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Detailed Chapter 4 संस्कृति और समाजीकरण UP Board Solutions for Class 11 Sociology
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Class 11 Sociology Chapter 4 संस्कृति और समाजीकरण UP Board Solutions PDF
UP Board Solutions For Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 4 Culture And Socialisation
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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर
Question 1. सामाजिक विज्ञान में संस्कृति की समझ, दैनिक प्रयोग के शब्द संस्कृति से कैसे भिन्न है?
Answer: 'संस्कृति' समाजशास्त्र की शब्दावली में प्रयुक्त की जाने वाली एक विशिष्ट संकल्पना है। इस नाते इसका एक सुस्पष्ट अर्थ है, जो इस संकल्पना के दैनिक प्रयोग में लगाए गए अर्थ से भिन्न होता है। रोजमर्रा की बातों अथवा दैनिक प्रयोग में 'संस्कृति' शब्द को कला तक सीमित कर दिया जाता है। अथवा इसका अर्थ कुछ वर्गों या देशों की जीवन-शैली से लगाया जाता है। कला के रूप में संस्कृति शब्द का प्रयोग शास्त्रीय संगीत, नृत्य अथवा चित्रकला में परिष्कृत रुचि का ज्ञान प्राप्त करने के संदर्भ में किया जाता है। यह परिष्कृत रुचि लोगों को असांस्कृतिक अर्थात् आम लोगों से भिन्न करती है। समाजशास्त्र में संस्कृति को व्यक्तियों में विभेद करने वाला साधन नहीं माना जाता है, अपितु इसे जीवन जीने का एक तरीका माना जाता है जिसमें समाज के सभी सदस्य भाग लेते हैं। टायलर (Tylor) ने संस्कृति की एक विस्तृत परिभाषा देते हुए लिखा है, “संस्कृति वह जटिल संपूर्ण व्यवस्था है जिसमें समस्त ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, प्रथाएँ तथा अन्य समस्त क्षमताएँ एवं आदतें सम्मिलित हैं जिन्हें व्यक्ति समाज का सदस्य होने के नाते प्राप्त करता है। इसी भाँति, मैलिनोव्स्की (Malinowski) के शब्दों में, “संस्कृति में उत्तराधिकार में प्राप्त कलाकृतियाँ, वस्तुएँ, तकनीकी प्रक्रिया, विचार, आदतें तथा मूल्य सम्मिलित होते हैं। इन विद्वानों द्वारा सूचीबद्ध वस्तुओं की प्रकृति भौतिक एवं अभौतिक दोनों प्रकार की है। भौतिक वस्तुओं को सभ्यता कहा जाता है तथा यह संस्कृति का भौतिक पक्ष है। अभौतिक पक्ष मूल्यों, ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है।In simple words: संस्कृति की समझ सामाजिक विज्ञान में अधिक व्यापक और विशिष्ट है, जहाँ इसे जीवन जीने का एक तरीका माना जाता है जिसमें समाज के सभी सदस्य शामिल होते हैं, जबकि दैनिक जीवन में यह अक्सर कला या जीवन-शैली तक सीमित रहती है। यह व्यक्तिगत भेदभाव का साधन नहीं, बल्कि एक साझा व्यवस्था का हिस्सा है।
🎯 Exam Tip: संस्कृति की समाजशास्त्रीय परिभाषाओं और उसके दैनिक उपयोग के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझाना महत्वपूर्ण है, विशेषकर टायलर और मैलिनोव्स्की जैसे विद्वानों के योगदान का उल्लेख करना।
Question 2. हम कैसे दर्शा सकते हैं कि संस्कृति के विभिन्न आयाम मिलकर समग्र बनाते हैं।
Answer: संस्कृति के तीन प्रमुख आयाम होते हैं-संज्ञानात्मक, आदर्शात्मक (मानकीय) तथा भौतिक । संज्ञानात्मक आयाम को संदर्भ हमारे द्वारा देखे या सुने गए को व्यवहार में लाकर उसे अर्थ प्रदान करने की प्रक्रिया से हैं। किसी नेता की कार्टून की पहचान करना अथवा अपने मोबाइल फोन की घंटी को पहचानना इसके उदाहरण हैं। आदर्शात्मक आयाम का संबंध आचरण के नियमों से हैं। अन्य व्यक्तियों के पत्रों को न खोलना, निधन पर अनुष्ठानों का निष्पादन करना ऐसे ही आचरण के नियम हैं। भौतिक आयाम में भौतिक साधनों के प्रयोग संबंधों क्रियाकलाप सम्मिलित होते हैं। इंटरनेट पर चैटिंग करना इसका उदाहरण है। इन तीनों आयामों के समग्र से ही संस्कृति का निर्माण होता है। व्यक्ति अपनी पहचान अपनी संस्कृति से ही करता है तथा संस्कृति के आधार पर ही अपने को अन्य संस्कृतियों के लोगों से अलग समझता है।In simple words: संस्कृति संज्ञानात्मक (समझना), आदर्शात्मक (नियम) और भौतिक (वस्तुएँ) जैसे तीन आयामों से मिलकर बनती है। ये तीनों पहलू मिलकर एक व्यक्ति की पहचान बनाते हैं और उसे अन्य संस्कृतियों से अलग करते हैं, जिससे एक पूर्ण सांस्कृतिक ढाँचा तैयार होता है।
🎯 Exam Tip: संस्कृति के तीनों आयामों (संज्ञानात्मक, आदर्शात्मक और भौतिक) को स्पष्ट उदाहरणों के साथ समझाना और यह बताना कि वे कैसे एक साथ मिलकर एक समग्र संस्कृति का निर्माण करते हैं, उच्च अंक प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 3. उन दो संस्कृतियों की तुलना करें जिनसे आप परिचित हों। क्या अनृजातीयता (नृजातीय नहीं बनना) कठिन नहीं है?
Answer: व्यक्ति अपनी पहचान अपनी संस्कृति से करता है। समान भाषा, क्षेत्र, धर्म, प्रजाति, अंतर्विवाह, रीति-रिवाज और धार्मिक विश्वासों के आधार पर बने सांस्कृतिक समूहों को नृजातीय समूह भी कहा जाता है। प्रत्येक नृजातीय समूह की अपनी नृजातीय अस्मिता होती है जिसका अर्थ समानता और अनन्यता से है। एक ओर, नृजातीय अस्मिता इस बात की ओर संकेत करती है कि- नृजातीय समूहों के सदस्यों में कौन-सी विशेषताएँ समान हैं तथा दूसरी ओर, इससे उन विशेषताओं का भी पता चलता है जो उन्हें दूसरे नृजातीय समूह से अलग करती है। जब हम दो संस्कृतियों की तुलना करते हैं तो हम दो नृजातीय समूहों में भेद करने का प्रयास करते हैं। उदाहरणार्थ-जब हम हिंदु संस्कृति की तुलना मुस्लिम संस्कृति से करने का प्रयास करते हैं तो दोनों में नृजातीय समानता एवं असमानता का पता लगाने का प्रयास करते हैं। चूँकि नृजातीय अस्मिता ही संस्कृति की पहचान होती है। इसलिए अनुजातीयता अर्थात् नृजातीय नहीं बनना बहुत कठिन होता है। वस्तुतः राष्ट्रीयता, भाषा, धर्म, क्षेत्र, प्रजाति, जाति, अहम् आदि की भावनाएँ नृजातीयता से जुड़ी होती हैं। इन्हें छोड़कर दो नृजातीय समूह या दो संस्कृतियों के लोग एक हों जाएँ, ऐसा असंभव तो नहीं है परंतु अत्यधिक कठिन है। जनजातियों में विभिन्न संस्कृतियों में आमनप्रदान से जनजातीय अस्मिता कम हुई है तथा सात्मीकरण की प्रक्रिया द्वारा अनेक जनजातियाँ अपनी संस्कृति खोकर हिंदू संस्कृति में आत्मसात् कर दी गई हैं।In simple words: अपनी नृजातीय पहचान को बनाए रखना कठिन होता है क्योंकि यह भाषा, धर्म और रीति-रिवाजों जैसे सांस्कृतिक तत्वों से गहराई से जुड़ी होती है। दो भिन्न संस्कृतियों की तुलना करते समय, हम अक्सर समानताओं और असमानताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जिससे अनृजातीयता (अपनी नृजातीय पहचान को छोड़ना) एक चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया बन जाती है।
🎯 Exam Tip: नृजातीयता की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए दो संस्कृतियों की तुलना के माध्यम से अनृजातीयता की कठिनाई को समझाना और उदाहरणों से समर्थन देना महत्वपूर्ण है।
Question 4. सांस्कृतिक परिवर्तनों का अध्ययन करने के लिए दो विभिन्न उपागमों की चर्चा करें ।
Answer: संस्कृति के विभिन्न पक्षों में होने वाले परिवर्तन को सांस्कृतिक परिवतर्न कहते हैं। सांस्कृतिक परिवर्तन समाज के आदर्शों और मूल्यों की व्यवस्था में होने वाला परिवर्तन है। सांस्कृतिक परिवर्तन वह तरीका है जिसके द्वारा समाज अपनी संस्कृति के प्रतिमानों को बदलता है। रूथ बेनेडिक्ट (Ruth Benedict) ने संस्कृति के प्रतिमानों की चर्चा करते हुए स्पष्ट लिखा है कि उनमें परिवर्तन सदैव होते रहते हैं। उन्हीं के शब्दों में, “हमें याद रखना चाहिए कि परिवर्तन से, चाहे उसमें कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, बचा नहीं जा सकता।” सांस्कृतिक परिवर्तन की संकल्पना सामाजिक परिवर्तन की संकल्पना से अधिक विस्तृत मानी जाती है। डेविस (Davis) के अनुसार, सामाजिक परिवर्तन, वास्तव में, सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं अपितु इसका एक अंग है। सांस्कृतिक परिवर्तन के अंतर्गत संस्कृति की किसी भी शाखा, जैसे कला, विज्ञान, दर्शन तथा तकनीकी में परिवर्तन को सम्मिलित किया जा सकता है।' भौतिक संस्कृति में परिवर्तन यद्यपि सामाजिक परिवर्तन ला सकता है परंतु वह स्वयं सामाजिक परिवर्तन नहीं है। सांस्कृतिक परिवर्तन संस्कृति से संबंधित होते हैं, सार्वभौम होते हैं, इनका क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत होता है, इनकी प्रकृति जटिल होती है तथा सभी समाजों में इनकी गति एक समान नहीं होती । सांस्कृतिक परिवर्तन का अध्ययन करने की दो पद्धतियाँ 'सर्वसम्मत समाधन की पद्धति' तथा 'संघर्ष की पद्धति है। पहली पद्धति के अंतर्गत सांस्कृतिक अंत: संबंधों को प्रकार्यात्मक परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है। आत्मसात् करने का सिद्धांत, जिसे मैल्टिग पॉट का सिद्धांत भी कहा जाता है, इसका उदाहरण है। इस सिद्धांत के अनुसार एक समूह अपनी सांस्कृतिक अस्मिता खोकर दूसरे सांस्कृतिक समूह में पूर्णतः आत्मसात हो जाता है। संघर्ष की पद्धति सांस्कृतिक समूहों को हित समूह के रूप में देखती है जो सदैव असमानता की स्थिति में होते हैं तथा किसी समान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। दक्षिण अफ्रीका में गोरे लोगों द्वारा काले लोगों से प्रजातीय भेदभाव अथवा श्रीलंका में अप्रवासी तमिलों और स्थानीय सिंहलियों के बीच धार्मिक संघर्ष सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित संघर्ष ही हैं।In simple words: सांस्कृतिक परिवर्तन समाज के आदर्शों, मूल्यों और प्रतिमानों में होने वाले बदलाव हैं, जिनका अध्ययन दो मुख्य उपागमों- सर्वसम्मत समाधान पद्धति और संघर्ष पद्धति से किया जाता है। सर्वसम्मत समाधान पद्धति संस्कृतियों के आत्मसात होने को देखती है, जबकि संघर्ष पद्धति असमानता और समान उद्देश्यों के लिए समूहों के बीच प्रतिस्पर्धा पर केंद्रित है।
🎯 Exam Tip: सांस्कृतिक परिवर्तन की परिभाषा, इसकी सार्वभौमिक प्रकृति और अध्ययन के दो उपागमों (सर्वसम्मत समाधान और संघर्ष) को उदाहरणों के साथ समझाना उत्तर को अधिक प्रभावी बनाता है।
Question 5. क्या विश्वव्यापीकरण को आप आधुनिकता से जोड़ते हैं? नृजातीयता का प्रेक्षण करें तथा उदाहरण दें।
Answer: नृजातीयता में सांस्कृतिक श्रेष्ठता की भावना निहित होती है। नृजातीयता का प्रयोग अपने सांस्कृतिक मूल्यों का अन्य संस्कृतियों के लोगों के व्यवहार तथा आस्थाओं के मूल्यांकन करने के लिए। किया जाता है। प्रत्येक नृजातीय समूह अपने सांस्कृतिक मूल्यों को अन्य समूहों के सांस्कृतिक मूल्यों से श्रेष्ठ मानता है। इसी भावना के कारण नृजातीयता की भावना को विश्व-बंधुत्व एवं विश्वव्यापीकरण के विपरीत माना जाता है विश्वव्यापीकरण में व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के मूल्यों एवं आस्थाओं का मूल्यांकन अपने मूल्यों एवं आस्थाओं के अनुसार नहीं करता । विश्वव्यापीकरण विभिन्न सांस्कृतिक प्रवृत्तियों को मान्यता प्रदान करता है तथा इन्हें अपने अंदर समायोजित करता है। इसमें संस्कृति को समृद्ध बनाने हेतु सांस्कृतिक विनिमय तथा लेम-देन पर भी बल दिया जाता है। विश्वव्यापीकरण को निश्चित रूप से आधुनिकता के साथ जोड़ा जा सकता है क्योंकि एक आधुनिक समाज सांस्कृतिक विभिन्नता का प्रशंसक होता है तथा बाहर से पड़ने वाले सांस्कृतिक प्रभावों के लिए अपने दरवाजे बंद नहीं करता। ऐसे सभी प्रभावों को सदैव इस प्रकार सम्मिलित किया जाता है कि ये देशीय संस्कृति के तत्त्वों के साथ मिल सकें। एक विश्वव्यापी पर्यवेक्षण प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संस्कृति को विभिन्न प्रभावों द्वारा सशक्त करने की स्वतंत्रता देता है।In simple words: विश्वव्यापीकरण को आधुनिकता से जोड़ा जा सकता है क्योंकि यह सांस्कृतिक विभिन्नता को स्वीकार करता है और बाहरी प्रभावों को स्थानीय संस्कृति में समाहित करता है। इसके विपरीत, नृजातीयता में सांस्कृतिक श्रेष्ठता की भावना होती है, जो अपने मूल्यों को दूसरों से बेहतर मानती है और विश्वबंधुत्व के विपरीत है, जबकि विश्वव्यापीकरण सांस्कृतिक विनिमय को बढ़ावा देता है।
🎯 Exam Tip: विश्वव्यापीकरण और आधुनिकता के संबंध को स्पष्ट करना, नृजातीयता की अवधारणा से इसका अंतर बताना और सांस्कृतिक विनिमय पर विश्वव्यापीकरण के प्रभावों को उदाहरणों के साथ समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 6. आपके अनुसार आपकी पीढी के लिए समाजीकरण का सबसे प्रभावी अभिकरण क्या है? यह पहले अलग कैसे था, आप इस बारे में क्या सोचते हैं।
Answer: समाजीकरण का अर्थ सीखने की उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा व्यक्ति को एक सामाजिक प्राणी बनाया जाता है तथा जिससे वह सांस्कृतिक मूल्यों का आंतरीकरण करता है। बच्चे का सामाजीकरण अनेक अभिकरणों एवं संस्थाओं द्वारा किया जाता है जिनमें वह भाग लेता है। परिवार, विद्यालय, समकक्ष समूह, पड़ोस, व्यावसायिक समूह तथा सामाजिक वर्ग/जाति, धर्म आदि ऐसे ही प्रमुख अभिकरण हैं। पहले कभी परिवार को समाजीकरण का प्रमुख माध्यम माना जाता था। यद्यपि आज भी समाजीकरण में परिवार को अत्यंत महत्त्व है, तथापि जन माध्यमों को आज समाजीकरण का सबसे प्रभावी अभिकरण माना जाने लगा है। इन माध्यमों में टेलीविजन प्रमुख है। बच्चा माता-पिता एवं परिवार के अन्य सदस्यों तथा समकक्ष समूह से बहुत-सी बातों को सीखता ही है, टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले कार्टूनों एवं बच्चों के लिए कार्यक्रमों का भी उस पर गहरा प्रभाव पड़ता है। बहुत-से शब्द, खान-पान के ढंग एवं बातचीत के तरीके आज बच्चे टेलीविजन के माध्यम से सीखने लगे हैं। ब्रिटेन में हुए एक अध्ययन में पाया गया है कि बच्चों द्वारा टेलीविजन देखने पर व्यय किया गया समय एक साल में एक सौ स्कूली दिवसों के समान है तथा इसमें बड़े भी पीछे नहीं हैं। टेलीविजन के परदे पर हिंसा तथा बच्चों के बीच आक्रमण व्यवहार में संबंध की पुष्टि भी अनेक अध्ययनों से हुई है।In simple words: मेरी पीढ़ी के लिए समाजीकरण का सबसे प्रभावी अभिकरण टेलीविजन और अन्य जन माध्यम हैं, जबकि पहले परिवार प्राथमिक अभिकरण था। अब बच्चे इन माध्यमों से भाषा, व्यवहार और सामाजिक मूल्यों को सीखते हैं, जो हिंसा जैसे नकारात्मक प्रभावों को भी जन्म दे सकते हैं, जिससे समाजीकरण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव आया है।
🎯 Exam Tip: समाजीकरण की अवधारणा को स्पष्ट करें और अपनी पीढ़ी के लिए सबसे प्रभावी अभिकरण (जैसे टेलीविजन) को पूर्ववर्ती अभिकरणों (जैसे परिवार) से तुलना करके बताएं, साथ ही इसके सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों पर भी चर्चा करें।
क्रियाकलाप आधारित प्रश्नोत्तर
Question 1. आप किसी अन्य व्यक्ति को अपनी संस्कृति में कैसे अभिवादन करेंगे? (क्रियाकलाप 1)
Answer: प्रत्येक संस्कृति में दूसरे का अभिवादन करने का अपना एक विशिष्ट ढंग होता है। भारतीय संस्कृति में बड़ों के पैर छूकर या हाथ जोड़कर नमस्ते द्वारा उनका अभिवादन किया जाता है। हमउम्र में अब मुस्कराकर, हाथ मिलाकर, हैलो कहकर भी अभिवादन किया जाने लगा है। पश्चिमी देशों में अभिवादन को ढंग बिना आयु के भेदभाव के हाथ मिलाने का है। यदि आप किसी अंग्रेज का हाथ जोड़कर अभिवादन करते हैं तो हो सकता है वह भारतीय संस्कृति के इस ढंग से अनभिज्ञ होने के नाते इसका अर्थ न समझ पाए । उसे इसका अर्थ बताने पर यही समझ में आएगा कि भारतीय संस्कृति में बड़ों का अभिवादन इसी ढंग से किया जाता है।In simple words: भारतीय संस्कृति में बड़ों का अभिवादन पैर छूकर या नमस्ते करके किया जाता है, जबकि हमउम्र लोगों के लिए मुस्कुराना, हाथ मिलाना या 'हैलो' कहना आम है। पश्चिमी संस्कृति में उम्र के भेदभाव के बिना हाथ मिलाना सामान्य है, और विभिन्न संस्कृतियों में अभिवादन के तरीकों को समझना महत्वपूर्ण है।
🎯 Exam Tip: विभिन्न संस्कृतियों में अभिवादन के तरीकों की विविधता को स्पष्ट करें और यह बताएं कि सांस्कृतिक संदर्भों को समझे बिना किस प्रकार गलतफहमी हो सकती है।
Question 2. अपने क्षेत्र के अतिरिक्त कम-से कम किसी एक क्षेत्र के बारे में पता लगाएँ कि प्राकृतिक वातावरण खाने-पीने की आदतों, रहने के ढंग, कपड़ों तथा देवी-देवताओं की पूजा करने के तरीकों को कैसे प्रभावित करता है? (क्रियाकलाप 2)
Answer: यदि हम अपने निकटवर्ती पर्वतीय स्थलों पर रहने वाले लोगों को देखें तो भिन्न प्राकृतिक पर्यावरण के प्रभावों को सरलता से समझ सकते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोग सर्दी होने के कारण या बर्फ पड़ने के कारण खाने में दाल, सब्जी के अतिरिक्त अंडों एवं मांस का सेवन भी काफी मात्रा में करते हैं। वे सोचते हैं कि मांसाहारी खाना उनके शरीर को गर्म रखने में अधिक सक्षम होता है। रहने के ढंग में भी अंतर स्पष्ट देखा जा सकता है। उनके मकानों की बनावट भिन्न होती है तथा पहाड़ी लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर पैदल ही जाते हैं क्योंकि रिक्शा-ताँगे न तो उपलब्ध होते हैं और न ही वे पहाड़ी क्षेत्रों में चल सकते हैं। सर्दी से बचने के लिए वे गर्म कपड़ों का इस्तेमाल अधिक करते हैं। कठिन जीवन होने के कारण ऐसा ही माना जाता है कि पहाड़ों पर रहने वाले अधिक धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं। वे देवी-देवताओं पर अधिक विश्वास करते हैं।In simple words: पहाड़ी क्षेत्रों का प्राकृतिक वातावरण लोगों के खाने-पीने की आदतों, रहन-सहन, कपड़ों और धार्मिक विश्वासों को प्रभावित करता है। ठंड के कारण वे मांस और अंडे का सेवन अधिक करते हैं, उनके मकान विशेष रूप से बने होते हैं, वे पैदल यात्रा करते हैं, गर्म कपड़े पहनते हैं और कठिन जीवन के कारण अधिक धार्मिक होते हैं।
🎯 Exam Tip: प्राकृतिक वातावरण और सांस्कृतिक प्रथाओं के बीच संबंध को उदाहरणों के साथ स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है, यह दर्शाते हुए कि कैसे भौगोलिक कारक जीवन-शैली के विभिन्न पहलुओं को आकार देते हैं।
Question 3. भारतीय भाषाओं में संस्कृति शब्द के समतुल्य शब्दों की पहचान कीजिए। वे किस प्रकार से संबंधित हैं? (क्रियाकलाप 3)
Answer: 'संस्कृति' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-'सम' तथा 'कृति' । संस्कृत में 'सम' उपसर्ग का अर्थ है 'अच्छा' तथा 'कृति' शब्द का अर्थ है 'करना'। इस अर्थ में यह 'संस्कार' का समानार्थक है। हिंदू जीवन में जन्म से मृत्यु तक अनेक संस्कार होते हैं जिससे जीवन परिशुद्ध होता है। व्यक्ति की आंतरिक व बाह्य क्रियाएँ संस्कारों के अनुसार ही होती है। मध्यकाल में इस शब्द का प्रयोग फसलों के उत्तरोत्तर परिमार्जन के लिए किया जाता था। इसी से खेती करने की कला के लिए 'कृषि (Agriculture) शब्द बना है परंतु अठारहवीं तथा उन्नीसवीं शताब्दियों में इस शब्द का प्रयोग व्यक्तियों के परिमार्जन के लिए भी किया जाने लगा। जो व्यक्ति परिष्कृत अथवा पढ़ा-लिखा था, उसे सुसंस्कृत कहा जाता था। इस युग में यह शब्द अभिजात वर्गों के लिए प्रयोग होता था। जिन्हें असंस्कृत जनसाधारण से अलग किया जाता था।In simple words: 'संस्कृति' शब्द 'सम' (अच्छा) और 'कृति' (करना) से बना है, जिसका अर्थ 'संस्कार' है, जो हिंदू जीवन में व्यक्ति के परिशुद्धिकरण से जुड़ा है। मध्यकाल में यह फसलों के परिमार्जन से संबंधित था, लेकिन 18वीं-19वीं शताब्दी में यह शिक्षित और परिष्कृत व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त होने लगा, जिससे उन्हें सामान्य जन से अलग पहचाना जाता था।
🎯 Exam Tip: 'संस्कृति' शब्द की व्युत्पत्ति और विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों में इसके अर्थ को स्पष्ट रूप से समझाना, विशेषकर भारतीय भाषाओं और हिंदू जीवन-दर्शन में इसके महत्व को उजागर करना महत्वपूर्ण है।
Question 4. संस्कृति की विभिन्न परिभाषाओं की तुलना करें तथा सबसे संतोषजनक परिभाषा का पता लगाएँ। (क्रियाकलाप 4)
Answer: क्रोबर एवं क्लूखोन नामक अमेरिकी मानवशास्त्रियों ने संस्कृति की परिभाषा जिन शब्दों द्वारा देने का प्रयास किया है उन्हें निम्न प्रकार से सूचीबद्ध किया है-
(1) संस्कृति सोचने, अनुभव करने तथा विश्वास करने का एक तरीका है।
