UP Board Solutions Class 12 Sociology Chapter 9 Crime

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Detailed Chapter 9 अपराध UP Board Solutions for Class 12 Sociology

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Class 12 Sociology Chapter 9 अपराध UP Board Solutions PDF

UP Board Solutions Class 12 Sociology Chapter 9 Crime

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 9 Crime (अपराध)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

 

Question 1. अपराध की परिभाषा दीजिए । भारत में अपराध के कारणों की विवेचना कीजिए।
या
अपराध के मुख्य व्यक्तिगत और मनोवैज्ञानिक कारणों को स्पष्ट कीजिए।
या
अपराध की परिभाषा दीजिए।
अपराध के आर्थिक और सामाजिक कारणों की व्याख्या कीजिए। अपराध के सामान्य कारणों की विवेचना कीजिए।
या
अपराध के चार प्रमुख कारण लिखिए।
या
क्या आपके विचार में अपराध का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कारण आर्थिक कारक है?
या
अपराध के विभिन्न कारकों का सविस्तार उल्लेख कीजिए।


Answer: अपराध की परिभाषा
अपराध एक ऐसा कार्य है, जो लोक-कल्याण के लिए अहितकर समझा जाता है तथा जिसे राज्य के द्वारा पारित कानून द्वारा निषिद्ध कर दिया जाता है। इसके उल्लंघनकर्ता को दण्ड दिया जाता है। अपराध को विभिन्न समाजशास्त्रियों ने निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है
इलियट तथा मैरिल के अनुसार, “अपराध को एक ऐसे समाज-विरोधी व्यवहार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसे समाज 'अमान्य करता है और इसके लिए दण्ड की व्यवस्था करता है।'
लैण्डिस और लैण्डिस के अनुसार, “अपराध वह कार्य है जिसे राज्य ने समूह-कल्याण के लिए हानिकारक घोषित किया है और जिसके लिए राज्य पर दण्ड देने की शक्ति है।”
थॉमस के अनुसार, “अपराध एक ऐसा कार्य है जो उस समूह के स्थायित्व का विरोधी है, जिसे व्यक्ति अपना समझता है।”
गिलिन तथा गिलिन के अनुसार, “कानूनी दृष्टिकोण से देश के कानूनों के विरुद्ध व्यवहारों को अपराध कहा जाता है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि अपराध की परिभाषा दो प्रकार से दी गयी है। इसे समाजशास्त्री दृष्टि से, कानूनी दृष्टि से तथा सामाजिक-कानूनी दृष्टि से परिभाषित किया गया है। किसी भी अपराध के लिए दो बातें होनी आवश्यक हैं (अ) वह कार्य समाज-विरोधी समझा जाता है तथा (ब) उस कार्य को करने वाले को राज्य कानूनी दृष्टि से दण्ड देता है।
अपराध के कारण
अपराध के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी होते हैं (अ) अपराध के व्यक्तिगत जैविकीय कारण व्यक्ति की आयु, लिंग, बौद्धिक स्तर, शैक्षणिक स्थिति तथा सामाजिक-आर्थिक स्थिति जैसे अनेक व्यक्तिगत व जैविकीय कारण अपराध के लिए उत्तरदायी बताये गये हैं। इनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं
1. आयु-आयु की दृष्टि से 17 वर्ष से 24 वर्ष के बीच की आयु में अपराध तीव्र गति से किये जाते हैं। गम्भीर अपराध 20 से 26 वर्ष की आयु में तथा यौन सम्बन्धी अपराध प्रौढ़ावस्था में अधिक होते हैं। अमेरिकी समाज में हुए अध्ययनों से हमें अपराध की प्रकृति और आयु में सम्बन्ध देखने को मिलता है।
2. लिंग-अपराध की दर महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में अधिक होती हैं। पुरुष का स्वभाव अधिक आक्रामक होता है, घर से बाहर रहने के कारण उन्हें उच्छृंखलता का अवसर अधिक मिलता है तथा उन पर कार्यभार होने के कारण मानसिक तनाव अधिक पाया जाता है।
3. शारीरिक दोष-व्यक्ति का कोई शारीरिक दोष भी कई बार अपराध का एक कारण बने जाता है। गोरिंग ने अपने अध्ययनों द्वारा यह बताया है कि अंग्रेज अपराधी कद में छोटे व वजन में कम होते हैं। यदि शारीरिक विकास आयु के अनुसार अत्यधिक है अथवा अत्यधिक अल्पविकसित है तो भी अपराध की प्रवृत्ति अधिक देखने को मिलती है।
4. वंशानुक्रमण-वंशानुक्रमण भी अपराध का कारण है। बच्चा जन्म से ही अपराधी प्रवृत्तियाँ लेकर आता है। लॉम्बोसो, गैरोफेलो, फैरी इत्यादि विद्वानों ने अपने अध्ययनों द्वारा अपराध में वंशानुक्रमण का महत्त्व स्पष्ट किया है।
(ब) अपराध के मनोवैज्ञानिक कारण अपराध को प्रोत्साहित करने वाली मानसिक दशाएँ निम्नलिखित हैं-
1. मानसिक दुर्बलता मानसिक दुर्बलता या बुद्धिहीनता भी अपराध का कारण हो सकता है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति अच्छे और बुरे कार्यों में अन्तर नहीं कर सकते। गोडार्ड ने मानसिक दुर्बलता को अपराध का प्रमुख कारण बताया है, जब कि एडलर ने इसका विरोध करते हुए इस बात पर बल दिया है कि अधिकांश अपराधी अपने बौद्धिक स्तर में सामान्य व्यक्ति के समान होते हैं।
2. संवेगात्मक अस्थिरता व संघर्ष-व्यक्ति संवेगात्मक तनाव को दूर करने के लिए भी अपराध करते हैं। हीले तथा ब्रोनर ने अपने अध्ययन द्वारा यह बताया है कि 91 प्रतिशत अपराधी अपनी हीनता की भावना को दूर करने के लिए अपराध करते हैं। अपराध भी एक संवेग है। बर्ट ने भी असन्तुलन तथा अस्थिरता पर बल दिया है।
3. मानसिक बीमारियाँ-अनेक मानसिक बीमारियाँ भी अपराधी प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देती हैं। हीन मनोवृत्तियाँ, हिस्टीरिया, मेनिया इत्यादि मानसिक बीमारियाँ भी अपराध के लिए उत्तर दायी मानी गयी हैं। अमेरिका की राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य समिति के अनुसार 77 प्रतिशत कैदी किसी-न-किसी रूप में मानसिक रोग से पीड़ित थे। यह अध्ययन 34 जेलों के अपराधियों के मानसिक विश्लेषण पर आधारित था।
(स) अपराध के सामाजिक कारण सामाजिक कारणों में हम निम्नलिखित दशाएँ सम्मिलित करते हैं-
1. परिवार-बच्चे के समाजीकरण तथा व्यक्तित्व के निर्माण में परिवार का महत्त्वपूर्ण योगदान होती है। यदि परिवार का वातावरण ही अच्छा नहीं है तो बच्चों का व्यक्तित्व भी ठीक प्रकार से विकसित नहीं होता है। सामान्यतः निम्नलिखित पारिवारिक दशाएँ अपराध में सहायक मानी जाती हैं
• विघटित परिवार-यदि परिवार विघटित है तथा सदस्यों में मतैक्य का अभाव है। तथा परिस्थितियों और भूमिकाओं में असन्तुलन आ गया है तो इसको सदस्यों पर बुरा प्रभाव पड़ता है और अपराधी प्रवृत्तियाँ अधिक पनपने लगती हैं।
• नष्ट घर-जब पारिवारिक विघटन अधिक हो जाता है तो उसे नष्ट घर कहते हैं। तलाक, परित्याग, माता या पिता दोनों में से एक या दोनों की मृत्यु से घर नष्ट हो जाता है और बच्चों का विकास ठीक प्रकार से नहीं हो पाता। अधिकांश बालअपराधी नष्ट घरों के ही होते हैं।
• तिरस्कृत बालक-यदि बच्चों को परिवार में संरक्षण तथा प्यार नहीं मिलती तथा अनचाहा बालक समझकर उसका तिरस्कार किया जाता है, तो वह अपराध की ओर अग्रसर हो जाता है। टैफ्ट के अनुसार, “निश्चित रूप से अनचाहा बालक बालअपराधी बन सकता है।”
• अनैतिक परिवार यदि परिवार के सदस्य अनैतिक कार्यों में लगे हुए हैं तो भी इसका बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ता है और वे अपराध की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं। इलियट के अनुसार, 67 प्रतिशत अपराधी लड़कियाँ अनैतिक परिवारों से आती हैं।
• अनुचित पारिवारिक नियन्त्रण-यदि सदस्यों पर परिवार का नियन्त्रण ठीक नहीं है और माता-पिता की व्यस्तता के कारण वे बच्चों को ठीक प्रकार से नहीं देख पा रहे हैं, तो बालक बुरी संगति में पड़कर आसानी से अपराधी बन जाते हैं।
2. शिक्षा-शिक्षा का भी अपराध से सम्बन्ध स्थापित किया गया है। शिक्षित व्यक्ति अधिकतर नियोजित अपराध करते हैं, जब कि अशिक्षित क्रूर अपराध अधिक करते हैं और सरलता से पकड़े जाते हैं।
3. धर्म-धर्म का नियन्त्रण आज प्रायः समाप्त होता जा रहा है तथा आज धर्म के नाम पर साम्प्रदायिकता का जहर पिलाकर अपराधों एवं गैर-कानूनी कार्यों को प्रोत्साहन मिल रहा है।
4. बुरी संगति-बुरा पड़ोस, अपराधी समूह आदि भी अपराध को प्रोत्साहन देते हैं। यदि व्यक्ति की संगति ठीक नहीं है और वह असामाजिक तत्वों के साथ रह रहा है, तो उसमें भी अपराध-वृत्ति पनपने लगती है। अपराध को जन्म देने में संगति का सबसे अधिक सहयोग रहता है।
5. सांस्कृतिक संघर्ष-सांस्कृतिक संघर्ष, सांस्कृतिक मूल्यों में परस्पर विरोध तथा सांस्कृतिक विलम्बन भी समाज में अव्यवस्था लाता है और अपराध-प्रवृत्तियों को विकसित होने में सहायता प्रदान करता है।
6. चलचित्र-चलचित्र को आज के युग में मनोरंजन की दृष्टि से प्रमुख स्थान प्राप्त है तथा इनका व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार पर गहन प्रभाव पड़ता है। काम-वासना के उत्तेजक दृश्यों, मार-धाड़ वाले दृश्यों, बलात्कार जैसे दृश्यों, अश्लील दृश्यों व गानों को युवा पीढ़ी पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। चलचित्रों में अपराध के जो दृश्य दिखाए जाते हैं, अनेक अपराधी उनका अनुसरण करके वैसे ही अपराध करना सीख जाते हैं तथा व्यवहार में करते भी हैं। चलचित्र मानसिक संघर्ष की स्थिति भी पैदा कर देते हैं, जो कि अपराध-वृत्ति के विकास में सहायक
7. समाचार-पत्र-समाचार-पत्र व पत्रिकाएँ भी अपराध को प्रोत्साहन देते हैं। प्रायः समाचार पत्रों में अपराध सम्बन्धी घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है तथा उन्हें रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है, जिसका युवा पीढ़ी पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
8. मद्यपाने मद्यपान तथा मादक द्रव्य-व्यसन अपराध का वैयक्तिक तथा सामाजिक कारण दोनों ही हैं। अधिकतर मद्यपान की आदत बुरी संगति, अनैतिक व विघटित परिवार होने के कारण तथा मानसिक तनाव के कारण पड़ती है। मद्यपान व्यक्ति, परिवार, समुदाय तथा समाज को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। इससे शारीरिक बीमारियों में वृद्धि होती है, शारीरिक पतन हो जाता है, व्यक्ति अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठता है और कई बार हत्या, आत्महत्या या बलात्कार जैसे अपराध भी कर बैठता है।
(द) अपराध के आर्थिक कारण
निम्नलिखित आर्थिक दशाएँ अपराध के लिए उत्तरदायी बतायी जाती हैं
1. निर्धनता-निर्धनता अपराध का एक कारण हो सकता है। निर्धनता व्यक्ति को गन्दी बस्तियों में रहने के लिए विवश करती है, जिनका वातावरण अपराधी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देने वाला होता है।
2. व्यापारिक स्थिति-अपराध की दर तथा व्यापार-चक्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। व्यापार की गिरावट के कारण रोजगार की कमी हो जाती है, माल का निकास रुक जाता है, पैसे की कमी - पड़ जाती है, भ्रष्टाचार बढ़ जाता है तथा इन सबसे अपराध की सामान्य दर प्रभावित होती है।
3. बेरोजगारी-बेरोजगारी भी अपराध का कारण है। अध्ययनों से पता चलता है कि बेकारी, आवारागर्दी और सम्पत्ति के विरुद्ध अपराधों को बढ़ावा देती है। वेश्यावृत्ति तथा महिलाओं में अनैतिकता को कई विद्वानों ने उनकी आर्थिक स्थिति से जोड़ा है। बेरोजगारी मानसिक तनाव की स्थिति पैदा कर देती है, जिससे व्यक्ति आपराधिक कार्यों की ओर अधिक आकर्षित हो जाता है।
4. आर्थिक असन्तोष व अत्यधिक असमानता-आर्थिक असन्तोष भी अपराध को प्रोत्साहन देता है। व्यक्ति अपनी अपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी कई बार अपराध की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं। अत्यधिक आर्थिक असमानता भी आर्थिक असन्तोष को जन्म देती है। आर्थिक असमानताओं से व्यक्ति में मानसिक तनाव पैदा हो जाता है, जो कि अपराध को बढ़ाता है।
5. औद्योगीकरण-औद्योगीकरण के फलस्वरूप जो समस्याएँ पैदा हो रही हैं, उनसे भी अपराध को प्रोत्साहन मिलता है।
(य) अपराध के भौगोलिक कारण भौगोलिक कारणों का भी अपराध को प्रोत्साहन देने में महत्त्वपूर्ण स्थान है। जलवायु, धरातल, ऋतु तथा मौसम के अनुसार अपराध की दरें घटने या बढ़ने सम्बन्धी अध्ययन हमारे सामने आये हैं। समतल क्षेत्र वाले भागों में बलात्कार की संख्या अधिक होती है, परन्तु संम्पत्ति के विरुद्ध अपराध कम होते हैं। अनेक गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में व्यक्ति के विरुद्ध अपराध तथा ठण्डे देशों में सम्पत्ति के विरुद्ध अपराध अधिक होने के निष्कर्ष निकाले गये हैं। अपराधशास्त्रियों ने अपराधी कैलेण्डर तक बनाकर यह बताने का प्रयास किया है कि किस प्रकार विशिष्ट प्रकार के अपराध विशिष्ट महीनों से सम्बन्धित हैं।
क्वेटलेट का कथन है कि “अपराध का प्रमुख सम्बन्ध जलवायु से है। जलवायु तथा मौसम में परिवर्तन होने के साथ ही अपराध में भी परिवर्तन देखने को मिलता है।” लैकेसन ने इस सन्दर्भ में निम्नलिखित विचार व्यक्त किये हैं।
अपराध
महीना1. शिशु-हत्या : जनवरी, फरवरी, मार्च तथा अप्रैल में अधिक
2. मानव-हत्या व अन्य गम्भीर अपराध: जुलाई में सबसे अधिक
3. पितृ-हत्या : जनवरी व अक्टूबर में सबसे अधिक4. बच्चों पर बलात्कार : जुलाई, अगस्त तथा सबसे कम दिसम्बर में
5. युवाओं से बलात्कार : सबसे अधिक दिसम्बर और जनवरी में
उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि अपराध का कोई एक कारण नहीं है, अपितु हो सकता है कि एक ही अपराध के पीछे एक से अधिक कारण हों। आपराधिक कारणों में व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक कारणों का भरपूर सहयोग रहता है।In simple words: अपराध समाज विरोधी व्यवहार है जिसे कानून द्वारा निषेध किया गया है और जिसके लिए दण्ड का प्रावधान है। इसके कई कारण हो सकते हैं, जिनमें व्यक्तिगत (आयु, लिंग, शारीरिक दोष, वंशानुक्रमण), मनोवैज्ञानिक (मानसिक दुर्बलता, संवेगात्मक अस्थिरता, बीमारियाँ), सामाजिक (परिवार का विघटन, शिक्षा, धर्म, बुरी संगति, सांस्कृतिक संघर्ष, चलचित्र, समाचार-पत्र, मद्यपान) और आर्थिक (निर्धनता, बेरोजगारी, असमानता) कारण शामिल हैं। भौगोलिक कारक जैसे जलवायु और मौसम भी अपराध को प्रभावित करते हैं।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में अपराध की परिभाषा और उसके विभिन्न कारणों (जैविकीय, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक) का विस्तृत विवरण देना महत्वपूर्ण है। विभिन्न समाजशास्त्रियों के मतों का उल्लेख करने से उत्तर की गुणवत्ता बढ़ती है।

