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Detailed Chapter 7 जन आंदोलनों का उदय UP Board Solutions for Class 12 Civics
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Class 12 Civics Chapter 7 जन आंदोलनों का उदय UP Board Solutions PDF
UP Board Class 12 Civics Chapter 7 Text Book Questions
UP Board Class 12 Civics Chapter 7 पाठ्यपुस्तक से अभ्यास प्रश्न
Question 1. चिपको आन्दोलन के बारे में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन गलत हैं- (क) यह पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए चला एक पर्यावरण आन्दोलन था। (ख) इस आन्दोलन ने पारिस्थितिकी और आर्थिक शोषण के मामले उठाए। (ग) यह महिलाओं द्वारा शुरू किया गया शराब-विरोधी आन्दोलन था। (घ) इस आन्दोलन की माँग थी कि स्थानीय निवासियों का अपने प्राकृतिक संसाधनों पर नियन्त्रण होना चाहिए।
Answer: (क) सही, (ख) सही, (ग) गलत, (घ) सही।
In simple words: चिपको आंदोलन पेड़ों की कटाई रोकने और स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण के लिए एक पर्यावरण आंदोलन था, जिसमें महिलाओं की सक्रिय भागीदारी थी, लेकिन यह मुख्य रूप से शराब-विरोधी आंदोलन नहीं था।
🎯 Exam Tip: चिपको आंदोलन के मूल उद्देश्यों और प्रकृति को स्पष्ट रूप से समझें, विशेषकर इसके पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक पहलुओं पर ध्यान दें।
Question 2. नीचे लिखे कुछ कथन गलत हैं। इनकी पहचान करें और जरूरी सुधार के साथ उन्हें दुरुस्त करके दोबारा लिखें
(क) सामाजिक आन्दोलन भारत के लोकतन्त्र को हानि पहुंचा रहे हैं।
(ख) सामाजिक आन्दोलनों की मुख्य ताकत विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच व्याप्त उनका जनाधार है।
(ग) भारत के राजनीतिक दलों ने कई मुद्दों को नहीं उठाया। इसी कारण सामाजिक आन्दोलनों का उदय हुआ।
Answer:
(क) सामाजिक आन्दोलन भारत के लोकतन्त्र को बढ़ावा दे रहे हैं।
(ख) यह कथन पूर्ण रूप से सही है।
(ग) यह कथन पूर्ण रूप से सही है।
In simple words: सामाजिक आंदोलन भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करते हैं, क्योंकि वे विभिन्न सामाजिक वर्गों को आवाज देते हैं और राजनीतिक दलों द्वारा छोड़े गए मुद्दों को सामने लाते हैं।
🎯 Exam Tip: सामाजिक आंदोलनों के लोकतंत्र पर सकारात्मक प्रभावों को पहचानें और समझाएं कि वे कैसे विभिन्न सामाजिक समूहों के जनाधार को मजबूत करते हैं।
Question 3. उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में (अब उत्तराखण्ड) 1970 के दशक में किन कारणों से चिपको आन्दोलन का जन्म हुआ? इस आन्दोलन का क्या प्रभाव पड़ा?
Answer: 1970 के दशक में उत्तर प्रदेश के उत्तरांचल (उत्तराखण्ड) क्षेत्र में चिपको आन्दोलन की शुरुआत हुई । चिपको आन्दोलन का अर्थ है-पेड़ से चिपक (लिपट) जाना अर्थात् पेड़ को आलिंगनबद्ध कर लेना।
चिपको आन्दोलन के कारण-चिपको आन्दोलन के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-
(1) चिपको आन्दोलन की शुरुआत उस समय हुई जब वन विभाग ने खेती-बाड़ी के औजार बनाने के लिए ‘Ashtree' काटने की अनुमति नहीं दी तथा खेल सामग्री बनाने वाली एक व्यावसायिक कम्पनी को यह पेड़ काटने की अनुमति प्रदान की गई। इससे गाँव वालों में रोष उत्पन्न हुआ और गाँव वाले वनों की इस कटाई का विरोध करते हुए जंगल में एकत्रित हो गए तथा पेड़ों से चिपक गए, जिससे ठेकेदारों के कर्मचारी पेड़ों को काट न सकें। इस घटना का पूरे देश में प्रसार हुआ ।
(2) गाँव वालों ने माँग रखी कि वन कटाई का ठेका किसी बाहरी व्यक्ति को नहीं दिया जाना चाहिए तथा स्थानीय लोगों का जल, जंगल, जमीन जैसे प्राकृतिक साधनों पर उपयुक्त नियन्त्रण होना चाहिए।
(3) चिपको आन्दोलन का एक अन्य कारण पारिस्थितिकी सन्तुलन बनाए रखना था। गाँववासी चाहते थे कि इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी सन्तुलन को हानि पहुँचाए बिना विकास किया जाए।
(4) ठेकेदारों द्वारा शराब की आपूर्ति करने का विरोध के रूप में यह आन्दोलन उठा। इस क्षेत्र में वनों की कटाई के दौरान ठेकेदार यहाँ के पुरुषों को शराब आपूर्ति का व्यवसाय भी करते थे। अतः स्त्रियों ने शराबखोरी की लत के विरोध में भी आवाज बुलन्द की ।
प्रभाव-चिपको आन्दोलन को देश में व्यापक सफलता प्राप्त हुई और सरकार ने पन्द्रह वर्षों के लिए हिमालयी क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी ताकि इस अवधि में क्षेत्र का वनाच्छादन फिर से ठीक अवस्था में आ जाए। इस आन्दोलन की सफलता ने भारत में चलाए गए अन्य आन्दोलनों को भी प्रभावित किया। इस आन्दोलन से ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक जागरूकता के आन्दोलन चलाए गए ।
In simple words: चिपको आंदोलन 1970 के दशक में उत्तराखंड में वनों की अंधाधुंध कटाई और बाहरी ठेकेदारों के एकाधिकार के विरोध में शुरू हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय अधिकारों की रक्षा और शराबखोरी का विरोध करना था, और इसने देश में व्यापक पर्यावरण जागरूकता फैलाई।
🎯 Exam Tip: चिपको आंदोलन के कारणों और इसके प्रभावों को विस्तार से समझाएं, जिसमें पर्यावरण, स्थानीय लोगों के अधिकार और सामाजिक मुद्दों के संदर्भ शामिल हों।
Question 4. भारतीय किसान यूनियन किसानों की दुर्दशा की तरफ ध्यान आकर्षित करने वाला अग्रणी संगठन है। नब्बे के दशक में इसने किन मुद्दों को उठाया और इसे कहाँ तक सफलता मिली?
Answer: 1990 के दशक में भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) ने भारतीय किसानों की दुर्दशा सुधारने हेतु अनेक मुद्दों पर बल दिया, जिनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं-
1. बिजली की दरों में बढ़ोतरी का विरोध किया।
2. 1980 के दशक में उत्तरार्द्ध में भारतीय अर्थव्यवस्था पर उदारीकरण के प्रभाव को देखते हुए नगदी फसलों के सरकारी खरीद मूल्यों में बढ़ोतरी की माँग की।
3. कृषि उत्पादों के अन्तर्राज्यीय आवाजाही पर लगी पाबन्दियों को हटाने पर बल दिया।
4. किसानों के लिए पेन्शन का प्रावधान करने की माँग की।
सफलताएँ - भारतीय किसान यूनियन को निम्नलिखित सफलताएँ प्राप्त हुईं-
(1) बीकेयू (BKU) जैसी माँगें देश के अन्य किसान संगठनों ने भी उठायीं। महाराष्ट्र के शेतकारी संगठन ने किसानों के आन्दोलन को इण्डिया की ताकतों (यानी शहरी औद्योगिक क्षेत्र) के खिलाफ 'भारत' (यानी ग्रामीण कृषि क्षेत्र) का संग्राम करार दिया।
(2) 1990 के दशक में बीकेयू ने अपनी संख्या बल के आधार पर एक दबाव समूह की तरह कार्य किया तथा अन्य किसान संगठनों के साथ मिलकर अपनी मांगें मनवाने में सफलता पायी।
(3) यह आन्दोलन मुख्य रूप से देश के समृद्ध राज्यों में सक्रिय था। खेती को अपनी जीविका का आधार बनाने वाले अधिकांश भारतीय किसानों के विपरीत बीकेयू जैसे संगठनों के सदस्य बाजार के लिए नगदी फसल उगाते थे। बीकेयू की तरह राज्यों के अन्य किसान संगठनों ने अपने सदस्य बनाए, जिनका क्षेत्र की चुनावी राजनीति से सम्बन्ध था। महाराष्ट्र का शेतकारी संगठन और कर्नाटक का रैयत संघ ऐसे किसान संगठनों के जीवन्त उदाहरण हैं।
In simple words: 1990 के दशक में भारतीय किसान यूनियन ने बिजली दरों में वृद्धि, नगदी फसलों के खरीद मूल्य, कृषि उत्पादों की आवाजाही पर प्रतिबंध और किसानों के लिए पेंशन जैसे मुद्दों को उठाया, और इन मांगों को मनवाने में देशव्यापी सफलता हासिल की, जिससे अन्य किसान संगठन भी प्रेरित हुए।
🎯 Exam Tip: बीकेयू द्वारा उठाए गए विशिष्ट मुद्दों और उसकी सफलता के कारणों को याद रखें, विशेषकर दबाव समूह के रूप में उसकी भूमिका को रेखांकित करें।
Question 5. आन्ध्र प्रदेश में चले शराब-विरोधी आन्दोलन ने देश का ध्यान कुछ गम्भीर मुद्दों की तरफ खींचा। ये मुद्दे क्या थे?