(2) संस्कृति लोगों के जीने का एक संपूर्ण तरीका है।
(3) संस्कृति व्यवहार का सारांश है।
(4) संस्कृति सीखा हुआ व्यवहार है।
(5) संस्कृति सीखी हुई चीजों का एक भंडार है।
(6) संस्कृति सामाजिक धरोहर है जो कि व्यक्ति अपने समूह से प्राप्त करता है।
(7) संस्कृति बार-बार घट रही समस्याओं के लिए मानकीकृत दिशाओं का एक समुच्चय है।
(8) संस्कृति व्यवहार के मानकीय नियमितीकरण हेतु एक साधन है।
उपर्युक्त अर्थों में संस्कृति को उस सामाजिक धरोहर के रूप में स्वीकार करना उचित है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांरित होती रहती है। यह सीखा हुआ व्यवहार है। जब हम अठारहवीं शताब्दी में लखनऊ की संस्कृति, अतिथि सत्कार की संस्कृति या सामान्यतया प्रयुक्त शब्द 'पाश्चात्य संस्कृति का प्रयोग करते हैं तो हमारा तात्पर्य व्यवहार के मानकीकृत ढंग से ही होता है। व्यवहार के भिन्न ढंग के कारण ही आज भी हम लखनऊ की संस्कृति को अन्य शहरों की संस्कृतियों से भिन्न मानते हैं।In simple words: संस्कृति को सोचने, जीने, व्यवहार करने और विश्वासों का एक सीखा हुआ तरीका माना जाता है, जो एक सामाजिक धरोहर के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती है। क्रोबर और क्लूखोन की परिभाषाओं के आधार पर, सबसे संतोषजनक परिभाषा यह है कि संस्कृति एक सीखा हुआ व्यवहार और सामाजिक विरासत है जो व्यक्ति को अपने समूह से प्राप्त होती है और समाज की समस्याओं के लिए मानकीकृत दिशाएँ प्रदान करती है।
🎯 Exam Tip: विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई संस्कृति की परिभाषाओं को सूचीबद्ध करना और उनमें से सबसे संतोषजनक परिभाषा को चुनकर उसके औचित्य को समझाना महत्वपूर्ण है, साथ ही उदाहरणों का प्रयोग करके अवधारणा को स्पष्ट करना।
Question 5. क्या आपको अपने आस-पास में बने किसी उप-सांस्कृतिक समूह की जानकारी है? आप " इनको पहचानने में कैसे सफल हुए? (क्रियाकलाप 5)
Answer: आपके आस-पास यदि निर्माण कार्य में लगे हुए बिहारी मजदूर अथवा रिक्शाचालक बिहारी एक स्थान पर रहते हैं तो आप इस उम-सांस्कृतिक समूह की सरलता से पहचान कर सकते हैं। उनकी बोलचाल से ही आप यह अनुमान लगा सकते हैं कि वे बिहार या पूर्वी उत्तर प्रदेश के हैं। इसी भाँति, यदि आपके आस-पड़ोस या किसी अन्य मुहल्ले में शहर से थोड़ा बाहर कूड़ा बीनने वाले परिवारों का झुंड रहता है तो उन्हें भी आप न केवल कार्य के आधार पर अपितु उनके रहन-सहन के आधार पर भी अलग उप-सांस्कृतिक समूह के रूप में पहचान सकते हैं।In simple words: हाँ, मेरे आस-पास निर्माण कार्य में लगे बिहारी मजदूर और कूड़ा बीनने वाले परिवारों के उप-सांस्कृतिक समूह हैं। मैं उन्हें उनकी विशिष्ट बोलचाल, रहन-सहन और कार्य-शैली के आधार पर आसानी से पहचान सकता हूँ, जो उन्हें मुख्य समाज से अलग करती है।
🎯 Exam Tip: उप-सांस्कृतिक समूहों की पहचान करने के लिए स्थानीय उदाहरणों का उपयोग करें और उन विशिष्ट विशेषताओं (भाषा, रहन-सहन, व्यवसाय) को उजागर करें जिनके आधार पर आपने उन्हें पहचाना।
Question 6. वे बातें बताएँ जिनमें एक घरेलू नौकर का बच्चा अपने आपको उस बच्चे से अलग समझे, जिसके परिवार में उसकी माँ काम करती है। साथ ही उन वस्तुओं के बारे में बताएँ जिन्हें वह आपस में बाँट सकते हैं या बदल सकते हैं? (क्रियाकलाप 6)
Answer: एक घरेलू नौकर का बच्चा अपने आपको उस बच्चे से, जिसके परिवार में उसकी माँ काम करती है, कई बातों में अलग समझ सकता है। वह सापेक्षिक वंचना की भावना से भी ग्रसित हो सकता है क्योंकि खाने-पीने के लिए जो सामान मालिक के बच्चे को उपलब्ध है अथवा खेलने के लिए जो खिलौने मालिक के बच्चे के पास है वह उसके पास नहीं है। नौकर के बच्चे के पास न तो वैसे कपड़े पहनने के लिए हो सकते हैं और हो सकता है कि वह स्कूल में भी पढ़ने नहीं जाता हो। उसकी बोलचाल का ढंग भी मालिक के बच्चे से अलग हो सकता है। नौकरानी के बच्चे की भाषा थोड़ी-बहुत अशिष्ट भी हो सकती है। इससे हमें यह पता चलता है कि विभिन्न पारिवारिक परिस्थितियों में होने वाले समाजीकरण से बच्चों की सीख में भी अंतर हो सकता है। हो सकता है कि मालिक की लड़की सुंदर कपड़े अधिक पहनती हो, जबकि नौकरानी की लड़की काँच की चूड़ियाँ अधिक पहनती हो । इसी भाँति उनकी अन्य रुचियों में भी अंतर हो सकता है। हो सकता है कि दोनों बच्चों में आपस में बाँटने के लिए कोई वस्तु न हो, तथापि वे किसी फिल्म के गाने के बारे में आपस में विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं। मालिक का बच्चा अपने पुराने कपड़ों या खिलौनों को नौकरानी के बच्चों को दे सकता है अथवा अपने सामान्य खिलौनों के साथ. उससे खेल भी सकता है।In simple words: एक घरेलू नौकर का बच्चा मालिक के बच्चे से खुद को खाने, कपड़े, शिक्षा, खिलौने और भाषा के मामले में अलग समझ सकता है, जिससे सापेक्षिक वंचना का अनुभव हो सकता है। हालांकि, वे फिल्म के गानों या पुरानी चीजों को साझा करके बातचीत कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: सामाजिक-आर्थिक स्थिति के कारण बच्चों के बीच के अंतर (वंचना, शिक्षा, जीवनशैली) और फिर भी साझा की जा सकने वाली वस्तुओं या गतिविधियों को स्पष्ट रूप से दर्शाना महत्वपूर्ण है।
Question 7. टेलीविजन, जगह, समय, सुअवसर, आपके आस-पास के लोग इत्यादि में किस चीज की उपस्थिति या अनुपस्थिति आपको व्यक्तिगत रूप से ज्यादा प्रभावित करेगी? (क्रियाकलाप 7)
Answer: यह परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। हो सकता है कि किसी बच्चे को अपना मकान न होने का गम ही सबसे अधिक प्रभावित कर रहा हो तो दूसरे को अपना मकान होने के बावजूद टेलीविजन न होने का। किसी निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चे को, जिसे की अपनी माता का हाथ बँटाने अनेक परिवारों में झाड़े-पोंछा या बर्तन साफ करने हेतु साथ जाता है, घर के कार्यों या विद्यालय के समय में सामंजस्य बैठाने की समस्या हो सकती है। छोटे घरों में रहने वाले बच्चे को अपनी पढ़ाई हेतु अलग कमरा उपलब्ध न होने की समस्या का सामना करना पड़ता है।In simple words: व्यक्तिगत रूप से प्रभावित करने वाली चीज सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती है; कुछ को मकान न होने का दुख हो सकता है, जबकि अन्य को टेलीविजन या पढ़ाई के लिए अलग कमरे की अनुपलब्धता प्रभावित कर सकती है। निम्न-सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले बच्चों को अक्सर घर के काम और स्कूल के बीच सामंजस्य बिठाने में परेशानी होती है।
🎯 Exam Tip: यह बताएं कि व्यक्तिगत प्रभाव सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर कैसे निर्भर करते हैं, और किसी एक बच्चे के लिए मकान, टेलीविजन या पढ़ाई के लिए जगह की अनुपस्थिति कैसे महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकती है।
Question 8. अपने मित्रों के साथ की गई अपनी अंत:क्रिया की तुलना अपने माता-पिता तथा अन्य बड़ों से की गई अंत:क्रिया से करने पर क्या अंतर स्पष्ट होता है? (क्रियाकलाप 8)
Answer: मित्रों की गणना समवयस्क समूह के रूप में होती है। समवयस्क समूह के सदस्यों का एक-दूसरे पर प्रभाव अधिक होता है। हमउम्र या एक व्यवसाय में लगे होने के कारण वे अपने विचारों को खुलकर एक-दूसरे को बता सकते हैं तथा विचारों में भिन्नता पर खुलकर वाद-विवाद कर सकते हैं। ऐसे समूह व्यक्ति की मनोवृत्ति तथा व्यवहार को निर्धारित करने में प्राय: महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। माता-पिता तथा अन्य बड़ों के साथ अंत:क्रिया समकक्ष समूहों के सदस्यों के साथ होने वाली अंत:क्रियाओं से भिन्न होती है। अक्सर बच्चे अपने माता-पिता या बड़ों के दृष्टिकोण को बिना किसी विवाद के अपना लेते हैं। इसीलिए यदि माता-पिता द्वारा किए जाने वाले समाजीकरण तथा समवयस्क समूह या विद्यालय द्वारा किए जाने वाले समाजीकरण में अधिक अंतर हो जाए तो बच्चे के सामने दुविधा की स्थिति पैदा हो सकती है कि वह माता-पिता द्वारा बताई गई बात को उचित माने या अपने दोस्तों व प्राध्यापकों द्वारा बताई गई बात को। इसलिए आज समाजीकरण के विभिन्न अभिकरणों में जीवन के लक्ष्यों के प्रति एवं व्यक्तित्व के निर्माण के प्रति सामंजस्य स्थापित करने की बात पर अधिक बल दिया जाने लगा है।In simple words: मित्रों के साथ बातचीत में विचारों का खुला आदान-प्रदान और वाद-विवाद होता है, क्योंकि समवयस्क समूह व्यक्ति के व्यवहार को बहुत प्रभावित करता है। इसके विपरीत, माता-पिता या बड़ों के साथ बातचीत में बच्चे अक्सर उनके दृष्टिकोण को बिना विवाद के स्वीकार करते हैं, और यदि इन दोनों प्रभावों में अंतर हो तो बच्चे दुविधा में पड़ सकते हैं।
🎯 Exam Tip: समवयस्क समूहों और माता-पिता/बड़ों के साथ अंत:क्रिया के बीच के स्पष्ट अंतरों को रेखांकित करें, और बताएं कि ये भिन्नताएं व्यक्ति की मनोवृत्ति और समाजीकरण को कैसे प्रभावित करती हैं।
Question 9. लोग अपने आस-पास के परिवेश के विपरीत परिवेशों में बने धारावाहिकों से खुद को कैसे जोड़ते हैं? यदि बच्चे अपने दादा-दादी के साथ टेलीविजन देख रहे हैं तो कौन-से कार्यक्रम देखने योग्य हैं, क्या इस पर उनमें असहमति है? यदि ऐसा है तो उनके दृष्टिकोण में क्या अंतर पाया गया? क्या इन अंतरों में क्रमश: संशोधन होता है (क्रियाकलाप 9)
Answer: आज टेलीविजन समाजीकरण का एक प्रमुख अभिकरण बन गया है। इसमें अनेक धारावाहिक दिखाए जाने लगे हैं। बहुत-से धारावाहिकों में किसी कॉलेज में अमीर परिवारों के छात्र-छात्राओं का प्रदर्शन बिगड़ते हुए बच्चों के रूप में भी हो सकता है। इन विपरीत परिवेशों में बने धारावाहिकों से बच्चा खुद को आँकने का प्रयास करता है। वह यह भी सोच सकता है कि धारावाहिकों में दिखाए जाने वाले ऐसे बिगड़े हुए बच्चे बनना अच्छी बात नहीं है। इसके विपरीत, यह भी हो सकता है कि उन बच्चों की जीवन-शैली का उस पर गहरा प्रभाव पड़े तथा वह उस शैली को अपने जीवन में भी अपनाने का प्रयास करने लगे। धारावाहिक देखते समय सामान्यत बच्चों एवं दादा-दादी में मतभेद हो सकता है क्योंकि पीढ़ी अंतर होने के कारण दोनों की रुचियों में काफी अंतर हो सकता है। पढ़ने वाले बच्चे हो सकता है कि विभिन्न विद्यालयों के बच्चों में दिखाए जाने वाले क्विज जैसे कार्यक्रम देखने या क्रिकेट का मैच देखने में अधिक रुचि रखते हों, जबकि दादा-दादी की इन दोनों प्रकार के कार्यक्रमों में कोई रुचि न हो और वे टेलीविजन पर उस समय प्रदर्शित की जाने वाली किसी पुरानी फिल्म को देखने के लिए उत्सुक हों। आजकल छोटी आयु में ही बच्चे कार्टून आधारित कार्यक्रम देखने के आदी हो जाते हैं तथा वे नहीं चाहते कि इन कार्यक्रमों के अतिरिक्त टेलीविजन पर कोई अन्य कार्यक्रम भी देखे जाएँ। दादा-दादी की ऐसे कार्यक्रमों में हो सकता है कि कोई रुचि ही न हो। इस प्रकार के अंतर पीढ़ी अंतराल के द्योतक हैं तथा दोनों पक्षों में इस बात को लेकर समझौता हो सकता है कि जिस समय बच्चे कार्यक्रम देखें उस समय उन्हें अपनी रुचि का कार्यक्रम देखने की अनुमति प्रदान की जाए तथा जब दादा-दादी कार्यक्रम देखें तो बच्चे अपना कार्यक्रम देखने पर जोर न दें। अन्य शब्दों में, समय निर्धारित कर दृष्टिकोण में अंतर को कम किया जा सकता है।In simple words: टेलीविजन धारावाहिकों के माध्यम से बच्चे खुद को विभिन्न परिवेशों से जोड़ते हैं, जिससे उनके व्यवहार और जीवनशैली प्रभावित होती है। बच्चों और दादा-दादी के बीच कार्यक्रम देखने की पसंद में अंतर पीढ़ी अंतराल के कारण होता है, जिसे समय निर्धारित करके और एक-दूसरे की रुचियों का सम्मान करके संशोधित किया जा सकता है।
🎯 Exam Tip: टेलीविजन के समाजीकरण प्रभाव को स्पष्ट करें, खासकर विपरीत परिवेशों के धारावाहिकों के संदर्भ में। बच्चों और दादा-दादी के बीच पीढ़ीगत अंतर के कारण रुचियों में असहमति और उसके संभावित समाधानों का उल्लेख करें।
Question 10. कस्बों तथा गाँवों में संस्कृति के मानकीय आयाम कैसे अलग हैं? (क्रियाकलाप 11)
Answer: कस्बों एवं गाँव के मानकीय आयामों में काफी भिन्नता पाई जाती है। कस्बों की जनसंख्या अधिक होने के कारण संबंध आमने-सामने के, व्यक्तिगत एवं घनिष्ठ नहीं होते हैं। औपचारिक नियंत्रण अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है तथा अनौपचारिक नियंत्रण का प्राय: अभाव पाया जाता है। इसके विपरीत, गाँव में आमने-सामने के प्रत्यक्ष एवं घनिष्ठ संबंध पाए जाते हैं तथा अनौपचारिक नियंत्रण ही अनुपालन के लिए पर्याप्त होता है। कस्बे एवं गाँव में रहने वाले लोगों का जीवन का ढंग, खान-पान, पहनावा, धार्मिक प्रवृत्ति एवं विश्व के प्रति दृष्टिकोण भी भिन्न-भिन हो सकता है। कस्बे में असुरक्षा का वातावरण भी अधिक हो सकता है। इसी के फलस्वरूप हो सकता है कि लड़की यदि किसी कार्य से कहीं बाहर जाती है तो उसके साथ उसका भाई या परिवार का अन्य बड़ा सदस्य जरूर जाए। हो सकता है कि यह स्थिति संबंधित लड़की को काफी उपहासजनके लगे क्योंकि वह विद्यालय में तो अकेली ही जाती है परंतु माता-पिता किसी अन्य कार्य हेतु उसे अकेले जाने से क्यों रोकते हैं। गाँव में इस प्रकार की परिस्थितियाँ ही विकसित नहीं होती हैं।In simple words: कस्बों में मानकीय आयाम औपचारिक नियंत्रण और अव्यक्तिक संबंधों पर आधारित होते हैं, जबकि गाँवों में घनिष्ठ संबंध और अनौपचारिक नियंत्रण अधिक प्रभावी होता है। यह भिन्नता जीवन शैली, खान-पान और सुरक्षा के अनुभवों को प्रभावित करती है; जैसे शहरों में लड़कियों की सुरक्षा के लिए अधिक प्रतिबंध होते हैं जो गाँवों में कम होते हैं।
🎯 Exam Tip: कस्बों और गाँवों के मानकीय आयामों के बीच के मुख्य अंतरों को स्पष्ट करें, विशेष रूप से सामाजिक संबंधों, नियंत्रण के प्रकार और लड़कियों की सुरक्षा जैसे पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए।
Question 11. पुजारी की बेटी को घंटी छूने की अनुमति जैसी प्रदत्त प्रस्थिति पर प्रश्न अन्य लड़कियों में किस प्रकार की प्रतिक्रिया विकसित कर सकता है? (क्रियाकलाप 11)
Answer: प्रदत्त प्रस्थिति कई बार समाज में प्रचलित मूल्यों के प्रति विद्रोह अथवा समतावादी व्यवहार की प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकती है। उदाहरणार्थ-यदि एक लड़की मंदिर में जाकर घंटी बजाने को उत्सुक है परंतु उसके माता-पिता उसे यह कहकर रोक रहे हैं कि लड़कियाँ मंदिर में घंटी नहीं बजा सकती है तो ऐसी स्थिति में लड़की के मन में अनेक प्रकार के विचार आ सकते हैं। वह माता-पिता को यह तर्क दे सकती है कि पिछली बार उसने मंदिर के पुजारी की लड़की को घंटी बजाते हुए देखा था तो फिर वह घंटी क्यों नहीं बजा सकती। माता-पिता यह तर्क दे सकते हैं कि चूंकि वह मंदिर के पुजारी की लड़की है इसलिए उसे घंटी बजाने का अधिकार प्राप्त है। हो सकता है लड़की इस तर्क को न माने तथा माँ-बाप को कहे कि जब भगवान की नजरों में सब एकसमान हैं तो इस प्रकार का भेदभाव कहाँ तक उचित है। बड़े लोग सदैव यह सोचते हैं कि वे जो तर्क बच्चों को देंगे वे चुपचाप उन्हें स्वीकार कर लेंगे।In simple words: पुजारी की बेटी को घंटी छूने की अनुमति अन्य लड़कियों में भेदभाव के प्रति विद्रोह की भावना जगा सकती है, जिससे वे सवाल उठा सकती हैं कि यदि भगवान की नजर में सब समान हैं तो यह लिंग आधारित प्रतिबंध क्यों। यह घटना सामाजिक मूल्यों और प्रदत्त प्रस्थिति के बीच टकराव को दर्शाती है।
🎯 Exam Tip: प्रदत्त प्रस्थिति और सामाजिक मूल्यों के बीच के संघर्ष को दर्शाने के लिए इस उदाहरण का उपयोग करें, और बताएं कि कैसे यह स्थिति बच्चों में समानता और न्याय के बारे में महत्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न कर सकती है।
परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
Question 1. व्यक्ति और समाज एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं और एक-दूसरे पर आश्रित हैं। यह कथन किसका है?
(क) दुर्वीम'
(ख) चार्ल्स कूले
(ग) मैकाइवर एवं पेज
(घ) प्लेटो
Answer: (ग) मैकाइवर एवं पेजIn simple words: यह कथन मैकाइवर एवं पेज का है कि व्यक्ति और समाज एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं और एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं।
🎯 Exam Tip: इस प्रकार के कथन-आधारित प्रश्नों में, सही समाजशास्त्री का नाम याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 2. 'मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।' यह कथन है-
(क) रूसो का
(ख) हरबर्ट स्पेन्सर का
(ग) मैकाइवर व पेज का
(घ) अरस्तू को
Answer: (घ) अरस्तू काIn simple words: 'मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है' यह प्रसिद्ध कथन अरस्तू का है, जो मानव के सामाजिक स्वभाव पर जोर देता है।
🎯 Exam Tip: यह एक मौलिक समाजशास्त्रीय कथन है। इसे सीधे याद रखें क्योंकि यह अक्सर पूछा जाता है।
Question 3. किसने कहा है कि समाज एक अधि-जैविक व्यवस्था है?
(क) मैकाइवर और पेज
(ख) किंग्सले डेविस
(ग) हरबर्ट स्पेन्सर
(घ) ऑगबर्न
Answer: (ग) हरबर्ट स्पेन्सरIn simple words: हरबर्ट स्पेन्सर ने समाज को एक 'अधि-जैविक व्यवस्था' के रूप में परिभाषित किया, जिसका अर्थ है कि समाज जैविक प्रणालियों से ऊपर एक जटिल संगठनात्मक इकाई है।
🎯 Exam Tip: समाज के जैविक और अधि-जैविक दृष्टिकोण से संबंधित समाजशास्त्रियों और उनके योगदान को याद रखना आवश्यक है।
Question 4. संस्कृति के भौतिक पक्ष को कहा जाता है-
(क) समाज
(ख) सामाजिक व्यवस्था
(ग) सभ्यता
(घ) मानव समाज
Answer: (ग) सभ्यताIn simple words: संस्कृति के भौतिक पहलुओं, जैसे उपकरण, तकनीक और वस्तुएं, जिन्हें मानव ने बनाया है, को 'सभ्यता' कहा जाता है।
🎯 Exam Tip: संस्कृति के भौतिक और अभौतिक पक्षों के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझना और उनके संबंधित शब्दों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 5. “सभ्यता संस्कृति का वाहक है।” यह कथन किसका है?
(क) क्लाइव बेल
(ख) मैकाइवर एवं पेज
(ग) फेयरचाइल्ड
(घ) ऑगबर्न एवं निमकॉफ
Answer: (ख) मैकाइवर एवं पेजIn simple words: मैकाइवर एवं पेज ने कहा है कि सभ्यता संस्कृति का माध्यम है, जिसका अर्थ है कि भौतिक उपकरण और प्रौद्योगिकियां संस्कृति के अमूर्त मूल्यों और विचारों को आगे बढ़ाती हैं।
🎯 Exam Tip: सभ्यता और संस्कृति के बीच के संबंध को परिभाषित करने वाले विभिन्न समाजशास्त्रियों के कथनों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 6. रॉबर्ट बीरस्टीड ने सामाजिक आदर्शों को कितनी श्रेणियों में विभाजित किया है?
(क) दो।
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
Answer: (ख) तीनIn simple words: रॉबर्ट बीरस्टीड ने सामाजिक आदर्शों को तीन मुख्य श्रेणियों- जनरीतियाँ, रूढ़ियाँ और कानून में विभाजित किया है।
🎯 Exam Tip: रॉबर्ट बीरस्टीड द्वारा सामाजिक आदर्शों के वर्गीकरण की श्रेणियों को याद रखना परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 7. किसके अनुसार सामाजिक मूल्य प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक संगठन व सामाजिक व्यवस्था से संबंधित होते हैं?
(क) इलियट एवं मैरिल
(ख) सी०एम०केस
(ग) राधाकमल मुखर्जी
(घ) जॉनसन
Answer: (ग) राधाकमल मुखर्जीIn simple words: राधाकमल मुखर्जी का मानना है कि सामाजिक मूल्य सीधे तौर पर समाज के संगठन और व्यवस्था से जुड़े होते हैं, उन्हें बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
🎯 Exam Tip: समाजशास्त्रीय अवधारणाओं को उनके संबंधित विद्वानों से जोड़ना और मुख्य परिभाषाओं को याद रखना आवश्यक है।
Question 8. ह्यूमन नेचर एंड दि सोशल ऑर्डर' पुस्तक के लेखक कौन हैं?
(क) फ्रॉयड
(ख) कूले
(ग) मैकाइवर एवं पेजं
(घ) मीड
Answer: (ख) कुलेIn simple words: 'ह्यूमन नेचर एंड दि सोशल ऑर्डर' पुस्तक चार्ल्स कूले द्वारा लिखी गई है, जिसमें उन्होंने 'आत्म' और सामाजिक अंत:क्रिया के सिद्धांतों पर चर्चा की है।
🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय पुस्तकों और उनके लेखकों के नाम याद रखना परीक्षा के लिए उपयोगी होता है।
निश्चित उत्तरीय प्रश्नोत्तरे
Question 1. संस्कृति के भौतिक पक्ष को क्या कहा जाता है?
