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Detailed Chapter 3 शब्द रूप प्रकार UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit
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Class 9 Sanskrit Chapter 3 शब्द रूप प्रकार UP Board Solutions PDF
UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 3 शब्द-रूप प्रकरण (व्याकरण)
संस्कृत में शब्दों को निम्नलिखित पाँच भागों में बाँटा जा सकता है-
(1) संज्ञा,
(2) सर्वनाम,
(3) विशेषण,
(4) क्रिया,
(5) अव्यये ।
संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण में लिंग, कारक और वचन के अनुसार परिवर्तन होता है। क्रिया में कालें, पुरुष और वचन के अनुसार परिवर्तन होता है तथा अव्ययों में किसी भी दशा में (लिंग, कारक, वचन आदि के कारण) कोई परिवर्तन नहीं होता।
लिंग
संस्कृत में निम्नलिखित तीन लिंग होते हैं-
(1) पुंल्लिग - जिससे पुरुष जाति का बोध होता है; जैसे-नरः, कविः ।
(2) स्त्रीलिंग - जिससे स्त्री जाति का बोध होता है; जैसे-माला, मतिः, धेनुः, वधू, माती आदि ।
(3) नपुंसकलिंग - जिससे न पुरुष जाति का बोध होता है और न स्त्री जाति का; जैसे-फलम्, वारि, मधु, जगत् आदि ।
विशेष - संस्कृत में लिंग-निर्णय में कठिनाई होती है। इसका अभ्यास अति आवश्यक है। इसके पूर्ण ज्ञान के लिए कोश, व्याकरण तथा साहित्य का अध्ययन आवश्यक है।
वचन
संस्कृत में निम्नलिखित तीन वचन होते हैं-
(1) एकवचन- जिनसे एक वस्तु का बोध होता है; यथा-बालकः पठति ।
(2) द्विवचन- जिनसे दो वस्तुओं का बोध होता है; यथा-बालकौ पठतः।।
(3) बहुवचन- जिनसे दो से अधिक वस्तुओं का बोध होता है; यथा-बालकाः पठन्ति ।
कारक
क्रिया से सम्बन्ध रखने वाले पदों को कारक कहते हैं। हिन्दी में कारकों की संख्या आठ है, किन्तु संस्कृत में सम्बन्ध तथा सम्बोधन को; क्रिया से सम्बन्ध न होने के कारण; कारक नहीं माना जाता है।
सामान्य रूप से कारकों का परिचय निम्नलिखित है-
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | सु | औ | जस् |
| द्वितीया | अम् | औट् | शस् |
| तृतीया | टा | भ्याम् | भिस् |
| चतुर्थी | डे | भ्याम् | भ्यस् |
| पञ्चमी | ङसि | भ्याम् | भ्यस् |
| षष्ठी | ङस् | ओस् | आम् |
| सप्तमी | ङि | ओ | सुप् |
विभक्तियों के प्रत्यय
संज्ञाओं के तीनों लिंगों, तीनों वचनों तथा सातों विभक्तियों में रूप चलते हैं। शब्द-रूपों को बनाने के लिए उनसे प्रत्यय जोड़े जाते हैं। इन प्रत्ययों को 'सुप् प्रत्यय कहते हैं और इनसे बनने वाले शब्दों को सुबन्त कहते हैं।
| कारक | विभक्ति | चिह्न |
|---|---|---|
| (1) कर्त्ता | प्रथमा | ने |
| (2) कर्म | द्वितीया | को |
| (3) करण | तृतीया | से, के द्वारा (with) |
| (4) सम्प्रदान | चतुर्थी | के लिए, को (देने के अर्थ में for) |
| (5) अपादान | पञ्चमी | से (अलग होने के अर्थ में from) |
| (6) सम्बन्ध | षष्ठी | का, के, की, रा, रे, री, ना, ने, नी |
| (7) अधिकरण | सप्तमी | में, पर |
| (8) सम्बोधन | प्रथमा | हे! भो! अरे ! |
कुछ व्यंजनान्त (हलन्त) होते हैं। इन सभी संज्ञा शब्दों को निम्नलिखित छः वर्गों में विभाजित किया जा सकता है
(1) स्वरान्त पुंल्लिग शब्द-राम, कवि, भानु, पितृ, गो आदि ।
(2) स्वरान्त नपुंसकलिंग शब्द-फल, वारि, मधु आदि ।
(3) स्वरान्त स्त्रीलिंग शब्द-माला, मति, धेनु, नदी, वधू, मातृ आदि ।
(4) व्यंजनान्त पुंल्लिग शब्द- करिन्, आत्मन्, राजन्, मरुत्, सुहद् आदि ।।
(5) व्यंजनान्त नपुंसकलिंग शब्द- मनस्, जगत्, नाम आदि ।
(6) व्यंजनान्त स्त्रीलिंग शब्द- वाच्, सरित्, विपद् आदि ।
विशेष- नवीं कक्षा में पुंल्लिग-राम, हरि, गुरु; स्त्रीलिंग-रमा, मति, वाच्; नपुंसकलिंग-सर्व, तद्, युष्मद् तथा अस्मद् शब्दों के रूप निर्धारित हैं। अनुवाद में सहायक होने के कारण इनके अतिरिक्त भी कुछ रूप यहाँ दिये जा रहे हैं।
स्वरान्त (अजन्त) पुंल्लिग शब्द ।
(1) 'राम' अकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | रामः | रामौ | रामाः |
| द्वितीया | रामम् | रामौ | रामान् |
| तृतीया | रामेण | रामाभ्याम् | रामैः |
| चतुर्थी | रामाय | रामाभ्याम् | रामेभ्यः |
| पञ्चमी | रामात् | रामाभ्याम् | रामेभ्यः |
| षष्ठी | रामस्य | रामयोः | रामाणाम् |
| सप्तमी | रामे | रामयोः | रामेषु |
| सम्बोधन | हे राम! | हे रामौ! | हे रामाः! |
ध्यातव्य- इसी प्रकार नर (मनुष्य), जनक (पिता), नृप (राजा), शिष्य, सूर्य, चन्द्र, खग (पक्षी), मयूर (मोर), धर्म, अनल (आग), पवन (वायु), खल (दुष्ट), सज्जन, कर (हाथ), पिक (कोयल), काक (कौआ), शुक (तोता), वानर (बन्दर), सिंह, मृग (हिरन), गज (हाथी), रासभ (गधा), छात्र, कृषक (किसान), मूषक (चूहा), बिडाल (बिलाव), कुक्कुर (कुत्ता), कूप (कुआँ), सरोवर (तालाब), घट (घड़ा), कलश (घड़ा), अश्व (घोड़ा), चौर, देव, इन्द्र, सुर (देवता), सहोदर (भाई), सुत (पुत्र), सर्प, गणेश आदि अकारान्त संज्ञा पुंल्लिग शब्द हैं। इन सभी के रूप 'राम' की तरह चलते हैं।
(2) जिन शब्दों में र, ष, क्ष, त्र, ऋ वर्ण होते हैं, उनमें तृतीया एकवचन और षष्ठी बहुवचन में 'न' के स्थान पर 'ण' हो जाता है।
(2) 'हरि' (विष्णु) इकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | हरिः | हरी | हरयः |
| द्वितीया | हरिम् | हरी | हरीन् |
| तृतीया | हरिणा | हरिभ्याम् | हरिभिः |
| चतुर्थी | हरये | हरिभ्याम् | हरिभ्यः |
| पञ्चमी | हरेः | हरिभ्याम् | हरिभ्यः |
| षष्ठी | हरे: | हर्यो: | हरीणाम् |
| सप्तमी | हरौ | हर्योः | हरिषु |
| सम्बोधन | हे हरे ! | हे हरी! | हे हरयः! |
