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Detailed Chapter 7 भारतदेश UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit
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Class 9 Sanskrit Chapter 7 भारतदेश UP Board Solutions PDF
कक्षा 9 संस्कृत पाठ 7 हिंदी अनुवाद भारतदेशः के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड
परिचय-विश्व में ऐसा कोई भी देश नहीं है, जो भारत के ज्ञान और विज्ञान से स्पर्धा कर सके। भारत का प्राकृतिक सौन्दर्य तो अनुपम ही है। यह वह देश है, जहाँ शरीरधारी सुकर्म करते हुए मोक्ष प्राप्त करते हैं। मनुष्य ही नहीं अपितु देवता भी मोक्ष की कामना से भारतभूमि पर अवतरित होते हैं। प्रस्तुत पाठ के श्लोक विष्णु पुराण से संगृहीत किये गये हैं। इनमें देवताओं द्वारा भारतवर्ष की महिमा का वर्णन किया गया है।पाठ-सारांश
हमारा देश भारतवर्ष महान् है। इसकी महिमा देवताओं ने पुराणों में गायी है। भारतवर्ष स्वर्ग और मोक्ष का साधनस्वरूप है। यहाँ पर देवता भी देवत्व के सुखों को भोगकर पुरुष रूप में जन्म लेना चाहते हैं। भारत में मनुष्य कर्मफल की इच्छा न करता हुआ अपने कर्मों को विष्णु के प्रति समर्पित करके प्रभु में लीन हो जाता है। यह भारतवर्ष सात समुद्रों वाली पृथ्वी पर सबसे पुण्यशाली है। यहाँ के लोग विष्णु के कल्याणकारी चरितों का गान करते हैं। भारत-भूमि पर जन्म प्राप्त करना बड़े पुण्य से या ईश्वर की कृपा से ही सम्भव है। कल्पों की आयु (UPBoardSolutions.com) प्राप्त करके दूसरे स्थानों पर जन्म लेने की अपेक्षा कम आयु पाकर भारत में जन्म लेना अच्छा है। यहाँ पर अपने क्षणिक जीवन में ही मनुष्य अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करके विष्णु का अभयपद प्राप्त करता है। देवता लोग कामना करते हैं कि हम अवशिष्ट पुण्य के प्रभाव से भारत में ही जन्म प्राप्त करें। जो पुरुष भारत में जन्म लेकर सत्कर्म नहीं करते, वे अमृत घट को छोड़कर विषपात्र पाने की इच्छा करते हैं । देवों द्वारा गायी गयी भारतभूमि की महिमा हमारे देश की महत्ता को प्रकट करती है।पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या
Question 1. गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमिभागे । स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ॥ (ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए।)
Answer:
शब्दार्थ-
गायन्ति - गाते हैं। देवाः - देवतागण । किले - निश्चित ही। गीतकानि - गीतों को। भारतभूमिभागे - भारत के भू-भाग पर । स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते - स्वर्ग और मोक्ष को प्राप्त कराने में साधनस्वरूप । भवन्ति - होते हैं। भूयः - फिर से । पुरुषाः - रूप में । सुरत्वात् - देवत्व का उपभोग करने के पश्चात् ।।
सन्दर्भ: प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत पद्म-पीयूषम्' के 'भारतदेशः' शीर्षक पाठ से उधृत है । [संकेत-इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा ।]
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में देवतागण भारत देश के उत्कर्ष का गान करते हुए यहाँ पर स्वयं जन्म धारण करने की इच्छा प्रकट करते हैं।