 

Question 2. अपराध को नियन्त्रित करने हेतु सुझाव दीजिए।
या
अपराध की परिभाषा दीजिए तथा अपराध नियन्त्रण के दो उपाय बताइए।
या
अपराध क्या है? अपराध को नियन्त्रित करने के सुझाव दीजिए।


Answer: अपराध की परिभाषा
अपराध एक ऐसा कार्य है, जो लोक-कल्याण के लिए अहितकर समझा जाता है तथा जिसे राज्य के द्वारा पारित कानून द्वारा निषिद्ध कर दिया जाता है। इसके उल्लंघनकर्ता को दण्ड दिया जाता है। अपराध को विभिन्न समाजशास्त्रियों ने निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है
इलियट तथा मैरिल के अनुसार, “अपराध को एक ऐसे समाज-विरोधी व्यवहार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसे समाज 'अमान्य करता है और इसके लिए दण्ड की व्यवस्था करता है।'
लैण्डिस और लैण्डिस के अनुसार, “अपराध वह कार्य है जिसे राज्य ने समूह-कल्याण के लिए हानिकारक घोषित किया है और जिसके लिए राज्य पर दण्ड देने की शक्ति है।”
थॉमस के अनुसार, “अपराध एक ऐसा कार्य है जो उस समूह के स्थायित्व का विरोधी है, जिसे व्यक्ति अपना समझता है।”
गिलिन तथा गिलिन के अनुसार, “कानूनी दृष्टिकोण से देश के कानूनों के विरुद्ध व्यवहारों को अपराध कहा जाता है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि अपराध की परिभाषा दो प्रकार से दी गयी है। इसे समाजशास्त्री दृष्टि से, कानूनी दृष्टि से तथा सामाजिक-कानूनी दृष्टि से परिभाषित किया गया है। किसी भी अपराध के लिए दो बातें होनी आवश्यक हैं (अ) वह कार्य समाज-विरोधी समझा जाता है तथा (ब) उस कार्य को करने वाले को राज्य कानूनी दृष्टि से दण्ड देता है। अपराध निरोध के लिए, दण्ड, जेल, परिवीक्षा एवं पैरोल तथा उत्तम-संरक्षण सेवाओं के अतिरिक्त कुछ अन्य सुझाव निम्न प्रकार दिये जा सकते हैं
1. पूर्व बाल-अपराधियों की खोज-हमें ऐसे बच्चों को खोजना होगा जिनके आगे चलकर अपराधी बनने की सम्भावना हो। उनको पहले ही ऐसी परिस्थितियाँ प्रदान की जाएँ कि वे आगे चलकर अपराधी नहीं बनें।
2. मार्ग-दर्शन-अपराधियों को जेल में इस प्रकार का मार्गदर्शन प्रदान किया जाए, कि वे जेल से छूटने के बाद अपराधी नहीं बनें।
3. समितियों का निर्माण-ऐसी सामुदायिक एवं पड़ोस समितियों का निर्माण किया जाए जो समुदाय की उन परिस्थितियों का पता लगाएँ जो अपराध के लिए उत्तर दायी हैं।
4. परिवार का पुनर्गठन-कई अपराधी विघटित एवं टूटे परिवारों से आते हैं। अतः ऐसे उपाय अपनाये जाएँ जिससे परिवार के सदस्यों में प्रेम व सहयोग पनपे तथा मनमुटाव और तनाव समाप्त हो।
5. स्वस्थ मनोरंजन-वर्तमान युग का अस्वस्थ एवं व्यापारिक मनोरंजन भी अपराध को जन्म देता है। भद्दे, भौंडे तथा नग्न व अर्द्ध-नग्न चित्र, अपराध से परिपूर्ण फिल्में, जासूसी उपन्यास एवं सस्ता साहित्य, नाचघर, नाइट क्लब, कैबरे आदि सभी व्यक्ति के पतन के लिए उत्तरदायी हैं। इन सभी पर कठोर कानूनी पाबन्दी लगायी जानी चाहिए।
6. स्वस्थ निवास-गन्दी बस्तियाँ एवं भीड़भाड़युक्त मकान भी अपराध के लिए उत्तरदायी हैं। अतः सरकार को अधिकाधिक नियोजित बस्तियों का निर्माण करना चाहिए तथा मकान बनाने के लिए ऋण की सुविधाएँ उपलब्ध करायी जानी चाहिए।
7. स्कूलों के वातावरण में सुधार किया जाना चाहिए, क्योंकि शिक्षण संस्थाओं में ही मानवता ढलती है एवं व्यक्ति में नैतिकता की भावनाएँ पनपती हैं। वहीं व्यक्ति के चरित्र का गठन भी होता है।
8. जेलों की दशाएँ सुधारी जाएँ, उनमें चिकित्सा सेवा, स्वस्थ वातावरण एवं निवास की उचित व्यवस्था की जाए तथा अपराधियों के साथ सहानुभूतिपूर्ण एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार किया जाए।
9. अपराधियों को सुधारने के लिए मन-चिकित्सकों एवं समाजशास्त्रियों की सहायता ली जाए, जिससे वे भविष्य में अपराध न करें।
10. दण्ड का निर्धारण अपराधी की परिस्थितियों को देखकर किया जाए।
11. अलग-अलग प्रकार के अपराधियों के लिए अलग-अलग प्रकार के बन्दीगृह हों, क्योंकि प्रथम अपराधी को आदतन अपराधी के साथ रखने से उसके सुधरने के बजाय बिगड़ने के अधिक अवसर रहते हैं।
12. जनमत में परिवर्तन कर ऐसी प्रवृत्तियों का बहिष्कार किया जाए जो समाज-विरोधी कार्यों को जन्म देती हैं।
13. अपराधियों को ऋण व प्रशिक्षण की सुविधाएँ दी जाएँ, जिससे वे अपना कोई व्यवसाय चला सकें और अपराधी कार्यों से मुक्ति पा सकें।
14. जेल में अपराधियों को काम दिया जाए एवं उससे प्राप्त धन में से आधा भाग उनके परिवार वालों को दिया जाए जिससे उनका भरण-पोषण होता रहे।
15. न्याय सस्ता हो एवं साथ ही उसे शीघ्र उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
16. अपराधी जनजातियों के सुधार के लिए योजनाबद्ध कार्य किये जाएँ।
17. समाज में व्याप्त बेकारी एवं गरीबी की समस्या को शीघ्र उन्मूलन किया जाए, क्योंकि निर्धनता ही प्रमुखतः सभी अपराधों की जड़ है।In simple words: अपराध वह कार्य है जिसे राज्य के कानूनों द्वारा गलत माना जाता है। इसे नियंत्रित करने के लिए बच्चों में अपराधी प्रवृत्तियों को शुरुआती चरण में पहचानना, जेलों में मार्गदर्शन और सुधार कार्यक्रमों को बढ़ावा देना, परिवार और समुदाय को मजबूत करना, अस्वस्थ मनोरंजन पर रोक लगाना, बेहतर आवासीय और शैक्षिक वातावरण प्रदान करना, और न्याय प्रणाली को सुलभ बनाने जैसे कई सुझाव दिए जा सकते हैं।

