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Detailed Chapter 16 अंतरिक्ष विज्ञानम UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit
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Chapter 16 अंतरिक्ष विज्ञानम Answers & Solutions for Class 9 Sanskrit (UP Board)
Up Board Class 9 Sanskrit Chapter 16 Antariksh - Vigyanam Question Answer (गद्य - भारती)
कक्षा 9 संस्कृत पाठ 16 हिंदी अनुवाद अन्तरिक्ष-विज्ञानम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड
पाठ-सारांश
अन्तरिक्ष-प्रकृति के विधान में बहुवर्णी शाटिका को पहने पृथ्वी जिस प्रकार मानवों को नदी-नद-पर्वत-रत्नरूपमयी अपनी विशाल सम्पत्ति से मोह लेती है, उसी प्रकार विशाल, अनन्त, निःसीम और ब्रह्मस्वरूपात्मक अन्तरिक्ष भी मानवों को आकृष्ट करता है। अनन्त आकाश में असंख्य नक्षत्र, पुच्छल तारे, नीहारिकाएँ, ग्रह, उपग्रह, सूर्य, चन्द्रमा, सप्तर्षि, 27 नक्षत्र और राशियाँ हैं, जो इसकी चकाचौंध को स्पष्ट करती हैं।
सौर-साम्राज्य-आकाश में स्थित सौर-साम्राज्य में एक सूर्य, नौ ग्रह, 28 उपग्रह, अनेक ग्रहकणिकाएँ, हजारों धूमकेतु और अनेक उल्काएँ हैं। ये ग्रह-कणिकाएँ मंगल और बृहस्पति नक्षत्र के बीच बिखरी हुई हैं। धूमकेतु ग्रहों और उपग्रहों से भिन्न होते हैं। छोटे-छोटे टिमटिमाते हुए प्रकाशबिन्दु तारा हैं। भीषण गर्मी और जलाभाव के कारण प्राणियों का यहाँ रहना असम्भव है।
सूर्य-सूर्य थाली के आकार का दिखाई देता हुआ भी वैसा नहीं है। यह पृथ्वी से तेरह लाख गुना बड़ा है तथा पृथ्वी से इसकी दूरी नौ करोड़ तीस लाख मील है। चन्द्रमा भी सूर्य जैसा ही दिखाई पड़ता है किन्तु वह पृथ्वी से भी बहुत छोटा है। नक्षत्र सूर्य की अपेक्षा बड़े होते हैं, परन्तु छोटे-छोटे दिखाई देते हैं। इसका कारण यह है कि जो वस्तु जितनी दूर होती है वह उतनी ही छोटी दिखाई देती है। सूर्य यदि क्षणभर के लिए भी अपने आकर्षण को रोक ले तो सभी ग्रह और उपग्रह आपस में टकराकर गिर पड़ेगे और पृथ्वी तो चूर्ण-चूर्ण हो जाएगी। यदि सूर्य अपना प्रकाश और ताप देना बन्द कर दे तो सभी जड़-चेतन का विनाश हो जाये। यही कारण है कि सूर्य हमारा महान उपकारक है।
सप्तर्षि और ध्रुव की स्थिति-उत्तरी दिशा में सप्तर्षि तारे हल के आकार में चमकते हैं। तीन तारे ऊपर पूँछ के रूप में तथा शेष चार नीचे चमकते हैं। इन्हीं के पास ध्रुव तारा भी चमकता है।
धूमकेतु-एक फुच्छल तारा (धूमकेतु) उत्तर की ओर देखा गया था। दूसरा धूमकेतु में दिखाई दिया। धूमकेतु की पूँछ अत्यन्त विशाल और भाप से बनी होती है। यह सौर-साम्राज्य के परिवार का नहीं है। यदि यह कभी सौर-साम्राज्य की सीमा में प्रवेश कर जाता है तो सूर्य इसे बलात् खींचकर घुमा देता है। इसे अपशकुन का द्योतक माना जाता है।
उल्काएँ-गहन रात्रि में जब आकाश स्वच्छ होता है, उस समय बाण के आकार का चकाचौंध करने वाला प्रकाश आकाश को चीरता हुआ वेग से दूर तक दौड़कर लुप्त हो जाता है। लोग इसे 'लूक टूटना' कहते हैं और इसे देखने पर फूलों का नाम लेकर या थूककर सम्भावित अनिष्ट का निवारण करते हैं। वास्तव में उल्काएँ इकट्ठी होकर इधर-उधर घूमती हैं। जब ये पृथ्वी की सीमा में पहुँचती हैं। तब वायुमण्डल से घर्षण करके जलती हुई फैलती हैं और फिर नष्ट हो जाती हैं। कुछ अधजली अवस्था में भूमि पर भी गिर जाती हैं। ऐसी उल्काएँ. कलकत्ता के संग्रहालय में रखी हुई हैं।
