UP Board Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 11 Neeti navneetam

NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit: Chapter 11 नीति नवनीतम

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Practice Class 9 Sanskrit Solutions: Chapter 11 नीति नवनीतम

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UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 11 Neetinavneetam Question Answer (पद्म-पीयूषम्)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 11 हिंदी अनुवाद माङ्गलिकम्नीति-नवनीतम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

परिचय-महर्षि वेदव्यास कृत महाभारत नामक विशाल ग्रन्थ विचारों का एक महान् कोश है। इसमें कौरव-पाण्डव-युद्ध की कथा के माध्यम से अनेक विषयों पर व्यापक महत्त्व के विचार व्यक्त किये गये हैं। महाभारत के प्रमुख पात्रों में विदुर का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। ये धृतराष्ट्र के भाई, सच्चे उपदेशक एवं नीति-शास्त्र के श्रेष्ठ ज्ञाता-पालनकर्ता थे। इसीलिए इन्हें महात्मा विदुर कहा जाता था। महाभारत की विस्तृत कथा में कई स्थलों पर धृतराष्ट्र को दिया गया उपदेश संस्कृत साहित्य में ‘विदुर-नीति' के नाम से प्रसिद्ध है। 'विदुर-नीति' के श्लोक अन्य आचार्यों-शुक्र, शंख, भर्तृहरि के नीति-ग्रन्थों में भी पाठान्तर से प्राप्त होते हैं। प्रस्तुत पाठ के नीति श्लोक महाभारत के पंचम पर्व 'उद्योग-पर्व के अन्तर्गत 'प्रजागर' ‘नामक उपपर्व से संगृहीत किये गये हैं। इसमें मानसिक क्षोभ से ग्रस्त तथा भविष्य की भयावह स्थिति से त्रस्त धृतराष्ट्र को महात्मा विदुर के द्वारा नीति के उपदेश दिये - जाने का वर्णन है। प्रस्तुत पाठ में व्यावहारिक अनुभव के एकादश श्लोकों का संग्रह है।

पाठ-सारांश

प्रत्येक श्लोक को संक्षिप्त भाव इस प्रकार है

1. प्रिय बोलने वाले पुरुष तो मिलते हैं, परन्तु अप्रिय हितकर बात कहने वाले दुर्लभ हैं।
2. मनुष्य को बहुजन हिताय एक के हित का त्याग करना चाहिए।
3. समस्त धर्मों का सार यही है कि अन्यों के साथ ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए, जो स्वयं को बुरा लगे।
4. किसी पर भी अधिक विश्वास नहीं करना चाहिए।
5. शान्ति से क्रोधी, सदाचार से दुराचारी, दान से कृपण तथा सत्य से झूठे व्यक्ति को जीता जा सकता है।
6. चरित्र की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए। चरित्रहीन व्यक्ति का नाश अवश्यम्भावी है। धन तो आता-जाता रहता है।
7. मनुष्य में चरित्र की प्रधानता होती है। उसके न होने पर धन, मित्र एवं जीवन की कोई उपयोगिता नहीं होती है।
8. प्रत्येक कार्य को दूरदर्शिता से करना चाहिए।
9. मनुष्य को ऐसा कर्म करना चाहिए, जिससे अन्त में सुख मिले।
10. वीर, विद्वान् तथा कुशल सेवक, ये तीन ही पृथ्वी के अन्दर सुखों को प्राप्त करते हैं।
11. इस भूलोक के छः सुख हैं-प्रतिदिन धन की प्राप्ति, आरोग्य, प्यारी तथा प्रिय बोलने वाली स्त्री, आज्ञाकारी पुत्र तथा धन देने वाली विद्या ।।

पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या

Question 1. सुलभाःपुरुषाः राजन् सततं प्रियवादिनः ।। अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥
Answer: शब्दार्थ
सुलभाः = सरलता से प्राप्त हो जाने वाले।
सततं = संदा।
प्रियवादिनः = प्रिय वचन बोलने वाले।
पथ्यस्य = हितकर वचन को।
वक्ता = कहने चोला।
श्रोता = सुनने वाला।
दुर्लभः = कठिनाई से प्राप्त होने वाला।
सन्दर्भ
प्रस्तुत नीति-श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत पद्म-पीयूषम्' के नीतिनवनीतम्' पाठ से उधृते है।
[संकेत-इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में सुलभ और दुर्लभ व्यक्तियों के विषय में बताया गया है।
अन्वय
हे राजन् ! सततं प्रियवादिनः पुरुषाः सुलभाः (सन्ति); अप्रियस्य पथ्यस्य (वचनस्य) तु वक्ता श्रोता च दुर्लभः (अस्ति)।
व्याख्या हे राजन्! निरन्तर प्रियवचन बोलने वाले पुरुष तो सरलता से प्राप्त हो जाते हैं, परन्तु कटु और हितकारी वचनों को कहने वाले और सुनकर सहन करने वाले श्रोता कठिनाई से ही मिलते
In simple words: हे राजन, हमेशा मीठा बोलने वाले लोग आसानी से मिल जाते हैं। लेकिन कड़वे, फिर भी हितकारी वचन कहने वाले और उन्हें धैर्य से सुनने वाले व्यक्ति बहुत दुर्लभ होते हैं।

