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Step-by-Step UP Board Solutions: Class 12 Sahityik Hindi विविध निबंध
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1. जो चढ़ गए राष्ट्रवेदी पर
“जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं। वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।' मैथिलीशरण गुप्त की इन काव्य पंक्तियों का अर्थ यह है कि देश-प्रेम के अभाव में मनुष्य जीवित प्राणी नहीं, बल्कि पत्थर के ही समान कहा जाएगा। हम जिस देश या समाज में जन्म लेते हैं, उसकी उन्नति में समुचित सहयोग देना हमारा परम कर्तव्य बनता है। स्वदेश के प्रति यही कर्तव्य-भावना, इसके प्रति प्रेम अर्थात् स्वदेश-प्रेम ही देशभक्ति का मूल स्रोत है। कोई भी देश सांधारण एवं निष्प्राण भूमि का केवल ऐसा टुकड़ा नहीं होता, जिसे मानचित्र द्वारा दर्शाया जाता है। देश का निर्माण उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि उसमें रहने वाले लोगों एवं उनके सांस्कृतिक पहलुओं से होता है। लोग अपनी पृथक सांस्कृतिक पहचान एवं अपने जीवन-मूल्यों को बनाए रखने के लिए ही अपने देश की सीमाओं से बँधकर इसके लिए अपने प्राण न्यौछावर करने को तत्पर रहते हैं। यही कारण है कि देश-प्रेम की भावना देश की उन्नति का परिचायक होती है। स्वदेश प्रेम-एक उच्च भावना वास्तव में देश-प्रेम की भावना मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ भावना है। इसके सामने किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत लाभ का कोई महत्त्व नहीं होता। यह एक ऐसा पवित्र व सात्विक भाव है, जो मनुष्य को निरन्तर त्याग की प्रेरणा देता है, इसलिए कहा गया है-“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” अर्थात् जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं। मानव की हार्दिक अभिलाषा रहती है कि जिस देश में उसका जन्म हुआ, जहाँ के अन्न-जल से उसके शरीर का पोषण हुआ एवं जहाँ के लोगों ने उसे अपना प्रेम एवं सहयोग देकर उसके व्यक्तित्व को निखारा, उसके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन वह सदा करता रहे। यही कारण है। कि मनुष्य जहाँ रहता है, अनेक कठिनाइयों के बावजूद उसके प्रति उसका मोह कभी खत्म नहीं होता, जैसा कि कवि रामनरेश त्रिपाठी ने अपनी कविता में कहा है। “विषुवत् रेखा का वासी जो जीता है नित हाँफ-हाँफ कर, रखता है अनुराग अलौकिक वह भी अपनी मातृभूमि पर । हिमवासी जो हिम में, तम में जी लेता है काँप-काँपकर, वह भी अपनी मातृभूमि पर कर देता है प्राण निछावर ।” स्वदेश प्रेम की अभिव्यक्ति के प्रकार स्वदेश प्रेम यद्यपि मन की एक भावना है तथापि इसकी अभिव्यक्ति हमारे क्रिया-कलापों से हो जाती है। देश प्रेम से । ओत-प्रोत व्यक्ति सदा अपने देश के प्रति कर्तव्यों के पालन हेतु न केवल तत्पर रहता है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर इसके लिए अपने प्राण न्यौछावर करने से भी पीछे । नहीं हटता । सच्चा देशभक्त आवश्यकता पड़ने पर अपना तन, मन, धन सब कुछ देश को समर्पित कर देता है। यह स्मरण रहे कि स्वदेश प्रेम को किसी विशेष क्षेत्र एवं सीमा में नहीं बघा जासकता। हमारे जिस कार्य से देश की उन्नति हो, वही स्वदेश प्रेम की सीमा में आता है। अपने प्रजातन्त्रात्मक देश में, हम अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए ईमानदार एवं देशभक्त जनप्रतिनिधि का चयन कर देश को जाति, सम्प्रदाय तथा प्रान्तीयता की राजनीति से मुक्त कर इसके विकास में सहयोग कर सकते हैं। जाति प्रथा, दहेज प्रथा, अन्धविश्वास, आढ़त इत्यादि कुरीतियाँ देश के विकास में बाधक है। हम इन्हें दूर करने में अपना योगदान कर देश सेवा का फल कर सकते है। अशिक्षा, निर्धनता, बेरोजगारी, व्याभिचार एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेकर हम अपने देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर कर सकते हैं। हम समय पर टैक्स का भुगतान कर देश की प्रगति में सहायक हो सकते हैं। इस तरह किसान, मजदूर, शिक्षक, सरकारी कर्मचारी, चिकित्सक, सैनिक और अन्य सभी पेशेवर लोगों के साथ-साथ देश के हर नागरिक द्वारा अपने कर्तव्यों का समुचित रूप से पालन करना भी देशभक्ति ही है। उपसंहार नागरिकों में स्वदेश प्रेम का अभाव राष्ट्रीय एकता में सबसे बड़ी बाधा के रूप में कार्य करता है, जबकि राष्ट्र की आन्तरिक शान्ति तथा सुव्यवस्था और घाहरी दुश्मनों से रक्षा के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है। यदि हम भारतवासी किसी कारणवश छिन्न-भिन्न हो गए, तो हमारी पारस्परिक फूट को देखकर अन्य देश हमारी स्वतन्त्रता को हड़पने का प्रयास करेंगे। इस प्रकार अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा एवं राष्ट्र की उन्नति के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है और राष्ट्रीय एकता बनाए रखना तब ही सम्भव है, जब हम देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे।
🎯 Exam Tip: इस निबंध में देश-प्रेम की भावना, उसके प्रकार और राष्ट्रीय एकता के महत्व को स्पष्ट रूप से समझाना महत्वपूर्ण है।
2. यदि मैं रक्षा मंत्री होता
भूमिका एवं रक्षामन्त्री बनने की प्रबुद्ध इच्छा का कारण सेना राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा दिवस का पावन पर्व और मैं सेना मुख्यालय पर तिरंगा फहराने के बाद देश के जवानों को सम्बोधित करते हुए भाषण दे रहा था। इस भाषण में देश की रक्षा के लिए मेरे द्वारा किए गए कार्यों का वर्णन तो था ही, साथ ही आने वाले वर्षों में मेरे द्वारा किए जाने वाले सम्भावित कार्यों का भी वर्णन था। मैं अभी भाषण दे ही रहा था कि अचानक मेरी नींद खुल गई और मैंने अपने आपको बिस्तर पर पाया। मैं वास्तव में रक्षा मन्त्री होने का खूबसूरत सपना देख रहा था।
रक्षा मन्त्री के रूप में प्राथमिकताएँ
भारत के रक्षा मन्त्री के रूप में मेरी निम्नलिखित प्राथमिकताएँ होंगी । 1. सेना का उचित प्रसार देश के रक्षामन्त्री के रूप में सबसे पहले मैं भारत में सेना के उचित प्रसार पर ध्यान देता। किसी भी देश की सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि उसके नागरिक कितने सुरक्षित, सजग एवं सतर्क प्रहरी हैं। समय के अनुसार विज्ञान एवं रक्षा मन्त्री के रूप में प्राथमिकता प्रौद्योगिकी में परिवर्तन को देखते हुए भारतीय सेना प्रणाली में भी इनको प्राथमिकता दिए जाने की आवश्यकता है। मैं सेना द्वारा सुरक्षा बढ़ाने के लिए विज्ञान की शिक्षा कार्यानुभव एवं व्यावसायिक शिक्षा पर बल देता।। 2. आन्तरिक एवं बाह्य सुरक्षा के लिए प्रयास एक देश तब ही प्रगति की राह पर अग्रसर रह सकता है, जब उसके नागरिक अपने देश में सुरक्षित हों। असुरक्षा की भावना न केवल नागरिकों का जीना दूभर कर देती हैं, बल्कि इससे देश की शान्ति एवं सुव्यवस्था के साथ-साथ इसकी प्रगति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। आज भारत निःसन्देह बहुत तेज़ी से प्रगति कर रहा है, किन्तु इसकी आन्तरिक सुरक्षा के समक्ष ऐसी चुनौतियाँ हैं, जो इसकी शान्ति एवं सुव्यवस्था पर प्रश्न-चिह्न लगा रही हैं। साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद, आतंकवाद, अलगाववाद, भाषावाद, नक्सलवाद इत्यादि भारत को आन्तरिक, बाह्य सुरक्षा के समक्ष ऐसी ही कुछ खतरनाक चुनौतियाँ हैं। मैं इन समस्याओं का समाधान कर आन्तरिक एवं बाह्य सुरक्षा को सुदृढ़ करने का प्रयास करता । 3. राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने का प्रयास भारत में कई धर्मों एवं जातियों के लोग रहते हैं, जिनके रहन-सहन एवं आस्था में अन्तर तो है ही साथ ही, उनकी भाषाएँ भी अलग-अलग हैं। इन सबके बावजूद पूरे भारतवर्ष के लोग भारतीयता की जिस भावना से ओत-प्रोत रहते हैं, उसे राष्ट्रीय एकता का विश्वभर में सर्वोत्तम उदाहरण कहा जा सकता है। यदि हम भारतवासी किसी कारणवश छिन्न-भिन्न हो गए तो अन्य देश हमारी स्वतन्त्रता को हड़पने का प्रयास करेंगे, इसलिए मैं भारत की सबसे बड़ी विशेषता विविधता में एकता' को महत्त्व देते हुए भारत की राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने का प्रयास करता। 4. सामाजिक समस्याओं का समाधान धार्मिक कट्टरता, जातिप्रथा, अन्धविश्वास, नारी-शोषण, सामाजिक शोषण, बेरोजगारी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, गरीबी इत्यादि हमारी प्रमुख सामाजिक समस्याएँ हैं। ऐसा नहीं है कि ये सभी सामाजिक समस्याएँ हमेशा से हमारे समाज में विद्यमान रही हैं। कुछ समस्याओं की जड़ धार्मिक कुरीतियाँ हैं, तो कुछ ऐसी समस्याएँ भी हैं, जिन्होंने सदियों की गुलामी के बाद समाज में अपनी जड़ें स्थापित कर ली, जबकि कुछ समस्याओं के मूल में दूसरी पुरानी समस्याएँ रही हैं। देश एवं समाज की वास्तविक प्रगति के लिए इन समस्याओं का शीघ्र समाधान आवश्यक है। एक रक्षा मन्त्री के रूप में मैं रक्षा सेनाओं की समस्याओं का समाधान करने के लिए व्यावहारिक एवं व्यावसायिक रोजगारोन्मुखी NCC, शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित कर देश के युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित करता। 5. रक्षा नीति में सुधार अन्तर्राष्ट्रिीय राजनीति के क्षेत्र में किसी भी देश की स्थिति तब ही सुदृढ़ हो सकती है, जब उसकी रक्षा नीति सही हो । भारत एक शान्तिप्रिय देश है। दुनिया भर में शान्ति को बढ़ावा देने एवं परस्पर सहयोग के लिए मैं भारतीय विदेश नीति में सुधार करता। राष्ट्रीय सीमा सुरक्षा बलों का विकास करता तथा मैं सम्पूण सेना के अंगों को प्रशिक्षित एवं अत्याधुनिक निक हथियारों, वायुयानों, रडारों एवं अत्याधुनिक रक्षा उपकरणों से सुसज्जित कर देश की सुरक्षा को सुनिश्चित करता । उपसंहार इस तरह स्पष्ट है कि यदि मैं भारत का रक्षा मन्त्री होता तो देश एवं देश की जनता को सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं शैक्षिक सुरक्षा के स्तर पर सुदृढ़ कर भारत को पूर्णतः विकसित ही नहीं, खुशहाल शान्तिप्रिय एवं सुरक्षित देश बनाने का सपना साकार करता।🎯 Exam Tip: यह निबंध कल्पना पर आधारित है, इसलिए अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से बताना और प्रत्येक बिंदु का तर्कसंगत समर्थन करना महत्वपूर्ण है।
3. जीवन में खेल की उपयोगिता
प्रस्तावना सभी प्राणियों में मानव का मस्तिष्क सर्वाधिक विकसित है। अपने मस्तिष्क के बल पर मानव ने पूरी दुनिया पर अधिकार पा लिया है और दिनों-दिन प्रगति के पथ पर अग्रसर है, किन्तु मानव का मस्तिष्क तभी स्वस्थ रह सकता है, जब उसका शरीर तन्दुरुस्त रहे। इसलिए कहा गया है-'स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम की आवश्यकता होती है और खेल व्यायाम का एक ऐसा रूप है जिसमें व्यक्ति को शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक विकास भी होता है। शरीर और मस्तिष्क का पारस्परिक सम्बन्ध इस प्रकार मस्तिष्क के शरीर से और शरीर के मस्तिष्क से पारस्परिक सम्बन्ध को देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि खेल-कूद व्यक्ति के बहुमुखी विकास के लिए आवश्यक है। जॉर्ज बर्नाड शॉ का कहना है-“हमें खेलना बन्द नहीं करना चाहिए, क्योंकि हम बूढे इसलिए होते हैं कि हम खेलना बन्द कर देते हैं।” जीवन में खेल कूद के लाभ स्वास्थ्य की दृष्टि से खेल कूद के कई लाभ हैं-इससे शरीर की मांसपेशियाँ एवं हड्डियाँ मज़बूत रहती हैं, रक्त का संचार सुचारु रूप से होता है। पाचन क्रिया सुदृढ़ रहती है, शरीर को अतिरिक्त ऑक्सीजन मिलती है और फेफड़े भी मज़बूत रहते हैं। खेलकूद के दौरान शारीरिक अंगों के सक्रिय रहने के कारण शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाती है। इस तरह, खेल मनुष्य के शारीरिक विकास के लिए आवश्यक हैं। खेल केवल मनुष्य के शारीरिक ही नहीं, मानसिक विकास के लिए भी आवश्यक है। इससे मनुष्य में मानसिक तनावों को झेलने की क्षमता में वृद्धि होती है। खेल-कूद की इसी महत्ता को स्वीकारते हुए 'स्वामी विवेकानन्द' ने कहा था-“यदि तुम गीता के मर्म को समझनी चाहते हो, तो खेल के मैदान में जाकर फुटबॉल खेलो ।” कहने का तात्पर्य यह है कि खेल-कूद द्वारा शरीर को स्वस्थ करके ही मानसिक प्रगति हासिल की जा सकती हैं। शिक्षा एवं रोजगार मे खेल-कूद की उपयोगिता शिक्षा एवं रोज़गार की दृष्टि से भी खेल-कूद अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। 'पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होंगे खराब' जैसी कहावत अब बीते दिनों की बात हो गई है। खेल अब व्यक्ति के कैरियर को नई ऊंचाइयों दे रहे हैं। राष्ट्रीय एवं अन्तरर्राष्ट्रीय स्तर पर आए दिन होने वाली तरह-तरह की खेल स्पर्धाओं के कारण खेल, खिलाड़ी और इससे जुड़े लोगों को पैसा, वैभव और पद हर प्रकार के लाभ प्राप्त हो रहे हैं। खेल-कूद के व्यवसायीकरण के कारण यह क्षेत्र रोज़गार का एक अच्छा माध्यम बन गया है। खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए राज्य, राष्ट्रीय एवं अन्तरष्ट्रिीय स्तर के खिलाड़ियों को निजी एवं बैंक, रेलवे जैसी सरकारी कम्पनियाँ ऊँचे वेतन वाले पदों पर नियुक्त करती हैं। जब खेल-कूद के महत्त्व की बात आती है तो लोग कहते हैं, कि क्रिकेट, बैडमिण्टन, हॉकी, फुटबॉल जैसे मैदान में खेले जाने वाले खेल ही हमारे लिए मानसिक एवं शारीरिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं तथा शतरंज, कैरम, लुडो जैसे घर के अन्दर खेले जाने वाले खेलों से सिर्फ हमारा मनोरंजन होता है और इसलिए ये खेल समय की बर्बादी हैं, किन्तु ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है। खेल-कूद जीवन का अभिन्न अंग जीवन में जिस तरह शिक्षा महत्त्वपूर्ण है, उसी तरह मनोरंजन के महत्त्व को भी नकारा नहीं जा सकता। काम की थकान के बाद हमारे मस्तिष्क को मनोरंजन की आवश्यकता होती है। नियमित दिनचर्या में यदि खेल-कूद का समावेश कर लिया जाए, तो व्यक्ति के जीवन में उल्लास-ही-उल्लास छा जाता है। अवकाश के समय घर के अन्दर खेले जाने वाले खेलों से न केवल स्वस्थ मनोरंजन होता है, बल्कि ये आपसी मेल-जोल को बढ़ाने में भी मददगार साबित होते हैं। खेल कोई भी हो यदि व्यक्ति पेशेवर खिलाड़ी नहीं है, तो उसके लिए इस बात का ध्यान रखना अनिवार्य हो जाता है कि खेल को खेल के समय ही खेला जाए, काम के समय नहीं।। उपसंहार भारत के ये महान् खिलाड़ी देश की नई पौध को खेल-कूद की ओर आकर्षित कर रहे हैं। क्रिकेट की दुनिया के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेन्दुलकर के कीर्तिमानों को तोड़ने वाला विश्व में कोई खिलाड़ी नहीं। उन्हें वर्ष 2014 में भारत का सर्वोच्च अलंकरण 'भारत रल' से भी सम्मानित किया गया है। इस प्रकार निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मनुष्य के सर्वांगीण एवं सन्तुलित विकास के लिए खेल कूद को जीवन में पर्याप्त स्थान दिया जाना चाहिए। अल्बर्ट आइंस्टाइन का कहना था-“खेल सबसे उच्चकोटि को अनुसन्धान है।”
🎯 Exam Tip: खेल-कूद के शारीरिक और मानसिक लाभों, साथ ही शिक्षा और रोजगार में इसकी उपयोगिता पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।
4. ग्राम्य जीवन का आनन्द/ग्रामीण जीवन