Answer: आन्ध्र प्रदेश में चले शराब-विरोधी आन्दोलन ने देश का ध्यान निम्नलिखित गम्भीर मुद्दों की तरफ खींचा-
1. शराब पीने से पुरुषों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य कमजोर होता है।
2. शराब पीने से व्यक्ति की कार्यक्षमता प्रभावित होती है जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।
3. शराबखोरी से ग्रामीणों पर कर्ज का बोझ बढ़ता है।
4. शराबखोरी से कामचोरी की आदत बढ़ती है।
5. शराब माफिया के सक्रिय होने से गाँवों में अपराधों को बढ़ावा मिलता है तथा अपराध और राजनीति के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध बनता है।
6. शराबखोरी से परिवार की महिलाओं से मारपीट एवं तनाव को बढ़ावा मिलता है।
7. शराब विरोधी आन्दोलन ने महिलाओं के मुद्दों-दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल व सार्वजनिक स्थानों पर यौन उत्पीड़न, लैंगिक असमानता आदि के प्रति समाज में जागरूकता उत्पन्न की।
In simple words: आंध्र प्रदेश के शराब-विरोधी आंदोलन ने शराब के कारण पुरुषों के स्वास्थ्य और कार्यक्षमता में गिरावट, ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव, कर्ज, अपराधों में वृद्धि, पारिवारिक तनाव और महिलाओं के खिलाफ हिंसा जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों को उजागर किया।
🎯 Exam Tip: शराब-विरोधी आंदोलन द्वारा उठाए गए सामाजिक-आर्थिक मुद्दों की सूची को याद करें और समझाएं कि यह आंदोलन लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण के लिए कैसे महत्वपूर्ण था।
Question 6. क्या आप शराब-विरोधी आन्दोलनको महिला-आन्दोलन का दर्जा देंगे? कारण बताएँ।
Answer: शराब-विरोधी आन्दोलन को महिला-आन्दोलन का दर्जा दिया जा सकता है क्योंकि अब तक जितने भी शराब-विरोधी आन्दोलन हुए उनमें महिलाओं की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण रही है। शराबखोरी से सर्वाधिक परेशानी महिलाओं को होती है। इससे परिवार की अर्थव्यवस्था चरमराने लगती है, परिवार में तनाव व मारपीट का वातावरण बनता है। तनाव के चलते पुरुष शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर हो जाते हैं। इन्हीं कारणों से शराब-विरोधी आन्दोलनों का प्रारम्भ प्रायः महिलाओं द्वारा किया जाता रहा है। अतः शराब-विरोधी आन्दोलन को महिला-आन्दोलन भी कहा जा सकता है।
In simple words: हाँ, शराब-विरोधी आंदोलनों को महिला आंदोलन कहा जा सकता है क्योंकि इनमें महिलाओं ने सक्रिय भूमिका निभाई है, क्योंकि शराबखोरी से परिवार की आर्थिक स्थिति, घरेलू हिंसा और पुरुषों के स्वास्थ्य पर सबसे अधिक नकारात्मक प्रभाव महिलाओं को ही झेलने पड़ते हैं।
🎯 Exam Tip: महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और शराबखोरी के सामाजिक प्रभावों, विशेषकर परिवारों और महिलाओं पर पड़ने वाले प्रभावों पर ध्यान केंद्रित करते हुए इस प्रश्न का उत्तर दें।
Question 7. नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने नर्मदा घाटी की बाँध परियोजना का विरोध क्यों किया?
Answer: नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने नर्मदा घाटी की बाँध परियोजना का विरोध अग्रलिखित कारणों से किया-
1. बाँध निर्माण से प्राकृतिक नदियों व पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता है।
2. जिस क्षेत्र में बाँध बनाए जाते हैं वहाँ रह रहे गरीबों के घर-बार, उनकी खेती योग्य भूमि, वर्षों से चले आ रहे कुटीर-धन्धों पर भी बुरा असर पड़ता है।
3. प्रभावित गाँवों के करीब ढाई लाख लोगों के पुनर्वास का मामला उठाया जा रहा था।
4. परियोजना पर किए जाने वाले व्यय में हेरा-फेरी के दोषों को उजागर करना भी परियोजना विरोधी स्वयं सेवकों का उद्देश्य था ।
5. आन्दोलनकर्ता प्रभावित लोगों को आजीविका और उनकी संस्कृति के साथ-साथ पर्यावरण को बचाना चाहते थे। वे जल, जंगल और जमीन पर प्रभावित लोगों का नियन्त्रण या इन्हें उचित मुआवजा और उनका पुनर्वास चाहते थे ।
In simple words: नर्मदा बचाओ आंदोलन ने नर्मदा घाटी में बांधों के निर्माण का विरोध पर्यावरण को नुकसान, विस्थापन, आजीविका के विनाश, सांस्कृतिक प्रभाव, पुनर्वास की समस्या और परियोजना में वित्तीय अनियमितताओं जैसे गंभीर मुद्दों के कारण किया, स्थानीय लोगों के अधिकारों और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की मांग की।
🎯 Exam Tip: नर्मदा बचाओ आंदोलन के पीछे के पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक कारणों को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध करें, जिसमें विस्थापन और स्थानीय लोगों के अधिकारों पर विशेष जोर दिया गया हो।
Question 8. क्या आन्दोलन और विरोध की कार्रवाइयों से देश का लोकतन्त्र मजबूत होता है? अपने उत्तर की पुष्टि में उदाहरण दीजिए।
Answer: अहिंसक और शान्तिपूर्ण आन्दोलनों एवं विरोध की कार्रवाइयों ने लोकतन्त्र को नुकसान नहीं बल्कि मजबूत किया है। इसके समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं-
1. चिपको आन्दोलन-अहिंसक और शान्तिपूर्ण तरीके से चलाया गया यह एक व्यापक जन आन्दोलन था। इससे पेड़ों की कटाई, वनों का उजड़ना रुका। पशु-पक्षियों और जनता को जल, जंगल, जमीन और स्वास्थ्यवर्धक पर्यावरण मिला। सरकार लोकतान्त्रिक माँगों के समक्ष झुकी ।
2. वामपन्थियों द्वारा चलाए गए किसान और मजदूर आन्दोलनों द्वारा जन-साधारण में जागृति, राष्ट्रीय कार्यों में भागीदारी और सरकार को सर्वहारा वर्ग की उचित माँगों के लिए जगाने में सफलता मिली।
3. दलित पैंथर्स नेताओं द्वारा चलाए गए आन्दोलनों, लिखे गए सरकार विरोधी साहित्यकारों की कविताओं और रचनाओं ने आदिवासी, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़ी जातियों में चेतना पैदा की। दलित पैंथर्स राजनीतिक दल और संगठन बने। जाति भेद-भाव और छुआछूत जैसी बुराइयों को दूर किया गया। समाज में समानता, स्वतन्त्रता, सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय, राजनीतिक न्याय को सुदृढ़ता मिली ।
4. ताड़ी-विरोधी आन्दोलन ने नशाबन्दी और मद्य-निषेध के विरोध का वातावरण तैयार किया। महिलाओं से जुड़ी अनेक समस्याएँ; जैसे-यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा और महिलाओं को विधायिका में दिए जाने वाले आरक्षण के मामले उठे । संविधान में कुछ संशोधन हुए और कानून बनाए गए।
In simple words: हाँ, अहिंसक आंदोलन लोकतंत्र को मजबूत करते हैं क्योंकि वे जनता को जागरूक करते हैं, उनकी मांगों को सरकार तक पहुंचाते हैं और सामाजिक न्याय व समानता जैसे मूल्यों को बढ़ावा देते हैं, जैसा कि चिपको, किसान और दलित पैंथर्स आंदोलनों ने दिखाया।
🎯 Exam Tip: विभिन्न आंदोलनों (जैसे चिपको, दलित पैंथर्स, शराब-विरोधी) के उदाहरणों का उपयोग करके समझाएं कि वे कैसे नागरिक भागीदारी बढ़ाते हैं और सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाते हैं, जिससे लोकतंत्र मजबूत होता है।
Question 9. दलित पैंथर्स ने कौन-कौन से मुद्दे उठाए?
