UP Board Solutions Class 12 Pedagogy Chapter 26 Guidance Educational and Vocational

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Detailed Chapter 26 मार्गदर्शन शैक्षिक और व्यावसायिक UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy

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Class 12 Pedagogy Chapter 26 मार्गदर्शन शैक्षिक और व्यावसायिक UP Board Solutions PDF

Detailed Answer Type Questions (विस्तृत उत्तरीय प्रश्न)

 

Question 1. निर्देशन से आप क्या समझते हैं? निर्देशन की आवश्यकता, महत्त्व एवं उपयोगिता का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
Answer: निर्देशन का अर्थ: 'निर्देशन' सामाजिक सम्पर्कों पर आधारित एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें किसी व्यक्ति द्वारा अन्य किसी व्यक्ति को इस प्रकार से सहायता प्रदान की जाती है कि वह अपनी जन्मजात और अर्जित योग्यताओं व क्षमताओं को समझते हुए अपनी समस्याओं का स्वतः समाधान करने में उपयोग कर सके। यह प्रक्रिया व्यक्ति के सर्वांगीण विकास और जीवन में सही निर्णय लेने में अत्यंत सहायक होती है।

निर्देशन की परिभाषा: प्रमुख विद्वानों के अनुसार निर्देशन को निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया जा सकता है:
1. स्किनर के शब्दों में: "निर्देशन एक प्रक्रिया है जो कि नवयुवकों को स्वयं अपने से, दूसरे से तथा परिस्थितियों से समायोजन करना सिखाती है।"
In simple words: Guidance is a helpful process where an experienced person guides someone to understand their own abilities and solve their life problems smoothly.

🎯 Exam Tip: उत्तर लिखते समय निर्देशन की परिभाषा को स्किनर जैसे प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिकों के मूल शब्दों में उद्धृत करने से पूरे अंक मिलते हैं।

Question 2. जोन्स के अनुसार, “निर्देशन एक ऐसी व्यक्तिगत सहायता है जो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे को, जीवन के लक्ष्यों को विकसित करने व समायोजन करने और लक्ष्यों की प्राप्ति में आयी हुई समस्याओं को हल करने के लिए प्रदान की जाती है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
Answer: जोन्स के अनुसार, निर्देशन एक ऐसी व्यक्तिगत सहायता है जो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे को, जीवन के लक्ष्यों को विकसित करने व समायोजन करने और लक्ष्यों की प्राप्ति में आयी हुई समस्याओं को हल करने के लिए प्रदान की जाती है। यह प्रक्रिया व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाने और उसे सही दिशा दिखाने में सहायक होती है।
In simple words: According to Jones, guidance is personal help given to a person to help them choose their goals, adjust to life, and solve their problems.

🎯 Exam Tip: परिभाषा लिखते समय विचारक का नाम और उनके मुख्य शब्दों (जैसे 'व्यक्तिगत सहायता' और 'लक्ष्यों की प्राप्ति') को रेखांकित अवश्य करें।

 

Question 3. मॉरिस के मतानुसार, “निर्देशन व्यक्तियों की स्वयं अपने प्रयत्नों से सहायता करने की एक क्रिया है जिसके द्वारा वे व्यक्तिगत सुख और सामाजिक उपयोगिता के लिए अपनी समस्याओं का पता लगाते हैं तथा उनका विकास करते हैं।” इस परिभाषा की व्याख्या कीजिए।
Answer: मॉरिस के मतानुसार, निर्देशन व्यक्तियों की स्वयं अपने प्रयत्नों से सहायता करने की एक क्रिया है जिसके द्वारा वे व्यक्तिगत सुख और सामाजिक उपयोगिता के लिए अपनी समस्याओं का पता लगाते हैं तथा उनका विकास करते हैं। यह व्यक्ति को स्वयं की क्षमताओं को पहचानने और उनका सही उपयोग करने के योग्य बनाती है।
In simple words: Morris believes that guidance helps people help themselves so they can find solutions to their problems and live a happy, useful life.

🎯 Exam Tip: मॉरिस की परिभाषा में 'स्वयं अपने प्रयत्नों से सहायता' वाक्यांश पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि यह स्व-सहायता पर बल देता है।

 

Question 4. हसबैण्ड के अनुसार, “निर्देशन व्यक्ति को उसके भावी जीवन के लिए तैयार करने, समाज में उसको अपने स्थान के उपयुक्त बनाने में सहायता देने की प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।” इस कथन को समझाइए।
Answer: हसबैण्ड के अनुसार, निर्देशन व्यक्ति को उसके भावी जीवन के लिए तैयार करने, समाज में उसको अपने स्थान के उपयुक्त बनाने में सहायता देने की प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। यह व्यक्ति को समाज का एक जिम्मेदार और उपयोगी नागरिक बनने में मदद करता है।
In simple words: Husband defines guidance as a way to prepare a person for their future and help them find their proper place in society.

🎯 Exam Tip: हसबैण्ड की परिभाषा में 'भावी जीवन' और 'समाज में उपयुक्त स्थान' जैसे मुख्य बिंदुओं को उत्तर में अवश्य शामिल करें।

 

Question 5. शिक्षा मन्त्रालय भारत सरकार के अनुसार, “निर्देशन एक क्रिया है जो व्यक्ति को शिक्षा, जीविका, मनोरंजन तथा मानव क्रियाओं के समाज सेवा सम्बन्धी कार्यों को चुनने, तैयार करने, प्रवेश करने तथा वृद्धि करने में सहायता प्रदान करती है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
Answer: शिक्षा मन्त्रालय भारत सरकार के अनुसार, निर्देशन एक क्रिया है जो व्यक्ति को शिक्षा, जीविका, मनोरंजन तथा मानव क्रियाओं के समाज सेवा सम्बन्धी कार्यों को चुनने, तैयार करने, प्रवेश करने तथा वृद्धि करने में सहायता प्रदान करती है। यह व्यक्ति के जीवन के हर क्षेत्र में सही निर्णय लेने में मार्गदर्शन करती है।
In simple words: The Ministry of Education states that guidance helps people choose and succeed in education, careers, hobbies, and social service.

🎯 Exam Tip: भारत सरकार की इस परिभाषा में शिक्षा, जीविका और मनोरंजन जैसे विविध क्षेत्रों का उल्लेख करना न भूलें।

 

निर्देशन की आवश्यकता, महत्त्व एवं उपयोगिता

निर्देशन की आवश्यकता हर युग में महसूस की जाती है। सदा-सर्वदा से उसके महत्त्व एवं योगदान को मान्यता प्राप्त हुई है तथा मानव-जीवन के लिए उसकी उपयोगिता भी सन्देह की दृष्टि से दूर एक सर्वमान्य तथ्य है, किन्तु मनुष्य की अनन्त इच्छाओं ने उसकी आवश्यकताओं को बढ़ाकर उसके व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा व्यावसायिक जीवन में अभूतपूर्व संकट और जटिलता उत्पन्न कर दी है। शायद इन्हीं कारणों से वर्तमान काल के सन्दर्भ में निर्देशन की आवश्यकता निरन्तर बढ़ती जा रही है। चिन्तन-मनन करने पर जीवन में निर्देशन की आवश्यकता हम अग्रलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत करते हैं:

 

Question 1. व्यक्ति के दृष्टिकोण से निर्देशन की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।
Answer: मानव-जीवन की जटिलता ने पग-पग पर नयी-नयी समस्याओं और संकटकालीन परिस्थितियों को जन्म दिया है। मनुष्य का कार्य-क्षेत्र विस्तृत हो रहा है और उसकी नित्यप्रति की आवश्यकताओं में वृद्धि हुई है। बढ़ती हुई आवश्यकताओं तथा धार्मिक विषमताओं ने मनुष्य को व्यक्तिगत, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से प्रभावित किया है। जीवन के हर एक क्षेत्र में समस्याओं के मोर्चे खुले हैं, जिनसे निपटने के लिए भौतिक एवं मानसिक दृष्टि से निर्देशन की अत्यधिक आवश्यकता है।
In simple words: Life has become very complex with many new problems. Guidance is needed to help individuals make the right choices and handle personal, social, and economic challenges.

🎯 Exam Tip: इस उत्तर में 'भौतिक एवं मानसिक दृष्टि से निर्देशन की आवश्यकता' को मुख्य बिंदु के रूप में प्रस्तुत करें।

 

Question 2. औद्योगीकरण से उत्पन्न समस्याएँ किस प्रकार निर्देशन की आवश्यकता को बढ़ाती हैं?
Answer: मनुष्य प्राचीन समय में अधिकांश कार्य अपने हाथों से किया करता था, किन्तु आधुनिक युग 'मशीनों का युग' कहा जाता है। तरह-तरह की मशीनों के आविष्कार से उद्योग-धन्धों का उत्पादन बढ़कर कई गुना हो गया है, किन्तु उत्पादन की प्रक्रिया जटिल-से-जटिल होती जा रही है। औद्योगिक दुनिया के विस्तार से नये-नये मानव सम्बन्ध विकसित हुए हैं जिनके मध्य सन्तुलन स्थापित करने की दृष्टि से निर्देशन बहुत आवश्यक है।
In simple words: Modern machines have made production fast but complex. Guidance is necessary to help workers adapt to these complicated systems and maintain good relationships at work.

🎯 Exam Tip: 'मशीनों का युग' और 'मानव सम्बन्धों में सन्तुलन' जैसे कीवर्ड्स का उपयोग करने से पूरे अंक मिलते हैं।

 

Question 3. नगरीकरण से उत्पन्न समस्याओं के समाधान में निर्देशन की क्या भूमिका है?
Answer: अधिकांश उद्योग-धन्धे तथा कल-कारखाने बड़े-बड़े नगरों में कायम हुए, इसलिए पिछले अनेक दशकों में लोगों का प्रवाह गाँवों से नगरों की ओर हुआ। नगरों में तरह-तरह की सुख-सुविधाओं, मनोरंजन के साधनों, शिक्षा की व्यवस्था, नौकरी के अवसर तथा सुरक्षा की भावना ने नगरों को आकर्षण का केन्द्र बना दिया। फलस्वरूप नगरों की संरचना में काफी जटिलता आने से समायोजन सम्बन्धी बहुत प्रकार की समस्याएँ भी उभरीं। नगरीय जीवन से उपयुक्त समायोजन करने हेतु निर्देशन की परम आवश्यकता महसूस होती है।
In simple words: As people moved from villages to cities for jobs and facilities, city life became crowded and complex. Guidance helps people adjust to this fast-paced urban lifestyle.

🎯 Exam Tip: नगरीकरण के प्रभाव के रूप में 'गाँवों से नगरों की ओर पलायन' और 'समायोजन की समस्या' को स्पष्ट रूप से लिखें।

 

Question 4. जाति-प्रथा के विघटन ने किस प्रकार निर्देशन की आवश्यकता को जन्म दिया है?
Answer: आजकल जाति और व्यवसाय का आपसी सम्बन्ध टूट गया है। इसका प्रमुख कारण जाति-प्रथा का विघटन है। पहले प्रत्येक जाति के बालकों को अपनी जाति के व्यवसाय का प्रशिक्षण परम्परागत रूप से उपलब्ध होता था। उदाहरणार्थ: ब्राह्मण का बेटा पण्डिताई व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करता था, लोहार का बेटा लोहारी और बनिये का बेटा व्यापार। यह व्यवस्था अब प्रायः समाप्त हो गयी है। इन परिवर्तित दशाओं ने व्यवसाय के चुनाव तथा प्रशिक्षण दोनों ही क्रियाओं के लिए निर्देशन की आवश्यकताओं को जन्म दिया है।
In simple words: In the past, children automatically followed their family's traditional caste occupation. Now that this system has broken down, young people need guidance to choose and train for new careers.

🎯 Exam Tip: इस उत्तर में परंपरागत व्यवसाय व्यवस्था के समाप्त होने और नए व्यावसायिक विकल्पों के चयन में निर्देशन की भूमिका को उदाहरण सहित समझाएं।

5. व्यावसायिक बहुलता

वर्तमान समय में अनेक कारणों से व्यवसायों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। औद्योगिकीकरण के परिणामस्वरूप कार्य के प्रत्येक क्षेत्र में विशेषीकरण की समस्या भी बढ़ी है। व्यावसायिक बहुलता और विशेषीकरण के विचार ने प्रत्येक बालक और किशोर के सम्मुख यह एक गंभीर समस्या खड़ी कर दी है कि वह इतने व्यवसायों के बीच से सम्बन्धित प्रशिक्षण किस प्रकार प्राप्त करे? निश्चय ही, इस समस्या का हल निर्देशन से ही सम्भव है।

 

6. मन के अनुकूल व्यवसाय का न मिलना

बेरोजगारी की समस्या आज न्यूनाधिक विश्व के प्रत्येक देश के सम्मुख विद्यमान है। आज हमारे देश में नवयुवक को मनोनुकूल, अच्छा एवं उपयुक्त व्यवसाय मिल पाना अत्यन्त दुष्कर कार्य है। हर कोई उत्तम व्यवसाय प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा रखता है, किन्तु रोजगार के अवसरों का अभाव उसे असफलता और निराशा के अतिरिक्त कुछ नहीं दे पाता। आज निराश, चिन्तित, तनावग्रस्त तथा उग्र बेरोजगार युवकों को सही दिशा दिखलाने की आवश्यकता है। उन्हें देश की आवश्यकताओं के अनुकूल तथा जीवन के लिए हितकारी शारीरिक कार्य करने की प्रेरणा देनी होगी। यह कार्य निर्देशन द्वारा ही सम्भव है।

 

7. विशेष बालकों की समस्याएँ

विशेष बालकों से हमारा अभिप्राय पिछड़े हुए/मन्दबुद्धि या प्रतिभाशाली ऐसे बालकों से है जो सामान्य बालकों से हटकर होते हैं। ये असामान्य व्यवहार प्रदर्शित करते हैं तथा सामाजिक परिस्थितियों में स्वयं को आसानी से अनुकूलित नहीं कर पाते। कुसमायोजन के कारण इनके सामने नित्यप्रति नयी-नयी समस्याएँ आती रहती हैं। ऐसे असामान्य एवं विशेष बालकों की समस्याएँ निर्देशन के माध्यम से ही पूरी हो सकती हैं।

 

8. शैक्षिक विविधता सम्बन्धी समस्याएँ

शिक्षा के विविध क्षेत्रों में हो रहे अनुसंधान कार्यों के कारण ज्ञान की राशि निरंतर बढ़ती जा रही है, जिससे एक ओर ज्ञान की नवीन शाखाओं का जन्म हुआ है, तो दूसरी ओर हर सत्र में नये पाठ्यक्रमों का समावेश करना पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त, सामान्य शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त प्रत्येक बालक के सामने यह समस्या आती है कि वह शिक्षा के विविध क्षेत्रों में से किस क्षेत्र को चुने और उसमें विशिष्टीकरण प्राप्त करे।

समाज की निरन्तर बढ़ती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जो नये एवं विशेष व्यवसाय जन्म ले रहे हैं उनके लिए किन्हीं विशेष पाठ्य-विषयों का अध्ययन अनिवार्य है। विभिन्न व्यवसायों की सफलता भिन्न-भिन्न बौद्धिक एवं मानसिक स्तर, रुचि, अभिरुचि, क्षमता व योग्यता पर आधारित है। व्यक्तिगत भिन्नताओं का ज्ञान प्राप्त करके उनके अनुसार बालक को उचित शैक्षिक मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए निर्देशन की जबरदस्त माँग है।

 

9. पाश्चात्य सभ्यता से समायोजन

आज के वैज्ञानिक युग में दो देशों के मध्य दूरी कम होने से पृथ्वी के दूरस्थ देश, उनकी सभ्यताएँ, संस्कृतियाँ, परम्पराएँ तथा रीति-रिवाज एक-दूसरे के काफी नजदीक आ गए हैं। अंग्रेजों के पदार्पण एवं शासन ने भारतीयों के मस्तिष्क पाश्चात्य सभ्यता में रंग डाले थे। वर्तमान समय में टी.वी. के विभिन्न चैनलों के माध्यम से पश्चिमी देशों के भौतिकवादी आकर्षण ने भारतीय युवाओं को इस सीमा तक सम्मोहित किया है कि वे अपने पुराने रीति-रिवाज और परम्पराएँ भुला बैठे हैं—एक प्रकार से भारतीय मूल्यों की अवमानना व उपेक्षा हो रही है। इससे असंख्य विसंगतियाँ तथा कुसमायोजन के दृष्टान्त दृष्टिगोचर हो रहे हैं। इनके दुष्प्रभाव से भारतीय युवाओं को बचाने के लिए विशिष्ट निर्देशन की आवश्यकता है।

 

10. यौन सम्बन्धी समस्याएँ

काम-वासना एक नैसर्गिक मूल-प्रवृत्ति है जो युवावस्था में विषमलिंगी व्यक्तियों में एक-दूसरे के प्रति अपूर्व आकर्षण पैदा करती है, किन्तु समाज की मान-मर्यादाओं तथा रीति-रिवाजों की सीमाओं को लाँघकर पुरुष एवं नारी का पारस्परिक मिलन नाना प्रकार की अड़चनों से भरा है। समाज ऐसे मिलन का घोर विरोध करता है। आमतौर पर काम-वासना की इस मूल-प्रवृत्ति का अवदमन होने से व्यक्ति में ग्रन्थियाँ बन जाती हैं तथा उसका व्यवहार असामान्य हो जाता है। यौन सम्बन्धों के कारण जनित विकृतियों में सुधार लाने के लिए तथा व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी निर्देशन की आवश्यकता होती है।

 

11. व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास

व्यक्तिगत एवं सामाजिक हित में मानव-शक्ति का सही दिशा में अधिकतम उपयोग अनिवार्य है, जिसके लिए व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास की आवश्यकता है। बालकों के व्यक्तित्व के सर्वांगीण तथा...