🎯 Exam Tip: अपराध की परिभाषा और उसके नियंत्रण के उपायों को क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण है। सामाजिक, आर्थिक और कानूनी पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए सुझावों को स्पष्ट करें।

 

Question 3. भारत में भ्रष्टाचार निवारण हेतु सुझाव दीजिए।
या
भ्रष्टाचार एक सार्वभौमिक बुराई है। भारत में भ्रष्टाचार निवारण के उपायों का सुझाव दीजिए।


Answer: भारत में स्वतन्त्रता-प्राप्ति के तुरन्त पश्चात् भ्रष्टाचार की समस्या के समाधान के लिए 'भ्रष्टाचार निरोधक कानून' (Prevention of Corruption Act) पास किया गया। यह कानून केवल सरकारी कर्मचारियों तक ही सीमित होने के कारण अधिक प्रभावपूर्ण नहीं हो सका। इसके पश्चात् सरकार ने भ्रष्टाचार निवारण हेतु सुझाव देने के लिए सन् 1962 में सन्तानम कमेटी की नियुक्ति की। इस समिति ने भ्रष्टाचार के सभी क्षेत्रों तथा तरीकों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए अपनी महत्त्वपूर्ण सिफारिशें प्रस्तुत कीं, लेकिन ये सिफारिशें इतनी आदर्शवादी तथा महत्त्वाकांक्षी थीं कि इन्हें लागू नहीं किया जा सका। सन् 1960 तथा 1970 के बीच हमारे समाज में भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया कि भ्रष्टाचार उन्मूलन की बात करने वाले मन्त्रियों और अधिकारियों के विरुद्ध भी नियोजित षडयन्त्र चलाये जाने लगे।
सन् 1975 के पश्चात् यह माँग जोर पकड़ने लगी कि मन्त्रियों और बड़े-बड़े अधिकारियों के विरुद्ध जाँच करने वाले आयुक्तों की भी नियुक्ति की जानी चाहिए। इसके फलस्वरूप आज अनेक राज्यों में लोकपाल की नियुक्तियाँ की गयी हैं, जिन्हें बड़े-बड़े अधिकारियों तथा मन्त्रियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच करने के अधिकार दिये गये हैं। अनेक राज्यों में भ्रष्ट अधिकारियों को 50 वर्ष की आयु में अनिवार्य रूप से सेवा-मुक्त कर देने का प्रावधान रखा गया है। इसका उद्देश्य भ्रष्टाचार के मामलों में कानूनी जटिलताओं से बचना तथा प्रभावी कार्यवाही करना है।
उपर्युक्त प्रयासों के पश्चात् भी भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं हो सकी। इसका कारण एक ओर, भ्रष्टाचार की जड़ों का बहुत गहराई तक फैला होना है और दूसरी ओर, सरकार तथा प्रशासन की अक्षमता इसके लिए उत्तरदायी है। केवल यह कहना कि राजनीतिज्ञों, अधिकारियों और जनसाधारण को ईमानदार बनाकर, नैतिक मूल्यों का प्रचार करके तथा राष्ट्रीयता की भावना को प्रोत्साहन देकर भ्रष्टाचार को समाप्त करना चाहिए, एक ख्याली पुलावे पकाना है। भ्रष्टाचार निवारण केवल तभी सम्भव है जब भ्रष्टाचार के मूल कारणों को देखते हुए एक व्यावहारिक योजना के द्वारा इस बुराई को दूर करने के प्रयत्न किये जाएँ। इस योजना के विभिन्न अंगों के रूप में निम्नलिखित सुझाव अधिक उपयोगी हो सकते हैं।
1. व्यापारिक वर्ग में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कर-संरचना में परिवर्तन करना आवश्यक है। व्यापारियों द्वारा सर्वाधिक भ्रष्टाचार करों की चोरी तथा नकली हिसाब-किताब के रूप में मिलता है। यदि प्रत्येक वस्तु के उत्पादन स्थान पर ही पूर्ण सतर्कता के साथ सम्पूर्ण कर (Taxes) ले लिये जाएँ तो सरकार को प्रशासनिक व्यय भी कम करना पड़ेगा और करों की चोरी की सम्भावना भी कम हो जायेगी।
2. छोटे कर्मचारियों में भ्रष्टाचार निवारण के लिए उनके वेतन-स्तर में सुधार आवश्यक है। प्रत्येक स्तर के कर्मचारी को इतना वेतन अवश्य मिलना चाहिए जिससे वह अपने परिवार की अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा कर सके।
3. उच्च प्रशासनिक पदों, टेक्निकल कुशलता वाली सेवाओं तथा व्यवसायियों के लिए सेवा के स्थायीकरण (Confirmation of service) की परम्परा प्रजातान्त्रिक समाजों के लिए पूर्णतया गलत है। इन पदों पर एक विशेष अवधि के लिए नियुक्तियाँ की जानी चाहिए। ऐसा करने से प्रत्येक व्यक्ति अपनी कुशलता को बढ़ाने का प्रयत्न करेगा तथा अधिक-से-अधिक ईमानदारी से कार्य करके अपने जीवन को निष्कलंक बनाने के लिए प्रयत्नशील रहेगा।
4. सरकारी कार्यालयों में कामकाजी प्रक्रिया में सरलता लाने से भी रिश्वत और दूसरे प्रकार के भ्रष्टाचारों को दूर किया जा सकता है। प्रत्येक विभाग में कार्य की प्रक्रिया को सरल बनाने तथा प्रत्येक निर्णय के लिए अधिकतम समय सीमा का निर्धारण होना चाहिए।
5. जनसाधारण में प्रत्येक कार्यालय के नियमों तथा कार्यविधि का प्रचार करने से भी रिश्वतों को कम किया जा सकता है। ऐसे प्रचार से सरकारी दफ्तरों में आने वाले लोग वहाँ के बाबुओं पर निर्भर नहीं रहेंगे और न ही उन्हें बाबुओं द्वारा गुमराह किया जा सकेगा।
6. वर्तमान परिस्थितियों में यह आवश्यक है कि महत्त्वपूर्ण निर्णयों का जनसाधारण में प्रकाशन किया जाये। देश को आज सबसे अधिक हानि ऐसे भ्रष्टाचार से होती है जिसमें मन्त्रियों अथवा अधिकारियों द्वारा लाखों और करोड़ों रुपयों की राशि का उपयोग गुप-चुप ढंग से कर लिया जाता है। लोक सम्पत्ति के उपयोग की पूरी जानकारी जनसाधारण को मिलने से भ्रष्टाचार में कमी हो सकती है।
7. राजनीतिक दलों के भ्रष्टाचार पर नियन्त्रण लगाने के लिए यह आवश्यक है कि सभी राजनीतिक दलों की वार्षिक आय और व्यय का हिसाब जनसाधारण के लिए प्रकाशित किया जाए। ऐसी सूची प्रकाशित होने से राजनीतिक दलों को चुनाव के समय तरह-तरह के भ्रष्ट व्यवहार करने से रोका जा सकेगा।
8. इन प्रयत्नों के साथ ही देश में एक भ्रष्टाचार विरोधी 'गुप्त सरकारी संगठन' का होना आवश्यक है। इस संगठन में प्रशासनिक, तकनीकी तथा व्यावसायिक कुशलता से सम्पन्न अधिकारियों की नियुक्ति होनी चाहिए। यह आरोप लगाया जा सकता है कि कालान्तर में ऐसे गुप्त संगठनों के अधिकारी भी भ्रष्ट बन सकते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि दिल्ली में नियुक्त अधिकारियों का दस्ता यदि चेन्नई के किसी गाँव में जाकर निर्माणाधीन सरकारी इमारत में लगने वाली वस्तुओं की किस्म का निरीक्षण करे तो इससे भ्रष्टाचार उन्मूलन में सहायता ही मिलेगी।
9. अन्त में भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए दण्ड की प्रक्रिया को कठोर बनाना आवश्यक है। भ्रष्टाचार के अभियोग में पकड़े गये व्यक्तियों को जमानत की सुविधा नहीं मिलनी चाहिए। भ्रष्टाचार को कानून के द्वारा एक जघन्य अपराध घोषित किये बिना स्थिति में सुधार नहीं किया जा सकता।
गुन्नार मिर्डल ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक 'एशियन ड्रामा' (Asian Drama) में एशिया और मुख्य रूप से भारत के लोक जीवन में बढ़ते हुए भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अनेक सुझाव दिये हैं-
1. भ्रष्टाचार के अपराधी लोगों को दण्ड देने के लिए सरल कानून बनाये जाएँ;
2. रिश्वत देने वाले लोगों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाए;
3. आयकर देने वाले लोगों के विवरण को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित किया जाए;
4. व्यापारियों द्वारा राजनीतिक दलों को दिये जाने वाले चन्दों पर रोक लगायी जाएँ;
5. वेतनभोगी कर्मचारियों को इतना वेतन अवश्य दिया जाए जिससे उनकी सामान्य आवश्यकताएँ पूरी हो सकें;
6. लाइसेन्स और परमिट देने वाले अधिकारियों की गतिविधियों पर नियन्त्रण रखा जाए;
7. जो लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध शिकायत करते हैं, उन्हें सुरक्षा दी जाए;
8. भ्रष्टाचार सम्बन्धी झूठे समाचार छापने वाले समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं के विरुद्ध कार्यवाही की जाए;
9. मन्त्रियों तथा उच्च अधिकारियों की आय-व्यय का नियमित निरीक्षण किया जाए तथा
10. भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सतर्कता अभियान को तेज किया जाए।
उपर्युक्त सभी सुझाव इस मान्यता पर आधारित हैं कि एक प्रजातान्त्रिक समाज में भ्रष्टाचार की समस्या जब सभी वर्गों और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त हो जाती है, तो केवल अनुनय, विनम्रता, प्रचार और पुराने कानूनों के द्वारा ही इसका समाधान नहीं किया जा सकता। इस दशा में भ्रष्टाचार का उन्मूलन केवल कठोर अनुशासन और समय के अनुरूप कानूनों के द्वारा ही सम्भव है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिन देशों को उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का चस्का लग चुका है वे पूँजीवादी स्वार्थों को लेकर अब उन प्रजातान्त्रिक देशों को भ्रष्ट बनाने का षडयन्त्र कर रहे हैं, जो अपनी प्रगति स्वयं ही करना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में हमारी जनतान्त्रिक स्वतन्त्रता पर भले ही अंकुश लग जाए, लेकिन सम्पूर्ण राष्ट्र की प्रगति और समृद्धि के लिए भ्रष्टाचार पर कठोरता से नियन्त्रण लगाना आज अंत्यधिक आवश्यक है।In simple words: भारत में भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के लिए कर-संरचना में बदलाव, कर्मचारियों के वेतन में सुधार, सरकारी प्रक्रियाओं का सरलीकरण, राजनीतिक दलों की वित्तीय पारदर्शिता और भ्रष्टाचार विरोधी संगठनों को सशक्त करना आवश्यक है। इसके साथ ही, भ्रष्टाचार के दोषियों को कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए।

🎯 Exam Tip: भ्रष्टाचार निवारण के उपायों को लिखते समय, यह सुनिश्चित करें कि आप कानूनी, प्रशासनिक और सामाजिक-आर्थिक पहलुओं को शामिल करें। गुन्नार मिर्डल जैसे विद्वानों के सुझावों का उल्लेख करने से उत्तर में गहराई आती है।

 

Question 4. ‘अपराध राज्य के नियमों का उल्लंघन है।' स्पष्ट करते हुए अपराध के मुख्य प्रकार बताइए।


