UP Board Solutions Class 12 Economics Chapter 7 Determination of Price and Output by Firm Under Imperfect Competition

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UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 7 Determination Of Price And Output By Firm Under Imperfect Competition (अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म द्वारा कीमत व उत्पादन का निर्धारण)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

 

Question 1. अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म अल्पकाल व दीर्घकाल में उत्पादन व कीमत का निर्धारण | किस प्रकार करती है ? सचित्र व्याख्या कीजिए ।
या
अपूर्ण बाजार में किसी फर्म की सामान्य लाभ, असामान्य लाभ तथा हानि की स्थिति में सन्तुलन को दर्शाने वाले चित्र बनाइए तथा व्याख्या कीजिए ।


Answer: अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत प्रत्येक उत्पादक अथवा विक्रेता का अपना अलग व स्वतन्त्र क्षेत्र होता है। अपने क्षेत्र में वह कुछ सीमा तक मनचाही कीमत प्राप्त कर सकता है। इसमें बाजार कई भागों में बँटा रहता है जिन पर विभिन्न विक्रेताओं का प्रभुत्व होता हैं। प्रत्येक विक्रेता का उद्देश्य एकाधिकारी की भाँति अधिकतम लाभ प्राप्त करना होता है।
अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म द्वारा कीमत व उत्पादन का निर्धारण अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत कीमत निर्धारण में माँग और पूर्ति की शक्तियों का समुचित ध्यान रखा जाता है। इनमें कीमत-निर्धारण उस बिन्दु पर होता है जहाँ पर सीमान्त लागत तथा सीमान्त आय दोनों ही बराबर होती हैं।
अपूर्ण प्रतियोगिता में प्रत्येक फर्म अपने लाभ को अधिकतम करने के लिए उत्पादन में तब तक परिवर्तन करती रहेगी जब तक MC = MR नहीं हो जाता। यदि सीमान्त आय सीमान्त लागत से अधिक है तो फर्म अपने उत्पादन को बढ़ाकर लाभ को अधिकतम करेगी और यदि सीमान्त आय सीमान्त लागत से कम है तो फर्म अपने उत्पादन को कम करके लाभ को अधिकतम करेगी। अतः फर्म का सन्तुलन बिन्दु वहाँ निश्चित होगा जहाँ सीमान्त आय और सीमान्त लागत बराबर होती हैं। इस बिन्दु पर फर्म का लाभ अधिकतम होता है और उसमें विस्तार व संकुचन की प्रवृत्ति नहीं होती है।
अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म की औसत आय व सीमान्त आय रेखाएँ एक माँग के रूप में बाएँ से दाएँ नीचे की ओर गिरती हुई होती हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि फर्म द्वारा एक रूप वस्तु का उत्पादन नहीं किया जाता। प्रत्येक फर्म यद्यपि एकाधिकारी नहीं होती, परन्तु एकाधिकारी प्रवृत्ति रखती है। प्रत्येक फर्म वस्तु की कीमत अपने ढंग से निर्धारित करती है। अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म उद्योग से कीमत ग्रहण नहीं करती है। अपूर्ण प्रतियोगिता में सीमान्त आय औसत आय से कम होती है। इसका मुख्य कारण यह है कि एक अतिरिक्त इकाई को बेचने के लिए फर्म को वस्तु की कीमत में थोड़ी-सी कमी करनी पड़ती है। इसलिए फर्म की औसत आय सीमान्त आय से अधिक होती है।
(i) अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत अल्पकाल में मूल्य व उत्पादन-निर्धारण – अल्पकाल में यह सम्भव हो सकता है कि फर्म अपने उत्पादन का समायोजन माँग के अनुसार न कर सके। इसलिए अल्पकाल में फर्म की कीमत-निर्धारण की स्थिति माँग के अनुरूप होती है। यदि वस्तु की माँग अधिक होती है और वस्तु का निकट-स्थानापन्न नहीं होता तो फर्म वस्तु की कीमत ऊँची निर्धारित करने की स्थिति में होगी। इसके विपरीत, यदि वस्तु की माँग कम होती है तो मुल्य निर्धारण नीची कीमत पर होगा। यदि माँग अत्यधिक कमजोर है तो कीमत और भी अधिक नीची निर्धारित होगी। इस प्रकार फर्म तीन स्थितियों में पायी जा सकती है (अ) असामान्य लाभ या लाभ अर्जित करने की स्थिति, (ब) शून्य लाभ या सामान्य लाभ प्राप्त करने की स्थिति तथा (स) हानि की स्थिति ।
उपर्युक्त तीनों स्थितियों की हम निम्नलिखित व्याख्या कर सकते हैं
(अ) असामान्य लाभ या लाभ अर्जित करने की स्थिति - यदि किसी फर्म द्वारा उत्पादित वस्तु की माँग बाजारों में अधिक है और उसकी स्थानापन्न वस्तुएँ नहीं हैं तो फर्म वस्तु की ऊंची कीमत निर्धारित करेगी। अल्पकाल में अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत फर्म असामान्य लाभ प्राप्त करने की स्थिति में होती है। ऐसी स्थिति में फर्म की औसत आय उसकी औसत लागत से अधिक होती है। कोई भी फर्म ऐसे बिन्दु पर सन्तुलन की स्थिति में होती हैं जहाँ पर सीमान्त लागते तथा सीमान्त आय बराबर होती हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र अपूर्ण प्रतियोगिता में असामान्य लाभ की स्थिति को दर्शाता है। इसमें OX-अक्ष पर उत्पादन की मात्रा (MR) और OY-अक्ष पर कीमत और लागत को दर्शाया गया है। फर्म E बिन्दु पर सन्तुलन में है जहाँ सीमान्त आय (MR) और सीमान्त लागत (MC) बराबर हैं, और फर्म असामान्य लाभ अर्जित कर रही है। उत्पादन OS और कीमत PO है।
(ब) शून्य या सामान्य लाभ प्राप्त करने की स्थिति – फर्म में सामान्य लाभ की स्थिति उस समय होती है जब वस्तु की माँग कम होती है तथा फर्म ऊंची कीमत निश्चित करने की स्थिति में नहीं होती। ऐसी स्थिति में फर्म की औसत आय (AR) उसकी औसत लागत (AC) के बराबर होती है, जिसके कारण फर्म न तो लाभ प्राप्त करती है और न हानि ही अर्थात् फर्म सन्तुलन की स्थिति औसत आय में होती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र अपूर्ण प्रतियोगिता में सामान्य लाभ या शून्य लाभ की स्थिति को दर्शाता है। इसमें OX-अक्ष पर उत्पादन की मात्रा और OY-अक्ष पर कीमत व लागत दिखाई गई है। फर्म E बिन्दु पर सन्तुलन में है, जहाँ सीमान्त आय (MR) और सीमान्त लागत (MC) बराबर हैं और औसत आय (AR) औसत लागत (AC) के बराबर है, जिससे फर्म केवल सामान्य लाभ कमा रही है।
(स) हानि की स्थिति – जब वस्तु की माँग इतनी अधिक कम हो लाभ की स्थिति कि फर्म को अपनी वस्तु को विवश होकर कम कीमत पर बेचना पड़े हैं। तब फर्म हानि की स्थिति में होती है। इस स्थिति में फर्म की औसत आय औसत लागत से कम होती है। इसलिए फर्म हानि उठाती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र अपूर्ण प्रतियोगिता में हानि की स्थिति को दर्शाता है। इसमें OX-अक्ष पर उत्पादन और OY-अक्ष पर कीमत व लागत दिखाई गई है। फर्म E बिन्दु पर सन्तुलन में है जहाँ सीमान्त आय (MR) और सीमान्त लागत (MC) बराबर हैं, लेकिन औसत लागत (AC) औसत आय (AR) से अधिक है, जिसके कारण फर्म को हानि हो रही है।
(ii) अपूर्ण प्रतियोगिता में दीर्घकाल में कीमत व उत्पादन-निर्धारण – दीर्घकाल में फर्म स्थिर सन्तुलन की स्थिति में होती है। अतः दीर्घकाल में फर्म केवल सामान्य लाभ अर्जित करती है। यदि दीर्घकाल में कुछ फर्मे अथवा उद्योग असामान्य लाभ अर्जित करते हैं तो ऊँचे लाभ से आकर्षित होकर अन्य फर्ने उद्योग में प्रवेश करने लगती हैं, जिसके कारण उस वस्तु के निकट-स्थानापन्न का उत्पादन प्रारम्भ हो जाता है। लाभ गिरकर सामान्य स्तर पर आ जाता है। प्रतियोगिता के कारण असामान्य लाभ समाप्त हो जाएगा और प्रत्येक फर्म केवल सामान्य लाभ ही अर्जित करेगी ।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र अपूर्ण प्रतियोगिता में दीर्घकाल में कीमत व उत्पादन-निर्धारण की सामान्य स्थिति को दर्शाता है। इसमें OX-अक्ष पर उत्पादन व बिक्री की मात्रा तथा OY-अक्ष पर कीमत व लागत दिखाई गई है। AR और MR क्रमशः औसत आय तथा सीमान्त आय वक्र हैं, जबकि AC और MC क्रमशः औसत लागत व सीमान्त लागत वक्र हैं। E फर्म का सन्तुलन बिन्दु है जहाँ सीमान्त आय (MR) और सीमान्त लागत (MC) बराबर हैं। सन्तुलन उत्पादन OS और कीमत ON है, जहाँ फर्म की औसत आय और सीमान्त लागत भी बराबर हैं, जिससे फर्म को केवल सामान्य लाभ प्राप्त हो रहा है।
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म अल्पकाल में असामान्य लाभ, सामान्य लाभ या हानि तीनों स्थितियों में हो सकती है, जबकि दीर्घकाल में केवल सामान्य लाभ अर्जित करती है, क्योंकि नए फर्मों का प्रवेश असामान्य लाभ को समाप्त कर देता है। कीमत और उत्पादन का निर्धारण MC=MR बिन्दु पर होता है।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में अल्पकाल और दीर्घकाल दोनों में फर्म के सन्तुलन का स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण है। विभिन्न लाभ-हानि स्थितियों को रेखाचित्रों के साथ समझाना उच्च अंक प्राप्त करने में सहायक होगा।