ध्यातव्य- इसी प्रकार कवि, मुनि, कपि (बन्दर), ऋषि, यति (साधु), विधि (ब्रह्मा, भाग्य), निधि (खजाना), गिरि (पर्वत), अग्नि, अरि, (शत्रु), वह्नि (आग), रवि (सूर्य), नृपति (राजा), उदधि (समुद्र), अतिथि (मेहमान), असि (तलवार), पाणि (हाथ), व्याधि (बीमारी), सेनापति, प्रजापति, भूपति (राजा), आधि (मानसिक पीड़ा), मणि, पयोधि (समुद्र) आदि संज्ञा इकारान्त पुंल्लिग शब्द हैं। इनके रूप 'हरि' के समान चलते हैं।
(3) 'गुरु' उकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | गुरुः | गुरू | गुरुवः |
| द्वितीया | गुरुम् | गुरू | गुरुन् |
| तृतीया | गुरुणा | गुरुभ्याम् | गुरुभिः |
| चतुर्थी | गुरवे | गुरुभ्याम् | गुरुभ्यः |
| पञ्चमी | गुरोः | गुरुभ्याम् | गुरुभ्यः |
| षष्ठी | गुरोः | गुर्वोः | गुरुणाम् |
| सप्तमी | गुरौ | गुर्वोः | गुरुषु |
| सम्बोधन | हे गुरो ! | हे गुरु ! | हे गुरुवः ! |
ध्यातव्य- इसी प्रकार भानु (सूर्य), साधु, विधु (चन्द्रमा), रिपु (शत्रु), जन्तु, विष्णु, शम्भु, शिशु (बच्चा) उरु (जंघा), प्रभु, वेणु, (बाँसुरी), राहु, वायु, मृत्यु, पशु, तरु (वृक्ष) आदि संज्ञा उकारान्त पुंल्लिग शब्द हैं। इन सभी के रूप 'गुरु' शब्द के समान चलते हैं।
(4) 'पितृ' ऋकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | पिता | पितरौ | पितरः |
| द्वितीया | पितरम् | पितरौ | पितॄन् |
| तृतीया | पित्रा | पितृभ्याम् | पितृभिः |
| चतुर्थी | पित्रे | पितृभ्याम् | पितृभ्यः |
| पञ्चमी | पितुः | पितृभ्याम् | पितृभ्यः |
| षष्ठी | पितुः | पित्रोः | पितृणाम् |
| सप्तमी | पितरि | पित्रोः | पितृषु |
| सम्बोधन | हे पितः ! | हे पितरौ ! | हे पितरः ! |
ध्यातव्य- (1) भ्रातृ, जामातृ आदि शब्द ऋकारान्त पुंल्लिग हैं। इनके रूप 'पितृ' शब्द के समान ही चलते हैं।
(2) 'मातृ' (स्त्रीलिंग) शब्द का रूप भी 'पितृ' के समान चलता है। केवल द्वितीया के बहुवचन में 'मात्' रूप बनता है।
(5) ओकारान्त 'गो' (बैल) शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | गौः | गावौ | गावः |
| द्वितीया | गाम् | गावौ | गाः |
| तृतीया | गवा | गोभ्याम् | गोभिः |
| चतुर्थी | गवे | गोभ्याम् | गोभ्यः |
| पञ्चमी | गोः | गोभ्याम् | गोभ्यः |
| षष्ठी | गोः | गवोः | गवाम् |
| सप्तमी | गवि | गवोः | गोषु |
| सम्बोधन | हे गौः ! | हे गावौ ! | हे गावः ! |
स्वरान्त (अजन्त) नपुंसकलिंग शब्द
(6) 'गृह' अकारान्त
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | गृहम् | गृहे | गृहाणि |
| द्वितीया | गृहम् | गृहे | गृहाणि |
| सम्बोधन | हे गृहे ! | हे गृहे ! | हे गृहाणि! |
विशेष- शेष तृतीया से सप्तमी विभक्ति तक के रूप अकारान्त पुंल्लिग 'राम' शब्द के समान चलते हैं।
ध्यातव्य- इसी प्रकार पुस्तकम्, वनम्, अरण्यम् (जंगल), मुखम्, कुसुमम्, रत्नम्, सुवर्णम्, कमलम्, पर्णम् (पत्ता), पत्रम् (पत्र या पत्ता), मित्रम्, नक्षत्रम्, तृणम्, उद्यानम्, उपवनम्, बीजम्, जलम्, चित्रम्, गगनम् (आकाश), शरीरम्, ज्ञानम्, दुग्धम् (दूध), अन्नम्, दर्पणम् (ऐना, दर्पण), भवनम् (घर), नगरम्, आम्रम् (आम का फल), दुःखम्, सुखम्, दानम्, नयनम् (आँख), नेत्रम्, छत्रम् (छाता) आदि शब्दों के रूप 'गृह' के समान चलते हैं।
(7) 'वारि' (जल) इकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | वारि | वारिणी | वारीणि |
| द्वितीया | वारि | वारिणी | वारीणि |
| तृतीया | वारिणा | वारिभ्याम् | वारिभिः |
| चतुर्थी | वारिणे | वारिभ्याम् | वारिभ्यः |
| पञ्चमी | वारिणः | वारिभ्याम् | वारिभ्यः |
| षष्ठी | वारिणः | वारिणोः | वारीणाम् |
| सप्तमी | वारिणि | वारिणोः | वारिषु |
| सम्बोधन | हे वारे !, वारि ! | हे वारिणी ! | हे वारीणि! |
(8) 'दधि' (दही) इकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | दधि | दधिनी | दधिनी |
| द्वितीया | दधि | दधिनी | दधीनि |
| तृतीया | दध्ना | दधिभ्याम् | दधिभिः |
| चतुर्थी | दध्ने | दधिभ्याम् | दधिभ्यः |
| पञ्चमी | दध्नः | दधिभ्याम् | दधिभ्यः |
| षष्ठी | दध्नः | दध्नोः | दध्नाम् |
| सप्तमी | दध्नि, दधनि | दध्नोः | दधिषु |
| सम्बोधन | हे दधि!, दधे ! | हे दधिनी ! | हे दधीनि ! |
ध्यातव्य- इसी प्रकार अक्षि (आँख), अस्थि (हड्डी), सक्थि (जाँघ) आदि शब्दों के रूप 'दधि' के समान चलते हैं।
(9) 'मधु' (शहद) उकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | मधु | मधुनी | मधूनि |
| द्वितीया | मधु | मधुनी | मधूनि |
| तृतीया | मधुना | मधुभ्याम् | मधुभिः |
| चतुर्थी | मधुने | मधुभ्याम् | मधुभ्यः |
| पञ्चमी | मधुनः | मधुभ्याम् | मधुभ्यः |
| षष्ठी | मधुनः | मधुनोः | मधूनाम् |
| सप्तमी | मधुनि | मधुनोः | मधुषु |
| सम्बोधन | हे मधु!, मधो ! | हे मधुनी ! | हे मधूनि ! |
ध्यातव्य- इसी प्रकार जानु (घुटना), दारु (लकड़ी), तालु, वस्तु, सानु (पर्वत की चोटी) उकारान्त नपुंसकलिंग शब्द हैं। इनके रूप भी 'मधु' के समान चलते हैं।
स्वरान्त (अजन्त) स्त्रीलिंग शब्द
(10) 'रमा' (लक्ष्मी) आकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | रमा | रमे | रमाः |
| द्वितीया | रमाम् | रमे | रमाः |
| तृतीया | रमया | रमाभ्याम् | रमाभिः |
| चतुर्थी | रमायै | रमाभ्याम् | रमाभ्यः |
| पञ्चमी | रमायाः | रमाभ्याम् | रमाभ्यः |
| षष्ठी | रमायाः | रमयोः | रमाणाम् |
| सप्तमी | रमायाम् | रमयोः | रमासु |
| सम्बोधन | हे रमे ! | हे रमे ! | हे रमाः! |