Answer: अपराध राज्य के नियमों का उल्लंघन
राज्य में व्यवस्था कायम रखने के लिए और उसका भली-भाँति संचालन करने के लिए कुछ कानून और नियम बनाये जाते हैं। राज्य के हर व्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि वह कानूनों को माने। किन्तु कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जो कानूनों का पालन नहीं करते हैं। वे कानून को भंग करते हैं। भंग करने वालों में दो तरह के लोग होते हैं-एक तो वे लोग, जो अनजाने में कानून-विरोधी कार्य कर डालते हैं और दूसरे वे, जो जान-बूझकर कानून को तोड़ते हैं। कानून को भंग करने का कार्य जब जान-बूझकर किया जाता है, तो ऐसा कार्य कानूनी दृष्टि से 'अपराध' कहलाता है।
इसलिए इस दृष्टि से उन बच्चों के गलत कार्यों को अपराध नहीं माना जाता, जो छः वर्ष से कम आयु के होते हैं। यदि कोई छोटा बच्चा कोई गलती करता है, तो उसकी अज्ञानता के कारण हम प्रारम्भ में उसे क्षमा कर देते हैं। नशे में चूर और पागल व्यक्ति यदि कोई गलत कार्य कर बैठता है, तो उसे भी 'अपराध' के अन्तर्गत नहीं रखा जाता। प्रत्येक राज्य में समुदाय की आवश्यकता के अनुसार सार्वजनिक कल्याण के आधार पर राज्य के नियम व कानून भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, इसलिए अपराध के अन्तर्गत आने वाले व्यवहारों की कोई ऐसी सूची नहीं बनायी जा सकती जो समाजों तथा समुदायों के लिए सार्वभौमिक हो। इसके उपरान्त भी कानूनी दृष्टिकोण से अपराध की धारणा चार विशेषताओं से सम्बन्धित है
1. अपराध कोई भी वह व्यवहार है जो एक समुदाय में प्रचलित कानूनों के उल्लंघन से सम्बद्ध हो।
2. ऐसे व्यवहार में अपराधी इरादे (criminal intentions) की समावेश हो। वास्तव में, व्यक्ति की 'नीयत' में जब दोष आ जाता है तथा वह जान-बूझकर किसी निषिद्ध अपराध को करता है, तभी इसे अपराध कहा जाता है।
3. अपराध का सम्बन्ध एक बाह्य क्रिया (over act) से है। व्यक्ति की नीयत में दोष आने पर भी यदि वह किसी बाह्य क्रिया द्वारा कानून का उल्लंघन नहीं करता तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता।
4. राज्य की ओर से दण्ड की व्यवस्था अपराध का अन्तिम तत्त्व है। व्यक्ति यदि कोई ऐसा व्यवहार करे जिससे सार्वजनिक जीवन को हानि होती हो, लेकिन राज्य की ओर से ऐसे व्यवहार के लिए कोई दण्ड निर्धारित न हो तो ऐसे व्यवहार को अपराध नहीं कहा जा सकता। उपर्युक्त विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए अनेक विद्वानों ने कानूनी दृष्टिकोण से अपराध को
परिभाषित किया है। डॉ० सेथना के अनुसार, “अपराध कोई भी वह कार्य अथवी त्रुटि है जो किसी विशेष समय पर राज्य द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार दण्डनीय है, इसका सम्बन्ध चाहे 'पाप' से हो अथवा नहीं।” लगभग इसी प्रकार हाल्सबरी का कथन है कि, “अपराध एक अवैधानिक त्रुटि है जो जनता के विरुद्ध है और जिसके लिए अभियुक्त को कानूनी दण्ड दिया जाता है। विलियम ब्लेकस्टोन के अनुसार, “किसी भी सार्वजनिक कानून की अवज्ञा अथवा उल्लंघन से सम्बन्धित व्यवह्मर ही अपराध है।' टैफ्ट ने अपराध की संक्षिप्त परिभाषा देते हुए लिखा है, “वैधानिक रूप से अपराध एक ऐसा कार्य है जो कानून के अनुसार दण्डनीय होता है।
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि कानून का एक बुरे इरादे से जान-बूझकर उल्लंघन करना तथा इस प्रकार सार्वजनिक हित को हानि पहुँचाना ही अपराध है। कानूनी दृष्टि से अपराधी व्यक्ति को राज्य द्वारा दण्ड मिलता है और असामाजिक कार्य करने पर स्वयं समाज व्यक्ति को बहिष्कृत करके, अपमानित करके या हुक्का-पानी बन्द करके दण्डित करता है।
अपराध के प्रकार
विभिन्न समाजशास्त्रियों ने अपराध को अपने-अपने ढंग से वर्गीकृत किया है। सामान्य रूप से अपराध निम्नलिखित प्रकार के होते हैं- (क) गम्भीरता के आधार पर वर्गीकरण-गम्भीरता के आधार पर अपराध को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है-
1. कम गम्भीर अपराध या कदाचार-इसमें उन अपराधों को सम्मिलित किया जाता है, जो कानून की दृष्टि से अधिक गम्भीर नहीं होते। जुआ, मद्यपान, बिना टिकट के यात्रा करना। इत्यादि लघु या कम गम्भीर अपराध के उदाहरण हैं।
2. गम्भीर अपराध या महापराध-इसमें गम्भीर प्रकृति के अपराध सम्मिलित किये जाते हैं। हत्या, बलात्कार, देशद्रोह इत्यादि अपराध इसके प्रमुख उदाहरण हैं। ऐसे अपराधों के लिए दण्ड भी गम्भीर होता है; जैसे-सम्पत्ति जब्त कर लेना, आजीवन कारावास अथवा मृत्युदण्ड आदि।
(ख) अपराध के प्रयोजन के आधार पर वर्गीकरण-बोन्जर (Bonger) ने अपराधियों के प्रयोजन के आधार पर अपराध को अग्रलिखित चार श्रेणियों में विभाजित किया है
1. आर्थिक अपराध;
2. लिंग सम्बन्धी अपराध;
3. राजनीतिक अपराध तथा
4. विविध (Miscellaneous) अपराध।
(ग) उद्देश्यों के आधार पर वर्गीकरण-हेज (Hayes) ने अपराधियों के उद्देश्यों तथा प्रेरणाओं को सामने रखकर अपराध को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित किया है।
1. व्यवस्था के विरुद्ध अपराध,
2. सम्पत्ति के विरुद्ध अपराध तथा
3. व्यक्ति के विरुद्ध अपराध।In simple words: अपराध राज्य द्वारा निर्धारित कानूनों का जानबूझकर उल्लंघन करना है, जिससे सार्वजनिक जीवन को हानि होती है और जिसके लिए दण्ड का प्रावधान है। इसे बच्चों, पागल या नशे में धुत व्यक्ति द्वारा किए गए कार्यों से अलग किया जाता है। अपराध को गंभीरता के आधार पर (कम गंभीर या गंभीर) और प्रयोजन के आधार पर (आर्थिक, लिंग संबंधी, राजनीतिक, विविध) तथा उद्देश्यों के आधार पर (व्यवस्था, संपत्ति या व्यक्ति के विरुद्ध) वर्गीकृत किया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: अपराध की कानूनी परिभाषा पर जोर दें और समझाएं कि यह कैसे एक जानबूझकर किया गया कार्य है। अपराध के विभिन्न वर्गीकरणों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना उत्तर को सुदृढ़ बनाएगा।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

 

Question 1. अपराध के लक्षणों का विवरण दीजिए।


Answer: जिरोम हाल ने उन विशेषताओं का उल्लेख किया है जिनके आधार पर किसी मानवीय व्यवहार को अपराध घोषित किया जाता है। वे इस प्रकार हैं
1. हानि-अपराधी क्रिया का बाह्य परिणाम ऐसा होना चाहिए जिससे अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों को शारीरिक, मानसिक या आर्थिक हानि हो। इस प्रकार के अपराध से समाज को नुकसान होता हो।
2. क्रिया-जब तक कोई व्यक्ति अपराधी क्रिया न करे और अपराध करने का केवल मन में . विचार ही रखे, तब तक वह विचार अपराध नहीं माना जाएगा।
3. कानून के द्वारा निषेध-कोई भी कार्य तब तक अपराध नहीं माना जाएगा जब तक कि उस देश का कानून उसे अवैधानिक घोषित न करे।
4. अपराधी उद्देश्य-अपराध निर्धारण में अपराधी उद्देश्य एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। जान बूझकर इरादतन किया हुआ कानून-विरोधी कार्य अपराध है। अनजाने में बिना इरादे के या भूल से किये हुए कार्य को हम अपराध तो मानते हैं, किन्तु उतना गम्भीर नहीं जितना कि पूर्व इरादे से किये कार्य को।
5. उद्देश्य और व्यवहार में सह-सम्बन्ध-अपराध के लिए अपराधी उद्देश्य के साथ ही क्रिया का होना भी आवश्यक है। उद्देश्यहीन क्रिया या क्रियाहीन उद्देश्य अपराध नहीं होगा। दोनों का प्रकाशन साथ-साथ होनी चाहिए।
6. दण्ड-अपराध करने पर राज्य और समाज अपराधी को दण्ड देता है। यह दण्ड शारीरिक .. दण्ड या जुर्माना आदि के रूप में हो सकता है।
7. समय व स्थान सापेक्ष-अपराधी क्रियाओं का सम्बन्ध समय व स्थान से भी है। एक समय में एक क्रिया अपराध मानी जाती है, वही दूसरे समय में नहीं। सती प्रथा, दहेज-प्रथा। और बाल-विवाह कभी अपराध नहीं माने जाते थे, किन्तु आज ये अपराधी क्रियाएँ हैं। इसी प्रकार से जो कार्य भारत में अपराध माने जाते हैं, वे अफ्रीका में भी अपराध माने जाते हों, यह आवश्यक नहीं है, क्योंकि सभी देशों के अपने-अपने कानून हैं।In simple words: अपराध के लक्षणों में दूसरों को शारीरिक, मानसिक या आर्थिक हानि पहुंचाना, वास्तविक क्रिया का होना (केवल विचार नहीं), कानून द्वारा निषेध, अपराधी का इरादा, उद्देश्य और क्रिया का सह-संबंध, राज्य द्वारा दण्ड का प्रावधान, और समय व स्थान के अनुसार अपराध की अवधारणा का बदलना शामिल है।

🎯 Exam Tip: अपराध के लक्षणों को एक क्रमबद्ध सूची के रूप में प्रस्तुत करें। प्रत्येक लक्षण को संक्षिप्त रूप से समझाएं, उदाहरणों का उपयोग करके उसकी स्पष्टता बढ़ाएं।

 

Question 2. अपराधों के कारण सम्बन्धी 'शास्त्रीय सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।


Answer: शास्त्रीय सिद्धान्त का विकास 18वीं सदी के अन्त में हुआ। इसके प्रमुख समर्थकों में बैकरिया, बेन्थम और फ्यूअरबेक थे। इस सिद्धान्त में विश्वास रखने वाले सुखदायी दर्शन (Hedonistic Philosophy) से प्रभावित थे। इस दर्शन की यह मान्यता है कि प्रत्येक व्यक्ति किसी भी कार्य को करने से पूर्व उससे मिलने वाले सुख व दुःख का हिसाब लगाता है और वही कार्य करता है जिससे उसको सुख मिलता है। एक अपराधी भी अपराध इसलिए करता है कि उसे अपराध करने पर दुःख की तुलना में सुख अधिक मिलता है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति चोरी करने से पूर्व यह सोचेगा कि चोरी करने पर उसे जो दण्ड मिलेगी, वह चोरी करने पर मिलने वाले सुख की तुलना में निश्चित ही कम होगा, तभी वह चोरी करेगा अन्यथा नहीं। इन विद्वानों का मत है कि अपराध को रोकने के लिए दण्ड इतना दिया जाए कि अपराध से मिलने वाले सुख की तुलना में वह अधिक हो। उनका मत है कि पागल, मूर्ख, बालक एवं वृद्धों को दण्ड नहीं दिया जाना चाहिए।
इस सिद्धान्त को एकांगी होने के कारण स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह सही नहीं है कि हर समय व्यक्ति सुख-दुःख से प्रेरित होकर ही कोई कार्य करता है। कई बार वह मजबूरी एवं दुःखों से मुक्ति के लिए भी अपराध करता है। अपराध के सामाजिक कारणों की भी इस सिद्धान्त में अवहेलना की गयी है।In simple words: शास्त्रीय सिद्धान्त के अनुसार, मनुष्य अपने कार्यों का चयन सुख-दुःख के मूल्यांकन के आधार पर करता है। अपराधी भी अपराध इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अपराध से मिलने वाला सुख दण्ड से मिलने वाले दुःख से अधिक होगा। इस सिद्धान्त का मानना है कि कठोर दण्ड से अपराधों को रोका जा सकता है, लेकिन यह सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारकों की उपेक्षा करता है।

