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UP Board Solutions For Class 9 Sanskrit Chapter 13 विद्यादानम् (कथा - नाटक कौमुदी)
परिचय- भारतीय वाङ्मय में वेदों और पुराणों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वेदों की अपेक्षा पुराण सरल, सरस और बोधगम्य हैं। पुराणों में उपदेश कथाओं के माध्यम से दिये गये हैं। ये कथाएँ काल्पनिक न होकर वास्तविक हैं। पुराणों को इतिहास भी माना जाता है। पुराण' शब्द का अर्थ है-पुराना। इसी आधार पर कहा जाता है कि जो व्यतीत हो जाता है, उसी की चर्चा इतिहास और पुराण दोनों में होती है। दोनों में अन्तर मात्र इतना ही होता है कि पुराणों का दृष्टिकोण धार्मिक होता है, जब कि इतिहास का तथ्यपरक । । पुराणों की कुल संख्या अठारह मानी जाती है। इसमें एक महत्त्वपूर्ण विष्णु पुराण' भी है। विष्णु पुराण में भूगोल, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, राजवंश-वर्णन एवं श्रीकृष्ण चरित से सम्बद्ध वर्णन हैं। इसके अन्त में कलियुग का वर्णन भी प्राप्त होता है तथा इसके पश्चात् अध्यात्म-मार्ग की शिक्षा का महत्त्वपूर्ण उल्लेख है। । प्रस्तुत पाठ के रूप में जो कथा प्रस्तुत है, उसका आधार इसी 'विष्णु-पुराण' का छठा अंश है। 'केशिध्वज' और 'खाण्डिक्य' दोनों विदेह नाम से प्रसिद्ध राजा जनक के पौत्र थे। दोनों ही समझते थे कि विरोध, शत्रुता और वैमनस्य मन का मैल है जो जीवन को सन्तापमय बनाता है। मन के इस मैल को धोने की सामर्थ्य विद्या में ही है। प्रस्तुत पाठ में विद्या के इसी ध्येय को व्यक्त किया गया है।
पाठ सारांश
राजा केशिध्वज और खाण्डिक्य आपस में विरोधी होते हुए भी एक-दूसरे की विद्या का आदर करते हैं तथा अवसर आने पर एक-दूसरे को अपनी विद्या दान में देते हैं। ऐसा करने से दोनों के मन का वैमनस्य नष्ट हो जाता है। पाठे का सारांश इस प्रकार है
केशिध्वज और खाण्डिक्य जनक का परिचय- प्राचीनकाल में धर्मध्वजजनक नाम के एक राजा थे। उनके दो पुत्र थे- अमितध्वज और कृतध्वज । कृतध्वज के केशिध्वज नाम का तथा अमितध्वज के खाण्डिक्य-जनक नाम का एक पुत्र था। खाण्डिक्य कर्ममार्ग में तथा केशिध्वज अध्यात्मशास्त्र में निपुण था। दोनों ही एक-दूसरे पर विजय पाना चाहते थे। केशिध्वज के द्वारा राज्य से उतार दिये जाने पर खाण्डिक्य अपने पुरोहित और मन्त्रियों के साथ वन में चले गये । केशिध्वज ने अमरता प्राप्त करने के लिए बहुत-से यज्ञ किये।
केशिध्वज द्वारा यज्ञानुष्ठान- एक बार केशिध्वज ने एक यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उसकी धर्मधेनु को एक सिंह ने मार दिया। उसने ऋत्विजों, कशेरु, शुनक आदि आचार्यों से इसके प्रायश्चित का विधान पूछा। कोई भी उसे यथोचित प्रायश्चित बताने में समर्थ नहीं हुआ। अन्ततः उसे '. शुनक ने बताया कि केवल खाण्डिक्य ही प्रायश्चित का विधान जानता है, अतः आप उसके पास चले जाइए। 'केशिध्वज' ने उसे अपना वैरी समझते हुए अपने मन में निश्चय किया कि खाण्डिक्य के पास जाने पर यदि वह मुझे मार देगी तो मुझे यज्ञ का फल प्राप्त हो जाएगा और यदि वह मुझे प्रायश्चित बताएगा तो मेरा यज्ञ निर्विघ्न समाप्त हो जाएगा।