 

Question 2. अपूर्ण प्रतियोगिता को स्पष्ट कीजिए। इस प्रतियोगिता में अल्पकाल में मूल्य-निर्धारण कैसे होता है?
या
अपूर्ण प्रतियोगिता में अल्पकाल में फर्म के सन्तुलन की दशाओं का सचित्र वर्णन कीजिए।
या
अपूर्ण प्रतियोगिता में अल्पकाल में एक फर्म मूल्य तथा उत्पादन का निर्धारण किस प्रकार करती है?


Answer: (संकेत – अपूर्ण प्रतियोगिता के अर्थ एवं दशाओं के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 का आरम्भिक भाग देखें।)
अपूर्ण प्रतियोगिता में कीमत या मूल्य-निर्धारण अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत प्रत्येक उत्पादक अथवा विक्रेता का अपना अलग एवं स्वतन्त्र क्षेत्र होता है और वह अपने क्षेत्र में कुछ सीमा तक मनमानी कीमत वसूल कर सकता है। अपूर्ण प्रतियोगिता में प्रत्येक विक्रेता का उद्देश्य एकाधिकारी की भाँति ही अधिकतम लाभ प्राप्त करना होता है; अतः वस्तु की कीमत का निर्धारण ठीक उसी प्रकार होता है जिस प्रकार एकाधिकार की अवस्था में । अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत कीमत का निर्धारण उस बिन्दु पर होता है जिस पर उत्पादन-इकाई की सीमान्त लागत तथा सीमान्त आय दोनों ही बराबर होती हैं। अपने लाभ को अधिकतम करने के लिए प्रत्येक उत्पादक उत्पादन को तब तक बढ़ाता रहता है जब तक कि उसकी सीमान्त आय सीमान्त लागत से अधिक रहती है, जब ये दोनों बराबर हो जाती हैं तो उसके बाद वह उत्पादन नहीं बढ़ाता । अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत विक्रेता कीमत का निर्धारण करते समय माँग और पूर्ति की शक्तियों का समुचित ध्यान रखता है; अतः अपूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में कीमत का निर्धारण माँग और पूर्ति दोनों की पारस्परिक क्रियाओं द्वारा होता है।
अपूर्ण प्रतियोगिता में उत्पादक का पूर्ति पर तो पूर्ण नियन्त्रण होता है, किन्तु माँग पर कोई प्रत्यक्ष नियन्त्रण नहीं होता; अतः अपूर्ण प्रतियोगिता में विक्रेता माँग की मूल्य सापेक्षता को ध्यान में रखकर कीमत का निर्धारण करता है। यदि वस्तु की मॉग मूल्ये सापेक्ष है तो विक्रेता उसकी कम कीमत निश्चित करेगा, क्योंकि मूल्य सापेक्ष वस्तुओं की कीमत में थोड़ी-सी भी कमी हो जाने पर उनकी माँग बहुत अधिक बढ़ जाती है; अतः कीमत कम निर्धारित होने के कारण यद्यपि प्रति इकाई लाभ तो कम हो जाता है, परन्तु माँग के बढ़ जाने के कारण कुल लाभ की मात्रा अधिक हो जाती है। इसके विपरीत, यदि वस्तु की माँग निरपेक्ष है तो कीमत में बहुत कमी होने पर भी उसकी माँग में विशेष वृद्धि नहीं होती और कीमत में वृद्धि होने पर माँग में कोई विशेष कमी नहीं होती।
अतः ऐसी वस्तुओं की कीमतें ऊँची ही निश्चित की जाती हैं, क्योंकि कीमतें चाहे कुछ भी हों, लोग उन्हें अवश्य खरीदेंगे । पूर्ति पक्ष के सम्बन्ध में यह विचार करना पड़ता है कि वस्तु के उत्पादन में प्रतिफल का कौन-सा नियम लागू हो रहा है ? यदि वस्तु का उत्पादन वृद्धिमान प्रतिफल नियम के अन्तर्गत हो रहा है तब वस्तु की कम कीमत निश्चित की जाएगी, इसके विपरीत, यदि उत्पादन ह्रासमान प्रतिफल नियम के अन्तर्गत हो रहा है तब वह वस्तु की कीमत जितनी अधिक वसूल कर सकता है, करेगा। आनुपातिक प्रतिफल नियम के अन्तर्गत उत्पादित वस्तु की कीमत उसकी माँग के अनुसार निर्धारित की जाएगी अर्थात् माँग के बढ़ने पर कीमत अधिक तथा माँग के घटने पर कम होगी। । संक्षेप में हम कह सकते हैं कि विक्रेता अपनी वस्तु की कीमत को निश्चित करते समय प्रत्येक कीमत पर अपने कुल लाभ का अनुमान लगाता है और वही कीमत निश्चित करता है जिस पर कि उसे अधिकतम कुल निवल लाभ अथवा आय प्राप्त होती हैं।
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता में मूल्य निर्धारण माँग और पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है, लेकिन विक्रेता अपनी मनचाही कीमत वसूल कर सकता है। फर्म अधिकतम लाभ के लिए उत्पादन करती है और अल्पकाल में उसकी स्थिति माँग की सापेक्षता पर निर्भर करती है।