चन्द्रमा-चन्द्रमा सभी नक्षत्रों में पृथ्वी के अधिक समीप है। इसकी कलाएँ घटती-बढ़ती रहती हैं। चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर चक्कर काटता रहता है और 28 दिन में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा कर लेता है। चन्द्रमा की कलाओं से तिथियों और महीनों का निर्माण होता है। चन्द्रमा सूर्य से प्रकाशित होता है। जब वह सूर्य और पृथ्वी के मध्य में आ जाता है, तब ग्रहण होता है। चन्द्रमा के जिस भाग पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है, वह कला रूप में दिखाई देता है और वही प्रकाश क्रम से घटता-बढ़ता रहता है। अमावस्या के दिन चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वी के मध्य में होता है। उसका जो भाग सूर्य के सामने होता है, वह प्रकाशमान होता है और वह भाग पृथ्वी पर दिखाई नहीं देता। पूर्णिमा के दिन पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा के मध्य में होती है, उस समय सम्पूर्ण चन्द्रमा प्रकाशमान दिखाई देता है।
नीहारिकाएँ-आकाश में विशाल आकार के वाष्पीय पदार्थों के जो समूह दिखाई देते हैं, वे नीहारिकाएँ हैं। रात के समय आकाश के बीच से सड़क बनाता हुआ-सा प्रकाश दिखाई पड़ता है। आकाश में बहुत-सी नीहारिकाएँ हैं, ये ऊँची-नीची बड़े आकार की, गोल आकार की और कुण्डली के आकार की होती हैं। एक नीहारिका सूर्य से दस खरब गुनी बड़ी होती है। बड़ी नीहारिका स्वयं में एक बड़ा ब्रह्माण्ड होती है। नीहारिका में असंख्य तारे होते हैं। इसे आकाश-गंगा भी कहते हैं।
नौ ग्रह-आधुनिक वैज्ञानिक सूर्य के बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, वरुण, वारुणी और यम ये नौ ग्रह बताते हैं। भारतीय ज्योतिषी सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु को नौ ग्रह कहते हैं।
शोंगयां का ससन्दर्भ अनुवाद
(1) प्रकृतेः विधाने यत्र इयं वसुन्धरा विभिन्नेषु रूपेषु बहुवर्णिकां शाटिकां परिधाय स्वकीयया विशालया नदी-वन-पर्वत-रत्न-रूपया सम्पत्तया मानवानां मनो मोहयति, तथैव विशालमिदमन्तरिक्षं निःसीमकमनन्तं हिरण्यगर्भात्मकं चास्ति । अस्मिन्ननन्ते आकाशे अनन्तानि नक्षत्राणि, पुच्छलताराः, नीहारिकाः, ग्रहाः, उपग्रहाः, आदित्याः, चन्द्रमाः, सप्तर्षयः, सप्तविंशतिनक्षत्राणि संवत्सरप्रवर्तकाः राशयः विलीनाः चाकचिक्यं प्रकटयन्ति ।
शब्दार्थ बहुवर्णिकां = अनेक रंगों की । शाटिकां = साड़ी । परिधाय = पहनकर । निः सीमकम् = सीमारहित । हिरण्यगर्भात्मकम् = ब्रह्मस्वरूपात्मक। आदित्याः = सूर्य । सप्तविंशति = सत्ताइस । विलीनाः = समायी हुई । चाकचिक्यम् = चकाचौंधं । प्रकटयन्ति = प्रकट करती है ।
सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत गद्य-भारती' में संकलित । 'अन्तरिक्ष-विज्ञानम्' पाठ से उद्धृत किया गया है। [संकेत-इस पाठ के शेष गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा ।] । प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में अन्तरिक्ष की विशालता एवं पृथ्वी की विचित्रता बतायी गयी है।
