरूपवान/रूपवती
बलबलवान/बलवतीविद्याविद्यावान/विद्यावती

प्रत्यय - वी

ओजओजस्वीयशस्यशस्वीमनस्मनस्वी
तपसतपस्वीतेजस्तेजस्वीमेदमेदस्वी
ऊर्जाऊर्जस्वीमायामायावीमेधामेधावी

प्रत्यय - शाली

प्रतिभाप्रतिभाशालीगौरवगौरवशालीबलबलशाली
भाग्यभाग्यशालीसम्पत्तिसम्पत्तिशालीप्रभावप्रभावशाली

प्रत्यय - एरा

मामाममेराचाचाचचेराफूफाफुफेरा
मौसामौसेरालूटलुटेराकाँसाकसेरा

प्रत्यय - वाला

दूधदूधवालापैसापैसेवालागाड़ीगाड़ीवाला
चायचायवालारिक्शारिक्शेवालापकौड़ीपकौड़ीवाला
बर्फबर्फवालाठेलाठेलेवालादुकानदुकानवाला

प्रत्यय - आलु/आलू

दयादयालुश्रद्धाश्रद्धालुकृपाकृपालु
ईर्ष्याईर्ष्यालुझगड़ाझगड़ालूढालढालू

क्रिया शब्दों से विशेषण

प्रत्यय - आऊ

कमानाकमाऊउठानाउठाऊउपजानाउपजाऊ
जलानाजलाऊबेचनाबिकाऊभड़कानाभड़काऊ
पंडितानापंडिताऊटिकनाटिकाऊदिखानादिखाऊ

प्रत्यय - आ

धातुविशेषण
कटकटा
छुटछुटा
फटफटा
भीगभीगा

प्रत्यय - आक/आका

तैरनातैराक
चलानाचालक
लड़नालड़ाका
उड़नाउड़ाका

प्रत्यय - एरा

खेलनाखिलाड़ी
बचनाबचिया
बढ़नाबढ़िया

प्रत्यय

लूटनालुटेरा
कमानाकमेरा

कपितय अन्य प्रत्यय :

प्रत्ययधातुविशेषणधातुविशेषण
पालनापालकलिखनालिखित
अकड़भूलनाभुलक्कड़घूमनाघुमक्कड़
ओड़/ओड़ाहसनाहसोड़भागनाभगोड़ा
वालाजानाजानेवालाखानाखानेवाला
पीनापीनेवालाउड़नाउड़नेवाला
हुआडरनाडरा हुआजागनाजागा हुआ
पढ़नापढ़ा हुआजाननाजाना हुआ

सर्वनाम से विशेषण की रचना

प्रत्ययसर्वनामविशेषणसर्वनामविशेषण
रामैंमेरातुमतुम्हारा
हमहमारातूतेरा
कावहउसकावेउनका
यहइसका

रूप बदलकर यह वैसा

कुछ अरबी-फारसी उपसर्गों से विशेषण की रचना :

  • ला – लाइलाज, लापरवाह, लापता, लावारिस
  • बे – बेईमान, बेहोश, बेकसूर, बेकाबू, बेवकूफ, बेकरार, बेचारा
  • कम – कमजोर, कम कीमत (सस्ता), कमबख्त (अथागा)
  • खुश – खुशकिस्मत, खुशदिल, खुशबू, खुशामद (चापलूस)
  • गैर – गैर कानूनी, गैर मामूली (असाधारण), गैर मुनासिब (अनुचित)
  • बद – बदइंतजामी, बदचलन, बदकिस्मत, बदज़बान, बदबू, बदतमीज, बदमिज़ाज, बदसलूकी, बदहाल
  • उर्दू – ना – नाखुश, नापसंद, नाबालिग, नालायक, नामुमकिन, नाकाबिल, नाजायज

प्रत्ययों के अतिरिक्त कई अर्धप्रत्ययों को जोड़कर भी विशेषण बनाए जाते हैं।

उचित प्रत्यय लगाकर विशेषण बनाइए :