 

Question 2. शैक्षिक निर्देशन से आप क्या समझते हैं? शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
Answer: शैक्षिक निर्देशन का अर्थ शैक्षिक निर्देशन बालक की अपने कार्यक्रम को बुद्धिमत्तापूर्वक नियोजित कर पाने में सहायता करता है। यह बालकों को ऐसे पाठ्य विषयों का चुनाव करने में सहायता देता है जो उनकी बौद्धिक क्षमताओं, रुचियों, योग्यताओं तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं के अनुकूल हों। यह उन्हें इस योग्य बना देता है कि वे शिक्षा सम्बन्धी कुछ विशेष समस्याओं तथा विद्यालय की विभिन्न परिस्थिति से भली प्रकार समायोजन स्थापित कर अपने शैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें। यह प्रक्रिया विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शैक्षिक पर्यावरण से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान तथा शैक्षिक परिस्थितियों में समायोजित होने के लिए दिये जाने वाले विशिष्ट निर्देशन को शैक्षिक निर्देशन कहते हैं।

शैक्षिक निर्देशन की परिभाषाएँ:
विभिन्न मनोवैज्ञानिकों एवं विद्वानों ने शैक्षिक निर्देशन की निम्नलिखित परिभाषाएँ दी हैं:

1. आर्थर जे० जोन्स के अनुसार: “शैक्षिक निर्देशन का तात्पर्य उस व्यक्तिगत सहायता से है जो विद्यार्थियों को इसलिए प्रदान की जाती हैं कि वे अपने लिए उपयुक्त विद्यालय, पाठ्यक्रम, पाठ्य विषय एवं विद्यालय जीवन का चयन कर सकें तथा उनसे समायोजन स्थापित कर सकें।”
2. रूथ स्ट्रैंग के कथनानुसार: “व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने का मुख्य लक्ष्य उसे समुचित कार्यक्रम के चुनाव तथा उसमें प्रगति में सहायता प्रदान करना है।”
3. एलिस के शब्दों में: “शैक्षिक निर्देशन से तीन विशेष क्षेत्रों में सहायता मिलती है:
• कार्यक्रम और पाठ्य-विषयों का चयन
• चालू पाठ्यक्रम में कठिनाइयों का मुकाबला करना तथा
• अगले प्रशिक्षण हेतु विद्यार्थियों का चुनाव।”

शैक्षिक निर्देशन सम्बन्धी उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि यह प्रक्रिया बालकों के पाठ्यक्रम चयन की सर्वोत्तम विधि है। उसमें बालकों की व्यक्तिगत विभिन्नताओं, शैक्षिक उपलब्धियों, प्राप्तांकों, अभिभावकों की आशाओं, महत्त्वाकांक्षाओं तथा मनोवैज्ञानिकों के परामर्श को मुख्य रूप से ध्यान में रखा जाता है। इसके अन्तर्गत एक निर्देशक द्वारा प्राप्त किये गये निर्देशन की जाँच भी सम्भव है, इसलिए यह विधि वैज्ञानिक एवं प्रामाणिक भी है।

शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया:
पाठ्य विषयों के चयन सम्बन्धी शैक्षिक निर्देशन के निम्नलिखित तीन मुख्य पहलू हैं:
(अ) बालक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना
(ब) पाठ्य विषयों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना और
(स) पाठ्य विषयों से सम्बन्धित व्यवसायों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना।

(अ) बालक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना:
जिस बालक/व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन देना है, उसके सम्बन्ध में निर्देशक को निम्नलिखित सूचनाएँ प्राप्त कर लेनी चाहिए:

1. बौद्धिक स्तर: शैक्षिक निर्देशन में बालक में बौद्धिक स्तर का पता लगाना अति आवश्यक है। तीव्र बुद्धि वाला बालक कठिन विषयों का अध्ययन करने के योग्य होता है और इसीलिए विज्ञान एवं गणित जैसे विषयों का चुनाव कर सकता है। वह उच्च कक्षाओं तक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों के साथ सुगमतापूर्वक पहुँच जाता है। कला-कौशल और रचनात्मक कार्यों में अपेक्षाकृत कम बुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। इस भाँति बालक के लिए पाठ्य विषयों का चुनाव करने में उसके बौद्धिक स्तर का ज्ञान बहुत आवश्यक है.
In simple words: Educational guidance helps students choose the right subjects and schools according to their intelligence and interests. It guides them to solve school-related problems and make better decisions for their future.

🎯 Exam Tip: To score full marks, clearly list the definitions given by different psychologists like Arthur Jones and Ruth Strang, and highlight the three main aspects of the guidance process.

2. शैक्षिक सम्प्राप्ति

शैक्षिक सम्प्राप्ति अथवा शैक्षिक उपलब्धि की सूचना, अक्सर पिछली कक्षाओं के प्राप्तांकों द्वारा मिलती है, लेकिन निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत सम्प्राप्ति परीक्षणों तथा सम्बन्धित अध्यापकों द्वारा भी शैक्षिक उपलब्धियों का ज्ञान कर लिया जाता है। किसी खास विषय में अधिक प्राप्तांकों की प्रवृत्ति बालक की उस विषय में रुचि एवं योग्यता का संकेत करती है। माना एक विद्यार्थी आठवीं कक्षा तक विज्ञान में सर्वाधिक अंक लेकर उत्तीर्ण हुआ है तो कहा जा सकता है कि भविष्य में भी विज्ञान में अधिक अंक प्राप्त करेगा। इन प्राप्तांकों या उपलब्धियों को आधार मानकर माध्यमिक स्तर पर विषय चुनने का परामर्श दिया जाना चाहिए।

 

3. मानसिक योग्यताएँ

शिक्षा-निर्देशक को बालक की मानसिक योग्यताओं को भी समुचित ज्ञान होना चाहिए, क्योंकि विभिन्न प्रकार के पाठ्य विषयों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की मानसिक योग्यताएँ उपयोगी सिद्ध होती हैं। उदाहरण के लिए साहित्यकार, अधिवक्ता, व्याख्याता, नेता तथा शिक्षक बनने में ‘शाब्दिक योग्यता’; गणितज्ञ में, वैज्ञानिक तथा इंजीनियर बनने में ‘सांख्यिकी योग्यता’, दार्शनिक, विचारक, गणितज्ञ, अधिवक्ता बनने में ‘तार्किक योग्यता’ सहायक होती है। मानसिक योग्यताओं का ज्ञान तत्सम्बन्धी मनोवैज्ञानिक परीक्षणों तथा शिक्षकों की सूचना द्वारा लगाया जा सकता है।

 

4. विशिष्ट मानसिक योग्यताएँ एवं अभिरुचियाँ

बालक के लिए पाठ्य विषय का चयन करते समय बालक की विशिष्ट मानसिक योग्यताओं तथा अभिरुचियों का ज्ञान परमावश्यक है। विभिन्न पाठ्य विषयों की सफलता अलग-अलग प्रकार की विशिष्ट योग्यताओं या अभिरुचियों पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए संगीत एवं कला की विशिष्ट तथा अभियोग्यता वाले बालक-बालिकाओं को प्रारम्भ से ही संगीत एवं कला विषयों का चुनाव कर लेना चाहिए।

 

5. रुचियाँ

बालक की जिस विषय में अधिक रुचि होगी, उस विषय के अध्ययन में वह अधिक ध्यान लगाएगा। अतः निर्देशक को बालक की रुचि का ज्ञान अवश्य लेना चाहिए। रुचियों का ज्ञान रुचि परीक्षणों तथा रुचि परिसूचियों के अतिरिक्त अभिभावकों, शिक्षकों तथा दैनिक निरीक्षण के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।

 

6. व्यक्तित्व की विशेषताएँ

माध्यमिक स्तर पर किसी बालक को विषयों के चयन सम्बन्धित परामर्श देने के लिए उसके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं का ज्ञान आवश्यक है। व्यक्तित्व विभिन्न प्रकार की विशेषताओं और गुणों; जैसे - आत्मविश्वास, धैर्य, लगन, मनन, अध्यवसाय आदि का संगठन है। साहित्यिक विषयों का चयन भावुक व्यक्ति को, विज्ञान और गणित का चयन तर्कयुक्त एवं दृढ़ निश्चयी व्यक्ति को तथा रचनात्मक विषयों का चयन उद्योगी एवं क्रिया-प्रधान व्यक्तियों को करना चाहिए। व्यक्तित्व के गुणों का ज्ञान जिन व्यक्तित्व परीक्षणों से किया जाता है। उनमें साक्षात्कार, व्यक्तित्व परिसूचियाँ, प्रश्नसूची, व्यक्ति-इतिहास और निर्धारण मान आदि प्रमुख हैं।

 

7. शारीरिक दशा

कुछ विषयों का चयन करते समय निर्देशक को बालक की शारीरिक रचना तथा स्वास्थ्य की दशाओं का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। कृषि विज्ञान एवं प्राविधिक विषय इन्हीं के अन्तर्गत आते हैं। कृषि सम्बन्धी अध्ययन जमीन के साथ कठोर श्रम पर निर्भर हैं, जिसके लिए हृष्ट-पुष्ट शरीर होना आवश्यक है। इसी प्रकार प्राविधिक विषयों का प्रयोगात्मक ज्ञान कार्यशाला में कई घण्टे काम करके ही उपलब्ध किया जा सकता है। अतः पाठ्य विषय के चयन से पूर्व चिकित्सक से शारीरिक विकास की जाँच करा लेनी चाहिए तथा रुग्ण या दुर्बल शरीर वाले बालकों को ऐसे विषय का चुनाव नहीं करना चाहिए।

 

8. पारिवारिक स्थिति

पारिवारिक परिस्थितियों, विशेषकर आर्थिक स्थिति, को ध्यान में रखकर शिक्षा-निर्देशक उन्हीं विषयों के चयन को परामर्श देता है जिन्हें निजी परिस्थितियों के अन्तर्गत आसानी से पढ़ा जा सके। माध्यमिक स्तर पर कुछ ऐसे विषय निर्धारित हैं जिनमें उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अभिभावकों को अत्यधिक धन खर्च करना पड़ता है; जैसे - विज्ञान पढ़ने के बाद योग्य बनाता है मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश।

बालक की योग्यताओं, उच्च बौद्धिक स्तर तथा अभिरुचि के बावजूद भी इन कॉलेजों में अपने बच्चों को भेजना हर एक माता-पिता के बस में नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में विद्यार्थियों के लिए पाठ्य विषयों के चयन में उसके परिवार की आर्थिक दशा को ध्यान में रखना आवश्यक है।

(ब) पाठ्य विषयों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना

निर्देशन एवं परामर्श प्रदान करने वाले विशेषज्ञ को बालक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने के उपरान्त पाठ्य विषयों से सम्बन्धित विस्तृत जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। इस सम्बन्ध में अग्रलिखित दो प्रकार की जानकारियाँ आवश्यक हैं -

1. पाठ्य विषयों के विभिन्न वर्ग : जूनियर स्तर से निकलकर माध्यमिक स्तर में प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों के लिए पाठ्यक्रम को कई वर्गों में विभक्त किया गया है; जैसे -

  • 1. साहित्यिक
  • 2. वैज्ञानिक
  • 3. वाणिज्य
  • 4. कृषि सम्बन्धी
  • 5. प्रौद्योगिकी
  • 6. रचनात्मक तथा
  • 7. कलात्मक।

इन वर्गों के विकास में ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त यह जानना आवश्यक है कि सम्बन्धित विद्यालय में कौन-कौन-से वर्ग के पाठ्य विषय पढ़ाए जाते हैं और विद्यार्थी की रुचि के विषय भी वहाँ उपलब्ध हो सकेंगे या नहीं।

2. विविध पाठ्य विषयों के अध्ययन हेतु आवश्यक मानसिक योग्यताएँ : किन विषयों के लिए कौन-सी योग्यताएँ आवश्यक हैं और उस विद्यार्थी में कौन-कौन-सी योग्यताएँ विद्यमान हैं? इन सभी बातों की विस्तृत जानकारी शिक्षा निर्देशक को होनी चाहिए, तभी वह उपयुक्त पाठ्य विषयों के चयन में विद्यार्थियों की सहायता कर सकता है।

 

(स) पाठ्य विषयों से सम्बन्धित व्यवसायों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना

प्रत्येक विद्यार्थी अपनी शिक्षा से निवृत्त होकर जीवन-यापन के लिए किसी-न-किसी व्यवसाय का चयन करता है। आजकल ज्यादातर व्यवसायों में विशेषीकरण होने से तत्सम्बन्धी प्रशिक्षण पहले से ही प्राप्त करना पड़ता है। अतः निर्देशक को पाठ्य विषयों से सम्बन्धित व्यवसायों के बारे में ये निम्नलिखित दो सूचनाएँ प्राप्त करना बहुत आवश्यक हैं -

1. व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए किन पाठ्य विषयों का अध्ययन आवश्यक है : सबसे पहले निर्देशक को यह जानना चाहिए कि किसी खास व्यवसाय से सम्बन्धित प्रशिक्षण कोर्स में प्रवेश पाने के लिए अध्ययन की शुरुआत के लिए किन विषयों का ज्ञान आवश्यक है। उदाहरणार्थ - डॉक्टर बनने के लिए 9वीं कक्षा से जीव विज्ञान पढ़ना चाहिए, जबकि इंजीनियर बनने के लिए विज्ञान वर्ग में गणित पढ़ना चाहिए।

