UP Board Solutions Class 9 Hindi Chapter 1 Baat

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Class 9 Hindi Chapter 1 बात Textbook Solutions with Answers

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

Question 1. निम्नांकित गद्यांशों में रेखांकित अंशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या और तथ्यपरक प्रश्नों के उत्तर दीजिये
(1) यदि हम वैद्य होते तो कफ और पित्त के सहवर्ती बात की व्याख्या करते तथा भूगोलवेत्ता होते तो किसी देश के जलबात का वर्णन करते, किन्तु दोनों विषयों में से हमें एक बात कहने का भी प्रयोजन नहीं है। हम तो केवल उसी बात के ऊपर दो-चार बातें लिखते हैं, जो हमारे-तुम्हारे सम्भाषण के समय मुख से निकल-निकल के परस्पर हृदयस्थ भाव को प्रकाशित करती रहती हैं।
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(2) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए ।
(3) हम अपने हृदयस्थ भावों की अभिव्यक्ति किसके माध्यम से करते हैं?
(4) भूगोलवेत्ता किसका अध्ययन करता है?
(5) वैद्य किस बात का वर्णन करते हैं?
[शब्दार्थ-सहवर्ती = साथ रहनेवाला, सहचर । वेत्ता = ज्ञाता, जाननेवाला। बात = वचन, शरीरस्थ वायु, वायु । जल-बात = जलवायु । प्रयोजन = मतलब । संभाषण = वार्तालाप । हृदयस्थ = हृदय में स्थित ।]
Answer:
1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी गदा' में संकलित एवं पं० प्रतापनारायण मिश्र द्वारा लिखित 'बात' शीर्षक पाठ से उद्धृत है। यहाँ लेखक बात की महत्ता बताते हुए कहता है कि जिस प्रकार का व्यक्ति होता है वह उसी प्रकार की बात करता है।
2. रेखांकित अंशों की व्याख्या - लेखक इस तथ्य से अवगत कराते हुए कहता है कि एक व्यक्ति का जो स्वभाव होगा अथवा जो जिस प्रकार का कार्य करेगा वह स्वाभाविक रूप से उसी प्रकार के वातावरण में उसी कार्य के अनुसार बुद्धिवाला हो जायेगा, फिर वह उसी से सम्बन्धित बात करेगी। उदाहरणस्वरूप यदि हम वैद्यराज को लें तो अपने स्वभावानुसार एवं कार्य के अनुरूप किसी रोग जैसे पित्त और उससे सम्बन्धित विषयों पर बात करेगा। यदि कोई भूगोल का ज्ञाता होगा तो वह अपने स्वभावानुसार किसी देश की जलवायु अथवा प्राकृतिक विषयों पर बात करेगा। परन्तु लेखक कहता है कि दोनों विषयों में बात कहने का हमारा कोई प्रयोजन नहीं है। हम लोग उसी विषय पर बात लिखते अथवा करते हैं जो हृदय की भावनाओं को वाणी के माध्यम से प्रकाशित करती है। हमारे मन की जो स्थिति है, जो भावनाएँ हमारे हृदय में प्रतिपल उठती हैं उसे यदि हम मुख से, वाणी के माध्यम से दूसरे को अवगत करायें तो वह 'बात' कहलाती है।
3. हम अपने हृदयस्थ भावों की अभिव्यक्ति बात के माध्यम से करते हैं।
4. भूगोलवेत्ता किसी देश के जल-बात का वर्णन करते हैं ।
5. वैद्य कफ और पित्त के सहवर्ती बात की व्याख्या करते हैं।
In simple words: लेखक बताते हैं कि हम अपने मन के विचारों और भावनाओं को वाणी यानी 'बात' के माध्यम से व्यक्त करते हैं। जिस प्रकार का व्यक्ति होता है, वह उसी प्रकार की बातें करता है, जैसे वैद्य रोगों की और भूगोलवेत्ता जलवायु की।

🎯 Exam Tip: सन्दर्भ, रेखांकित अंश की व्याख्या और प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट तथा संक्षिप्त होने चाहिए ताकि पूरे अंक मिल सकें।

 

(2) जब परमेश्वर तक बात का प्रभाव पहुँचा हुआ है तो हमारी कौन बात रही? हम लोगों के तो 'गात माँहि बात करामात है।' नाना शास्त्र, पुराण, इतिहास, काव्य, कोश इत्यादि सब बात ही के फैलाव हैं जिनके मध्य एक-एक बात ऐसी पायी जाती है जो मन, बुद्धि, चित्त को अपूर्व दशा में ले जानेवाली अथच लोक-परलोक में सब बात बनानेवाली है। यद्यपि बात का कोई रूप नहीं बतला सकता कि कैसी है पर बुद्धि दौड़ाइये तो ईश्वर की भाँति इसके भी अगणित ही रूप पाइयेगा । बड़ी बात, छोटी बात, सीधी बात, खोटी बात, टेढ़ी बात, मीठी बात, कड़वी बात, भली बात, बुरी बात, सुहाती बात, लगती बात इत्यादि सब बाते ही तो हैं।
प्रश्न
(1) गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(2) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(3) “गात माँहि बात करामात है।” का क्या तात्पर्य है?
(4) कौन-सी बात चित्त, मन और बुद्धि को अपूर्व दिशा की ओर अग्रसर करती है?
(5) 'बड़ी बात', 'छोटी बात' एवं 'सीधी बात' मुहावरे का क्या अभिप्राय है?
Answer:
1. सन्दर्भ - प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी गदा' में संकलित पं० प्रतापनारायण मिश्र द्वारा लिखित 'बात' शीर्षक पाठ से उद्धत किया गया है। इसमें लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि बात का प्रभाव मनुष्य तक नहीं, बल्कि ईश्वर तक भी है।
2. रेखांकित अंशों की व्याख्या - इन पंक्तियों में लेखक बात की महत्ता दिखाते हुए कहता है कि बात का प्रभाव मनुष्य तक ही सीमित नहीं, परमेश्वर तक इसके प्रभाव से बच नहीं पाये। यद्यपि परमेश्वर के विषय में कहा गया है कि उसकी न वाणी है, न हाथ हैं, न पैर हैं, बल्कि वह तो निराकार निरंजन है तथापि उसे बिना वाणी का वक्ता कहा गया है। जब निराकार ब्रह्म पर भी बात को प्रभाव होता है तो फिर हम शरीरधारी मनुष्यों का तो कहना ही क्या है? हमारे शरीर में तो बात (भाषण शक्ति अथवा वायु) का ही चमत्कार है। अनेक शास्त्र, पुराण, इतिहास, काव्य, कोष आदि जितना भी साहित्य है, वह सब बात का ही विस्तार है। इन विविध प्रकार के ग्रन्थों में एक से बढ़कर एक बातें पायी जाती हैं। एक-एक बात ऐसी अमूल्य है कि जो हमारे मन, बुद्धि और चित्त को अपूर्व आनन्दमयी दशा में पहुँचा देती है। इन ग्रन्थों की बातें ही लोक तथा परलोक की सब बातों का ज्ञान कराती हैं। लेखक कहता है कि बात का रूप-रंग नहीं होता। कोई कह नहीं सकता कि अमुक बात ऐसी है परन्तु यदि बुद्धि से विचार कर देखा जाय तो हम पायेंगे कि जैसे भगवान् के अनेक रूप होते हैं, उसी प्रकार बात के भी अनेक रूप होते हैं, जैसे बड़ी बात, छोटी बात, सीधी बात, टेढ़ी बात, मीठी, कड़वी, भली, बुरी, सुहाती और लगती बात आदि कैसी भी हों ये सब बात के ही रूप हैं।
3. “गात माँहि बात करामात है।” का तात्पर्य है कि हमारे शरीर में तो बात का ही चमत्कार है।
4. नानाशास्त्र, पुराण, इतिहास काल आदि की बातें चित्त, मन और बुद्धि को अपूर्व दिशा की ओर अग्रसर करती है।
5. 'बड़ी बात', 'छोटी बात' एवं 'सीधी बात' मुहावरे का अभिप्राय बात का स्वरूपगत वैभिन्नता को दर्शाना है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि 'बात' सिर्फ मनुष्यों तक ही नहीं, बल्कि परमेश्वर तक भी अपना प्रभाव डालती है। विभिन्न शास्त्र और साहित्य 'बात' का ही विस्तार हैं, जो हमें असीमित आनंद और ज्ञान देते हैं। 'बात' के कई रूप होते हैं, जो उसके प्रभाव और अर्थ को निर्धारित करते हैं।