अंश, स्थान, चलाना, अनुराग, बाहर, दैव, प्रांत, तैरना, कुसुम, खूब, भूत, केन्द्र, विनय, पल्लव, नीचे, न्याय, राष्ट्र, दुकान, सुरभि, भागना, देह, धूम, तपस्, अपेक्षा, डरना, बुद्धि, फेन, ऐश्वर्य, तरंग, हँसना, पक्ष, रंग, सम्पत्ति, संकोच, पढ़ना, सेना, कुल, विश्वास, पियासा, पालना, तत्त्व, रस, कर्तव्य, अंक, बर्फ, नमक, क्षुधा, मान, आकाश, घृणा, श्री, चितन, द्रव, निन्दा, स्वदेश, पुष्प, जल, शासक, फल, पाप, दिन, वन, मुख, ईश्वर, लालच, गुण, उपयोग, धर्म, नाश, पराक्रम, रक्त, लूट, अनुभव, उपकार, रोग, भाग्य, शांति, अनुकरण, अंत, यत्न, स्थल, संपादक, अग्र, ठंड, दंत, अवकाश, ज्ञान, प्यास, चिंता, प्रातःकाल, ऋण, ईर्ष्या, कथा, चमक, पूत, नाम, श्रद्धा, कर्म, वर्णन, कसूर, कोध, घड़ी, पुण्य, कमाना, पता, धन, भीतर, होश

क्रिया

जिन शब्दों से किसी काम का 'करना' या 'होना' पता चलता है, उन्हें क्रिया कहते हैं। क्रिया तीन प्रकार के शब्दों से बनती है।

  • धातुओं से – जैसे – 'पढ़' से पढ़ाना, 'जा' से जाना, 'हँस' से हँसना, 'पी' से पीना आदि।
  • संज्ञा से – 'हाथ' से हथियाना (हाथ + आ + ना), 'बात' से (बात + आ + ना) बतियाना, लतियाना (लात + आ + ना) आदि।
  • विशेषण से – चिकना से चिकनाना (चिकना + आ + ना), धमकी से धमकाना (धमकी + आ + ना) आदि।

हिंदी की अधिकतर क्रियाएँ धातु से बनती हैं। धातु में 'ना' जोड़ने पर क्रिया का सामान्य रूप मिलता है। क्रिया में से 'ना' हटाने पर जो शब्द बचता है, वह धातु है। धातु का मतलब क्रिया का मूलरूप है।

(A) रचना की दृष्टि से क्रियाएँ तीन प्रकार की होती हैं :

  • मूल (रूढ़),
  • यौगिक और
  • पूर्व कालिक

रूढ़ क्रियाएँ :

वे क्रियाएँ जो धातु से बनती हैं। धातु का मतलब – 'मूल' है। पढ़ना, पढ़ा, पढ़ाई, पढ़ाकू, पढ़ेगा, पढ़ाएगी आदि में मूलधातु 'पढ़' है, जो संस्कृत 'पठ' से बनी है। इसीलिए हिंदी में 'पाठ', 'पाठक', 'पठित' आदि रूप प्रचलित हैं, जिनकी धातु 'पठ' है।

यौगिक क्रियाएँ :

वे क्रियाएँ जो एक से अधिक तत्वों से बनती हैं। जैसे – 'खाना' से खिलाना, 'पढ़ना' से पढ़ाना और पढ़वाना आदि। यौगिक क्रियाओं के चार उपभेद होते हैं –

  • प्रेरणार्थक क्रियाएँ
  • संयुक्त क्रियाएँ
  • अनुकरणात्मक क्रियाएँ और
  • नाम धातु क्रियाएँ।

1. प्रेरणार्थक क्रियाएँ :

जब कर्ता अपना काम खुद न करके किसी दूसरे को वह काम करने के लिए प्रेरणा देता है, उसे प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं। जैसे – व्यापारी क्लर्क से पत्र लिखवाता है। इसमें 'लिखवाता है' यह प्रेरणार्थक क्रिया 'लिखवाना' का एक रूप है।

प्रेरणार्थक रूप लेने पर धातु कभी-कभी बदल जाती है।

उदाहरण:

  • (क) 'कर' धातु का 'करा' – क्रिया रूप 'करना' से 'कराना' (प्रथम प्रेरणार्थक) 'कर' से 'करवा' – क्रियारूप 'करना' से 'करवाना' (द्वितीय प्रेरणार्थक)
  • (ख) धातु के बीच में दीर्घ स्वर हो तो वह ह्रस्व हो जाता है। जैसे – काट से कटा, कटवा – क्रिया रूप 'काटना' से कटाना, कटवाना नाच से नचा, नचवा – क्रिया रूप 'नाचना' से नचाना, नचवाना
  • (ग) 'ए', 'ऐ' का हुस्व रूप 'ई' और 'ओ', 'औ' का 'उ' होता है। बोल से बुला, बुलवा – क्रिया रूप 'बोलना' से 'बुलाना', 'बुलवाना'। बैठ से बिठा, बिठवा – क्रिया रूप 'बैठना' से 'बिठाना', 'बिठवाना'।
  • (घ) जिन धातुओं के अंत में दीर्घ स्वर आता है, उनमें अक्सर 'ल' जुड़ता है। खा से खिला, खिलवा - क्रिया रूप 'खाना' से खिलाना, खिलवाना पी से पिला, पिलवा – क्रिया रूप 'पीना' से पिलाना, पिलवाना