Answer: संस्कृति के भौतिक पक्ष को सभ्यता कहा जाता है।In simple words: संस्कृति के भौतिक पक्ष को सभ्यता कहते हैं, जिसमें मानव निर्मित वस्तुएँ और तकनीकें शामिल होती हैं।
🎯 Exam Tip: संस्कृति के भौतिक और अभौतिक पहलुओं को परिभाषित करना और उनके संबंधित शब्दों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 2. उन भौतिक साधनों को क्या कहा जाता है जिनमें उपयोगिता का तत्व पाया जाता है?
Answer: जिन भौतिक साधनों में उपयोगिता का तत्त्व पाया जाता है उन्हें सभ्यता कहते हैं।In simple words: वे भौतिक साधन जिनमें उपयोगिता का गुण होता है, उन्हें सभ्यता कहते हैं, जैसे कि औजार और तकनीक।
🎯 Exam Tip: सभ्यता की परिभाषा को उसकी उपयोगिता के संदर्भ में स्पष्ट रूप से बताना आवश्यक है।
Question 3. निम्न कथन किसने कहा है “अधिजैविक संस्कृति के बाद की अवस्था के रूप में सभ्यता की परिभाषा दी जा सकती है?
Answer: यह कथन ऑगबर्न तथा निमकॉफ का है।In simple words: ऑगबर्न और निमकॉफ ने सभ्यता को अधि-जैविक संस्कृति की अगली अवस्था के रूप में परिभाषित किया है।
🎯 Exam Tip: समाजशास्त्रियों द्वारा दी गई विशेष परिभाषाओं को उनके नामों के साथ याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 4. “सभ्यता संस्कृति का वाहक हैं” किसने कहा है?
Answer: यह कथन मैकाइवर और पेज का है।In simple words: मैकाइवर और पेज के अनुसार, सभ्यता संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ले जाने का साधन है।
🎯 Exam Tip: मैकाइवर और पेज के सभ्यता और संस्कृति के संबंध में दिए गए प्रमुख कथन को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 5. उच्चस्तरीय मानदंडों को क्या कहा जाता है?
Answer: उच्चस्तरीय मानदंडों को सामाजिक मूल्य कहा जाता है।In simple words: सामाजिक मूल्य वे उच्चस्तरीय मानदंड होते हैं जो समाज में सही और गलत का निर्धारण करते हैं।
🎯 Exam Tip: सामाजिक मूल्यों की परिभाषा और उनके महत्व को संक्षेप में स्पष्ट करें।
Question 6. वह कौन-सी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति पहले से सीखे हुए व्यवहारों को भुला देता है?
Answer: व्यक्ति द्वारा पहले से सीखे हुए व्यवहारों को भुला देने की प्रक्रिया को वि-समाजीकरण कहा जाता है।In simple words: वि-समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने पुराने या पहले सीखे हुए व्यवहारों और मूल्यों को छोड़ देता है।
🎯 Exam Tip: वि-समाजीकरण की अवधारणा को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना महत्वपूर्ण है।
Question 7. उस प्रक्रिया को क्या कहा जाता है जिसमें व्यक्ति समाज द्वारा अस्वीकृत व्यवहारों (जैसी चोरी करना, अपराध करना आदि) को सीखता है?
Answer: समाज द्वारा अस्वीकृत व्यवहारों को सीखने की प्रक्रिया को नकारात्मक समाजीकरण कहते हैं।In simple words: नकारात्मक समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति ऐसे व्यवहारों को सीखता है जिन्हें समाज अस्वीकृत करता है, जैसे चोरी या अपराध।
🎯 Exam Tip: समाजीकरण के सकारात्मक और नकारात्मक रूपों के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझाएं।
Question 8. इड, इगो एवं सुषर इगो के आधार पर समाजीकरण की व्याख्या करने वाले विद्वान कौन हैं?
Answer: इड, इगो एवं सुपर इगो के आधार पर समाजीकरण की व्याख्या करने वाले विद्वान् फ्रॉयड हैं।In simple words: सिगमंड फ्रॉयड ने व्यक्ति के 'इड', 'इगो' और 'सुपर इगो' की अवधारणाओं के माध्यम से समाजीकरण की प्रक्रिया को समझाया है।
🎯 Exam Tip: फ्रॉयड के मन के संरचनात्मक मॉडल (इड, इगो, सुपर इगो) और समाजीकरण में उनकी भूमिका को याद रखें।
Question 9. 'ह्यूमन नेचर एण्ड दि सोशल ऑर्डर' पुस्तक के लेखक कौन हैं?
Answer: 'ह्यूमन, नेचर एण्ड दि सोशल ऑर्डर' पुस्तक के लेखक का नाम कूले है।In simple words: चार्ल्स कूले ने 'ह्यूमन नेचर एण्ड दि सोशल ऑर्डर' नामक पुस्तक लिखी, जिसमें उन्होंने आत्म और सामाजिक अंत:क्रिया के सिद्धांतों का वर्णन किया है।
🎯 Exam Tip: समाजशास्त्र में महत्वपूर्ण पुस्तकों और उनके लेखकों को याद रखना आवश्यक है।
Question 10. 'माइण्ड, सेल्फ एण्ड सोसाइटी पुस्तक के लेखक कौन हैं?
Answer: 'माइण्ड, सेल्फ एण्ड सोसाइटी' पुस्तक के लेखक का नाम मीड है।In simple words: 'माइण्ड, सेल्फ एण्ड सोसाइटी' जॉर्ज हर्बर्ट मीड द्वारा लिखित पुस्तक है, जिसमें उन्होंने 'आत्म' के विकास और प्रतीकात्मक अंत:क्रियावाद के सिद्धांतों को प्रस्तुत किया है।
🎯 Exam Tip: जॉर्ज हर्बर्ट मीड के योगदान और उनकी प्रमुख रचना को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 11. अपनी पहली जीवन पद्धति के स्थान पर दूसरी जीवन पद्धति को अपनाने से संबंधित सीख की प्रक्रिया को क्या कहते हैं?
Answer: पहली जीवन पद्धति के स्थान पर दूसरी जीवन पद्धति को अपनाने से संबंधित सीख की प्रक्रिया को पुनर्समाजीकरण कहते हैं।In simple words: पुनर्समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपनी पिछली जीवन-शैली या सामाजिक भूमिका को छोड़कर एक नई जीवन-शैली या भूमिका को अपनाता है।
🎯 Exam Tip: पुनर्समाजीकरण की अवधारणा को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें और इसके उदाहरण दें।
Question 12. 'लिबिडो किस विद्वान की संकल्पना है?
Answer: 'लिबिडो' फ्रॉयड द्वारा प्रतिपादित संकल्पना है।In simple words: लिबिडो सिगमंड फ्रॉयड की एक अवधारणा है, जो काम ऊर्जा या जीवन ऊर्जा को संदर्भित करती है, जो मानव व्यवहार को संचालित करती है।
🎯 Exam Tip: फ्रॉयड की प्रमुख अवधारणाओं, जैसे लिबिडो, को याद रखना और उन्हें संक्षेप में परिभाषित करना आवश्यक है।
Question 13. कौन-सा विद्वान समाजीकरण की प्रक्रिया को काम प्रवृत्तियों (लिबिडो) द्वारा निर्धारित प्रक्रिया मानता है?
Answer: समाजीकरण की प्रक्रिया को काम प्रवृत्तियों (लिबिडो) द्वारा निर्धारित प्रक्रिया मानने वाले विद्वान का नाम फ्रॉयड है।In simple words: सिगमंड फ्रॉयड ने तर्क दिया कि समाजीकरण की प्रक्रिया मुख्य रूप से काम प्रवृत्तियों या 'लिबिडो' द्वारा संचालित होती है, जो व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक विकास को प्रभावित करती है।
🎯 Exam Tip: फ्रॉयड के समाजीकरण के सिद्धांत और उसमें लिबिडो की भूमिका को संक्षेप में स्पष्ट करें।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
Question 1. सभ्यता किसे कहते हैं?
Answer: संस्कृति के भौतिक पक्ष को सभ्यता कहा जाता है। सभ्यता का संबंध उस कला-विन्यास से है। जिसे मनुष्य ने अपने जीवन की दशाओं को नियंत्रित करने हेतु रचा है। यह संस्कृति का अधिक जटिल व विकसित रूप है जिसमें मानव-निर्मित भौतिक वस्तुएँ सम्मिलित होती हैं। मैकाइवर तथा पेज के अनुसार, “सभ्यता से हमारा अर्थ उस संपूर्ण प्रविधि तथा संगठन से हैं जिसे कि मनुष्य ने अपने जीवन की दशाओं को नियंत्रित करने के उद्देश्य से बनाया है।In simple words: सभ्यता संस्कृति का भौतिक पहलू है, जिसमें मनुष्य द्वारा अपने जीवन को नियंत्रित करने के लिए बनाई गई सभी मानव-निर्मित वस्तुएँ, तकनीकें और प्रणालियाँ शामिल होती हैं। यह संस्कृति का एक जटिल और विकसित रूप है।
🎯 Exam Tip: सभ्यता की परिभाषा देते समय, उसके भौतिक पक्ष, मानव-निर्मित वस्तुओं और नियंत्रण के उद्देश्य पर जोर दें, साथ ही मैकाइवर एवं पेज की परिभाषा का उल्लेख करें।
Question 2. भौतिक तथा अभौतिक संस्कृति में दो अंतर बताइए ।
Answer: भौतिक एवं अभौतिक संस्कृति में पाए जाने वाले दो अंतर निम्नलिखित हैं।
(1) भौतिक संस्कृति के अंतर्गत मनुष्य द्वारा निर्मित वे सभी वस्तुएँ आ जाती हैं जिनका उनकी उपयोगिता द्वारा मूल्यांकन किया जाता है, जबकि अभौतिक संस्कृति का संबंध मूल्यों, विचारों व ज्ञान से है।
(2) भौतिक संस्कृति मानव द्वारा निर्मित वस्तुओं का योग है, जबकि अभौतिक संस्कृति रीति-रिवाजों, रूढ़ियों, प्रथाओं, मूल्यों, नियमों का उपनियमों का योग है।In simple words: भौतिक संस्कृति में मानव द्वारा निर्मित सभी मूर्त वस्तुएँ और उपकरण शामिल होते हैं, जिनकी उपयोगिता का मूल्यांकन किया जा सकता है। इसके विपरीत, अभौतिक संस्कृति में अमूर्त पहलू जैसे मूल्य, विश्वास, ज्ञान, रीति-रिवाज और नियम शामिल होते हैं।
🎯 Exam Tip: भौतिक और अभौतिक संस्कृति के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें, प्रत्येक के उदाहरणों के साथ उनकी प्रकृति और घटकों को समझाएं।
Question 3. संस्कृति और सभ्यता में दो प्रमुख अंतर बताइए।
Answer: संस्कृति और सभ्यता में पाए जाने वाले दो प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं-
(1) उपयोगिता के आधार पर अंतर-सभ्यता के अंतर्गत मनुष्य द्वारा निर्मित वे सभी वस्तुएँ आ जाती हैं जिनका इनकी उपयोगिता द्वारा मूल्यांकन किया जाता है, किंतु संस्कृति का संबंध उस ज्ञाने से है जिसके आधार पर वस्तुओं का निर्माण किया जाता है।
(2) स्वरूप में अंतर-सभ्यता का संबंध व्यक्ति की बाहरी दशा से होता है जो व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति करती है, किंतु संस्कृति का संबंध व्यक्ति की आंतरिक अवस्था से है जो व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करती है। संस्कृति से व्यक्ति सर्वांग रूप से प्रभावित होता है।In simple words: सभ्यता मानव निर्मित उपयोगी वस्तुओं से संबंधित है जो बाहरी आवश्यकताओं की पूर्ति करती है, जबकि संस्कृति मानव के आंतरिक विचारों, मूल्यों और व्यवहारों से संबंधित है जो वस्तुओं के निर्माण का आधार बनती है।
🎯 Exam Tip: संस्कृति और सभ्यता के बीच के अंतर को उनकी उपयोगिता और स्वरूप के आधार पर स्पष्ट करें, यह बताते हुए कि एक बाहरी पहलुओं से संबंधित है और दूसरी आंतरिक पहलुओं से।
Question 4. सामाजिक मूल्यों के दो प्रमुख कार्य बताइए ।
Answer: सामाजिक मूल्यों के दो प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-
(1) मानव समाज में व्यक्ति सामाजिक मूल्यों के आधार पर समाज द्वारा स्वीकृत नियमों का पालन करता है। वह उनके अनुकूल अपने व्यवहार को ढालकर अपना जीवन व्यतीत करता है। इस प्रकार सामाजिक मूल्य सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने में सहायता प्रदान करते हैं।
(2) मनुष्य अपनी अनंत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सतत् प्रयत्न करता रहता है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति में उसे सामाजिक मूल्यों से पर्याप्त सहायता प्राप्त होती है।In simple words: सामाजिक मूल्यों के दो प्रमुख कार्य हैं- पहला, वे व्यक्ति को समाज के स्वीकृत नियमों के अनुसार व्यवहार करने में मदद करते हैं, जिससे सामाजिक व्यवस्था बनी रहती है। दूसरा, वे व्यक्ति को अपनी अनंत आवश्यकताओं की पूर्ति में मार्गदर्शन और सहायता प्रदान करते हैं।
🎯 Exam Tip: सामाजिक मूल्यों के प्रमुख कार्यों को स्पष्ट और संक्षिप्त रूप से बताएं, विशेष रूप से सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने और व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति में उनकी भूमिका पर जोर दें।
Question 5. सभ्यता की परिभाषा लिखिए ।
Answer: क्लाइव बेल के शब्दों में, “वह (सभ्यता) मूल्यों के ज्ञान के आधार पर स्वीकृत किया गया तर्क और तर्क के आधार पर कठोर व भेदनशील बनाया गया मूल्यों का ज्ञान है।”In simple words: क्लाइव बेल के अनुसार, सभ्यता मूल्यों के ज्ञान और तर्क पर आधारित एक कठोर और भेदनशील ज्ञान प्रणाली है, जो समाज द्वारा स्वीकार की जाती है।
🎯 Exam Tip: क्लाइव बेल द्वारा दी गई सभ्यता की परिभाषा को सटीक रूप से याद रखें और उसे उद्धृत करें।
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
Question 1. संस्कृति से आप क्या समझते हैं?
Answer: संस्कृति को सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों तथा सामाजिक विरासत के आधार पर समझाने का प्रयास किए गया है। प्रत्येक समाज की अपनी भिन्न संस्कृति होती है। संस्कृति वह संपूर्ण जटिलता है। जिसमें वे सभी वस्तुएँ सम्मिलित हैं जिन पर हम विचार करते हैं, कार्य करते हैं और समाज का सदस्य होने के नाते अपने पास रखते हैं। संस्कृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांरित होती रहती है। प्रत्येक पीढ़ी ने अपने पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान एवं कला का और अधिक विकास किया है। अन्य शब्दों में, प्रत्येक पीढ़ी ने अपने पूर्वजों के ज्ञान को संचित किया है। और इस ज्ञान के आधार पर नवीन ज्ञान और अनुभव का भी। ज्ञान अर्जन किया है। इस प्रकार के ज्ञान व अनुभव के अंतर्गत यंत्र, प्रविधियाँ, प्रथाएँ, विचार और मूल्य आदि आते हैं। ये मूर्त और अमूर्त वस्तुएँ संयुक्त रूप से संस्कृति' कहलाती हैं। इस प्रकार वर्तमान पीढ़ी ने अपने पूर्वजों तथा स्वयं के प्रयासों से जो अनुभव व व्यवहार सीखा है वहीं संस्कृति है। मैकाइवर एवं पेज के शब्दों में, “संस्कृति हमारे दैनिक व्यवहार में कला, साहित्य, सीखा है वहीं संस्कृति है। मैकाइवर एवं पेज' के शब्दों में, “संस्कृति हमारे दैनिक व्यवहार में कला, साहित्य, धर्म, मनोरंजन और आनंद में पाए जाने वाले रहन-सहन और विचार के ढंगों से हमारी प्रकृति की अभिव्यक्ति है।”In simple words: संस्कृति एक समाज की सीखी हुई व्यवहार प्रतिमानों और सामाजिक विरासत की संपूर्ण जटिलता है, जिसमें मूर्त और अमूर्त वस्तुएँ (जैसे कला, ज्ञान, मूल्य) शामिल होती हैं। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती है, जहाँ प्रत्येक पीढ़ी पूर्वजों के ज्ञान को विकसित करती है, और मैकाइवर एवं पेज के अनुसार, यह हमारे दैनिक जीवन के रहन-सहन और विचारों की अभिव्यक्ति है।
🎯 Exam Tip: संस्कृति की परिभाषा देते समय, इसे एक सीखी हुई, जटिल, पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होने वाली सामाजिक विरासत के रूप में प्रस्तुत करें, जिसमें मूर्त और अमूर्त दोनों पहलू शामिल हों, और मैकाइवर एवं पेज जैसे विद्वानों के कथन को उद्धृत करें।
Question 2. भौतिक संस्कृति से आप क्या समझते हैं?
Answer: मनुष्यों ने अपनी आवश्यकताओं के कारण अनेक आविष्कारों को जन्म दिया है। ये आविष्कार हमारी संस्कृति के भौतिक तत्त्व माने जाते हैं। इस प्रकार भौतिक संस्कृति उन आविष्कारों का नाम है। जिनको मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं के कारण जन्म दिया है। यह भौतिक संस्कृति मानव-जीवन के बाह्य रूप से संबंधित है। भौतिक संस्कृति को ही सभ्यता कहा जाता है। मोटर, रेलगाड़ी, हवाईजहाज, मेज-कुर्सी, बिजली का पंखा आदि सभी भौतिक तत्त्व; भौतिक संस्कृति अथवा सभ्यता के ही प्रतीक है। संस्कृति के भौतिक पक्ष को मैथ्यू आरनोल्ड, अल्फर्ड, वेबर तथा मैकाइवर एवं पेज ने ही सभ्यता कहा है। भौतिक संस्कृति अथवा सभ्यता की परिभाषा करते हुए मैकाइवर और पेज ने लिखा है कि “मनुष्य ने अपने जीवन की दशाओं को नियंत्रित करने के प्रयत्न से जिस संपूर्ण कला-विन्यास की रचना की है, उसे सभ्यता कहते हैं।"In simple words: भौतिक संस्कृति में वे सभी मानव-निर्मित आविष्कार और वस्तुएँ शामिल हैं जो मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनाता है, जैसे कि औजार, वाहन, और घरेलू उपकरण। इसे सभ्यता भी कहा जाता है और यह मानव जीवन के बाहरी पहलुओं से संबंधित है, जिसका उद्देश्य जीवन की दशाओं को नियंत्रित करना है।
🎯 Exam Tip: भौतिक संस्कृति को उसकी परिभाषा, मानव आवश्यकताओं से संबंध, और सभ्यता के साथ उसके पर्याय को स्पष्ट करें। उदाहरणों के साथ विभिन्न भौतिक तत्वों का उल्लेख करें।
Question 3. अभौतिक संस्कृति किसे कहते हैं?
Answer: मानव जीवन को संगठित करने के लिए मनुष्य ने अनेक रीति-रिवाजों, प्रथाओं, रूढ़ियों आदि को जन्म दिया है। ये सभी तत्त्व मनुष्य की अभौतिक संस्कृति के रूप हैं। ये तत्त्व अमूर्त हैं। इसलिए 'संस्कृति मानव-जीवन के उन अमूर्त तत्त्वों का योग है जो नियमों, उपनियमों, रूढ़ियो, रीति-रिवाजों आदि के रूप में मानव व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। इस प्रकार संस्कृति जीवन के अमूर्त तत्त्वों को कहते हैं वास्तव में संस्कृति के अंतर्गत वे सभी चीजें सम्मिलित की जा सकती हैं जो व्यक्ति की आंतरिक व्यवस्था को प्रभावित करती हैं। दूसरे शब्दों में, संस्कृति में वे पदार्थ सम्मिलित किए जा सकते हैं जो मनुष्य के व्यवहारों को प्रभावित करते हैं। टॉयलर ने लिखा है, “संस्कृति वह जटिल समग्रता है जिसमें समस्त ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता के सिद्धांत, विधि-विधान, प्रथाएँ एवं अन्य समस्त योग्यताएँ सम्मिलित हैं जिन्हें व्यक्ति समाज का सदस्य होने के नाते प्राप्त करता है।”In simple words: अभौतिक संस्कृति मानव-निर्मित अमूर्त तत्वों का समूह है, जैसे रीति-रिवाज, मूल्य, विश्वास, नियम और प्रथाएँ, जो मानव व्यवहार को नियंत्रित करते हैं और व्यक्ति की आंतरिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। टॉयलर के अनुसार, यह ज्ञान, विश्वास, कला और नैतिकता की एक जटिल समग्रता है।
🎯 Exam Tip: अभौतिक संस्कृति की परिभाषा, उसकी अमूर्त प्रकृति, मानव व्यवहार पर उसके नियंत्रण और टॉयलर जैसे विद्वानों की परिभाषाओं को स्पष्ट रूप से समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 4. संस्कृति और सभ्यता में संबंध स्पष्ट कीजिए।
Answer: संस्कृति तथा सभ्यता के मध्य एक विभाजन-रेखा खींच देना बहुत अधिक वैज्ञानिक नहीं है। वास्तविकता यह है कि समाज का बाह्य व्यवहार (सभ्यता) तथा आंतरिक व्यवहार (संस्कृति) एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं। ऐसी चीजों, जिन्हें हम सभ्यता की संज्ञा देते हैं, में कुछ अंशों में सांस्कृतिक पहलू भी होता है। यही बात संस्कृति के संबंध में लागू होती है। सांस्कृतिक पदार्थ कही जाने वाली वस्तुओं में उपयोगिता का तत्त्व निश्चित रूप से सम्मिलित होता है। जब भी कोई वस्तु, जिसमें आवश्यकता पूर्ति की जाती है, खरीदी जाती है तो उसकी उपयोगिता के साथ-साथ उसके सौंदर्य पर भी विचार किया जाता है। उदाहरणार्थ-स्कूटर या टेलीविजन खरीदते समय उसकी उपयोगिता को तो हम देखते ही हैं, साथ ही उसमें कलात्मकता कितनी है इस पर भी ध्यान देते हैं।In simple words: संस्कृति और सभ्यता आपस में घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं; सभ्यता (बाहरी व्यवहार और भौतिक वस्तुएँ) में हमेशा सांस्कृतिक पहलू होते हैं, और संस्कृति (आंतरिक व्यवहार और अमूर्त मूल्य) भौतिक वस्तुओं के माध्यम से व्यक्त होती है। उदाहरण के लिए, एक स्कूटर खरीदते समय उसकी उपयोगिता (सभ्यता) और सौंदर्य (संस्कृति) दोनों पर ध्यान दिया जाता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
🎯 Exam Tip: संस्कृति और सभ्यता के अविभाज्य संबंध को स्पष्ट करें, यह बताते हुए कि कैसे वे एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं और उदाहरणों का उपयोग करके समझाएं कि भौतिक वस्तुओं में सांस्कृतिक मूल्य कैसे निहित होते हैं।
Question 5. संस्कृति सभ्यता को क्या योगदान करती है?
Answer: संस्कृति सभ्यता को निम्नलिखित योगदान करती है-
(1) संस्कृति सभी वस्तुओं एवं विषयों का अंतिम माप है-संस्कृति केवल विचारों और आचारों का माप मात्र नहीं है वरन् इसके मूल्यों व आदर्शों के आधार पर ही संसार की हर वस्तु या घटना का अर्थ लगाया जाता है। उदाहरणार्थ-सिक्खों में 'कृपाण धार्मिक आवश्यकता है जो सभ्यता का भाग होते हुए भी आज के युग में केवल सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में प्रचलित है।
(2) सभ्यता में संस्कृति की भूमिका-समाज अपनी शक्तियों, साधनों व आविष्कारों का निर्माण व प्रयोग संस्कृति द्वारा निर्धारित दिशा के अनुसार ही करता है। मैकाइवर तथा पेज ने लिखा है कि “सभ्यता संबंधी साधनों को उस एक जहाज के रूप में देखा जा सकता है जो कि विभिन्न बंदरगाहों पर जा सकता है; परंतु वह बंदरगाह, जिधर हम बढ़ते हैं, सांस्कृतिक वरण है।”In simple words: संस्कृति सभ्यता को दिशा और अर्थ प्रदान करती है; यह विचारों और आचारों का अंतिम माप है, जिसके मूल्यों के आधार पर हर वस्तु का मूल्यांकन होता है। सभ्यता के साधनों और आविष्कारों का उपयोग संस्कृति द्वारा निर्धारित दिशा में होता है, जैसे मैकाइवर और पेज के अनुसार, सभ्यता वह जहाज है जो सांस्कृतिक वरण द्वारा निर्धारित बंदरगाहों की ओर बढ़ता है।
🎯 Exam Tip: सभ्यता को संस्कृति द्वारा प्रदान किए गए दिशा और अर्थ के संदर्भ में समझाएं, विशेष रूप से मूल्यों के माप और मैकाइवर एवं पेज के 'जहाज' के दृष्टांत का उल्लेख करें।
Question 6. सभ्यता संस्कृति को क्या योगदान करती है?