अन्वय: देवाः किल गीतकानि गायन्ति । स्वर्गापवर्गास्पद हेतु-भूते भारतभूमि भागे ये सुरत्वात् । भूयः पुरुषाः भवन्ति (ते) तु धन्याः (सन्ति) ।
व्याख्या: देवगण भी निश्चय ही (भारतभूमि की प्रशंसा के) गीत गाते हैं। स्वर्ग और मोक्ष को प्राप्त कराने में साधनस्वरूप भारतभूमि के भाग में जो देवता लोग देवत्व को छोड़कर फिर से मनुष्य रूप में जन्म लेते हैं, वे निश्चय ही धन्य हैं।
In simple words: देवतागण भारतभूमि के उन मनुष्यों को धन्य कहते हैं जो स्वर्ग और मोक्ष दिलाने वाली इस भूमि पर देवत्व के बाद मनुष्य रूप में जन्म लेते हैं।
🎯 Exam Tip: श्लोक का सही अनुवाद, शब्दार्थ और सन्दर्भ-प्रसंग की स्पष्टता उच्च अंक दिलाते हैं।
Question 2. कर्माण्यसङ्कल्पित तत्फलानि संन्यस्य विष्णौ परमात्मभूते ।। अवाप्य तां कर्ममहीमनन्ते तस्मिल्लयं ते त्वमलाः प्रयान्ति ॥ (ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए।)
Answer:
शब्दार्थ-
कर्माणि - कर्मों को। असङ्कल्पित तत्फलानि - उनके फलों की प्राप्ति की इच्छा से ने किये गये, अनासक्त भाव से किये गये। संन्यस्य - समर्पित करके । विष्णौ - विष्णु को । परमात्मभूते - परमात्मस्वरूप। अवाप्य - प्राप्त करके । कर्ममहीम् - कर्मभूमि (भारत)। अनन्ते - अन्तहीन ईश्वर में । लयं - लीन । प्रयान्ति - हो जाते हैं। अमलाः - पाप-मल से रहित होते हुए ।
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में कर्मफल की इच्छा ने रखकर किये गये कर्म को भगवान् को समर्पित करके मुक्त हो जाने का वर्णन है।
अन्वय: ते तु तां कर्ममहीम् अवाप्य असङ्कल्पित तत् फलानि कर्माणि परमात्मभूते विष्णौ संन्यस्य अमलाः (सन्तः) तस्मिन् अनन्ते लयं प्रयान्ति ।
व्याख्या: भारतभूमि में उत्पन्न होने वाले वे लोग उस कर्मभूमि भारत को प्राप्त करके (जन्म : लेकर) कर्मफल की इच्छा न रखते हुए किये (UPBoardSolutions.com) गये (अनासक्त भाव से) कर्मों को परमात्मस्वरूप विष्णु में समर्पित करके पाप-मल से रहित होकर उस अनन्त परमात्मा में विलीन हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि चारों पुरुषार्थों में जो सर्वोपरि पुरुषार्थ मोक्ष है, उसे प्राप्त कर लेते हैं और संसार के आवागमन से मुक्त हो जाते हैं।
In simple words: जो लोग कर्मभूमि भारत में जन्म लेकर फल की इच्छा रहित कर्मों को परमात्मा विष्णु को समर्पित कर देते हैं, वे पाप-मुक्त होकर उस अनन्त परमात्मा में लीन हो जाते हैं और मोक्ष प्राप्त करते हैं।
🎯 Exam Tip: श्लोक के भावार्थ को स्पष्ट करना और मुक्ति के मार्ग को रेखांकित करना महत्वपूर्ण है।
Question 3. अहो भुवः सप्तसमुद्रवत्याः द्वीपेषु वर्षेष्वधिपुण्यमेतत् । गायन्ति यत्रत्यजनाः मुरारेर्भद्राणि कर्माण्यवतारवन्ति । (ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए।)
Answer:
शब्दार्थ-
अहो - हर्षसूचक शब्द । भुवः - पृथ्वी के । सप्तसमुद्रवत्याः - सात समुद्रों वाली । द्वीपेषु - समस्त द्वीपों में । वर्षेषु- द्वीपों के खण्डों में, देशों में। अधिपुण्यम् - अधिक पुण्य वाला । एतद् - यह भारतवर्ष । गायन्ति - गाते हैं। यत्रत्य जनाः - जहाँ के रहने वाले लोग । मुरारेः - विष्णु के । भद्राणि - कल्याणकारी । अवतारवन्ति - अवतारों वाले ।।