Answer: दलित पैंथर्स बीसवीं शताब्दी के सातवें दशक के शुरुआती सालों में दलित शिक्षित युवा वर्ग का आन्दोलन था। इसमें ज्यादातर शहर की झुग्गी-बस्तियों में पलकर बड़े हुए दलित थे। दलित पैंथर्स ने दलित समुदाय से सम्बन्धित सामाजिक असमानता, जातिगत आधार पर भेदभाव, दलित महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, दलितों का सामाजिक एवं आर्थिक उत्पीड़न तथा दलितों के लिए आरक्षण जैसे मुद्दे उठाए ।
In simple words: दलित पैंथर्स आंदोलन ने दलित समुदाय के लिए सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव, दलित महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, आर्थिक उत्पीड़न और सरकारी नौकरियों में आरक्षण जैसे मुद्दों को उठाया।
🎯 Exam Tip: दलित पैंथर्स आंदोलन द्वारा उठाए गए प्रमुख सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को स्पष्ट रूप से पहचानें और उन्हें संक्षेप में समझाएं।
Question 10. निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दें लगभग सभी नए सामाजिक आन्दोलन नयी समस्याओं; जैसे-पर्यावरण का विनाश, महिलाओं की बदहाली, आदिवासी संस्कृति का नाश और मानवाधिकारों का उल्लंघन..... के समाधान को रेखांकित करते हुए उभरे । इनमें से कोई भी अपने आप में समाज व्यवस्था के मूलगामी बदलाव के सवाल से नहीं जुड़ा था। इस अर्थ में ये आन्दोलन अतीत की क्रान्तिकारी विचारधाराओं से एकदम अलग हैं। लेकिन, ये आन्दोलन बड़ी बुरी तरह बिखरे हुए हैं और यही इनकी कमजोरी है..... सामाजिक आन्दोलनों का एक बड़ा दायरा ऐसी चीजों की चपेट में है कि वह एक ठोस तथा एकजुट जन आन्दोलन का रूप नहीं ले पाता और न ही वंचितों और गरीबों के लिए प्रासंगिक हो जाता है। ये आन्दोलन बिखरे-बिखरे हैं, प्रतिक्रिया के तत्त्वों से भरे हैं, अनियत हैं और बुनियादी सामाजिक बदलाव के लिए इनके पास कोई फ्रेमवर्क नहीं है। 'इस' या 'उस' के विरोध (पश्चिम-विरोधी, पूँजीवाद-विरोधी, 'विकास'-विरोधी, आदि) में चलने के कारण इनमें कोई संगति आती हो अथवा दबे-कुचले लोगों और हाशिए के समुदायों के लिए ये प्रासंगिक हो पाते हों-ऐसी बात नहीं। - रजनी कोठारी
(क) नए सामाजिक आन्दोलन और क्रान्तिकारी विचारधाराओं में क्या अन्तर है?
Answer: (क) सामाजिक आन्दोलन समाज से जुड़े हुए मामलों अथवा समस्याओं को उठाते हैं; जैसे-जाति भेदभाव, रंग भेदभाव, लिंग भेदभाव के विरोध में चलाए जाने वाले सामाजिक आन्दोलन । इसी प्रकार ताड़ी विरोधी आन्दोलन, सभी को शिक्षा, सामाजिक न्याय और समानता के लिए चलाए जाने वाले आन्दोलन आदि । जबकि क्रान्तिकारी विचारधारा के लोग तुरन्त सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में बदलाव लाना चाहते हैं। वे लक्ष्यों को ज्यादा महत्त्व देते हैं, तरीकों को नहीं। मार्क्सवादी-लेनिनवादी या नक्सलवादी आन्दोलन को क्रान्तिकारी विचारधारा के आन्दोलन मानते हैं।
In simple words: नए सामाजिक आंदोलन विशिष्ट सामाजिक समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जबकि क्रांतिकारी विचारधाराएं समाज के मूलभूत ढांचे को तुरंत और व्यापक रूप से बदलने का लक्ष्य रखती हैं।
🎯 Exam Tip: नए सामाजिक आंदोलनों और क्रांतिकारी विचारधाराओं के बीच के अंतर को उनके उद्देश्यों, कार्यक्षेत्र और बदलाव के दृष्टिकोण के आधार पर स्पष्ट करें।
Question 10. (ख) लेखक के अनुसार सामाजिक आन्दोलनों की सीमाएँ क्या-क्या हैं?
Answer: (ख) सामाजिक आन्दोलन बिखरे हुए हैं तथा इसमें एकजुटता का अभाव पाया जाता है। सामाजिक आन्दोलनों के पास सामाजिक बदलाव में लिए कोई ढाँचागत योजना नहीं है।
In simple words: लेखक के अनुसार, सामाजिक आंदोलनों की प्रमुख सीमाएं उनकी बिखरी हुई प्रकृति, एकजुटता की कमी और सामाजिक बदलाव के लिए एक सुसंगत ढाँचागत योजना का अभाव है।
🎯 Exam Tip: लेखक द्वारा बताई गई सामाजिक आंदोलनों की कमियों, जैसे कि बिखराव और एकजुटता की कमी, को संक्षेप में समझाएं।
Question 10. (ग) यदि सामाजिक आन्दोलन विशिष्ट मुद्दों को उठाते हैं तो आप उन्हें 'बिखरा' हुआ कहेंगे या मानेंगे कि वे अपने मुद्दे पर कहीं ज्यादा केन्द्रित हैं। अपने उत्तर की पुष्टि में तर्क दीजिए।
Answer: (ग) सामाजिक आन्दोलनों द्वारा उठाए गए विशिष्ट मुद्दों के कारण यह कहा जा सकता है कि ये आन्दोलन अपने मुद्दों पर अधिक केन्द्रित हैं।
In simple words: यदि सामाजिक आंदोलन विशिष्ट मुद्दों पर केंद्रित होते हैं, तो उन्हें 'बिखरा हुआ' कहा जा सकता है क्योंकि वे व्यापक सामाजिक परिवर्तन के बजाय एक ही विषय पर अधिक ध्यान देते हैं।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न का उत्तर देते समय, आंदोलनों के 'विशिष्ट मुद्दों पर केंद्रित' होने और 'बिखरे हुए' होने के बीच के संबंध को स्पष्ट रूप से तर्क सहित प्रस्तुत करें।
UP Board Class 12 Civics Chapter 7 InText Questions
UP Board Class 12 Civics Chapter 7 पाठान्तर्गत प्रश्नोत्तर
Question 1. है तो यह बड़ी शानदार बात! लेकिन कोई मुझे बताए कि हम जो यहाँ राजनीति का इतिहास पढ़ रहे हैं, उससे यह बात कैसे जुड़ती है?
Answer: सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों में जन आन्दोलनों की शानदार उपलब्धि रही है। चिपको आन्दोलन में उत्तराखण्ड के एक गाँव के स्त्री एवं पुरुषों ने पर्यावरण की सुरक्षा और जंगलों की कटाई का विरोध करने के लिए एक अनूठा प्रयास किया, जिसमें इन लोगों ने पेड़ों को अपनी बाँह में भर लिया ताकि उनको काटने से बचाया जा सके। इस आन्दोलन को व्यापक सफलता प्राप्त हुई ।
जन आन्दोलनों का राजनीति से सम्बन्ध का पुराना इतिहास रहा है। जन आन्दोलन कभी राजनीतिक तो कभी सामाजिक आन्दोलन का रूप ले सकते हैं और अकसर यह दोनों ही रूपों में नजर आते हैं। उदाहरण के लिए, भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन को ही लें तो यह मुख्य रूप से राजनीतिक आन्दोलन था लेकिन औपनिवेशक काल में सामाजिक-आर्थिक मसलों पर भी विचार मन्थन चला जिससे अनेक स्वतन्त्र सामाजिक आन्दोलनों का जन्म हुआ; जैसे-जाति प्रथा विरोधी आन्दोलन, किसान सभा आन्दोलन और मजदूर संगठनों के आन्दोलन। इन आन्दोलनों ने सामाजिक संघर्षों के कुछ अन्दरूनी मुद्दे उठाए । ऐसे ही कुछ आन्दोलन आजादी के बाद के दौर में भी चलते रहे । मुम्बई, कोलकाता और कानपुर जैसे बड़े शहरों के औद्योगिक मजदूरों के बीच मजदूर संगठनों के आन्दोलनों का बड़ा जोर था। सभी बड़ी पार्टियों ने इस तबके के मजदूरों को लामबन्द करने के लिए अपने-अपने मजदूर संगठन बनाए।
इस प्रकार जन-आन्दोलनों और राजनीति का गहरा नाता रहा है। आन्दोलनों के दौरान किए जाने वाले सफल प्रयोगों को राजनीतिक दल अपना लेते हैं।
In simple words: जन आंदोलन राजनीति से गहराई से जुड़े हैं क्योंकि वे सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों को प्रभावित करते हैं, जनता की समस्याओं को उठाते हैं, और कभी-कभी राजनीतिक दलों द्वारा अपनाए जाते हैं, जैसा कि चिपको आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हुए विभिन्न आंदोलनों से स्पष्ट होता है।
🎯 Exam Tip: जन आंदोलनों और राजनीतिक इतिहास के बीच के संबंध को समझाते हुए, उदाहरणों के साथ स्पष्ट करें कि कैसे आंदोलन सामाजिक और राजनीतिक बदलावों को प्रेरित करते हैं।
Question 2. गैर-राजनीतिक संगठन? मैं यह बात कुछ समझा नहीं। आखिर, पार्टी के बिना राजनीति कैसे की जा सकती है?
Answer: सामान्यतः गैर-राजनीतिक संगठन ऐसे संगठन हैं जो दलगत राजनीति से दूर स्थानीय एवं क्षेत्रीय मुद्दों से जुड़े हुए होते हैं तथा सक्रिय राजनीति में भाग लेने की अपेक्षा एक दबाव समूह की तरह कार्य करते हैं।
औपनिवेशिक दौर में सामाजिक-आर्थिक मसलों पर भी विचार मन्थन चला जिससे अनेक स्वतन्त्र सामाजिक आन्दोलनों का जन्म हुआ; जैसे-जाति प्रथा विरोधी आन्दोलन, किसान सभा आन्दोलन और मजदूर संगठनों के आन्दोलन। ये आन्दोलन 20वीं सदी के प्रारम्भ में अस्तित्व में आए। मुम्बई, कोलकाता और कानपुर जैसे औद्योगिक शहरों में मजदूर संगठनों के आन्दोलनों का जोर था। इनका मुख्य जोर आर्थिक अन्याय और असमानता के मसले पर रहा। ये सभी गैर-राजनीतिक संगठन थे और इन्होंने अपनी माँगें मनवाने के लिए आन्दोलनों का सहारा लिया।
यद्यपि ऐसे गैर-राजनीतिक संगठनों ने औपचारिक रूप से चुनावों में भाग तो नहीं लिया लेकिन राजनीतिक दलों से इनका सम्बन्ध नजदीकी रहा। इन आन्दोलनों में सम्मिलित हुए कई व्यक्ति और संगठन राजनीतिक दलों में भी सक्रिय हुए।
In simple words: गैर-राजनीतिक संगठन वे होते हैं जो सीधे चुनाव नहीं लड़ते लेकिन दबाव समूह के रूप में स्थानीय मुद्दों पर राजनीति को प्रभावित करते हैं, जैसे औपनिवेशिक काल के जाति, किसान और मजदूर आंदोलन।
🎯 Exam Tip: गैर-राजनीतिक संगठनों की परिभाषा, उनके उद्देश्यों और राजनीतिक दलों से उनके संबंध को उदाहरणों के साथ स्पष्ट करें।
Question 3. क्या दलितों की स्थिति इसके बाद से ज्यादा बदल गई है? दलितों पर अत्याचार की घटनाओं के बारे में मैं रोजाना सुनती हूँ। क्या यह आन्दोलन असफल रहा? या, यह पूरे समाज की असफलता है?
