UP Board Solutions Class 12 Psychology Chapter 9 Group Tension

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Detailed Chapter 9 समूह तनाव UP Board Solutions for Class 12 Psychology

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Class 12 Psychology Chapter 9 समूह तनाव UP Board Solutions PDF

UP Board Solutions Class 12 Psychology Chapter 9 Group Tension

UP Board Solutions For Class 12 Psychology Chapter 9 Group Tension (समूह-तनाव)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. समूह-तनाव (Group Tension) से आप क्या समझते हैं? समूह-तनाव की उत्पत्ति के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए। या समूह-तनाव से आप क्या समझते हैं? समूह तनाव के लिए उत्तरदायी कारकों को स्पष्ट कीजिए। या समूह-तनाव के लिए उत्तरदायी चार कारणों के बारे में लिखिए।
Answer: भूमिका
(Introduction)
मनुष्य को समूह में रहने वाले एक सामाजिक प्राणी के रूप में स्वीकार किया जाता है। प्रत्येक समाज में समूहों का निर्माण विभिन्न आधारों पर होता है; जैसे-धर्म, जाति, सम्प्रदाय, वर्ग, क्षेत्र, भाषा, व्यवसाय, आवास, आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक स्तर आदि । 'तनाव' (Tension) एक प्रकार की मानसिक अवस्था है, जो व्यक्ति और समूह दोनों में पायी जाती है। कोलमैन के अनुसार, “मनोवैज्ञानिक अर्थों में तनाव, दबाव, बेचैनी तथा चिन्ता की अनुभूति है।” सामाजिक विघटन की क्रिया में भीतरी तनावों के कारण समाज के अंग टूटकर अलग होने लगते हैं। और उनकी प्रगति रुक जाती है। समूहों के बीच इस स्थिति को 'समूह-तनाव (Group Tension) कहते हैं।
समूह-तनाव का अर्थ
(Meaning of Group Tension)
समूह-तनाव उस स्थिति का नाम है जिसमें समाज का कोई वर्ग, सम्प्रदाय, धर्म, जाति या राजनीतिक दल-दूसरे के प्रति भय, ईर्ष्या, घृणा तथा विरोध से भर जाता है। ऐसी दशा में उन दोनों समूहों में सामाजिक तनाव उत्पन्न हो जाता है। इन समूहों में यह तनाव अलगाव की भावना के कारण उत्पन्न होता है, जिसके परिणामस्वरूप कोई समाज या राष्ट्र छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो जाता है। आज दुनियाभर के समाज इस प्रकार के समूह-तनाव के शिकार हैं, जिनके कारण मानव सभ्यता मार-काट, विद्रोह और युद्ध की त्रासदी से गुजर रही है। अमेरिका में अमेरिकन तथा हब्शी, दक्षिणी अफ्रीका में श्वेत और अश्वेत प्रजातियाँ, हिटलर के समय में जर्मन और यहूदी-इन समूहों के बीच तनाव विश्वस्तरीय समूह-तनाव के उदाहरण हैं। हमारे देश भारत में हिन्दू-मुसलमानों के बीच, उत्तरी एवं दक्षिणी भारतीयों के बीच, ऊँची और नीची जातियों के बीच, विभिन्न भाषा-भाषियों के बीच, समूह-तनाव 177 राजनीतिक दलों के बीच तथा मालिकों व श्रमिकों के बीच अक्सर ही समूह-तनाव उत्पन्न हो जाता है। इन तनावे की परिस्थितियों से न केवल हमारी राष्ट्रीय एकता क्षीण होती है, अपितु राष्ट्रीय शक्ति का भी अपव्यय होता है।
समूह-तनाव के विभिन्न प्रकार अथवा रूप
(Different kinds of Group Tension)
भारत एक विशाल देश है जिसमें अनेक प्रकार की जातियाँ, सम्प्रदाय, वर्ग तथा विविध भाषा-भाषी लोग विभिन्न क्षेत्रों में निवास करते हैं। इन्हीं के आधार पर हमारे भारतीय समाज में समूह-तनाव के ये चार प्रमुख स्वरूप या प्रकार पाये जाते हैं-
1. जातिगत समूह-तनाव,
2. साम्प्रदायिक समूह-तनाव,
3. क्षेत्रीय समूह-तनाव तथा
4. भाषागत समूह-तनावे ।
समूह-तनाव के कारण
(Causes of Group Tension)
समूह-तनाव के अनेक कारण हैं। जाति, वर्ग, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्र, भाषा, संस्कृति तथा सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक स्थिति आदि विभिन्न आधारों को लेकर समूह निर्मित हो जाते हैं। इन समूहों के निहित स्वार्थ तथा क्षुद्र मानसिकता के कारण पारस्परिक द्वेष तथा विरोध पनपते हैं जिनसे समूह-तनाव उत्पन्न हो जाता है। समूह-तनाव के विभिन्न कारणों को निम्नलिखित दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- (1) वातावरणीय कारण (2) मनोवैज्ञानिक कारण।
(1) वातावरणीय कारण (Environmental Causes) समूह-तनाचे को जन्म देने वाले प्रमुख वातावरणीय कारण निम्नलिखित हैं –
(i) ऐतिहासिक कारण- अनेक ऐतिहासिक कारण समूह-तनाव के लिए उत्तरदायी रहे हैं। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर मुसलमान, ईसाई तथा अन्य सम्प्रदायों के लोग बाहर से हमारे देश में आये । मध्यकाल में मुसलमान आक्रान्ताओं ने शक्ति और हिंसा के बल पर यहाँ के निवासियों का धर्म-परिवर्तन किया स्थान-स्थान पर मन्दिर लूटे और गिराये तथा उनकी जगह मस्जिदें बनायी गयीं। समय के साथ-साथ घाव भरते गये और हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतियों में समन्वय हुआ। ये दोनों जातियाँ भारत की आजादी के लिए एकजुट होकर लड़ीं, आजादी तो मिली किन्तु 'फूट डालो और राज्य करो की नीति का प्रयोग करके अंग्रेज शासक जाते-जाते हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य का जहर सींच गये। अधिकांश राजनीतिक दल अपनी स्वार्थ-सिद्धि हेतु देश की अनपढ़, भोली तथा धार्मिक अन्धविश्वासों से ग्रस्त जनता को पूर्वाग्रह तथा तनाव से भर देते हैं जिससे साम्प्रदायिक तनाव बढ़ता है और संवेदनशील इलाकों में दंगे भड़कते हैं। उत्तर प्रदेश में अयोध्या से सम्बन्धित रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद, ऐतिहासिक कारण का एक प्रमुख उदाहरण है।
(ii) भौतिक कारण - किसी भी देश के प्राकृतिक भू-भाग, वहाँ के निवासियों की शरीर-रचना, वेशभूषा, खानपानं इत्यादि किसी विशेष क्षेत्र की ओर संकेत करते हैं। पूरा देश पर्वत, नदियों, वन, पठार तथा रेगिस्तान आदि भौतिक परिस्थितियों के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में बँटा है। एक क्षेत्र के निवासी स्वयं को दूसरे से अलग समझने लगते हैं। विभिन्नता से उत्पन्न यह पृथकता ही पूर्वाग्रहों का कारण बनती है जिसके फलस्वरूप सामूहिक तनाव पैदा होते हैं।
(iii) सामाजिक कारण- समूह-तनाव की पृष्ठभूमि में अनेक सामाजिक कारण क्रियाशील होते हैं। दो वर्गों या सम्प्रदायों के बीच सामाजिक दूरी उनमें ऊँच-नीच की भावना में वृद्धि करती है जिससे विरोध तथा तनाव का जन्म होता है। हिन्दू और मुसलमानों के रीति-रिवाज, प्रथाएँ, परम्पराएँ, खान-पान तथा पोशाक कई प्रकार से एक-दूसरे से भिन्न हैं। हिन्दू गाय को पवित्र तथा माँ के समान मानते हैं, किन्तु मुस्लिम समुदाय में ऐसा नहीं है। दोनों वर्गों की ये विभिन्नताएँ उनकी विचारधाराओं को विपरीत दिशाओं में मोड़ देती हैं, जिसके परिणामस्वरूप समूह-तनाव पैदा होता है तथा साम्प्रदायिक उपद्रव होते हैं। इसी प्रकार हिन्दू समाज में ब्राह्मण सर्वोच्च तथा शूद्र निम्नतम सामाजिक स्थिति रखते । हैं। क्षत्रिय की अपेक्षा ब्राह्मण शूद्र को अपने से बहुत हीन तथा नीचा समझते हैं। प्रत्येक ऊँची स्थिति वाला वर्ग अपने से नीची स्थिति वाले वर्ग का शोषण एवं उत्पीड़न करता है। इससे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सामाजिक दूरी बढ़ती जाती है और पूर्वाग्रह उत्पन्न होते हैं। पूर्वाग्रहों के कारण विभिन्न समूहों में तनाव की दशाएँ पैदा होती हैं।
(iv) धार्मिक कारण- भारत विविध धर्मों का देश है। शायद यहाँ विश्व के सभी देशों से अधिक धार्मिक विभिन्नता देखने को मिलती है। धर्म को समझने का आधार वैज्ञानिक और विवेकपूर्ण न होने के कारण विभिन्न धर्मावलम्बियों में आपसी अविश्वास, द्वेष, भय, विरोध, सन्देह तथा घृणा का भाव उत्पन्न हो गया है। हर एक धर्मावलम्बी अपने धर्म-विशेष को सर्वश्रेष्ठ तथा दूसरों को निम्न कोटि का तथा व्यर्थ समझता है। एक धर्म के लोग दूसरे पर छींटाकशी तथा आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं। इससे पूर्वाग्रहों तथा अफवाहों को बल मिलता है जिससे उत्पन्न तनाव की परिस्थितियाँ साम्प्रदायिक संघर्षों में बदल जाती हैं।
(v) आर्थिक कारण- दुनियाभर में आर्थिक विषमता और शोषण के आधार पर दो सबसे बड़े वर्ग बने हैं-शोषक और शोषित । स्पष्टतः पूँजीपति लोग 'शोषक वर्ग' के अन्तर्गत आते हैं, जबकि श्रमिक या मजदूर लोग 'शोषित वर्ग' के अन्तर्गत । शोषक (पूँजीपति) वर्ग, शोषित (श्रमिक) वर्ग का हर प्रकार से शोषण करता है। श्रमिकों की खून-पसीने की कमाई का अधिकतम लाभांश पूँजीपति लोग चट कर जाते हैं। इससे दोनों वर्गों के मध्य मतभेद और तनाव पैदा होते हैं जिसकी चरमावस्था ही वर्ग-संघर्ष है।
(vi) राजनीतिक कारण- अनेक राजनीतिक समस्याओं तथा सत्ता हथियाने के उद्देश्य से विभिन्न राजनीतिक दल एक-दूसरे की कठोर-से-कठोर आलोचना किया करते हैं। प्रत्येक दल दूसरे दलों की प्रतिष्ठा गिराने तथा उन्हें असफल करने के इरादे से राजनीतिक षडयन्त्र रचता है। इन सभी बातों को लेकर एक़ राजनीतिक विचारधारा वाला समूह दूसरे समूहों के खिलाफ आन्दोलन चलाता है। जिससे तनाव पैदा होता है। सरकार द्वारा जनता के किसी वर्ग विशेष को प्रश्रय, अतिरिक्त लाभ या सुविधाएँ देने से भी यह समूह-तनाव उत्पन्न होता है।
(vii) सांस्कृतिक कारण – सांस्कृतिक अलगाव भी समूह-तनाव का एक विशेष कारण है। किसी समुदाय विशेष की संस्कृति के विभिन्न अवयव हैं-उसके रीति-रिवाज, प्रथाएँ, परम्पराएँ, कला, साहित्य, धर्म तथा भाषी इत्यादि । सांस्कृतिक भिन्नता के आधार पर एक वर्ग स्वयं को दूसरों से पृथक समझने लगता है जिसके परिणामस्वरूप समूह-तनाव उत्पन्न होता है जिसकी परिणति संघर्ष में होती है।
(2) मनोवैज्ञानिक कारण (Psychological Causes)
सामान्यतया लोगों की दृष्टि में धर्म, सम्प्रदाय, जाति, वर्ग, भाषा तथा संस्कृति आदि वातावरणीय कारण ही समूह-तनाव के लिए उत्तरदायी हैं, किन्तु सत्यता यह है कि इन कारणों के अतिरिक्त कुछ मनोवैज्ञानिक कारणों की भी विशिष्ट भूमिका समूह-तनाव बढ़ाने के लिए उत्तरदायी है। समूह-तनाव के लिए उत्तरदायी प्रमुख मनोवैज्ञानिक कारणों का वर्णन निम्नलिखित है –
(i) पूर्वाग्रह- पूर्वाग्रह या पूर्वधारणा (Prejudice) से तात्पर्य किसी व्यक्ति, समूह, वस्तु या विचार के विषय में पूर्णतया जाने बिना, उसके अनुकूल या प्रतिकूल, अच्छा या बुरा निर्णय पहले से ही कर लेने से है। जेम्स ड्रेवर के अनुसार, “निश्चित वस्तुओं, सिद्धान्तों, व्यक्तियों के प्रति अनुकूल या प्रतिकूल अभिवृत्ति को, जिनमें संवेग भी सम्मिलित रहते हैं, पूर्वाग्रह कहते हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि भले ही हमने किसी व्यक्ति, समूह, वर्ग या वस्तु की सत्यता जानने का प्रयास किया हो अथवा नहीं, लेकिन हम किन्हीं कारणों से उनके विषय में पहले ही एक धारणा बना लेते हैं। हमारी यह पूर्वधारणा या विचार किसी तर्क या विवेक पर आधारित नहीं होता और न ही हम उसके सम्बन्ध में तथ्यों की छानबीन ही करते हैं; हम तो उसके विषय में एक निर्णय धारण कर लेते हैं-यही पूर्वाग्रह या पूर्वधारणा है क्योकि सम्बन्धित व्यक्ति का समूचा व्यक्तित्व इन्हीं पूर्वधारणाओं या पूर्वाग्रहों से ओत-प्रोत रहता है। अतः वह इन्हीं से प्रेरित होकर व्यवहार प्रदर्शित करता है जो समूह-तनाव, साम्प्रदायिक दंगों, उपद्रवों तथा अन्तर्राष्ट्रीय अशान्ति को जन्म देती है। स्पष्टतः पूर्वाग्रह, समूह-तनांव का एक अति महत्त्वपूर्ण एवं मौलिक कारण है।
(ii) अभ्यनुकूलन- अभ्यनुकूलन (Conditioning) का सिद्धान्त पूर्वाग्रहों के निर्माण में सहायक होता है और इस प्रकार समूह-तनाव का एक प्रमुख कारण बनता है। व्यक्ति जब शुरू में कुछ व्यक्तियों या वस्तुओं से विशेष प्रकार के अनुभव प्राप्त करता है तो वह उन विशेषताओं का सामान्यीकरण कर लेता है और उसे जाति या वर्ग-विशेष की सभी वस्तुओं या व्यक्तियों पर लागू कर देता है। उदाहरणार्थ-किसी विशुद्ध आचरण वाले ब्राह्मण परिवार का एक बच्चा अण्डे के सेवन को निरन्तर एवं बार-बार अधार्मिक एवं पाप कहते सुनता है। लगातार एक ही प्रकार की बात सुनते-सुनते उसके मन पर अण्डे के बुरे होने की स्थायी छाप पड़ जाती है। अब वह प्रत्येक अण्डा खाने वाले को अधार्मिक या पापी समझेगा और उससे घृणा करेगा। इसी भाँति एक समूह-विशेष के लोग प्रायः अभ्यनुकूलित होकर दूसरे समूह के लोगों के प्रति द्वेष, घृणा या विद्रोह की भावना से भर उठते हैं, जिसके फलस्वरूप समूह-तनाव उत्पन्न होता है।
(iii) तादात्म्य एवं अन्तःक्षेपण- व्यक्ति जिस परिवेश के घनिष्ठ सम्पर्क में रहता है उससे सम्बन्धित वर्ग, जाति या समूह के अन्य लोगों से वह अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है और उनसे आत्मीकरण कर लेता है। समनर (Sumner) ने इसे 'अन्तःसमूह' (In-group) कहकर पुकारा कारा है और अन्य समूहों को बाह्य-समूह (Out-group) का नाम दिया है। इन अन्तःसमूहों तथा बाह्य-समूहों के मध्य संघर्ष, पूर्वधारणा को जन्म देता है। तादात्म्य एवं अन्तःक्षेपण की क्रिया से बनी यह पूर्वधारणा या पूर्वाग्रह ही समूह-तनाव का कारण बनती है।
(iv) सामाजिक दूरी- समाज के विभिन्न वर्गों में सामाजिक दूरी का होना भी तनाव की उत्पत्ति का कारण है। जब एक समूह के किसी दूसरे समूह के साथ किसी प्रकार के सम्बन्ध नहीं होते और उसके साथ सामाजिक व्यवहार भी नहीं होते तो इसे सामाजिक दूरी का नाम दिया जाता है। जिन समूहों में सामाजिक दूरी कम होती है उनमें प्रेम, मित्रता तथा निकट के सम्बन्ध स्थापित होते हैं, किन्तु जिनमें यह दूरी अधिक होती है उनमें पारस्परिक वैमनस्य तथा तनाव बढ़ते हैं। सामाजिक दूरी के अधिक होने से विभिन्न समूहों में तनाव उत्पन्न होते हैं।
(v) भ्रामक विश्वास, रूढ़ियाँ और प्रचार - विभिन्न विरोधी सम्प्रदायों में एक-दूसरे के प्रति भ्रामक रूढ़ियाँ, विश्वास तथा प्रचार चलते रहते हैं। रूढ़ियों का आधार साधारण रूप से परम्पराएँ होती हैं जिनके माध्यम से भ्रान्तिपूर्ण पूर्वधारणाओं का निर्माण होता है और ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में चलती जाती हैं। सामाजिक सम्पर्क के अभाव में इन रूढ़ियों तथा विश्वासों को दूर करना भी सम्भव नहीं होता। इसी के फलस्वरूप ये शनैः-शनैः तनाव का कारण बन जाते हैं। इसी प्रकार भ्रामक प्रचार भी तनाव के कारण । भारत-पाक युद्ध के दौरान पाकिस्तान भारत के विषय में भ्रामक प्रचार करता है जिससे भारत में रहने वाले हिन्दू-मुस्लिम सम्प्रदायों में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास एवं विद्वेष बढ़े और भारत में गृहयुद्ध छिड़ जाए।
(vi) मिथ्या-दोषारोपण- एक समूह द्वारा दूसरे समूह पर झूठे और मनगढ़न्त आरोप लगाना मिथ्या-दोषारोपण कहलाता है। इनका कोई तार्किक या वैज्ञानिक आधार नहीं होता। एक समूह अपने प्रतिद्वन्द्वी समूह को नीचा दिखाने के लिए उस पर मिथ्या-दोषारोपण करता है। इसमें अफवाहें, कार्टून, व्यंग्य, आर्थिक भेदभाव, कानून द्वारा सामाजिक-आर्थिक-प्रतिबन्ध लगाना, सम्पत्ति का विनाश तथा बेगारी करना इत्यादि सम्मिलित हैं। मिथ्या-दोषारोपण की क्रियाएँ उस समय अधिक प्रभावकारी हो जाती हैं जब एक वर्ग को यह भय सताने लगता है कि दूसरा वर्ग उससे आगे बढ़ जाएगा या अधिक शक्तिशाली बन जाएगा। इस प्रकार के व्यवहारों में एक उच्च समूह के लोग अपनी चिन्ताओं, भग्नाशाओं, निराशाओं तथा मानसिक संघर्षों को प्रक्षेपण सुरक्षा प्रक्रिया द्वारा अभिव्यक्त करते हैं ।
(vii) व्यक्तित्व एवं व्यक्तिगत विभिन्नताएँ- अध्ययनों से पता चलता है कि जिन लोगों में समायोजन दोष तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी असन्तुलन पाया जाता है उनमें पूर्वाग्रहों की मात्रा सामांन्यजनों की अपेक्षा अधिक होती है। कुण्ठिते, असहिष्णु, आतंकित, असुरक्षित और मानसिक अन्तर्द्वन्द्व एवं हीन-भावना ग्रन्थियों से युक्त व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत विशेषताओं को पूर्वाग्रहों की सहायता से प्रकट करते हैं। यदि किसी समूह का नेता व्यक्तित्व के असन्तुलन एवं पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है तो उस स्मूह का अन्य समूहों से समूह-तनाव लगातार बना रहता है। स्पष्टतः व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक विभिन्नताओं के कारण जो समायोजन के दोष पैदा होते हैं, उनसे समूह-तनाव जन्म लेते हैं। वस्तुतः समूह-तनाव के लिए हमेशा कोई एक कारण उत्तरदायी नहीं होता, अक्सर एक या एक से अधिक वातावरणीय या मनोवैज्ञानिक कारण मिलकर समूह-तनाव उत्पन्न करते हैं।
In simple words: Group tension arises when groups in society develop fear, jealousy, hatred, or opposition towards each other, leading to social unrest and division. It is caused by various environmental factors like historical events, physical differences, social disparities, religious beliefs, economic inequalities, political conflicts, and cultural differences, as well as psychological factors such as prejudice, conditioning, identification with one's own group, social distance, misinformation, scapegoating, and individual personality traits.