अनुवाद प्रकृति के विधान में जहाँ यह पृथ्वी विभिन्न रूपों में बहुरंगी साड़ी पहनकर नदी, वन, पर्वत, रत्नरूप अपनी विशाल सम्पत्ति से मानवों के मन को मोह लेती है, उसी प्रकार यह विशाल अन्तरिक्ष असीम, अनन्त और ब्रह्मस्वरूप वाला है। इस अनन्त आकाश में असंख्य नक्षत्र, पुच्छल तारे, आकाश-गंगाएँ, ग्रह, उपग्रह, सूर्य, चन्द्रमा, सप्तर्षि, तारे, सत्ताइस नक्षत्र, संवत्सरों की प्रवर्तक राशियाँ विलीन होकर चकाचौंध प्रकट करती हैं।
(2) कैवले सौरसाम्राज्ये एकः आदित्यः, तस्य नवग्रहाः अष्टाविंशत्युपग्रहान सन्ति । अनेकाः ग्रहकणिकाः सहस्रं धूम्रकेतवः तथैव अनन्ता उल्काश्च समुपलभ्यन्ते। ग्रहकणिकाः, मङ्गलबृहस्पतिनक्षत्रयोरन्तरले विकीर्णाः सन्ति । ताः लघ्व्यः सन्ति, उल्काश्च ततोऽपि अतिलघ्व्यः । धूम्रकेतवः ग्रहेभ्यः उपग्रहेभ्यश्च भिन्नाः भवन्ति । ते परिमाणेन लघवः आकाशे इतस्ततः विकीर्णाः सन्ति । अल्पीयांसं प्रकाशबिन्दु ध्रियमाणाः टिमटिमायन्ते तास्तास्ताराः । तत्र भीषणमौष्ण्यं जलाभावश्चातः प्राणिनां निःश्वसनमसम्भवम् ।
शब्दार्थ अष्टाविंशत्युपग्रहाः = अट्ठाइस उपग्रह । ग्रहकणिकाः = छोटे-छोटे ग्रह के कण (टुकड़े)। समुपलभ्यन्ते = प्राप्त होती हैं। अन्तराले = मध्य में। विकीर्णाः = फैली हुई । लघ्व्यः = छोटी-छोटी । इतस्ततः = इधर-उधर । अल्पीयांसम् = थोड़ी-सी। ध्रियमाणाः = धारण करते हुए। औष्ण्यम् = गर्मी । निवसनम् = रहना।
प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में सौर-मण्डल का वर्णन किया गया है।
अनुवाद केवल सौर-मण्डल में एक सूर्य, उसके नौ ग्रह, अट्ठाइस उपग्रह हैं। अनेक छोटे-छोटे ग्रह, हजारों धूमकेतु और उसी प्रकार अनन्त उल्काएँ पायी जाती हैं। ग्रह-कणिकाएँ मंगल और बृहस्पति नक्षत्रों के मध्य में फैली हैं। वे बहुत छोटी हैं और उल्काएँ उनसे भी अधिक छोटी होती हैं। धूमकेतु ग्रहों और उपग्रहों से भिन्न होते हैं। वे परिमाण में छोटे, आकाश में इधर-उधर फैले हुए हैं। थोड़े-से प्रकाश के बिन्दु को धारण करते हुए अनेक तारे टिमटिमाते रहते हैं। वहाँ भीषण गर्मी है एवं जल का अभाव है; अतः प्राणियों का वहाँ रहना असम्भव है।
(3) सूर्यः स्थाल्याकारः प्रतीयते परम् एवं नास्ति । अयं पृथिव्याः त्रयोदशलक्षात्मको गुणितो अतीव महान् वेविद्यते । चन्द्रोऽपि प्रायः सूर्य इव वीक्षते । परन्तु पृथिव्या अपि लघुरस्ति । नक्षत्राणामाकारं आवं-श्रावं पाठे-पाठं मनोऽतीव विमुग्धतां भजते । तानि सूर्यापेक्षया अतीव महान्ति प्रतिभान्ति, परं लघूनि दृश्यन्ते । कारणमिदं यद्वस्तु यावदूरं भवति, तद्वस्तु लघु दृश्यते । सूर्यो यदि ऐक क्षणमपि नैजमाकर्षणमवरुन्धीत् तदा सर्वे ग्रहाः उपग्रहाश्च परस्परं संघर्षणं, परिघट्टनञ्च कुर्वाणाः स्वस्थानात् च्यवीरन्। वराकी पृथिवी तु सर्वथैव चूर्णतां गच्छेत् । इत्थमेकमपि मुहूर्तं तापं प्रकाशञ्च यदि सूर्योऽवरुन्ध्यात् तदा अस्माकं समेषां जडचेतनानां सर्वनाशो जायेत । सौरसाम्राज्ये यानि पिण्डानि सन्ति तेषां गतिः सुनिश्चिता, तानि एकस्यामेव दिशि गतिं प्रकुर्वते, तस्यामेव धुरि परिचलन्ति । द्वौ त्रयो वा उपग्रहा एवंविधाः सन्ति ये विपरीत दिशं वहन्ति । ते सर्वे सौरसाम्राज्ये नियमं व्यवस्थामेवावलम्बन्ते । पृथिवीतः सूर्यः त्रिंशल्लक्षाधिकनवकोटिमीलापरिमिते दूरेऽस्ति । चन्द्रोऽपि पृथिवीतः लक्षद्वयात्मके दूरे वसति ।