Answer: सभ्यता संस्कृति को निम्नलिखित योगदान करती है-
(1) सभ्यता संस्कृति की वाहक है-संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करने का कार्य सभ्यता करती है। रवींद्रनाथ ठाकुर की कविताएँ, विचार, लेख, गीत (जो संस्कृति के तत्त्व हैं)-पुस्तक (जो सभ्यता का तत्त्व है) रूप में छपे हैं और उनके विचारों से अन्य लोग आज भी लाभांवित होते हैं।
(2) सभ्यता संस्कृति के प्रसार में सहायक है-संस्कृति के तत्त्व सभ्यता के द्वारा प्रसारित होते हैं। उदाहरणार्थ-मार्क्स के विचार दुनिया के कोने-कोने में प्रसारित हुए हैं। इनका प्रसार संचार के साधनों; जैसे-प्रेस तथा रेडियो (जोकि सभ्यता के प्रतीक हैं) के माध्यम से किया गया है।
(3) सभ्यता संस्कृति का वातावरण है- सभ्यता में विकास के साथ-साथ संस्कृति को सभ्यता के अनुसार सामंजस्य स्थापित करना पड़ता है। उदाहरणार्थ-औद्योगीकरण के कारण हमारा जीवन बहुत व्यस्त हो गया है जिसके परिणामस्वरूप विवाह की प्रक्रिया बहुत छोटी हो गई है। जो विवाह संस्कार पहले आठ-नौ घंटे में संपन्न होता था वह आज आधा घंटे में ही पूरा हो जाता है।In simple words: सभ्यता संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करती है, जैसे पुस्तकें विचारों को फैलाती हैं, और संचार माध्यमों से संस्कृति का प्रसार करती है। यह संस्कृति के लिए एक वातावरण भी बनाती है, जहाँ संस्कृति को सभ्यता के विकास के साथ सामंजस्य बिठाना पड़ता है, जैसे औद्योगीकरण ने विवाह समारोहों को छोटा कर दिया है।
🎯 Exam Tip: सभ्यता के तीन मुख्य योगदानों (वाहक, प्रसार में सहायक, वातावरण) को स्पष्ट रूप से समझाएं, प्रत्येक के लिए ठोस उदाहरण प्रस्तुत करें, जैसे रवींद्रनाथ ठाकुर के विचार या विवाह समारोहों का सिकुड़ना।
Question 7. राधाकमल मुखर्जी ने किन चार प्रकार के मूल्यों का उल्लेख किया है?
Answer: राधाकमल मुखर्जी ने निम्नलिखित चार प्रकार के मूल्यों का उल्लेख किया है-
(1) वे मूल्य जो सामाजिक संगठन व व्यवस्था को सृदृढ़ बनाने के लिए समाज में समानता व सामाजिक न्याय का प्रतिपादन करते हैं।
(2) वे मूल्य जिनके आधार पर सामान्य सामाजिक जीवन के प्रतिमान व आदर्शों का निर्धारण होता है। इन मूल्यों के अंतर्गत एकता व उत्तरदायित्व की भावना आदि समाहित होती है।
(3) वे मूल्य जिनका संबंध आदान-प्रदान व सहयोग आदि से होता है। इन मूल्यों के आधार पर आर्थिक जीवन की उन्नति होती है व आर्थिक जीवन संतुलित होता है।
(4) वे मूल्य जो समाज में उच्चता लाने व नैतिकता को विकसित करने में सहायता प्रदान करते हैं।In simple words: राधाकमल मुखर्जी ने चार प्रकार के मूल्यों का उल्लेख किया है: सामाजिक संगठन व न्याय संबंधी, सामाजिक जीवन के प्रतिमान व आदर्श संबंधी (जैसे एकता), आर्थिक जीवन के आदान-प्रदान व सहयोग संबंधी, और नैतिकता व उच्चता विकसित करने वाले मूल्य।
🎯 Exam Tip: राधाकमल मुखर्जी द्वारा दिए गए सामाजिक मूल्यों के चारों प्रकारों को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध करें और प्रत्येक श्रेणी के तहत मुख्य विशेषताओं को संक्षेप में बताएं।
Question 8. समाजीकरण क्या है? समाजीकरण का अर्थ स्पष्ट कीजिए ।
या
समाजीकरण से आप क्या समझते हैं?
Answer: मनुष्य का जन्म समाज में होता है। समाज में जन्म लेने के पश्चात् वह धीरे-धीरे आसपास के वातावण के संपर्क में आता है और उससे प्रभावित होता है। प्रारंभ में मनुष्य एक प्रकार से जैविक प्राणी मात्र ही होता है; क्योंकि आहार, निद्रा आदि के अतिरिक्त उसे और किसी बात का ज्ञान नहीं होता; अतः उसकी अवस्था बहुत-कुछ पशुओं के ही समान होती है। इसके अतिरिक्त, जन्म के समय बालक में सभी प्रकार के सामाजिक गुणों का भी अभाव होता है और समाजिक गुणों के अभाव में कोई भी बालक एक जैविक प्राणी मात्र ही होता है। माता-पिता के संपर्क में आकर वह मुस्कराना और पहचानना सीखता है। धीरे-धीरे वह अपने परिवार के अन्य सदस्यों के संपर्क में आता है और उनसे सामाजिक शिष्टाचार की अनेक बातें सीखता है। आगे चलकर और बड़े होने पर उसके संपर्क का क्षेत्र और अधिक व्यापक हो जाता है तथा वह विभिन्न सामाजिक तरीकों से अपने कार्यों का संचालन करना सीख लेता है। इस प्रकार वह जैविक प्राणी से सामाजिक प्राणी बन जाता है और समाजशास्त्र में बच्चे के सामाजिक बनने की इस प्रक्रिया को ही समाजीकरण कहा जाता है। अतः समाजीकरण सीखने की एक प्रक्रिया है। इसी के परिणामस्वरूप व्यक्ति समाज में रहना सीखता है अर्थात् एक सामाजिक प्राणी बनता हैं। संस्कृति का हस्तांतरण भी इसी प्रक्रिया के माध्यम से होता है। ग्रीन (Green) के अनुसार, समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बच्चा सांस्कृतिक विशेषताओं, स्वानुभूति और व्यक्तित्व प्राप्त करता है।”In simple words: समाजीकरण वह आजीवन प्रक्रिया है जिसमें एक जैविक प्राणी समाज के नियमों, मूल्यों और व्यवहारों को सीखकर एक सामाजिक प्राणी बनता है। इसमें बच्चा परिवार, पड़ोस और अन्य सामाजिक माध्यमों से सांस्कृतिक विरासत को आत्मसात करता है, जिससे उसका व्यक्तित्व विकसित होता है।
🎯 Exam Tip: समाजीकरण की परिभाषा को एक सीखने की प्रक्रिया के रूप में स्पष्ट करें जो व्यक्ति को जैविक से सामाजिक प्राणी में बदलती है। ग्रीन की परिभाषा और सांस्कृतिक हस्तांतरण में इसकी भूमिका को उजागर करें।
Question 9. व्यक्ति को समाजीकरण की क्यों आवश्यकता होती है?
Answer: समाजीकरण एक अत्यंत अनिवार्य प्रक्रिया है जिसकी आवश्यकता व्यक्ति को निम्नलिखित कारणों से होती है-
(1) 'स्व' का विकास-मानव चरित्र का विकास व्यक्ति के 'स्व' या 'अहं' के विकास पर निर्भर है। जब तक व्यक्ति के 'स्व' का विकास नहीं हो जाता, तब तक व्यक्ति को भले-बुरे का ज्ञान नहीं होता। व्यक्ति के 'स्व' का विकास करने के लिए व्यक्ति को शिष्टाचार, बोलचाल तथा उठने-बैठने के तरीकों को जानना चाहिए। इन तरीकों को जानना ही समाजीकरण कहलाता है। इसलिए समाजीकरण मानव जीवन में 'स्व' के विकास के लिए नितांत आवश्यक है। वस्तुतः समाजीकरण का अर्थ ही 'स्व' का विकास करना है।
(2) व्यक्तित्व के विकास में सहायक–व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास समाज में रहकर ही कर सकता है। जो व्यक्ति किसी कारणवश समाज के बाहर रहे, उनमें व्यक्ति के उचित गुणों का विकास नहीं हो पाता। ऐसे अनेक बालकों का अध्ययन किया गया है जो भेड़ियों की माँद में पाए गए थे या किन्हीं कारणवश माता-पिता से बिछुड़करे जंगलों पशुओं के साथ रहे। उन बच्चों का व्यवहार भेड़िए या जंगली पशु जैसा ही था, क्योंकि मानव समाज से उनका कोई संबंध नहीं बन पाया था। फलस्वरूप उनमें व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाया था तथा वे समाज से अलग रहने के कारण पशुतुल्य ही रहे। इससे यह सिद्ध होता है कि व्यक्तित्व का विकास करने के लिए व्यक्ति को समाजीकरण की अत्यंत आवश्यकता है।In simple words: व्यक्ति के लिए समाजीकरण 'स्व' के विकास और व्यक्तित्व के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह व्यक्ति को भले-बुरे का ज्ञान, शिष्टाचार और सामाजिक व्यवहार सिखाता है, जिससे वह समाज में एक पूर्ण सदस्य के रूप में कार्य कर पाता है।
🎯 Exam Tip: समाजीकरण की आवश्यकता को दो मुख्य बिंदुओं ('स्व' का विकास और व्यक्तित्व का निर्माण) के तहत समझाएं, और प्रत्येक बिंदु के लिए प्रासंगिक उदाहरणों का उपयोग करें।
Question 10. समाजीकरण में कौन-से कारक सहायक माने जाते हैं?
Answer: अमेरिकी समाजशास्त्री क्यूबर ने समाजीकरण में निम्नलिखित तीन कारकों को सहायक माना है-
(1) पैतृक गुण-मनुष्य में जो कुछ भी गुण पाए जाते हैं वे अपने पूर्वजों के कारण पाए जाते हैं। व्यक्ति अपने पूर्वजों के अनुसार ही खाता-पीता तथा जीवन-यापन करता है। अपने समूह के अनुरूप ही वह अपने को ढालता है तथा मान्यताओं का निर्माण करता है।
(2) सांस्कृतिक पर्यावरण-सांस्कृतिक पर्यावरण में व्यक्ति पलता है और उसी में उसका पोषण होता है। सांस्कृतिक पर्यावरण प्रत्येक स्थान पर अलग-अलग प्रभाव डालता है। इस कारण ही भिन्न-भिन्न संस्कृतियों में रहने वाले व्यक्तियों के व्यवहारों में भिन्नता पायी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भिन्नता के अनुसार ही समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा व्यवहार करना सीखता है। तथा उसके आदर्शों के अनुसार अपने जीवन को ढालता है।
(3) नवीनतम अनुभव-प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कुछ-न-कुछ नवीन अनुभवों को अवश्य प्राप्त करता रहता है। ये अनुभव ही उसे सीखने में सहायता देते हैं। चाहे और अनचाहे अनुभव मनुष्य का समाजीकरण करने में अपना योग देते हैं।In simple words: क्यूबर के अनुसार, समाजीकरण में तीन कारक सहायक होते हैं: पैतृक गुण (जो हमें पूर्वजों से मिलते हैं), सांस्कृतिक पर्यावरण (जिसमें हम पलते हैं और जो हमारे व्यवहार को आकार देता है), और नवीनतम अनुभव (जो सीखने की प्रक्रिया में योगदान करते हैं)।
🎯 Exam Tip: क्यूबर द्वारा बताए गए समाजीकरण के तीन सहायक कारकों (पैतृक गुण, सांस्कृतिक पर्यावरण, नवीनतम अनुभव) को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध करें और प्रत्येक की भूमिका को संक्षेप में समझाएं।
Question 11. आनुवंशिकता अथवा वंशानुक्रमण किस प्रकार से मानव जीवन को प्रभावित करते हैं?
Answer: व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण एवं विकास को प्रभावित करने वाले एक मुख्य कारक को आनुवंशिकता अथवा वंशानुक्रमण कहा जाता है। हिंदी के 'वंशानुक्रमण' शब्द के अंग्रेजी पर्यायवाची 'हेरेडिटी' (Heredity) है। यह शब्द वास्तव में लैटिन शब्द 'हेरिडिटास' (Heriditas) से व्युत्पन्न हुआ है। लैटिन भाषा में इस शब्द का आशय उस पूँजी से होता है, जो बच्चों को माता-पिता से उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त होती है। प्रस्तुत संदर्भ में वंशानुक्रमण का आशय व्यक्तियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित होने वाले शारीरिक, बौद्धिक तथा अन्य व्यक्तित्व संबंधी गुणों से है। इस मान्यता के अनुसार बच्चों या संतान के विभिन्न गुण एवं लक्षण अपने माता-पिता के समान होते हैं। उदाहरणार्थ-गोरे माता-पिता की संतान गोरी होती है। लंबे कद के माता-पिता की संतान भी. लंबी होती है। इसी तथ्य के अनुसार प्रजातिगत विशेषताएँ सदैव बनी रहती हैं। घंशानुक्रमण के ही कारण मनुष्य की प्रत्येक संतान मनुष्य ही होती है। कभी भी कोई बिल्ली कुत्ते को जन्म नहीं देती। ऐसा माना जाता है कि लिंग-भेद, शारीरिक लक्षणों, बौद्धिक प्रतिभा, स्वभाव पर वंशानुक्रमण का गंभीर प्रभाव पड़ता हैं। वंशानुक्रमण एक प्रबल एवं महत्त्वपूर्ण कारक हैं, परंतु इसे एकमात्र कारक मानना अंसगत है। इसके अतिरिक्त पर्यावरण भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है, जिसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिए।In simple words: आनुवंशिकता या वंशानुक्रमण व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण का एक महत्वपूर्ण कारक है, जो माता-पिता से बच्चों में शारीरिक, बौद्धिक और व्यक्तित्व संबंधी गुणों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण करता है। यह प्रजातिगत विशेषताओं को बनाए रखता है, लेकिन इसे एकमात्र कारक मानना गलत है क्योंकि पर्यावरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
🎯 Exam Tip: आनुवंशिकता को परिभाषित करें और इसके द्वारा मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को शारीरिक लक्षणों, बौद्धिक क्षमताओं और स्वभाव के संदर्भ में समझाएं, यह भी बताएं कि इसे एकमात्र निर्धारक नहीं मानना चाहिए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
Question 1. सभ्यता को परिभाषित कीजिए तथा इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
या
सभ्यता की संकल्पना को स्पष्ट कीजिए। यह संस्कृति से किस प्रकार अलग है? समझाइए ।
Answer: प्राय: संस्कृति और सभ्यता के अर्थों में भ्रम पैदा हो जाती है। अधिकतर लोगों द्वारा इनको एक-दूसरे के पर्यायवाची के रूप में प्रयोग किया जाता है, परंतु यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो दोनों में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। गंग्वृति के दो पक्ष होते हैं-अभौतिक एवं भौतिक। संज्ञानात्मक एवं आदर्शात्मक पक्ष को संस्कृति कहते हैं, जबकि भौतिक पक्ष को अधिकतर सभ्यता के नाम से जाना जाता है।
सभ्यता का अर्थ तथा परिभाषाएँ
संस्कृति के भौतिक पक्ष को सभ्यता कहा जाता है। सभ्यता में औजारों, तकनीकों, यंत्रों, भवनों तथा यातायात के साधनों के साथ-साथ उत्पादन तथा संप्रेक्षण के उपकरणों को सम्मिलित किया जाता है। मानव ने अपनी सुख-सुविधा के लिए जिन वस्तुओं का उत्पादन किया है उन्हें हम सभ्यता कहते हैं। सभ्यता को उत्पादन बढ़ाने तथा जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने के लिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है। प्रमुख विद्वानों ने सभ्यता को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है-
(1) मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) के अनुसार-सभ्यता से हमारा अर्थ उस संपूर्ण प्रविधि तथा संगठन से है जिसे कि मनुष्य ने अपने जीवन की दशाओं को नियंत्रित करने के उद्देश्य से बनाया हैं।”
(2) ग्रीन (Green) के अनुसार-“एक संस्कृति तभी सभ्यता बनती है जब उसके पास एक लिखित भाषा, विज्ञान, दर्शन, अत्यधिक विशेषीकरण वाला श्रम-विभाजन, एक जटिल प्रविधि तथा राजनीतिक पद्धति हो ।”
(3) ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार-“अधिजैविक संस्कृति के बाद की अवस्था के रूप में सभ्यता की परिभाषा दी जा सकती है।”
(4) क्लाइव बेल (Cliye Bell) के अनुसार-"वह (सभ्यता) मूल्यों के ज्ञान के आधार पर स्वीकृत किया गया तर्क और तर्क के आधार पर कठोर और भेदनशील बनाया गया मूल्यों का ज्ञान है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि सभ्यता का संबंध उस कला विन्यास से है जिसे मनुष्य ने अपने जीवन की दशाओं को नियंत्रित करने हेतु रचा है। यह संस्कृति का अधिक जटिल व विकसित रूप है जिसमें मानव निर्मित भौतिक वस्तुएँ सम्मिलित होती हैं।In simple words: सभ्यता संस्कृति का भौतिक पक्ष है, जिसमें मनुष्य द्वारा अपनी सुख-सुविधा और जीवन को नियंत्रित करने के लिए बनाए गए औजार, तकनीक, और भौतिक वस्तुएँ शामिल हैं। यह संस्कृति से इस मायने में अलग है कि संस्कृति अमूर्त पहलुओं (ज्ञान, मूल्य) पर केंद्रित है जबकि सभ्यता मूर्त, उपयोगी वस्तुओं पर, जिसका उद्देश्य जीवन स्तर में सुधार लाना है।
🎯 Exam Tip: सभ्यता की परिभाषा देते समय उसे संस्कृति के भौतिक पक्ष के रूप में स्पष्ट करें और मैकाइवर एवं पेज, ग्रीन, ऑगबर्न-निमकॉफ तथा क्लाइव बेल जैसे विद्वानों के कथनों का उपयोग करें। संस्कृति से इसके अंतर को भी स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ
सभ्यता की प्रमुख परिभाषाओं से इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं-
1. सभ्यता संस्कृति के विकास का उच्च व जटिल स्तर है।
2. सभ्यता में परिवर्तनशीलता का गुण पाया जाता है।
3. सभ्यता भौतिक संस्कृति है, क्योंकि इसमें मानव निर्मित भौतिक वस्तुएँ ही सम्मिलित की जाती हैं।
4. भौतिक वस्तुओं से संबंधित होने के कारण सभ्यता की प्रकृति मूर्त होती है।
5. सभ्यता में उपयोगिता का गुण पाया जाता है अर्थात् यह मनुष्यों के लिए किसी-न-किसी प्रकार से उपयोगी होती है।
6. सभ्यता में प्रगतिशीलता का गुण पाया जाता है।
7. सभ्यता मानव आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन है। इनसे मानव आनंद व संतुष्टि प्राप्त करता है।
8. सभ्यता में एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रसारित होने की क्षमता पाई जाती है। इसलिए जो कोई वस्तु किसी एक देश में बनती व विकसित होती है उसका अन्य देशों में शीघ्र ही प्रसार हो जाता है।
9. सभ्यता मानव कार्यों को सरल बनाती है।
10. सभ्यता सांस्कृतिक क्रियाओं को शक्ति प्रदान करती है तथा संस्कृति के विकास के उत्थान में सहायता देती है।
सभ्यता एवं संस्कृति में अंतर
सभ्यता और संस्कृति में पाए जाने वाले प्रमुख अंतर निम्न प्रकार हैं-
1. गिलिन एवं गिलिन के मत में, “सभ्यता, संस्कृति को अधिक जटिल तथा विकसित रूप है।”
2. ए० डब्ल्यू० ग्रीन सभ्यता और संस्कृति के अंतर को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि “एक संस्कृति तभी सभ्यता बनती है जब उसके पास लिखित भाषा, विज्ञान, दर्शन, अत्यधिक विशेषीकरण वाला श्रम-विभाजन, एक जटिल प्रविधि और राजनीतिक पद्धति हो।”
3. संस्कृति का संबंध आत्मा से है और सभ्यता का संबंध शरीर से है।
4. सभ्यता को सरलता से समझा जा सकता है, लेकिन संस्कृति को हृदयंगम करना कठिन है।
5. सभ्यता को कुशलता के आधार पर मापना चाहें तो मापा जा सकता है, परंतु संस्कृति को नहीं।
6. सभ्यता में फल प्राप्त करने का उद्देश्य होता है, परंतु संस्कृति में क्रिया ही साध्य है।
7. मैकाइवर एवं पेज के अनुसार-संस्कृति केवल समान प्रवृत्ति वालों में ही संचारित रहती है। कलाकार की योग्यता के बिना कोई भी कला के गुण की परख नहीं कर सकता, न ही संगीतकार के गुण के बिना ही कोई संगीत का मजा ले सकता। सभ्यता सामान्य तौर पर ऐसी माँग नहीं करती। हम उसको उत्पन्न करने वाली सामर्थ्य में हिस्सा लिए बिना ही उसके उत्पादकों का आनंद ले सकते हैं।”
8. सभ्यता का संपूर्ण हस्तांतरण हो सकता है, परंतु संस्कृति का हस्तांतरण पूर्ण रूप से कभी नहीं” हो सकता।
9. सभ्यता का रूप बाह्य होता है, जबकि संस्कृति का आंतरिक ।
10. सभ्यता बिना प्रयास के प्रसारित होती है, जबकि संस्कृति ज्यों-की-त्यों प्रसारित नहीं होती।
11. सभ्यता सदा प्रगति करती है, जबकि संस्कृति सदैव प्रगति नहीं करती।।
निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृति एवं सभ्यता दो भिन्न संकल्पनाएँ हैं, यद्यपि दोनों में परस्पर घनिष्ठ संबंध पाया जाता है। सभ्यता संस्कृति का भौतिक पक्ष है। इसलिए ठीक ही कहा जाता है कि “हमारे पास जो कुछ है वह सभ्यता है, हम जो कुछ हैं वह संस्कृति है।”
Question 2. संस्कृति को परिभाषित कीजिए तथा इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
या
संस्कृति का अर्थ समझाते हुये, संस्कृति की संकल्पना को स्पष्ट कीजिए ।
Answer: संस्कृति समाजशास्त्र की प्रमुख संकल्पना है। समाजशास्त्र में संस्कृति को सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों तथा सामाजिक विरासत के आधार पर समझाने का प्रयास किया जाता है। प्रत्येक समाज की अपनी भिन्न संस्कृति होती है। संस्कृति में समाजशास्त्रियों की रुचि इसलिए है क्योंकि संस्कृति तथा सांस्कृतिक परिवर्तन समाज और सामाजिक परिवर्तन को प्रभावित करते हैं। इसलिए, संस्कृति की संकल्पना इसके आयामों तथा भेदों का अध्ययन समाजशास्त्र की विषय-वस्तु में सम्मिलित किया जाता है। वैसे संस्कृति का अध्ययन मानवशास्त्र में किया जाता है। संस्कृति का समाजशास्त्र में अध्ययन करने का एक अन्य कारण इसका व्यक्तित्व पर पड़ने वाला गहरा प्रभाव है।
संस्कृति का अर्थ तथा परिभाषाएँ
मनुष्य प्राकृतिक वातावरण में अनेक सुविधाओं का उपभोग करता है तो दूसरी ओर उसे अनेक असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। परंतु मनुष्य ने आदिकाल से प्राकृतिक बाधाओं को दूर करने के लिए वे अपनी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेक समाधानों की खोज की है। इन खोजे गए उपायों को मनुष्य ने आगे आने वाली पीढ़ी को भी हस्तांतरित किया। प्रत्येक पीढ़ी ने अपने पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान और कला को और अधिक विकास किया है। अन्य शब्दों में, प्रत्येक पीढ़ी ने अपने पूर्वजों के ज्ञान को संचित किया है और इस ज्ञान के आधार पर नवीन ज्ञान और अनुभव का भी ज्ञान अर्जन किया है। इस प्रकार के ज्ञान व अनुभव के अंतर्गत यंत्र, प्रविधियाँ, प्रथाएँ, विचार और मूल्य आदि आते हैं। ये मूर्त और अमूर्त वस्तुएँ संयुक्त रूप से 'संस्कृति' कहलाती हैं। इस प्रकार, वर्तमान पीढ़ी ने अपने पूर्वजों तथा स्वयं के प्रयासों से जो अनुभव व व्यवहार सीखा है वही संस्कृति है। प्रमुख विद्वानों ने संस्कृति को निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया है-
1. हॉबल (Hoebel) के अनुसार-"संस्कृति संबंधित सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का संपूर्ण योग है जो कि एक समाज के सदस्यों की विशेषताओं को बतलाता है और जो इसलिए प्राणिशास्त्रीय विरासत का परिणाम नहीं होता ।”