🎯 Exam Tip: व्याख्या करते समय लेखक के मूल विचार को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें और तकनीकी शब्दों के अर्थ भी समझाएँ।

 

(3) सच पूछिये तो इस बात की भी क्या ही बात है जिसके प्रभाव से मानव जाति समस्त जीवधारियों की शिरोमणि (अशरफ-उल मखलूकात) कहलाती है। शुकसारिकादि पक्षी केवल थोड़ी-सी समझने योग्य बातें उच्चरित कर सकते हैं, इसी से अन्य नभचारियों की अपेक्षा आदृत समझे जाते हैं। फिर क़ौन न मानेगा कि बात की बड़ी बात है। हाँ, बात की बात इतनी बड़ी है कि परमात्मा को लोग निराकार कहते हैं, तो भी इसका सम्बन्ध उसके साथ लगाये रहते हैं। वेद, ईश्वर का वचन है, कुरआनशरीफ कलामुल्लाह है, होली बाइबिल वर्ड ऑफ गोड है। यह वचन, कलाम और वर्ड बात ही के पर्याय हैं जो प्रत्यक्ष मुख के बिना स्थिति नहीं कर सकती। पर बात की महिमा के अनुरोध से सभी धर्मावलम्बियों ने 'बिन बानी वक्ता बड़ जोगी' वाली बात मान रखी है।
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(2) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(3) निराकार परमात्मा का सम्बन्ध बात से कैसे है?
(4) मानव जाति समस्त जीवधारियों में क्यों शिरोमणि है?
(5) 'बिन बानी वक्ता बड़ जोगी' का क्या अभिप्राय है?
Answer:
1. सन्दर्भ - प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी गदा' में संकलित एवं पं० प्रतापनारायण मिश्र द्वारा लिखित 'बात' नामक हास्य-व्यंग्य प्रधान निबन्ध से उद्धृत किया गया है। इसके अन्तर्गत लेखक ने बात की महत्ता का वर्णन किया है और कहा है कि बात के कारण ही जन मानस में व्यक्ति की प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है।
2. रेखांकित अंशों की व्याख्या - वस्तुतः बात का महत्त्व इतना अधिक है कि उसका वर्णन करना कठिन हो जाता है। यदि बात के महत्त्व को लेखनीबद्ध किया जाये तो एक ग्रन्थ बन सकता है। संसार में मानव को समस्त प्राणियों से श्रेष्ठ माना जाता है। उसका मुख्य कारण भी यह बात ही है। मानव ही एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो बात करने में चतुर है। इसी कारण वह सभी प्राणियों का सिरमौर बना है। मानव की भाषा में तोता-मैना आदि पक्षी थोड़ा समझने योग्य बातों का उच्चारण कर लेते हैं, जिसके कारण वे आकाश में विचरण करनेवाले अन्य पक्षियों की तुलना में श्रेष्ठ समझे जाते हैं और इसीलिए उनका जनसामान्य में आदर किया जाता है। इतना सब कुछ होते हुए भी भला कौन ऐसा व्यक्ति होगा, जो बात (भाषा) की महत्ता को स्वीकार नहीं करेगी। बात (भाषा) की महत्ता के कारण ही लोग भगवान् का सम्बन्ध उससे जोड़ते हैं। यद्यपि लोग भगवान् को बिना आकार वाला (अशरीर) मानते हैं किन्तु लोग उसे फिर भी श्रेष्ठ उपदेशवक्ता कहकर उसकी सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार करते हैं। लेखक बात की महत्ता का वर्णन करते हुए यह कहता है कि यदि यह कहा जाय कि भगवान् तो निराकार होने के कारण सम्भाषण (उपदेश) कर ही नहीं सकते तो वह मनुष्य से भी निम्न श्रेणी में आ जाते हैं क्योंकि मनुष्य तो सम्भाषण करने में समर्थ है। अतः बात (सदुपदेश) ही भगवान् को मनुष्य से श्रेष्ठ बनाती है। इसीलिए शायद सभी धर्मावलम्बी भगवान् का सम्बन्ध भाषण-शक्ति से अवश्य जोड़ते हैं, चाहे वे उसके निराकार रूप के समर्थक हों अथवा साकार रूप के।
3. हिन्दू समाज में वेदों को ईश्वर का वचन कहा जाता है साथ ही ईश्वर को निराकार कहा जाता है।
4. बात का प्रभाव के कारण मानव जाति जीवधारियों में शिरोमणि है।
5. 'बिन बानी वक्ता बड़ जोगी' का अभिप्राय प्रत्यक्ष मुख के बिना बात से स्थित स्पष्ट हो जाना है।
In simple words: मानव जाति सभी जीवों में श्रेष्ठ है क्योंकि उसके पास 'बात' करने की क्षमता है। 'बात' इतनी शक्तिशाली है कि ईश्वर को भी निराकार होते हुए भी वचन से जोड़ा जाता है। सभी धार्मिक ग्रंथ, जैसे वेद और बाइबिल, 'बात' के ही विभिन्न रूप हैं जो बिना मुख के भी अपनी उपस्थिति दर्शाते हैं।

🎯 Exam Tip: व्याख्या में धार्मिक ग्रंथों के संदर्भों को सटीकता से प्रस्तुत करें और 'बात' के महत्त्व को उजागर करें।

 

(4) बात के काम भी इसी भाँति अनेक देखने में आते हैं। प्रीति-वैर, सुख-दुःख, श्रद्धा-घृणा, उत्साह-अनुत्साह आदि जितनी उत्तमता और सहजता बात के द्वारा विदित हो सकते हैं, दूसरी रीति से वैसी सुविधा ही नहीं । घर बैठे लाखों कोस का समाचार मुख और लेखनी से निर्गत बात ही बतला सकती है। डाकखाने अथवा तारघर के सहारे से बात की बात में चाहे जहाँ की जो बात हो, जान सकते हैं। इसके अतिरिक्त बात बनती है, बात बिगड़ती है, बात आ पड़ती है, बात जाती रहती है, बात उखड़ती है। हमारे तुम्हारे भी सभी काम बात पर ही निर्भर करते हैं। 'बातहि हाथी पाइये बातहि हाथी पाँव' बात ही से पराये अपने और अपने पराये हो जाते हैं। मक्खीचूस उदार तथा उदार स्वल्पव्ययी, कापुरुष युद्धोत्साही एवं युद्धप्रिय शान्तिशील, कुमार्गी, सुपथगामी अथच सुपन्थी, कुराही इत्यादि बन जाते हैं।
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(2) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(3) लाखों कोस का समाचार कौन बतला सकता है?
(4) पाँच वाक्यों में बात का महत्त्व लिखिए।
(5) 'बातहि हाथी पाइये बातहि हाथी पाँव' का आशय स्पष्ट कीजिए ।।
Answer:
1. सन्दर्भ - प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी गदा' के पाठ 'बात' से उद्धृत है। इसके लेखक पं० प्रतापनारायण मिश्र हैं। इन पंक्तियों में लेखक ने वाणी के महत्त्व को स्पष्ट किया है।
2. रेखांकित पद्यांशों की व्याख्या - लेखक बात के विभिन्न रूपों पर प्रकाश डालते हुए कहता है कि बात का प्रभाव बहुत व्यापक होता है। बात कहने के ढंग से ही उसका प्रभाव घटता अथवा बढ़ता है। 'निश्चय ही हमारे बात करने के ढंग से हमारा प्रत्येक कार्य प्रभावित होता है। बात के प्रभावशाली होने पर कवि अथवा चारण, राजाओं से पुरस्कार में हाथी तक प्राप्त कर लेते थे किन्तु कटु बात कहने से राजाओं द्वारा लोग हाथी के पाँव के नीचे कुचल भी दिये जाते थे। यह बात भी सिद्ध है कि बात अर्थात् वायु-प्रकोप से 'हाथीपाँव' नामक रोग भी हो जाता है।” किसी की वाणी से प्रभावित होकर बड़े-बड़े कंजूस भी उदार हृदयवाले बन जाते हैं और परिश्रम से अर्जित अपनी सम्पत्ति परोपकार के लिए अर्पित कर देते हैं। इसके विपरीत कटु वाणी के प्रभाव से उदार-हृदय व्यक्ति भी अपने साधनों को समेट लेता है। युद्ध-क्षेत्र में चारणों की ओजपूर्ण वाणी सुनकर कायरों में भी वीरता का संचार हो जाता है और यदि बात लग जाय तो युद्ध चाहनेवाला व्यक्ति भी शान्तिप्रिय बन जाता है। बात के प्रभाव से बुरे रास्ते पर चलनेवाला व्यक्ति सन्मार्ग पर चलने लगता है और बात की शक्ति-द्वारा सन्मार्ग पर चलनेवाला व्यक्ति भी दुष्टों-जैसा व्यवहार करने लगता है। तात्पर्य यह है कि बात कहने का ढंग और शब्दों का प्रयोग मनुष्य पर आश्चर्यजनक प्रभाव डालता है।
3. लाखों कोस को समाचार बात बतला सकता है।
4. बात का महत्त्व -
(i) बात के अनेक काम देखने में मिलते हैं?
(ii) बात के द्वारा कोई भी भाव सहजता एवं सरलता से विदित हो सकता है।
(iii) लाखों कोस का समाचार मुख या लेखनी से निर्गत बात बतला सकती है।
(iv) हम डाकघर अथवा तारघर के सहारे दूर की बात जान सकते हैं।
(v) सभी काम बात पर ही निर्भर करते हैं।
5. 'बातहि हाथी पाइये बातहि हाथी पाँव' का आशय है अच्छी बात से पुरस्कार स्वरूप हाथी की प्राप्ति होती है और बुरी बात पर हाथी के पाँव के नीचे कुचला जा सकता है।
In simple words: 'बात' प्रेम-वैर, सुख-दुःख जैसे भावों को व्यक्त करने का सबसे प्रभावी माध्यम है। यह दूर-दराज के समाचारों को पहुँचा सकती है और व्यक्तियों के स्वभाव तथा भाग्य को बदल सकती है, जिससे अच्छे परिणाम मिलने पर सम्मान (हाथी) और बुरे परिणाम मिलने पर अपमान (हाथी के पाँव) मिलता है।