🎯 Exam Tip: शास्त्रीय सिद्धान्त के प्रमुख विचारकों (जैसे बेकरिया, बेन्थम) और 'सुखदायी दर्शन' के प्रभाव को स्पष्ट रूप से उल्लेख करें। सिद्धान्त की आलोचना को भी शामिल करना न भूलें।

 

Question 3. अपराधों के कारण सम्बन्धी इटैलियन सम्प्रदाय अथवा प्रारूपवादी सम्प्रदाय सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
या
‘अपराधी जन्मजात होते हैं।' इस कथन की व्याख्या कीजिए।


Answer: इस सम्प्रदाय के जन्मदाता इटली के लॉम्ब्रोसो, उनके समर्थक गैरोफैलों और एनरिकोफेरी थे। इटली के निवासी होने के कारण इस सम्प्रदाय का यह नामकरण किया गया। इस सम्प्रदाय के लोगों ने अपराध के कारणों की व्याख्या अपराधी की शरीर-रचना के आधार पर की है।
लॉम्ब्रोसो इटली की सेना में डॉक्टर थे। अपने सेवाकाल के दौरान उन्होंने देखा कि कुछ सैनिक अनुशासन-प्रिय हैं, तो कुछ उद्दण्ड। अपराधी सैनिकों की शरीर-रचना और सामान्य सैनिकों की शरीर-रचना में उल्लेखनीय अन्तर था। उन्होंने इटली की जेलों का भी अध्ययन किया और पाया कि शरीर-रचना और मानसिक विशेषताओं में घनिष्ठ सम्बन्ध है। उन्होंने उस समय के एक प्रसिद्ध डाकू की खोपड़ी (Skull) और मस्तिष्क (Brain) का अध्ययन किया तो पाया कि उसमें अनेक विचित्रताएँ हैं, जो साधारण मनुष्यों में नहीं होतीं। इसके अतिरिक्त उन्होंने 383 मृत अपराधियों की खोपड़ियों का भी अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि अपराधियों की शारीरिक रचना आदिमानव और पशुओं से बहुत-कुछ मिलती-जुलती है। इसलिए ही उनमें जंगलीपन और पशुता के गुण हैं जो उन्हें अपराध के लिए प्रेरित करते हैं। ये शारीरिक विशेषताएँ वंशानुक्रमण में मिलती। हैं और अपराधियों को विशेष प्रारूप प्रदान करती हैं। इसलिए इस मत को प्रारूपवादी सम्प्रदाय भी कहते हैं। यही कारण है कि अपराधी जन्मजात होते हैं। उन्होंने लगभग 15 शारीरिक अनियमितताओं का उल्लेख किया और बतलाया कि जिसमें भी इनमें से 4 अनियमितताएँ होंगी, वह निश्चित रूप से अपराधी होगा। वे अपराधियों को दण्ड देने के साथ-साथ बाल-अपराधियों के सुधार के पक्ष में भी थे।
इटैलियन सम्प्रदाय की अनेक विद्वानों ने आलोचना की है। उनमें डॉ० गोरिंग और थान सेलिन प्रमुख हैं। गोरिंग ने 12 वर्ष तक तीन हजार अपराधियों का अध्ययन करके बताया कि अपराधी और गैर-अपराधी की शरीर-रचना में कोई अन्तर नहीं होता। यदि अपराधी आदिमानव का प्रारूप है तो क्या सभी आदिमानव अपराधी थे? आज यह भी कोई नहीं मानता कि अपराधी जन्मजात होते हैं और शारीरिक एवं मानसिक लक्षण वंशानुक्रमण में मिलते हैं।In simple words: इटैलियन सम्प्रदाय, जिसके प्रणेता लॉम्ब्रोसो थे, मानता है कि अपराधी जन्मजात होते हैं और उनकी शारीरिक बनावट आदिमानवों या पशुओं से मिलती-जुलती होती है, जो उन्हें अपराध की ओर प्रेरित करती है। लॉम्ब्रोसो ने अपराधियों की खोपड़ियों और शारीरिक अनियमितताओं का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला था। हालांकि, बाद में इस सिद्धान्त की आलोचना की गई और यह अस्वीकृत कर दिया गया कि अपराधी जन्मजात होते हैं।

🎯 Exam Tip: लॉम्ब्रोसो के सिद्धान्त के मुख्य बिन्दुओं (जन्मजात अपराधी, शारीरिक विशेषताएँ) को स्पष्ट करें। साथ ही, इस सिद्धान्त की आलोचना और वर्तमान स्वीकार्यता का भी उल्लेख करना आवश्यक है।

 

Question 4. प्राचीर-विहीन जेल पर एक टिप्पणी लिखिए।


Answer: डॉ० सम्पूर्णानन्द के प्रयासों के परिणामस्वरूप वर्ष 1952-53 में चन्द्रप्रभा नदी पर अपराधियों को एक शिविर लगाया गया, जिसमें उनके भोजन, वस्त्र, शिक्षा और मनोरंजन की व्यवस्था की गयी। ऐसे शिविरों में अपराधियों को बन्दी बनाकर नहीं रखा जाता है और न ही उनके लिए चौकीदारी की व्यवस्था की जाती है। केरल, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु तथा गुजरात में इस प्रकार की जेलों की व्यवस्था की गयी है।
यहाँ जेलों की ऊँची-ऊंची दीवारों के स्थान पर काँटेदार तार लगाये गये। वह भी इसलिए कि अपराधी उस सीमारेखा का अतिक्रमण न करें। अपराधियों के लिए बने ये शिविर दीवारों से रहित थे। अतः इन्हें प्राचीर-विहीन बन्दीगृह कहा गया। बन्दीगृहों में रहने वाले अपराधियों से कार्य कराया जाता था। उसके बदले उन्हें पारिश्रमिक दिया जाता था। बन्दी अपनी आधी आमदनी अपने घर भेज सकते थे और उसका चौथाई अंश अपने पर व्यय कर सकते थे, जब कि चौथाई अंश कोष में जमा कराया था। उनकी सजा की अवधि समाप्त होने पर उनकी बचत उन्हें सौंप दी जाती थी। सम्पूर्णानन्द शिविर बन्दियों में आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान जगाने के माध्यम थे। अपराधी स्वयं सुधरकर, आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होकर समाज में पहुँचता था। छूटने पर उसे व्यवसाय करने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती थी। सरकार भी कैदियों की सुरक्षा, रखवाली तथा भारी रख-रखाव के व्यय से बच जाती थी।In simple words: प्राचीर-विहीन जेल ऐसे खुले शिविर होते हैं जहाँ अपराधियों को बिना ऊँची दीवारों के रखा जाता है, केवल काँटेदार तार होते हैं। यहाँ कैदियों को काम करने और पारिश्रमिक कमाने का अवसर दिया जाता है, जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें और समाज में लौटने पर सामान्य जीवन जी सकें। इसका उद्देश्य कैदियों में सुधार और आत्मसम्मान बढ़ाना है, साथ ही सरकार के रख-रखाव के खर्च को कम करना है।

🎯 Exam Tip: प्राचीर-विहीन जेल की अवधारणा, उसके उद्देश्य (सुधार, आत्मनिर्भरता) और लाभों (कैदियों व सरकार के लिए) को स्पष्ट रूप से समझाएं। उदाहरण के तौर पर डॉ. सम्पूर्णानन्द के प्रयासों का उल्लेख करें।

 

Question 5. परिवीक्षा (Probation) पर टिप्पणी लिखिए।


Answer: परिवीक्षा में अपराधी को सजा के बदले सशर्त मुक्त कर दिया जाता है और उससे अपेक्षा की जाती है कि वह परिवीक्षा की अवधि में अपना आचरण उत्तम रखेगा। इस प्रकार अपराधी को दण्ड के बजाय, दण्ड सुनाने के बाद ही, उसे परिवीक्षा पर छोड़ा जाता है। छूटने से पूर्व परिवीक्षा काल में उत्तम आचरण रखने का प्रमाण-पत्र देना होता है। अपराधी को सरकार की ओर से निर्देशन एवं सहायता प्रदान की जाती है, जिससे वह समाज के साथ सामंजस्य स्थापित कर सके। परिवीक्षा अधिकारी सरकार की ओर से परिवीक्षा पर छोड़े गये अपराधियों की देख-रेख करता है। वही अपराधी की छानबीन कर प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है। उत्तर प्रदेश में प्रत्येक ऐसे अपराधी को प्रोबेशन पर छोड़ने का प्रावधान है जिसकी आयु 21 वर्ष से कम हो तथा जिसे न्यायालय ने 6 माह की सजा सुनाई हो। परिवीक्षा पर छोड़ने से अनेक लाभ होते हैं; जैसे-
1. अपराधी की मनोवृत्ति में परिवर्तन होता है और उसे भविष्य में समाज-विरोधी कार्य न करने का प्रोत्साहन मिलता है।
2. वह जेल के दूषित वातावरण से बच जाता है।
3. उसमें अनुशासन की भावना उत्पन्न होती है।
4. जेल में रहने पर उस पर जो खर्च होता है वह परिवीक्षा पर छोड़ने से बच जाता है।In simple words: परिवीक्षा (Probation) एक ऐसी प्रक्रिया है जहाँ अपराधी को जेल की सजा के बजाय कुछ शर्तों के साथ समाज में छोड़ा जाता है, जिसमें उसे एक परिवीक्षा अधिकारी की निगरानी में अच्छा व्यवहार करना होता है। इसका उद्देश्य अपराधी के व्यवहार में सुधार लाना, उसे जेल के नकारात्मक प्रभावों से बचाना, और समाज में पुनः एकीकृत होने में सहायता करना है, जिससे सरकारी खर्च भी कम होता है।

🎯 Exam Tip: परिवीक्षा की परिभाषा और उसके मुख्य लाभों को स्पष्ट करें। यह भी उल्लेख करें कि किन अपराधियों को परिवीक्षा पर छोड़ा जा सकता है (जैसे आयु सीमा)।

 

Question 6. “प्रत्येक मानव व्यवहार सीखा हुआ व्यवहार है-अपराधी व्यवहार भी मानव व्यवहार है, अतः सीखा हुआ व्यवहार है।” स्पष्ट कीजिए।