🎯 Exam Tip: अपूर्ण प्रतियोगिता की अवधारणा और अल्पकाल में मूल्य-निर्धारण की व्याख्या करते समय माँग की लोच के प्रभाव को दर्शाना विश्लेषण को गहरा बनाता है।

 

Question 3. पूर्ण एवं अपूर्ण प्रतियोगिता में अन्तर (भेद) कीजिए। इनमें से कौन व्यावहारिक है ?
या
पूर्ण एवं अपूर्ण प्रतियोगी बाजार की विशेषताओं की तुलना कीजिए।


Answer: पूर्ण प्रतियोगिता तथा अपूर्ण प्रतियोगिता में अन्तर (भेद)

क०स०पूर्ण प्रतियोगिताअपूर्ण प्रतियोगिता
1.पूर्ण प्रतियोगिता में क्रेताओं व विक्रेताओं की संख्या अधिक होती है।अपूर्ण प्रतियोगिता में क्रेताओं और विक्रेताओं की संख्या पूर्ण प्रतियोगिता की अपेक्षा कम होती हैं। इसमें एकाधिकारी प्रतियोगिता, 'अल्पाधिकार' तथा 'द्वयाधिकारी की स्थितियाँ सम्मिलित होती हैं।
2.पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म के द्वारा उत्पादित तथा बेची जाने वाली वस्तुओं में एकरूपता होती है।अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत वस्तु-विभेद पाया जाता है। प्रत्येक फर्म बाजार में अपनी वस्तु की अलग पहचान बनाने का प्रयास करती है।
3.पूर्ण प्रतियोगिता में फर्मों का स्वतन्त्र प्रवेश व बहिर्गमन होता है।अपूर्ण प्रतियोगिता में भी फमों का स्वतन्त्र प्रवेश व बहिर्गमन होता है।
4.पूर्ण प्रतियोगिताओं में क्रेताओं और विक्रेताओं को बाजार का पूर्ण ज्ञान होता है तथा उनमे परम्पर सम्पर्क होता है।अपूर्ण प्रतियोगिता में क्रेताओं और विक्रेताओं का सम्पूर्ण ज्ञान नहीं होता है।
5.पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में वस्तु की कीमत का निर्धारण उद्योग द्वारा माँग और पूर्ति की शक्तियों के सन्तुलन से होता है। इस कीमत को उद्योग में कार्य कर रही फमें दिया हुआ मान लेती हैं।अपूर्ण प्रतियोगिता में विक्रेता कीमत निर्धारित करते समय माँग व पूर्ति की शक्तियों का ध्यान रखता है, परन्तु प्रत्येक फर्म या विक्रेता का अपना अलग स्वतन्त्र क्षेत्र होता है।
6.पूर्ण प्रतियोगिता में औसत आय तथा सीमान्त आय बराबर होती हैं। औसत आय तथा सीमान्त आय वक्र एक सीधी पड़ी रेखा होती है।अपूर्ण प्रतियोगिता में औसत आय सीमान्त आय से अधिक होती है। औसत आय वक्र तथा सीमान्त आय वक्र बाएँ से दाएँ नीचे को गिरता हुआ होता है।
7.पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म अल्पकाल में लाभ, सामान्य लाभ व हानि अर्जित करती है तथा दीर्घकाल में फर्म को मात्र सामान्य लाभ ही प्राप्त होता है।अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म अल्पकाल में लाभ, सामान्य लाभ व हानि की स्थिति में हो सकती है। तथा दीर्घकाल में फर्म को केवल सामान्य लाभ ही अर्जित हो पाता है।
8.पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म विज्ञापन व प्रचार आदि में प्रायः बिक्री लागते वहन नहीं करती है।अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म वस्तु की बिक्री बढ़ाने के लिए विज्ञापन व प्रचार व्यय करती है।
9.पूर्ण प्रतियोगिता एक काल्पनिक दशा है। वास्तविक जीवन में यह नहीं पायी जाती है। अतः पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति केवल सैद्धान्तिक है।अपूर्ण प्रतियोगिता व्यावहारिक जीवन में पायी जाती है। अतः यह सैद्धान्तिक न होकर व्यावहारिक है।

In simple words: पूर्ण प्रतियोगिता एक आदर्श लेकिन काल्पनिक बाजार स्थिति है जहाँ असंख्य खरीदार और विक्रेता समरूप उत्पाद बेचते हैं, जबकि अपूर्ण प्रतियोगिता एक अधिक वास्तविक स्थिति है जहाँ फर्मों के पास कुछ बाजार शक्ति होती है, उत्पाद अलग-अलग होते हैं, और विज्ञापन महत्वपूर्ण होता है।

🎯 Exam Tip: तुलनात्मक प्रश्नों में हमेशा एक तालिका का उपयोग करें। मुख्य बिन्दुओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें और प्रत्येक बाजार संरचना के व्यावहारिक निहितार्थों पर प्रकाश डालें।

 

Question 4. अपर्ण प्रतिस्पर्धा में औसत वक्र तथा सीमान्त आय वक्र का रूप कैसा होता है ? इस प्रतिस्पर्धा में सन्तुलन बिन्दु कैसे निर्धारित किया जाता है ?


