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Download Solutions: Chapter 7 नायक वही परिवर्तन बाप की परत (Class 12 Sahityik Hindi UP Board)
नौका विहार / परिवर्तन / बापू के प्रति – जीवन/साहित्यिक परिचय
प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार कवियों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। जिनमें से एक का उत्तर देना होता है। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।
जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ
सुकुमार भावनाओं के कवि सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म हिमालय के सुरम्य प्रदेश कुर्माचल (कुमाऊँ) के कौसानी नामक ग्राम में 20 मई, 1900 को हुआ था। हाईस्कूल में अध्ययन के लिए वे अल्मोड़ा के राजकीय हाईस्कूल में प्रविष्ट हुए। यहीं पर उन्होंने अपना नाम गुसाईं दत्त से बदलकर सुमित्रानन्दन पन्त रखा। इलाहाबाद के म्योर सेण्ट्रल कॉलेज में प्रवेश लेने के बाद गाँधीजी के आह्वान पर उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया। फिर स्वाध्याय से ही अंग्रेजी, संस्कृत और बांग्ला साहित्य का गहन अध्ययन किया।
उपनिषद्, दर्शन तथा आध्यात्मिक साहित्य की ओर उनकी रुचि प्रारम्भ से ही थी। इलाहाबाद (प्रयाग) वापस आकर 'रुपाभा' पत्रिका का प्रकाशन करने लगे। बीच में प्रसिद्ध नर्तक उदयशंकर के सम्पर्क में आए और फिर उनका परिचय अरविन्द घोष से हुआ। इनके दर्शन से प्रभावित पन्त जी ने अनेक काव्य संकलन स्वर्ण किरण, स्वर्ण धूलि, उत्तरा आदि प्रकाशित किए। वर्ष 1961 में उन्हें पद्मभूषण सम्मान, 'कला एवं बूढा चाँद' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार, 'लोकायतन' पर सोवियत भूमि पुरस्कार तथा 'चिदम्बरा' पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। 28 दिसम्बर, 1977 को प्रकृति के सुकुमार कवि पन्त जी प्रकृति की गोद में ही विलीन हो गए।
साहित्यिक गतिविधियाँ
छायावादी युग के प्रतिनिधि कवि सुमित्रानन्दन पन्त ने सात वर्ष की आयु में ही कविता लेखन करना प्रारम्भ कर दिया था। उनकी प्रथम रचना वर्ष 1916 में आई, उसके बाद वर्ष 1919 में उनकी काव्य के प्रति रुचि और बढ़ गई। पन्त जी के काव्य में कोमल एवं मृदुल भावों की अभिव्यक्ति होने के कारण इन्हें प्रकृति का सुकुमार कवि' कहा जाता है। इनकी निम्नलिखित रचनाएँ उल्लेखनीय हैं।
कृतियाँ
काव्य रचनाएँ
यीणा (1919), ग्रन्थि (1920), पल्लव (1926), गुंजन (1932), युगान्त (1987), युगवाणी (1938), ग्राम्या (1940), स्वर्ण-किरण (1947), युगान्तर (1948), उत्तरा (1949), चिदम्बरा (1958), कला और बूढा चाँद (1959), लोकायतन आदि।
गीति-नाटय
ज्योत्स्ना, रजत शिखर, अतिमा (1955)
उपन्यास
हार (1960)
कहानी संग्रह
पाँच कहानियाँ (1938)
काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष
1. सौन्दर्य के कवि सौन्दर्य के उपासक पन्त की सौन्दर्यानुभूति के तीन मुख्य केन्द्र प्रकृति, नारी एवं कला हैं। उनका सौन्दर्य प्रेमी मन प्रकृति को देखकर विभोर हो उठता है। वीणा, ग्रन्थि, पल्लव आदि प्रारम्भिक कृतियों में प्रकृति का कोमल रूप परिलक्षित हुआ है। आगे चलकर 'गुंजन' आदि काव्य रचनाओं में कवियर पन्त का प्रकृति-प्रेम मांसल बन जाती है और नारी सौन्दर्य का चित्रण करने लगता हैं। 'पल्लव', एवं 'गुंजन' में प्रकृति और नारी मिलकर एक हो गए हैं।