Answer: सदरलैण्ड (Sutherland) का विचार है कि अपराध एक सीखा हुआ व्यवहार है, जो अन्तक्रिया तथा सम्पर्क के द्वारा एक से दूसरे व्यक्ति द्वारा ग्रहण किया जाता है, इसे कभी भी वंशानुक्रम के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। यद्यपि इस व्यवहार को किसी भी समूह में रहकर सीखा जा सकती है, लेकिन मुख्यतः यदि व्यक्ति के प्राथमिक समूहों का वातावरण अपराधी हो तो व्यक्ति जल्दी ही अपराधी व्यवहार को ग्रहण कर लेता है। कोई व्यक्ति कितनी परिस्थिति से तथा किस सीमा तक अपराधी व्यवहार को सीखेगा यह प्राथमिक समूहों की चार परिस्थितियों पर निर्भर करता है, अर्थात्
1. प्राथमिकता,
2. पुनरावृत्ति,
3. अवधि तथा
4. तीव्रता।
इसका तात्पर्य है कि एक व्यक्ति कितनी कम आयु में अपराधी समूहों के सम्पर्क में आया (प्राथमिक), कितनी बार उसे ऐसे सम्पर्क का अवसर मिला (पुनरावृत्ति), कितने अधिक समय तक यह अपराधियों के सम्पर्क में रहा (अवधि) तथा यह सम्पर्क कितनी घनिष्ठता का रहा (तीव्रता) आदि कारक ही इस बात का निर्धारण करते हैं कि अपराधी व्यवहारों की सीख कितनी प्रभावपूर्ण होगी। सदरलैण्ड का कथन है कि अपराधी व्यवहारों की सीख एक व्यक्ति को केवल अपराध के तरीकों का ही प्रशिक्षण नहीं देती बल्कि उसकी मनोवृत्तियों तथा प्रेरणाओं को भी बदल देती है। व्यक्ति की मनोवृत्तियाँ जब इस तरह बदल जाती हैं कि वह नियमों के पालन की अपेक्षा नियमों के उल्लंघन को अपने व्यक्तित्व को अंग बना लेता है तो स्वाभाविक रूप में वह अपराध की ओर बढ़ने लगता है। सीख की यह मात्रा सभी अपराधियों में भिन्न-भिन्न होती है। यही कारण है कि सभी अपराधियों की विशेषताएँ भी एक-दूसरे से कुछ भिन्न होती हैं। इसी आधार पर सदरलैण्ड ने अपने सिद्धान्त को 'विभिन्नतायुक्त संगति सिद्धान्त' (Theory of Differential Association) का नाम दिया है। इस सिद्धान्त द्वारा प्रस्तुत मुख्य निष्कर्ष इस प्रकार हैं-
1. अपराधी व्यवहार एक सीखा हुआ व्यवहार है;
2. अपराधी व्यवहार की सीख अन्तक्रिया और संचार के माध्यम से प्रभावपूर्ण बनती है;
3. अपराधी व्यवहार का एक बड़ा भाग प्राथमिक समूहों में सीखा जाता है;
4. अपराधी व्यवहार की सीमा अथवा दर सीखने की प्रक्रिया की प्राथमिकता, पुनरावृत्ति, अवधि तथा तीव्रता के अनुसार घटती-बढ़ती है तथा
5. अपराधी व्यवहार भी अन्य प्रक्रियाओं के समान एक सामाजिक प्रक्रिया है।In simple words: सदरलैण्ड के 'विभिन्नतायुक्त संगति सिद्धान्त' के अनुसार, अपराधी व्यवहार जन्मजात नहीं होता बल्कि सामाजिक अंतःक्रिया और संचार के माध्यम से सीखा जाता है, खासकर प्राथमिक समूहों में। सीखने की प्रक्रिया की प्रभावशीलता व्यक्ति के अपराधी समूहों के साथ सम्पर्क की उम्र, आवृत्ति, अवधि और गहनता पर निर्भर करती है, जिससे व्यक्ति के विचार और प्रेरणाएँ भी बदल जाती हैं।

🎯 Exam Tip: सदरलैण्ड के विभिन्नतायुक्त संगति सिद्धान्त के मुख्य तत्वों को विस्तार से बताएं। सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले चार कारकों (प्राथमिकता, पुनरावृत्ति, अवधि, तीव्रता) को समझाना महत्वपूर्ण है।

 

Question 7. “हमें अपराधी से नहीं अपराध से घृणा करनी चाहिए। इस परिप्रेक्ष्य में मृत्युदण्ड अपराध निरोध का निकृष्टतम साधन है।” स्पष्ट कीजिए।
या
'अपराधी जन्मजात नहीं होते वरन बनाये जाते हैं। व्याख्या कीजिए
या
यह कथन किसका है कि अपराधी बनाये जाते हैं?


Answer: समाजशास्त्रीय सिद्धान्त के अनुसार अपराधी जन्मजात नहीं होते, बल्कि समाज द्वारा बनाये जाते हैं। सदरलैण्ड के अनुसार, दूसरे व्यवहारों के समान अपराध भी एक सीखा हुआ व्यवहार है, जो पारस्परिक सम्पर्क तथा अन्तक्रिया के द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है। कोई व्यक्ति कितनी शीघ्रता से तथा किस मात्रा में अपराध सीखेगा, यह उसकी आयु, पुनरावृत्ति, अवधि तथा तीव्रता पर निर्भर करता है। यही कारण है कि कुछ अपराधी सामान्य श्रेणी के होते हैं, जब कि कुछ बहुत गम्भीर प्रकार के अपराधी बन जाते हैं।
कुछ समाजशास्त्रियों का मत है कि अपराध को सम्बन्ध बुरी संगति अथवा दोषपूर्ण सामाजिक पर्यावरण से है। इस दृष्टिकोण से अपराध के लिए व्यक्ति की अपेक्षा समाज अधिक उत्तरदायी है। वास्तव में अनेक सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, मानसिक और शैक्षणिक दशाएँ संयुक्त रूप से अपराधी व्यवहार को प्रोत्साहन देती हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि अपराधी जन्मजात नहीं होते हैं, बल्कि व्यक्ति जब एक से अधिक कारकों द्वारा प्रभावित होता है, केवल उसी समय उसमें अपराधी प्रवृत्ति जाग्रत होती है।
अपराध के लिए दण्ड-विधान का औचित्य समझने के लिए अपराध के कारणों को समझने की आवश्यकता है। अपराध के लिए अपराधी की जगह व्यक्ति के दोषपूर्ण वंशानुक्रम, मानसिक अस्वस्थता एवं बीमारी, मानसिक अस्थिरता और संघर्ष, औद्योगीकरण और नगरीकरण, व्यापारिक उतार-चढ़ाव, निर्धनता तथा बेरोजगारी, सामाजिक कुरीतियाँ, टूटे परिवार, अशिक्षा आदि को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में किसी भी अपराधी को दण्ड देने की बजाय, सामाजिक दशाओं को बदलने के लिए गम्भीर प्रयास किये जाने चाहिए। हमें अपराधी से नहीं बल्कि उन सामाजिक परिस्थितियों से घृणा करनी चाहिए जो अपराधी को जन्म देती हैं।
अतः मृत्युदण्ड को अपराध रोकने का निकृष्टतम साधन कहना सर्वथा उचित ही है।In simple words: समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के अनुसार, अपराधी जन्मजात नहीं होते, बल्कि सामाजिक परिवेश और अंतःक्रिया के कारण अपराधी बनते हैं। विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, मानसिक और शैक्षिक कारक मिलकर अपराध को बढ़ावा देते हैं। इसलिए, अपराधियों को कठोर दण्ड देने के बजाय, उन सामाजिक परिस्थितियों को बदलने पर ध्यान देना चाहिए जो अपराध को जन्म देती हैं, और मृत्युदण्ड को अपराध रोकने का एक अप्रभावी और निकृष्टतम साधन माना जाता है।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता दें, जिसमें सदरलैण्ड के सिद्धान्त का उल्लेख करें। मृत्युदण्ड की आलोचना और अपराध के सामाजिक कारणों पर केंद्रित समाधानों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

 

Question 1. अपराधी कितने प्रकार के होते हैं ?


Answer: विभिन्न विद्वानों ने अपराध तथा अपराधियों का वर्गीकरण विभिन्न प्रकार से किया है। सामान्यतया अपराधी निम्न प्रकार के होते हैं।
1. जन्मजात अपराधी
2. अपस्मारी अपराधी-ये अपराधी मानसिक विकारों के कारण उचित और अनुचित में भेद नहीं कर पाते।
3. आकस्मिक अपराधी-ये अपराधी विशेष परिस्थितियों में ही अपराध करते हैं।
4. आवेगयुक्त अपराधी-वे अपराधी, जो बहुत शीघ्र आवेग-पूर्ण स्थिति में आकर अपराध करते हैं।
5. व्यावसायिक अपराधी-ये अपराधी अपराध को अपनी आजीविका का साध्य मानते हैं।
6. श्वेतवसन अपराधी-ये अपराधी समाज में उच्च वर्ग के सदस्य होते हैं तथा महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक पदों अथवा व्यापार में लगे होते हैं।In simple words: अपराधियों को जन्मजात, अपस्मारी (मानसिक रूप से कमजोर), आकस्मिक (विशेष परिस्थितियों में), आवेगयुक्त (जल्दबाजी में), व्यावसायिक (अपराध को आय का साधन मानने वाले), और श्वेतवसन (उच्च वर्ग के) अपराधियों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: अपराधियों के प्रकारों को सूचीबद्ध करते समय, प्रत्येक प्रकार की संक्षिप्त व्याख्या देना सुनिश्चित करें, जिससे छात्रों को उनकी विशेषताओं को समझने में मदद मिले।

 

Question 2. अपराध के चार प्रमुख कारण लिखिए।


Answer: अपराध के चार प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-
1. तलाक, मृत्यु, कलह आदि पारिवारिक दशाएँ।
2. निर्धनता, बेरोजगारी एवं अशिक्षा जैसे आर्थिक कारक।
3. औद्योगीकरण एवं नगरीकरण की प्रक्रियाएँ।
4. विधवा पुनर्विवाह निषेध, वेश्यावृत्ति, देवदासी प्रथा आदि सामाजिक कुरीतियाँ।In simple words: अपराध के चार प्रमुख कारण हैं: पारिवारिक समस्याएं जैसे तलाक और कलह; आर्थिक कारक जैसे गरीबी और बेरोजगारी; औद्योगीकरण और शहरीकरण; तथा सामाजिक कुरीतियाँ जैसे वेश्यावृत्ति और अशिक्षा।

🎯 Exam Tip: अपराध के प्रमुख कारणों को संक्षेप में और स्पष्ट रूप से बिंदुवार लिखें, जिससे वे आसानी से याद रहें। विभिन्न श्रेणियों (पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक) में कारणों को वर्गीकृत करें।

 

Question 3. क्या मद्यपान भी अपराधों का कारण है ?


Answer: मद्यपान (शराबखोरी) ने भी अपराधों को बढ़ावा दिया है। कई लोग सामान्य स्थिति में अपराध नहीं कर पाते, वे शराब पीकर अपराध करते हैं। यौन अपराध, लड़ाई-झगड़े, हत्या, घातक आक्रमण, जुआ, भ्रष्टाचार एवं वाहन द्वारा दुर्घटना आदि अपराध कई बार शराब पीकर ही किये जाते हैं। शराब पीने पर व्यक्ति का मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है और उसमें उत्तेजना पैदा हो जाती है। परिणामस्वरूप वह अपराध कर बैठता है। शराबी व्यक्ति का अक्सर नैतिक पतन हो जाता है, वह उचित-अनुचित में भेद नहीं कर पाता और अपराध करने लगता है। ब्रुसेल्स ने अपने अध्ययन में यह पाया कि 70 प्रतिशत अपराधी शराब पीते थे। स्पष्ट है कि मद्यपान भी अपराध का एक प्रमुख कारण है।In simple words: हाँ, मद्यपान अपराधों का एक प्रमुख कारण है क्योंकि शराब पीने से व्यक्ति का मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है, उत्तेजना बढ़ती है और नैतिक पतन होता है। इससे यौन अपराध, लड़ाई-झगड़े, हत्या और दुर्घटनाएँ जैसे अपराध बढ़ जाते हैं।

🎯 Exam Tip: मद्यपान और अपराध के बीच सीधा संबंध स्थापित करें, यह समझाते हुए कि शराब कैसे व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता और व्यवहार को प्रभावित करती है। प्रासंगिक आंकड़ों या अध्ययनों का उल्लेख करना सहायक होगा।

 

Question 4. नगरीकरण कैसे अपराधों का एक कारक है ?