2. संयुक्त क्रियाएँ :

जो दो या दो से अधिक क्रियाएँ मिलकर किसी पूरी क्रिया को बनाती हैं, वे संयुक्त क्रिया कहलाती हैं। जैसे – 'पढ़ना' और 'चुकना' दो क्रियाओं का संयुक्त क्रियापद रूप – 'पढ़ चुका' बनता है। इसी प्रकार 'चुकना' और 'सकना' क्रियापदों का संयुक्त रूप 'चुका सकना' है। संयुक्त क्रिया के चार भाग हैं – मुख्य क्रिया, संयोजी क्रिया, सहायक क्रिया और रंजक क्रिया।

कुछ प्रमुख संयुक्त क्रिया रूप इस प्रकार हैं –

  • 'उठना' के योग से बनी – हैरान हो उठना, परेशा हो उठता आदि
  • 'देना' या 'डालना' के योग से – लिख डालना, कर डालना, पढ़ देना, पढ़ डालना आदि।
  • 'चाहिए' के योग से – बोलना चाहना, देना चाहना, हँसना चाहना आदि।
  • 'खाना-पीना', 'मरना-जीना', 'रोना-धोना' आदि पुनरुक्त। ऐसे अन्य कई रूप भी हैं।

4. नाम धातु क्रियाएँ :

जो धातुएँ 'नाम' (संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण) से बनती हैं, उन्हें नाम धातु कहते हैं और इनका क्रिया रूप नाम धातु क्रिया कहलाता है।

जैसे -

हाथ – हथियाना, बात-बतियाना, अपना से अपनाना, साठ से सठियाना इत्यादि।

(3) पूर्वकालिक क्रिया –

जिस क्रिया का पूरा होना किसी दूसरी क्रिया के पूरा होने से पहले पाया जाता है और जो लिंग, वचन, पुरुष से उपयोग नहीं होती, उसे पूर्वकालिक क्रिया कहते हैं। जैसे – 'मदन पढ़कर सोता है।' यहाँ 'पढ़ने' का काम 'सोने' से पहले हो चुका है; इसलिए 'पढ़कर' पूर्वकालिक क्रिया है।

संयुक्त क्रिया के अवयव –

  • 1. मुख्य क्रिया – कर्ता या कर्म के मुख्य कार्य को मुख्य क्रिया कहते हैं। जैसे – जानने, खाने, पढ़ने आदि में 'जाना', 'खाना' और 'पढ़ना' मुख्य क्रिया हैं।
  • 2. सहायक क्रिया – काल का बोध करानेवाला क्रियापद सहायक क्रिया कहलाता है, जैसे – 'मैं खाना खा चुका हूँ' में 'खा' मुख्य क्रिया है और 'चुका हूँ' सहायक क्रिया।
  • 3. संयोजी क्रिया – जो मुख्य क्रिया के पक्ष, वृत्ति या वाच्य की जानकारी देती है, संयोजी क्रिया कहलाती है, जैसे – 'रमेश पढ़ने लगा है।' इस वाक्य में 'लगा' कार्य के आरंभ की जानकारी दे रहा है; इसलिए यह संयोजी क्रिया है। संयोजी क्रियाएँ कार्य की प्रगति, आरंभ, निरंतरता, इच्छा, विवशता और संदेह आदि को प्रकट करती हैं।
  • 4. रंजक क्रिया – ये क्रियाएँ मुख्य क्रिया के अर्थ (Mood) में और भी सुंदरता लाती हैं, उसमें एक विशेष छवि पैदा करती हैं। जैसे – 'तुम यह काम कर आना।' यहाँ 'आना' क्रिया रंजक क्रिया है। 'आना', 'जाना', 'उठना', 'बैठना', 'लेना', 'देना', 'सकना', 'पड़ना', 'चाहना', 'डालना', 'लगना', 'रहना' आदि रंजक क्रियाएँ हैं।

क्रिया के भेद :

अर्थ के आधार पर क्रिया के दो भेद हैं –

  • 1. सकर्मक (Transitive),
  • 2. अकर्मक (Intransitive)

सकर्मक क्रिया के काम का फल कर्ता को छोड़कर कर्म पर पड़ता है। जैसे –

  • 1. बालक दूध पीता है।
  • 2. नौकर सब्जी लाता है।
  • 3. लड़के क्रिकेट खेल रहे हैं।