2. विभिन्न वर्गों के पाठ्य विषयों का अध्ययन किन व्यवसायों के योग्य बनाता है : पाठ्य विषयों के चयन में व्यवसाय सम्बन्धी जानकारी आवश्यक है। निर्देशक को पहले ही यह ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए कि किसी व्यवसाय-विशेष का सीधा सम्बन्ध किन-किन विषयों से है ताकि व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त न करके भी उन विषयों का ज्ञान उसके कार्य में मदद दे सके। उदाहरण के लिए - कॉमर्स लेकर कोई विद्यार्थी वाणिज्य या व्यापार के क्षेत्र में प्रवेश कर सकता है, किन्तु डॉक्टरी या इंजीनियरिंग के क्षेत्र में नहीं। बालक को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने से पूर्व उपर्युक्त समस्त बातों की विस्तृत एवं वास्तविक जानकारी एक सफल शिक्षा निर्देशक (Educational Guide) को होनी चाहिए।

 

Question 3. शैक्षिक निर्देशन की उपयोगिता एवं महत्त्व का उल्लेख कीजिए। [2011, 13]
अथवा
शैक्षिक निर्देशन से आप क्या समझते हैं? इसकी उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।

Answer: शैक्षिक निर्देशन का अर्थ है विद्यार्थी को उसकी शिक्षा के क्षेत्र में मार्गदर्शन प्रदान करना ताकि वह अपनी क्षमताओं और अभिरुचियों के अनुसार सही विषयों और पाठ्यक्रमों का चयन कर सके। इसकी उपयोगिता एवं महत्त्व निम्नलिखित हैं:
1. सही विषयों के चयन में सहायक: यह विद्यार्थियों को उनकी रुचि और मानसिक योग्यता के अनुसार सही विषयों को चुनने में मदद करता है।
2. भविष्य के व्यवसाय की तैयारी: शैक्षिक निर्देशन विद्यार्थियों को उनके भविष्य के करियर और व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए सही आधार तैयार करने में मदद करता है।
3. अपव्यय और अवरोधन को रोकना: सही मार्गदर्शन मिलने से विद्यार्थी अनुत्तीर्ण होने या बीच में पढ़ाई छोड़ने से बच जाते हैं, जिससे समय और धन की बचत होती है।
4. सर्वांगीण विकास: यह बालक के व्यक्तित्व के संतुलित और सर्वांगीण विकास में सहायक होता है।
In simple words: Educational guidance helps students choose the right subjects and courses based on their interests and abilities. This prepares them for their future careers and prevents them from wasting time on wrong choices.

🎯 Exam Tip: To score full marks, clearly define educational guidance first, and then list at least three distinct benefits such as proper subject selection, career alignment, and reducing academic dropouts.

 

Question. शैक्षिक निर्देशन की क्या आवश्यकता है? स्पष्ट कीजिए। [2013]
Answer: शैक्षिक निर्देशन का अर्थ: शैक्षिक निर्देशन बालक की अपने कार्यक्रम को बुद्धिमत्तापूर्वक नियोजित कर पाने में सहायता करता है। यह बालकों को ऐसे पाठ्य विषयों का चुनाव करने में सहायता देता है जो उनकी बौद्धिक क्षमताओं, रुचियों, योग्यताओं तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं के अनुकूल हों। यह उन्हें इस योग्य बना देता है कि वे शिक्षा सम्बन्धी कुछ विशेष समस्याओं तथा विद्यालय की विभिन्न परिस्थिति से भली प्रकार समायोजन स्थापित कर अपने शैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शैक्षिक पर्यावरण से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान तथा शैक्षिक परिस्थितियों में समायोजित होने के लिए दिये जाने वाले विशिष्ट निर्देशन को शैक्षिक निर्देशन कहते हैं।

शैक्षिक निर्देशन की परिभाषाएँ: विभिन्न मनोवैज्ञानिकों एवं विद्वानों ने शैक्षिक निर्देशन की निम्नलिखित परिभाषाएँ दी हैं:

(i) आर्थर जे० जोन्स के अनुसार: “शैक्षिक निर्देशन का तात्पर्य उस व्यक्तिगत सहायता से है जो विद्यार्थियों को इसलिए प्रदान की जाती हैं कि वे अपने लिए उपयुक्त विद्यालय, पाठ्यक्रम, पाठ्य विषय एवं विद्यालय जीवन का चयन कर सकें तथा उनसे समायोजन स्थापित कर सकें।”

(ii) रूथ स्ट्रॉन्ग के कथनानुसार: “व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने का मुख्य लक्ष्य उसे समुचित कार्यक्रम के चुनाव तथा उसमें प्रगति में सहायता प्रदान करना है।”

(iii) एलिस के शब्दों में: “शैक्षिक निर्देशन से तीन विशेष क्षेत्रों में सहायता मिलती है:
- कार्यक्रम और पाठ्य-विषयों का चयन
- चालू पाठ्यक्रम में कठिनाइयों का मुकाबला करना तथा
- अगले प्रशिक्षण हेतु विद्यार्थियों का चुनाव।”

शैक्षिक निर्देशन सम्बन्धी उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि यह प्रक्रिया बालकों के पाठ्यक्रम चयन की सर्वोत्तम विधि है। उसमें बालकों की व्यक्तिगत विभिन्नताओं, शैक्षिक उपलब्धियों, प्राप्तांकों, अभिभावकों की आशाओं, महत्त्वाकांक्षाओं तथा मनोवैज्ञानिकों के परामर्श को मुख्य रूप से ध्यान में रखा जाता है। इसके अन्तर्गत एक निर्देशक द्वारा प्राप्त किये गये निर्देशन की जाँच भी सम्भव है, इसलिए यह विधि वैज्ञानिक एवं प्रामाणिक भी है। यह छात्रों के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करती है।

शैक्षिक निर्देशन के लाभ, उपयोगिता एवं महत्त्व:
वर्तमान शिक्षा पद्धति एक जटिल व्यवस्था है, जिसमें बालकों की क्षमताएँ, शक्तियाँ, योग्यताएँ समय तथा धन आदि का अपव्यय होता है और वे अपने शैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रहते हैं। इन असफलताओं तथा निराशाओं के बीच शैक्षिक निर्देशन आशा की किरणों के साथ शिक्षा के क्षेत्र में अवतरित होता है, जिसकी उपयोगिता या महत्त्व सन्देह से परे है। इसमें लाभों की पुष्टि निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत हो जाती है:

1. पाठ्य विषयों का चयन: माध्यमिक विद्यालयों में विभिन्न व्यवसायों से सम्बन्धित विविध पाठ्य विषयों के अध्ययन की व्यवस्था है। निर्देशन की सहायता से विद्यार्थी अपने बौद्धिक-स्तर, क्षमताओं, योग्यताओं तथा रुचियों के अनुसार पाठ्य-विषयों का चुनाव कर सकता है। इस भाँति वह अपने मनोनुकूल व्यवसाय की प्राप्ति कर सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है।

2. भावी शिक्षा का सुनिश्चित: हाईस्कूल स्तर के पश्चात् विद्यार्थियों के लिए यह सुनिश्चित कर पाना दूभर हो जाता है कि उनकी भावी शिक्षा का लक्ष्य एवं स्वरूप क्या होगा, अर्थात् वे किस व्यावसायिक विद्यालय में प्रवेश लें, व्यापारिक विद्यालय में या औद्योगिक विद्यालय में? यदि किन्हीं कारणों से वे अनुपयुक्त शिक्षा संस्थान में भर्ती हो जाते हैं तो कुसमायोजन के कारण उन्हें बीच में ही संस्था छोड़नी पड़ सकती है, जिसके फलस्वरूप काफी हानि उठानी पड़ती है। इसके सन्दर्भ में निर्देशक सही पथ-प्रदर्शन करते है.
In simple words: शैक्षिक निर्देशन का मतलब है छात्रों को सही विषय और करियर चुनने में मदद करना। इससे वे अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार पढ़ाई कर पाते हैं और भविष्य में असफल होने से बचते हैं।

🎯 Exam Tip: परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए शैक्षिक निर्देशन की परिभाषाओं को लिखते समय विचारकों (जैसे आर्थर जे० जोन्स, रूथ स्ट्रॉन्ग) के नामों को अवश्य रेखांकित (underline) करें।

Significance and Functions of Educational Guidance (Continued)

  • 3. नवीन विद्यालय में समायोजन : शैक्षिक निर्देशन उन विद्यार्थियों की सहायता करता है जो किसी नये विद्यालय में प्रवेश पाते हैं और वहाँ के वातावरण के साथ समायोजित नहीं हो पाते।
  • 4. पाठ्यक्रम का संगठन : विद्यार्थियों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को दृष्टिगत रखते हुए उनका पाठ्यक्रम निर्धारित एवं संगठित किया जाना चाहिए। पाठ्यक्रम-संगठन का कार्य शैक्षिक निर्देशन के माध्यम से किया जाता है।
  • 5. परिवर्तित विद्यालयी प्रबन्ध, पाठ्यक्रम एवं शिक्षण विधि के सन्दर्भ में : विद्यालय एक लघु समाज है। समाज की प्रजातान्त्रिक व्यवस्था का सीधा प्रभाव विद्यालय प्रबन्ध एवं व्यवस्थाओं पर पड़ा है। प्रजातान्त्रिक शिक्षा समाज के सभी व्यक्तियों को समान अवसर प्रदान करती है। व्यक्तिगत विभिन्नता के सिद्धान्त पर आधारित गत्यात्मक प्रकार की प्रशासन्त्रिक विद्यालय व्यवस्था पाठ्यक्रम तथा शिक्षण-विधियों की आवश्यकताओं की ओर पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए। इन परिवर्तित दशाओं के कारण पैदा होने वाली समस्याओं का समाधान एकमात्र शैक्षिक निर्देशन की सहायता से ही सम्भव है।
  • 6. मन्दबुद्धि, पिछड़े तथा मेधावी बालक : शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत मन्दबुद्धि, पिछड़े तथा मेधावी बालकों की पहचान करके उनकी क्षमतानुसार शिक्षा की व्यवस्था की जाती है। इस विशिष्ट व्यवस्था का लाभ अलग-अलग तीनों ही वर्गों के बालकों अर्थात् मन्दबुद्धि, पिछड़े तथा मेधावी बालकों को प्राप्त होता है।
  • 7. अभिभावकों की सन्तुष्टि : कभी-कभी अभिभावकों की महत्त्वाकांक्षाओं तथा बालकों की मानसिक योग्यताओं व क्षमताओं के मध्य गहरा अन्तर होता है। निर्देशन के माध्यम से वे बालक की विशेषताओं की सही वास्तविक झलक पाकर तदनुकूल शिक्षा की व्यवस्था कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षा संस्थानों के कार्यक्रमों से परिचित होकर उन्हें अपना योगदान प्रदान कर सकते हैं।
  • 8. अनुशासन की समस्या का समाधान : क्योंकि शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया में बालक की क्षमताओं, रुचियों तथा अभिरुचियों को ध्यान में रखकर उसकी शिक्षा सम्बन्धी व्यवस्था की जाती है; अतः पाठ्यक्रम बालक को भार-स्वरूप नहीं लगता। इसके विपरीत वह चयनित विषयों में रुचि लेकर अनुशासित रूप में अध्ययन करता है, जिससे अनुशासन की समस्या का किसी हद तक समाधान निकल आता है।
  • 9. जीविकोपार्जन का समुचित ज्ञान : प्रायः विद्यार्थियों को विभिन्न पाठ्य विषयों से सम्बन्धित एवं आगे चलकर उपलब्ध हो सकने वाले व्यावसायिक अवसरों की जानकारी नहीं होती। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति किसी खास व्यवसाय में जानकारी व रुचि न होने के कारण बार-बार अपना पेशा बदलते हैं, जिससे व्यावसायिक अस्थिरता में वृद्धि के कारण हानि होती है। अतः रोजगार के अवसरों का ज्ञान प्राप्त करने तथा जीविकोपार्जन सम्बन्धी समुचित ज्ञान पाने की दृष्टि से शैक्षिक निर्देशन अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होता है।
  • 10. अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या का अन्त : अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या के अन्तर्गत अनेक बालक-बालिकाएँ विभिन्न कारणों से स्थायी साक्षरता प्राप्त किये बिना ही विद्यालय का त्याग कर देते हैं, जिससे प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर अत्यधिक अपव्यय हो रहा है। इसके अतिरिक्त परीक्षा में फेल होने वाले विद्यार्थियों की संख्या भी निरन्तर बढ़ रही है। इस समस्या का अन्त शैक्षिक निर्देशन के माध्यम से ही सम्भव है।

 

Question 4. सामूहिक शैक्षिक निर्देशन विधि और प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
या
वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन और सामूहिक शैक्षिक निर्देशन विधियों का आलोचनात्मक वर्णन कीजिए।
या
शैक्षिक निर्देशन की कितनी विधियाँ हैं ? उन्हें संक्षेप में समझाइए। [2007]

Answer: शैक्षिक निर्देशन की दो मुख्य विधियाँ प्रचलित हैं: वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन (Individual Educational Guidance) और सामूहिक शैक्षिक निर्देशन (Group Educational Guidance)। ये दोनों विधियाँ विद्यार्थियों को उनकी शैक्षिक समस्याओं को समझने, सही विषयों का चयन करने और उनके भविष्य को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
In simple words: Educational guidance is mainly given in two ways: one-on-one (individual) or in a group. Both methods help students choose the right subjects and solve their school-related problems.

🎯 Exam Tip: When explaining the methods of educational guidance, always start by clearly listing the two main types (Individual and Group) before describing them in detail.

I. वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन तथा II. सामूहिक शैक्षिक निर्देशन

I. वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन

1. भेंट या साक्षात्कार : निर्देशक या परामर्शदाता बालक से भेंट करके या साक्षात्कार द्वारा उसके सम्बन्ध में आवश्यक सूचनाएँ एकत्र करता है तथा निर्देशन की प्रक्रिया में सहायक विभिन्न तथ्यों की जानकारी उपलब्ध कराता है।

2. प्रश्नावली : बालक के सम्बन्ध में तथ्यों का पता लगाने अथवा उसके व्यक्तिगत विचारों से परिचित होने के उद्देश्य से एक प्रश्नावली निर्मित की जाती है, जिसके उत्तर स्वयं बालक को देने होते हैं। प्रश्नावली के माध्यम से बालक की आदतों, पारिवारिक वातावरण, अवकाशकालीन क्रियाओं, शिक्षा और व्यवसाय सम्बन्धी योजनाओं के विषय में ज्ञान हो जाता है।

3. व्यक्तिगत इतिहास : व्यक्तिगत इतिहास के माध्यम से बालक को व्यक्तिगत, सामाजिक व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी प्राप्त की जाती है। इसके अतिरिक्त बालक के अभिभावक, मित्र, परिवार के सदस्य एवं आस-पड़ोस के लोग भी उसके विषय में बताते हैं, जिनमें उसकी समस्याओं का निदान एवं समाधान किया जाता है।

4. संचित अभिलेख : विद्यालय में हर एक विद्यार्थी से सम्बन्धित एक 'संचित अभिलेख' होता है। इस अभिलेख में विद्यार्थी की प्रगति, योग्यता, बौद्धिक स्तर, रुचि, पारिवारिक दशा तथा शारीरिक स्वास्थ्य सम्बन्धी सूचनाएँ संगृहीत रहती हैं। इन अभिलेखों का अध्ययन कर परामर्शदाता, निर्देशन की दिशा निर्धारित करता है।

5. बुद्धि एवं ज्ञानार्जन परीक्षण : इन परीक्षणों के माध्यम से निर्देशक इस बात की जाँच करता है कि विद्यार्थी ने विभिन्न पाठ्य विषयों में कितना ज्ञानार्जन किया है, उसका बौद्धिक स्तर कितना है, शिक्षक ने उसे कितने प्रभावकारी ढंग से पढ़ाया है तथा उसकी योग्यताएँ व दुर्बलताएँ क्या हैं? इन सभी बातों का ज्ञान विद्यार्थी की भावी प्रगति के सन्दर्भ में अनुमान लगाने में निर्देशक की सहायता करता है।

6. परामर्श : निर्देशक विद्यार्थियों की समस्या का ज्ञान करके तथा उनके विषय में समस्त तथ्यों का संकलन करके उन्हें शिक्षा सम्बन्धी परामर्श प्रदान करता है। यह परामर्श उनकी समस्याओं का उचित समाधान करने में सहायक होता है।

7. अनुगामी कार्यक्रम : निर्देशन प्रदान करने के उपरान्त अनुगामी कार्य द्वारा यह जाँच की जाती है कि निर्देशन के बाद विद्यार्थी की प्रगति सन्तोषजनक रही है अथवा नहीं। असन्तोषजनक प्रगति इस बात की द्योतक है कि विद्यार्थी के बारे में निर्देशक के अनुमान गलत थे तथा निर्देशक ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर पाया। इसलिए उसमें संशोधन करके पुनः निर्देशन प्रदान किया जाना चाहिए। वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन की विधि के उपर्युक्त सोपान किसी विद्यार्थी की शैक्षिक समस्याओं के सम्बन्ध में समुचित परामर्श एवं समाधान प्रस्तुत करने में सहायक सिद्ध होते हैं। लेकिन इस विधि की कुछ सीमाएँ हैं; जैसे- एक ही विद्यार्थी के लिए विशेषज्ञ या मनोवैज्ञानिक की आवश्यकता होती है तथा इसमें अधिक समय और धन का व्यय भी होता है। सामूहिक शैक्षिक निर्देशन में इन कमियों को पूरा करने का प्रयास किया गया है।

II. सामूहिक शैक्षिक निर्देशन

सामूहिक शैक्षिक निर्देशन की विधि के विभिन्न सोपानों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है।

1. अनुस्थापने वार्ताएँ : सामूहिक निर्देशन के अन्तर्गत, सर्वप्रथम, मनोवैज्ञानिक विद्यालय में जाकर बालकों को वार्ता के माध्यम से निर्देशन का महत्त्व समझाता है। ये वार्ताएँ विद्यार्थियों को स्वयं अपनी आवश्यकताओं, क्षमताओं, शैक्षिक उद्देश्यों, रुचियों इत्यादि के सम्बन्ध में सोचने-समझने हेतु प्रेरित व उत्साहित करती हैं।

2. मनोवैज्ञानिक परीक्षण : विद्यार्थियों को उचित दिशा में निर्देशित करने के उद्देश्य से मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है। इन परीक्षणों की सहायता से विद्यार्थियों की सामान्य एवं विशिष्ट बुद्धि, मानसिक योग्यता, रुचि, अभिरुचि,

भाषा एवं व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं का ज्ञान होता है। इससे निर्देशन का कार्य सुगम हो जाता है।

3. साक्षात्कार : व्यक्तिगत निर्देशन के समान ही साक्षात्कार का प्रयोग सामूहिक निर्देशन में भी किया जाता है। इसके लिए निर्देशक या निर्देशन समिति स्वयं बालकों से भेंट करके विभिन्न पाठ्य विषयों के प्रति उनकी रुचि, भावी शिक्षा और व्यवसाय-योजना आदि के सम्बन्ध में सूचनाएँ एकत्र करते हैं। इसके लिए 'स्वयं-सूची' (Self-Inventory) का भी प्रयोग किया जाता है।

4. विद्यालय से तथ्य संकलन : मनोवैज्ञानिक, बालकों की विभिन्न पाठ्य विषयों की 'शैक्षणिक-सम्प्राप्ति' की जानकारी के लिए, पूर्व परीक्षाओं के प्राप्तांकों पर विचार करता है। इस सम्बन्ध में 'संचित-लेखा' (Cumulative Record) के साथ-साथ अध्यापकों की राय लेना भी जरूरी एवं महत्त्वपूर्ण है।

5. सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का अध्ययन : शिक्षा से सम्बन्धित समुचित निर्देशन प्रदान करने की दृष्टि से विद्यार्थियों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का अध्ययन आवश्यक है। निर्देशक को समाज, आस-पड़ोस, घर-गृहस्थी, मित्र-मण्डली, परिचितों तथा अभिभावकों से उनके विषय में पूरी-पूरी सामाजिक व आर्थिक जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।

6. परिवार से सम्पर्क : पिता ने बालकों को जन्म दिया है, पालन-पोषण किया है, उन्हें शनैः-शनैः विकसित होते हुए देखा है तथा उनकी भावी उन्नति व व्यवसाय का स्वप्न देखा है। अतः मनोवैज्ञानिक को बालकों के माता-पिता के विचारों को अवश्य समझना चाहिए। इसके लिए पत्र-व्यवहार द्वारा या माता-पिता से व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित करके तथ्यों का संकलन किया जा सकता है।

7. पार्श्व-चित्र : अनेकानेक स्रोतों से एकत्रित की गयी सूचनाओं व तथ्यों को एक पार्श्व चित्र (Profile) में व्यक्त किया जाता है। इस प्रयास में उनकी विभिन्न योग्यताओं, क्षमताओं तथा भिन्न-भिन्न परीक्षण स्तर के चित्र अंकित किये जाते हैं। पार्श्व-चित्र को देखकर बालकों के सम्बन्ध में एक साथ ही ढेर सारी महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ ज्ञात हो जाती हैं। इन सूचनाओं के आधार पर विद्यार्थियों को पाठ्य विषयों के चुनाव के सम्बन्ध में निर्देशन दिया जाता है जो प्रायः लिखित रूप में होता है।

8. अनुगामी कार्य : अनुगामी कार्य का एक नाम अनुवर्ती अध्ययन (Follow-up Study) भी है। निर्देशन से सम्बन्धित यह अन्तिम सोपान या कार्य है। निर्देशन पाने के बाद जब बालक किसी विषय का चयन करके उसका अध्ययन शुरू कर देता है तो मनोवैज्ञानिक या निर्देशक को यह जाँच करनी होती है कि बालक उस विषय का सफलता से अध्ययन कर रहा है अथवा नहीं। बालक की ठीक प्रगति का अभिप्राय है कि निर्देशन सन्तोषजनक रहा अन्यथा उसे फिर से निर्देशन प्रदान किया जाता है।

 

Question 5. व्यावसायिक निर्देशन का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया का भी विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
व्यावसायिक निर्देशन का क्या अर्थ है? माध्यमिक विद्यालयों में व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता की विवेचना कीजिए। [2007]

Answer: व्यावसायिक निर्देशन का अर्थ: व्यावसायिक निर्देशन एक ऐसी मनोवैज्ञानिक सहायता है जो व्यक्ति (विद्यार्थी) को जीवन के एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य 'जीविकोपार्जन' की प्राप्ति में सहायक है। इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को यह निर्णय करने में मदद देना है कि वह जीविकोपार्जन के लिए कौन-सा उपयुक्त व्यवसाय चुने जो उसकी बुद्धि, अभिरुचि तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं के अनुकूल हो। यह प्रक्रिया छात्रों को उनके भविष्य के प्रति जागरूक और आत्मनिर्भर बनाने में अत्यंत सहायक सिद्ध होती है।
व्यावसायिक निर्देशन की परिभाषा
In simple words: व्यावसायिक निर्देशन का अर्थ है छात्रों को उनकी रुचि और योग्यता के अनुसार सही नौकरी या करियर चुनने में मदद करना ताकि वे जीवन में सफल हो सकें।

🎯 Exam Tip: व्यावसायिक निर्देशन की परिभाषा और अर्थ लिखते समय 'जीविकोपार्जन' और 'मनोवैज्ञानिक सहायता' जैसे मुख्य शब्दों को रेखांकित (underline) अवश्य करें।

1. क्रो एवं क्रो के अनुसार: “व्यावसायिक निर्देशन की व्याख्या सामान्यतः उसे सहायता के रूप में की जाती है, जो विद्यार्थियों को किसी व्यवसाय को चुनने, उसके लिए तैयारी करने तथा उसमें उन्नति प्रदान करने के लिए दी जाती है।”

2. अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार: “व्यावसायिक निर्देशन वह सहायता है जो एक व्यक्ति को व्यवसाय चुनने से सम्बन्धित समस्या के समाधान हेतु प्रदान की जाती है, जिससे व्यक्ति की क्षमताओं का तत्सम्बन्धी व्यवसाय सुविधाओं के साथ समायोजन हो सके।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि व्यावसायिक निर्देशन, उपयुक्त व्यवसाय के चुनाव में किसी व्यक्ति की सहायता करने की प्रक्रिया है। यह उसे व्यावसायिक परिस्थितियों से स्वयं को अनुकूलित करने में मदद देती है, जिससे कि समाज की मानव-शक्ति का सदुपयोग हो सके तथा अर्थव्यवस्था में समुचित सन्तुलन स्थापित हो सके।

व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया : व्यवसाय का चयन

किसी व्यक्ति के लिए उपयुक्त व्यवसाय चुनने की दृष्टि से व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया प्रारम्भ की जाती है। यह प्रक्रिया निर्देशक से निम्नलिखित दो प्रकार की जानकारियों की माँग करती है:

(A) व्यक्ति के विषय में जानकारी।
(B) व्यवसाय जगत् सम्बन्धी जानकारी।

(A) व्यक्ति के विषय में जानकारी

व्यावसायिक निर्देशन के अन्तर्गत उपयुक्त व्यवसाय का चुनाव करते समय सर्वप्रथम व्यक्ति के शारीरिक विकास, उसके बौद्धिक स्तर, मानसिक योग्यताओं, रुचियों, अभिरुचियों तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं का अध्ययन करना आवश्यक है। व्यक्ति के इस भाँति अध्ययन को व्यक्ति-विश्लेषण (Individual Analysis) का नाम दिया गया है। व्यक्ति-विश्लेषण में निम्नलिखित बातें जानना आवश्यक समझा जाता है:

1. शैक्षिक योग्यता: किसी व्यवसाय के चयन में उसके लिए शिक्षा के स्तर तथा शैक्षणिक योग्यता की जानकारी आवश्यक होती है। कुछ व्यवसायों के लिए प्रारम्भिक स्तर, कुछ के लिए माध्यमिक स्तर, तो कुछ के लिए उच्च स्तर की शिक्षा अपेक्षित हैं। प्रोफेसर, इंजीनियर, डॉक्टर, वकील तथा प्रशासक आदि के व्यवसाय हेतु उच्च शिक्षा की आवश्यकता होती है, किन्तु ओवरसियर, कम्पाउन्डर, स्टेनोग्राफर, क्लर्क, मिस्त्री तथा प्राथमिक स्तर के शिक्षक हेतु सामान्य शिक्षा ही पर्याप्त है।

कृषि, निजी व्यापार, दुकानदारी आदि के लिए थोड़ी बहुत शिक्षा से ही काम चल जाता है। वैसे अब परिस्थितियाँ बदल रही हैं। इसके अतिरिक्त अनेक व्यवसायों में शैक्षिक योग्यताओं के साथ-साथ विशेष परीक्षण-प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए इंजीनियर और ओवरसियर तथा कम्पाउन्डर बनने के लिए विशेष प्रशिक्षण में शामिल होना पड़ता है।

2. बुद्धि: यह बात सन्देह से परे है कि भिन्न-भिन्न व्यवसायों में सफलता प्राप्त करने के लिए भिन्न-भिन्न बौद्धिक स्तर की आवश्यकता होती है।

🎯 Exam Tip: व्यावसायिक निर्देशन की परिभाषाओं को लिखते समय क्रो एवं क्रो तथा अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के मुख्य कथनों को स्पष्ट रूप से उद्धृत (Quote) करें ताकि परीक्षा में पूरे अंक मिल सकें।

निर्देशक या परामर्शदाता को व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता का ज्ञान निम्नलिखित तालिका से हो सकता है:

 

क्रमांकबौद्धिक स्तरबुद्धि से सम्बन्धित व्यवसाय
1.प्रखर बुद्धिउच्च स्तर के शासक एवं राजनीतिज्ञ, उच्च न्यायालयों के जज, प्रबन्धक, निदेशक, राजकीय सचिव तथा अनुसन्धान कार्यशालाओं के निदेशक आदि।
2.उच्च बुद्धिविश्वविद्यालय के प्राध्यापक, इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, नेता, शासक, प्रबन्धक, व्यापार संचालक, एकाउण्टेण्ट, बैंकर, जज, लेखक, अनुसन्धानकर्ता आदि।
3.अच्छी बुद्धिशिक्षक, संवाददाता, पुस्तकालय-अध्यक्ष, कलाकार।
4.सामान्य बुद्धिएजेण्ट, नर्स, कम्पाउन्डर, क्लर्क, ड्राफ्ट्समैन, दुकानदार, व्यापारी तथा मिस्त्री आदि।
5.न्यून बुद्धिड्राइवर, पोस्टमैन, बढ़ई, लुहार, वेल्डर, टर्नर, fटर, प्लम्बर, टेलर, बुनकर, दर्जी, मिलर आदि।
6.अति न्यून बुद्धिचपरासी, रसोइया, नाई, धोबी, श्रमिक, सन्देशवाहक, पैकर आदि।

 

3. मानसिक योग्यताएँ

अलग-अलग व्यवसायों के लिए विशिष्ट मानसिक योग्यताओं की आवश्यकता होती है। निर्देशक को चाहिए कि वह सम्बन्धित व्यक्ति में विशिष्ट योग्यता की जाँच कर उसे तत्सम्बन्धी व्यवसाय चुनने का परामर्श दे। उदाहरण के लिए संगीत की विशेष योग्यता संगीतज्ञ के लिए, यान्त्रिक (Mechanical) व आन्तरिक्ष (Spatial) योग्यता इंजीनियर और मिस्त्रियों के लिए, शाब्दिक व शब्द-प्रवाह सम्बन्धी योग्यताएँ वकील, अध्यापक और लेखक आदि के लिए आवश्यक समझी जाती हैं।

 

4. अभियोग्यताएँ

विभिन्न प्रकार के व्यवसायों की सफलता हेतु विभिन्न प्रकार की अभियोग्यताएँ या अभिरुचियाँ आवश्यक हैं। सर्वमान्य रूप से, प्रत्येक व्यक्ति में किसी विशेष प्रकार का कार्य करने से सम्बन्धित योग्यता जन्म से ही होती है। यदि जन्म से चली आ रही योग्यता को ही प्रशिक्षण देकर अधिक परिष्कृत एवं प्रभावशाली बनाया जाए तो व्यक्ति की व्यावसायिक कार्यकुशलता में अभिवृद्धि हो सकती है। यान्त्रिक कार्य के लिए यान्त्रिक अभिरुचि, कला सम्बन्धी कार्य के लिए कलात्मक अभिरुचि तथा लिपिक के लिए लिपिक अभिरुचि आवश्यक है।

 

5. रुचियाँ

किसी कार्य की सफलता के लिए उस कार्य में व्यक्ति को रुचि का लेना आवश्यक है। किसी ऐसे कार्य को करना उचित है जिसमें पहले से व्यक्ति की रुचि हो, अन्यथा मिले हुए कार्य में बाद की रुचि विकसित की जा सकती है। प्रायः, योग्यता और रुचि साथ-साथ पाये जाते हैं और कम योग्यता वाले क्षेत्र में व्यक्ति रुचि प्रदर्शित नहीं करता। ऐसी दशा में रुचि और योग्यता में से किसे प्रमुखता दी जाए – यह बात विचारणीय बन जाती है।