🎯 Exam Tip: When explaining group tension, ensure you cover both environmental and psychological causes with clear examples. Providing a balanced view of both types of factors will demonstrate a comprehensive understanding and secure higher marks.

 

Question 2. पूर्वाग्रह (Prejudice) से क्यो आशय है? पूर्वाग्रहों के विकास की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए इन्हें दूर करने के उपायों का भी उल्लेख कीजिए। या समाज में विभिन्न प्रकार के पूर्वाग्रहों का विकास क्यों होता है? उन्हें दूर करने के लिए क्या उपाय कर सकते हैं? या पूर्वाग्रह समूह-तनाव को किस प्रकार बढ़ाते हैं? पूर्वग्रह को दूर करने की विधियों का वर्णन कीजिए। या पूर्वग्रहित निर्णय का अर्थ स्पष्ट कीजिए । पूर्वाग्रहित निर्णयों के विकास के कारणों का वर्णन कीजिए। या पूर्वग्रहित निर्णय का अर्थ स्पष्ट कीजिए । पूर्वग्रहित निर्णयों को कम करने की विधियाँ लिखिए।
Answer: भूमिका
(Introduction)
प्रत्येक व्यक्ति समाजीकरण की प्रक्रिया के अन्तर्गत समाज के अन्य व्यक्तियों तथा समूहों के प्रति सम्बन्धात्मकं या द्वेषात्मक या घृणात्मक प्रवृत्तियाँ विकसित करता है। व्यक्ति जिस समूह को सदस्य होता है, वह समूह उसे दूसरे समूहों के प्रति पूर्वाग्रही बना देता है। पूर्वाग्रह का प्रभाव इतना गहरा होता है कि व्यक्ति यह नहीं समझ पाता कि वह किन्हीं व्यक्तियों या समूह के प्रति पूर्वाग्रही भी है। पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यक्ति को प्रत्येक विचार, भावना अथवा क्रिया पूरी तरह से सहज एवं स्वाभाविक प्रतीत होती है और वह अपने पूर्वाग्रहयुक्त व्यवहार को सामान्य व्यवहार समझता है। पूर्वाग्रह समूह-तनाव के लिए आधारभूत मनोवैज्ञानिक कारण है। पूर्वाग्रहों के विकास के साथ-ही-साथ समूह-तनाव का भी विकास होता है।
पूर्वाग्रह का आशय
(Meaning of Prejudice)
लैटिन भाषा का एक शब्द है प्रीजूडिकम (prejudicum) जिसका शाब्दिक अर्थ है-'पूर्व निर्णयों पर आधारित निर्णय' । पूर्वाग्रह में किसी बात की जाँच या परीक्षा करने से पहले ही उसके सम्बन्ध में कोई निश्चित विश्वास और अभिवृत्ति बना ली जाती है, अर्थात् पूर्वाग्रह एक ऐसा निर्णय होता है जो तथ्यों के समुचित परीक्षण के पूर्व ही ले लिया जाता है। इस भॉति, पूर्वाग्रह को शीघ्रतापूर्वक लिया गया या अपरिपक्व निर्णय कहा जा सकता है। इसमें सन्देह नहीं कि पूर्वाग्रह अनुचित और अविवेकपूर्ण होते हैं। उदाहरण के तौर पर भारतीय समाज में प्रायः ऊँची जाति के लोग अनुसूचित जाति के लोगों को अस्पृश्य समझते हैं और उन्हें छूने से परहेज करते हैं। यह एक पूर्वाग्रह है। इसी प्रकार युद्धप्रिय कबीलों या समूहों में जन्म लेने वाले बालकों को इस भाँति पाला-पोसा और प्रशिक्षित किया जाता है कि उनमें शत्रु के प्रति द्वेषात्मक एवं घृणात्मक प्रवृत्तियाँ विकसित हो जाती हैं। बालकों की ऐसी प्रवृत्तियाँ एवं व्यवहार के प्रतिमान सहज, सामान्य तथा सामाजिक दृष्टि से स्वीकृत समझे जाते हैं। इतना ही नहीं बल्कि होता यह है कि जो बालक बड़े होकर इन प्रवृत्तियों/प्रतिमानों के अनुरूप व्यवहार नहीं करते, वे अपने समूह से बहिष्कृत और अपने समूह की सुरक्षा के प्रति खतरा समझे जाते हैं। समूह या कबीला इसके लिए उन्हें दण्ड भी दे सकती है। निष्कर्षतः व्यक्तिगत, समूहगत, पारस्परिक वृत्तियों एवं विश्वासों के आधार पर किसी समूह, समुदाय, सम्प्रदाय, वर्ग, क्षेत्र, मत-मजहब या भाषा के प्रतिकूल या अनुकूल जब कोई धारणा निर्मित कर ली जाती है तो उसे पूर्वाग्रह (Prejudice) कहते हैं।
पूर्वाग्रह की परिभाषा
(Definition of Prejudice)
पूर्वाग्रह को विभिन्न विद्वानों द्वारा निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है (1) क्रेच और क्रचफील्ड के अनुसार, “पूर्वाग्रह उन अभिवृत्तियों तथा विश्वासों को कहा जाता है जो व्यक्तियों को अनुकूल तथा प्रतिकूल स्थिति में रखते हैं। जातीय पूर्वाग्रह किसी अल्पसंख्यक, जातीय, नैतिक और राष्ट्रीय समूह के प्रति उन मनोवृत्तियों तथा विश्वासों को कहते हैं जो उस समूह के सदस्यों के लिए प्रतिकूल होते हैं।”
(2) जेम्स ड्रेवर के मतानुसार, “निश्चित वस्तुओं, सिद्धान्तों, व्यक्तियों के प्रति अनुकूल या प्रतिकूल अभिवृत्ति को, जिसमें संवेग भी सम्मिलित रहते हैं, पूर्वाग्रह कहते हैं।” क्रेच एवं ऋचफील्ड तथा जेम्स ड्रेवर की उपर्युक्त दोनों परिभाषाओं में दो शब्दों का प्रयोग मिलता है, ये हैं-'अभिवृत्ति' और 'विश्वास' । पूर्वाग्रह को समझने के लिए इन दोनों शब्दों से परिचित होना आवश्यक है।
अभिवृत्ति एवं विश्वास (Attitudes and Believes)-अभिवृत्ति एक मानसिक एवं स्नायविक तत्परता है जिसका प्रभाव व्यक्ति के समस्त व्यवहारों पर पड़ता है। इसी भाँति, प्रत्येक व्यक्ति का अपना अलग एक संसार होता है जिसमें अपनी देखी हुई तथा जानी हुई बातों के आधार पर वह कुछ विश्वासं निर्मित कर लेता है। विश्वास अच्छे-बुरे अथवा सही-गलत कुछ भी हो सकते हैं। किन्तु ये विश्वास उस व्यक्ति को एक सुनिश्चित व्यवहार प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
क्रेच तथा ऋचफील्ड ने अभिवृत्ति एवं विश्वास को इस प्रकार परिभाषित किया है-“व्यक्ति से सम्बन्धित समुदाय के कुछ पक्षों के प्रति प्रेरणात्मक, संवेगात्मक, प्रत्यक्षात्मक तथा ज्ञानात्मक प्रक्रियाओं के स्थायी संगठन को अभिवृत्ति कहते हैं।” तथा “व्यक्ति से सम्बन्धित समुदाय के कुछ पक्षों के प्रति प्रत्यक्षीकरण तथा ज्ञान के स्थायी संगठन को विश्वास कहा जाता है।”
पूर्वाग्रहों का विकास (पूर्वाग्रहों के विकास के कार्यकारी कारक)
(Development of Prejudices)
पूर्वाग्रहों के विकास में अनेक तत्त्व कार्य करते हैं, जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत है |
(1) अभ्यनुकूलन (Conditioning)- अभ्यनुकूलन पूर्वाग्रहों के विकास में एक महत्त्वपूर्ण अवयव है। इसके द्वारा विकसित पूर्वाग्रह अत्यन्त सरल प्रकार के होते हैं तथा इनको जल्दी ही दूर कर लिया जा सकता है। गार्डनर मर्फी नामक मनोवैज्ञानिक ने पूर्वाग्रह के निर्माण तथा विकास की प्रक्रिया में अभ्यनुकूलन का योगदान स्पष्ट किया है। मर्फी के अनुसार हम किसी धार्मिक रीति-रिवाज, समुदाय, भाषा या वर्ग के प्रति पूर्वाग्रहों से ग्रसित हो जाते हैं और इस भॉति निर्मित पूर्वाग्रह विकसित होकर व्यक्ति के सामान्य अनुभवों का अंग बन जाते हैं। उदाहरण के लिए—माना कोई बालक लम्बी-चौड़ी कद-काठी, दाढ़ी-मूंछ वाले किसी कुरूप तथा डरावने व्यक्ति को लड़ते हुए देख लेता है तो वह उससे भयभीत हो जाता है तथा बचने का प्रयास करता है। इस प्रकार उसके मन में यह विश्वास उत्पन्न हो जाता है कि ऐसे व्यक्ति क्रूर, निर्दयी तथा आततायी होते हैं। भविष्य में उसका यह आग्रह समूचे समुदाय या जाति पर लागू हो जाता है। इस प्रकार का पूर्वाग्रह अभ्यनुकूलन के कारण से ही विकसित हुआ ।
(2) आत्मीकरण तथा अन्तःक्षेपण (Identification and Interjection) – किम्बाल यंग के मतानुसार, “आन्तरिक समूह तथा बाह्य समूह के पारस्परिक संघर्ष पूर्वाग्रहों को जन्म देते हैं।” मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में अनेक प्रकार के समूहों की उपस्थिति-मात्र से ही पूर्वाग्रहों का जन्म नहीं होता, संघर्ष तो समूहों में भेदभाव के कारण उत्पन्न होता है। यदि सभी जातियों, सम्प्रदायों में आपसी भेदभाव नहीं है तो ऐसी दशा में पूर्वाग्रहों की उत्पत्ति नहीं होगी । वस्तुतः जब व्यक्ति अपने तथा बाहरी समाज के बीच अन्तर समझने लगता है तो यह अन्तर ही उस व्यक्ति में पूर्वाग्रहों को विकसित करता है।
'आत्मीकरण' की प्रक्रिया के अन्तर्गत बालक स्वयं को अपने परिवार के अनुकूल ढालने का प्रयास करता है तथा परिवार के रीति-रिवाजों, प्रथाओं एवं परम्पराओं को आत्मीकृत कर लेना चाहता है जिसके परिणामस्वरूप उसके मस्तिष्क पर विभिन्न प्रकार के पूर्वाग्रहों का विकास समाज के विभिन्न समुदायों, वर्गों तथा जातियों के प्रति होने लगता है।
बड़ा होने पर बालक समाज की कई संस्थाओं; जैसे— स्कूल, धर्मस्थल, क्रीड़ास्थल तथा सामुदायिक क्लबोंके सम्पर्क में आता है और विविध अनुभव प्राप्त करता है। इसके फलस्वरूप उसके मन में विभिन्न धर्मों, वर्गों, जातियों, सम्प्रदायों, भाषाओं तथा क्षेत्रों के प्रति एक विशिष्ट पृष्ठभूमि और विचारधारा निर्मित हो जाती है। अब उसके सामने दो समाज होते हैं —एक अपना निजी समाज तथा दूसरा बाहरी समाज । दोनों समाजों के बीच वह एक अन्तर का बोध करने लगता है और इस प्रकार उसमें पूर्वाग्रह विकसित हो जाते हैं।
(3) व्यक्तिगत एवं सामाजिक सम्पर्क (Personal and Social Contact)- शुरू में बालक अपने माता-पिता तथा परिवारजनों के सम्पर्क में आता है। इस छोटे-से क्षेत्र में ही उसे प्राथमिक अनुभव होते हैं जो आयु वृद्धि के साथ-साथ पास-पड़ोस, गली-मुहल्ले, नगर और इस भाँति बाहरी समाज तक फैल जाते हैं। यहाँ बालक को दोनों ही प्रकार के अनुभव होते हैं कुछ खट्टे तो कुछ मीठे, कुछ प्रतिकूल तो कुछ अनुकूल । बाहरी समाज के व्यवहार से दुःख या पीड़ा महसूस होने पर बालक को कटु अनुभव होते हैं और वह उस समाज को अपने विरुद्ध समझकर उसके प्रति पूर्वाग्रह विकसित कर लेता है। सुखकारी अनुभव अनुकूल पूर्वाग्रहों की उत्पत्ति करते हैं तथा उन्हें विकसित करते हैं।
(4) सामाजिक दूरी (Social Distance)- सामाजिक दूरी का अभिप्राय है, एक समूह का दूसरे समूह से अलगाव अर्थात् उनमें पारस्परिक व्यवहार का अभाव और इस भॉति उनके बीच आपसी सम्बन्धों का न होना। सामाजिक दूरी रखने वाले समूहों के रीति-रिवाज, प्रथाएँ, परम्पराएँ, आस्थाएँ और सामाजिक व्यवहार भी पृथक् ही होते हैं। इससे आपसी तनाव बढ़ता है। प्रायः परस्पर विरोधी समूह एक-दूसरे को घृणा व सन्देह की दृष्टि से देखते हैं, एक-दूसरे को अपने से हीन मानते हैं, एक-दूसरे के विरुद्ध अफवाहें फैलाते हैं तथा घृणास्पद प्रचार करते हैं। इसके फलस्वरूप उनमें परस्पर तनाव उत्पन्न हो जाता है और संघर्ष प्रबल हो जाता है। भारतीय समाज में धार्मिक, साम्प्रदायिक, जातीय, क्षेत्रीय तथा भाषायी तनाव अक्सर दखने में आते हैं। इस प्रकार सामाजिक दूरी के आधार पर पूर्वाग्रहों का विकास होता है।
(5) व्यक्तित्व (Personality)- मनोवैज्ञानिक खोजों से ज्ञात हुआ है कि समाज में असन्तुलित व्यक्तित्व वाले तथा कुसमायोजित लोग, आम लोगों की अपेक्षा, पूर्वाग्रहों से अधिक ग्रस्त पाये जाते हैं। वस्तुतः ऐसे लोग अपनी मानसिक कुण्ठाओं, मनोविकारों, भय या असुरक्षा की भावना को पूर्वाग्रहों के मध्यम से प्रकट करते हैं और समाज में तनाव के बीज आरोपित कर देते हैं। ऐसे व्यक्ति यदि किसी समूह, समुदाय, क्षेत्र या मजहब के नेता हों तो वह सामूहिक तनाव सतत प्रबल होता जाता है। कुछ स्वार्थी नेता तथाकथित निम्न तथा उच्च जातियों के बीच भेदभाव उत्पन्न करके जातीय तनाव बढ़ा देते हैं। इस प्रकार व्यक्तित्व के कारण भी पूर्वाग्रहों का विकास होता है।
(6) मिथ्या-दोषारोपण (Scapegoating)– मिथ्या-दोषारोपण के माध्यम से एक समूह अपने विरोधी समूह के विरुद्ध झूठी तथा भ्रामक बातों को प्रचार करता है। इन आरोपों के पीछे कोई तर्क या वैज्ञानिक आधार नहीं होता। मिथ्या-दोषारोपण में एक समूह सम्भाषण, समाचार-पत्र, मंच, रेडियो तथा टी० वी० आदि के माध्यम से दूसरे समूह के विरुद्ध विरोधी प्रचार करता है। कभी-कभी तो यह आलोचना इतनी उत्तेजनापूर्ण एवं घृणित हो जाती है कि विरोधी समूहों में खुला व रक्तपातपूर्ण संघर्ष शुरू हो जाता है। स्पष्टतः मिथ्या-दोषारोपण पूर्वाग्रहों के विकसित होने का महत्त्वपूर्ण कारक हो जाता है।
(7) रूढ़ियाँ (Stereotypes)- प्रसिद्ध विद्वान् किम्बाल यंग के मतानुसार, “रूढ़ियाँ एक बेकार की धारणा हैं जो किसी समूह के ऐसे लक्षणों को व्यक्त करने के लिए बनायी जाती हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता।” रूढ़ियाँ ऐसी प्रतिमाएँ हैं जो व्यक्ति विशेष के मन में किन्हीं समूहों के प्रति दुराग्रह, द्वेष या घृणा के कारण निर्मित हो जाती हैं। रूढ़ियाँ आधारहीन व परम्परागत होती हैं। तथा भाषा एवं संस्कारों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली होती हैं। किस्से, कथा एवं कहानियाँ इन रूढ़ियों को पोषित करते हैं। रूढ़ियों का सम्बन्ध क्योंकि मानसिक क्रियाओं; यथा-संवेगों व प्रेरणाओं से होता है; अतः ये मानव-जीवन पर सदैव किसी-न-किसी रूप में असर डालती हैं। रूढ़ियों से परिचालित मानव-व्यवहार पूर्वाग्रहों में रूपान्तरित तथा विकसित हो जाता है और समूह-तनावों का कारण बनता है।
पूर्वाग्रह दूर करने के उपाय
(Remedies for the Removal of Prejudices)
आधुनिक भारतीय समाज एक बहुलवादी एवं प्रतियोगितावादी समाज है, जहाँ व्यक्ति को पूर्वाग्रह की ओर ले जाने वाले कई रास्ते हैं और इन रास्तों पर चलने में कोई कठिनाई भी नहीं होती है। साथ ही, यह पूर्वाग्रहों की सार्वभौमिकता भी सामान्य है, किन्तु अनेक पूर्वाग्रह मानव-समाज के लिए अत्यन्त घातक हैं जिनका डटकर मुकाबला किया जाना चाहिए तथा जिन्हें दूर करने के भरसक एवं तत्काल कदम उठाये जाने चाहिए। ऐसे ही कुछ उपाय निम्नलिखित रूप में उल्लिखित हैं –
(1) सम्पर्क – मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि विभिन्न समूहों के बीच पूर्वाग्रहों को कम करने के लिए उनमें परस्पर सम्पर्क वृद्धि अनिवार्य है। इसका सर्वोत्तम उपाय है कि सभी समूहों को एक-दूसरे के समीप लाया जाये और उन्हें ऐसी परिस्थतियों के अन्तर्गत रखा जाये कि सभी समूह परस्पर परिचित हों और उनमें मेल-मिलाप बढ़ सके । सम्पर्क वृद्धि के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है –
1. पूर्वाग्रह को दूर करने के लिए समूह का प्रत्येक सदस्य विभिन्न परिस्थितियों (जैसे – कॉलेज या नौकरी) में बराबरी के स्तर पर प्रतिभागिता करे ।
2. सभी को यह ज्ञात हो कि वे एक समान लक्ष्य के लिए कार्य कर रहे हैं।
3. इस प्रकार कार्य-समूह द्वारा सफलता प्राप्त करने पर पूर्वाग्रह समाप्त हो जाते हैं और घनिष्ठता विकसित होती है; अतः सफलता महत्त्वपूर्ण कारक है।
4. समूह के सभी सदस्यों को विचाराभिव्यक्ति का पूरा अवसर मिलना चाहिए तथा उनकी निर्णय लेने में भागीदारी होनी चाहिए ।
(2) शिक्षा- शिक्षा पूर्वाग्रहों को दूर करने का सशक्त साधन है। शिक्षित व्यक्ति बिना सोच-विचार किये किसी बात पर विश्वास नहीं करता, वह उसे पहले तर्क की कसौटी पर कसता है। इसके अतिरिक्त शिक्षा दूसरे समूहों के बारे में सूचनाएँ प्रदान करती है, जिसके फलस्वरूप लोगों में दूसरों के प्रति स्वीकृत्यात्मक भावनाएँ विकसित होती हैं। शोध अध्ययनों के निष्कर्ष बताते हैं कि अशिक्षित लोगों की तुलना में कॉलेज स्तर के शिक्षित लोगों में बहुत कम पूर्वाग्रह देखने में आये हैं।
(3) सामाजिक-आर्थिक समानता- समाज के विभिन्न वर्गों, समूहों या समुदायों में पारस्परिक तनाव एवं संघर्ष का एक प्रमुख कारण समाज में व्याप्त सामाजिक-आर्थिक विषमता है। सामाजिक संघर्ष का एक बड़ा कारण धनी एवं निर्धनों के बीच भारी विषमता है। अतः सामाजिक एवं आर्थिक सुधारों के द्वारा पूर्वाग्रहों को कम और दूर किया जा सकता है।
(4) भावात्मक एकता- भावात्मक एकता स्थापित कर भी पूर्वाग्रहों को एक बड़ी सीमा तक समाप्त किया जा सकता है। इसके लिए राष्ट्रीय उत्सवों तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। भावनात्मक एकता का पूर्वाग्रहों पर गहरा प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।
(5) सन्तुलित व्यक्तित्व- असन्तुलित व्यक्तित्व के कारण भी पूर्वाग्रह पनपते हैं। असन्तुलित व्यक्तित्व तथा असमायोजन दोष के कारण अविश्वास उभरता है तथा दूषित अभिवृत्तियाँ जन्म लेती हैं। सन्तुलित व्यक्तित्व भग्नाशा, असहिष्णुता हीन-भावना तथा मानसिक संघर्ष को कम करता है और इस भाँति विरोधी समूहों पर दोषारोपण के अवसर कम होते जाते हैं।
(6) चेतना का स्तर - पूर्वाग्रह दूर करने का एक उत्तम उपाय है-चेतना जाग्रत करना। चेतना के जागरण से वैकल्पिक यथार्थों का निर्माण होता है तथा समूह के सदस्य अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों तथा उत्पीड़क प्रभावों के प्रति संवेदनशील बनते हैं। उनमें सामूहिक शक्ति, एकता की भावना तथा सामूहिक प्रतिरक्षा की भावना विकसित होती है।
In simple words: Prejudice is a preconceived opinion or attitude, positive or negative, formed without sufficient knowledge or reason, which often leads to group tension and conflict. It develops through psychological processes like conditioning and identification, and can be mitigated through increased inter-group contact, education, promoting socio-economic equality, fostering emotional unity, balanced personality development, and raising awareness.