🎯 Exam Tip: इस श्लोक की व्याख्या करते समय प्रिय और अप्रिय वचनों के वक्ता-श्रोता की तुलना पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि यह नीति-वचन का मूल भाव है।

 

Question 2. त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्येजत् ॥
Answer: शब्दार्थ
त्यजेत् = छोड़ देना चाहिए। कुलस्यर्थे = कुल की भलाई के लिए। ग्रामस्या = ग्राम की भलाई के लिए।
जनपदस्यार्थे = जनपद की भलाई के लिए आत्मार्थे= अपने कल्याण के लिए।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि व्यक्ति को अपने हित के लिए सब कुछ छोड़ देना चाहिए।
अन्वय कुलस्यार्थे एकं त्यजेत्, ग्रामस्यायें कुलं त्यजेत्, जनपदस्यार्थे ग्रामं (त्यजेत्), आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ।।
व्याख्या मनुष्य को परिवार की भलाई के लिए एक व्यक्ति को छोड़ देना चाहिए, गाँव के हित के लिए अपने परिवार को त्याग देना चाहिए, जनपद की भलाई के लिए गाँव को छोड़ देना चाहिए और अपने कल्याण के लिए पृथ्वी को त्याग देना चाहिए।
In simple words: बड़े कल्याण के लिए छोटी वस्तुओं का त्याग करना उचित है। परिवार के लिए एक सदस्य को, गाँव के लिए परिवार को, जनपद के लिए गाँव को और अपने आत्मा के कल्याण के लिए पृथ्वी तक का त्याग किया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: इस श्लोक में बड़े हित के लिए छोटे हित के त्याग के क्रम को स्पष्ट रूप से समझाएँ। आत्मा के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का विचार महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥
Answer: शब्दार्थ
श्रूयताम् = सुनिए। सर्वस्वं = सब कुछ, प्रत्येक वस्तु। श्रुत्वा = सुनकर। अवधार्यताम् = धारण कीजिए। आत्मनः = अपने। प्रतिकूलानि = विरुद्ध आचरण। परेषां = दूसरों। के लिए। समाचरेत् = करना चाहिए।
प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में व्यक्ति के सर्वश्रेष्ठ धर्म को बताया गया है।
अन्वय धर्मसर्वस्वं श्रूयतां, श्रुत्वा च अपि अवधार्यताम् (यत्) आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।।
व्याख्या धर्म का सब कुछ अर्थात् सार सुनिए और सुनकर उसको धारण कीजिए। वह सारे यह है कि जो भी आचरण आप अपने लिए अनुकूल नहीं समझते हों, वैसा आचरण आपको दूसरों के प्रति भी नहीं करना चाहिए।
In simple words: धर्म का सार यह है कि जो व्यवहार आपको स्वयं पसंद नहीं, वह दूसरों के साथ भी न करें। इस सिद्धांत को सुनकर जीवन में धारण करें।

🎯 Exam Tip: यह श्लोक 'परोपकार' और 'समानता' के सिद्धांत को दर्शाता है। व्याख्या में इस सार्वभौमिक धर्म के महत्व को रेखांकित करें।

 

Question 4. न चिश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नीतिविश्वसेत्। विश्वासाद् भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ।
Answer: शब्दार्थ
न विश्वसेत् = विश्वास नहीं करना चाहिए। अविश्वस्ते = विश्वास न करने योग्य पर। न अतिविश्वसेत् = अधिक विश्वास नहीं करना चाहिए। मूलानि अपि = जड़ों को भी। निकृन्तति = काट डालता है।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि व्यक्ति को किसी पर भी अत्यधिक विश्वास नहीं करना चाहिए।
अन्वय अविश्वस्ते न विश्वसेत्, विश्व न अतिविश्वसेत्। विश्वासात् उत्पन्न भयं मूलानि अपि निकृन्तति।
व्याख्या जो विश्वास के योग्य नहीं है, उस पर विश्वास नहीं करनी चाहिए। जो विश्वसनीय हो, उसके ऊपर भी अधिक विश्वास नहीं करना चाहिए। विश्वास से इतना भय उत्पन्न हो जाता है कि वह जड़ों को भी काट देता है। तात्पर्य यह है कि किसी भी व्यक्ति पर अत्यधिक विश्वास करने से .. उसके द्वारा समूल नाश किये जाने की सम्भावना बन जाती है।
In simple words: जिस पर विश्वास न हो उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए, और जिस पर विश्वास हो उस पर भी अत्यधिक विश्वास नहीं करना चाहिए। अत्यधिक विश्वास से उत्पन्न भय जड़ों को भी काट डालता है, यानी पूर्ण विनाश कर सकता है।