ऊपर के वाक्यों में 'क्या' से प्रश्न पूछें – बालक क्या पीता है? तो उत्तर 'दूध' मिलेगा। इसी तरह नौकर क्या लाता है? का उत्तर 'सब्जी' और लड़के क्या खेलते हैं का उत्तर 'क्रिकेट' मिलेगा। क्योंकि इन वाक्यों की क्रियाओं का फल कर्म – 'दूध', 'सब्जी' और 'क्रिकेट' पर पड़ रहा है इसलिए ये क्रियाएँ सकर्मक हैं।

ध्यान रखना चाहिए कि ये क्रियाएँ अकर्मक रूप में भी इस्तेमाल होती हैं। जैसे – 'बालक पीता है। लड़के खेल रहे हैं।' ऐसे वाक्यों में कर्म नहीं दिया गया है। इसलिए यहाँ ये अकर्मक के रूप में हैं। जो क्रिया सकर्मक तथा अकर्मक दोनों रूपों में उपयोग होती है, उन्हें उभयविध या द्विविध क्रियाएँ कहते हैं।

द्विकर्मक क्रियाएँ:

कुछ क्रियाओं के साथ दो कर्मों की आवश्यकता होती है। जैसे – शिक्षक ने विद्यार्थी को हिंदी पढ़ाया। यहाँ हिंदी किसको पढ़ाया तो उत्तर 'विद्यार्थी को', क्या पढ़ाया तो उत्तर 'हिंदी' मिलेगा। इस तरह यहाँ द्विकर्मक क्रिया है। वाक्य में पदार्थवाची कर्म मुख्य कर्म है और प्राणी का बोध करानेवाला कर्म गौण है। गौण कर्म के साथ 'को' का उपयोग होता है।

(2) अकर्मक क्रियाएँ

जिन क्रियाओं में कोई कर्म नहीं होता और उनके व्यापार का फल कर्ता पर ही पड़ता है, वे अकर्मक कहलाती हैं। जैसे – 'विवेक हँसता है।' 'मनन रोता है।' इनमें क्रिया 'हँसना' और 'रोना' का फल क्रमशः विवेक तथा मनन (कर्ताओं) पर पड़ रहा है। इसलिए ये अकर्मक क्रियाएँ हैं।

कई अकर्मक क्रियाएँ ऐसी हैं जिनका स्वर परिवर्तन या कभी-कभी व्यंजन परिवर्तन करने पर सकर्मक रूप मिल जाता है। जैसे –

  • उड़ना – उड़ाना
  • रोना – रुलाना
  • टूटना – तोड़ना
  • हँसना – हँसाना
  • डूबना – डुबोना/डुबाना
  • सूखना – सुखाना

अकर्मक तथा सकर्मक क्रियाओं के भी उपभेद होते हैं।

क्रिया के वाच्य

वाच्य क्रिया के उस बदले हुए रूप को कहा जाता है, जिससे कर्ता, कर्म और भाव के अनुसार क्रिया के परिवर्तन का पता चलता है। जैसे –

  • आयु फुटबाल खेलता है। कर्तृवाच्य
  • फुटबाल खेला जाता है। – कर्मवाच्य
  • रीटा से चला नहीं जाता है। – भाववाच्य

पहले वाक्य में क्रिया कर्ता 'आयु' के अनुसार अन्य पुरुष, एकवचन, पुल्लिंग में है – खेलता है।

दूसरे वाक्य में कर्म – फुटबाल के अनुसार है – खेला जाता है।

तीसरे वाक्य में क्रिया – चला नहीं जाता है, जिससे न चल सकने का भाव प्रकट होता है।

इस तरह वाच्य के तीन प्रकार होते हैं – कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य।

1. कर्तृवाच्य (Active Voice) :

इसमें कर्ता की प्रमुखता होती है और क्रिया का सीधा तथा मुख्य संबंध कर्ता से होता है। जैसे –

सकर्मक –

  • विमल एस.एम.एस. भेजता है।
  • लड़के एस.एम.एस. भेजते हैं।

अकर्मक –

  • विमल हँसता है।
  • लड़के हँसते हैं।

2. कर्म वाच्य (Passive Voice) :

इसमें कर्म कर्ता की स्थिति में होता है, यानी कि कर्म प्रमुख होता है। क्रियापद के लिंग तथा वचन कर्म के अनुसार होते हैं। जैसे –

सकर्मक –

  • पिनरा द्वारा एस.एन.एस. भेजा जाता है।
कर्तृवाच्यकर्मवाच्य
3. उषा ने सफाई की।उषा द्वारा सफाई की गई।
4. नानी ने गुड़िया को कहानी सुनाई।नानी द्वारा बच्चों को कहानी सुनाई गई।
5. धोबी ने कपड़े धोए।धोबी से कपड़े धोए गए। या धोबी द्वारा कपड़े धोए गए।