ध्यातव्य- इसी प्रकार बाला (स्त्रा), ललना (स्त्री), कन्या, निशा (रात), भार्या (स्त्री), राधा, तारा, कला, विद्या, लता, माला, छात्रा, कमला (लक्ष्मी), पूर्णिमा, दया, नासिका (नाक), वाटिका (बाग), कोकिला (कोयल), शोभा, संख्या, सुषमा, सीता, सन्ध्या, धरा (पृथ्वी) आदि आकारान्त स्त्रीलिंग शब्द हैं। इन सभी के रूप 'रमा' के समान चलेंगे।
(11) 'मति' (बुद्धि) इकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | मतिः | मती | मतयः |
| द्वितीया | मतिम | मती | मतीः |
| तृतीया | मत्या | मतिभ्याम् | मत्तिभिः |
| चतुर्थी | मतये, मत्यै | मतिभ्याम् | मतिभ्यः |
| पञ्चमी | मतेः, मत्याः | मतिभ्याम् | मतिभ्यः |
| षष्ठी | मतेः, मत्याः | मत्योः | मतीनाम् |
| सप्तमी | मतौ, मत्याम् | मत्यर्योः | मतिसु |
| सम्बोधन | हे मते ! | हे मती ! | हे मतयः ! |
ध्यातव्य- इसी प्रकार बुद्धि, शुद्धि, गति, भक्ति, शक्ति, धूलि, स्मृति, रुचि, शान्ति, रीति, नीति, पङ्क्ति, जाति, गीति, भीति (डर), युक्ति (उपाय), रात्रि, कृति (रचना), सम्पत्ति, विपत्ति, सन्तति (सन्तान) आदि इकारान्त स्त्रीलिंग शब्द हैं। इन सभी के रूप 'मति' के समान चलेंगे। 'पति' शब्द का रूप भी 'मति' के समान ही चलता है। मात्र चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी, सप्तमी विभक्ति के एकवचन रूपों में परिवर्तन होता है। ये रूप क्रमशः पत्ये, पत्युः, पत्युः, पत्यौ होते हैं।
(12) 'नदी' ईकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | नदी | नद्यौ | नद्यः |
| द्वितीया | नदीम् | नद्यौ | नदीः |
| तृतीया | नद्या | नदीभ्याम् | नदीभिः |
| चतुर्थी | नद्यै | नदीभ्याम् | नदीभ्यः |
| पञ्चमी | नद्याः | नदीभ्याम् | नदीभ्यः |
| षष्ठी | नद्याः | नद्योः | नदीनाम् |
| सप्तमी | नद्याम् | नद्योः | नदीषु |
| सम्बोधन | हे नदि ! | हे नद्यौ ! | हे नद्यः ! |
ध्यातव्य - (1) इसी प्रकार राज्ञी (रानी), नारी, पार्वती, नटी, पृथ्वी, देवी, अटवी (जंगल), कुन्ती, गौरी, कुमारी, सखी, पुत्री, रजनी, महिषी, मही, मृगी, वापी, दासी, श्रीमती आदि ईकारान्त स्त्रीलिंग शब्द हैं। इन सभी शब्दों के रूप 'नदी' के समान चलते हैं।
(2) श्री, लक्ष्मी, तरी, तन्त्री आदि शब्दों के प्रथमा विभक्ति एकवचन के रूप में विसर्ग लगते हैं।
(13) 'धेनु' (गाय) उकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | धेनुः | धेनू | धेनवः |
| द्वितीया | धेनुम् | धेनू | धेनूः |
| तृतीया | धेन्वा | धेनुभ्याम् | धेनुभिः |
| चतुर्थी | धेनवे, धेन्वै | धेनुभ्याम् | धेनुभ्यः |
| पञ्चमी | धेनोः, धेन्वाः | धेनुभ्याम् | धेनुभ्यः |
| षष्ठी | धेनौ, धेन्वाः | धेन्वोः | धेनूनाम् |
| सप्तमी | धेनौ, धेन्वाम् | धेन्वोः | धेनुषु |
| सम्बोधन | हे धेनो ! | हे धेनू ! | हे धेनवः! |
ध्यातव्य- इसी प्रकार तनु (शरीर), रेणु (धूलि), हनु (ठोड़ी) आदि उकारान्त स्त्रीलिंग शब्द हैं। इन सभी शब्दों के रूप 'धेनु' के समान चलते हैं।
(14) 'वधू' (बहू) ऊकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | वधूः | वध्वौ | वध्वः |
| द्वितीया | वधूम् | वध्वौ | वधूः |
| तृतीया | वध्वा | वधूभ्याम् | वधूभिः |
| चतुर्थी | वध्वै | वधूभ्याम् | वधूभ्यः |
| पञ्चमी | वध्वाः | वधूभ्याम् | वधूभ्यः |
| षष्ठी | वध्वाः | वध्वोः | वधूनाम् |
| सप्तमी | वध्वाम् | वध्वोः | वधूषु |
| सम्बोधन | हे वधु ! | हे वध्वौ ! | हे वध्वः ! |
ध्यातव्य- इसी प्रकार चमू (सेना), तनू (शरीर), रज्जू (रस्सी), श्वश्रू (सास), कर्कन्धू (बेर), जम्बू (जामुन), श्मश्रू (दाढ़ी) आदि ऊकारान्त स्त्रीलिंग शब्द हैं। इन सभी शब्दों के रूप 'वधू' के समान चलते हैं।
व्यञ्जनान्त संज्ञाएँ
(15) 'भगवत्' तकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | भगवान् | भगवन्तौ | भगवन्तः |
| द्वितीया | भगवन्तम् | भगवन्तौ | भगवतः |
| तृतीया | भगवता | भगवद्भ्याम् | भगवद्भिः |
| चतुर्थी | भगवते | भगवद्भ्याम् | भगवद्भ्यः |
| पञ्चमी | भगवतः | भगवद्भ्याम् | भगवद्भ्यः |
| षष्ठी | भगवतः | भगवतोः | भगवताम् |
| सप्तमी | भगवति | भगवतोः | भगवत्सु |
| सम्बोधन | हे भगवन्! | हे भगवन्तौ ! | हे भगवन्त! |
ध्यातव्य - इसी प्रकार भवत् (पुं० आप), बुद्धिमत् (बुद्धिमान), बलवत्, श्रुतवत्, गुणवत्, धनवत्, धीमत्, शीलवत्, रूपवत्, शक्तिमत् आदि वत्-मत् प्रत्ययान्त तकारान्त पुंल्लिग शब्द हैं। इनके रूप 'भगवत्' के समान चलते हैं।
(16) 'इन्' प्रत्ययान्त 'करिन्' (हाथी) शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | करी | करिणौ | करिणः |
| द्वितीया | करिणम् | करिणौ | करिणः |
| तृतीया | करिणा | करिभ्याम् | करिभिः |
| चतुर्थी | करिणे | करिभ्याम् | करिभ्यः |
| पञ्चमी | करिणः | करिभ्याम् | करिभ्यः |
| षष्ठी | करिणः | करिणोः | करीणाम् |
| सप्तमी | करिणि | करिणोः | करिषु |
| सम्बोधन | हे करिन् ! | हे करिणौ ! | हे करिणः ! |
ध्यातव्य- संन्यासिन्, दण्डिन्, तपस्विन्, धनिन्, स्वामिन्, यशस्विन्, दानिन्, ज्ञानिन्, विद्यार्थिन्, हस्तिन्, गुणिन्, मन्त्रिन्, पक्षिन्, वाजिन् (घोड़ा), बलिन्, सुखिन् आदि 'इन्' प्रत्ययान्त पुंल्लिग शब्द हैं। इन सभी के रूप 'करिन्' शब्द के समान चलते हैं।
(17) 'राजन्' नकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | राजा | राजानौ | राजान्: |
| द्वितीया | राजानम् | राजानौ | राज्ञः |
| तृतीया | राज्ञा | राजभ्याम् | राजभिः |
| चतुर्थी | राज्ञे | राजभ्याम् | राजभ्यः |
| पञ्चमी | राज्ञः | राजभ्याम् | राजभ्यः |
| षष्ठी | राज्ञः | राज्ञोः | राज्ञाम् |
| सप्तमी | राज्ञि, राजनि | राज्ञोः | राजसु |
| सम्बोधन | हे राजन् ! | हे राजानौ ! | हे राजानः! |
(18) 'जगत्' तकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | जगत् | जगती | जगन्ति |
