UP Board Solutions Class 12 Sociology Chapter 12 Female Persecution

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Class 12 Sociology Chapter 12 महिला उत्पीड़न UP Board Solutions PDF

UP Board Solutions Class 12 Sociology Chapter 12 Female Persecution

 

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

Question 1. महिला उत्पीड़न से आप क्या समझते हैं?
Answer: महिला उत्पीड़न

भारत पर ब्रिटिश शासन का लगभग 200 वर्ष तक प्रभुत्व रहा है। इससे पूर्व मुगलों का एक लम्बा शासनकाल भारत में रहा है। इन सैकड़ों वर्षों में भारतीय संस्कृति, मूल्य, आदर्श और मान्यताएँ एक के बाद एक लचर होती गईं।

सच्चिदानंद सिन्हा हिंसा की मूल प्रवृत्तियों को खंगालते हुए कहते हैं, “हिंसा मानव की एक ऐसी प्रवृत्ति है जिसका निर्गुण में जितना निषेध होता है, सगुण में उसका उतना ही जबरदस्त आकर्षण भी है।” अहिंसा परम धर्म है, यह लगभग सभी प्राचीन भारतीय धर्मों-बौद्ध, जैन या सनातनियों द्वारा उद्घोषित होता है। ईसाई धर्म में तो एक गाल पर कोई चाँटी मारे तो दूसरा गाल भी मारने वाले के सामने कर देना ईसा मसीह के उपदेश का मूल-मंत्र है, लेकिन व्यवहार में धर्म का यह रूप कहीं नहीं दिखाई देता है।

मनुष्य में हिंसा की पाशविक प्रवृत्तियाँ सदैव रही हैं। उसने सभ्यता के विकास और शिक्षा की ओढ़नी ओढ़ रखी है। आज भी हम मुक्केबाजी में खून से लथपथ बॉक्सर को देखकर आनंदित होते हैं, बुल-फाइटिंग देखकर अपना मनोरंजन करते हैं और डब्ल्यू डब्ल्यू०एफ० में भारी-भरकम पहलवानों की धरपटक कुश्ती या फाइटिंग का मजा लेते हैं एवं मुर्गे को हलाल कर उसके तड़पने का मजा लेते हैं। इस प्रकार ऐसे कितने ही उदाहरण दिए जा सकते हैं। डाकू आज भी सामूहिक कत्ल करने में संकोच नहीं करता, आतंकवादी और नक्सलवादी कत्लेआम करते रहते हैं। क्या ये 21वीं सदी के सभ्य-शिक्षित, वैज्ञानिक एवं प्रगतिशील समाज के चिह्न हैं? ये सभी हिंसी की प्रवृत्तियों के उदाहरण हैं।

इस भौतिक और भोगवादी संस्कृति में रिश्तों के नाम गुम हो रहे हैं। उसका रिश्ता केवल स्वयं से है। वह सब कुछ मनमानी करने के लिए स्वतन्त्र है, उसे न समाज का भय है और न संबंधियों का, तभी तो रिश्तों, यहाँ तक कि खून के रिश्तों में भी बलात्कार जैसी निकृष्ट घटनाएँ घटने लगी हैं। यह कैसा उत्पीड़न है, जहाँ स्त्री जीवनपर्यंत घुट-घुटकर मरती है। यह कैसा समाज है, जो स्त्री को जिंदा ही मार देता है।

यह नव-जन्मा युवा वर्ग, स्थापित मर्यादाओं और मूल्यों के विरुद्ध खड़ा हुआ है जिसकी सोच में पाश्चात्य देशों की खुली-सेक्स संस्कृति का स्वप्न है, जो चलते-फिरते व्यंग्यों से युवतियों को अपमान करता रहता है। जंगल की आग की तरह भय लड़कियों में समाता जा रहा है कि वे कैसे स्कूल, कॉलेज, बाजार या नौकरी पर जाएँ; क्योकि जगह-जगह छेड़ने वाले खड़े हैं। ये नवयुवतियाँ कितनी अपमानित हों और किस सीमा तक, इसके अलावा प्रतिरोध करने पर ये अराजक तत्त्व लड़की पर सार्वजनिक स्थानों पर ही तेजाब तक फेंककर उसे बदसूरत बना देते हैं। यह सामाजिक-सामूहिक उत्पीड़न इस अनैतिक व अपराधी समाज में उत्पन्न हुआ है।

भारतीय समाज में सदियों से स्त्री की स्थिति कितनी दयनीय और सोचनीय रही है? वर्षों-वर्षों तक उसका स्वरूप स्त्री के रूप में दासी की तरह रहा है। वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में स्त्रियों का तरह-तरह से शोषण और उत्पीड़न हो रहा है। विज्ञापनों और चलचित्रों में जिस रूप में स्त्री या युवती को प्रस्तुत किया जा रहा है, इसका प्रभाव खुले रूप में समाज में दिखाई पड़ता है। प्रेम और कामवासना की भावना जन्मजात होती है, किन्तु जिस रूप में यह पनप रहा है, वह परिवार, समाज और देश के तथा संस्कृति के लिए घातक हैं।

इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि दुनिया के हर क्षेत्र ने स्त्रियों के पैरों में बेड़ियाँ डाली हैं। हर जगह । उसे पुरुष के अधीन रहना है। इस दृष्टि से स्त्री का घर में भी भरपूर उत्पीड़न हो रहा है और वह घर के बाहर भी सुरक्षित नहीं है। आर्थिक-सामाजिक मूल्यों में जो गिरावट आई है, उसने पूरे समाज, देश व राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया है। लोकतंत्र में स्त्री का अपमान, उत्पीड़न, अत्याचार आदि भयमुक्त समाज की देन हैं। हम लोकतंत्र के दोराहे पर खड़े अभी रास्ता ढूंढ रहे हैं कि देश को किस रास्ते पर ले जाएँ।

1947 से लेकर आज तक हम भटकाव की स्थिति में हैं। यही कारण है। कि लोकतंत्र अराजकता में बदलता जा रहा है और स्त्री का सार्वजनिक स्थानों पर अपमान हो रहा है। दुःख इस बात का है कि स्त्री हिंसा की प्रवृत्तियों में कमी आने के बजाय उसमें वृद्धि हो रही है। हम किसी-न-कि- 7 में स्त्री को अपमानित कर रहे हैं, उत्पीड़न और अत्याचार कर रहे हैं। दूसरे को किसी भी रूप में कष्ट पहुँचाना हिंसा है चाहे वह शब्दों से हो या व्यवहार से अथवा किसी के प्रति मन में बुरी भावना आना भी हिंसा है। इस दृष्टि से यदि देखा जाए तो समाज के चारों ओर का परिदृश्य कहीं-न-कहीं हमें हिंसात्मक दिखाई पड़ता है, भले ही उसका स्वरूप कुछ भी हो।
In simple words: Female persecution refers to the widespread and often violent mistreatment of women, rooted in societal values that historically devalued them. It encompasses physical, emotional, and social abuse, reflecting a deeply ingrained patriarchal mindset where women are subjected to various forms of exploitation and violence, both within and outside their homes.