केशिध्वज का खाण्डिक्य के समीप जाना - केशिध्वज रथ पर सवार होकर खाण्डिक्य के पास पहुँचा । केशिध्वज को देखकर ख़ाण्डिक्य ने समझा कि वह उसे मारने आया है; अतः उसने अपने धनुष पर बाण-चढ़ाकर उसे युद्ध के लिए ललकारा। केशिध्वज ने कहा- मैं तुम्हें मारने नहीं, अपितु एक संशय दूर करने आया हूँ। यह सुनकर खाण्डिक्य शान्त हो गया। मन्त्रियों द्वारा केशिध्वज को मारने की सलाह देने पर भी खाण्डिक्य ने सोचा कि इसको मारकर मैं पृथ्वी का राज्य प्राप्त करूंगा और नहीं मारता हूँ तो पारलौकिक विजय प्राप्त करूंगा। दोनों में पारलौकिक विजय श्रेष्ठ है; अतः मुझे इसे न मारकर इसकी शंका का समाधान करना चाहिए।
खाण्डिक्य द्वारा प्रायश्चित्त- विधान का कथन-केशिध्वज ने अपनी यज्ञ की धर्मधेनु के सिंह द्वारा वध का वृत्तान्त बताकर उसका प्रायश्चित पूछो । खाण्डिक्य ने यथाविधि उसे उचित प्रायश्चित बता दिया। प्रायश्चित ज्ञात होने पर राजा केशिध्वज यज्ञ-स्थान पर लौट आया और सहर्ष यज्ञ सम्पन्न कराकर यज्ञ की समाप्ति पर ब्राह्मणों, सदस्यों और याचकों को खूब दान दिया। अन्त में उसे स्मरण आया कि उसने खाण्डिक्य को गुरु-दक्षिणा नहीं दी हैं।
केशिध्वज द्वारा गुरु-दक्षिणा- केशिध्वज पुनः रथ पर सवार होकर खाण्डिक्य के पास वन में गया और कहा कि मैं तुम्हें गुरु-दक्षिणा देने आया हूँ। मन्त्रियों द्वारा अपहत राज्य माँगने का परामर्श दिये जाने पर भी खाण्डिक्य ने राज्य की माँग नहीं की वरन् उससे कहा कि आप अध्यात्मविद्या के ज्ञाता हैं। अतः ऐसे कर्म का उपदेश दीजिए, जिससे क्लेश की शान्ति हो । केशिध्वज को आश्चर्य हुआ कि उसने निष्कण्टक राज्य क्यों नहीं माँगा? उसके इस 'ल्का स्त्र देते हुए खाण्डिक्य ने कहा कि मूर्खजन राज्य की इच्छा करते हैं, मेरे जैसे नहीं। केशिध्वज ने प्रसन्न होकर उससे कहा कि खाण्डिक्य तुम धन्य हो । मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। तत्पश्चात् उसे आत्मा का स्वरूप और योग-विद्या की शिक्षा दी। इस प्रकार शिक्षा से दोनों के मन की मलिनता समाप्त हो गयी।
चरित्र-चित्रण
केशिध्वज
परिचय- केशिध्वज धर्मध्वज-जनक का पौत्र और कृतध्वज का पुत्र था। वह अध्यात्मविद्या का ज्ञाता था और अमरत्व-प्राप्त करने के लिए अनेक यज्ञों का विधान किया करता था। वह खाण्डिक्य से राज्य छीनकर स्वयं राजा बन बैठा था। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(1) सांसारिक सुखों में आसक्त- केशिध्वज अध्यात्मवेत्ता होते हुए भी सांसारिक सुख-भोगों में आसक्त था। उसने अपने भाई खाण्डिक्य का राज्य छीनकर हड़प लिया था। अन्त में वह स्वयं अनुभव करता है कि वह अज्ञान से मृत्यु को जीतना चाहता है एवं राज्य और भोगों में लिप्त है।