| द्वितीया | जगत् | जगती | जगन्ति |
| तृतीया | जगता | जगद्भ्याम् | जगद्भिः |
| चतुर्थी | जगते | जगद्भ्याम् | जगद्भ्यः |
| पञ्चमी | जगतः | जगद्भ्याम् | जगद्भ्यः |
| षष्ठी | जगतः | जगतोः | जगताम् |
| सप्तमी | जगति | जगतोः | जगत्सु |
| सम्बोधन | हे जगत् ! | हे जगती ! | हे जगन्ति ! |
ध्यातव्य- इसी प्रकार पठत्, रुदत्, तरत्, ददत् आदि तकारान्त नपुंसकलिंग शब्दों के रूप चलते हैं।
(19) 'नामन्' नकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | नाम | नामनी, नाम्नी | नामानि |
| द्वितीया | नाम | नामनी, नाम्नी | नामानि |
| तृतीया | नाम्ना | नामभ्याम् | नामभिः |
| चतुर्थी | नाम्ने | नामभ्याम् | नामभ्यः |
| पञ्चमी | नाम्नः | नामभ्याम् | नामभ्यः |
| षष्ठी | नाम्नः | नाम्नोः | नाम्नाम् |
| सप्तमी | नाम्नि, नामनि | नाम्नोः | नामसु |
| सम्बोधन | हे नाम!, नामन् ! | हे नाम्नी ! | हे नामानि ! |
ध्यातव्य - व्योमन् (आकाश), धामन् (घर, तेज), प्रेमन् (प्रेम), सामन् (सामवेद का मन्त्र) आदि नकारान्त नपुंसकलिंग शब्द हैं। इनके रूप 'नामनू' शब्द के समान चलते हैं।
(20) 'मनस्' सकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | मनः | मनसी | मनांसि |
| द्वितीया | मनः | मनसी | मनांसि . |
| तृतीया | मनसा | मनोभ्याम् | मनोभिः |
| चतुर्थी | मनसे | मनोभ्याम् | मनोभ्यः |
| पञ्चमी | मनसः | मनोभ्याम् | मनोभ्यः |
| षष्ठी | मनसः | मनसोः | मनसाम् |
| सप्तमी | मनसि | मनसोः | मनस्सु, मनःसु |
| सम्बोधन | हे मनः ! | हे मनसी ! | हे मनांसि ! |
ध्यातव्य- इसी प्रकार नभस् (आकाश), अम्भस् (पानी), उरस् (छाती), पयस् (दूध या पानी), रजस् (धूल), वयस् (उम्र), वक्षस् (छाती), अयस् (लोहा), तमस् (अन्धकार), वर्चस् (वचन), यशस् (कीर्ति), तेजस्, तपस्, शिरस्, सरस् (तालाब) इत्यादि सकारान्त नपुंसकलिंग शब्द हैं। इन सभी के रूप 'मनस्' के समान चलेंगे।
(21) 'वाच्' (वाणी) चकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | वाक्, वाग् | वाचौ | वाचः |
| द्वितीया | वाचम् | वाचौ | वाचः |
| तृतीया | वाचा | वाग्भ्याम् | वाग्भिः |
| चतुर्थी | वाचे | वाग्भ्याम् | वाग्भ्यः |
| पञ्चमी | वाचः | वाग्भ्याम् | वाग्भ्यः |
| षष्ठी | वाचः | वाचोः | वाचाम् |
| सप्तमी | वाचि | वाचोः | वाक्षु |
| सम्बोधन | हे वाक् ! | हे वाचौ ! | हे वाचः! |
(22) 'सरित्' तकारान्त शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | सरित् | सरितौ | सरितः |
| द्वितीया | सरितम् | सरितौ | सरितः |
| तृतीया | सरिता | सरिद्भ्याम् | सरिद्भिः |
| चतुर्थी | सरिते | सरिद्भ्याम् | सरिद्भ्यः |
| पञ्चमी | सरितः | सरिद्भ्याम् | सरिद्भ्यः |
| षष्ठी | सरितः | सरितोः | सरिताम् |
| सप्तमी | सरिति | सरितोः | सरित्सु |
| सम्बोधन | हे सरित् ! | हे सरितौ ! | हे सरितः ! |
ध्यातव्य- इसी प्रकार, विद्युत (बिजली), हरित् (हरा, घास, दिशा), योषित् (स्त्री) आदि तकारान्त शब्दों के रूप 'सरित्' के समान चलेंगे।
सर्वनाम शब्द
जो शब्द संज्ञा शब्दों के स्थान पर प्रयुक्त किये जाते हैं, वे सर्वनाम कहे जाते हैं; जैसे-सर्व, तद्, किम्, युष्मद्, अस्मद् आदि। युष्मद् और अस्मद् को छोड़कर सर्वनाम शब्दों के रूप तीनों लिंगों में अलग-अलग बनते हैं। विशेष - सर्वनाम शब्दों के सम्बोधन में रूप नहीं चलते हैं।
(1) 'सर्व' (सब) पुंल्लिग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | सर्वः | सर्वो | सर्वे |
| द्वितीया | सर्वम् | सर्वो | सर्वान् |
| तृतीया | सर्वेण | सर्वाभ्याम् | सर्वैः |
| चतुर्थी | सर्वस्मै | सर्वाभ्याम् | सर्वेभ्यः |
| पञ्चमी | सर्वस्मात् | सर्वाभ्याम् | सर्वेभ्यः |
| षष्ठी | सर्वस्य | सर्वयोः | सर्वेषाम् |
| सप्तमी | सर्वस्मिन् | सर्वयोः | सर्वेषु |
'सर्व' नपुंसकलिंग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | सर्वम् | सर्वे | सर्वाणि |
| द्वितीया | सर्वम् | सर्वे | सर्वाणि |
विशेष-शेष तृत्तीया से सप्तमी तक के रूप सर्व (पुंल्लिग) के समान चलेंगे।
'सर्व' स्त्रीलिंग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | सर्वा | सर्वे | सर्वाः |
| द्वितीया | सर्वाम् | सर्वे | सर्वाः |
| तृतीया | सर्वया | सर्वाभ्याम् | सर्वाभिः |
| चतुर्थी | सर्वस्यै | सर्वाभ्याम् | सर्वाभ्यः |
| पञ्चमी | सर्वस्याः | सर्वाभ्याम् | सर्वाभ्यः |
| षष्ठी | सर्वस्याः | सर्वयोः | सर्वासाम् |
| सप्तमी | सर्वस्याम् | सर्वयोः | सर्वासु |
(2) 'तत्' या तद् (वह) पुंल्लिग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | सः | तौ | ते |
| द्वितीया | तम् | तौ | तान् |
| तृतीया | तेन | ताभ्याम् | तैः |
| चतुर्थी | तस्मै | ताभ्याम् | तेभ्यः |
| पञ्चमी | तस्मात् | ताभ्याम् | तेभ्यः |
| षष्ठी | तस्य | तयोः | तेषाम् |
| सप्तमी | तस्मिन् | तयोः | तेषु |
'तद्' नपुंसकलिंग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | तत्, तद् | ते | तानि |
| द्वितीया | तत्, तद् | ते | तानि.. |
विशेष - शेष तृतीया से सप्तमी विभक्ति के रूप तद् (पुंल्लिग) के समान चलेंगे।
'तद्' स्त्रीलिंग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | सा | ते | ताः |
| द्वितीया | ताम् | ते | ताः |
| तृतीया | तया | ताभ्याम् | ताभिः |
| चतुर्थी | तस्यै | ताभ्याम् | ताभ्यः |
| पञ्चमी | तस्याः | ताभ्याम् | ताभ्यः |
| षष्ठी | तस्याः | तयोः | तासाम् |
| सप्तमी | तस्याम् | तयोः | तासु |
(3) 'यद्' (जो) पुंल्लिग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | यः | यौ | ये |