2. कल्पना के विविध रूप व्यक्तिवादी कलाकार के समान अन्तर्मुखी बनकर अपनी कल्पना को असीम गगन में खुलकर विचरण करने देते हैं।
3. रस चित्रण पन्त जी का प्रिय रस गार है, परन्तु उनके काव्य में शान्त, अद्भुत, करुण, रौद्र आदि रसों का भी सुन्दर परिपाक हुआ है।
कला पक्ष
1. भाषा पन्त जी की भाषा चित्रात्मक है। साथ ही उसमें संगीतात्मकता के गुण भी विद्यमान हैं। उन्होंने कविता की भाषा एवं भावों में पूर्ण सामंजस्य पर बल दिया है। उनकी प्रकृति सम्बन्धी कविताओं में चित्रात्मकता अपनी चरम सीमा पर दिखाई देती है। कोमलकान्त पदावली से युक्त सहज खड़ी बोली में पद-लालित्य का गुण विद्यमान है। उन्होंने अनेक नए शब्दों का निर्माण भी किया; जैसे-टलमल, रलमल आदि। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ एवं परिमार्जित है, जिसमें एक सहज प्रवाह एवं अलंकृति देखने को मिलती है।
2. शैली पन्त जी की शैली में छायावादी काव्य शैली की समस्त विशेषताएँ: जैसे-लाक्षणिकता, प्रतीकात्मकता, ध्वन्यात्मकता, चित्रात्मकता, सजीव एवं मनोरम बिम्ब-विधान आदि पर्याप्त रूप से विद्यमान हैं।
3. छन्द एवं अलंकार पन्त जी ने नवीन छन्दों का प्रयोग किया। मुक छन्दों का विरोध किया, क्योंकि वे उसकी अपेक्षा तुकान्त छन्दों को अधिक सक्षम मानते थे। उन्होंने छन्द के बन्धनों का विरोध किया। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अन्योक्ति जैसे अलंकार उन्हें विशेष प्रिय थे। वे उपमाओं की लड़ी बाँधने में अत्यन्त सक्षम थे। उन्होंने मानवीकरण एवं ध्वन्यर्थ-व्यंजना जैसे पाश्चात्य अलंकारों के भी प्रयोग किए।
हिन्दी साहित्य में स्थान
सुमित्रानन्दन पन्त के काव्य में कल्पना एवं भावों की सुकुमार कोमलता के दर्शन होते हैं। पन्त जी सौन्दर्य के उपासक थे। वे युगद्रष्टा व युगस्रष्टा दोनों हीं थे। वे असाधारण प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार थे। छायावाद के युग प्रवर्तक कवि के रूप में उनकी सेवाओं को सदा याद किया जाता रहेगा।
पद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-पत्र में पद्म भाग से दो पद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे।
नौका विहार
Question 1. शान्त, स्निग्ध ज्योत्स्ना उज्ज्वल! अपलक अनन्त नीरव भूतल ! सैकत शय्या पर दुग्ध धवल, तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म विरल, लेटी है श्रान्त, क्लान्त, निश्चल! तापस-बाला गंगा निर्मल, शशिमुख से दीपित मृदु करतल, लहरें उर पर कोमल कुन्तल! गोरे अंगों पर सिहर-सिहर, लहराता तार-तरल सुन्दर चंचल अंचल-सा नीलाम्बर! साड़ी की सिकुड़न-सी जिस पर, शशि की रेशमी विभा से भर सिमटी हैं वर्तुल, मृदुल लहर!उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
(i) प्रस्तुत पद्यांश किस कविता से उद्धत है तथा इसके कवि कौन हैं?
Answer: प्रस्तुत पशि 'नौका विहार' कविता से उदधत है तथा इसके कवि प्रकृति के सुकुमार कवि 'सुमित्रानन्दन पन्त' हैं।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने किसका उल्लेख किया है?