(2) धर्मभीरु- केशिध्वज धर्मभीरु राजा है तभी वह सिंह द्वारा यज्ञधेनु के मार देने पर विद्वानों से उसका प्रायश्चित पूछता है और विहित प्रायश्चित जानने के लिए ही खाण्डिक्य के पास पहुँचता है। जब तक वह प्रायश्चित नहीं कर लेता, उसे शान्ति नहीं मिलती। यज्ञ के पूरा होने पर वह खाण्डिक्य के पास गुरु-दक्षिणा देने के लिए भी जाता है। इन सभी बातों से उसकी धर्मभीरुता प्रकट होती है।
(3) यज्ञ में रुचि - केशिध्वज अमरत्व प्राप्त करने के लिए अनेक यज्ञ करता है। वह यज्ञ को निर्विघ्न समाप्त करना चाहता है। इसीलिए विघ्न आने पर शत्रु से भी पूछकर वह उसका प्रायश्चित करता है। यज्ञ की समाप्ति पर वह ब्राह्मणों, याचकों और सदस्यों को खूब धन दक्षिणी रूप में देता है। प्रायश्चित पूछने के लिए शत्रु के पास जाने को, यज्ञ के फल और उसकी निर्विघ्न समाप्ति को वह प्राणों से भी अधिक महत्त्व देता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि वह न केवल यज्ञ का विधान करने का इच्छुक है, अपितु वह यज्ञ की निर्विघ्न समाप्ति भी चाहता है।
(4) अध्यात्म विद्या का ज्ञाता- केशिध्वज अध्यात्मपरायण कृतध्वज का पुत्र है; अतः अध्यात्म विद्या का ज्ञान उसे पैतृकदाय के रूप में प्राप्त हुआ है। खाण्डिक्य भी उसे अंध्यात्म विद्या का विद्वान् मानते हुए उससे आत्मा का स्वरूप और योग-विद्या को सीखता है।
(5) गुणग्राही - केशिध्वज गुणों का आदर करना जानता है और शत्रु से भी विद्या-ग्रहण करने में संकोच नहीं करता। वह खाण्डिक्य से यज्ञधेनु की हत्या का प्रायश्चित पूछने जाता है और उससे नम्रतापूर्वक व्यवहार करता। खाण्डिक्य के क्रोध करने पर भी वह जरा-भी विचलित नहीं होता। उसका यह गुण उसकी गुण-ग्राहकता में अचल आस्था को प्रदर्शित करता है। इसके साथ ही वह अपने गुणों को दूसरों को प्रदान करने वाला भी है।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि केशिध्वजे अध्यात्मज्ञानी, विवेकी और गुणग्राही होते हुए भी सांसारिक सुखों में आसक्त और धर्मभीरु राजा है, जिसमें विवेकशीलता, प्रत्युत्पन्नमतित्व, आत्मबले आदि गुण भी विद्यमान हैं।
खाण्डिक्य
परिचय-खाण्डिक्य धर्मध्वज-जनक का पौत्र और अमितध्वज का पुत्र था। राज्य हड़प लेने के कारण वह केशिध्वज को अपना शत्रु मानता था। कर्मकाण्ड में उसकी दृढ़ आस्था थी। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं
(1) विवेकी-खाण्डिक्यजनक विवेकी राजा है। किसी भी कार्य को करने से पहले वह अपने मन्त्रियों और पुरोहितों से सलाह लेकर तत्पश्चात् अपने विवेक से काम करता है। वह मन्त्रियों की सलाह को आँख मूंदकर नहीं मानता। केशिध्वज के वन में आने पर वह दोनों ही बार अपने विवेक से कार्य करता है।