🎯 Exam Tip: Focus on defining female persecution comprehensively, linking it to historical and cultural factors like patriarchy and declining societal values. Providing examples of its manifestation, as discussed in the text, will fetch higher marks.

 

Question 2. सती प्रथा से क्या आशय है? भारत में इसका उन्मूलन किस प्रकार सम्भव हो सका?
Answer: सती-प्रथा पी०वी० काणे लिखते हैं-"आजकल भारत में सती होना अपराध है, किन्तु लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व (सन् 1829 से पूर्व) इस देश में विधवाओं का सती हो जाना एक धर्म था। विधवाओं का सती अर्थात् पति की चिता पर जलकर भस्म हो जाना केवल ब्राह्मण धर्म में नहीं पाया गया है, प्रत्युत यह प्रथा मानव समाज की प्राचीनतम धार्मिक धारणाओं एवं अंधविश्वासपूर्ण कृत्यों में समाविष्ट रही है। सती होने की प्रथा प्राचीन यूनानियों, जर्मनों, स्लावों एवं अन्य जातियों में पाई गई है, किन्तु इसका प्रचलन बहुधा राजघरानों एवं भद्र लोगों में ही रहा है। पति की मृत्यु पर विधवा के जल जाने को सहमरण या सहगमन या अन्वारोहण कहा जाता है, किन्तु अनुसरण तब होता है। जब पति और कहीं मर जाता है तथा जला दिया जाता है और उसकी भस्म के साथ या पादुका के साथ या बिना किसी चिह्न के उसकी विधवा जलकर मर जाती है।

भारत में अनेक धर्मग्रंथों में सती-प्रथा का उल्लेख मिलता है। बहुत-से अभिलेखों में सती होने के उदाहरण प्राप्त होते हैं, इनमें सबसे प्राचीन गुप्त संवत् 191 (510 ई०) का है। कभी-कभी भारतीय धर्म पर तरस आता है कि उसने स्त्री के साथ इतना अन्याय और अत्याचार कैसे किया ? यदि स्त्री और पुरुष दोनों समान हैं तो नियम और सिद्धान्त दोनों के लिए समान होने चाहिए । इस दृष्टि से पत्नी की मृत्यु के पश्चात् उसकी चिता पर पति क्यों नहीं जलकर भस्म होता है? स्त्री के साथ ही इतना अमानवीय और पाशविक व्यवहार क्यों? राजा राममोहन राय की अनुपस्थिति में उनकी भाभी सती हो गई थी, इस घटना ने उन्हें झकझोरकर रख दिया। सती-प्रथा के विरुद्ध उन्होंने आन्दोलन छेड़ा तथा इसके विरुद्ध कानून बनवाकर ही उन्होंने साँस ली। सती-प्रथा भारतीय समाज, हिन्दू धर्म पर कलंक थी, हालाँकि अभी भी भूले-भटके इस प्रकार की घटनाएँ प्रकाशित होती हैं।
In simple words: Sati प्रथा was an ancient practice where a widow would immolate herself on her husband's funeral pyre, viewed as a religious duty. Its abolition in India became possible due to the tireless efforts of social reformers like Raja Rammohan Roy, who campaigned against it, leading to the enactment of a law in 1829 by the British government prohibiting the practice.

🎯 Exam Tip: When answering about Sati, clearly define the practice and then elaborate on the historical context and the pivotal role of social reformers like Raja Rammohan Roy in its abolition, including the year of the law's enactment.

 

Question 3. घरेलू हिंसा से क्या तात्पर्य है? महिलाएँ किस प्रकार घरेलू हिंसा से पीड़ित हैं? या महिलाओं के विरूद्ध हिंसा के विभिन्न स्वरूपों की विवेचना कीजिए। या “महिलाओं के विरूद्ध अत्याचार एक ज्वलंत सामाजिक समस्या है।” विवेचना कीजिए।
Answer: भारतीय समाज में महिलाओं को घरेलू हिंसा एवं उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ता है। यह उत्पीड़न भी अत्यधिक व्यापक है। इसमें भी साधारण उत्पीड़न से लेकर हत्या तक के उदाहरण प्रायः मिलते रहते हैं। इस वर्ग के उत्पीड़न एवं हिंसा का विवरण निम्नवर्णित है

1. दहेज के कारण होने वाली हत्याएँ-भारतीय समाज में दहेज प्रथा भी एक प्रमुख समस्या मानी जाती है। यह भारतीय समाज में पाया जाने वाला एक ऐसा अभिशाप है जो आज भी अनेक सरकारी एवं गैर-सरकारी प्रयासों के बावजूद अपनी अस्तित्व बनाए हुए है। दहेज के कारण लड़की के माता-पिता को कई बार अनैतिक साधनों को अपनाकर उसके दहेज का प्रबन्ध करना पड़ता है। ज्यादा दहेज न ला पाने के कारण अनेक नवविवाहित वधुओं को सास-ससुर तथा ननद आदि के ताने सुनने पड़ते हैं।

कई बार तो उन्हें दहेज की बलि पर जिन्दा चढ़ा दिया जाता है। दहेज प्रथा के कारण बेमेल विवाहों को भी प्रोत्साहन मिलता है तथा वैवाहिक एवं पारिवारिक जीवन अत्यन्त संघर्षमय हो जाता है। दहेज न लाने वाली वधुओं को विविध प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक कष्ट सहन करना पड़ता है जिसके परिणामस्वरूप वे अनेक बीमारियों का शिकार हो जाती है। दुःख की बात तो यह है कि पढ़ी-लिखी लड़कियाँ तथा उनके पढ़े-लिखे माता-पिता भी इस बुराई का विरोध नहीं करते अपितु ज्यादा दहेज देना अपनी शान एवं प्रतिष्ठा समझते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में भारत में दहेज के कारण होने वाली स्त्रियों की हत्याओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। राम आहूजा के अनुसार दहेज हत्याओं की शिकार अधिकतर मध्यम वर्ग की महिलाएँ होती हैं। ये अधिकतर उच्च जातियों में होती हैं तथा पति पक्ष के लोगों द्वारा ही की जाती हैं। दहेज हत्याओं की शिकार स्त्रियों की आयु 21 से 24 वर्ष के बीच होती है। तथा परिवार की रचना की इन हत्याओं में काफी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। दहेज हत्या से पहले स्त्रियों को अनेक प्रकार की यातनाएँ दी जाती हैं तथा उनका उत्पीड़न किया जाता है।