2. बीरस्टीड (Bierstedt) के अनुसार-"संस्कृति वह संपूर्ण जटिलता है जिसमें वे सभी वस्तुएँ सम्मिलित हैं जिन पर हम विचार करते हैं, कार्य करते हैं और समाज का सदस्य होने के नाते अपने पास रखते हैं।”
3. मैकाइवर एवं पेंज (MacIver and Page) के शब्दों में-"संस्कृति हमारे दैनिक व्यवहार में कला, साहित्य, धर्म, मनोरंजन और आनन्द में पाए जाने वाले रहन-सहन और विचार के ढंगों में हमारी प्रकृति की अभिव्यक्ति है।”
4. पिडिंगटन (Piddington) के अनुसार-"संस्कृति उन भौतिक एवं बौद्धिक साधनों या उपकरणों का संपूर्ण योग है जिनके द्वारा मानव अपनी जैविक एवं सामाजिक आवश्यकताओं की संतुष्टि तथा अपने पर्यावरण से अनुकूलन करता है।"
5. मजूमदार (Mazumdar) के अनुसार-"संस्कृति मानव-उपलब्धियों, भौतिक तथा अभौतिक, * का संपूर्ण योग है जो समाजशास्त्रीय रूप से, अर्थात् परंपरा एवं संचरण द्वारा, क्षितिजीय एवं लंबे रूप में हस्तांतरणीय है।”
6. कोनिग (Koenig) के अनुसार-"संस्कृति मनुष्य द्वारा स्वयं को अपने पर्यावरण के साथ अनुकूलित करने एवं अपने जीवन के ढंगों को उन्नत करने के प्रयत्नों का संपूर्ण योग है।”
7. रैडफील्ड (Redfield) के अनुसार-"संस्कृति ऐसे परंपरागत विश्वासों के संगठित समूह को कहते हैं जो कला एवं कलाकृतियों में प्रतिबिंबित होते हैं तथा जो परंपरा द्वारा चलते रहते हैं। और किसी मानव समूह की विशेषता को चित्रित करते हैं।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृति में दैनिक जीवन में पाई जाने वाली समस्त वस्तुएँ आ जाती हैं। मनुष्य भौतिक, मानसिक तथा प्राणिशास्त्रीय रूप में जो कुछ पर्यावरण से सीखता है उसी को संस्कृति कहा जाता है। यह सीखने की प्रक्रिया (समाजीकरण) द्वारा पूर्व पीढ़ियों से प्राप्त सामाजिक विरासत है जो शुक्राणुओं द्वारा स्वचालित रूप से हस्तांतरित जैविक विरासत से पूर्णतः भिन्न है। वस्तुतः संस्कृति पर्यावरण का मानव-निर्मित भाग है। यह उन तरीकों को कुल योग है जिनके द्वारा मनुष्य अपना जीवन व्यतीत करता है।
संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ
संस्कृति की संकल्पना को इसकी निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-
1. परिवर्तनशीलता-संस्कृति सदा परिवर्तनशील है। इसमें परिवर्तन होते रहते हैं, चाहे वे परिवर्तन धीरे-धीरे हों या आकस्मिक रूप में। वास्तव में, संस्कृति मनुष्य की विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति की विधियों का नाम हैं। चूंकि समाज में परिस्थितियाँ सदा एक-सी नहीं रहती हैं इसलिए आवश्यकताओं की पूर्ति की विधियों में भी परिवर्तन करना पड़ता है। पहले तलवार से युद्ध किया जाता था, परंतु अब बंदूकों, तोपों, बमों द्वारा यह काम किया जाता हैं। पहले लोग बैलगाड़ियों से और पैदल यात्रा करते थे, अब वे हवाई जहाजे और मोटरों से यात्रा करते हैं। जब इस प्रकार की पद्धतियाँ समाज द्वारा स्वीकृत हो जाती हैं और आने वाली पीढ़ियों में हस्तांतरित कर दी जाती हैं तो संस्कृति में परिवर्तन हो जाता है। यह तो स्पष्ट ही है। कि प्रत्येक समाज के रहन-सहन में कुछ-न-कुछ परिवर्तन होता ही रहता है; अतः यह कहना ठीक ही है कि संस्कृति सदा परिवर्तनशील है।
2. आदर्शात्मक-संस्कृति में सामाजिक विचार, व्यवहार-प्रतिमान आदि आदर्श रूप में होते हैं। इनके अनुसार कार्य करना सुसंस्कृत होने का प्रतीक माना जाता है। सभी मनुष्य संस्कृति के आदर्श प्रतिमानों के अनुसार अपने जीवन को बनाने का प्रयास करते हैं। इसीलिए संस्कृति की प्रकृति आदर्शात्मक होती है।
3. सामाजिकता का गुण-संस्कृति का जन्म समाज में तथा समाज के सदस्यों द्वारा होता है। इसीलिए यह कहा जाता है कि मानव स्वयं अपनी संस्कृति का निर्माता होता है। मानव समाज के बाहर संस्कृति की रक्षा नहीं की जा सकती। पशु समाज संस्कृति-विहीन समाज है क्योंकि इसमें किसी प्रकार की संस्कृति नहीं होती है।
4. सीखा हुआ आचरण-व्यक्ति समाजीकरण की प्रक्रिया में कुछ-न-कुछ सीखता ही रहता है। ये सीखे हुए अनुभव, विचार- प्रतिमान आदि ही संस्कृति के तत्त्व होते हैं। इसलिए संस्कृति को सीखा हुआ व्यवहार कहा जाता है। बाल कटवाना, लाइन में खड़ा होना, अच्छे कपड़े पहनना, अभिवादन करना, नाचना-गाना आदि सीखे हुए व्यवहार के उदाहरण हैं। इस संबंध में ध्यान रखने की एक बात यह है कि मनुष्य समाज में रहकर अज्ञात रूप से भी अनेक बातें सीखता है। जिनको सीखने को वह स्वयं प्रयत्न नहीं करता। परिवार में रहकर व्यक्ति अनेक बातें अपना माता-पिता तथा अन्य व्यक्तियों से धीरे-धीरे सीखती है तथा अनेक बातें ऐसी होती हैं जिनकी उसको समुचित रूप से शिक्षा दी जाती है। मनुष्य जो कुछ भी ज्ञात- अज्ञात से समाज से सीखता। है वह सब संस्कृति में सम्मिलित होता है।
5. संगठित प्रतिमान-संस्कृति में सीखे हुए आचरण संगठित प्रतिमानों के रूप में होते हैं। संस्कृति में प्रत्येक व्यक्ति के आचरणों की इकाइयों में एक व्यवस्था और सबंध होता है। किसी भी मनुष्य का आचरण उसके पृथक्-पृथक् आचरणों की सूची नहीं होता। उदाहरण के लिए-बच्चा परिवार में जन्म लेता है। परिवार में उसे प्रारंभ से ही उसकी संस्कृति का ज्ञान कराया जाता है। बच्चे का बोलना, चलना-फिरना, व्यवहार करना आदि ऐसे प्राथमिक आचरण हैं जो आजीवन चलते रहते हैं। हमारे मस्तिष्क में इन सब वर्गों के व्यवहारों की जो एक संगठित रूपरेखा या स्वरूप है उसी को हम प्रतिमान कहते हैं। संस्कृति के अंतर्गत सीखे हुए व्यवहारों के इसी प्रकार के संगठित प्रतिमान सम्मिलित होते हैं।
6. पार्थिव या अपार्थिव दोनों तत्वों का विद्यमान रहना-संस्कृति के अंतर्गत दो प्रकार के तत्त्व आते हैं-एक, पार्थिव और दूसरे, अपार्थिव । ये दोनों ही तत्त्व संस्कृति का निर्माण करते हैं। अपार्थिव स्वरूप को हम आचरण या क्रिया कह सकते हैं अर्थात् जिन्हें छुआ या देखा न जा सके या जिनका कोई स्वरूप नहीं; जैसे-बोलना, गाना, अभिवादन करना आदि । जिन् पार्थिव या साकार वस्तुओं का मनुष्य सृजन करता है वे पार्थिव तत्त्वों के अंतर्गत आती हैं; जैसे- रेडियो, मोटर, टेलीविजन, सिनेमा आदि ।
7. भिन्नता-प्रत्येक समाज की संस्कृति भिन्न होती हैं अर्थात् प्रत्येक समाज की अपनी पृथक् प्रथाएँ, परंपराएँ, धर्म, विश्वास, कला का ज्ञान आदि होते हैं। संस्कृति में भिन्नता के कारण ही विभिन्न समाजों में रहने वाले लोगों का रहन-सहन, खान- पान, मूल्य, विश्वास एवं रीति-रिवाज भिन्न-भिन्न होते हैं।
8. हस्तातंरण की विशेषता-संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित हो जाती है। संस्कृति का अस्तित्व हस्तांतरण के कारण स्थायी बना रहता है। हस्तांतरण की यह प्रक्रिया निरंतर होती रहती है। संस्कृति का हस्तांतरण माता-पिता, वयोवृद्धों, अध्यापकों आदि के द्वारा होता है। यहाँ हस्तांतरण का आशय केल यही है कि एक पीढ़ी अपने आचरणों को दूसरी पीढ़ी को सिखा देती है अर्थात् ये एक पीढ़ी से दूसरी में स्वतः हस्तांतरित होते रहते हैं। यह हस्तांतरण या सीखना अज्ञात या आकस्मिक रूप में भी हुआ करता है। इस प्रकार, संस्कृति की यह एक और विशेषता है कि वह युगों से हस्तांतरित होती आती है।
In simple words: संस्कृति हमारे सीखे हुए व्यवहार, विचारों और रीति-रिवाजों का कुल योग है जो हमें पीढ़ी दर पीढ़ी मिलता है। यह मानव जीवन को आकार देती है और विभिन्न समाजों में अलग-अलग होती है, समय के साथ बदलती भी है।
🎯 Exam Tip: संस्कृति की परिभाषा और उसकी विशेषताओं को समझना समाजशास्त्र के मूल सिद्धांतों में से एक है। परिभाषाएँ स्पष्ट रूप से लिखें और विद्वानों के नाम अवश्य उद्धृत करें।
Question 3. सामाजिक आदर्श की परिभाषा दीजिए तथा सामाजिक आदर्शों के प्रमुख प्रकार एवं विशेषताएँ बताइए ।
या
सामाजिक आदर्श से आप क्या समझते हैं? सामाजिक आदर्शों का महत्त्व बताइए ।
Answer: किसी समाज में व्यवहार करने के जो नियम हैं उन्हें सामाजिक आदर्श कहा जाता है। इन्हीं आदर्शों से हमें उचित-अनुचित का पता चलता है और इन्हीं से समाज की आचरण संबंधी प्रत्याक्षाएँ विकसित होती हैं। सामाजिक आदर्शों से ही हमें पता चलता है किससे, किन परिस्थितियों में, किसके द्वारा, क्या कार्य करने या न करने की आशा की जाती है तथा इनको पालन न करने पर क्या दंड दिया जाता है।
सामाजिक आदर्शों का अर्थ एवं परिभाषाएँ
सामाजिक आदर्श व्यवहार के वे नियम हैं जो समाज द्वारा स्वीकृति के कारण संस्थागत हो जाते हैं तथा स्वीकृत व्यवहार के नियम आदर्श कहलाते हैं। इन्हें निम्न प्रकार से परिभाषित किया जा सकता हैं-
1. रॉबर्ट बीरस्टीड (Robert Bierstedt) के अनुसार-"एक आदर्श, संक्षेप में प्रक्रिया को मानकी प्रतिरूप है। अपने समाज के लिए स्वीकार करने योग्य कुछ करने का तरीका है।”
2. किंग्स्ले डेविस (Kingsley Davis) के अनुसार-"आदर्श नियंत्रण हैं। ये वे तत्त्व हैं जिनके द्वारा मानव समाज अपने सदस्यों के व्यवहारों का नियमन इस प्रकार करता है कि वे सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए अपनी क्रियाओं का संपादन करते रहें और कभी-कभी सावयवी आवश्यकताओं के मूल्य पर भी ।”
3. ग्रीन (Green) के अनुसार-"सामाजिक आदर्श मानकीकृत सामान्यीकरण है जिनके परिणामस्वरूप सदस्यों से एक निश्चित व्ययवहार करने की आशा की जाती है।”
4. शेरिफ एवं शेरिफ (Sheriff and Sheriff) के अनुसार-"जीवन और उसके उन्नयन के विविध कार्यों में संलग्न व्यक्तियों की अंतक्रिया के बीच समूह की संरचना का जन्म होता है, व्यक्ति विभिन्न कार्य करते हैं और प्रत्येक की एक सापेक्ष परिस्थिति हो जाती है। कार्य संचालन का क्रम और उनके नियमों का स्वरूप स्थिर हो जाता है। इस प्रकार नियम, व्यवहार के तरीके तथा अनुकरणीय जीवन मूल्य आदि सामूहिक अंतःक्रिया के ही सह-उत्पादन हैं, नियमों, मानकों और मूल्यों के इस विशिष्ट गठन को समूह के सामाजिक आदर्शों के रूप में जाना जाता है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक आदर्श समाज के वे नियम हैं जो सदस्यों के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं तथा समाज द्वारा अनुमोदित होते हैं।
सामाजिक आदर्शों की विशेषताएँ
सामाजिक आदर्श की संकल्पना को इसकी निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-
1. संस्कृति के प्रतिनिधि-सामाजिक आदर्शों को संबंधित संस्कृति अथवा समूह का प्रतिनिधि माना जाता है। इन आदर्शों की प्रकृति से हम उस समाज या समूह की प्रकृति के बारे में अनुमान लगा सकते हैं।
2. सामाजिक अनुमोदन-सामाजिक आदर्शों की दूसरी विशेषता समाज अथवा संबंधित समूह द्वारा इनको प्राप्त स्वीकृति है। सामूहिक स्वीकृति के कारण ही इनमें स्थायित्व का गुण पाया जाता है। अतः आदर्श में वे व्यवहार नियम नहीं आते जिनको सामूहिक अनुमोदन प्राप्त नहीं है।
3. स्थायी प्रकृति-सामाजिक आदर्शों की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इनमें स्थायित्व पाया जाता है, क्योंकि इनका विकास शनैःशनैः होता है और ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होते रहते हैं। इसलिए इनमें परिवर्तन लाना कठिन है। इस स्थायी प्रकृति के कारण ही आदर्श समूह के सदस्यों का अंग बन जाते हैं।
4. लिखित व अलिखित स्वरूप-सामाजिक आदर्शों का स्वरूप लिखित एवं अलिखित दोनों प्रकार का हो सकता है। अधिकांशतः आदर्श दोनों ही रूपों में समाज में विद्यमान होते हैं तथा व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं।
5. कर्तव्य की भावना-सामाजिक आदर्शों का पालन इसलिए किया जाता है क्योंकि इनके साथ । कर्त्तव्य की भावना जुड़ी होती है। सामान्यतः इनका पालन करना सदस्य अपना गौरव समझते
6. रूढ़िवादी प्रकृति-यद्यपि सामाजिक आदर्श हमारे व्यवहार के प्रमुख आधार हैं फिर भी इनकी । प्रकृति रूढ़िवादी होती है। इस रूढ़िवादी प्रकृति के कारण ही इनमें परिवर्तन सरलता से नहीं किया जा सकता है।
7. दोहरी प्रकृति-सामाजिक आदर्शों की प्रकृति दोहरी होती है। ये एक ओर व्यक्तियों को प्रभावित करते हैं और उन पर नियंत्रण रखते हैं तो दूसरी ओर स्वयं व्यक्तियों से प्रभावित होते रहते हैं।
8. कल्याणकारी प्रकृति-सामाजिक आदर्श सामूहिक होते हैं तथा इनकी प्रकृति कल्याणकारी होती है। इसी प्रकृति के कारण इनमें स्थायित्व होता है और सदस्य इन्हें अपने व्यक्तित्व का अंग बना लेते हैं।
सामाजिक आदर्शों के प्रकार
सामाजिक आदर्श सामाजिक परिस्थितियों की देन हैं, समाज द्वारा अनुमोदित होते हैं तथा व्यक्तियों के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। आदर्श अनेक प्रकार के होते हैं। रॉबर्ट बीरस्टीड (Robert Bierstedt) ने सामाजिक आदर्शों को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित किया है-
1. जनरीतियाँ (Folkways),
2. रूढ़ियाँ (Mores) तथा
3. कानून (Law)
किंग्स्ले डेविस (Kingsley Davis) ने सामाजिक आदर्शों के अग्रलिखित प्रकारों का उल्लेख किया है-
1. रूढ़ियाँ (Mores),
2. प्रथागत कानून (Customary law),
3. जनरीतियाँ (Folkways),
4. फैशन तथा सनक (Fashion and fad),
5. संस्थाएँ (Institutions),
6. परिपाटी एवं शिष्टाचार (Convention and etiquette) तथा
7. प्रथा, नैतिकता तथा धर्म (Custom, morality and religion)।
आदर्शों को सकारात्मक एवं नकारात्मक में भी विभाजित किया गया है। प्रथम प्रकार के आदर्श व्यक्तियों के अनुपालन हेतु निर्देश देते हैं, जबकि दूसरे प्रकार के आदर्श किसी व्यवहार का न करने पर बल देते हैं।
सामाजिक आदर्शों का महत्त्व
सामाजिक आदर्श समाज द्वारा अनुमोदित व्यवहार के वे नियम होते हैं जिनका पालन करना व्यक्ति अपना कर्तव्य मानते हैं; अतः समाज में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। इनके महत्त्व को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-
1. सामाजिक आदर्श समाज के सदस्यों के व्यवहार में अनुरूपता लाने में सहायक है।
2. सामाजिक आदर्श समाज के सदस्यों को उचित तथा अनुचित का ज्ञान कराते हैं और इस प्रकार उनका मार्गदर्शन करते हैं।
3. सामाजिक आदर्श समाज को संगठित करने तथा इस प्रकार समाज की व्यवस्था को बनाए रखने ' व एकता लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
4. सामाजिक आदर्श नागरिक नियंत्रण के प्रमुख साधन हैं तथा वे केवल व्यक्तियों के व्यवहार को ही नियंत्रित नहीं करते अपितु समूहों के व्यवहार को भी नियंत्रित करते हैं।
5. सामाजिक आदर्श सामाजिक विरात के रूप में संस्कृति की रक्षा करते हैं तथा इसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित करते हैं।
6. सामाजिक आदर्श व्यक्तित्व के विकास की प्रक्रिया में सहायक होते हैं।
7. सामाजिक आदर्श सामाजिक प्रतिष्ठा का निर्धारण करते हैं तथा साथ ही इसकी रक्षा करते हैं।
In simple words: सामाजिक आदर्श वे नियम हैं जो समाज द्वारा स्वीकृत होते हैं और व्यक्तियों के व्यवहार को निर्देशित करते हैं। ये व्यक्तियों को सही-गलत का बोध कराते हैं और समाज को सुव्यवस्थित रखने में मदद करते हैं।
🎯 Exam Tip: सामाजिक आदर्शों की विभिन्न परिभाषाओं, उनकी विशेषताओं और प्रकारों को समझना आवश्यक है। प्रमुख समाजशास्त्रियों के वर्गीकरण को याद रखें।
Question 4. सामाजिक मूल्य क्या हैं? सामाजिक मूल्यों के प्रकार तथा महत्त्व की विवेचना कीजिए ।
या
सामाजिक मूल्यों की संकल्पना स्पष्ट कीजिए तथा सामाजिक मूल्यों की विशेषताएँ बताइएं ।
Answer: सामाजिक मूल्य समाज के प्रमुख तत्त्व हैं तथा इन्हीं मूल्यों के आधार पर हम किसी समाज की प्रगति, उन्नति, अवनति अथवा परिवर्तन की दिशा निर्धारित करते हैं। इन्हीं मूल्यों द्वारा व्यक्तियों की क्रियाएँ निर्धारित की जाती हैं तथा इससे समाज का प्रत्येक पक्ष प्रभावित होता है। सामाजिक मूल्यों के बिना न तो समाज की प्रगति की कल्पना की जा सकती है और न ही भविष्य में प्रगतिशील क्रियाओं का निर्धारण ही संभव है। मूल्यों के आधार पर ही हमें यह पता चलता है कि समाज में किस चीज को अच्छा अथवा बुरा समझा जाता है। अतः सामाजिक मूल्य मूल्यांकन का भी प्रमुख आधार हैं। विभिन्न समाजों की आवश्यकताएँ तथा आदर्श भिन्न-भिन्न होते हैं; अतः सामाजिक मूल्यों के मापदंड भी भिन्न-भिन्न होते हैं। किसी भी समाज में सामाजिक मूल्य उन उद्देश्यों, सिद्धांतों अथवा विचारों को कहते हैं जिनको समाज के अधिकांश सदस्य अपने अस्तित्व के लिए आवश्यक समझते हैं और जिनकी रक्षा के लिए बड़े-से-बड़ा बलिदान करने को तत्पर रहते हैं। मातृभूमि, राष्ट्रगान, धर्म निरपेक्षता, प्रजातंत्र इत्यादि हमारे सामाजिक मूल्यों को ही व्यक्त करते हैं।
सामाजिक मूल्यों का अर्थ तथा परिभाषाएँ
सामाजिक मूल्य प्रत्येक समाज के वातावरण और परिस्थितियों के वैभिन्त्र्य के कारण अलग-अलग होते हैं। ये मानव मस्तिष्क को विशिष्ट दृष्टिकोण प्रदान करते हैं, जो सामाजिक मूल्यों के निर्माता होते हैं। प्रत्येक समाज की सांस्कृतिक विशेषताएँ अपने समाज के सदस्यों में विशिष्ट मनोवृत्तियों उत्पन्न कर देती हैं जिनके आधार पर भिन्न-भिन्न विषयों और परिस्थितियों का मूल्यांकन किया जाता है। यह संभव है कि जो 'आदर्श' और 'मूल्य एक समाज के लिए मान्य हैं, वे ही दूसरे समाज में अक्षम्य अपराध माने जाते हों। उदाहरणार्थ-भारत के सभ्य समाजों में विवाहेतर यौन संबंध मूल्यों की दृष्टि से घातक हैं किंतु जनजातियों के ये सर्वोच्च लाभदायी मूल्य हैं। अतः मूल्यों का निर्धारण समाज की विशेषता पर आधारित है। प्रमुख विद्वानों ने सामाजिक मूल्यों की परिभाषाएँ निम्न प्रकार से दी हैं-
1. राधाकमल मुखर्जी (R.K. Mukherjee) के अनुसार-"मूल्य समाज द्वारा मान्यता प्राप्त वे । इच्छाएँ तथा लक्ष्य हैं जिनका आंतरीकरण समाजीकरण की प्रक्रिया क माध्यम से होता है और जो व्यक्पितरक अधिमान्यताएँ, मानदंड (मानक) तथा अभिलाषाएँ बन जाती हैं।”
2. रॉबर्ट बीरस्टीड (Robert Bierstedt) के अनुसार-"जब किसी समाज के स्त्री-पुरुष अपने ही तरह के लोगों के साथ मिलते हैं, काम करते हैं या बात करते हैं, तब मूल्य ही उनके क्रमबद्ध सामाजिक संसर्ग को संभव बनाते हैं।”
3. एच० एम० जॉनसन (H.M. Johnson) के अनुसार-"मूल्य को एक धारणा या मानक के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। यह सांस्कृतिक हो सकता है या केवल व्यक्तिगत और इसके द्वारा चीजों की एक-दूसरे के साथ तुलना की जाती है, इसे स्वीकृत या अस्वीकृति प्राप्त । होती है, एक-दूसरे की तुलना में उचित अनुचित, अच्छा या बुरा, ठीक अथवा गलत माना जाता है।”
4. वुड्स (Woods) के अनुसार-"मूल्य दैनिक जीवन के व्यवहार को नियंत्रित करने के सामान्य सिद्धांत हैं। मूल्य न केवल मानव व्यवहार को दिशा प्रदान करते हैं अपितु वे अपने आप में आदर्श एवं उद्देश्य भी हैं। जहाँ मूल्य होते हैं वहाँ न केवल यह देखा जाता है कि क्या चीज होनी चाहिए बल्कि यह भी देखा जाता है कि वह सही है या गलत है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह स्पष्ट हो होता है कि मूल्य का एक सामाजिक आधार होता है। और वे समाज द्वारा मान्यता प्राप्त लक्ष्यों की अभिव्यक्ति करते हैं। मूल्य हमारे व्यवहार का सामान्य तरीका है। मूल्यों द्वारा ही हम अच्छे या बुरे, सही या गलत में अंतर करना सीखते हैं।
मूल्यों का समाजशास्त्रीय महत्त्व
सामाजिक मूल्य समाज के सदस्यों की आंतरिक तथा मनोवैज्ञानिक भावनाओं पर आधारित होते हैं। इसीलिए समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से मूल्यों का अत्यधिक महत्त्व होता है। इनके आधार पर ही सामाजिक घटनाओं एवं समस्याओं का मूल्यांकन किया जाता है। मूल्य व्यक्तिगत, सामाजिक और अंतर्राष्ट्रीय जीवन को भी अपने अनुरूप बनाने का प्रयास करते हैं।
सामाजिक मूल्य सामाजिक एकरूपता के जनक हैं, क्योंकि मूल्य व्यवहार के प्रतिमान अथवा मानकों को प्रस्तुत करते हुए समाज के सदस्यों से अपेक्षा करते हैं कि वे अपने आचरण द्वारा मूल्यों का स्तर बनाए रखेंगे। इस तरह सामाजिक प्रतिमानों के रूप में मूल्यों का निर्धारण होता है।
सामाजिक मूल्यों से ही विभिन्न प्रकार की मनोवृत्तियों का निर्धारण होता है तथा व्यक्ति को उचित एवं अनुचित का ज्ञान होता है। शिल्स तथा पारसन्स (Shils and Parsons) के अनुसार, सामाजिक मूल्य सामाजिक व्यवहार के कठोर नियंत्रक हैं। इनके अनुसार, सामाजिक मूल्यों के बिना सामाजिक जीवन असंभव है, सामाजिक व्यवस्था सामूहिक लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सकती तथा व्यक्ति अन्य व्यक्तियों को अपनी आवश्यकताओं एवं जरूरतों को भावात्मक रूप से नहीं बता पाएँगे । संक्षेप में सामाजिक मूल्यों का निम्नलिखित महत्त्व हैं-
1. मानव समाज में व्यक्ति इन मूल्यों के आधार पर समाज द्वारा स्वीकृत नियमों का पालो करता | है। वह उनके अनुकूल अपने व्यवहार को ढालकर अपना जीवन व्यतीत करता है।