(2) प्रतिशोध की भावना से पीड़ित - केशिध्वज द्वारा परास्त किये जाने और राज्य छीन लेने के बाद से ही खाण्डिक्य उससे प्रतिशोध लेने के अवसर की प्रतीक्षा में रहता था। केशिध्वज को वन में पास आता देखकर वह उसे मारने के लिए क्रोध से धनुष उठा लेता है, लेकिन वह इस प्रकार प्रतिशोध से पृथ्वी के राज्य को प्राप्त करने की अपेक्षा पारलौकिक विजय को श्रेयस्कर मानकर केशिध्वज को नहीं मारता। इस क्रिया से उसका चरित्र एक आदर्श प्रतिशोधी के रूप में दृष्टिगत होता है।
(3) परमार्थ प्रेमी- खाण्डिक्य परमार्थ प्रेमी है। वह शत्रु को सम्मुख आया हुआ देखकर भी परमार्थ के लोभ से उसे नहीं मारता। वह केशिध्वज से गुरु-दक्षिणा के रूप में राज्य न माँगकर परमार्थ विद्या माँगता है। वह परमार्थ विद्या को क्लेश-शान्ति का उपाय मानता है। सांसारिक सुख या राज्यादि की कामना करने वालों को वह मन्दमति मानता है। वह परमार्थ विद्या को ही शाश्वत और स्थायी आनन्द प्रदान करने वाली मानता है।
(4) सन्तोषी व्यक्ति - खाण्डिक्य परम सन्तोषी व्यक्ति था। इसीलिए वह केशिध्वज से दोनों बार राज्य नहीं माँगता । यदि वह चाहता तो उसे राज्य अनायास ही प्राप्त हो जाता; क्योंकि दोनों बार उसके सम्मुख ऐसे ही अवसर उपस्थित थे; किन्तु उसने ऐसा नहीं किया। ये दोनों ही घटनाएँ उसके सन्तोषी व्यक्ति होने की ओर इंगित करती हैं।
(5) तत्त्वज्ञानी- खांण्डिक्य अपने द्वारा सम्पादित होने वाले समस्त कार्यों के अन्तर्भूत तत्त्वों को जान लेने के पश्चात् ही उनको सम्पादन करता था। वह कर्मकाण्ड के सभी विधानों के सारभूत तत्त्वों का ज्ञाता और अद्वितीयवेत्ता था। यह बात शुनक द्वारा केशिध्वज को; प्रायश्चित विधान के तत्त्वों को जानने के लिए; उनके पास भेजे जाने वाले प्रसंग से भली-भाँति स्पष्ट हो जाती है।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि खाण्डिक्य सांसारिक सुखों को महत्त्व न देकर परमार्थ को महत्त्व देता है। केशिध्वज से आत्मज्ञान प्राप्त करके वह अपने मन में वैमनस्य की मलिनता को धो डालता है।
लघु उत्तरीय संस्कृत प्रश्नोत्तर
अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखिएप्रश्
Question 1. केशिध्वजः कस्य सूनुः आसीत्?
Answer: केशिध्वजः कृतध्वजस्य सूनुः आसीत् ।
In simple words: केशिध्वज कृतध्वज का पुत्र था।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में केशिध्वज के पिता का नाम पूछा गया है, जो कि कृतध्वज है।
Question 2. खाण्डिक्यजनकः कस्य पुत्रः आसीत्?
Answer: खाण्डिक्यजनकः अमितध्वजस्य पुत्रः आसीत् ।
In simple words: खाण्डिक्यजनक अमितध्वज का पुत्र था।
🎯 Exam Tip: खाण्डिक्यजनक के पिता का नाम याद रखना महत्त्वपूर्ण है, जो कि अमितध्वज था।
Question 3. खाण्डिक्यः कथं वनं जगाम?
Answer: केशिध्वजेन पराजितः राज्यादवरोपितः सन् खाण्डिक्यः वनं जगाम ।
In simple words: केशिध्वज द्वारा पराजित और राज्य से हटाए जाने के बाद खाण्डिक्य वन में चले गए।
🎯 Exam Tip: यह प्रश्न खाण्डिक्य के वन जाने के कारण पर केंद्रित है, जिसका मुख्य कारण केशिध्वज से पराजय था।
Question 4. केशिध्वजस्य धर्मधेनुं कः जघान?