2. विधवाओं पर होने वाले अत्याचार-भारतीय समाज में विधवाओं की सामाजिक स्थिति अत्यन्त निम्न रही है। हिन्दू समाज में तो स्त्री का पति ही सब कुछ माना जाता है तथा उसे भगवान व देवता तक का पद प्रदान किया जाता है। पति की मृत्यु के पश्चात् विधवा स्त्री की स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो जाती है तथा परिवार और समाज के सदस्य उसे हीन दृष्टि से देखते हैं। उन्हें पुनर्विवाह करने की अनुमति भी प्रदान नहीं की जाती है जिसके कारण उन्हें पति के परिवार में ही अपमानजनक, उपेक्षित, नीरस एवं आर्थिक कठिनाइयों से भरा हुआ जीवन व्यतीत करना पड़ता है। विधवाओं का किसी भी शुभ अवसर पर जाना अपशगुन माना जाता रहा है। इसलिए उन्हें सामाजिक जीवन से अलग-थलग कर दिया जाता रहा है।

आज भी उनकी स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है। यद्यपि कानूनी रूप से विधवाओं के पुनर्विवाह को मान्यता प्रदान की गई है, तथापि आज भी इसका प्रचलन अधिक नहीं हो पाया है। राम आहूजा के अनुसार विधवाओं पर अत्याचार करने वाले व्यक्ति पति पक्ष के होते हैं जो उन्हें उनके पतियों की सम्पत्ति से वंचित रखना चाहते हैं। विधवाओं को अपने पतियों के व्यापार आदि के बारे में काफी कम जानकारी होती है। यही अज्ञानता उनके शोषण का प्रमुख कारण बन जाती है। इनका कहना है कि युवा विधवाओं को अधिक अपमान एवं शोषण सहन करना पड़ता है। यद्यपि विधवाओं पर होने वाले अत्याचारों के लिए सम्पत्ति की प्रमुख भूमिका होती है, तथापि विधवाओं की निष्क्रियता एवं बुजदिली भी इसमें सहायक कारक हैं।

3. तलाकशुदा स्त्रियों पर होने वाले अत्याचार-विवाह-विच्छेद अथवा तलाक भारतीय स्त्रियों की एक प्रमुख समस्या है। परम्परागत रूप से पुरुषों को अपनी पत्नियों को तलाक देने का अधिकार प्राप्त था। मनुस्मृति में कहा गया है कि यदि कोई स्त्री शराब पीती है, हमेशा पीड़ित रहती है, अपने पति की आज्ञा का पालन नहीं करती है तथा धन का सर्वनाश करती है तो मनुष्य को उसके जीवित रहते हुए भी दूसरा विवाह कर लेना चाहिए। पुरुषों की ऐसी स्थिति होने पर स्त्री को उन्हें छोड़ने का अधिकार प्राप्त नहीं था। तलाकशुदा स्त्री को आज भी, समाज में एक कलंक माना जाता है तथा हर कोई व्यक्ति उसी को दोष देता है चाहे यह सब उसके शराबी, जुआरी व चरित्रहीन पति के कारण ही क्यों न हुआ हो ।

उसे सब बुरी नजर से देखते हैं तथा आजीविका का कोई साधन न होने के कारण वह यौन शोषण का शिकार बन जाती है। तलाक के बाद उसके सामने तथा अपने बच्चों का पेट भरने की समस्या उठ खड़ी होती है। समाज के कुछ दलाल ऐसी स्त्रियों को बहका-फुसलाकर वेश्यावृत्ति जैसे अनैतिक कार्य करने पर विवश कर देते हैं। वे बेचारी न चाहती हुई भी अनेक समस्याओं का शिकार हो जाती हैं।

4. पत्नी की मार-पिटाई-घरेलू हिंसा का एक अन्य रूप पत्नी के साथ होने वाली मार-पिटाई है। अनेक स्त्रियाँ पति द्वारा किए जाने वाले इस प्रकार के अत्याचारों को चुपचाप सहन करती रहती हैं। पिछले कुछ वर्षों में इस प्रकार की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है यद्यपि इसके बारे में किसी भी प्रकार के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। राम आहूजा के अनुसार मार-पिटाई की शिकार स्त्रियों की आयु अधिकतर 25 वर्ष से कम होती है। अधिकतर ऐसी घटनाएँ निम्न आय वाले परिवारों में अधिक होती हैं। इसके कारणों का उल्लेख करते हुए आहूजा ने बताया है कि इनमें यौनिक असामंजस्य, भावात्मक अशान्ति, पति का अत्यधिक घमण्डी होना, पति का शराबी होना तथा पत्नी की निष्क्रियता व बुजदिली प्रमुख हैं।
In simple words: Domestic violence encompasses various forms of abuse against women within their homes, including dowry-related deaths, mistreatment of widows, abuse of divorced women, and spousal battery. These acts are fueled by societal norms, economic pressures, and patriarchal attitudes, leading to immense physical, mental, and social suffering for women.

🎯 Exam Tip: To score well, define domestic violence clearly and elaborate on each specific form (dowry deaths, widow abuse, etc.) with relevant details from the text. Emphasize the underlying societal factors.

 

Question 4. महिला उत्पीड़न के कारण व उत्तर:दायी तत्वों की व्याख्या कीजिए।
Answer: महिला उत्पीड़न के कारण एवं उत्तर: दायी तत्त्व

स्त्री-हिंसा, उत्पीड़न, अत्याचार, शोषण आदि इस बात पर निर्भर करता है कि समाज की व्यवस्था और संरचना कैसी है? स्त्री की आर्थिक-सामाजिक स्थिति कैसी है? परिवार में उसका मान कैसा है? स्त्री स्वावलंबी और शिक्षित है कि नहीं। शासन-व्यवस्था में कानून की भूमिका कैसी है? उपर्युक्त वे पहलू या कोण हैं जिनके आधार पर हम किसी निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि स्त्री-हिंसा में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका किसकी है? पुरुषों के अतिरिक्त महिला उत्पीड़न में कुछ महिलाएँ भी अपने निहित स्वार्थों के कारण स्त्री-हिंसा में सहभागी बन जाती हैं।

लेकिन मुख्य रूप से पुरुष वर्ग ही स्त्री के साथ अत्याचार करता है, शोषण करता है तथा धोखा देकर उत्पीड़न करता है। इसके साथ-ही-साथ कुछ चीजें ऐसी हैं जो स्त्री के साथ दुर्व्यवहार करने के लिए विवश करती हैं। ये वे लोग हैं जो समाज से उपेक्षित हैं, इन्हें मान-सम्मान कहीं नहीं मिला, ये निराशावादी और कुंठाग्रस्त होते हैं तथा इनमें हीनता की भावना इतनी अधिक होती है कि ये बात-बात पर अपना आक्रोश प्रकट करते हैं। इस प्रकार निराशा और हताशा की स्थिति में ये स्त्रियों के साथ किसी सीमा तक जा सकते हैं, इस श्रेणी में वे लोग भी आते हैं जो वैयक्तिक विघटन के शिकार हो गए हैं अथवा जिनकी स्थिति एवं भूमिका के साथ परिवार में द्वंद्व है, ऐसे लोग अच्छे और बुरे का अन्तर भी भूल जाते हैं।