शब्दार्थ स्थाल्याकारः = थाली के आकार वाला। प्रतीयते = प्रतीत होता है। वेविद्यते = विद्यमान है। वीक्षते = दिखाई पड़ता है। आवं-आवम् = सुन-सुनकर । पाठे-पाठम् = पढ़-पढ़कर । विमुग्धतां भजते = मुग्ध हो जाता है। प्रतिभान्ति = प्रतीत होते हैं। यावत् दूरं = जितनी दूर । नैजम् = स्वयं से सम्बन्धित । अवरुन्धीत = रोक ले। च्यवीरन् = गिर पड़े । वराकी = बेचारी । चूर्णता गच्छेत् = चूर्ण हो जाये। अवरुन्ध्यात् = रोक ले। समेषाम् = सभी का । प्रकुर्वते = करते हैं। धुरि = धुरी पर । वहन्ति = चलते हैं। अवलम्बन्ते = सहारा लेते हैं। त्रिंशल्लक्षाधिकनवकोटिमील = नौ करोड़ तीस लाख मील ।।
प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में सौर-मण्डल में सूर्य के आकार, उसके पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव तथा उसकी स्थिति बतायी गयी है।
अनुवाद सूर्य थाली के आकार को मालूम पड़ता है, परन्तु ऐसा नहीं है। यह पृथ्वी से तेरह लाख गुना अधिक बड़ा विद्यमान है। चन्द्रमा भी प्रायः सूर्य के समान दिखाई देता है, परन्तु यह पृथ्वी से भी छोटा है। नक्षत्रों के आकार को सुन-सुनकर, पढ़-पढ़कर मन अत्यन्त मुग्ध हो जाता है, वे सूर्य की अपेक्षा अत्यन्त विशाल होते हैं, परन्तु छोटे दिखाई देते हैं। इसका यह कारण है कि जो वस्तु जितनी दूर होती है, वह वस्तु उतनी छोटी दिखाई देती है। यदि सूर्य एक क्षण को भी अपना आकर्षण रोक दे, तब सब ग्रह और उपग्रह आपस में रगड़ते हुए और टकराते हुए अपने स्थान से गिर पड़े। बेचारी पृथ्वी तो पूरी तरह से चूर्ण-चूर्ण हो जाये। इसी प्रकार यदि सूर्य एक मुहूर्त (थोड़े समय) को भी ताप और प्रकाश बन्द कर दे, तब हम सभी जड़-चेतन प्राणियों का सर्वनाश हो जाये। सौर-साम्राज्य में जो पिण्ड हैं, उनकी गति सुनिश्चित है और वे एक ही दिशा में गमन करते हैं और उसी धुरी पर घूमते हैं। दो या तीन उपग्रह इस तरह के हैं, जो विपरीत दिशा में चलते हैं। वे सब सौर-साम्राज्य में नियम और व्यवस्था का ही सहारा लेते हैं। सूर्य पृथ्वी से नौ करोड़ तीस लाख मील दूरी पर है। चन्द्रमा भी पृथ्वी से दो लाख मील दूरी पर रहता है।”
(4) सप्तर्षयः ध्रुवं च-उत्तरस्यां दिशि सप्तर्षयः हलाकारं प्रतिभासन्ते । तिस्राः ताराः उपरि एकस्यां पुङ्ङ्क्तौ पुच्छरूपेण, चतस्रः चतुरस्रतयाधः प्रतिभासन्ते । समीपे धुवं भं भासते ।
शब्दार्थ हलाकारम् = हल के आकार के प्रतिभासन्ते = चमकते हैं। पुच्छरूपेण = पूँछ के रूप में। चतुरस्रतयाधः (चतुरस्रतया + अधः) = चौकोर तथा नीचे । भम् = तारा।
प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में सप्तर्षि तारों और ध्रुव के विषय में बताया गया है।
अनुवाद सप्तर्षि तारे और धुव-उत्तर दिशा में सप्तर्षि तारे हल के आकार में चमकते हैं। तीन तारे ऊपर एक पंक्ति में पूँछ रूप में, चार चौकोर होने से नीचे की ओर चमकते हैं। पास में ध्रुव तारा चमकता है।”