Answer: प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने चाँदनी रात में किए गए भौका विहार का चित्रण किया है। इसमें कवि ने गंगा की कल्पना का उल्लेख नायिका के रूप में किया है।
(iii) प्रस्तुत पद्मांश में कवि ने अपने आसपास कैसे वातावरण का वर्णन किया हैं?
Answer: कवि के अनुसार चारों ओर शान्त, तरल एवं उज्वल चाँदनी छिटकी हुई है। आकाश टकटकी बोधे पृथ्वी को देख रहा है। पृथ्वी अत्यधिक शान्त एवं शब्दरहित है। ऐसे मनोहर एवं शान्त वातावरण में क्षीण धार वाली गंगा बालू के बीच मन्द-मन्द बह रही है।
(iv) गंगा बालू के बीच बहती हुई कैसी प्रतीत हो रही हैं?
Answer: गंगा बालू के बीच बहती हुई ऐसी प्रतीत हो रही है, मानो कोई छरहरे, दुबले-पतले शरीर वाली सुन्दर युवती दूध जैसी सफेद शय्या पर गर्मी से व्याकुल होकर थकी, मुरझाई एवं शान्त लेटी हुई हो।
(v) 'नीलाम्बर' का समास-विग्रह करते हुए भेद बताएँ।
Answer: नीलाम्बर-नीला है जो अम्बर (कर्मधारय समास)।
In simple words: यह पद्यांश 'नौका विहार' कविता से लिया गया है और सुमित्रानन्दन पन्त इसके कवि हैं। इसमें कवि चाँदनी रात में गंगा नदी के नौका विहार का वर्णन कर रहे हैं, जहाँ गंगा को एक थक चुकी नायिका के रूप में चित्रित किया गया है और वातावरण अत्यन्त शान्त व सुन्दर है।
🎯 Exam Tip: पद्यांश के कवि और कविता का नाम याद रखना महत्वपूर्ण है, साथ ही वर्णन की प्रमुख विशेषताओं को सटीक शब्दों में प्रस्तुत करना चाहिए।
Question 2. जब पहुँची चपला बीच धार छिप गया चाँदनी का कगार ! दो बाँहों से दूरस्थ तीर धारा का कृश कोमल शरीर आलिंगन करने को अधीर ! अति दूर, क्षितिज पर विटप-माल लगती भू-रेखा-सी अराल, अपलक नभ, नील-नयन विशाल, माँ के उर पर शिशु-सा, समीप, सोया धारा में एक द्वीप, उर्मिल प्रवाह को कर प्रतीप, वह कौन विहग? क्या विकल कोक, उड़ता हरने निज विरह शोक? छाया को कोकी का विलोक !उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने प्राकृतिक दृश्यों का चित्र किस प्रकार किया हैं?
Answer: प्रस्तुत पद्मांश में कवि ने नौका-विहार करते हुए दोनों तटों के प्राकृतिक दृश्यों एवं द्वीप और समुद्र का अपनी सूक्ष्म कल्पनाओं द्वारा वर्णन किया है। साथ-ही-साथ गंगा नदी के सौन्दर्य को अति रंजित करने का प्रयास किया है।
(ii) नौका-विहार के समय कवि को दूर से दिखने वाले तट कैसे प्रतीत हो रहे हैं?
Answer: जब कवि की नाव गंगा के मध्य धार में पहुँचती है, तो वहाँ से चन्द्रमा की चाँदनी में चमकते हुए रेतीले तट स्पष्ट दिखाई नहीं देते हैं। कवि को दूर से दिखते दोनों किनारे ऐसे प्रतीत हो रहे हैं जैसे वे व्याकुल होकर गंगा की धारासपी नायिका के पतले कोमल शरीर का आलिंगन करना चाहते हों।
(iii) कवि को वृक्षों को देखकर कैसा प्रतीत हुआ?