| द्वितीया | यम् | यौ | यान् |
| तृतीया | येन | याभ्याम् | यैः |
| चतुर्थी | यस्मै | याभ्याम् | येभ्यः |
| पञ्चमी | यस्मात् | याभ्याम् | येभ्यः |
| षष्ठी | यस्य | ययोः | येषाम् |
| सप्तमी | यस्मिन् | ययोः | येषु |
'यद्' नपुंसकलिंग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | यद्, यत् | ये | यानि |
| द्वितीया | यद्, यत् | ये | यानि |
'यद्' स्त्रीलिंग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | या | ये | याः |
| द्वितीया | याम् | ये | याः |
| तृतीया | यया | याभ्याम् | याभिः |
| चतुर्थी | यस्यै | याभ्याम् | याभ्यः |
| पञ्चमी | यस्याः | याभ्याम् | याभ्यः |
| षष्ठी | यस्याः | ययोः | यासाम् |
| सप्तमी | यस्याम् | ययोः | यासु |
(4) 'किम्' (क्या कौन) पुंल्लिग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | कः | कौ | के |
| द्वितीया | कम् | कौ | कान् |
| तृतीया | केन | काभ्याम् | कैः |
| चतुर्थी | कस्मै | काभ्याम् | केभ्यः |
| पञ्चमी | कस्मात् | काभ्याम् | केभ्यः |
| षष्ठी | कस्य | कयोः | केषाम् |
| सप्तमी | कस्मिन् | कयोः | केषु |
'किम्' नपुंसकलिंग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | किम् | के | कानि |
| द्वितीया | किम् | के | कानि |
विशेष-शेष तृतीया से सप्तमी विभक्ति तक के रूप किम् (पुंल्लिग) के समान चलेंगे।
'किम्' स्त्रीलिंग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | का | के | काः |
| द्वितीया | काम् | के | काः |
| तृतीया | कया | काभ्याम् | काभिः |
| चतुर्थी | कस्यै | काभ्याम् | काभ्यः |
| पञ्चमी | कस्याः | काभ्याम् | काभ्यः |
| षष्ठी | कस्याः | कयोः | कासाम् |
| सप्तमी | कस्याम् | कयोः | कासु |
(5) 'इदम्' (यह) पुंल्लिग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | अयम् | इमौ | इमे |
| द्वितीया | इमम्, एनम् | इमौ, एनौ | इमान्, एनान् |
| तृतीया | अनेन, एनेन | आभ्याम् | एभिः |
| चतुर्थी | अस्मै | आभ्याम् | एभ्यः |
| पञ्चमी | अस्मात् | आभ्याम् | एभ्यः |
| षष्ठी | अस्य | अनयोः, एनयोः | एषाम् |
| सप्तमी | अस्मिन् | अनयोः, एनयोः | एषु |
'इदम्' नपुंसकलिंग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | इदम् | इमे | इमानि |
| द्वितीया | इदम्, एनत् | इमे, एने | इमानि, एनानि |
विशेष-शेष तृतीया से सप्तमी विभक्ति तक के रूप इदम् (पुंल्लिग) के समान चलेंगे।
'इदम्' स्त्रीलिंग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | इयम् | इमे | इमाः |
| द्वितीया | इमाम्, एनाम् | इमे, एने | इमाः, एनाः |
| तृतीया | अनया, एनया | आभ्याम् | आभिः |
| चतुर्थी | अस्यै | आभ्याम् | आभ्यः |
| पञ्चमी | अस्याः | आभ्याम् | आभ्यः |
| षष्ठी | अस्याः | अनयोः, एनयोः | आसाम् |
| सप्तमी | अस्याम् | अनयोः, एनयोः | आसु |
(6) 'अस्मद्' (मैं, हम) उत्तमपुरुषवांची शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | अहम् | आवाम् | वयम् |
| द्वितीया | माम्, मा | आवाम्, नौ | अस्मान्, नः |
| तृतीया | मया | आवाभ्याम् | अस्माभिः |
| चतुर्थी | मह्यम्, मे | आवाभ्याम्, नौ | अस्मभ्यम्, नः |
| पञ्चमी | मत् | आवाभ्याम् | अस्मत् |
| षष्ठी | मम्, मे | आवयोः, नौ | अस्माकम्, नः |
| सप्तमी | मयि | आवयोः, नौ | अस्मासु |
(7) 'युष्मद्' (तू, तुम) मध्यमपुरुषवाची शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | त्वम् | युवाम् | यूयम् |
| द्वितीया | त्वाम्, त्वा | युवाम्, वाम् | युष्मान्, वः |
| तृतीया | त्वया | युवाभ्याम् | युष्माभिः |
| चतुर्थी | तुभ्यम्, ते | युवाभ्याम्, वाम् | युष्मभ्यम्, वः |
| पञ्चमी | त्वत् | युवाभ्याम् | युष्मत् |
| षष्ठी | तव, ते | युवयोः, वाम् | युष्माकम्, वः |
| सप्तमी | त्वयि | युवयोः, वाम् | युष्मासु |
संख्यावाचक विशेषण
(1) 'एक' से 'चतुर्' शब्द तक संख्या-वाचक शब्दों के रूप तीनों लिंगों में भिन्न-भिन्न चलते हैं। शेष संख्याओं के तीनों लिंगों में एक समान रूप होते हैं।
(2) 'एक' शब्द के एकवचन में, 'द्वि' शब्द के द्विवचन में और शेष संख्यावाचकों के बहुवचन में रूप चलते हैं।
(1) एकवचनान्त 'एक' शब्द
| विभक्ति | पुंल्लिग | नपुंसकलिंग | स्त्रीलिंग |
| प्रथमा | एकः | एकम् | एका |
| द्वितीया | एकम् | एकम् | एकाम् |
| तृतीया | एकेन | एकेन | एकया |
| चतुर्थी | एकस्मै | एकस्मै | एकस्यै |
| पञ्चमी | एकस्मात् | एकस्मात् | एकस्याः |
| षष्ठी | एकस्य | एकस्य | एकस्याः |
| सप्तमी | एकस्मिन् | एकस्मिन् | एकस्याम् |
(2) द्विवचनान्त 'द्वि' (दो) शब्द
| विभक्तिः | पुंल्लिग | नपुं०/स्त्री० |
| प्रथमा | द्वौ | द्वे |
| द्वितीया | द्वौ | द्वे |
| तृतीया | द्वाभ्याम् | द्वाभ्याम् |
| चतुर्थी | द्वाभ्याम् | द्वाभ्याम् |
| पञ्चमी | द्वाभ्याम् | द्वाभ्याम् |
| षष्ठी | द्वयोः | द्वयोः |
| सप्तमी | द्वयोः | द्वयोः |
(3) बहुवचनान्त 'त्रि' (तीन) शब्द
| विभक्ति | पुंल्लिग | नपुंसकलिंग | स्त्रीलिंग |
| प्रथमा | त्रयः | त्रीणि | तिस्रः |
| द्वितीया | त्रीन् | त्रीणि | तिस्रः |
| तृतीया | त्रिभिः | त्रिभिः | तिसृभिः |
| चतुर्थी | त्रिभ्यः | त्रिभ्यः | तिसृभ्यः |
| पञ्चमी | त्रिभ्यः | त्रिभ्यः | तिसृभ्यः |
| षष्ठी | त्रयाणाम् | त्रयाणाम् | तिसृणाम् |
| सप्तमी | त्रिषु | त्रिषु | तिसृषु |
(4) बहुवचनान्त 'चतुर्' (चार) शब्द
| विभक्ति | पुंल्लिग | नपुंसकलिंग | स्त्रीलिंग |
| प्रथमा | चत्वारः | चत्वारि | चतस्रः |
| द्वितीया | चतुरः | चत्वारि | चतस्रः |
| तृतीया | चतुर्भिः | चतुर्भिः | चतसृभिः |
| चतुर्थी | चतुर्थ्यः | चतुर्थ्यः | चतसृभ्यः |