Answer: अपूर्ण प्रतिस्पर्धा में औसत आय वक्र तथा सीमान्त आय वक्र का रूप – अपूर्ण प्रतिस्पर्धा बाजार में औसत आय और सीमान्त आय रेखाएँ अलग-अलग होती हैं तथा बाएँ से दाएँ नीचे की ओर गिरती हुई होती हैं। अतः स्पष्ट है कि फर्म का उत्पादन बढ़ने पर 14 औसत आय (AR) और सीमान्त आय (MR) दोनों ही गिरती हैं, किन्तु सीमान्त आय औसत आय की अपेक्षा तेजी से गिरती है। इसका कारण यह होता है कि विक्रेताओं की संख्या पूर्ण प्रतियोगिता की तुलना में अपेक्षाकृत कम होने से विक्रेता कीमत को प्रभावित कर सकने की स्थिति में होता है अर्थात् वे कीमत में कमी करके वस्तु की बिक्री को बढ़ा सकते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र अपूर्ण प्रतियोगिता में औसत आय (AR) और सीमान्त आय (MR) वक्रों को दर्शाता है। इसमें OX-अक्ष पर बिक्री की इकाइयाँ तथा OY-अक्ष पर आय (Rs. में) दिखाई गई है। AR वक्र और MR वक्र दोनों नीचे की ओर गिरते हुए होते हैं, और MR वक्र AR वक्र के नीचे स्थित होता है, जो यह दर्शाता है कि अतिरिक्त इकाई बेचने के लिए कीमत कम करनी पड़ती है।
अपूर्ण प्रतिस्पर्धा में सन्तुलन बिन्दु का निर्धारण – अपूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में आय वक्र अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत कीमत-निर्धारण में माँग और पूर्ति की शक्तियों का समुचित ध्यान रखा जाता है। इनमें कीमत-निर्धारण उस बिन्दु पर होता है जहाँ पर सीमान्त लागत तथा सीमान्त आय दोनों ही बराबर होती हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म द्वारा असामान्य लाभ की स्थिति में सन्तुलन को दर्शाता है। इसमें OX-अक्ष पर उत्पादन की मात्रा तथा OY-अक्ष पर कीमत और लागत प्रदर्शित है। सन्तुलन E बिन्दु पर होता है जहाँ सीमान्त लागत (MC) और सीमान्त आय (MR) बराबर होते हैं, और फर्म असामान्य लाभ अर्जित कर रही होती है।
अपूर्ण प्रतियोगिता में प्रत्येक फर्म अपने लाभ को अधिकतम करने के लिए उत्पादन में जब तक परिवर्तन करती रहेगी तब तक MR = MC अर्थात् सीमान्त आय = सीमान्त लागत नहीं हो जाता। यदि सीमान्त आय, सीमान्त लागत से अधिक है तो फर्म अपने उत्पादन को बढ़ाकर लाभ को अधिकतम करेगी और यदि सीमान्त आय, सीमान्त लागत से उत्पादन की मात्रा कम है तो फर्म अपने उत्पादन को कम करके लाभ को फर्म द्वारा असामान्य लाभ की स्थिति अधिकतम करेगी। अतः फर्म को सन्तुलन बिन्दु वहाँ निश्चित होगा जहाँ सीमान्त आय और सीमान्त लागत बराबर होती हैं। इस बिन्दु पर फर्म का लाभ अधिकतम होता है और उससे विस्तार व संकुचन की प्रवृत्ति नहीं होती है।
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता में औसत और सीमान्त आय वक्र नीचे की ओर गिरते हुए होते हैं, जिसमें सीमान्त आय वक्र औसत आय वक्र से नीचे रहता है। सन्तुलन उस बिन्दु पर होता है जहाँ सीमान्त आय (MR) सीमान्त लागत (MC) के बराबर होती है, जिससे फर्म अपना अधिकतम लाभ अर्जित करती है।

🎯 Exam Tip: AR और MR वक्रों के आकार को समझाना और MC=MR सन्तुलन शर्त को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित करें कि आप इन वक्रों के रिश्ते को सही ढंग से बताएँ।

 

Question 5. अपूर्ण प्रतियोगिता में एक फर्म के दीर्घकालीन साम्य को समझाइए ।


Answer: दीर्घकाल में अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत फर्म को केवल सामान्य लाभ ही प्राप्त होता है। इसके विपरीत पूर्ण प्रतियोगिता में लाभ अथवा हानि की स्थिति भी हो सकती है। यही कारण है कि दीर्घकाल में सामान्य लाभ प्राप्त करने की स्थिति पूर्ण प्रतियोगिता की अपेक्षा अपूर्ण प्रतियोगिता में पहले आती है।
संलग्न चित्र में,
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म के दीर्घकालीन सन्तुलन को दर्शाता है। इसमें OX-अक्ष पर उत्पादन की मात्रा और OY-अक्ष पर कीमत व लागत प्रदर्शित है। E सन्तुलन बिन्दु है जहाँ दीर्घकालीन सीमान्त लागत (LMC) और सीमान्त आय (MR) बराबर हैं। इस स्थिति में औसत आय (AR) भी औसत लागत (LAC) के बराबर होती है, जिससे फर्म केवल सामान्य लाभ अर्जित करती है।
E = सन्तुलन बिन्दु LM = औसत आय LM = औसत लागत (... औसत लाभ = औसत आय) अतः लाभ की मात्रा शून्य (सामान्य लाभ) है।
In simple words: दीर्घकाल में अपूर्ण प्रतियोगी फर्म केवल सामान्य लाभ कमाती है क्योंकि नए फर्मों के प्रवेश और मौजूदा फर्मों के बहिर्गमन के कारण बाजार में समायोजन होता है, जिससे असामान्य लाभ या हानि समाप्त हो जाती है।

🎯 Exam Tip: दीर्घकाल में सामान्य लाभ की स्थिति को AR = AC और MR = MC शर्तों के साथ स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है। यह दीर्घकालीन सन्तुलन की मुख्य विशेषता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