हिंदी में कर्तृवाच्य को कर्मवाच्य में बदलने की अंग्रेजी व्याकरण जैसी कोई प्रक्रिया नहीं होती है। हिंदी में कुछ वाच्य केवल कर्तृरूप में ही चलते हैं और कुछ कर्मवाच्य में ही। हिंदी में 'रावण राम द्वारा मारा गया' जैसा वाक्य गढ़ा तो जा सकता है, पर चलता नहीं है। हिंदी की प्रकृति के अनुसार 'राम ने रावण को मारा' ही उचित है। हिंदी में कर्मवाच्य का प्रयोग कुछ विशेष स्थितियों में ही होता है।

जैसे -
(1) जब कर्ता अज्ञात हो या ज्ञात कर्ता का उल्लेख करने की जरूरत न हो; जैसे – कल परीक्षाफल घोषित किया जाएगा।
(2) कानूनी तथा सरकारी व्यवहार में - इस पत्र द्वारा आपको सूचित किया जाता है कि -
(3) अकाल पड़ने पर तत्काल सहायता पहुँचाई जाएगी
(4) संभावना दर्शाने हेतु - उत्पादन घटने पर प्याज का आयात किया जाएगा।
(5) अशक्यता के संदर्भ में -
(1) मुझसे चला नहीं जाता ।
(2) यह किताब मुझसे पढ़ी नहीं जाती ।
(3) वह तेज गेंदबाजी नहीं खेल पाता ।
(6) कर्त्ता पर बल देने के लिए-
(1) रोहित द्वारा शतक बनाया गया ।
(2) रावण राम के हाथों मारा गया।

सारांश रूप उदाहरण –

कर्तृवाच्यकर्मवाच्यभाववाच्य
(1) राघव कविता रचता है।राघव द्वारा कविता रची जाती है।-
(2) राम ने रावण को मारा।राम द्वारा रावण को मारा गया।-
(3) राधिका पढ़ न सकी।-राधिका से पढ़ा न जा सका।
(4) वह आ नहीं सकेगा।-उससे आया नहीं जा सकेगा।
(5) बच्चे खेलेंगे।बच्चों द्वारा खेला जाएगा।

कर्तृवाच्य का भाववाच्य में परिवर्तन :

  1. कर्ता के आगे 'से' अथवा 'के द्वारा' लगा दें।
  2. मुख्य क्रिया को सामान्य भूतकाल एकवचन में बदलकर उसके साथ 'जाना' क्रिया की धातु के एकवचन, पुलिंग, अन्य पुरुष का वही काल लगा दें जो कर्तृवाच्य की क्रिया का है।
कर्तृवाच्यभाववाच्य
(1) मैं यह पुस्तक नहीं पढ़ सकूँगा।मुझसे यह पुस्तक नहीं पढ़ी जा सकेगी।
(2) गर्मियों में खूब नहाते हैं।गर्मियों में खूब नहाया जाता है।

अविकारी शब्द (अव्यय तथा निपात)

शब्द के दो प्रकार होते हैं –

  1. विकारी और
  2. अविकारी।

जिन शब्दों के रूप में लिंग, वचन या कारक आदि के कारण कोई विकार या परिवर्तन न हो, उन्हें अविकारी या अव्यय कहा जाता है। जैसे –

  • यदि वह पढ़ेगा तो उत्तीर्ण हो जाएगा।
  • आप कहाँ जा रहे हो?
  • राम और लक्ष्मण सहोदर भाई नहीं थे।
  • अभी, मैं तो नहीं आ सकता।

यहाँ पर यदि, तो, कहाँ, और, अभी, तो तथा धीरे-धीरे अव्यय हैं। अव्यय कुछ शब्दों से जुड़ने पर उन्हें भी अव्यय बना सकते हैं, जैसे – प्रतिदिन, भरपेट, यथासंभव इत्यादि।

अव्यय के भेद : अव्यय के चार भेद माने गए हैं –

  1. क्रिया-विशेषण (Adverb)
  2. संबंधबोधक (Post Position)
  3. समुच्चयबोधक (Conjunction)
  4. विस्मयादिबोधक (Interjection)

इनके अलावा एक अविकारी शब्द 'निपात' भी है जो अव्यय जैसा होता है। प्राचीन विवेचन में 'नाम', 'आख्यात', 'अव्यय' तथा 'निपात' का उल्लेख मिलता है। नाम से तात्पर्य – 'संज्ञा, सर्वनाम तथा विशेषण', आख्यात् का तात्पर्य 'क्रिया' से है। अव्यय तथा निपात दोनों अविकारी शब्द हैं।

(1) क्रिया-विशेषण :