🎯 Exam Tip: When defining prejudice, ensure you highlight its irrational and premature nature. For its development and remedies, provide a good mix of psychological and social factors, focusing on practical solutions for reduction.

 

Question 3. समूह – तनाव को दूर करने के उपाय बताइए। या समूह-तनाव का निराकरण किस प्रकार किया जा सकता है? उदाहरण सहित विवरण दीजिए।
Answer: समूह-तनाव के निवारण की विधियाँ
(Measures to Remove the Group Tension)
आज हमारे देश में समूह-तनाव की समस्या ने गम्भीर रूप धारण कर लिया है। इसे दूर करने के लिए उन सभी कारणों का निवारण करना होगा जो तनाव की उत्पत्ति एवं विकास के लिए उत्तरदायी हैं। समूह-तनाव की समाप्ति के लिए अभी तक कोई प्रभावशाली मनोवैज्ञानिक उपाय नहीं खोजे जा सके हैं, अत: सामान्य रूप से परम्परागत विधियों से समूह-तनाव को कम करने का प्रायस किया जाता है। समूह-तनाव पारिवारिक वातावरण में जन्म लेते हैं। पड़ोस, विद्यालय तथा खेल के मैदान में इन्हें शक्ति मिलती है तथा साम्प्रदायिक राजनीतिक दलों, पुस्तकों, समाचार-पत्रों तथा भाषणों द्वारा इनका पोषण किया जाता है।
विभिन्न प्रकार के समूह-तनावों के निवारण हेतु निम्नलिखित सामान्य उपाय काम में लाये जाते हैं।
(1) व्यक्तित्व का सन्तुलित विकास (Harmonious Development of Personality)- समूह तनाव को दूर करने के लिए जीवन के प्रारम्भिक चरण से ही व्यक्तित्व का सन्तुलित विकास आवश्यक है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, व्यक्तित्व का सन्तुलन बिगड़ने से मानसिक स्वास्थ्य खराब होता है जिससे संघर्ष और तनाव जन्म लेते हैं। व्यक्तित्व का सन्तुलित विकास व्यक्ति को पूर्वाग्रहों या पूर्णधारणाओं से मुक्त रखता है और वह जीवन के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण अपनाने में सफल होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मानसिक स्वास्थ्य, विज्ञान के प्रचार-प्रसार, समायोजन दोषों के उपचार तथा निर्देशन-सेवाओं के विस्तार की अत्यधिक आवश्यकता है।
(2) उचित शिक्षा (Proper Education)- उपयुक्त शिक्षा समूह-तनावों को दूर करने का सबसे प्रभावशाली माध्यम है। शिक्षा की कमी और बाह्य समूहों के प्रति अज्ञानता के कारण विभिन्न वर्गों के बीच तनाव बढ़ते हैं। शिक्षा की रूपरेखा इस प्रकार तैयार की जानी चाहिए कि विभिन्न क्षेत्रों या प्रान्तों के निवासी एक-दूसरे की भाषा, संस्कृति, बोल- चाल, रहन-सहन और भावनाओं को उचित सम्मान दे सकें; वे संकीर्णता के स्थान पर उदार दृष्टिकोण अपना सकें। प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री के०जी० सैन्यदेन का मत है कि समूह-तनाव की रोकथाम के लिए बालकों के लिए विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों तथा सम्प्रदायों को मूल्यवान बातों की शिक्षा की व्यवस्था की जाए ताकि वे एक-दूसरे की संस्कृति, धर्म तथा सम्प्रदाय को भली-भाँति समझ सकें ।
पाठयक्रम पुस्तकें तथा मनोरंजन सम्बन्धी साहित्य का चयन करते समय बालकों के संवेगात्मक तथा उचित विकास व अभिवृत्ति निर्माण का ध्यान रखा जाये। शिक्षक पूर्वाग्रहों से मुक्त हों तथा स्वस्थ-सन्तुलित व्यक्तित्व वाले हों। उन्हें चाहिए कि बालकों को आपसी घनिष्ठ मित्रता के लिए प्रोत्साहित करें। विद्यालयों में प्रजातान्त्रिक नियमों तथा विश्व-बन्धुत्व की भावना को समर्थन मिलना चाहिए। वस्तुतः एक-दूसरे के प्रति सहिष्णुता, सद्भाव, प्रेम एवं अच्छी सोच पैदा करने वाली शिक्षा ही समूह-तनाव को कम कर सकती है।
(3) सामाजिक सम्पर्क (Social Contact) — समूह-तनाव का एक प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण कारण सामाजिक दूरी है। सामाजिक दूरी को कम करने के लिए समाज में स्थित विभिन्न समूहों को एक-दूसरे के अधिकाधिक निकट सम्पर्क में लाने का प्रयास किया जाना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों, वर्गों तथा जातियों के व्यक्तियों को परस्पर मिलजुलक्रः कार्य करने एवं सास्कृतिक अवसरों पर व्यक्तिगत रूप से सम्पर्क साधने का अवसर प्रदान किया जाए। अध्ययन एवं अनुभव बताते हैं कि जिन नगरों में सामाजिक सम्पर्क बढ़ता है, वहाँ समूह-तनाव में निरन्तर कमी आती जाती है।
(4) व्यापक आदर्श एवं लक्ष्य (Wide Ideals and Goals)- समूह-तनाव का एक मुख्य कारण यह है कि सामान्यतया विभिन्न जातियों, वर्गों, सम्प्रदायों, अलग-अलग प्रान्तों में रहने वाले विभिन्न भाषा-भाषियों के परस्पर विरोधी आदर्श एवं लक्ष्य होते हैं। इनसमेहों की अभिवृत्ति, विश्वासों तथा संवेगों को किसी उच्च आदर्श तथा व्यापक लक्ष्य की ओर मोड देने से आपसी भेदभाव तथा संकीर्णता समाप्त होगी; अतः पूरे समाज में ऐसे व्यापक आदर्शों और लक्ष्यों की स्थापना की जानी चाहिए जो सर्वमान्य हों और जिन्हें प्राप्त करने में सभी लोग प्रयत्नशील हों।
(5) सामाजिक सुधार (Social Reformation)- सामाजिक सुधार समूह-तनावों को दूर करने में एक पर्याप्त सीमा तक सहायक होते हैं। इसके लिए समाज के विभिन्न समूहों के सामाजिक दोषों, कुरीतियों, गलत प्रथाओं व परम्पराओं और अन्धविश्वासों में सुधार लाना परम आवश्यक है। समाज सुधार कार्यक्रमों से सामाजिक जागृति आती है, आपसी भेदभाव दूर होते हैं तथा स्वस्थ समझ-बूझ पैदा होती है।
(6) आर्थिक सुधार (Economic Reformation)- प्रायः देखा गया है कि विभिन्न समूहों की आर्थिक समस्याओं से समूह-तनाव का जन्म होता है। अतः आर्थिक विषमता दूर करने की दृष्टि से सम्बन्धित वर्गों या समूहों की आर्थिक दशा में सुधार वांछित है। आर्थिक उन्नति के लिए कृषि तथा उद्योग-धन्धों को बढ़ावा मिलना चाहिए तथा उत्पादित सामग्री का विवेकपूर्ण तरीकों से वितरण किया जाना चाहिए। अर्थशास्त्रियों का सुझाव है कि आर्थिक दशा में सुधार से समूह-तनाव कम होंगे।
(7) वैधानिक सुधार (Legal Reformation)- समूह-तनाव को समाप्त करने के लिए विधि (कानून) की भी सहयता ली जा सकती है। ऐसे विचारों, कार्यक्रमों, प्रथाओं तथा परम्पराओं पर कानूनी रोक लगा देनी चाहिए जो जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रीयता तथा साम्प्रदायिक उन्माद बढ़ाते हों। इस प्रकार की भावनाओं को प्रोत्साहित करने वालों तथा अफवाहें फैलाने वालों को कठोर दण्ड एवं इनके विरुद्ध जनमत तैयार करना भी आवश्यक है। कानून का सहारा लेकर छुआछूत को कम किया जा सकता है; इससे सामाजिक सम्पर्कों में वृद्धि होगी। भारतीय संविधान द्वारा पिछड़े लोगों, अछूतों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा आदिवासियों के लिए सरकारी नौकरियों में स्थान सुरक्षित किये गये हैं।
(8) युवकों का संगठन (Youth Organization)- राष्ट्रीय स्तर पर युवकों के ऐसे संगठन निर्मित किए जाएँ जिनमें विभिन्न जातियों, वर्गों, सम्प्रदायों, क्षेत्रों, भाषा-भाषियों तथा धर्मों के लोग एक साथ एकत्र होकर सामूहिक कार्यों में भाग ले सकें तथा एक-दूसरे से सद्भाव बढ़ा सकें। भारतीय विश्वविद्यालयों में प्रत्येक वर्ष मनाए जाने वाला 'युवक समारोह' (Youth Festival) इसी आशय से निर्मितँ एक संगठन है।
(9) स्वस्थ साहित्य का निर्माण (Formation of Health Literature)– साहित्य एक प्रबल एवं प्रभावशाली माध्यम है। इसका उपयोग समूह तनाव कम करने हेतु किया जाना चाहिए। समूह-तनाव को रोकने के लिए दो कदम उठाने होंगे-एक, समूह-तनाव को प्रोत्साहित करने वाले साहित्य पर प्रतिबन्ध लगाने होंगे तथा दो, स्वस्थ साहित्य का सृजन किया जाना चाहिए ताकि लोगों में उदारता, सहयोग, मैत्री तथा विश्वबन्धुत्व की भावनाओं का उदय एवं विकास हो सके ।
(10) सामाजिक समायोजन में वृद्धि (Increasing Social Adjustment)- समूह-तनाव में कमी लाने के लिए सामाजिक समायोजन में अधिक-से-अधिक वृद्धि आवश्यक है । विभिन्न समाजसेवी संस्थाओं तथा सरकारी संस्थानों का कर्तव्य है कि वे सामाजिक कुसमायोजन (Social Mal-adjustment) को दूर करने के लिए अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करें तथा लोगों के संवेगात्मक विकास को सन्तुलित बनाए रखने के लिए निरन्तर प्रयास करें। एक समूह से दूसरे समूहों के प्रति भय, कुण्ठा, राग-द्वेष, क्रोध, घृणा, द्वेष, सन्देह तथा विरोध'को निकालने हेतु समाज में अनुकूल वातावरण तैयार किया जाना आवश्यक है।
(11) स्वस्थ प्रचार (Healthy Propaganda)- आधुनिक काल की जनतान्त्रिक शासन प्रणालियों में प्रचार का विशेष महत्त्व है। विभिन्न प्रचार साधनों तथा जनसंचार का उपयोग सकारात्मक अभिवृत्तियों, विश्वासों, पूर्वाग्रहों, मूल्यों, मतों तथा विचारों के निर्माण में किया जाना चाहिए। इसके साथ-साथ, भ्रामक एवं दूषित प्रचार पर पाबन्दी भी लगनी चाहिए। समूह-तनाव के विरुद्ध सफल प्रचार वह है जिसमें पहले से मौजूद विश्वासों तथा अभिवृत्तियों को सहारा लिया जाता है एवं उन्हें शनैः-शनैः बदलने की कोशिश की जाती है।
इसके विपरीत, नकारात्मक प्रचार से अन्धविश्वास, भ्रामक एवं गलत तथ्य जनता तक पहुँचते हैं, जिससे गलतफहमियाँ उत्पन्न होती हैं और समूहों में तनाव व संघर्ष का जन्म होता है; अतः भ्रामक एवं गलत प्रचार पर रोक लगाई जानी चाहिए तथा साम्प्रदायिक उन्माद बढ़ाने वाले प्रचारकों को कठोर दण्ड दिया जानी चाहिए। समूह-तनाव के निवारण के लिए राष्ट्रव्यापी स्वस्थ जनमत निर्माण आवश्यक एवं लाभकारी है। इसके लिए वांछित प्रचार-तन्त्र में पत्र-पत्रिकाओं, सम्पादकों, रेडियो, टी० वी०, सिनेमा, सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिक नेताओं तथा आदर्श शिक्षकों की सेवाएँ महत्त्वपूर्ण हैं।
(12) समूह-तनाव पर अनुसन्धान (Research work in Group Tension) समूह- तनाव पर अंकुश लगाने के लिए विशेष अध्ययनों तथा अनुसन्धानों की आवश्यकता है। इसके लिए देश-विदेश के लिए मनोवैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों व विभिन्न विषयों के विद्वानों तथा विचारकों को अथक प्रयास करने होंगे। इस दृष्टि से समूह-तनावों के विविध स्वरूपों, कारणों तथा उन्हें दूर करने के उपायों पर अनुसन्धान कार्य की आवश्यकता है।
In simple words: Group tension can be reduced by fostering harmonious personality development from an early age and promoting proper education that encourages tolerance and mutual respect. Additionally, increasing social contact between different groups, establishing common ideals and goals, implementing social and economic reforms, enforcing legal measures against divisive practices, and organizing youth activities that promote unity can help mitigate group tension.

🎯 Exam Tip: Focus on providing a diverse range of solutions, categorized logically (e.g., educational, social, economic, psychological). Emphasize the importance of a multi-faceted approach to demonstrate thorough understanding.