Answer: केशिध्वजस्य धर्मधेनुं एकः सिंहः जघान ।
In simple words: केशिध्वज की यज्ञधेनु गाय को एक शेर ने मार डाला था।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में घटना के मुख्य पात्र (शेर) और प्रभावित वस्तु (यज्ञधेनु) को याद रखें।
Question 5. प्रायश्चितविषये ऋत्विजः किम् ऊचुः?
Answer: प्रायश्चितविषये न वयं जानीमः, अत्र कशेरुः प्रष्टव्यः इति ऋत्विजः ऊचुः ।
In simple words: प्रायश्चित्त के विषय में ऋत्विजों ने कहा कि वे नहीं जानते और कशेरु से पूछना चाहिए।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में ऋत्विजों द्वारा दी गई सलाह को याद रखना महत्वपूर्ण है, जो कि कशेरु से पूछने की थी।
Question 6. कशेरुः केशिध्वजं किमब्रवीत्?
Answer: कशेरुः 'नाहं जानामि, भार्गवं शुनकं पृच्छ, सः नूनं वेत्स्यति' इति केशिध्वजम् अब्रवीत् ।
In simple words: कशेरु ने केशिध्वज से कहा, 'मैं नहीं जानता, भार्गव शुनक से पूछो, वह अवश्य जानता होगा।'
🎯 Exam Tip: कशेरु ने सीधे उत्तर न देकर शुनक का नाम सुझाया, यह संवाद महत्वपूर्ण है।
Question 7. भार्गवो शुनकः राजानं किमाह?
Answer: भार्गवः शुनकः राजानमाह यत् “न कशेरुः न चाहं, वान्यः कश्चिज्जानाति, केवलं खाण्डिक्यः जानाति, यो भवता पराजितः ।”
In simple words: भार्गव शुनक ने राजा से कहा कि न कशेरु, न मैं, और न ही कोई दूसरा जानता है, केवल खाण्डिक्य ही जानता है जिसे आपने पराजित किया है।
🎯 Exam Tip: शुनक का यह उत्तर कहानी में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जो खाण्डिक्य के महत्व को दर्शाता है।
Question 8. पुरोहितः मन्त्रिणश्च खाण्डिक्यं किमुचुः?
Answer: पुरोहितः मन्त्रिणश्च खाण्डिक्यम् ऊचुः यत् वंशगतः शत्रुरेषु हन्तव्यः, हतेऽस्मिन् सर्वा पृथ्वी तव वश्या भविष्यति ।।
In simple words: पुरोहितों और मंत्रियों ने खाण्डिक्य से कहा कि यह वंशगत शत्रु है और इसे मार डालना चाहिए, क्योंकि उसे मारने पर सारी पृथ्वी तुम्हारे अधीन हो जाएगी।
🎯 Exam Tip: यह प्रश्न मंत्रियों और पुरोहितों की सलाह को उजागर करता है, जो कि शत्रुतापूर्ण थी।
Question 9. केशिध्वजम् आयान्तं दृष्ट्वा खाण्डिक्यः किमुवाच ?
Answer: केशिध्वजम् आयान्तं दृष्ट्वा खाण्डिक्यः उवाच यत् त्वं मां हन्तुम् आगतः, त्वाम् अहं हनिष्यामि, त्वं मम राज्यहरो रिपुः इति ।।
In simple words: केशिध्वज को आते देखकर खाण्डिक्य ने कहा कि तुम मुझे मारने आए हो, मैं तुम्हें मार डालूँगा, तुम मेरे राज्य को छीनने वाले शत्रु हो।
🎯 Exam Tip: खाण्डिक्य की प्रारंभिक प्रतिक्रिया (क्रोध और युद्ध की चुनौती) इस प्रश्न का मुख्य बिंदु है।
Question 10. खाण्डिक्येन केशिध्वजः कथं न हेत:?