इस प्रकार के व्यक्ति स्त्री के साथ परिवार और परिवार के बाहर कुछ भी कर सकते हैं; क्योकि ये मानसिक रूप से बीमार हैं। विकृत व्यक्तित्व का व्यक्ति, शक्की, ईष्यालु, झगड़ालू तथा बात-बात पर लड़ने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति अपनी पत्नी, बेटी या परिवार की स्त्री के साथ अत्याचार करते हैं तथा मार-पीट और गाली-गलौज की भी सीमाएँ लाँघ जाते हैं।

इस तरह पुरुष चाहे स्वस्थ मस्तिष्क का हो या विकृत मानसिकता और सोच का अथवा हीन-भावना से ग्रस्त हो, इन सबका कहर स्त्री पर ही टूटता है। मूलतः पुरुषप्रधान समाज ही यौन-हिंसा के लिए भी उत्तर दायी है।
In simple words: The primary causes of female persecution stem from a patriarchal social structure where women hold an inferior status. Factors include their economic and social dependence, lack of education, and societal acceptance of male dominance. Additionally, individuals with psychological issues, feelings of inadequacy, or those who are socially marginalized often resort to violence against women.

🎯 Exam Tip: Explain both societal (patriarchy, economic dependence, lack of education) and individual (psychological issues, frustration) factors contributing to female persecution. A balanced discussion of these two categories will yield full marks.

 

Question 5. समाज में स्त्री हिंसा के पोषक तत्त्व कौन-कौन से हैं?
Answer: स्त्री-हिंसा के पोषक तत्त्व व्यक्ति परिस्थितियों का दास है, पर स्त्री और पुरुष की परिस्थितियों में अन्तर है। क्षमता, शक्ति, योग्यता और संषर्घ करने की क्षमता में भी अन्तर है, संवेदनशीलता में भी काफी अन्तर है। ऐसा नहीं है कि महिलाएँ अपराधी नहीं हैं, वे भी डकैती से लेकर तस्करी तक के क्षेत्र में नामजद हैं। और उन पर भी मुकदमे दर्ज हैं। जेल में हजारों की संख्या में महिलाएँ भी हैं। हत्या जैसे जघन्य अपराध में भी महिलाएँ पीछे नहीं हैं, लेकिन इन सबके पीछे किसी-न-किसी व्यक्ति या अपराधी समूह या रैकेट का हाथ होता है। वर्तमान समय में न जाने कितने यौनकर्मियों के रैकेट हैं, जोकि पुरुषों के निर्देशन में महिलाएँ चला रही हैं। महिला उत्पीड़न एवं स्त्री-हिंसा के पोषक तत्त्व निम्नलिखित हैं

1. अराजक तत्त्व इनका कोई धर्म, जाति व संप्रदाय नहीं होता। जब भी लोकतंत्र कमजोर होता है, अराजक तत्त्वों का दबदबा समाज में बढ़ जाता है। इस प्रकार के लोग दिनदहाड़े लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप बलात्कार, अपहरण आदि की दुर्घटनाएँ बढ़ जाती हैं।

2. माफिया नगरों और महानगरों में तरह-तरह के माफियाओं के संगठन हैं। ये धन, बल, गुंडई, राजनीति आदि में शक्तिशाली हैं। इनकी पहुँच दूर-दूर तक है। ये नियोजित ढंग से लड़कियों और महिलाओं को अपने जाल में फंसाकर उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं।

3. नशे की दुनिया और नशेबाज इनके चरित्र का अनुमान लगाना कठिन है। विशेषतौर से निम्न और निम्न मध्यम-वर्ग के नशेबाज चौराहों पर लड़कियों के स्कूल के पास खड़े होकर छेड़खानी करना, व्यंग्य मारना, भद्दे-भद्दे मजाक करना, जबरदस्ती प्यार दर्शाना आदि करते हैं। इस प्रकार के लोग अपनी निजी जिन्दगी में भी अपनी पत्नी और बच्चों को मारते-पीटते हैं और कभी-कभी ये इतने उत्तेजित हो जाते हैं कि पत्नी-बच्चों की हत्या तक कर देते हैं।

4. विद्वेष की भावना लड़की जब प्रेमजाल में नहीं हँसती तो बदला लेने की भावना से उस पर तेजाब फेंका जाता है। अपहरण करके सामूहिक बलात्कार यहाँ तक कि उसकी हत्या तक कर दी जाती है।

5. परिस्थितिवश परिवार में कभी-कभी अचानक ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जो अचानक विस्फोटक बन जाती हैं; जैसे-छोटी-छोटी बातों को लेकर बहस करना, बच्चों को डाँटना, घरेलू कार्यों को लेकर अथवा किसी और कारण से ऐसी गर्म और उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति तैयार हो जाती है कि गाली-गलौज और मारपीट तक की नौबत आ जाती है। इसी प्रकार की परिस्थितियों में घर-परिवार में भी महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार होता है जिसमें घर की अन्य महिला सदस्य भी सम्मिलित होती हैं। अतः इस प्रकार की घटनाएँ घरेलू हिंसा की श्रेणी में आती हैं।

6. देह-व्यापार के रैकेट ये वे रैकेट हैं जो अपने व्यापार में चतुर, सक्षम और अनुभवी होते हैं। ये लड़की को अपनी चालों में फंसाकर उसके घर और परिवार से बाहर निकाल लाते हैं। इसके अलावा ये रैकेट लड़की का अपहरण करके भी उन्हें जबरदस्ती देह-व्यापार के धंधे में डालते हैं तथा ऐसा करने के लिए लड़की को विवश करते हैं, इसके लिए उसे तरह-तरह की यातनाएँ दी जाती हैं और यह तब तक चलता है जब तक वह देह-व्यापार का हिस्सा नहीं बन जाती ।

समाज में यौन-उत्पीड़न, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार आदि को नियंत्रित करने हेतु उच्चस्तरीय कार्यवाही आवश्यक है जिसके तहत इस प्रकार की गतिविधियों और अभद्र व्यवहार को रोका जा सके।
In simple words: The elements that fuel violence against women include anarchic elements who disregard social norms, powerful mafia organizations involved in exploitation, individuals addicted to intoxicants who engage in harassment, vengeful feelings leading to acid attacks or kidnapping, situational family conflicts, and human trafficking rackets. These factors collectively contribute to a pervasive environment of female persecution.

🎯 Exam Tip: List and briefly explain each contributing factor to female violence. Providing distinct examples for each point, such as specific crimes committed by anarchic elements or the role of mafia, will enhance your answer.