क्रिया की विशेषता बतानेवाले अव्ययों को क्रिया-विशेषण कहते हैं। अर्थ के आधार पर क्रिया-विशेषण के मुख्य चार भेद हैं –

  • (क) कालवाचक क्रिया-विशेषण
  • (ख) स्थानवाचक क्रिया-विशेषण
  • (ग) रीतिवाचक क्रिया-विशेषण
  • (घ) परिमाणवाचक क्रिया-विशेषण

(क) कालवाचक क्रिया-विशेषण के उदाहरण :

उदाहरण :

  • तुरंत, अभी, अब, कल, आज, प्रातः आदि – समयबोधक (कालवाचक)
  • दिनभर, आजकल, सदैव, हमेशा, लगातार, निरंतर आदि – अवधिबोधक
  • प्रतिदिन, बारंबार, कईबार, हरबार आदि – बारंबारताबोधक

(ख) स्थानबोधक क्रिया-विशेषण के उदाहरण :

  • बाहर-भीतर, आमने-सामने, आस-पास, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे आदि – स्थितिबोधक
  • ओर, ऊपर की ओर, बाई ओर, दाई ओर, चारों ओर आदि – दिशाबोधक
  • धीरे-धीरे, ध्यान से, झट-पट, भली-भाँति इत्यादि।

(घ) परिमाणवाचक क्रिया-विशेषण के उदाहरण –

  • इतना, उतना, कम, अधिक, इत्यादि – तुलनाबोधक
  • थोड़ा, कुछ, लगभग इत्यादि – न्यूनताबोधक
  • बहुत, बड़ा, भारी इत्यादि – अधिकताबोधक
  • ठीक, काफी, केवल इत्यादि – पर्याप्तताबोधक
  • क्रमशः, थोड़ा-थोड़ा इत्यादि – श्रेणीबोधक

विशेष : यद्यपि क्रिया-विशेषण अविकारी शब्द हैं किन्तु कुछ क्रिया-विशेषणों में विशेषणों की भाँति विकार (परिवर्तन) भी होता है; जैसे – अच्छा लिखा निबंध, अच्छी लिखी चिट्ठी, ताजमहल कैसा लगता है; चाँदनी कैसी चमक रही है।

(2) संबंधबोधक क्रिया-विशेषण (Post Position):

वे अव्यय जो संज्ञा या सर्वनाम से जुड़कर उनका संबंध वाक्य के दूसरे शब्दों से बताते हैं, उन्हें संबंधबाधक क्रिया-विशेषण कहते हैं।

(क) प्रयोग के आधार पर संबंधबोधक अव्यय के दो भेद हैं –

  • संबंद्ध संबंधबोधक; जैसे – धर्म के बिना, विद्यार्थी के साथ इत्यादि।
  • असंबंद्ध संबंधबोधक; जैसे – सहित, तक आदि।

(ख) व्युत्पत्ति के आधार पर संबंधबोधक अव्यय के दो भेद हैं –

  • मूल संबंद्धबोधक – पर्यन्त, समान, बिना आदि।
  • यौगिक संबंधबोधक – द्वारा, योग्य, बाहर।

(ग) अर्थबोध के आधार पर – डॉ. हरदेव बाहरी ने संबंधबोधक अव्यय के चौदह भेद माने हैं

  • कालवाचक – पहले, बाद, आगे, पश्चात्, अब तक इत्यादि।
  • स्थानवाचक – निकट, समीप, सामने, बाहर इत्यादि।
  • दिशावाचक – दायाँ-बायाँ, तरफ, ओर आदि
  • साधनवाचक – द्वारा, जरिए, सहारे, मार्फत आदि।
  • उद्देश्यवाचक – हेतु, निमित्त आदि।
  • विरोधवाचक – उलटे, विरुद्ध, खिलाफ, अपेक्षा, अतिरिक्त, सिवा आदि।
  • विनिमयवाचक- बदले, एवज, स्थान पर, जगह पर आदि।
  • साहचर्यवाचक – संग, साथ, सहित, समेत आदि।
  • सादृश्यवाचक – समान, तुल्य, बराबर आदि।
  • विरोधवाचक – विरोध, विरुद्ध, विपरीत, विलोम आदि।
  • विषयवाचक – संबंध, आश्रय, भरोसे।
  • संग्रहवाचक – भर, मात्र, अंतर्गत आदि।
  • तुलनावाचक – अपेक्षा, समक्ष, समान आदि।
  • कारणवाचक – कारण, परेशानी से, मारे आदि

संबंधबोधक और क्रिया-विशेषण में अंतर – यदि अव्यय शब्द क्रिया की विशेषता बताने के साथ अन्य किसी संज्ञा या सर्वनाम से संबंधित हो तो 'संबंधवाचक' कहलाता है, अन्यथा क्रिया-विशेषण। जैसे -