 

6. व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताएँ

अनेक व्यवसायों की सफलता व्यक्तित्व सम्बन्धी विशिष्ट गुणों पर आधारित होती है। अतः निर्देशक को व्यवसाय के चयन सम्बन्धी परामर्श प्रदान करते समय व्यक्तित्व की विशेषताओं पर भी ध्यान देना चाहिए। एजेण्ट या सेल्समैन के लिए मिलनसार, आत्मविश्वासी, खुशमिजाज, व्यवहार-कुशल तथा बहिर्मुखी व्यक्तित्व का होना परमावश्यक है। कुछ व्यवसाय ऐसे होते हैं जिनमें संवेगात्मक स्थिति, धैर्य, एकाग्रता, सामाजिकता आदि गुणों की आवश्यकता होती है; जैसे- डॉक्टर, इंजीनियर, बैंक लिपिक तथा ड्राइवर इत्यादि। लेखक, विचारक और समीक्षक का व्यक्तित्व चिन्तनशील एवं अन्तर्मुखी होता है।

 

7. शारीरिक दशा

प्रत्येक कार्य में शारीरिक शक्ति का उपभोग होता ही है। अतः सभी व्यवसायों के चयन में शारीरिक विकास, स्वास्थ्य आदि शारीरिक दशाओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए। कुछ व्यवसायों; जैसे- पुलिस, सेना आदि में अधिक शारीरिक क्षमता की आवश्यकता होती है और उनके लिए शारीरिक दृष्टि से क्षमतावान व्यक्तियों को ही चुना जाता है। ऐसे व्यवसायों में कम क्षमता वाले, अस्वस्थ या रोगी व्यक्तियों को कदापि नहीं लिया जा सकता, चाहे वे कितने ही बुद्धिमान क्यों न हों।

8. आर्थिक स्थिति: बालक को व्यवसाय चुनने सम्बन्धी परामर्श प्रदान करने में उसके परिवार की आर्थिक दशा का ज्ञान निर्देशक को अवश्य रहना चाहिए। कुछ व्यवसाय ऐसे हैं जिनके प्रशिक्षण में अधिक समय और अधिक धन दोनों की आवश्यकता होती है, उदाहरणार्थ–डॉक्टरी और इंजीनियरिंग। लम्बे समय तक शिक्षा पर भारी धन व्यय करना प्रत्येक परिवार के वश की बात नहीं है। अतएव अनेक योग्य एवं प्रतिभाशाली युवक-युवतियाँ धनाभाव के कारण से इन व्यवसायों का चयन नहीं कर पाते।

 

9. लिंग: लैंगिक भेद के कारण व्यक्तियों के कार्य-क्षेत्र में अन्तर आ जाता है, इसलिए व्यवसाय चयन की प्रक्रिया में निर्देशक को व्यक्ति के लिंग का भी ध्यान रखना चाहिए। सेना और पुलिस जैसे विभाग पुरुषों के लिए ही उपयुक्त समझे जाते हैं, जब कि अध्यापन, परिचर्या, लेखन आदि स्त्रियों के लिए अधिक ठीक रहते हैं। वस्तुतः स्त्रियाँ बौद्धिक कार्य तो पुरुषों के समान कर सकती हैं, लेकिन उनमें पुरुषों के समान कठोर शारीरिक श्रम की क्षमता नहीं होती। यह कारक भी अब कुछ हद तक कम महत्त्वपूर्ण हो गया है क्योंकि प्रायः सभी व्यवसायों में किसी-न-किसी रूप में महिलाएँ पदार्पण कर रही हैं।

 

10. आयु: बहुत से व्यवसायों में राज्य की ओर से सेवाओं में प्रवेश पाने की आयु सीमाएँ निर्धारित कर दी गयी हैं। प्रशिक्षण प्राप्त करने की भी सीमाएँ सुनिश्चित कर दी गयी हैं। अतः किसी व्यवसाय के चयन हेतु निर्देशक को व्यक्ति की आयु सीमा पर भी विचार कर लेना चाहिए।

 

(B) व्यवसाय-जगत सम्बन्धी जानकारी

व्यावसायिक निर्देशक को व्यवसाय-जगत् की पूरी जानकारी होनी चाहिए। विश्वभर में कितने प्रकार के व्यवसाय हैं, किन्तु किन क्षेत्रों में कौन-से व्यवसाय उपलब्ध हैं, किसी व्यवसाय की विभिन्न शाखाओं व उपशाखाओं का ज्ञान, व्यवसाय-विशेष के लिए आवश्यक शैक्षिक-बौद्धिक-मानसिक योग्यताएँ तथा व्यक्तिगत भिन्नता के साथ अपनाये गये व्यवसाय का समायोजन-इन सभी बातों को लेकर जानकारी आवश्यक है। व्यवसाय-जगत् से पूर्ण परिचय के लिए निर्देशक का अग्रलिखित तथ्यों से अवगत होना परमावश्यक है।

 

व्यवसायों का वर्गीकरण

व्यावसायिक निर्देशन के लिए व्यवसायों के प्रकारों को समझना सबसे पहला और अनिवार्य कदम है। व्यवसायों को कई आधारों पर वर्गीकृत किया गया है। तीन प्रमुख आधार ये हैं:

  • 1. कार्य के स्वरूप की दृष्टि से व्यवसायों का वर्गीकरण
  • 2. शिक्षा बौद्धिक स्तर, प्रशिक्षण तथा सामाजिक सम्मान आदि की दृष्टि से व्यवसायों का वर्गीकरण तथा
  • 3. रुचियों की दृष्टि से व्यवसायों का वर्गीकरण।

 

1. कार्य के स्वरूप की दृष्टि से व्यवसायों का वर्गीकरण

इस आधार पर व्यवसायों को चार वर्गों में रखा गया है:
(i) पढ़ने-लिखने तथा मौलिक विचारों से सम्बन्धित व्यवसाय : इन व्यवसायों में सूक्ष्म बातों की खोज करके नवीन विचारों का प्रतिपादन किया जाता है। साहित्यकार, कवि, निबन्धकार, कथाकार, लेखक, नाटककार, वैज्ञानिक तथा दार्शनिक आदि सभी प्रकार के व्यवसाय इसी कोटि में आते हैं।
(ii) सामाजिक व्यवसाय : इस प्रकार के व्यवसायों में सामाजिक सम्पर्कों व सम्बन्धों को आधार बनाया जाता है। डॉक्टर, वकील, नेता, दुकानदार, जीवन बीमा निगम के एजेण्ट आदि सभी के व्यवसाय सामाजिक सम्बन्धों पर आधारित होते हैं।
(iii) कार्यालय से सम्बन्धित व्यवसाय : आय-व्यय का हिसाब रखना, फाइलों को समझना, उन पर टिप्पणी लिखना तथा व्यावसायिक-पत्रों के उत्तर देना आदि कार्यों का समावेश इस प्रकार के व्यवसायों में होता है। क्लर्क, मुनीम, कार्यालय अधीक्षक, मैनेजर, एकाउण्टेंट आदि इसी वर्ग के व्यवसाय हैं।
(iv) हस्त-कौशल सम्बन्धी व्यवसाय : इन व्यवसायों में विभिन्न यन्त्रों की सहायता से किसी-न-किसी चीज़ का निर्माण किया जाता है; जैसे-लोहार, मिस्त्री, बढ़ई, चर्मकार, जिल्दसाज, ओवरसियर व इंजीनियर आदि।

2. शिक्षा, बौद्धिक स्तर, प्रशिक्षण तथा सामाजिक सम्मान आदि की दृष्टि से व्यवसायों का वर्गीकरण

इस आधार पर बैकमैन (Backman) ने व्यवसायों को निम्नलिखित पाँच श्रेणियों में विभाजित किया है:

 

(i) प्रशासकीय एवं उच्च स्तरीय व्यवसाय:
इसके तीन उपवर्ग हैं:
(क) भाषा सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे – विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, लेखक, वकील, सम्पादक, जज आदि।
(ख) विज्ञान सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे – डॉक्टरी, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, ऑडिटर तथा एकाउन्टेन्ट आदि।
(ग) प्रशासकीय व्यवसाय; जैसे – प्रशासक तथा मैनेजर आदि।

 

(ii) व्यापार एवं मध्यम स्तरीय व्यवसाय:
इसके दो उपवर्ग हैं:
(क) व्यापार सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे – व्यापारी, विज्ञापन के एजेण्ट, दुकानदार आदि।
(ख) मध्यम स्तर के व्यवसाय; जैसे – डिजाइनर, अभिनेता व फोटोग्राफर आदि।

 

(iii) कुशलतापूर्ण व्यवसाय:
इनमें किसी-न-किसी कौशल की आवश्यकता होती है। इसके अन्तर्गत दो प्रकार के कौशल हैं:
(क) शारीरिक कौशल सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे – रंगाई, छपाई, बढ़ईगिरी, दर्जीगिरी, मिस्त्री आदि।
(ख) बौद्धिक कौशल सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे – लिपिक, स्टेनोग्राफर तथा खजांची आदि।

 

(iv) अर्द्ध-कुशलतापूर्ण व्यवसाय:
इनमें कुछ कौशल और कुछ यन्त्रवत् कार्य शामिल हैं; जैसे – गार्ड, कण्डक्टर, पुलिस और ट्रैफिक का सिपाही, कार या ट्रक का ड्राइवर आदि।

 

(v) निम्न-स्तरीय व्यवसाय:
इन व्यवसायों में बुद्धि का सबसे कम प्रयोग किया जाता है; जैसे – चपरासी, चौकीदार, रिक्शाचालक, कृषि-कार्य, बोझा ढोना तथा मिल-मजदूर आदि।

 

3. रुचियों की दृष्टि से व्यवसायों का वर्गीकरण

व्यक्ति की रुचियों के अनुसार व्यवसायों को इन वर्गों में विभक्त किया गया है:

  • यान्त्रिक व्यवसाय
  • गणनात्मक व्यवसाय
  • बाह्य जीवन से सम्बन्धित व्यवसाय
  • वैज्ञानिक व्यवसाय
  • कलात्मक व्यवसाय
  • प्रभावात्मक व्यवसाय
  • साहित्यिक व्यवसाय
  • संगीतात्मक व्यवसाय
  • समाज सेवा सम्बन्धी व्यवसाय तथा
  • लिपिक सम्बन्धी व्यवसाय।

 

वर्तमान युग में व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से पड़ती है:

 

1. व्यक्तिगत भिन्नता:
व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी एवं मौलिक कारक व्यक्तिगत भिन्नता है। किसी व्यक्ति विशेष के लिए कौन-सा व्यवसाय उपयुक्त होगा, इसके लिए व्यावसायिक निर्देशन का कार्यक्रम अपेक्षित एवं अपरिहार्य है।

 

Question 6. व्यावसायिक निर्देशन के लाभ, महत्त्व एवं उपयोगिता का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
“व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता व्यक्ति और समाज की दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। [2007]
या
व्यावसायिक निर्देशन से आप क्या समझते हैं? वर्तमान संदर्भ में इसके महत्त्व पर प्रकाश डालिए। [2016]

Answer: व्यवसाय व्यक्ति के जीवन यापने का अनिवार्य माध्यम है जो व्यक्ति की रुचि और योग्यता के अनुसार होना चाहिए। व्यक्तिगत विभिन्नताओं को दृष्टिगत रखते हुए अनुकूल व्यवसाय चुनने में व्यक्ति की मदद करना व्यावसायिक निर्देशन का कार्य है। इसके अतिरिक्त नियोक्ता के लिए उपयुक्त व्यक्ति को तलाशने का कार्य भी इसी के अन्तर्गत आता है। व्यावसायिक निर्देशन के अर्थ को क्रो तथा क्रो ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “व्यावसायिक निर्देशन की व्याख्या सामान्यतः उस सहायता के रूप में की जाती है, जो विद्यार्थियों को किसी व्यवसाय को चुनने, उसके लिए तैयारी करने तथा उसमें उन्नति प्रदान करने के लिए दी जाती है।”

व्यावसायिक निर्देशन के लाभ, महत्त्व एवं उपयोगिता:
व्यावसायिक निर्देशन की उपयोगिता को संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

1. व्यक्तिगत भेद एवं व्यावसायिक निर्देशन: मनोवैज्ञानिक एवं सर्वमान्य रूप से कोई भी दो व्यक्ति एकसमान नहीं हो सकते और हर मामले में आनुवंशिक और परिवेशजन्य भेद पाये जाते हैं। इन भेदों के कारण हर व्यक्ति पृथक एवं दूसरों की अपेक्षा बेहतर कार्य कर सकता है तथा इन्हीं के आधार पर व्यक्ति को सही और उपयुक्त व्यवसाय चुनने होते हैं। व्यावसायिक निर्देशन के माध्यम से व्यक्तिगत गुणों के आधार पर व्यवसाय चुनने से व्यक्ति को सफलता मिलती है। इसके अतिरिक्त, यह व्यक्ति को अपनी वास्तविक क्षमताओं को पहचानने में मदद करता है।
In simple words: Vocational guidance helps people choose a career that matches their unique talents and interests. Since everyone is different, this guidance ensures that people find the right job where they can succeed and be happy.