2. सामाजिक मूल्यों के आधार पर सामाजिक तथ्यों और घटनाओं; जैसे-विचार, अनुभव तथा क्रियाओं आदि का ज्ञान प्राप्त होता है। अतः सामाजिक तथ्यों को समझने के लिए सामाजिक मूल्यों का ज्ञान होना आवश्यक है।
3. समाज के सदस्यों की प्रवृत्तियाँ व मनोवृत्तियाँ सामाजिक मूल्यों के आधार पर निर्धारित की जाती
4. मनुष्य अपनी अनंत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सतत प्रयत्न करता रहता है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति में उसे सामाजिक मूल्यों से पर्याप्त सहायता प्राप्त होती है।
5. सामाजिक मूल्य व्यक्तियों को अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं व उद्देश्यों को वास्तविकता प्रदान करने का आधार प्रस्तुत करते हैं।
6. समाज सामाजिक संबंधों का जाल है। सामाजिक मूल्य संबंधों के इस जाल को संतुलित करने व समाज़ के सदस्यों में सामंजस्य बनाए रखने में सहयोग प्रदान करते हैं।
7. सामाजिक मूल्य व्यक्ति के समाजीकरण एवं विकास में सहायक होते हैं।
8. सामाजिक मूल्यों के आधार पर ही सामाजिक क्रियाओं एवं कार्यकलापों का ज्ञान होता है।
सामाजिक मूल्यों की प्रमुख विशेषताएँ अथवा लक्षण निम्नलिखित हैं-
1. किसी भी समाज के मूल्य वहाँ की संस्कृति द्वारा निर्धारित होते हैं; अतः मूल्य संस्कृति की उपज हैं तथा वे संस्कृति को बनाए रखने में भी सहायक होते हैं।
2. सामाजिक मूल्य मानसिक धारणाएँ हैं; अतः जिस प्रकार समाज अमूर्त है उसी प्रकार मूल्य भी अमूर्त होते हैं। अन्य शब्दों में, सामाजिक मूल्यों को न तो देखा जा सकता है और न ही इनको स्पर्श किया जा सकता है, इनका केवल अनुभव किया जा सकता है।
3. मूल्य व्यवहार करने के विस्तृत तरीके ही नहीं है अपितु समाज द्वारा वांछित तरीकों के प्रति व्यक्त की जाने वाली प्रतिबद्धता भी है।
4. प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक मूल्यों को अपने ढंग से लेता है और उनका निर्वाचन करता है। एक सन्यासी एवं व्यापारी के लिए ईमानदारी' (जो कि एक सामाजिक मूल्य है) का अर्थ भिन्न-भिन्न हो सकता है।
5. सामाजिक मूल्य मानव व्यवहार के प्रेरक अथवा चालक के रूप में कार्य करते हैं।
6. सामाजिक मूल्य व्यक्ति पर थोपे नहीं जाते अपितु वह समाजीकरण द्वारा स्वयं इनका अंतरीकरण कर लेता है और इस प्रकार वे उसके व्यक्तित्व के ही अंग बन जाते हैं।
7. सामाजिक मूल्य व्यक्ति के लक्ष्यों, साधनों व तरीकों के चयन के पैमाने हैं। हम सामाजिक मूल्यों के आधार पर ही किसी एक लक्ष्य को अन्य की अपेक्षा अधिक प्राथमिकता देते हैं।
8. सामाजिक मूल्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते रहते हैं और इसलिए इनमें परिवर्तन करना कठिन होता है। व्यक्तियों की इनके प्रति प्रतिबद्धता या वचनबद्धता के कारण भी इनमें परिवर्तन करना कठिन होता है।
9. सामाजिक मूल्यों में संज्ञानात्मक, आदर्शात्मक तथा भौतिक तीनों प्रकार के तत्त्व निहित होते हैं।
10. किसी भी समाज की प्रगति का मूल्यांकन सामाजिक मूल्यों के आधार पर ही किया जाता है।
11. सामाजिक मूल्य ही नैतिकता-अनैतिकता अथवा उचित-अनुचित के मापंदड होते हैं।
सामाजिक मूल्यों के प्रकार
सामाजिक मूल्य विभिन्न प्रकार के होते हैं तथा विद्वानों ने इनका वर्गीकरण विविध प्रकार से किया है। प्रमुख विद्वानों द्वारा प्रस्तुत वर्गीकरण इस प्रकार हैं- (अ) राधाकमल मुखर्जी (Radhakamal Mukherjee) के अनुसार सामाजिक मूल्य प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक संगठन व सामाजिक व्यवस्था से संबंधित होते हैं। इन्होंने चार प्रकार के मूल्यों का उल्लेख किया है-
1. वे मूल्य जिनका संबंध आदान-प्रदान व सहयोग आदि से होता है। इन मूल्यों के आधार पर आर्थिक जीवन की उन्नति होती है व आर्थिक जीवन संतुलित होता है।
2. वे मूल्य जिनके आधार पर सामान्य सामाजिक जीवन के प्रतिमानों व आदर्शों का निर्धारण होता है। इन मूल्यों के अंतर्गत एकता व उत्तरदायित्व भी भावना आदि समाहित होती है।
3. वे मूल्य जो सामाजिक संगठन व व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए समाज में समानता व सामाजिक न्याय का प्रतिपादन करते हैं।
4. वे मूल्य जो समाज में उच्चता लाने व नैतिकतों को विकसित करने में सहायता प्रदान करते हैं।
(ब) इलियट एवं मैरिल (Elliott and Merrill) ने अमेरिकी समाज के संदर्भ में तीन प्रकार के सामाजिक मूल्यों का उल्लेख किया है-
1. आर्थिक सफलता
2. मानवीय स्नेह तथा
3. देशभक्ति या राष्ट्रीयता की भावना ।
(स) सी० एम० केस (C.M. Case) ने सामाजिक मूल्यों को चार भागों में विभाजित किया है-
1. सामाजिक मूल्य-ये मूल्य सामाजिक जीवन से संबंधित होते हैं। सहयोग, दान, सेवा, निवास, भूमि, समूह इत्यादि के निर्धारित मूल्य इस कोटि में आते हैं।
2. सांस्कृतिक मूल्य-इन मूल्यों की उत्पत्ति व्यक्ति के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में नियमितता और नियंत्रण के लिए हुई। परंपरा, लोक कला, रीति-रिवाज, धार्मिक क्रियाएँ, गायन, नृत्य सभी सांस्कृतिक मूल्य कहे जाते हैं।
3. विशिष्ट मूल्य-इनका निर्धारण परिस्थितियों के लिए किया जाता है। अवसर-विशेष के लिए जिन मूल्यों का प्रचलन किया जाता है वे ही विशिष्ट मूल्य कहलाते हैं, जैसे-ब्रिटिश सत्ता को । उखाड़ फेंकने के लिए भारतीय जनता एक साथ कृत संकल्प हुई थी।
4. जैविक या सावयवी मूल्य-ये मूल्य व्यक्ति की शरीर रक्षा के लिए निर्धारित किए जाते हैं। जैसे-'शराब मत पियो' सावयवी मूल्य ही है क्योंकि शराब के परिणाम खराब स्वास्थ्य, विभिन्न बीमारियों तथा मानसिक असमर्थता आदि हैं जिनको प्रभाव व्यक्ति के शरीर के साथ ही भावी संतान पर भी पड़ता है तथा समाज में भी शराब के दुष्परिणाम देखे जा सकते हैं।
In simple words: सामाजिक मूल्य वे मानक या विश्वास हैं जो समाज में सही, गलत, अच्छा और बुरा तय करते हैं। ये व्यक्तियों के व्यवहार को दिशा देते हैं और समाज की व्यवस्था तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
🎯 Exam Tip: सामाजिक मूल्यों की अवधारणा को परिभाषाओं, विशेषताओं और विभिन्न समाजशास्त्रियों के वर्गीकरण के माध्यम से विस्तार से समझाना चाहिए। उदाहरणों का प्रयोग उत्तर को अधिक प्रभावी बनाता है।
Question 5. अनुपालन को परिभाषित कीजिए तथा इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
या
अनुपालन के अर्थ को समझाते हुए अनुपालन की संकल्पना को स्पष्ट कीजिए ।
या
अनुपालन किसे कहते हैं? इसके प्रमुख कारण बताइए।
Answer: 'अनुपालन' समाजशास्त्र की प्रमुख संकल्पना है। अनुपालन का अर्थ व्यक्तियों द्वारा समाज की मान्यताओं के अनुकूल व्यवहार करना है। इसकी विपरीत स्थिति को 'विचलन' कहते हैं जिसका अर्थ समाज के आदर्शों एवं मान्यताओं से हटकर व्यवहार करना है। यद्यपि समाज के अधिकांश व्यक्ति समाज की मान्यताओं एवं आदर्शों के अनुरूप व्यवहार करते हैं, तथापि प्रत्येक समाज में कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो कि समाज की मान्यताओं व आदर्शों से हटकर व्यवहार करते हैं। उनके इसी व्यवहार को विचलन कहा जाता है। इस अर्थ में ये दोनों संकल्पनाएँ एक-दूसरे के विपरीत हैं।
अनुपालन का अर्थ तथा परिभाषाएँ
प्रत्येक समाज में व्यवहार करने के कुछ आदर्श प्रतिमान होते हैं। जब बच्चा पैदा होता है तो उसे समाज में प्रचलित आदर्शों, मान्यताओं, मूल्यों, प्रथाओं, रूढ़ियों आदि का कोई ज्ञान नहीं होता। समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा समाज अपने सदस्यों को इनका ज्ञान प्रदान करता है। इसी प्रकार के माध्यम से व्यक्ति उनका अपने व्यक्तित्व में आंतरीकरण कर लेते हैं और उन्हीं के अनुकूल व्यवहार करने लगते हैं। इसी को हम अनुपालन कहते हैं। अतः समाज द्वारा स्वीकृत आदर्श नियमों के अनुरूप व्यवहार करना ही अनुपालन है। इसे विद्वानों ने निम्नवर्णित प्रकार से परिभाषित किया है-
1. मर्टन (Merton) के अनुसार-"इस शब्द का सामान्य अर्थ यह है कि व्यक्ति जिस समूह का सदस्य है उसमें प्रचलित आदर्शों एवं प्रत्याशाओं के अनुरूप व्यवहार करें।
2. जॉनसन (Johnson) के अनुसार-"अनुपालन वह क्रिया है जो (1) सामाजिक आदर्श या आदर्शों की ओर अभिमुख होती है और (2) सामाजिक आदर्श द्वारा स्वीकृत व्यवहार के अनुसार होती है। अन्य शब्दों में, अनुपालन केवल मान्य सामाजिक आदर्शों के अनुसार व्यवहार करना ही नहीं है। संबंधित आदर्श भी क्रिया करने वाले कर्ता की प्रेरणा के अंग हैं, चाहे वह अनिवार्य रूप से इनके बारे में एक समय विशेष पर अथवा सदैव जागरूक नहीं होता।"
3. कुले (Cooley) के अनुसार-"अनुपालन एक समूह द्वारा निर्धारित प्रतिमानों को बनाए रखने ” का प्रयत्न है। यह क्रिया के स्वरूपों का एक स्वैच्छिक अनुकरण है।”
4. थियोडोरसन एवं थियोडोरसन (Theodorson and Theodorson) के अनुसार “सामाजिक समूह की प्रत्याशाओं के अनुसार व्यवहार करना ही अनुपालन है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी समाज के सदस्यों द्वारा स्वीकृत आदर्शों या प्रतिमानों के अनुसार व्यवहार करना ही अनुपालन है। वास्तव में, समाज के आदर्शों एवं मूल्यों में समाज या समूह की दबाव की शक्ति होती है जो व्यक्ति को इनके अनुसार व्यवहार करने के लिए प्रेरित करती है। समाजीकरण तथा सामाजिक नियंत्रण द्वारा व्यक्तियों के व्यवहार में अनुपालन लाने का प्रयास किया जाता है।
अनुपालन की विशेषताएँ
अनुपालन की संकल्पना को इसकी निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-
1. सामाजिक आदर्शों से संबंधित सामाजिक आदर्श, प्रथाएँ, रूढ़ियाँ जनरीतियाँ अथवा कानून वे मानदंड हैं जो व्यक्ति को समाज द्वारा स्वीकृत व्यवहार करने के लिए प्रेरित करते हैं। अनुपालन का संबंध व्यवहार के इन्हीं मानदंडों से है क्योंकि इनके अनुसार व्यवहार करना ही अनुपालन कहलाता है।
2. कर्तव्यों का ज्ञान-अनुपालन का संबंध कर्तव्यों के ज्ञान से हैं अर्थात् अनुपालन में व्यक्ति से यह आशा की जाती है कि वह अपने कर्तव्यों व अधिकारों के अनुसार ही समाज द्वारा स्वीकृत व्यवहार करेगा।
3. मूर्त क्रियाएँ-अनुपालन की दूसरी विशेषता यह है कि इसका संबंध मानदंडों के अनुरूप मूर्त क्रियाओं से है अर्थात् व्यक्ति की क्रियाओं से ही हम इस बात का पता लगा सकते हैं कि व्यक्ति में अनुपालन पाया जाता है अथवा नहीं।
4. संगठन से संबंधित-अनुपालन का एक अन्य लक्षण यह है कि इससे किसी समाज में संगठन तथा व्यवस्था बनाए रखने में सहायता मिलती है। अगर किसी समाज के व्यक्ति मान्यताओं के अनुरूप व्यवहार नहीं करेंगे तो उस समाज में विघटन की स्थिति पैदा हो सकती है।
5. मानदंडों में भिन्नता-अनुपालन की प्रकृति में भिन्नता पाई जाती है अर्थात् यह सभी समाजों के एक समान व्यवहार से संबंधित नहीं है। इसलिए इसके मानदंडों में भी भिन्नता पाई जाती है।
अनुपालन के प्रमुख कारण
प्रत्येक समाज यह, चाहता है कि उसके सभी सदस्य समाज द्वारा स्वीकृत आदर्शों के अनुसार ही व्यवहार करें ताकि इससे अनुपालन बना रहे और समाज में स्थायित्व व संगठन भी बना रहे। अतः प्रत्येक समाज अनेक ऐसे उपाय करता है जो अनुपालन को प्रोत्साहन दें तथा इसकी विपरीत स्थिति (अर्थात् विचलन) पर अंकुश लगाए रखें। अनुपालन को बनाए रखने में सहायक प्रमुख कारण अग्रांकित हैं-
1. समाजीकरण-अनुपालन में सहायक सर्वप्रथम कारण समाजीकरण की प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्ति में सामाजिक आदशों व मानदंडों के अनुरूप व्यवहार करने का ज्ञान प्रदान किया जाता है। वास्तव में समाजीकरण द्वारा ही सामाजिक आदर्शों व प्रतिमानों का आंतरीकरण होता है और वे व्यक्तित्व का अंग बन जाते हैं।
2. पद-सोपान-पद-सोपान भी व्यक्ति के व्यवहार में अनुपालन लाता है। इससे हमें यह पता चलता है कि सामाजिक आदर्शों में किस प्रकार का क्रम पाया जाता है और अगर एक व्यक्ति किसी परिस्थिति में एक आदर्श के अनुरूप व्यवहार नहीं कर पाए तो उसे उसके बाद किस आदर्श को मानना होता। आदर्शों के विकल्पों में पदे-सोपान पाया जाता है।
3. आवश्यकताओं की पूर्ति-व्यक्तियों के अनुपालन का एक अन्य कारण आवश्यकताओं की पूर्ति भी है। अनुपालन से जिन आवश्यकताओं की पूर्ति होती है वह विचलन से नहीं हो सकती और अगर होती भी है तो वह समाज द्वारा स्वीकृत नहीं होती ।
4. समूह का दबाव-समूह के दबाव के कारण भी व्यक्तियों में अनुपालन अधिक पाया जाता है। अगर व्यक्ति को यह अनुभव होता है कि सामूहिक मान्यताओं का उल्लंघन करने पर उसे समूह द्वारा दंड दिया जाएगा तो वह मान्यताओं व आदर्शों के अनुरूप ही व्यवहार करने का प्रयास करता है।
5. विचारधारा-विचारधारा व्यक्तियों के व्यवहार में अनुपालन बनाए रखने में सहायता प्रदान करती है। अगर समाज में प्रचलित विचारधाराएँ सामाजिक आदर्शों व मूल्यों का ही समर्थन करने वाली हैं तो व्यक्तियों के व्यवहार में अनुपालन की संभावना अधिक होती है।
6. निहित स्वार्थ-व्यक्ति निहित स्वार्थों के कारण भी सामाजिक आदर्शों का अनुकरण करता है। ताकि उसे इनसे सामाजिक सुरक्षा मिलती रहे। अनुपालन के कारण ही समाज व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा करते हैं।
7. सामाजिक नियंत्रण-जो व्यक्ति समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा आदर्शों के अनुरूप व्यवहार करना नहीं सीखते और इनके विरुद्ध व्यवहार करते हैं, उन पर समाज राज्य व कानून द्वारा नियंत्रण रखता है तथा उनके द्वारा बलपूर्वक उन्हें सामाजिक आदर्शों के अनुकूल व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है।
8. विसंवाहन-विसंवाहन का संबंध व्यक्तियों द्वारा विभिन्न भूमिकाओं के संपादन से है। व्यक्ति को अनेक भूमिकाएँ निभानी पड़ती हैं और कई बार कुछ भूमिकाएँ परस्पर विरोधी भी होती हैं। विसंवाहन द्वारा व्यक्ति अपनी भूमिकाओं को इस प्रकार से निभाता है कि उसके व्यवहार में अनुपालन बना रहता है।
In simple words: अनुपालन का अर्थ है समाज द्वारा निर्धारित नियमों और आदर्शों के अनुसार व्यवहार करना। यह व्यक्ति के समाजीकरण, पदसोपान, आवश्यकताओं की पूर्ति और सामाजिक नियंत्रण जैसे कारकों पर निर्भर करता है।
🎯 Exam Tip: अनुपालन की अवधारणा, इसकी विशेषताओं और कारणों को स्पष्ट रूप से समझाना महत्वपूर्ण है। समाजशास्त्रीय संदर्भों में विचलन से इसका अंतर भी बताएं।
Question 6. समाजीकरण क्या है? इसके प्रमुख अभिकरणों की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
या
समाजीकरण क्या है? संक्षेप में समाजीकरण के प्रमुख अभिकरणों का उल्लेख कीजिए ।
या
समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवार तथा विद्यालय की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
या
“परिवार समाजीकरण का प्रमुख आधार है।” इस कथन की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
Answer: मनुष्य का जन्म समाज में होता है। समाज में जन्म लेने के पश्चात् वह धीरे-धीरे आस-पास के वातावरण के संपर्क में आता है और उससे प्रभावित होता है। प्रारंभ में मनुष्य एक प्रकार से जैविक प्राणी मात्र होता है; क्योंकि आहार, निद्रा आदि के अतिरिक्त उसे और किसी बात का ज्ञान नहीं होता। और उसकी अवस्था बहुत-कुछ पशुओं के समान होती है। इसके अतिरिक्त जन्म के समय बालक में सभी प्रकार के सामाजिक गुणों का भी अभाव होता है। सामाजिक गुणों के अभाव में बालक एक जैविक प्राणी मात्र ही होता है। माता-पिता के संपर्क में आकर वह मुस्कराना और पहचानना सीखता है। धीरे-धीरे वह अपने परिवार के अन्य सदस्यों के संपर्क में आता है और उनसे सामाजिक शिष्टाचार की अनेक बातें सीखता हैं। आगे चलकर और बड़े होने पर उसके सपंर्क का क्षेत्र और अधिक व्यापक हो जाता है तथा वह विभिन्न सामाजिक तरीकों से अपने कार्यों का संचालन करना सीख लेता है तथा उसका प्रत्येक व्यवहार समाज के नियमों के अनुसार होने लगता है। इस प्रकार, वह प्राणी से सामाजिक प्राणी बन जाता है और समाजशास्त्र में बच्चे के सामाजिक बनने की इस प्रक्रिया को ही समाजीकरण कहा जाता है।
समाजीकरण का अर्थ एवं परिभाषाएँ
समाजीकरण सीखने की एक प्रक्रिया है। इसी के परिणामस्वरूप व्यक्ति समाज में रहना सीखता है। अर्थात् एक सामाजिक प्राणी बनता है। संस्कृति का हस्तांतरण भी इसी प्रक्रिया के माध्यम से होता है। विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रतिपादित समाजीकरण की परिभाषाएँ निम्नवर्णित हैं-
1. ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार-"समाजीकरण से समाजशास्त्रियों का तात्पर्य है वह प्रक्रिया जिससे व्यक्ति का मानवीकरण होता है।”
2. ग्रीन (Green) के अनुसार-"समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बच्चा अपनी सांस्कृतिक विशेषताओं, आत्मपन और व्यक्तित्व प्राप्त करता है।”
3. जॉनसन (Johnson) के अनुसार-"समाजीकरण एक प्रकार का सीखना है जो सीखने वाले को सामाजिक कार्य करने योग्य बनाता है।”
4. बोगार्ड्स (Bogardus) के अनुसार-"समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति एक-दूसरे पर निर्भर रहकर व्यवहार करना सीखता है और इसके द्वारा सामाजिक आत्म-नियंत्रण सामाजिक उत्तरदायित्त्व तथा संतुलित व्यक्तित्व का अनुभव प्राप्त करता है।”
5. डेविस (Davis) के अनुसार-"परिवर्तन की इस प्रक्रिया के बिना, जिसे हम समाजीकरण कहते हैं, समाज एक पीढ़ी से भी आगे स्वयं को संतुलित नहीं कर सकता है और न ही संस्कृति जीवित रह सकती है। इसके बिना व्यक्ति सामाजिक प्राणी भी नहीं बन सकता है।'
6. कोनिग (Koenig) के अनुसार-"समीकरण से तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसमें एक व्यक्ति अपने समाज, जिसमें वह जन्मा है, जो कार्यरत (या उपयोगी) सदस्य बनता है अर्थात् समाज | की जनरीतियों एवं रूढ़ियों के अनुसार व्यवहार एवं कार्य करता है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि समाजीकरण की प्रक्रिया जीवन भर किसी-न-किसी रूप में चलती रहती है। इसी प्रक्रिया के माध्यम से संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्सांतरित होती है।
समाजीकरण के प्रमुख अभिकरण
समाज की विभिन्न संस्थाएँ व्यक्ति के समाजीकरण में योगदान देती आई हैं। ये संस्थाएँ अथवा अभिकरण निम्नलिखित हैं-
1. परिवार-बालक का समाजीकरण करने वाली प्रथम तथा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संस्था परिवार है। परिवार में ही बच्चे का जन्म होता है तथा सबसे पहले वह माता-पिता व अन्य परिवारजनों के ही संपर्क में आता है। परिवार के सदस्य बालक के समाजीकरण में अपना प्रथम तथा स्थायी योगदान प्रदान करते हैं। परिवार के सदस्यों का परस्पर सहयोग और प्रेम-भाव बालक को समाजीकरण के लिए प्रेरित करता है। किम्बाल यंग (Kimball Young) के शब्दों में, “समाज के अंतर्गत समाजीकरण की भिन्न-भिन्न संस्थाओं में परिवार' अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है ।” प्रत्येक बालक अपने माता-पिता से रीति-रिवाज, सामाजिक परंपराओं तथा सामाजिक शिष्टाचार का ज्ञान प्राप्त करता है। वह परिवार में ही रहकर आज्ञाकारिता, सामाजिक अनुकूलन तथा सहनशीलता की प्रवृत्ति को विकसित करता है। संभवतः इसलिए परिवार को बच्चे की प्रथम पाठशाला कहा गया है जो कि ठीक भी है। समाजीकरण में परिवार के महत्त्व को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है-
(i) माता-पिता के व्यवहार का प्रभाव-बच्चों के साथ माता-पिता का क्या और कैसा व्यवहार है, इस बात से ही बच्चे के सामाजिक जीवन का अनुमान लगाया जा सकता है। माता-पिता के व्यवहार को बालक के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अधिक लाड़-प्यार में पला बालक प्रायः बिगड़ जाता है। इसके साथ ही साथ माता-पिता से प्यार न मिलने पर बालक में हीन भावना ग्रन्थियाँ बनने लगती हैं और उसका व्यक्तित्व ठीक प्रकार से विकसित नहीं हो पाता।
(ii) माता-पिता के चरित्र का प्रभाव-समाजीकरण में माता-पिता के चरित्र का विशेष प्रभाव पड़ता है। चरित्रहीन माता-पिता के बालकों के व्यक्तित्व के संतुलित होने की कोई संभावना नहीं होती । जुआरी व शराबी माता-पिता की संतान नियंत्रणहीन हो जाती है और वह समाज-विरोधी कार्य करने लगती है। इसके विपरीत, चरित्रवान माता-पिता की संतान पर रीति-रिवाजों और प्रतिमानों द्वारा सामाजिक नियंत्रण की संभावना बनी रहती है।
(iii) भाई-बहनों का प्रभाव-परिवार में रहने वाले भाई-बहनों को भी बालक के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है। भाई-बहनों में बालक का जो स्थान होता है उससे बालक का व्यक्तित्व प्रभावित होता है। यदि उसका स्थान परिवार में सबसे प्रथम है तो वह अपने आचरण को संतुलित रखने का प्रयास करता है ताकि उसके छोटे भाई-बहन उसका सम्मान करें। एक ही पीढ़ी के होने के कारण भाई-बहनों का प्रभाव समाजीकरण में अत्यधिक पड़ता है।