Answer: कवि को दूर क्षितिज पर कतारबद्ध वृक्षों को देख ऐसा लग रहा है, मानो वे नीले आकाश के विशाल नेत्रों की तिरछी भौहें हैं और धरती को एकटक निहार रही हैं।
(iv) गंगा नदी के ऊपर पक्षी को उड़ता देख कवि ने क्या कल्पना की?
Answer: गंगा नदी के ऊपर एक पक्षी को उड़ते देख कवि ने कल्पना की कि कहीं यह चकवा तो नहीं है, जो भ्रमवश जल में अपनी ही छाया को चकमी समझ उसे पाने की चाह लिए विरह-वेदना को मिटाने हेतु व्याकुल होकर आकाश में उड़ता जा रहा है।
(v) ‘नयन' का सन्धि-विच्छेद करते हुए भेद बताइए।
Answer: नयन-ने + अन (अयादि सन्धि)।
In simple words: इस पद्यांश में कवि नौका विहार के दौरान गंगा के मध्य भाग में पहुँचने पर नदी के किनारों, दूर क्षितिज पर वृक्षों और उड़ते हुए पक्षी के दृश्य का वर्णन करते हैं, जिसमें किनारों को गंगा का आलिंगन करने को अधीर प्रेमी और वृक्षों को धरती को निहारती भौंहों के समान बताया गया है।
🎯 Exam Tip: प्राकृतिक तत्वों का मानवीकरण और उपमा अलंकारों का प्रयोग करते हुए कवि की कल्पना शक्ति का प्रदर्शन करें। समास-विग्रह जैसे व्याकरण के प्रश्न भी महत्वपूर्ण होते हैं।
परिवर्तन
Question 3. कहाँ आज वह पूर्ण पुरातन, वह सुवर्ण का काल? भूतियों का दिगन्त छवि जाल, ज्योति चुम्बित जगती का भाल? राशि-राशि विकसित वसुधा का वह यौवन-विस्तार? स्वर्ग की सुषमा जब साभार । धरा पर करती थी अभिसार! प्रसूनों के शाश्वत श्रृंगार, (स्वर्ण भूगों के गन्ध विहार) गूंज उठते थे बारम्बार सृष्टि के प्रथमोद्गार । नग्न सुन्दरता थी सुकुमार ऋद्धि औं सिद्धि अपार । अये, विश्व का स्वर्ण स्वप्न, संसृति का प्रथम प्रभात, कहाँ वह सत्य, वेद विख्यात? दुरित, दुःख दैन्य न थे जब ज्ञात, अपरिचित जरा-मरण भू-पात ।उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
(i) प्रस्तुत पद्यांश के शीर्षक तथा कवि का नामोल्लेख कीजिए।
Answer: प्रस्तुत पद्मांश 'परिवर्तन' नामक कविता से उदधृत है तथा इसके रचयिता प्रकृति के सुकुमार कवि 'सुमित्रानन्दन पन्त' जी हैं।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि ने किस ओर संकेत किया हैं?
Answer: कवि ने भारतवर्ष के वैभवपूर्ण और समृद्ध अतीत का उल्लेख करते हुए समय के साथ-साथ देश की भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों में होने वाले परिवर्तनों की ओर संकेत किया है।
(iii) कवि ने अतीत के वैभवपूर्ण व समृद्धशाली भारत की तुलना वर्तमान से किस प्रकार की हैं।
Answer: कवि के अनुसार आज हमारी समृद्धि और ऐश्वर्य विलुप्त हो चुके हैं, जो हमारे स्वर्णिम अतीत की पहचान थी। कभी हमारा देश सोने की चिड़िया कहलाता था, आज वह स्वर्ण युग विलुप्त सा हो गया है। इस प्रकार हमारे देश से ज्ञान, हरियाली इत्यादि भी समय-समय पर कम होती जा रही हैं।
(iv) कवि ने स्वर्णिम भारत का चित्रण किस रूप में किया है?