प्रस्तावना यद्यपि आज भारत विकाशील देशों की श्रेणी में खड़ा हुआ है। फिर भी आज शहरों की अपेक्षा भारत वर्ष में गाँवों की संख्या अधिक है। एक सर्वे के अनुसार भारत वर्ष की कुल जनसंख्या का 75% भाग ग्रामीण परिवेश में ही निवास करता है। गाँवों का जीवन शान्त, हरियाली एवं प्रदूषण मुक्त होता है। गाँवों के खेतों की सुन्दरता और हरियाली बरबस ही मन को हर लेती है। गाँव की शिक्षा व्यवस्था भारतवर्ष के अधिकांश गाँवों में मूलभूत सुविधाओं की प्रायः कमी पाई जाती है। आज भी इस आधुनिक युग में गाँव का जीवन शहरों से बहुत अलग है। गाँव में पूर्ण रूप से शिक्षा की सुविधाएँ आज भी उपलब्ध नहीं हो पाई हैं। आज भी ज्यादातर गाँवों में मात्र प्राइमरी स्कूलों की सुविधा है और कुछ बड़े गाँवों में मात्र हाई स्कूल की सुविधा है। कॉलेज या उच्च शिक्षा के लिए आज भी गाँव के बच्चों को बड़े शहरों में जाना पड़ता है। ऐसे में जिन लोगों के घर अपने बच्चों को शहर भेजने के लिए पैसे नहीं होते हैं, वह उनकी शिक्षा वहीं रोक देते हैं। इस प्रकार ज्यादातर लोग गाँव में अशिक्षित रह जाते हैं। ग्रामीण आवासीय व्यवस्था भारतवर्ष में आज भी अधिकांश जनसंख्या कच्चे घास फूस के मकानों अथवा झोपड़ियों में निवास करती है। पहले भारत के सभी गाँव में बाँस और भूसे से बने छप्पर हुआ करते थे और घर भी, मिट्टी के बने होते थे, परन्तु अब प्रधानमंत्री आवास योजना की मदद से गाँव में गरीब लोगों को मुफ्त में पक्के घर मिल रहे हैं। ग्रामीण लोगों का मुख्य व्यवसाय लगभग सभी गाँवों के लोग खेती-किसानी करते हैं और अपने घरों में मुर्गियाँ, गाय-भैंस, बैल और बकरियाँ पालते हैं। साथ ही गाँव के लोग शहरी लोगों की तरह सब्जी मण्डी से सब्जियाँ खरीदने नहीं जाते हैं। हर कोई अपने खेतों और बगीचों में सब्जियाँ लगाते है और खुद के घर की सब्जियाँ खाते हैं। गांव के लोगों का मुख्य कार्य खेती होता है। आज भी शहरों में जिस अनाज को लोग खाते हैं, वह गांव के खेतों से ही आता है। गाँवों में परिवहन की सुविधाएँ आज भी इस 21 वीं सदी में कई ऐसे गाँव हैं, जहाँ तक पहुँचने के लिए अच्छी सड़क तक नहीं है। हालाँकि प्रधानमन्त्री ग्रामीण सड़क योजना के अनुसार ज्यादातर गाँव को अब पक्की सड़कों से जोड़ा जा चुका है, परन्तु फिर भी कुछ ऐसे गाँव हैं, जहाँ पर सड़क न होने के कारण वहाँ जाना तक बहुत मुश्किल होता है। उन जगहों पर सड़क न होने के कारण बारिश के महीने में सड़कों व गड्डों में पानी भर जाता है व कीचड़ को जाती है, जिसके कारण आना-जाना मुश्किल हो जाता है। शहर के मुकाबले गाँव में बहुत कम लोग रहते हैं। गाँव में लोगों के घर के आस पास बहुत खुली जगह होती है और हर किसी व्यक्ति के पास मोटरसाइकिल या कार नहीं होती है। गाँव में ज्यादातर लोगों के पास वाहन के रूप में बैलगाड़ी होती है। परन्तु कुछ गाँव में अभी भी लोगों के पास मोटर गाड़ी की सुविधाएँ हैं। गाँव की स्वास्थ्य से जुडी सुविधाएँ अब गाँव के पास भी सरकार की ओर से प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र जगह-जगह खोले जा चुके हैं, जिससे गाँव के लोगों को भी चिकित्सा के क्षेत्र में सुविधाएँ मिल रही हैं। इमरजेंसी के समय के लिए सरकार ने अब ज्यादातर प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों में मुफ्त 108 एम्बुलेंस सर्विस प्रदान की है, जो बहुत मददगार साबित हुई हैं। गाँव में साप्ताहिक छोटे बाजार लगते हैं, जहाँ लोग कपड़े, खाने का समान, बिजली का सामान और अन्य जरूरी समान खरीदने जाते हैं। अगर उन्हें कुछ बड़ी चीजें खरीदनी होती हैं, तो वे पास के शहर चले जाते हैं। गाँव का वातावरण गांव में मौसम बहुत ही सुहाना और वातावरण बहुत स्वच्छ होता है। आज शहरी इलाकों में प्रदूषण के कारण साँस लेना तक मुश्किल हो गया है। परन्तु गाँव में ऐसा नहीं है। गाँव में कम वाहन चलने के कारण प्रदूषण ना के बराबर होता है, इसलिए वहाँ वातावरण भी स्वच्छ होता है। ग्रामीण लोगों की जीवन शैली जिन क्षेत्रों में कुछ प्राकृतिक कारणों से खेती-किसानी सही प्रकार से नहीं हो पा रही हैं, उन क्षेत्रों के गांव में ज्यादातर लोग गरीबी रेखा (BPL - Below poverty line) के नीचे होते हैं। उनके पास खेत न होने या खेतों में पानी की सुविधा सही प्रकार से ना हो पाने के कारण उनके पास एक वक्त का खाना खाने के लिए भी अनाज नहीं होता है। ज्यादातर राज्यों की सरकार के द्वारा इन गरीबी रेखा के लोगों के लिए जन धन योजना' बैंक अकाउण्ट प्रदान किया जाता है और साथ ही परिवार के अनुसार 2 किलो वाला चावल प्रदान किया जा रहा है और साथ ही प्रधानमन्त्री उज्ज्वला योजना के अनुसार, घर पर गैस कनेक्शन दिए जा रहे हैं। ग्रामीण परिवेश में प्रकाश की व्यवस्था पहले कुछ वर्ष गाँव का जीवन रात होते ही अंधकार में डूब जाता था, क्योंकि ज्यादातर गाँव में बिजली की सुविधा नहीं थी। आज लगभग ज्यादातर गांव में बिजली की सुविधा पहुँच चुकी है। अब गांव के बच्चे भी मेहनत कर रहे हैं और शिक्षा के क्षेत्र में बहुत सफलताएँ प्राप्त कर रहे हैं। गाँव के पारम्परिक त्योहार और संस्कृति आज भले ही शहरी क्षेत्रों में लोग भारत की संस्कृति और परम्परा को काफी हद तक भुला चुके हैं, लेकिन आज भी ग्रामीण लोगों के दिल में हमारे देश की परम्परा और संस्कृति कूट-कूटकर भरी हुई हैं। गाँव के त्योहारों में शहरों के जितनी आतिशबाजी और रोशनी तो नहीं होती है, परन्तु उनमें सभी लोग नियम से और मिल-जुल कर त्योहार का आनन्द उठाते हैं। उपसंहार संक्षेप में कहें तो ग्रामीण परिवेश में ही आनन्द की अनुभूति होती है, क्योंकि जहां शहरी व्यक्ति स्वार्थी हो गए हैं, वहाँ वे स्वयं के लिए ही केन्द्रित हो गए हैं, जबकि गांवों के लोग मिलनसार, परस्पर सहयोगी तथा खुश दिखाई देते हैं।
🎯 Exam Tip: ग्रामीण जीवन की शिक्षा, व्यवसाय, स्वास्थ्य, परिवहन, और संस्कृति जैसे विभिन्न पहलुओं को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों दृष्टिकोणों से वर्णित करना महत्वपूर्ण है।
5. रोग वद्धि कारण एवं निवारण/स्वास्थ्य/आरोग्य
प्रस्तावना हम सब ने स्वास्थ्य से सम्बन्धित अनेक कहावतें तथा श्लोगन सुन रखे हैं; जैसे-जान है तो जहान है। एक तन्तुरूस्ती हजार नियामत तथा संस्कृत भाषा में भी कालिदास द्वारा उक्त शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम् यह बिल्कुल सत्य है कि, " स्वास्थ्य ही धन है। क्योंकि, हमारा शरीर ही हमारी सभी अच्छी और बुरी सभी तरह की परिस्थितियों में हमारे साथ रहता है। इस संसार में कोई भी हमारे बुरे समय में मदद नहीं कर सकता है। इसलिए, यदि हमारा स्वास्थ्य ठीक है, तो हम अपने जीवन में कितनी भी बुरी परिस्थिति का सामना कर सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति स्वस्थ नहीं है, तो वह अवश्य ही जीवन का आनन्द लेने के स्थान पर जीवन में स्वास्थ्य सम्बन्धी या अन्य परेशानियों से पीड़ित होगा। स्वास्थ्य से तात्पर्य स्वस्थ शरीर से तात्पर्य है कि मानव या किसी भी प्राणी की शारीरिक एवं मानसिक क्षमता को उसके द्वारा सुचारु रूप से उपयोग करना। यदि चर ऐसा नहीं कर पा रहा है तो निश्चित है कि वह किसी-न-किसी शारीरिक अथवा मानसिक रोग से ग्रस्त है। आए दिन नई-नई बीमारियां सामने आती रहती हैं; जैसे बुखार, चेचक, हैजा, कैन्सर, एड्स नजला, जुकाम, जोड़ों का दर्द, अल्जाइमर सियाटिका, अल्सर दाद, खाज, खुजली, मधुमेह, हृदय रोग एवं विभिन्न पातक रोग आदि में से संसार का हर व्यक्ति किसी-न-किसी छोटी-बड़ी बीमारी से अवश्य ही रोग प्रस्त होता है। कुछ रोगों का तो हमें सामान्य रूप से ही पता चल जाता है, परन्तु कुछ रोगों की जाँच के लिए हमें चिकित्सीय उपकरणों /मशीनों आदि की सुविधाएँ लेनी पड़ती है। रोग वृद्धि के कारण किसी भी रोग की वृद्धि का प्रमुख कारण है, हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आना। दूसरा प्रमुख मूल कारण है, विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों के स्तर में वृद्धि होना, जिसके कारण कुछ रोग तो मनुष्य के खान-पान तथा पेय जल की अशुद्धता से फैलते हैं तथा कुछ रोग वायु की अशुद्धता अर्थात् ऑक्सीजन की कमी तथा विभिन्न जहरीली गैसों के वातावरण में वृद्धि के कारण फैलते हैं। कुछ रोगों की वृद्धि का कारण मानव की अज्ञानता है, तो कुछ रोगों की वृद्धि का कारण मनुष्य की लापरवाही भी होती है। रोग वृद्धि के दुष्परिणाम सर्वप्रथम तो रोग ग्रस्त व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है। उसका न तो खान-पान में हो मन लगता है और न ही किसी भी अन्य कार्यों में, वह घर के किसी अन्य सदस्य पर निर्भर रहने लगता है, क्योंकि वह स्वयं के कार्यों को भी ठीक से करने में असमर्थ हो जाता है। संसार का कोई भी शारीरिक और आन्तरिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति जीवनभर में बहुत-सी चुनौतियों का सामना करता है, यहाँ तक कि उसे अपनी नियमित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी और पर निर्भर रहना पड़ता है। यह स्थिति उस व्यक्ति के लिए बहुत शर्मनाक होती है, जो इन सब का सामना करता है। इसलिए, अन्त में सभी प्रकार से खुश रहने के लिए और अपने सभी कार्यों को स्वयं करने के लिए अपने स्वास्थ्य को बनाए रखना अच्छा होता है। यह सत्य है कि धन और स्वास्थ्य एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं, क्योंकि अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए हमें धन की आवश्यकता होती है और धन कमाने के लिए अच्छे स्वास्थ्य की, लेकिन यह भी सत्य है, कि हमारा अच्छा स्वास्थ्य हर समय हमारी मदद करता है और हमें केवल धन कमाने के स्थान पर अपने जीवन में कुछ बेहतर करने के लिए भी प्रोत्साहित करता है। स्वास्थ्य प्राप्ति एवं रोग निवारण के उपाय आजकल अच्छा स्वास्थ्य भगवान के दिए हुए एक वरदान की तरह है। यह बिल्कुल वास्तविक तथ्य है, कि स्वास्थ्य ही वास्तविक धन है। अच्छा स्वास्थ्य एक व्यक्ति के लिए जीवनभर में कमाई जाने वाली सबसे कीमती आय होती है। यदि कोई अपना स्वास्थ्य खोता है, तो वह जीवन के सभी आकर्षण को खो देता है। अच्छा धन, अच्छे स्वास्थ्य का प्रयोग करके कभी भी कमाया जा सकता है, हालाँकि एक बार अच्छा स्वास्थ्य खो देने पर इसे दोबारा किसी भी कीमत पर प्राप्त नहीं किया जा सकता है। अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए हमें नियमित शारीरिक व्यायाम, योग, ध्यान, सन्तुलित भोजन, अच्छे विचार, स्वच्छता, व्यक्तिगत स्वच्छता, नियमित चिकित्सकीय जाँच, पर्याप्त मात्रा में सोना और आराम करना आदि की आवश्यकता होती है। यदि कोई स्वस्थ है, तो उसे अपने स्वास्थ्य के लिए दवा खरीदने या डॉक्टरों से मिलने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। इतना ही नहीं अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त करना स्वच्छता का मुख्य घटक है। इसलिए माननीय प्रधानमन्त्री महोदय जी द्वारा स्वच्छता अभियान/आन्दोलन सम्बन्धी विभिन्न योजनाओं को लागू किया गया तथा उन्हें बढ़ावा दिया गया है। उपसंहार हमारे ग्रन्थों में स्वास्थ्य का मूल मन्त्र बताते हुए कहा गया है कि जल्दी सोना, सुबह जल्दी उठना व्यक्ति को सर्वप्रथम स्वस्थ बनाता है, उसे । धनवान बनाता है तथा इतना ही नहीं, उसे बुद्धिमान भी बनाता है। अतः हमें अपने आस-पास की साफ-सफाई के साथ-साथ स्वास्थ्य सम्बन्धी उपरोक्त मन्त्र के अनुसार अपनी दिनचर्या में बदलाव लाना चाहिए, तभी हम स्वस्थ, समृद्ध तथा खुशहाल जीवन जी सकते हैं।
🎯 Exam Tip: स्वास्थ्य की परिभाषा, रोग वृद्धि के कारण, उसके दुष्परिणाम और निवारण के उपायों पर विस्तार से लिखना महत्वपूर्ण है।
6. मेरा प्रिय खेल-हॉकी
प्रस्तावना संसार का कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं हैं जिसे कोई न कोई खेल । प्रिय न हो। सभी को कोई-न-कोई खेल अपनी रुचि के अनुरूप अवश्य ही प्रिय होता है। किसी को शारीरिक, तो किसी को मानसिक विकास को प्रबल करने वाले खेल प्रिय होते हैं। मुझे हॉकी का खेल अतिप्रिय है, क्योंकि हॉकी खेल के कारण ही हमारा भारत देश प्रसिद्ध है। यह हमारा राष्ट्रीय खेल भी है। हॉकी खेल का इतिहास भारत का राष्ट्रीय खेल हॉकी विश्व के लोकप्रिय खेलों में से एक हैं। इसकी शुरूआत कब हुई? यह तो निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता, किन्तु ऐतिहासिक साक्ष्यों से सैकड़ों वर्ष पहले भी इस प्रकार का खेल होने के प्रमाण मिलते हैं। आधुनिक हॉकी खेलों का जन्मदाता इंग्लैण्ड को माना जाता है। भारत में भी आधुनिक हॉकी की शुरूआत का श्रेय अंग्रेज़ों को ही जाता है। हॉकी के अन्तर्राष्ट्रीय मैचों की शुरूआत 19वीं शताब्दी में हुई थी। इसके बाद 20वीं शताब्दी में वर्ष 1924 में अन्तर्राष्ट्रीय हॉकी संघ की स्थापना पेरिस में हुई । विश्व के सबसे बड़े अन्तर्राष्ट्रीय खेल आयोजन 'ओलम्पिक' के साथ-साथ 'राष्ट्रमण्डल खेल' एवं 'एशियाई खेलों में भी हॉकी को शामिल किया जाता है। वर्ष 1971 में पुरुषों के हॉकी विश्वकप की एवं वर्ष 1971 में महिलाओं के हॉकी विश्वकप की शुरूआत हुई। न्यूनतम निर्धारित समय में परिणाम देने में सक्षम होना इस खेल की प्रमुख विशेषता है। हॉकी खेल का स्वरूप हॉकी मैदान में खेला जाने वाला खेल है। बर्फीले क्षेत्रों में बर्फ के मैदान पर खेली जानी वाली आइस हॉकी भारत में लोकप्रियता अर्जित नहीं कर सकी है। दो दलों के बीच खेले जाने वाले खेल हॉकी में दोनों दलों के 11-11 खिलाड़ी भाग लेते हैं। आजकल हॉको के मैदान में कृत्रिम घास का प्रयोग भी किया जाने लगा है। इस खेल में दोनों टीमें स्टिक को सहायता से रबड़ या कठोर प्लास्टिक की गेंद को विरोधी टीम के नेट या गोल में डालने का प्रयास करती हैं। यदि विरोधी टीम के नेट में गेंद चली जाती है, तो उसे एक गोल कहा जाता हैं। जो टीम विपक्षी टीम के विरुद्ध अधिक गोल बनाती है, उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है। मैच में विभिन्न प्रकार के निर्णय एवं खेल पर नियन्त्रण के लिए रेफरी को तैनात किया जाता है। मैच बराबर रहने की दशा में परिणाम निकालने के लिए विशेष व्यवस्था भी होती है। भारतीय हॉकी की प्रतिष्ठा राष्ट्रीय खेल हॉकी की बात आते ही तत्काल मेजर ध्यानचन्द का स्मरण हो आता है, जिन्होंने अपने करिश्माई प्रदर्शन से पूरी दुनिया को अचम्भित कर खेलों के इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित करवा लिया। हॉकी के मैदान पर जब वह खेलने उतरते थे, तो विरोधी टीम को हारने में देर नहीं लगती थी। उनके बारे में यह कहा जाता है कि वे किसी भी कोण से गोल कर सकते थे। यही कारण है कि सेण्टर फॉरवर्ड के रूप में उनकी तेज़ी और जबरदस्त फु को देखते हुए उनके जीवनकाल में ही उन्हें 'हॉकी का जादूगर' कहा जाने लगा था। उन्होंने इस खेल को नवीन ऊँचाइयाँ दीं। भारतीय हॉकी का स्वर्णिम इतिहास मेजर ध्यानचन्द का जन्म 29 अगस्त, 1905 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ था। वे बचपन में अपने मित्रों के साथ पेड़ की डाली की स्टिक और कपड़ों की गेंद बनाकर हॉकी खेला करते थे। 