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Detailed अलंकार (1st Language) GSEB Solutions for Class 10 Hindi
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Class 10 Hindi अलंकार (1st Language) GSEB Solutions PDF
अलंकार का आम मतलब है – गहना या सजावट। जिस तरह एक महिला की खूबसूरती गहनों से बढ़ती है, ठीक वैसे ही कविता के शब्दों और अर्थों की शोभा उनके अलंकारों से बढ़ती है।
कविता के शब्दों और उनके अर्थों को सुंदर बनाने वाले गुणों को अलंकार कहते हैं। अलंकार के दो मुख्य प्रकार होते हैं –
1. शब्दालंकार
2. अर्थालंकार
1. शब्दालंकार :
जब कविता में शब्दों की वजह से कोई ख़ास प्रभाव या सुंदरता पैदा हो, और अगर उन शब्दों को उनकी जगह से हटा दिया जाए तो वह सुंदरता खत्म हो जाए, तो उसे शब्दालंकार कहते हैं। शब्दालंकार के कई भेद हैं; जैसे – अनुप्रास, यमक, श्लेष आदि।
1. अनुप्रास : अक्षरों के दोहराव को अनुप्रास अलंकार कहते हैं। दोहराव का मतलब है एक ही अक्षर का बार-बार आना। 'कठिन कलाह आई है करत करत अभ्यास' में 'क' अक्षर कई बार आया है, इसलिए यह अनुप्रास अलंकार है।
2. यमक अलंकार : जब कविता में कोई एक शब्द एक से ज़्यादा बार आता है, लेकिन हर बार उसका मतलब अलग होता है, तो वहाँ यमक अलंकार होता है। उदाहरण के लिए -
कनक-कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।
या पाये बौराय जग, बा खाये बौराय॥
यहाँ 'कनक' शब्द दो बार आया है। पहले 'कनक' का मतलब सोना है, और दूसरे 'कनक' का मतलब धतूरा है।
(3) श्लेष अलंकार : श्लेष का मतलब है – जुड़ा हुआ। जहाँ एक शब्द के एक से ज़्यादा मतलब निकलते हैं, वहाँ श्लेष अलंकार होता है। जैसे -
चिरजीवौ जोरी जूरै, क्यों न सनेह गंभीर।
को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के वीर।।
यहाँ 'वृषभानुजा' और 'हलधर' शब्दों के कई मतलब हैं, जैसे 'वृषभानु + जा' का मतलब वृषभानु की बेटी राधा, और बैल की बहन गाय। 'हलधर के वीर' का मतलब बलराम के भाई कृष्ण, और बैल के भाई भी।
(4) वक्रोक्ति अलंकार : वक्र + उक्ति का मतलब है टेढ़ा बयान। जहाँ बोलने वाले की बात का कोई अलग अर्थ लिया जाए, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण :
भूषन भारि सँभारि है, क्यों इहिं तन सुकुमार।
सूधे पाइ न धर परै, सोभा ही कै भार॥
अगर सुंदरता के बोझ से पैर सीधे नहीं टिक पा रहे हों, तो गहनों का वज़न कैसे संभाला जाएगा। (यह एक प्रकार की वक्रोक्ति है)
2. अर्थालंकार :
जहाँ अर्थ की वजह से कविता में अद्भुत प्रभाव पैदा होता है, वहाँ अर्थालंकार होता है। अर्थालंकार के कुछ खास प्रकार इस तरह हैं –
(1) उपमा अलंकार : उपमा का अर्थ है – बराबरी करना। जहाँ एक जैसी ख़ूबियों, विशेषताओं या प्रभाव के कारण उपमेय की उपमान से, या मौजूद चीज़ की ग़ैर-मौजूद चीज़ से तुलना की जाती है, वहाँ उपमा अलंकार होता है। उपमा अलंकार के चार मुख्य भाग हैं – उपमेय, उपमान, साधारण धर्म और वाचक शब्द।
उपमेय : वह चीज़ जिसकी उपमा या तुलना की जानी हो, उसे उपमेय कहते हैं। कवि के लिए उपमेय का वर्णन पहले बताया जाता है। इसलिए इसे 'प्रस्तुत' भी कहते हैं। जैसे – 'पीपर पान सरिस मन डोला।' इस पंक्ति में 'मन' उपमेय है।
उपमान : जिस चीज़ से उपमेय की बराबरी की जाती है, उसे उपमान कहते हैं। कवि के लिए उपमान का इस्तेमाल उपमेय के बाद होता है, इसलिए इसे 'अप्रस्तुत' भी कहते हैं। ऊपर दिए उदाहरण में 'पीपर पान' उपमान है, क्योंकि मन (उपमेय) की तुलना उससे हुई है।