(iv) पारिवारिक नियंत्रण का प्रभाव-माता-पिता के निंयत्रण का भी बच्चों अथवा परिवार के युवक-युवतियों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। नियंत्रणहीन परिवार में युवक-युवितयों के बिगड़ने की संभावना अधिक बनी रहती है। इसके विपीरत, जो परिवार नियंत्रित रहते हैं। उनके बच्चे पूर्ण से सुयोग्य एवं नियंत्रित रहते हैं।
(v) परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रभाव-परिवार की आर्थिक स्थिति भी बच्चे के समाजीकरण को प्रभावित करती है। यदि परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है तो बच्चे की संभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर दी जाती है जिससे बच्चा अपराधों की ओर आकर्षित नहीं होता। इसके विपरीत, निर्धन परिवार के बच्चों की आवश्यकता की पूर्ति नहीं होती। इन परिवारों के बच्चों में हीन-भावना ग्रथियों का निर्माण हो जाता है और वे समाज-विरोधी कार्य करने लगते हैं।
(vi) नागरिक गुणों की पाठशाला - परिवार को ही नागरिक गुणों की प्रथम पाठशाला कहो गया है। परिवार में रहकर ही बच्चा सर्वप्रथम सहानुभूति, प्रेम, त्याग, सहिष्णुता, आज्ञापालन आदि गुणों को सीख जाता है। इन्हीं से व्यक्ति का समाजीकरण संभव होता है।
2. पड़ोस-परिवार के पश्चात् बालक अपने पड़ोस के संपर्क में आता है। पड़ोस के वातावरण से बालक पर्याप्त प्रभावित होता है। पड़ोसियों का परस्पर प्रेम, सहयोग तथा सद्भाव बालक के समाजीकरण में विशेष योगदान करता है। पड़ोस के बालक परस्पर मिलकर खेलते हैं। इस खेल में या तो बालक अन्य बालकों का नेतृत्व करता है या किसी बालक के नेतृत्व में कार्य करता है।
इस प्रकार, बालक के समाजीकरण की प्रक्रिया चलती रहती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए अच्छे पड़ोस में रहना पसंद किया जाता है। यदि पड़ोस अच्छा नहीं है तो बच्चों के समाजीकरण की प्रक्रिया भी दूषित हो जाती है।
3. विद्यालय परिवार तथा पड़ोस के पश्चात बालक के समाजीकरण में विद्यालय महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है। विद्यालय समाज का लघु रूप होता है; अतः बालक को वहाँ अनेक सामाजिक अनुभव होते हैं और अनेक सामाजिक क्रियाओं में भाग लेने के अवसर मिलते हैं। बालक के परस्पर मिलने-जुलने, उठने-बैठने, खेलने-कूदने तथा सहयोगपूर्वक श्रमदान आदि में भाग लेने से उसमें सामाजिकता की भावना का विकास होता है। समाज के नियमों और व्यवहारों का प्रायोगिक ज्ञान प्राप्त करने की दृष्टि से विद्यालय का सर्वोच्च स्थान है यह समाजीकरण का महत्त्वपूर्ण औपचारिक अभिकरण है। विद्यालय के महत्त्व को निम्नलिखित तथ्यों से समझा जा सकता है-
(i) स्कूल के वातावरण का प्रभाव-स्कूल का वातावरण भी बच्चों के जीवन को प्रभावित करता है। यदि स्कूल में अनुशासन ठीक है और सभी अध्यापक अपने उत्तरदायित्व का पूरा ध्यान रखते हैं तो बच्चे का जीवन भी सुधरता है और उनमें जीवन को अनुशासित एवं संतुलित करने की क्षमता विकसित होती है। यदि स्कूल का वातावण दूषित हो तो इसके प्रभाव के कारण बच्चों के व्यक्तित्व का ठीक प्रकार से विकास नहीं हो पाता है।
(ii) शिक्षक के व्यक्तित्व का प्रभाव-बालक के जीवन पर उसके अध्यापकों तथा गुरुओं के व्यक्तित्व और चरित्र का गहरा प्रभाव पड़ता है। अध्यापक के आदर्श बच्चों के जीवन को पूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं। बच्चों के सोचने-विचारन, उठने-बैठने, बोलने तथा हाव-भाव आदि पर अध्यापकों के व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ता है। यह प्रभाव दोनों ही प्रकार का हो सकता है। सुयोग्य अध्यापक बालकों में लोकप्रिय होकर अपना आदर्श बच्चों के अनुभव के लिए छोड़ जाते हैं। इसके विपरीत, कुछ अध्यापक अपने प्रति घृणा के भाव भी बच्चों के मन में छोड़ जाते हैं।
(iii) सहपाठियों का प्रभाव-बच्चों के व्यक्तित्व पर उनके सहपाठियों का भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। यदि सभी छात्र योग्य परिवार के हों तो बालकों की आदत पर अच्छा प्रभाव पड़ता है और यदि छात्रों की अधिकतर संख्या टूटे हुए (भग्न) परिवारों से संबंधित है। तो बच्चों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।
(iv) अध्यापकों के व्यवहार का प्रभाव-अध्यापकों के व्यवहार का भी बच्चों के चरित्र एवं व्यक्तित्व पर विशेष प्रभाव पड़ता है। बच्चों के साथ यदि अध्यापकों का व्यवहार उचित हो तो बच्चे मन लगाकर कार्य करते हैं। इसके विपरीत, यदि बच्चों के साथ कठोर व्यवहार हो तो वे कक्षा में उपस्थित होने से मन चुराने लगते हैं तथा विद्यालय के समय को बुरी संगति में बिताकर छुट्टी के समय घर पहुँच जाते हैं। इस प्रकार कुसंगति में पड़कर वे समाज-विरोधी कार्य करने लगते हैं और उनके समाजीकरण की प्रक्रिया में बाधा पड़ती है।
4. मित्र-मण्डली-अपनी मित्र-मंडली में रहना प्रत्येक बालक पसंद करता है। मित्र-मंडली एक ऐसा प्राथमिक समूह है जिसमें बालक अनेक बातें सीखता है। मित्रों का परस्पर व्यवहार तथा शिष्टाचार भी समाजीकरण में सहायक होता है। बच्चा अपने मित्रों से बहुत कुछ सीखता है। क्योंकि एक ही आयु-समूह होने के कारण बच्चे एक-दूसरे को अत्यधिक प्रभावित करते हैं। परंतु बुरी मित्र-मंडली का प्रभाव बालक को असामाजिक बना देता है। परिवार के बाद मित्र-मंडली ही एक ऐसा प्राथमिक अभिकरण है जिसकी बच्चे के समाजीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
5. क्रीड़ा-समूह-मित्र-मंडली के समान बालक के समाजीकरण में क्रीड़ा-समूह भी अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। बड़े होने पर बालक अपने साथी-समूह में खेलता है तो वह अनेक परिवारों से आए बालको के संपर्क में आता है और उनके बोलचाल तथा शिष्टाचार के ढंगों को सीखता है। प्रत्येक बालक एक-दूसरे को कुछ-न-कुछ सामाजिक व्यवहार के पाठ का शिक्षण देता है। क्रीड़ा-समूह बालकों में सामाजिक अनुशासन भी उत्पन्न करता है। क्रीड़ा-समूह में रहकर बालक सहयोग, न्याय, अनुकूलन तथा प्रतिस्पर्धा आदि सामाजिक गुणों को अर्जित करता है तथा ये गुण क्रमशः विकसित होकर जीवन भर उसके काम आते हैं।
6. जाति-जाति' (Caste) से भी व्यक्ति को समाजीकरण होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति के प्रति श्रद्धा की भावना रखता है और उसके प्रति कर्तव्य का पालन करना सीखता है। प्रत्येक जाति को अपनी प्रथाएँ परंपराएँ और सांस्कृतिक उपलब्धियाँ होती हैं। व्यक्ति इनको किसी-न-किसी रूप में ग्रहण करता है। जाति के नियम पालन, उसके अनुशासन में रहना आदि व्यक्ति के समाजीकरण में योगदान देते हैं।
7. जन-माध्यम-आज के इलेक्ट्रॉनिक युग में जन-माध्यम हमारे दैनिक जीवन का अनिवार्य अंग बन गए हैं। इसमें पत्र-पत्रिकाएँ, रेडियो, टेलीविजन, फिल्मों इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है। बच्चों को संस्कृति तथा इसमें हो रहे परिवर्तनों का ज्ञान देने में जन-माध्यमों की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो गई है। बच्चों तथा बड़ों पर हुए अध्ययनों से यह पता चलता है कि विभिन्न जन-माध्यमों को उनके मूल्यों, आदर्शों, व्यवहार प्रतिमानों, दृष्टिकोण इत्यादि पर गहरा प्रभाव पड़ता है। रामायण तथा महभारत जैसे धारावाहिकों ने बच्चों को परंपरागत भारतीय संस्कृति के आदर्शों से परिचित कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि समाजीकरण की प्रक्रिया में अनेक अभिकरण महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। इन अभिकरणों के अतिरिक्त संस्थाएँ, आर्थिक संस्थाएँ एवं राजनीतिक संस्थाएँ भी समाजीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इन सभी के सामूहिक योगदान के परिणामस्वरूप ही व्यक्ति सामाजिक विरासत को ग्रहण कर पाता है।
In simple words: समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति समाज के नियम, मूल्य और व्यवहार सीखते हुए एक सामाजिक प्राणी बनता है। परिवार, पड़ोस, विद्यालय, मित्र समूह और जन-माध्यम इसके प्रमुख अभिकरण हैं, जो व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
🎯 Exam Tip: समाजीकरण की परिभाषा को विभिन्न समाजशास्त्रियों के विचारों के साथ प्रस्तुत करें। विभिन्न अभिकरणों-परिवार, पड़ोस, विद्यालय, मित्र-मंडली, जाति और जन-माध्यम-की भूमिका को उदाहरणों सहित स्पष्ट करना आवश्यक है।
Question 7. व्यक्तित्व किसे कहते हैं? इसको प्रभावित करने वाले कारक बताइए ।
या
व्यक्तित्व को परिभाषित कीजिए तथा इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए ।
या
व्यक्तित्व की संकल्पना स्पष्ट कीजिए।
Answer: 'व्यक्तित्व' शब्द का साधारण बोल-चाल में बहुत अधिक प्रयोग होता है। प्रत्येक बालक भी अपने व्यक्तित्व के विकास एवं निखार के प्रति सजग रहता है। अन्य व्यक्तियों के व्यक्तित्व का भी भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से निरंतर मूल्यांकन किया जाता रहता है। फिल्मी कलाकारों, राजनीतिक नेताओं, शिक्षकों तथा अभिभावकों तक के व्यक्तित्व की चर्चा की जाती है। इसके अतिरिक्ति व्यवसाय वरण करने वाले युवक भी व्यक्तित्व परीक्षण की बात किया करते हैं; यथा-इंटरव्यू में व्यक्तित्व का विशेष प्रभाव पड़ता है' आदि। स्पष्ट है कि व्यक्तित्व' शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया जाता है।
व्यक्तित्व का अर्थ एवं परिभाषाएँ
सामान्य बोलचाल की भाषा में प्रयोग होने वाले शब्द 'व्यक्तित्व' का आशय संबंधित व्यक्ति के बाहरी पक्ष से होता है। इस दृष्टिकोण से यदि व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) समय के अनुकूल वस्त्र धारण करे, अच्छे तथा सौम्य ढंग का फैशन करे तो माना जाता है कि अमुक व्यक्ति का व्यक्तित्व श्रेष्ठ है। इस दृष्टिकोण से व्यक्तित्व के निर्धारण में शारीरिक पक्ष को ही महत्त्व दिया जाता है। इस प्रचलित अर्थ के अतिरिक्ति दार्शनिक दृष्टिकोण से भी व्यक्तित्व का विवेचन किया जाता है। दार्शनिक दृष्टिकोण से व्यक्तित्व से आशय व्यक्ति के आंतरिक रूप से होता है। इस दृष्टिकोण से व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्धारण उसकी आत्मा या आध्यात्मिक गुणों के आधार पर किया जाता है। यदि तटस्थ भाव से देखा जाए तो मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्यक्तित्व संबंधी उपर्युक्त दोनों ही मत एकांगी तथा अपने आप में अपूर्ण हैं। व्यक्तित्व की पूर्ण व्याख्या के लिए इस शब्द के शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ वास्तविक अर्थ एवं परिभाषाओं का भी विवेचन करना होगा।
व्यक्तित्व की अवधारणा एक जटिल अवधारणा है। व्यक्तित्व' शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द *Personality' का हिंदी रूपांतर है जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के persona' शब्द से हुई है। इसका पारंपरिक अर्थ वेशभूषा है, जो नाटकों के समय कलाकरों द्वारा धारण की जाती थी। उदाहरणार्थ-यदि कोई कलाकार सम्राट की वेशभूषा धारण करके रंगमंच पर प्रस्तुत होता था तो उस रूप को विशिष्ट व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया जाता था। इस पारंपरिक अर्थ को ही आधार पर आगे चलकर व्यक्ति के गुणों को 'पर्साना' (व्यक्तित्व) के रूप में जाना जाने लगा। व्यक्तित्व के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा जाता है कि व्यक्ति की जितनी भी विशेषताएँ अथवा विलक्षणताएँ होती हैं, उन सबका समन्वित अथवा संगठित (Integrated) रूप ही व्यक्तित्व है। यह एक प्रकार का गत्यात्मक संगठन (Dynamic organisation) होता है। शरीर से संबंधित विशेषताओं को व्यक्तित्व का बाहरी पक्ष माना जाता है। इससे भिन्न व्यक्ति की बुद्धि, योग्यताएँ, आदतें, रुचियाँ, दृष्टिकोण, चरित्र आदि विशेषताएँ व्यक्तित्व के आंतरिक पक्ष का प्रतिनिधित्व करती हैं।
व्यक्तित्व को निम्न प्रकार से परिभाषित करते हैं।
1. ऑलपोर्ट के अनुसार-"व्यक्तित्व व्यक्ति के भीतर उन मनोदैहिक गुणों का गत्यात्मक संगठन है जो परिवेश के प्रति होने वाले अपूर्व अभियोजनों का निर्णय करते हैं।”
2. मन के अनुसार-"व्यक्तित्व की परिभाषा एक व्यक्ति के ढाँचे, व्यवहार के रूपों, रुचियों, अभिवृत्तियों, सामथ्र्यो, योग्यताओं तथा अभिरुचियों के सबसे अधिक लाक्षणिक संकलन के रूप में की जा सकती है।”
3. मार्टन प्रिन्स के शब्दों में-"व्यक्तित्व समस्त शारीरिक, जन्मजात तथा अर्जित प्रवृत्तियों का योग है।” प्रकार के आंतरिक एवं बाहरी गुणों का समावेश होता है। व्यक्ति के व्यवहार से जो कुछ भी प्रकट होता है, वह सब उसके व्यक्तित्व का ही परिणाम होता है। इन समस्त परिभाषाओं से ज्ञात होता है कि व्यक्ति के केवल बाहरी रूप को ही नहीं बल्कि बाहरी व आंतरिक अर्थात् शारीरिक व मानसिक गुणों के योग को व्यक्तित्व के रूप में परिभाषित किया जाता है।
व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले कारक
व्यक्ति अथवा बालक के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों के अभीष्ट विकास के लिए मुख्य रूप से दो कारकों को उत्तरदायी ठहराया जाता है, ये कारक हैं-वंशानुक्रमण (Heredity) तथा पर्यावरण (Environment) । भिन्न-भिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से इन दोनों की भूमिका तथा महत्त्व का वर्णन किया है। कुछ विद्वान् व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण एवं विकास के लिए केवल आनुवंशिकता को ही महत्त्व देते हैं तथा स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जैसी वंश परंपरा एवं विशेषताएँ होंगी, वैसी ही उनकी संतानें भी होंगी। इस मत के समर्थक विद्वान् पर्यावरण को गौण मानते हैं तथा उनके अनुसार व्यक्ति स्वयं अपने अनुकूल पर्यावरण को तैयार कर लेता है। इसके विपरीत, विद्वानों का एक अन्य वर्ग व्यक्ति के विकास में पर्यावरण के कार्य भाग को अधिक महत्त्व देता है। इस मत के समर्थक एक विद्वान का कहना है, “नवजात शिशु अनिश्चित रूप से लचीला होता है। उसके अनुसार, “मुझे एक दर्जन बच्चे दे दीजिए, मैं आपकी माँग के अनुसार उनमें से किसी को भी चिकित्सक, वकील, व्यापारी अथवा चोर बना सकता हूँ। मनुष्य कुछ नहीं है, वह पर्यावरण का दास है, उसकी उपज है। इस कथन के अनुसार स्पष्ट है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में उसके वंश-परंपरा का कोई महत्त्व नहीं है, केवल पर्यावरण ही उसके व्यक्तित्व का निर्धारण करता है। आज यह स्वीकार किया जाने लगा है कि व्यक्तित्व के निर्माण में वंशानुक्रमण एवं पर्यावरण दोनों का ही प्रभाव पड़ता है। इसलिए इन दोनों को थोड़ा विस्तारपूर्वक समझ लेना अनिवार्य है-
1. वंशानुक्रमण-व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण एवं विकास को प्रभावित करने वाले एक मुख्य कारक को आनुवंशिकता अथवा वंशानुक्रमण कहा जाता है। हिंदी के वंशानुक्रमण' शब्द के अंग्रेजी पर्यायवाची 'हेरेडिटी' (Heredity) है। यह शब्द वास्तव में लैटिन शब्द 'हेरिडिस' (Heriditas) से व्युत्पन्न हुआ है। लैटिन भाषा में इस शब्द का आशय उस पूँजी से होता है, जो बच्चों को माता-पिता से उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त होती है। प्रस्तुत संदर्भ में वंशानुक्रमण का आशय व्यक्तियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित होने वाले शारीरिक, बौद्धिक तथा अन्य व्यक्तित्व संबंधी गुणों से है। इस मान्यता के अनुसार बच्चों या संतान के विभिन्न गुण एवं लक्षणे अपने माता-पिता के समान होते हैं। उदाहरणार्थ-गोरे माता-पिता की संतान गोरी होती हैं। लंबे कद के माता-पिता की संतान भी लंबी होती है। इसी तथ्य के अनुसार प्रजातिगत विशेषताएँ सदैव बनी रहती है। वंशानुक्रमण के ही कारण मनुष्य की प्रत्येक संतान मनुष्य ही होती है। कभी भी कोई बिल्ली कुत्ते को जन्म नहीं देती। ऐसा माना जाता है कि लिंग-भेद, शारीरिक लक्षणों, बौद्धिक प्रतिभा, स्वभाव पर वंशानुक्रमण का गंभीर प्रभाव पड़ता है। वंशानुक्रमण एक प्रबल एवं महत्त्वपूर्ण कारक है, परंतु इसे एकमात्र कारक मानना अंसगत है। इसके अतिरिक्त पर्यावरण भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है, जिसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिए।
2. पर्यावरण-व्यक्ति को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाला एक मुख्य कारक पर्यावरण भी है। पर्यावरण का प्रभाव केवल मनुष्यों पर ही नहीं, वरन् विश्व की प्रत्येक जड़-चेतन वस्तू पर पड़ता है। मनुष्य के साथ-साथ पेड़-पौधे, पशु-पक्षी एवं भौतिक पदार्थ भी पर्यावरण के प्रभाव से मुक्त नहीं हैं। वनस्पतिशास्त्रियों ने सिद्ध कर दिया है कि अनेक पेड़-पौधे केवल एक विशिष्ट प्रकार के पर्यावरण (जलवायु आदि) में ही उग सकते हैं। इसी प्रकार पशु-पक्षी भी पर्यावरण पर निर्भर करते हैं। पहाड़ों पर रहने वाला सफेद भालू गर्म मैदानों में नहीं रह सकता। जहाँ तक मनुष्य का प्रश्न है वह भी पर्यावरण से अत्यधिक प्रभावित होता है। वैसे यह सत्य है। कि मनुष्य पूर्णतया पर्यावरण का दास नहीं है। मनुष्य में अपने पर्यावरण को एक सीमा तक नियंत्रित एवं परिवर्तित करने की भी क्षमता है, परंतु इस क्षमता के होते हुए भी सामान्य रूप से व्यक्ति को पर्यावरण के प्रभाव से मुक्त नहीं माना जा सकता। पर्यावरण मनुष्य को कहाँ तक प्रभावित करता है तथा पर्यावरण को मनुष्य कहाँ तक नियंत्रित कर सकता है, यह एक भिन्न प्रश्न है। इस विवाद से बचते हुए यह स्वीकार किया जा सकता है कि व्यक्ति का जीवन पर्यावरण से प्रभावित अवश्य होता है। हिंदी के 'पर्यावरण' शब्द का अंग्रेजी पयार्यवाची Environment है। पर्यावरण' शब्द, दो शब्दों 'परि + आवरण' से मिलकर बना है। 'परि शब्द का अर्थ है 'चारों ओर' तथा 'आवरण' शब्द का अर्थ है 'ढके हुए। इस प्रकार से * ‘पर्यावरण' को अर्थ हुआ चारों ओर ढके हुए' या 'चारों ओर से घिरे हुए। इस स्थिति में व्यक्ति का पर्यावरण वह समस्त क्षेत्र है जो व्यक्ति को घेरे रहता है; अर्थात् विश्व में व्यक्ति के अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह उसका पर्यावरण है। पर्यावरणविदों को तो यहाँ तक कहना है कि व्यक्ति केवल अपने पर्यावरण की ही उपज है।” इस वर्ग के विद्वानों का कहना है कि पर्यावरण व्यक्ति को अनेक प्रकार से प्रभावित करता है। व्यक्ति के जीवन के विभिन्न पक्ष पर्यावरण के ही परिणामस्वरूप विकसित होते हैं। इस मत के अनुयायिओं के अनुसार मानव शिशु को इच्छानुसार विकसित किया जा सकता है, केवल अनुकूल पर्यावरण उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। पर्यावरणविदों के अनुसार यदि कोई समूह अपने पर्यावरण को नियंत्रित करने में सफल हो जाये तो वह अपने सदस्यों को सरलता से अभीष्ट रूप से विकसित कर सकता है। वातावरण के बहुपक्षीय तथा निश्चित प्रभावों को प्रमाणित करने के लिए अनेक सफल परीक्षण भी किए जा चुके हैं।
व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ
व्यक्तित्व का निर्माण मुख्य रूप से कुछ शीलगुणों की समग्रता के द्वारा होता है जिन्हें इसकी प्रमुख विशेषताएँ भी कहा गया है। ये विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. मानसिक गुण या तत्त्व-व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले मानसिक तत्त्वों (Mental Traits) को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जा सकता है। इन तीनों का संक्षिप्त परिचय निम्नवत् हैं-
(i) स्वभाव-व्यक्तित्व के निर्माण में व्यक्ति के स्वभाव का भी विशेष महत्त्व एवं योगदान होता है। स्वभाव के अनुसार ही व्यक्तित्व का निर्माण भी हो जाता है। सामान्य रूप से स्वभाव के आधार पर व्यक्तियों के चार वर्ग निर्धारित किए जाते हैं, जिन्हें क्रमशः आशावादी, निराशावादी, चिड़चिड़े तथा अस्थिर स्वभाव वाले कहा जाता है। स्वभाव के आधार पर व्यक्तियों के कुछ अन्य वर्ग भी निर्धारित किए जा सकते हैं, जैसे कि मिलनसार या संकोची स्वभाव वाले । सामान्य रूप से आशवादी तथा मिलनसार स्वभाव वाले व्यक्तियों के व्यक्तित्व को उत्तम माना जाता है।
(ii) ज्ञान एवं बुद्धि-व्यक्तित्व के निर्माण में व्यक्ति के ज्ञान एवं बुद्धि का विशेष योगदान होती है। बुद्धि ज्ञान-प्राप्ति का साधन है। उच्च बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति का व्यक्तिव निश्चित रूप से प्रभावशाली एवं उत्तम माना जाता है। इससे भिन्न औसत बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व भी सामान्य श्रेणी का होता है। मंदबुद्धि वाले व्यक्तियों में ज्ञान का भी प्रायः अभाव ही पाया जाता है। ऐसे व्यक्तियों का व्यक्तित्व निम्न स्तर का होता है तथा समाज में उनका किसी प्रकार का प्रभाव नहीं होता।