Answer: खाण्डिक्येन पारलौकिकं जयम् अवाप्तं केशिध्वजः न हतः ।
In simple words: खाण्डिक्य ने केशिध्वज को इसलिए नहीं मारा क्योंकि उसे पारलौकिक विजय प्राप्त करनी थी।
🎯 Exam Tip: खाण्डिक्य के निर्णय के पीछे का कारण (पारलौकिक विजय की इच्छा) इस प्रश्न का महत्वपूर्ण उत्तर है।
Question 11. खाण्डिक्यः केशिध्वजं कां गुरुदक्षिणाम् अयाचत्?
Answer: खाण्डिक्यः केशिध्वजम् गुरुदक्षिणारूपेण अध्यात्मविद्याम् अयाचत्।।
In simple words: खाण्डिक्य ने केशिध्वज से गुरुदक्षिणा के रूप में अध्यात्मविद्या की याचना की।
🎯 Exam Tip: यह प्रश्न खाण्डिक्य की आध्यात्मिक प्रवृत्ति को दर्शाता है, उसने भौतिक राज्य के बजाय विद्या मांगी।
वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर
अधोलिखित प्रश्नों में से प्रत्येक प्रश्न के उत्तर रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। इनमें से एक विकल्प शुद्ध है। शुद्ध विकल्प का चयन कर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए
Question 1. 'विद्यादानम्' नामक पाठ किस ग्रन्थ से उदधृत है?
(क) “श्रीमद्भागवत् पुराण' से
(ख) 'अग्निपुराण' से
(ग) 'महाभारत से
(घ) विष्णुपुराण' से
Answer: (घ) विष्णुपुराण' से
In simple words: यह पाठ विष्णुपुराण नामक ग्रंथ से लिया गया है।
🎯 Exam Tip: स्रोत ग्रन्थ का नाम याद रखना एक सीधा प्रश्न है।
Question 2. विष्णुपुराण की रचना किसके द्वारा की गयी?
(क) महर्षि वाल्मीकि के द्वारा
(ख) महर्षि वशिष्ठ' के द्वारा
(ग) “महर्षि विश्वामित्र के द्वारा
(घ) महर्षि वेदव्यास के द्वारा
Answer: (घ) महर्षि वेदव्यास के द्वारा
In simple words: विष्णुपुराण की रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी।
🎯 Exam Tip: प्रमुख धार्मिक ग्रंथों और उनके रचयिताओं के नाम याद रखें।
Question 3. धर्मध्वज के पुत्रों के नाम क्या थे?
(क) केशिध्वज और अमितध्वज
(ख) अमितध्वज और कृतध्वज
(ग) कृतध्वज और केशिध्वज
(घ) केशिध्वज और खाण्डिक्य-जनक
Answer: (ख) अमितध्वज और कृतध्वज
In simple words: धर्मध्वज के दो पुत्र थे, अमितध्वज और कृतध्वज।
🎯 Exam Tip: वंशावली के महत्वपूर्ण नामों को ध्यान से पढ़ें।
Question 4. खाण्डिक्य-जनक किसके पुत्र थे?
(क) अमितध्वज के
(ख) केशिध्वज के
(ग) धर्मध्वज के .
(घ) कृतध्वज के
Answer: (क) अमितध्वज के
In simple words: खाण्डिक्य-जनक अमितध्वज के पुत्र थे।
🎯 Exam Tip: पात्रों के बीच के संबंधों को स्पष्ट रूप से समझें।
Question 5. खाण्डिक्य वन में क्यों चला गया था?
(क) क्योंकि नगर में उसका दम घुटता था
(ख) क्योंकि वह केशिध्वज से पराजित हो गया था।
(ग) क्योंकि वह तपस्या करना चाहता था ।
(घ) क्योंकि उसके लिए वन का निवास रुचिकर था
Answer: (ख) क्योंकि वह केशिध्वज से पराजित हो गया था।
In simple words: खाण्डिक्य केशिध्वज से पराजित होने के कारण वन में चले गए थे।
🎯 Exam Tip: कहानी के महत्वपूर्ण घटनाक्रम और उनके कारणों को याद रखें।
Question 6. सिंह ने किसकी धर्मधेनु को मार डाला था?