 

Question 4. जातिवाद से क्या आशय है? जातिवाद के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए। जातिवाद को कैसे समाप्त किया जा सकता है? या जातिवाद से आप क्या समझते हैं? जातिवाद के क्या कारण हैं? इन्हें दूर करने के आवश्यक उपाय क्या हैं? या जातिवाद के कारण लिखिए। जातिवाद से उत्पन्न तनाव को कैसे रोका जा सकता है?
Answer: जातिवाद का अर्थ
(Meaning of Casteism)
भारत में जातिवाद प्राचीनकाल की वर्ण-व्यवस्था के विचार से जुड़ा है। सर्वमान्य रूप से विभिन्न वर्गों में विभाजित प्राचीन भारतीय समाज में वर्गीकरण का आधार वर्णाश्रम व्यवस्था थी, जिसके अन्तर्गत समाज को चार वर्गों (वर्गों) में विभक्त किया गया था- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र । तत्कालीन भारतीय मनीषियों ने इन चारों वर्षों के कार्य भी निर्धारित कर रखे थे- ब्राह्मण अध्ययन-अध्यापन का कार्य, क्षत्रिय शासन तथा राज्य की सुरक्षा सम्बन्धी कार्य, वैश्य व्यापार सम्बन्धी कार्य तथा शूद्र सेवा के कार्य करते थे। ये कार्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तान्तरित होते चलते थे। शनैः-शनैः यह वर्ण-व्यवस्था ही जाति-प्रथा में बदल गयी। जाति-व्यवस्था के अन्तर्गत समूची भारतीय समाज जातियों तथा उपजातियों में विभाजित हुआ । इस भाँति, भारत में जातिवाद की उत्पत्ति हुई जो धीरे-धीरे विकसित होकर ज्वलन्त प्रश्नचिह्न के रूप में उभरी है।
“जातिवाद किसी एक जाति या उपजाति के सदस्यों की वह भावना है जिसमें वे देश, अन्य जातियों या सम्पूर्ण समाज के हितों की अपेक्षा अपनी जाति या समूह के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक हितों या लाभों को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।' ब्राह्मणवाद, वणिकवाद, कायस्थवाद, जाटवाद और अहीरवाद आदि-आदि जातिवाद के विषवृक्ष के ही कडुए फल हैं। वस्तुतः यह एक जाति या उपजाति-विशेष के प्रति अन्धी सामूहिक निष्ठा है जो अपने हितों की रक्षा में अन्यों को बलिवेदी पर चढ़ा देती है।
जातिवाद के कारण ।
(Causes of Casteism)
आजकल भारतीय समाज में जातिवाद अपनी गहरी और फैली हुई जड़ों के साथ स्थायित्व धारण कर चुका है। इसके दूषित परिणाम मानव जीवन के सभी पक्षों को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं जिससे समाज छोटे-छोटे खण्डों में विभाजित होता जा रहा है। जातिवाद के विकास के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं
(1) अपनी जाति की प्रतिष्ठा की एकांगी भावना- जातिवाद के विकास में एक जाति-विशेष की अपनी जाति के लिए प्रतिष्ठा की एकांगी भावना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कारण है। प्रायः अपनी जाति की प्रतिष्ठा के विचार से लोग उसे पूरे समाज से पृथक् मान लेते हैं तथा उसकी झूठी प्रतिष्ठा का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करते हैं। किसी जाति-विशेष के सदस्य अपनी जाति के हितों को सुरक्षित रखने के लिए अच्छे-बुरे, उचित-अनुचित, वैधानिक-अवैधानिक सभी तरह के प्रयास करते हैं। अपनी जाति के लिए अन्ध-भक्ति और झूठी प्रतिष्ठा की भावना से प्रेरित होकर लोग अन्य जातियों के प्रति गलत पूर्वाग्रह तथा घृणा के विचार से ग्रस्त हो जाते हैं। इन सभी बातों से समाज में जातिवाद बढ़ता है।
(2) व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान- लोग अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को हल करने के लिए भी जातिवाद का सहारा लेने लगे हैं। अपनी समस्याओं के समाधान हेतु एक जाति के लोग अपनी ही जाति के अन्य लोगों से सहायता लेने के लिए तत्पर और प्रयत्नशील हुए । इस प्रकार : जातिगत भावनाओं के माध्यम से लोग एक-दूसरे के अधिक निकट आने लगे तथा सम्पर्क साधने लगे। अपनी जाति का हवाला देकर भावप्रवणता (Sentiment) उत्पन्न करके लोगों ने जातिवाद को बढ़-चढ़कर फैलाया।
(3) विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्ध - विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्धों के कारण सामाजिक सम्बन्ध जाति के अन्तर्गत ही सीमित हो जाते हैं। हमारे देश में हिन्दू विवाह के नियमों के अनुसार जातिगत अन्तर्विवाह (Caste Endogamy) के कारण एक जाति के सभी सदस्य स्वयं को एक वैवाहिक समूह समझने लगे। इसमें अन्तर्जातीय विवाह को निषिद्ध माना गया था और प्रत्येक जाति का सदस्य इस बात के लिए बाध्य था कि वह अपनी ही जाति-समूह से जीवन-साथी का चुनाव करे। कुछ जातियों में तो सिर्फ उपजातियों के अन्तर्गत ही विवाह सम्भव है। इन सब बातों के फलस्वरूप लोगों में जातिवाद की प्रबल भावना का विकास हुआ ।
(4) आजीविका में सहायता- आजीविका की समस्या समाज के प्रत्येक व्यक्ति के साथ जुड़ी है। देश में बेकारी की समस्या अपनी चरम सीमा पर है। वर्तमान परिस्थितियों में योग्य से योग्य व्यक्ति भी उपयुक्त रोजगार की तलाश में भटक रहा है। नौकरी पाने के लिए 'जुगाड़' शब्द प्रचलित हो गया है, जिसके सहारे आसानी से काम हो जाता है। नौकरी पाने और देने में लोगों ने जुगाड़ की दृष्टि से जातिवाद का आश्रय प्राप्त किया और अपनी जाति के प्रभावशाली लोगों तथा उच्चाधिकारियों को जाति के नाम पर प्रभावित करके नौकरी पाने की चेष्टा करने लगे। इससे लोगों को सफलता भी मिली जिससे जातिवाद की भावना बढ़ती गयी।
(5) नगरीकरण तथा औद्योगीकरण- बीसवीं शताब्दी की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देन नगरीकरण एवं औद्योगीकरण हैं। विशाल नगरों में या उनके आस-पास बड़े-बड़े औद्योगिक संस्थान स्थापित हुए जिससे वहाँ का सामाजिक जीवन काफी जटिल हो गया है। महानगरों में एक-दूसरे से सहायता पाने और करने की दृष्टि से एक ही जाति के लोग एक-दूसरे के समीप आये और अधिकाधिक संगठित होने लगे। इस प्रकार सुरक्षा और उन्नति के विचार से नगरीकरण तथा औद्योगीकरण की पृष्ठभूमि में जातिवाद की प्रक्रिया व्यापक हुई।
(6) यातायात तथा प्रचार के साधनों का विकास- यातायात तथा प्रचार के साधनों द्वारा नगरों में बिखरे हुए जातीय सदस्य पुनः परस्पर सम्बन्ध स्थापित करने लगे और संगठित हो गये। अपनी जाति की उन्नति के लिए जाति-विशेष के सदस्यों ने अपनी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारम्भ किया, उन्हें पर्याप्त सहयोग मिला और अन्ततः जातीयता के नाम पर देश के विभिन्न भागों के लोग अपनी ही जाति के लोगों से सम्पर्क साधने लगे।
जातिवाद को समाप्त करने के उपाय
(Measures to Remove Casteism)
जातिवाद हमारी मानवता के नाम पर कलंक है और मानव समाज के लिए एक बहुत बड़ा अभिशाप है। प्रमुख समाजशास्त्री, मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक तथा विचारक इस बात पर एकमत हैं कि जातिवाद का अन्त किए बिना मानव सभ्यता को एक सूत्र में बाँधना कठिन है। जातिवाद को समाप्त करने के उपाय निम्नलिखित हैं –
(1) शिक्षा की समुचित व्यवस्था – जातिवाद की संकीर्ण विचारधारा को रोकने का सर्वशक्तिमान साधन और उपाय शिक्षा की समुचित व्यवस्था करना है। विद्यार्थियों को इस प्रकार शिक्षित किया जाना चाहिए कि जातिवाद के विचार उनके मस्तिष्क को जरा भी न छू सकें और उनके मत छुआछूत तथा भेदभाव से सर्वथा दूर रहें। इसके लिए पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियाँ, पाठ्य-सहगामी क्रियाएँ तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि को इस प्रकार नियोजित किया जाए कि विद्यार्थियों में नवीन मनोवृत्तियाँ तथा आदर्श व्यवहार के प्रतिमान विकसित हो सकें । इसके अतिरिक्त शिक्षा के माध्यम से जातिवाद के विरुद्ध स्वस्थ जनमत भी विकसित करना होगा।
(2) साहित्य-सृजन- जातीयता की भावना एवं पूर्वाग्रहों के विरुद्ध गीत, कहानियाँ, नाटक, उपन्यास, निबन्ध तथा लेख लिखकर साहित्य का सृजन किया जाना चाहिए। इस साहित्य में जातिवाद के दुष्परिणामों को उजागर करते हुए मानव-समाज की एकता की भावना को समर्थन देना होगा। इससे शिक्षित वर्ग में जातिवाद का विकार कम किया जा सकता है।
(3) अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन– अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन देने से जातिवाद को समाप्त किया जा सकता है। अन्तर्जातीय विवाह के अन्तर्गत अलग-अलग जातियों के युवक और युवती जीवन-भर के लिए स्थायी वैवाहिक बन्धन में बंध जाते हैं जिससे सामाजिक दूरी रखने वाले दो परिवारों को भी एक-दूसरे के समीप आने का मौका मिलता है। यही नहीं, दोनों परिवारों के सम्बन्धीगण भी स्वयं को एक-दूसरे के नजदीक महसूस करने लगते हैं। इससे विविध जातियों के मध्य सामाजिक सम्बन्धों का एक जाल-सा निर्मित होने लगता है और विभिन्न जातियों में एक-दूसरे के प्रति समझ-बूझ और लगाव पैदा होने लगता है।
(4) सांस्कृतिक विनिमय- प्रत्येक जाति और उपजाति की संस्कृति न्यूनाधिक रूप से दूसरी जातियों और उपजातियों की संस्कृति से भिन्न अवश्य होती है। धर्म, साहित्य, कला, भाषा, विश्वास, आस्थाएँ तथा आचार-विचार की दृष्टि से एक जाति के लोग दूसरी जाति से अलगाव महसूस करने लगते हैं। स्पष्टतः सांस्कृतिक भिन्नता बढ़ने पर जातिगत भिन्नता को बढ़ना स्वाभाविक है; अतः विभिन्न जातियों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान द्वारा समान एवं अच्छे आचरण के बीज बोए जी सकते हैं। ये बीज प्रेम, सहानुभूति, भ्रातृत्व-भाव एवं सहयोग के रूप में पुष्पित-पल्लवित होंगे।
(5) सामाजिक-आर्थिक समानता – विभिन्न जातियों के मध्य सामाजिक-आर्थिक विषमता के कारण भी स्वार्थपूर्ण एवं एकांगी भाव पैदा हो जाते हैं जिससे समूह-तनाव और संघर्ष विकसित होते हैं। यदि अलग-अलग जातियों के सामाजिक रीति-रिवाजों, त्योहारों, प्रथाओं तथा आयोजनों को, एक-समान धरातल पर मिल-जुलकर मनाया जाए; सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध सभी जातियों के लोग एकजुट होकर संघर्ष करें तथा एक-दूसरे के प्रति सामाजिक सम्मान व प्रतिष्ठा व्यक्त करें तो लोगों के मन में जातीय आधार पर घुली कड़वाहट दूर हो सकती है। इसी प्रकार सामाजिक क्षेत्र के आर्थिक क्षेत्र से घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। आर्थिक विषमताएँ, प्रतिद्वन्द्विता, विद्वेष, प्रतिस्पर्धा, वैमनस्य, तनाव तथा वर्ग-संघर्ष को जन्म देती हैं। देश की सरकार को चाहिए कि वह आर्थिक समानता के सत्प्रयासों से जातिवाद की तीव्रता को प्रभावहीन बनाए ।
(6) 'जाति' शब्द का कम-से- कम प्रयोग - किसी विचार को बार-बार सुनने से न चाहते हुए भी उसका प्रभाव पड़ता ही है। यदि आज की पीढ़ी के बच्चे 'जाति' शब्द का अधिक प्रयोग करेंगे तो वे जिज्ञासा एवं अभ्यास के द्वारा इसे आत्मसात् कर लेंगे। इस शब्द के अंकुर भविष्य में जातिवाद के घने और विस्तृत वृक्ष के रूप में आकार लेंगे। अतः ' जाति' शब्द का कम-से-कम प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि जातिवाद के विचार को कोई प्रोत्साहन ही न मिल सके और धीरे-धीरे इसका अस्तित्व ही मिट जाए।
(7) कानूनी सहायता – कानून की सहायता लेकर भी जातिवाद पर अंकुश लगाया जा सक्रा है। हमारे देश में प्रायः लोग अपने नाम के साथ जाति लिखते हैं, इस पर कानूभी रोक लगाकर जातिगत अभिव्यक्ति को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके अलावा जातिवाद की संकीर्ण एवं तुच्छ मानसिकता को प्रश्रय देने वाले या इसका प्रचार करने वालों को कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए।
(8) जातिवाद के विरुद्ध प्रचार-जन- सामान्य की मनोवृत्ति में परिवर्तन लाने की दृष्टि से प्रचार-तन्त्र का उपयोग किया जाना चाहिए। जातिवाद के अंकुर लोगों के मस्तिष्क में हैं। सिर्फ बाहरी दबाव से जातिवाद की समस्या समाप्त होने वाली नहीं है, इसके लिए लोगों की अभिवृत्ति और विश्वास पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने होंगे। यह स्वस्थ एवं उचित प्रकार के माध्यम से सम्भव है जिसके लिए समाचार-पत्र, पत्रिकाओं, सिनेमा, टी० वी०, सभाओं तथा प्रदर्शनों आदि का सहारा लिया जा सकता है।
In simple words: Casteism is a social ideology where members of a caste show extreme loyalty to their own group, often at the expense of national interests, stemming from historical caste systems and fostering discrimination. It arises from factors like strong caste identity, addressing personal problems through caste networks, endogamous marriage restrictions, caste-based employment support, urbanization, and enhanced transport/communication. To combat casteism, comprehensive education, promotion of inter-caste marriages, cultural exchange, economic equality, controlled use of the word 'caste', and legal as well as media campaigns against it are crucial.

🎯 Exam Tip: When discussing casteism, clearly define it as a narrow group loyalty detrimental to national unity. For causes and remedies, provide diverse examples and categorize solutions into educational, social, economic, and legal reforms to show a holistic understanding.

 