🎯 Exam Tip: मुहावरों और लोकोक्तियों का अर्थ स्पष्ट करते हुए उनके व्यावहारिक प्रयोग को भी समझाना चाहिए, इससे उत्तर प्रभावशाली बनता है।

 

(5) बात का तत्त्व समझना हर एक का काम नहीं है और दूसरों की समझ पर आधिपत्य जमाने योग्य बात गढ़ सकना भी ऐसों वैसों का साध्य नहीं है। बड़े-बड़े विज्ञवरों तथा महा-महा कवीश्वरों के जीवन बात ही के समझने-समझाने में व्यतीत हो जाते हैं। सहृदयगण की बात के आनन्द के आगे सारा संसार तुच्छ हुँचता है। बालकों की तोतली बातें, सुन्दरियों की मीठी-मीठी प्यारी-प्यारी बातें, सत्कवियों की रसीली बातें, सुवक्ताओं की प्रभावशालिनी बातें जिनके जी को और का और न कर दें, उसे पशु नहीं पाषाणखण्ड कहना चाहिए, क्योंकि कुत्ते, बिल्ली आदि को विशेष समझ नहीं होती तो भी पुचकार के 'तूतू', 'पूसी-पूसी' इत्यादि बातें कह दो तो भावार्थ समझ के यथासामर्थ्य स्नेह प्रदर्शन करने लगते हैं। फिर वह मनुष्य कैसा जिसके चित्त पर दूसरे हृदयवान् की बात का असर न हो।
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) बालकों की बातें कैसी होती हैं?
(4) इस अवतरण में पाषाण खण्ड से क्या आशय है?
(5) विद्वानों एवं कवियों का जीवन कैसे बीतता है?
Answer:
1. सन्दर्भ - प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी गदा' में संकलित एवं पं० प्रतापनारायण मिश्र द्वारा लिखित 'बात' शीर्षक निबन्ध से उधृत है। इस गद्यावतरण में लेखक ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि बात कहने की क्षमता यद्यपि सब में होती है किन्तु 'बात' को सही ढंग से व्यक्त कर पाना या दूसरों की बातों को समझ पाना सभी के वश की बात नहीं होती।
2. रेखांकित अंश की व्याख्या - विद्वानों की बात का तात्पर्य समझ पाना प्रत्येक व्यक्ति के लिए सरल काम नहीं है। साथ ही साथ दूसरों को प्रभावित कर सकनेवाली बात भी गढ़कर कह देना साधारण मनुष्यों का काम नहीं है। संसार में बड़े-बड़े ज्ञानियों एवं कवियों का जीवन बात के तात्पर्य को समझने और समझाने में ही बीत जाता है। सुहृदगणों की बात में जो आनन्द मिलता है उसके आगे सारा संसार फीका पड़ जाता है। बालकों की तोतली बोलियों में, सुन्दर रमणियों की मीठी, प्यारी-प्यारी बातों में, कवियों की रसीली उक्तियों में और सुन्दर वक्ताओं की प्रभावशाली सशक्त बातों में जो आकर्षण होता है वह सभी के चित्त को मुग्ध कर देता है। जो इससे प्रभावित नहीं होते वे पशु ही क्यों पत्थर की शिला की भाँति शुष्क और कठोर होते हैं ।
3. बालकों की बातें सुन्दर रमणियों की मीठी, प्यारी-प्यारी होती हैं।
4. बालकों की तोतली बातें, सुन्दरियों की प्यारी मीठी बातें, कवियों की रसीली बातें जिनके हृदय को प्रभावित न करे उन्हें पाषाण खण्ड कहते हैं।
5. विद्वानों एवं कवियों का जीवन बात ही को समझने-समझाने में व्यतीत हो जाते हैं।
In simple words: 'बात' का सही अर्थ समझना और उसे प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना हर किसी के बस की बात नहीं। विद्वान और कवि अपना जीवन 'बात' के गूढ़ अर्थों को समझने-समझाने में लगाते हैं। मधुर और प्रभावशाली 'बातें' सभी को मोहित करती हैं, और जो इन बातों से प्रभावित न हो, वह पत्थर के समान कठोर हृदय वाला होता है।

🎯 Exam Tip: लेखक के विचारों को संक्षेप में स्पष्ट करें और 'बात' के भावनात्मक प्रभाव को रेखांकित करें।

 

(6) 'मर्द की जबान' (बात का उदय स्थान) और गाड़ी का पहिया चलता-फिरता ही रहता है। आज जो बात है कल ही स्वार्थान्धता के वश हुजूरों की मरजी के मुवाफिक दूसरी बातें हो जाने में तनिक भी विलम्ब की सम्भावना नहीं है। यद्यपि कभी-कभी अवसर पड़ने पर बात के अंश का कुछ रंग-ढंग परिवर्तित कर लेना नीति-विरुद्ध नहीं है। पर कब? जात्युपकार, देशोद्धार, प्रेम-प्रचार आदि के समय न कि पापी पेट के लिए।
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(3) लेखक ने किसे नियमों का उल्लंघन नहीं माना है?
(4) 'मर्द की जबान' के चलते-फिरते रहने से क्या तात्पर्य है?
(5) बात के ढंग का कुछ रंग-ढंग परिवर्तित कर लेना किस प्रकार नीति विरुद्ध नहीं है?
Answer:
1. सन्दर्भ - प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी गद्य' के 'बात' पाठ से उद्धृत है। इसके लेखक पं० प्रतापनारायण मिश्र हैं। पं० प्रतापनारायण मिश्र ने प्रस्तुत गद्यांश में यह बताया है कि प्राचीन काल में हमारे यहाँ के लोग बात के पक्के होते थे, किन्तु आजकल स्वार्थ में अन्धे लोग तुरन्त बात बदल देते हैं।
2. रेखांकित अंश की व्याख्या - लेखक का कथन है कि आजकल के भारत के अनेक कुपुत्रों ने यह तरीका अपना रखा है कि आदमी की जवान और गाड़ी का पहिया तो चलते ही रहते हैं अर्थात् गाड़ी का पहिया जिस प्रकार स्थिर नहीं रहता उसी प्रकार जबाने की स्थिर रहना या बात का पक्का होना आवश्यक नहीं है। यह कथन उन्हीं स्वार्थी लोगों का है जिनके लिए जाति, देश और सम्बन्धों का कोई महत्त्व नहीं होती। ऐसे लोगों की आज की जो बात है कल ही वह स्वार्थवश मालिक के मन के अनुसार बदलने में थोड़ी भी देर नहीं लगाते हैं। लेखक आगे कहता है कि किसी महान् उद्देश्य की साधना या समय आने पर बात के रंग-ढंग या कहने का तरीका बदल लेने में किसी नियम का उल्लंघन नहीं है। ऐसा मानव जाति की भलाई के समय, देशोद्धार के समय और प्रेम-प्रसंग में ही करना चाहिए अर्थात् यदि बात बदलने से मानव जाति की भलाई होती है, देश का कल्याण होता है या प्रेम-प्रसंग में प्रेमी-प्रेमिका का हित छिपा है तो कोई नियम विरुद्ध कार्य नहीं है। स्वार्थ या पापी पेट को भरने के लिए कभी भी बात नहीं बदलनी चाहिए।
3. यदि बात बदलने से मानव जाति की भलाई होती है, देश का कल्याण होता है या प्रेम-प्रसंग में प्रेमी-प्रेमिका को हित छिपा है तो कोई नियम विरुद्ध कार्य नहीं है।
4. 'मर्द की जबान' के चलते-फिरते रहना का तात्पर्य है स्वार्थवश बात बदलने में विलम्ब न लगना है।
5. जाति उपकार और देशोद्धार के लिए अवसर पड़ने पर बात के कुछ रंग-ढंग को परिवर्तित कर लेना नीति विरुद्ध नहीं है।
In simple words: लेखक बताते हैं कि आज के युग में लोग स्वार्थ के लिए अपनी बात आसानी से बदल देते हैं, ठीक वैसे ही जैसे गाड़ी का पहिया चलता रहता है। हालांकि, लोक कल्याण, देश प्रेम, या प्रेम-प्रसंग जैसे नेक उद्देश्यों के लिए 'बात' में थोड़ा परिवर्तन करना गलत नहीं है, लेकिन स्वार्थी होकर बात बदलना अनुचित है।