Answer: औद्योगीकरण एवं नगरीकरण परस्पर सम्बन्धित प्रक्रियाएँ हैं। इसलिए जो परिस्थितियाँ औद्योगीकरण के कारण अपराध के लिए उत्तरदायी हैं, लगभग वे ही परिस्थितियाँ नगरों में मौजूद हैं। नगरों में संयुक्त परिवारों का विघटन हो रहा है, वहाँ पर आवास-सुविधाओं का अभाव है, नवीनता का आकर्षण एवं फैशन नगरीय जीवन की विशेषताएँ हैं। व्यापारिक मनोरंजन, स्त्री-पुरुषों के अनुपात में अन्तर, स्त्रियों को मिलने वाली स्वतन्त्रता, नैतिकता के बदलते प्रतिमान, जाति एवं संयुक्त परिवार के नियन्त्रण का अभाव आदि कारक नगरीय जीवन में अपराध को जन्म देने में सहायक हो रहे हैं।In simple words: नगरीकरण अपराध का एक महत्वपूर्ण कारक है क्योंकि यह संयुक्त परिवारों को तोड़ता है, आवास की कमी पैदा करता है, नए फैशन और मनोरंजन को बढ़ावा देता है, लिंग अनुपात में असंतुलन लाता है, महिलाओं को अधिक स्वतंत्रता देता है और पारंपरिक नैतिक नियंत्रणों को कमजोर करता है, जिससे अपराधी प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं।

🎯 Exam Tip: नगरीकरण के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों को स्पष्ट रूप से जोड़ें जो अपराध में वृद्धि का कारण बनते हैं (जैसे परिवार का विघटन, नैतिक मूल्यों में परिवर्तन)।

 

Question 5. औद्योगीकरण कैसे अपराधों का एक कारक है ?


Answer: औद्योगीकरण ने हमारे सामाजिक जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन किये हैं। इसके कारण बड़े-बड़े नगरों का जन्म हुआ, लोगों में गतिशीलता बढ़ी, जाति का नियन्त्रण शिथिल हुआ, संयुक्त परिवार टूटे तथा सामुदायिक जीवन का ह्रास हुआ। मिल-मालिकों एवं मजदूरों के बीच संघर्ष बढ़ा, आए दिन हड़ताल, तोड़-फोड़, घेराव, तालाबन्दी और आगजनी जैसे सामूहिक अपराध होने लगे। औद्योगिक केन्द्रों में वेश्यावृत्ति, जुआखोरी एवं शराबी-वृत्ति में भी वृद्धि हुई।In simple words: औद्योगीकरण अपराध का एक कारक है क्योंकि इसने सामाजिक संरचना में बदलाव लाए हैं, जैसे बड़े शहरों का उदय, लोगों की गतिशीलता में वृद्धि, जाति नियंत्रण में कमी, संयुक्त परिवारों का विघटन और सामुदायिक जीवन का ह्रास। इन परिवर्तनों ने श्रमिक संघर्ष, हिंसा और अनैतिक गतिविधियों जैसे वेश्यावृत्ति, जुआ और शराबखोरी को बढ़ावा दिया।

🎯 Exam Tip: औद्योगीकरण के सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों और उसके परिणामस्वरूप होने वाले अपराधों के प्रकारों (जैसे सामूहिक अपराध, नैतिक पतन) पर ध्यान केंद्रित करें।

 

Question 6. 'आयु भी अपराधों का एक प्रभावी कारक है, व्याख्या कीजिए।


Answer: अपराध एवं आयु में भी सह-सम्बन्ध पाया जाता है। सामान्यतः 20 से 24 वर्ष की आयु में ही अपराध अधिक किये जाते हैं, बचपन एवं वृद्धावस्था में कम। इंग्लैण्ड में पुरुषों द्वारा सर्वाधिक अपराध 12 से 15 वर्ष की आयु में तथा स्त्रियों द्वारा 15 से 17 वर्ष की आयु में किये गये। इसकी तुलना में अमेरिका में 18 से 44 वर्ष की आयु में अपराध अधिक हुए हैं। अपराध की प्रकृति के साथ-साथ अपराधियों की आयु में भी अन्तर पाया जाता है। हत्या एवं डकैती युवा लोगों द्वारा अधिक की जाती है, बच्चों द्वारा छोटे-छोटे झगड़े एवं चोरियाँ तथा वृद्धों द्वारा यौनसम्बन्धी अपराध अधिक किये जाते हैं। आयु का सम्बन्ध शारीरिक विकास से है। पूर्ण विकसित व्यक्ति ऐसे अपराध अधिक करता है जिनमें शारीरिक शक्ति की अधिक आवश्यकता होती है।In simple words: आयु अपराध का एक महत्वपूर्ण कारक है, जिसमें युवावस्था (विशेषकर 12-24 वर्ष) में अपराध दर अधिक होती है, जबकि बचपन और वृद्धावस्था में यह कम होती है। विभिन्न आयु वर्गों में अपराधों की प्रकृति भी भिन्न होती है- युवा हिंसक अपराधों में अधिक शामिल होते हैं, जबकि बच्चे छोटे-मोटे झगड़ों में और वृद्ध यौन अपराधों में।

🎯 Exam Tip: आयु के विभिन्न चरणों में अपराध की प्रवृत्ति और प्रकारों को स्पष्ट रूप से दर्शाएं। उदाहरणों का उपयोग कर तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करें।

 

Question 7. अपराध के कारणों से सम्बन्धित आर्थिक सिद्धान्त के बारे में बताइए।


Answer: कार्ल मार्क्स, एंजिल्स, विलियम बोंजर आदि का मत है कि अपराध आर्थिक कारणों से ही होते हैं। जब समाज में आर्थिक विषमता बढ़ती है, लोगों की भोजन, वस्त्र और निवास सम्बन्धी आवश्यक आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं होतीं, तो मजबूरन उन्हें अपराध का सहारा लेना पड़ता है। किन्तु यह मत एकपक्षीय है, क्योंकि आर्थिक कारणों के अलावा कई अन्य कारण भी अपराध के लिए उत्तरदायी होते हैं।In simple words: अपराध का आर्थिक सिद्धान्त, जो कार्ल मार्क्स और बोंजर जैसे विचारकों से जुड़ा है, यह मानता है कि आर्थिक असमानता और मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति न हो पाने के कारण लोग अपराध करते हैं। हालांकि, यह सिद्धान्त केवल आर्थिक कारकों पर केंद्रित होने के कारण एकपक्षीय माना जाता है, क्योंकि अपराध के कई अन्य सामाजिक और व्यक्तिगत कारण भी होते हैं।

🎯 Exam Tip: आर्थिक सिद्धान्त के प्रमुख प्रतिपादकों का उल्लेख करें और स्पष्ट करें कि कैसे आर्थिक विषमता और अभाव अपराध के मूल कारण के रूप में देखे जाते हैं। सिद्धान्त की सीमा या आलोचना का भी संक्षिप्त उल्लेख करें।

 

Question 8. पैरोल (Parole) पर टिप्पणी लिखिए।


Answer: पैरोल पर उन अपराधियों को छोड़ा जाता है जिन्हें लम्बी अवधि की सजा मिली हो और उसका कुछ भाग वे काट चुके हों। सजा काटने के दौरान यदि अपराधी का आचरण अच्छा रहता है तो जेल अधिकारी की सिफारिश पर उसे शेष सजा से मुक्ति मिल जाती है। पैरोल का उद्देश्य भी अपराधी का सुधार करना है। पैरोल पर छूटने वाले से अपेक्षा की जाती है कि वह कुछ शर्तों का पालन करेगा। ऐसा न करने पर उसे पुनः दण्ड भुगतने को कहा जाता है। पैरोल पर छूटे अपराधी की देखभाल के लिए पैरोल अधिकारी होता है। पैरोल से भी कई लाभ हैं; जैसे-
1. राज्य के खर्चे में कमी आती है। तथा अच्छे आचरण को बढ़ावा मिलता है,
2. जेल के दूषित वातावरण से अपराधी को शीघ्र मुक्ति मिल जाती है और
3. उसे समाज से अनुकूलन करने का एक अवसर मिल जाता है।In simple words: पैरोल एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ लंबे समय की सजा काट चुके अपराधियों को अच्छे व्यवहार के आधार पर कुछ शर्तों के साथ जेल से अस्थायी मुक्ति दी जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य अपराधी का सुधार करना, उसे समाज में पुनः एकीकृत होने का अवसर देना, और राज्य के जेल खर्च को कम करना है, जिसकी निगरानी एक पैरोल अधिकारी करता है।

🎯 Exam Tip: पैरोल की परिभाषा, इसके उद्देश्यों (सुधार, सामाजिक एकीकरण) और लाभों (व्यक्तिगत और संस्थागत) को स्पष्ट रूप से समझाएं। परिवीक्षा से इसके अंतर को भी ध्यान में रखें।

 

Question 9. अपराध किसे कहते हैं?


Answer: अपराध का अर्थ एवं परिभाषा
समाज की व्यवस्था बनाये रखने के लिए नियमों, कानूनों, प्रथाओं और परम्पराओं के अनुपालन पर बल दिया गया है। कुछ समाज-विरोधी ऐसे भी व्यक्ति होते हैं, जो नियमों और कानूनों का उल्लंघन करते हैं। उनके द्वारा किए गये राज्य-विरोधी या कानून-विरोधी कार्य ही अपराध कहलाते हैं।In simple words: अपराध वह कार्य है जो समाज के स्थापित नियमों, कानूनों, प्रथाओं और परंपराओं का उल्लंघन करता है और जिसे राज्य या कानून द्वारा गलत माना जाता है। ऐसे कार्य करने वाले व्यक्ति को दण्डित किया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: अपराध की परिभाषा को सरल और स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत करें। यह भी उल्लेख करें कि अपराध सामाजिक व्यवस्था और कानूनी ढांचे के उल्लंघन से कैसे जुड़ा है।

 

निश्चित उत्तीय प्रश्न (1 अंक)

 

Question 1. इलियट और मैरिल के अनुसार अपराध की क्या परिभाषा है?
Answer: इलियट और मैरिल के अनुसार, “समाज-विरोधी व्यवहार जो कि समूह द्वारा अस्वीकार किया जाता है, जिसके लिए समूह दण्ड निर्धारित करता है, अपराध के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”
In simple words: इलियट और मैरिल के अनुसार, अपराध वह व्यवहार है जिसे समाज गलत मानता है और जिसके लिए समाज दण्ड निर्धारित करता है। यह एक समाज-विरोधी क्रिया है।

🎯 Exam Tip: परिभाषाओं को उद्धरण चिह्नों में लिखें और विद्वानों के नाम सही ढंग से याद रखें, क्योंकि ये सीधे स्कोरिंग पॉइंट होते हैं।

 

Question 2. डॉ० हैकरवाल ने अपराध की क्या परिभाषा दी है ?
Answer: डॉ० हैकरवाल ने अपराध के सामाजिक पक्ष को प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि, सामाजिक दृष्टिकोण से अपराध व्यक्ति का एक ऐसा व्यवहार है जो कि उन मानव सम्बन्धों की व्यवस्था में बाधा डालता है, जिन्हें समाज अपने अस्तित्व के लिए प्राथमिक दशा के रूप में स्वीकार करता है।”
In simple words: डॉ. हैकरवाल ने अपराध को सामाजिक दृष्टिकोण से परिभाषित करते हुए कहा कि यह एक ऐसा व्यवहार है जो मानव संबंधों की व्यवस्था को बाधित करता है, जो समाज के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।

🎯 Exam Tip: समाजशास्त्रियों की परिभाषाओं को याद करते समय उनके मुख्य बिन्दु (जैसे 'सामाजिक पक्ष' या 'मानव संबंध') पर ध्यान दें।

 

Question 3. 'अपराधी जन्मजात होते हैं। यह कथन किसका है ?
Answer: यह कथन लॉम्ब्रोसो का है।
In simple words: यह विचार कि अपराधी जन्म से ही अपराधी होते हैं, इटालियन समाजशास्त्री लॉम्ब्रोसो द्वारा प्रस्तुत किया गया था।