23 वर्ष की उम्र में ध्यानचन्द वर्ष 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक में पहली बार भाग ले रही भारतीय हॉकी टीम के सदस्य चुने गए थे। उनके प्रदर्शन के दम पर भारतीय हॉकी टीम ने तीन बार; वर्ष 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक, वर्ष 1932 के लॉस एंजिल्स ओलम्पिक एवं वर्ष 1936 के बर्लिन ओलम्पिक में स्वर्ण पदक प्राप्त कर राष्ट्र को गौरवान्वित किया था। यह भारतीय हॉकी को उनका अविस्मरणीय योगदान है। ध्यानचन्द की उपलब्धियों को देखते हुए ही उन्हें विभिन्न पुरस्कारों एवं सम्मानों से सम्मानित किया गया। वर्ष 1956 में 51 वर्ष की आयु में जब वे भारतीय सेना के मेजर पद से सेवानिवृत्त हुए, तो उसी वर्ष भारत सरकार ने उन्हें 'पद्म भूषण' से अलंकृत किया। उनके जन्मदिन 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाने को घोषणा की गई। मेजर ध्यानचन्द के अतिरिक्त धनराज पिल्ले, दिलीप टिकी, अजीतपाल सिंह, असलम शेर खान, परगट सिंह इत्यादि भारत के अन्य प्रसिद्ध हॉकी खिलाड़ी रहे है। भारतीय हॉकी का विकास एवं शानदार प्रदर्शन देश में राष्ट्रीय खेल हॉकी को विकास करने के लिए वर्ष 1925 में ग्वालियर में अखिल भारतीय हॉकी संघ की स्थापना की गई थी। यदि ओलम्पिक खेलों में भारतीय टीमों के प्रदर्शन की बात की जाए, तो वर्ष 2014 तक देश को कुल 24 पदक प्राप्त हुए हैं, जिनमें से 11 पदक अकेले भारतीय हॉकी टीम ने ही हासिल किए हैं। हॉकी में प्राप्त 11 पदकों में से 8 स्वर्ण, 1 रजत एवं 2 काँस्य पदक शामिल हैं। वर्ष 1928 से लेकर वर्ष 1956 तक लगातार छः बार भारत ने ओलम्पिक खेलों में हॉकी का स्वर्ण पदक जीतने में सफलता पाई। इसके अतिरिक्त, भारत ने वर्ष 1964 एवं 1980 में भी स्वर्ण पदक प्राप्त किया। हॉकी के विश्वकप में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन ओलम्पिक जैसा नहीं रहा है। वर्ष 1971 में हुए पहले हॉकी विश्वकप में भारत तीसरे स्थान पर, जबकि वर्ष 1973 में हुए दूसरे विश्वकप में दूसरे स्थान पर रहा। वर्ष 1975 में हुए तीसरे हॉकी विश्वकप में भारतीय खिलाड़ियों ने शीर्ष स्थान प्राप्त कर इतिहास रच दिया। उपसंहार इधर विगत तीन चार दशकों से भारतीय महिला हॉकी टीम का प्रदर्शन भी अच्छा होने लगा है। इसने राष्ट्रमण्डल खेल, 2002 और एशियन गेम्स, 1982 में स्वर्ण पदक जीतकर भारत का मान बढ़ाया है। इसके अलावा एशियन गेम्स, 1998 और राष्ट्रमण्डल खेल, 2006 में यह टीम उपविजेता घोषित हुई। इतना ही नहीं वर्ष 1986 एवं 2006 में हुए एशियन गेम्स में कांस्य पदक हासिल करने के पश्चात् इसने वर्ष 2014 का एशियन गेम्स हॉकी काँस्य पदक भी अपनी झोली में डाला। इस प्रकार भारतीय पुरुष हॉकी टीम के साथ-साथ भारतीय महिला हॉकी टीम ने भी अन्तरष्ट्रिीय स्तर पर अपनी विशेष पहचान कायम करने में सफलता पाई है। आशा है आने वाले वर्षों में ये दोनों टीमें नए-नए कीर्तिमान गढ़कर भारत को गौरवान्वित करने में पूर्ण सहयोग देगी
🎯 Exam Tip: हॉकी के इतिहास, स्वरूप, प्रमुख खिलाड़ियों (जैसे मेजर ध्यानचंद) के योगदान और भारतीय हॉकी के प्रदर्शन को विस्तार से समझाना आवश्यक है।
7. व्यायाम और योगासन का महत्त्व
संकेत बिन्दु भूमिका, स्वस्थ शरीर की आवश्यकता, स्वस्थ रहने में योग की भूमिका, व्यायाम और योग के लाभ, उपसंहार ।। भूमिका प्रकृति ने संसार के सभी जीव-जन्तुओं को पनपने एवं बढ़ने के अवसर प्रदान किए हैं। सभी प्राणियों में श्रेष्ठ होने के कारण मानव ने अनुकूल-प्रतिकूल, सभी परिस्थितियों में अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग कर स्वयं को स्वस्थ बनाए रखने में सफलता हासिल की है। विश्व की सभी सभ्यता-संस्कृतियों में न सिर्फ स्वास्थ्य रक्षा को प्रश्रय दिया गया है, अपितु स्वस्थ रहने की तरह-तरह की विधियों का शास्त्रगत बखान भी किया गया हैं। भगवान बुद्ध ने कहा था- “हमारा कर्तव्य है कि हम अपने शरीर को स्वस्थ रखें अन्यथा हम अपने मन को सक्षम और शुद्ध नहीं रख पाएंगे । आज की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में इनसान को फुर्सत के दो पल भी नसीब नहीं हैं। घर से दफ्तर, दफ्तर से घर, तो कभी घर ही दफ़्तर बन जाता है यानी इनसान के काम की कोई सीमा नहीं है। वह हमेशा खुद को व्यस्त रखता है। इस व्यस्तता वे कारण आज मानव शरीर तनाव, थकान, बीमारी इत्यादि का घर बनता जा रहा है। आज उसने हर प्रकार की सुख-सुविधाएँ तो अर्जित कर ली हैं, किन्तु उसके सामने शारीरिक एवं मानसिक तौर पर स्वस्थ रहने की चुनौती आ खड़ी हुई है। स्वस्थ शरीर की आवश्यकता यद्यपि चिकित्सा एवं आयुर्विज्ञान के क्षेत्र में मानव ने अनेक प्रकार की बीमारियों पर विजय हासिल की है, किन्तु इससे इसे पर्याप्त मानसिक शान्ति भी मिल गई हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता। तो क्या मनुष्य अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ कर रहा है? यह ठीक है कि काम ज़रूरी है, लेकिन काम के साथ साथ स्वास्थ्य का भी ख्याल रखा जाए, तो यह सोने-पे-सुहागा वाली बात ही होगी। महात्मा गांधी ने कहा भी हैं- “स्वास्थ्य ही असली धन है, सोना और चाँदी नहीं।” सचमुच यदि व्यक्ति स्वस्थ न रहे तो उसके लिए दुनिया की हर खुर्श निरर्थक होती है। रुपये के ढेर पर बैठकर आदमी को तब ही आनन्द मिल सकते है, जब वह शारीरिक रूप से स्वस्थ हो। स्वास्थ्य की परिभाषा के अन्तर्गत केवरु शारीरिक रूप से स्वस्थ होना ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से स्वस्थ होना भी शामिल हैं। व्यक्ति शारीरिक रूप से स्वस्थ हो, किन्तु मानसिक परेशानियों से जुड़ रहा हो, तो भी उसे स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। उसी व्यक्ति को स्वस्थ कहा जा सकता है, जो शारीरिक एवं मानसिक दोनों रूप से स्वस्थ हो। साइरस ने ठीक ही कहा है कि “अच्छा स्वास्थ्य एवं अच्छी समझ, जीवन के दो सर्वोत्तम वरदान हैं।” स्वस्थ रहने में योग की भूमिका योग प्राचीन समय से ही प्रारतीय संस्कृति का अंग रहा हैं। हमारे पूर्वजों ने बहुत समय पहले ही इसका आविष्कार कर लिया था और इसके महत्व को पहचान लिया था। इसीलिए योग पद्ध । सदियों बाद भी जीवित है। योग प्रत्येक दृष्टिकोण से लाभदायक हैं। योग करने 3 व्यक्ति का शरीर सुगठित तथा सुडौल बनता है। वह क्रियाशील बना रहता है। योग से न केवल तन की थकान दूर होती है, बल्कि मन की थकान भी दूर हो जाती है। योग करने वाला व्यक्ति अपने अंग प्रत्यंग में एक नए उत्साह एवं स्फूर्ति का अनुभव करता है। योग करने से शरीर के प्रत्येक अंग में रक्त का संचार सुचारु रूप से होता रहत हैं तथा शरीर रोगमुक्त रहता है। योग से पाचन-तन्त्र भी ठीक रहता है। ध्यान रहे कि पाचन-तन्त्र के अनियमित होने पर ही अधिकांश बीमारियाँ जन्म लेती हैं। यह आश्चर्यजनक तथ्य है, परन्तु उतना ही सत्य भी है कि नियमित रूप से योग करने से शरीर स्वस्थ तो रहता ही है, साथ ही यदि कई रोग है तो योग के द्वारा उसका उपचार भी किया जा सकता है। कुछ रोगों में दो दवा से अधिक लाभ योग करने से होता हैं। इसीलिए कहा गया है- “आसनं विजितं येनल जितं तेन जगत्र्यम् अनेन विधिनायु तः प्राणायाम सदा कुरू अर्थात् जिसने आसन को जीत लिया है, उसने तीनों लोकों को जीत लिया। इसीलिए विधि-विधान से प्राणायाम और योग का अभ्यास करना चाहिए। व्यायाम और योग के लाभ मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर ही योग का विकास किया गया था। यह हमारे शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं। इसका उद्देश्य शरीर, मन एवं आत्मा के बीच सन्तुलन अर्थात् योग स्थापित करना होता है। यह मन को शान्त एवं स्थिर रखता है, तनाव को दूर कर सोचने की क्षमता, आत्मविश्वास तथा एकाग्रता को बढ़ाता है। यह विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों के लिए विशेष रूप से लाभदायक सिद्ध होता है, क्योंकि यह उनके मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाने के साथ-साथ उनकी एकाग्रता भी बढ़ाता है, जिससे उनके लिए अध्ययन-अध्यापन की प्रक्रिया सरल हो जाती है। यह शरीर