(क) केशिध्वज की
(ख) अमितध्वज की
(ग) धर्मध्वज की
(घ) कृतध्वज की
Answer: (क) केशिध्वज की
In simple words: शेर ने केशिध्वज की यज्ञधेनु गाय को मार डाला था।
🎯 Exam Tip: घटना के मुख्य पात्र और प्रभावित वस्तु को स्पष्ट रूप से पहचानें।
Question 7. केशिध्वज क्या धारण करके खाण्डिक्य के पास पहुँचा था?
(क) कृष्णाजिन
(ख) वल्कल
(ग) कवच
(घ) राजसी वस्त्र
Answer: (ग) कवच
In simple words: केशिध्वज कवच पहनकर खाण्डिक्य के पास पहुँचे थे।
🎯 Exam Tip: कहानी में पात्रों के पहनावे या स्थिति से संबंधित विवरण महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
Question 8. केशिध्वज किसका प्रायश्चित करना चाहता था?
(क) उसने अपने पुरोहित का अपमान किया था
(ख) उसके यज्ञ की यज्ञधेनु को सिंह ने मार डाला था
(ग) वह अधिक यज्ञ नहीं कर सका था।
(घ) उसने अपने भाई का राज्य छीना था ।
Answer: (ख) उसके यज्ञ की यज्ञधेनु को सिंह ने मार डाला था
In simple words: केशिध्वज अपनी यज्ञ की यज्ञधेनु को शेर द्वारा मारे जाने का प्रायश्चित करना चाहता था।
🎯 Exam Tip: प्रायश्चित्त के कारण को ठीक से पहचानें।
Question 9. खाण्डिक्यजनक के मन्त्रियों ने केशिध्वज के प्रायश्चित पूछने के लिए आने पर उसे परामर्श दिया कि
(क) उसे प्रायश्चित बताकर पारलौकिक विजय प्राप्त करनी चाहिए
(ख) प्रायश्चित्त पूछने के लिए आये शत्रु को प्रायश्चित नहीं बताना चाहिए
(ग) विद्या सीखने के लिए आये हुए को नहीं मारना चाहिए
(घ) वंशगत शत्रु केशिध्वज को मार डालना चाहिए।
Answer: (घ) वंशगत शत्रु केशिध्वज को मार डालना चाहिए।
In simple words: खाण्डिक्य के मंत्रियों ने सलाह दी कि केशिध्वज, जो उनका वंशगत शत्रु था, उसे मार देना चाहिए।
🎯 Exam Tip: मंत्रियों द्वारा दी गई सलाह की प्रकृति और उनके इरादों को समझें।
Question 10. केशिध्वज के मन को सन्तोष क्यों नहीं था?
(क) क्योंकि उसने अपनी प्रजा को कष्ट दिया था।
(ख) क्योंकि उसने खाण्डिक्य को गुरुदक्षिणा नहीं दी थी
(ग) क्योंकि उसने खाण्डिक्य से क्षमायाचना नहीं की थी।
(घ) क्योंकि उसने यज्ञ के पुरोहित को दक्षिणा नहीं दी थी।
Answer: (ख) क्योंकि उसने खाण्डिक्य को गुरुदक्षिणा नहीं दी थी
In simple words: केशिध्वज को खाण्डिक्य को गुरुदक्षिणा न देने के कारण मन में असंतोष था।
🎯 Exam Tip: केशिध्वज के आंतरिक संघर्ष या अधूरी इच्छा को पहचानें।
Question 11. खाण्डिक्य ने केशिध्वज से गुरुदक्षिणा में राज्य क्यों नहीं माँगा?