Question 5. साम्प्रदायिकता से क्या अभिप्राय है? हमारे देश में साम्प्रदायिक तनाव के क्या कारण हैं? इन्हें दूर करने के लिए आप किन उपायों का सुझाव देंगे? या समूह-तनाव के लिए उत्तरदायी सम्प्रदायवाद के कारणों की विवेचना कीजिए | या साम्प्रदायिकता से सामूहिक तनाव बढ़ता है।” इस कथन की विवेचना कीजिए। सम्प्रदायवाद के कारणों पर प्रकाश डालिए।
Answer: साम्प्रदायिकता का आशय
(Meaning of Communalism)
साम्प्रदायिकता का दूसरा नाम 'धार्मिक उन्माद या मजहबी जनून भी है। सम्प्रदायवाद का एक कलुषित कारनामा यह भी है कि इसने मजहब या सम्प्रदाय को 'धर्म' (Religion) का एक पर्यायवाची बना दिया है। दुनिया के सभी मनुष्यों को एक ही धर्म है और वह है – मानवता (Humanity)। मजहब या सम्प्रदाय के सन्दर्भ में कहा गया है 'मजहब में अक्ल का दखल नहीं है, किन्तु धर्म तो सद्ज्ञप्ति, सविवेक तथा सदाचरण पर आधारित होता है। इस प्रकार धर्म और सम्प्रदाय को अलग-अलग करके देखा जाना चाहिए। धर्म के प्रति आकर्षण एवं आस्था मानव-मात्र को प्रेम, बन्धुत्व एवं सहयोग के पथ पर आरूढ़ करते हैं, किन्तु साम्प्रदायिक सिद्धान्त उनमें मार-काट एवं पशु-प्रवृत्ति का बीजारोपण करते हैं।
साम्प्रदायिकता की भावना के प्रबल हो जाने की स्थिति में अपने सम्प्रदाय से सम्बन्धित सभी बातें अच्छी एवं महान प्रतीत होती हैं तथा अन्य सम्प्रदायों की सभी बातों को हीन एवं बुरा माना जाने लगता है। इस स्थिति में विभिन्न सम्प्रदायों के मध्य प्रायः एक प्रकार की पृथकता या अलगाव की भावना का विकास होने लगता है तथा यही भावना अनेक बारं पारस्परिक विरोध का रूप भी ग्रहण कर लेती है। इस प्रकार का विरोध बढ़ जाने पर शत्रुता एवं संषर्घ को रूप ग्रहण कर लेता है। यह दशा अन्ध-साम्प्रदायिकता की दशा होती है। इस प्रकार की दशाओं में ही साम्प्रदायिक दंगे हुआ करते हैं। वास्तव में साम्प्रदायिकता में अन्धविश्वासों, पूर्वाग्रहों एवं पक्षपात के तत्त्वों की बहुलता होती है। साम्प्रदायिकता व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के लिए हानिकारक एवं इनकी प्रगति में बाधक कारक है। राष्ट्र की प्रगति के लिए साम्प्रदायिकता का पूर्ण रूप से उन्मूलन होना अति आवश्यक है।
साम्प्रदायिक तनाव के कारण
(Causes of Communal Tension)
सम्प्रदायवाद एवं साम्प्रदायिकता के विशद् अध्ययन से साम्प्रदायिक तनाव के अनेक कारण ज्ञात होते हैं। सभी कारणों का तो यहाँ वर्णन नहीं किया जा सकता, कुछ मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
(1) ऐतिहासिक कारण – भारत में साम्प्रदायिक संघर्ष तथा तनाव कोई नयी बात नहीं है। इतिहास के झरोखे से देखने पर इसका सम्बन्ध शताब्दियों पूर्व मुगलों के आक्रमण से जुड़ता है। वस्तुतः मुसलमान लोग विदेशी आक्रान्ताओं के रूप में भारत आये और उन्होंने तत्कालीन आर्यों की सम्पत्ति लूटकर यहाँ भारी मार-काट मचाई। इस भाँति, साम्प्रदायिक तनाव की शुरुआत मुसलमानों के भारत पर आक्रमण के साथ ही हो गयी थी। भारत के मूल निवासी अर्थात् हिन्दुओं के मन में मुसलमानों के प्रति विदेशीपन का भाव स्थायी रूप धारण कर गया और मुसलमान सदा के लिए अत्याचार और अन्याय के प्रतीक बन गये। स्पष्टतः वर्तमान साम्प्रदायिकता का विषे भारत में मुसलमानों के साथ आया। हिन्दू-मुसलमानों में पहले से ही एक-दूसरे के प्रति पूर्वाग्रह बन चुके हैं, जिन्हें साम्प्रदायिक तनाव के लिए उत्तरदायी कहा जा सकता है।
(2) सांस्कृतिक कारण – विभिन्न सांस्कृतिक कारणों से भी साम्प्रदायिक तनाव उत्पन्न होते हैं। हिन्दू संस्कृति के अनेक प्रतीक, मुस्लिम संस्कृति के प्रतीकों से न केवल भिन्न हैं अपितु विरोधी भी हैं। गो-हत्या, सिर पर चोटी रखना, जनेऊ धारण करना तथा मूर्ति पूजा आदि को लेकर दोनों सम्प्रदायों में भारी मतभेद हैं। इसके अतिरिक्त रहन-सहन, खान-पान, उठना-बैठना, पूजा की पद्धति तथा अन्य सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी पर्याप्त अन्तर विद्यमाने हैं। इन विभिन्न सांस्कृतिक अन्तरों के कारण दोनों सम्प्रदायों के मध्य तनाव और संघर्ष पैदा होते रहते हैं।
(3) भौतिक कारण – सामाजिक-सांस्कृतिक समानता के आधार पर विभिन्न समुदायों के लोगों ने भारत में अपनी अलग-अलग बस्तियाँ बनाकर रहना पसन्द किया। सभी समुदायों का रहन-सहन तथा खान-पान का तरीका अलग-अलग होने से अनेक नगरों में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख तथा ईसाई लोग पृथक् बस्तियाँ या कॉलोनी बनाकर रहते हैं। इस अलगाववादी प्रवृत्ति से तनाव और संघर्ष का होना स्वाभाविक ही है।
(4) सामाजिक एवं आर्थिक कारण- हिन्दू तथा मुसलमान सम्प्रदायों के सामाजिक रीति-रिवाज, प्रथाएँ, पहनावा, रहन-सहन, धर्म, विचार तथा साहित्य में एक-दूसरे से पर्याप्त अन्तर हैं। इससे दोनों में पारस्परिक तनाव पैदा होना स्वाभाविक है। इसके अतिरिक्त ये दोनों सम्प्रदाय आर्थिक आधार पर भी एक-दूसरे से अलग हैं। स्पष्टतः सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से पृथकता के कारण साम्प्रदायिक विद्वेष, तनाव एवं संघर्ष जन्म ले लेते है।
(5) संजनीतिक कारण- कुछ राजनीतिक दल नियमों, सिद्धान्तों, कर्तव्यों तथा राष्ट्रीय हितों की परवाह किए बिना, अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए साम्प्रदायिक तनाव को प्रोत्साहन देते हैं। ये दल अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति हेतु अक्सर विभिन्न सम्प्रदायों के बीच नासमझी तथा अफवाहों के मध्याम से तनाव एवं संघर्ष को प्रेरित करते हैं, उन्हें आपस में लड़ाकर स्वयं वाहवाही लूटते हैं और अपना चुनावी उल्लू सीधा करते हैं। हाल ही में, रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को साम्प्रदायिक रंग देकर विभिन्न राजनीतिक दल अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं।
(6) मनोवैज्ञानिक कारण विभिन्न सम्प्रदायों में एक- दूसरे के प्रति विरोधी पूर्वाग्रहों (अर्थात् एक-दूसरे के लिए घृणा व विद्वेष) के कारण अनबन तथा तनाव की स्थिति बनी रहती है। स्पष्टतः एक-दूसरे के प्रति पहले से बनी हुई पूर्वधारणाएँ ही तनाव का कारण बनती हैं। साम्प्रदायिक लोगों में बिना किसी स्पष्ट कारण या विवेक के ही अन्य सम्प्रदायों के प्रति घृणा के मनोभावे उत्पन्न हो जाया करते हैं। एक हिन्दू अकारण ही एक मुसलमान को देशद्रोही तथा एक मुसलमान अकारण ही एक हिन्दू को काफिर समझ बैठता है। स्पष्टतः साम्प्रदायिक तनावों की पृष्ठभूमि में मनोवैज्ञानिक कारण काफी सक्रिय तथा महत्त्वपूर्ण कहे जा सकते हैं।
साम्प्रदायिक तनावों को दूर करने के उपाय
(Measurse to Remove Communal Tensions)
साम्प्रदायिकता राष्ट्रीय अखण्डता तथा एकता की जड़ में हलाहल (विष) के समान है। यह एक सम्प्रदाय के लोगों के मन में आतंक, असुरक्षा, सन्देह, घृणा तथा नकारात्मक मनोवृत्ति का बीजारोपण कर उसे अकारण ही अन्य सम्प्रदाय का आजन्म शत्रु बना देती है। मनुष्य; मानव-प्रेम और विश्व-बन्धुत्व पर आधारित अपने सर्वव्यापी एवं सार्वभौमिक धर्म 'मनुष्यता का परित्याग कर, साम्प्रदायिकता की क्षुद्र एवं संकीर्ण भावधारा को अपना लेता है, जिससे उसकी बौद्धिक एवं आत्मिक मुक्ति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। इन सभी तथ्यों के आधार पर निर्विवाद कहा जा सकता है कि साम्प्रदायिकता एवं उससे जन्मे तनावों को आमूल उखाड़ फेंकना होगा। साम्प्रदायिक तनावों को अग्रलिखित उपायों से दूर किया जा सकता है
(1) इतिहास की नवीन व्याख्या तथा उसका प्रचार- राष्ट्रीय इतिहास के सृजन एवं प्रचार-प्रसार के लिए इतिहास को नयी दृष्टि एवं नयी व्याख्या देनी होगी। निस्सन्देह भारत का इतिहास मुगलकाल से ही साम्प्रदायिक तनावों के प्रमाण प्रस्तुत करता है, किन्तु यदि उन पुरानी बातों तथा दृष्टान्तों को ही बार-बार दोहराया जाएगा। तो इससे साम्प्रदायिक तनाव कम नहीं होंगे। इसके लिए इतिहास के ऐसे प्रसंगों पर बल दिया जाना चाहिए जिनसे एक-दूसरे के प्रति मैत्री भाव तथा सहयोग का परिचय मिले । उदाहरण के तौर पर, बच्चों को बताना होगा कि भारत की आजादी के लिए हिन्दू और मुसलमान दोनों कन्धे-से-कन्धा मिलाकर लड़े और दोनों ने भारत-माँ की रक्षा हेतु अपने प्राण उत्सर्ग किए। कांग्रेस और आजाद हिन्द फौज के सेनानी इसके साक्षात् प्रमाण । भारत की सेना का योद्धा वीर अब्दुल हमीद पाकिस्तान के खिलाफ लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुआ ।
(2) सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना - साम्प्रदायिक तनावों में कमी लाने की दृष्टि से विभिन्न सम्प्रदायों के बीच सामाजिक दूरी को समाप्त कर सुमधुर एवं प्रगाढ़ सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना करनी होगी। इसके लिए आवश्यक है कि अल्पसंख्यकों के नाम पर चलने वाली समस्त शिक्षण संस्थाएँ बन्द हों तथा सभी सम्प्रदाय के बालकों की सम्मिलित शिक्षण संस्थाओं में एकसमान पढ़ाई-लिखाई हो । एक सम्प्रदाय के लोग अन्य सम्प्रदायों के शादी-विवाह, सहभोज तथा अन्य आयोजनों में सम्मिलित हों। सभी सम्प्रदाय एक-दूसरे की धार्मिक व सामाजिक भावनाओं का सम्मान करें तथा सभी के धार्मिक स्थलों की मर्यादा व प्रतिष्ठा का पूरा ध्यान रखा जाए।
(3) सांस्कृतिक विनिमय- सांस्कृतिक विनिमय के माध्यम से भी साम्प्रदायिक तनावों व संघर्षों का वेग कम किया जा सकता है। इसके लिए विभिन्न सम्प्रदायों के मिश्रित सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए। सम्मिलित पर्व व त्योहारों; जैसे-ईद, दीपावली व होली आदि को उत्साह से मनाना चाहिए। इससे विभिन्न सम्प्रदायों की मिथ्या धारणाएँ, भ्रामक प्रचार तथा आपसी नासमझी समाप्त होती है और वे कटुता भूलकर एक-दूसरे के अधिक नजदीक आते हैं।
(4) राष्ट्रीयता का प्रचार- उल्लेखनीय रूप से भारत एक धर्म-निरपेक्ष राज्य है; अतः साम्प्रदायिक तनावों को समाप्त करने तथा साम्प्रदायिक सद्भाव उत्पन्न व विकसित करने के उद्देश्य से राष्ट्रीयता का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए। इसके लिए विभिन्न राष्ट्रीय पर्वो को मिल-जुलकर धूमधाम से मनाना चाहिए। जब विभिन्न सम्प्रदायों के लोग अपने राष्ट्र के प्रति एक समान निष्ठा तथा आस्था के भाव रखेंगे, तभी साम्प्रदायिकता की क्षुद्र भावना का प्रभाव कम हो सकेगा।
(5) राजनीतिक उपाय – विभिन्न साम्प्रदायिक दलों पर कानूनी रोक लगा देनी चाहिए तथा उनके नेतृत्व को मनमानी करने से रोक देना चाहिए। जो लोग कानून की अवज्ञा करें, उन्हें कठोर दण्ड दिया जाए। चुनाव आदि राजनीतिक गतिविधियों में साम्प्रदायिकता को साधन के रूप में प्रयोग करने वाले दलों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही की जाए। समस्त राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्रों से साम्प्रदायिकता के पक्ष में प्रकाशित उद्घोषणाओं को हटवा दिया जाए। साम्प्रदायिक तनाव एवं संघर्षों के समर्थन में प्रकाशित सामग्री, पत्र-पत्रिकाओं तथा जनसंचार के माध्यमों पर कड़ा प्रतिबन्ध लगाया जाए। इन सभी राजनीतिक उपायों से साम्प्रदायिकता के विरुद्ध जनमत तैयार हो सकता है।
(6) भौगोलिक एवं आर्थिक प्रयास – विभिन्न सम्प्रदायों के मध्य स्थित अलगाववादी प्रवृत्तियों को हताश करने के लिए सभी सम्प्रदायों के लोगों को एक ही कॉलोनी में बसने हेतु प्रोत्साहित किया जाए। एक ही सम्प्रदाय द्वारा बसाई गई बस्तियाँ मोहल्ले या कॉलोनियाँ समाप्त करने के प्रयास हों तथा सभी को एक साथ मिलकर रहने के सम्पर्क कार्यक्रम शुरू हों। इसी प्रकार आर्थिक विषमता के दोष को दूर करने की दृष्टि से श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक व लाभांश दिलाया जाए। उनके कार्य की दशाओं में सुधार हो, शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था के साथ-साथ ही उनके तथा परिवारजनों के जीवन की सुरक्षा का प्रबन्ध भी हो ।
(7) मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं उपाय - मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी कुछ आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण कदम उठाकर साम्प्रदायिक तनावों में कमी लाई जा सकती है। सर्वप्रथम, अल्संख्यकों को आश्वस्त करके उन्हें विश्वास में लेना होगा। उनके मन से भय, घृणी तथा असुरक्षा की भावनाओं को दूर करना होगा। स्वस्थ्य प्रचार के माध्यम से भ्रामक एवं निराधार विश्वासों को प्रभावहीन बनाना होगा। विभिन्न सम्प्रदायों की एक-दूसरे के प्रति मनोवृत्ति बदलने के लिए ठोस एवं सक्रिय कदम उठाने होंगे। तभी वे सब एक राष्ट्रीय धारा में सम्मिलित हो सकेंगे।
(8) शिक्षा- साम्प्रदायिक तनावों व संघर्षों का अन्त करने के लिए शिक्षा की समुचित व्यवस्था करनी होगी। शिक्षा से उदारता व विनम्रता आती है, वैज्ञानिक चिन्तन विकसित होता है तथा अन्धविश्वास व रूढ़ियाँ मिट जाती हैं। शिक्षितजनों को धार्मिक कट्टरपंथी अपने चंगुल में नहीं फँसा सकते। शिक्षा समाज को सम्पन्नता तथा समृद्धि की राह पर ले जाती है। एक शिक्षित, सम्पन्न एवं समृद्ध समाज साम्प्रदायिक विनाश से कोसों दूर रहता है। वस्तुतः साम्प्रदायिकता के उन्मूलन का एक सहज एवं कारगर उपाय शिक्षा ही है।
In simple words: Communalism refers to an extreme form of religious fanaticism where one's own community is seen as superior, leading to hatred and conflict with other groups, often fueled by historical, cultural, socio-economic, political, and psychological factors like prejudice. To mitigate it, strategies include reinterpreting history to promote harmony, fostering social integration, cultural exchange, promoting nationalism, implementing strict legal and political measures against divisive elements, addressing economic disparities, and utilizing psychological approaches to build trust and understanding.

🎯 Exam Tip: When defining communalism, emphasize its divisive and harmful nature. For causes and remedies, provide a broad spectrum of factors and solutions, ensuring to mention the role of education, law, and inter-group interaction for a comprehensive answer.

 

Question 6. भाषावाद से आप क्या समझते हैं? भाषागत तनाव के कारण बताइए तथा उसके निवारण के उपाय भी बताइए । या भाषागत तनाव को रोकने के लिए क्या उपाय किये जाने चाहिए? या भाषावाद के किन्हीं दो कारणों के बारे में लिखिए। या भाषावाद के निराकरण के कोई चार उपाय लिखिए।
Answer: भाषावाद
(Linguism)
भाषा मन के भावों के अभिव्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है। भाषागत समानता विभिन्न व्यक्तियों को एक-दूसरे की ओर आकर्षित करती है, जबकि भाषागत भिन्नता के कारण लोग पृथकता या अलगाव महसूस करते हैं। यही कारण है कि एक ही भाषा बोलने वाले दो अपरिचित व्यक्ति भी शीघ्र ही एक-दूसरे से अपनी बात कह सकते हैं तथा पारस्परिक निकटता बना लेते हैं। इससे भिन्न दो भिन्न भाषा-भाषी अपनी बात न तो कह सकते हैं और न ही समझ सकते हैं-निकट होते हुए भी वे एक-दूसरे से अलग रहते हैं। वास्तव में, भाषा में एकीकरण की प्रबल क्षमताएँ पाई जाती हैं। हमारा देश एक बहुभाषायी देश है। इससे जहाँ एक ओर हमारे देश की सांस्कृतिक समृद्धि हुई, वही कुछ समस्याएँ। भी उम्पन्न हुई हैं। भाषाओं की विविधता के कारण उत्पन्न होने वाली मुख्यतम समस्या है-भाषावाद का प्रबल होना।
भाषावाद का अर्थ
(Meaning of Linguism)
कोई भी सिद्धान्त, मत, विचार या माध्यम समाज के लिए उस समय तक हानिकारक नहीं है जब तक कि वह 'वाद' (ism) की शक्ल नहीं ले लेता; 'वाद' बनते ही वह समस्या बनकर उभरता है। अत: भारत में भाषाओं की विविधता साहित्य एवं संस्कृति के बहुआयामी विकास की दृष्टि से एक अच्छी एवं प्रशंसनीय बात कही जा सकती है, किन्तु यदि भाषाओं की विविधता 'वाद' का रूप लेती है तो इसे एक गम्भीर समस्या कहा जाएगा भाषावाद के अन्तर्गत एक भाषा वाला अपनी भाषा को सर्वोत्कृष्ट मानकर अन्य भाषाभाषियों को हीन समझकर उनकी उपेक्षा करता है।
वह अपनी भाषा बोलने वालों का | ही पक्षपात करता है तथा अपनी भाषा को मान्यता दिलाने के लिए उचित-अनुचित साधनों का प्रयोग भी करता है। ऐसी दशा में कहा जा सकता है कि वह व्यक्ति भाषावाद से ग्रस्त है। जब एक भाषा बोलने वाले यह अनुभव करते हैं कि उन पर दूसरी भाषा जबरदस्ती लादी जा रही है तो इससे तनाव उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार भाषावाद के कारण दो भाषाओं में विरोध उत्पन्न होता है। उदाहरणार्थ-हिन्दी के राष्ट्रभाषा बनने पर अहिन्दी भाषी वर्गों; विशेष रूप से दक्षिण के लोगों ने हिन्दी भाषा का प्रबल विरोध किया। दक्षिण भारतवासियों का विचार है कि हिन्दी उन पर लादी जा रही । है। वे हिन्दी भाषा के प्रयोग के विरुद्ध तनाव से भर उठते हैं और संघर्ष के लिए तत्पर हो उठते हैं। असम में बंगाली के खिलाफ आन्दोलन होते हैं। पंजाब प्राप्त के पंजाब एवं हरियाणा में विभाजन के समय पंजाबी व हिन्दी भाषा के समर्थकों तथा प्रचारकों में तनाव रहा। ये सभी भाषावाद से प्रेरित तनाव एवं संघर्षात्मक परिस्थितियों के उदाहरण हैं। भाषावाद की समस्या ने राष्ट्र की एकता और प्रतिष्ठा को खतरे में डाल दिया है।
भाषावाद के कारण
(Causes of Linguism)
भारत में भाषावाद की जटिल समस्या विभिन्न परिस्थितियों एवं कारकों का परिणाम है। ये बहुतायत में हो सकते हैं और उन सभी का यहाँ विवेचन सम्भव नहीं है। भाषावाद की उत्पत्ति एवं विकास सम्बन्धित प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –
(1) ऐतिहासिक कारण – भारत में भाषावाद के कारण उत्पन्न तनाव एवं संघर्ष एक लम्बे और प्राचीन इतिहास से जुड़े हैं; अतः भाषावाद का ऐतिहासिक पक्ष भी एक महत्त्वपूर्ण कारक को जन्म देता है। हम जानते हैं कि किसी भी क्षेत्र में भाषा का उद्भव एवं विकास एक ही देन में या अल्पकाल में ही नहीं हो गया। प्रत्येक भाषा का हजारों-हजार वर्षों पुराना इतिहास है और आज वे अपने क्षेत्र के वातावरण के साथ इस प्रकार घुल-मिल गयी हैं जिस प्रकार फूल में उसकी सुगन्ध निहित होती है। स्वाभाविक रूप से किसी भी क्षेत्र के निवासियों को अपनी भाषा के साथ ऐसा भावनात्मक एवं सांवेगिक सम्बध बन जाता है कि वे उसकी उपेक्षा तथा दूसरी भाषा की मान्यता सहन नहीं कर पाते। ब्रिटिशकाल में शासन द्वारा भारतीयों पर अंग्रेजी एक अनिवार्य भाषा के रूप में लाद दी गयी, जिसे दक्षिणवासियों ने पर्याप्त रूप से अपना लिया। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया। दुर्भाग्यवश दक्षिण में हिन्दी का प्रचलन बहुत कम था; अतः उन्हें सीखने के लिए एकदम नये सिरों से प्रयास करना पड़ा, जबकि वे अंग्रेजी को आत्मसात् कर उस भाषा को अच्छी प्रकार जान। चुके थे। न तो उन्होंने हिन्दी को ग्रहण करना चाहा और न अंग्रेजी को छोड़ना चाहा। अतः हिन्दी को लेकर भाषागत एवं सांस्कृतिक आधार पर विरोध, तनाव एवं संघर्ष ने जन्म लिया । इन्हीं दशाओं ने प्रबल रूप धारण कर भाषावाद को विकसित किया।
(2) भौगोलिक कारण- देश के विभिन्न क्षेत्र भौगोलिक सीमाओं द्वारा परिसीमित होकर एक-दूसरे से अलग हो गये। अलग-अलग क्षेत्रों की अलग-अलग भाषाएँ विकसित हुईं । प्रत्येक क्षेत्र के साहित्य तथा संस्कृति में वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों; यथा-नदियों, पर्वतों, वन, स्थानीय कृषि तथा पशुओं की अभीष्ट छाप दृष्टिगोचर होती है; अतः क्षेत्र की स्थानीय भाषा के साहित्य के प्रति वहाँ के निवासियों में अपनत्व की भावना पैदा होना स्वाभाविक है। इन दशाओं में अन्य भाषाओं तथा भाषाभाषी समूहों के प्रति उदासीनता, विरोध तथा घृणा का भाव उत्पन्न होना भी स्वाभाविक हो ।
(3) राजनीतिक कारण- अनेक राजनीतिक दल अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों की सिद्धि हेतु भाषावाद को प्रेरित तथा 'प्रोत्साहित करते हैं। विशेषकर चुनावों के समय कुछ राजनीतिक नेता लोग वोट प्राप्त करने की दृष्टि से अल्पसंख्यक भाषा-भाषियों की भावनाओं व संवेगों को उभारकर तनाव एवं संघर्ष उत्पन्न करा देते हैं जिससे जन-धन की हानि होती है। क्योंकि ये लोग भाषा को मुद्दा बनाकर उखाड़-पछाड़ कर राजनीतिक प्रपंच रचते हैं; अतः एक विशेष भाषा से प्रेम व लगाव रखने वालों का उन्हें समर्थन मिल जाता है जो उनके निर्वाचन काल हेतु सर्वाधिक उपयोगी कहा जा सकता है।
(4) सामाजिक कारण- भाषावाद के जन्म और विकास के कुछ सामाजिक कारण भी हैं। जिस समाज की मान्यताएँ जिस भाषा में स्थान पाती हैं, उस समाज में उस भाषा को भरपूर सम्मान मिलता है। उस समाज के सदस्य उस भाषा से तो विशेष लगाव रखते हैं, किन्तु अन्य भाषाओं से, जिनसे उनकी मान्यताओं का कोई सरोकार नहीं है, घृणा करने लगते हैं। भाषावाद इसी सामाजिक प्रक्रिया का एक दुष्परिणाम है।
(5) आर्थिक कारण- यदि किसी देश की सरकार खासतौर से एक भाषा-भाषी समूह को प्रोत्साहन देने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करती है तो अन्य भाषा-भाषी समूह उस भाषा से विद्वेष एवं घृणा का भाव रखने लगते हैं। ऐसी परिस्थितियों में भाषावाद को बल मिलता है।
(6) मनोवैज्ञानिक कारण- भाषावाद की पृष्ठभूमि में व्यक्ति की संकीर्ण आत्मसम्मान की भावना निहित होती है, जिसके परिणामस्वरूप लोग अपनी भाषा को अच्छा तथा अन्य भाषाओं को बुरा बताने लगते हैं। किसी भाषा के जानने तथा प्रयोग करने वालों की उस भाषा से भावनात्मक एवं संवेगात्मक सहानुभूति हो जाती है। भाषा व्यक्ति के अवधान को केन्द्रित करती है; अतः एक भाषा के ज्ञाता व प्रयोग करने वाले एक-दूसरे के जल्दी सम्पर्क में आते हैं, लेकिन उनमें दूसरी भाषा वालों के प्रति । वैसी भावनात्मक या सांवेगिक अनुरक्ति नहीं होती। इससे भाषावाद का उद्भव एवं विकास होता है।
भाषीवाद के निवारण के उपाय
(Measures to Remove Linguism)
भाषावाद के विभिन्न कारणों का विवेचन करने के उपरान्त भाषावाद को समाप्त करने के उपायों की खोज करनी होगी। इस तनाव से संघर्ष की परिस्थितियाँ देश की एकता व अखण्डता के लिए। विषाक्त एवं हानिकारक हैं। यदि भाषावाद का विष देश में इसी प्रकार संचरित होता रहा तो जल्दी ही देश हजारों भाषाओं के नाम पर टुकड़ों में बँट जाएगा; अतः भाषावाद का उन्मूलन अनिवार्य है। इसके प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं –
(1) राष्ट्रीय भाषा का विकास एवं राष्ट्रीय समर्थन- सम्पूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने की दृष्टि से एक राष्ट्रीय भाषा का विकास होना आवश्यक है। इसके लिए देश-भर के लोगों को एक राष्ट्रीय भाषा के सिद्धान्त को मान्यता प्रदान करनी होगी। लोगा अनिवार्य रूप से एक राष्ट्रीय भाषा की आवश्यकता अनुभव करें तथा विदेशी भाषा के स्थान पर एक स्वदेशी भाषा को समर्थन देने के लिए प्रेरित व तत्पर हों। राष्ट्रीय भाषा के चुनाव की समस्या पर विचार करना यहाँ हमारा उद्देश्य नहीं है, किन्तु उल्लेखनीय रूप से यह भाषा समूचे देश की सम्पर्क भाषा हो जिसे अधिक-से-अधिक संख्या में लोग समझते, बोलते तथा प्रयोग करते हों। जनसमर्थित राष्ट्रीय भाषा का विकास एवं प्रयोग राष्ट्र को एकता एवं अखण्डता की ओर अग्रसर करेमा ।
(2) क्षेत्रीय भावनाओं को सम्मान एवं प्रोत्साहन - हम जानते हैं कि विभिन्न भौगोलिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक कारणों से एक क्षेत्र-विशेष के निवासी अपनी भाषा को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं तथा उसके प्रति अथाह प्रेम एवं लगाव प्रदर्शित करते हैं; अतः क्षेत्रीय भाषाओं की उपेक्षा नहीं की जा सकती । विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं को मान्यता प्रदान करने के साथ-साथ उन्हें राजकीय कार्यों में भी प्रयोग करने की छूट दी जानी चाहिए। इससे क्षेत्रीय विकास प्रोत्साहित होगा तथा स्थानीय लोगों में आत्म-स्वाभिमान पैदा होगा। स्पष्टतः भाषावाद तथा भाषावाद तनावों का अन्त करने के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में प्रतिष्ठा का ध्यान रखना होगा।
(3) साम्प्रदायिकता एवं क्षेत्रवाद का विरोध- साम्प्रदायिकता एवं क्षेत्रवाद के बन्धन भाषावाद को उकसाकर इसे राष्ट्रीय एकता के पैरों की बेड़ियाँ बना देते हैं। भाषावाद की समस्या का अन्त करने के लिए साम्प्रदायिक एवं क्षेत्रीय आधार पर उपजी विकृतियों तथा विषमताओं को नष्ट करना होगा। अतः साम्प्रदायिक एवं क्षेत्रीय भावनाओं का एक साथ मिलकर पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए।
(4) सांस्कृतिक विनिमय- सांस्कृतिक विनिमय के माध्यम से भी भाषावाद का निवारण सम्भव है। इसके लिए विभिन्न भाषाओं के साहित्य का अन्य भाषाओं के अनुवाद करने कार्य के को। प्रोत्साहित किया जाए। बहू-भाषी कवि सम्मेलनों, दूरदर्शन के कार्यक्रमों, सिनेमा, नाटक आदि के माध्यम से विभिन्न भाषा-भाषी समूहों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान की व्यवस्था करनी चाहिए । भिन्न-भिन्न भाषा-भाषी समूहों के कलाकारों, साहित्यकारों, रंगकर्मियों, पत्रकारों, लेखकों तथा कवियों को पारस्परिक सम्पर्क के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए ।
(5) राजनीतिक उपाय- भाषागत तनावों से बचने के लिए ऐसे राजनीतिक दलों पर कठोर नियन्त्रण की आवश्यकता है जो अपने स्वार्थों की सिद्धि हेतु विभिन्न भाषा-भाषी समूहों को शिकार बना लेते हैं। भाषायी तनाव व विद्रोह भड़काने वाले राजनीतिक एजेण्टों को पकड़कर दण्डित किया जाना चाहिए।
(6) सही सोच का प्रचार-प्रसार- देशवासियों में इस सोच का प्रचार किया जाना चाहिए कि भाषा तो अभिव्यक्ति का माध्यम है। स्वार्थ-सिद्धि का साधन बनाकर इसका दुरुपयोग करना अक्षम्य अपराध है। सभी भाषाएँ समान रूप से प्रतिष्ठित एवं मान्य हैं किसी भी भाषा का महत्त्व कम नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में अंग्रेजी हो या हिन्दी या किसी ग्रामीण अचंल में बोली जाने वाली ऐसी भाषा जिसे लिपिबद्ध भी नहीं किया जा सकता–सभी को बराबर महत्त्व है; अतः भाषा को लेकर विवाद नहीं है।
In simple words: Linguism is the tendency for speakers of one language to consider their language superior and disregard others, creating division. It stems from historical imposition of languages, geographical isolation leading to distinct linguistic identities, political exploitation, social attachment to one's language, economic favouritism, and psychological identification. To counter this, promoting a national language with popular support, respecting regional languages, combating communalism and regionalism, fostering cultural exchange, implementing political controls on divisive linguistic movements, and promoting an inclusive understanding of language as a tool of expression are essential.