साधारण धर्म : उपमेय और उपमान में मौजूद समान गुण या विशेषता को 'साधारण धर्म' कहते हैं। यहाँ डोलना (चंचलता) सामान्य विशेषता है।
वाचक शब्द : वह ख़ास शब्द जिससे उपमेय और उपमान में मौजूद समान गुणों को दिखाया जाता है, उसे वाचक शब्द कहते हैं। यहाँ 'सरिस' (जैसा) एक वाचक शब्द है। मुख्य वाचक शब्द हैं: तुल्य, सम, सा, से, सी, जैसा, ज्यों। जब उपमा में ये सभी चारों भाग होते हैं, तब उसे 'पूर्णोपमा अलंकार' कहते हैं, और जब उनमें से एक या ज़्यादा भाग गायब होते हैं, तब उसे 'लुप्तोपमा अलंकार' कहा जाता है। पुराने और आज के सभी कवियों को यह अलंकार बहुत पसंद है। जैसे, 'पानी केरा बुदबुदा अस मानस की जात।' इसमें साधारण गुण (नश्वरता) की कमी होने से यह लुप्तोपमा है।
(2) रूपक अलंकार : रूपक का मतलब है – किसी पर कोई चीज़ थोपना। जहाँ उपमेय और उपमान अलग होते हुए भी, समान गुणों की वजह से उनके बीच कोई फ़र्क न किया जाए, यानी जहाँ उपमेय पर उपमान का आरोप बिना किसी भेदभाव के किया जाए, वहाँ 'रूपक' अलंकार होता है। उदाहरण के लिए : मैया मैं तो चन्द्र खिलौना लैहों। (यहाँ चंद्रमा को ही खिलौना बताया गया है)
(3) उत्प्रेक्षा अलंकार : जहाँ एक जैसी ख़ूबियों की वजह से उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाती है, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। 'मनु', 'मानहु', 'मानो', 'जनु', 'जानहु', 'जानो', 'जैसे' आदि इस अलंकार के पहचान शब्द हैं।
उदाहरण :
उदित कुमुदिनीनाथ हुए प्राची में ऐसे।
सुधा कलश रत्नाकर से उठता हो जैसे ॥
यहाँ 'कुमुदिनीनाथ' (चंद्रमा) की 'सुधा-कलश' (अमृत-घड़ा) से कल्पना की गई है, जो कि अप्रस्तुत है।
(4) विभावना अलंकार : जहाँ कोई कारण न होने पर भी काम होता हुआ दिखाया जाता है, वहाँ विभावना अलंकार होता है।
उदाहरण :
निन्दक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबण बिना, निर्मल करे सुभाय।।
इस जगह पानी और साबुन के इस्तेमाल के बिना ही काम पूरा हो रहा है।
(5) असंगति अलंकार : जहाँ कारण और काम में कोई तालमेल न हो, वहाँ असंगति अलंकार होता है।
उदाहरण :
हृदय घाव मेरे वीर रघुवीरै।
(6) अतिशयोक्ति : जहाँ किसी बात को बहुत ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर बोला जाए, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण :
हनुमान की पूछ में, लगन न पाई आग।
लंका सिगरी जल गई, गए निशाचर भाग॥
यहाँ हनुमान की पूंछ में आग लगने से पहले ही पूरी लंका का जलना बताया गया है, इस वजह से यह अतिशयोक्ति अलंकार है।
(7) अन्योक्ति : जब कविता में किसी ग़ैर-मौजूद (दूसरे) के बहाने किसी और को कुछ कहा जाए, जिससे ख़ास प्रभाव या सुंदरता पैदा हो, वहाँ 'अन्योक्ति' अलंकार होता है; उदाहरण के लिए-
माली आवत देखकर, कलयिन करी पुकारि।।
फूली-फूली चुन लिए, काल्हि हमारी बारि॥
इस जगह माली, कलियों और फूलों के माध्यम से समय, नौजवानों और बूढ़े लोगों के बारे में बात की गई है।
(8) मानवीकरण : जब कुदरत की चीज़ों पर इंसानों की हरकतें या भावनाएं थोपी जाती हैं, तब वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है; उदाहरण के लिए –
सिंधु सेज पर धरा वधू अब, तनिक सकुचती बैठी-सी।
प्रलय निशा की हलचल स्मृति में, मान किए-सी ऐंठी-सी॥