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में देवताओं ने समस्त विश्व में भारतवर्ष को सर्वोत्कृष्ट बताया है।
अन्वय: अहो! सप्तसमुद्रवत्याः भुवः द्वीपेषु वर्षेषु एतत् (भारतवर्षम्) अधिपुण्यम् (अस्ति), यत्रत्यजनाः मुरारेः अवतारवन्ति भद्राणि कर्माणि गायन्ति ।
व्याख्या: अहो! सात समुद्रों से घिरी हुई पृथ्वी के सभी द्वीपों और खण्डों में यह भारतवर्ष अधिक पुण्यशाली है, जहाँ के रहने वाले लोग भगवान् विष्णु के द्वारा लिये गये अवतारों के कल्याणकारी शुभ कर्मों का गान करते हैं।
In simple words: देवता आश्चर्यचकित होकर कहते हैं कि सात समुद्रों वाली पृथ्वी के सभी देशों में भारतवर्ष सबसे पुण्यशाली है, जहाँ के लोग भगवान विष्णु के अवतारों के शुभ कर्मों का गान करते हैं।
🎯 Exam Tip: श्लोक में भारत की महत्ता और भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा को स्पष्ट करना चाहिए।
Question 4. अहो अमीषां किमकारि शोभनं प्रसन्न एषां स्विदुत स्वयं हरिः । यैर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे मुकुन्दसेवौपायिकं स्पृहा हि नः ॥ (ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए।)
Answer:
शब्दार्थ-
अमीषाम् - इन्होंने । किम् - कौन, क्या। अकारि - किया है। शोभनम् - अच्छा कर्म, पुण्य । एषां - इन (भारतवासियों) पर । स्विदुत - अथवा । स्वयं हरिः - स्वयं विष्णु ने । यैः - जिनके द्वारा । लब्धं - प्राप्त किया है। नृषु - मानव योनि में, मनुष्य रूप में। भारताजिरे - भारत के प्रांगण में। मुकुन्दसेवौपायिकम् - विष्णु की सेवा का साधनस्वरूप। स्पृहा - इच्छा । नः - हमारी ।।
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में भारत में जन्म लेने वाले लोगों के पुण्य पर देवताओं को भी आश्चर्य, है ।
अन्वय: अहो! अमीषां किं शोभनम् अकारि, स्विदुत हरिः स्वयम् एषां प्रसन्नः (अस्ति) । यैः भारताजिरे नृषु मुकुन्दसेवौपायिकं जन्म लब्धम् । नः हि स्पृही (अस्ति)।
व्याख्या: अहो! इन भारत के रहने वालों ने ऐसा कौन-सा शुभ कर्म किया है अथवा विष्णु स्वयं इन लोगों पर प्रसन्न हैं, जिन लोगों ने भारत के प्रांगण में मनुष्यों में भगवान् विष्णु की सेवा का साधनस्वरूप जन्म प्राप्त किया है। हमारी इच्छा है कि हम भी वहीं जन्म प्राप्त करें।
In simple words: देवता आश्चर्य से पूछते हैं कि भारत के लोगों ने कौन सा शुभ कर्म किया है या स्वयं विष्णु उनसे प्रसन्न हैं, क्योंकि उन्हें भारत में मनुष्य रूप में जन्म मिला है जो विष्णु की सेवा का साधन है और हमें भी ऐसे जन्म की इच्छा है।
🎯 Exam Tip: श्लोक में देवताओं की भारतभूमि पर जन्म लेने की इच्छा और उसके पीछे के कारणों को स्पष्ट करना आवश्यक है।
Question 5. कल्पायुषां स्थानजयात् पुनर्भवात् क्षणायुषां भारतभूजयो वरम् । क्षणेन मर्येन कृतं मनस्विनः संन्यस्य संयन्त्यभयं पदं हरेः ॥ (ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए।)
Answer:
शब्दार्थ-
कल्पायुषाम् - एक कल्प की आयु वाले ब्रह्मादिकों का, कल्प समय का एक बहुत बड़ा विभाग है जो एक हजार महायुग अर्थात् 4 अरब 32 करोड़ मानव वर्षों का माना जाता है। स्थानजयात् - लोकों की प्राप्ति की अपेक्षा पुनर्भवात् - जहाँ से पुनः जन्म लेना पड़ता है। क्षणायुषाम् - क्षणभर की आयु वालों का । भारतभूजयः - भारतभूमि में जन्म । वरम् - श्रेष्ठ । क्षणेन - क्षणिक । मन - मरणशील शरीर से । कृतम् - अपने कर्म को । मनस्विनः - धीर, मनस्वी पुरुष । संन्यस्य - भगवान् को समर्पित करके । संयान्ति - प्राप्त करते हैं। अभयं - (जन्म-जरा-मरण आदि के) भय से मुक्ति । पदं - स्थान को । हरेः - हरि के ।
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में एक कल्प की आयु वालों की अपेक्षा क्षणभर की आयु वाले “भारतवासियों को श्रेष्ठ बताया गया है।
अन्वय: पुनर्भवात् कल्पायुषां स्थानजयात् क्षणायुषां भारतभूजयः वरम् (अस्ति) । मनस्विनः क्षणेन मत्येंन कृतं संन्यस्य हरेः अभयं पदं संयान्ति ।
व्याख्या: कल्प की आयु वाले ब्रह्मादिकों से पुनर्जन्म वाले लोकों को प्राप्त करने की अपेक्षा क्षणभर की आयु वालों को भारतभूमि पर जन्म लेना अच्छा है। धीर पुरुष क्षणिक मरणशील शरीर से किये गये कर्म को भगवान् को समर्पित करके विष्णु के जरा-मरणादि भय से रहित स्थान मोक्ष को प्राप्त करते हैं।
In simple words: यह कहा गया है कि कल्पों तक जीने वाले ब्रह्मादिकों के लोकों को प्राप्त करने से बेहतर है कि भारत में क्षणिक जीवन पाकर, धीर पुरुष अपने कर्मों को भगवान को समर्पित करके मोक्ष प्राप्त करें।
🎯 Exam Tip: भारतभूमि पर क्षणिक जीवन के महत्व को दर्शाना और मोक्ष प्राप्ति के उपाय को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
Question 6. यद्यस्ति नः स्वर्गसुखावशेषितं स्विष्टस्य सूक्तस्य कृतस्य शोभनम् । तेनाजनाभे स्मृतिमज्जन्म नः स्यात् वर्षे हरियर्द् भजतां शं तनोति ॥ (ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए।)
Answer:
शब्दार्थ-
यद्यस्ति (यदि + अस्ति) - यदि है। नः - हमारे । स्वर्गसुखावशेषितम् - स्वर्ग के सुखों से बचा हुआ । स्विष्टस्य - सुन्दर यज्ञ का । सूक्तस्य - सुन्दर वचन को । कृतस्य - पुण्य कर्म का । अजनाभे - भारतवर्ष में । स्मृतिमत् - ईश्वर के स्मरण से युक्त । जन्म स्यात् - जन्म हो । भजताम् - जिसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों का। शम् - कल्याण को । तनोति - वृद्धि करते हैं।
प्रसंग: स्वर्गलोक निवासी जीव स्वर्ग के सुख से बचे हुए पुण्य कर्म से भारत में जन्म लेने की इच्छा करते हैं।
अन्वय: यदि नः स्विष्टस्य, सूक्तस्य कृतस्य (तु) स्वर्गसुखावशेषितम् (अस्ति), (तर्हि) तेन नः अजनाभे स्मृतिमत् जन्म स्यात्। यत् भजतां हरिः शं तनोति ।।
व्याख्या: यदि हमारे भली-भाँति किये गये यज्ञ का, सत्य आदि सुन्दर वचन का, किये गये पुण्य कर्म का स्वर्ग-सुख से बचाया हुआ पुण्य कर्म है, तो उससे (UPBoardSolutions.com) भारतवर्ष में भगवान् की स्मृति से युक्त जन्म हो। जिस जन्म को प्राप्त करने वाले पुरुषों के स्वयं भगवान् विष्णु कल्याण की वृद्धि करते हैं। तात्पर्य यह है कि देवतागण भी भारत-भूमि पर जन्म पाने की उत्कट इच्छा रखते हैं और इसके लिए व्याकुलता का अनुभव करते हैं।