🎯 Exam Tip: When defining linguism, emphasize its divisive nature arising from perceived language superiority. For causes, categorize them into historical, geographical, political, social, economic, and psychological. For remedies, propose multi-faceted solutions involving language policy, cultural exchange, and political responsibility.

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. जातिगत समूह-तनाव से क्या आशय है?
Answer: भारतीय समाज में अनेकानेक जातियों का उद्भव और विकास हुआ है तथा उनके अपने-अपने विचार एवं दृष्टिकोण निर्मित हुए हैं। विचारों और दृष्टिकोण में पर्याप्त अन्तर की घाई ने उनके मध्य सामाजिक दूरी को अत्यधिक बढ़ा दिया। इसके परिणामस्वरूप जातियों में ऊँच-नीच को भेदभाव उभरने लगा। किसी जाति-विशेष के लोग पूर्वाग्रहों तथा अज्ञानता के कारण निज जाति के प्रति अन्ध-भक्ति तथा अन्य जातियों के प्रति संकुचित दृष्टिकोण से भर गये जिससे मानवता का व्यापक दृष्टिकोण आहत हुआ । काका कालेलकर ने उचित ही कहा है, “जातिवाद एक अबाधित, अन्ध समूह-भक्ति है जो कि न्याय, औचित्य, समानता और विश्वबन्धुत्व की उपेक्षा करती है।” जातिवाद की संकुचित विचारधारा ने सामाजिक सम्बन्धों में संकीर्णता, विरोध, पक्षपात, प्रतिद्वन्द्विता तथा पारस्परिक घृणा के बीज बो दिये, जिससे देश के प्रत्येक भाग में जातीय तनाव उत्पन्न हो गया। समय के साथ-साथ जातिगत भावना ने जातिगत सामूहिक तनाव को उग्र एवं स्थायी बनाया है।
In simple words: Caste-based group tension arises from deeply ingrained caste systems where individuals show blind loyalty to their own caste, fostering prejudice and discrimination against others. This leads to social distance, conflict, and a restricted worldview, ultimately weakening societal harmony and national unity.

🎯 Exam Tip: Define caste-based group tension clearly by linking it to social distance, prejudice, and its negative impact on broader human values. Mentioning a relevant quote or authority figure strengthens your answer.

 

Question 2. जातिवाद के दुष्परिणामों का उल्लेख कीजिए। या जातिवाद के कोई दो दुष्परिणाम लिखिए।
Answer: जातिवाद के विस्तार से किसी जाति-विशेष के सदस्यों को तो लाभ होता है, किन्तु वहीं दूसरी ओर जातिवाद की उन्नति से समूचे देश और समाज की हानि भी होती है। यदि जातिवाद एक जाति की स्वार्थ-सिद्धि का प्रभावशाली यन्त्र है तो सम्पूर्ण मानव जाति के लिए सबसे बड़ा अभिशाप भी है। जातिवाद के अनेक दुष्परिणामों में से कुछ निम्नलिखित रूप में हैं
(1) राष्ट्रीयता एकता में बाधा – जातिवाद फैलने से राष्ट्र विभिन्न स्वार्थी समूहों में बँट जाता है। जिनका एकमात्र लक्ष्य अपने-अपने हितों की पूर्ति तथा स्वार्थों की सिद्धि होता है। इसके परिणामस्वरूप भिन्न जातियों के मध्य समूह-तनाव एवं संघर्ष उत्पन्न होते हैं जिससे राष्ट्र की शक्ति कमजोर पड़ती है। स्पष्टतः जातीयता के आधार पर विभाजन के फलस्वरूप राष्ट्र की एकता को खतरा पैदा होता है तथा राष्ट्रीय विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।
(2) राष्ट्रीय क्षमता का ह्रास- जातिगत भावना पक्षपात को प्रोत्साहित करती है। पक्षपात राष्ट्र के मानवीय संसाधनों के उचित उपयोग में बाधक है। कम योग्य और कम क्षमता वाले व्यक्ति अधिक योग्य एवं अधिक क्षमतावान व्यक्तियों का स्थान ले लेते हैं जिससे राष्ट्र की सक्षम मानव ऊर्जा उचित अवसरों की तलाश में अपनी शक्ति और समय को व्यर्थ करती है। इस भाँति जातिवाद बढ़ने से राष्ट्रीय क्षमता और क्रियाशीलता को निरन्तर ह्यास होता है।
(3) प्रजातन्त्र के लिए खतरा - प्रजातन्त्र के मूलभूत सिद्धान्त हैं— स्वतन्त्रता, समानता तथा बन्धुत्व की भावना । इसके विपरीत जातिवाद असमानता, वर्ग-भावना, वैमनस्य, विद्वेष, पक्षपात तथा तनाव पर आधारित है। इससे प्रजातन्त्र को भारी खतरा पैदा हो गया है। के० एम० पणिक्करे ने उचित वही कहा है, “वास्तव में जब तक उपजाति तथा संयुक्त परिवार रहेंगे तब तक समाज का कोई भी संग्रठन समानता के आधार पर सम्भव नहीं है।”
(4) पक्षपात तथा भ्रष्टाचार को बढ़ावा- पक्षपात और भ्रष्टाचार ये दोनों विचार साथ-साथ चलते हैं। जातिवाद के कारण पक्षपात की भावना प्रोत्साहित होती है, उचित-अनुचित का विवेक समाप्त हो जाता है तथा अन्याय एवं अनैतिकता का बोलबाला हो जाता है। इससे निश्चय ही भ्रष्टाचार प्रेरित होता है जिससे समाज को हानि पहुँचती है।
In simple words: Casteism gravely undermines national unity by dividing society into self-serving groups, obstructing development. It leads to the erosion of national capability by promoting favoritism over merit, hindering the efficient use of human resources. Furthermore, it poses a significant threat to democracy by fostering inequality and discord, and fuels widespread corruption and partiality, causing harm to society.

🎯 Exam Tip: When asked about the ill effects of casteism, focus on its impact on national unity, resource allocation, democratic values, and corruption. Providing clear, concise points with brief explanations will yield higher marks.

 

Question 3. साम्प्रदायिक समूह-तनाव से क्या आशय है?
Answer: भारत विभिन्न सम्प्रदायों का देश है। यहाँ प्रमुख रूप से हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई-इन चार सम्प्रदायों के लोग रहते हैं, जिसकी वजह से इनसे सम्बन्धित साम्प्रदायिक विभिन्नता भी दृष्टिगोचर होती है। विभिन्न सम्प्रदायों के मध्य पाये जाने वाले विरोध एवं तनाव को साम्प्रदायिक तनाव कहते हैं। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय 1947 ई० में हुए साम्प्रदायिक दंगों ने इस साम्प्रदायिक तनाव को स्थायी बना दिया। तभी से हिन्दू और मुस्लिम दोनों सम्प्रदायों के लोग एक-दूसरे को सन्देह, घृणा तथा वैमनस्य की दृष्टि से देखने लगे। आज भी दोनों सम्प्रदायों में समूह-तनाव की स्थिति बनी हुई है। इसी प्रकार पंजाब समस्या ने हिन्दू और सिक्ख सम्प्रदायों के बीच सन्देह, विरोध एवं तनाव को वातावरण पैदा करने की कोशिश में है। ऐसा साम्प्रदायिक समूह-तनाव देश के विभिन्न नगरों; जैसे-मेरठ, अलीगढ़, आगरा आदि में साम्प्रदायिक उन्माद को बढ़ाकर साम्प्रदायिक दंगों में बदल देता है।
In simple words: Communal group tension refers to the conflict and animosity that arise between different religious communities within a society. In India, this tension is historically rooted, manifesting as suspicion, hatred, and hostility, often leading to communal riots and undermining national unity.

🎯 Exam Tip: Define communal group tension by highlighting its inter-religious nature and its manifestation as conflict. Mentioning historical context and real-world examples (like riots or specific regions) adds depth to your answer.

 

Question 4. टिप्पणी लिखिए-भारत में साम्प्रदायिकता।
Answer: भारत हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई तथा पारसी इत्यादि अनेक सम्प्रदायों के अनुयायियों का निवास स्थान है, किन्तु इनमें से मुख्य सम्प्रदाय सिर्फ दो हैं – हिन्दू सम्प्रदाय तथा मुस्लिम सम्प्रदाय । विदेशी आक्रान्ताओं के रूप में मुसलमान शासकों ने भारत में प्रवेश किया तथा यहाँ की हिन्दू प्रजा पर अमानुषिक अत्याचार किये । हिन्दूजन उस अत्याचार, दमन और त्रासदी भरे काल को आज भी भुला नहीं सके हैं। इसके परिणामस्वरूप, हिन्दू और मुस्लिम सम्प्रदायों के बीच लम्बे समय से चली आ रही विरोध एवं प्रतिशोध की भावना आज भी समूह-तनाव और संघर्ष पैदा कर देती है।
आधुनिक काल में इन दोनों सम्प्रदायों के बीच सबसे बड़ा संघर्ष तथा तनाव भारत की स्वतन्त्रता-प्राप्ति एवं विभाजन की प्रक्रिया के दौरान हुआ था। देश दो टुकड़ों में बँट गयो-भारत और पाकिस्तान । इस विभाजन के परिणामस्वरूप हिन्दू और मुसलमानों में शताब्दियों पूर्व के पूर्वाग्रह जाग । उठे और दोनों सम्प्रदाय साम्प्रदायिक दंगों की भयंकर विभीषिका के शिकार हुए। हजारों बच्चों, बूढ़ों, युवक-युवतियों और वयस्कों का कत्ल हुआ और लाखों-करोड़ों लोग बेघर हो गये। सच तो यह है कि आज भी भारत के मुसलमान और हिन्दूजन एक-दूसरे से समायोजित नहीं हो पाये हैं। दोनों ओर ।
पूर्वाग्रहों तथा विरोधी भावनाओं के पलीते में आग लगाने वाली समस्याओं, घटनाओं, उन्मादी लोगों तथा दलों की भरमार है। जरा-सी चिंगारी छूते ही साम्प्रदायिक दंगों की ज्वाला प्रज्वलित हो उठती है। मेरठ, अलीगढ़, इलाहाबाद, मुरादाबाद, दिल्ली तथा गुजरात के कुछ नगर आदि कई संवेदनशील नगरों में अनेक बार सोम्प्रदायिकता की भयानक विभीषिका अपना कहर ढा चुकी है।
In simple words: Communalism in India refers to the deep-seated religious divides, primarily between Hindus and Muslims, stemming from historical conflicts and foreign invasions. This long-standing animosity, exacerbated by the partition of India, often erupts into violent communal riots in various sensitive cities, fueled by prejudice, misinformation, and political exploitation.

🎯 Exam Tip: When discussing communalism in India, focus on its historical roots, its manifestation in post-independence conflicts (like partition), and its impact on social harmony. Providing specific examples of affected cities or events can strengthen your analysis.