के जोड़ों एवं मांसपेशियों में लचीलापन लाता है, मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, शारीरिक विकृतियों को काफी हद तक ठीक करता है, शरीर में रक्त के प्रवाह को सुचारु करता है तथा पाचन तन्त्र को मज़बूत बनाता है। इन सबके अतिरिक्त यह शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्तियाँ बढ़ाता है, कई प्रकार की बीमारियों यथा- अनिद्रा, तनाव, थकान, उच्च रक्तचाप, चिन्ता इत्यादि को दूर करता है तथा शरीर को अधिक ऊर्जावान बनाता है। हमारे शास्त्र में कहा भी गया है-“व्यायामान्पुष्ट गात्राणि” अर्थात् व्यायाम से शरीर मजबूत होता हैं। व्यायाम से होने वाले मानसिक स्वास्थ्य के लाभ पर गौर करें, तो पता चलता है। कि यह मन को शान्त एवं स्थिर रखता है, तनाव को दूर कर सोचने की क्षमता, अमविश्वास तथा एकाग्रता को बढ़ाता है। विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों के लिा व्यायाम विशेष रूप से लाभदायक है, क्योकि यह उनके मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ने के साथ-साथ उनकी एकाग्रता भी बढ़ती है, जिससे उनके लिए अध्ययन-अध्यापन की प्रक्रिया सरल हो जाती है। कलियुगी भीम की उपाधि से विभूप्ति विश्वप्रसिद्ध पहलवान राममूर्ति कहते हैं-“मैंने व्यायाम के बल पर अपने दमे तग शरीर की कमजोरी को दूर किया तथा विश्व के मशहूर पहलवानों में अपनी गिनती राई, ये है व्यायाम की महत्ता । उपहार वर्तमान परिवेश में योग न सिर्फ हमारे लिए लाभकारी है, बल्कि विश्व के बढ़ते प्रदूषण एवं मानवीय व्यस्तताओं से उपजी समस्याओं के निवारण में इसकी सार्थकता पर भी बढ़ गई हैं। योगाभ्यास की जटिलताओं को देखते हुए इसे अनुभवी योग प्रशिक्षक की देखरेख में ही करना चाहिए अन्यथा इससे लाभ के स्थान पर हानि भी हो सकी है। एक महत्त्वपूर्ण बात और कुछ लोग इसे धर्म विशेष से जोड़कर देखते हैं और लोगों के मन में साम्प्रदायिकता की भावना फैलाने की कोशिश करते हैं, जोकि सर्वथा अनुचित हैं। अतः हमें इसकी महत्ता समझते हुए, इसके कल्याणकारी स्वरूप को अपनाने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
🎯 Exam Tip: व्यायाम और योगासन के शारीरिक और मानसिक लाभों, साथ ही आधुनिक जीवनशैली में इसकी प्रासंगिकता को समझाना महत्वपूर्ण है।
8. यदि मैं प्रधानाचार्य होता
संकेत बिन्दु भूमिका, प्रधानाचार्य बनने पर किए जाने वाले कार्य, विद्यार्थियों का सर्वागीण विकस, विद्यालय को बेहतर बनाने का प्रयास, उपसंहार । भूमिका विद्यलय एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्था है, जहाँ से शिक्षा प्राप्त करके विद्यार्थी अफार, प्रशासनिक अधिकारी, नेता, मन्त्री, राज्यपाल, राष्ट्रपति आदि बनाते हैं। विद्यार्थियों के जीवन के निर्माण के लिए अच्छे अध्यापक की आवश्यकता होती है तथा उन्हें व्यास्थित तथा उत्तम वातावरण देना प्रधानाचार्य की दायित्व होता है। प्रत्येक विद्यार्थी अपने जीवन में निम्न कल्पनाएँ करता है; जैसे – डॉक्टर बनना, इंजीनियर बनना, IAS ऑफिसर बनना इत्यादि। उसी प्रकार मेरी कल्पना भी एक प्रधानाचार्य बनने की है। प्रधानाचार्य बनने र किए जाने वाले कार्य अपने कार्यकाल में मैं विद्यालय की व्यवस्था को आकर्षक बनाने का प्रयास करूंगा। प्रधानाचार्य बनने पर मैं सर्वप्रथम विद्यालय के भवनों की रफाई का निरीक्षण करके दिशा-निर्देश जारी करूंगा। विद्यालय के पुस्तकालय को समृद्धशाली बनाऊँगा। पुस्तकालय में ज्ञान-विज्ञन के सभी प्रकार के साधनों को उपलब्ध कराने का प्रयास करूंगा। मैं विद्यार्थियों के प्रत्येक क्षेत्र में विकास करने का प्रयास करूंगा। मैं विद्यालय में विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई, खेलकुद तथा सांस्कृतिक सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए विद्यार्थियों के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति करूंगा।। विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास अपने विद्यालय में विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास करने के लिए हर सम्भव प्रयास करूंगा। अनेक विषयों पर वाद-विवाद, संगीत, चित्रकला आदि की प्रतियोगिताएँ आयोजित करवाऊँगा तथा इन सभी से सम्बन्धित राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों को भाग लेने के लिए प्रेरित करूंगा। सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए कुशल अध्यापकों को नियुक्त करूंगा जिससे हमारा विद्यालय पढ़ाई के साथ-साथ सांस्कृतिक क्षेत्र में भी आगे बढ़ सके । विद्यालय को बेहतर बनाने का प्रयास विद्यालय का स्तर ऊपर उठाने के लिए मैं कम्प्यूटर प्रणाली लागू करूंगा जिससे प्रत्येक विद्यार्थी तकनीकी क्षेत्र में आगे बढ़ सके। मैं प्रत्येक कक्षा को शैक्षिक भ्रमण पर ले जाऊँगा साथ ही शारीरिक शिक्षा के अध्यापक से मिलकर एक परामर्श समिति बनाऊँगा तथा तद्नुरूप खेलकूद और व्यायाम आदि की व्यवस्था करवाऊंगा। विद्यार्थियों में नियम पालन, संयम, विनय, कर्तव्यनिष्ठा आदि सद्गुणों के विकास के लिए सदैव प्रयत्नशील रहूंगा तथा मैं स्वयं ही अनुकरणीय आचरण करते हुए अध्यापकों एवं विद्यार्थियों के बीच में प्रस्तुत रहूंगा। उपसंहार मेधावी गरीब छात्रों को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें आर्थिक, पुस्तकीय, शत्रवृत्ति के रूप में सहायता प्रदान करने का प्रयास करूंगा। विद्यालय में प्रयोगशाला के स्वरूप में भी सुधार करवाऊँगा, जिससे विद्यार्थियों की विज्ञान के प्रति अधिक रुचि जागृत होगी तथा विद्यार्थी विज्ञान के प्रति हीन-भावना का अनुभव नहीं करेंगे। कर्मचारियों और अध्यापकों को अच्छे कार्य हेतु पारितोषिक प्रदान करते हुए विद्यार्थियों को भी पुरस्कार प्रदान करूंगा। इस प्रकार प्रधानाचार्य बनकर में अपने सभी कर्तव्यों का उचित प्रकार से निर्वाह करूंगा।
🎯 Exam Tip: प्रधानाचार्य के रूप में आपकी भूमिका, विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए योजनाएं, और विद्यालय के समग्र सुधार के लिए उठाए जाने वाले कदमों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
9. आज का आदर्श नेता
संकेत विन्द भूमिका, अरविंद केजरीवाल का समाज सेवा के लिए प्रेरित होना, भ्रष्टाचार का विरोध, 'आम आदमी पाटी' की धारणा, उपसंहार।। भूमिका लोकतन्त्र में आम आदमी होने के मायने क्या होते हैं, 'आम' होने के बावजूद वह कितना खास होता है, इसकी एक मिसाल कायम की है अरविन्द केजरीवाल ने इसलिए अरविन्द केजरीवाल को आज का आदर्श नेता माना जाता है। दो साल पहले तक अरविन्द केजरीवाल एक आम भारतीय थे, परन्तु आज वही 'आम आदमी' लाखों लोगों की आवाज है। एक आम आदमी से दिल्ली के मुख्यमन्त्री तक का सफर तय करने वाले अरविन्द केजरीवाल का महज दो वर्ष में भारतीय राजनीति में एक अहम जगह बना लेना एक साधारण राजनीतिक घटना नहीं है वरन् भारतीय राजनीति में एक ऐसा अध्याय जुड़ने के समान है, जिसे किसी भी हाल में अनदेखा नहीं किया जा सकता। अरविन्द केजरीवाल का समाज सेवा के लिए प्रेरित होना सरकारी नौकरी करते हुए अरविन्द केजरीवाल ने सरकारी तन्त्र में फैले हुए भ्रष्टाचार और अव्यवस्था को करीब से महसूस किया, जिससे उन्हें समाज-सेवा के क्षेत्र में आने की प्रेरणा मिली। वर्ष 2000 में अरविन्द केजरीवाल ने अपने सहयोगी मनीष सिसोदिया के साथ । मिलकर 'परिवर्तन' नामक एनजीओ की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाना था। वर्ष 2005 में केजरीवाल ने 'कबीर' नाम से एक नए एन जी ओ की स्थापना की, जो मूल रूप से परिवर्तन' का ही बदला हुआ रूप था। इनके कामकाज का मुख्य तरीका आर टी आई के माध्यम से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कार्य