🎯 Exam Tip: प्रमुख सिद्धांतों और उनके प्रतिपादकों के नाम याद रखना सीधे अंक दिलाता है।

 

Question 4. “समाज की असन्तुलित आर्थिक व्यवस्था ही अपराध का प्रमुख कारण है।” यह कथन किसका है ?
Answer: यह कथन प्रसिद्ध विद्वान् लॉम्ब्रोसो का है।
In simple words: यह कथन भी लॉम्ब्रोसो का है, जो यह बताता है कि समाज में आर्थिक असमानता ही अपराध का मुख्य कारण बनती है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न समाजशास्त्रियों के विचारों को उनके सिद्धांतों से जोड़कर याद करें ताकि भ्रम से बचा जा सके।

 

Question 5. “अपराध का प्रमुख सम्बन्ध जलवायु से है। जलवायु तथा मौसम में परिवर्तन होने के साथ ही अपराधी में भी परिवर्तन देखने को मिलता है।” यह कथन किसका है ?
Answer: यह कथन प्रसिद्ध विद्वान् क्वेटलेट का है।
In simple words: प्रसिद्ध विद्वान क्वेटलेट का मानना था कि अपराध और जलवायु के बीच गहरा संबंध है, जहाँ मौसमी बदलाव अपराध के प्रकार और दर को प्रभावित करते हैं।

🎯 Exam Tip: पर्यावरणीय कारकों और अपराध के बीच संबंध स्थापित करने वाले विद्वानों पर विशेष ध्यान दें।

 

Question 6. यह कथन किसका है-'अपराधी बनाये जाते हैं ?
Answer: सदरलैण्ड का।
In simple words: सदरलैण्ड का मानना था कि अपराधी जन्मजात नहीं होते, बल्कि सामाजिक परिस्थितियों और अंतःक्रियाओं के माध्यम से अपराधी बनते हैं।

🎯 Exam Tip: 'जन्मजात' बनाम 'बनाये जाते हैं' वाले सिद्धांतों में अंतर स्पष्ट रूप से समझें और उनके प्रतिपादकों को याद रखें।

 

Question 7. “करुणा और ईमानदारी की प्रचलित भावनाओं का उल्लंघन ही अपराध है।” यह कथन किसका है ?
Answer: यह कथन गैरोफैलो का है।
In simple words: गैरोफैलो के अनुसार, अपराध बुनियादी मानवीय नैतिक मूल्यों जैसे करुणा और ईमानदारी का उल्लंघन है।

🎯 Exam Tip: नैतिक मूल्यों और अपराध के संबंध पर आधारित परिभाषाओं को याद करें, जैसे गैरोफैलो का दृष्टिकोण।

 

Question 8. 'अपराध सीखा हुआ व्यवहार है।' यह कथन किसका है ?
Answer: यह कथन 'सदरलैण्ड' का है।
In simple words: सदरलैण्ड के 'विभिन्न संगति सिद्धांत' के अनुसार, अपराधी व्यवहार जन्मजात नहीं होता बल्कि अन्य सामाजिक व्यवहारों की तरह सीखा जाता है।

🎯 Exam Tip: सदरलैण्ड के 'सीखा हुआ व्यवहार' सिद्धांत को याद रखें, क्योंकि यह अपराध के सामाजिक सीखने पर केंद्रित है।

 

Question 9. अपराध सम्बन्धी कैलेण्डर किसने बनाया ?
Answer: अपराध सम्बन्धी कैलेण्डर लैकेसन ने बनाया।
In simple words: लैकेसन ने 'अपराध कैलेण्डर' विकसित किया, जिसमें यह दिखाया गया कि विभिन्न प्रकार के अपराध विशिष्ट महीनों से कैसे संबंधित होते हैं।

🎯 Exam Tip: विशेष अवधारणाओं (जैसे 'अपराध कैलेण्डर') और उनके सृजकों के नाम को सटीकता से याद करें।

 

Question 10. अपराधों के कारणों से सम्बन्धित समाजशास्त्रीय सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक कौन हैं?
Answer: अपराधों के कारणों से सम्बन्धित समाजशास्त्रीय सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक सदरलैण्ड
In simple words: सदरलैण्ड अपराध के सामाजिक कारणों के सिद्धांतों के प्रमुख समर्थकों में से एक हैं, जिन्होंने 'विभिन्न संगति सिद्धांत' दिया।

🎯 Exam Tip: समाजशास्त्रीय सिद्धांतों और उनके प्रमुख समर्थकों के बीच सीधा संबंध स्थापित करें।

 

Question 11. अपराध के लिए जैविकीय कारकों को उत्तर:दायी ठहराने वाले समाजशास्त्री कौन हैं?
Answer: अपराध के लिए जैविकीय कारकों को उत्तर:दायी ठहराने वाले समाजशास्त्री लॉम्ब्रोसो
In simple words: लॉम्ब्रोसो वह समाजशास्त्री थे जिन्होंने अपराधी व्यवहार को जैविकीय या शारीरिक विशेषताओं से जोड़ा, यह तर्क देते हुए कि अपराधी जन्मजात होते हैं।

🎯 Exam Tip: 'जैविकीय कारक' शब्द को लॉम्ब्रोसो से जोड़कर याद रखें।

 

Question 12. 'आर्थिक निर्धारणवाद' अवधारणा से कौन समाजशास्त्री सम्बन्धित है ?
Answer: 'आर्थिक निर्धारणवाद' अवधारणा से सदरलैण्ड सम्बन्धित हैं।
In simple words: सदरलैण्ड ने अपराध के आर्थिक कारणों पर भी जोर दिया, हालांकि उन्हें मुख्य रूप से 'विभिन्न संगति सिद्धांत' के लिए जाना जाता है।

🎯 Exam Tip: आर्थिक सिद्धांतों और उनके संबंधित समाजशास्त्रियों को स्पष्ट रूप से पहचानें।

 

Question 13. 'प्रिन्सिपल्स ऑफ क्रिमिनोलॉजी' नामक पुस्तक के लेखक कौन हैं ?
Answer: ' प्रिन्सिपल्स ऑफ क्रिमिनोलॉजी' नामक पुस्तक के लेखक सदरलैण्ड हैं।
In simple words: एडविन सदरलैण्ड, जिन्होंने 'विभिन्न संगति सिद्धांत' दिया, 'प्रिन्सिपल्स ऑफ क्रिमिनोलॉजी' पुस्तक के लेखक हैं।

🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण पुस्तकों और उनके लेखकों को याद करना अक्सर प्रत्यक्ष प्रश्न होता है।

 

Question 14. लॉम्ब्रोसो ने अपराधियों को कितने भागों में बाँटा ?
Answer: लॉम्ब्रोसो ने अपराधियों को निम्नलिखित चार भागों में बाँटा है-
(1) जन्मजाते,
(2) अपस्मारी,
(3) आकस्मिक तथा
(4) आवेगयुक्त अपराधी ।
In simple words: लॉम्ब्रोसो ने अपराधियों को चार मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया: जन्मजात अपराधी, अपस्मारी अपराधी, आकस्मिक अपराधी और आवेगयुक्त अपराधी, जो उनकी जैविकीय प्रवृत्तियों पर आधारित थे।

🎯 Exam Tip: वर्गीकरण के प्रकारों और उनकी विशेषताओं को सूची के रूप में याद करना सहायक होता है।

 

Question 15. किसी भी समाज का अपराध से पूर्णतया रहित हो पाना सम्भव है। (सत्य/असत्य)
Answer: असत्य ।
In simple words: कोई भी समाज अपराध से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि सामाजिक संरचनाओं और मानवीय व्यवहारों में हमेशा कुछ न कुछ विचलन मौजूद रहता है।

🎯 Exam Tip: सत्य/असत्य प्रश्नों में अवधारणाओं की समझ महत्वपूर्ण होती है, न कि केवल तथ्य।

 

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

 

Question 1. 'अपराधिक कैलेण्डर' के प्रतिपादक कौन थे ?
(क) समनर
(ख) जिंन्सबर्ग ।
(ग) कार्ल मार्क्स
(घ) हंटिंग्टन और क्वेटलेट
Answer: (घ) हंटिंग्टन और क्वेटलेट
In simple words: हंटिंग्टन और क्वेटलेट ने 'अपराधिक कैलेण्डर' की अवधारणा दी, जो यह बताती है कि अपराध की दरें मौसम और जलवायु से प्रभावित होती हैं।

🎯 Exam Tip: अवधारणाओं और उनके प्रतिपादकों को सही विकल्प के साथ याद रखें।

 

Question 2. कौन-सा सिद्धान्त अपराध की व्याख्या सुख-दुःख की धारणा के आधार पर करता है ?
(क) बहुकारकीय
(ख) जैविकीय
(ग) शास्त्रीय
(घ) आर्थिक
Answer: (ग) शास्त्रीय
In simple words: शास्त्रीय सिद्धांत, खासकर बेंथम और बेकरिया जैसे विचारकों द्वारा दिया गया, यह मानता है कि व्यक्ति अपने सुख-दुःख की गणना के आधार पर व्यवहार करते हैं, जिसमें अपराधी व्यवहार भी शामिल है।

🎯 Exam Tip: प्रत्येक सिद्धांत की मूल धारणा को समझें ताकि सही विकल्प का चयन कर सकें।

 

Question 3. श्वेतवसन अपराध अवधारणा से कौन समाजशास्त्री जुड़ा है ?
(क) सदरलैण्ड
(ख) लॉम्ब्रोसो
(ग) कार्ल मार्क्स
(घ) एंजिल्स
Answer: (क) सदरलैण्ड
In simple words: 'श्वेतवसन अपराध' की अवधारणा एडविन सदरलैण्ड ने दी थी, जो उच्च सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले व्यक्तियों द्वारा किए गए अपराधों को संदर्भित करती है।

🎯 Exam Tip: विशेष प्रकार के अपराधों (जैसे 'श्वेतवसन अपराध') को उनके संबंधित समाजशास्त्रियों से जोड़कर याद रखें।

 

Question 4. अपराध के शास्त्रीय सिद्धान्त से सम्बन्धित हैं
(क) बेन्थम
(ख) मॉण्टेस्क्यू
(ग) बकल
(घ) कार्ल मार्क्स
Answer: (क) बेन्थम
In simple words: जेरेमी बेंथम शास्त्रीय अपराध सिद्धांत के एक प्रमुख समर्थक थे, जिन्होंने माना कि लोग अपने कार्यों के सुख-दुःख के मूल्यांकन के आधार पर चुनाव करते हैं।

🎯 Exam Tip: शास्त्रीय सिद्धांत के प्रमुख प्रतिपादकों में से एक बेंथम हैं, यह तथ्य याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 5. अच्छे आचरण के कारण बन्दीगृह से अस्थायी मुक्ति को कहते हैं
(क) प्रोबेशन
(ख) पैरोल
(ग) मुक्ति सहायता
(घ) आचरण मुक्ति
Answer: (ख) पैरोल
In simple words: पैरोल वह व्यवस्था है जिसमें अपराधी को उसकी सजा के कुछ हिस्से को जेल में काटने के बाद अच्छे आचरण के आधार पर सशर्त रिहा किया जाता है।

🎯 Exam Tip: 'प्रोबेशन' और 'पैरोल' के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें क्योंकि ये अक्सर भ्रमित करते हैं।

 

Question 6. सदरलैण्ड किस पुस्तक के लेखक थे ?
(क) सोशल डिसऑर्गेनाइजेशन
(ख) सोशल चेंज
(ग) प्रिन्सिपल्स ऑफ क्रिमिनोलॉजी
(घ) सोसायटी
Answer: (ग) प्रिन्सिपल्स ऑफ क्रिमिनोलॉजी
In simple words: एडविन सदरलैण्ड, जिन्होंने 'विभिन्न संगति सिद्धांत' दिया, 'प्रिन्सिपल्स ऑफ क्रिमिनोलॉजी' नामक पुस्तक के लेखक हैं।

🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय पुस्तकों और उनके लेखकों के नाम सीधे याद रखें।

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