Answer: स्वर्णिम भारत में धरती के चारों और छाया हुआ सौन्दर्य उन्मुक्त और सुकुमार था। धरती अपूर्व वैभव और सुख-समृद्धि से पूर्ण थी। सचमुच वह वैभवशाली युग विश्व के स्वर्णिम स्वप्न का युग था। वह युग सृष्टि के प्रथम प्रभाव के समान आशा, उल्लास, सौन्दर्य व जीवन से परिपूर्ण था।
(v) “विश्व का स्वर्ण स्वप्न संसृति का प्रथम प्रभात" पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
Answer: इस पंक्ति में 'स' और 'प्र' वर्ण की आवृत्ति होने के कारण अनुप्रास अलंकार है।
In simple words: यह पद्यांश 'परिवर्तन' कविता से है, जिसके कवि सुमित्रानन्दन पन्त हैं। कवि इसमें भारत के गौरवशाली अतीत और वर्तमान की तुलना करते हुए बताते हैं कि कैसे समय के साथ देश का वैभव, समृद्धि, ज्ञान और प्राकृतिक सौन्दर्य कम होता जा रहा है।
🎯 Exam Tip: कविता के शीर्षक और कवि के नाम के साथ-साथ अतीत और वर्तमान की तुलना को स्पष्ट रूप से दर्शाना और अलंकारों की पहचान करना आवश्यक है।
Question 4. आज बचपन का कोमल गात। जरा का पीला पात। चार दिन सुखद चाँदनी रात और फिर अन्धकार, अज्ञात! शिशिर-सा झर नयनों का नीर झुलस देता गालों के फूल! प्रणय का चुम्बन छोड़ अधीर अधर जाते अधरों को भूल! मृदुल होठों का हिमजल हास उड़ा जाता नि:श्वास समीर; सरल भौंहों का शरदाकाश घेर लेते घन, घिर गम्भीर । शून्य साँसों का विधुर वियोग छुड़ाता अधर मधुर संयोग! मिलन के पल केवल दो चार, विरह के कल्प अपार!उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवि द्वारा परिवर्तनशीलता को किस प्रकार स्पष्ट किया गया है?
Answer: प्रस्तुत पद्यांश में कवि द्वारा विविध उदाहरणों के माध्यम से समय की परिवर्तनशीलता को स्पष्ट करते हुए उसकी शक्ति के प्रभाव को समझाने का प्रयास किया गया है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश में प्रेमी-प्रेमिका के माध्यम से दुःख के समय का वर्णन किस प्रकार किया गया है?
Answer: समय की परिवर्तनशीलता को स्पष्ट करते हुए कवि ने आँख से गिरते हुए आँसू की समानता पतझड़ के पीले पत्तों से की है। दुःख के क्षणों में गिरते रहने वाले आँसू, पुष्पों के समान गालों को इस प्रकार झुलसा देते हैं जैसे शिशिर की ओस फूल एवं पत्तों को झुलसा देती है। उस समय प्रेमी के अधर प्रणय के चुम्बनों को भूलकर अपने प्रिय के अधरों को भी भूल जाता है।
(iii) पद्मांश में कवि ने समय की परिवर्तनशीलता को स्पष्ट करने के लिए युवावस्था और वृद्धावस्था के समय का उल्लेख किस रूप में किया है?