Answer: दलितों की स्थिति में सुधार हेतु सन् 1972 में शिक्षित दलित युवा वर्ग ने महाराष्ट्र में एक आन्दोलन चलाया, जिसे दलित पैंथर्स आन्दोलन के नाम से जाना जाता है। इस आन्दोलन के माध्यम से दलितों की स्थिति सुधारने हेतु अनेक प्रयास किए गए। इस आन्दोलन का उद्देश्य जाति प्रथा को समाप्त करना तथा गरीब किसान, शहरी औद्योगिक मजदूर और दलित सहित सारे वंचित वर्गों का एक संगठन तैयार करना था।
यद्यपि इस आन्दोलन द्वारा शिक्षित युवा वर्ग ने काफी प्रयास किया, लेकिन अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हो पायी। भारतीय संविधान में छुआछूत की प्रथा को समाप्त कर दिया गया। इसके बावजूद भी पुराने जमाने में जिन जातियों को अछूत माना गया था, उनके साथ नए दौर में भी सामाजिक भेदभाव तथा हिंसा का बर्ताव कई रूपों में जारी रहा। दलितों की बस्तियाँ मुख्य गाँव से अब भी दूर थीं, दलित महिलाओं के साथ यौन-अत्याचार होते थे। जातिगत प्रतिष्ठा की छोटी-मोटी बात को लेकर दलितों पर सामूहिक जुल्म ढाए जाते थे।
In simple words: 1972 में दलित पैंथर्स जैसे आंदोलनों ने दलितों की स्थिति सुधारने का प्रयास किया, और संविधान में छुआछूत को समाप्त करने के बावजूद भी, दलितों के खिलाफ सामाजिक भेदभाव और हिंसा आज भी विभिन्न रूपों में जारी है, जो समाज की सामूहिक असफलता को दर्शाता है।
🎯 Exam Tip: दलित पैंथर्स आंदोलन के उद्देश्यों और दलितों की स्थिति में आज भी व्याप्त चुनौतियों के बीच संबंध को समझाएं, जिसमें संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद सामाजिक भेदभाव पर प्रकाश डाला गया हो।
Question 4. मुझे कोई ऐसा नहीं मिला जो कहे कि मैं किसान बनना चाहता हूँ। क्या हमें अपने देश में किसानों की जरूरत नहीं है?
Answer: यद्यपि भारत एक कृषि-प्रधान देश है और भारतीय अर्थव्यवस्था का अधिकांश हिस्सा कृषि पर आधारित है, लेकिन संसाधनों के अभाव व वर्षा आधारित कृषि होने के कारण किसानों को इस कार्य में पर्याप्त लाभ नहीं मिल पा रहा है। इसके अलावा जनाधिक्य व कृषिगत क्षेत्र की सीमितता के कारण इस क्षेत्र में छिपी हुई बेरोजगारी जैसी समस्या आम बात हो गई है। आम नागरिक को इस क्षेत्र में उज्ज्वल भविष्य नजर नहीं आ रहा है। इसलिए लोग कृषिगत कार्यों की अपेक्षा अन्य कार्यों में अधिक रुचि लेने लगे हैं।
In simple words: भारत को किसानों की आवश्यकता है, लेकिन कृषि क्षेत्र में संसाधनों की कमी, वर्षा पर निर्भरता, कम लाभप्रदता और छिपी हुई बेरोजगारी के कारण यह आकर्षक नहीं रहा है, जिससे युवा अन्य व्यवसायों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
🎯 Exam Tip: भारतीय कृषि की समस्याओं, जैसे संसाधनों की कमी, लाभप्रदता का अभाव और छिपी हुई बेरोजगारी को समझाते हुए किसानों के महत्व पर अपने विचार प्रस्तुत करें।
Question 5. क्या आन्दोलनों को राजनीति की प्रयोगशाला कहा जा सकता है? आन्दोलनों के दौरान नए प्रयोग किए जाते हैं और सफल प्रयोगों को राजनीतिक दल अपना लेते हैं।
Answer: जन-आन्दोलनों को राजनीति की प्रयोगशाला कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जन-आन्दोलन कभी सामाजिक तो कभी राजनीतिक आन्दोलन का रूप ले सकते हैं। भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति पूर्व और स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद अनेक जन-आन्दोलन हुए, जिन्होंने बाद में राजनीतिक रूप ग्रहण कर लिया। भारत के स्वाधीनता आन्दोलन को इसका उदाहरण माना जा सकता है।
इसी प्रकार भारत की स्वतन्त्रता के उपरान्त प्रारम्भिक वर्षों में दक्षिण भारत के आन्ध्र प्रदेश के अन्तर्गत आने वाले तेलंगाना क्षेत्र के किसान कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में लामबन्द हुए। इन्होंने काश्तकारों के बीच जमीन के पुनर्वितरण की माँग की। आन्ध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार के कुछ भागों में किसान तथा कृषि मजदूरों ने मार्क्सवादी-लेनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में अपना विरोध जारी रखा। ऐसे आन्दोलनों ने औपचारिक रूप से चुनावों में भाग तो नहीं लिया लेकिन राजनीतिक दलों से इनका नजदीकी रिश्ता कायम हुआ। इन आन्दोलनों में शामिल कई व्यक्ति और संगठन राजनीतिक दलों में सक्रिय रूप से जुड़े । ऐसे जुड़ाव से दलगत राजनीति में विभिन्न सामाजिक तबकों की बेहतर नुमाइन्दगी सुनिश्चित हुई ।
In simple words: हाँ, आंदोलनों को राजनीति की प्रयोगशाला कहा जा सकता है क्योंकि वे नए विचारों और रणनीतियों को जन्म देते हैं, जिन्हें बाद में राजनीतिक दल अपना लेते हैं, और इस तरह वे सामाजिक और राजनीतिक बदलावों को आकार देते हैं, जैसा कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और तेलंगाना किसान आंदोलन ने दिखाया।
🎯 Exam Tip: आंदोलनों और राजनीति के बीच के गतिशील संबंध को समझाएं, जिसमें यह बताया जाए कि कैसे आंदोलन नए राजनीतिक विचारों को जन्म देते हैं और दलों को प्रभावित करते हैं।
UP Board Class 12 Civics Chapter 7 Other Important Questions
UP Board Class 12 Civics Chapter 7 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
Question 1. भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् होने वाले प्रमुख किसान आन्दोलनों की विवेचना कीजिए।
Answer: स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् किसान आन्दोलन भारत एक कृषि-प्रधान देश है। भारतीय अर्थव्यवस्था का अधिकांश हिस्सा कृषि पर निर्भर है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने कृषकों की दशा सुधारने हेतु अनेक प्रयास किए, फिर भी कृषकों की माँगें पूरी नहीं हो पायीं और उन्होंने आन्दोलन का सहारा लिया। इनमें से कुछ आन्दोलन निम्नलिखित हैं-
1. तिभागा आन्दोलन-तिभागा आन्दोलन सन् 1946-47 में बंगाल में प्रारम्भ हुआ। यह आन्दोलन मुख्यतः जोतदारों के विरुद्ध मझोले किसानों एवं बटाईदारों का संयुक्त आन्दोलन था। इस आन्दोलन का मुख्य कारण सन् 1943 में बंगाल में पड़ा भीषण अकाल था। इस आन्दोलन के कारण कई गाँवों में किसान सभा का शासन स्थापित हो गया परन्तु औद्योगिक मजदूर वर्ग और मझोले किसानों के समर्थन के बिना यह शीघ्र ही समाप्त हो गया।
2. तेलंगाना आन्दोलन-तेलंगाना आन्दोलन हैदराबाद राज्य में सन् 1946 में जागीरदारों द्वारा की जा रही जबरन एवं अत्यधिक वसूली के विरोध में चलाया गया क्रान्तिकारी किसान आन्दोलन था। इस आन्दोलन में किसानों ने माँग की कि उनके सभी ऋण माफ कर दिए जाएँ परन्तु जमींदारों ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया। क्रान्तिकारी किसानों ने पाँच हजार गुरिल्ला किसान तैयार किए और जमींदारों के विरुद्ध संघर्ष आरम्भ कर दिया। गुरिल्ला सैनिकों ने जमींदारों के हथियार छीन लिए और उन्हें भगा दिया लेकिन भारत सरकार द्वारा हस्तक्षेप करने पर यह आन्दोलन समाप्त हो गया।
3. आधुनिक किसान आन्दोलन-अपने हितों की रक्षा के लिए किसान समय-समय पर आन्दोलन करते रहते हैं। पिछले कई वर्षों से कपास के दामों में कमी होने के कारण कपास उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब आदि के किसानों में असन्तोष फैल गया। मार्च 1987 में गुजरात के किसानों ने अपनी मांगें मनवाने के लिए विधानसभा का घेराव करने की योजना बनाई। सरकार ने गुजरात विधानसभा (गांधीनगर) की किलेबन्दी कर दी। पुलिस ने किसानों पर तरह-तरह के अत्याचार किए और किसानों ने पुलिस के अत्याचारों के विरुद्ध ग्राम बन्द करने की अपील की, जिसके कारण गुजरात के अनेक शहरों में दूध और सब्जी की समस्या कई दिनों तक रही।
किसान आन्दोलनों का मूल्यांकन स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी किसानों की समस्या वैसी ही बनी हुई है जैसी कि ब्रिटिशकाल में थी। इससे स्पष्ट होता है कि स्वतन्त्रता से पूर्व और स्वतन्त्रता के बाद किए गए सभी किसान आन्दोलन असफल रहे । इन किसान आन्दोलनों की असफलता के महत्त्वपूर्ण कारक हैं-किसान आन्दोलनों में संगठन की कमी, किसानों में अज्ञानता, अन्धविश्वास, क्रान्तिकारी तथा उद्देश्यपूर्ण विचारधारा की कमी और योग्य नेतृत्व का अभाव ।