भयानक प्रलय के बाद ज़मीन का समुद्र की सतह से ऊपर आना, एक रूठी हुई दुल्हन की तरह दिखाया गया है जो पलंग पर बैठी हो। भारतीय काव्य-शास्त्र में इसे रूपक अलंकार के भीतर रखा गया था। यह अंग्रेजी के 'पर्सोनिफिकेशन' अलंकार का हिंदी नाम है।
खास बात : गुजरात राज्य के हाईस्कूल के सिलेबस में इतने अलंकार तय किए गए हैं। इनके अलावा कुछ और ज़रूरी अलंकार नीचे दिए गए हैं।
(9) उल्लेख अलंकार : जब किसी एक इंसान या चीज़ का कई तरह से वर्णन किया जाता है, तो उसे उल्लेख अलंकार कहते हैं।
उदाहरण :
तू रूप है पवन में, सौंदर्य है सुमन में।
तू प्राण है पवन में, विस्तार है गगन में।।
(10) दृष्टांत अलंकार : जहाँ मिसाल देकर किसी बताई हुई बात को पक्का किया जाता है, वहाँ दृष्टांत अलंकार होता है।
उदाहरण :
जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥
(11) भ्रांतिमान अलंकार : जहाँ समानता की वजह से किसी चीज़ को कुछ और समझकर उसका अद्भुत ढंग से वर्णन किया जाता है, वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होता है।
उदाहरण :
नाक का मोती अधर की कांति से,
बीज दाडिम का समझकर भ्रांति से,
देखकर उनको हुआ शुक मौन है,
सोचता है – अन्य शुक यह कौन है ?
(12) संदेह अलंकार : जब मौजूद चीज़ में किसी दूसरी (अज्ञात) चीज़ का इशारा मिले, तो उसे संदेह अलंकार कहते हैं।
उदाहरण :
सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है।
नारी ही की सारी है या सारी ही की नारी है।
(13) विरोधाभास अलंकार : जहाँ असल में विरोध न होते हुए भी विरोध जैसा लगे, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है।
उदाहरण :
या अनुरानी चित्त की गति समुझे नहिं कोय।
ज्यों-ज्यों बड़े श्यामरंग त्यों-त्यों उज्जव होय।
अलंकारों के कुछ प्रचलित उदाहरण है
(1) अनुप्रास अलंकार :
1. तहनि तनूजा तरु तमाल तरुवर बहु छाए ('त' की आवृत्ति)
2. चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रही है जल-थल में (च, ल की आवृत्ति)
(2) यमक अलंकार :
1. माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर। (यहाँ 'मनका' का मतलब माला के दाने, और मन का मतलब दिल का है)
2. जे तीन बेर खाती थीं वे तीन बेर खाती हैं। (यहाँ 'तीन बेर' का मतलब तीन बार, और 'तीन बेर' का मतलब बेर के तीन दाने हैं)
(3) श्लेष अलंकार :
1. चरन धरत चिंता करत फिर चितवत चहुँ ओर। सुबरन को ढूँढ़त फिरत, कवि व्याभिचारी, चोर।
सुबरन के तीन अर्थ है-
- कवि के लिए सुनहरे शब्द (सोना)
- व्यभिचारी के लिए – सुंदर काया या रंग-रूप (सोना)
- चोर के लिए – धन या सोना (सोना)
(2) रहिम पानी राखिए, बिनु पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुस, चून।। (पानी का मतलब मोती के लिए चमक है, इंसान के लिए इज़्ज़त है, और चूने के लिए पानी ही है)
(4) वक्रोक्ति अलंकार :
1. को तुम? हैं घनश्याम हम, तो बरसो कित जाय। (कृष्ण ने राधा को दरवाज़ा खोलने को कहा। राधा ने पूछा – 'आप कौन हैं?' कृष्ण ने जवाब दिया – 'मैं घनश्याम हूँ।' (घनश्याम का मतलब कृष्ण) राधा ने 'घनश्याम' का अर्थ काले बादल लिया और कहा – 'तो फिर कहीं जाकर बारिश करो।')
2. मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हिं उचित तप, मो कहँ भोगू ॥ (भगवान राम ने सीताजी को जंगल जाने से रोकने के लिए कहा कि आपका शरीर बहुत नाज़ुक है। आपको जंगल में जाना ठीक नहीं है। तब सीताजी कहती हैं – 'हाँ! मैं भी कोमल हूँ, लेकिन आप जंगल जाने लायक हैं!' मतलब आप भी तो कोमल हैं, तो आप जंगल क्यों जाएँगे?)