(क) क्योंकि खाण्डिक्य को राज्य से घृणा हो गयी थी,
(ख) क्योंकि खाण्डिक्य के पास स्वयं बड़ा राज्य था।
(ग) क्योंकि खाण्डिक्य के मन्त्रियों ने राज्य न लेने की सलाह दी थी
(घ) क्योंकि खाण्डिक्यं आत्मज्ञान को क्लेश शान्त करने वाला समझता था
Answer: (घ) क्योंकि खाण्डिक्यं आत्मज्ञान को क्लेश शान्त करने वाला समझता था
In simple words: खाण्डिक्य ने राज्य नहीं माँगा क्योंकि वह आत्मज्ञान को ही क्लेश शांत करने का सर्वोत्तम साधन मानता था।
🎯 Exam Tip: खाण्डिक्य की आध्यात्मिक दृष्टि और भौतिक इच्छाओं से ऊपर उठने की प्रवृत्ति को समझें।
Question 12. 'मूर्खाः कामयन्ते राज्यादिकं न तु मादृशाः ।' वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?
(क) केशिध्वजः
(ख) अमितध्वजः
(ग) खाण्डिक्यजनकः
(घ) धर्मध्वजः
Answer: (ग) खाण्डिक्यजनकः
In simple words: इस वाक्य को कहने वाले खाण्डिक्यजनक हैं।
🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण उक्तियों और उनके वक्ताओं को याद रखना अक्सर पूछा जाता है।
Question 13. '............' कर्ममार्गे केशिध्वजश्च अध्यात्मशास्त्रे निपुणः आसीत्।' वाक्य में रिक्त-पद की पूर्ति होगी।
(क) “खाण्डिक्यः' से
(ख) 'कृतध्वजः' से
(ग) “अमितध्वजः' से
(घ) “धर्मध्वजः' से
Answer: (क) “खाण्डिक्यः' से
In simple words: रिक्त स्थान में 'खाण्डिक्यः' आएगा, जिसका अर्थ है कि खाण्डिक्य कर्ममार्ग में और केशिध्वज अध्यात्मशास्त्र में निपुण थे।
🎯 Exam Tip: पाठ के मुख्य पात्रों की विशिष्टताओं और उनकी विशेषज्ञता के क्षेत्रों को पहचानें।
Question 14. 'रे मूढ़! किं मृगाः कृष्णचर्मरहिताः भवन्ति?' वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?
(क) केशिध्वजः
(ख) धर्मध्वजः
(ग) खाण्डिक्यः
(घ) अमितध्वजः
Answer: (क) केशिध्वजः
In simple words: इस वाक्य के वक्ता केशिध्वज हैं।
🎯 Exam Tip: उद्धरणों को उनके सही वक्ताओं से जोड़ना महत्वपूर्ण है।
Question 15. किन्तु मया हतोऽयं पारलौकिकविजयं प्राप्स्यति, अहञ्च•••••••” ।' वाक्य में रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी
(क) राजकोषम्' से ।
(ख) राजसिंहासनम्' से
(ग) “धनम्' से
(घ) “पृथिवीम्' से
Answer: (घ) “पृथिवीम्' से
In simple words: रिक्त स्थान की पूर्ति 'पृथिवीम्' से होगी, जिसका अर्थ है कि 'अगर मैं इसे मारता हूँ तो यह परलोक में विजय प्राप्त करेगा, और मैं पृथ्वी पर।'
🎯 Exam Tip: अधूरे वाक्यों को संदर्भ के अनुसार सही शब्द से भरना सुनिश्चित करें।
Question 16. क्षत्रियः सन्नपि त्वं निष्कण्टकं राज्यं कथं न याचसे?' वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?
(क) केशिध्वजः
(ख) धर्मध्वजः ।
(ग) खाण्डिक्यः
(घ) अमितध्वजः
Answer: (क) केशिध्वजः
In simple words: इस वाक्य के वक्ता केशिध्वज हैं।
🎯 Exam Tip: यह कथन केशिध्वज द्वारा खाण्डिक्य से उसके निर्णय पर आश्चर्य व्यक्त करने के संदर्भ में है।
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