In simple words: स्वतंत्रता के बाद भारत में तिभागा, तेलंगाना और आधुनिक किसान आंदोलन हुए, जिनमें किसानों ने अपनी समस्याओं-जैसे शोषण, वसूली और कम कीमतों के खिलाफ संघर्ष किया, लेकिन संगठन की कमी, अज्ञानता और नेतृत्व के अभाव के कारण इनमें से कई आंदोलन अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर पाए।
🎯 Exam Tip: स्वतंत्रता के बाद के प्रमुख किसान आंदोलनों (तिभागा, तेलंगाना, आधुनिक किसान आंदोलन) के नाम, उनके कारण और परिणामों को याद रखें, साथ ही उनकी सफलताओं और असफलताओं का मूल्यांकन करें।
Question 2. जन-आन्दोलन के मुख्य कारणों का उल्लेख करते हुए भारतीय राजनीति पर प्रभावों का वर्णन कीजिए।
Answer: जन-आन्दोलन के प्रमुख कारण जन-आन्दोलन के अनेक कारण उत्तरदायी थे, जिनमें से प्रमुख अग्रलिखित हैं-
1. राजनीतिक दलों के आचार-व्यवहार से मोह भंग होना-सत्तर और अस्सी के दशक में समाज के कई तबकों का राजनीतिक दलों के आचार-व्यवहार से मोह भंग हो गया। गैर-कांग्रेसवाद या जनता पार्टी की असफलता से राजनीतिक अस्थिरता का माहौल पैदा हो गया। इससे दल-रहित जन-आन्दोलनों का उदय हुआ ।
2. सरकार की आर्थिक नीतियों से मोह भंग होना-सरकार की आर्थिक नीतियों से भी लोगों का मोह भंग हुआ क्योंकि गरीबी और असमानता बड़े पैमाने पर बनी रही। आर्थिक संवृद्धि का लाभ समाज के हर तबके को समान रूप से नहीं मिला। जाति और लिंग आधारित साम्प्रदायिक असमानताओं ने गरीबी के मुद्दे को और ज्यादा जटिल और धारदार बना दिया। समाज के विभिन्न समूहों के बीच अपने साथ हो रहे अन्याय और वंचना का भाव प्रबल हुआ ।
3. लोकतान्त्रिक संस्थाओं और चुनावी राजनीति से विश्वास उठना-राजनीतिक धरातल पर सक्रिय कई समूहों का विश्वास लोकतान्त्रिक संस्थाओं और चुनावी राजनीति से उठ गया। ये समूह दलगत राजनीति से अलग हुए और अपने विरोध को स्वर देने के लिए इन्होंने आवाम को लामबन्द करना शुरू कर दिया। दलित पैंथर्स आन्दोलन, किसान आन्दोलन, ताड़ी विरोध आन्दोलन, नर्मदा बचाओ आन्दोलन आदि इसी तरह के जनआन्दोलन थे।
भारतीय राजनीति पर जन-आन्दोलनों का प्रभाव भारतीय राजनीति पर जन-आन्दोलनों के निम्नलिखित प्रभाव पड़े-
1. इन सामाजिक आन्दोलनों ने समाज के उन नए वर्गों की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को अभिव्यक्ति दी जो अपनी समस्याओं को चुनावी राजनीति के जरिये हल नहीं कर पा रहे थे।
2. विभिन्न सामाजिक समूहों के लिए ये आन्दोलन अपनी बात रखने को बेहतर माध्यम बनकर उभरे।
3. समाज के गहरे तनावों और जनता के क्षोभ को एक सार्थक दिशा देकर इन आन्दोलनों ने एक तरह से लोकतन्त्र की रक्षा की है तथा सक्रिय भागीदारी के नए रूपों के प्रयोग ने भारतीय लोकतन्त्र के जनाधार को बढ़ाया है।
4. ये आन्दोलन जनता की उचित माँगों के प्रतिनिधि बनकर उभरे हैं और इन्होंने नागरिकों के एक बड़े समूह को अपने साथ जोड़ने में सफलता हासिल की है।
In simple words: जन आंदोलनों का उदय राजनीतिक दलों के आचरण, सरकारी आर्थिक नीतियों की विफलता और लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास की कमी जैसे कारणों से हुआ। इन आंदोलनों ने नए सामाजिक वर्गों की समस्याओं को आवाज दी, लोगों को अभिव्यक्ति का माध्यम दिया और लोकतंत्र को मजबूत किया।
🎯 Exam Tip: जन आंदोलनों के उदय के कारणों (राजनीतिक मोहभंग, आर्थिक असमानता) और भारतीय राजनीति पर उनके प्रभावों (सामाजिक समस्याओं का प्रकटीकरण, लोकतंत्र का सुदृढीकरण) को विस्तृत रूप से समझाएं।
Question 3. भारत में स्त्रियों के उत्थान के लिए उठाए गए कदमों का वर्णन कीजिए।
Answer: भारत में स्त्रियों के उत्थान के लिए उठाए गए कदम
भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद स्त्रियों की दशा में सुधार लाने के लिए अनेक कदम उठाए गए, जिनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं-
1. महिला अपराध प्रकोष्ठ तथा परिवार न्यायपालिका-इस विभाग का मुख्य कार्य महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए सुनवाई करना तथा विवाह, तलाक, दहेज व पारिवारिक विवादों को सुलझाना है।
2. सरकारी कार्यालयों में महिलाओं की भर्ती-वर्तमान में लगभग सभी सरकारी कार्यालयों में महिला कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती है। वायु सेना, नौ सेना तथा थल सेना और सशस्त्र सेनाओं के तीनों अंगों में अधिकारी पदों पर स्त्रियों की भर्ती पर लगी रोक को हटा लिया गया है। सभी क्षेत्रों में महिलाएँ कार्य कर रही हैं।
3. स्त्री शिक्षा-स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में स्त्री शिक्षा का काफी विस्तार हुआ है।
4. राष्ट्रीय महिला आयोग-सन् 1990 के एक्ट के अन्तर्गत एक राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना की गई है। महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, दिल्ली, पंजाब, कर्नाटक, असम एवं गुजरात राज्यों में भी महिला आयोगों की स्थापना की जा चुकी है। ये आयोग महिलाओं पर हुए अत्याचार, उत्पीड़न, शोषण तथा अपहरण आदि के मामलों की जाँच-पड़ताल करते हैं। सभी राज्यों में महिला आयोग स्थापित किए जाने की माँग जोर पकड़ रही है और इन आयोगों को प्रभावी बनाने की माँग भी जोरों पर है।
5. महिला आरक्षण-महिलाएँ कुल आबादी की लगभग 50 प्रतिशत हैं। लेकिन सरकारी कार्यालयों, संसद, राज्य विधानमण्डलों आदि में इनकी संख्या बहुत कम है। सन् 1993 के 73वें व 74वें संविधान संशोधन । द्वारा पंचायती राज संस्थाओं तथा नगरपालिकाओं में एक-तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिए गए हैं। संसद और राज्य विधानमण्डलों में भी इसी प्रकार आरक्षण किए जाने की माँग जोर पकड़ रही है। यद्यपि इस ओर प्रयास किया जा रहा है; परन्तु सर्वसम्मति के अभाव में यह विधेयक संसद में पारित नहीं हो पाया है।
उपर्युक्त प्रयासों के अलावा अखिल भारतीय महिला परिषद् तथा कई अन्य महिला संगठन स्त्रियों को अत्याचार उत्पीड़न और अन्याय से बचाने, उन पर अत्याचार तथा बलात्कार करने वाले अपराधियों को दण्ड दिलवाने तथा महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए प्रयत्नशील हैं।
In simple words: भारत में महिलाओं के उत्थान के लिए महिला अपराध प्रकोष्ठ, सरकारी कार्यालयों में भर्ती, स्त्री शिक्षा का विस्तार, राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना और पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण जैसे कदम उठाए गए हैं, हालांकि संसद में महिला आरक्षण जैसे कुछ प्रयास अभी भी विचाराधीन हैं।
🎯 Exam Tip: महिलाओं के उत्थान के लिए सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों (जैसे महिला आयोग, आरक्षण, शिक्षा) को सूचीबद्ध करें और प्रत्येक के महत्व को समझाएं।
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
Question 1. स्वतन्त्रता के बाद महिलाओं की स्थिति में क्या परिवर्तन आया? स्पष्ट कीजिए।
Answer: स्वतन्त्रता के बाद महिलाओं की स्थिति को असमानता से समानता तक लाने के जागरूक प्रयास होते रहे हैं। वर्तमान काल में महिलाओं को पुरुषों के समान समानता का दर्जा प्राप्त है। महिलाएँ किसी भी प्रकार की शिक्षा या प्रशिक्षण को चुनने के लिए स्वतन्त्र हैं; परन्तु ग्रामीण समाज में अभी भी महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है जिसे दूर किए जाने की आवश्यकता है। यद्यपि कानूनी तौर पर महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्रदान किए गए हैं परन्तु आदिकाल से चली आ रही पुरुष प्रधान व्यवस्था में व्यावहारिक रूप में महिलाओं के साथ अभी भी भेदभाव किया जाता है।
In simple words: स्वतंत्रता के बाद महिलाओं की स्थिति में कानूनी रूप से काफी सुधार हुआ है, उन्हें पुरुषों के समान अधिकार और शिक्षा व करियर चुनने की स्वतंत्रता मिली है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में और पुरुष प्रधान सामाजिक संरचनाओं के कारण व्यावहारिक भेदभाव अभी भी मौजूद है।
🎯 Exam Tip: स्वतंत्रता के बाद महिलाओं की स्थिति में आए कानूनी और सामाजिक परिवर्तनों को समझाएं, साथ ही आज भी मौजूद चुनौतियों पर भी प्रकाश डालें।