  • लड़का चारपाई पर बैठा है।
  • लड़का छत के ऊपर बैठा है।
  • संबंधबोधक अव्यय
  • क्रिया-विशेषण अव्यय

(3) समुच्चयबोधक या योजक अव्यय (Conjunction) :

जो अव्यय दो पदों, दो उपवाक्यों या दो वाक्यों को एकदूसरे से जोड़ते हैं, उन्हें समुच्चयबोधक अव्यय कहते हैं। जैसे – और, ताकि, किन्तु इत्यादि।

समुच्चयबोधक अव्यय के प्रमुख दो भेद हैं – समानाधिकरण समुच्चयबोधक और व्याधिकरण समुच्चयबोधक।

(क) समानाधिकरण समुच्चयबोधक – दो समान पदों, उपवाक्यों या वाक्यों को जोड़नेवाले अव्यय समानाधिकरण समुच्चयबोधक अव्यय कहलाते हैं। इसके चार उपभेद माने जाते हैं –

  • संयोजक – और, तथा, एवं
  • विभाजक – या, अथवा, कि, नहीं तो
  • विरोधवाचक – परंतु, किंतु, लेकिन, वरन
  • परिमाणबोधक – अतः, इसलिए, अतएव, एतदर्थ

(ख) व्याधिकरण समुच्चयबोधक अव्यय – जो अव्यय शब्द मुख्य वाक्य से एक या अनेक आश्रित वाक्यों को जोड़ते हैं, उन्हें व्याधिकरण समुच्चय बोधक अव्यय कहते हैं। जैसे – क्योंकि और किंतु आदि। व्याधिकरण समुच्चयबोधक अव्यय के चार उपभेद हैं –

  • उद्दश्यवाचक – जा, ।क, ताकि
  • कारणवाचक – क्योंकि, इसलिए, जो कि
  • संकेतवाचक – चाहे, तो, किंतु, परंतु
  • संकेतवाचक – अर्थात्, मानो, यानि कि

(4) विस्मयादिबोधक अव्यय (Interjection):

हर्ष, शोक, विस्मय आदि मनोभावों के प्रकट करनेवाले अव्यय 'विस्मयादि बोधक' अव्यय कहलाते हैं। जैसे – ओह !, वाह!, हाय !, अरे !, इत्यादि। ये अव्यय निम्नलिखित कार्य करते हैं –

  • हर्ष सूचित करना – अहा !, वाह-वाह !, शाबाश ! इत्यादि
  • शोक सूचित करना – ओह !, आह !, हाय ! आदि।
  • स्वीकार एवं संबोधन सूचित करना – अच्छा !, हाँ, जी, हाँ, ठीक ! आदि
  • तिरस्कार एवं घृणा सूचित करना – छि !, धिक !, दुर् आदि।

विद्वानों ने अर्थ के विचार से इसके सात से लेकर चौदह उपभेद माने हैं। आठ मुख्य उपभेद इस प्रकार हैं

  • हर्षबोधक – वाह!, अच्छा !, शाबाश!
  • विस्मय (आश्चर्य) बोधक – अरे !, क्या !, क्यों !, ऐं!
  • शोकबोधक – हाय !, ओह !, आह !
  • तिरस्कारबोधक – हट-हट ! भाग-भाग ! दूर-दूर !
  • भावबोधक – (प्रशंसा, आदर, अनादर) साधु-साधु !, अजी! अबे
  • स्वीकार या अनुमोदनबोधक – हाँ !, जी हाँ !, जी!
  • संबोधनबोधक – अरे !, हे !, ओ!
  • घृणाबोधक – छिः छिः, राम-राम !

कभी-कभी संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया या वाक्यांश भी विस्मयादिबोधक का कार्य करते हैं। जैसे –

  • संज्ञा – बाप रे ! अरे माई रे !, राम-राम !
  • सर्वनाम – कौन !, क्या !, आप !
  • विशेषण – सुंदर !, बहुत सुंदर !, अच्छे !
  • क्रिया – चुप!, आ गए !, भाग !
  • वाक्यांश – क्या हुआ !, मारे गए !