(5) धूम्रकेतुः-अष्टाधिकैकोनविंशतिशततमेऽब्दे एको महान् धूम्रकेतुः रात्रेरन्तिमे प्रहरे गगने उत्तरस्यां दिशि दृष्टः । इत्थम् द्वितीयो धूम्रकेतुः दशाधिकैकोनविंशे शततमें ख्रीष्टाब्देऽपि वीक्षितो जनैः । धूम्रकेतोः पुच्छमतिविशालमल्पीयसा वाष्पेण निर्मितं भवति । एककिलोग्राम-भारात्मकं परिमाणं प्रायः भवति । धूम्रकेतुः सौरसाम्राज्धस्य परिवारो नास्ति । अयं सौरजगतः बहिरेव इतस्ततः परिभ्रमति । यदा सौरसाम्राज्यस्य परिवारो नास्ति । अयं सौरजगतः बहिरेव इतस्ततः परिभ्रमति । यदा सौरसाम्राज्यस्य सीमानं प्रविशति तदा सूर्यः बलादार्कषति । यावत् न परिक्रमते | तावत् मुक्तो न भवति । अयम् अतिथिः दैवयोगात् सौरसाम्राज्यमाविशति । यः शक्तिहीनः धूम्रकेतुर्भवति च सततं परिभ्रमन्नेव तिष्ठति । कश्चन नश्यत्येव । एनमपशकुनस्यापि द्योतकं मन्यन्ते ।।
शब्दार्थ अष्टाधिकैकोनविंशतिशततमेऽब्दे = सन् 1908 में। रात्रेः अन्तिमे = रात के अन्तिम में। दशाधिकैकोनविंशे = 1910 में । वीक्षितः = देखा गया। अल्पीयसा वाष्पेण = थोड़ी-सी भाप से । बहिरेव = बाहर ही। इतस्ततः = इधर-उधर । परिभ्रमति = चारों ओर घूमता है। सीमानम् = सीमा को । प्रविशति = प्रवेश करता है। बलादाकर्षति = बल से खींचता है। परिक्रमते = घूमता है। आविशति = प्रवेश करता है। परिभ्रमन्नेव तिष्ठति = घूमता ही रहता है। कश्चन = कोई । नश्यत्येव = नष्ट हो जाता है।
प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में धूमकेतु (पुच्छल तारा) का वर्णन किया गया है।
अनुवाद धूम्रकेतु-सन् 1908 ईसवी में एक बड़ा धूमकेतु रात्रि के अन्तिम प्रहर में आकाश में उत्तर दिशा में दिखाई दिया था। इसी प्रकार दूसरा धूमकेतु सन् 1910 ईसवी में लोगों ने देखा। धूम्रकेतु की अत्यन्त विशाल पूँछ थोड़ी-सी भाप से बनी होती है। प्रायः इसका भार एक किलोग्राम के बराबर होता है। धूम्रकेतु सौर-साम्राज्य परिवार का नहीं है। यह सौर-जगत् के बाहर की इधर-उधर घूमता है। जब वह सौर-साम्राज्य की सीमा में प्रवेश करता है, तब सूर्य इसे बलपूर्वक अपनी ओर खींचता है। यह जब तक नहीं घूमता है, तब तक मुक्त नहीं होता है। यह अतिथि दैवयोग से ही सौर-साम्राज्य में प्रवेश करता है। जो धूमकेतु बलहीन (कमजोर) होता है, वह निरन्तर घूमता ही रहता है। कोई नष्ट हो जाता है। इसे अपशकुन का भी सूचक मानते हैं ।
(6) उल्काः-गहने निशीथे यदा गगनमतिस्वच्छं भवति । तदा एकः शराकारः विभ्राजिष्णुः चाकचिक्यं ध्रियमाणः पुञ्जीभूतः प्रकाशः सकलं नभः द्विधा विभजन् महता वेगेन धावन्दूरं गत्वा लुप्तोऽपि भवति । जनाः लूकः त्रुटित इति कथयन्ति । तं दृष्ट्वा पञ्चपुष्पाणां नामोच्चारणेन, केचन षष्ठीवनेन अशुभनिवारणं कुर्वते । साधारणाः जनाः यत् किमपि बुवन्तु किन्तु नक्षत्रपतने धारायाः विनाशः अवश्यम्भावी । वस्तुतः उल्काः पिण्डीभूताः इतस्ततः परिभ्रमन्ति । यदा पृथिव्याः सीमानमाश्रयन्ते, घनीभूतेन वायुमण्डलेन सङ्कर्षणं कृत्वा निष्क्रामन्ति तदा ज्वलन्तः अग्रे प्रसरन्ति पुनश्च नश्यन्ति । कदापि अर्धज्वलनावस्थायां पतित्वा भूमिमा-विशन्ति । एवंविधाः उल्काः कलिकातानगरस्य सङ्ग्रहालये संस्थापिताः सन्ति ।
शब्दार्थ गहने निशीथे = घनी रात में। शराकारः = बाण के आकार वाला। विभ्राजिष्णुः = विशेष चमकीला । ध्रियमाणः = रहता हुआ । पुञ्जीभूतः = एकत्र हुआ । द्विधा = दो भागों में । त्रुटितः = टूटा हुआ । ष्ठीवनेन = थूकने से। परिभ्रमन्ति = घूमती हैं। सीमानमाश्रयन्ते = सीमा का आश्रय लेती हैं। निष्क्रामन्ति = निकलती हैं। भूमिमाविशन्ति = पृथ्वी में घुस जाती हैं। अर्धज्वलनावस्थायां = आधी जली हुई अवस्था में । संस्थापिताः सन्ति = रखी हैं।
प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में उल्काओं का वर्णन किया गया है।