Question 2. राष्ट्रीय महिला आयोग को समझाइए।
Answer: राष्ट्रीय महिला आयोग भारत में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए सन् 1990 में संसद ने एक कानून बनाया जो कि 31 जनवरी, 1992 को अस्तित्व में आया। इस कानून के तहत राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना की गई। राष्ट्रीय महिला आयोग को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। यह आयोग महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए संसद को कानून बनाने के लिए उस पर दबाव डालता है। संसद द्वारा पास किए गए कानूनों की आयोग समीक्षा करता है, जो महिलाओं के अधिकारों से सम्बन्धित हैं। यह आयोग महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों की जाँच करता है तथा दोषी को दण्ड दिलवाने की सिफारिश करता है। इसके साथ-साथ यह आयोग महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकार दिलाने के लिए प्रयासरत रहता है।
In simple words: राष्ट्रीय महिला आयोग 1992 में स्थापित एक सांविधिक निकाय है, जिसे महिलाओं के अधिकारों की रक्षा, उन पर हो रहे अत्याचारों की जांच और उनके सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए नीतियों व कानूनों को प्रभावित करने का व्यापक अधिकार प्राप्त है।
🎯 Exam Tip: राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना, इसके कार्यों और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा में इसकी भूमिका को संक्षेप में समझाएं।
Question 3. जन-आन्दोलन का क्या अर्थ है? दल समर्थित (दलीय) और स्वतन्त्र (निर्दलीय) आन्दोलन का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
Answer: जन-आन्दोलन का अर्थ-प्रजातान्त्रिक मर्यादाओं तथा संवैधानिक नियमों के आधार पर तथा सामाजिक शिष्टाचार से सम्बन्धित नियमों के पालन सहित सरकारी नीतियों, कानून व प्रशासन सहित किसी मुद्दे पर व्यक्तियों के समूह या समूहों के द्वारा असहमति प्रकट किया जाना 'जन-आन्दोलन' कहलाता है। - जन-आन्दोलनों में प्रदर्शन, नारेबाजी, जुलूस जैसे क्रियाकलाप शामिल हैं।
जन-आन्दोलनों का स्वरूप
1. दल आधारित आन्दोलन-जब कभी राजनीतिक दल या राजनीतिक दलों के समर्थन प्राप्त समूहों द्वारा आन्दोलन किए जाते हैं तो इन्हें 'दलीय आन्दोलन' कहा जाता है; जैसे-किसान सभा आन्दोलन एक दलीय आन्दोलन था।
2. स्वतन्त्र जन-आन्दोलन-जब आन्दोलन असंगठित लोगों के समूह द्वारा संचालित किए जाते हैं, तो वे निर्दलीय जन-आन्दोलन कहलाते हैं; जैसे-चिपको आन्दोलन, दलित पैंथर्स आन्दोलन ।
In simple words: जन आंदोलन संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीकों से सरकार की नीतियों के खिलाफ असहमति व्यक्त करने वाले सामूहिक प्रदर्शन होते हैं, जो दल समर्थित (किसी राजनीतिक दल द्वारा समर्थित) या स्वतंत्र (असंगठित समूहों द्वारा संचालित) हो सकते हैं।
🎯 Exam Tip: जन आंदोलन की परिभाषा, इसके विभिन्न स्वरूपों (दलीय और निर्दलीय) को उदाहरणों के साथ स्पष्ट करें।
Question 4. क्या आपपंचायत स्तर पर महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों पर आरक्षण के पक्ष में हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए ।
Answer: भारत में 73वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना की गई है। इस संविधान संशोधन द्वारा स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गई हैं। पंचायत स्तर पर महिलाओं के लिए आरक्षण की यह व्यवस्था सही है, क्योंकि-
1. यह संस्था तभी सफलतापूर्वक कार्य कर सकती है जब इसके संगठन में पुरुष और स्त्रियों दोनों को स्थान मिले ।
2. यदि स्त्रियों को पंचायतों में आरक्षण दिया जाता है तो पंचायत और अधिक लोकतान्त्रिक संस्था बनेगी तथा लोगों का उन पर विश्वास बना रहेगा। एक धारणा यह भी है कि स्त्रियाँ शारीरिक रूप से निर्बल होती हैं, इस कारण भी उनको अपनी सुरक्षा के लिए पंचायतों में आरक्षण दिया जाना चाहिए।
3. ग्रामीण स्तर पर महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बहुत कम है, यदि पंचायतों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की जाती हैं तो इससे राजनीति में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ेगी तथा उन्हें राजनीतिक शिक्षा भी मिलेगी ।
In simple words: हाँ, पंचायत स्तर पर महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों का आरक्षण सही है क्योंकि यह पंचायतों को अधिक समावेशी बनाता है, महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाता है, और उन्हें राजनीतिक शिक्षा व सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे ये संस्थाएं बेहतर कार्य कर पाती हैं।
🎯 Exam Tip: महिला आरक्षण के पक्ष में दिए गए तर्कों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें, जिसमें लोकतांत्रिक भागीदारी, सशक्तिकरण और संस्थागत प्रभाव पर जोर दिया गया हो।
Question 5. मण्डल आयोग के सम्बन्ध में आप क्या जानते हैं? मण्डल आयोग की प्रमुख सिफारिशों का उल्लेख कीजिए।
Answer: मण्डल आयोग-मण्डल आयोग का गठन 1 जनवरी, 1979 में किया गया। इस आयोग का मुख्य कार्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए वर्गों की पहचान करना तथा इनके विकास के लिए सुझाव देना था। मण्डल आयोग ने 13 दिसम्बर, 1980 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
मण्डल आयोग की प्रमुख सिफारिशें -
1. सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण होना चाहिए।
2. अन्य पिछड़ा वर्गों (OBC's) के कल्याण के लिए बनाए गए कार्यक्रम के लिए धन केन्द्र सरकार को देना चाहिए।
3. भूमि सुधार शीघ्र किए जाएँ ताकि छोटे किसानों को अमीर किसानों पर निर्भर न रहना पड़े।
4. अन्य पिछड़ा वर्गों को लघु उद्योग लगाने के लिए सहायता दी जाए तथा उन्हें प्रोत्साहित किया जाए।
5. अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए विशेष शिक्षा योजनाएँ लागू की जाएँ।
In simple words: मंडल आयोग का गठन 1979 में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करने और उनके विकास हेतु सुझाव देने के लिए किया गया था, और इसकी प्रमुख सिफारिशों में सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण, ओबीसी कल्याण कार्यक्रमों के लिए धन, भूमि सुधार और विशेष शिक्षा योजनाएं शामिल थीं।
🎯 Exam Tip: मंडल आयोग के गठन की तारीख, उसके उद्देश्य और उसकी प्रमुख सिफारिशों (विशेषकर 27% आरक्षण) को सटीक रूप से याद करें।
Question 6. भारत में लोकप्रिय जन-आन्दोलन से सीखे सबकों (पाठों) का मूल्यांकन कीजिए ।
Answer: जन-आन्दोलन के सबक
जन-आन्दोलनों के द्वारा पढ़ाए जाने वाले प्रमुख सबक निम्नलिखित हैं-
1. जन-आन्दोलन के द्वारा लोगों को लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिली है।
2. इन आन्दोलनों का उद्देश्य दलीय राजनीति की खामियों को दूर करना था। इस रूप में इन्हें देश की लोकतान्त्रिक राजनीति के अहम हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।
3. सामाजिक आन्दोलनों ने समाज के उन नए वर्गों की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को अभिव्यक्ति दी है जो अपनी समस्याओं को चुनावी राजनीति के माध्यम से हल नहीं कर पा रहे थे।
4. समाज के गहरे तनावों और जनता के क्षोभ को इन आन्दोलनों ने एक सार्थक दिशा दी है।
5. इन आन्दोलनों के सक्रिय भागीदारी के नए रूपों के प्रयोग ने भारतीय लोकतन्त्र के जनाधार को बढ़ाया है।
In simple words: जन आंदोलनों ने लोगों को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को समझने, दलीय राजनीति की कमियों को उजागर करने, नए सामाजिक वर्गों की समस्याओं को आवाज देने और जनता की भागीदारी बढ़ाकर भारतीय लोकतंत्र के जनाधार को मजबूत करने जैसे महत्वपूर्ण सबक सिखाए हैं।
🎯 Exam Tip: जन आंदोलनों के लोकतंत्र पर पड़े सकारात्मक प्रभावों (जैसे लोकतांत्रिक समझ, भागीदारी में वृद्धि, समस्याओं का प्रकटीकरण) को बिंदुवार समझाएं।
Question 7. नर्मदा बचाओ आन्दोलन की प्रमुख गतिविधियों को समझाइए ।