🎯 Exam Tip: व्यावसायिक निर्देशन की परिभाषा लिखते समय क्रो तथा क्रो (Crow and Crow) के कथन को उद्धृत करने से उत्तर अधिक प्रभावशाली बनता है और पूरे अंक मिलते हैं।

2. व्यावसायिक बहुलता एवं निर्देशन : आजकल व्यवसाय अपनाने का आधार सामाजिक परम्पराएँ व जाति-व्यवस्था नहीं रही। समय के साथ साथ व्यावसायिक बहुलता ने व्यवसाय के चुनाव की गम्भीर समस्या को जन्म दिया है। व्यावसायिक निर्देशन में विविध व्यवसायों व कार्यों का विश्लेषण करके उनके लिए आवश्यक गुणों वाले व्यक्ति को चुना जाता हैं।

3. सफल एवं सुखी जीवन के लिए सोच : समझकर व्यवसाय चुनने में व्यक्ति के जीवन में स्थायित्व एवं उन्नति आती है। व्यवसाय का उपयुक्त चुनाव सफलता को जन्म देता है, जिससे जीवन में सुख और समृद्धि आती है।

4. आर्थिक लाभ : व्यवसाय में योग्य, सक्षम, बुद्धिमान एवं रुचि रखने वाले कार्मिकों को नियुक्त करने से न केवल उत्पादन की मात्रा बढ़ती है, बल्कि उत्पादित वस्तुओं में गुणात्मक वृद्धि भी होती है। जिससे व्यवसाय को अधिक लाभ होता है। इस लाभ का अंश कर्मचारियों में भी विभाजित होता है और वे आर्थिक लाभ अर्जित करते हैं।

5. शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य : विवशतावश किसी व्यवसाय को अपनाने से रुचिहीनता, निराशा, उत्साहहीनता, कुंठाओं एवं तनावों का जन्म होता है; अतः शारीरिक-मानसिक क्षमताओं व शक्तियों का भरपूर लाभ उठाने के लिए व दुर्बलताओं से बचने के लिए व्यावसायिक निर्देशन महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी है।

6. अवांछित प्रतिस्पर्धा की समाप्ति एवं सहयोग में वृद्धि : अच्छे व्यवसाय बहुत कम हैं, जबकि उनके पीछे बेतहाशा दौड़ रहे अभ्यर्थियों की भीड़ अधिक है। इससे अवांछित एवं गलाकाट प्रतिस्पर्धा का जन्म हुआ है। व्यावसायिक निर्देशों का सहारा लेकर यदि व्यक्ति अपनी योग्यता, क्षमता व शक्ति को आँककर सही व्यवसाय चुन लेगा तो समाज में अवांछित प्रतिस्पर्धा से उत्पन्न भग्नाशा समाप्त हो जाएगी। इससे पारस्परिक सहयोग में वृद्धि होगी।

7. मानवीय संसाधनों का सुनियोजित एवं अधिकतम उपयोग : मानव शक्ति को समझना, आँकना और उसके लिए उपयुक्त व्यवसाय की तलाश करना व्यावसायिक निर्देशन का कार्य है। यह निर्देशन राष्ट्रीय नियोजन कार्यक्रम का भी एक महत्त्वपूर्ण अंग है, जिसके अन्तर्गत मानवीय संसाधनों का अधिकाधिक उपयोग सम्भव होता है जिससे व्यक्तिगत एवं समष्टिगत कल्याण में अभिवृद्धि की जा सकेगी।

8. समाज की गत्यात्मकता एवं प्रगति : समाज की प्रकृति गत्यात्मक है। हर पल नयी-नयी परिस्थितियाँ जन्म ले रही हैं। बढ़ती हुई मानवीय आवश्यकताओं, उपलब्ध किन्तु सीमित साधनों एवं प्रगति की परिवर्तनशीलता आदि अवधारणाओं ने मानव व उसके समाज के मध्य समायोजन की दशाओं को विकृत कर डाला है। इस विकृत दशा में सुधार लाने की दृष्टि से तथा व्यावसायिक सन्तुष्टि के विचार को पुष्ट करने हेतु व्यक्ति को उचित कार्य देना होगा। इसके लिए व्यावसायिक निर्देशन ही एकमात्र उपाय दीख पड़ता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. निर्देशन की विधि के आधार पर निर्देशन का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
Answer: निर्देशन प्रदान करने की विधि के आधार पर निर्देशन दो प्रकार का होता है, जो व्यक्ति की विशिष्ट आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुसार तय किया जाता है:
1. वैयक्तिक निर्देशन तथा
2. सामूहिक निर्देशन।

1. वैयक्तिक निर्देशन : सर्वोत्तम समझे जाने वाले इस निर्देशन का प्रयोग व्यक्ति विशेष की गम्भीरतम समस्याओं को हल करने में किया जाता है। इसके अन्तर्गत वह समस्यायुक्त व्यक्ति से व्यक्तिगत सम्पर्क साधता है, उसका बारीकी से अध्ययन करता है, उसकी समस्याओं को स्वयं समझने का प्रयास करता है और इसके बाद व्यक्ति को इस योग्य बनाता है कि वह अपनी समस्याओं का समाधान स्वयमेव प्रस्तुत कर सके। इस प्रकार के निर्देशन में मनोवैज्ञानिक या विशेषज्ञ एक बार में सिर्फ एक व्यक्ति पर ध्यान दे पाता है। इस कारणवश यह निर्देशन धन और समय की दृष्टि से महँगा पड़ता है। इसके अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक / विशेषज्ञ के अभाव में इसका प्रयोग करना सम्भव नहीं है.
In simple words: निर्देशन देने के दो तरीके होते हैं - एक-एक करके (व्यक्तिगत) या पूरे समूह को एक साथ। वैयक्तिक निर्देशन में गाइड केवल एक व्यक्ति की गंभीर समस्याओं को गहराई से समझकर उसे खुद हल खोजने के काबिल बनाता है।

🎯 Exam Tip: परीक्षा में पूरे अंक पाने के लिए निर्देशन के दोनों प्रकारों के नाम लिखकर वैयक्तिक निर्देशन की परिभाषा, कार्यविधि और इसकी सीमाओं (जैसे अधिक खर्चीला होना) को स्पष्ट रूप से लिखें।

 

Question 2. निर्देशन का मायर्स द्वारा प्रस्तुत किया गया वर्गीकरण दीजिए।
Answer: मायर्स (Mayers) के अनुसार समस्याओं के आधार पर निर्देशन के आठ प्रकार बताए गए हैं, जो निम्न प्रकार वर्णित हैं। यह वर्गीकरण व्यक्ति के जीवन के सर्वांगीण विकास में सहायक सिद्ध होता है:
1. शैक्षिक निर्देशन – निर्देशन की यह शाखा व्यक्ति को शिक्षा सम्बन्धी समस्याओं के समाधान में सहायता करती है।
2. व्यावसायिक निर्देशन – यह उपयुक्त व्यवसाय के चुनाव में मार्गदर्शन करता है।
3. सामाजिक तथा नैतिक निर्देशन – इसमें सामाजिक सम्बन्धों को स्वस्थ व दृढ़ बनाने, सामाजिक तनाव को कम करने तथा मनुष्यों की नैतिक मूल्यों में प्रतिष्ठा हेतु परामर्श दिया जाता है।
4. नागरिकता सम्बन्धी निर्देशन – यह शाखा नागरिक के अधिकार व कर्तव्यों के सम्बन्ध में आवश्यक निर्देश एवं सुझाव देकर व्यक्ति को श्रेष्ठ नागरिक बनाने में मदद करती है।
5. समाज-सेवा सम्बन्धी निर्देशन – यह शाखा समाज-सेवा सम्बन्धी कार्यों को सम्पादित करने तथा योजनाओं को पूरा करने में सहायता प्रदान करती है।
6. नेतृत्व सम्बन्धी निर्देशन – इसके अन्तर्गत लोगों में नेतृत्व की क्षमता का विकास करने सम्बन्धी पथ-प्रदर्शन प्रदान किया जाता है।
7. स्वास्थ्य सम्बन्धी निर्देशन – इसमें व्यक्तियों को स्वास्थ्य सम्बन्धी परामर्श देने तथा अपने परिवार के सदस्यों का स्वास्थ्य बनाये रखने हेतु निर्देश और सुझाव मिलते हैं।
8. मनोरंजन सम्बन्धी निर्देशन – निर्देशन की इस शाखा के अन्तर्गत लोगों को अपने खाली समय को सदुपयोग करने तथा श्रमोपरान्त मनोरंजन करने के उपायों से अवगत कराया जाता है।
In simple words: मायर्स ने बताया कि लोगों को जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों जैसे पढ़ाई, नौकरी, सेहत और समाज में सही रास्ता दिखाने के लिए आठ तरह के निर्देशन (गाइडेंस) की जरूरत होती है।

🎯 Exam Tip: परीक्षा में मायर्स के वर्गीकरण के सभी आठ प्रकारों के नाम स्पष्ट रूप से लिखकर उनके आगे एक-एक वाक्य में उनका महत्व अवश्य समझाएं।

 

Question 3. शैक्षिक निर्देशन के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
Answer: शैक्षिक निर्देशन अपने आप में व्यावहारिक महत्त्व एवं उपयोगिता की प्रक्रिया है। यह छात्रों को उनके शैक्षिक जीवन में सही निर्णय लेने में सक्षम बनाती है। शैक्षिक निर्देशन के मुख्य सिद्धान्त निम्नलिखित हैं:
1. शैक्षिक निर्देशन सर्वसुलभ होना चाहिए: वर्तमान परिस्थितियों में यह अनिवार्य समझा जाता है कि प्रत्येक छात्र को आवश्यक शैक्षिक निर्देशन की सुविधा उपलब्ध हो। सैद्धान्तिक रूप से यह माना जाता है कि शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने में किसी भी प्रकार का पक्षपात या भेदभाव नहीं होना चाहिए।
2. मानक परीक्षणों को अपनाने का सिद्धान्त: शैक्षिक निर्देशन से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि शैक्षिक निर्देशन आवश्यक परीक्षणों के आधार पर ही दिया जाए।
3. वैयक्तिक भिन्नता का सिद्धान्त: सैद्धान्तिक रूप से यह माना जाता है कि शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया में वैयक्तिक भिन्नता को पूरी तरह से ध्यान में रखा जाए। प्रत्येक छात्र को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करते समय उसके व्यक्तिगत गुणों, क्षमताओं तथा आकांक्षाओं आदि को ध्यान में रखना चाहिए।
4. अनुगामी अध्ययन का सिद्धान्त: यह सत्य है कि शैक्षिक निर्देशन की सही प्रक्रिया को अपनाया जाना चाहिए, परन्तु इसके साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि निर्देशन प्रदान करने के उपरान्त उसकी सफलता का मूल्यांकन भी किया जाए। इसे निर्देशन के अनुगामी अध्ययन का सिद्धान्त कहा जाता है।
In simple words: शैक्षिक निर्देशन के सिद्धांतों का मतलब है कि पढ़ाई में मदद हर बच्चे को बिना किसी भेदभाव के मिलनी चाहिए, बच्चे की अपनी खूबियों को ध्यान में रखकर दी जानी चाहिए, और मदद के बाद यह भी देखना चाहिए कि उसका फायदा हुआ या नहीं।

🎯 Exam Tip: शैक्षिक निर्देशन के चारों सिद्धांतों (सर्वसुलभता, मानक परीक्षण, वैयक्तिक भिन्नता और अनुगामी अध्ययन) को हेडिंग बनाकर उत्तर लिखने से पूरे अंक मिलते हैं।

 

Question 4. व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता क्यों है? स्पष्ट कीजिए। या शिक्षा में व्यावसायिक निर्देशन का महत्त्व बताइए।
Answer: व्यावसायिक निर्देशन (Vocational Guidance) की आवश्यकता और महत्त्व निम्नलिखित कारणों से है:
1. उपयुक्त व्यवसाय के चयन में सहायक: आज के समय में व्यवसायों की विविधता बहुत अधिक है। व्यावसायिक निर्देशन छात्रों को उनकी रुचि, योग्यता और क्षमता के अनुसार सही व्यवसाय चुनने में मदद करता है।
2. व्यक्तिगत एवं सामाजिक सामंजस्य: जब कोई व्यक्ति अपनी रुचि के अनुकूल कार्य करता है, तो उसे मानसिक संतोष मिलता है। इससे समाज में भी उत्पादकता और सकारात्मकता बढ़ती है।
3. राष्ट्रीय संसाधनों का सदुपयोग: सही निर्देशन से मानव संसाधन का अपव्यय रुकता है। योग्य व्यक्ति सही स्थान पर कार्य करके देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
4. बेरोजगारी की समस्या का समाधान: व्यावसायिक निर्देशन युवाओं को स्वरोजगार और बाजार की मांग के अनुसार कौशल विकसित करने के लिए प्रेरित करता है, जिससे बेरोजगारी कम होती है।
In simple words: व्यावसायिक निर्देशन बच्चों को यह समझने में मदद करता है कि उन्हें भविष्य में कौन सी नौकरी या काम करना चाहिए, ताकि वे अपनी पसंद के काम में सफल हो सकें और देश का भी विकास हो।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न का उत्तर देते समय 'उपयुक्त व्यवसाय का चयन' और 'मानव संसाधन का सदुपयोग' जैसे मुख्य बिंदुओं को रेखांकित (underline) अवश्य करें।

Question. व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता एवं महत्ता पर प्रकाश डालिए। [2011, 13]
Answer: वर्तमान युग में व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से पड़ती है:
1. व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी एवं मौलिक कारक व्यक्तिगत भिन्नता है। किसी व्यक्ति विशेष के लिए कौन-सा व्यवसाय उपयुक्त होगा, इसके लिए व्यावसायिक निर्देशन का कार्यक्रम अपेक्षित एवं अपरिहार्य है। व्यावसायिक सफलता के लिए सही मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है।
2. विभिन्न व्यक्तियों में शरीर, मन या बुद्धि, योग्यता, स्वभाव, रुचि, अभिरुचि तथा व्यक्तित्व के अनेकानेक तत्वों की दृष्टि से पर्याप्त अन्तर दृष्टिगोचर होता है। व्यक्ति द्वारा चुने गये व्यवसाय एवं इन वैयक्तिक भिन्नताओं के मध्य समायोजन की दृष्टि से व्यावसायिक निर्देशन आवश्यक है।
3. व्यक्ति और उसके समाज की दृष्टि से भी व्यवसाय में निर्देशन की आवश्यकता महसूस की जाती है। व्यक्ति द्वारा चयन किया गया व्यवसाय यदि उसकी वृत्तियों के अनुकूल हो और उसके माध्यम से वह अपना समुचित विकास स्वयं कर सके तो उसका जीवन सुखी हो सकता है। व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति की आजीविका के सम्बन्ध में अभीष्ट सहायता कर उसके हित में कार्य करता है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति का सुख मिलकर ही समूचे समाज को सुखी बनाता है।
4. मानव संसाधनों का संरक्षण तथा व्यक्तिगत साधनों का समुचित उपयोग व्यावसायिक निर्देशन के बिना सम्भव नहीं है। व्यक्ति का आर्थिक विकास, प्रगति एवं समृद्धि उसके जीवन में प्रसन्नता उत्पन्न करती है, जिसके लिए व्यावसायिक निर्देशन की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।
5. अनेक व्यवसायों के लिए भिन्न-भिन्न क्षमताओं व योग्यताओं से युक्त व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। व्यावसायिक निर्देशन के माध्यम से किसी विशेष व्यवसाय के लिए विशेष क्षमता व योग्यता वाले उपयुक्त व्यक्तियों का सुगम व प्रभावशाली चयन किया जा सकता है।
6. समाज गत्यात्मक एवं क्रियाशील है जिसकी परिस्थितियाँ एवं कार्य द्रुत गति से परिवर्तित हो रहे हैं। नये-नये परिवर्तनों के साथ तालमेल बिठाने के लिए भी व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता पड़ती है।

निष्कर्षत : व्यक्तिगत भिन्नता, व्यावसायिक बहुलता, विविध व्यवसायों से सम्बन्धित जानकारी तथा वातावरण के साथ उचित सामंजस्य बनाने के लिए भी व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता पड़ती है।
In simple words: Vocational guidance helps people choose the right career based on their unique skills, personality, and interests. This leads to personal happiness and helps society grow efficiently.

🎯 Exam Tip: To score full marks, list at least 4 to 5 key points clearly with headings like individual differences, social needs, and resource utilization.

 

Question 5. शैक्षिक निर्देशन तथा व्यावसायिक निर्देशन में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2007, 08, 09, 13, 14]
Answer: शैक्षिक निर्देशन और व्यावसायिक निर्देशन, ये निर्देशन के दो मुख्य प्रकार हैं। शैक्षिक निर्देशन का आशय शैक्षिक विषयों के सम्बन्ध में परामर्श देना है, जबकि व्यावसायिक निर्देशन व्यवसाय के चुनाव तथा व्यवसाय से सम्बन्धित समस्याओं के निराकरण के लिए दिये जाने वाले परामर्श को कहते हैं। मानव जीवन में निर्देशन के इन दोनों प्रकारों का महत्त्वपूर्ण स्थान है और ये दोनों व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में सहायक होते हैं।
In simple words: Educational guidance helps students choose the right subjects and courses in school. Vocational guidance helps people choose the right job or career and solve work-related problems.

🎯 Exam Tip: Clearly define both terms in separate sentences or a table to highlight the contrast between academic choices and career choices.