(5) उपमा अलंकार :
- पीपर पात सरिस मन डोला (पीपल का पत्ता – उपमान, मन – उपमेय, सरिस (जैसा) – वाचक शब्द, और डोलना (हिलना) – साधारण गुण है)
- हरिपद कोमल कमल से (भगवान के पैर – उपमेय, कोमल – सामान्य विशेषता, से – तुलना वाला शब्द, कमल – उपमान)
(6) रूपक अलंकार :
- मैया मैं तो चन्द्र-खिलौना लैहों। (चंद्रमा को खिलौना बताया गया है)
- चरण-कमल बंदौं हरि राई। (यहाँ चरणों को कमल जैसा बताया गया है)
(7) उत्प्रेक्षा अलंकार :
1. सोहत ओढ़ें पीतपट, स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि शैल पर, आतप पर्यो प्रभात ॥ (श्रीकृष्ण का सांवला शरीर – नीलमणि पर्वत जैसा, पीताम्बर – सुबह की धूप जैसा सोचा गया है)
- भगवान का मुख मानो मीठा चंद्रमा हो।
(8) अतिशयोक्ति अलंकार :
1. देख लो साकेत नगरी है यही, स्वर्ग से मिलने गगन में जा रही। (यहाँ साकेत शहर की ऊँचाई को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है)
2. भूप सहस दस एक हि बारा, लगे उठावन टरत न टारा। (यहाँ राजाओं की गिनती को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है)
(9) अन्योक्ति अलंकार :
1. जिन दिनों में फूल देखे थे, वह मौसम चला गया। अब भँवरा केवल गुलाब की काँटेदार डाल पर है।
2. स्वारथ सुकृत न श्रम वृपा, देख विहंग विचारि। बाज पराए पानि पर, तू पंछी जिन मारि।।
(10) मानवीकरण अलंकार :
- आसमान रूपी पनघट में उषा रूपी चतुर स्त्री तारों के घड़ों को डुबो रही है।
- बादलों से भरे आकाश से शाम की सुंदर परी धीरे-धीरे उतर रही है।
स्वयं करे
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों में कौन-से अलंकार हैं, दिए गए विकल्पों में से चुनकर उसका नाम लिखिए।
Question 1. संसार की समरस्थली में धीरता धारण करो।
(क) उपमा
(ख) रूपक
(ग) अनुप्रास
(घ) मानवीकरण
Answer: (ग) अनुप्रास
In simple words: यह पंक्ति 'अनुप्रास अलंकार' दिखाती है क्योंकि इसमें 'स' ध्वनि कई बार दोहराई गई है, जिससे यह सुनने में बेहतर लगती है।
Exam Tip: 'अनुप्रास अलंकार' पहचानने के लिए, हमेशा एक काव्य पंक्ति में शब्दों की शुरुआत में एक ही व्यंजन ध्वनि की आवृत्ति देखें।
Question 2. तो पर वारौ उरबसी, सुनि राधिके सुजान। तू मोहन के उर बसी, दै उरबसी समान ॥
(क) यमक
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) उपमा
(घ) अनुप्रास
Answer: (क) यमक
In simple words: यह पंक्ति 'यमक अलंकार' का उदाहरण है क्योंकि इसमें "उरबसी" शब्द एक से अधिक बार आया है, लेकिन हर बार इसका मतलब अलग-अलग है।
Exam Tip: 'यमक अलंकार' के लिए, उन शब्दों पर ध्यान दें जो दोहराए जाते हैं लेकिन हर बार अलग-अलग अर्थ रखते हैं।
Question 3. वे न इहाँ नागर बड़े जिन आदर तौं आव। फूलौ अनफूलौ भयो, गँवई गाँव गुलाब।।
(क) अन्योक्ति
(ख) संदेह
(ग) भ्रांतिमान
(घ) उपमा
Answer: (क) अन्योक्ति
In simple words: यह उदाहरण 'अन्योक्ति अलंकार' दिखाता है, जहाँ किसी और चीज़ के बारे में सीधे बात करके कुछ और ही समझाया जाता है। यहाँ, गाँव का गुलाब कुछ और दर्शाता है।
Exam Tip: 'अन्योक्ति अलंकार' अक्सर प्रकृति या आम चीज़ों का उपयोग करता है ताकि मानवीय स्थितियों या भावनाओं के बारे में एक छिपा हुआ या अप्रत्यक्ष संदेश दिया जा सके।