Answer: नर्मदा बचाओ आन्दोलन की प्रमुख गतिविधियाँ-
1. आन्दोलन के नेतृत्व ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि इन परियोजनाओं का लोगों के पर्यावास, आजीविका, संस्कृति तथा पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ा है।
2. प्रारम्भ में आन्दोलन ने परियोजना से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित सभी लोगों के समुचित पुनर्वास किए जाने की माँग रखी ।
3. बाद में इस आन्दोलन ने इस बात पर बल दिया कि ऐसी परियोजनाओं की निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय समुदाय की भागीदारी होनी चाहिए और जल, जंगल, जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर उनका प्रभावी नियन्त्रण होना चाहिए।
4. अब आन्दोलन बड़े बाँधों की खुली मुखालफत करता है।
5. आन्दोलन ने अपनी माँगे मुखर करने के लिए हरसम्भव लोकतान्त्रिक रणनीति का इस्तेमाल किया। यथा
• इसने अपनी बात न्यायपालिका से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय मंचों तक उठायी।
• इसके नेतृत्व ने सार्वजनिक रैलियों तथा सत्याग्रह जैसे तरीकों का भी प्रयोग किया।
• नवें दशक के अन्त तक आते-आते इससे कई अन्य आन्दोलन भी जुड़े और यह देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे सम धर्म आन्दोलनों के गठबन्धन का अंग बन गया।
In simple words: नर्मदा बचाओ आंदोलन ने बांध परियोजनाओं के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को उजागर किया, विस्थापितों के पुनर्वास, निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय भागीदारी, और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की मांग की, और इसके लिए न्यायपालिका, अंतर्राष्ट्रीय मंचों, रैलियों और सत्याग्रह जैसे लोकतांत्रिक तरीकों का उपयोग किया।
🎯 Exam Tip: नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रमुख गतिविधियों और उसकी संघर्ष रणनीतियों को विस्तार से समझाएं, जिसमें स्थानीय लोगों के अधिकारों और पर्यावरणीय संरक्षण पर उसके जोर को रेखांकित करें।
Question 8. महिला सशक्तीकरण की राष्ट्रीय नीति, 2001 के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए ।
Answer: राष्ट्रीय महिला सशक्तीकरण (2001) के उद्देश्य
राष्ट्रीय महिला सशक्तीकरण नीति, 2001 के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
1. सकारात्मक आर्थिक और सामाजिक नीतियों द्वारा ऐसा वातावरण तैयार करना जिसमें महिलाओं को अपनी पूर्ण क्षमता को पहचानने का मौका मिले और उनका पूर्ण विकास हो ।
2. महिलाओं द्वारा पुरुषों की भाँति राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नागरिक सभी क्षेत्रों में समान स्तर पर मानवीय अधिकारों और मौलिक स्वतन्त्रताओं का कानूनी और वास्तविक उपभोग ।
3. स्वास्थ्य देखभाल, प्रत्येक स्तर पर उन्नत शिक्षा, जीविका एवं व्यावसायिक मार्गदर्शन, रोजगार, समान पारिश्रमिक, सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक पदों आदि में महिलाओं को समान सुविधाएँ।
4. न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाकर महिलाओं के विरुद्ध होने वाले किसी भी प्रकार के अत्याचारों का उन्मूलन करना।
In simple words: महिला सशक्तिकरण की राष्ट्रीय नीति, 2001 का उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और नागरिक क्षेत्रों में पुरुषों के समान अधिकार, विकास के अवसर, उन्नत शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और अत्याचारों से मुक्ति प्रदान कर उनका पूर्ण विकास सुनिश्चित करना है।
🎯 Exam Tip: राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण नीति, 2001 के मुख्य उद्देश्यों को याद रखें, जिसमें महिलाओं के सर्वांगीण विकास और विभिन्न क्षेत्रों में समान अधिकारों पर जोर दिया गया है।
Question 9. महिला सशक्तीकरण के साधन के रूप में संसद और राज्य विधानसभाओं में सीटों के आरक्षण की व्यवस्था का परीक्षण कीजिए।
Answer: महिला सशक्तीकरण के लिए यह आवश्यक है कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाया जाए। प्रायः सभी राजनीतिक दल, महिला संघ व सामाजिक संगठन निरन्तर इस बात पर बल देते रहे हैं कि जब तक स्थानीय संस्थाओं, विधानमण्डलों और संसद में महिलाओं के लिए स्थान सुरक्षित नहीं किए जाते तब तक महिलाओं की स्थिति में सुधार नहीं हो सकता।
73वें-74वें संविधान संशोधन द्वारा ग्रामीण एवं शहरी स्थानीय संस्थाओं में महिलाओं के लिए कुल निर्वाचित पदों का एक-तिहाई भाग आरक्षित किया गया है। इसमें महिला सशक्तीकरण आन्दोलन को बल मिला। संसद और राज्य विधानमण्डलों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई स्थान सुरक्षित रखने के कई बार प्रयास किए जा चुके हैं लेकिन इसमें सफलता प्राप्त नहीं हुई है।
In simple words: महिला सशक्तिकरण के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं में सीटों का आरक्षण महत्वपूर्ण है, और हालांकि 73वें-74वें संविधान संशोधन के तहत स्थानीय निकायों में एक-तिहाई आरक्षण दिया गया है, संसद और राज्य विधानसभाओं में यह अभी तक लागू नहीं हो पाया है, जिससे राजनीतिक भागीदारी में कमी बनी हुई है।
🎯 Exam Tip: महिला सशक्तिकरण के लिए राजनीतिक भागीदारी के महत्व को समझाएं और स्थानीय निकायों में आरक्षण की सफलता की तुलना संसद और राज्य विधानसभाओं में आरक्षण की चुनौतियों से करें।
Question 10. भारत में पर्यावरण सुरक्षा हेतु क्या-क्या कदम उठाए जा रहे हैं? स्पष्ट कीजिए।
Answer: पर्यावरणीय सुरक्षा आन्दोलन भारत में पर्यावरण की सुरक्षा हेतु अनेक कदम उठाए जा रहे हैं, जिनमें प्रमुख हैं-
1. स्वतन्त्र भारत में वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए अनेक स्थानों पर अभयारण्यों की स्थापना की गई और इन अभयारण्यों में सभी प्रकार के जीवों की सुरक्षा की व्यवस्था की गई, जिससे जंगलों की संख्या बढ़े और वातावरण स्वच्छ हो ।
2. पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी गई तथा सर्वत्र वृक्षारोपण कार्य प्रारम्भ किया गया। वृक्षों की कटाई रोकने के लिए उत्तर प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में चिपको आन्दोलन चलाया गया।
3. सिंचाई के लिए विभिन्न बाँधों की व्यवस्था की गई, इन बाँधों में सिंचाई एवं विद्युत उत्पादन दोनों कार्य चलने लगे।
4. भारत में विकास की क्रान्ति के सन्दर्भ में कृषि क्षेत्र में हरित क्रान्ति का नारा दिया गया और अन्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त की गई।
In simple words: भारत में पर्यावरण सुरक्षा के लिए वन्यजीव अभयारण्यों की स्थापना, पेड़ों की कटाई पर रोक (जैसे चिपको आंदोलन), वृक्षारोपण, सिंचाई और विद्युत उत्पादन के लिए बांधों का निर्माण, और हरित क्रांति के माध्यम से कृषि विकास जैसे कई कदम उठाए गए हैं।
🎯 Exam Tip: पर्यावरण सुरक्षा के लिए भारत सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों (वन्यजीव संरक्षण, वृक्षारोपण, जल संसाधन प्रबंधन, हरित क्रांति) को सूचीबद्ध करें और प्रत्येक के योगदान को समझाएं।
अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तार
Question 1. चिपको आन्दोलन का मुख्य पहलू क्या था?
Answer: चिपको आन्दोलन का मुख्य पहलू जंगल के वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई को रोकना था।
In simple words: चिपको आंदोलन का मुख्य उद्देश्य पेड़ों की अंधाधुंध कटाई को रोकना और वनों की रक्षा करना था।
🎯 Exam Tip: चिपको आंदोलन के मूल उद्देश्य को संक्षिप्त और स्पष्ट रूप से बताएं।
Question 2. 'दलित पैंथर्स' क्या था?
Answer: दलित हितों की दावेदारी के क्रम में महाराष्ट्र में सन् 1972 में दलित युवाओं का एक संगठन 'दलित पैंथर्स' बना ।
In simple words: दलित पैंथर्स 1972 में महाराष्ट्र में गठित दलित युवाओं का एक संगठन था, जिसका उद्देश्य दलितों के हितों की रक्षा करना था।
🎯 Exam Tip: दलित पैंथर्स के गठन वर्ष और उसके प्राथमिक उद्देश्य को याद रखें।
Question 3. 'ताड़ी विरोधी आन्दोलन' क्या था?