अनुवाद उल्काएँ-घनी रात में जब आकाश अत्यन्त स्वच्छ होता है, तब एक बाण के आकार का, चमकता हुआ, चकाचौंध करता हुआ, पुंजीभूत (एकत्रित) प्रकाश सारे आकाश को दो भगों में विभाजित करता हुआ बड़े वेग से दूर जाकर लुप्त हो जाता है। इसे लोग 'लूक टूट गया' कहते हैं। उसे देखकर कुछ लोग पाँच फूलों के नाम के उच्चारण के द्वारा और कुछ थूककर अशुभ निवारण करते हैं। साधारण लोग जो कुछ भी कहें, किन्तु नक्षत्र के गिरने में पृथ्वी का विनाश अवश्य होता है। वास्तव में उल्काएँ एकत्रित होकर इधर-उधर घूमती हैं। जब ये पृथ्वी की सीमा में पहुँचती हैं, घने वायुमण्डल से रगड़ (संघर्ष) करके निकल जाती हैं, तब (उल्काएँ) जलते हुए आगे फैल जाती हैं। और फिर नष्ट हो जाती हैं। कभी आधी जली अवस्था में गिरकर पृथ्वी में प्रवेश कर जाती हैं। इस प्रकार की उल्काएँ कलकत्ती नगर के संग्रहालय में रखी हुई हैं।
(7) चन्द्रमाः- चन्द्रमाः पृथिव्या एव निर्गत्य गतः एवं वैज्ञानिका अपि भाषन्ते । सर्वेष्वपि नक्षत्रेषु एकः चन्द्रमा एव धरायाः समीपवर्ती वर्तते । चन्द्रमसः कलाः क्षीणा भवन्ति, परिवर्धन्ते । चन्द्रे कलङ्कः अस्ति, राहुरेनं ग्रस्ते इत्यादिकाः वार्ताः प्राचीनकालतः प्रचलन्ति । अधुना सर्वा अपि गल्पीभूता जाताः । चन्द्रः पृथिवीं परितः अण्डाकारं भ्रमति । पृथिवी स्वयं सूर्य परितः भ्रमति । चन्द्रमास्तु पृथिवीं परितः चलति । प्रायः अष्टाविंशतितमे दिवसे परिक्रमा पूरयति । गर्तिलान् पर्वतान् कलङ्कान् कथयन्ति वैज्ञानिकाः । चन्द्रस्य कलाभिः तिथीनां मासानाञ्च निर्माणं भवति । चन्द्रः सूर्यप्रकाशात् प्रकाशितो भवति । यदा चन्द्रः सूर्यपृथिव्योरन्तराले जायते, तदा ग्रहणं भवति एवं वदन्ति वैज्ञानिकाः। चन्द्रोपरि सूर्यस्य प्रकाशः यस्मिन् भागे पतति सः भागः प्रकाशितः कलारूपेण दृष्टिपथमायाति । स एव प्रकाशः तेनैव क्रमेण वर्धते, ह्रसति च ।। अमावस्यायां चन्द्रः सूर्यपृथिव्योः मध्ये भवति, चन्द्रस्य यः अर्धभागः सूर्याभिमुखं भवति स भागः प्रकाशमानो भवति । प्रकाशितः स भागः पृथिव्या न दृष्टो जायते । केवलः अप्रकाशितोऽर्धभागः पृथिवीस्थैः जनैः दृश्यते । प्रकाशाभावे चन्द्रस्य दर्शनं न जायते। अयं कालः अमानाम्नाभिधीयते ।। पूर्णिमायां पृथिवी सूर्यचन्द्रमसोः मध्ये भवति । सूर्येण प्रकाशितं सकलं चन्द्रमण्डलं दृष्टिगोचरं भवति ।।
शब्दार्थ निर्गत्य = निकलकर । भाषन्ते = कहते हैं। परिवर्धन्ते = बढ़ती हैं। राहुः एनम् = राहु इसको । ग्रसते = निगल लेता है। गल्पीभूताः = गप बनकर, असत्य । परितः = चारों ओर । पूरयति = पूरी करता है। गर्तिलान् = गड्डेदार । सूर्यपृथिव्योः अन्तराले = सूर्य और पृथ्वी के मध्य में। जायते = होता है। दृष्टिपथम् आयाति = दिखाई देता है। हसति = घटता है। सूर्याभिमुखम् = सूर्य के सम्मुख । पृथिवीस्थैः जनैः = धरती पर रहने वाले लोगों के द्वारा। अमानाम्नाभिधीयते = अमा (अमावस्या) के नाम से कहा जाता है।
प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में चन्द्रमा की स्थिति का वर्णन किया गया है।