शैक्षिक निर्देशन और व्यावसायिक निर्देशन में अन्तर

दोनों ही आवश्यक तथा उपयोगी हैं। इनके मध्य भेद को निम्नलिखित तालिका के अन्तर्गत स्पष्ट किया जा सकता है:

क्र०सं०शैक्षिक निर्देशनव्यावसायिक निर्देशन
1.शैक्षिक निर्देशन का क्षेत्र शैक्षिक विषयों से सम्बन्धित है।व्यावसायिक निर्देशन का क्षेत्र व्यवसायों से सम्बन्धित है।
2.शैक्षिक निर्देशन केवल छात्र-छात्राओं को दिया जाता है।व्यावसायिक निर्देशन सभी व्यक्तियों के लिए उपयोगी है।
3.शैक्षिक निर्देशन शैक्षिक समस्याओं के समाधान के लिए दिया जाता है।व्यावसायिक निर्देशन व्यवसाय सम्बन्धी समस्याओं को हल करने में सहायक होता है।
4.शैक्षिक निर्देशन लेने वाले व्यक्ति के लिए शिक्षित होना आवश्यक है।व्यावसायिक निर्देशन के लिए शिक्षित होना एक अनिवार्य शर्त नहीं है। एक निरक्षर व्यक्ति भी व्यावसायिक निर्देशन से पर्याप्त लाभ उठा सकता है।
5.शैक्षिक निर्देशन का क्षेत्र सीमित है।व्यावसायिक निर्देशन का क्षेत्र बहुत विस्तृत है।

 

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. परामर्श किसे कहते हैं? इसके कितने प्रकार हैं? (2016)
Answer: परामर्श शब्द का अर्थ राय, सलाह, मशवरा तथा सुझाव लेना या देना होता है। अंग्रेजी में परामर्श को काउंसलिंग (Counseling) कहते हैं। रोजर्स के अनुसार, “परामर्श किसी व्यक्ति के साथ लगातार प्रत्यक्ष सम्पर्क की वह कड़ी है, जिसका उद्देश्य उसकी अभिवृत्तियों तथा व्यवहार में परिवर्तन लाने में सहायता प्रदान करना है।” परामर्श एक ऐसी व्यवहारगत प्रक्रिया है, जिसमें कम-से-कम दो व्यक्ति परामर्श लेने वाला तथा परामर्श देने वाला अवश्य शामिल होता है। यह प्रक्रिया व्यक्ति को सही निर्णय लेने में सक्षम बनाती है।

परामर्श के प्रकार:
परामर्श मुख्य रूप से चार प्रकार का होता है:
1. आपातकालीन परामर्श
2. समस्या समाधानात्मक या उपचारात्मक परामर्श
3. निवारक परामर्श
4. विकासात्मक या रचनात्मक परामर्श
In simple words: परामर्श का मतलब किसी से सलाह या राय लेना-देना है। इसमें दो लोग होते हैं—एक सलाह देने वाला और दूसरा सलाह लेने वाला, ताकि व्यक्ति अपनी समस्याओं को आसानी से सुलझा सके।

🎯 Exam Tip: परामर्श की परिभाषा लिखते समय प्रसिद्ध विचारक रोजर्स (Rogers) के कथन को उद्धृत करना और इसके चारों प्रकारों को स्पष्ट रूप से लिखना पूरे अंक दिलाता है।

 

Question 2. निर्देशन और परामर्श में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2012]
Answer: निर्देशन और परामर्श में मुख्य अन्तर निम्नलिखित तालिका द्वारा स्पष्ट किया गया है। ये दोनों प्रक्रियाएँ व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

निर्देशनपरामर्श
निर्देशन का सम्बन्ध सामान्य तथा सामूहिक रूप से समूह विशेष के व्यक्तियों की समस्याओं से हो सकता है।परामर्श हमेशा किसी एक व्यक्ति या व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित होता है।
निर्देशन एक व्यापक प्रक्रिया है।परामर्श निर्देशन प्रक्रिया का ही एक अंग है।
निर्देशन पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों, समाचार आदि के माध्यम से दिया जा सकता है।परामर्श के लिए आपसी विचार-विमर्श एवं तर्क-वितर्क आवश्यक होता है।
निर्देशन का सम्बन्ध शैक्षिक, व्यावसायिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं से होता है।परामर्श का सम्बन्ध बालक एवं बालिकाओं की व्यक्तिगत समस्याओं से होता है, जिसमें जीवन के व्यावहारिक तौर-तरीके शामिल होते हैं।

In simple words: निर्देशन बड़े समूह को सामान्य सलाह देने जैसा है (जैसे किताबों या भाषणों द्वारा), जबकि परामर्श किसी एक व्यक्ति के साथ आमने-सामने बैठकर उसकी निजी समस्याओं पर गहराई से बातचीत करना है।

🎯 Exam Tip: अन्तर स्पष्ट करते समय हमेशा तालिका (Table) का प्रयोग करें। निर्देशन को व्यापक प्रक्रिया और परामर्श को उसका एक अंग बताना एक मुख्य बिंदु है जिसे परीक्षक अवश्य देखता है।

 

Question 3. व्यक्तिगत निर्देशन से आप क्या समझते हैं?
Answer: हर एक व्यक्ति का जीवन अनेक व्यक्तिगत समस्याओं से भरा होता है, ये समस्याएँ परिवार सम्बन्धी, मित्र सम्बन्धी, समायोजन सम्बन्धी, स्वास्थ्य सम्बन्धी, मानसिक ग्रन्थियों सम्बन्धी या यौन समस्याओं से सम्बन्धित हो सकती हैं। इन व्यक्तिगत कठिनाइयों को दूर करने और व्यक्ति को समाज में बेहतर तालमेल बिठाने के लिए जो सहायता दी जाती है, उसे व्यक्तिगत निर्देशन कहते हैं। यह व्यक्ति को मानसिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर बनाता है।
In simple words: जब किसी व्यक्ति को उसकी निजी समस्याओं (जैसे परिवार, दोस्तों या मानसिक तनाव) को सुलझाने और जीवन में तालमेल बिठाने के लिए मदद दी जाती है, तो उसे व्यक्तिगत निर्देशन कहते हैं।

🎯 Exam Tip: व्यक्तिगत निर्देशन की परिभाषा में उन क्षेत्रों (जैसे परिवार, स्वास्थ्य, मानसिक ग्रन्थि) का उल्लेख अवश्य करें जहाँ व्यक्ति को इसकी आवश्यकता होती है।

 

प्रश्न 4. शैक्षिक निर्देशन से आप क्या समझते हैं ? [2010, 12, 13]
उत्तर : शिक्षा जीवन-पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया होने के बावजूद भी विशेष तौर पर मानव-जीवन के एक विशिष्ट काल और स्थान से सम्बन्ध रखती है। शैक्षिक जगत् में मनुष्य की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसने अपने अध्ययन के लिए किन विषयों या विशिष्ट क्षेत्रों का चयन किया है। शैक्षिक निर्देशन के अन्तर्गत बालक की योग्यताओं व क्षमताओं के अनुसार उपयुक्त अध्ययन-क्षेत्र या विषयों का चुनाव किया जाता है। शैक्षिक निर्देशन के अर्थ को जोन्स ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “शैक्षिक निर्देशन का तात्पर्य उस व्यक्तिगत सहायता से हैं जो विद्यार्थियों को इसलिए प्रदान की जाती है कि वे अपने लिए उपयुक्त विद्यालय, पाठ्यक्रम, पाठ्य विषय एवं विद्यालय जीवन का चयन कर सकें तथा उनसे समायोजन स्थापित कर सकें।” यह प्रक्रिया छात्रों को उनके भविष्य के लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से देखने में मदद करती है।
In simple words: शैक्षिक निर्देशन का अर्थ है छात्रों को उनकी रुचि और योग्यता के अनुसार सही विषय और स्कूल चुनने में मदद करना ताकि वे जीवन में सफल हो सकें।

🎯 Exam Tip: शैक्षिक निर्देशन की परिभाषा लिखते समय जोन्स (Jones) के कथन को उद्धृत करना अच्छे अंक प्राप्त करने में सहायक होता है।

 

प्रश्न 5. शैक्षिक निर्देशन के क्या लाभ हैं? [2011]
उत्तर : शैक्षिक निर्देशन के लाभ निम्नलिखित हैं:
1. छात्र-छात्राओं की समस्याओं का उचित शैक्षिक निर्देशन से समाधान हो सकता है।
2. छात्र और छात्राओं को क्षमता, रुचि तथा योग्यतानुसार दिशा-निर्देश प्राप्त हो जाते हैं।
3. पाठ्यक्रम निर्धारण में शैक्षिक निर्देशन महत्त्वपूर्ण होता है।
4. शैक्षिक निर्देशन से अनुशासन सम्बन्धी समस्याओं का भी समाधान हो जाता है।
5. रोजगार के अवसरों का ज्ञान प्राप्त होता है।
इसके अलावा, यह छात्रों के समय और ऊर्जा की बर्बादी को भी रोकता है।
In simple words: शैक्षिक निर्देशन से छात्रों को सही विषय चुनने, अनुशासन बनाए रखने और भविष्य में नौकरी के अच्छे अवसर खोजने में मदद मिलती है।

🎯 Exam Tip: लाभों को बिन्दुओं (points) में स्पष्ट रूप से लिखें और मुख्य शब्दों जैसे 'क्षमता', 'रुचि' और 'अनुशासन' को रेखांकित करें।

 

प्रश्न 6. व्यावसायिक निर्देशन से आप क्या समझते हैं ? [2007, 13]
उत्तर : व्यवसाय व्यक्ति के जीवन यापने का अनिवार्य माध्यम है जो व्यक्ति की रुचि और योग्यता के अनुसार होना चाहिए। व्यक्तिगत विभिन्नताओं को दृष्टिगत रखते हुए अनुकूल व्यवसाय चुनने में व्यक्ति की मदद करना व्यावसायिक निर्देशन का कार्य है। इसके अतिरिक्त नियोक्ता के लिए उपयुक्त व्यक्ति को तलाशने का कार्य भी इसी के अन्तर्गत आता है। व्यावसायिक निर्देशन के अर्थ को क्रो तथा क्रो ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “व्यावसायिक निर्देशन की व्याख्या सामान्यतः उस सहायता के रूप में की जाती है, जो विद्यार्थियों को किसी व्यवसाय को चुनने, उसके लिए तैयारी करने तथा उसमें उन्नति प्रदान करने के लिए दी जाती है।” यह व्यक्ति को कार्यक्षेत्र में आने वाली चुनौतियों के लिए मानसिक रूप से तैयार करता है।
In simple words: व्यावसायिक निर्देशन का मतलब है किसी व्यक्ति को उसकी पसंद और काबिलियत के हिसाब से सही नौकरी या काम चुनने और उसमें तरक्की करने में मदद करना।

🎯 Exam Tip: क्रो तथा क्रो (Crow and Crow) की परिभाषा को सटीक शब्दों में लिखें ताकि उत्तर अधिक प्रभावशाली लगे।

 

प्रश्न 7. व्यावसायिक निर्देशन के उद्देश्य का उल्लेख कीजिए।
उत्तर : व्यावसायिक निर्देशन अपने आप में एक उद्देश्यपूर्ण क्रिया है। इसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
1. प्रत्येक व्यक्ति को उसकी योग्यताओं एवं क्षमताओं के अनुसार व्यवसाय का चुनाव करने में सहायता प्रदान करना।
2. सम्बन्धित व्यक्तियों को विभिन्न व्यवसायों के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी प्रदान करना।
3. प्रत्येक कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति की नियुक्ति में सहायता प्रदान करना।
4. व्यक्ति को अपने जीवन में निराश एवं कुण्ठित होने से बचाना।
यह समाज में श्रम के सही विभाजन और आर्थिक स्थिरता को भी बढ़ावा देता है।
In simple words: इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को उनकी योग्यता के अनुसार सही काम दिलाना है ताकि वे अपने काम से खुश रहें और जीवन में निराश न हों।

🎯 Exam Tip: चारों उद्देश्यों को क्रमानुसार लिखें और 'निराशा से बचाना' जैसे मनोवैज्ञानिक पहलुओं को भी शामिल करें।

 

प्रश्न 8. व्यावसायिक निर्देशन के क्षेत्र की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर : व्यावसायिक निर्देशन का क्षेत्र काफी व्यापक है। वास्तव में निर्देशन के व्यावसायिक पक्ष को उसके शैक्षिक, भौतिक तथा सांस्कृतिक पक्षों से पूर्ण रूप से अलग नहीं किया जा सकता। इस स्थिति में व्यावसायिक निर्देशन के लिए व्यक्ति से सम्बन्धित समस्त सूचनाएँ आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण होती हैं। व्यक्ति की अभिरुचि, योग्यता एवं क्षमताओं को जानना अनिवार्य है। व्यावसायिक निर्देशन के लिए व्यक्तिगत भिन्नताओं के साथ-ही-साथ व्यवसायों से सम्बन्धित भिन्नताओं को भी जानना आवश्यक है। इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यावसायिक निर्देशन का क्षेत्र व्यापक है। आधुनिक युग में नए व्यवसायों के आने से इसका क्षेत्र और भी अधिक विस्तृत हो गया है।
In simple words: व्यावसायिक निर्देशन का क्षेत्र बहुत बड़ा है क्योंकि इसमें व्यक्ति की आदतों, पढ़ाई और समाज की जरूरतों को ध्यान में रखकर सही काम का चुनाव किया जाता है।

🎯 Exam Tip: उत्तर में 'व्यापक क्षेत्र' और 'व्यक्तिगत भिन्नताओं' जैसे महत्वपूर्ण शब्दों का प्रयोग अवश्य करें।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. निर्देशन का क्या अर्थ है? [2011, 13] या निर्देशन में क्या प्रदान किया जाता है? [2009, 11]
Answer: “निर्देशन एक ऐसी व्यक्तिगत सहायता है जो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे को, जीवन के लक्ष्यों को विकसित करने व समायोजन करने और लक्ष्यों की प्राप्ति में आयी हुई समस्याओं को हल करने के लिए प्रदान की जाती है।” [ जोन्स ] यह परिभाषा स्पष्ट करती है कि निर्देशन का उद्देश्य व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाना है।
In simple words: Guidance is a personal help given by one person to another. It helps them set life goals, adjust to situations, and solve problems to achieve success.

🎯 Exam Tip: Always write the name of the scholar (like Jones) when writing a definition to score full marks.

 

Question 2. सामान्य वर्गीकरण के अनुसार निर्देशन के मुख्य प्रकार कौन-कौन-से हैं? [2016]
Answer: सामान्य वर्गीकरण के अनुसार निर्देशन के मुख्य प्रकार हैं:
1. शैक्षिक निर्देशन
2. व्यावसायिक निर्देशन तथा
3. व्यक्तिगत निर्देशन। ये तीनों प्रकार व्यक्ति के जीवन के विभिन्न पहलुओं को बेहतर बनाने में मदद करते हैं।
In simple words: Generally, guidance is of three main types: educational (for studies), vocational (for jobs), and personal (for private life).

🎯 Exam Tip: List all three types clearly in points to make your answer neat and easy to read for the examiner.

 

Question 3. निर्देशन की विधि के आधार पर निर्देशन के मुख्य प्रकार कौन-कौन-से हैं?
Answer: निर्देशन की विधि के आधार पर निर्देशन के दो मुख्य प्रकार हैं:
1. वैयक्तिक निर्देशन तथा
2. सामूहिक निर्देशन। ये दोनों विधियाँ अलग-अलग परिस्थितियों में उपयोग की जाती हैं।
In simple words: Based on the method used, guidance can be given to one person at a time (individual) or to a group of people together (group).

🎯 Exam Tip: Remember that "method-based" classification only has two types: individual and group guidance.

 

Question 4. विद्यालय में उत्पन्न होने वाली समस्याओं के समाधान के लिए दिये जाने वाले निर्देशन को क्या कहते हैं?
Answer: विद्यालय में उत्पन्न होने वाली समस्याओं के समाधान के लिए दिये जाने वाले निर्देशन को ‘शैक्षिक निर्देशन’ कहते हैं। यह छात्रों को उनकी पढ़ाई और स्कूल के वातावरण में ढलने में मदद करता है।
In simple words: The guidance given to solve problems faced by students in school is called educational guidance.