Answer: आन्ध्र प्रदेश के नेल्लौर जिले में दुबरगंटा गाँव की महिलाओं द्वारा ताड़ी (शराब) की बिक्री के विरोध में किए गए आन्दोलन को 'ताड़ी विरोधी आन्दोलन' कहा जाता है।
In simple words: ताड़ी विरोधी आंदोलन आंध्र प्रदेश के नेल्लौर जिले में महिलाओं द्वारा ताड़ी (शराब) की बिक्री के खिलाफ चलाया गया एक सामाजिक आंदोलन था।
🎯 Exam Tip: ताड़ी विरोधी आंदोलन का स्थान और उसके मुख्य उद्देश्य को याद रखें।
Question 4. सरदार सरोवर परियोजना को कब और कहाँ प्रारम्भ किया गया था?
Answer: 1980 दशाब्दी के प्रारम्भ में सरदार सरोवर परियोजना को नर्मदा घाटी में प्रारम्भ किया गया था।
In simple words: सरदार सरोवर परियोजना 1980 के दशक की शुरुआत में नर्मदा घाटी में प्रारम्भ की गई थी।
🎯 Exam Tip: सरदार सरोवर परियोजना के प्रारंभ का दशक और स्थान याद रखें।
Question 5. पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित किन्हीं दो आन्दोलनों के नाम बताइए।
Answer:
1. चिपको आन्दोलन,
2. नर्मदा बचाओ आन्दोलन ।
In simple words: चिपको आंदोलन और नर्मदा बचाओ आंदोलन पर्यावरण संरक्षण से जुड़े दो प्रमुख आंदोलन हैं।
🎯 Exam Tip: पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कम से कम दो महत्वपूर्ण आंदोलनों के नाम याद रखें।
Question 6. तिभागा आन्दोलन क्या था?
Answer: तिभागा आन्दोलन सन् 1947-48 में बंगाल में प्रारम्भ हुआ। यह आन्दोलन मुख्यतः जोतदारों के विरुद्ध मझोले किसानों और बटाईदारों का संयुक्त प्रयास था।
In simple words: तिभागा आंदोलन 1947-48 में बंगाल में शुरू हुआ एक किसान आंदोलन था, जिसका उद्देश्य जोतदारों के खिलाफ मझोले किसानों और बटाईदारों के अधिकारों की रक्षा करना था।
🎯 Exam Tip: तिभागा आंदोलन के समय, स्थान और मुख्य उद्देश्य को याद रखें।
Question 7. किन्हीं दो किसान आन्दोलनों के नाम बताइए।
Answer:
1. तिभागा आन्दोलन,
2. तेलंगाना आन्दोलन।
In simple words: तिभागा आंदोलन और तेलंगाना आंदोलन भारत के दो प्रमुख किसान आंदोलन हैं।
🎯 Exam Tip: कम से कम दो महत्वपूर्ण किसान आंदोलनों के नाम याद रखें।
Question 8. दलित पैंथर्स के उद्देश्य बताइए । (कोई दो)
Answer: दलित पैंथर्स के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे-
1. जाति आधारित असमानता को समाप्त करना।
2. भौतिक साधनों के मामले में अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ संघर्ष करना।
In simple words: दलित पैंथर्स का मुख्य उद्देश्य जाति आधारित असमानता को समाप्त करना और दलितों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ संघर्ष करना था।
🎯 Exam Tip: दलित पैंथर्स के किन्हीं दो प्रमुख उद्देश्यों को याद रखें और संक्षेप में समझाएं।
Question 9. पर्यावरण संरक्षण आन्दोलन से सम्बन्धित किन्हीं दो प्रमुख व्यक्तियों के नाम लिखिए।
Answer:
1. सुन्दरलाल बहुगुणा,
2. मेधा पाटकर ।
In simple words: सुन्दरलाल बहुगुणा और मेधा पाटकर पर्यावरण संरक्षण आंदोलनों से जुड़े दो प्रमुख व्यक्ति हैं।
🎯 Exam Tip: पर्यावरण संरक्षण आंदोलनों से जुड़े किन्हीं दो प्रसिद्ध व्यक्तियों के नाम याद रखें।
Question 10. औपनिवेशिक दौर के प्रमुख आन्दोलन कौने-से थे?
Answer: औपनिवेशिक दौर के प्रमुख आन्दोलन थे-किसान आन्दोलन, मजदूर संगठनों के आन्दोलन, आदिवासी आन्दोलन तथा स्वाधीनता आन्दोलन ।
In simple words: औपनिवेशिक काल के प्रमुख आंदोलन किसान, मजदूर संगठन, आदिवासी और स्वतंत्रता आंदोलन थे।
🎯 Exam Tip: औपनिवेशिक दौर के किन्हीं तीन से चार प्रमुख आंदोलनों के नाम याद रखें।
Question 11. महिला सशक्तीकरण से क्या आशय है?
Answer: महिला सशक्तीकरण से आशय महिलाओं की समाज में दोयम दर्जे की भूमिका को समाप्त करना तथा समाज की मुख्यधारा के साथ जोड़ते हुए सभी क्षेत्रों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने से है।
In simple words: महिला सशक्तिकरण का अर्थ है महिलाओं को समाज में समान दर्जा दिलाना, उन्हें मुख्यधारा में लाना और सभी क्षेत्रों में उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना।
🎯 Exam Tip: महिला सशक्तिकरण की परिभाषा को संक्षिप्त और स्पष्ट रूप से बताएं, जिसमें समानता और भागीदारी पर जोर दिया गया हो।
Question 12. एन०एफ०एफ० तथा बी०के०यू० का पूरा नाम बताइए।
Answer:
1. एन०एफ०एफ० (NFF)-नेशनल फिश वर्कर्स फोरम (National Fish Workers Forum)
2. बीकेयू (BKU)-भारतीय किसान यूनियन ।
In simple words: NFF का पूरा नाम नेशनल फिश वर्कर्स फोरम है और BKU का पूरा नाम भारतीय किसान यूनियन है।
🎯 Exam Tip: दिए गए संक्षिप्ताक्षरों (NFF और BKU) के पूर्ण रूपों को याद रखें।
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
Question 1. अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना किस वर्ष हुई-
(a) सन् 1967 में
(b) सन् 1936 में
(c) सन् 1944 में
(d) सन् 1954 में ।
Answer: (b) सन् 1936 में
In simple words: अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना वर्ष 1936 में हुई थी।
🎯 Exam Tip: अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना के वर्ष को सही ढंग से याद करें।
Question 2. सूचना के अधिकार का आन्दोलन किस सन में प्रारम्भ हुआ-
(a) सन् 1980 में
(b) सन् 1984 में
(c) सन् 1988 में
(d) सन् 1990 में।
Answer: (d) सन् 1990 में।
In simple words: सूचना के अधिकार का आंदोलन 1990 में शुरू हुआ था।
🎯 Exam Tip: सूचना के अधिकार आंदोलन के प्रारंभ वर्ष को याद रखें।
Question 3. चिपको आन्दोलन की शुरुआत किस राज्य से हुई-
(a) उत्तराखण्ड
(b) छत्तीसगढ़
(c) झारखण्ड
(d) राजस्थान ।
Answer:
(a) उत्तराखण्ड।
In simple words: चिपको आंदोलन की शुरुआत उत्तराखंड राज्य में हुई थी।
🎯 Exam Tip: चिपको आंदोलन के उद्गम राज्य का नाम याद रखें।
Question 4. गोवा मुक्ति संग्राम का प्रमुख कार्यकर्ता था-
(a) लाल डेंगा
(b) मोहन रानाडे
(c) सुभाष धीसिंह
(d) महेन्द्र सिंह टिकैत ।
Answer: (b) मोहन रानाडे
In simple words: मोहन रानाडे गोवा मुक्ति संग्राम के प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक थे।
🎯 Exam Tip: गोवा मुक्ति संग्राम से संबंधित प्रमुख व्यक्ति का नाम याद रखें।
Question 5. किस वर्ष स्टॉकहोम में मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन हुआ था-
(a) सन् 1962 में
(b) सन् 1967 में
(c) सन् 1970 में
(d) सन् 1972 में।
Answer: (d) सन् 1972 में।
In simple words: स्टॉकहोम में मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन 1972 में आयोजित हुआ था।
🎯 Exam Tip: स्टॉकहोम सम्मेलन के वर्ष को याद रखें, जो पर्यावरण आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है।
Question 6. काका कालेलकर आयोग का गठन किया गया-
(a) सन् 1950 में
(b) सन् 1953 में
(c) सन् 1956 में
(d) सन् 1961 में।
Answer: (b) सन् 1953 में।
In simple words: काका कालेलकर आयोग का गठन 1953 में हुआ था।
🎯 Exam Tip: काका कालेलकर आयोग के गठन के वर्ष को सही ढंग से याद करें।
Question 7. दलित पैंथर्स का गठन किया गया-
(a) सन् 1970 में
(b) सन् 1972 में
(c) सन् 1974 में
(d) सन् 1978 में।
Answer: (b) सन् 1972 में ।
In simple words: दलित पैंथर्स का गठन वर्ष 1972 में हुआ था।
🎯 Exam Tip: दलित पैंथर्स के गठन वर्ष को याद रखें।
Question 8. ताड़ी विरोधी आन्दोलन से सम्बन्धित राज्य था-
(a) राजस्थान
(b) महाराष्ट्र
(c) उत्तर प्रदेश
(d) आन्ध्र प्रदेश ।
Answer: (d) आन्ध्र प्रदेश ।
In simple words: ताड़ी विरोधी आंदोलन आंध्र प्रदेश राज्य से संबंधित था।
🎯 Exam Tip: ताड़ी विरोधी आंदोलन से संबंधित राज्य का नाम याद रखें।
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