निपात

'निपात' उन अविकारी शब्दों को कहते हैं जो संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण व क्रिया विशेषण के साथ प्रयुक्त होकर उस पर बल देने, उसे सीमित करने या दूसरों के साथ मिलाने का काम करते हैं। जैसे – नहीं, मत, न, जी, हाँ, सिर्फ, मात्र, केवल, भी, ही, भर, तक, तो इत्यादि।

निपात के संबंध में विशेष बातें –

  • निपात का अपना वस्तुपरक अर्थ नहीं होता। (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया आदि की भाँति निपात का अपना अर्थ नहीं होता।)
  • निपात वाक्यांश या वाक्य को विशेष अर्थ प्रदान करते हैं।
  • सहायक शब्द के रूप में प्रयोग होने के बावजूद इन्हें वाक्य का अंग नहीं माना जाता है।
  • वाक्य में आने पर ये उसके संपूर्ण अर्थ का प्रभावित करते हैं।

निपात और अव्यय – निपात नए भाव प्रकट करने के लिए प्रयुक्त होते हैं। निपात में लिंग, वचन, कारक आदि की दृष्टि से रूप-भेद नहीं होते हैं, इसलिए इसे अव्यय के अंतर्गत रखा जाता है। किंतु 'अव्यय' और 'निपात' में थोड़ा अंतर है। निपात के प्रयोग से वाक्य के अर्थ की एक नई अवधारणा बनती है। निपात का प्रयोग वाक्य में अर्थ के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थान पर हो सकता है। कुछ उदाहरण –

ही : रमण अपने स्कूल ही गया है।
रमण ही अपने स्कूल गया है।
रमण अपने ही स्कूल गया है।

भी : बच्चे फुटबॉल भी खेलते हैं।
बच्चे भी फुटबॉल खेलते हैं।
बच्चे फुटबॉल खेलते भी हैं।

तक : पवन ने खाया तक नहीं।
पवन तक ने नहीं खाया।
मेरी आवाज तक नहीं सुन रहे हो।
उसने पत्र का उत्तर तक नहीं दिया।
उसने पत्र तक का उत्तर नहीं दिया।

भर : जी भर बातें करेंगे। तुम पेटभर खा लो।
तुमने तो मिठाई छुआ भर है।

तो : तो आप आ गए।
आप तो आ गए।
आप तो आ ही गए।

मात्र/सिर्फ/केवल : मुझे मात्र पाँच मिनट दीजिए।
मुझे पाँच मिनट मात्र चाहिए।
वह केवल बातें करता है।

Free study material for Hindi

GSEB Solutions Class 10 Hindi पद विचार (1st Language)

Students can now access the GSEB Solutions for पद विचार (1st Language) prepared by teachers on our website. These solutions cover all questions in exercise in your Class 10 Hindi textbook. Each answer is updated based on the current academic session as per the latest GSEB syllabus.

Detailed Explanations for पद विचार (1st Language)

Our expert teachers have provided step-by-step explanations for all the difficult questions in the Class 10 Hindi chapter. Along with the final answers, we have also explained the concept behind it to help you build stronger understanding of each topic. This will be really helpful for Class 10 students who want to understand both theoretical and practical questions. By studying these GSEB Questions and Answers your basic concepts will improve a lot.

Benefits of using Hindi Class 10 Solved Papers

Using our Hindi solutions regularly students will be able to improve their logical thinking and problem-solving speed. These Class 10 solutions are a guide for self-study and homework assistance. Along with the chapter-wise solutions, you should also refer to our Revision Notes and Sample Papers for पद विचार (1st Language) to get a complete preparation experience.

FAQs

Where can I find the latest GSEB Class 10 Hindi Vyakaran पद विचार (1st Language) Solutions for the 2026-27 session?

The complete and updated GSEB Class 10 Hindi Vyakaran पद विचार (1st Language) Solutions is available for free on StudiesToday.com. These solutions for Class 10 Hindi are as per latest GSEB curriculum.

Are the Hindi GSEB solutions for Class 10 updated for the new 50% competency-based exam pattern?

Yes, our experts have revised the GSEB Class 10 Hindi Vyakaran पद विचार (1st Language) Solutions as per 2026 exam pattern. All textbook exercises have been solved and have added explanation about how the Hindi concepts are applied in case-study and assertion-reasoning questions.

How do these Class 10 GSEB solutions help in scoring 90% plus marks?

Toppers recommend using GSEB language because GSEB marking schemes are strictly based on textbook definitions. Our GSEB Class 10 Hindi Vyakaran पद विचार (1st Language) Solutions will help students to get full marks in the theory paper.

Do you offer GSEB Class 10 Hindi Vyakaran पद विचार (1st Language) Solutions in multiple languages like Hindi and English?

Yes, we provide bilingual support for Class 10 Hindi. You can access GSEB Class 10 Hindi Vyakaran पद विचार (1st Language) Solutions in both English and Hindi medium.

Is it possible to download the Hindi GSEB solutions for Class 10 as a PDF?

Yes, you can download the entire GSEB Class 10 Hindi Vyakaran पद विचार (1st Language) Solutions in printable PDF format for offline study on any device.