 

Question 6. पंचवर्षीय योजनाओं में महिला कल्याण योजनाओं का वर्णन कीजिए।
Answer: नारी और पंचवर्षीय योजनाएँ।

प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-56)-यह कल्याणकारी लक्ष्यों को लेकर बनाई गई थी। महिला कल्याण के मुद्दे इसमें समाहित थे। केन्द्रीय सामाजिक कल्याण बोर्ड (सी०एस०डब्ल्यू० बोर्ड) ने स्वैच्छिक संस्थाओं से मिलकर या इनके सहयोग से स्त्री कल्याण का बहुत कार्य किया।

द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61)-द्वितीय योजना की मुख्य बात यह है कि इनमें महिलामंडलों को प्रोत्साहित किया गया कि वे जमीनी स्तर पर कार्य करें जिससे कि कल्याणकारी लक्ष्यों की प्रगति हो सके, साथ ही बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसरों को उत्पन्न करना। आय और सम्पत्ति में असमानता घटाना था।

तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-62 से 1965-66)-इस योजना में महिला शिक्षा पर अत्यधिक जोर दिया गया और प्राथमिकता भी दी गई। माँ और बच्चों के स्वास्थ्य पर भी ध्यान दिया गया। गर्भवती स्त्रियों को सुविधाएँ प्रदान करने के लिए कार्यक्रम बनाए गए। समानता के बेहतर अवसरों का विकास करना और आय तथा सम्पत्ति के अन्तर को घटाना, साथ ही धन के समान वितरण की बेहतर व्यवस्था करना।

चौथी पंचवर्षीय योजना (1969-74)-इस योजना के तहत् समानता और सामाजिक न्याय को प्रोत्साहित करने वाले कार्यक्रमों को प्रेरित करना था जिससे जीवन स्तर अच्छा हो सके।

पाँचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-79)-इस योजना में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव आया कि 'कल्याण' शब्द के स्थान पर विकास शब्द को रखा गया। इस दृष्टि से सामाजिक कल्याण का दायरा काफी बढ़ गया। परिवार की विभिन्न समस्याओं पर विचार किया जाने लगा। वहीं स्त्री की भूमिका पर भी ध्यान दिया गया कि वह देश के विकास में किस प्रकार उपयोगी होगी। यह कल्याण और विकास की अवधारणा के मध्य एक नवीन समन्वयात्मक उपागम था।

छठी पंचवर्षीय योजना (1980-85)-इस योजना में महिला कल्याण व विकास को एक पहचान ही नहीं मिली, बल्कि उसको प्राथमिकता प्रदान की गई। महिला विकास हेतु एक पृथक् सेक्टर का प्रस्ताव रखा गया जिससे कि महिलाओं का विकास समुचित ढंग से हो सके। इसकी मुख्य बात स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार था। यह महसूस किया गया कि चीजें अति आवश्यक हैं, बुनियादी हैं।

सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90)-महिला विकास का कार्यक्रम वैसा ही चलता रहेगा, परन्तु महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में इस तरह का बदलाव लाया जाए जिससे कि वे राष्ट्र की मुख्य विकास की धारा में शामिल हो सकें । इस दृष्टि से महिलाओं के लिए लाभप्रद कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाने लगा जिससे महिलाओं को आर्थिक लाभ प्राप्त हो सके और उनकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति बेहतर हो सके।

आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97)-इस योजना में यह सुनिश्चित किया गया कि विकास लाभ स्त्रियों को प्राप्त हो रहा है अथवा नहीं। ऐसा तो नहीं है कि उनकी उपेक्षा की जा रही हो । कुछ विशेष कार्यक्रम भी चलाए गए जिससे स्त्रियों को अतिरिक्त लाभ प्राप्त हो सके। इन कार्यक्रमों पर निगाह रखी गई जिससे इनमें कोई गड़बड़ी न हो सके । विकास कार्यक्रम का लक्ष्य स्त्रियों को इस योग्य बनाया जाना था कि वे पुरुषों के समान विकास कार्य में भाग ले सकें । निश्चय ही सरकार का यह कदम सामाजिक-आर्थिक विकास से महिला सशक्तीकरण की ओर ले जाता है।

नौवी पंचवर्षीय योजना (1997-2002)-यह देश की आजादी के पचासवें वर्ष में शुरू हुई । योजना का लक्ष्य था-सभी स्तरों के लोगों को विकास कार्य से जोड़ा जाए। महिलाओं को. सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन और विकास के लिए अधिकार सम्पन्न बनाया जाए ।

दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-2007)-इस योजना के केन्द्र में लक्ष्य था कि विकास इस तरह हो कि नीचे के पिछड़े, दलित, निर्धन लोगों को लाभ प्राप्त हो सके। यह लाभ सभी स्त्री-पुरुष को समान रूप से प्राप्त हो तथा नौकरी के अवसर सभी को समान रूप से प्राप्त हों एवं इसमें संतुलित विकास का लक्ष्य रखा गया।

ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012)-इस योजना का लक्ष्य समावेशी विकास, था. जिसमें देश की प्रत्येक महिला को स्वयं विकसित करने में सक्षम बनाना प्रमुख है तथा यह आभास कराना कि वे देश की आर्थिक समृद्धि एवं विकास का प्रमुख घटक हैं।

बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012-2017)-इस योजना में महिला सशक्तीकरण को मुख्य लक्ष्य के रूप में रखा गया है। इसके लिए, 'स्वाधार' नामक एक 24 x 7 महिला हेल्पलाइन, ‘उज्ज्वला' नामक तस्करी रोधी योजना को कार्यान्वित किया जा रहा है।
In simple words: India's Five-Year Plans progressively integrated women's welfare and development into national policy. Starting with basic welfare in early plans, the focus shifted to women's education, health, economic empowerment, and participation in national development, culminating in emphasizing their role as key economic contributors and promoting overall empowerment.

🎯 Exam Tip: To answer effectively, chronologically list each Five-Year Plan and concisely describe its specific contribution or changed focus towards women's welfare and development. Highlighting key initiatives or policy shifts for each plan is crucial.

 

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

 

Question 1. पुनर्जागरण काल में महिलाओं की क्या स्थिति थी?
Answer: पुनर्जागरण काल में महिलाओं की स्थिति

भारतीय समाज के आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक ढाँचे में स्त्री की स्थिति दोयम पायदान पर रही है। उसे उसका अधिकार नहीं मिला। वह ऐसी स्थिति और परिस्थिति से घिरी रही है, जहाँ से बाहर निकलना कठिन रहा है। धार्मिक अंधविश्वासों और रूढ़ियों ने उसके पैरों में बेड़ियाँ डाल रखी हैं। वे अभी भी कहीं-न-कहीं उन्हें कमजोर बनाए हुए हैं।

एक नई चेतना और सुधार का युग नवजागरण के साथ आरम्भ हुआ। 19वीं सदी के पूर्व नवजागरण का संदेश धर्म के विभिन्न संप्रदायों द्वारा दिया गया। जाति-पाति, छुआछूत, ऊँच-नीच आदि सामाजिक समस्याओं एवं कुरीतियों का विरोध धार्मिक संतों, सूफियों आदि के द्वारा किया गया। 19वीं शताब्दी के बाद मूलतः वे धार्मिक तत्व नष्ट तो नहीं हुए, किन्तु उनका स्वरूप परिवर्तित हो गया। कहीं पर यह यूरोपीय संस्कृति से प्रेरित होता प्रतीत होता है और कहीं पर विशुद्ध भारतीय धर्म की ओर अग्रसर होने के लिए आन्दोलन छेड़ता है।