🎯 Exam Tip: इस श्लोक में विश्वास और अतिविश्वास के खतरों पर जोर दिया गया है। विश्वास के विवेकपूर्ण उपयोग और उसके परिणामों को स्पष्ट करें।

 

Question 5. अक्रोधेन जयेत् क्रोधमसाधु साधुना जयेत् ।। जयेत् कदर्यं दानेन जयेत् सत्येन चानृतम् ॥
Answer: शब्दार्थ
अक्रोधेन = क्रोध के अभाव से, शान्ति से। जयेत् = जीतना चाहिए। असाधं = असाधु को, दुष्ट को। साधुना = सदाचार से। कदर्यम् = कंजूसी को। अनृतम् = असत्य को या असत्यवादी को।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में क्रोधी को, दुष्ट व्यक्ति को तथा कंजूस को कैसे जीता जाए, इसके विषय में बताया गया है।
अन्वय अक्रोधेन क्रोधं जयेत्। साधुना असाधुम् जयेत्। दानेन कदर्यम् जयेत्। सत्येन च अनृतम् जयेत् ।।
व्याख्या
क्रोधी व्यक्ति को अक्रोध (क्षमाशीलता) से जीतना चाहिए। सद्व्यवहार से दुर्जन पुरुष को जीतना चाहिए। दान देने से कंजूस को जीतना चाहिए और सत्य बोलने से असत्य (बोलने वाले व्यक्ति) को जीतना चाहिए।
In simple words: क्रोध को शांत भाव से, दुष्ट को सज्जनता से, कंजूस को दान से और असत्य को सत्य से जीतना चाहिए। यह श्लोक विपरीत गुणों से दोषों पर विजय पाने का मार्ग सिखाता है।

🎯 Exam Tip: यह श्लोक जीवन में सद्गुणों के महत्व को बताता है। प्रत्येक दोष को कैसे पराजित किया जा सकता है, इसका स्पष्टीकरण आवश्यक है।

 

Question 6. वृत्तं यत्नेन संरक्षेद वित्तमायाति मति च ।। अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ॥
Answer: शब्दार्थ
वृत्तम् = चरित्र की। यत्नेन = प्रयत्नपूर्वक। संरक्षेद् = रक्षा करनी चाहिए। आयाति याति = आता-जाता है।
अक्षीणः = जो क्षीण नहीं है, वह। क्षीणः = दुर्बल। वृत्ततः = चरित्र से। हतः = भ्रष्ट हुआ।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में चरित्र की प्रधानता पर विशेष बल दिया गया है।
अन्वय वृत्तं यत्नेन संरक्षेत्। वित्तम् आयाति याति च। वित्ततः क्षीणः अक्षीणः भवति। वृत्ततः हतः तु हत (एव भवति)।
व्याख्या (मनुष्य को अपने) चरित्र की प्रयत्न से रक्षा करनी चाहिए। धन तो आता है और चला जाता है। धन की दृष्टि से दुर्बल व्यक्ति निर्धन नहीं होता है, लेकिन चरित्र से भ्रष्ट (गिरा) हुआ व्यक्ति तो मर ही जाता है अर्थात् समाज में उसे जाना ही नहीं जाता है। तात्पर्य यह है कि व्यक्ति को अपने चरित्र की रक्षा करनी चाहिए।
In simple words: मनुष्य को अपने चरित्र की रक्षा बहुत सावधानी से करनी चाहिए, क्योंकि धन तो आता-जाता रहता है। धन से निर्धन हुआ व्यक्ति क्षीण नहीं होता, लेकिन चरित्र से गिरा हुआ व्यक्ति मृत के समान है।

🎯 Exam Tip: चरित्र की महत्ता और धन की अस्थिरता के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें। 'चरित्रहीन व्यक्ति मृत के समान है' इस बिंदु पर जोर दें।

 

Question 7. शीलं प्रधानं पुरुषे तद्यस्येह प्रणश्यति। न तस्य जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभिः ॥
Answer: शब्दार्थ
शीलं = चरित्र। प्रधानम् = मुख्य। इह = इस लोक में। प्रणश्यति = नष्ट हो जाता है। तस्य = उसका।
जीवितेनार्थः = जीवित रहने का प्रयोजन। धनेन = धन के द्वारा। बन्धुभिः = बन्धुओं ‘(भाइयों) द्वारा।।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में व्यक्ति के लिए चरित्र का महत्त्व बताया गया है।
अन्वय
इह पुरुषे शीलं प्रधानं (अस्ति) यस्य तद् प्रणश्यति, तस्य न जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभिः।
व्याख्या
इस संसार में पुरुष में चरित्र ही मुख्य गुण होता है। जिसका यह गुण नष्ट हो जाता है, उसके न जीवित रहने का कोई मतलब है, न धनु का। ऐसे व्यक्ति की उसके बन्धु भी कामना नहीं करते। तात्पर्य यह है कि चरित्रहीन व्यक्ति का जीवन ही व्यर्थ हो जाता है।
In simple words: मनुष्य के जीवन में चरित्र ही सबसे महत्वपूर्ण है। जिसका चरित्र नष्ट हो जाता है, उसके जीवन, धन और संबंधियों का कोई मूल्य नहीं रहता। चरित्रहीन व्यक्ति का जीवन व्यर्थ माना जाता है।