🎯 Exam Tip: 'मर्द की जबान' जैसे मुहावरों के अर्थ को वर्तमान संदर्भ से जोड़कर स्पष्ट करें और नैतिक पहलू पर जोर दें।

 

Question 2. पं० प्रतापनारायण मिश्र का जीवन-परिचय बताते हुए उनकी साहित्यिक सेवाओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा पं० प्रतापनारायण मिश्र का जीवन एवं साहित्यिक परिचय स्पष्ट कीजिए ।
Answer:
पं० प्रतापनारायण मिश्र
(स्मरणीय तथ्य)
जन्म-सन् 1856 ई० । मृत्यु-सन् 1894 ई० । पिता-पं० संकटाप्रसाद मिश्र (ज्योतिषी)। जन्म-स्थान-बैजेगाँव (उन्नाव), उ० प्र० । शिक्षा-संस्कृत, बंगला, उर्दू आदि का ज्ञान।
साहित्यिक विशेषताएँ - प्रारम्भिक लेखक होते हुए भी श्रेष्ठ निबन्धों की रचना की । आँख, कान जैसे साधारण विषयों पर भी सुन्दर निबन्ध रचना।
भाषा-शैली- प्रवाहपूर्ण, हास्य-विनोद का पुट, मुहावरों की चहल-पहल, भाषा में चमत्कार ।
रचनाएँ- 50 से भी अधिक पुस्तकों की रचना । 'प्रतापनारायण मिश्र ग्रन्थावली' (सभी रचनाओं का संग्रह) प्रकाशित हो चुका है।
• जीवन-परिचय- पं० प्रतापनारायण मिश्र का जन्म उन्नाव जिला के बैजेगाँव में सन् 1856 ई० में हुआ था। इनके पिता पं० संकटाप्रसाद मिश्र एक ज्योतिषी थे। वे पिता के साथ बचपन से ही कानपुर आ गये थे। अंग्रेजी स्कूलों की अनुशासनपूर्ण पढ़ाई इन्हें रुचिकर नहीं लगी । फलतः घर पर ही आपने बंगला, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, फारसी का अध्ययन किया। लावनीबाजों के सम्पर्क में आकर मिश्र जी ने लावनियाँ लिखनी शुरू कीं और यहीं से इनकी कविता का श्रीगणेश हुआ। बाद में आजीवन इन्होंने हिन्दी की सेवा की।
• कानपुर के सामाजिक-राजनीतिक जीवन से भी इनका गहरा सम्बन्ध था। वे यहाँ की अनेक सामाजिक संस्थाओं से सम्बद्ध थे। इन्होंने कानपुर में एक नाटक-सभा की भी स्थापना की थी। ये भारतेन्दु के व्यक्तित्व से अत्यन्त प्रभावित थे तथा इन्हें अपना गुरु और आदर्श मानते थे। अपनी हाजिरजवाबी और हास्यप्रियता के कारण वे कानपुर में काफी लोकप्रिय थे। इनकी मृत्यु कानपुर में ही सन् 1894 ई० में हुई ।
• कृतियाँ-मिश्र जी द्वारा लिखित पुस्तकों की संख्या 50 हैं, जिनमें प्रेम-पुष्पावली, मन की लहर, मानस विनोद आदि काव्य-संग्रह; कलि कौतुक, हठी हम्मीर, गो-संकट, भारत-दुर्दशा (नाटक), जुआरी-खुआरी (प्रहसन) आदि प्रमुख हैं। नागरी प्रचारिणी सभा काशी द्वारा 'प्रतापनारायण मिश्र ग्रन्थावली' नाम से इनकी समस्त रचनाओं का संकलन प्रकाशित हुआ है।
• साहित्यिक परिचय-प्रतिभा एवं परिश्रम के बल पर अपने 38 वर्ष के अल्प जीवन-काल में ही पं० प्रतापनारायण मिश्र ने हिन्दी-निर्माताओं की वृहन्नयी (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र) में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया। कविता के क्षेत्र में ये पुरानी धारा के अनुयायी थे। ब्रजभाषा की समस्या की पूर्तियाँ ये खूब किया करते थे। हिन्दी-हिन्दुस्तान का नारा भी इन्होंने ही दिया था। मिश्र जी का उग्र और प्रखर स्वभाव उनकी कविताओं की अपेक्षा उनके निबन्धों में विशेष मुखर हुआ । मिश्र जी के निबन्धों में आत्मीयता और फक्कड़पन की सरसता है। इन्होंने कुछ गम्भीर विषयों पर कलम चलायी है जिसकी भाषा अत्यन्त ही संधी और परिमार्जित है। हिन्दी निबन्ध के क्षेत्र में आज भी उनके जैसे लालित्यपूर्ण निबन्धकार की अभी बहुत कुछ कमी है। इनके निबन्धों में पर्याप्त विविधता है।
In simple words: पं० प्रतापनारायण मिश्र (1856-1894) भारतेन्दु युग के प्रमुख लेखक थे। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, उर्दू का अध्ययन किया और हिन्दी साहित्य में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया, खासकर निबन्ध और नाटक विधा में। उनकी भाषा प्रवाहपूर्ण, मुहावरेदार और हास्य-विनोद से परिपूर्ण थी।

🎯 Exam Tip: जीवन-परिचय में जन्म-मृत्यु, शिक्षा, प्रमुख कृतियों और साहित्यिक योगदान को क्रमबद्ध तरीके से लिखें।

 

Question 3. पं० प्रतापनारायण मिश्र को साहित्यिक परिचय एवं भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए ।
Answer:
• साहित्यिक परिचय-प्रतिभा एवं परिश्रम के बल पर अपने 38 वर्ष के अल्प जीवन-काल में ही पं० प्रतापनारायण मिश्र ने हिन्दी-निर्माताओं की वृहन्नयी (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र) में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया। कविता के क्षेत्र में ये पुरानी धारा के अनुयायी थे। ब्रजभाषा की समस्या की पूर्तियाँ ये खूब किया करते थे। हिन्दी-हिन्दुस्तान का नारा भी इन्होंने ही दिया था। मिश्र जी का उग्र और प्रखर स्वभाव उनकी कविताओं की अपेक्षा उनके निबन्धों में विशेष मुखर हुआ । मिश्र जी के निबन्धों में आत्मीयता और फक्कड़पन की सरसता है। इन्होंने कुछ गम्भीर विषयों पर कलम चलायी है जिसकी भाषा अत्यन्त ही संधी और परिमार्जित है। हिन्दी निबन्ध के क्षेत्र में आज भी उनके जैसे लालित्यपूर्ण निबन्धकार की अभी बहुत कुछ कमी है। इनके निबन्धों में पर्याप्त विविधता है।
• भाषा-शैली- मिश्र जी की भाषा मुहावरों और कहावतों से सजी हुई अत्यन्त ही लच्छेदार है जिसमें उर्दू, फारसी, संस्कृत शब्दों के साथ-साथ वैसवाड़ी के देशज शब्दों के भी प्रयोग हुए हैं। इनके निबन्धों की शैली में एक अद्भुत प्रवाह एवं आकर्षण है। इनकी शैली मुख्यतः दो प्रकार की हैं- (1) विनोदपूर्ण तथा (2) गम्भीर शैली । विनोदपूर्ण शैली को उत्कृष्ट कहना ‘समझदार की मौत' है। गम्भीर शैली में इन्होंने बहुत ही कम लिखा है। यह उनके स्वभाव के बिल्कुल ही विरुद्ध था। 'मनोयोग' नामक निबन्ध इनकी गम्भीर शैली का उत्कृष्ट नमूना है।
In simple words: प्रतापनारायण मिश्र हिन्दी के महत्वपूर्ण निबन्धकार थे, जिन्होंने 'हिन्दी-हिन्दुस्तान' का नारा दिया। उनकी भाषा मुहावरेदार, उर्दू-फारसी-संस्कृत मिश्रित और वैसवाड़ी के शब्दों से युक्त थी। उनकी शैली विनोदपूर्ण (जैसे 'समझदार की मौत') और गम्भीर (जैसे 'मनोयोग') दोनों थी, जिसमें प्रवाह और आकर्षण था।