18वीं शताब्दी के भारत का यदि अवलोकन किया जाए, तो यह युग संक्रमण काल का था। राजनीतिक दृष्टि से मुगल सिंहासन डाँवाडोल था। मुगल शासन नीति के तहत धार्मिक कट्टरता ने भारत में अनेक समस्याओं को जन्म दिया। यह वह युग था जिसमें स्त्री से जुड़ी अनेक समस्याओं ने अपनी मजबूत जगह बना ली; जैसे-बाल-विवाह, सती-प्रथा, विधवा-पुनर्विवाह निषेध आदि । नवजागरण के समाज सुधारकों ने स्त्री समस्याओं और उत्पीड़न के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ा। पुनर्जागरण आन्दोलन के पिता कहे जाने वाले राजा राममोहन राय ने सती-प्रथा के विरुद्ध आवाज बुलंद की और अंततः अंग्रेजों को सन् 1829 में सती-प्रथा को गैर-कानूनी घोषित करके कानून बनाना पड़ा।

इसी तरह उन्होंने बहुपत्नी प्रथा का विरोध किया। भारत में धर्म और संस्कृति के नाम पर स्त्रियों के साथ अत्याचार होते रहे हैं, शोषण और उत्पीड़न होता रहा है। इसके साथ एक लम्बा इतिहास जुड़ा है, इसलिए स्त्री हिंसा की जड़े बहुत गहरी हैं। उसकी पृष्ठभूमि में धर्म और संस्कृति है तो कहीं पितृसत्तात्मक व्यवस्था का दबदबा ।
In simple words: During the Renaissance period in India, women generally held a secondary status, deprived of rights and constrained by religious superstitions and patriarchal norms, leading to widespread issues like child marriage, Sati, and prohibition of widow remarriage. However, social reformers during this era initiated movements against these injustices, notably Raja Rammohan Roy's successful campaign against Sati.

🎯 Exam Tip: Focus on describing the dual nature of women's status during the Renaissance: initial suppression by traditions and the subsequent efforts of social reformers like Raja Rammohan Roy to address issues like Sati and child marriage.

 

Question 2. अंग्रेजी शासनकाल में महिलाओं से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण सामाजिक अधिनियम कौन-कौन से थे?
Answer: अंग्रेजी शासनकाल के महत्त्वपूर्ण सामाजिक अधिनियम -
1. सती-प्रथा निषेध अधिनियम (1829)
2. बाल-विवाह निरोधक अधिनियम (1929)
3. हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856)
4. हिन्दू स्त्रियों का संम्पत्ति पर अधिकार अधिनियम (1937)
5. विशेष विवाह अधिनियम (1872, 1923, 1954)
6. पृथक् रहने पर भरण-पोषण हेतु हिन्दू-विवाहित स्त्रियों का अधिकार अधिनियम (1946)
7. हिन्दू विवाह निर्योग्यता निवारण अधिनियम (1946)
In simple words: During British rule, several significant social acts were passed to improve women's rights, including the Sati Prohibition Act (1829), Child Marriage Restraint Act (1929), Hindu Widows' Remarriage Act (1856), and acts related to women's property rights and marriage. These laws aimed to curb harmful practices and grant women more legal standing.

🎯 Exam Tip: List the acts clearly with their respective years. Emphasize that these laws were instrumental in challenging regressive social practices and empowering women during the colonial period.

 

Question 3. स्वतन्त्रता के पश्चात भारत में महिला उत्थान के लिए कौन-कौन से अधिनियम व कानून पारित किए गए?
Answer: स्वतन्त्रता के पश्चात बने अधिनियम

स्वतंत्रता के पश्चात् सरकार का यह पुनीत कर्तव्य और दायित्व था कि वह हिन्दू कानूनों को संशोधित कर उनकी कमियों का निराकरण करे। इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर सन् 1948 में हिन्दू कोड बिल प्रस्तुत किया गया, किन्तु इसका विरोध होने के कारण इसे आगामी चुनाव तक स्थगित क़र दिया गया। सन् 1950 में पुनः इसे लोकसभा में प्रस्तुत किया गया, फिर भी यह पास न हो सका। इसके पश्चात् सन् 1952 में चुनाव हुआ और जनता के चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा लोकसभा का गठन हुआ। नई लोकसभा में इसे छोटे-छोटे खंडों में प्रस्तुत किया गया और वे कानून के रूप में पारित कर दिए गए। स्वतंत्रता के पश्चात् बने अधिनियम निम्नलिखित हैं

1. हिन्दू विवाह अधिनियम (1955)
2. हिन्दू उत्तर- अधिकार अधिनियम (1955)
3. हिन्दू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम (1956)
4. स्त्रियों और कन्याओं का अनैतिक व्यापार निरोधक अधिनियम (1956)
5. दहेज निरोधक अधिनियम (1961)
6. चिकित्सा गर्भ समापन अधिनियम (1971)
7. कन्या-भ्रूण हत्या अधिनियम (1994, 1996, 2003)
8. घरेलू हिंसा अधिनियम (संरक्षण) 2005
In simple words: Post-independence, India passed several landmark laws for women's upliftment, including the Hindu Marriage Act (1955), Hindu Succession Act (1955), Dowry Prohibition Act (1961), and the Protection of Women from Domestic Violence Act (2005). These laws aimed to reform Hindu personal laws, ensure property rights, prevent dowry-related abuses, and protect women from domestic violence.

🎯 Exam Tip: Name at least 4-5 key post-independence acts related to women's rights with their years. Briefly state the purpose of each act (e.g., marriage, property, dowry, domestic violence) for a comprehensive answer.

 

Question 4. मूल अधिकारों में महिला अधिकारों के सन्दर्भ में क्या उल्लेखित है।
Answer: संविधान के भाग 3 में मूल अधिकारों की व्याख्या की गई है। प्रजातांत्रिक देश में मूल अधिकार मानव स्वतंत्रता और प्रजातंत्र के आधार स्तम्भ हैं। अतः प्रजातांत्रिक समाज के संविधान में व्यक्तियों के मूल अधिकारों को शामिल किया जाना अत्यन्त जरूरी है। एक स्वतंत्र प्रजातांत्रिक देश में मूल अधिकार सामाजिक, धार्मिक और नागरिक जीवन के पूर्ण उपभोग के एकमात्र साधन हैं, इसलिए लोकतंत्र के आदर्शों को प्राप्त करने तथा मानव के पूर्ण विकास के लिए मूल अधिकारों का होना अत्यन्त आवश्यक है। संविधान के भाग 3 में मूल अधिकारों और भाग 4 में राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों की व्याख्या की गई है। इनमें स्पष्ट रूप से महिलाओं के अधिकार संबंधी बातें कही गई हैं।
In simple words: The Indian Constitution's Part 3, detailing Fundamental Rights, and Part 4, outlining Directive Principles of State Policy, explicitly address women's rights. These provisions ensure human freedom, democratic values, and enable women to fully participate in social, religious, and civic life, reflecting the commitment to gender equality.