🎯 Exam Tip: यह श्लोक चरित्र को जीवन का आधार मानता है। चरित्र के अभाव में जीवन की निरर्थकता को उदाहरण सहित समझाएँ।

 

Question 8. दिवसेनैव तत्कुर्याद् येन रात्रौ सुखं वसेत् ।। अष्टमासेन तत् कुर्याद् येन वर्षाः सुखं वसेत् ॥
Answer: शब्दार्थ
दिवसेन = दिनभर में। कुर्यात् = करना चाहिए। रात्रौ = रात्रि में। वसेत् = रहे। अष्टमासेन = आठ महीनों में।
वर्षाः = वर्षा ऋतु तक ।।
प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में दिनभर किये गये और आठ महीने किये गये श्रम के लाभ का वर्णन किया गया है।
अन्वय दिवसेन एव तत् कुर्यात्, ग्रेन रात्रौ सुखं वसेत्। अष्टमासेन तत् कुर्यात्, येन वर्षाः सुखं। वसेत्।
व्याख्या
दिनभर में ही वह कार्य कर लेना चाहिए, जिससे रात्रि में सुखपूर्वक रह सकें। आठ. महीने तक वह कर लेना चाहिए, जिससे वर्षपर्यन्त सुखपूर्वकै रह सकें। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक कार्य। को दूरदर्शिता और श्रमपूर्वक करना चाहिए।
In simple words: दिन में वह कार्य करें जिससे रात में सुख मिले, और आठ महीनों में वह कार्य करें जिससे पूरे वर्ष सुखपूर्वक रह सकें। यह दूरदर्शिता और योजनाबद्ध तरीके से कार्य करने का महत्व बताता है।

🎯 Exam Tip: समय के सदुपयोग और भविष्य की योजना के महत्व को इस श्लोक में दर्शाया गया है। इसे दैनिक और वार्षिक योजना के संदर्भ में समझाएँ।

 

Question 9. पूर्वे वयसि तत्कुर्याद् येन वृद्धः सुखं वसेत् ।। यावज्जीवेन तत्कुर्याद् येन प्रेत्य सुखं वसेत् ॥
Answer: शब्दार्थ
पूर्वे वयसि = पहली अवस्था में, यौवन में।
वृद्धः = बूढा।
यावज्जीवेन = जीवनभर में।
प्रेत्य = मरकर, परलोक में।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में मनुष्य द्वारा सत्कार्य किये जाने को वर्णन किया गया है।
अन्वय
(मनुष्यः) पूर्वे वयसि तत् कुर्यात्, येन वृद्धः (सन्) सुखं वसेत्। यावज्जीवेन तत् कुर्यात् येन प्रेत्य सुखं वसेत्।
व्याख्या मनुष्य को पहली अवस्था अर्थात् जवानी में उस कार्य को कर लेना चाहिए अर्थात् युवावस्था में मनुष्य को सन्तानादि के प्रति कर्तव्य-निर्वाह को ध्यानपूर्वक करना चाहिए, जिससे वृद्ध होने पर वह सुखपूर्वक रह सके। जीवनभर में वह कार्य करना चाहिए, जिससे मरकर परलोक में सुखपूर्वक रह सके। मृत्यु के पश्चात् सुखपूर्वक रहने का अर्थ कीर्ति रूप से संसार में रहने तथा आत्मा की शान्ति से है।
In simple words: युवावस्था में ऐसे कार्य करें जिससे बुढ़ापे में सुख मिले, और जीवन भर ऐसे कार्य करें जिससे मृत्यु के बाद परलोक में शांति मिले। यह जीवन के प्रत्येक चरण में अच्छे कर्मों के महत्व को बताता है।

🎯 Exam Tip: यह श्लोक दीर्घकालिक योजना और सत्कर्मों के महत्व को उजागर करता है। युवावस्था और जीवन भर के कार्यों के परिणामों को स्पष्ट करें।

 