In simple words: देवतागण प्रार्थना करते हैं कि यदि उनके पुण्य कर्म का कुछ भाग स्वर्ग सुख से बचा है, तो उससे उन्हें भारतवर्ष में भगवान की स्मृति युक्त जन्म मिले, जिससे भगवान विष्णु की भक्ति करने पर कल्याण की वृद्धि हो।
🎯 Exam Tip: देवताओं की भारतभूमि पर जन्म लेने की इच्छा और उसके पीछे के आध्यात्मिक कारणों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
Question 7. सञ्चितं सुमहत् पुण्यमअक्षय्यममलं शुभम् । कदा वयं नु लप्स्यामो जन्म भारतभूतले ॥ (ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए।)
Answer:
शब्दार्थ-
सञ्चितम् - एकत्र किया हुआ । सुमहत् - बहुत अधिक । अक्षय्यम् - नष्ट न होने वाला । अमलम् - पापरहित । शुभम् - कल्याणकारी । लप्स्यामः - प्राप्त करेंगे। भारत-भूतले - भारतभूमि पर ।
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि देवगण अपने संचित पुण्य से भारतभूमि पर जन्म लेने की उत्कट इच्छा रखते हैं।
अन्वय: (अस्माभिः) अक्षय्यम् अमलं शुभं सुमहत् (यत्) पुण्यं सञ्चितम् (तेनैव पुण्येन) वयं भारतभूतले कदा नु जन्म लप्स्यामः ।।
व्याख्या: हमने (देवताओं ने) कभी नष्ट न होने वाला, पापरहित, शुभ जो बहुत बड़ा पुण्य संचित किया है, उसी पुण्य से हम देवतागण भारतभूमि पर कब जन्म प्राप्त करेंगे?
In simple words: देवतागण यह कामना करते हैं कि उन्होंने जो अक्षय, निर्मल और कल्याणकारी पुण्य एकत्र किया है, उसी पुण्य के बल पर उन्हें भारतभूमि पर जन्म कब मिलेगा।
🎯 Exam Tip: श्लोक में देवताओं की भारतभूमि पर जन्म लेने की तीव्र अभिलाषा और उसके कारण को स्पष्ट करें।
Question 8. सम्प्राप्य भारते जन्म सत्कर्मसु पराङ्मुखः ।। पीयूषकलशं हित्वा विषभाण्डं स इच्छति ॥ (ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए।)
Answer:
शब्दार्थ-
सम्प्राप्य - प्राप्त करके । सत्कर्मसु - अच्छे कर्मों से पराङ्मुखः - विमुख । पीयूषकलशम् - अमृत से भरे घड़े को । हित्वा - छोड़कर । विषभाण्डम् - विष से भरे पात्र को । इच्छति - इच्छा करता है।
प्रसंग: प्रस्तुत श्लोक में भारत में जन्म लेकर सत्कर्म करने पर बल दिया गया है।
अन्वय: भारते जन्म सम्प्राप्य (यः) सत्कर्मसु पराङ्मुखः भवति, (यः) सः पीयूषकलशं हित्वा विषभाण्डम् इच्छति ।।
व्याख्या: भारत में जन्म प्राप्त करके जो व्यक्ति सत्कर्मों से विमुख होता है, वह अमृत से पूर्ण घड़े को छोड़कर विष से पूर्ण पात्रं को पाने की इच्छा करता है। तात्पर्य यह है कि भारत में जन्म लेकर सत्कर्म ही करना चाहिए।
In simple words: जो व्यक्ति भारत में जन्म लेकर भी अच्छे कर्मों से मुँह मोड़ लेता है, वह अमृत का घड़ा छोड़कर विष के पात्र को पाने की इच्छा करता है, अर्थात् ऐसा करना मूर्खता है।
🎯 Exam Tip: श्लोक के माध्यम से भारतभूमि पर सत्कर्मों के महत्व को उजागर करना और उसके विपरीत परिणाम को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
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