अनुवाद चन्द्रमा-चन्द्रमा पृथ्वी से निकलकर ही (आकाश में) गया है, ऐसा वैज्ञानिक भी कहते हैं। सभी नक्षत्रों में अकेला चन्द्रमा ही पृथ्वी के समीप स्थित है। चन्द्रमा की कलाएँ घटती और बढ़ती हैं। चन्द्रमा में कलंक होता है, राहु इसे ग्रसता है, इत्यादि बातें प्राचीनकाल से चली आ रही हैं। अब ये सभी असत्य बनकर रह गयी हैं। चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर अण्डे के आकार में घूमता है। पृथ्वी स्वयं सूर्य के चारों ओर घूमती है। चन्द्रमा तो पृथ्वी के चारों ओर चलता है। प्रायः अट्ठाइसवें दिन चक्कर पूरा कर लेता है। गड्डेदार पर्वतों को वैज्ञानिक कलंक कहते हैं। चन्द्रमा की कलाओं से तिथि और महीनों का निर्माण होता है। चन्द्रमा सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है। जब चन्द्रमा सूर्य और पृथ्वी के मध्य में आ जाता है, तब ग्रहण होता है, ऐसा वैज्ञानिक कहते हैं। चन्द्रमा के ऊपर जिस भाग पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है, वह प्रकाशित भाग कला के रूप में दृष्टि में आता है। वही प्रकाश उसी क्रम से बढ़ता और घटता है। अमावस्या के दिन चन्द्रमा सूर्य और पृथ्वी के मध्य में होता है। चन्द्रमा का जो आधा भाग सूर्य की ओर होता है, वह भाग प्रकाशमान होता है। वह प्रकाशित भाग पृथ्वी से नहीं दिखाई देता। केवल अप्रकाशित आधा भाग पृथ्वी पर स्थित लोगों को दिखाई देता है। प्रकाश के अभाव में चन्द्रमा का दर्शन नहीं होता है। यह समय 'अमावस्या के नाम से पुकारा जाता है।। पूर्णिमा के दिन पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा के मध्य में होती है। सूर्य से प्रकाशित सम्पूर्ण चन्द्रमण्डल दिखाई पड़ता है।
(8) नीहारिकाः-विशालतमानाकाराणां वाष्पीयपदार्थानां समूहो, नीहारिका । रात्रौ आकाशं द्विधा कुर्वन् विशालो राजमार्ग इव यः प्रकाशः मध्येऽवलोक्यते, सः नीहारिका नाम्ना घुष्यते । आकाशे बहव्यः नीहारिकाः भवन्ति । इमानतावनताः, बृहदाकाराः, दीर्घवृत्ताकाराः, कुण्डलिताः वा भवन्ति । नीहारिकायाः परिमाणं सूर्यतः दशखर्वगुणितं भवति । दीर्घा नीहारिका एकं पृथक् ब्रह्माण्डं भवति । नीहारिकामध्ये अगणिताः ताराः, तारां परितः वाष्पीयपदार्थाः भवन्ति । रात्रौ निर्मला गङ्गा इवे दृष्टिपथमायाति । अतः आकाशगङ्गा नाम्नाभिधीयते । अस्यां दशसहस्रकोटयः गुम्फिताः परस्परमाकृष्टाः ताराः भवन्ति । आधुनिका वैज्ञानिकाः (सूर्यग्रहेषु) बुध-शुक्र-पृथ्वी-मङ्गल-बृहस्पति-शनि-यूरेनस (वरुण)-नेपच्यून (वारुणी)- प्लेटो (यम) इति नवग्रहान् वर्णयन्ति । चन्द्रं पृथिवी-ग्रह कथयन्ति । भारतीयां ज्योतिर्विदः सूर्य-चन्द्र-मंगल-बुध-बृहस्पति-शुक्र-शनि-राहु-केतून् नवग्रहान् निर्दिशन्ति । एवमेन्तरिक्षं विभुः, अनन्तं निःसीमात्मकं चास्ते । अत्रत्यमेकमपि नक्षत्रं वर्णनातीतमस्ति ।
शब्दार्थ विशालतमानाम् आकाराणाम् = अत्यन्त विशाल आकार का । वाष्पीयपदार्थानाम् = भाप के पदार्थों का । द्विधा = दो भागों में। अवलोक्यते = देखा जाता है। घुष्यंते = पुकारा जाता है। नतावनता = ऊँची-नीची । कुण्डलिताः = कुण्डली (गोल) के आकार की। दशखर्वगुणितं = दसे खरब गुना । दृष्टिपथमायाति = दिखाई देती है। दशसहस्त्रकोटयः = दस हजार करोड़ । गुम्फिताः = गॅथी हुई । ज्योतिर्विदः = ज्योतिषी । निर्दिशन्ति = निर्दिष्ट करते हैं। विभुः = व्यापक । निः सीमात्मकम् = सीमारहित।
प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में नीहारिकाओं का वर्णन और नवग्रहों का नाम-निर्देश किया गया है।