 

Question 1. अपूर्ण प्रतियोगिता से आप क्या समझते हैं ? अपूर्ण प्रतियोगिता की विशेषताओं की विवेचना कीजिए ।
या
अपूर्ण प्रतियोगी बाजार को परिभाषित कीजिए।
या
अपूर्ण प्रतियोगिता की मुख्य विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।


Answer: अपूर्ण प्रतियोगिता का अर्थ वास्तविक जीवन में न तो पूर्ण प्रतियोगिता की दशाएँ पायी जाती हैं और न एकाधिकार की । प्रायः इन दोनों के बीच की अवस्थाएँ मिलती हैं, जिसे अपूर्ण प्रतियोगिता कहते हैं। अपूर्ण प्रतियोगिता से अभिप्राय पूर्ण प्रतियोगिता तथा एकाधिकार के बीच की किसी अवस्था से होता है। अपूर्ण प्रतियोगिता का स्वरूप अंशतः प्रतियोगिता तथा अंशतः एकाधिकारी होता है।
फेयर चाइल्ड के शब्दों में, “यदि बाजार उचित प्रकार से संगठित नहीं होता, यदि क्रेता और विक्रेता एक-दूसरे के सम्पर्क में आने में कठिनाई का अनुभव करते हैं और वे दूसरे के द्वारा क्रय की गयी वस्तुओं और उनके द्वारा दिये गये मूल्यों की तुलना करने में असमर्थ रहते हैं तो ऐसी स्थिति को अपूर्ण प्रतियोगिता कहते हैं।
जे० के० मेहता के शब्दों में, “यह बात भली-भाँति स्पष्ट हो गयी है कि विनिमय की प्रत्येक स्थिति वह स्थिति है जिसको आंशिक एकाधिकार की स्थिति कहते हैं और यदि आंशिक एकाधिकार को दूसरी ओर से देखा जाए तो यह अपूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति है। प्रत्येक स्थिति में प्रतियोगिता तत्त्व तथा एकाधिकार तत्त्व दोनों का मिश्रण है।”
अपूर्ण प्रतियोगिता की विशेषताएँ
(i) अपूर्ण प्रतियोगिता में क्रेताओं, विक्रेताओं एवं फर्मों की संख्या पूर्ण प्रतियोगिता की अपेक्षा कम होती है।
(ii) अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत प्रतियोगिता तो होती है, किन्तु वह इतनी अपूर्ण तथा दुर्बल होती है कि माँग और पूर्ति की शक्तियों को कार्य करने का पूर्ण अवसर नहीं मिलता।
(iii) क्रेताओं और विक्रेताओं को बाजार की स्थिति का पूर्ण ज्ञान नहीं होता है। परिणामस्वरूप बाजार में कीमतें भिन्न-भिन्न होती हैं।
(iv) प्रत्येक विक्रेता को कुछ सीमा तक अपनी वस्तु की मनचाही कीमत वसूल करने की स्वतन्त्रता रहती है।
(v) अपूर्ण प्रतियोगिता में वस्तु-विभेद होता है। प्रत्येक फर्म अपनी वस्तु की बाजार माँग में अलग पहचान बनाने का प्रयत्न करती है।
(vi) अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्मों को बाजार में प्रवेश करने व छोड़ने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है। अर्थात् बाजार में फर्मों का स्वतन्त्र प्रवेश व बहिर्गमन होता है।
(vii) फर्म के माँग वक्र या औसत आगम वक्र (AR) का ढाल ऋणात्मक होता है और फर्म का सीमान्त आगम वक्र (MR) इसके औसत आगम वक्र से नीचा होता है।
(viii) दीर्घकाल में वस्तु का मूल्य सीमान्त आगम (MR) तथा ओसत आगम (AR) के बराबर होता है।
(ix) अपूर्ण प्रतियोगिता में वस्तु की बिक्री बढ़ाने हेतु विज्ञापन में प्रचार आदि का आश्रय लिया जाता है।
(x) व्यावहारिक जीवन में बाजार में अपूर्ण प्रतियोगिता की ही स्थिति पायी जाती है।
(xi) अपूर्ण प्रतियोगिता में वस्तु का बाजार संगठित नहीं होता।
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता एक बाजार संरचना है जो पूर्ण प्रतियोगिता और एकाधिकार के बीच स्थित होती है, जहाँ विक्रेताओं की संख्या सीमित होती है, उत्पादों में विभेद होता है, और फर्मों के पास कीमत पर कुछ नियंत्रण होता है। इसकी मुख्य विशेषताओं में वस्तु विभेद, सीमित प्रतिस्पर्धा और विज्ञापन का उपयोग शामिल है।

🎯 Exam Tip: अपूर्ण प्रतियोगिता की परिभाषा के साथ उसकी विशेषताओं को क्रमबद्ध तरीके से लिखना और प्रत्येक विशेषता का संक्षिप्त विवरण देना पूरे अंक दिलाएगा।

 

Question 2. अपूर्ण प्रतियोगिता क्या है ? इसके अन्तर्गत मूल्य-निर्धारण कैसे होता है ? या अपूर्ण प्रतियोगिता क्या है? इसकी दशाओं का वर्णन कीजिए तथा इसके अन्तर्गत कीमत-निर्धारण को समझाइए ।