Question 10. सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुषास्त्रयः। शूरश्च कृतविद्यश्च यश्च जानाति सेवितुम् ॥
Answer: शब्दार्थ
सुवर्णपुष्पाम् = सोने के फूलों वाली धनधान्य से पूर्ण। चिन्वन्ति = चुनते हैं। पुरुषास्त्रयः = तीन प्रकार के पुरुष।
शूरः = वीर। कृतविद्यः = विद्या प्राप्त किया हुआ। सेवितुं जानाति = सेवा करना जानता है।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में पृथ्वी को भोगने की क्षमता रखने वाले व्यक्तियों का वर्णन किया गया
अन्वय
यः शूरः च, कृतविद्यः च, (यः) च सेवितुं जानाति (एते) त्रयः पुरुषाः सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति।
व्याख्या
जो शूरवीर हैं, विद्या प्राप्त किये हुए हैं और दूसरों की सेवा करना जानते हैं, ये तीन प्रकार के पुरुष पृथ्वी से स्वर्णपुष्पों को चुनते हैं। तात्पर्य यह है कि इस पृथ्वी पर सभी प्रकार की सम्पत्तियाँ उपलब्ध हैं। इन सम्पत्तियों को शूरवीर, विद्वान् और परोपकारी ही प्राप्त करते हैं।
In simple words: यह पृथ्वी सोने के फूलों से भरी है, और इसे केवल तीन प्रकार के पुरुष ही चुन पाते हैं: शूरवीर, विद्वान और जो सेवा करना जानते हैं। ये गुण ही समृद्धि और सफलता दिलाते हैं।

🎯 Exam Tip: इस श्लोक में 'सुवर्णपुष्पां पृथिवी' का अर्थ और उसे प्राप्त करने वाले तीन प्रकार के पुरुषों (शूरवीर, विद्वान, सेवक) के गुणों को स्पष्ट रूप से समझाएँ।

 

Question 11. अर्थागमो नित्यमरोगिता च प्रियाश्च भार्या प्रियवादिनी च ।। वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन् ॥
Answer: शब्दार्थ
अर्थागमः = धन का आना। अरोगिता = रोगरहित होना। प्रिया = प्रिय। भार्या = पत्नी। प्रियवादिनी = मधुर बोलने वाली। वश्यः = वश में रहने वाला, आज्ञाकारी। अर्थकरी = धन कमाने वाली। षड् = छः।
प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में जीवलोक के छः सुखों के नाम गिनाये गये हैं।
अन्वय
राजन्! नित्यम् अर्थागमः अरोगिता च, प्रिया भार्या प्रियवादिनी च, वश्यः पुत्रः च, अर्थकरी विद्या च, (एतानि) षट् जीवलोकस्य सुखानि (सन्ति)।
व्याख्या
हे राजन् ! सदा धन का आगमन (प्राप्ति) होना, रोगरहित होना, प्रिय और मधुरभाषिणी पत्नी, वश में रहने वाला आज्ञाकारी पुत्र और धन कमाने वाली विद्या-ये छः जीवलोक (संसार) के सुख हैं। तात्पर्य यह है कि जिनके पास उपर्युक्त छः की उपलब्धता है, उन्हें ही सुखी मानना चाहिए।
In simple words: हे राजन, इस संसार में छह प्रकार के सुख हैं: प्रतिदिन धन की प्राप्ति, निरोगी काया, प्रिय और मीठा बोलने वाली पत्नी, आज्ञाकारी पुत्र और धन कमाने वाली विद्या। ये मिलकर जीवन को सुखी बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: इस श्लोक में वर्णित छह सुखों को सूचीबद्ध करें और उनकी महत्ता को संक्षेप में स्पष्ट करें। जीवन में इन तत्वों के संतुलन को उजागर करें।

सूक्तिपरक वाक्य की व्याख्या

Question 1. अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ।
Answer: सन्दर्य
प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत पद्म-पीयूषम्' के नीति-नवनीतम्' एर से उद्धृत है।
संकेत
इस पाठ की शेष समस्त सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।
प्रसंगर प्रस्तुत सूक्ति में बताया गया है कि सत्य और हितकारी बात को सुनने और कहने वाले मुश्किल से मिलते हैं।
अर्थ अप्रिय तथा हितकारी बात को कहने वाला और सुनने वाला दोनों ही दुर्लभ होते हैं।
व्याख्या
संसार में प्रियवचन बोलने वालों की संख्या अधिक होती है; क्योंकि प्रियवचन बोलने में सुनने वाले के हित का ध्यान रखना अनिवार्य नहीं है। हितकारी वचन प्रायः कटु होते हैं; जैसे - गुणकारी औषध। यदि औषध में मिठास का ध्यान रखा जाएगा तो उसके गुणकारी होने की ओर ध्यान कम हो जाता है। इसीलिए पहले तो हितकारी बात कहने वाले ही कम होते हैं; क्योंकि वह सुनने वाले को कड़वी लगती है। अधिकांश श्रोता हितकारी होने पर भी कड़वी बात सुनना पसन्द नहीं करते। यदि कोई कड़वी और हितकारी बात को कहने का साहस भी करे तो सुनने वाला उसको सुनना नहीं चाहेगा। ऐसा व्यक्ति, जो कड़वी तथा हित की बात कहने का साहसी हो और ऐसा व्यक्ति, जो उस कटु तथा हित की बात को सुनकर सहन कर ले तथा भाराज न हो, दोनों ही प्रकार के लोग मुश्किल से मिलते हैं।
In simple words: सत्य और हितकारी बात अक्सर कड़वी होती है, इसलिए उसे कहने वाले और सुनने वाले दोनों ही प्रकार के लोग इस संसार में बहुत कम मिलते हैं। मीठा बोलने वाले अधिक होते हैं क्योंकि उसमें किसी को बुरा नहीं लगता।