🎯 Exam Tip: Mention both Part 3 (Fundamental Rights) and Part 4 (Directive Principles) of the Constitution. Highlight that these parts explicitly contain provisions related to women's rights, affirming their equality and participation in society.

 

Question 5. कन्या भ्रूण हत्या पर कानूनी प्रतिबन्ध कब से लगाया गया था?
Answer: पितृसत्तात्मक परिवार में पुत्र का महत्त्व कन्या से कहीं अधिक है, इसीलिए अनादिकाल से परिवार पुत्र-प्राप्ति की कामना करता है। वह वंश का नाम चलाता है। सभी प्रकार के धार्मिक कार्यों को पूर्ण करता है। यदि परिवार में पहली-दूसरी लड़की का जन्म हो जाए और इसके पश्चात् पत्नी गर्भधारण करती है तो लिंग का पता लगाने हेतु भ्रूण का लिंग परीक्षण कराया जाता है और गर्भ में लड़की है तो गर्भपात करा दिया जाता है। इससे देश में स्त्री और पुरुष के अनुपात में असंतुलन पैदा हो रहा है, इसलिए इसे रोकने हेतु प्रसव पूर्व जाँच अधिनियम, 1994 में बनाया गया तथा यह 1 जनवरी, 1996 से पूरे देश में लागू कर दिया गया।

लिंग चयन एवं भ्रूण की लिंग जाँच पर निषेध के अतिरिक्त ऐसी सेवा देने वालों के विज्ञापनों तथा प्रसव पूर्व तकनीक का प्रयोग कर भ्रूण के लिंग की जानकारी देने पर भी निषेध है। किसी भी प्रावधान का उल्लंघन करने पर 5 वर्ष की कैद और र 1,00,000 का जुर्माना किया जा सकता है। ऐसे केन्द्रों का पंजीयन/लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है।
In simple words: The legal ban on female feticide in India was implemented through the Pre-Natal Diagnostic Techniques (Regulation and Prevention of Misuse) Act, 1994, which came into effect nationwide on January 1, 1996. This act criminalized sex determination tests and abortions based on gender, aiming to address the skewed sex ratio caused by patriarchal preference for sons.

🎯 Exam Tip: State the exact name of the act (Pre-Natal Diagnostic Techniques Act, 1994) and its implementation date (January 1, 1996). Briefly explain the reason behind this ban (patriarchal preference, skewed sex ratio) and the penalties involved.

 

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

 

Question 1. स्त्रियों के विरुद्ध हिंसक व्यवहार के स्वरूप बताइए।
Answer: स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा के निम्नलिखित स्वरूप हो सकते हैं-
1. सती-प्रथा,
2. बलात्कार, अपहरण और हत्या,
3. कन्या-भ्रूण हत्या,
4. घरेलू हिंसा,
5. दहेज प्रथा,
6. देह-व्यापार,
7. अन्य छेड़खानी, ताना मारना, मारना-पीटना, धोखे से विवाह आदि ।
In simple words: Violent behavior against women manifests in various forms, including historical practices like Sati, severe crimes such as rape, kidnapping, and murder, the abhorrent act of female feticide, widespread domestic violence, dowry-related abuses, commercial sexual exploitation (prostitution), and general harassment like teasing, verbal abuse, physical assault, or fraudulent marriages.

🎯 Exam Tip: List at least five distinct forms of violent behavior against women, covering both traditional practices and modern-day crimes. Briefly describing each form will ensure clarity and completeness.

 

Question 2. महिला समाख्या योजना पर टिप्पणी लिखिए।
Answer: महिला समाख्या योजना सन् 1989 में आरम्भ की गई। इस योजना के तहत् ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएँ जो आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग की हैं, उन्हें शिक्षित करने/समानता प्राप्त करने हेतु इस योजना का अपना महत्त्व है; क्योकिं महिला को शिक्षित कर उन्हें शक्तिशाली बनाना है। महिला संघ ग्रामीण स्तर पर, महिलाओं को प्रश्न करने, अपने विचार रखने और अपनी आवश्यकताओं को व्यक्त करने का अवसर प्रदान करती है। इस तरह महिलाओं के व्यक्तित्व निर्माण का भी कार्य करती है और महिला सशक्तीकरण का भी।।
In simple words: The Mahila Samakhya Yojana, launched in 1989, is a significant initiative aimed at empowering economically and socially backward rural women through education and promoting equality. It establishes women's collectives at the village level, enabling them to voice their concerns, express ideas, and collectively address their needs, thereby fostering personality development and women's empowerment.

🎯 Exam Tip: Focus on the scheme's launch year, its target group (economically/socially backward rural women), and its primary objectives (education, equality, empowerment). Mentioning the role of Mahila Sanghs is key.

 

Question 3. शिक्षा गारंटी योजना से महिला वर्ग किस प्रकार लाभान्वित हुआ है?
Answer: किसी भी समाज, देश व राष्ट्र की प्रगति के लिए बुनियादी चीजों में से एक शिक्षा भी है। अशिक्षित समाज में न तो पुरुष उन्नति कर सकती है और न ही स्त्री, इसलिए सरकार ने सर्वप्रथम शिक्षा पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। इस शिक्षा योजना के तहत् उन बच्चों को स्कूल लाने का प्रयास किया जाता है, जो स्कूल नहीं जाते हैं। इस योजना की विशेषता है कि दुर्गम स्थानों पर जहाँ एक किलोमीटर में कोई औपचारिक स्कूल नहीं है और स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की आयु 6-14 वर्ष के बीच है और उस क्षेत्र में 15 से 25 बच्चे तक हैं तो एक ईजीपीएस (शिक्षा गारंटी योजना) के तहत् स्कूल खोल दिया जाएगा।
In simple words: The Education Guarantee Scheme (EGS) primarily benefited girls, especially in remote areas, by establishing schools where none existed within a one-kilometer radius for 15-25 out-of-school children aged 6-14. This initiative ensured basic education access for girls who were previously excluded, fostering their empowerment and contributing to overall societal progress.

🎯 Exam Tip: Explain how the Education Guarantee Scheme directly benefits the female population by establishing schools in remote areas, focusing on out-of-school children, especially girls, and thereby enhancing their access to education.

 

Question 4. किस पंचवर्षीय योजना में महिला कल्याण शब्द के स्थान पर महिला विकास शब्द का प्रयोग किया गया था?
Answer: पाँचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-79)-महिला कल्याण शब्द के स्थान पर महिला विकास शब्द का प्रयोग किया गया इससे सामाजिक कल्याण का दायरा काफी बढ़ गया। परिवार की विभिन्न समस्याओं पर विचार किया जाने लगा वहीं स्त्री की भूमिका पर भी ध्यान दिया गया कि वह देश के विकास में किस प्रकार उपयोगी होगी। यह कल्याण और विकास की अवधारणा के मध्य एक नवीन समन्वयात्मक उपागम था।
In simple words: In the Fifth Five-Year Plan (1974-79), the term "महिला कल्याण" (women's welfare) was replaced with "महिला विकास" (women's development). This shift broadened the scope from mere welfare to active participation and consideration of women's role in national development, integrating their issues into a more comprehensive development framework.