Question 4. उषा सुनहले तीर बरसती, जय लक्ष्मी-सी उदित हुई।
(क) रूपक
(ख) उपमा
(ग) अतिशयोक्ति
(घ) मानवीकरण
Answer: (ख) उपमा
In simple words: यह पंक्ति 'उपमा अलंकार' का प्रयोग करती है क्योंकि यह 'उषा' की 'जय लक्ष्मी' से सीधे तुलना करती है, जिसमें "सी" शब्द का प्रयोग करके समानता दिखाई गई है।
Exam Tip: 'उपमा अलंकार' को आमतौर पर "सी", "समा", "सरिस", "जैसा" (जैसे, समान) जैसे तुलनात्मक शब्दों से पहचाना जाता है, जो दो चीज़ों को सीधे जोड़ते हैं।
Question 5. पड़ी अचानक नदी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार ? राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार।
(क) रूपक
(ख) अतिशयोक्ति
(ग) उपमा
(घ) उत्प्रेक्षा
Answer: (ख) अतिशयोक्ति
In simple words: यह 'अतिशयोक्ति अलंकार' का उदाहरण है क्योंकि यह घोड़े चेतक की नदी पार करने की गति को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताता है, राणा के सोचने से भी पहले।
Exam Tip: 'अतिशयोक्ति अलंकार' किसी बात को वास्तविकता से बहुत बड़ा या ज़्यादा नाटकीय बताता है ताकि एक मज़बूत प्रभाव या असर पैदा हो सके।
Question 6. उदित उदयगिरि मंच पर रघुवर बाल-पतंग।
(क) उपमा
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) रूपक
(घ) भ्रांतिमान
Answer: (ग) रूपक
In simple words: यह पंक्ति 'रूपक अलंकार' का उपयोग करती है क्योंकि यह 'रघुवीर' को 'उदयगिरि मंच' पर 'उगते सूरज' के रूप में सीधे दिखाती है, उनकी पहचान को 'जैसा' या 'की तरह' शब्दों के बिना मिला देती है।
Exam Tip: 'रूपक अलंकार' में, 'उपमेय' (विषय) को सीधे 'उपमान' (तुलना की वस्तु) के रूप में पहचाना जाता है जैसे कि वे एक ही हों, अक्सर बिना तुलनात्मक शब्दों के।
Question 7. वह दीपशिखा-सी शांत भाव में लीन।
(क) उपमा
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) भ्रांतिमान
(घ) रूपक
Answer: (क) उपमा
In simple words: यह पंक्ति 'उपमा अलंकार' का उदाहरण है क्योंकि यह उसकी स्थिरता की तुलना दीपक की लौ से "सी" शब्द (जैसे) का उपयोग करके करती है, सीधे समानता दिखाती है।
Exam Tip: याद रखें कि 'उपमा' प्रत्यक्ष तुलना पर केंद्रित होती है, अक्सर "जैसे" या "की तरह" अर्थ वाले शब्दों का उपयोग करती है, साझा गुणों को उजागर करती है।
Question 8. लट लटकनि मनो मत्त मधुप गन मादक मधुहि पिये।
(क) अनुप्रास; उपमा
(ख) अनुप्रास, उत्प्रेक्षा
(ग) अनुप्रास, रूपक
(घ) अनुप्रास, संदेह
Answer: (ख) अनुप्रास, उत्प्रेक्षा
In simple words: इस पंक्ति में 'अनुप्रास अलंकार' है क्योंकि 'मा' ध्वनि की पुनरावृत्ति हुई है, और 'उत्प्रेक्षा अलंकार' भी है क्योंकि "मनो" (मानो) शब्द का प्रयोग हुआ है, जो एक मज़बूत संभावना या कल्पना को दर्शाता है।
Exam Tip: जब कोई पंक्ति कई अलंकार दिखाती है, तो सभी प्रमुख अलंकारों को पहचानें। 'उत्प्रेक्षा' अक्सर 'मनु', 'मानहु', 'जनहु', 'जानो' (मानो, लगता है) जैसे शब्दों से पहचानी जाती है।
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