🎯 Exam Tip: साहित्यिक परिचय में लेखक की विचारधारा और निबन्धों की विशेषताएँ, तथा भाषा-शैली में उनकी विविधता को स्पष्ट रूप से दर्शाएँ।

 

Question 4. पं० प्रतापनारायण मिश्र का जीवन-परिचय बताते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए।
Answer:
पं० प्रतापनारायण मिश्र
(स्मरणीय तथ्य)
जन्म-सन् 1856 ई० । मृत्यु-सन् 1894 ई० । पिता-पं० संकटाप्रसाद मिश्र (ज्योतिषी)। जन्म-स्थान-बैजेगाँव (उन्नाव), उ० प्र० । शिक्षा-संस्कृत, बंगला, उर्दू आदि का ज्ञान।
साहित्यिक विशेषताएँ - प्रारम्भिक लेखक होते हुए भी श्रेष्ठ निबन्धों की रचना की । आँख, कान जैसे साधारण विषयों पर भी सुन्दर निबन्ध रचना।
भाषा-शैली- प्रवाहपूर्ण, हास्य-विनोद का पुट, मुहावरों की चहल-पहल, भाषा में चमत्कार ।
रचनाएँ- 50 से भी अधिक पुस्तकों की रचना । 'प्रतापनारायण मिश्र ग्रन्थावली' (सभी रचनाओं का संग्रह) प्रकाशित हो चुका है।
• जीवन-परिचय- पं० प्रतापनारायण मिश्र का जन्म उन्नाव जिला के बैजेगाँव में सन् 1856 ई० में हुआ था। इनके पिता पं० संकटाप्रसाद मिश्र एक ज्योतिषी थे। वे पिता के साथ बचपन से ही कानपुर आ गये थे। अंग्रेजी स्कूलों की अनुशासनपूर्ण पढ़ाई इन्हें रुचिकर नहीं लगी । फलतः घर पर ही आपने बंगला, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, फारसी का अध्ययन किया। लावनीबाजों के सम्पर्क में आकर मिश्र जी ने लावनियाँ लिखनी शुरू कीं और यहीं से इनकी कविता का श्रीगणेश हुआ। बाद में आजीवन इन्होंने हिन्दी की सेवा की।
• कानपुर के सामाजिक-राजनीतिक जीवन से भी इनका गहरा सम्बन्ध था। वे यहाँ की अनेक सामाजिक संस्थाओं से सम्बद्ध थे। इन्होंने कानपुर में एक नाटक-सभा की भी स्थापना की थी। ये भारतेन्दु के व्यक्तित्व से अत्यन्त प्रभावित थे तथा इन्हें अपना गुरु और आदर्श मानते थे। अपनी हाजिरजवाबी और हास्यप्रियता के कारण वे कानपुर में काफी लोकप्रिय थे। इनकी मृत्यु कानपुर में ही सन् 1894 ई० में हुई ।
• कृतियाँ-मिश्र जी द्वारा लिखित पुस्तकों की संख्या 50 हैं, जिनमें प्रेम-पुष्पावली, मन की लहर, मानस विनोद आदि काव्य-संग्रह; कलि कौतुक, हठी हम्मीर, गो-संकट, भारत-दुर्दशा (नाटक), जुआरी-खुआरी (प्रहसन) आदि प्रमुख हैं। नागरी प्रचारिणी सभा काशी द्वारा 'प्रतापनारायण मिश्र ग्रन्थावली' नाम से इनकी समस्त रचनाओं का संकलन प्रकाशित हुआ है।
In simple words: पं० प्रतापनारायण मिश्र का जन्म 1856 में उन्नाव में हुआ और मृत्यु 1894 में कानपुर में हुई। उन्होंने अनेक नाटक सभाओं की स्थापना की और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को गुरु माना। उनकी 50 से अधिक कृतियों में 'प्रेम-पुष्पावली', 'कलि कौतुक', 'हठी हम्मीर' और 'भारत-दुर्दशा' प्रमुख हैं, जो 'प्रतापनारायण मिश्र ग्रन्थावली' में संकलित हैं।

🎯 Exam Tip: जीवन-परिचय के साथ-साथ कृतियों का उल्लेख करते समय प्रमुख काव्य-संग्रह, नाटक और प्रहसन को अलग-अलग श्रेणी में प्रस्तुत करें।

 

Question 5. पं० प्रतापनारायण मिश्र के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालिए । अथवा पं० प्रतापनारायण मिश्र को संक्षिप्त साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी प्रमुख रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
Answer:
पं० प्रतापनारायण मिश्र
(स्मरणीय तथ्य)
जन्म-सन् 1856 ई० । मृत्यु-सन् 1894 ई० । पिता-पं० संकटाप्रसाद मिश्र (ज्योतिषी)। जन्म-स्थान-बैजेगाँव (उन्नाव), उ० प्र० । शिक्षा-संस्कृत, बंगला, उर्दू आदि का ज्ञान।
साहित्यिक विशेषताएँ - प्रारम्भिक लेखक होते हुए भी श्रेष्ठ निबन्धों की रचना की । आँख, कान जैसे साधारण विषयों पर भी सुन्दर निबन्ध रचना।
भाषा-शैली- प्रवाहपूर्ण, हास्य-विनोद का पुट, मुहावरों की चहल-पहल, भाषा में चमत्कार ।
रचनाएँ- 50 से भी अधिक पुस्तकों की रचना । 'प्रतापनारायण मिश्र ग्रन्थावली' (सभी रचनाओं का संग्रह) प्रकाशित हो चुका है।
• जीवन-परिचय- पं० प्रतापनारायण मिश्र का जन्म उन्नाव जिला के बैजेगाँव में सन् 1856 ई० में हुआ था। इनके पिता पं० संकटाप्रसाद मिश्र एक ज्योतिषी थे। वे पिता के साथ बचपन से ही कानपुर आ गये थे। अंग्रेजी स्कूलों की अनुशासनपूर्ण पढ़ाई इन्हें रुचिकर नहीं लगी । फलतः घर पर ही आपने बंगला, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, फारसी का अध्ययन किया। लावनीबाजों के सम्पर्क में आकर मिश्र जी ने लावनियाँ लिखनी शुरू कीं और यहीं से इनकी कविता का श्रीगणेश हुआ। बाद में आजीवन इन्होंने हिन्दी की सेवा की।
• कानपुर के सामाजिक-राजनीतिक जीवन से भी इनका गहरा सम्बन्ध था। वे यहाँ की अनेक सामाजिक संस्थाओं से सम्बद्ध थे। इन्होंने कानपुर में एक नाटक-सभा की भी स्थापना की थी। ये भारतेन्दु के व्यक्तित्व से अत्यन्त प्रभावित थे तथा इन्हें अपना गुरु और आदर्श मानते थे। अपनी हाजिरजवाबी और हास्यप्रियता के कारण वे कानपुर में काफी लोकप्रिय थे। इनकी मृत्यु कानपुर में ही सन् 1894 ई० में हुई ।
• कृतियाँ-मिश्र जी द्वारा लिखित पुस्तकों की संख्या 50 हैं, जिनमें प्रेम-पुष्पावली, मन की लहर, मानस विनोद आदि काव्य-संग्रह; कलि कौतुक, हठी हम्मीर, गो-संकट, भारत-दुर्दशा (नाटक), जुआरी-खुआरी (प्रहसन) आदि प्रमुख हैं। नागरी प्रचारिणी सभा काशी द्वारा 'प्रतापनारायण मिश्र ग्रन्थावली' नाम से इनकी समस्त रचनाओं का संकलन प्रकाशित हुआ है।
• साहित्यिक परिचय-प्रतिभा एवं परिश्रम के बल पर अपने 38 वर्ष के अल्प जीवन-काल में ही पं० प्रतापनारायण मिश्र ने हिन्दी-निर्माताओं की वृहन्नयी (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र) में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया। कविता के क्षेत्र में ये पुरानी धारा के अनुयायी थे। ब्रजभाषा की समस्या की पूर्तियाँ ये खूब किया करते थे। हिन्दी-हिन्दुस्तान का नारा भी इन्होंने ही दिया था। मिश्र जी का उग्र और प्रखर स्वभाव उनकी कविताओं की अपेक्षा उनके निबन्धों में विशेष मुखर हुआ । मिश्र जी के निबन्धों में आत्मीयता और फक्कड़पन की सरसता है। इन्होंने कुछ गम्भीर विषयों पर कलम चलायी है जिसकी भाषा अत्यन्त ही संधी और परिमार्जित है। हिन्दी निबन्ध के क्षेत्र में आज भी उनके जैसे लालित्यपूर्ण निबन्धकार की अभी बहुत कुछ कमी है। इनके निबन्धों में पर्याप्त विविधता है।
In simple words: पं० प्रतापनारायण मिश्र (1856-1894) भारतेन्दु युग के एक बहुमुखी लेखक थे। उनका व्यक्तित्व हाजिरजवाब और हास्यप्रिय था। उन्होंने हिन्दी-हिन्दुस्तान का नारा दिया और अपने अल्प जीवनकाल में 50 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनमें 'कलि कौतुक' और 'भारत-दुर्दशा' जैसे नाटक तथा 'प्रेम-पुष्पावली' जैसे काव्य-संग्रह प्रमुख हैं।