Answer: (संकेत – अपूर्ण प्रतियोगिता के अर्थ एवं दशाओं के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 का आरम्भिक भाग देखें।)
अपूर्ण प्रतियोगिता में कीमत या मूल्य-निर्धारण अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत प्रत्येक उत्पादक अथवा विक्रेता का अपना अलग एवं स्वतन्त्र क्षेत्र होता है और वह अपने क्षेत्र में कुछ सीमा तक मनमानी कीमत वसूल कर सकता है। अपूर्ण प्रतियोगिता में प्रत्येक विक्रेता का उद्देश्य एकाधिकारी की भाँति ही अधिकतम लाभ प्राप्त करना होता है; अतः वस्तु की कीमत का निर्धारण ठीक उसी प्रकार होता है जिस प्रकार एकाधिकार की अवस्था में । अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत कीमत का निर्धारण उस बिन्दु पर होता है जिस पर उत्पादन-इकाई की सीमान्त लागत तथा सीमान्त आय दोनों ही बराबर होती हैं। अपने लाभ को अधिकतम करने के लिए प्रत्येक उत्पादक उत्पादन को तब तक बढ़ाता रहता है जब तक कि उसकी सीमान्त आय सीमान्त लागत से अधिक रहती है, जब ये दोनों बराबर हो जाती हैं तो उसके बाद वह उत्पादन नहीं बढ़ाता । अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत विक्रेता कीमत का निर्धारण करते समय माँग और पूर्ति की शक्तियों का समुचित ध्यान रखता है; अतः अपूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में कीमत का निर्धारण माँग और पूर्ति दोनों की पारस्परिक क्रियाओं द्वारा होता है।
अपूर्ण प्रतियोगिता में उत्पादक का पूर्ति पर तो पूर्ण नियन्त्रण होता है, किन्तु माँग पर कोई प्रत्यक्ष नियन्त्रण नहीं होता; अतः अपूर्ण प्रतियोगिता में विक्रेता माँग की मूल्य सापेक्षता को ध्यान में रखकर कीमत का निर्धारण करता है। यदि वस्तु की मॉग मूल्ये सापेक्ष है तो विक्रेता उसकी कम कीमत निश्चित करेगा, क्योंकि मूल्य सापेक्ष वस्तुओं की कीमत में थोड़ी-सी भी कमी हो जाने पर उनकी माँग बहुत अधिक बढ़ जाती है; अतः कीमत कम निर्धारित होने के कारण यद्यपि प्रति इकाई लाभ तो कम हो जाता है, परन्तु माँग के बढ़ जाने के कारण कुल लाभ की मात्रा अधिक हो जाती है। इसके विपरीत, यदि वस्तु की माँग निरपेक्ष है तो कीमत में बहुत कमी होने पर भी उसकी माँग में विशेष वृद्धि नहीं होती और कीमत में वृद्धि होने पर माँग में कोई विशेष कमी नहीं होती।
अतः ऐसी वस्तुओं की कीमतें ऊँची ही निश्चित की जाती हैं, क्योंकि कीमतें चाहे कुछ भी हों, लोग उन्हें अवश्य खरीदेंगे । पूर्ति पक्ष के सम्बन्ध में यह विचार करना पड़ता है कि वस्तु के उत्पादन में प्रतिफल का कौन-सा नियम लागू हो रहा है ? यदि वस्तु का उत्पादन वृद्धिमान प्रतिफल नियम के अन्तर्गत हो रहा है तब वस्तु की कम कीमत निश्चित की जाएगी, इसके विपरीत, यदि उत्पादन ह्रासमान प्रतिफल नियम के अन्तर्गत हो रहा है तब वह वस्तु की कीमत जितनी अधिक वसूल कर सकता है, करेगा। आनुपातिक प्रतिफल नियम के अन्तर्गत उत्पादित वस्तु की कीमत उसकी माँग के अनुसार निर्धारित की जाएगी अर्थात् माँग के बढ़ने पर कीमत अधिक तथा माँग के घटने पर कम होगी। । संक्षेप में हम कह सकते हैं कि विक्रेता अपनी वस्तु की कीमत को निश्चित करते समय प्रत्येक कीमत पर अपने कुल लाभ का अनुमान लगाता है और वही कीमत निश्चित करता है जिस पर कि उसे अधिकतम कुल निवल लाभ अथवा आय प्राप्त होती हैं।
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता एक बाजार है जहाँ फर्मों के पास कीमत पर कुछ नियंत्रण होता है, और वे अपने उत्पादों को विभेदित करती हैं। मूल्य निर्धारण तब होता है जब फर्म का सीमान्त आय (MR) सीमान्त लागत (MC) के बराबर हो जाती है, साथ ही माँग की लोच और उत्पादन के नियमों का भी ध्यान रखा जाता है।

🎯 Exam Tip: अपूर्ण प्रतियोगिता की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए, मूल्य निर्धारण के लिए MC=MR शर्त और माँग की लोच की भूमिका को समझाना महत्वपूर्ण है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

 

Question 1. अपूर्ण प्रतियोगिता में सीमान्त आय का औसत आय से कम होने का क्या कारण है?


Answer: अपूर्ण प्रतियोगिता में सीमान्त आय का औसत आय से कम होने का मुख्य कारण यह है कि एक अतिरिक्त इकाई को बेचने के लिए फर्म को वस्तु की कीमत में थोड़ी-सी कमी करनी पड़ती है। इसलिए फर्म की औसत आय सीमान्त आय से अधिक होती है।
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता में, सीमान्त आय औसत आय से कम होती है क्योंकि एक अतिरिक्त इकाई बेचने के लिए फर्म को कीमत कम करनी पड़ती है, जिससे सभी इकाइयों पर प्राप्त आय प्रभावित होती है।

🎯 Exam Tip: इस अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए माँग वक्र के ढलान और उसके परिणामस्वरूप AR वक्र व MR वक्र के बीच के संबंध को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म को कब हानि उठानी पड़ती है ?


Answer: जब वस्तु की माँग इस सीमा तक कम हो जाती है कि फर्म को अपनी वस्तु को विवश होकर लागत से कम कीमत पर बेचना पड़े, तब फर्म हानि की स्थिति में होती है अर्थात् इस स्थिति में फर्म की औसत आय उसकी औसत लागत से कम होती है। इसलिए फर्म को हानि उठानी पड़ती है।
In simple words: फर्म को हानि तब होती है जब उसकी औसत आय (AR) औसत लागत (AC) से कम हो जाती है, यानी, जब प्रति इकाई कीमत प्रति इकाई उत्पादन लागत से कम होती है।

🎯 Exam Tip: हानि की स्थिति को AR < AC की शर्त के साथ याद रखना चाहिए। यह अल्पकाल में संभव है।

 

Question 3. अपूर्ण प्रतियोगिता की चार विशेषताएँ बताइए ।
या
अपूर्ण प्रतियोगिता की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।


Answer:
(i) विक्रेताओं की अपेक्षाकृत कम संख्या,
(ii) वस्तु-विभेद पाया जाना,
(iii) बाजार का अपूर्ण ज्ञान,
(iv) पूर्ण गतिशील न होना ।
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता की मुख्य विशेषताओं में विक्रेताओं की सीमित संख्या, उत्पादों में भिन्नता (वस्तु-विभेद), बाजार के बारे में क्रेताओं और विक्रेताओं को अपूर्ण जानकारी, और संसाधनों की गतिशीलता की कमी शामिल है।

🎯 Exam Tip: विशेषताओं को सूचीबद्ध करते समय, मुख्य बिन्दुओं को संक्षिप्त और स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें। वस्तु-विभेद और सीमित प्रतिस्पर्धा प्रमुख विशेषताएँ हैं।

 

Question 4. अपूर्ण प्रतियोगिता की दशा में उत्पादक कब असामान्य लाभ प्राप्त करता है ?