Answer: कवि के अनुसार युवावस्था में जिन होंठों पर हमेशा ओस कणों-सी निर्मल और आकर्षण हँसी विद्यमान रहती है, वृद्धावस्था में वही होंठ गहरी साँसों को छोड़ने से मलिन पड़ जाते हैं और उनकी हँसी गायब हों। जाती है।
(iv) “मिलन का समय अल्प, जबकि वियोग का दीर्घ होता है-स्पष्ट कीजिए।
Answer: प्रस्तुत पद्यांश में स्पष्ट है कि मिलन के सुखद समय में प्रेमी-प्रेमिका के जो होंठ आपस में जुड़े होते हैं, वियोग के विकट समय में वही होंठ विरह-वेदना से व्याकुल हो उठते हैं। इस प्रकार मिलन का समय तो अल्प होता है, परन्तु वियोग दीर्घकालीन होता है अर्थात् सुख कुछ समय साथ रहकर चला जाता है, जबकि दुःख का प्रभाव देर तक बना रहता है।
(v) 'समीर' के चार पर्यायवाची शब्द लिखिए।
Answer: पवन, हवा, अनिल और वायु 'समीर' के पर्यायवाची हैं।
In simple words: इस पद्यांश में कवि जीवन में परिवर्तनशीलता का चित्रण कर रहे हैं, जहाँ बचपन की कोमलता वृद्धावस्था के पीलेपन में बदल जाती है। दुःख के क्षणों में आँसू गालों को झुलसा देते हैं और मिलन के सुखद पल क्षणिक होते हैं, जबकि वियोग बहुत लम्बा।
🎯 Exam Tip: मानवीय जीवन के विभिन्न चरणों में होने वाले परिवर्तनों का वर्णन करते समय उपमा और मानवीकरण अलंकारों का उचित प्रयोग करें। पर्यायवाची शब्द भी याद रखें।
Question 5. खोलता इधर जन्म लोचन मूदती उधर मृत्यु क्षण-क्षण अभी उत्सव औ हास हुलास अभी अवसाद, अश्रु, उच्छ्वास! अचरिता देख जगत् की आप शून्य भरता समीर निःश्वास, डालता पातों पर चुपचाप ओस के आँसू नीलाकाश, सिसक उठता समुद्र का मन, सिहर उठते उहुगन ! अहे निष्ठुर परिवर्तन ! तुम्हारा ही ताण्डव नर्तन विश्व का करुण विवर्तन! तुम्हारा ही नयनोन्मीलन, निखिल उत्थान, पतन! अहे वासुकि सहस्रफन! लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे चिह्न निरन्तर छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षःस्थल पर ! शत शत फेनोच्छ्वसित, स्फीत फूत्कार भयंकर घुमा रहे हैं घनाकार जगती को अम्बर मृत्यु तुम्हारा गरल दन्त, कंचुक कल्पान्तर अखिल विश्व ही विवर, वक्र-कुण्डल दिमण्डल ।उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
(i) प्रस्तुत पद्यांश द्वारा कवि ने संसार की परिवर्तनशीलता को किस प्रकार स्पष्ट किया है?
Answer: कवि संसार की परिवर्तनशीलता को स्पष्ट करते हुए कहता है कि इस मृत्युलोक में जन्म-मरण का चक्र सदा चलता ही रहता है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश में परिवर्तन को किसके समान बताया गया है?
Answer: प्रस्तुत पद्मांश में परिवर्तन को विनाशक तथा सप के राजा वासुकि के समान बताया गया है, क्योंकि इन सर्यों के विष के झागों से भरी हुई और सारे विश्व को अपनी लपेट में ले लेने वाली सैकड़ों भयंकर फैंकारें इस संसार के मेघों के आकार से परिपूर्ण आकार को निरन्तर घुमाती रहती हैं।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश में एक और सुख का वर्णन है तो दूसरी ओर दुःख का । स्पष्ट कीजिए।
Answer: कवि ने सुख के क्षण का वर्णन मानव धरती पर जन्म लेने से किया है, तो दुःख का वर्णन मृत्यु को प्राप्त होने वाले कितने ही लोगों द्वारा आँख मूंद लेने से किया है। इस प्रकार एक ओर जन्म पर हर्षोल्लास का उत्सव है तो वहीं दूसरी ओर मृत्यु के शोक में आँसू बहाए जाते हैं।
(iv) अचरिता देख जगत् की आप', 'शून्य भरता समीर निःश्वास” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
Answer: प्रस्तुत पंक्ति से आशय यह है कि जैसे संसार की क्षणिकता देख पवन दुःखी होकर आहे भरने लगी हैं तथा नीले आकाश से भी यह सब नहीं देखा जाता और वह व्यथित होकर अनुरूप में पेड़ की शाखा पर ओस की बूंदें टपकाने लगा है।
(v) “शत-शत फेनोवसित, स्फीत फूत्कार भयंकर' में कौन-सा अलंकार है?