🎯 Exam Tip: लेखक के व्यक्तित्व और कृतित्व को अलग-अलग खंडों में प्रस्तुत करें। व्यक्तित्व में उनके स्वभाव और प्रभाव को, तथा कृतित्व में प्रमुख रचनाओं को उजागर करें।

 

उदाहरण

1. विनोदपूर्ण शैली - (i) “इसके अतिरिक्त बात बनती है, बात बिगड़ती है, बात जाती है, बात खुलती है, बात छिपती है, बात अड़ती है, बात जमती है, बात उखड़ती है, हमारे-तुम्हारे भी सभी काम बात पर ही निर्भर हैं ।”- बात ।
2. गम्भीर शैली - 'संसार में संसारी जीव निस्संदेह एक-दूसरे की परीक्षा न करें तो काम न चले पर उनके काम चलने में कठिनाई यह है कि मनुष्य की बुद्धि अल्प है। अतः प्रत्येक विषय पर पूर्ण निश्चय सम्भव नहीं है।”

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. पं० प्रतापनारायण मिश्र की भाषा एवं शैली की दो-दो विशेषताएँ लिखिए ।
Answer: भाषा की विशेषताएँ-
1. मिश्र जी ने सर्वसाधारण की बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है।
2. भाषा प्रवाहयुक्त, सरल एवं मुहावरेदार है। शैली की विशेषताएँ-
(i) लेखों की शैली संयत एवं गम्भीर है।
(ii) लेखों में विनोदपूर्ण व्यंग्य तथा वक्रता के दर्शन होते हैं।
In simple words: पं० प्रतापनारायण मिश्र की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और मुहावरेदार थी, जो आम बोलचाल के करीब थी। उनकी शैली विनोदपूर्ण व्यंग्य और वक्रता से भरी होने के साथ-साथ संयत और गम्भीर भी थी।

🎯 Exam Tip: भाषा और शैली की विशेषताओं को अलग-अलग बिंदुओं में स्पष्ट करें, उदाहरण के लिए मुहावरेदार भाषा या विनोदपूर्ण शैली।

 

Question 2. “बात के कारण ही मनुष्य सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।” इस तथ्य को लेखक ने किस प्रकार सिद्ध किया
Answer: राजा दशरथ ने वचन के कारण ही अपने प्राण त्याग दिये लेकिन वचन का त्याग नहीं किया। वचन का पक्का व्यक्ति समाज में समादृर होता है।
In simple words: लेखक ने राजा दशरथ के उदाहरण से सिद्ध किया कि वचन (बात) का पालन करने के लिए प्राण भी त्याग दिए जाते हैं। वचनबद्धता व्यक्ति को समाज में आदरणीय बनाती है, और यही क्षमता मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ बनाती है।

🎯 Exam Tip: ऐतिहासिक या पौराणिक उदाहरणों का प्रयोग करके अपनी बात को प्रमाणित करें, जिससे उत्तर अधिक विश्वसनीय लगे।

 

Question 3. बातहि हाथी पाइये बातहि हाथीपाँव' से लेखक का क्या तात्पर्य है?
Answer: बात के द्वारा ही व्यक्ति हाथी तक प्राप्त कर सकता है और बात से ही व्यक्ति अपयश का भागी भी हो सकता है। अर्थात् उसे हाथी के पैर के नीचे कुचला भी जा सकता है।
In simple words: इस मुहावरे का अर्थ है कि अच्छी और प्रभावी 'बात' व्यक्ति को सम्मान (हाथी मिलना) दिला सकती है, जबकि कटु या अनुचित 'बात' उसे अपमान (हाथी के पैर से कुचलना) का भागी बना सकती है।

🎯 Exam Tip: मुहावरे का अर्थ स्पष्ट करने के साथ-साथ उसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं को भी समझाएँ।

 

Question 4. पं० प्रतापनारायण मिश्र ने किन पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया?
Answer: पं० प्रतापनारायण मिश्र ने 'ब्राह्मण' एवं 'हिन्दुस्तान' पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया।
In simple words: पं० प्रतापनारायण मिश्र ने 'ब्राह्मण' और 'हिन्दुस्तान' नामक महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया, जिससे वे अपने विचारों को जन-जन तक पहुँचाते थे।

🎯 Exam Tip: जब पत्रिकाओं के नाम पूछे जाएँ, तो उन्हें उद्धरण चिह्नों में लिखें।

 

Question 5. 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता' सूक्ति का अर्थ बताइए ।
Answer: 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता' पर हठ करनेवाले को यह कहके बातों में उड़ायेंगे कि हम लूले-लँगड़े ईश्वर को नहीं मान सकते। हमारा तो प्यारा कोटि काम सुन्दर श्याम वर्ण विशिष्ट है। 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता' का तात्पर्य हाथ-पैर से हीन युवावस्था को प्राप्त है।
In simple words: 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता' का शाब्दिक अर्थ है जिसके हाथ-पैर न हों फिर भी वह वेगवान हो और ग्रहण करने वाला हो। यहाँ लेखक इस सूक्ति का प्रयोग उस निराकार ईश्वर के संदर्भ में करते हैं, जिसकी कोई शारीरिक विशेषता नहीं होती, लेकिन फिर भी वह सारे जगत का कार्य करता है।

🎯 Exam Tip: सूक्ति या श्लोक के अर्थ को केवल शाब्दिक न बताकर उसके गूढ़ार्थ और संदर्भ को भी स्पष्ट करें।

 

Question 6. आर्यगण अपनी बात का ध्यान रखते थे, इस बात को क्या प्रमाण है?
Answer: राजा दशरथ ने अपने प्राण त्याग दिये लेकिन उन्होंने वचन नहीं छोड़ा।
In simple words: राजा दशरथ का अपने वचन के लिए प्राण त्याग देना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि प्राचीन आर्यगण अपनी 'बात' (वचन) का कितना ध्यान रखते थे।

🎯 Exam Tip: ठोस ऐतिहासिक या पौराणिक उदाहरण देकर अपने उत्तर को सशक्त बनाएँ।

 

Question 7. 'बात' पाठ से मुहावरों की सूची बनाइए।
Answer:
गात माँहि बात करामात है।
बातहिं हाथी पाइये बातहिं हाथी पाँव ।
मर्द की जबान ।
बात-बात में बात ।
In simple words: 'बात' पाठ में कई मुहावरों का प्रयोग हुआ है, जैसे 'गात माँहि बात करामात है' (बात में ही सारा चमत्कार), 'बातहिं हाथी पाइये बातहिं हाथी पाँव' (अच्छी बात से सम्मान, बुरी बात से अपमान), 'मर्द की जबान' (वचन का पक्का होना), और 'बात-बात में बात' (हर प्रसंग में बात)।