| पञ्चमी | चतुर्थ्यः | चतुर्थ्यः | चतसृभ्यः |
| षष्ठी | चतुर्णाम्, चतुर्णाम् | चतुर्णाम् | चतसृणाम् |
| सप्तमी | चतुर्षु | चतुर्षु | चतसृषु |
पुंल्लिग, नपुंसकलिंग तथा स्त्रीलिंग में एकसमान
| विभक्ति | (5) 'पञ्चन्' | (6) 'षट्' |
| प्रथमा | पञ्च | षट्, षड् |
| द्वितीया | पञ्च | षट्, षड् |
| तृतीया | पञ्चभिः | षद्भिः |
| चतुर्थी | पञ्चभ्यः | षड्भ्यः |
| पञ्चमी | पञ्चभ्यः | षड्भ्यः |
| षष्ठी | पञ्चानाम् | षण्णाम् |
| सप्तमी | पञ्चसु | षट्सु, षटत्सु |
| विभक्ति | (7) 'सप्तन्' (सात) | (8) 'अष्टन्' (आठ) |
| प्रथमा | सप्त | अष्टौ, अष्ट |
| द्वितीया | सप्त | अष्टौ, अष्ट |
| तृतीया | सप्तभिः | अष्टभिः, अष्टाभिः |
| चतुर्थी | सप्तभ्यः | अष्टभ्यः, अष्टाभ्यः |
| पञ्चमी | सप्तभ्यः | अष्टभ्यः, अष्टाभ्यः |
| षष्ठी | सप्तानाम् | अष्टनाम्, अष्टानाम् |
| सप्तमी | सप्तसु | अष्टसु, अष्टासु |
| विभक्ति | (9) 'नवन्' (नौ) | (10) 'दशन्' (दस) |
| प्रथमा | नव | दश |
| द्वितीया | नव | दश |
| तृतीया | नवभिः | दशभिः |
| चतुर्थी | नवभ्यः | दशभ्यः |
| पञ्चमी | नवभ्यः | दशभ्यः |
| षष्ठी | नवानाम् | दशानाम् |
| सप्तमी | नवसु | दशंसु |
ध्यातव्य - (1) सभी नकारान्तवाची (एका-दशन् से अष्टादशन्) शब्दों के रूप 'पञ्चन्' शब्द के समान तीनों लिंगों में एकसमान चलते हैं।
(2) एकोनविंशतिः (19) से लेकर सभी संख्यावाची शब्दों के रूप स्त्रीलिंग और एकवचन में ही होते हैं।
(3) इकारान्त स्त्रीलिंग (एकोनविंशतिः आदि) संख्यावाची शब्दों के रूप 'मति' के समान चलते हैं।
(4) 'शत्' अन्त वाले (त्रिंशत्, चत्वारिंशत्, पञ्चाशत्) संख्यावाची शब्दों के रूप 'विपद्' शब्द के समान चलते हैं।
(5) षष्टिः, सप्ततिः, अशीतिः, नवतिः आदि सभी इकारान्त शब्दों के रूप 'मति' के समान चलते हैं।
एक से सौ तक संख्यावाची शब्द
1. एकः, एकम्, एका
2. द्वौ, द्वे, द्वे
3. त्रयः त्रीणि, तिस्स्रः
4. चत्वारः, चत्वारि, चतस्रः
5. पञ्च
6. षट्, षड्
7. सप्त
8. अष्टौ, अष्ट
9. नव
10. दश
11. एकादश
12. द्वादश
13. त्रयोदश
14. चतुर्दश
15. पञ्चदश
16. षोडश
17. सप्तदश
118. अष्टादश
19. नवदश, एकोनविंशतिः, एकान्नविंशति, ऊनविंशतिः
20. विंशतिः
21. एकविंशतिः
22. द्वाविंशतिः
23. त्रयोविंशतिः
24. चतुर्विंशतिः
25. पञ्चविंशतिः
26. षड्विंशतिः
27. सप्तविंशतिः
28. अष्टाविंशतिः
29. एकोनत्रिंशत्, एकान्नत्रिंशत्, ऊनत्रिंशत्, नवविंशतिः
30. त्रिंशत्
31. एकत्रिंशत्
32. द्वात्रिंशत्
33. त्रयस्त्रिंशत्
34. चतुस्त्रिंशत्
35. पञ्चत्रिंशत्
36. षट्त्रिंशत्
37. सप्तत्रिंशत्
38. अष्टात्रिंशत्
39. नवत्रिंशत्, ऊनचत्वारिंशत्, एकोनचत्वारिंशत्, एकान्नचत्वारिंशत्
40. चत्वारिंशत्
41. एकचत्वारिंशत्
42. द्वाचत्वारिंशत्, द्विचत्वारिंशत्
43. त्रयश्चत्वारिंशत्, त्रिचत्वारिंशत्
44. चतुश्चत्वारिंशत्
45. पञ्चचत्वारिंशत्
46. षट्चत्वारिंशत्
47. सप्तचत्वारिंशत्
48. अष्टचत्वारिंशत्, अष्टाचत्वारिंशत्
49. नवचत्वारिंशत्, ऊनपञ्चाशत्, एकोनपञ्चाशत्, एकान्नपञ्चाशत्
64. चतुष्षष्टिः
65. पञ्चषष्टिः
66. षट्षष्टिः
67. सप्तषष्टिः
68. अष्टषष्टिः, अष्टाषष्टिः
69. नवषष्टिः, ऊनसप्ततिः, एकोनसप्ततिः, एकान्नसप्ततिः
70. सप्ततिः
71. एकसप्ततिः
72. द्विसप्ततिः, द्वासप्ततिः
73. त्रिसप्ततिः, त्रयस्सप्ततिः
74. चतुस्सप्ततिः
75. पञ्चसप्ततिः
76. षट्सप्ततिः
77. सप्तसप्ततिः
78. अष्टसप्ततिः, अष्टासप्ततिः
79. नवसप्ततिः, ऊनाशीतिः, एकोनाशीतिः, एकान्नाशीतिः
80. अशीतिः
81. एकाशीतिः
82. द्वयशीतिः
83. त्र्यशीतिः
84. चतुरशीतिः
85. पञ्चाशीतिः
86. षडशीतिः
87. सप्ताशीतिः
88. अष्टाशीतिः
89. नवाशीतिः, ऊननवतिः, एकोननवतिः, एकान्ननवतिः ।
90. नवतिः
91. एकनवतिः
92. द्विनवतिः, द्वानवतिः
93. त्रिनवतिः त्रयोनवतिः
Question 1. 'राम' शब्द रूप कैसा है?
(क) अकारान्त
(ख) मकारान्त
(ग) आकारान्त
(घ) इकारान्त
Answer: (क) अकारान्त
In simple words: 'राम' शब्द अकारान्त होता है, जिसका अर्थ है कि यह 'अ' स्वर से समाप्त होता है।
🎯 Exam Tip: शब्द रूपों के प्रकार (जैसे अकारान्त, इकारान्त) को समझना मूल शब्दों के सही विभक्तियों को पहचानने की कुंजी है।
Question 2. 'राम' शब्द का तृतीया बहुवचन में रूप होता है-
(क) रामेभ्यः
(ख) रामेण
(ग) रामाभ्याम्
(घ) रामैः
Answer: (घ) रामैः
In simple words: 'राम' शब्द का तृतीया विभक्ति, बहुवचन में रूप 'रामैः' होता है।
🎯 Exam Tip: तृतीया बहुवचन के रूप प्रायः 'भिः' प्रत्यय से बनते हैं, लेकिन अकारान्त शब्दों में विशेष रूप से 'ऐः' प्रत्यय का प्रयोग होता है।
Question 3. 'रामाय' शब्द किस विभक्ति और किस वचन का रूप है?
(क) पञ्चमी और एकवचन :
(ख) षष्ठी और द्विवचन
(ग) चतुर्थी और बहुवचन
(घ) चतुर्थी और एकवचन
Answer: (घ) चतुर्थी और एकवचन
In simple words: 'रामाय' शब्द 'राम' का चतुर्थी विभक्ति, एकवचन का रूप है, जिसका अर्थ 'राम के लिए' होता है।
🎯 Exam Tip: चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग संप्रदान कारक में होता है, जिसका अर्थ 'के लिए' या 'को' (देने के अर्थ में) होता है।
Question 4. हरि शब्द का रूप किसकी भाँति चलेगा?
(क) दधि की
(ख) मति की ।
(ग) वारि की
(घ) मुनि की
Answer: (घ) मुनि की
In simple words: 'हरि' एक इकारान्त पुंल्लिग शब्द है, इसलिए इसका रूप 'मुनि' जैसे अन्य इकारान्त पुंल्लिग शब्दों की तरह चलता है।
🎯 Exam Tip: समान स्वरान्त या व्यंजनान्त वाले शब्दों के रूप एक जैसे चलते हैं, जिससे उन्हें याद रखना आसान हो जाता है।
Question 5. हरौ' शब्द किस विभक्ति और किस वचन का रूप है?