Answer: प्रस्तुत पंक्ति में 'शत' शब्द की पुनरावृत्ति होने के कारण यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
In simple words: इस पद्यांश में कवि परिवर्तन को जन्म और मृत्यु के चक्र के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जहाँ एक पल खुशी तो अगले पल गम है। परिवर्तन को विनाशक वासुकि सर्प के समान बताया गया है, जिसके तांडव से विश्व में उत्थान और पतन का चक्र निरंतर चलता रहता है।
🎯 Exam Tip: परिवर्तन की विनाशकारी शक्ति और जन्म-मृत्यु के शाश्वत चक्र को स्पष्ट करने पर ध्यान दें। पंक्तियों के निहितार्थ और अलंकार की पहचान महत्वपूर्ण है।
बापू के प्रति
Question 1. तुम मांसहीन, तुम रक्तहीन
हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीन, तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल
हे चिर नवीन ! तुम पूर्ण इकाई जीवन की,
जिसमें असार भव-शून्य लीन, आधार अमर, होगी जिस पर
हे चिर पुराण!
भावी
की संस्कृति समासीन ।। तुम मांस, तुम्हीं हो रक्त-अस्थि
निर्मित जिनसे नवयुग का तन, तुम धन्य ! तुम्हारा निःस्व
त्याग
हे विश्व भोग का वर साधन; इस भस्म-काम तन की रज से,
जग पूर्ण काम नव जगजीवन, बीनेगा सत्य-
अहिंसा के
ताने-बानों से मानवपन!उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
(i) प्रस्तुत पद्यांश किस कविता से अवतरित है तथा इसके रचयिता कौन हैं?
Answer: प्रस्तुत पद्मांश 'बापू के प्रति' नामक कविता से अवतरित है तथा इसके रचयिता प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त' जी हैं।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
Answer: प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के आदर्शों को भारतीय संस्कृति का वाहक बताया हैं तथा कवि ने गाँधी जी को सत्य और अहिंसा की प्रतिमूर्ति मानकर उनके बताए गए आदर्शों पर चलने की कामना व्यक्त की है।
(iii) कवि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को नमन करते हुए क्या कह रहे हैं?
Answer: कवि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को नमन करते हुए कहते हैं कि हे महात्मन ! तुम्हारे शरीर में मांस और रक्त का अभाव है। तुम हड्डियों का ढाँचा मात्र हो । तुम्हें देख ऐसा आभास होता है कि तुम पवित्रता एवं उत्तम ज्ञान से परिपूर्ण केवल आत्मा हो । हे प्राचीन संस्कृतियों के पोषक! तुम्हारे विचारों में प्राचीन व नवीन दोनों आदर्शों का सार विद्यमान है।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने राष्ट्रपिता को नवयुग के रूप में किस प्रकार प्रस्तुत किया हैं?
Answer: कवि राष्ट्रपिता को नवयुग के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि हे बापू! तुम नवयुग के आदर्श हो, जिस प्रकार शरीर के निर्माण में मांस, रक्त और अरिथ की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, उसी प्रकार नवयुग के निर्माण में तुम्हारे सआदशों की अमूल्य योगदान है।।
(v) 'तन' शब्द के चार पर्याय लिखिए।
Answer: : देह, अंग, काया, गात तन के पर्यायवाची शब्द हैं।
In simple words: यह पद्यांश 'बापू के प्रति' कविता से है और सुमित्रानन्दन पन्त इसके कवि हैं। इसमें कवि महात्मा गाँधी के भौतिक शरीर के त्याग और उनके सत्य व अहिंसा के आदर्शों की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि बापू ही नए युग के निर्माण के आधार हैं।
🎯 Exam Tip: महात्मा गाँधी के आदर्शों, उनके त्याग और नए भारत के निर्माण में उनकी भूमिका को स्पष्ट रूप से समझाएँ। पर्यायवाची शब्दों पर भी ध्यान दें।
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