Answer: अपूर्ण प्रतियोगिता में उत्पादक केवल उस दशा में असामान्य लाभ प्राप्त करने की स्थिति में होता है जब उसकी औसत आय उसकी औसत लागत से अधिक हो ।
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता में उत्पादक तब असामान्य लाभ अर्जित करता है जब उसकी औसत आय (AR) उसकी औसत लागत (AC) से अधिक होती है।

🎯 Exam Tip: असामान्य लाभ की शर्त AR > AC है। यह स्थिति अल्पकाल में आम है, लेकिन दीर्घकाल में नए फर्मों के प्रवेश के कारण यह समाप्त हो जाती है।

 

Question 5. अपूर्ण प्रतियोगिता में दीर्घकाल में वस्तु का मूल्य किस स्थिति में निर्धारित होता है ?


Answer: अपूर्ण प्रतियोगिता में दीर्घकाल में वस्तु का मूल्य सीमान्त आय व सीमान्त लागत की सन्तुलन की स्थिति में निर्धारित होता है। यहाँ फर्म केवल सामान्य लाभ अर्थात् शून्य लाभ की स्थिति में होती है।
In simple words: दीर्घकाल में अपूर्ण प्रतियोगिता में वस्तु का मूल्य MC=MR की सन्तुलन स्थिति पर निर्धारित होता है, और फर्म केवल सामान्य लाभ अर्जित करती है, क्योंकि नए फर्मों के प्रवेश से असामान्य लाभ समाप्त हो जाते हैं।

🎯 Exam Tip: दीर्घकालीन सन्तुलन में, MC=MR के साथ-साथ AR=AC की शर्त भी पूरी होती है, जो सामान्य लाभ को दर्शाती है।

 

Question 6. अधिकतम बिक्री करने के लिए उत्पादक को क्या करना पड़ता है ?


Answer: उत्पादक को वस्तुओं की अधिकतम बिक्री करने के लिए विज्ञापन व प्रचार आदि पर व्यय करना पड़ता है।
In simple words: अधिकतम बिक्री प्राप्त करने के लिए उत्पादक को अपने उत्पादों का विज्ञापन और प्रचार करना पड़ता है, क्योंकि अपूर्ण प्रतियोगिता में वस्तु-विभेद और प्रतिस्पर्धा होती है।

🎯 Exam Tip: अपूर्ण प्रतियोगिता में गैर-कीमत प्रतिस्पर्धा, जैसे विज्ञापन, बिक्री बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण तरीका है, जबकि पूर्ण प्रतियोगिता में इसकी आवश्यकता नहीं होती।

 

Question 7. अपूर्ण प्रतियोगिता का स्वरूप कैसा होता है ?


Answer: अपूर्ण प्रतियोगिता का स्वरूप अंशतः पूर्ण प्रतियोगिता तथा अंशतः एकाधिकारी होता है।
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता का स्वरूप आंशिक रूप से पूर्ण प्रतिस्पर्धी और आंशिक रूप से एकाधिकारवादी होता है, जिसमें दोनों बाजार संरचनाओं की कुछ विशेषताएँ मौजूद होती हैं।

🎯 Exam Tip: यह समझना महत्वपूर्ण है कि अपूर्ण प्रतियोगिता एक स्पेक्ट्रम है जिसमें विभिन्न बाजार संरचनाएँ (जैसे एकाधिकारवादी प्रतियोगिता और अल्पाधिकार) शामिल हैं।

 

Question 8. अपूर्ण प्रतियोगिता बाजार में औसत ओगम वक्र का ढाल किस प्रकार का होता है?


Answer: अपूर्ण प्रतियोगिता की दशा में औसत आगम वक्र बाएँ से दाएँ नीचे की ओर गिरता हुआ होता है।
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता में औसत आगम वक्र (AR) बाएँ से दाएँ नीचे की ओर ढलान वाला होता है, यह दर्शाता है कि अधिक इकाइयाँ बेचने के लिए फर्म को कीमत कम करनी पड़ती है।

🎯 Exam Tip: यह ढलान अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म की कीमत निर्धारण शक्ति और माँग वक्र की लोच को दर्शाता है, जो पूर्ण प्रतियोगिता के क्षैतिज AR वक्र से भिन्न होता है।

 

Question 9. अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत कीमत-निर्धारण किस प्रकार होता है ?


Answer: अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत कीमत-निर्धारण में माँग एवं पूर्ति की शक्तियों का समुचित ध्यान रखा जाता है। इस प्रकार कीमत-निर्धारण उस बिन्दु पर होता है जहाँ पर सीमान्त लागत तथा सीमान्त आय दोनों ही बराबर हों ।
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता में कीमत निर्धारण माँग और पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है, लेकिन मुख्य सन्तुलन बिंदु वह होता है जहाँ सीमान्त आय (MR) सीमान्त लागत (MC) के बराबर होती है।

🎯 Exam Tip: कीमत निर्धारण में MR=MC की शर्त प्राथमिक है, लेकिन फर्म अपनी उत्पाद की मांग को भी ध्यान में रखती है।

 

Question 10. अपूर्ण प्रतियोगिता में सीमान्त आगम रेखा का ढाल कैसा होता है ?


Answer: अपूर्ण प्रतियोगिता में सीमान्त आगम रेखा का ढाल बाएँ से दाएँ नीचे की ओर होता है।
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता में सीमान्त आगम रेखा (MR) भी बाएँ से दाएँ नीचे की ओर ढलान वाली होती है और औसत आगम रेखा से तेज़ी से गिरती है।

🎯 Exam Tip: MR वक्र का नीचे की ओर ढलान इस तथ्य का परिणाम है कि फर्म को अधिक बिक्री के लिए कीमत कम करनी पड़ती है, जिससे प्रत्येक अतिरिक्त इकाई की बिक्री पर होने वाली आय कम होती जाती है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

 

Question 1. अपूर्ण प्रतियोगिता है
(a) काल्पनिक
(b) व्यावहारिक
(c) काल्पनिक-व्यावहारिक
(d) इनमें से कोई नहीं
Answer: (b) व्यावहारिक
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता वास्तविक दुनिया के बाजारों में पाई जाने वाली एक प्रचलित बाजार संरचना है, न कि केवल एक सैद्धांतिक अवधारणा।

🎯 Exam Tip: यह प्रश्न बाजार संरचनाओं के व्यावहारिक अनुप्रयोग पर केंद्रित है। अपूर्ण प्रतियोगिता, एकाधिकारवादी प्रतियोगिता और अल्पाधिकार सभी वास्तविक जीवन में देखे जाते हैं।

 