(क) प्रथमा और द्विवचन का
(ख) सप्तमी और एकवचन का
(ग) द्वितीया और द्विवचन को ।
(घ) षष्ठी और द्विवचन का
Answer: (ख) सप्तमी और एकवचन का
In simple words: 'हरौ' शब्द 'हरि' का सप्तमी विभक्ति, एकवचन का रूप है।
🎯 Exam Tip: सप्तमी विभक्ति अधिकरण कारक को दर्शाती है और इसका अर्थ 'में' या 'पर' होता है।
Question 6. 'गुरु' शब्द का द्वितीया द्विवचन में रूप होगा
(क) गुरौ
(ख) गुरोः ।
(ग) गुरवः
(घ) गुरू
Answer: (घ) गुरू
In simple words: 'गुरु' शब्द (उकारान्त पुंल्लिग) का द्वितीया विभक्ति, द्विवचन में रूप 'गुरू' होता है।
🎯 Exam Tip: उकारान्त शब्दों के द्विवचन रूपों में अक्सर दीर्घ 'ऊ' ध्वनि आती है, जैसे 'गुरू' या 'भानू'।
Question 7. 'गुरवः' शब्द किस विभक्ति और किस वचन का रूप है?
(क) सप्तमी और द्विवचन का ।
(ख) चतुर्थी और एकवचन का
(ग) प्रथमा और बहुवचनं का
(घ) द्वितीया और बहुवचन का
Answer: (ग) प्रथमा और बहुवचनं का
In simple words: 'गुरवः' शब्द 'गुरु' का प्रथमा विभक्ति, बहुवचन का रूप है, जिसका अर्थ 'अनेक गुरु' होता है।
🎯 Exam Tip: बहुवचन रूप पहचानने से वाक्य में क्रिया और कर्ता के बीच सही समन्वय स्थापित करने में मदद मिलती है।
Question 8. 'रमा' शब्द किस प्रकार का है?
(क) अकारान्त स्त्रीलिंग
(ख) आकारान्त स्त्रीलिंग
(ग) अकारान्त पुंल्लिग
(घ) आकारान्त पुंल्लिग
Answer: (ख) आकारान्त स्त्रीलिंग
In simple words: 'रमा' शब्द 'आ' स्वर से समाप्त होता है और स्त्रीलिंग है, इसलिए यह एक आकारान्त स्त्रीलिंग शब्द है।
🎯 Exam Tip: आकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के रूप 'रमा' की तरह ही चलते हैं, जैसे 'माला', 'लता' आदि।
Question 9. 'रमाभिः' शब्द किस विभक्ति और किस वचन का रूप है?
(क) चतुर्थी और बहुवचन का
(ख) पञ्चमी और बहुवचन का
(ग) तृतीया और बहुवचन का।
(घ) द्वितीया और बहुवचन का।
Answer: (ग) तृतीया और बहुवचन का।
In simple words: 'रमाभिः' शब्द 'रमा' का तृतीया विभक्ति, बहुवचन का रूप है।
🎯 Exam Tip: स्त्रीलिंग शब्दों के तृतीया बहुवचन में अक्सर 'भिः' प्रत्यय का प्रयोग होता है।
Question 10. 'रमा' शब्द का षष्ठी द्विवचन का रूप होगा-
(क) रमायाः
(ख) रमयोः (ग) रमायै (घ) रमया
Answer: (ख) रमयोः
In simple words: 'रमा' शब्द का षष्ठी विभक्ति, द्विवचन में रूप 'रमयोः' होता है।
🎯 Exam Tip: षष्ठी विभक्ति संबंध कारक को दर्शाती है और इसका अर्थ 'का, के, की' होता है।
Question 11. 'मति' शब्द का रूप किसके समान नहीं चलेगा
(क) सम्पत्ति के
(ख) सरित् के
(ग) नीति के
(घ) भक्ति के
Answer: (ख) सरित् के
In simple words: 'मति' एक इकारान्त स्त्रीलिंग शब्द है, जबकि 'सरित्' एक तकारान्त स्त्रीलिंग शब्द है, इसलिए 'सरित्' का रूप 'मति' के समान नहीं चलेगा।
🎯 Exam Tip: शब्द रूपों का निर्धारण मुख्य रूप से उनके अंतिम स्वर या व्यंजन (अजन्त/हलन्त) और उनके लिंग पर निर्भर करता है।
Question 12. 'मत्योः' शब्द रूप की विभक्ति और वचन है
(क) सप्तमी और द्विवचन
(ख) पञ्चमी और एकवचन
(ग) चतुर्थी और एकवचन ।
(घ) षष्ठी और एकवचन
Answer: (क) सप्तमी और द्विवचन
In simple words: 'मत्योः' शब्द 'मति' का षष्ठी द्विवचन या सप्तमी द्विवचन का रूप है।
🎯 Exam Tip: कुछ शब्द रूपों में एक ही रूप भिन्न-भिन्न विभक्तियों और वचनों में पाया जा सकता है, जिन्हें संदर्भ से समझना महत्वपूर्ण होता है।
Question 13. द्वितीया विभक्ति के द्विवचन में 'मति' शब्द का रूप होगा
(क) मत्योः
(ख) मती
(ग) मत्यौ
घ) मत्यै
Answer: (ख) मती
In simple words: 'मति' शब्द का द्वितीया विभक्ति, द्विवचन में रूप 'मती' होता है।
🎯 Exam Tip: इकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के द्वितीया द्विवचन रूपों में प्रायः 'ई' की ध्वनि आती है, जैसे 'मती', 'बुद्धी'।
Question 14. 'वाच्' शब्द कैसा है?
(क) हलन्त पुंल्लिगे ।
(ख) चकारान्त स्त्रीलिंग ।
(ग) चकारान्त पुंल्लिग
(घ) चकारान्त नपुंसकलिंग ।
Answer: (ख) चकारान्त स्त्रीलिंग ।
In simple words: 'वाच्' शब्द 'च' व्यंजन पर समाप्त होता है और स्त्रीलिंग है, इसलिए यह एक चकारान्त स्त्रीलिंग शब्द है।
🎯 Exam Tip: हलन्त (व्यंजनान्त) शब्दों के रूप थोड़े जटिल होते हैं और इन्हें उनके अंतिम व्यंजन के आधार पर पहचाना जाता है।
Question 15. सप्तमी बहुवचन में 'वाच्' शब्द का क्या रूप होगा? ।
(क) वाचशु
(ख) वाचषु
(ग) वाचसु
(घ) वाक्षु
Answer: (घ) वाक्षु
In simple words: 'वाच्' शब्द का सप्तमी विभक्ति, बहुवचन में रूप 'वाक्षु' होता है।
🎯 Exam Tip: हलन्त शब्दों के सप्तमी बहुवचन में 'सु' या 'षु' प्रत्यय का प्रयोग होता है, जो संधि नियमों के अनुसार बदल सकता है।
Question 16. 'वाच्' शब्द का प्रथमा विभक्ति और एकवचन का रूप होगा
(क) वाचः
(ख) वाणी
(ग) वाक् (घ) वाचम्
Answer: (ग) वाक्
In simple words: 'वाच्' शब्द का प्रथमा विभक्ति, एकवचन में रूप 'वाक्' (या वाग्) होता है।
🎯 Exam Tip: व्यंजन संधि के नियमों के कारण प्रथमा एकवचन में मूल शब्द के अंतिम व्यंजन में परिवर्तन हो सकता है।
Question 17. 'सर्व' नपुंसकलिंग शब्द का तृतीया बहुवचन में क्या रूप होगा?
(क) सर्वैः (ख) सर्वस्यै । (ग) स्वर से पहले (घ) सर्वेभ्यः
Answer: (क) सर्वैः
In simple words: 'सर्व' नपुंसकलिंग शब्द का तृतीया बहुवचन में रूप 'सर्वैः' होता है, जो पुंल्लिग के समान ही है।
🎯 Exam Tip: सर्वनाम शब्दों में नपुंसकलिंग के रूप अक्सर प्रथमा और द्वितीया को छोड़कर पुंल्लिग के समान होते हैं।
Question 18. 'तद्' नपुंसकलिंग का द्वितीया बहुवचन में क्या रूप होगा?