करना था। उल्लेखनीय है कि सूचना का अधिकार' को कानूनी रूप देने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे द्वारा एक देशव्यापी आन्दोलन चलाया गया था, जिसमें अरुणा राय, शेखर सिंह, प्रशान्त भूषण आदि सहित केजरीवाल ने भी अपना सक्रिय योगदान दिया था। इन सबके सम्मिलित प्रयासों से ही भारत के नागरिकों को वर्ष 2005 में 'सूचना का अधिकार' मिल पाया था। अपने गाँधीवादी तरीकों के कारण गाँधीवादी नेता के रूप में पहचाने जाने वाले केजरीवाल के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके आदर्श महात्मा गांधी नहीं बल्कि मदर टेरेसा हैं। वह वर्ष 1990 में मदर टेरेसा से मिले भी थे। उनसे मिलने के बाद ही उनके मन में समाज-सेवा के प्रति रुचि जागी। अपना पूरा समय समाज-सेवा को देने के उद्देश्य से केजरीवाल ने फरवरी, 2006 में आयकर विभाग के संयुक्त आयुक्त पद से इस्तीफा दे दिया। इसी वर्ष इन्हें परिवर्तन' और 'कबीर' के द्वारा समाज-सुधार के क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवाएं देने के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दिसम्बर 2006 में इन्होंने मनीष सिसोदिया, अभिनन्दन शेखरी, प्रशान्त भूषण और किरण बेदी के साथ मिलकर पब्लिक कॉज़ रिसर्च फाउण्डेशन' की स्थापना की, जिसके लिए इन्होंने मैग्सेसे पुरस्कार में मिली धनराशि दान कर दी। भ्रष्टाचार का विरोध वर्ष 2010 में अरविंद केजरीवाल ने उस वर्ष हुए। दिल्ली राष्ट्रमण्डल खेलों में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार की आशंका जताई। केजरीवाल ने यह अनुभव किया कि केबोर' और 'परिवर्तन' जैसे गैर सरकारी संगठनों की सफलता की अपनी सीमाएँ हैं। इसलिए इन्होंने दूसरे सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने वर्ष 2011 में जनलोकपाल बिल को माँग कर रहे और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले अन्ना हजारे का भी समर्थन किया। इस दौरान उनकी गिरफ्तारी हुई और उन्हें जेल भी जाना पड़ा। वर्ष 2012 तक केजरीवाल अन्ना हजारे द्वारा शुरू किए गए भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का प्रमुख चेहरा बन चुके थे। बाद में, केन्द्र सरकार ने आन्दोलन से प्रभावित होते हुए जनलोकपाल बिल का मसौदा तैयार किया, लेकिन केजरीवाल सहित अन्य कार्यकर्ता 'कमजोर' लोकपाल बिल से खुश नहीं हुए। इसका नतीजा यह हुआ कि अरविंद केजरीवाल ने राजनीति में आने का फैसला किया और नवम्बर 2012 में उन्होंने औपचारिक रूप से ‘आम आदमी पार्टी' (आप) की स्थापना की। केजरीवाल ने न केवल राजनीति में प्रवेश किया बल्कि वर्ष 2018 में होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी चुनाव लड़ने का फैसला लिया। 'आम आदमी पार्टी की धारणा 'आम आदमी पार्टी ने अपने नाम से ही दिल्ली की आम जनता को आकर्षित किया। भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से उपजी यह पाटी आम आदमी को सीधे-सीधे प्रभावित करने वाले मुद्दों जैसे-भ्रष्टाचार, महँगाई, सुरक्षा आदि पर खड़ी हुई थी, जिसमें युवाओं ने भरपूर समर्थन दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि दिसम्बर 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में पूरे आत्मविश्वास के साथ चुनावों में उतरी। दिल्ली के ये चुनाव निकट भविष्य में एक बड़े बदलाव की आहट थे। एक साल के राजनीतिक अनुभव वाली नई पार्टी ने दिल्ली में 15 वर्षों से सत्ता में रही कांग्रेस को महज 8 सीटों पर सीमित कर दिया। यहाँ तक की केजरीवाल ने नई दिल्ली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते हुए तीन बार दिल्ली की मुख्यमन्त्री रहीं शीला दीक्षित को उन्हीं की सीट 'नई दिल्ली से उनको भारी अन्तर से पराजित किया। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी 31 सीटों के बाद सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी लेकिन 28 सीटों के साथ आप भी अधिक पीछे नहीं थीं। अंततः आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के सहयोग से गठबन्धन की सरकार बनाई। इस दौरान आपने अपने वादों के अनुरूप थोड़े-बहुत काम अवश्य किए, लेकिन दिल्ली की जनता को तब बड़ा झटका लगा जब केवल 49 दिन के बाद अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमन्त्री पद से यह कहकर इस्तीफा दे दिया कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी सत्ताधारी पार्टी से सहयोग नहीं कर रही हैं और इसीलिए उनकी पार्टी जन लोकपाल बिल पारित नहीं करा सकी। इसके बाद उनकी लोकप्रियता में बहुत कमी आ गई। दिल्ली की जनता ने उन्हें उनके वादों के आधार पर वोट दिया था, लेकिन उनके इस्तीफे से लोगों में यह सन्देश गया कि वह अपने वादों को पूरा करने में सक्षम नहीं है। आप ने 2014 के लोकसभा चुनावों में भी पूरे देश में 400 सीटों पर चुनाव लड़ा पर वहाँ भी उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। यह वक्त पार्टी नेता अरविन्द केजरीवाल के लिए काफी मुश्किल था। उनकी पार्टी का भविष्य दाँव पर था, लेकिन कहते हैं न कि इनसान की परीक्षा कठिन समय में ही होती है। उन्होंने साहस बनाए रखा और अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं में भी नया उत्साह भरा। अपनी कमियों को पहचानते हुए गलतियों के लिए जनता से माफी माँगी। भ्रष्टाचार मुक्त शासन का सपना देखने वाली जनता पर इसका असर हुआ और फरवरी 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में वह ऐतिहासिक जीत आप की झोली में आई, जिसकी खुद आप नेताओं को भी उम्मीद नहीं थी। उपसंहार इन चुनावों में आप पार्टी को 70 में से 67 सीटें मिली जबकि राष्ट्रपति शासन लगने से पूर्व हुए चुनावों में पार्टी को बहुमत भी नहीं मिला था । प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा महज 3 सीटों पर सिमट गई तो सबसे अधिक अनुभवी पार्टी कांग्रेस को पूरी दिल्ली में एक भी सोट नसीब नहीं हुई। यह पहली बार हुआ है कि किसी पार्टी को 54% वोट मिले हों और वह 95% से ज्यादा सीटों पर जीती हो। अरविन्द केजरीवाल न केवल जनता का भरोसा जीता बल्कि बड़ी राजनीतिक पार्टियों को भी आईना दिखा दिया। इस प्रकार आज अरविन्द केजरीवाल सभी के लिए आदर्श नेता बन गए हैं।
🎯 Exam Tip: अरविंद केजरीवाल के सामाजिक कार्यों, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, 'आम आदमी पार्टी' की स्थापना और राजनीतिक सफर पर प्रकाश डालना महत्वपूर्ण है।
10. डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम
संकेत विन्दु भूमिका, विज्ञान के क्षेत्र में प्राप्त उपलब्धियाँ, डॉ. कलाम को सम्मानित किए गए सम्मान, राष्ट्रपति के रूप में, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, उपसंहार। भूमिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, जिनका पूरा नाम अबुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम हैं, का जन्म 15 अक्टूबर, 1931 को तमिलनाडु राज्य में स्थित रामेश्वरम् के धनुषकोडी नामक स्थान में एक मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवार में हुआ था। वे अपने पिता के साथ मस्जिद में नमाज़ पढ़ने जाते हुए रास्ते में पड़ने वाले शिव मन्दिर में भी माथा नवाते। इसी गंगा-जमुनी संस्कृति के बीच कलाम ने धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ा। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने एवं घर के खर्चे में योगदान के लिए अखबार बेचने पड़ते थे। इसी तरह, संघर्ष करते हुए प्रारम्भिक शिक्षा रामेश्वरम् के प्राथमिक स्कूल से प्राप्त करने के बाद उन्होंने रामनाथपुरम् के श्वार्ज हाईस्कूल से मैट्रिकलेशन किया। इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए तिरुचिरापल्ली चले गए। वहाँ के सेंट जोसेफ कॉलेज से उन्होंने बीएससी की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 1957 में एम आई टी से वैमानिकी इंजीनियरी में डिप्लोमा प्राप्त किया। अन्तिम वर्ष में उन्हें एक परियोजना दी गई, जिसमें उन्हें 30 दिनों के अन्दर विमान का एक डिज़ाइन तैयार करना था, अन्यथा उनकी छात्रवृत्ति रुक जाती। कलाम ने इसे निर्धारित अवधि में पूरा किया। उन्होंने तमिल पत्रिका 'आनन्द विकटन' में अपना विमान स्वयं बनाएँ' शीर्षक से एक लेख लिखा, जिसे प्रथम स्थान मिला। बीएससी के बाद वर्ष 1958 में उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त की। विज्ञान के क्षेत्र में प्राप्त उपलब्धियाँ अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. कलाम ने हावरक्राफ्ट परियोजना एवं विकास संस्थान में प्रवेश किया। इसके बाद वर्ष 1962 में वे भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन में आए, जहाँ उन्होंने सफलतापूर्वक कई उपग्रह प्रक्षेपण परियोजनाओं में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहाँ रहकर उन्होंने थुम्बा में रॉकट इंजीनियरी डिविजन की स्थापना की। उनको उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें 'नासा' में प्रशिक्षण हेतु भेजा गया। नासा से लौटने के पश्चात् वर्ष 1963 में उनके निर्देशन में भारत का पहला रॉकेट 'नाइक अपाची' छोड़ा गया। 20 नवम्बर, 1967 को 'रोहिणी-75' रॉकिट का सफल प्रक्षेपण उन्हीं के निर्देशन में हुआ । परियोजना निदेशक के रूप में भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 के निर्माण में भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई । इसी प्रक्षेपण यान से जुलाई, 1980 में रोहिणी उपग्रह का अन्तरिक्ष में सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया गया । वर्ष 1982 में वे भारतीय रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन में वापस निदेशक के तौर पर आए तथा अपना सारा ध्यान गाइडेड मिसाइल के विकास पर केन्द्रित किया। अग्नि मिसाइल एवं पृथ्वी मिसाइल के सफल परीक्षण का श्रेय भी काफी हद तक उन्हीं को जाता हैं। जुलाई, 1992 में वे भारतीय रक्षा मन्त्रालय में वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त हुए। उनकी देख-रेख में भारत ने 11 मई, 1998 को पोखरण में अपना दूसरा सफल परमाणु परीक्षण किया और परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों की सूची में शामिल हुआ । वैज्ञानिक के रूप में कार्य करने के दौरान अलग-अलग प्रणालियों को एकीकृत रूप देना उनकी विशेषता थी। उन्होंने अन्तरिक्ष एवं सामरिक प्रौद्योगिकी का उपयोग कर नए उपकरणों का निर्माण भी किया। डॉ. कलाम को सम्मानित किए गए सम्मान डॉ. कलाम की उपलब्धियों को देखते हुए वर्ष 1981 में भारत सरकार ने उन्हें 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया, इसके बाद वर्ष 1990 में उन्हें पद्म विभूषण' भी प्रदान किया गया उन्हें विश्वभर के 30 से अधिक विश्वविद्यालयों ने डॉक्टरेट की मानद उपाधि से विभूषित किया । वर्ष 1997 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रल' से सम्मानित किया। उन्हें एस्ट्रोनॉटिकल सोसायटी ऑफ़ इण्डिया का आर्यभट्ट पुरस्कार तथा राष्ट्रीय एकता के लिए इन्दिरा गाँधी पुरस्कार भी प्रदान किया गया है। वे ऐसे तीसरे राष्ट्रपति हैं, जिन्हें यह सम्मान राष्ट्रपति बनने से पूर्व ही प्राप्त हुआ है। अन्य दो राष्ट्रपति हैं— सर्वपल्ली राधाकृष्णन एवं डॉक्टर जाकिर हुसैन । राष्ट्रपति के रूप में वर्ष 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन सरकार ने डॉक्टर कलाम को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया। विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भी उनका समर्थन किया और 18 जुलाई, 2002 को उन्हें 90% बहुमत द्वारा भारत का राष्ट्रपति चुना गया। इस तरह उन्होंने 25 जुलाई, को ग्यारहवें राष्ट्रपति के रूप में अपना पदभार ग्रहण किया। उन्होंने इस पद को 25 जुलाई, 2007 तक सुशोभित किया। वे राष्ट्रपति भवन को सुशोभित करने वाले प्रथम वैज्ञानिक हैं, साथ ही वे प्रथम ऐसे राष्ट्रपति भी हैं, जो अविवाहित रहे। राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल में उन्होंने कई देशों का दौरा किया एवं भारत का शान्ति का सन्देश दुनियाभर को दिया। इस दौरान उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया एवं अपने व्याख्यानों द्वारा देश के नौजवानों का मार्गदर्शन करने एवं उन्हें प्रेरित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। बहुमुखी प्रतिभा के धनी सीमित संसाधनों एवं कठिनाइयों के होते हुए भी उन्होंने भारत को अन्तरिक्ष अनुसन्धान एवं प्रक्षेपास्त्रों के क्षेत्र में एक ऊँचाई प्रदान की। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने तमिल भाषा में अनेक कविताओं की रचना भी की है, जिनका अनुवाद विश्व की कई भाषाओं में हो चुका है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने कई प्रेरणास्पद पुस्तकों की भी रचना की है। भारत 2020 : नईं सहस्राब्दि के लिए एक दृष्टि', 'इग्नाइटेड माइण्ड्स : अनलीशिंग द पावर विदिन इण्डिया', 'इण्डिया मोइ ड्रीम', 'विंग्स ऑफ फायर', 'माइ जन', 'महाशक्ति भारत', 'अदम्य साहस', 'छुआ आसमान', 'भारत की आवाज', 'टर्निग प्वाइण्ट' आदि उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। 'विंग्स ऑफ़ फ़ायर' उनकी आत्मकथा है, जिसे उन्होंने भारतीय युवाओं को मार्गदर्शन प्रदान करने वाले अन्दाज में लिखा है। उनकी पुस्तकों का कई भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उनका मानना है कि भारत तकनीकी क्षेत्र में पिछड़ जाने के कारण ही अपेक्षित उन्नति शिखर पर नहीं पहुँच पाया है, इसलिए अपनी पुस्तक “भारत 2020 : नई सहस्राब्दि के लिए एक दृष्टि' के द्वारा उन्होंने भारत के विकास स्तर को वर्ष 2020 तक विज्ञान के क्षेत्र में अत्याधुनिक करने के लिए देशवासियों को एक विशिष्ट दृष्टिकोण प्रदान | किया। यही कारण है कि वे देश को नई पीढ़ी के लोगों के बीच काफी लोकप्रिय रहे हैं। उपसंहार 80 वर्ष से अधिक आयु के होने के बावजूद वे समाज सेवा एवं अन्य कार्यों में खुद को व्यस्त रखते थे। शिक्षकों के प्रति डॉ. कलाम के हृदय में बहुत सम्मान था। राष्ट्रपति के पद से सेवानिवृत्त होने के पश्चात् वे देशभर में अनेक शिक्षण संस्थानों में ज्ञान बाँटते रहे, यहाँ तक कि 27, जुलाई, 2015 की शाम को भी उन्होंने अपनी अन्तिम साँस शिलांग में इण्डियन इंस्टीटयट ऑफ मैनेजमेण्ट के विद्यार्थियों से बात करते ली अर्थात् अन्तिम साँस में भी वह शिक्षक के रूप में रहे। वे भारत के सर्वधर्मसद्भावना के साक्षात् प्रतीक हैं। वे कुरान एवं भगवद्गीता दोनों का अध्ययन करते थे। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि भारतवासी उनके जीवन एवं उनके कार्यों से प्रेरणा प्रहण कर वर्ष 2020 तक भारत को सम्पन्न देशों की श्रेणी में ला खड़ा करने के उनके सपने को साकार करेंगे। उनके द्वारा कही निम्न पंक्तियों सभी को प्रेरणा देती “सपने वह नहीं होते जो आप नींद में देखते हैं। सपने तो वह हैं जो आपको सोने नहीं देते।”
🎯 Exam Tip: डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के जीवन, विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान, सम्मान और राष्ट्रपति के रूप में उनके कार्यकाल का विस्तार से वर्णन करना महत्वपूर्ण है।
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