Question 2. अपूर्ण प्रतियोगिता में औसत और सीमान्त आगम के वक्र गिरते हुए होते हैं
(a) नीचे की ओर
(b) ऊपर की ओर
(c) बीच में
(d) इनमें से कोई नहीं
Answer: (a) नीचे की ओर
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता में, फर्म की कीमत निर्धारण शक्ति के कारण औसत और सीमान्त आगम दोनों वक्र नीचे की ओर ढलान वाले होते हैं, यह दर्शाता है कि अधिक उत्पाद बेचने के लिए कीमत कम करनी पड़ती है।

🎯 Exam Tip: इस अवधारणा को रेखाचित्रों के माध्यम से समझना महत्वपूर्ण है, जहाँ AR और MR वक्रों का नकारात्मक ढलान अपूर्ण प्रतियोगिता की एक विशिष्ट विशेषता है।

 

Question 3. अपूर्ण प्रतियोगिता की दशा में दीर्घकाल में विक्रेता केवल प्राप्त करता है
(a) हानि :
(b) सामान्य लाभ
(c) अधिकतम लाभ
(d) शून्य लाभ
Answer: (b) सामान्य लाभ
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता में दीर्घकाल में, नए फर्मों के प्रवेश और बहिर्गमन के कारण बाजार में समायोजन होता है, जिससे सभी फर्मों को केवल सामान्य लाभ प्राप्त होता है।

🎯 Exam Tip: दीर्घकाल में सामान्य लाभ की स्थिति अपूर्ण प्रतियोगिता का एक प्रमुख परिणाम है, जो नए फर्मों के आसान प्रवेश और बहिर्गमन की संभावना के कारण होता है।

 

Question 4. अपूर्ण प्रतियोगिता में विक्रेताओं की संख्या होती है
(a) शून्य
(b) कम
(c) अधिक
(d) ये सभी
Answer: (b) कम
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता वाले बाजारों में विक्रेताओं की संख्या पूर्ण प्रतियोगिता की तुलना में अपेक्षाकृत कम होती है, लेकिन एकाधिकार से अधिक होती है।

🎯 Exam Tip: विक्रेताओं की संख्या बाजार संरचना को परिभाषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कम संख्या प्रतिस्पर्धा को सीमित करती है और फर्मों को कुछ बाजार शक्ति प्रदान करती है।

 

Question 5. अपूर्ण प्रतियोगिता में प्रत्येक फर्म अपने लाभ को अधिकतम करने के लिए उत्पादन में परिवर्तन करती रहती है, जब तक
(a) सीमान्त लागत = सीमान्त आय
(b) सीमान्त आय, सीमान्त लागत से अधिक
(c) सीमान्त आय, सीमान्त लागत से कम
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Answer: (a) सीमान्त लागत = सीमान्त आय
In simple words: कोई भी फर्म तब तक अपने उत्पादन को समायोजित करती रहती है जब तक उसकी सीमान्त लागत (MC) सीमान्त आय (MR) के बराबर न हो जाए, जो अधिकतम लाभ का बिंदु होता है।

🎯 Exam Tip: अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए MC=MR का सिद्धांत सभी बाजार संरचनाओं (पूर्ण प्रतियोगिता को छोड़कर जहाँ P=MC=MR होता है) में सार्वभौमिक है।

 

Question 6. वस्तु (उत्पाद) विभेद' एक आधारभूत विशेषता है
या
वस्तु-विभेद किस बाजार में पाया जाता है?
(a) पूर्ण प्रतियोगिता की
(b) अपूर्ण प्रतियोगिता की
(c) एकाधिकार की
(d) इनमें से किसी की नहीं
Answer: (b) अपूर्ण प्रतियोगिता की।
In simple words: वस्तु-विभेद, जहां उत्पादक अपनी वस्तुओं को दूसरों से अलग दिखाने का प्रयास करते हैं, अपूर्ण प्रतियोगिता की एक मूलभूत विशेषता है।

🎯 Exam Tip: वस्तु-विभेद फर्मों को कीमत पर कुछ नियंत्रण रखने और गैर-कीमत प्रतिस्पर्धा में संलग्न होने की अनुमति देता है, जो पूर्ण प्रतियोगिता में संभव नहीं है।

 

Question 7. किसी फर्म के अधिकतम लाभ के लिए प्रथम आवश्यकता है
(a) सीमान्त आगम = औसत आगम
(b) सीमान्त लागत = औसत लागत
(c) सीमान्त लागते = सीमान्त आगम
(d) औसत लागत = औसत आगम
Answer: (c) सीमान्त लागत = सीमान्त आगम
In simple words: अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए किसी फर्म को अपनी उत्पादन मात्रा को उस बिंदु तक बढ़ाना या घटाना चाहिए जहाँ उसकी सीमान्त लागत (MC) सीमान्त आय (MR) के बराबर हो जाए।

🎯 Exam Tip: MC = MR का नियम लाभ अधिकतमकरण के लिए मौलिक है और इसे बाजार संरचनाओं के संदर्भ में समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 8. कोई फर्म सन्तुलन की स्थिति प्राप्त करती है जब
(a) सीमान्त आगम एवं सीमान्त लागत बराबर हों ।
(b) सीमान्त आगम सीमान्त लागत से अधिक हो ।
(c) सीमान्त आगम सीमान्त लागत से कम हो ।
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
Answer: (a) सीमान्त आगम एवं सीमान्त लागत बराबर हों ।
In simple words: एक फर्म तब सन्तुलन में होती है जब उसकी सीमान्त आय (MR) और सीमान्त लागत (MC) बराबर होती हैं, क्योंकि इस बिंदु पर लाभ अधिकतम होता है और उत्पादन में कोई बदलाव नहीं होता।

🎯 Exam Tip: यह सन्तुलन की स्थिति फर्म के लिए सबसे कुशल उत्पादन स्तर का प्रतिनिधित्व करती है, जहाँ वह न तो उत्पादन बढ़ाना चाहेगी और न ही घटाना चाहेगी।

 

Question 9. अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म की औसत आय रेखा होती है
(a) गिरती हुई रेखा
(b) उठती हुई रेखा
(c) क्षैतिज रेखो ।
(d) ऊर्ध्व रेखा ।
Answer: (a) गिरती हुई रेखा
In simple words: अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म की औसत आय रेखा (AR) नीचे की ओर ढलान वाली होती है क्योंकि अधिक इकाइयों को बेचने के लिए फर्म को अपनी कीमत कम करनी पड़ती है।

🎯 Exam Tip: AR वक्र का गिरता हुआ स्वरूप यह दर्शाता है कि फर्म एक 'कीमत निर्धारक' है और उसकी माँग वक्र की लोच एक से अधिक होती है, जिससे कीमत में कमी से कुल राजस्व बढ़ता है।

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