 

Question 5. साम्प्रदायिकता का व्यक्तित्व के विकास पर क्या प्रभाव पड़ता है?
Answer: मनुष्य का व्यक्तित्व उसकी सभी शारीरिक, जन्मजात तथा अर्जित वृत्तियों का योग है। यह उनके परिवेश में स्थित विभिन्न कारकों के अन्तःकार्य से उत्पन्न व्यक्ति की आदतों, मनोवृत्तियों व गुणों का एक गतिशील संगठन है। मनुष्य का व्यक्तित्व उसके आरम्भिक काल से ही विकसित होने लगता बालक के मस्तिष्क की तुलना एक कोरी स्लेट से की गयी है जिस पर कुछ भी लिखा जा सकता है। साम्प्रदायिक वातावरण में रहने वाले बालक में आरम्भ काल से ही विभिन्न प्रकार की पूर्वधारणाएँ।
विकसित होने लगती हैं। पूर्वधारणा में पूर्व-निर्णय, भ्रान्तिपूर्ण विश्वास तथा राग-द्वेष के संवेग निहित होते हैं। विवेकहीन मान्यताओं तथा अन्धविश्वासों के आधार पर बने पूर्वाग्रह या पूर्वधारणाएँ बालक के व्यक्तित्व पर बुरा प्रभाव डालती हैं। दो विरोधी समुदाय के बालकों में विकसित प्रतिकूल अभिवृत्तियाँ छनमें द्वेष, तनाव तथा शत्रुता के भाव पैदा करेंगी।
अभिवृत्ति के आधार पर ही सामाजिक शत्रुता या मित्रता निर्मित होती है; अतः प्रतिकूल अभिवृत्ति के आधार पर निर्मित सामाजिक शत्रुता; साम्प्रदायिक तनाव एवं दंगे के समय; अपना कुप्रभाव दिखाती है। व्यवहार और अभिवृत्तियाँ पर्याप्त सीमा तक विश्वासों से सम्बन्धित हैं। हिन्दुओं को पुनर्जन्म में विश्वास है लेकिन मुसलमानों का नहीं। यह विश्वास उत्पन्न होने पर कि अमुक हमारे विरोधी और शत्रु हैं, साम्प्रदायिक भावना को बल मिलता है। यही कारण है कि बालक में विविध सम्प्रदायों के प्रति पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण निर्मित हो जाता है। यह दृष्टिकोण उसके व्यक्तित्व के विकास को बाधित करता है।
साम्प्रदायिकता एक क्षुद्र एवं संकुचित मानसिकता के कारण पैदा होती है। यह एक ओर मानव की बुद्धि को अपने बन्धनों में जकड़ लेती है और उसे विकास नहीं करने देती तथा दूसरी ओर यह मानव को समाज और वातावरण के विभिन्न अवयवों से उचित सामयोजन नहीं करने देती, जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व असन्तुलन को प्राप्त होता है और उसके व्यक्तित्व का विकास रुक जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि साम्प्रदायिकता हर दृष्टिकोण से बुरी है तथा इसका व्यक्तित्व के विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
In simple words: Communalism significantly impairs personality development by instilling negative attitudes, prejudices, and irrational beliefs from childhood. It fosters feelings of hatred and tension towards other communities, leading to social animosity and hindering intellectual and psychological growth. This narrow mindset prevents individuals from achieving balanced development and adapting well to their environment.

🎯 Exam Tip: When discussing communalism's impact on personality, focus on how it distorts attitudes, fosters prejudice, and impedes holistic development. Emphasize the psychological harm and its effect on social adjustment.

 

Question 6. सम्प्रदायवाद की रोकथाम के किन्हीं दो उपायों के बारे में संक्षेप में लिखिए।
Answer: सम्प्रदायवाद की रोकथाम के लिए उपयोगी उपाय इस प्रकार हैं-
1. मिश्रित सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए। इन कार्यक्रमों के आयोजनों से विभिन्न सम्प्रदाय एक-दूसरे के निकट आते हैं, उनकी अच्छाइयों का पता चलता है तथा अनेक प्रकार की मिथ्या धारणाएँ समाप्त होती हैं।
2. साम्प्रदायिकता को नियन्त्रित करने के लिए व्यापक स्तर पर इसके विरुद्ध प्रचार किया जाना चाहिए। जन-संचार के सभी माध्यमों द्वारा साम्प्रदायिकता से होने वाली हानियों तथा इसके बुरे परिणामों को जन-साधारण तक पहुँचाना चाहिए ।
In simple words: To prevent communalism, two key measures are organizing mixed cultural programs that bring different communities together, fostering understanding and dispelling misconceptions. Secondly, widespread public awareness campaigns through all mass media are essential to educate people about the harms of communalism and its negative consequences.

🎯 Exam Tip: For short answers on communalism prevention, focus on actionable and impactful measures. Cultural integration and public awareness campaigns are strong points that cover both social interaction and knowledge dissemination.

 

Question 7. क्षेत्रीय समूह-तनाव से क्या आशय है?
Answer: भारत एक उप-महाद्वीप तथा विशाल भौगोलिक-राजनीतिक इकाई है जो विभिन्न क्षेत्रों में विभाजित है। प्रत्येक क्षेत्र की भौगोलिक सीमाओं, धर्म, संस्कृति एवं भाषा, रहन-सहन तथा सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक स्वार्थों ने उस क्षेत्र-विशेष के निवासियों के मन में अपने क्षेत्र की सुख-समृद्धि एवं प्रगति तथा अन्य क्षेत्रों के प्रति अलगाव की भावना को जन्म दिया। परिणामतः एक क्षेत्र के लोग अपने क्षेत्र वालों के प्रति प्रेम तथा दूसरे क्षेत्र वालों के प्रति विद्वेष, घृणा और विरोध की भावना रखने लगे।
किसी क्षेत्र-विशेष के लिए पक्षपात, अन्धभक्ति, निहित स्वार्थ, संकुचित मानसिकता तथा अन्य क्षेत्रों के प्रति उपेक्षा क्षेत्रवाद' (Regionalism) को जन्म देते हैं। एक क्षेत्र के लोग अपनी माँगों के समर्थन. तथा अन्य के विरोध में आन्दोलन इत्यादि करते हैं, जिनकी परिणति हिंसात्मक दंगों में होती है।
इससे एक-दूसरे के प्रति घृणा बढ़ती है और लोगों में क्षेत्रीय तनाव उत्पन्न होने लगता है। क्षेत्रीयता के आधार पर बढ़ती हुई घृणा और पूर्वाग्रह; क्षेत्रीय समूह-तनाव को स्थायी बना देते हैं। हमारे देश में क्षेत्रीय आर्धार पर मुम्बई राज्य को गुजरात एवं महाराष्ट्र में और पंजाब को पंजाब एवं हरियाणा में विभाजित किया मैया है। समय-समय पर कुछ अन्य क्षेत्र भी अलग राज्य की मांग करते रहते हैं; इससे क्षेत्रीय समूह-तुनाव बढ़ रहा है और राष्ट्र की एकता को आघात पहुँचा रहा है।
In simple words: Regional group tension arises when people in a specific geographical area develop a strong sense of loyalty to their region's prosperity, often leading to feelings of alienation, prejudice, and animosity towards other regions. This regionalism can escalate into protests and violent conflicts as groups advocate for their demands or oppose others, threatening national unity.

🎯 Exam Tip: Define regional group tension by linking it to geographical, cultural, and socio-economic factors that create a strong sense of regional identity. Highlight its potential to cause conflict and threaten national integrity.

 

Question 8. भाषागत समूह-तनाव से क्या आशय है?
Answer: भाषागत समूह-तनाव भाषा भावाभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। इसमें एकीकरण की प्रबल शक्ति होती है। क्योंकि इसी के माध्यम से एक व्यक्ति दूसरे के सम्पर्क में आकर विचारों का आदान-प्रदान करता है। भारत में हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, मराठी, गुजराती, बंगाली, तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, कश्मीरी, सिन्धी तथा असमिया अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। देश के संविधान में 22 भाषाओं को राष्ट्रीय महत्त्व देते हुए हिन्दी को राष्ट्रभाषा स्वीकार किया गया है।
अहिन्दी भाषा वर्गों ने हिन्दी भाषा का जबरदस्त विरोध किया। उन्हें हिन्दी भाषा का प्रभुत्व स्वीकार नहीं है। इसके बदले वे अंग्रेजी भाषा के प्रति पक्षपात दिखाते हैं। असम में असमी तथा बंगाली भाषाओं के आधार पर असन्तोष व्याप्त है। विभिन्न भाष्य-भाषी लोगों में सम्पर्क तथा भाषायी आधार पर राज्यों की स्थापना को लेकर काफी तनाव पाया जाता है। इससे आन्दोलन, राजनीतिक षडयन्त्र तथा हिंसात्मक उपद्रव होते हैं।
भाषायी तनाव; संघर्ष और रक्तपात में बदलकर सैकड़ों-हजारों लोगों की जान तथा करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति तबाह कर देते हैं। इससे उत्पन्न देश के बंटवारे के विचार से राष्ट्रीय एकता खतरे में पड़ती है। सर्वविदित है कि गुजरात और महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक तथा आन्ध्र प्रदेश की स्थापना भाषायी तनावों का ही दुष्परिणाम है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश, बंगाली भाषा के आधार पर पाकिस्तान से अलग हुआ । भाषागत समूह-तनाव किसी भी देश की अखण्डता और प्रभुसत्ता के लिए खतरनाक सिद्ध होते हैं।
In simple words: Linguistic group tension refers to conflicts arising from language differences, especially when one language group feels superior or oppressed by another. In India, a multi-linguistic nation, this tension often escalates due to historical language impositions or political mobilization, leading to social unrest, violence, and threats to national unity.

🎯 Exam Tip: Define linguistic group tension by emphasizing language as a medium of expression and its potential to cause division in diverse societies. Provide examples from India to illustrate its historical and political implications.

 

Question 9. पूर्वाग्रहों की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।
Answer: पूर्वाग्रहों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
1. किसी भी वस्तु, व्यक्ति, समूह अथवा विचार के प्रति अनुकूल या प्रतिकूल अभिवृत्तियों तथा । विश्वासों के नाम पूर्वाग्रह है।
2. किसी व्यक्ति, समुदाय, पदार्थ अथवा समाज के प्रति लिये गये पूर्व निर्णय या पहले से ही निर्मित आग्रह को पूर्वाग्रह रहते हैं।
3. पूर्वाग्रहों का निर्माण व्यक्ति की मानसिक अभिवृत्तियों तथा संवेगों से होता है। इनके निर्माण में व्यक्तित्व के ज्ञानात्मक, प्रत्यक्षात्मक, प्रेरणात्मक तथा संवेगात्मक सभी पक्ष क्रियाशील होकर कार्य करती हैं।
4. पूर्वाग्रह अच्छे भी हो सकते हैं और बुरे भी, अनुकूल भी हो सकते हैं और प्रतिकूल भी, सही भी हो सकते हैं और गलत भी; किन्तु इस बात का परीक्षण नहीं किया जा सकता कि ये पूर्वाग्रह किन तथ्यों या सत्य पर आधारित हैं।
5. ज्यादातर पूर्वाग्रह भ्रम तथा आतंक उत्पन्न करने वाले होते हैं और सामुदायिक, धर्मगत, जातिगत या परम्परागत किसी भी प्रकार के हो सकते हैं।
6. पूर्वाग्रह वंश परम्परागत तथा जन्मजात नहीं होते, अपितु ये अर्जित होते हैं। कोई भी व्यक्ति पूर्व निर्मित आग्रह को लेकर पैदा नहीं होता बल्कि उसमें अनुकूल या प्रतिकूल विश्वास एवं अभिवृत्तियाँ कट्टरवादियों द्वारा विकसित किये जाते हैं।
7. पूर्वाग्रह लोगों के व्यक्तित्व के अभिन्न अंग बन जाते हैं जिसके फलस्वरूप समूह में व्यवहार सम्बन्धी दोष पैदा होने लगते हैं जो समूह-तनाव उत्पन्न कर देते हैं।
8. समूह-तनाव सामुदायिक, जातीय तथा वर्ग-संघर्ष, सामाजिक संघर्ष तथा युद्ध की विभीषिका को जन्म देते हैं।
In simple words: Prejudices are preconceived, often irrational, attitudes or beliefs towards objects, people, groups, or ideas, which can be positive or negative, and are largely acquired rather than innate. They involve cognitive, perceptual, motivational, and emotional aspects of personality, becoming an integral part of an individual's worldview, frequently leading to misconceptions and fueling various forms of group tension like communal, caste, or class conflicts.

🎯 Exam Tip: When listing characteristics of prejudice, ensure you highlight its nature as a preconceived, often irrational attitude, its acquired nature, and its multifarious impact on personality and group dynamics. Provide at least 5-6 distinct points.

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. भारतवर्ष में समूह-तनाव के विभिन्न रूप क्या हैं?
Answer: भारत एक विशाल देश है जिसमें अनेक जातियों, उपजातियों, सम्प्रदायों, वर्गों तथा भिन्न भाषा-भाषी लोग विभिन्न क्षेत्रों में निवास करते हैं। इस विविधता ने जहाँ एक ओर भारतीय समाज एवं संस्कृति को समृद्ध बनाया है, वहीं दूसरी ओर विभिन्न समूह तनावों को भी बल दिया है। हमारे देश में मुख्य रूप से चार प्रकार के समूह-तनाव पाये जाते हैं-
1. जातिगत समूह-तनाव,
2. साम्प्रदायिक समूह-तनाव,
3. क्षेत्रीय समूह-तनाव तथा
4. भाषागत समूह-तनाव।
In simple words: In India, group tensions manifest primarily in four forms: caste-based tension, arising from social hierarchies and discrimination; communal tension, stemming from religious differences and conflicts; regional tension, driven by loyalties and disparities between different geographical areas; and linguistic tension, caused by conflicts over language identity and dominance.

🎯 Exam Tip: For this question, simply list the four main types of group tensions prevalent in India. A clear, concise enumeration is sufficient.

 

Question 2. रुढियुक्तियों को परिभाषित कीजिए या रूढ़ियुक्तियों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
Answer: किम्बाल यंग ने रूढ़ियुक्ति को इन शब्दों में परिभाषित किया है, “रूढ़ियुक्ति एक भ्रामक वर्गीकरण करने की धारणा है जिसके साथ पसन्द अथवा नापसन्द तथा स्वीकृति अथवा अस्वीकृति की प्रबल संवेगात्मक भावना जुड़ी होती है। इस प्रकार रूढ़ियुक्तियों काल्पनिक मत हैं, जो तर्क पर आधारित नहीं होते, बल्कि व्यक्ति की पसन्द अथवा नापसन्द पर आधारित होते हैं। रूढ़ियुक्तियों से सम्बन्धित कोई ठोस प्रमाण नहीं होता। रूढ़ियुक्तियाँ प्रायः पूर्वाग्रहों को जन्म देती हैं तथा इन्हीं पूर्वाग्रहों ले समाज में सामूहिक-तनाव उत्पन्न होते हैं।
In simple words: Stereotypes are oversimplified, often inaccurate, and emotionally charged beliefs about groups, characterized by strong feelings of like or dislike, acceptance or rejection. These are typically unfounded in logic or solid evidence, often giving rise to prejudices that contribute to collective societal tensions.

🎯 Exam Tip: Provide a clear definition of stereotypes, emphasizing their unsubstantiated nature and their connection to emotions and prejudices. Citing a key theorist like Kimball Young can add credibility to your answer.

 

Question 3. समूह-तनाव-निवारण में शिक्षा की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
Answer: समूह-तनाव-निवारण के विभिन्न उपायों में से सर्वाधिक उपयोगी एवं विश्वसनीय उपाय है—शिक्षा का प्रसार । वास्तव में समूह-तनाव की उत्पत्ति संकीर्ण दृष्टिकोण, पूर्वाग्रहों तथा अन्धविश्वासों आदि के कारण ही होता है। शिक्षा इन कारकों को समाप्त करने में सहायक होती है, शिक्षित व्यक्ति का दृष्टिकोण उदार एवं व्यापक होता है, वह पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर तटस्थ रूप से चिन्तन करता है तथा अन्धविश्वासों से मुक्त होती है।
इस स्थिति में समूह-तनावों की उत्पत्ति की सम्भावना कम हो जाती है। इसके अतिरिक्त शिक्षा ग्रहण करते समय भिन्न-भिन्न समूहों एवं वर्गों के बालक एक साथ रहते हैं तथा परस्पर निकट सम्पर्क में आते हैं। इससे भी विभिन्न समूहों में विद्यमान सामाजिक दूरी घटती है तथा समूह-तनाव की सम्भावना भी प्रायः नहीं रहती। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि समूह-तनाव के निवारण में शिक्षा की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।।
In simple words: Education is a crucial tool for preventing group tension because it counters narrow-mindedness, prejudices, and superstitions—the root causes of such tensions. By fostering an open and broad perspective, education helps individuals think objectively, interact closely with diverse groups, and reduces social distance, thereby minimizing the chances of group tension.

🎯 Exam Tip: Focus on how education directly addresses the root causes of group tension (prejudice, narrow-mindedness). Emphasize its role in fostering open-mindedness, promoting inter-group contact, and reducing social distance for a comprehensive answer.

 

Question 4. संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए-भारत की भाषाएँ।
Answer: भारत एक विस्तृत एवं विशाल देश है। यहाँ कश्मीर से कन्याकुमारी तथा कच्छ' से अरुणाचल प्रदेश तक अनेकानेक भाषाएँ बोली जाती हैं। यहाँ अनेक धर्म और सम्प्रदाय के लोगों के समान ही भिन्न-भिन्न भाषाएँ तथा उपभाषाएँ भी प्रचलित हैं। विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न मुख्य भाषाएँ बोली तथा लिखी जाती हैं, इनके अतिरिक्त सिर्फ बोलचाल में प्रयोग की जाने वाली विविध स्थानीय बोलियाँ हैं जो प्रत्येक 50 किलोमीटर के अन्तर पर बदल जाती हैं। इनका क्षेत्र सीमित है तथा इनका कोई साहित्य भी विकसित नहीं हैं। हमारे देश की मुख्य भाषाएँ-हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, मराठी, गुजराती, बंगाली, तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, असमी तथा कश्मीरी इत्यादि हैं। भारत के संविधान में हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया है।
In simple words: India is a vast and linguistically diverse country, with numerous languages and dialects spoken across its regions. While Hindi is recognized as the national language in the Constitution, major languages like Urdu, Punjabi, Marathi, Gujarati, Bengali, Tamil, Telugu, Malayalam, Kannada, Assamese, and Kashmiri are also prominent, contributing to a rich cultural tapestry but also sometimes leading to linguistic tensions.

🎯 Exam Tip: Briefly state India's linguistic diversity. List several major languages and mention Hindi's status as the national language. Keep it concise as it's a short note.