🎯 Exam Tip: Use the exact term 'शैक्षिक निर्देशन' (Educational Guidance) in your answer and highlight or underline it.

 

Question 5. शैक्षिक निर्देशन की कितनी विधियाँ हैं?
Answer: शैक्षिक निर्देशन की दो विधियाँ हैं:
1. वैयक्तिक निर्देशन तथा
2. सामूहिक निर्देशन। ये दोनों विधियाँ छात्रों की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करती हैं।
In simple words: Educational guidance can be given in two ways: to a single student (individual) or to a group of students (group).

🎯 Exam Tip: Clearly state the number 'दो' (two) first, and then list both methods to get full marks.

 

Question 6. व्यक्तिगत शैक्षिक निर्देशन में एक समय में कितने व्यक्तियों को निर्देशन प्राप्त होता है?
Answer: व्यक्तिगत शैक्षिक निर्देशन में एक समय में एक ही व्यक्ति को निर्देशन प्राप्त होता है। इससे उस व्यक्ति की समस्याओं पर पूरा ध्यान दिया जा सकता है।
In simple words: In personal or individual guidance, only one person receives help at a time so they get full attention.

🎯 Exam Tip: The keyword here is 'एक ही व्यक्ति' (only one person). Make sure to emphasize this in your answer.

 

Question 7. शैक्षिक निर्देशन के मुख्य उद्देश्य क्या हैं? [2010, 11]
Answer: शैक्षिक निर्देशन का मुख्य उद्देश्य है – बालक को शैक्षिक परिस्थितियों में उत्पन्न होने वाली समस्याओं के समाधान के योग्य बनाना। शैक्षिक परिस्थितियों में समायोजन स्थापित करने के लिए शैक्षिक निर्देशन दिया जाता है। यह छात्र के सर्वांगीण विकास में सहायक होता है।
In simple words: The main goal of educational guidance is to help students solve their school-related problems and adjust well to their learning environment.

🎯 Exam Tip: Mention the keywords 'समस्याओं के समाधान' (solving problems) and 'समायोजन' (adjustment) to score maximum marks.

 

Question 8. व्यक्ति की व्यावसायिक समस्याओं के समाधान के लिए दिये जाने वाले निर्देशन को क्या कहते हैं?
Answer: व्यक्ति की व्यावसायिक समस्याओं के समाधान के लिए दिये जाने वाले निर्देशन को ‘व्यावसायिक निर्देशन’ कहते हैं। यह व्यक्ति को सही करियर चुनने और उसमें सफल होने में मदद करता है।
In simple words: Guidance given to help someone solve career or job-related problems is called vocational guidance.

🎯 Exam Tip: Ensure you write 'व्यावसायिक निर्देशन' (Vocational Guidance) clearly as it is the core term of this question.

 

Question 9. एक साथ अनेक व्यक्तियों को निर्देशन प्रदान करने की प्रक्रिया को क्या कहते हैं?
Answer: एक साथ अनेक व्यक्तियों को निर्देशन प्रदान करने की प्रक्रिया को ‘सामूहिक निर्देशन’ कहते हैं। यह विधि समय और ऊर्जा दोनों की बचत करती है।
In simple words: The process of giving guidance to many people at the same time is called group guidance.

🎯 Exam Tip: Use the term 'सामूहिक निर्देशन' (Group Guidance) to answer this direct one-word style question.

 

Question 10. निर्देशन के केवल दो उद्देश्य लिखिए। [2014]
Answer: निर्देशन का एक उद्देश्य है – समस्या को भली-भाँति समझने में सहायता प्रदान करना तथा दूसरा उद्देश्य है–समस्या का समाधान प्राप्त करने में सहायता प्रदान करना। ये दोनों उद्देश्य व्यक्ति को सही दिशा दिखाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
In simple words: The two main goals of guidance are to help a person understand their problem clearly and to help them find a proper solution for it.

🎯 Exam Tip: Present the two objectives clearly, using connectors like 'पहला' (first) and 'दूसरा' (second) or bullet points for better presentation.

 

Question 11. निर्देशन क्यों आवश्यक है ? [2014]
Answer: किसी भी समस्या के उचित समाधान को ढूंढ़ने के लिए निर्देशन आवश्यक होता है। यह व्यक्ति को सही मार्ग चुनने में मदद करता है।
In simple words: निर्देशन हमें अपनी समस्याओं का सही हल खोजने और सही रास्ता चुनने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: परीक्षा में पूरे अंक पाने के लिए उत्तर में 'उचित समाधान' और 'समस्या' जैसे मुख्य शब्दों का प्रयोग अवश्य करें।

 

Question 12. व्यावसायिक निर्देशन की कितनी विधियाँ हैं? [2007]
Answer: व्यावसायिक निर्देशन की दो विधियाँ हैं:
1. व्यक्तिगत व्यावसायिक निर्देशन तथा
2. सामूहिक व्यावसायिक निर्देशन। ये दोनों विधियाँ व्यक्ति को करियर चुनने में सहायता करती हैं।
In simple words: व्यावसायिक निर्देशन के दो तरीके होते हैं - एक अकेले व्यक्ति के लिए (व्यक्तिगत) और दूसरा पूरे समूह के लिए (सामूहिक)।

🎯 Exam Tip: दोनों विधियों के नाम स्पष्ट रूप से नंबर डालकर लिखें ताकि परीक्षक को उत्तर समझने में आसानी हो।

 

Question 13. निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य:
(i) निर्देशन एक प्रकार की वैयक्तिक सहायता है।
(ii) निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत निर्देशक द्वारा ही सम्बन्धित व्यक्ति के समस्त कार्य किये जाते हैं।
(iii) विद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों के लिए निर्देशन अनावश्यक एवं व्यर्थ है।
(iv) व्यक्तिगत निर्देशन के परिणाम सामूहिक निर्देशन से अच्छे होते हैं।
(v) शैक्षिक निर्देशन व्यावसायिक निर्देशन से उत्तम है।
Answer:
(i) सत्य
(ii) असत्य
(iii) असत्य
(iv) सत्य
(v) सत्य। ये कथन निर्देशन के विभिन्न सिद्धांतों और व्यावहारिक पहलुओं को दर्शाते हैं।
In simple words: यहाँ दिए गए कथनों में से पहला, चौथा और पाँचवाँ सही हैं, जबकि दूसरा और तीसरा गलत हैं।

🎯 Exam Tip: प्रत्येक उप-प्रश्न का उत्तर उसके सही क्रमांक (i, ii, iii आदि) के सामने ही लिखें ताकि कोई भ्रम न रहे।

 

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए।

 

Question 1. “निर्देशन एक प्रक्रिया है, जो कि नवयुवकों को स्वयं अपने में, दूसरों से तथा परिस्थितियों से समायोजन करना सिखाती है।” यह परिभाषा दी है:
(a) हसबैण्ड ने
(b) मौरिस ने
(c) स्किनर ने
(d) जोन्स ने
Answer: (c) स्किनर ने
In simple words: स्किनर के अनुसार, निर्देशन युवाओं को खुद से, दूसरों से और अपने माहौल से तालमेल बिठाना सिखाता है।

🎯 Exam Tip: परिभाषा वाले प्रश्नों में "समायोजन" शब्द को स्किनर के नाम से जोड़कर याद रखें।

 

Question 2. “निर्देशन प्रदर्शन नहीं है।” यह कथन किसका है?
(a) क्रो एवं क्रो का
(b) जोन्स का
(c) वैफनर का
(d) वुड का
Answer: (a) क्रो एवं क्रो का
In simple words: क्रो एवं क्रो का मानना था कि निर्देशन केवल दिखावा या प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह एक वास्तविक मदद है।

🎯 Exam Tip: "निर्देशन प्रदर्शन नहीं है" कथन को सीधे क्रो एवं क्रो के नाम से याद रखें।

 

Question 3. “शैक्षिक निर्देशन व्यक्तिगत छात्रों की योग्यताओं, पृष्ठभूमि और आवश्यकताओं का पता लगाने की विधि प्रदान करता है।” यह परिभाषा दी है:
(a) रूथ तथा स्ट्रेन्ज ने
(b) क्रो एवं क्रो ने
(c) हैमरिन व एरिक्सन ने
(d) बोरिंग व अन्य ने
Answer: (c) हैमरिन व एरिक्सन ने
In simple words: हैमरिन और एरिक्सन ने कहा था कि शैक्षिक निर्देशन से छात्रों की काबिलियत और जरूरतों को समझने में मदद मिलती है।

🎯 Exam Tip: "योग्यताओं, पृष्ठभूमि और आवश्यकताओं" शब्दों को हैमरिन व एरिक्सन की परिभाषा के मुख्य बिंदु के रूप में याद रखें।

 

Question 4. “व्यावसायिक निर्देशन व्यक्तियों को व्यवसायों में समायोजित होने में सहायता प्रदान करता है।” यह कथन है:
(a) विलियम जोन्स का
(b) सुपर का
(c) हैडफील्ड का
(d) शेफर का
Answer: (b) सुपर का
In simple words: सुपर के अनुसार, व्यावसायिक निर्देशन लोगों को उनके काम या नौकरी में अच्छी तरह ढलने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: "व्यवसायों में समायोजित" शब्द सुपर की परिभाषा की पहचान है।

 

Question 5. निर्देशन का प्रमुख उद्देश्य है: [2009, 11, 13]
(a) छात्र का शारीरिक विकास
(b) छात्र का मानसिक विकास
(c) छात्र का सर्वांगीण विकास
(d) छात्र को संवेगात्मक विकास
Answer: (c) छात्र का सर्वांगीण विकास
In simple words: निर्देशन का मुख्य लक्ष्य छात्र का हर तरह से (शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आदि) विकास करना है।

🎯 Exam Tip: जब भी निर्देशन या शिक्षा के उद्देश्य की बात हो, "सर्वांगीण विकास" (all-round development) हमेशा सबसे सही उत्तर होता है।

 

Question 6. शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने में सहायक होता है।
(a) व्यक्तित्व परीक्षण
(b) बौद्धिक परीक्षण
(c) अभिरुचि परीक्षण
(d) None of the options
Answer: (b) बौद्धिक परीक्षण
In simple words: Intelligence tests help teachers understand a student's learning capacity, making it easier to guide them educationally.

🎯 Exam Tip: Remember that educational guidance (शैक्षिक निर्देशन) is directly linked to intellectual capacity, so intelligence tests (बौद्धिक परीक्षण) are the key tool here.

 

Question 7. बालकों को विद्यालय की सामान्य समस्याओं के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन कहलाता है। [2010, 12, 15]
(a) व्यक्तिगत निर्देशन
(b) शैक्षिक निर्देशन
(c) व्यावसायिक निर्देशन
(d) आवश्यक निर्देशन
Answer: (b) शैक्षिक निर्देशन
In simple words: Guidance given to students to solve their school-related problems is called educational guidance.

🎯 Exam Tip: Any guidance related to school, subjects, or classroom problems always falls under educational guidance (शैक्षिक निर्देशन).

 

Question 8. व्यावसायिक निर्देशन का प्रमुख उद्देश्य है। [2015]
(a) शारीरिक विकास
(b) मानसिक विकास
(c) सामाजिक विकास
(d) व्यावसायिक समस्याओं का समाधान
Answer: (d) व्यावसायिक समस्याओं का समाधान
In simple words: Vocational guidance helps people choose the right career and solve work-related challenges.

🎯 Exam Tip: Match the term "व्यावसायिक" (vocational/professional) in the question directly with "व्यावसायिक समस्याओं" in the correct option to save time.

 

Question 9. किसी व्यक्ति को किसी समस्या के समाधान के लिए किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दी गई सहायता को कहते हैं।
(a) समस्या समाधान
(b) साधारण सहायता
(c) निर्देशन
(d) अनावश्यक सहायता
Answer: (c) निर्देशन
In simple words: When someone guides or helps you solve a problem, that assistance is called guidance (निर्देशन).

🎯 Exam Tip: Guidance is defined as personal assistance given by one person to another to solve problems, so "निर्देशन" is the correct term.

 

Question 10. निर्देशन वह निजी सहायता है, जो जीवन के लक्ष्यों को विकसित करने में, समायोजन करने में और लक्ष्यों की प्राप्ति में उनके सामने आने वाली समस्याओं को सुलझाने में एक व्यक्ति द्वारा अन्य व्यक्ति को दी जाती है।” यह कथन किसका है।
(a) आर्थर जोन्स
(b) बी० मोरिस
(c) हसबैण्ड
(d) डॉ० भाटिया
Answer: (a) आर्थर जोन्स
In simple words: This famous definition of guidance as personal help for achieving life goals was given by Arthur Jones.

🎯 Exam Tip: Associate the keywords "निजी सहायता" (personal assistance) and "जीवन के लक्ष्यों" (life goals) with Arthur Jones to easily recall this definition.

 

Question 11. निर्देशन की मुख्य रूप से आवश्यकता होती है।
(a) बाल समस्याओं के समाधान के लिए
(b) शिक्षा एवं व्यवसाय की समस्याओं के लिए
(c) व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए
(d) All of the options
Answer: (d) All of the options
In simple words: Guidance is needed for everything—solving children's issues, choosing careers, and overall personality development.

🎯 Exam Tip: Since guidance is a comprehensive process, it covers education, career, and personal growth, making "All of the options" the correct choice.

 

Question 12. शैक्षिक निर्देशन के प्रमुख महत्त्व हैं। [2010, 12, 15]
(a) पाठ्य-विषयों के चयन में सहायक
(b) अनुशासन स्थापित करने में सहायक
(c) शैक्षिक वातावरण में समायोजित होने में सहायक
(d) All of the options
Answer: (d) All of the options
In simple words: Educational guidance helps students choose subjects, maintain discipline, and adapt to the school environment.

🎯 Exam Tip: Read all options carefully; if all listed points are positive benefits of educational guidance, the answer is always "All of the options".

Question 13. ...है?
(a) क्रो एवं क्रो
(b) जोन्स
(c) बी० मोरिस
(d) None of the options
Answer: (b) जोन्स
In simple words: Jones is the correct scholar associated with the definition or statement mentioned in this question.

🎯 Exam Tip: Memorize the definitions given by key educationists like Jones and Crow & Crow to score full marks in definition-based questions.

 

Question 14. व्यावसायिक विवरण के लिए दिए जाने वाले निर्देशन को कहते हैं:
(a) महत्त्वपूर्ण निर्देशन
(b) व्यावसायिक निर्देशन
(c) शैक्षिक निर्देशन
(d) आवश्यक निर्देशन
Answer: (b) व्यावसायिक निर्देशन
In simple words: Guidance that is provided to help someone understand and choose a career path is called vocational guidance.

🎯 Exam Tip: Look for keywords like 'व्यावसायिक' (vocational) in the question to easily identify 'व्यावसायिक निर्देशन' as the correct answer.

 

Question 15. व्यावसायिक निर्देशन से लाभ होते हैं:
(a) व्यक्ति की अपनी रुचि एवं योग्यता के अनुसार व्यवसाय मिल जाता है।
(b) औद्योगिक-व्यावसायिक संस्थानों को योग्य एवं कुशल कर्मचारी मिल जाते हैं।
(c) उत्पादन की दर में वृद्धि होती है
(d) All of the options
Answer: (d) All of the options
In simple words: Vocational guidance helps individuals get jobs they like, helps companies find skilled workers, and increases overall production.

🎯 Exam Tip: When all the given options describe positive benefits of a process, 'All of the options' is almost always the correct choice.

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