🎯 Exam Tip: मुहावरों की सूची बनाते समय उन्हें यथासंभव सटीक और उद्धरण चिह्नों के साथ प्रस्तुत करें।

 

Question 8. 'बात' पाठ में बात और ईश्वर में क्या साम्य बताया गया है?
Answer: बात और ईश्वर में परस्पर साम्य है। वेद ईश्वर का वचन है। कुरानशरीफ कलामुल्लाह है, होली बाइबिल वर्ड ऑफ गॉड है। यह वचन, कलाम और वर्ड बात ही के पर्याय हैं।
In simple words: लेखक ने 'बात' और ईश्वर में समानता बताई है क्योंकि सभी धर्मों के पवित्र ग्रंथ - वेद, कुरान, बाइबिल - ईश्वर के वचन हैं, और ये वचन या 'वर्ड' ही 'बात' के पर्याय हैं, जो ईश्वर की अभिव्यक्ति का माध्यम हैं।

🎯 Exam Tip: विभिन्न धर्मों के पवित्र ग्रंथों का उदाहरण देकर 'बात' और ईश्वर के बीच के सम्बन्ध को स्पष्ट करें।

 

Question 9. प्रथम अनुच्छेद में 'बात' शब्द का प्रयोग किन-किन अर्थों में किया गया है?
Answer: प्रथम अनुच्छेद में 'बात' शब्द का प्रयोग वचन, कलाम और वर्ड के रूप में किया गया है।
In simple words: पाठ के पहले अनुच्छेद में 'बात' शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से वचन, कलाम (इस्लामी संदर्भ में) और वर्ड (ईसाई संदर्भ में) के अर्थों में किया गया है, जो किसी भी प्रकार की अभिव्यक्ति को दर्शाते हैं।

🎯 Exam Tip: अनुच्छेद के विशिष्ट संदर्भ में पूछे गए अर्थों को सटीक रूप से पहचानें और सूचीबद्ध करें।

 

Question 10. किस प्रकार के व्यक्ति को हमें पाषाणखण्ड समझना चाहिए और क्यों?
Answer: बालकों की तोतली बातें, सुन्दरियों की मीठी-मीठी और प्यारी-प्यारी बातें, सत्कवियों की रसीली बातें, सुवक्ताओं की प्रभावशालिनी बातों का जिनके हृदय पर प्रभाव नहीं पड़ता, उन्हें पशु नहीं पाषाणखण्ड कहना चाहिए क्योंकि कुत्ते, बिल्ली आदि को विशेष समझ नहीं होती तो भी पुचकार के तू-तू, पूसी-पूसी इत्यादि बातें कह दो तो वे भावार्थ समझ के यथासामर्थ्य स्नेह प्रदर्शन करने लगते हैं।
In simple words: लेखक के अनुसार, जो व्यक्ति बच्चों की तोतली बातों, सुंदरियों की मीठी बातों, कवियों की रसीली उक्तियों या वक्ताओं की प्रभावशाली बातों से प्रभावित नहीं होता, उसे पत्थर के समान कठोर हृदय वाला समझना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि पशु भी स्नेह भरी 'बात' को समझकर प्रतिक्रिया देते हैं, जबकि ऐसा व्यक्ति संवेदनहीन होता है।

🎯 Exam Tip: 'पाषाणखण्ड' जैसे प्रतीकात्मक शब्दों का अर्थ समझाते हुए, लेखक के मूल विचार को उदाहरण सहित स्पष्ट करें।

 

Question 11. 'बात' शब्द की गूढता पर तीस शब्द लिखिए ।
Answer: नाना शास्त्र, पुराण, इतिहास, काव्य, कोश इत्यादि सब बात ही के फैलाव हैं जिनके मध्य एक बात ऐसी पायी जाती है जो मन, बुद्धि, चित्त को अपूर्व दशा में ले जानेवाली अथवा लोक-परलोक में सब बात बनानेवाली है। यद्यपि बात का कोई रूप नहीं बतला सकता कि कैसी है, पर बुद्धि दौड़ाइये तो पता चलेगा कि ईश्वर की भाँति इसके अनेक रूप हैं।
In simple words: 'बात' शब्द अत्यंत गूढ़ है, क्योंकि यह केवल वाणी नहीं, बल्कि समस्त ज्ञान, भावनाओं और अनुभवों का विस्तार है। यह मन, बुद्धि और चित्त को प्रभावित करने की क्षमता रखती है, लोक और परलोक दोनों में इसका महत्त्व है। 'बात' के अनगिनत रूप हैं, ठीक वैसे ही जैसे ईश्वर के।

🎯 Exam Tip: गूढ़ता जैसे विषयों पर लिखते समय, उसके विभिन्न आयामों (मानसिक, भावनात्मक, आध्यात्मिक) को संक्षेप में स्पष्ट करें।

 

Question 12. 'बात' पाठ से 10 सुन्दर वाक्य लिखिए ।
Answer: वेद ईश्वर का वचन है। निराकार शब्द का अर्थ शालिग्राम शिला है। बात के अनेक रूप हैं। बात का तत्त्व समझना आसान काम नहीं है। मर्द की जबान और गाड़ी का पहिया चलता-फिरता ही रहता है। बात से ही अपने-पराये और पराये अपने हो जाते हैं। कुरान शरीफ कलामुल्लाह है। होली बाइबिल वर्ड ऑफ गॉड है। निराकार शब्द का अर्थ शालिग्राम शिला है। मर्द की जबान और गाड़ी का पहिया चलता-फिरता रहता है।
In simple words: 'बात' पाठ जीवन के अनेक पहलुओं को उजागर करता है। यह हमें बताता है कि 'बात' सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि वचन, विश्वास और पहचान का आधार है। यह ईश्वर के वचन से लेकर मानव संबंधों और सामाजिक मूल्यों तक फैली हुई है, जो व्यक्ति को सफल या असफल बना सकती है।

🎯 Exam Tip: वाक्यों को चुनते समय पाठ के प्रमुख विचारों और विषयों को समाहित करने का प्रयास करें।

 

Question 13. 'बात' पाठ का मुख्य उद्देश्य बताइए।
Answer: 'बात' पाठ का मुख्य उद्देश्य यह है कि हम दूसरों से बहुत नपी-तुली बात करें।
In simple words: 'बात' पाठ का मुख्य उद्देश्य हमें यह सिखाना है कि हमें हमेशा सोच-समझकर और नपी-तुली बातें करनी चाहिए। क्योंकि 'बात' का अत्यधिक प्रभाव होता है, इसलिए उसके प्रयोग में सावधानी बरतना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

🎯 Exam Tip: पाठ के मुख्य उद्देश्य को स्पष्ट और संक्षिप्त रूप से व्यक्त करें।

 

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. लेखक ने भारत के कुपुत्रों द्वारा 'मर्द की जबान' का क्या अर्थ बताया है?
Answer: लेखक ने भारत के कुपुत्रों द्वारा 'मर्द की जबान' को अर्थ बताया है कि आजकल के बहुतेरे भारत के कुपुत्र अपने वचन की तनिक भी परवाह नहीं करते। स्वार्थ के कारण वे अपनी बात तुरन्त बदल देते हैं। इनका मानना है कि 'मर्द की जबान' और 'गाड़ी को पहिया' सदैव चलता रहता है अर्थात् गाड़ी के पहिये की तरह मर्द की जबान भी चलायमान है अतः इस जबान से जो कुछ भी कहा जाय, उसे पूरा करना आवश्यक नहीं । हुजूरों की मरजी के अनुसार, इसे चाहे जब बदला जा सकता है।
In simple words: लेखक के अनुसार, आज के भारत के कुपुत्रों ने 'मर्द की जबान' का अर्थ बदल दिया है। वे इसे 'गाड़ी के पहिए' की तरह चलायमान मानते हैं, जिसे अपने स्वार्थ या दूसरों की मर्जी के अनुसार कभी भी बदला जा सकता है, बिना वचनबद्धता का ध्यान रखे।

🎯 Exam Tip: प्रश्न का उत्तर देते समय लेखक के वास्तविक विचारों को सटीक रूप से प्रस्तुत करें।

 