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

 

Question I. निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए |
Answer: 1. समाज के विभिन्न अंगों के मध्य विकसित होने वाली सामाजिक दूरी के परिणामस्वरूप प्रबल | होने वाले तनाव को सामूहिक तनाव कहते हैं।
2. एक समूह के अधिकांश लोगों द्वारा दबाव, बेचैनी एवं चिन्ता की अनुभूति समूह-तनाव कहलाती है।
3. दक्षिण अफ्रीकी में श्वेतों तथा अश्वेतों के मध्य पाये जाने वाला तनाव प्रजातीय तनाव
4. निश्चित विषय-वस्तुओं, सिद्धान्तों, व्यक्तियों के प्रति बिना कारण के अनुकूल या प्रतिकूल अभिवृत्ति को पूर्वाग्रह कहते हैं।
5. ब्रिट के अनुसार पूर्वाग्रह का अर्थ अपरिपक्व अथवा पक्षपातपूर्ण मत है।
6. किसी परिस्थिति में पक्षपातपूर्ण एवं अपरिपक्व मत पूर्वाग्रह कहलाते हैं।
7. पक्षपात या पूर्वाग्रह समूह-तनाव का कारण बनता है।
8. पूर्वाग्रह समूह-तेनावों को बढ़ावा देते हैं।
9. पूर्वाग्रहों के कारण व्यक्ति का दृष्टिकोण पक्षपातपूर्ण हो जाता है।
10. अपनी जाति को महान् तथा अन्य जातियों को हीन मानने के परिणामस्वरूप विकसित होने वाले तनाव को जातिगत समूह-तनाव कहते हैं।
11. सामाजिक दूरी के कारण 'जातीय दूरी' में वृद्धि होती है।
12. अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन देकर जातिगत तनाव को कम किया जा सकता है।
13. यातायात एवं प्रचार साधनों ने भी जातिवाद को बढ़ावा दिया है।
14. हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, पारसी आदि समूहों के मध्य समय-समय पर उत्पन्न होने वाले तनाव को साम्प्रदायिक तनाव कहा जाता है।
15. साम्प्रदायिक भावना की चरम परिणति प्रायः साम्प्रदायिक तनाव के रूप में होती है।
16. सम्प्रदायवाद सामूहिक तनाव का एक कारण हो सकता है।
17. सांस्कृतिक आदान-प्रदान से साम्प्रदायिक तनाव को समाप्त किया जा सकता है।
18. क्षेत्रवाद समूह तनाव का एक रूप है।
19. भाषावाद समूह तनाव का एक रूप है।
20. नकारात्मक प्रभाव के रूप में भाषावाद क्षेत्रीय तनाव के लिए उत्तरदायी हो सकता है।
21. सभी प्रकार के समूह-तनाव को कम करने में शिक्षा को प्रसार सहायक होता है।
22. किसी व्यक्ति या समुदाय पर गलत आरोप लगाकर तनाव उत्पन्न करने को अफवाहें, दंगे फैलाना कहा जाती है।
In simple words: This section tests knowledge of terms related to group tension, prejudice, casteism, communalism, and linguism, focusing on their definitions, causes, and impacts. The correct answers fill in the blanks, identifying concepts like social tension, emotional states, forms of prejudice, and methods to mitigate these issues.

🎯 Exam Tip: For fill-in-the-blanks, thoroughly understand the core definitions and causal relationships of key terms like 'group tension', 'prejudice', and different forms of social conflicts. This ensures accurate recall and correct completion.

 

Question II. निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –
Answer: Question 1. समूह-तनाव से क्या आशय है?
Answer: समूह-तनाव उस स्थिति का नाम है जिसमें समाज का कोई वर्ग, सम्प्रदाय, धर्म, जाति या राजनीतिक दल; दूसरे के प्रति भय, ईर्ष्या, घृणा तथा विरोध से भर जाता है।
Question 2. भारतीय समाज में मुख्य रूप से किस-किस प्रकार के समूह-तनाव पाये जाते हैं?
Answer: भारतीय समाज में पाये जाने वाले समूह-तनाव के मुख्य रूप हैं-जातिगत समूह-तनाव, भाषागत समूह-तनाव, क्षेत्रगत समूह-तनाव तथा साम्प्रदायिक समूह-तनाव ।
Question 3. समूह-तनाव के सामान्य वातावरणीय कारणों का उल्लेख कीजिए।
Answer: समूह-तनाव के सामान्य वातावरणीय कारण हैं-ऐतिहासिक कारण, भौतिक कारण, सामाजिक कारण, धार्मिक कारण, आर्थिक कारण, राजनीतिक कारण तथा सांस्कृतिक कारण।
Question 4. समूह-तनाव के चार मुख्य मनोवैज्ञानिक कारणों का उल्लेख कीजिए।
Answer:
1. पूर्वाग्रह,
2. भ्रामक विश्वास, रूढ़ियाँ और प्रचार,
3. मिथ्या दोषारोपण तथा
4. व्यक्तित्व एवं व्यक्तिगत भिन्नताएँ।
Question 5. पूर्वाग्रह से क्या आशय है?
Answer: पूर्वाग्रह एक ऐसा निर्णय होता है जो तथ्यों के समुचित परीक्षण के पूर्व लिया जाता है।
Question 6. पूर्वाग्रह से छुटकारा पाने के मुख्य उपाय क्या हैं?
Answer:
1. पारस्परिक सम्पर्क,
2. शिक्षा,
3. सामाजिक-आर्थिक समानता,
4. भावात्मक एकता,
5. सन्तुलित व्यक्तित्व तथा
6. चेतना जाग्रत करना।
Question 7. जातिवाद से क्या आशय है?
Answer: जातिवाद किसी जाति या उपजाति के सदस्यों की वह भावना है जिसमें वे देश, अन्य जातियों या सम्पूर्ण समाज के हितों की अपेक्षा अपनी जाति या समूह के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक हितों या लाभों को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
Question 8. जातिवाद के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
Answer:
1. अपनी जाति की प्रतिष्ठा की एकांगी भावना,
2. व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान,
3. विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्ध,
4. आजीविका में सहायक,
5. नगरीकरण तथा औद्योगीकरण,
6. यातायात तथा प्रचार के साधनों का विकास ।
Question 9. भारत में साम्प्रदायिक तनाव के चार मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
Answer:
1. ऐतिहासिक कारण
2. सांस्कृतिक कारण,
3. राजनीतिक कारण तथा
4. मनोवैज्ञानिक कारण।
Question 10. भाषावाद के निवारण के मुख्य उपायों का उल्लेख कीजिए।
Answer:
1. राष्ट्रीय भाषा का विकास एवं राष्ट्रीय समर्थन,
2. क्षेत्रीय भाषाओं को सम्मान एवं प्रोत्साहन,
3. साम्प्रदायिकता एवं क्षेत्रवाद का विरोध,
4. सांस्कृतिक विनिमय,
5. राजनीतिक उपाय तथा
6. सही सोच का प्रचार-प्रसार ।,
In simple words: This section provides concise answers to fundamental questions about group tensions in India. It defines group tension, outlines its various forms (caste, communal, regional, linguistic), lists environmental and psychological causes, clarifies the meaning of prejudice, and enumerates solutions for both prejudice and specific tensions like casteism and linguism, as well as the causes of communal tension in India.

🎯 Exam Tip: For single-sentence answers, be direct and precise. Focus on capturing the core definition or the primary list of causes/remedies without extensive elaboration. Enumerated lists are excellent for questions asking for multiple points.

बहुविकल्पीय प्रश्न

 

Question 1. “मनोवैज्ञानिक अर्थों में तनाव, दबाव, बेचैनी तथा चिन्ता की अनुभूति है।” यह कथन किस मनोवैज्ञानिक का है?
(क) जेम्स ड्रेवर
(ख) कोलमैन
(ग) क्रेच तथा क्रचफील्ड
(घ) बेलार्ड
Answer: (ख) कोलमैन
In simple words: This question identifies the psychologist who defined tension as a feeling of stress, pressure, restlessness, and anxiety in psychological terms. The correct answer is Coleman.

🎯 Exam Tip: For definition-based MCQs, memorize key psychologists and their associated definitions. Direct recall of concepts and their originators is essential.

 

Question 2. समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों या समूहों के बीच सामाजिक दूरी के बढ़ जाने की स्थिति को कहते हैं – (क) सामूहिक संघर्ष (ख) पारस्परिक सहयोग (ग) समूह-तनाव (घ) सामूहिक सौहार्द
Answer: (ग) समूह-तनाव
In simple words: The condition where social distance increases between different groups or classes in society is known as group tension. This option correctly identifies the outcome of growing social separation.

🎯 Exam Tip: Understand the direct implications of social dynamics. Increased social distance is a primary indicator and cause of group tension, making it the most appropriate answer.

 

Question 3. निम्नलिखित में कौन समूह-तनाव का कारण है-
(क) शिक्षा
(ख) खेल
(ग) रूढ़ियुक्तियाँ
(घ) राष्ट्रीय पर्व
Answer: (ग) रूढ़ियुक्तियाँ
In simple words: Among the given options, stereotypes (रूढ़ियुक्तियाँ) are a significant cause of group tension, as they create prejudiced beliefs and negative attitudes towards other groups. Education, sports, and national festivals generally promote harmony, not tension.

🎯 Exam Tip: Identify factors that inherently lead to conflict or division. Stereotypes, being biased and often negative generalizations, are a direct source of group tension.

 

Question 4. व्यक्तिगत, सामुदायिक, परम्परागत विश्वासों तथा वृत्तियों के आधार पर जब किसी सम्प्रदाय, धर्म, वर्ग, क्षेत्र या भाषा के प्रतिकूल या अनुकूल धारणा बना ली जाती है तो उसे क्या कहते हैं? (क) सम्प्रदायवाद (ख) समूह-तनाव (ग) भ्रामक दृष्टिकोण (घ) पूर्वाग्रह
Answer: (घ) पूर्वाग्रह
In simple words: When a preconceived notion, either favorable or unfavorable, is formed about a community, religion, class, region, or language based on personal, communal, or traditional beliefs without proper evaluation, it is called prejudice. This term accurately describes the formation of such biased views.

🎯 Exam Tip: Recognize the definition of "preconceived notion" or "prejudgment." This directly points to the concept of prejudice, which is a fundamental psychological cause of group tension.

 

Question 5. प्रबल जातिवाद की भावना के कारण विकसित होने वाले सामाजिक तनाव को कहते हैं – (क) अनावश्यक तनावे (ख) गम्भीर सामूहिक तनाव (ग) जातिगर्त समूह-तनाव। (घ) इनमें से कोई नहीं
Answer: (ग) जातिगर्त समूह-तनाव ।
In simple words: The social tension that arises specifically due to strong feelings of casteism is known as caste-based group tension. This term precisely describes the nature of the tension originating from caste divisions.

🎯 Exam Tip: Link the cause (casteism) directly to the specific type of tension it generates. "Caste-based group tension" is the most accurate and descriptive option.

 

Question 6. निम्नलिखित में से कौन-सा सामूहिक तनाव है जो केवल भारतीय समाज में ही पाया जाता (क) भाषागत समूह-तनाव (ख) धर्मगत समूह-तनाव (ग) क्षेत्रगत समूह-तनाव (घ) जातिगत समूह-तनाव
Answer: (घ) जातिगत समूह-तनाव
In simple words: Among the given options, caste-based group tension is a form of collective tension uniquely prevalent and deeply entrenched within Indian society, distinct from linguistic, religious, or regional tensions which are more universal.

🎯 Exam Tip: Identify the social issue that is historically and culturally most specific to India. While other tensions exist, casteism is a defining characteristic of Indian social dynamics.

 

Question 7. निम्नलिखित में कौन जातिवाद का दुष्परिणाम नहीं है –
(क) भ्रष्टाचार
(ख) पक्षपात
(ग) समूह-तनाव
(घ) अन्तर्जातीय विवाह
Answer: (घ) अन्तर्जातीय विवाह
In simple words: Inter-caste marriage is a measure to reduce casteism and promote social harmony, making it a positive step rather than a negative consequence. Corruption, partiality, and group tension are all detrimental outcomes of casteism.

🎯 Exam Tip: Distinguish between negative consequences and potential remedies. Inter-caste marriage is typically proposed as a solution to, not a negative outcome of, casteism.

 

Question 8. अपनी भाषा को उच्च तथा अन्य भाषाओं को हीन मानने से उत्पन्न होने वाले सामाजिक तनाव को कहते हैं – (क) गम्भीर सामाजिक तनावे (ख) क्षेत्रीय तनाव (ग) भाषागत तनाव (घ) साम्प्रदायिक तनाव
Answer: (ग) भाषागत तनाव
In simple words: The social tension arising from considering one's own language superior and other languages inferior is called linguistic tension. This term specifically describes conflicts rooted in linguistic differences and biases.

🎯 Exam Tip: Connect the specific cause (language superiority/inferiority) to its direct effect. "Linguistic tension" accurately describes this type of social conflict.

 

Question 9. किस प्रकार के समूह-तनाव को कम करने का उपाय है-अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन? (क) भाषागत समूह-तनाव (ख) धर्मगत समूह-तनाव (ग) जातिगत समूह-तनाव (घ) क्षेत्रगत समूह-तनाव
Answer: (ग) जातिगत समूह-तनाव
In simple words: Promoting inter-caste marriages is a direct and effective measure to reduce caste-based group tension. By fostering unity across caste lines, it helps break down social barriers and prejudices associated with caste.

🎯 Exam Tip: Match the remedy to the specific problem it addresses. Inter-caste marriages are a common solution proposed for the reduction of caste-related tensions.

 

Question 10. हमारे देश में समय-समय पर होने वाले साम्प्रदायिक दंगों के पीछे मुख्य कारण होता है – (क) जातिगत भावना (ख) क्षेत्रीय भावना (ग) साम्प्रदायिकता की भावना (घ) विद्रोह की भावना
Answer: (ग) साम्प्रदायिकता की भावना
In simple words: The primary cause behind the recurring communal riots in our country is the feeling of communalism. This refers to the extreme loyalty to one's own religious community, often leading to hatred and conflict with others.

🎯 Exam Tip: Directly link communal riots to the underlying sentiment that fuels them. Communalism is the specific ideological basis for such conflicts.

 

Question 11. धर्मान्धता अथवा धार्मिक कट्टरता की भावना के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है- (क) सामाजिक तनाव (ख) धर्मगत समूह-तनाव (ग) वर्गवाद (घ) अनावश्यक तनाव
Answer: (ख) धर्मगत समूह-तनाव
In simple words: Religious fanaticism or extremism directly results in religious group tension. This occurs when rigid adherence to one's own faith leads to intolerance and conflict with other religious communities.

🎯 Exam Tip: Directly connect the cause (religious fanaticism) to the specific type of tension it creates. "Religious group tension" is the most accurate outcome.

 

Question 12. जातिवाद के उग्र रूप धारण कर लेने पर होता है (क) राष्ट्र की प्रगति (ख) आर्थिक उत्थान् (ग) भ्रष्टाचार का बोलबाला (घ) समाज में सहयोग
Answer: (ग) भ्रष्टाचार का बोलबाला
In simple words: When casteism intensifies, it often leads to rampant corruption within society. This is because favoritism based on caste overrides merit, fostering unfair practices and undermining transparency.

🎯 Exam Tip: Identify the negative societal outcome that is a direct consequence of entrenched casteism. Corruption, often linked to nepotism and favoritism within caste networks, is a strong example.

 

Question 13. साम्प्रदायिक तनाव को कम करने के लिए किया जाना चाहिए – (क) राष्ट्रीयता का प्रचार (ख) साम्प्रदायिक राजनीतिक दलों पर प्रतिबन्ध (ग) मिश्रित कार्यक्रमों का आयोजन (घ) ये सभी उपाय
Answer: (घ) ये सभी उपाय
In simple words: All the listed measures—promoting nationalism, banning communal political parties, and organizing mixed cultural events—are essential and effective strategies to reduce communal tension in society. A comprehensive approach is necessary.

🎯 Exam Tip: When given multiple positive solutions to a complex problem like communal tension, the "all of the above" option is often correct, indicating a multi-faceted approach is needed.

 

Question 14. मिश्रित सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन से कम किया जा सकता है – (क) जातिगत समूह-तनाव (ख) साम्प्रदायिक तनाव (ग) भाषागत तनाव (घ) हर प्रकार का समूह-तनाव
Answer: (घ) हर प्रकार का समूह-तनाव
In simple words: Organizing mixed cultural programs helps reduce all types of group tension, including caste-based, communal, and linguistic tensions, by fostering interaction, understanding, and shared experiences among diverse groups. These events promote harmony and break down barriers.

🎯 Exam Tip: Cultural exchange promotes overall social cohesion. Therefore, mixed cultural programs can broadly address and reduce various forms of group tension, not just one specific type.

 

Question 15. अपने देश में भाषावाद को नियन्त्रित करने का उपाय है – (क) व्यापक राजनीतिक प्रयास (ख) राष्ट्रभाषा को सम्मान प्रदान करना (ग) समस्त क्षेत्रीय भाषाओं को समान प्रोत्साहन (घ) ये सभी उपाय
Answer: (घ) ये सभी उपाय
In simple words: Controlling linguism in our country requires a multi-pronged approach, including comprehensive political efforts, granting respect to the national language, and equally encouraging all regional languages. All these measures combined are necessary for effective management.

🎯 Exam Tip: Similar to communal tension, linguism is a complex issue requiring multiple solutions. The option "all of the above" often correctly indicates that various strategies are collectively effective.

 

Question 16. समूह-तनाव निवारण में सर्वाधिक सहायक कारक है – (क) आर्थिक सुधार करना (ख) शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार (ग) आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार (घ) कठोर कानून बनाना
Answer: (ख) शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार
In simple words: The most significant factor in preventing group tension is the promotion and spread of education. Education helps eradicate ignorance, prejudice, and narrow-mindedness, which are fundamental causes of various societal conflicts.

🎯 Exam Tip: Education is frequently considered a foundational solution for many social issues because it addresses root causes like ignorance and prejudice. Identify it as a broad, empowering tool.

 

Question 17. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की अलग राज्य की माँग किस विचारधारा का परिणाम है? (क) जातिवाद (ख) धर्मवाद (ग) क्षेत्रवाद (घ) अन्धविश्वास
Answer: (ग) क्षेत्रवाद
In simple words: The demand for a separate state in Western Uttar Pradesh is a direct outcome of regionalism. This ideology prioritizes the interests and identity of a specific region, often leading to calls for administrative or political autonomy.

🎯 Exam Tip: Connect territorial demands or aspirations for autonomy directly to the concept of regionalism, which focuses on regional identity and interests.

 

Question 18. निम्नलिखित में से कौन समूह-तनाव को कम करता है? (क) रूढूयाँ (ख) पूर्वाह्न (ग) अशिक्षा (घ) समाज के सदस्यों के समान आदर्श और लक्ष्य
Answer: (घ) समाज के सदस्यों के समान आदर्श और लक्ष्य
In simple words: Establishing common ideals and goals among members of society significantly reduces group tension. Shared objectives foster unity, cooperation, and a sense of collective identity, thereby minimizing conflicts.

🎯 Exam Tip: Identify factors that promote cohesion and common purpose. Shared goals and ideals are powerful unifying forces that counteract division and tension.

 

Question 19. निम्नलिखित कथनों में से कौन सही है?
(क) पूर्वाग्रह सीखे नहीं जाते ।
(ख) पूर्वाग्रह असन्तोष प्रदान करते हैं।
(ग) पूर्वाग्रह सत्य पर आधारित होते हैं।
(घ) पूर्वाग्रह समूह-तनाव के लिए उत्तरदायी होते हैं।
Answer: (घ) पूर्वाग्रह समूह-तनाव के लिए उत्तरदायी होते हैं।
In simple words: The correct statement is that prejudices are responsible for group tension. Prejudices are learned, often irrational, and cause dissatisfaction, and they serve as a fundamental psychological cause of conflicts between groups.

🎯 Exam Tip: Understand the nature of prejudice and its direct impact. Prejudice is a key cause of group tension, making this the most accurate statement among the options.

 

Question 20. “सभी अश्वेत अच्छे बास्केटबॉल खिलाड़ी होते हैं।” यह कथन उदाहरण है-
(क) रूढ़ियुक्ति का
(ख) पूर्वाग्रह का
(ग) मिथ्यादोषारोपण का
(घ) संघर्ष का
Answer: (ख) पूर्वाग्रह का
In simple words: The statement "All black people are good basketball players" is an example of prejudice. It's a preconceived, often stereotypical, notion about an entire group, even if it might appear positive, reflecting a biased generalization rather than individual assessment.

🎯 Exam Tip: Recognize that prejudice involves a preconceived judgment or attitude towards a group, often based on stereotypes, whether seemingly positive or negative. This example illustrates such a generalization.

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