🎯 Exam Tip: इस सूक्ति में कड़वे सच और हितकारी सलाह के महत्व और समाज में उनकी दुर्लभता को रेखांकित करें।

 

Question 2. आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ।
Answer: प्रसंग
प्रस्तुत सूक्ति में कल्याण के लिए त्याग करने की बात को समझाया गया है।
अर्थ अपने कल्याण के लिए पृथ्वी को त्याग देना चाहिए।
व्याख्या
प्रस्तुत सूक्ति में व्यक्ति की त्यागवृत्ति के आदर्श को निरूपित किया गया है। यदि एक को त्यागने से कुल का, कुल को त्यागने से गाँव का, गाँव को त्यागने से जनपद का कल्याण होता हो तो व्यक्ति को इन्हें निःसंकोच त्याग देना चाहिए। इसी प्रकार से यदि व्यक्ति को अपना कल्याण किसी वस्तु को त्यागने से होता हो तो उसे त्याग देना चाहिए, भले ही वह वस्तु कितनी ही बहुमूल्य क्यों न हो। यहाँ तक कि यदि अपने प्राणों को त्यागने से व्यक्ति का कल्याण हो तो उसे उन्हें भी त्याग देना चाहिए। यहाँ पर अपने कल्याण से तात्पर्य यश, कीर्ति से है; अर्थात् यदि प्राणों को त्यागने से सदैव के लिए व्यक्ति को यश और कीर्ति की प्राप्ति होती हो तो उसे प्राणों को त्यागने में भी संकोच नहीं करना चाहिए।
In simple words: अपने परम कल्याण, जैसे यश और कीर्ति के लिए व्यक्ति को भौतिक वस्तुओं, यहाँ तक कि अपने प्राणों का भी त्याग करने को तैयार रहना चाहिए। यह सूक्ति बड़े उद्देश्य के लिए बलिदान के महत्व को बताती है।

🎯 Exam Tip: 'आत्मार्थे' का अर्थ केवल स्वार्थ नहीं, बल्कि यश और कीर्ति से जुड़े व्यापक कल्याण से है, इसे स्पष्ट रूप से समझाएँ। त्याग के विभिन्न स्तरों को उल्लेख करें।

 

Question 3. आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥
Answer: प्रसंग
प्रस्तुत सूक्ति में धर्म के सार को बताया गया है। अर्थ-जो आचरण अपने लिए ठीक न हो, उसे दूसरों के लिए नहीं करनी चाहिए।
व्याख्या
व्यक्ति जिस आचरण को अपने लिए उचित नहीं समझता, उसे स्वयं वैसा आचरण दूसरों के लिए भी नहीं करना चाहिए। यही सब धर्मों का सार है, यही शाश्वत धर्म है, यही सबके कल्याण का मूलमन्त्र है।
In simple words: जो व्यवहार तुम्हें स्वयं पसंद नहीं, वैसा व्यवहार दूसरों के साथ भी कभी न करें। यह सभी धर्मों का मूल सिद्धांत और सार्वभौमिक कल्याण का मंत्र है।

🎯 Exam Tip: यह सूक्ति 'स्वयं के साथ जैसा चाहते हो, वैसा दूसरों के साथ करो' के स्वर्णिम नियम को दर्शाती है। इसकी व्याख्या में समानुभूति (empathy) के महत्व पर प्रकाश डालें।

 