(क) तान्
(ख) तानि
(ग) ते ।
(घ) ताः
Answer: (ख) तानि
In simple words: 'तद्' नपुंसकलिंग शब्द का द्वितीया बहुवचन में रूप 'तानि' होता है।
🎯 Exam Tip: नपुंसकलिंग शब्दों के प्रथमा और द्वितीया बहुवचन में 'अनि' प्रत्यय का प्रयोग होता है।
Question 19. 'नौ' किस शब्द और वचन का रूप है?
(क) न शब्द, प्रथमा, द्विवचन ।
(ख) अस्मद् शब्द, द्वितीया, द्विवचन
(ग) नव शब्द, चतुर्थी, द्विवचन
(घ) नो शब्द, द्वितीया, द्विवचन
Answer: (ख) अस्मद् शब्द, द्वितीया, द्विवचन
In simple words: 'नौ' शब्द 'अस्मद्' (मैं) सर्वनाम का द्वितीया विभक्ति, द्विवचन का वैकल्पिक रूप है, जिसका अर्थ 'हम दोनों को' होता है।
🎯 Exam Tip: सर्वनामों के वैकल्पिक रूप (जैसे 'मा', 'मे', 'नौ') संस्कृत भाषा में सामान्य हैं और इन्हें विशेष रूप से याद रखना चाहिए।
Question 20. 'अस्मद्' शब्द का इनमें से सही रूप कौन-सा है?
(क) मयी
(ख) माम
(ग) मम
(घ) मम्
Answer: (ग) मम
In simple words: 'अस्मद्' (मैं) सर्वनाम का षष्ठी विभक्ति, एकवचन में रूप 'मम' होता है, जिसका अर्थ 'मेरा' होता है।
🎯 Exam Tip: 'अस्मद्' और 'युष्मद्' के रूप तीनों लिंगों में समान रहते हैं और इन्हें प्रायः याद कर लेना चाहिए।
Question 21. 'त्वम्' किस शब्द और वचन का रूप है?
(क) तू शब्द और प्रथमा एकवचन का
(ख) युष्मद् शब्द और प्रथमा एकवचन का
(ग) अस्मद् शब्द और प्रथमा एकवचन का
(घ) स शब्द और तृतीया एकवचन का
Answer: (ख) युष्मद् शब्द और प्रथमा एकवचन का
In simple words: 'त्वम्' शब्द 'युष्मद्' (तुम) सर्वनाम का प्रथमा विभक्ति, एकवचन का रूप है, जिसका अर्थ 'तुम' होता है।
🎯 Exam Tip: 'युष्मद्' और 'अस्मद्' सर्वनामों के प्रथमा एकवचन के रूप वाक्यों की शुरुआत में कर्ता के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
Question 22. 'युष्मद्' का द्वितीया बहुवचन में कौन-सा रूप होगा?
(क) त्वाम्
(ख) युष्मान् (ग) यूयम् (घ) युवाम्
Answer: (ख) युष्मान्
In simple words: 'युष्मद्' (तुम) सर्वनाम का द्वितीया विभक्ति, बहुवचन में रूप 'युष्मान्' होता है, जिसका अर्थ 'तुम सबको' होता है।
🎯 Exam Tip: द्वितीया विभक्ति कर्म कारक को दर्शाती है और इसका अर्थ 'को' होता है।
Question 23. 'अस्मद्' शब्द का' अस्मत्' रूप किस विभक्ति और वचन में बनता है?
(क) प्रथमा बहुवचन में ।
(ख) षष्ठी एकवचन में ।
(ग) पञ्चमी बहुवचन में
(घ) सप्तमी एकवचन में
Answer: (ग) पञ्चमी बहुवचन में
In simple words: 'अस्मत्' शब्द 'अस्मद्' (मैं) सर्वनाम का पञ्चमी विभक्ति, बहुवचन का रूप है, जिसका अर्थ 'हम सबसे' (अलग होने के अर्थ में) होता है।
🎯 Exam Tip: पञ्चमी विभक्ति अपादान कारक को दर्शाती है और इसका अर्थ 'से' (अलग होने के अर्थ में) होता है।
Question 24. 'तद्' सर्वनाम नपुंसकलिंग का' तस्मै' रूप बनता है
(क) प्रथमा में
(ख) चतुर्थी में
(ग) पञ्चमी में
(घ) सप्तमी में
Answer: (ख) चतुर्थी में
In simple words: 'तस्मै' शब्द 'तद्' सर्वनाम का चतुर्थी विभक्ति, एकवचन का रूप है, जिसका प्रयोग पुंल्लिग और नपुंसकलिंग दोनों में होता है।
🎯 Exam Tip: सर्वनामों के रूप याद करते समय उनके लिंग और वचन के अनुसार होने वाले परिवर्तनों पर विशेष ध्यान दें।
Question 25. 'वाग्भिः' रूप किस विभक्ति के किस वचन का है? ।
(क) तृतीया के बहुवचन का।
(ख) चतुर्थी के द्विवचन का।
(ग) षष्ठी के द्विवचन का
(घ) सप्तमी के एकवचन का
Answer: (क) तृतीया के बहुवचन का।
In simple words: 'वाग्भिः' शब्द 'वाच्' (वाणी) का तृतीया विभक्ति, बहुवचन का रूप है।
🎯 Exam Tip: तृतीया बहुवचन में 'भिः' प्रत्यय का प्रयोग होता है, जो हलन्त शब्दों के साथ संधि नियमों के कारण बदल सकता है।
Question 26. 'युष्मत्' रूप किस विभक्ति के किस वचन का है?
(क) पञ्चमी के बहुवचन का
(ख) षष्ठी के एकवचन का
(ग) सप्तमी के द्विवचन का न का
(घ) षष्ठी के द्विवचन का ।
Answer: (क) पञ्चमी के बहुवचन का
In simple words: 'युष्mत्' शब्द 'युष्mद्' (तुम) सर्वनाम का पञ्चमी विभक्ति, बहुवचन का रूप है, जिसका अर्थ 'तुम सबसे' होता है।
🎯 Exam Tip: 'युष्mद्' और 'अस्मद्' के पञ्चमी बहुवचन रूप 'युष्mत्' और 'अस्मत्' होते हैं।
Question 27. 'अस्मद्' शब्द कामया' रूप बनता है
(क) द्वितीया विभक्ति में
(ख) चतुर्थी विभक्ति में
(ग) पञ्चमी विभक्ति में ।
(घ) तृतीया विभक्ति में
Answer: (घ) तृतीया विभक्ति में
In simple words: यदि 'कामया' शब्द 'मया' का एक त्रुटिपूर्ण रूप है, तो 'मया' शब्द 'अस्मद्' सर्वनाम का तृतीया विभक्ति, एकवचन का रूप है, जिसका अर्थ 'मेरे द्वारा' होता है।
🎯 Exam Tip: विभक्ति और वचन के आधार पर शब्दों के अंत में लगने वाले प्रत्ययों को ध्यानपूर्वक समझें।
Question 28. 'ऊननवतिः' संख्यावाची शब्द का मान है
(क) 89 (ख) 91 (ग) 99 (घ) 79
Answer: (क) 89
In simple words: 'ऊननवतिः' का अर्थ 'नब्बे में एक कम' होता है, इसलिए इसका मान 89 है।
🎯 Exam Tip: संस्कृत संख्याओं को समझने के लिए 'ऊन' (कम) और 'अधिक' (ज्यादा) जैसे उपसर्गों पर ध्यान दें।
Question 29. 'षष्णवतिः' संख्यावाची शब्द का मान है
(क) 96
(ख) 69
(ग) 99
(घ) 59
Answer: (क) 96
In simple words: 'षष्णवतिः' का अर्थ 'छह और नब्बे' होता है, इसलिए इसका मान 96 है।
🎯 Exam Tip: बड़ी संख्याओं को बनाने के लिए इकाई और दहाई के अंकों के संस्कृत नामों का सही संयोजन महत्वपूर्ण है।
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