(iii) संकल्प-शक्ति एवं चरित्र-व्यक्तित्व के निर्माण में व्यक्ति की संकल्प-शक्ति तथा चरित्र का भी विशेष योगदान होता है। व्यक्तित्व के निर्माण का एक मुख्य तत्त्व व्यक्ति का चरित्र है। चरित्र एक ऐसा तत्त्व है, जिसे प्रत्यक्ष रूप में नहीं देखा जा सकता, परंतु व्यवहार में यह शीघ्र ही प्रकट हो जाता है। उच्च एवं सृदृढ़ चरित्र वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व उत्तम एवं सराहनीय होता है। इसके विपरीत निम्न चरित्र एवं दुर्बल । संकल्प-शक्ति वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व निम्न एवं निंदनीय होता है।
2. शारीरिक गुण एवं तत्व-व्यक्तित्व के निर्माण में व्यक्ति के शारीरिक गुणों एवं तत्त्वों को भी विशेष योगदान होता है। शारीरिक गुण एवं तत्त्व व्यक्ति के व्यक्तित्व के बाहरी पक्ष का निर्माण करते हैं। व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले शारीरिक तत्त्वों को प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले शारीरिक तत्त्वों में मुख्य हैं-शरीर की आकृति, लंबाई, गठन, वाणी, मुख-मुद्रा तथा भाव-भंगिमाएँ आदि । इसके अतिरिक्त शरीर पर धारण की जाने वाली वेशभूषा तथा शरीर को सजाने-सँवारने के ढंग आदि भी व्यक्तित्व के निर्माण में योगदान देते हैं। भिन्न-भिन्न शारीरिक लक्षणों वाले व्यक्तियों के व्यक्तित्व की भी भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ निर्धारित की गई हैं। आकर्षक शारीरिक लक्षणों वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व प्रथम दृष्टि से ही आकर्षक प्रतीत होती है, परंतु यदि मानसिक गुण अनुकूल न हों तो शारीरिक पक्ष आकर्षक होते हुए भी । क्रमशः व्यक्ति का व्यक्तित्व अपनी गरिमा खो बैठता है तथा प्रथम दृष्टि में पड़ने वाला उसका प्रभाव घटने लगता है।
3. सामाजिकता - यह सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण एवं विकास सामाजिक पर्यावरण में ही होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर कहा जा सकता है कि व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले तत्त्वों में सामाजिकता का भी विशेष स्थान है। व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास उसकी सामाजिक अभिवृत्ति के ही अनुकूल होता है। सामाजिकता को अधिक महत्त्व देने वाले व्यक्तियों का व्यक्तित्व भिन्न प्रकार का होता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति सामाजिक कार्यकलापों में कम भाग लेते हैं, उनको व्यक्तित्व कुछ भिन्न रूप में विकसित होता है। अनेक व्यक्ति सामाजिक दृष्टिकोण से कुछ आक्रामक वृत्ति के होते हैं। ऐसे व्यक्तियों का व्यक्तित्व समाज में निंदनीय माना जाता है। स्पष्ट है कि सामाजिकता की मात्रा तथा स्वरूप भी व्यक्तित्व के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
4. दृढ़ता-व्यक्तित्व के निर्माण में उपर्युक्त तीन तत्त्वों के अतिरिक्त दृढ़ता (Persistence) को भी विशेष योगदान है। दृढ़ता से आशय है व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व संबंधी गुणों के प्रति स्थिर रहना। व्यक्तित्व संबंधी गुणों में दृढ़ता रहने पर ही व्यक्तित्व में स्थायित्व आता है तथा उसका प्रभाव पड़ता है। व्यक्तित्व की दृढ़ता से ही जीवन में अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है। तथा सफलता प्राप्त होती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि व्यक्तित्व के चारों आवश्यक तत्त्वों में सर्वाधिक महत्त्व दृढ़ता का ही है।
In simple words: व्यक्तित्व व्यक्ति के आंतरिक और बाहरी गुणों का समग्र रूप है, जिसमें उसका स्वभाव, बुद्धि, चरित्र, शारीरिक बनावट और सामाजिकता शामिल है। यह वंशानुक्रमण और पर्यावरण दोनों से प्रभावित होता है।
🎯 Exam Tip: व्यक्तित्व की अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए परिभाषाओं और विद्वानों के विचारों को शामिल करें। व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले कारकों (वंशानुक्रमण और पर्यावरण) तथा प्रमुख विशेषताओं (मानसिक, शारीरिक गुण, सामाजिकता और दृढ़ता) को विस्तार से समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 7. व्यक्तित्व किसे कहते हैं? इसको प्रभावित करने वाले कारक बताइए ।
Answer: 'व्यक्तित्व' शब्द का साधारण बोल-चाल में बहुत अधिक प्रयोग होता है। प्रत्येक बालक भी अपने व्यक्तित्व के विकास एवं निखार के प्रति सजग रहता है। अन्य व्यक्तियों के व्यक्तित्व का भी भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से निरंतर मूल्यांकन किया जाता रहता है। फिल्मी कलाकारों, राजनीतिक नेताओं, शिक्षकों तथा अभिभावकों तक के व्यक्तित्व की चर्चा की जाती है। इसके अतिरिक्ति व्यवसाय वरण करने वाले युवक भी व्यक्तित्व परीक्षण की बात किया करते हैं; यथा-इंटरव्यू में व्यक्तित्व का विशेष प्रभाव पड़ता है' आदि। स्पष्ट है कि 'व्यक्तित्व' शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया जाता है।
व्यक्तित्व का अर्थ एवं परिभाषाएँ
सामान्य बोलचाल की भाषा में प्रयोग होने वाले शब्द 'व्यक्तित्व' का आशय संबंधित व्यक्ति के बाहरी पक्ष से होता है। इस दृष्टिकोण से यदि व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) समय के अनुकूल वस्त्र धारण करे, अच्छे तथा सौम्य ढंग का फैशन करे तो माना जाता है कि अमुक व्यक्ति का व्यक्तित्व श्रेष्ठ है। इस दृष्टिकोण से व्यक्तित्व के निर्धारण में शारीरिक पक्ष को ही महत्त्व दिया जाता है। इस प्रचलित अर्थ के अतिरिक्ति दार्शनिक दृष्टिकोण से भी व्यक्तित्व का विवेचन किया जाता है। दार्शनिक दृष्टिकोण से व्यक्तित्व से आशय व्यक्ति के आंतरिक रूप से होता है। इस दृष्टिकोण से व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्धारण उसकी आत्मा या आध्यात्मिक गुणों के आधार पर किया जाता है। यदि तटस्थ भाव से देखा जाए तो मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्यक्तित्व संबंधी उपर्युक्त दोनों ही मत एकांगी तथा अपने आप में अपूर्ण हैं। व्यक्तित्व की पूर्ण व्याख्या के लिए इस शब्द के शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ वास्तविक अर्थ एवं परिभाषाओं का भी विवेचन करना होगा।
व्यक्तित्व की अवधारणा एक जटिल अवधारणा है। 'व्यक्तित्व' शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द "Personality" का हिंदी रूपांतर है जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के "persona" शब्द से हुई है। इसका पारंपरिक अर्थ वेशभूषा है, जो नाटकों के समय कलाकरों द्वारा धारण की जाती थी। उदाहरणार्थ-यदि कोई कलाकार सम्राट की वेशभूषा धारण करके रंगमंच पर प्रस्तुत होता था तो उस रूप को विशिष्ट व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया जाता था। इस पारंपरिक अर्थ को ही आधार पर आगे चलकर व्यक्ति के गुणों को 'पर्साना' (व्यक्तित्व) के रूप में जाना जाने लगा। व्यक्तित्व के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा जाता है कि व्यक्ति की जितनी भी विशेषताएँ अथवा विलक्षणताएँ होती हैं, उन सबका समन्वित अथवा संगठित (Integrated) रूप ही व्यक्तित्व है। यह एक प्रकार का गत्यात्मक संगठन (Dynamic organisation) होता है। शरीर से संबंधित विशेषताओं को व्यक्तित्व का बाहरी पक्ष माना जाता है। इससे भिन्न व्यक्ति की बुद्धि, योग्यताएँ, आदतें, रुचियाँ, दृष्टिकोण, चरित्र आदि विशेषताएँ व्यक्तित्व के आंतरिक पक्ष का प्रतिनिधित्व करती हैं।
व्यक्तित्व को निम्न प्रकार से परिभाषित करते हैं।
1. ऑलपोर्ट के अनुसार-"व्यक्तित्व व्यक्ति के भीतर उन मनोदैहिक गुणों का गत्यात्मक संगठन है जो परिवेश के प्रति होने वाले अपूर्व अभियोजनों का निर्णय करते हैं।”
2. मन के अनुसार-“व्यक्तित्व की परिभाषा एक व्यक्ति के ढाँचे, व्यवहार के रूपों, रुचियों, अभिवृत्तियों, सामथ्र्यों, योग्यताओं तथा अभिरुचियों के सबसे अधिक लाक्षणिक संकलन के रूप में की जा सकती है।”
3. मार्टन प्रिन्स के शब्दों में-“व्यक्तित्व समस्त शारीरिक, जन्मजात तथा अर्जित प्रवृत्तियों का योग है।” प्रकार के आंतरिक एवं बाहरी गुणों का समावेश होता है। व्यक्ति के व्यवहार से जो कुछ भी प्रकट होता है, वह सब उसके व्यक्तित्व का ही परिणाम होता है। इन समस्त परिभाषाओं से ज्ञात होता है कि व्यक्ति के केवल बाहरी रूप को ही नहीं बल्कि बाहरी व आंतरिक अर्थात् शारीरिक व मानसिक गुणों के योग को व्यक्तित्व के रूप में परिभाषित किया जाता है।
व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले कारक
व्यक्ति अथवा बालक के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों के अभीष्ट विकास के लिए मुख्य रूप से दो कारकों को उत्तरदायी ठहराया जाता है, ये कारक हैं-वंशानुक्रमण (Heredity) तथा पर्यावरण (Environment) । भिन्न-भिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से इन दोनों की भूमिका तथा महत्त्व का वर्णन किया है। कुछ विद्वान् व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण एवं विकास के लिए केवल आनुवंशिकता को ही महत्त्व देते हैं तथा स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जैसी वंश परंपरा एवं विशेषताएँ होंगी, वैसी ही उनकी संतानें भी होंगी। इस मत के समर्थक विद्वान् पर्यावरण को गौण मानते हैं तथा उनके अनुसार व्यक्ति स्वयं अपने अनुकूल पर्यावरण को तैयार कर लेता है। इसके विपरीत, विद्वानों का एक अन्य वर्ग व्यक्ति के विकास में पर्यावरण के कार्य भाग को अधिक महत्त्व देता है। इस मत के समर्थक एक विद्वान का कहना है, “नवजात शिशु अनिश्चित रूप से लचीला होता है। उसके अनुसार, “मुझे एक दर्जन बच्चे दे दीजिए, मैं आपकी माँग के अनुसार उनमें से किसी को भी चिकित्सक, वकील, व्यापारी अथवा चोर बना सकता हूँ। मनुष्य कुछ नहीं है, वह पर्यावरण का दास है, उसकी उपज है। इस कथन के अनुसार स्पष्ट है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में उसके वंश-परंपरा का कोई महत्त्व नहीं है, केवल पर्यावरण ही उसके व्यक्तित्व का निर्धारण करता है। आज यह स्वीकार किया जाने लगा है कि व्यक्तित्व के निर्माण में वंशानुक्रमण एवं पर्यावरण दोनों का ही प्रभाव पड़ता है। इसलिए इन दोनों को थोड़ा विस्तारपूर्वक समझ लेना अनिवार्य है-
1. वंशानुक्रमण-व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण एवं विकास को प्रभावित करने वाले एक मुख्य कारक को आनुवंशिकता अथवा वंशानुक्रमण कहा जाता है। हिंदी के 'वंशानुक्रमण' शब्द के अंग्रेजी पर्यायवाची 'हेरेडिटी' (Heredity) है। यह शब्द वास्तव में लैटिन शब्द 'हेरिडिस' (Heriditas) से व्युत्पन्न हुआ है। लैटिन भाषा में इस शब्द का आशय उस पूँजी से होता है, जो बच्चों को माता-पिता से उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त होती है। प्रस्तुत संदर्भ में वंशानुक्रमण का आशय व्यक्तियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित होने वाले शारीरिक, बौद्धिक तथा अन्य व्यक्तित्व संबंधी गुणों से है। इस मान्यता के अनुसार बच्चों या संतान के विभिन्न गुण एवं लक्षणे अपने माता-पिता के समान होते हैं। उदाहरणार्थ-गोरे माता-पिता की संतान गोरी होती हैं। लंबे कद के माता-पिता की संतान भी लंबी होती है। इसी तथ्य के अनुसार प्रजातिगत विशेषताएँ सदैव बनी रहती है। वंशानुक्रमण के ही कारण मनुष्य की प्रत्येक संतान मनुष्य ही होती है। कभी भी कोई बिल्ली कुत्ते को जन्म नहीं देती। ऐसा माना जाता है कि लिंग-भेद, शारीरिक लक्षणों, बौद्धिक प्रतिभा, स्वभाव पर वंशानुक्रमण का गंभीर प्रभाव पड़ता है। वंशानुक्रमण एक प्रबल एवं महत्त्वपूर्ण कारक है, परंतु इसे एकमात्र कारक मानना अंसगत है। इसके अतिरिक्त पर्यावरण भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है, जिसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिए।
2. पर्यावरण-व्यक्ति को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाला एक मुख्य कारक पर्यावरण भी है। पर्यावरण का प्रभाव केवल मनुष्यों पर ही नहीं, वरन् विश्व की प्रत्येक जड़-चेतन वस्तू पर पड़ता है। मनुष्य के साथ-साथ पेड़-पौधे, पशु-पक्षी एवं भौतिक पदार्थ भी पर्यावरण के प्रभाव से मुक्त नहीं हैं। वनस्पतिशास्त्रियों ने सिद्ध कर दिया है कि अनेक पेड़-पौधे केवल एक विशिष्ट प्रकार के पर्यावरण (जलवायु आदि) में ही उग सकते हैं। इसी प्रकार पशु-पक्षी भी पर्यावरण पर निर्भर करते हैं। पहाड़ों पर रहने वाला सफेद भालू गर्म मैदानों में नहीं रह सकता। जहाँ तक मनुष्य का प्रश्न है वह भी पर्यावरण से अत्यधिक प्रभावित होता है। वैसे यह सत्य है। कि मनुष्य पूर्णतया पर्यावरण का दास नहीं है। मनुष्य में अपने पर्यावरण को एक सीमा तक नियंत्रित एवं परिवर्तित करने की भी क्षमता है, परंतु इस क्षमता के होते हुए भी सामान्य रूप से व्यक्ति को पर्यावरण के प्रभाव से मुक्त नहीं माना जा सकता। पर्यावरण मनुष्य को कहाँ तक प्रभावित करता है तथा पर्यावरण को मनुष्य कहाँ तक नियंत्रित कर सकता है, यह एक भिन्न प्रश्न है। इस विवाद से बचते हुए यह स्वीकार किया जा सकता है कि व्यक्ति का जीवन पर्यावरण से प्रभावित अवश्य होता है। हिंदी के 'पर्यावरण' शब्द का अंग्रेजी पयार्यवाची Environment है। 'पर्यावरण' शब्द, दो शब्दों 'परि + आवरण' से मिलकर बना है। 'परि शब्द का अर्थ है 'चारों ओर' तथा 'आवरण' शब्द का अर्थ है 'ढके हुए'। इस प्रकार से * 'पर्यावरण' को अर्थ हुआ 'चारों ओर ढके हुए' या 'चारों ओर से घिरे हुए'। इस स्थिति में व्यक्ति का पर्यावरण वह समस्त क्षेत्र है जो व्यक्ति को घेरे रहता है; अर्थात् विश्व में व्यक्ति के अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह उसका पर्यावरण है। पर्यावरणविदों को तो यहाँ तक कहना है कि व्यक्ति केवल अपने पर्यावरण की ही उपज है।” इस वर्ग के विद्वानों का कहना है कि पर्यावरण व्यक्ति को अनेक प्रकार से प्रभावित करता है। व्यक्ति के जीवन के विभिन्न पक्ष पर्यावरण के ही परिणामस्वरूप विकसित होते हैं। इस मत के अनुयायिओं के अनुसार मानव शिशु को इच्छानुसार विकसित किया जा सकता है, केवल अनुकूल पर्यावरण उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। पर्यावरणविदों के अनुसार यदि कोई समूह अपने पर्यावरण को नियंत्रित करने में सफल हो जाये तो वह अपने सदस्यों को सरलता से अभीष्ट रूप से विकसित कर सकता है। वातावरण के बहुपक्षीय तथा निश्चित प्रभावों को प्रमाणित करने के लिए अनेक सफल परीक्षण भी किए जा चुके हैं।
व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ
व्यक्तित्व का निर्माण मुख्य रूप से कुछ शीलगुणों की समग्रता के द्वारा होता है जिन्हें इसकी प्रमुख विशेषताएँ भी कहा गया है। ये विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. मानसिक गुण या तत्त्व-व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले मानसिक तत्त्वों (Mental Traits) को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जा सकता है। इन तीनों का संक्षिप्त परिचय निम्नवत् हैं-
1. स्वभाव-व्यक्तित्व के निर्माण में व्यक्ति के स्वभाव का भी विशेष महत्त्व एवं योगदान होता है। स्वभाव के अनुसार ही व्यक्तित्व का निर्माण भी हो जाता है। सामान्य रूप से स्वभाव के आधार पर व्यक्तियों के चार वर्ग निर्धारित किए जाते हैं, जिन्हें क्रमशः आशावादी, निराशावादी, चिड़चिड़े तथा अस्थिर स्वभाव वाले कहा जाता है। स्वभाव के आधार पर व्यक्तियों के कुछ अन्य वर्ग भी निर्धारित किए जा सकते हैं, जैसे कि मिलनसार या संकोची स्वभाव वाले । सामान्य रूप से आशवादी तथा मिलनसार स्वभाव वाले व्यक्तियों के व्यक्तित्व को उत्तम माना जाता है।
2. ज्ञान एवं बुद्धि-व्यक्तित्व के निर्माण में व्यक्ति के ज्ञान एवं बुद्धि का विशेष योगदान होती है। बुद्धि ज्ञान-प्राप्ति का साधन है। उच्च बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति का व्यक्तिव निश्चित रूप से प्रभावशाली एवं उत्तम माना जाता है। इससे भिन्न औसत बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व भी सामान्य श्रेणी का होता है। मंदबुद्धि वाले व्यक्तियों में ज्ञान का भी प्रायः अभाव ही पाया जाता है। ऐसे व्यक्तियों का व्यक्तित्व निम्न स्तर का होता है तथा समाज में उनका किसी प्रकार का प्रभाव नहीं होता।
3. संकल्प-शक्ति एवं चरित्र-व्यक्तित्व के निर्माण में व्यक्ति की संकल्प-शक्ति तथा चरित्र का भी विशेष योगदान होता है। व्यक्तित्व के निर्माण का एक मुख्य तत्त्व व्यक्ति का चरित्र है। चरित्र एक ऐसा तत्त्व है, जिसे प्रत्यक्ष रूप में नहीं देखा जा सकता, परंतु व्यवहार में यह शीघ्र ही प्रकट हो जाता है। उच्च एवं सृदृढ़ चरित्र वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व उत्तम एवं सराहनीय होता है। इसके विपरीत निम्न चरित्र एवं दुर्बल । संकल्प-शक्ति वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व निम्न एवं निंदनीय होता है।
2. शारीरिक गुण एवं तत्व-व्यक्तित्व के निर्माण में व्यक्ति के शारीरिक गुणों एवं तत्त्वों को भी विशेष योगदान होता है। शारीरिक गुण एवं तत्त्व व्यक्ति के व्यक्तित्व के बाहरी पक्ष का निर्माण करते हैं। व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले शारीरिक तत्त्वों को प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले शारीरिक तत्त्वों में मुख्य हैं-शरीर की आकृति, लंबाई, गठन, वाणी, मुख-मुद्रा तथा भाव-भंगिमाएँ आदि । इसके अतिरिक्त शरीर पर धारण की जाने वाली वेशभूषा तथा शरीर को सजाने-सँवारने के ढंग आदि भी व्यक्तित्व के निर्माण में योगदान देते हैं। भिन्न-भिन्न शारीरिक लक्षणों वाले व्यक्तियों के व्यक्तित्व की भी भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ निर्धारित की गई हैं। आकर्षक शारीरिक लक्षणों वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व प्रथम दृष्टि से ही आकर्षक प्रतीत होती है, परंतु यदि मानसिक गुण अनुकूल न हों तो शारीरिक पक्ष आकर्षक होते हुए भी । क्रमशः व्यक्ति का व्यक्तित्व अपनी गरिमा खो बैठता है तथा प्रथम दृष्टि में पड़ने वाला उसका प्रभाव घटने लगता है।
3. सामाजिकता- यह सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण एवं विकास सामाजिक पर्यावरण में ही होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर कहा जा सकता है कि व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले तत्त्वों में सामाजिकता का भी विशेष स्थान है। व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास उसकी सामाजिक अभिवृत्ति के ही अनुकूल होता है। सामाजिकता को अधिक महत्त्व देने वाले व्यक्तियों का व्यक्तित्व भिन्न प्रकार का होता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति सामाजिक कार्यकलापों में कम भाग लेते हैं, उनको व्यक्तित्व कुछ भिन्न रूप में विकसित होता है। अनेक व्यक्ति सामाजिक दृष्टिकोण से कुछ आक्रामक वृत्ति के होते हैं। ऐसे व्यक्तियों का व्यक्तित्व समाज में निंदनीय माना जाता है। स्पष्ट है कि सामाजिकता की मात्रा तथा स्वरूप भी व्यक्तित्व के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
4. दृढ़ता-व्यक्तित्व के निर्माण में उपर्युक्त तीन तत्त्वों के अतिरिक्त दृढ़ता (Persistence) को भी विशेष योगदान है। दृढ़ता से आशय है व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व संबंधी गुणों के प्रति स्थिर रहना। व्यक्तित्व संबंधी गुणों में दृढ़ता रहने पर ही व्यक्तित्व में स्थायित्व आता है तथा उसका प्रभाव पड़ता है। व्यक्तित्व की दृढ़ता से ही जीवन में अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है। तथा सफलता प्राप्त होती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि व्यक्तित्व के चारों आवश्यक तत्त्वों में सर्वाधिक महत्त्व दृढ़ता का ही है।
In simple words: Personality is the unique set of enduring behavioral and mental characteristics that define an individual. It's shaped by both inherited traits (heredity) and environmental factors (upbringing, culture, experiences). Key aspects include mental qualities, physical attributes, social adaptability, and persistence.
🎯 Exam Tip: When discussing personality, ensure you elaborate on both genetic predispositions and environmental influences, providing examples for each to secure full marks. Also, clearly define personality and its core components for a comprehensive answer.
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