Question 4. अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ।।
Answer: प्रसंग
प्रस्तुत सूक्ति में व्यक्ति के जीवन में चरित्र की महत्ता को बताया गया है।
अर्थ धन का नाश, नाश नहीं होता, किन्तु चरित्र से मरा हुआ तो मर ही जाता है।
व्याख्या
इस संसार में धन का आना-जाना तो लगा ही रहता है। धन का होना या न होना व्यक्ति के जीवन में कोई महत्त्व नहीं रखता। यदि व्यक्ति धनवान् है, किन्तु उसका व्यवहार, आचार-विचार और चरित्र ठीक नहीं है, तो सभी लोग उसे घृणा की दृष्टि से देखते हैं। ऐसे लोग जनसामान्य के सम्मान का पात्र नहीं बन पाते। ऐसे घृणास्पद जीवन से तो मर जाना ही श्रेयस्कर होता है। इसके विपरीत यदि व्यक्ति के पास धन नहीं है अथवा उसका धन किन्हीं कारणों से नष्ट हो गया है। और उस व्यक्ति का व्यवहार मृदु तथा चरित्र उत्तम बना रहता है, मन-वचन तथा कर्म से वह सदाचरण करता है तो सम्पूर्ण समाज उसे सम्मानपूर्ण दृष्टि से देखता है। उसका आचरण और वचन प्रामाणिक माने जाते हैं। भला ऐसे व्यक्ति के लिए धन का क्या महत्त्व है, उसने तो बिना धन के ही सब कुछ पा लिया है। इसीलिए तो कहा गया है कि धन के नष्ट होने से व्यक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, किन्तु यदि व्यक्ति का चरित्र नष्ट हो गया तो समझो वह व्यक्ति ही मर गया। अंग्रेजी में ऐसी ही एक कहावत है
If wealth is lost, nothing is lost.
If health is lost, something is lost.
If character is lost, everything is lost.
अतः व्यक्ति को अपने चरित्र को अक्षुण्ण रखना चाहिए।
In simple words: धन की हानि होने से व्यक्ति का नाश नहीं होता, पर यदि चरित्र चला जाए तो वह मृत के समान हो जाता है। चरित्र ही मनुष्य का सच्चा धन है, जिसके बिना सब कुछ व्यर्थ है।

🎯 Exam Tip: यह सूक्ति चरित्र की महत्ता और धन की क्षणभंगुरता को स्पष्ट करती है। अंग्रेजी कहावत का उल्लेख अतिरिक्त अंक दिला सकता है।

 

Question 5. यावज्जीवेन तत्कुर्याद् येन प्रेत्य सुखं वसेत् ।।
Answer: प्रसंग
प्रस्तुत सूक्ति में बुरे कार्यों को न करने की बात पर बल दिया गया है।
अर्थ
व्यक्ति को जीवनभरं उन कार्यों को करना चाहिए, जिससे (वह) मरकर परलोक में सुखपूर्वक रह सके।
व्याख्या
भारतीय दर्शनशास्त्र का मत है कि जो व्यक्ति अच्छे कार्य करके अपने जीवन में पुण्यों का संचय करता है, वह मरकर परलोक में सुखपूर्वक रहता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने जीवन में बुरे कर्म करके पापों का संचय करता है, वह मरकर परलोक में महान् दुःखों को भोगता है। इसलिए व्यक्ति को जीवनभर अच्छे कार्य करके पुण्यों का संचय कर लेना चाहिए, जिससे परलोक में उसे कोई कष्ट न हो।
In simple words: मनुष्य को पूरे जीवन ऐसे कार्य करने चाहिए, जिनसे मरने के बाद परलोक में उसे सुख और शांति मिले। यह अच्छे कर्मों और पुण्यार्जन के महत्व पर जोर देती है।

🎯 Exam Tip: यह सूक्ति भारतीय दर्शन में 'कर्मफल' के सिद्धांत को स्पष्ट करती है। इसे वर्तमान और भविष्य के सुख के बीच संबंध के रूप में समझाएँ।

श्लोक का संस्कृत-अर्थ

Question 1. सुलभाः पुरुषाः - ओता च दुर्लभः ॥ (श्लोक 1)
Answer: संस्कृतार्थः-
महात्मा विदुरः धृतराष्ट्रम् उपदिशति यत् हे नृप! हितकराणि वचनानि अप्रियाणि कटूनि च भवन्ति। संसारे अस्मिन् एतादृशाः पुरूषाः तु बाहुल्येन प्राप्यन्ते ये अनवरतं प्रियं वदन्ति। परम् एतादृशाः जनाः न प्राप्यन्ते ये हितकारकाणि वचनानि वदन्ति, यतः तानि श्रोतुः अप्रियाणि भवन्ति। यदि भाग्येन एतादृशाः पुरुषः प्राप्यते यः अप्रियं कटु हितवचं कथयति, कश्चित् तस्य वचनं श्रोतुं समर्थः न भवति। अप्रियं कटु हितवचनानि श्रोतापि दुर्लभो भवति ।।
In simple words: विदुर धृतराष्ट्र को समझाते हैं कि प्रिय बोलने वाले लोग आसानी से मिल जाते हैं, लेकिन कड़वे और हितकारी वचन कहने वाले और सुनने वाले दोनों ही संसार में दुर्लभ होते हैं। ऐसे व्यक्ति भाग्य से ही मिलते हैं जो अप्रिय सत्य कहते हैं, और उन्हें सुनने वाले भी कम होते हैं।

🎯 Exam Tip: इस संस्कृतार्थ में प्रियवचनी और हितवचनी व्यक्तियों के बीच का अंतर स्पष्ट करें। 'दुर्लभ' शब्द के महत्व पर ध्यान दें।