Question 2. निम्नलिखित में से सही वाक्य के सम्मुख सही (√) का चिह्न लगाओ
(अ) पं० प्रतापनारायण मिश्र भारतेन्दु युग के लेखक हैं।
(ब) निराकार शब्द का अर्थ शालिग्राम शिला है।
(स) पं० प्रतापनारायण मिश्र ने ब्राह्मण' पत्रिका को सम्पादन नहीं किया।
(द) 'बात' के कई रूप हैं।
Answer:
(अ) पं० प्रतापनारायण मिश्र भारतेन्दु युग के लेखक हैं। (√)
(ब) निराकार शब्द का अर्थ शालिग्राम शिला है। (√)
(स) पं० प्रतापनारायण मिश्र ने ब्राह्मण' पत्रिका को सम्पादन नहीं किया। (x)
(द) 'बात' के कई रूप हैं। (√)
In simple words: सही वाक्यों को पहचानना आवश्यक है। पं० प्रतापनारायण मिश्र भारतेन्दु युग के थे और 'बात' के कई रूप होते हैं। 'निराकार' का अर्थ शालिग्राम शिला है। यह ध्यान रखना चाहिए कि मिश्र जी ने 'ब्राह्मण' पत्रिका का सम्पादन किया था, इसलिए 'नहीं किया' वाला कथन गलत है।

🎯 Exam Tip: ऐसे प्रश्नों में प्रत्येक विकल्प को ध्यान से पढ़ें और सुनिश्चित करें कि आप लेखक के संदर्भ में सही जानकारी का चयन कर रहे हैं।

 

Question 3. पं० प्रतापनारायण मिश्र किस युग के लेखक हैं?
Answer: पं० प्रतापनारायण मिश्र भारतेन्दु युग के लेखक हैं।
In simple words: पं० प्रतापनारायण मिश्र हिन्दी साहित्य के भारतेन्दु युग के एक प्रमुख और प्रभावशाली लेखक थे।

🎯 Exam Tip: लेखक के युग को सटीक रूप से याद रखें क्योंकि यह सामान्य ज्ञान का प्रश्न है।

 

Question 4. पं० प्रतापनारायण मिश्र किस महान् साहित्यकार को अपना गुरु मानते थे?
Answer: पं० प्रतापनारायण मिश्र भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को अपना गुरु मानते थे।
In simple words: पं० प्रतापनारायण मिश्र, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को अपना साहित्यिक गुरु और आदर्श मानते थे, जिनसे वे अत्यधिक प्रभावित थे।

🎯 Exam Tip: प्रमुख साहित्यकारों के गुरु-शिष्य परंपरा से संबंधित प्रश्नों का उत्तर सटीक होना चाहिए।

 

Question 5. पं० प्रतापनारायण मिश्र द्वारा लिखित दो नाटकों के नाम लिखिए ।
Answer: पं० प्रतापनारायण मिश्र द्वारा लिखित दो नाटक-'कलि-कौतुक' और 'हठी हम्मीर' है।
In simple words: पं० प्रतापनारायण मिश्र के दो प्रसिद्ध नाटक 'कलि-कौतुक' और 'हठी हम्मीर' हैं, जो उनके कृतित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

🎯 Exam Tip: नाटकों के नाम याद करते समय उनकी सही वर्तनी पर भी ध्यान दें।

 

Question 6. कलामुल्लाह का क्या अर्थ है?
Answer: कलामुल्लाह का अर्थ वचन है।
In simple words: 'कलामुल्लाह' एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ 'अल्लाह का वचन' या 'ईश्वर का वचन' होता है, जो कुरानशरीफ के संदर्भ में प्रयुक्त होता है।

🎯 Exam Tip: ऐसे शब्दों का अर्थ देते समय, यदि संभव हो तो उनके सांस्कृतिक या धार्मिक संदर्भ को भी संक्षेप में बताएं।

 

व्याकरण-बोध

 

Question 1. निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ स्पष्ट करते हुए उनका वाक्य प्रयोग कीजिए -
बात जाती रहना, बात जमना, बात बिगड़ना, बात का बतंगड़ बनाना, बात उखड़ना, बात की बात ।
Answer:
• बात जाती रहना- (बात का महत्त्व न होना)
राम ने दिनेश को इतना अधिक प्रलोभन दिया फिर भी उसकी बात जाती रही ।
• बात जमना - (ठीक तरह से बात समझ में आना) मैंने उसे बहुत अच्छी तरह से समझाया, जिससे बात जम गयी लगती है।
• बात बिगड़ना - (बात न बनना) मोहन को मैंने बार-बार समझाया था फिर भी बात बिगड़ गयी ।
• बात का बतंगड़ बनाना - (बातों में उलझाना) उसने बात का ऐसा बतंगड़ बनाया कि उसके समझ में नहीं आया।
• बात उखड़ना - (बात न बनना) उसके लाख समझाने पर भी बात उखड़ गयी।
• बात की बात - (प्रसंगवश किसी बात का जिक्र होना) मैं उसके साथ किये गये कार्यों का वर्णन नहीं कर रहा हूँ, यह तो बात की बात है।
In simple words: मुहावरे जैसे 'बात जाती रहना', 'बात जमना', 'बात बिगड़ना', 'बात का बतंगड़ बनाना', 'बात उखड़ना', और 'बात की बात' हिंदी भाषा को जीवंत बनाते हैं। ये क्रमशः बात के महत्वहीन होने, समझ में आने, खराब होने, छोटी बात को बड़ा बनाने, बात न बनने और प्रसंगवश उल्लेख होने का अर्थ व्यक्त करते हैं।

🎯 Exam Tip: मुहावरे का अर्थ स्पष्ट करें और फिर उसका एक उपयुक्त वाक्य प्रयोग करें जिससे अर्थ पूरी तरह से स्पष्ट हो जाए।

 

Question 2. निम्नलिखित में सनियम सन्धि-विच्छेद कीजिए तथा सन्धि का नाम बताइएनिराकार, निरवयव, परमेश्वर, धर्मावलम्बी, विदग्धालाप, युद्धोत्साही, स्वार्थान्धता, कवीश्वर, योगाभ्यास ।
Answer:
निराकार = निर + आकार = अ + आ = आ (दीर्घ सन्धि)
निरवयव = निरः + अवयव = : + अ = र (विसर्ग सन्धि)
परमेश्वर = परम + ईश्वर = अ + ई = ए (गुण सन्धि)
धर्मावलम्बी = धर्म + अवलम्बी = अ + अ = आ (दीर्घ सन्धि)
विदग्धालाप = विदग्ध + आलाप = अ + आ = आ (दीर्घ सन्धि)
युद्धोत्साही = युद्ध + उत्साही = अ + उ = ओ (गुण सन्धि)
स्वार्थान्धता = स्वार्थ + अन्धता = अ + अ = आ (दीर्घ सन्धि)
कवीश्वर = कवि + ईश्वर = इ + ई = ई (दीर्घ सन्धि)
योगाभ्यास = योग + अभ्यास = अ + अ = आ (दीर्घ सन्धि)
In simple words: सन्धि-विच्छेद में शब्दों को उनके मूल खंडों में विभाजित किया जाता है और सन्धि का प्रकार (जैसे दीर्घ, गुण, विसर्ग) बताया जाता है। यह प्रक्रिया शब्दों के निर्माण और उनके अर्थ को समझने में मदद करती है, जैसे निराकार का विसर्ग सन्धि और परमेश्वर का गुण सन्धि।

🎯 Exam Tip: सन्धि-विच्छेद करते समय, प्रत्येक शब्द के मूल रूप और सन्धि के नियमों को सटीक रूप से लागू करें और सन्धि का नाम अवश्य लिखें।

 

Question 3. निम्नलिखित में समास-विग्रह करके समास का नाम भी लिखिएकापुरुष, पाषाणखण्ड, सुपथ, यथासामर्थ्य, अपाणिपादो, कुमार्गी ।
Answer:
कापुरुष = कायर पुरुष = कर्मधारय
पाषाणखण्ड = पाषाण का खण्ड = सम्बन्ध तत्पुरुष
सुपथ = सुन्दर रास्ता = प्रादि तत्पुरुष
यथासामर्थ्य = सामर्थ्य के अनुसार = अव्ययीभाव
अपाणिपादो = नपाणिपादो = क् तत्पुरुष
कुमार्गी = कुत्सित मार्गी = कर्मधारय
In simple words: समास-विग्रह में यौगिक शब्दों को उनके घटक शब्दों में विभाजित किया जाता है और समास का प्रकार बताया जाता है। यह शब्दों की संरचना और उनके अर्थ को समझने में सहायक है, जैसे 'कापुरुष' कर्मधारय है और 'यथासामर्थ्य' अव्ययीभाव समास है।

🎯 Exam Tip: समास-विग्रह और समास के नाम को सटीक रूप से पहचानें। विशेष रूप से तत्पुरुष और कर्मधारय जैसे समान दिखने वाले समासों के बीच के अंतर को स्पष्ट रखें।

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