अनुवाद नीहारिकाएँ- अत्यन्त विशाल आकार का वाष्पीय पदार्थों का समूह नीहारिका है। रात्रि में आकाश को दो भागों में करता हुआ, विशाल राजमार्ग के समान जो प्रकाश मध्य में दिखाई देता है, वह नीहारिका' के नाम से पुकारा जाता है। आकाश में बहुत-सी नीहारिकाएँ होती हैं। ये ऊँची-नीची, बड़े आकार की, बड़े घेरे के आकार की अथवा कुण्डली के आकार की होती हैं। नीहारिका का परिमाण (माप) सूर्य से दस खरब गुना होता है। एक बड़ी नीहारिका एक अलग ब्रह्माण्ड होती है । नीहारिका के मध्य में अगणित तारे और तारों के चारों ओर वाष्पीय पदार्थ होते हैं। रात्रि में स्वच्छ गंगा के समान दिखाई पड़ती हैं; अतः 'आकाश गंगा' के नाम से पुकारी जाती हैं। इसमें दस हजार करोड़ परस्पर आकृष्ट हुए गुंथे हुए तारे होते हैं। आधुनिक वैज्ञानिक (सूर्य के ग्रहों में) बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, वरुण, वारुणी और यम इन नौ ग्रहों का वर्णन करते हैं। चन्द्रमा को पृथ्वी का ग्रह कहते हैं। भारतीय ज्योतिषी सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु को नौ ग्रह कहते हैं। इस प्रकार अन्तरिक्ष सर्वशक्तिमान, अनन्त और निःसीम है। इसका एक भी नक्षत्र वर्णन से परे है।
लघु उत्तरीय प्ररन
Question 1. 'अन्तरिक्ष-विज्ञानम्' पाठ का सारांश लिखिए। या सौरमण्डल के सदस्यों का परिचय' अन्तरिक्ष-विज्ञानम्' पाठ के आधार पर दीजिए।
Answer: [संकेत-'पाठ-सारांश' मुख्य शीर्षकं की सामग्री को अपने शब्दों में लिखिए ।]
In simple words: इस पाठ में अन्तरिक्ष, सौरमंडल, सूर्य, चंद्रमा, धूमकेतु, उल्का और नीहारिकाओं का विस्तृत विवरण दिया गया है, जो छात्रों को ब्रह्मांड की विशालता और उसमें मौजूद खगोलीय पिंडों के बारे में जानकारी देता है।
🎯 Exam Tip: सारांश लिखते समय मुख्य बिंदुओं को क्रमबद्ध और संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करें, जिससे विषय की पूरी समझ स्पष्ट हो सके।
Question 2. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए (क) धूमकेतु, (ख) उल्का, (ग) चन्द्रमा, (घ) नीहारिका और (ङ) सूर्य ।
Answer: (संकेत-'पाठ-सारांश' मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत सम्बद्ध शीर्षकों की सामग्री को अपने शब्दों में लिखें ।
In simple words: इस प्रश्न में धूमकेतु, उल्का, चंद्रमा, नीहारिका और सूर्य जैसे विभिन्न खगोलीय पिंडों की विशेषताओं और भूमिका का संक्षिप्त वर्णन करना है।
🎯 Exam Tip: प्रत्येक खगोलीय पिंड पर लिखते समय उसकी मुख्य पहचान, संरचना और सौरमंडल में उसकी स्थिति को स्पष्ट करें।
Question 3. अन्तरिक्ष के विस्तार और शोभा का वर्णन कीजिए ।
Answer: [संकेत-'पाठ-सारांश' मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत दिये गये शीर्षकों 'सौर- साम्राज्य और 'अन्तरिक्ष' से सम्बद्ध सामग्री को संक्षेप में अपने शब्दों में लिखें]
In simple words: इस प्रश्न में ब्रह्मांड की विशालता, अनंतता और उसमें मौजूद असंख्य तारों, ग्रहों, उपग्रहों, धूमकेतुओं और नीहारिकाओं की अद्भुत सुंदरता का वर्णन करना है।
🎯 Exam Tip: अन्तरिक्ष की भव्यता का वर्णन करते हुए, विभिन्न खगोलीय पिंडों के नाम और उनकी आकर्षक विशेषताओं को शामिल करें।
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