 

Question 2. त्येजेदेकं कुलस्यार्थे - पृथिवीं त्यजेत् ॥ (श्लोक 2)
Answer: संस्कृतार्थः- विदुरः धृतराष्ट्रं कथयति यत् यदि एकस्य पुरुषस्य परित्यागेन कुलस्य रक्षा भवति तदा एकं त्यजेत्। यदि कुलस्य परित्यागेन ग्रामस्य रक्षा भवति तर्हि स्वकीयं परिवारं त्यजेत्। यदि ग्रामस्य परित्यागेन जनपदस्य रक्षा भवति, तर्हि ग्रामं त्यजेत्। यदि पृथिव्याः परित्यागेन आत्मनः एव कल्याणं भवति, तर्हि पृथिवीं त्यजेत्।
In simple words: विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं कि यदि एक व्यक्ति के त्याग से कुल की रक्षा हो, तो उसे त्यागें। यदि कुल के त्याग से गाँव की रक्षा हो, तो कुल त्यागें। यदि गाँव के त्याग से जनपद की रक्षा हो, तो गाँव त्यागें। और यदि पृथ्वी के त्याग से आत्मा का कल्याण हो, तो पृथ्वी भी त्याग दें।

🎯 Exam Tip: त्याग के क्रम और उसके अंतिम लक्ष्य (आत्म-कल्याण) को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें। श्लोक के नीतिपरक संदेश पर जोर दें।

 

Question 3. अक्रोधेन जयेत् - चानृतम् ॥ (श्लोक 5)
Answer: संस्कृतार्थः-
क्रोधस्वभावं पुरुषं शान्त्या स्ववशं कुर्यात्, दुर्जनं पुरुषं सद्व्यवहारेण जयेत्, धनादिकं दत्त्वा कृपणं जयेत्, सत्यवचनेन मिथ्याभाषिणं स्ववशं कुर्यात् ।।
In simple words: क्रोध स्वभाव वाले व्यक्ति को शांति से, दुर्जन को अच्छे व्यवहार से, कंजूस को दान से और झूठे व्यक्ति को सत्य से वश में करना चाहिए। यह बताता है कि हर दोष को उसके विपरीत गुण से जीता जा सकता है।

🎯 Exam Tip: प्रत्येक नकारात्मक गुण को सकारात्मक गुण से जीतने के तरीके को स्पष्ट करें। उदाहरणों के माध्यम से समझाना प्रभावी होगा।

 

Question 4. वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् - हतो हतः ॥ (श्लोक 7)
Answer: संस्कृतार्थः-
महाभारते महाराजः विदुरः कथयति यत् नरः स्वचरित्रस्य रक्षां प्रयत्नपूर्वकं कुर्यात्। धन॑स्य रक्षायै विशेष प्रयत्नं न कुर्यात्, धनं तु कदाचित् आगच्छति, कदाचित् च गच्छति। चरित्रे. धने च महदन्तरम् अस्ति। यदि कदाचित् धनं नश्यति तर्हि धनहीनः पुरुषः क्षीणः न मन्यते, किन्तु चरित्रस्य दृष्ट्या पतितः पुरुषः चिराय नष्टः भवति।
In simple words: विदुर कहते हैं कि मनुष्य को अपने चरित्र की रक्षा ध्यान से करनी चाहिए, धन की रक्षा के लिए विशेष प्रयास न करें। धन आता-जाता रहता है, पर चरित्र और धन में बहुत अंतर है। धनहीन व्यक्ति कमजोर नहीं माना जाता, लेकिन चरित्रहीन व्यक्ति सदा के लिए नष्ट हो जाता है।

🎯 Exam Tip: चरित्र को धन से अधिक महत्वपूर्ण बताने वाले इस श्लोक की तुलना में दोनों के बीच के अंतर पर बल दें।

 

Question 5. अर्थागमो नित्यमरोगिता - सुखानि राजन् ॥ (श्लोक 11)
Answer: संस्कृतार्थः-
महाराजः विदुरः धृतराष्ट्रं प्रति कथयति यत् हे राजन् ! प्राणिनां षट् सुखानि भवन्ति-धनस्य प्राप्तिः, अनवरतं स्वस्थं शरीरं, मधुर
In simple words: महाराज विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं कि हे राजन, प्राणियों के छह सुख होते हैं: धन की प्राप्ति, हमेशा स्वस्थ शरीर, मधुर बोलने वाली पत्नी, आज्ञाकारी पुत्र और धन कमाने वाली विद्या। यह श्लोक जीवन के प्रमुख सुखों को सूचीबद्ध करता है।

🎯 Exam Tip: श्लोक में वर्णित छह सुखों को संस्कृत में लिखें और उनकी व्याख्या हिंदी में करें, यह सुनिश्चित करते हुए कि प्रत्येक सुख स्पष्ट रूप से परिभाषित हो।

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