🎯 Exam Tip: Identify the correct Five-Year Plan (Fifth Plan, 1974-79) and clearly state the terminology shift from 'welfare' to 'development'. Explain the significance of this change, emphasizing a broader, more active role for women.

 

निश्वित उत्तीय प्रश्न (1 अंक)

 

Question 1. “हिंसा मानव की एक ऐसी प्रवृत्ति है जिसका निर्गुण में जितना निषेध होता है सगुण में उसका उतना ही जबरदस्त आकर्षण भी है।” यह कथन किसके द्वारा प्रतिपादित है।
Answer: उपर्युक्त कथन सच्चिदानन्द सिन्हा द्वारा हिंसा की मूल प्रवृत्तियों का विश्लेषण करते हुए कहा गया है।
In simple words: This statement, which describes human violence as a powerful attraction despite its moral prohibition, was articulated by सच्चिदानन्द सिन्हा.

🎯 Exam Tip: Directly name सच्चिदानन्द सिन्हा as the proponent of the given statement. No further elaboration is needed for a 1-mark question.

 

Question 2. सती प्रथा उन्मूलन का श्रेय किसको जाता है?
Answer: सती प्रथा उन्मूलन का श्रेय राजा राममोहन राय को जाता है।
In simple words: The credit for the abolition of Sati प्रथा is attributed to Raja Rammohan Roy.

🎯 Exam Tip: Identify Raja Rammohan Roy as the key figure in the abolition of Sati. This direct answer is sufficient.

 

Question 3. भारत में बाल विवाह के उन्मूलन हेतु अंग्रेजी शासनकाल में बने अधिनियम का क्या नाम था और यह कब से प्रभाव में आया था?
Answer: अंग्रेजी शासनकाल में बाल विवाह रूपी ज्वलंत समस्या के निराकरण के लिए “बाल विवाह निरोधक अधिनियम 1929 में प्रभाव में आया था।
In simple words: During the British rule, the act aimed at eradicating child marriage was called the "बाल विवाह निरोधक अधिनियम" (Child Marriage Restraint Act), and it came into effect in 1929.

🎯 Exam Tip: Provide the exact name of the act, "बाल विवाह निरोधक अधिनियम," and its implementation year, 1929. Ensure both parts of the question are answered precisely.

 

Question 4. स्वाधार' नामक महिला हेल्पलाइन किस पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत प्रारम्भ की गई थी?
Answer: स्वाधार' नामक महिला हेल्पलाइन बारहवीं पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत प्रारम्भ की गई थी।
In simple words: The 'Swadhar' women's helpline was initiated under the Twelfth Five-Year Plan.

🎯 Exam Tip: Simply state the "बारहवीं पंचवर्षीय योजना" as the plan under which the 'Swadhar' helpline was launched. Direct factual recall is key here.

 

Question 5. महिला समाख्या योजना कब प्रारम्भ हुई थी?
Answer: महिला समाख्या योजना सम् 1989 में प्रारम्भ हुई थी ।
In simple words: The Mahila Samakhya Yojana was launched in the year 1989.

🎯 Exam Tip: State the year 1989 as the commencement date for the Mahila Samakhya Yojana. Accuracy of the year is important.

 

बहुविकल्पीय प्रा (1 अंक)

 

Question 1. भारत के किस प्राचीन धर्म द्वारा “अहिंसा परम धर्म” का उदघोष किया जाता है?
(क) सनातन धर्म
(ख) जैन धर्म
(ग) बौद्ध धर्म
(घ) इन सभी धर्मों द्वारा
Answer: (घ) इन सभी धर्मों द्वारा
In simple words: The principle of "Ahimsa Param Dharma" (non-violence is the supreme duty) is proclaimed by all these ancient Indian religions: Sanatan Dharma, Jainism, and Buddhism.

🎯 Exam Tip: Remember that the principle of "Ahimsa Param Dharma" is foundational to multiple ancient Indian religions, not just one. Choose the option that encompasses all relevant faiths.

 

Question 2. इनमें से स्त्री-हिंसा के पोषक तत्त्व कौन-से हैं?
(क) अराजक तत्व
(ख) माफिया
(ग) विद्वेष की भावना
(घ) ये सभी
Answer: (घ) ये सभी
In simple words: All the listed elements- anarchic elements, mafia, and feelings of malice- contribute to and perpetuate violence against women.

🎯 Exam Tip: Understand that female violence is often fueled by multiple interconnected societal and individual factors. Consider all presented options as potential contributing elements.

 

Question 3. केन्द्रीय सामाजिक कल्याण बोर्ड ने किस पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत स्वैच्छिक संस्थाओं के साथ मिलकर महिला कल्याण के क्षेत्र में कार्य किए थे?
(क) प्रथम पंचवर्षीय योजना
(ख) द्वितीय पंचवर्षीय योजना
(ग) तीसरी पंचवर्षीय योजना
(घ) चौथी पंचवर्षीय योजना
Answer: (क) प्रथम पंचवर्षीय योजना
In simple words: The Central Social Welfare Board collaborated with voluntary organizations for women's welfare initiatives during the First Five-Year Plan.

🎯 Exam Tip: Recall that the Central Social Welfare Board's work with voluntary organizations for women's welfare was a key feature of the First Five-Year Plan.

 

Question 4. पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में महिला कल्याण' के स्थान पर किस शब्द का प्रयोग किया गया?
(क) अभिवृद्धि
(ख) विकास
(ग) आयोजना
(घ) सामाजिक कल्याण
Answer: (ख) विकास
In simple words: In the Fifth Five-Year Plan, the term 'महिला कल्याण' (women's welfare) was replaced by 'विकास' (development) to signify a broader approach.

🎯 Exam Tip: Remember the significant shift in terminology in the Fifth Five-Year Plan from 'welfare' to 'development' when referring to women's issues.

 

Question 5. कन्या भ्रूण हत्या पर कानूनी प्रतिबंध के लिए बनाया गया “प्रसव पूर्व जाँच अधिनियम-1994” कब से लागू किया गया था?
(क) 1 जनवरी, 1994
(ख) 1 जनवरी, 1995
(ग) 1 जनवरी, 1996
(घ) 1 जनवरी, 1997
Answer: (ग) 1 जनवरी, 1996
In simple words: The "Pre-Natal Diagnostic Techniques Act-1994" which legally banned female feticide, was implemented from January 1, 1996.

🎯 Exam Tip: Precisely recall the implementation date of the Pre-Natal Diagnostic Techniques Act-1994, which is January 1, 1996.

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